আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
1901 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن علي الشَّيباني، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزَة حدثنا عبيد الله بن موسى، حدثنا إسرائيل بن يونس، عن منصور، عن رِبْعيِّ بن حِرَاش، عن عِمران بن حُصَين، عن أبيه: أنَّه أتَى النبيَّ صلى الله عليه وسلم قبل أن يُسلِمَ، فلما أراد أن ينصرف قال: ما أقول؟ قال: "قُل: اللهمَّ قِنِي شَرَّ نفسي، واعزِمْ لي على رُشْدِ أمري"، فقالها، ثم انصرف ولم يُسلِمْ، ثم أسلم، قال: يا رسول الله، فما أقول الآن وقد أسلمتُ؟ قال: "قُل: اللهمَّ قِنِي شرَّ نفسي، واعزِمْ لي على رُشْدِ أمري، اللهمَّ اغفر لي ما أسررتُ وما أعلنتُ، وما أخطأتُ وما عَمَدتُ، وما عَلِمتُ وما جَهِلتُ" [1]. هذا حديثٌ صحيحٌ على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর পিতা ইসলাম গ্রহণের পূর্বে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসেছিলেন। অতঃপর যখন তিনি ফিরে যেতে চাইলেন, তখন বললেন: আমি কী বলব (কোন দু'আ পড়ব)? তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “বলো: আল্লাহুম্মা ক্বিনী শার্রা নাফসী, ওয়া‘যিম লী ‘আলা রুশ্দি আমরী।” (অর্থ: হে আল্লাহ! আমাকে আমার নফসের (প্রবৃত্তির) অনিষ্টতা থেকে বাঁচান এবং আমার সকল কাজ সঠিক পথে পরিচালিত করার দৃঢ় সংকল্প দিন।) তিনি তা বললেন, অতঃপর ফিরে গেলেন, কিন্তু ইসলাম গ্রহণ করলেন না। এরপর তিনি ইসলাম গ্রহণ করলেন। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রসূল! এখন আমি কী বলব, যখন আমি ইসলাম গ্রহণ করেছি? তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “বলো: আল্লাহুম্মা ক্বিনী শার্রা নাফসী, ওয়া‘যিম লী ‘আলা রুশ্দি আমরী। আল্লাহুম্মাগফির লী মা আসরারতু ওয়ামা আ‘লানতু, ওয়ামা আখত্বা’তু ওয়ামা ‘আমাদতু, ওয়ামা ‘আলিমতু ওয়ামা জাহিলতু।” (অর্থ: হে আল্লাহ! আমাকে আমার নফসের অনিষ্টতা থেকে বাঁচান এবং আমার সকল কাজ সঠিক পথে পরিচালিত করার দৃঢ় সংকল্প দিন। হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করে দিন— যা আমি গোপনে করি ও যা প্রকাশ্যে করি, যা ভুলক্রমে করি ও যা ইচ্ছাকৃতভাবে করি এবং যা আমি জানি ও যা আমি না জানি।)
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح، وقد اختلف في إسناده، فرواه بعضهم عن عمران بن حصين عن أبيه، فجعله من مسند حصين بن عبيد الخزاعي، ورواه بعضهم عن عمران بن حصين أنَّ أباه إلى آخره، وقال بعضهم عن عمران بن حصين أنَّ رجلًا، فجعله من مسند عمران، ولا يعلُّ هذا الحديث، إذ إنَّ عمران وأباه صحابيان، ولا يضر الاختلاف في الصحابي، بل ومرسله مقبول.منصور: هو ابن المعتمر.وأخرجه النسائي (10764) عن أحمد بن سليمان، عن عبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (10765) من طريق عمرو بن أبي قيس، عن منصور، به.وأخرجه ابن حبان (899) من طريق محمد بن عثمان العجلي، عن عبيد الله بن موسى، به إلى عمران بن حصين قال: أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم رجل فقال … فجعله من مسند عمران.وأخرجه أحمد 33/ (19992) من طريق شيبان، والنسائي (10766) من طريق زكريا بن أبي زائدة، كلاهما عن منصور، عن ربعي، عن عمران قال: جاء حصين إلى النبي صلى الله عليه وسلم … فذكره، في رواية شيبان: عمران بن حصين أو غيره أنَّ حصينًا … إلى غيره.قال البزار (3580): وأحسب أنَّ حديث عمران أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لأبيه، أصوب.وأخرج أحمد (19925) من طريق مطرف بن عبد الله بن الشخير، عن عمران بن حصين قال: كان عامة دعاء النبي صلى الله عليه وسلم: "اللهم اغفر لي ما أخطأتُ وما تعمدتُ، وما أسررتُ وما أعلنتُ، وما جهلتُ وما تعمدتُ". وإسناده صحيح.وأخرج الترمذي (3483) من طريق شبيب بن شيبة، عن الحسن البصري، عن عمران بن حصين قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم لأبي: "قل: اللهم أَلهمني رشدي، وأعذني من شر نفسي". وهذا إسناد ضعيف لضعف شبيب بن شيبة، والحسنُ البصريُّ لم يسمع من عمران. قال الترمذي: هذا حديث غريب.
1902 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مسدَّد، حدثنا بِشْر بن المفضَّل، حدثنا شعبة قال: سمعتُ أبا إسحاق قال: سمعتُ أبا المغيرةِ - أو المغيرةَ أبا الوليد - يحدِّثُ عن حذيفة أنه قال: يا رسول الله، إنِّي رجلٌ ذَرِبُ اللسانِ، وإنَّ عامَّة ذلك على أهلي، فقال: "فأينَ أنتَ من الاستغفار؟ إنِّي لأَستغفرُ الله في اليوم والليلة - أو الليلةِ، أو في اليوم - مئةَ مرَّة" [1]. قال الحاكم: هذا عُبيدٌ أبو المغيرة بلا شكٍّ، وقد أتى شعبةُ بالإسناد والمتن بالشك، وحَفِظَه سفيانُ بن سعيد فأَتى به بلا شكٍّ في الإسناد والمتن:
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি এমন এক ব্যক্তি যার ভাষা রুক্ষ (বা কটু), আর এর অধিকাংশ আমার পরিবারের উপরই পড়ে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তুমি ইস্তিগফার (আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা) থেকে দূরে কেন? আমি তো দিন ও রাতে— অথবা রাতে— অথবা দিনে— একশো বার আল্লাহর কাছে ইস্তিগফার করি।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده محتمل للتحسين، وقصة استغفار النبي صلى الله عليه وسلم صحيحة بشواهدها، وأبو المغيرة لم يرو عنه غير أبي إسحاق السبيعي، وذكره ابن حبان في ثقات التابعين، وقد اختلف في اسمه، فقيل: عبيد بن المغيرة، وقيل: عبيد بن عمرو، وقيل: عبيد الله بن أبي المغيرة، وقيل: المغيرة بن أبي عبيد، وقيل: الوليد، وقيل: أبو الوليد. لكن قد صحَّت قضية استغفار النبي صلى الله عليه وسلم في اليوم مئة مرة أو سبعين مرة من غير وجه عن النبي صلى الله عليه وسلم كما سيأتي. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي.وأخرجه أحمد 38/ (23362)، والنسائي (10210) من طريق محمد بن جعفر، عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (23340) من طريق إسرائيل، وابن ماجه (3817) من طريق أبي بكر بن عياش، والنسائي (10211) من طريق أبي الأحوص، و (10214) من طريق أبي خالد الدالاني، أربعتهم عن أبي إسحاق السبيعي، به. وسموه جميعهم أبا المغيرة بلا شك، وقال الدالاني: أبو المغيرة عبيد البجلي. وفي رواية أبي بكر بن عياش: "تستغفر الله في اليوم سبعين مرة"، وقال الباقون: "كل يوم" بلا شك، وزاد إسرائيل والدالاني في المتن: "وأتوب إليه".وخالف سعيد بن عامر عن شعبة عن أبي إسحاق، فقال: عن مسلم بن نذير عن حذيفة، أخرجه هكذا النسائي (10209). وهذا من أوهام سعيد بن عامر، فهو ربما وهم كما قال أبو حاتم الرازي.وانظر ما بعده، وما سيأتي برقم (3748).ويشهد لاستغفار النبي صلى الله عليه وسلم حديث أبي هريرة عند البخاري (6307) رفعه: "والله إني لأستغفر الله في اليوم أكثر من سبعين مرة".وحديث الأغر المزني مرفوعًا عند مسلم (2702): "إنه ليُغان على قلبي، وإني لأستغفر الله في اليوم مئة مرة"، وسيشير إليه المصنف بعد قليل.وحديث ابن عمر عند أحمد 8/ (4726)، وأبي داود (1516)، وابن ماجه (3814)، والترمذي (3434)، والنسائي (10219)، وابن حبان (927): إنْ كنّا لَنَعُدُّ لرسول الله صلى الله عليه وسلم في المجلس الواحد مئة مرة: "ربِّ اغفر لي وتب عليَّ، إنك أنت التواب الرحيم"، وإسناده صحيح، وسيشير إليه المصنِّف أيضًا.قوله: "ذَرِبُ اللسان" يعني: حادَّ اللسان، لا يبالي بما قال. قاله ابن الأثير في "النهاية".
1903 - حدثنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا الحسن بن سلَّام، حدثنا قَبِيصَةُ، حدثنا سفيان.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن، حدثنا سفيانُ، عن أبي إسحاق، عن عُبيدٍ أبي المغيرة، عن حذيفةَ قال: كنتُ ذَرِبَ اللسانِ على أهلي، قلتُ: يا رسول الله، قد خشيتُ أن يُدخِلَني لساني النارَ؟ قال: "فأينَ أنتَ من الاستغفار؟ إنِّي لأستغفرُ الله في اليوم مئةَ مرَّة".قال أبو إسحاق: فذكرتُ ذلك لأبي بُرْدة، فقال: "وأتوبُ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه هكذا، إنَّما أخرج مسلم حديث أبي بُردةَ، عن الأغرِّ المُزْني، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "إنه لَيُغانُ على قلبي، وإنِّي لأستغفرُ الله في اليوم مئةَ مرة".وكذلك حديثُ نافع، عن ابن عمر: إِنْ كُنَّا لَنَعُدَّ لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم [2].
হুতাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার পরিবারের প্রতি কটুভাষী ছিলাম। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার আশঙ্কা হয় যে আমার এই জিহ্বা আমাকে জাহান্নামে প্রবেশ করাবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি ইস্তেগফার (আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাওয়া) থেকে দূরে কেন? নিশ্চয় আমি দিনের মধ্যে একশত বার আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করি।" আবূ ইসহাক (রাবী) বলেন: আমি আবূ বুরদার নিকট বিষয়টি উল্লেখ করলে তিনি বললেন: "এবং আমি তওবা করি।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده محتمل للتحسين كسابقه. قبيصة: هو ابن عقبة، وعبد الرحمن: هو ابن مهدي، وسفيان: هو الثوري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي، وأبو بردة المذكور بإثر الحديث: هو ابن أبي موسى الأشعري.وهو في "مسند أحمد" 38/ (23371).وأخرجه النسائي (10212) عن عمرو بن علي الفلاس، وابن حبان (926) من طريق أبي خيثمة، كلاهما عن عبد الرحمن بن مهدي، به. ولم يذكر عمرو بن علي رواية أبي إسحاق عن أبي بردة.وأخرجه أحمد (23421) عن وكيع، والنسائي (10213) من طريق مخلد بن يزيد، كلاهما عن سفيان الثوري، به. لم يذكرا رواية أبي إسحاق عن أبي بردة أيضًا.وطريق أبي بردة هذه اختلف فيها عليه، فرواه بعضهم عنه مرسلًا، ورواه بعضهم عنه عن أبي موسى الأشعري، والمحفوظ عنه عن الأغر المزني، انظر تفصيل ذلك في تعليقنا على "مسند أحمد" 32/ (19672) و 38/ (23340).
[2] حديث الأغر المزني عند مسلم برقم (2702)، وأما حديث ابن عمر فليس عنده كما يُوهم ظاهر كلام المصنف، وإنما هو مخرَّج في "السنن" وغيرها كما في تعليقنا على الحديث السابق.
1904 - أخبرنا مُكْرَم بن أحمد القاضي، حدثنا أبو قِلَابة الرَّقَاشي، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثني أبي، عن حسين المعلِّم، عن عبد الله بن بُريدةَ، عن أبي موسى الأشعريِّ قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "اللهمَّ إِنِّي أستغفرُكَ لما قدَّمتُ وما أخَّرتُ، وما أعلنتُ وما أسررتُ، أنت المقدِّمُ، وأنت المؤخِّر، وأنت على كلِّ شيءٍ قديرٌ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ মূসা আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে ক্ষমা চাই যা আমি আগে করেছি এবং যা আমি পরে করেছি, এবং যা আমি প্রকাশ করেছি ও যা আমি গোপন করেছি। তুমিই অগ্রে স্থাপনকারী (আল-মুকাদ্দিম) এবং তুমিই বিলম্বে স্থাপনকারী (আল-মুআখখির), আর তুমিই সকল কিছুর উপর ক্ষমতাবান।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، فقد خالف أبا قلابة الرقاشي - وهو عبد الملك بن محمد البصري - أحمدُ بنُ حنبل، فرواه عن عبد الصمد بهذا الإسناد إلى عبد الله بن بريدة قال: حُدِّثت عن الأشعري، فذكر واسطةً مبهمةً بين ابن بريدة وأبيه. والذي يبدو أنَّ الوهم بإسقاط الواسطة المبهمة إنما هو من أبي قلابة، فقد قال الدارقطني فيه: صدوق كثير الخطأ في الأسانيد والمتون، كان يحدِّث من حفظه فكثرت الأوهام منه. قلنا: وهذا المبهم متابع، فيصح الحديث.وأخرجه أحمد 32/ (19489) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن أبيه، عن حسين، عن ابن بريدة قال: حُدِّثتُ عن الأشعري أنه قال .. فذكره.وأخرجه البخاري (6398)، ومسلم (2719)، وابن حبان (957) من طريق ابن أبي موسى الأشعري عن أبيه. هكذا في البخاري وابن حبان لم يذكرا اسم ابن أبي موسى، وفي مسلم: أبو بردة بن أبي موسى. وزادوا جميعًا في أوله: "رب اغفر لي خطيئتي وجهلي، وإسرافي في أمري كله، وما أنت أعلم به مني، اللهم اغفر لي خطاياي، وعمدي وجهلي وهزلي، وكل ذلك عندي".وفي الباب عن ابن عمر، وسيأتي برقم (1955).وعن أبي هريرة عند أحمد 13/ (7913).وعن علي بن أبي طالب عند مسلم (771).وعن ابن عباس عند البخاري (1120)، ومسلم (769).
1905 - أخبرنا بكر بن محمد الصَّيْرَفي، حدثنا أحمد بن عبيد الله النَّرْسي، حدثنا محمد بن سابق، حدثنا إسرائيل، عن أبي سِنَان، عن أبي الأحْوَص، عن ابن مسعودٍ قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن قال: أستغفرُ الله الذي لا إله إلَّا هو الحيُّ القَيُّومُ وأتوبُ إليه، ثلاثًا، غُفِرت له ذُنوبُه وإن كان فارًّا من الزَّحْف" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি ‘আস্তাগফিরুল্লাহাল্লাযী লা ইলাহা ইল্লা হুওয়াল হাইয়্যুল ক্বাইয়্যুমু ওয়া আতূবু ইলাইহি’ (অর্থাৎ: আমি আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাই, যিনি ছাড়া কোনো উপাস্য নেই, যিনি চিরঞ্জীব, চিরস্থায়ী, এবং আমি তাঁর কাছে তওবা করি) এই বাক্যটি তিনবার বলবে, তার গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে, যদিও সে জিহাদের ময়দান থেকে পলায়নকারী হয়।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل محمد بن سابق، وقد توبع إسرائيل: هو ابن يونس، وأبو سنان: هو ضرار بن مرة، وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك الجشمي.وأخرجه البيهقي في "الدعوات" (161) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (2582) من طريق محمد بن يوسف الفريابي عن إسرائيل.وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 300 عن ابن نمير، عن إسرائيل، به. لكنه وقفه على ابن مسعود، ومثل هذا لا يضر ما دام ثبت مرفوعًا من غير هذه الطريق الواحدة.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (8541) من طريق حُديج بن معاوية، عن أبي إسحاق السبيعي، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن ابن مسعود قوله، موقوفًا، وهذا إسناد ضعيف لضعفٍ في حُديج بن معاوية. سلّام، أنَّ رجلًا حدَّثه، أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم. وقد كان يحيى ربما حدَّث من صحيفةٍ لأبي سلَّام كانت عنده، وإلّا فقد سمعَ هذا الحديث من زيد بن سلّام عن جده أبي سلّام كما في رواية أبان العطّار السابقة، فلا اختلاف.وقوله: "بَخ بَخ" كلمة تُقال عند المدح والرضا بالشيء، وتُكرّر للمبالغة، وهي مبنية على السكون، فإن وصلتَ جَرَرْتَ ونَوَّنتَ - يعني كما هو الحال هنا - وربما شُدِّدت الخاء.
1906 - حدثنا عمرو بن محمد بن منصور العَدْل، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا سليمان بن أحمد الواسطي، حدثنا الوليد بن مُسلم، حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، حدثني أبو سَلّام الأسودُ، حدثني أبو سلمى راعي رسولِ الله صلى الله عليه وسلم ولقيتُه في مسجد الكوفة - قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "بخٍ بخٍ بخمسٍ ما أثقلَهُنَّ في الميزان: سبحانَ الله، والحمدُ لله، ولا إلهَ إِلَّا اللهُ، واللهُ أكبرُ، والولدُ الصالحُ يُتوفَّى للمسلمِ فيَحتسبُه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "বাহ! বাহ! পাঁচটি জিনিস যা মিজানের পাল্লায় কতই না ভারী: সুবহানাল্লাহ, আলহামদুলিল্লাহ, লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, আল্লাহু আকবার, এবং কোনো নেককার সন্তান যদি কোনো মুসলমানের মারা যায় আর সে তার জন্য সওয়াবের প্রত্যাশা করে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف من أجل سليمان بن أحمد الواسطي، وقد تابعه غير واحدٍ عن الوليد بن مسلم.فقد أخرجه النسائي (9923)، وابن حبان (833) من طرق عن الوليد بن مسلم، عن عبد الله بن العلاء بن زَبْر وعبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن أبي سلَّام، عن أبي سلمى. فقرنُوا بابن جابر عبدَ الله بنَ العلاء بن زَبْر، وهو ثقة أيضًا.وأخرجه أحمد 24/ (15662) و 29/ (18076) من طريق أبان بن يزيد العطّار، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلَّام، عن أبي سلّام، عن مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم. وهذا إسناد صحيح، والمولى المبهم هو الراعي أبو سلمى المبيَّن في رواية ابن جابر وابن زَبْر.وأخرجه أحمد 38/ (23100) من طريق هشام الدَّستُوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلّام، أنَّ رجلًا حدَّثه، أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم. وقد كان يحيى ربما حدَّث من صحيفةٍ لأبي سلَّام كانت عنده، وإلّا فقد سمعَ هذا الحديث من زيد بن سلّام عن جده أبي سلّام كما في رواية أبان العطّار السابقة، فلا اختلاف.وقوله: "بَخ بَخ" كلمة تُقال عند المدح والرضا بالشيء، وتُكرّر للمبالغة، وهي مبنية على السكون، فإن وصلتَ جَرَرْتَ ونَوَّنتَ - يعني كما هو الحال هنا - وربما شُدِّدت الخاء.
1907 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّرِيّ بن خُزيمة، حدثنا أبو غسان مالك بن إسماعيل، حدثنا إسرائيل، عن أبي سِنَان، عن أبي صالح، عن أبي سعيد وأبي هريرة، قالا: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الله اصطَفَى من الكلامِ: سبحانَ الله، والحمدُ لله، ولا إله إلَّا اللهُ، واللهُ أكبرُ، فإذا قال العبدُ: سبحانَ الله، كَتَبَ اللهُ له عشرين حسنةً، أو حَطَّ عنه عشرين سيئةً، وإذا قال: اللهُ أكبرُ، فمثلُ ذلك، وإذا قال: لا إلهَ إلَّا الله، فمثلُ ذلك، وإذا قال العبدُ: الحمدُ لله ربِّ العالمين، من قِبَل نفسِه، كُتبتْ له ثلاثون حسنةً، وحُطَّ عنه ثلاثون سيئةً" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ সাঈদ ও আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়ে বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা বাণীসমূহের মধ্য থেকে (চারটি বাণীকে) মনোনীত করেছেন: সুবহানাল্লাহ, আলহামদুলিল্লাহ, লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ এবং আল্লাহু আকবার। যখন কোনো বান্দা ‘সুবহানাল্লাহ’ বলে, তখন আল্লাহ তার জন্য বিশটি নেকি লেখেন অথবা তার থেকে বিশটি পাপ মোচন করেন। আর যখন সে ‘আল্লাহু আকবার’ বলে, তখনও অনুরূপ (বিশ নেকি লেখা হয় বা বিশ পাপ মোচন করা হয়)। আর যখন সে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলে, তখনও অনুরূপ (বিশ নেকি লেখা হয় বা বিশ পাপ মোচন করা হয়)। আর যখন বান্দা নিজ থেকে (স্বতঃস্ফূর্তভাবে) ‘আলহামদু লিল্লাহি রাব্বিল আলামীন’ বলে, তখন তার জন্য ত্রিশটি নেকি লেখা হয় এবং তার থেকে ত্রিশটি পাপ মোচন করা হয়।”
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، لكنه اختُلف في رفعه ووقفه على أبي سِنان - وهو ضرار بن مُرّة - والراجح وقفه فيما يغلب على الظن. إسرائيل: هو ابن يونس، وأبو صالح: هو عبد الرحمن بن قيس الحَنفي.وأخرجه أحمد 13/ (8012) و 17/ (11304)، والنسائي (10608) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، وأحمد 13/ (8093) و 17/ (11327) عن عبد الرزاق، كلاهما عن إسرائيل، بهذا الإسناد.وخالف إسرائيلَ فيه خالدُ بنُ عبد الله الواسطي عند عبد الله بن أحمد بن حنبل في زياداته على "الزهد" لأبيه (1000) فرواه عن أبي سنان عن أبي صالح عن أبي هريرة وحده موقوفًا.ويُرجِّح الوقفَ ما رواه سهيل بن أبي صالح، عن أبيه ذكوان السمان، عن عبد الله بن ضمرة السَّلُولي، عن كعب الأحبار، قال: اختار الله الكلام فأحبُّ الكلام إلى الله: لا إله إلّا الله، والله أكبر، وسبحان الله، والحمد لله، فمن قال: لا إله إلّا الله، فهي كلمة الإخلاص كتب الله بها … ثم ذكر مثله. أخرجه النسائي (10611) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن سهيل.وكذلك هو عند محمد بن نصر المروزي في "تعظيم قدر الصلاة" (326) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي، عن سُهيل، عن أبيه، عن السَّلولي، عن كعب، لكن مختصرًا بذكر أوله، دون قوله: فمن قال … إلى آخره.فلعلَّ أبا هريرة سمع الخبر بطوله من كعب الأحبار، لأنَّ أبا هريرة كان جليسًا له، ويكون رفع الخبر وهمًا، والله تعالى أعلم. وانظر ما سيأتي برقم (1911).لكن أخرج النسائيُّ (10609)، وابنُ حبان (836) و (1812) من طريق الأعمش، عن أبي صالح السمّان، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خير الكلام أربعٌ لا تُبالي بأيّهن بدأتَ: سبحانَ الله، والحمدُ لله، ولا إله إلّا الله، واللهُ أكبرُ". وإسناده صحيح. وهو في "مسند أحمد" 26/ (16412) أيضًا، لكنه لم يسمِّ فيه أبا هريرة، إنما قال عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. فالظاهر أنَّ أبا هريرة أحدهم.إذًا فهذا القدر من الحديث هو الذي يصحُّ مرفوعًا دون سائره، ويؤيده ما رواه مسلم (2695)، والترمذي (3597)، والنسائي (10603)، وابن حبان (834) من طريق الأعمش، عن أبي صالح السمّان، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لأَن أقول: سبحان الله، والحمد لله، ولا إله إلّا الله، والله أكبَرُ، أحبُّ إليَّ مما طلعت عليه الشمس".ويشهد لهذا القدر حديث سمرة بن جندب عند مسلم (2137).
1908 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المُثنّى، حدثنا محمد بن عبد الله الخُزاعي، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن أبي سِنَان، عن عثمان بن أبي سَوْدة، عن أبي هريرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مرَّ به وهو يَغرِسُ غَرْسًا، فقال: "ما تَصنعُ يا أبا هُريرة؟ " قال: أغرِسُ غرسًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ألا أدلُّك على غَرْسٍ خيرٍ لك منه؟ " قلت: ما هو؟ قال: "سبحانَ اللهِ، والحمدُ للهِ، ولا إلهَ إلَّا اللهُ، واللهُ أكبرُ، يُغرَسُ لك بكلِّ واحدةٍ شجرةٌ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ عن جابر:
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যখন তিনি একটি চারা রোপণ করছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, "হে আবূ হুরায়রা, তুমি কী করছো?" তিনি বললেন, "আমি একটি চারা রোপণ করছি।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি কি তোমাকে এর চেয়ে উত্তম রোপণের কথা বলে দেব না?" আমি বললাম, "তা কী?" তিনি বললেন, "(তা হলো) সুবহানাল্লাহ, আলহামদুলিল্লাহ, লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, এবং আল্লাহু আকবার। এর প্রত্যেকটির বিনিময়ে তোমার জন্য একটি করে বৃক্ষ রোপণ করা হবে।।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف من أجل أبي سِنان - وهو عيسى بن سنان القَسْملي - فهو ليِّن الحديث كما قال الحافظُ ابن حجر، وقد حسَّن إسنادَه المنذريُّ في "الترغيب والترهيب".أبو المثنّى: هو معاذ بن المثنّى العنبري ومحمد بن عبد الله الخُزاعي: هو ابن عثمان البصري.وأخرجه ابن ماجه (3807) من طريق عفان بن مسلم، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وقد روي مرفوعُه عن أبي هريرة من طريقين آخرين، أحدهما عند البزار (9311) من طريق حميد المكي مولى ابن علقمة، عن عطاء بن أبي رباح، عن أبي هريرة. وإسناده ضعيف لجهالة حميد هذا.وثانيهما عند الطبراني في "الأوسط" (3171) من طريق سليمان بن أبي كريمة، عن ابن جُريج، عن أبي صالح، عن أبي هريرة. وإسناده ضعيف لضعف سليمان بن أبي كريمة، ولعنعنة ابن جريج، ولا رواية له عن أبي صالح - وهو السمّان - أصلًا، إنما يروي بواسطةٍ عنه.ويشهد لغِراس الجنة حديثُ عبد الله بن مسعود عند الترمذي (3462)، وقال عنه: حسنٌ غريب.وحديثُ عبد الله بن عباس عند الطبراني في "الأوسط" (8475)، وفي "الدعاء" (1676). وقال المنذري في "الترغيب والترهيب": إسناده حسن لا بأس به في المتابعات.ويشهد لذكر التسبيح وحده أنه يغرس به غرس في الجنة حديث جابر التالي.
1909 - أخبرَناه أبو الحسن أحمد بن محمد العَنَزِي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سلمة، عن الحجّاج الصَّوّاف، عن أبي الزُّبير، عن جابر، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَن قال: سبحانَ الله العَظيم، غُرِست له نخلةٌ في الجنة" [1].
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি 'সুবহানাল্লাহিল আযীম' (মহান আল্লাহ পবিত্র) বলবে, তার জন্য জান্নাতে একটি খেজুর গাছ রোপণ করা হবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. وقد سلف برقم (1868). وأخرجه ابن حبان (840) من طريق حرملة بن يحيى، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 18/ (11713) من طريق ابن لهيعة، عن درّاج أبي السَّمْح، به.ويشهد له حديثُ أبي هريرة الآتي برقم (2008)، ورجاله ثقات لكنه معَلٌّ.وحديث النعمان بن بشير عند أحمد 30/ (18353) وغيره، وفيه رجل مبهم، ولولاه لكان إسناده على شرط الصحيح كما قال الحافظُ في "الأمالي المطلقة" ص 222.وروي من قول عثمان بن عفان فيما أخرجه أحمد 1/ (513)، وإسناده حسن، ومثله لا يُقال من قِبَل الرأي والاجتهاد.ومن قول ابن عباس في أكثر الروايات عنه عند الطبري في "تفسيره" 15/ 254، وهو أصح ما روي عنه كما قال العلائي.ومن قول ابن عُمر عند الطبري أيضًا 15/ 255، ورجاله ثقات.وأسنده الطبريُّ أيضًا عن عطاء بن أبي رباح وسعيد بن المسيب وسالم ومجاهد ومحمد بن كعب القرظي والحسن وقتادة.
1910 - حدثنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقَفي وأبو محمد عبد الله بن محمد الصَّيدلاني، قالا: حدثنا أبو عبد الله محمد بن أيوب البَجَلي، حدثنا أحمد بن عيسى المصري، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن أبي السَّمْح، عن أبي الهَيثم، عن أبي سعيد الخُدْري، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "استكثِروا من الباقِياتِ الصالحاتِ" قيل: وما هُنّ يا رسولَ الله؟ قال: "المِلّةُ" قيل: وما هي؟ قال: "التكبيرُ والتهليلُ والتسبيحُ والتحميدُ، ولا حولَ ولا قوةَ إلَّا بالله" [1]. هذا أصح إسناد للمِصريِّين [2]، ولم يُخرجاه.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা 'আল-বাক্বিয়াতুস সালিহাত' (চিরস্থায়ী পুণ্যকর্ম)-এর সংখ্যা বৃদ্ধি করো।" জিজ্ঞাসা করা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! সেগুলো কী? তিনি বললেন: "আল-মিল্লাত।" জিজ্ঞাসা করা হলো: সেটা কী? তিনি বললেন: "তাকবীর, তাহলীল, তাসবীহ, তাহমীদ এবং 'লা হাওলা ওয়া লা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ'।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف رواية أبي السَّمْح - وهو درّاج بن سمعان - عن أبي الهيثم - وهو سليمان بن عمرو العُتْواريّ - وللخبر شواهد أوردها الحافظ العلائي في "جزء تفسير الباقيات الصالحات" يصح بها كما قال. وأخرجه ابن حبان (840) من طريق حرملة بن يحيى، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 18/ (11713) من طريق ابن لهيعة، عن درّاج أبي السَّمْح، به.ويشهد له حديثُ أبي هريرة الآتي برقم (2008)، ورجاله ثقات لكنه معَلٌّ.وحديث النعمان بن بشير عند أحمد 30/ (18353) وغيره، وفيه رجل مبهم، ولولاه لكان إسناده على شرط الصحيح كما قال الحافظُ في "الأمالي المطلقة" ص 222.وروي من قول عثمان بن عفان فيما أخرجه أحمد 1/ (513)، وإسناده حسن، ومثله لا يُقال من قِبَل الرأي والاجتهاد.ومن قول ابن عباس في أكثر الروايات عنه عند الطبري في "تفسيره" 15/ 254، وهو أصح ما روي عنه كما قال العلائي.ومن قول ابن عُمر عند الطبري أيضًا 15/ 255، ورجاله ثقات.وأسنده الطبريُّ أيضًا عن عطاء بن أبي رباح وسعيد بن المسيب وسالم ومجاهد ومحمد بن كعب القرظي والحسن وقتادة.
[2] كذا قال المصنّف هنا، وهو خلاف قوله في "معرفة علوم الحديث" ص 56 حيث قال: أثبت إسناد المصريين: الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر الجُهني. وهذا أصح من قوله هنا، لما هو معلوم من كلام كثير من الأئمة في ضعف رواية درّاج أبي السَّمْح عن أبي الهيثم، وما قاله المصنف هنا هو رأي يحيى بن معين، فقد أسنده عنه هو في مصنفه هذا بإثر الحديث الآتي برقم (3636). عبد الله بن ضَمْرة السَّلُولي، عن كعب الأحبار قولَه، وهو الصحيح، وروايته عن أبي هريرة مرفوعًا خطأٌ كما جزم به أبو زرعة الرازي فيما نقله عنه ابن أبي حاتم في "العلل" (2022). وقد روي ذلك عن أبي هريرة مرفوعًا أيضًا من وجه آخر تقدَّم برقم (1907)، لكنه اختُلف في رفعه ووقفه، كما سبق، ووقفه أرجَح وأشبه.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (4084) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي في "الشعب" (571)، وقوام السنة الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (758) من طريق المؤمّل بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، عن سهيل بن أبي صالح، به.وأخرجه محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدَني في "الإيمان" (3) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، والنسائي (10611) - ومن طريقه ابن عبد البر في "التمهيد" 6/ 48 - من طريق جرير بن عبد الحميد، والبيهقي في "الشعب" (3465) من طريق زهير بن محمد التميمي، ثلاثتهم عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن عبد الله بن ضمرة السَّلُولي، عن كعب الأحبار قوله.
1911 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا عبد العزيز بن عبد الله الأُويسي، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الرِّجَال، حدثنا سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَن كَبَّر واحدةً كُتِب له عشرون ومُحِيَت عنه عشرون، ومن سبَّح واحدةً كُتِبَت له عشرون ومُحِيَت عنه عشرون، ومن حَمِدَ واحدةً كُتِبَت له ثلاثون ومُحِيَت عنه ثلاثون" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি একবার তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বলবে, তার জন্য বিশটি সাওয়াব লেখা হবে এবং তার বিশটি গুনাহ মুছে ফেলা হবে। আর যে ব্যক্তি একবার তাসবীহ (সুবহানাল্লাহ) বলবে, তার জন্য বিশটি সাওয়াব লেখা হবে এবং তার বিশটি গুনাহ মুছে ফেলা হবে। আর যে ব্যক্তি একবার তাহমীদ (আলহামদুলিল্লাহ) বলবে, তার জন্য ত্রিশটি সাওয়াব লেখা হবে এবং তার ত্রিশটি গুনাহ মুছে ফেলা হবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] رجاله ثقات، لكنه اختُلف في إسناده على سُهيل بن أبي صالح، فقد رواه عبدُ الرحمن بن أبي الرِّجال كما وقع عند المصنف هنا، وتابعه حماد بن سلمة، لكن الراوي عنه المؤمَّل بن إسماعيل، وهو سيئ الحفظ، وخالفهما جماعةٌ فرووه عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن عبد الله بن ضَمْرة السَّلُولي، عن كعب الأحبار قولَه، وهو الصحيح، وروايته عن أبي هريرة مرفوعًا خطأٌ كما جزم به أبو زرعة الرازي فيما نقله عنه ابن أبي حاتم في "العلل" (2022). وقد روي ذلك عن أبي هريرة مرفوعًا أيضًا من وجه آخر تقدَّم برقم (1907)، لكنه اختُلف في رفعه ووقفه، كما سبق، ووقفه أرجَح وأشبه.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (4084) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي في "الشعب" (571)، وقوام السنة الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (758) من طريق المؤمّل بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، عن سهيل بن أبي صالح، به.وأخرجه محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدَني في "الإيمان" (3) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، والنسائي (10611) - ومن طريقه ابن عبد البر في "التمهيد" 6/ 48 - من طريق جرير بن عبد الحميد، والبيهقي في "الشعب" (3465) من طريق زهير بن محمد التميمي، ثلاثتهم عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن عبد الله بن ضمرة السَّلُولي، عن كعب الأحبار قوله.
1912 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا أبو الوليد الطَّيالسي، حدثنا أبو عَوَانة، عن حُصَين، عن سالم بن أبي الجَعْد، قال: حدثنا أبو أُمامة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ما مِن عبدٍ قال: الحمدُ لله عددَ ما خَلَق، والحمدُ لله مِلءَ ما خَلَق، والحمدُ لله عددَ ما في السماوات والأرض، والحمدُ لله عددَ ما أَحصى كتابُه، والحمدُ لله عددَ كل شيءٍ، وسبحانَ الله مِثلَهن"، قال: فأعظمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ذلكَ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবু উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কোনো বান্দা নেই যে এই দু’আ করে: ‘আলহামদুলিল্লাহ (আল্লাহর প্রশংসা) তাঁর সৃষ্ট বস্তুর সংখ্যার সমপরিমাণ, আলহামদুলিল্লাহ তাঁর সৃষ্ট বস্তুর পরিমাণের সমপরিমাণ, আলহামদুলিল্লাহ আসমান ও যমীনে যা কিছু আছে তার সংখ্যার সমপরিমাণ, আলহামদুলিল্লাহ তাঁর কিতাব যা কিছু গণনা করেছে তার সংখ্যার সমপরিমাণ, আলহামদুলিল্লাহ প্রতিটি বস্তুর সংখ্যার সমপরিমাণ’ এবং সুবহানাল্লাহও (আল্লাহ পবিত্র) এগুলোর অনুরূপ সংখ্যায় (বলবে)।" (বর্ণনাকারী বলেন) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটিকে খুবই গুরুত্বপূর্ণ বলে গণ্য করলেন।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن اختُلف في سماع سالم بن أبي الجعد من أبي أُمامة - وهو صُديّ بن عجلان - فقد قال أبو حاتم فيما نقله عنه ابنه في "المراسيل" (290): أدرك أبا أمامة، وحسَّن الدارقطنيُّ في "علله" (2696) إسناد خبر من روايته عنه. لكن قال البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "علله الكبير" ص 386: ما أرى سمع منه. وجزم في "تاريخه الكبير" 4/ 81 بأنَّ روايته عنه مرسلة. وما وقع هنا من تصريحه بالسماع إن ثبت فهو يؤيد سماعَه منه، وعلى أيِّ حالٍ فقد روي مثلُ هذا الخبر عن أبي أمامة بأسانيد عدة.حُصين: هو ابن عبد الرحمن السُّلَمي، وأبو عوانة: هو الوضّاح بن عبد الله اليشكري، وأبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك. وأخرجه أحمد 36/ (22144) عن أبي الوليد هشام بن عبد الملك، به غير أنه قال: عن سالم: أنَّ أبا أمامة حدَّث. لم يصرِّح بسماعه كما وقع في روايته عند المصنف هنا.وأخرجه النسائي (9921)، وابن حبان (830) من طريق محمد بن سعد بن زرارة، عن أبي أمامة. ومحمد بن سعد بن زرارة هذا قال عنه الذهبي في "الميزان": لا يُعرف. واحتمل المزي في "التهذيب" 25/ 255 أن يكون هو محمد بن عبد الرحمن بن سعد بن زُرارة، وأنه قد يُنسب إلى جده، وبه جزم ابنُ حجر، فقال: هذا لا محيد عنه. قلنا كذلك سماهُ أبو حنيفة في روايته لهذا الخبر عنه كما في "الآثار" لأبي يوسف (218) حيث قال: عن أبي حنيفة، عن محمد بن عبد الرحمن بن سعد بن زُرارة. فإسناده قويٌّ إن شاء الله.وله طريق ثالثة عند الطبراني في "الدعاء" (1743)، والخطيب البغدادي في "تلخيص المتشابه" 1/ 560، وأبي القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (754) بإسناد حسنٍ كما قال الحافظ في "إتحاف المهرة" 6/ (6479). ولفظه عند الخطيب وأبي القاسم بنحو لفظ حديث سعد بن أبي وقاص الآتي عند المصنف برقم (2032).
1913 - أخبرنا أبو بكر محمد بن المُؤمَّل، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا عمرو بن عَوْن الواسطي، حدثنا هُشيم، أخبرنا يعلى بن عطاء، عن عمرو بن عاصم، عن أبي هريرة: أنَّ أبا بكر الصِّدّيق سأل النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: مُرْني بكلماتٍ أقولُهن إذا أصبحتُ وإذا أمسيتُ، فقال: "قل: اللهمَّ فاطرَ السماواتِ والأرضِ، عالمَ الغَيبِ والشهادةِ، ربَّ كلِّ شيءٍ ومَليكَه، أشهدُ أن لا إلهَ إلَّا أنتَ، أعوذُ بك من شرِّ نفْسي، ومن شَرِّ الشيطانِ وشِرْكِه"، فقال: "قُلْها إذا أصبحتَ وإذا أمسيتَ، وإذا أخذت مَضجَعكَ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে আবু বকর আস-সিদ্দিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞাসা করলেন এবং বললেন: আমাকে এমন কিছু বাক্য (দো'আ) শিখিয়ে দিন যা আমি সকাল ও সন্ধ্যায় বলবো।
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি বলো: "হে আল্লাহ! হে আকাশমন্ডলী ও পৃথিবীর সৃষ্টিকর্তা! হে দৃশ্যমান ও অদৃশ্যের মহাজ্ঞানী! হে প্রতিটি বস্তুর প্রতিপালক ও মালিক! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই। আমি আপনার কাছে আমার আত্মার অনিষ্ট থেকে এবং শয়তানের অনিষ্ট ও তার শিরক (অংশীবাদিতা) থেকে আশ্রয় চাই।"
অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তা বলবে যখন তুমি সকালে উঠবে, যখন তুমি সন্ধ্যায় উপনীত হবে এবং যখন তুমি বিছানায় শয়ন করবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. عمرو بن عاصم: هو ابن سفيان بن عبد الله الثقفي.وأخرجه أبو داود (5067)، والنسائي (7644) و (7652) و (10326) من طرق عن هُشيم بن بشير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 1/ (51)، و (63) و 13/ (7961)، والترمذي (3392)، والنسائي (7668) و (9755) و (10563)، وابن حبان (962) من طريق شعبة بن الحجاج، عن يعلى بن عطاء، به. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.
1914 - حدثنا إبراهيم بن عِصْمة بن إبراهيم العَدْل، حدثنا أبي، حدثنا إبراهيم بن موسى الفَرّاء، حدثنا زكريا بن مَنظُور، حدثني محمد بن عُقبة، عن أم هانئ بنت أبي طالب، قالت: قلتُ: يا نبيَّ الله، إني امرأةٌ قد كَبِرتُ وضَعُفتُ، فدُلَّني على عملٍ، قال: "كَبِّري اللهَ مئةَ مرّة، واحمَدِي اللهَ مئةَ مرّة، وسبِّحي اللهَ مئةَ مرّة، فهو خيرٌ لك من مئة بَدَنةٍ مُتقبَّلَة، وخيرٌ من مئة فرَسٍ مُسرَجٍ مُلجَمٍ في سبيل الله، وخيرٌ من مئة رَقَبةٍ مُتقبَّلَة، وقولُ: لا إله إلَّا الله، لا يَتْرُك ذَنبًا، ولا يُشبِهُها عملٌ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، وزكريا بن مَنظُور لم يُخرجاه.
উম্মে হানি বিনতে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর নবী! আমি একজন বৃদ্ধা ও দুর্বল নারী হয়ে গেছি, তাই আমাকে এমন একটি আমলের পথ দেখান (যা আমি করতে পারি)। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তুমি ১০০ বার আল্লাহর বড়ত্ব ঘোষণা করো (তাকবীর দাও), ১০০ বার আল্লাহর প্রশংসা করো (তাহমিদ পড়ো) এবং ১০০ বার আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা করো (তাসবীহ পড়ো)। এটি তোমার জন্য কবুল হওয়া একশত উট কুরবানী করার চেয়েও উত্তম, এবং আল্লাহর রাস্তায় লাগাম ও জিন পরিহিত একশত ঘোড়া (দান করার) চেয়েও উত্তম, এবং কবুল হওয়া একশত দাস মুক্ত করার চেয়েও উত্তম। আর 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলা, কোনো গুনাহ অবশিষ্ট রাখে না এবং কোনো আমলই এর সমকক্ষ হতে পারে না।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح بطرقه وشاهده، وهذا إسناد ضعيف، لأنَّ زكريا بن منظور ضعَّفوه كما قال الذهبي في "تلخيصه"، لكن روي هذا الخبر من وجوه أخرى عن أم هانئ، إلا أنها لا تخلو من مقالٍ، لكنها باجتماعها مع شاهده من حديث أبي أمامة من وجهين عنه يتقوى الخبرُ إن شاء الله.وأخرجه ابن ماجه (3810) عن إبراهيم بن المنذر الحِزامي، عن أبي يحيى زكريا بن منظور، به. لكن دون ذكر التهليل.وأخرجه بتمامه أحمد 44/ (26911)، والنسائي (10613) من طريق عاصم بن بَهْدلة، عن أبي صالح مولى أم هانئ، عن أم هانئ. وإسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل أبي صالح مولى أم هانئ فيُكتب حديثُه. وقد قُيّد أبو صالح في رواية البخاري في "تاريخه الكبير" 2/ 254 وفي رواية الطبراني في "الكبير" 24/ (1008) بمولى أم هانئ، فبطلت دعوى من ظنَّه أبا صالح ذكوان السمان الثقة.وأخرجه بتمامه أيضًا أحمد 45/ (27393) من طريق أبي مَعْشَر نَجيح السِّنْدي، عن مسلم بن أبي مريم، عن صالح مولى وَجْزَة، عن أم هانئ. وأبو معشر ضعيف، لكنه لم ينفرد به عن مسلم بن أبي مريم، فقد تابعه محمد بن عجلان عند ابن أبي شيبة 10/ 278، غير أنه جعله من رواية مسلم بن أبي مريم مرسلًا.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 24/ (995)، وفي "الدعاء" (327) من طريق سعيد بن عمرو بن جعدة بن هبيرة، عن جدته أم هانئ. ورجاله لا بأس بهم لكن سعيد لم يدرك جدته.ويشهد له حديث أبي أمامة عند أبي عمرو الحيري في الجزء الرابع من "فوائد الحاج" (34)، والطبراني في "الكبير" (8024)، وفي "مسند الشاميين" (830) من طريقين عن أبي أمامة. وكلٌّ من الطريقين فيه مقالٌ، لكنهما باجتماعهما يتقوى خبرُ أبي أُمامة. وقد صحَّ من حديث عائشة عند إسحاق بن راهويه في "مسنده" (1173)، والمصنِّف في "معرفة علوم الحديث" ص 201، لكن بلفظ: "قولي: لا إله إلّا الله وحده لا شريك له، مئة مرة، فلن تسبقك حسنةٌ ولا تترك سيئةً، وقولي: الله أكبر، مئة مرة، يُكتب لك بها خيرٌ من مئة بدنة، وقولي: سبحان الله، مئة مرة، يُكتب لك بها خير من مئة فرس مُلجَّم مُسرج في سبيل الله، وقولي: الحمد لله، مئة مرة، يُكتب لك بها خير من مئة رقبة". وإسناده صحيح.وفي الباب عن عبد الله بن عمرو بن العاص عند النسائي في "الكبرى" (10767) بإسناد حسنٍ، لكن بلفظ: "من قال: سبحان الله، مئة مرة قبل طلوع الشمس وقبل غروبها، كان أفضل من مئة بدنة، ومن قال: الحمد لله، مئة مرة قبل طلوع الشمس وقبل غروبها، كان أفضل من مئة فرس يُحمل عليها، ومن قال: الله أكبر، مئة مرة قبل طلوع الشمس وقبل غروبها، كان أفضل من عتق مئة رقبة، ومن قال: لا إله إلّا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد، وهو على كل شيء قدير، مئة مرة قبل طلوع الشمس وقبل غروبها لم يجئ يوم القيامة أحدٌ بعمل أفضلَ من عمله، إلّا من قال قوله، أو زاد". وقد تقدَّم عند المصنف برقم (1864) مختصرًا بذكر التهليل.وفي الباب أيضًا عن أبي هريرة عند البخاري (3293) و (6403)، ومسلم (2691) واللفظ له: "من قال: لا إله إلّا الله، وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد، وهو على كل شيء قدير، في يوم مئة مرة، كانت له عدل عشر رقاب، وكتبت له مئة حسنة، ومُحيت عنه مئة سيئة، وكانت له حِرزًا من الشيطان يومه ذلك حتى يُمسي، ولم يأت أحدٌ أفضل مما جاء به إلّا أحدٌ عمل أكثر من ذلك، ومن قال: سبحان الله وبحمده، في يوم مئة مرة، حُطَّت خطاياه ولو كانت مثل زَبَد البحر".
1915 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا زياد بن الخليل التُّستَري، حدثنا محمد بن جامع العطّار، حدثنا السَّكَن بن أبي السكن البُرْجُمي، حدثنا الوليد بن أبي هشام، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما أنعَمَ اللهُ على عبدٍ من نعمةٍ فعَلِمَ أنها مِن الله إِلَّا كتب الله له شُكرَها قبل أن يَحمَدَه عليها، وما أذنبَ عبدٌ ذنبًا فنَدِم عليه إلَّا كتبَ اللهُ له مغفرتَه قبل أن يَستغفرَه، وما اشترى عبدٌ ثوبًا بدينارٍ أو نصفِ دينارٍ، فلَبِسَه فحَمِدَ الله عليه إِلَّا لم يَبلُغْ ركبتَيه حتى يغفرَ اللهُ له" [1]. هذا حديث لا أعلم في إسناده أحدًا ذُكر بجَرْح! ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা কোনো বান্দাকে কোনো নেয়ামত দান করলে এবং সে যদি জানতে পারে যে তা আল্লাহর পক্ষ থেকে এসেছে, তবে আল্লাহ তার প্রশংসা করার আগেই তার জন্য এর কৃতজ্ঞতা (শুকর) লিখে দেন। আর কোনো বান্দা যদি কোনো পাপ করে এবং তার জন্য অনুতপ্ত হয়, তবে আল্লাহ তার ক্ষমা প্রার্থনা (ইস্তিগফার) করার আগেই তার জন্য ক্ষমা লিখে দেন। আর কোনো বান্দা এক দিনার বা অর্ধ দিনার দিয়ে কোনো কাপড় কিনে তা পরিধান করে আল্লাহর প্রশংসা করলে, কাপড়টি তার হাঁটু পর্যন্ত পৌঁছানোর আগেই আল্লাহ তাকে ক্ষমা করে দেন।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لضعف محمد بن جامع العطار كما أشار إليه الذهبي في "تلخيصه"، إذ نقل قول ابن عدي فيه أنه لا يُتابَع على أحاديثه. قلنا: وضعَّفه أبو حاتم وأبو يعلى والدارقطني، وقد روى هذا الحديثَ أيضًا هشامُ بن زياد، وهو هشام بن أبي هشام أخي الوليد راوي الحديث هنا، لكن هشامًا رواه عن أبي الزناد عن القاسم بن محمد عن عائشة كما سيأتي عند المصنف برقم (7838) مختصرًا بذكر طرف منه: وهو ذكر الندم على الذنب، ورواه غير المصنف تامًّا، وهشام المذكور متروك الحديث، فلا اعتداد بمتابعته. وللحديث طريق أخرى عن عائشة لكن فيها رجلٌ متَّهم، فلا يُعتدُّ بها كذلك. لكن روي منه ذكر النعمة بإسناد لا بأس به.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (4503)، وشُهدة الكاتبة في "فوائدها" (84)، وابن حجر في "نتائج الأفكار" 1/ 131 من طريق أبي أيوب سليمان بن داود الشاذَكوني، عن السّكن بن أبي السّكن البُرجُمي، بهذا الإسناد. والشاذكوني متروك متهم.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (2676) من طريق بَزِيع بن حسّان أبي الخليل، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. وبَزِيع هذا متروك اتهمه ابن حبان والمصنّف في "المدخل إلى الصحيح".وقد رُوي أوله في ذكر النعمة عند البيهقي في "شعب الإيمان" (4071) من طريق أحمد بن زيد الفلسطيني - وهو الرملي - عن إبراهيم بن عبد الحميد الواسطي - وهو الجُرشي - عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. وهذا إسناد لا بأس به إن شاء الله.ويشهد لذكر الندم على الذنب حديثا عبد الله بن مسعود وأنس الآتيان برقم (7804) و (7806) بلفظ: "الندم توبة"، وهو حديث صحيح.
1916 - أخبرنا أبو بكر بن أبي نصر الدارَبردي بمَرْو، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا عبد الله بن مَسلَمة، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، عن أبيه، عن أبان بن عثمان، قال: سمعت عثمان بن عفّان يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "ما مِن عبدٍ يقولُ في صباحِ كلِّ يومٍ ومساءِ كلِّ ليلةٍ: باسم اللهِ الذي لا يَضُرُّ معَ اسمِه شيءٌ في الأرضِ ولا في السماءِ، وهو السميعُ العليمُ، ثلاثَ مراتٍ، فيَضُرَّه شيءٌ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উসমান ইবনে আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এমন কোনো বান্দা নেই, যে প্রতিদিন সকালে এবং প্রতি রাতে সন্ধ্যায় তিনবার এই দু'আ পাঠ করে: 'বিসমিল্লাহিল্লাযী লা ইয়াডুর্রু মা‘আসমিহি শাইউন ফীল আরদি ওয়ালা ফিস সামা-ই, ওয়া হুয়াস সামী‘উল ‘আলীম' (আল্লাহর নামে, যাঁর নামের সাথে আকাশ বা পৃথিবীর কোনো কিছুই ক্ষতি করতে পারে না। আর তিনি সর্বশ্রোতা, সর্বজ্ঞ), অতঃপর কোনো কিছু তার ক্ষতি করতে পারে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزناد. واسم أبي الزِّناد عبدُ الله بن ذكوان.وأخرجه أحمد 1/ (446) و (474)، وابن ماجه (3869)، والترمذي (3388)، والنسائي (10106) من طرق عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح غريب.وأخرجه النسائي (10107) من طريق يزيد بن فراس، عن أبان بن عثمان، به. وقال: يزيد بن فراس مجهول لا نعرفه. قلنا: وكذلك قال أبو حاتم الرازي.وأخرجه أبو داود (5089)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" لأبيه (528)، والنسائي (9759)، وابن حبان (852) و (862) من طريق أبي ضمرة أنس بن عياض، عن أبي مودود عبد العزيز بن أبي سُليمان، عن محمد بن كعب القُرظي، عن أبان بن عثمان، به. لكن خولف فيه أبو ضمرة:فقد أخرجه أبو داود (5088) عن عبد الله بن مسلمة، عن أبي مودود، عمن سمع أبان بن عثمان، به. وقد تابع عبدَ الله بنَ مسلمة زيدُ بنُ الحباب عند ابن أبي شيبة 10/ 238، لكنهما قد خولفا:فقد رواه عبد الرحمن بن مهدي من كتابه عند ابن أبي حاتم "العلل" (2079)، وأبي نعيم في "الحلية" 9/ 42، وكذلك رواه أبو عامر العقدي عند ابن أبي حاتم أيضًا، كلاهما عن أبي مودود، عن رجلٍ، عمن سمع أبان بن عثمان، عن أبيه. فصار في الإسنادين رجلان مبهمان وقد وافقهما عبدُ الله بنُ مَسلمة القعنبي في رواية أبي زرعة الرازي عنه كما في "العلل" لابن أبي حاتم (2105)، ورواية محمد بن علي بن ميمون الرقي عنه كذلك عند النسائي (9760)، فهذا هو الصحيح في هذا الإسناد بلا ريب، وبذلك جزم عبد الرحمن بن مهدي وأبو زرعة والدارقطنيُّ في "العلل" (254) وغيرُهم، وخطَّؤوا من ذكر فيه محمد بن كعب القُرظي بدل الرجلين المبهمين.
1917 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا مُسدَّد، حدثنا عيسى بن يونس، عن الوليد بن ثَعلَبة، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن قال: اللهمّ أنتَ ربِّي لا إله إِلَّا أَنتَ، خَلَقْتَني وأنا عبدُك، وعلى عَهْدِك ووَعدِك ما استطعتُ، أعوذُ بك من كلِّ ما صنعتُ، وأبُوءُ بذَنْبي، فاغفِرْ لي ذُنوبي، إنه لا يغفرُ الذنوبَ إلَّا أنت، فمات من يومِه وليلتِه، دَخَل الجنةَ" [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি বলে: ‘হে আল্লাহ! আপনিই আমার রব। আপনি ছাড়া কোনো ইলাহ (উপাস্য) নেই। আপনিই আমাকে সৃষ্টি করেছেন এবং আমি আপনার বান্দা। আমি আমার সাধ্যমতো আপনার অঙ্গীকার ও প্রতিশ্রুতির উপর প্রতিষ্ঠিত আছি। আমি আমার কৃতকর্মের অনিষ্ট থেকে আপনার কাছে আশ্রয় চাই। আমি আমার পাপ স্বীকার করছি, অতএব আমার অপরাধসমূহ ক্ষমা করে দিন। নিশ্চয়ই আপনি ছাড়া অন্য কেউ গুনাহ ক্ষমা করতে পারে না।' এরপর যদি সে ঐ দিন বা রাতের মধ্যে মারা যায়, তবে সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن خالف فيه الوليدَ بنَ ثعلبة حسينُ بنُ ذكوان المُعلِّم، فرواه عن عبد الله بن بريدة عن بُشَير بن كعب عن شداد بن أوس، وقد خطّأ النسائيُّ وابنُ مَنْدَه في "التوحيد" (218) رواية الوليد بن ثعلبة، وصوَّبا رواية حسين المعلّم، وعليها اقتصر البخاري، وأما الحافظ ابن حجر فقال في "نتائج الأفكار" 2/ 341 - 342: كنتُ أظن أنَّ رواية الوليد بن ثعلبة شاذة وأنه سلك الجادّة، حتى رأيت الحديث من رواية سليمان بن بُريدة عن أبيه أخرجها ابن السُّنّي (يعني في "عمل اليوم والليلة": 43)، فبان أنَّ للحديث عن بريدة أصلًا. قلنا: لكن في الإسناد إلى سليمان بن بُريدة رجلان ضعيفان!!وأخرجه أحمد 38/ (23013)، وأبو داود (5070)، وابن ماجه (3872)، والنسائي (9764) و (10227) و (10340)، وابن حبان (1035) من طرق عن الوليد بن ثعلبة، به. وزادوا في الدعاء: "أبوءُ بنعمتك عليَّ وأبوءُ بذنبي".وأخرجه أحمد 28/ (17111) و (17130)، والبخاري (6306) و (6323)، والنسائي (7908) و (9763) و (10225) و (10341)، وابن حبان (932) و (933) من طرق عن حسين المعلّم، عن عبد الله بن بريدة، عن بُشَير بن كعب، عن شداد بن أوس. وقال النسائي في آخر موضع: حسينٌ أثبت عندنا من الوليد بن ثعلبة، وأعلم بعبد الله بن بريدة، وحديثه أولى بالصواب. وسيأتي عند المصنف من هذه الطريق برقم (3749).وأخرجه النسائي (10226) و (10342) من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت البُناني، و (10342) من طريق حماد بن سلمة، عن أبي العَوّام فائد بن كيسان، كلاهما عن عبد الله بن بُريدة: أنَّ ناسًا من أهل الكوفة كانوا في سفر ومعهم شداد بن أوس … فذكراه مرسلًا. وهذا يؤيد أنَّ الحديث لشداد بن أوس، ولعلَّ بُشَير بن كعب يكون أحد أولئك النفر الذين كانوا مع شداد في سفره، والله أعلم.
1918 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عوف بن سُفيان الطائي، حدثنا أبو المُغيرة عبد القُدّوس بن الحجّاج، حدثنا أبو بكر بن أبي مريم، حدثنا الأحوص بن حَكِيم بن عُمير وحبيب بن عُبيد، عن أبي الدرداء، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا يَدَعُ رجلٌ منكم أن يعمل ألفَ حسنةٍ حتى يُصبحَ، يقولُ: سبحانَ اللهِ وبحمدِه، مئةَ مرّة، فإنها ألفُ حسنةٍ، فإنه لم يعملْ إن شاءَ اللهُ مثلَ ذلك في يومِه من الذنوب، ويكونُ ما عملَ من خَيرٍ سِوى ذلك وافِرًا" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন সকাল না হওয়া পর্যন্ত এক হাজার নেকি অর্জনের সুযোগ হাতছাড়া না করে। সে যেন একশ বার বলে: 'সুবহানাল্লাহি ওয়া বিহামদিহি' (আল্লাহ পবিত্র এবং সকল প্রশংসা তাঁর জন্য)। নিশ্চয়ই এটা (তার আমলনামায়) এক হাজার নেকি। আল্লাহর ইচ্ছায়, তার সেই দিনের গুনাহ এর চেয়ে বেশি হবে না, এবং এর বাইরে সে যে নেক আমল করবে, তাও প্রচুর পরিমাণে থাকবে।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف من أجل أبي بكر بن أبي مريم، فهو واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وقد اختُلف في إسناده في تسمية شيخه عن عبد القدوس بن الحجاج، فبعض من رواه عن عبد القدوس ذكر فيه أبا الأحوص حكيم بن عُمير بدل ابنه الأحوص بن حكيم بن عمير، وأغلب الظن أنَّ الوهم فيه من جهة أبي بكر بن أبي مريم نفسه، على أنَّ كلًّا من أبي الأحوص وابنه الأحوص لا يدرك السماع من أبي الدرداء، ولا حتى حبيب بن عُبيد، فالإسناد منقطع أيضًا كما قال الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (3385) عن أبي بكر بن زنجويه، عن أبي المغيرة عبد القدوس بن الحجاج، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 36/ (21741) و 45/ (27478)، وأخرجه الطبراني في "مسند الشاميين" (1471) عن أحمد بن عبد الوهاب بن نجدة، كلاهما (أحمد وابن نجدة) عن أبي المغيرة عبد القدوس بن الحجاج، عن أبي بكر بن أبي مريم، عن أبي الأحوص حكيم بن عُمير وحبيب بن عبيد، عن أبي الدرداء. لكن وقع في رواية ابن نجدة: ألفي حسنة، بدل: ألف حسنة.
1919 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن عبد الله بن مُسلم، حدثنا حجاج بن مِنهال، حدثنا عبد الله بن عمر النُّمَيري، عن يونس بن يزيد الأَيْلي، حدثني الحَكَم بن عبد الله الأَيْلي، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، قالت: دخَل عليَّ أبو بكر فقال: هل سمعتِ من رسولِ الله صلى الله عليه وسلم دعاءً علَّمَنِيه؟ قلتُ: ما هو؟ قال: كان عيسى ابنُ مريم يُعلِّمه أصحابَه، قال: "لو كان على أحدِكُم جبلُ ذهبٍ دَينًا، فدعا اللهَ بذلك، لقَضاه اللهُ عنه: اللهمَّ فارجَ الهَمّ، كاشِفَ الغَمّ، مُجيبَ دعوةِ المُضطرين، رحمنَ الدنيا والآخرةِ [1] ورَحِيمَهما، أنت تَرحمُني فارحمْني رحمةً تُغنِيني بها عن رحمةِ مَن سِواكَ".قال أبو بكر الصديق: وكانت عليَّ بقيةٌ من الدَّين، وكنتُ للدَّيْن كارهًا، فكنتُ أدعُو بذلك، فأتاني اللهُ بفائدةٍ فقضاهُ اللهُ عنّي، قالت عائشةُ: [كان] لأسماءَ بنتِ عُميسٍ عليَّ دينارٌ وثلاثةُ دراهمَ، فكانت تدخُل علي فأستحيي أن أنظُر في وجهها، لأني لا أجدُ ما أَقضيها، فكنتُ أدعُو بذلك، فما لبثتُ إِلَّا يسيرًا حتى رَزَقنيَ اللهُ رِزقًا ما هو بصدقةٍ تُصدِّق بها عليَّ، ولا ميراثٍ ورثتُه، فقضاهُ اللهُ عني، وقسمتُ في أهلي قَسْمًا حسنًا، وحَلَّيتُ ابنةَ عبد الرحمن بثلاثِ أواقِ وَرِقٍ وفَضَلَ لنا فَضْلٌ حَسَن [2].قد احتجَّ البخاريُّ بعبد الله بن عمر النُّميري، وهذا حديثٌ صحيحٌ، غير أنهما لم يحتجّا بالحكم بن عبد الله الأَيْلي [3].
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমার কাছে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন, "তুমি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে এমন কোনো দু'আ শুনেছ যা তিনি আমাকে শিখিয়েছেন?" আমি বললাম, "সেটা কী?" তিনি বললেন: "ঈসা ইবনু মারইয়াম (আঃ) তা তাঁর সঙ্গীদের শিক্ষা দিতেন।" তিনি বলেন: "তোমাদের কারো উপর যদি স্বর্ণের পাহাড় পরিমাণ ঋণও থাকে, আর সে আল্লাহকে এই দু'আর মাধ্যমে ডাকে, তবে আল্লাহ অবশ্যই তার পক্ষ থেকে তা পরিশোধ করে দেবেন: 'আল্লা-হুম্মা ফা-রিজাল হাম্ম, কা-শিফাল গাম্ম, মুজীবা দা‘ওয়াতিল মুদ্বতাররীন, রহমানাদ্দুন্ইয়া ওয়াল আ-খিরাতি ওয়া রাহীমাহুমা- আংতা তারহামুনী ফারহামনী রাহমাতান তুগনীনী বিহাল লান রাহমাতি মান সিওয়া-কা'।"
(অর্থ: হে আল্লাহ! যিনি সকল উদ্বেগ দূরকারী, সকল দুঃখ মোচনকারী, দুস্থদের ডাকে সাড়াদানকারী, দুনিয়া ও আখিরাতের রহমান (পরম দয়ালু) এবং রাহীম (অতি দয়ালু), আপনিই আমাকে দয়া করেন। সুতরাং আমাকে এমন দয়া করুন যা আপনার ছাড়া অন্য কারো দয়া থেকে আমাকে মুখাপেক্ষীহীন করে দেবে।)
আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমার উপরও কিছু ঋণ বাকি ছিল এবং আমি ঋণকে অপছন্দ করতাম। আমি সেই দু'আটি পড়তাম, অতঃপর আল্লাহ আমার জন্য ফায়দা এনে দিলেন এবং আল্লাহ আমার পক্ষ থেকে তা পরিশোধ করে দিলেন।
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আসমা বিনতু 'উমাইসের আমার কাছে এক দীনার এবং তিনটি দিরহাম পাওনা ছিল। তিনি যখন আমার কাছে আসতেন, আমি তার মুখের দিকে তাকাতে লজ্জা পেতাম, কারণ তা পরিশোধ করার মতো কিছু আমার কাছে ছিল না। আমি এই দু'আটি পড়তাম। কিছুকাল পরেই আল্লাহ আমাকে এমন রিযিক দান করলেন যা কারো প্রদত্ত সাদাকাও ছিল না বা আমার উত্তরাধিকারসূত্রে প্রাপ্ত সম্পদও ছিল না। আল্লাহ আমার পক্ষ থেকে সেই ঋণ পরিশোধ করে দিলেন। আমি আমার পরিবারের মাঝে উত্তমভাবে বণ্টন করলাম এবং আব্দুর রহমানের কন্যাকে তিন উকিয়া রূপা দ্বারা অলংকৃত করলাম। এরপরও আমাদের জন্য ভালো পরিমাণ সম্পদ অতিরিক্ত ছিল।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] لفظة "والآخرة" سقطت من (ز) و (ب)، ورُمِّجت في (ص)، وأثبتناها من (ع)، وهي ثابتة لجميع من خرَّج هذا الخبر.
[2] إسناده واهٍ بمرّة من أجل الحكم بن عبد الله الأيْلي، فهو متروك وكذّبه بعض الأئمة.وأخرجه أبو بكر المروزي في "مسند أبي بكر الصديق" (40)، والبزار (62)، والطبراني في "الدعاء" (1041)، وابن عدي في "الكامل" 2/ 203 - 204، والبيهقي في "الدعوات الكبير" (304)، وفي "دلائل النبوة" 6/ 171، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1281)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 47/ 472 من طرق عن يونس بن يزيد الأيْلي، بهذا الإسناد. وبعضهم لا يذكر قصة أبي بكر وقصة عائشة. وسيأتي عند المصنف برقم (7866) من طريق يحيى بن محمد الشهيد، عن عبد الرحمن بن المبارك.وفي الباب عن الحسن البصري مرسلًا عند البيهقي في "شُعب الإيمان" (6679).قوله: رفيعة، أي بقعة رفيعة، كما وقع مقيدًا عند سائر من خرّج الحديث، ويمكن حذف الموصوف وإقامة الصفة مقامه عند اتضاح الموصوف وأمن اللبس.
1919 [3] - بل قال البخاري فيه: تركوه، وهي من أغلظ عبارات الجرح عنده. وسيأتي عند المصنف برقم (7866) من طريق يحيى بن محمد الشهيد، عن عبد الرحمن بن المبارك.وفي الباب عن الحسن البصري مرسلًا عند البيهقي في "شُعب الإيمان" (6679).قوله: رفيعة، أي بقعة رفيعة، كما وقع مقيدًا عند سائر من خرّج الحديث، ويمكن حذف الموصوف وإقامة الصفة مقامه عند اتضاح الموصوف وأمن اللبس.
1920 - حدثنا علي بن حَمْشاذ العدل، حدثنا أبو المُثنّى العَنْبري ومحمد بن أيوب البَجَلي، قالا: حدثنا عبد الرحمن بن المبارك العَيشي، حدثنا فُضيل بن سليمان النُّميري، حدثنا موسى بن عُقبة، حدثنا عبيد الله بن سلْمان الأغَرّ، عن أبيه، عن أبي الدرداء، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "كلُّ شيءٍ يتكلم به ابنُ آدمَ فإنه مكتوبٌ عليه، فإذا أخطأ خطيئةً فأحبَّ أن يتوبَ إلى اللهِ، فليأتِ رَفِيعةً فَليَمُدَّ يدَيه إلى الله عز وجل، ثم يقول: اللهمّ إني أتوبُ إليك منها، لا أرجِعُ إليها أبدًا، فإنه يُغفر له ما لم يَرجِعْ في عمله ذلك" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আদম সন্তান যা কিছু কথা বলে, তা সবই তার আমলনামায় লিপিবদ্ধ হয়। অতঃপর যখন সে কোনো পাপ করে এবং আল্লাহর কাছে তাওবা করতে পছন্দ করে, তখন সে যেন উঁচু স্থানে এসে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার দিকে তার দু’হাত প্রসারিত করে। অতঃপর সে বলবে: "হে আল্লাহ! আমি এই পাপ থেকে তোমার কাছে তাওবা করছি, আমি আর কখনো তাতে ফিরে যাব না।" তবে তার জন্য ক্ষমা করা হয় যতক্ষণ না সে তার সেই কাজে পুনরায় ফিরে যায়।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف من أجل فُضيل بن سليمان النُّميري، فليس هو بذاك القوي، وقد انفرد به ولم يتابع عليه، بل قال الذهبي في "مهذب السنن الكبرى" للبيهقي 8/ 4158: هذا منكر.وأخرجه الطبراني في "الدعاء" (207)، وفي "المعجم الكبير" كما في "جامع المسانيد والسنن" لابن كثير 9/ (11905)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 10/ 154، وفي "شعب الإيمان" (6678)، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (784) من طرق عن عبد الرحمن بن المبارك، بهذا الإسناد. وسيأتي عند المصنف برقم (7866) من طريق يحيى بن محمد الشهيد، عن عبد الرحمن بن المبارك.وفي الباب عن الحسن البصري مرسلًا عند البيهقي في "شُعب الإيمان" (6679).قوله: رفيعة، أي بقعة رفيعة، كما وقع مقيدًا عند سائر من خرّج الحديث، ويمكن حذف الموصوف وإقامة الصفة مقامه عند اتضاح الموصوف وأمن اللبس.