আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1881 - أخبرنا عبد الله بن جعفر الفَسَوي، حدثنا يعقوب بن سفيان الفَسَوي، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا سعيد [1] بن أبي أيوب، عن الحسن بن ثَوْبان، عن هشام بن أبي رُقَيَّة، أنَّ أبا الدَّرداءِ وابن عباسٍ قالا: إِنَّ اسمَ الله الأكبرَ: رَبِّ رَبِّ [2].
আবূ দারদা ও ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন: নিশ্চয়ই আল্লাহর মহানতম নামটি হলো: রব্বি, রব্বি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: سعد. وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 273 و 14/ 32 عن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الدعاء" (119) من طريق عبد الله بن وهب، عن سعيد بن أبي أيوب، به.ووقع في المطبوع منه: سعيد بن أبي أيوب والحسن بن ثوبان، بالعطف، وهو خطأ، إنما هو سعيد بن أبي أيوب عن الحسن بن ثوبان.
[2] إسناده قوي من أجل الحسن بن ثوبان. وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 273 و 14/ 32 عن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الدعاء" (119) من طريق عبد الله بن وهب، عن سعيد بن أبي أيوب، به.ووقع في المطبوع منه: سعيد بن أبي أيوب والحسن بن ثوبان، بالعطف، وهو خطأ، إنما هو سعيد بن أبي أيوب عن الحسن بن ثوبان.
1882 - أخبرني أحمد بن محمد بن إسماعيل بن مِهْران، حدثنا أبي، حدثنا هشام بن عمّار، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثنا عبد الله العلاء، قال: سمعتُ القاسم يحدِّثُ عن أبي أُمامةَ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "اسمُ الله الأعظمُ في ثلاثِ سُوَرٍ من القرآن: في سورة البقرةِ، وآلِ عمران، وطه". قال القاسم: فالتمستُها، إنه: الحيُّ القيُّوم [1].
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহর ইসমে আ'যম (আল্লাহর মহানতম নাম) কুরআনের তিনটি সূরার মধ্যে রয়েছে: সূরা আল-বাক্বারাহ, সূরা আলে ইমরান, এবং সূরা ত্বা-হা।" কাসিম (বর্ণনাকারী) বলেন, আমি তা অনুসন্ধান করে পেয়েছি, তা হলো: আল-হাইয়্যুল ক্বাইয়্যূম।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح إن شاء الله، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن اختلف في رفعه ووقفه، كما فصّلناه في تعليقنا على "سنن ابن ماجه" (3856) و (3856 م).وسيأتي برقم (1887) و (1888). وسيكرره المصنف بإسناده ومتنه برقم (3485).وانظر الأحاديث الثلاثة التالية بعده، وما سيأتي أيضًا برقم (4166)، ومن وجه آخر حسن عن سعد برقم (4172).
1883 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب إملاءً، حدثنا محمد بن علي بن مَيْمُون الرَّقِّي، حدثنا محمد بن يوسف الفِرْيابي، حدثنا يونس بن أبي إسحاق، عن إبراهيم بن محمد بن سعد، عن أبيه، عن جدِّه سعد بن أبي وقّاص، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "دعوةُ ذي النُّون إذْ دعا وهو في بطن الحُوت: لا إلهَ إِلَّا أَنتَ، سبحانَكَ إِنِّي كنتُ من الظالمين، إنه لم يَدْعُ بها مسلمٌ في شيءٍ قطُّ، إلا استجابَ اللهُ له بها" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد رُوي عن الفِرْيابي عن سفيان الثوري عن يونس بن أبي إسحاق كذلك، وهو وهمٌ من الراوي:
সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যুন-নুনের (ইউনুস আ.) সেই দু'আ, যখন তিনি মাছের পেটে থেকে দু'আ করেছিলেন: 'লা ইলাহা ইল্লা আনতা সুবহানাকা ইন্নি কুনতু মিনায যোয়ালিমিন' (তুমি ছাড়া কোনো উপাস্য নেই, তুমি পবিত্র, নিশ্চয় আমি অত্যাচারীদের অন্তর্ভুক্ত ছিলাম)। কোনো মুসলিম যখনই এই দু'আর মাধ্যমে কোনো বিষয়ে দু'আ করবে, আল্লাহ অবশ্যই তার জন্য তা কবুল করবেন।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق.وأخرجه الترمذي (3505)، والنسائي (10417) من طريقين عن محمد بن يوسف الفريابي، بهذا الإسناد. وذكر الترمذي أنَّ بعضهم رواه عن يونس عن إبراهيم بن محمد بن سعد عن سعد، لم يذكر عن أبيه، ثم قال الترمذي: وكان يونس بن أبي إسحاق ربما ذكر في هذا الحديث عن أبيه، وربما لم يذكره.وأخرجه مطولًا ضمن قصةٍ أحمد 3/ (1462) عن إسماعيل بن عمر الواسطي، عن يونس بن أبي إسحاق، به. وسيكرره المصنف بإسناده ومتنه برقم (3485).وانظر الأحاديث الثلاثة التالية بعده، وما سيأتي أيضًا برقم (4166)، ومن وجه آخر حسن عن سعد برقم (4172).
1884 - حدَّثَناه أبو عمرو محمد بن أحمد بن إسحاق العدل، حدثنا أبو بكر محمد بن عبد الله بن جُوروَيهِ [1] الرازي، حدثنا عمر بن الخطاب الأهوازي، حدثنا محمد بن يوسف الفِرْيابي، حدثنا سفيان، عن يونس بن أبي إسحاق، عن أبيه، عن إبراهيم بن محمد بن سعد، عن أبيه [2] قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "دعوةُ ذي النُّون إِذْ دعا وهو في بطن الحوت: لا إله إلَّا أنتَ سبحانك إنِّي كنتُ من الظالمين، لا يدعو بها رجلٌ مسلمٌ في شيءٍ قطُّ، إِلَّا استجابَ اللهُ له" [3].
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মাছের পেটে থাকা অবস্থায় যুন-নূন (ইউনুস আ.)-এর দু‘আটি হলো: ‘লা ইলাহা ইল্লা আনতা সুবহানাকা ইন্নী কুনতু মিনায যালিমীন’ (আপনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, আপনি পবিত্র, নিশ্চয়ই আমি যালিমদের অন্তর্ভুক্ত ছিলাম)। কোনো মুসলিম ব্যক্তি কোনো বিষয়ে কখনো এই দু‘আ করলে আল্লাহ অবশ্যই তার দু‘আ কবুল করেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في النسخ الخطية: جوريه، وهو خطأ، والتصويب من "تاريخ بغداد" 3/ 452، و"الأنساب" للسمعاني 3/ 357 رسم (الجورويي).
[2] كذا في النسخ الخطية بصورة الإرسال، ووقع في المطبوع بعد هذا: "عن جده سعد بن أبي وقاص"، موصولًا، وصنيع الحافظ ابن حجر في "إتحاف المهرة" (5116) يوهم أنه موصول، حيث لم يشر إلى إرساله، والله أعلم.
1884 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد وقع فيه الوهم ممن دون الفريابي، فذكر فيه سفيان الثوري بين الفريابي ويونس كما قال المصنف، فقد رواه جمعٌ عن الفريابي - كما سلف في تخريج الحديث الذي قبله - لم يذكروا فيه سفيان، فالوهم إما من عمر بن الخطاب الأهوازي فهو صدوق كما في "التقريب"، أو من محمد بن عبد الله بن جورويه، فقد ترجمه الخطيب في "تاريخ بغداد" ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا. ثم إذا كان الصواب في رواية سفيان هذه أنه مرسل، فهذا وهمٌ آخر، حيث المحفوظ أنه من حديث سعد بن أبي وقاص موصولًا، والله تعالى أعلم.ولم نقف عليه من هذا الوجه عند غير المصنف.
1885 - فأخبرَناه أبو عبد الله الصَّفَّار، حدثنا ابن أبي الدُّنيا، حدّثني عُبيد بن محمد، حدثنا محمد بن مُهاجر القُرَشي، حدثني إبراهيم بن محمد بن سعد، عن أبيه، عن جدِّه قال: كنا جلوسًا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "ألا أخبِرُكم بشيء إذا نزل برجل منكم كَرْبٌ أو بلاءٌ من بلايا الدنيا دعا به يُفَرَّجْ عنه؟ " فقيل له: بلى، فقال: "دعاءُ ذي النُّون: لا إله إلَّا أنتَ، سبحانَك إنِّي كنتُ من الظالمين" [1].
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে ছিলাম। তিনি বললেন: "আমি কি তোমাদের এমন একটি বিষয় সম্পর্কে খবর দেব না যে, যখন তোমাদের কারো উপর পার্থিব কোনো কষ্ট বা বিপদ নেমে আসে, তখন সে যদি সেই দোয়া করে, তবে তা তার থেকে দূর হয়ে যায়?" তাঁকে বলা হলো: হ্যাঁ। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা হলো যুন-নূনের (ইউনুস আঃ-এর) দোয়া: 'লা ইলাহা ইল্লা আনতা সুবহানাকা ইন্নি কুনতু মিনায যালিমীন' (আপনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, আপনি পবিত্র, নিশ্চয়ই আমি ছিলাম জালিমদের অন্তর্ভুক্ত)।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبيد بن محمد - وهو المحاربي - وشيخُه محمد بن مهاجر القرشي قال البخاري: لا يتابع على حديثه.وأخرجه النسائي (10416) عن القاسم بن زكريا، عن عبيد بن محمد، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو عمر الجوري في "قوارع القرآن" (70) عن أبي عبد الله الحاكم إجازةً، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 17/ 82 من طريق يحيى بن صالح، عن أبي يحيى بن عبد الرحمن، عن بشر بن منصور، عن علي بن زيد عن سعيد بن المسيب، به. أبو يحيى بن عبد الرحمن لم نتبينه، وعلي بن زيد - وهو ابن جدعان - ضعيف، فيحتمل أن تكون رواية عمرو بن بكر السكسكي عن علي بن زيد هذا، فأبدله عمرو بن بكر أو ابنه إبراهيم بمحمد بن زيد - وهو ابن المهاجر الثقة - ولا يستبعد هذا فهما متهمان، والله تعالى أعلم.لكن صحَّ الحديث بسياقة أخرى من وجه آخر عن سعد، انظر الأحاديث الثلاثة السابقة.
1886 - حدَّثَناه الزُّبير بن عبد الواحد الحافظ، حدثنا محمد بن الحسن بن قُتيبة العَسْقلاني، حدثنا أحمد بن عمرو بن بَكْر السَّكْسَكيّ، حدّثني أبي، عن محمد بن زيد [1]، عن سعيد بن المسيّب، عن سعد بن مالكٍ قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "هل أدلُّكم على اسمِ الله الأعظم الذي إذا دُعِيَ به أجاب، وإذا سُئِلَ به أَعطَى؟ الدعوةُ التي دعا بها يُونُسُ حيثُ ناداه في الظُّلُمات الثلاث: لا إله إلَّا أنتَ، سبحانَكَ إِنِّي كنتُ من الظالمين"، فقال رجل: يا رسولَ الله، هل كانت ليونُسَ خاصةً أم للمؤمنين عامة؟ فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ألا تسمعُ قولَ الله عز وجل: {فَاسْتَجَبْنَا لَهُ وَنَجَّيْنَاهُ مِنَ الْغَمِّ وَكَذَلِكَ نُنْجِي الْمُؤْمِنِينَ} [الأنبياء: 88] " وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أيُّما مسلمٍ دعا بها في مَرَضِه أربعينَ مرةً، فمات في مَرَضِه ذلك، أُعطِيَ أجرَ شهيد، وإن بَرَأَ بَرَأَ وقد غُفِرَ له جميعُ ذنوبه" [2].
সাদ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমি কি তোমাদেরকে আল্লাহর সেই ইসমে আ'যম (মহান নাম) সম্পর্কে বলে দেব, যার দ্বারা দোয়া করা হলে তিনি কবুল করেন এবং যার মাধ্যমে কিছু চাওয়া হলে তিনি প্রদান করেন?" তা হলো সেই দোয়া যা ইউনুস (আঃ) করেছিলেন যখন তিনি তিন অন্ধকারের মধ্যে তাঁকে ডেকেছিলেন: 'লা ইলাহা ইল্লা আনতা, সুবহানাকা ইন্নি কুনতু মিনায যালিমীন' (আপনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই; আপনি পবিত্র, নিশ্চয়ই আমি ছিলাম জালিমদের অন্তর্ভুক্ত)। তখন এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল: ইয়া রাসূলাল্লাহ, এটা কি ইউনুস (আঃ)-এর জন্যেই নির্দিষ্ট ছিল, নাকি সাধারণভাবে সকল মুমিনের জন্য? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি আল্লাহর বাণী শোনোনি: {অতঃপর আমি তার ডাকে সাড়া দিলাম এবং তাকে দুশ্চিন্তা থেকে মুক্তি দিলাম। আর এভাবেই আমি মুমিনদেরকে মুক্তি দিয়ে থাকি} [সূরা আল-আম্বিয়া: ৮৮]" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বললেন: "যে কোনো মুসলিম যদি তার অসুস্থ অবস্থায় এই দোয়া চল্লিশ বার পাঠ করে, আর সে যদি সেই অসুস্থতায় মারা যায়, তাহলে তাকে শহীদের সওয়াব দেওয়া হবে। আর যদি সে সুস্থ হয়ে যায়, তবে সে এমন অবস্থায় সুস্থ হবে যে তার সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়েছে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في النسخ الخطية: يزيد، والتصويب من "إتحاف المهرة" (5116) و"تلخيص المستدرك" و"قوارع القرآن" للجوري حيث رواه من طريق المصنف نفسه، ومحمد بن زيد هذا: هو ابن المهاجر، فهو الذي يروي عن سعيد بن المسيب، ويروي عنه عمرو بن بكر السكسكي. وأخرجه أبو عمر الجوري في "قوارع القرآن" (70) عن أبي عبد الله الحاكم إجازةً، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 17/ 82 من طريق يحيى بن صالح، عن أبي يحيى بن عبد الرحمن، عن بشر بن منصور، عن علي بن زيد عن سعيد بن المسيب، به. أبو يحيى بن عبد الرحمن لم نتبينه، وعلي بن زيد - وهو ابن جدعان - ضعيف، فيحتمل أن تكون رواية عمرو بن بكر السكسكي عن علي بن زيد هذا، فأبدله عمرو بن بكر أو ابنه إبراهيم بمحمد بن زيد - وهو ابن المهاجر الثقة - ولا يستبعد هذا فهما متهمان، والله تعالى أعلم.لكن صحَّ الحديث بسياقة أخرى من وجه آخر عن سعد، انظر الأحاديث الثلاثة السابقة.
[2] إسناده تالف، أحمد بن عمرو بن بكر السكسكي، كذا سماه المصنف، ولم نقع لعمرو بن بكر السكسكي على ابنٍ اسمه أحمد، وإنما يروي عنه ابنه إبراهيم، فالغالب على الظن أنه إبراهيم هذا، ووهم المصنف فسماه أحمد، وإبراهيم وأبوه عمرو بن بكر متروكان، بل اتهمهما ابن حبان بالوضع. وأخرجه أبو عمر الجوري في "قوارع القرآن" (70) عن أبي عبد الله الحاكم إجازةً، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 17/ 82 من طريق يحيى بن صالح، عن أبي يحيى بن عبد الرحمن، عن بشر بن منصور، عن علي بن زيد عن سعيد بن المسيب، به. أبو يحيى بن عبد الرحمن لم نتبينه، وعلي بن زيد - وهو ابن جدعان - ضعيف، فيحتمل أن تكون رواية عمرو بن بكر السكسكي عن علي بن زيد هذا، فأبدله عمرو بن بكر أو ابنه إبراهيم بمحمد بن زيد - وهو ابن المهاجر الثقة - ولا يستبعد هذا فهما متهمان، والله تعالى أعلم.لكن صحَّ الحديث بسياقة أخرى من وجه آخر عن سعد، انظر الأحاديث الثلاثة السابقة.
1887 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا أبو بكر بن أبي الدنيا، حدثني عمّار بن نَصْر، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثني عبد الله بن العلاء بن زَبْرٍ، حدثنا القاسم بن عبد الرحمن، عن أبي أُمامةَ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ اسمَ الله الأعظم لَفِي ثلاثِ سورٍ من القرآن: في سورةِ البقرة وآلِ عمرانَ، وطه".فالتمستُها فوجدتُ في سورة البقرة آيةَ الكرسي: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ} [البقرة: 255]، وفي سورة آل عمران: {الم (1) اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ} [آل عمران: 1 - 2]، وفي سورة طه: {وَعَنَتِ الْوُجُوهُ لِلْحَيِّ الْقَيُّومِ} [طه: 111] [1].
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর সর্বশ্রেষ্ঠ নামটি কুরআনের তিনটি সূরার মধ্যে রয়েছে: সূরা বাকারা, আলে ইমরান এবং ত্ব-হা-তে।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর আমি তা অনুসন্ধান করলাম এবং সূরা বাকারার মধ্যে আয়াতুল কুরসীতে পেলাম: {আল্লাহ্, তিনি ব্যতীত অন্য কোন ইলাহ নেই, তিনি চিরঞ্জীব, সর্বসত্তার ধারক} [সূরা বাকারা: ২৫৫]। আর সূরা আলে ইমরানের মধ্যে পেলাম: {আলিফ, লাম, মীম। আল্লাহ্, তিনি ব্যতীত অন্য কোন ইলাহ নেই, তিনি চিরঞ্জীব, সর্বসত্তার ধারক} [সূরা আলে ইমরান: ১-২]। আর সূরা ত্ব-হার মধ্যে পেলাম: {আর সকল মুখমণ্ডল অবনত হবে চিরঞ্জীব, সর্বসত্তার ধারকের কাছে} [সূরা ত্ব-হা: ১১১]।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، عمار بن نصر - وإن كان فيه مقال - متابع، وقد سلف من طريق هشام بن عمار عن الوليد بن مسلم برقم (1882).
1888 - حدَّثَناه أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى، حدثنا أبو بكر محمد بن إسحاق، حدثنا محمد بن مَهْدي العطّار بالفُسْطاط، حدثنا عمرو بن أبي سلمة، حدثنا ابن زَبْر - وهو عبد الله بن العلاء - قال: سمعت القاسم أبا عبد الرحمن يقول: إنَّ اسمَ الله الأعظم لفي سورٍ من القرآن ثلاثٍ: البقرة وآل عمران، وطه.فقال له رجل يقال له: عيسى بن موسى - وأنا أسمع -: يا أبا زَبْر سمعتُ غَيْلانَ بن أنسٍ يقول: سمعتُ القاسم أبا عبد الرحمن يقول [1]: سمعتُ أبا أمامة يحدِّث عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنَّ اسمَ الله الأعظم لفي سورٍ من القرآن ثلاثٍ. ثم ذكره بنحوه [2].حديث عمرو بن أبي سلمة هذا لا يعلِّل حديث الوليد بن مسلم، فإنَّ الوليد أحفظُ وأتقنُ وأعرفُ بحديث بلده، على أنَّ الشيخين لم يحتجّا بالقاسم أبي عبد الرحمن.
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন যে, নিশ্চয়ই আল্লাহ্র ইসমে আ'যম (মহানতম নাম) কুরআনের তিনটি সূরার মধ্যে বিদ্যমান। (আবূ ইসহাক ইবরাহীম ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াহইয়া, আবূ বকর মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক, মুহাম্মাদ ইবনু মাহদী আল-আত্তার, আমর ইবনু আবী সালামা, এবং ইবনু যাবর—আব্দুল্লাহ ইবনুল আ'লা—কর্তৃক বর্ণিত) তিনি (ইবনু যাবর) বলেন: আমি কাসিম আবূ আব্দুর রহমান-কে বলতে শুনেছি: নিশ্চয়ই আল্লাহ্র ইসমে আ'যম কুরআনের তিনটি সূরার মধ্যে বিদ্যমান: আল-বাক্বারাহ, আলে ইমরান, এবং ত্বা-হা।
তখন ঈসা ইবনু মূসা নামক এক ব্যক্তি তাঁকে বলল—আর আমি (ইবনু যাবর) শুনছিলাম—: হে আবূ যাবর! আমি গাইলান ইবনু আনাস-কে কাসিম আবূ আব্দুর রহমান-কে বলতে শুনেছি: আমি আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এই মর্মে হাদীস বর্ণনা করতে শুনেছি যে, নিশ্চয়ই আল্লাহ্র ইসমে আ'যম কুরআনের তিনটি সূরার মধ্যে বিদ্যমান। এরপর তিনি তার অনুরূপ উল্লেখ করেন।
আমর ইবনু আবী সালামা-র এই হাদীসটি ওয়ালীদ ইবনু মুসলিম-এর হাদীসকে দুর্বল করে না। কারণ ওয়ালীদ তার অঞ্চলের হাদীস সম্পর্কে অধিক হাফিয, নির্ভরযোগ্য ও অধিক অবগত। তবে শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম) কাসিম আবূ আব্দুর রহমান থেকে হাদীস গ্রহণ করেননি।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] من قوله: "إن اسم الله" إلى هنا سقط من (ب) والمطبوع.
[2] إسناده فيه لين، عمرو بن أبي سلمة يعتبر به في المتابعات، والراوي عنه محمد بن مهدي العطار، روى عنه جمع منهم ابن خزيمة، ولم نقف له على ترجمة، غير أنَّ ابن خزيمة قال في "صحيحه" (1746): فارسي الأصل سكن الفُسطاط. قلنا: وهو متابع، لكن المحفوظ رفعه كما في رواية الوليد بن مسلم السابقة. محمد بن إسحاق: هو ابن خزيمة الإمام.وأخرجه ابن ماجه (3856) و (3856 م) عن عبد الرحمن بن إبراهيم الدمشقي، عن عمرو بن أبي سلمة، بهذا الإسناد. النبي صلى الله عليه وسلم، وقد روى عنه جمع ووثقه العجلي وابن حبان، فمثله يُعدُّ ثقةً، ولهذا صحَّح حديثه هذا الحافظ في "نتائح الأفكار" 2/ 163، وأقرَّ الذهبيُّ المصنِّفَ هنا في "تلخيصه" بنظافة إسناده، لكنه استنكره وقال: أخاف أن يكون موضوعًا. ولا يُسلَّم للذهبي ذلك مع ثقة رجاله، وإخراج البخاري له في "الأدب المفرد"، وسكوت الأئمة المتقدمين عليه مع إخراجهم له.وسيأتي برقم (4354)، ويأتي تخريجه هناك.
1889 - أخبرنا أبو عبد الله الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا ابن أبي مَسَرَّة، حدثنا خَلّاد بن يحيى، حدثنا عبد الواحد بن أيمن المكِّي، عن عُبيد بن رِفاعةَ بن رافع الزُّرَقي، عن أبيه قال: [لمّا] كان يومُ أُحدٍ انكَفَأَ المشركون، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "استَوُوا حتى أُثْنيَ على ربِّي"، فصاروا خلفَه صفوفًا، فقال: "اللهمَّ لك الحمدُ كلُّه، اللهمَّ لا مانعَ لما بَسَطْتَ، ولا باسطَ لما قَبضتَ، ولا هاديَ لمن أضللتَ، ولا مُضِلَّ لمن هديتَ، ولا مُنْطِيَ لما مَنعتَ، ولا مانعَ لما أَنْطيتَ، ولا مقرِّبَ لما باعدتَ، ولا مُباعِدَ لما قرَّبتَ، اللهمَّ ابسُطْ علينا من بَرَكاتِكَ ورَحمتِك وفَضلِكَ ورِزْقِكَ، اللهمَّ إنِّي أسألك النَّعيمَ يومَ القيامة، والأمنَ يومَ الخوف، اللهمَّ عائذٌ بك من شرِّ ما أعطيتَنا، وشرِّ ما مَنَعْتَنا، اللهمَّ حبِّب إلينا الإيمانَ وزيِّنْه في قلوبنا، وكَرِّه إلينا الكُفْرَ والفُسوقَ والعِصيانَ، واجعلنا من الرَّاشدين، اللهمَّ تَوفَّنا مُسلمِين، وأَحْيِنا مُسلمِين، وأَلْحِقْنا بالصالحين، غيرَ خزايا ولا مَفتونِين اللهمَّ قاتلِ الكفرةَ الذين يكذِّبون رُسُلَك، ويَصُدُّون عن سبيلك، واجعلْ عليهم رِجْزَكَ وعذابَك الحقَّ الحقَّ" [1]. هذا حديث صحيح [2] على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
রিফাআহ ইবনে রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উহুদের যুদ্ধ ছিল এবং মুশরিকরা পিছু হটলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "তোমরা সোজা হয়ে দাঁড়াও, যেন আমি আমার রবের প্রশংসা করতে পারি।" অতঃপর তারা তাঁর পিছনে সারিবদ্ধ হয়ে দাঁড়ালেন। তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! সমস্ত প্রশংসা তোমারই জন্য। হে আল্লাহ! তুমি যা প্রসারিত (দান) করো, তা রোধ করার কেউ নেই; আর তুমি যা গুটিয়ে নাও (সংকুচিত করো), তা প্রসারিত করার কেউ নেই। তুমি যাকে পথভ্রষ্ট করো, তাকে পথ দেখানোর কেউ নেই; আর তুমি যাকে পথ দেখাও, তাকে পথভ্রষ্ট করার কেউ নেই। তুমি যা মানা করো (দেওয়া থেকে বিরত থাকো), তা দেওয়ার কেউ নেই; আর তুমি যা দাও, তা থেকে বারণ করার কেউ নেই। তুমি যাকে দূরে সরিয়ে দাও, তাকে কাছে আনার কেউ নেই; আর তুমি যাকে কাছে আনো, তাকে দূরে সরিয়ে দেওয়ার কেউ নেই। হে আল্লাহ! তুমি তোমার বরকত, রহমত, অনুগ্রহ ও রিযিক আমাদের উপর বিস্তৃত করে দাও। হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে চাই কিয়ামতের দিন নিআমত এবং ভয়ের দিন নিরাপত্তা। হে আল্লাহ! তুমি যা আমাদের দিয়েছ, তার অনিষ্ট থেকে এবং তুমি যা আমাদের থেকে মানা করেছ (বা বিরত রেখেছ), তার অনিষ্ট থেকে আমি তোমার কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করছি। হে আল্লাহ! আমাদের কাছে ঈমানকে প্রিয় করে দাও এবং তা আমাদের হৃদয়ে সুশোভিত করো। আমাদের কাছে কুফর, ফিসক (পাপাচারে লিপ্ত হওয়া) ও নাফরমানিকে অপছন্দনীয় করো এবং আমাদের হিদায়াতপ্রাপ্তদের অন্তর্ভুক্ত করো। হে আল্লাহ! তুমি আমাদের মুসলিম অবস্থায় মৃত্যু দাও, মুসলিম অবস্থায় জীবিত রাখো, এবং লাঞ্ছিত ও ফিতনাগ্রস্ত না করে আমাদের নেককারদের সঙ্গে মিলিত করো। হে আল্লাহ! সেই কাফিরদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করো যারা তোমার রাসূলগণকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করে এবং তোমার পথ থেকে বাধা দেয়। আর তাদের উপর তোমার শাস্তি ও প্রকৃত আযাব বর্ষণ করো।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، وعبيد بن رفاعة ثقة كما قال الذهبي في "تلخيصه"، على أنَّ بعضهم جزم بصحبته، كابن معين في رواية الدُّوري عنه، والطبراني وغيرهما، لكن الصحيح أنه ولد في عهد النبي صلى الله عليه وسلم، وقد روى عنه جمع ووثقه العجلي وابن حبان، فمثله يُعدُّ ثقةً، ولهذا صحَّح حديثه هذا الحافظ في "نتائح الأفكار" 2/ 163، وأقرَّ الذهبيُّ المصنِّفَ هنا في "تلخيصه" بنظافة إسناده، لكنه استنكره وقال: أخاف أن يكون موضوعًا. ولا يُسلَّم للذهبي ذلك مع ثقة رجاله، وإخراج البخاري له في "الأدب المفرد"، وسكوت الأئمة المتقدمين عليه مع إخراجهم له.وسيأتي برقم (4354)، ويأتي تخريجه هناك.
[2] لفظة "صحيح" سقطت من (ز) و (ع)، وأثبتناها من (ص) و (ب). ابن راهويه في "مسنده" (424)، والمستغفري في "دلائل النبوة" (63)، والبيهقي في "الشعب" (1077)، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (1263)، وموقوفًا عند نعيم بن حماد (676)، وابن أبي شيبة 15/ 245. وإسناده لا يصح.وعن أنس بن مالك مرفوعًا عند أبي نعيم في "الحلية" 3/ 48، وابن قدامة المقدسي في "إثبات صفة العلو" (30). وإسناده ضعيف جدًّا.قوله: "إلا من دعا دعاء الغريق" أي: دعاءَ من يخشى الغرق، فهو وَجِلٌ ملحٌّ في الدعاء مخلص فيه.
1890 - أخبرنا علي بن عبد الرحمن بن ماتَى الدِّهقانُ بالكوفة، حدثنا الحسين بن الحَكَم الحِبَري، حدثنا قَبِيصةُ، حدثنا سفيان، عن الأعمش، عن عُمارةَ بن عُمَير، عن أبي عمَّار، عن حُذيفة رَفَعه قال: "يأتي عليكم زمانٌ لا يَنجُو فيه إلَّا مَن دعا دعاءَ الغَريق" [1]. هذا حديث صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, “তোমাদের ওপর এমন এক সময় আসবে যখন ডুবে যাওয়া ব্যক্তির দোয়ার মতো দোয়া যে করবে, সে ব্যতীত কেউ মুক্তি পাবে না।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح موقوفًا، رجاله ثقات إلا أنه قد اختُلف فيه على سفيان - وهو الثوري - فرواه قبيصة - وهو ابن عقبة - عنه فرفعه، وقبيصة في سفيان ليس بذاك القوي فإنه سمع منه وهو صغير كما قال ابن مَعين، وقد خالفه الحسين بن حفص فيما سيأتي برقم (8513) فرواه عن سفيان موقوفًا، ورواه موقوفًا أيضًا أبو معاوية وعبدة بن سليمان عن الأعمش كما سيأتي.الأعمش: هو سليمان بن مهران، وأبو عمار: هو عَريب بن حُميد الهمداني الدُّهني.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (504) عن عبدة بن سليمان، وابن أبي شيبة 10/ 201 و 15/ 21 عن أبي معاوية الضرير، كلاهما عن سليمان الأعمش، بهذا الإسناد موقوفًا.وروي عن الأعمش، عن إبراهيم بن يزيد النخعي، عن همام بن الحارث، عن حذيفة موقوفًا، أخرجه من طريقه نعيم بن حماد (503)، وابن أبي شيبة 10/ 202 و 15/ 21 عن أبي معاوية الضرير، وقرن نعيم بن حماد بأبي معاوية عيسى بنَ يونس، وأبو نعيم في "حلية الأولياء" 1/ 274 من طريق جرير، والبيهقي في "شعب الإيمان" (1078) من طريق يعلى بن عبيد، أربعتهم عن الأعمش، به.قال وكيع بن الجراح - فيما حكاه عنه الإمام أحمد في "العلل" (1370) رواية ابنه عنه -: كان سفيان ينكر حديث إبراهيم عن همام، يقول: إنما هو حديث عمارة هذا.وفي الباب عن أبي هريرة مرفوعًا عند نعيم بن حماد في "الفتن" (703) و (720)، وإسحاق ابن راهويه في "مسنده" (424)، والمستغفري في "دلائل النبوة" (63)، والبيهقي في "الشعب" (1077)، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (1263)، وموقوفًا عند نعيم بن حماد (676)، وابن أبي شيبة 15/ 245. وإسناده لا يصح.وعن أنس بن مالك مرفوعًا عند أبي نعيم في "الحلية" 3/ 48، وابن قدامة المقدسي في "إثبات صفة العلو" (30). وإسناده ضعيف جدًّا.قوله: "إلا من دعا دعاء الغريق" أي: دعاءَ من يخشى الغرق، فهو وَجِلٌ ملحٌّ في الدعاء مخلص فيه.
1891 - حدثنا بكر بن محمد بن حَمْدان الصَّيْرفي بمَرْو، حدثنا عبد الصّمد بن الفَضْل البَلْخي، حدثنا أبو عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، حدثني أبو مَرحُوم عبد الرحيم [1] بن ميمون، عن سهل بن معاذ بن أنس، عن أبيه، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَن أكل طعامًا فقال: الحمدُ لله الذي أطعَمَني هذا، ورَزَقَنيه من غير حَوْلٍ منِّي ولا قوّة، غُفِرَ له ما تقدَّم من ذَنْبِه، ومَن لَبِسَ ثوبًا فقال: الحمدُ لله الذي كَسَاني هذا من غير حولٍ منِّي ولا قوة، غُفِرَ له ما تقدَّم من ذنبه" [2]. هذا حديث صحيحٌ على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.
মু'আয ইবনু আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি খাবার খেল এবং বলল: ‘সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি আমাকে এটি খাওয়ালেন এবং আমার কোনো ক্ষমতা ও শক্তি ছাড়াই এর রিযিক দিলেন,’ তার পূর্বের সকল গুনাহ মাফ করে দেওয়া হয়। আর যে ব্যক্তি পোশাক পরিধান করল এবং বলল: ‘সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি আমার কোনো ক্ষমতা ও শক্তি ছাড়াই আমাকে এটি পরিধান করালেন,’ তার পূর্বের সকল গুনাহ মাফ করে দেওয়া হয়।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] تحرف في النسخ الخطية إلى: عبد الرحمن.
[2] إسناده ليِّن، أبو مرحوم وشيخه سهل يعتبر بهما في المتابعات والشواهد، وقد انفردا بهذا الحديث، ومع ذلك فقد حسنه الترمذي في "جامعه"، وابن حجر في "نتائج الأفكار" 1/ 120، وفي "الخصال المكفرة" ص 74.وأخرجه أحمد 24/ (15632)، وأخرجه أبو داود (4023) عن نصير بن الفرج، والترمذي (3458) عن محمد بن إسماعيل البخاري، ثلاثتهم (أحمد ونصير والبخاري) عن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد. قال الترمذي: حديث حسن غريب. قلنا: واقتصر أحمد والبخاري على الشطر الأول، وفي رواية نصير في آخره: "غفر له ما تقدم من ذنبه وما تأخر" بزيادة "وما تأخر" وهي زيادة منكرة تفرد بها نصير بن الفرج عن بقية أصحاب عبد الله بن يزيد المقرئ.وأخرج الشطر الأول منه ابن ماجه (3285) من طريق عبد الله بن وهب، عن سعيد بن أبي أيوب، به.وسيأتي برقم (7597)، وفي الإسناد هناك يحيى بن أيوب بدل سعيد بن أبي أيوب، وهو وهم.
1892 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا صالح بن محمد الرَّازي، حدثنا أبي، حدثنا أبو معاوية عبد الرحمن بن قيس، حدثنا محمد بن أبي حُمَيد، عن محمد بن المُنكدر، عن جابرٍ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ما أنعَمَ الله على عبدٍ من نعمةٍ فقال: الحمدُ لله، إلَّا وقد أَدَّى شُكْرَها، فإن قالها الثانيةَ، جَدَّدَ اللهُ له ثوابَها، فإن قالها الثالثةَ، غَفَرَ اللهُ له ذُنوبَه" [1].هذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه، إلَّا أنهما لم يخرِّجا أبا معاوية.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ কোনো বান্দাকে কোনো নিয়ামত দান করলে, আর সে ‘আলহামদুলিল্লাহ’ বললে, সে অবশ্যই তার শুকরিয়া আদায় করে নেয়। আর যদি সে দ্বিতীয়বার তা বলে, তবে আল্লাহ তার জন্য তার সওয়াবকে নবায়ন করে দেন। আর যদি সে তৃতীয়বার তা বলে, তবে আল্লাহ তার গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، عبد الرحمن بن قيس أبو معاوية متروك، بل متهم، وشيخه محمد بن أبي حميد - وهو الأنصاري الزرقي - ضعيف، والراوي عنه يعني عن أبي معاوية - وهو محمد بن عبد الله بن عبد الرحمن، والد صالح بن محمد الرازي - لم نقع له على ترجمة وقد تعقب الذهبي في "تلخيصه" المصنِّفَ في تصحيحه لهذا الحديث بقوله: ليس بصحيح، قال أبو زرعة: عبد الرحمن بن قيس كذاب.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (4090) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (2369) من طريق أحمد بن منصور الحنظلي، عن عبد الرحمن بن قيس، به.
1893 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو الحسن محمد بن سِنَان القَزّاز، حدثنا عمر بن يونس بن القاسم اليَمَاميّ، حدثنا عكرمة بن عمَّارٍ، قال: سمعتُ شدّادًا أبا عمار يحدِّثُ، عن شدَّادِ بن أوْسٍ - وكان بدريًّا - قال: بينما هُم في سَفَرٍ إذ نَزَلَ القومُ يَتصبَّحون، فقال شدّاد: أَدْنُوا هذه السُّفرة نَعبَثْ بها، ثم قال: أَستغفرُ الله، ما تكلمتُ بكلمةٍ منذ أسلمتُ إلَّا وأنا أَزُمُّها وأَخطِمُها قبلَ كلمتي هذه، ليس كذلك قال محمدٌ صلى الله عليه وسلم، ولكن قال: "يا شدَّادُ، إذا رأيتَ الناسَ يَكنِزونَ الذَّهبَ والفضةَ فاكنِزْ هؤلاءِ الكلمات: اللهمَّ إِنِّي أسألُك التَّثبُّتَ في الأمور، وعزيمةَ الرُّشْد، وأسألكَ شُكرَ نعمتِك، وحُسنَ عبادَتِك، وأسألكَ قلبًا سليمًا، ولسانًا صادقًا، وخُلُقًا مستقيمًا، وأستغفرُكَ لما تعلم، وأسألك من خيرِ ما تعلمُ، وأعوذُ بكَ من شرِّ ما تعلمُ، إنَّك أنتَ علَّامُ الغُيوب" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
শাদ্দাদ ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তারা (সাহাবীরা) একবার সফরে ছিলেন। যখন কাফেলা সকালের বিশ্রামের জন্য থামল, তখন শাদ্দাদ বললেন: "এই দস্তরখানটি আনো, আমরা এটি নিয়ে একটু মজা করি।" অতঃপর তিনি বললেন: "আমি আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাই। ইসলাম গ্রহণের পর থেকে আমার এই কথার আগে আমি এমন কোনো কথা বলিনি, যা আমি লাগাম না দিয়ে ও নিয়ন্ত্রণ না করে বলে দিয়েছি। মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো এমন বলেননি, বরং তিনি বলেছেন: "হে শাদ্দাদ! যখন তুমি দেখবে যে লোকেরা সোনা ও রূপা সঞ্চয় করছে, তখন তুমি এই বাক্যগুলো সঞ্চয় করো: 'হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে সর্বক্ষেত্রে দৃঢ়তা (সিদ্ধান্তের অটলতা) এবং হেদায়েতের (সঠিক পথের) সংকল্প প্রার্থনা করি। আমি আপনার কাছে আপনার নিয়ামতের কৃতজ্ঞতা এবং উত্তমরূপে আপনার ইবাদত করার সামর্থ্য প্রার্থনা করি। আমি আপনার কাছে নির্মল অন্তর, সত্যবাদী জিহ্বা এবং সরল-সঠিক চরিত্র কামনা করি। আপনি যা জানেন, তার জন্য আমি আপনার কাছে ক্ষমা চাই। আপনি যা জানেন তার উত্তম কল্যাণ আমি আপনার কাছে চাই এবং আপনি যা জানেন তার অনিষ্ট থেকে আপনার কাছে আশ্রয় চাই। নিশ্চয়ই আপনিই গায়েব সম্পর্কে মহাজ্ঞানী।'"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد، محمد بن سنان القزاز وإن كان فيه ضعف فهو حسن الحديث في المتابعات والشواهد، وحديثه هذا روي من غير وجه عن شداد بن أوس، وهي وإن كانت لا يخلو كلٌّ منها من مقال، إلّا أنه بمجموعها يتقوى الحديث. شداد أبو عمار: هو شداد بن عبد الله القرشي.وأخرجه دون القصة التي في أوله البيهقي في "الدعوات" (243) عن محمد بن عبد الله الضبي، عن أبي العباس محمد بن يعقوب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 28/ (17114) من طريق حسان بن عطية، عن شداد بن أوس. وهذا إسناد منقطع، فحسان لم يسمع من شداد، لكن أخرجه ابن حبان (935) من وجه آخر عن حسان بن عطية عن مسلم بن مِشكم عن شداد بن أوس، فذكر الواسطة بينهما، لكن مسلم بن مشكم هذا ضعيف.ورواه مطولًا ومختصرًا سعيد بن إياس الجريري - وكان قد اختلط - فاضطرب فيه، فرواه مرةً عن أبي العلاء يزيد بن عبد الله بن الشخير عن رجل من بني حنظلة عن شداد بن أوس، كما أخرجه أحمد (17133)، والترمذي (3407)، ورواه مرةً عن أبي العلاء بن الشخير عن شداد، لم يذكر فيه الحنظلي، وهذا إسناد ضعيف أيضًا لاختلاط الجريري ولإبهام الرجل الحنظلي.وللحديث طرق أخرى غير هذه مذكورة في تعليقنا على "المسند" يتقوى الحديث بمجموعها، والله أعلم. وأخرجه النسائي (10388) و (10389) من طريق علي بن الحسين، عن ابنة عبد الله بن جعفر، عن أبيها، عن علي رفعه، وفيه قصة بين علي بن الحسين وعبد الله بن جعفر وابنته.وأخرجه النسائي (10394) من طريق ربعي بن حراش، عن عبد الله بن شداد، عن عبد الله بن جعفر، عن علي قوله، فذكره موقوفًا.وأخرجه النسائي أيضًا موقوفًا من طريق ربعي بن حراش (10395) عن عبد الله بن شداد: أَنَّ عليًا قال لابن أخيه … فذكره، وبرقم (10396) من طريق ربعي أيضًا عن ابن شداد، عن علي أنه قال لابني جعفر … فذكره.وسيأتي بعده من طريق محمد بن عجلان عن محمد بن كعب القرظي، وبرقم (4721) من طريق عبد الرحمن بن أبي ليلى عن عليٍّ مرفوعًا، مع اختلاف في بعض ألفاظه، وسيأتي الكلام عليها هناك.وله شاهد من حديث ابن عباس في "الصحيحين" كما سيشير إليه المصنف بإثر الحديث التالي.وسلف هذا الذكر ضمن سياقة أخرى برقم (1214) من حديث عبد الله بن أبي أوفى بإسناد ضعيف جدًّا.
1894 - أخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا رَوْح بن عُبادة، حدثنا أسامة بن زيد، عن محمد بن كعبٍ القُرَظي، عن عبد الله بن شدَّاد، عن عبد الله بن جعفر، عن علي بن أبي طالبٍ قال: علَّمني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا نَزَلَ بِي كَرْبٌ أن أقول: "لا إله إلَّا الله الحليمُ الكريم، سبحانَ الله، وتبارك اللهُ ربُّ العرش العظيم، والحمدُ لله ربِّ العالمين" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه لاختلافٍ فيه على الناقِلِين [2]، وهكذا أقام إسنادَه محمدُ بن عَجْلان عن محمد بن كعب:
আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমার ওপর কোনো কষ্ট বা বিপদ নেমে আসত, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে শিক্ষা দিয়েছেন যে আমি যেন বলি: “আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, যিনি পরম সহনশীল, পরম দয়ালু। আল্লাহ পবিত্র। আর সেই আল্লাহ বরকতময়, যিনি মহান আরশের মালিক। আর সকল প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি সৃষ্টিকুলের রব।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أسامة بن زيد - وهو الليثي - وقد توبع.وأخرجه أحمد 2/ (701) عن روح بن عبادة، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (10389) و (10390) من طريق أبان بن صالح، عن محمد بن كعب القرظي، به. وأخرجه النسائي (10388) و (10389) من طريق علي بن الحسين، عن ابنة عبد الله بن جعفر، عن أبيها، عن علي رفعه، وفيه قصة بين علي بن الحسين وعبد الله بن جعفر وابنته.وأخرجه النسائي (10394) من طريق ربعي بن حراش، عن عبد الله بن شداد، عن عبد الله بن جعفر، عن علي قوله، فذكره موقوفًا.وأخرجه النسائي أيضًا موقوفًا من طريق ربعي بن حراش (10395) عن عبد الله بن شداد: أَنَّ عليًا قال لابن أخيه … فذكره، وبرقم (10396) من طريق ربعي أيضًا عن ابن شداد، عن علي أنه قال لابني جعفر … فذكره.وسيأتي بعده من طريق محمد بن عجلان عن محمد بن كعب القرظي، وبرقم (4721) من طريق عبد الرحمن بن أبي ليلى عن عليٍّ مرفوعًا، مع اختلاف في بعض ألفاظه، وسيأتي الكلام عليها هناك.وله شاهد من حديث ابن عباس في "الصحيحين" كما سيشير إليه المصنف بإثر الحديث التالي.وسلف هذا الذكر ضمن سياقة أخرى برقم (1214) من حديث عبد الله بن أبي أوفى بإسناد ضعيف جدًّا.
[2] سيأتي بيان اختلاف الناقلين عند الحديث رقم (4721). الإسناد.وأخرجه أحمد 2/ (726)، وابن حبان (865) من طريق الليث بن سعد، والنسائي (10392) من طريق عبد الوهاب بن بخت، كلاهما عن محمد بن عجلان، به.وأخرجه النسائي (10393) من طريق أبي ثوبان، عن الحسن بن الحر، عن محمد بن عجلان، عن محمد بن كعب، عن عبد الله بن جعفر، عن بعض أهله، عن جعفر بن أبي طالب: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم علمه كلمات … فذكره. قال النسائي: هذا خطأ، وأبو ثوبان ضعيف لا يقوم بمثله حجة، والصواب حديث يعقوب.
1895 - أخبرَناه أبو عَوْن محمد بن أحمد بن ماهان الجزَّار بمكة، حدثنا محمد بن علي بن زيد، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا يعقوب بن عبد الرحمن، عن محمد بن عَجْلان عن محمد بن كعب، عن عبد الله بن شدّاد، عن عبد الله بن جعفر، عن عليٍّ قال: لَقَّنَني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم هؤلاءِ الكلماتِ إن نَزَلَ بِي شِدَّة أو كَرْبٌ أن أقولَهُنَّ: "لا إله إلَّا اللهُ الحليمُ الكريم، سبحانه وتعالى، تبارك اللهُ ربُّ العرش العظيم، والحمدُ لله ربِّ العالمين".قال: فكان عبدُ الله بن جعفر يلقِّنُها الميِّتَ، ويَنفُثُ بها على المَوعُوك [1]. قد أخرج البخاريُّ ومسلمٌ [2] هذا الحديث مختصرًا من حديث قتادةَ عن أبي العاليَة عن ابن عباس.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এই বাক্যগুলো শিক্ষা দিয়েছেন, যেন আমি কোনো কঠিন বিপদ বা সংকটের সম্মুখীন হলে তা বলি: "আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই। তিনি সহনশীল ও মহান। তিনি পবিত্র ও সুমহান। বরকতময় আল্লাহ্, যিনি মহান আরশের রব। আর সকল প্রশংসা বিশ্বজগতের রব আল্লাহর জন্য।" রাবী বলেন, আব্দুল্লাহ ইবন জাʿফর এই কালেমাগুলো মৃতপ্রায় ব্যক্তিকে তালকীন করতেন এবং জ্বরাক্রান্ত ব্যক্তির ওপর ফুঁ দিতেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل محمد بن عجلان.وأخرجه النسائي (7626) و (10391) عن قتيبة بن سعيد، عن يعقوب بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 2/ (726)، وابن حبان (865) من طريق الليث بن سعد، والنسائي (10392) من طريق عبد الوهاب بن بخت، كلاهما عن محمد بن عجلان، به.وأخرجه النسائي (10393) من طريق أبي ثوبان، عن الحسن بن الحر، عن محمد بن عجلان، عن محمد بن كعب، عن عبد الله بن جعفر، عن بعض أهله، عن جعفر بن أبي طالب: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم علمه كلمات … فذكره. قال النسائي: هذا خطأ، وأبو ثوبان ضعيف لا يقوم بمثله حجة، والصواب حديث يعقوب.
[2] البخاري (6345) و (6346) و (7426) و (7431)، ومسلم (2730) بلفظ: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول عند الكرب: "لا إله إلا الله العظيم الحليم، لا إله إلا الله رب العرش العظيم، لا إله إلا الله رب السماوات ورب الأرض ورب العرش الكريم". وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الفرج بعد الشدة" (47)، ومن طريقه أبو علي التنوخي في "الفرج بعد الشدة" 1/ 138، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (1287) عن إسحاق بن أبي إسرائيل المروزي، عن النضر بن إسماعيل، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن القاسم بن عبد الرحمن، عن ابن مسعود. لم يذكر فيه: عن أبيه، وهو المحفوظ فإسحاق بن أبي إسرائيل وثقه غير واحد، وقد توبع.وأخرجه أبو علي التنوخي 1/ 139 من طريق أخرى عن إسحاق بن أبي إسرائيل، عن النضر بن إسماعيل، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن القاسم بن عبد الرحمن قال: حدثنا عبد الله بن مسعود .. فذكره. والتصريح بالتحديث هنا وهم من أحد الضعفاء في هذا الإسناد، لأنَّ الانقطاع فيه ظاهر، والله أعلم.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9751)، وفي "الأسماء والصفات" (215) من طريق حفص بن غياث، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن القاسم بن عبد الرحمن، عن ابن مسعود. لم يذكر فيه أيضًا: عن أبيه. قال البيهقي بإثره: وهذا مع إرساله أصح. يعني أصح من رواية من قال في الإسناد: عن أبيه.وله شاهد من حديث أنس بن مالك عند الترمذي (3524)، وفيه يزيد بن أبان الرقاشي وهو ضعيف، قال الترمذي: حديث غريب. وسيأتي حديث أنس هذا في "المستدرك" برقم (2023)، لكن ليس دعاءً للهمِّ والغم والكرب، وإنما ذِكْر من أذكار الصباح والمساء.وفي الباب عن رجل من بني زريق عن أبيه عن جده، قال: أكثر دعاء النبي صلى الله عليه وسلم يوم أحد: "يا حي يا قيوم، برحمتك أستغيث، اكفني كل شيء، ولا تكلني إلى نفسي طرفة عين"، أخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2925)، وهذا إسناد ضعيف لإبهام الزرقي وأبيه وجده.
1896 - أخبرنا أبو بكر بن أبي دَارِم الحافظ بالكوفة، حدثنا أحمد بن موسى بن إسحاق التَّميمي، حدثنا وَضَّاح بن يحيى النَّهْشَلي، حدثنا النَّضر بن إسماعيل البَجَلي، حدثنا عبد الرحمن بن إسحاق، حدثنا القاسم بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن ابن مسعودٍ قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا نَزَلَ به همٌّ أو غمٌّ قال: "يا حيُّ يا قيُّومُ، برحمتِكَ أَستَغيث" [1]. هذا حديثٌ صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবন মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর কোনো দুশ্চিন্তা বা পেরেশানি আসতো, তখন তিনি বলতেন: “ইয়া হাইয়্যু ইয়া কাইয়্যুমু, বিরাহমাতিকা আস্তাগীস” (হে চিরঞ্জীব, হে সর্বসত্তার ধারক! আমি আপনার রহমতের মাধ্যমে সাহায্য প্রার্থনা করছি)।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف عبد الرحمن بن إسحاق - وهو الكوفي أبو شيبة الواسطي - وضعف النضر بن إسماعيل البجلي، ثم إنه قد انفرد وضاح بن يحيى النهشلي بوصله - وهو متكلم فيه، ولا يحتمل تفرده - وخالفه غيره فرواه عن النضر عن عبد الرحمن بن إسحاق عن القاسم بن عبد الرحمن عن ابن مسعود، لم يذكر فيه: عن أبيه، فلا ندري العهدةُ في ذلك عليه أم على أبي بكر بن أبي دارم، فقد قال فيه الحاكم: رافضي غير ثقة، لذلك قال الذهبي: عبد الرحمن - يعني ابن عبد الله بن مسعود - لم يسمع من أبيه، وعبد الرحمن - يعني ابن إسحاق - ومن بعده ليسوا بحجة، قلنا: أما سماع عبد الرحمن من أبيه فقد رجحنا فيما سلف برقم (278) أنه سمع منه شيئًا قليلًا.وأخرجه البيهقي في "الدعوات" (190) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الفرج بعد الشدة" (47)، ومن طريقه أبو علي التنوخي في "الفرج بعد الشدة" 1/ 138، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (1287) عن إسحاق بن أبي إسرائيل المروزي، عن النضر بن إسماعيل، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن القاسم بن عبد الرحمن، عن ابن مسعود. لم يذكر فيه: عن أبيه، وهو المحفوظ فإسحاق بن أبي إسرائيل وثقه غير واحد، وقد توبع.وأخرجه أبو علي التنوخي 1/ 139 من طريق أخرى عن إسحاق بن أبي إسرائيل، عن النضر بن إسماعيل، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن القاسم بن عبد الرحمن قال: حدثنا عبد الله بن مسعود .. فذكره. والتصريح بالتحديث هنا وهم من أحد الضعفاء في هذا الإسناد، لأنَّ الانقطاع فيه ظاهر، والله أعلم.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9751)، وفي "الأسماء والصفات" (215) من طريق حفص بن غياث، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن القاسم بن عبد الرحمن، عن ابن مسعود. لم يذكر فيه أيضًا: عن أبيه. قال البيهقي بإثره: وهذا مع إرساله أصح. يعني أصح من رواية من قال في الإسناد: عن أبيه.وله شاهد من حديث أنس بن مالك عند الترمذي (3524)، وفيه يزيد بن أبان الرقاشي وهو ضعيف، قال الترمذي: حديث غريب. وسيأتي حديث أنس هذا في "المستدرك" برقم (2023)، لكن ليس دعاءً للهمِّ والغم والكرب، وإنما ذِكْر من أذكار الصباح والمساء.وفي الباب عن رجل من بني زريق عن أبيه عن جده، قال: أكثر دعاء النبي صلى الله عليه وسلم يوم أحد: "يا حي يا قيوم، برحمتك أستغيث، اكفني كل شيء، ولا تكلني إلى نفسي طرفة عين"، أخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2925)، وهذا إسناد ضعيف لإبهام الزرقي وأبيه وجده.
1897 - أخبرنا محمد بن المُؤمَّل بن الحسن، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا أبو ثابت محمد بن عُبيد الله، حدثنا محمد بن إسماعيل بن أبي فُدَيك، حدثني سعد بن سعيد بن أبي سعيد المَقبُري، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ما كَرَبَني أَمرٌ إِلَّا تَمثَّل لي جبريلُ عليه السلام فقال: يا محمد، قل: توكَّلتُ على الحي الذي لا يموت، والحمدُ لله الذي لم يَتَّخِذْ ولدًا، ولم يكن له شَريكٌ في المُلك، ولم يكن له وَليٌّ من الذُّلِّ، وكبِّره تكبيرًا" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখনই কোনো বিষয় আমাকে চিন্তিত করত বা কষ্ট দিত, তখনই জিবরীল (আঃ) আমার সামনে এসে বলতেন: হে মুহাম্মাদ, আপনি বলুন: আমি ভরসা করি সেই চিরঞ্জীবের উপর, যিনি কখনও মৃত্যুবরণ করেন না। আর সকল প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি কোনো সন্তান গ্রহণ করেননি, আর রাজত্বে তাঁর কোনো অংশীদার নেই, আর দুর্বলতার কারণে তাঁর কোনো অভিভাবকের প্রয়োজন নেই, এবং আপনি তাঁর যথাযথ মহিমা ঘোষণা করুন (তাকবীর দ্বারা)।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، سعد بن سعيد بن أبي سعيد المقبري يُضعَّف في الحديث، ضعفه غير واحد من أهل العلم، ثم إنه لم يدرك أباه كما قال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 4/ 1106، فعامة ما يرويه إنما هو عن أخيه عبد الله، وأخوه هذا متروك الحديث، ولذلك قال الحافظ ابن حجر في "تهذيب التهذيب" في إسناد هذا الحديث: وكأنه سقط عبد الله من السند. وقال أبو حاتم كما في "الجرح والتعديل" لابنه 4/ 85: هو في نفسه مستقيم، وبليَّته أنه يحدِّث عن أخيه عبد الله بن سعيد، وعبد الله بن سعيد ضعيف الحديث، ولا يحدِّث عن غيره، فلا أدري منه أو من أخيه؟وأخرجه البيهقي في "الدعوات" (185) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وقوله: "الحمد لله الذي لم يتخذ ولدًا … " إلى آخره أخرجه الطبراني في "الدعاء" (676) في فضل قوله في دبر كل صلاة، من طريق موسى بن يسار عن أبي هريرة، وإسناده ضعيف فيه من لم يُعرَف.وأخرج هذا الذكر أيضًا ضمن قصة وأنه يُذهِبُ الله به السّقم والضُّر: أبو يعلى (6671)، والطبراني في "الدعاء" (1045)، وابن السني في "عمل اليوم والليلة" (546) من طريق موسى بن عبيدة الرّبذي، عن محمد بن كعب القرظي، عن أبي هريرة. وهذا إسناد ضعيف أيضًا لضعف موسى بن عبيدة الربذي.
1898 - أخبرنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن شاذان الجَوهري، حدثنا سعيد بن سليمان الواسطي، حدثنا فُضَيل بن مرزوق، حدّثني أبو سَلَمةَ الجُهَني، عن القاسم بن عبد الرحمن، عن أبيه قال: قال عبد الله بن مسعود: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما أصابَ مسلمًا قَطُّ همٌّ ولا حَزَنٌ فقال: اللهمَّ إِنِّي عبدُك، وابنُ أَمَتَكَ، ناصِيتي في يَدِكَ، ماضٍ فيَّ حُكمُك، عدلٌ فيَّ قضاؤُك، أسألكَ بكلِّ اسمٍ هو لك، سمَّيتَ به نفسَك، أو أنزلتَه في كتابك، أو علَّمتَه أحدًا من خَلْقِكَ، أو استأثرتَ به في عِلْمِ الغَيبِ عندك، أن تجعلَ القرآنَ رَبيعَ قلبي، وجلاءَ حُزْني، وذهابَ همِّي، إلَّا أذهَبَ الله همَّه، وأبدَلَه مكانَ حَزَنِه فَرَحًا"، قالوا يا رسولَ الله، ألا نتعلمُ هذه الكلمات؟ قال: "بلى، ينبغي لمن سَمِعَهُنَّ أن يتعلَّمَهنَّ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم إن سَلِمَ من إرسال عبد الرحمن بن عبد الله عن أبيه، فإنه مختَلَف في سماعه عن أبيه [2].
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখনই কোনো মুসলিম দুশ্চিন্তা বা মনোকষ্টে আক্রান্ত হয়, আর সে বলে: “হে আল্লাহ! আমি আপনার দাস, আপনার দাস ও দাসীর সন্তান। আমার কপালের কেশগুচ্ছ (ভাগ্য) আপনার হাতে। আমার উপর আপনার বিধান কার্যকর, আমার উপর আপনার ফয়সালা ন্যায়সঙ্গত। আমি আপনার প্রতিটি নামের ওসীলায় আপনার কাছে প্রার্থনা করি, যে নাম আপনি নিজে রেখেছেন, অথবা আপনার কিতাবে নাযিল করেছেন, অথবা আপনার সৃষ্টির কাউকে শিখিয়েছেন, অথবা আপনার কাছে থাকা গায়েবী জ্ঞানে গোপন করে রেখেছেন (সংরক্ষিত রেখেছেন), (সেই নামগুলোর ওসীলায় চাই) যেন আপনি কুরআনকে আমার হৃদয়ের বসন্ত, আমার দুঃখের অপসারণকারী এবং আমার দুশ্চিন্তার দূরকারী বানিয়ে দেন।” [সে এই দুআ করলে] আল্লাহ তার দুশ্চিন্তা দূর করে দেন এবং তার দুঃখের স্থলে আনন্দ বদলে দেন। সাহাবীগণ বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা কি এই বাক্যগুলো শিখে নেব না? তিনি বললেন: অবশ্যই! যে ব্যক্তি এগুলো শোনে, তার উচিত হলো সেগুলো শিখে নেওয়া।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لجهالة أبي سلمة الجهني، كما هو مبيَّن في التعليق على "مسند أحمد" 6/ (3712)، فليس هو موسى بن عبد الله - أو ابن عبد الرحمن - الجهني الثقة الذي هو من رجال "التهذيب"، لذلك تعقب المصنِّفَ الحافظُ الذهبي في "تلخيصه" فقال: أبو سلمة لا يُدرى من هو، ولا رواية له في الكتب الستة، انتهى. القاسم بن عبد الرحمن: هو ابن عبد الله بن مسعود.وأخرجه أحمد (3712) و (4318)، وابن حبان (972) من طريق يزيد بن هارون، عن فضيل بن مرزوق، بهذا الإسناد.
[2] قد رجحنا فيما سلف برقم (278) أنه سمع منه شيئًا قليلًا، والله أعلم. وسيأتي الحديث برقم (3400) عن أبي بكر بن إسحاق عن يعقوب بن يوسف بإسناده إلى عطاء بن السائب عن سعيد بن جبير عن ابن عباس، لم يذكر فيه يحيى بن عمارة.
1899 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن الخليل الأصبهاني، حدثنا يعقوب بن يوسف القَزْويني، حدثنا محمد بن سعيد بن سابق، حدثنا عمرو بن أبي قيس، عن عطاء بن السائب، عن يحيى بن عُمارة، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس، قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يدعو يقول: "اللهمَّ قنِّعْني بما رزَقْتَني، وبارِكْ لي فيه، واخلُفْ عليَّ كلَّ غائبةٍ لي بخير" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুআ করতেন এবং বলতেন: "হে আল্লাহ! আপনি আমাকে যে রিযিক দিয়েছেন, তাতে আমাকে পরিতুষ্ট করুন, এবং তাতে আমার জন্য বরকত দিন, আর আমার অনুপস্থিত প্রতিটি জিনিসের জন্য উত্তম প্রতিস্থাপন (বা উত্তরসূরি) দান করুন।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، عطاء بن السائب كان قد اختلط، وقد اضطرب في إسناده ومتنه، كما سلف الكلام عليه برقم (1692). يحيى بن عمارة: هو الكوفي.وأخرجه البيهقي في "الآداب" (944)، وفي "الدعوات الكبير" (242) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه القاسم بن الفضل الثقفي في السادس من "الثقفيات" (34)، والديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (623)، والضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 10/ (418) - ومن طريقه ابن حجر في "نتائج الأفكار" 5/ 277 - من طريق محمد بن مسلم بن وارة، عن محمد بن سعيد بن سابق، به. قال الحافظ ابن حجر: حديث حسن، وعمرو قديم السماع من عطاء. قلنا: لكن عطاءً قد اضطرب فيه كما سلف بيانه برقم (1692)، ثم إنَّ رواية عمرو بن قيس نفسها ستأتي عند المصنف برقم (3400) لم يذكر فيها يحيى بن عمارة.وأخرجه ابن السني في "القناعة" (11)، وقوام السنة الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (2303)، والضياء المقدسي (419) - ومن طريقه ابن حجر في "النتائج" 5/ 276 - من طريق عبد الرحمن بن عبد الله الدشتكي، والخطيب في "المتفق والمفترق" (1745) من طريق عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد الرازي، وابن حجر 5/ 277 من طريق عبد الله بن الجهم ثلاثتهم عن عمرو بن أبي قيس، به. وسيأتي الحديث برقم (3400) عن أبي بكر بن إسحاق عن يعقوب بن يوسف بإسناده إلى عطاء بن السائب عن سعيد بن جبير عن ابن عباس، لم يذكر فيه يحيى بن عمارة.
1900 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني أسامة بن زيد، أنَّ سليمان بن موسى حدَّثه عن مكحول: أنه دَخَلَ على أنس بن مالكٍ، قال: فسمعتُه يَذكُرُ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول: "اللهمَّ انفَعْني بما علَّمْتَني، وعلِّمْني ما يَنفَعُني، وارزُقْني عِلْمًا تَنفَعُني به" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বলতেন: "হে আল্লাহ! আপনি আমাকে যা শিখিয়েছেন, তা দ্বারা আমাকে উপকৃত করুন। আর আমাকে এমন বিষয় শিক্ষা দিন, যা আমার উপকারে আসবে এবং আমাকে এমন জ্ঞান দান করুন, যা দ্বারা আমি উপকৃত হতে পারব।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل أسامة بن زيد - وهو الليثي - وسليمان بن موسى - وهو الأشدق - لكن أسامة قد توبع. الربيع بن سليمان: هو المرادي، ومكحول: هو الشامي.وأخرجه النسائي (7819) عن يونس بن عبد الأعلى، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (1748)، وفي "مسند الشاميين" (3371) من طريق عمارة بن غزية، عن سليمان الأشدق، به.وله شاهد من حديث أبي هريرة عند الترمذي (3599)، وابن ماجه (251) و (3833)، وإسناده ضعيف. فجعله من مسند حصين بن عبيد الخزاعي، ورواه بعضهم عن عمران بن حصين أنَّ أباه إلى آخره، وقال بعضهم عن عمران بن حصين أنَّ رجلًا، فجعله من مسند عمران، ولا يعلُّ هذا الحديث، إذ إنَّ عمران وأباه صحابيان، ولا يضر الاختلاف في الصحابي، بل ومرسله مقبول.منصور: هو ابن المعتمر.وأخرجه النسائي (10764) عن أحمد بن سليمان، عن عبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (10765) من طريق عمرو بن أبي قيس، عن منصور، به.وأخرجه ابن حبان (899) من طريق محمد بن عثمان العجلي، عن عبيد الله بن موسى، به إلى عمران بن حصين قال: أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم رجل فقال … فجعله من مسند عمران.وأخرجه أحمد 33/ (19992) من طريق شيبان، والنسائي (10766) من طريق زكريا بن أبي زائدة، كلاهما عن منصور، عن ربعي، عن عمران قال: جاء حصين إلى النبي صلى الله عليه وسلم … فذكره، في رواية شيبان: عمران بن حصين أو غيره أنَّ حصينًا … إلى غيره.قال البزار (3580): وأحسب أنَّ حديث عمران أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لأبيه، أصوب.وأخرج أحمد (19925) من طريق مطرف بن عبد الله بن الشخير، عن عمران بن حصين قال: كان عامة دعاء النبي صلى الله عليه وسلم: "اللهم اغفر لي ما أخطأتُ وما تعمدتُ، وما أسررتُ وما أعلنتُ، وما جهلتُ وما تعمدتُ". وإسناده صحيح.وأخرج الترمذي (3483) من طريق شبيب بن شيبة، عن الحسن البصري، عن عمران بن حصين قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم لأبي: "قل: اللهم أَلهمني رشدي، وأعذني من شر نفسي". وهذا إسناد ضعيف لضعف شبيب بن شيبة، والحسنُ البصريُّ لم يسمع من عمران. قال الترمذي: هذا حديث غريب.