হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1921)


1921 - أخبرنا أبو العباس القاسم بن القاسم السَّيَّاري بمَرْو، حدثنا أبو المُوجِّه، حدثنا علي بن خَشْرم، أخبرنا عيسى بن يونس، عن أبي بكر بن أبي مريم الغَسّاني، عن ضَمْرة بن حبيب، عن زيد بن ثابت: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم علَّمه وأمَرَه أن يَتعاهدَ أهلَه في كل صباحٍ: "لَبّيكَ اللهمَّ لَبّيكَ وسَعْدَيك، والخيرُ في يدَيك، ومنك وإليك، اللهمّ ما قلتُ مِن قولٍ، أو حلَفتُ من حَلِفٍ، أو نذَرتُ من نَذْرٍ، فمشيئتُك بين يدَي ذلك كلِّه، ما شئتَ كان، وما لم تَشأ لم يكُن [1]، ولا حَولَ ولا قُوةً إلَّا بك، إنك على كل شيءٍ قديرٌ، اللهم ما صليتُ من صلاةٍ فعلى من صلّيتُ، وما لعنتُ من لَعنٍ فعلى من لَعنتُ، أنت وَليِّي في الدنيا والآخرة، تَوفَّني مسلمًا وأَلحِقْني بالصالحين، اللهم إني أَسألُك الرضا بعد القضاءِ، وبَرْدَ العيشِ بعد الموت، ولذةَ النظرِ إلى وجهك، وشوقًا إلى لقائك، في غير ضَرَّاءَ مُضِرّة، ولا فتنةٍ مُضِلّة، وأعوذُ بك أن أَظلِمَ أو أُظلَمَ، أو أَعتديَ أو يُعتدى علَيَّ، أو أكسِبَ خطيئةً أو ذنبًا لا تغفرُه، اللهمَّ فاطرَ السماوات والأرض، عالمَ الغيبِ والشهادة، ذا الجَلالِ والإكرام، فإني أَعهَدُ إليك في هذه الحياة الدنيا وأُشهِدُك، وكفى بك شهيدًا، أني أشهد أن لا إله إلَّا أنتَ وحدَك لا شَريكَ لك، لك المُلك ولك الحَمدُ، وأنت على كلِّ شيءٍ قديرٌ، وأشهدُ أنَّ محمدًا عبدُك ورسولُك، وأشهدُ أنَّ وَعدَكَ حقٌّ، ولقاءَك حقٌّ، والساعةَ آتيةٌ لا رَيبَ فيها، وأنك تبعثُ مَن في القُبور، وأنك إن تَكِلْني إلى نفسي تَكِلْني إلى ضعفٍ وعَورةٍ وذنبٍ وخطيئةٍ، وإني لا أثِقُ إلَّا برحمتِك، فاغفِرْ لِي ذُنوبي كلَّها، إنه لا يَغفرُ الذنوبَ إلَّا أنتَ، وتُب علَيَّ إنك أنت التوّابُ الرحيمُ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে এই দু'আ শিক্ষা দিয়েছেন এবং আদেশ করেছেন যে তিনি যেন প্রতিদিন সকালে তা তাঁর পরিবারের লোকদেরকে শিখিয়ে দেন: "আমি হাযির, হে আল্লাহ, আমি হাযির এবং সকল কল্যাণ আপনার জন্যই। সমস্ত কল্যাণ আপনার হাতে, আর আপনিই সবকিছুর উৎস এবং সবকিছুর প্রত্যাবর্তন আপনার দিকে। হে আল্লাহ! আমি যে কথাই বলি না কেন, যে কসমই করি না কেন, অথবা যে মানতই করি না কেন, এই সবকিছুর উপরে আপনার ইচ্ছাই চূড়ান্ত। আপনি যা চান তা হয়, আর আপনি যা না চান তা হয় না। আপনার সাহায্য ছাড়া কোনো ক্ষমতা বা শক্তি নেই। নিশ্চয় আপনি সবকিছুর উপর ক্ষমতাবান। হে আল্লাহ! আমি যে সালাত (দরূদ)ই পাঠ করি না কেন, তা কেবল তারই জন্য যার উপর আপনি সালাত (দরূদ) পাঠ করেছেন। আর আমি যে লানতই করি না কেন, তা কেবল তারই জন্য যাকে আপনি লানত করেছেন। আপনিই দুনিয়া ও আখিরাতে আমার বন্ধু। আমাকে মুসলিম হিসেবে মৃত্যু দিন এবং সৎকর্মশীলদের সাথে আমাকে যুক্ত করুন। হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট ফয়সালার পর সন্তুষ্টি চাই, মৃত্যুর পর আরামদায়ক জীবন চাই, আপনার চেহারার (দীদার) দিকে দৃষ্টিপাতের স্বাদ চাই, এবং আপনার সাথে সাক্ষাতের তীব্র আকাঙ্ক্ষা চাই; যা কোনো ক্ষতিকারক কষ্ট কিংবা বিভ্রান্তকারী ফিতনা থেকে মুক্ত হবে। আর আমি আপনার আশ্রয় চাই যেন আমি যুলম না করি বা আমার উপর যুলম না করা হয়, অথবা আমি সীমালঙ্ঘন না করি বা আমার উপর সীমালঙ্ঘন না করা হয়, অথবা আমি এমন কোনো ভুল বা পাপ না করি যা আপনি ক্ষমা করবেন না। হে আল্লাহ, হে আসমানসমূহ ও জমিনের স্রষ্টা, হে গায়েব ও প্রকাশের জ্ঞানদাতা, হে মহিমা ও সম্মান অধিকারী! নিশ্চয় আমি আপনাকে এই দুনিয়ার জীবনে প্রতিশ্রুতিবদ্ধ করছি এবং আপনাকে সাক্ষী রাখছি, আর সাক্ষী হিসেবে আপনিই যথেষ্ট। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, আপনি একক, আপনার কোনো শরীক নেই। রাজত্ব আপনারই এবং সমস্ত প্রশংসা আপনারই। আর আপনি সবকিছুর উপর ক্ষমতাবান। আর আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার বান্দা ও রাসূল। আর আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনার ওয়াদা সত্য, আপনার সাক্ষাত সত্য, কিয়ামত অবশ্যই আসবে—এতে কোনো সন্দেহ নেই, এবং আপনি কবরবাসীদের পুনরুত্থিত করবেন। আর আপনি যদি আমাকে আমার নিজের দায়িত্বে ছেড়ে দেন, তবে আপনি আমাকে দুর্বলতা, অক্ষমতা, পাপ ও ভুলের হাতে ছেড়ে দেবেন। আর আমি আপনার দয়া ব্যতীত আর কারো উপর ভরসা করি না। সুতরাং আমার সকল গুনাহ ক্ষমা করে দিন। নিশ্চয় আপনি ছাড়া আর কেউ গুনাহ ক্ষমা করতে পারে না। এবং আমার তাওবা কবুল করুন। নিশ্চয় আপনিই তাওবা কবুলকারী, পরম দয়ালু।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] في (ز): لا يكن.



[2] إسناده ضعيف لضعف أبي بكر بن أبي مريم، ولانقطاعه، لأنَّ ضمرة بن حبيب لم يدرك زيد بن ثابت، على أنَّ بعض من رواه عن أبي بكر بن أبي مريم زاد فيه بين ضمرة وبين زيد بن ثابت أبا الدرداء، وبذلك يكون انقطاعه أظهر، لأنَّ أبا الدرداء توفي قبل زيد بن ثابت، وقد توبع أبو بكر بن أبي مريم فيبقى في الخبر علةُ الانقطاع.وأخرجه أحمد 35/ (21666) عن أبي المغيرة عبد القدوس بن الحجاج الخَولاني، عن أبي بكر بن أبي مريم، عن ضمرة، عن أبي الدرداء، عن زيد بن ثابت.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (4932)، وفي "الدعاء" (320)، وفي "مسند الشاميين" (2013)، وابن بطة في "الإبانة" 7/ 39 من طريق عبد الله بن صالح كاتب الليث، عن معاوية بن صالح، عن ضمرة بن حبيب، عن زيد بن ثابت. وأخرجه مختصرًا بذكر المكثرين أحمد 13/ (8085) و 16/ (10795) من طريقين عن أبي إسحاق السبيعي، به.وأخرجه مختصرًا بذكر كنز الجنة النسائي (10118) من طريق إسرائيل بن يونس، عن جده أبي إسحاق، به.وأخرجه دون ذكر حق الله وحق العباد أحمد 16/ (10736) و (10918) من طريق عبد الرحمن بن عابس، عن كُميل بن زياد، به.وأخرجه مختصرًا أيضًا ابن ماجه (4131) من طريق محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، رفعه: "الأكثرون هم الأسفلون، إلّا من قال هكذا وهكذا وهكذا" ثلاثًا. وإسناده قويٌّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1922)


1922 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المُثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا أبو الأحوص، حدثنا أبو إسحاق، عن كُميل بن زياد، عن أبي هريرة، قال: كنا نمشي مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم في بعض حِيطان المدينةِ، فقال: "يا أبا هريرة" فقلتُ: لبيكَ يا رسولَ الله، فقال: "إنَّ المُكثِرين هم الأَقَلُّون إِلَّا مَن قال بمالِه هكذا وهكذا - وأومأ بيدِه عن يمينِه وعن شمالِه - وقليلٌ ما هُم"، ثم قال: "يا أبا هِرّ، ألا أدلُّك على كَنْزٍ من كُنوز الجنةِ؟ " قلت: بلى يا رسول الله، قال: "تقول: لا حَولَ ولا قُوَّة إلَّا بالله، ولا مَلجأَ ولا مَنْجا من الله إلَّا إليه"، ثم قال: "يا أبا هِرّ، تدري ما حقُّ الله على العِباد، وما حقُّ العِبادِ على الله؟ " قال: قلت: اللهُ ورسولُه أعلم، قال: "فإنَّ حقَّ الله على العِباد أن يَعبُدوه ولا يُشرِكُوا به شيئًا، وحقَّ العِباد على الله أن لا يُعذِّبَ مَن لا يُشركُ به" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه هكذا.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে মদীনার কিছু উদ্যানে হাঁটছিলাম। তিনি বললেন, "হে আবু হুরায়রা!" আমি বললাম, আপনার খেদমতে উপস্থিত, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই সম্পদ পুঞ্জীভূতকারীরা (পরকালে) হবে সর্বনিম্ন (মর্যাদার দিক থেকে), তবে সেই ব্যক্তি ব্যতীত যে তার সম্পদ দ্বারা এভাবে এবং এভাবে (দান) করেছে - এই বলে তিনি তার হাত দ্বারা ডান ও বাম দিকে ইশারা করলেন - আর তারা খুব কম সংখ্যক।" এরপর তিনি বললেন, "হে আবু হির! আমি কি তোমাকে জান্নাতের গুপ্তধনসমূহের একটি গুপ্তধনের সন্ধান দেব না?" আমি বললাম, অবশ্যই, হে আল্লাহর রাসূল! তিনি বললেন, "তুমি বলবে: 'লা হাওলা ওয়া লা কুয়্যাতা ইল্লা বিল্লাহ' (আল্লাহ ছাড়া কারো কোনো ক্ষমতা বা শক্তি নেই) এবং 'লা মালজাআ ওয়া লা মানজা মিনাল্লাহি ইল্লা ইলাইহি' (আল্লাহ থেকে বাঁচার এবং আশ্রয় নেওয়ার কোনো স্থান নেই, কেবল তাঁর কাছেই ছাড়া)।" এরপর তিনি বললেন, "হে আবু হির! তুমি কি জানো, বান্দাদের উপর আল্লাহর কী হক এবং আল্লাহর উপর বান্দাদের কী হক?" আমি বললাম, আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই বান্দাদের উপর আল্লাহর হক হলো, তারা তাঁর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করবে না। আর আল্লাহর উপর বান্দাদের হক হলো, যিনি তাঁর সাথে কাউকে শরীক করেন না, তিনি তাকে আযাব দেবেন না।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وأبو الأحوص: هو سلّام بن سُليم، وأبو المُثنَّى: هو معاذ بن المثنَّى. وأخرجه مختصرًا بذكر المكثرين أحمد 13/ (8085) و 16/ (10795) من طريقين عن أبي إسحاق السبيعي، به.وأخرجه مختصرًا بذكر كنز الجنة النسائي (10118) من طريق إسرائيل بن يونس، عن جده أبي إسحاق، به.وأخرجه دون ذكر حق الله وحق العباد أحمد 16/ (10736) و (10918) من طريق عبد الرحمن بن عابس، عن كُميل بن زياد، به.وأخرجه مختصرًا أيضًا ابن ماجه (4131) من طريق محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، رفعه: "الأكثرون هم الأسفلون، إلّا من قال هكذا وهكذا وهكذا" ثلاثًا. وإسناده قويٌّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1923)


1923 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا وكيع، عن عُبادة بن مُسلم الفَزَاري، قال: حدثني جُبير بن [أبي] [1] سليمان بن جُبير بن مُطعم، قال: سمعتُ ابن عمر يقول: لم يكن رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَدَعُ هؤلاءِ الكلمات حين يُصبحُ وحين يُمسي: "اللهم إني أسألُك العفوَ والعافيةَ في دِيني ودُنياي، وأهلي ومالي، اللهم استُرْ عَوراتي، وآمِن رَوْعاتي، اللهم احفَظْني من بين يَدَيّ ومِن خَلْفي، وعن يَميني وعن شِمالي ومن فَوقي، وأعوذُ بعظمتِك أن أُغتالَ من تَحتي"؛ يعني الخَسْفَ [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সকাল ও সন্ধ্যায় এই বাক্যগুলো পাঠ করা কখনোই ছাড়তেন না: "হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে আমার দ্বীন, দুনিয়া, পরিবার এবং ধন-সম্পদের ক্ষেত্রে ক্ষমা (আল-আফও) এবং সুস্থতা (আল-আফিয়াহ) প্রার্থনা করি। হে আল্লাহ! আমার ত্রুটিসমূহ ঢেকে দিন এবং আমার ভয়কে শান্তিতে পরিণত করুন। হে আল্লাহ! আমাকে আমার সম্মুখ দিক থেকে, পেছন দিক থেকে, ডান দিক থেকে, বাম দিক থেকে এবং আমার উপর দিক থেকে হিফাযত করুন। আর আপনার মহত্ত্বের দ্বারা আশ্রয় চাই যেন আমাকে নিচের দিক থেকে আকস্মিকভাবে গ্রাস করা না হয়" (অর্থাৎ ভূমিধসের মাধ্যমে)।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] لفظة "أبي" سقطت من نسخنا الخطية، والصواب ذكرها كما جاء في "مسند أحمد" 8/ (4785).



[2] إسناده صحيح. وهو في "مسند أحمد" 8/ (4785).وأخرجه أبو داود (5074)، وابن ماجه (3871)، والنسائي (7915) و (7916) و (10325)، وابن حبان (961) من طرق عن عُبادة بن مسلم الفزاري، بهذا الإسناد. وجاء في رواية النسائي: قال جبير: هو الخسف، قال عُبادة: فلا أدري قولُ النبي صلى الله عليه وسلم أو قولُ جُبير؟









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1924)


1924 - أخبرني عبد الله بن الحُسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا رَوح بن عُبادة، حدثنا محمد بن أبي حُميد، عن إسماعيل بن محمد ابن سعد بن أبي وقّاص، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "من سَعادةِ ابنِ آدمَ استخارتُه إلى الله، ومن شِقْوةِ ابنِ آدمَ تَرْكُه استخارةَ الله" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আদম সন্তানের সৌভাগ্যের কারণ হলো আল্লাহর কাছে ইস্তিখারা (কল্যাণ কামনা) করা এবং আদম সন্তানের দুর্ভাগ্যের কারণ হলো আল্লাহর কাছে ইস্তিখারা করা পরিত্যাগ করা।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف بمَرّة، محمد بن أبي حُميد متفق على ضعفه، وقد تابعه رجل مثلُه في الضعف، فلا يعتد بمتابعته.وأخرجه أحمد 3/ (1444) عن رَوح بن عبادة، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (2151) من طريق أبي عامر العَقَدي، عن محمد بن أبي حميد، به. وقال: غريب لا نعرفه إلّا من حديث محمد بن أبي حميد، وليس هو بالقوي عند أهل الحديث.قلنا: قد تابعه عبد الرحمن بن أبي بكر المُليكي عند البزار (1179)، وأبي يعلى (701)، لكن عبد الرحمن هذا متفق على ضعفه.وروي الخبر من وجه آخر عند البزار (1097) من طريق عمران بن أبان الواسطي، عن عبد الرحمن المُليكي أيضًا، لكنه قال فيه: عن محمد بن المنكدر، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، عن أبيه. فعاد الحديث إلى المُليكي، وعمران الراوي عنه ضعيف كذلك.وقد صحَّ من حديث جابر بن عبد الله عند أحمد 23/ (14707)، والبخاري (1162) وغيرهما قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يعلّمنا الاستخارة في الأمور كلها كما يُعلّمنا السورة من القرآن … وذكر دعاء الاستخارة. الحُبُلي أقربُ وأشبَه، لأن ابن وهب أعلم بحديث المصريين كما قال الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 1/ 92، ولأنَّ الليث بن سعد قد تابعه عليه، كما نبَّه عليه الطبراني في "الأوسط" (8742)، غير أننا لم نقف على روايته فيما بأيدينا من مصادر التخريج، وتابعه أيضًا خالد بن أبي عمران يرويه عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي مباشرة، وطريقه هذه وإن كانت من رواية ابن لهيعة عنه تصلح للتقوية في مثل هذا، والله أعلم. وقد تابع زيدَ بنَ الحباب عبدُ الله بنُ صالح فيما سيأتي برقم (2492).وأخرجه أبو داود (1529)، والنسائي (9748)، وابن حبان (863) من طرق عن زيد بن الحباب، بهذا الإسناد.وأما رواية عبد الله بن وهب، فقد أخرجها مسلم (1884)، والنسائي (4324) و (9749)، وابن حبان (4612) من طرق عنه، عن أبي هانئ، عن أبي عبد الرحمن الحبلي، عن أبي سعيد، مطولًا بنحو الرواية الآتية عند المصنف برقم (2492).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1925)


1925 - أخبرنا الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا زيد بن الحُبَاب، حدثني عبد الرحمن بن شُريح، حدثني أبو هانئ التُّجِيبيّ، قال: سمعتُ أبا علي الجَنْبي، قال: سمعتُ أبا سعيد الخُدريَّ يقول: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَن قال: رَضِيتُ بالله ربًّا، وبالإسلام دِينًا، وبمحمدٍ رسولًا، وَجَبتْ له الجنةُ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি বলে: ‘আমি আল্লাহকে রব (প্রভু), ইসলামকে দ্বীন (জীবন ব্যবস্থা) এবং মুহাম্মাদকে রাসূল (বাণীবাহক) হিসেবে সন্তুষ্টচিত্তে গ্রহণ করলাম’, তার জন্য জান্নাত আবশ্যক (নিশ্চিত) হয়ে যায়।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد اختُلف فيه على أبي هانئٍ - وهو حميد بن هانئ الخَولاني - في تعيين شيخه، فذكر أبو شُريح المعافري - وهو عبد الرحمن بن شُريح - عنه أنه أبو على الجَنْبي - وهو عمرو بن مالك الهَمْداني - كما وقع عند المصنف هنا، وخالفه عبد الله بن وهب، فذكر عن أبي هانئ أنه أبو عبد الرحمن الحُبُلي - واسمه عبد الله بن يزيد المعافري - وكلاهما ثقة، فالخَطبُ هيّن، ولذلك صحَّح ابن حبان كلا الطريقين، وإن كانت الرواية بذكر أبي عبد الرحمن الحُبُلي أقربُ وأشبَه، لأن ابن وهب أعلم بحديث المصريين كما قال الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 1/ 92، ولأنَّ الليث بن سعد قد تابعه عليه، كما نبَّه عليه الطبراني في "الأوسط" (8742)، غير أننا لم نقف على روايته فيما بأيدينا من مصادر التخريج، وتابعه أيضًا خالد بن أبي عمران يرويه عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي مباشرة، وطريقه هذه وإن كانت من رواية ابن لهيعة عنه تصلح للتقوية في مثل هذا، والله أعلم. وقد تابع زيدَ بنَ الحباب عبدُ الله بنُ صالح فيما سيأتي برقم (2492).وأخرجه أبو داود (1529)، والنسائي (9748)، وابن حبان (863) من طرق عن زيد بن الحباب، بهذا الإسناد.وأما رواية عبد الله بن وهب، فقد أخرجها مسلم (1884)، والنسائي (4324) و (9749)، وابن حبان (4612) من طرق عنه، عن أبي هانئ، عن أبي عبد الرحمن الحبلي، عن أبي سعيد، مطولًا بنحو الرواية الآتية عند المصنف برقم (2492).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1926)


1926 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد الدَّقّاق، حدثنا علي بن إبراهيم الواسِطي، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا شعبة.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق وأبو بكر بن حَمْدان الزاهد، قالا: حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، قال: سمعتُ أبا عَقيل هاشم بن بلال يُحدِّث عن أبي سَلَّام سابِق بن ناجيةَ، قال: كنا جُلوسًا في مسجد حِمصَ، فمرَّ رجلٌ فقالوا: هذا خَدَمَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فنهضتُ إليه فسألتُه، قلت: حدِّثني حديثًا سمعتَه من رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، ولم يَتداولْه الرجالُ بينكما، قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقولُ: "ما من عبدٍ يقولُ حين يُمسي ويُصبحُ: رضيتُ بالله ربًّا، وبالإسلام دِينًا، وبمحمد نبيًّا، إلَّا كان حقًّا على الله أن يُرضِيَه يومَ القيامةِ" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু সাল্লাম সাবিক ইবনু নাজিয়াহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা হিমস মসজিদের মধ্যে উপবিষ্ট ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি আমাদের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন। লোকেরা বললো: ইনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করেছেন। আমি তখন উঠে তার কাছে গেলাম এবং তাকে জিজ্ঞাসা করলাম। আমি বললাম: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শোনা এমন একটি হাদীস বর্ণনা করুন, যা আপনাদের দুইজনের মধ্যে (অন্য কোনো লোকের মাধ্যমে) আদান-প্রদান হয়নি। তিনি (সাহাবী) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে বান্দাই সকাল-সন্ধ্যায় এই দু'আটি পড়ে: ‘আমি আল্লাহকে রব হিসেবে, ইসলামকে দ্বীন হিসেবে এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নবী হিসেবে পেয়ে সন্তুষ্ট’, তবে কিয়ামতের দিন তাকে সন্তুষ্ট করা আল্লাহর উপর আবশ্যক হয়ে যায়।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح بما قبله، لكن بلفظ: "وجبت له الجنة" بدل: "إلّا كان حقًّا على الله أن يرضيه" كما في حديث أبي سعيد الخدري السابق. وهذا إسناد ضعيف لجهالة سابق بن ناجية، وما وقع في إسناد الحاكم هنا من قوله: عن أبي سلّام سابق بن ناجية، فوهمٌ، صوابه: عن سابق بن ناجية، عن أبي سلّام، عن هذا الرجل الذي خَدَمَ النبي صلى الله عليه وسلم، كما جاء في رواية "مسند أحمد" 38/ (23111). وإذا صحَّ ذلك فأبو سلّام هذا قُيِّد في رواية عفّان عن شعبة عند أحمد بأبي سلّام البراء، يعني أنه غير ممطور الحبشي، وهذا ما اعتمده الذهبي في "المُقتنى في سرد الكنى" حيث أورد الترجمتين بالرقمين (2748) و (2751)، لكن قيّده أبو النضر هاشم بن القاسم في روايته عن شعبة عند أحمد بالحبشي، وبه جزم ابن معين في رواية ابن محرز عنه، وكذلك المنذري في "الترغيب والترهيب"، والعلائيُّ في "جامع التحصيل" (971)، وابنُ حجر في "تهذيب التهذيب" و"الإصابة" 7/ 185، و"نتائج الأفكار" 2/ 373، يعني أنَّ أبا سلّام هذا هو مَمطُور الحبشي التابعي المعروف، وعلى أي حالٍ يبقى فيه جهالة سابق بن ناجية.وقد روى هذا الحديثَ مِسعَرُ بن كدام عن أبي عقيل فاضطرب في إسناده ولم يضبطه كما سيأتي بيانه. وضبطه شعبة وهُشيم في روايتهما عن أبي عقيل، حيث قالا: عن سابق، عن أبي سلام، عن خادم النبي صلى الله عليه وسلم. وتساهلَ الحافظُ رحمه الله إذ قوَّى إسناد هذا الخبر في "فتح الباري" 19/ 243.وأخرجه أحمد 31/ (18967) عن أسود بن عامر، و (18969) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، و 38/ (23112) عن عفان بن مسلم، وأبو داود (5072) عن حفص بن عمر، والنسائي (9747) من طريق خالد بن الحارث، خمستهم عن شعبة، عن أبي عَقيل، عن سابق بن ناجية، عن أبي سلام، عن الرجل الذي خدم النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرجه النسائي (10324) من طريق هُشيم، عن أبي عَقيل هاشم بن بلال، عن سابق بن ناجية، عن أبي سلّام، عن رجل طُوالٍ أشعثَ خدم النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرجه أحمد 31/ (18968) عن وكيع عن مِسعَر بن كدام، عن أبي عَقيل، عن أبي سلّام، عن سابق خادم النبي صلى الله عليه وسلم. وهكذا قلب الإسناد وأسقط منه رجلًا، وجعل سابقًا هو الصحابي الذي خدم النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرجه ابنُ ماجه (3870) من طريق محمد بن بشر العَبْدي، عن مِسعَر، عن أبي عَقيل، عن سابق، عن أبي سلام خادم النبي صلى الله عليه وسلم. فجعل أبا سلّام هو الصحابي الذي خدم النبي صلى الله عليه وسلم، وقد اغتر بهذه الرواية خليفةُ بن خيّاط، فذكر أبا سلام في الصحابة، وكذلك جزم بصحبته ابنُ عبد البر، ولا يصحُّ ذلك كما يظهر جليًّا من رواية شعبة وهُشيم اللذين ضبطا الرواية عن أبي عقيل.وفي الباب عن ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم عند الترمذي (3389)، وقال: حديث حسن غريب، وذكر المنذري في "الترغيب والترهيب" أنه جاء في بعض نسخ الترمذي: حسن صحيح. قلنا: كذلك جاء في نسخة عندنا برواية أبي حامد التاجر وأبي ذر الترمذي عن أبي عيسى الترمذي، وفي هذا ردٌّ على الحافظ ابن حجر رحمه الله في "نتائج الأفكار" 2/ 371 حيث ردَّ على النووي في نقله حكم الترمذي بأنه حسن صحيح غريب، فقال: لم أر لفظة صحيح لا بخط الكروخي، ولا بخط الحافظ أبي علي الصَّدَفي من طريق أبي علي السِّنجي، ولا في غيرهما من النسخ، ولا في الأطراف، فكأنَّ الشيخ رآه في نسخة ليست معتمدة.قلنا: مردُّ جميع النسخ التي عند الحافظ إلى رواية أبي العباس المحبُوبي عن أبي عيسى الترمذي، فلذلك لم يجده فيها.وتحسين الترمذي لهذا الخبر أو تصحيحه له فيه نظرٌ، لأنَّ في إسناده أبا سَعْد سعيد بن المرزُبان البقّال، يرويه عن أبي سلمة عن ثوبان، وأبو سعد البقال ضعيف، وكان يدلس وقد عنعنه، ولعله يكون وهم في هذا الإسناد بأن يكون أخطأ في تسمية الصحابي والتابعي، ويكون الحديث لأبي سلّام عن خادم النبي صلى الله عليه وسلم، فتحرف عليه اسم أبي سلّام إلى أبي سلمة ويكون قوله: عن ثوبان، من صنيعه هو، لكون ثوبان كان مولًى لرسول الله صلى الله عليه وسلم، وكان يخدمه، وكان نزل حمص، فقيَّد اسمَه من عنده بناء على هذه المعطيات المشتركة، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1927)


1927 - حدثنا أبو جعفر أحمد بن عُبيدٍ الحافظ بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين بن دِيزِيلَ، حدثنا أبو النصر [1] عمر بن محمد المصري [2]، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن قال إذا أصبحَ مئةَ مرَّة، وإذا أمسى مئةَ مرَّة: سبحانَ الله وبحمدِه، غُفِرَت ذُنوبُه وإن كانت أكثرَ من زبَدِ البحر" [3]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি সকালে একশত বার এবং সন্ধ্যায় একশত বার ‘সুবহানাল্লাহি ওয়া বিহামদিহি’ বলবে, তার গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে, যদিও তা সমুদ্রের ফেনা থেকেও বেশি হয়।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] كذلك جاء في (ص) و (ب) و (ع) بإهمال الصاد، ورسم فوقها في (ص) و (ب) علامة إهمال، وفي (ز): النضير، بالضاد المعجمة وزيادة الياء بعدها، ولم نقف لهذا الراوي على ترجمة فيما بأيدينا من مصادر، ولم نقف له على رواية غير هذه أيضًا. وأخرجه أحمد 14/ (8835) من طريق إسماعيل بن زكريا الخُلْقاني، عن سهيل، به، لكن بلفظ: "لم يأت أحدٌ يوم القيامة بأفضل مما جاء به إلّا أحدٌ قال مثل ما قال أو زاد عليه".وأخرجه مسلم (2692)، والترمذي (3469)، والنسائي (10327) من طريق عبد العزيز بن المختار، وأبو داود (5091)، والنسائي كما في "تحفة الأشراف" للمزي 9/ (12560)، وابن حبان (860) من طريق روح بن القاسم، كلاهما عن سهيل بن أبي صالح، عن سُمَيّ مولى أبي بكر بن عبد الله، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، بمثل لفظ إسماعيل بن زكريا، لكنهما زادا في إسناده سُميًّا بين سُهيل وأبيه.وأخرجه أحمد 13/ (8009) و 14/ (8873) و 16/ (10683)، والبخاري (6405)، ومسلم (2691)، وابن ماجه (3812)، والترمذي (3466)، والنسائي (10593)، وابن حبان (829) من طريق مالك بن أنس، عن سميّ، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، بمثل لفظ حماد بن سلمة عن سهيل لكن دون ذكر الصباح والمساء.وتحصّل من مجموع هذه الروايات أنَّ سُهيلًا رواه مرة عن أبيه مباشرة، ومرة بواسطة سُميّ، فالظاهر أنه رواه على الوجهين، وأما ثواب التسبيح فرواه باللفظين المذكورين، وكأنهما محفوظان عنه جميعًا، والله تعالى أعلم.



[2] كذلك في النسخ الخطية: المصري نسبة لمصر، وفي المطبوع: النصري، بالنون بدل الميم، وكذلك رُسمت في "إتحاف المهرة" للحافظ لكن دون إعجام، فتحتمل هذا وتحتمل أيضًا البصري بالباء الموحدة. وأخرجه أحمد 14/ (8835) من طريق إسماعيل بن زكريا الخُلْقاني، عن سهيل، به، لكن بلفظ: "لم يأت أحدٌ يوم القيامة بأفضل مما جاء به إلّا أحدٌ قال مثل ما قال أو زاد عليه".وأخرجه مسلم (2692)، والترمذي (3469)، والنسائي (10327) من طريق عبد العزيز بن المختار، وأبو داود (5091)، والنسائي كما في "تحفة الأشراف" للمزي 9/ (12560)، وابن حبان (860) من طريق روح بن القاسم، كلاهما عن سهيل بن أبي صالح، عن سُمَيّ مولى أبي بكر بن عبد الله، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، بمثل لفظ إسماعيل بن زكريا، لكنهما زادا في إسناده سُميًّا بين سُهيل وأبيه.وأخرجه أحمد 13/ (8009) و 14/ (8873) و 16/ (10683)، والبخاري (6405)، ومسلم (2691)، وابن ماجه (3812)، والترمذي (3466)، والنسائي (10593)، وابن حبان (829) من طريق مالك بن أنس، عن سميّ، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، بمثل لفظ حماد بن سلمة عن سهيل لكن دون ذكر الصباح والمساء.وتحصّل من مجموع هذه الروايات أنَّ سُهيلًا رواه مرة عن أبيه مباشرة، ومرة بواسطة سُميّ، فالظاهر أنه رواه على الوجهين، وأما ثواب التسبيح فرواه باللفظين المذكورين، وكأنهما محفوظان عنه جميعًا، والله تعالى أعلم.



1927 [3] - حديث صحيح، وأبو النصر متابع، وقد اختُلف فيه على سهيل بن أبي صالح في إسناده ومتنه، كما سيأتي بيانه. أبو صالح: هو ذكوان السمّان.وأخرجه ابن حبان (859) من طريق هُدبة بن خالد، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 14/ (8835) من طريق إسماعيل بن زكريا الخُلْقاني، عن سهيل، به، لكن بلفظ: "لم يأت أحدٌ يوم القيامة بأفضل مما جاء به إلّا أحدٌ قال مثل ما قال أو زاد عليه".وأخرجه مسلم (2692)، والترمذي (3469)، والنسائي (10327) من طريق عبد العزيز بن المختار، وأبو داود (5091)، والنسائي كما في "تحفة الأشراف" للمزي 9/ (12560)، وابن حبان (860) من طريق روح بن القاسم، كلاهما عن سهيل بن أبي صالح، عن سُمَيّ مولى أبي بكر بن عبد الله، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، بمثل لفظ إسماعيل بن زكريا، لكنهما زادا في إسناده سُميًّا بين سُهيل وأبيه.وأخرجه أحمد 13/ (8009) و 14/ (8873) و 16/ (10683)، والبخاري (6405)، ومسلم (2691)، وابن ماجه (3812)، والترمذي (3466)، والنسائي (10593)، وابن حبان (829) من طريق مالك بن أنس، عن سميّ، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، بمثل لفظ حماد بن سلمة عن سهيل لكن دون ذكر الصباح والمساء.وتحصّل من مجموع هذه الروايات أنَّ سُهيلًا رواه مرة عن أبيه مباشرة، ومرة بواسطة سُميّ، فالظاهر أنه رواه على الوجهين، وأما ثواب التسبيح فرواه باللفظين المذكورين، وكأنهما محفوظان عنه جميعًا، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1928)


1928 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب إملاءً وقراءةً، حدثنا هارون بن سُليمان الأصبهاني، حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي، حدثنا سفيان، عن منصور، عن الشَّعبي، عن أمّ سلمة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا خرجَ من بيتِه قال: "باسم الله، ربِّ أعوذُ بك أن أَزِلَّ أو أضِلَّ، أو أَظلِمَ أو أُظلَمَ، أو أَجهَلَ أو يُجهَلَ علَيَّ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وربما توهَّم مُتوهِّم أنَّ الشعبيّ لم يسمع من أم سلمة، وليس كذلك، فإنه دَخَلَ على عائشة وأم سلمة جميعًا، ثم أكثرَ الروايةَ عنهما جميعًا.




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর ঘর থেকে বের হতেন, তখন বলতেন: "আল্লাহর নামে (আমি বের হচ্ছি)। হে আমার রব, আমি আপনার আশ্রয় চাই যেন আমি পদস্খলিত না হই অথবা পথভ্রষ্ট না হই, অথবা যেন আমি জুলুম না করি অথবা আমার প্রতি জুলুম করা না হয়, অথবা যেন আমি মূর্খতা না করি কিংবা আমার প্রতি মূর্খতা করা না হয়।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. سفيان: هو الثوري، ومنصور: هو ابن المعتمر، والشعبي: هو عامر بن شَراحيل، وقد أدرك الشعبيُّ أمَّ سلمة بيقين، كما أوضحناه في "سنن ابن ماجه" بتحقيقنا (3884)، وبه جَزَمَ المصنّف هنا.وأخرجه أحمد 44/ (26704)، والنسائي (7870) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (26616)، والترمذي (3427)، والنسائي (9835) من طريق وكيع بن الجراح، عن سفيان الثوري، به. وزاد في أوله: "باسم الله توكلتُ على الله". وقال الترمذي: حديث حسن صحيح. وأخرجه أحمد (26729)، وأبو داود (5094)، وابن ماجه (3884)، والنسائي (7868) (7869) (9834) من طرق عن منصور بن المعتمر، به. ولم يذكر بعضُهم في روايته أولَ الحديث: "باسم الله".وأخرجه النسائي (9833) من طريق مؤمَّل بن إسماعيل، عن شعبة، عن عاصم، عن الشعبي، عن أم سلمة. وقال بإثره: هذا خطأ: عاصم عن الشعبي، والصواب: شعبة عن منصور، ومؤمَّل بن إسماعيل كثير الخطأ، خالفه بهز بن أسد، رواه عن شعبة عن منصور عن الشعبي.وأخرجه النسائي (9836) عن محمد بن بشار، عن عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان الثوري، عن زُبيد الياميّ، عن الشعبي مرسلًا، ولم يذكر: "باسم الله". وقال الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 1/ 160 بعد أن ذكر الاختلاف بين منصور وزُبيد في وصل الحديث وإرساله: هذه العلة غير قادحة، فإنَّ منصورًا ثقة حافظ، ولم يُختلَف عليه فيه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1929)


1929 - أخبرنا أبو قُتيبة سَلْم بن الفضل الأَدَمي بمكة، حدثنا محمد بن نصر بن منصور الصائغ، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا حاتم بن إسماعيل، عن عبد الله بن حُسين بن عطاء بن يَسار، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا خرج من بيتِه يقول: "باسمِ الله، لا حَولَ ولا قُوَّة إلَّا بالله، التُّكْلانُ على الله" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর ঘর থেকে বের হতেন, তখন বলতেন: "আল্লাহর নামে। আল্লাহর সাহায্য ও ক্ষমতা ব্যতীত কোনো উপায় নেই এবং কোনো শক্তি নেই। আল্লাহর উপরই ভরসা।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله بن حُسين بن عطاء بن يسار، وقد وهم فيه كما نبّه عليه أبو زرعة الرازي في سؤالات البرذعي له (453) حيث قال: ضعيفٌ، حدَّث عن سُهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "والتكلان على الله"، وإنما هو عن سُهيل، عن أبيه، عن السَّلُولي، عن كعب. قلنا: السَّلُولي هو عبد الله بن ضَمْرة. وله طريق أخرى عن أبي هريرة لكنها ضعيفة أيضًا، فلا يُفرح بها، غير أنَّ لهذا الخبر شواهد يتحسّن بها في أقل أحواله، ولذلك حسَّنَه الحافظ في "نتائج الأفكار" 1/ 166.وأخرجه ابن ماجه (3885) عن يعقوب بن حميد بن كاسب، عن حاتم بن إسماعيل، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن ماجه أيضًا (3886) من طريق هارون بن هارون القرشي التيمي، عن الأعرج، عن أبي هريرة. وهارون هذا ضعيف باتفاق.ولم نقف عليه من رواية سُهيل، عن أبيه، عن السَّلُولي، عن كعب قوله، لكن من رواية مجاهد، عن عبد الله بن ضمرة السَّلولي، عن كعب قوله، عند معمر في "جامعه" (19827)، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 10/ 212، وابن أبي الدنيا في "التوكل على الله" (21)، وأبي نعيم في "الحلية" 5/ 389، وعبد الغني المقدسي في "الترغيب في الدعاء" (116). لكن سقط اسم السلولي من مطبوع "جامع معمر".ويشهد له مرفوعًا حديث أنس بن مالك عند أبي داود (5095)، والترمذي (3426)، والنسائي (9837)، وابن حبان (822) من طريق ابن جريج، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس. وقال الترمذي: حسن غريب لا نعرفه إلّا من هذا الوجه؛ كذلك جاء في رواية أبي العباس المحبوبي عنه، وأما في رواية أبي حامد التاجر وأبي ذر الترمذي عنه فقال: حسن صحيح غريب. كذلك جاء في نسخة خطيّة منه عندنا بروايتهما. وقد أعلَّ البخاري هذا الحديث فيما نقله عنه الترمذي في "علله الكبير" (673) بقوله: لا أعرف لابن جريج عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة غير هذا الحديث، ولا أعرف له سماعًا منه. قلنا: وجزم الدارقطني في "العلل" (2349) بأنَّ ابن جريج لم يسمعه من إسحاق، محتجًّا برواية عبد الله بن عبد العزيز بن أبي روّاد عن ابن جريج - وهو أثبت الناس فيه - فقال: حُدِّثت عن إسحاق.قلنا: لقاؤه له ممكن جدًّا، فقد أدرك ابن جُريج من حياة إسحاق ما يقارب الخمسين عامًا، على أنه وقع تصريحه منه بالسماع في رواية الضياء المقدسي في "المختارة" 4/ (1540).كما يشهد له حديث عثمان بن عفان عند أحمد 1/ (471)، وفي إسناده رجلٌ مبهم يرويه عن عثمان، وقد جاء في بعض مصادر التخريج تقييده بأنه ابنٌ لعثمان بن عفان، وبقية رجاله لا بأس بهم، فيصلحُ مثلُه في الشواهد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1930)


1930 - أخبرنا أحمد بن سَلْمان الفقيه، حدثنا الحسن بن مُكْرم، حدثنا عثمان بن عُمر، حدثنا شعبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حَنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن أبي جعفر المَديني، قال: سمعتُ عُمارة بن خُزيمة يُحدِّث عن عثمان بن حُنَيف: أنَّ رجلًا ضريرًا أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: ادْعُ اللهَ تعالى أن يُعافِيَني، قال: "إن شئتَ أخَّرتَ ذلك، وإن شئتَ دعوتُ"، قال: فادْعُه، قال: فأمَرَه النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن يتوضأ فيُحسنَ الوضوءَ، ويُصليَ ركعتَين، ويدعوَ بهذا الدُّعاء: "اللهمّ إني أسألُك وأتوجَّه إليكَ بنبيِّك محمدٍ صلى الله عليه وسلم نبيِّ الرَّحمةِ، يا محمدُ، إني أتوجَّه بك إلى ربّك في حاجَتي هذه فتَقضِيها لي، اللهم شفِّعْه فيَّ وشَفِّعْني فيه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উসমান ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক জন্মান্ধ ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আপনি আল্লাহর কাছে দোয়া করুন, যেন তিনি আমাকে আরোগ্য দান করেন। তিনি বললেন: তুমি চাইলে আমি তা (দোয়া করা) বিলম্বিত করতে পারি, আর তুমি চাইলে আমি এখনই দোয়া করতে পারি। লোকটি বলল: আপনি (দয়া করে) দোয়া করুন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন তাকে নির্দেশ দিলেন যে, সে যেন উত্তমরূপে ওযু করে, দু’রাকাত সালাত (নামাজ) আদায় করে এবং এই দোয়াটি পড়ে: “হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে প্রার্থনা করি এবং আপনার নবী মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), যিনি দয়ার নবী, তার মাধ্যমে আপনার দিকে মনোনিবেশ করি। হে মুহাম্মাদ! আমি এই (বিশেষ) প্রয়োজনে আপনার রব-এর দিকে আপনার মাধ্যমে মনোনিবেশ করছি, যেন তিনি তা আমার জন্য পূর্ণ করে দেন। হে আল্লাহ! আপনি আমার ব্যাপারে তাঁর সুপারিশ কবুল করুন এবং আমার ব্যাপারে আমার সুপারিশ কবুল করুন।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. أبو جعفر المديني: هو عُمير بن يزيد الخَطْمي.وقد تقدَّم برقم (1194) من طريق العباس بن محمد الدُّوري عن عثمان بن عُمر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1931)


1931 - أخبرنا عبد الله بن جعفر بن دَرَستَوَيهِ الفارسي، حدثنا يعقوب بن سفيان، حدثنا قَبيصة ومحمد بن كثير، قالا: حدثنا سفيان، عن عمرو بن مُرَّة، عن عبد الله بن الحارث، عن طَلِيقِ بن قيس، عن ابن عباس، قال: كان من دُعاء النبيِّ صلى الله عليه وسلم: "ربِّ أعِنِّي ولا تُعِنْ عليَّ وانصُرني ولا تَنصُرْ عَلَيَّ، وامكُرْ لي ولا تمكُرْ علَيَّ، واهدِني ويَسِّرِ الهُدى لي، وانصُرني على مَن بَغَى عَلَيَّ، رَبِّ اجعلْني لك شَكّارًا، لك ذَكّارًا، لك رَهّابًا، لك مِطوَاعًا، لك مُخبِتًا، لك أوّاهًا مُنِيبًا، تَقبّل تَوبتي، وأجِبْ دعوتي، واهْدِ قلبي وثَبِّتْ حُجَّتي، وسَدِّد لِساني، واسْلُلْ سَخِيمةَ قلبي" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দু‘আগুলোর মধ্যে একটি ছিল: "হে আমার রব! আমাকে সাহায্য করো, আমার বিপক্ষে কাউকে সাহায্য করো না। আমাকে বিজয়ী করো, আমার বিপক্ষে কাউকে বিজয়ী করো না। আমার অনুকূলে কৌশল করো, আমার বিপক্ষে কৌশল করো না। আমাকে পথ দেখাও এবং আমার জন্য হিদায়াত সহজ করে দাও। যারা আমার ওপর সীমালঙ্ঘন করে, তাদের বিরুদ্ধে আমাকে সাহায্য করো। হে আমার রব! আমাকে তোমার প্রতি অত্যধিক কৃতজ্ঞ, তোমার প্রতি অধিক স্মরণকারী, তোমার প্রতি ভীত সন্ত্রস্ত, তোমার প্রতি অতি অনুগত, তোমার প্রতি বিনীত, তোমার প্রতি রোনাজারীকারী এবং প্রত্যাবর্তনকারী বানাও। আমার তাওবা কবুল করো, আমার দু‘আ কবুল করো, আমার অন্তরকে সঠিক পথে পরিচালিত করো, আমার প্রমাণকে দৃঢ় করো, আমার জিহ্বাকে সঠিক পথে পরিচালিত করো এবং আমার অন্তরের হিংসা দূর করে দাও।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. قبيصة: هو ابن عُقبة السُّوَائي، ومحمد بن كثير: هو العَبْدي، وسفيان: هو الثَّوري.وأخرجه أحمد 3/ (1997)، وأبو داود (1510)، وابن ماجه (3830)، والترمذي (3551)، والنسائي (10368)، وابن حبان (947) و (948) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.والسَّخيمة: الحِقد والضغينة في النفس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1932)


1932 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن أحمد بن بُطّة الأصبهاني، حدثنا عبد الله بن محمد بن زكريا الأصبهاني، حدثنا مُحرِز بن سَلَمة العَدَني، حدثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن سُهيل بن أبي صالح، عن موسى بن عُقبة، عن عاصم بن أبي عُبيد، عن أم سلَمة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، هذا ما سألَ محمدٌ ربَّه: "اللهمَّ إني أسألُك خيرَ المَسألة، وخيرَ الدُّعاء، وخيرَ النَّجاح، وخيرَ العمَل، وخيرَ الثَّواب، وخيرَ الحياة، وخيرَ المَمات، وثَبِّتني وثَقِّل مَوازِيني، وحَقِّق إيماني، وارفَع درجتي، وتَقبّل صلاتي، واغفِر خَطيئتي، وأسألُك الدرجاتِ العُلَى من الجنة، اللهمَّ إني أسألُك فَواتحَ الخيرِ وخواتِمَه وجَوامِعَه، وأولَه، وظاهرَه، وباطنَه، والدرجاتِ العُلى مِن الجنة، آمين.اللهمَّ إني أسألُك خيرَ ما آتي، وخيرَ ما أفعلُ، وخير ما أعملُ، وخيرَ ما بَطَنَ، وخيرَ ما ظَهَرَ، والدرجاتِ العُلَى من الجنة، آمين.اللهمَّ إني أسألُك أن ترفعَ ذِكْري، وتَضَعَ وِزْري، وتُصلِحَ أمري، وتُطهِّرَ قلبي، وتُحصِّن فَرْجي، وتُنوِّر لي قلبي، وتَغفِر لي ذَنبي، وأسألُك الدرجاتِ العُلى من الجنة، آمين.اللهمَّ إني أسألُك أن تُبارك لي في نَفْسي، وفي سَمْعي، وفي بصري، وفي رُوحي، وفي خَلْقي وفي خُلُقي، وأهلي، وفي مَحْيَاي، وفي مَماتي، وفي عَمَلي، وتقبّل حَسناتي، وأسألُك الدرجاتِ العُلَى من الجنة" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণিত, (তিনি বলেন,) এটিই সেই (দোয়া) যা মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর রবের কাছে চাইতেন: "হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে প্রার্থনা করি সর্বশ্রেষ্ঠ প্রার্থনা, সর্বশ্রেষ্ঠ দু'আ, সর্বশ্রেষ্ঠ সফলতা, সর্বশ্রেষ্ঠ আমল, সর্বশ্রেষ্ঠ প্রতিদান, সর্বশ্রেষ্ঠ জীবন এবং সর্বশ্রেষ্ঠ মৃত্যু। আমাকে সুদৃঢ় রাখুন, আমার পাল্লা ভারী করুন, আমার ঈমানকে নিশ্চিত করুন, আমার মর্যাদা উন্নীত করুন, আমার সালাত কবুল করুন, আমার ভুলত্রুটি ক্ষমা করুন এবং আমি আপনার কাছে জান্নাতের সুউচ্চ স্তরগুলো প্রার্থনা করি। আমীন। হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে প্রার্থনা করি কল্যাণের শুরু, তার সমাপ্তি, তার ব্যাপকতা, তার প্রথম, তার বাহ্যিক ও তার অভ্যন্তরীণ (সবকিছু) এবং জান্নাতের সুউচ্চ স্তরগুলো। আমীন। হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে প্রার্থনা করি যা আমি সম্পাদন করি তার কল্যাণ, যা আমি করি তার কল্যাণ, যা আমি আমল করি তার কল্যাণ, যা গোপন থাকে তার কল্যাণ এবং যা প্রকাশ পায় তার কল্যাণ এবং জান্নাতের সুউচ্চ স্তরগুলো। আমীন। হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে প্রার্থনা করি যে আপনি আমার খ্যাতি বৃদ্ধি করুন, আমার বোঝা হালকা করুন, আমার বিষয়গুলো শুধরে দিন, আমার অন্তরকে পবিত্র করুন, আমার লজ্জাস্থানকে সংরক্ষিত করুন, আমার জন্য আমার অন্তরকে আলোকিত করুন, আমার গুনাহ ক্ষমা করুন এবং আমি আপনার কাছে জান্নাতের সুউচ্চ স্তরগুলো প্রার্থনা করি। আমীন। হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে প্রার্থনা করি যে আপনি আমাকে বরকত দিন আমার নফসে, আমার শ্রবণে, আমার দৃষ্টিতে, আমার রূহে, আমার গঠনে, আমার চরিত্রে, আমার পরিবারে, আমার জীবনে, আমার মরণে এবং আমার আমলে। আর আপনি আমার নেক আমলগুলো কবুল করুন এবং আমি আপনার কাছে জান্নাতের সুউচ্চ স্তরগুলো প্রার্থনা করি।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده محتمل للتحسين من أجل عاصم بن أبي عُبيد، فهو - وإن لم يرو عنه غير موسى بن عقبة - تابعي كان يدخل على زينب بنت أم سلمة وعلى أم سلمة كما وصفه موسى بن عقبة مرةً، وذكره ابن حبان في "الثقات".وأخرجه الطبراني في "الكبير" 23/ (717)، وفي "الأوسط" (6218)، وفي "الدعاء" (1422)، والبيهقي في "الدعوات" (256) و (257) من طرق عن عبد العزيز بن أبي حازم، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1933)


1933 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا العباس بن الوليد بن مَزْيَد البَيْروتي، حدثنا محمد بن شعيب بن شابُور، حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، حدثنا خالد بن اللَّجْلاج، حدثنا عبد الرحمن بن عائش الحَضْرمي، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقولُ وذَكَر الربَّ تبارك وتعالى، فقال: "قُل: اللهمَّ إني أسألُك الطَّيباتِ، وتَرْك المُنكراتِ، وحُبَّ المساكين، وأن تَتُوب علَيَّ وتَغفرَ لي وتَرحمَني، وإذا أردتَ فتنةً في قومٍ فتوفَّني غيرَ مَفتُون"، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تَعلَّموهُنَّ، فوالذي نفْسي بيده إنهنَّ الحقُّ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد رُويَ عن مُعاذ بن جَبَل عن النبي صلى الله عليه وسلم مثلُه:




আব্দুর রহমান ইবনে আয়িশ আল-হাদরামি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি— আর তিনি বরকতময় ও সুউচ্চ রবের কথা উল্লেখ করে বলেন: (আল্লাহর কাছে) বলো: "হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে উত্তম বস্তুসমূহ, মন্দ কাজসমূহ বর্জন এবং মিসকিনদের প্রতি ভালোবাসা কামনা করি। আর আপনি যেন আমার তওবা কবুল করেন, আমাকে ক্ষমা করেন এবং আমার প্রতি দয়া করেন। আর যখন আপনি কোনো জাতির মধ্যে ফিতনা (বিপর্যয়) সৃষ্টি করতে চান, তখন আমাকে যেন ফিতনামুক্ত অবস্থায় মৃত্যু দেন।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা এগুলো শিখে নাও। কারণ, যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! এগুলোই সত্য।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف لاضطرابه كما هو مبيَّن مفصَّل في تعليقنا على "مسند أحمد" (3484) و (16621)، وخالد بن اللجلاج مع فضله لم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، وابن عائش لا تصح له صحبة.وأخرجه البيهقي في "الدعوات" (206) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (388)، وفي "الآحاد والمثاني" (2585)، ومحمد بن نصر المروزي في "قيام الليل - مختصره" ص 55 - 56، وابن خزيمة في "التوحيد" 2/ 536، والآجري في "الشريعة" (1041)، والطبراني في "الدعاء" (1418) و (1419)، وفي "مسند الشاميين" (597) و (598)، والدارقطني في "رؤية الله" (233 - 240)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (644)، والبغوي في "شرح السنة" (924)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (11) من طرق عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، به.ورواه زهير بن محمد التميمي عند أحمد 27/ (16621) عن يزيد بن يزيد بن جابر - أخي عبد الرحمن - عن خالد بن اللجلاج، عن عبد الرحمن بن عائش، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، عن النبي صلى الله عليه وسلم.ورواه أبو سلام الحبشي عند أحمد 36/ (22109)، والترمذي (3235) عن عبد الرحمن بن عائش، عن مالك بن يخامر السكسكي، عن معاذ بن جبل، عن النبي صلى الله عليه وسلم.وانظر الطريق التالي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1934)


1934 - أخبرَناهُ أبو حفص عُمر بن محمد الفقيه بِبُخارى، حدثنا صالح بن محمد بن حبيب الحافظ، حدثنا محمد بن سعيد بن سُويد القرشي بالكوفة، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن بن إسحاق، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبيه، عن معاذ بن جبل قال: أبطأ عنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم صلاةَ الفجر، حتى كادتْ أن تُدرِكَنا الشمسُ، ثم خرج فصلَّى بنا فخفَّف في صلاتِه، ثم انصرفَ فأقبلَ علينا بوجهِه، فقال: "على مَكانِكم أُخبِرْكم ما بَطّأني عنكم اليومَ في هذه الصلاةِ، إني صلَّيتُ في ليلَتي هذه ما شاءَ اللهُ، ثم مَلَكتْني عيني فنِمتُ، فرأيتُ ربّي تبارك وتعالى، فألهَمَني أنْ قلتُ: اللهمَّ إني أسألُك الطيّباتِ، وتَرْك المُنكراتِ، وحبَّ المَساكينِ، وأن تتوبَ علَيَّ، وتَغفرَ لي وتَرحَمَني، وإذا أردتَ في خَلْقِك فتنةً، فنجِّني إليك منها غيرَ مفتونٍ، اللهمَّ وأسألُك حبَّك وحبَّ من يُحبُّك، وحبَّ عمل يقرِّبُني إلى حُبِّك"، ثم أقبل إلينا صلى الله عليه وسلم، فقال: "تعلَّمُوهنَّ وادرُسُوهنَّ، فإنهن حَقٌّ" [1].




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাতে আমাদের কাছে আসতে দেরি করলেন, এমনকি সূর্য আমাদের নাগালের কাছাকাছি এসে গিয়েছিল। এরপর তিনি বেরিয়ে এলেন এবং আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। তিনি সালাত সংক্ষিপ্ত করলেন। সালাত শেষে তিনি আমাদের দিকে মুখ ফিরিয়ে বললেন: "তোমরা তোমাদের জায়গায় থাকো। আমি তোমাদের জানাবো, আজ এই সালাতে তোমাদের কাছে আসতে আমার কেন দেরি হলো। নিশ্চয়ই আমি আজ রাতে আল্লাহর ইচ্ছামতো সালাত আদায় করেছি। এরপর আমার চোখ ঢলে আসলো এবং আমি ঘুমিয়ে পড়লাম। অতঃপর আমি আমার বরকতময় ও সুমহান রবকে দেখলাম। তিনি আমাকে এমন ইলহাম (প্রেরণা) দিলেন যে আমি বললাম: 'হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে উত্তম কাজ, মন্দ কাজ বর্জন করা এবং মিসকিনদের ভালোবাসা প্রার্থনা করি। আর তুমি যেন আমার তওবা কবুল করো, আমাকে ক্ষমা করো এবং আমার প্রতি দয়া করো। আর যখন তুমি তোমার সৃষ্টির মাঝে কোনো ফিতনা (বিপর্যয়) দিতে চাও, তখন আমাকে সেই ফিতনা থেকে নিরাপদ অবস্থায় তোমার দিকে উঠিয়ে নাও। হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে তোমার ভালোবাসা, যারা তোমাকে ভালোবাসে তাদের ভালোবাসা এবং এমন আমলের ভালোবাসা প্রার্থনা করি যা আমাকে তোমার ভালোবাসার কাছাকাছি পৌঁছে দেয়।'" এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের দিকে ফিরে বললেন: "তোমরা এই বাক্যগুলো শিখে নাও এবং অধ্যয়ন করো, কারণ এগুলো সত্য।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف بمرَّة، سعيد بن سويد مجهول تفرد بالرواية عنه ابنه محمد، ومحمد هذا - وإن روى عنه غير واحدٍ - لا يعرف بجرح ولا تعديل، فهو مستور الحال، وذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 7/ 266 وسكت عنه، وعبد الرحمن بن أبي إسحاق - وهو أبو شيبة الواسطي - ضعيف منكر الحديث، ومحمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى سيئ الحفظ، لكن لم يقع في إسناد هذا الخبر إلا عند المصنف، وأبوه عبد الرحمن لم يسمع من معاذ بن جبل كما قال ابن خزيمة في "التوحيد".والدارقطني في "رؤية الله" (228) من طريق محمد بن سويد بن سعيد، بهذا الإسناد. ووقع في المطبوع من "مسند البزار": عبد الله بن سويد، وهو خطأ. وقد أشار الدارقطني في "العلل" 6/ 57 إلى طريق محمد بن سويد هذه مع بقية طرق هذا الخبر ثم قال: ليس فيها صحيح، وكلها مضطربة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1935)


1935 - أخبرنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحُسين، حدثنا آدمُ بن أبي إياس، حدثنا شعبةُ.وأخبرنا أبو بكر محمد بن أحمد الجَلّاب وأبو بكر أحمد بن جعفر القَطِيعي، قالا: حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن جَبْر بن حَبيب، عن أم كُلثوم بنت أبي بكر، عن عائشة: أنَّ أبا بكر الصديق دَخَل على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكلَّمَه في شيءٍ يُخفِيه من عائشة، وعائشةُ تُصلِّي، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "يا عائشةُ، عليكِ بالكَوامِلِ" - أو كلمةً أخرى - فلما انصرفَتْ عائشةُ سألتْه عن ذلك، فقال لها: "قُولي: اللهمَّ إني أسألُك من الخيرِ كلِّه، عاجِلِه وآجلِه، ما علمتُ منه وما لم أعلَمْ، وأعوذُ بكَ من الشرِّ كُلِّه، عاجلِه وآجلِه، ما علمتُ منه وما لم أعلَمْ، وأسألُك الجنةَ وما قَرَّب إليها مِن قولٍ أو عملٍ، وأعوذُ بك من النار وما قَرَّب إليها مِن قولٍ أو عمل، وأسألُك خيرَ ما سألك عبدُك ورسولُك محمدٌ، وأعوذُ بك من شرِّ ما استعاذك منه عبدُك ورسولُك محمدٌ صلى الله عليه وسلم، وأسألُك ما قَضَيتَ لي مِن أمرٍ أن تجعلَ عاقبتَه رَشَدًا" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন এবং তাঁর সাথে এমন বিষয়ে কথা বললেন যা তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর থেকে গোপন রাখতে চাইলেন। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সালাত আদায় করছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হে আয়িশা, তুমি 'কামিলাত' (পরিপূর্ণ বিষয়সমূহ)-কে অপরিহার্য করো।” — অথবা অনুরূপ কোনো শব্দ বলেছিলেন। যখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি এ বিষয়ে তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: “তুমি বলো: হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে যাবতীয় কল্যাণ চাই, তার বর্তমান ও ভবিষ্যৎ, যা আমি জানি এবং যা আমি জানি না। আর আমি আপনার কাছে যাবতীয় অনিষ্ট থেকে আশ্রয় চাই, তার বর্তমান ও ভবিষ্যৎ, যা আমি জানি এবং যা আমি জানি না। আমি আপনার কাছে জান্নাত চাই এবং জান্নাতের নিকটবর্তীকারী কথা ও কাজ চাই। আর আমি আপনার কাছে জাহান্নাম থেকে আশ্রয় চাই এবং জাহান্নামের নিকটবর্তীকারী কথা ও কাজ থেকে আশ্রয় চাই। আর আমি আপনার কাছে সেই কল্যাণ চাই, যা আপনার বান্দা ও রাসূল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার কাছে চেয়েছেন, এবং আমি সেই অনিষ্ট থেকে আশ্রয় চাই, যা থেকে আপনার বান্দা ও রাসূল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার কাছে আশ্রয় চেয়েছেন। আর আপনি আমার জন্য যা কিছু ফায়সালা করেছেন, আমি প্রার্থনা করি যেন আপনি তার পরিণতি সঠিক ও সফল করে দেন।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده صحيح. وهو في "مسند أحمد" 42/ (25137).وأخرجه أحمد 41/ (25019) و 42/ (25139)، وابن ماجه (3846) من طريق حماد بن سلمة، عن جَبْر بن حبيب، به.وأخرجه أحمد 42/ (25138) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن شعبة، به.وأخرجه ابن حبان (869) من طريق حماد بن سلمة، عن سعيد بن إياس الجُريري، عن أم كلثوم بنت أبي بكر، به. وذكر حماد بن سلمة الجُريريَّ بدل جَبْر بن حبيب، وهذا لا يضرُّ، لأنَّ حماد بن سلمة قد سمع هذا الحديث من كليهما كما تدل عليه رواية أبي يعلى (4473)، والطبراني في "الدعاء" (1347)، حيث قَرن حمادٌ في روايتهما الجُريري بجَبْر، وحماد سمع من الجُريري قبل أن يتغيّر.وخالف شعبةَ وحمادَ بنَ سلمة في إسناده أبو نَعَامة العَدَوي كما في الطريق التالية عند المصنف، فجعله من رواية جَبْر بن حبيب عن القاسم بن محمد عن عائشة. وذكر القاسم بن محمد بدل أم كلثوم بنت أبي بكر، وهو شُذوذٌ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1936)


1936 - وقد حدَّثَناهُ أبو محمد [1] بنُ الخُراساني، حدثنا الحسن بن مُكْرَم، حدثنا عثمان بن عُمر، أخبرنا أبو نَعَامَة العَدَوي عمرو بن عيسى، حدثنا جَبْر بن حبيب، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، نحوه [2].هكذا قاله أبو نَعامة، وشعبةُ أحفظُ منه، وإذا خالفَه فالقولُ قولُ شعبةَ.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এর অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। এটি আমাদের নিকট আবূ মুহাম্মাদ ইবনু খুরাসানী বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, হাসান ইবনু মুকাররাম আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, উসমান ইবনু উমার আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আবূ না’আমা আল-আদাবী আমর ইবনু ঈসা আমাদের খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন, জাব্র ইবনু হাবীব আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি আল-কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ থেকে এটি বর্ণনা করেন। আবূ না’আমা এভাবেই বর্ণনা করেছেন। তবে শু’বাহ তার চেয়ে অধিক মুখস্থকারী। আর যখন সে (আবূ না’আমা) শু’বাহ’র বিরোধিতা করে, তখন শু’বাহ’র বক্তব্যই গ্রহণযোগ্য।




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] وقع في المطبوع: أبو بكر محمد، وهو خطأ، فهو أبو محمد عبد الله بن إسحاق بن الخُراساني.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن خالف فيه أبو نَعَامة العدوي الحفاظَ من أصحاب جَبْر بن حبيب كشعبة وحماد بن سلمة الذين رووه عنه فذكروا أم كلثوم بنت أبي بكر بدل القاسم بن محمد، وكذلك رواه سعيدٌ الجُريري عن أم كلثوم كما تقدَّم بيان ذلك عند الطريق السابقة، وقد نبَّه الدارقطني في "علله" (3596) على هذا الاختلاف، وصحَّح قولَ شعبة ومن تابعه، ومع ذلك جَوَّد إسنادَه الحافظُ ابن رجب في "فتح الباري" 9/ 310!وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (3344/ 3) عن عبد الأعلى بن حماد النَّرسي، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (6028) عن إبراهيم بن مرزوق، كلاهما عن عثمان بن عُمر، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1937)


1937 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثنا هارون بن مَعروف، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرنا حُيَيّ بن عبد الله، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن عبد الله بن عمرو، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنه كان يَدعُو يقولُ: "اللهمَّ اغفِرْ لنا ذُنُوبَنا وظُلْمَنا وهَزْلَنا، وجِدَّنا وعَمْدَنا، وكلُّ ذلك عِندنا" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'আ করতেন এবং বলতেন: "হে আল্লাহ! আমাদের গুনাহসমূহ, আমাদের জুলুম (অবিচার), আমাদের ঠাট্টা-তামাশা, আমাদের গুরুত্ব সহকারে করা কাজ, এবং আমাদের ইচ্ছাকৃত (দোষ/কাজ) ক্ষমা করে দিন, আর এই সবই আমাদের মধ্যে রয়েছে।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل حُيَيّ بن عبد الله: وهو المَعَافِري. أبو عبد الرحمن الحُبُلي: هو عبد الله بن يزيد المَعَافري.وأخرجه ابن حبان (1027) من طريق أحمد بن عمرو بن السَّرْح، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 11/ (6617) من طريق عبد الله بن لَهيعة، عن حُيّي بن عبد الله، به.ويشهد له حديث أبي موسى الأشعري عند البخاري (6398) و (6399)، ومسلم (2719)، ولفظه: "اللهم اغفر لي خطيئتي وجَهْلي، وإسرافي في أمري، وما أنت أعلمُ به مني، اللهم اغفر لي هَزْلي وجِدِّي، وخطئي وعمدي، وكل ذلك عندي"، وفي بعض الروايات زيادة: "أنت المُقدِّم وأنت المؤخِّر وأنت على كل شيء قديرٌ".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1938)


1938 - أخبرنا عبد العزيز بن محمد بن إسحاق الوَرّاق، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا سُنَيد بن داود، حدثنا عمرو بن أبي سَلَمة، حدثنا زُهير بن محمد، عن هشام بن عُروة، عن أبيه، عن عائشة، أنها قالت: أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم جبريلُ عليه السلام، فقال: "إِنَّ الله يأمُرُك أن تَدعُوَ بهؤلاءِ الكلماتِ، فإنه مُعطيكَ إحداهُنّ: اللهمَّ إني أسألُك تَعجيلَ عافيَتِك، وصَبرًا على بَليّتِك، أو خُروجًا من الدنيا إلى رَحمتِك" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জিবরাঈল (আঃ) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ আপনাকে এই বাক্যগুলো দিয়ে দু'আ করার নির্দেশ দিচ্ছেন। কেননা তিনি আপনাকে সেগুলোর মধ্যে যেকোনো একটি অবশ্যই দান করবেন: হে আল্লাহ, আমি আপনার কাছে আপনার দ্রুত আরোগ্য (বা নিরাপত্তা) চাই, এবং আপনার পরীক্ষার (বিপদাপদের) ওপর ধৈর্য, অথবা দুনিয়া থেকে আপনার রহমতের দিকে প্রস্থান।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف، عمرو بن أبي سلمة - وهو التِّنِّيسي الدمشقي، وإن كان لا بأس به - روى عن زهير بن محمد التميمي مناكير، فيما قاله أحمد والنسائي، على أنَّ زهيرًا نفسَه أحاديثُ أهل الشام عنه غير مستقيمة، لأنه لما نزل الشام حدثهم من حفظه، فكثر غلطُه.وأخرجه ابن حبان (922) من طريق عبد الرحمن بن إبراهيم المعروف بدُحيم، عن عمرو بن أبي سلمة، بهذا الإسناد. وحديثُ عائشة الآتي أيضًا برقم (1962)، وهو حسنٌ إن شاء الله.وحديثُ سَعْد بن زُرارة عند الطبراني في "الدعاء" (1448)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 12/ 175، وإسنادُه صحيح إن كان محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان أدرك سَعْد بن زُرارة.وحديثُ عبد الله بن الشِّخِّير عند البزار (2294)، وضياء الدين المقدسي في "المختارة" 9/ (464)، وإسناده حسنٌ في المتابعات والشواهد.ومرسلُ عروة بن الزبير عند معمر بن راشد في "جامعه" (19640) ورجاله ثقات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1939)


1939 - أخبرنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا أبو جعفر محمد بن عبد الله بن سليمان، حدثنا العلاء بن عمرو الحَنَفي، حدثنا عبد الرحمن بن محمد المُحارِبي، حدثنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هُريرة، قال: كان مِن دُعاءِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم: "اللهمَّ أمتِعْني بسَمْعي وبَصَري، واجعلهُما الوارثَ مني، وانصُرني على مَن ظَلَمَني، وأرِني فيه ثَأْري" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দু‘আসমূহের মধ্যে ছিল: “হে আল্লাহ! আপনি আমাকে আমার শ্রবণশক্তি ও দৃষ্টিশক্তি দ্বারা উপকৃত করুন (বা, সুস্থ রাখুন)। আর সে দুটিকে আমার উত্তরাধিকারী করুন (অর্থাৎ, আমার শেষ দিন পর্যন্ত যেন অক্ষুণ্ণ থাকে)। এবং যে আমার প্রতি যুলম করেছে, তার ওপর আমাকে সাহায্য করুন। আর তার মধ্যে আমাকে আমার প্রতিশোধ দেখিয়ে দিন।”




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم غير العلاء بن عمرو الحَنَفي، فقد اختُلف فيه اختلافًا بيِّنًا بين مُوثِّق ومُضعِّف، وأقرب أحواله أنه يُقبل في المتابعات والشواهد، وقد تابعه حماد بن سلمة فيما سيأتي عند المصنف برقم (2662) وإسناده حسن، لأنَّ محمد بن عمرو - وهو ابن علقمة الليثي - حسنُ الحديث، وللحديث شواهد يصحُّ بها.وأخرجه الترمذي (3604/ 7) من طريق جابر بن نوح، عن محمد بن عمرو، به. وقال: حديث حسن غريب من هذا الوجه.ويشهد له حديث علي بن أبي طالب الآتي عند المصنف برقم (1954)، ورجاله لا بأس بهم غير أنَّ فيه انقطاعًا.وحديثُ ابن عمر الآتي كذلك برقم (1955)، وهو حديث حسن. وحديثُ عائشة الآتي أيضًا برقم (1962)، وهو حسنٌ إن شاء الله.وحديثُ سَعْد بن زُرارة عند الطبراني في "الدعاء" (1448)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 12/ 175، وإسنادُه صحيح إن كان محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان أدرك سَعْد بن زُرارة.وحديثُ عبد الله بن الشِّخِّير عند البزار (2294)، وضياء الدين المقدسي في "المختارة" 9/ (464)، وإسناده حسنٌ في المتابعات والشواهد.ومرسلُ عروة بن الزبير عند معمر بن راشد في "جامعه" (19640) ورجاله ثقات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (1940)


1940 - أخبرنا بكر بن محمد الصَّيرفي بمَرْو، حدثنا عبد الصمد بن الفَضْل، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا سعيد بن أبي أيّوب، حدثني عبد الله بن الوليد، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن حُجَيرة، عن أبيه، عن أبي هريرة: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أَوصَى سلمانَ الخَير، فقال: "يا سلمانُ، إنَّ رسولَ الله يريدُ أن يَمنحَك كلماتٍ تسألُهُن الرحمنَ، وترغبُ إليه فيهنّ، وتدعُو بهنّ في الليل والنهار، قُل: اللهمَّ إني أسألُك صحةً في إيمانٍ، وإيمانًا في حُسن خُلُق، ونجاحًا يتبعه فَلاحٌ، ورحمةً منك وعافيةً، ومغفرةً منك ورِضوانًا" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালমান আল-খায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে উপদেশ দিয়েছিলেন। তিনি বললেন: "হে সালমান! নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাকে এমন কিছু বাক্য দান করতে চান, যা দিয়ে তুমি দয়াময় (আল্লাহ)-এর কাছে প্রার্থনা করবে, সেগুলোর মাধ্যমে তাঁর কাছে আগ্রহ প্রকাশ করবে এবং রাত-দিনে সেগুলোর দ্বারা দু'আ করবে। তুমি বলো: 'হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে এমন সুস্থতা চাই যা ঈমানের সাথে থাকে; এমন ঈমান চাই যা উত্তম চরিত্রের সাথে থাকে; এমন সফলতা চাই যার পরে মুক্তি আসে; তোমার পক্ষ থেকে রহমত ও নিরাপত্তা চাই; এবং তোমার পক্ষ থেকে ক্ষমা ও সন্তুষ্টি চাই'।"




تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] إسناده ضعيف من أجل عبد الله بن الوليد - وهو التُّجِيبي - فهو ليِّن الحديث كما قال الحافظ في "التقريب"، وقد اختُلف في إسناده كذلك فمرة يرويه عبد الله بن الوليد، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن حُجيرة، عن أبيه، عن أبي هريرة، ومرة يرويه عن عبد الرحمن بن حُجيرة مباشرة، عن أبي هريرة، والوهم في ذلك فيما يغلب على الظن من جهة عبد الله بن الوليد نفسِه، والله أعلم.وأخرجه البيهقي في "الدعوات الكبير" (225) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (9765) عن محمد بن عبد الله بن يزيد المقرئ، و (10329) عن عبيد الله بن فضالة، والطبراني في "الأوسط" (9333) عن هارون بن ملول، ثلاثتهم عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، به.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (327)، وأحمد بن حنبل في "مسنده" 14/ (8272) كلاهما عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، عن سعيد بن أبي أيوب، عن عبد الله بن الوليد، عن عبد الرحمن بن حُجيرة - كذلك قُيّد في رواية ابن راهويه، وفي رواية أحمد: عن ابن حُجيرة عن أبي هريرة، وبين وفاة عبد الرحمن بن حُجيرة ووفاة عبد الله بن الوليد نحو ثمانية وأربعين سنةً. وربما روى عبدُ الله بن الوليد عن عبد الرحمن بن حُجيرة عن أبيه، فكأنه كان أحيانًا يقلب اسم عبد الله بن عبد الرحمن بن حُجيرة إلى عبد الرحمن بن حُجيرة، ويقصد الابنَ لا الأب، والله أعلم.