আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
2041 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مِهْران، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا يونس بن أبي إسحاق، عن بُرَيد بن أبي مريم، عن أنس بن مالك، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن صلَّى عليَّ صلاةً، صلَّى اللهُ عليه عشرَ صلَواتٍ، وحَطَّ عنه عشرَ خَطِيئاتٍ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "যে ব্যক্তি আমার উপর একবার দরূদ পড়ে, আল্লাহ তার উপর দশটি রহমত নাযিল করেন এবং তার দশটি গুনাহ মোচন করে দেন।"
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق - واسم أبي إسحاق عمرو بن عبد الله السَّبيعي - وقد تابعه أبوه.وأخرجه أحمد 19/ (11998) و 21/ (13754)، والنسائي (1221) و (9807) و (10122 - 10124)، وابن حبان (904) من طرق عن يونس بن أبي إسحاق، به. زاد بعضهم: "ورفعت له - أو ورفعه بها عشر درجات".وأخرجه النسائي (9808) من طريق مخلد بن يزيد، عن يونس بن أبي إسحاق، عن بُريد بن أبي مريم، عن الحسن البصري، عن أنس. فزاد في إسناده الحسن البصري بين بُريد وأنس، مع أنَّ بُريدًا سمع من أنس عدة أحاديث، وقد صرَّح بسماعه منه هذا الحديثَ بعينه في بعض طُرقه، فالظاهر أنه سمع الحديث أولًا بواسطة الحسن البصري، ثم التقى بأنس فسمعه منه مباشرة، فكان بُريد يحدِّث به على الوجهين، وإلّا فالإسناد بدون ذكر الحسن البصري متصلٌ كما يفيده قول ابن القيم في "جلاء الأفهام" ص 66. وقد تابع يونسَ على روايته على بُريد عن أنس مباشرةً أبوه أبو إسحاق عند أبي يعلى في "مسنده" (3681) بإسناد صحيح إليه.وأما الضياء المقدسي في "مختارته" (1567) فرجَّح رواية بُريد عن أنس مباشرة لتصريحه بالسماع منه.
2042 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا جَدّي، حدثنا إسماعيل بن أبي أُويس، حدثنا سُليمان بن بلال، حدثني عَمرو بن أبي عَمرو، عن عاصم بن عمر بن قَتادة، عن عبد الواحد بن محمد بن عبد الرحمن بن عَوف، عن عبد الرحمن بن عَوف، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إني لَقِيتُ جبريلَ عليه السلام فبَشَّرني، وقال: إنَّ ربّك يقول لك: من صَلَّى عليكَ صَلَّيتُ عليه، ومن سَلَّم عليكَ سلَّمْتُ عليه، فسجدتُ لله شُكرًا" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.آخر كتاب الدعوات
আব্দুর রহমান ইবনে আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমি জিবরাঈল (আঃ)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম। তিনি আমাকে সুসংবাদ দিলেন এবং বললেন, ‘নিশ্চয় আপনার রব আপনাকে বলছেন: যে আপনার উপর সালাত (দরূদ) পাঠ করবে, আমি তার উপর সালাত (রহমত) বর্ষণ করব। আর যে আপনার উপর সালাম পাঠ করবে, আমি তার উপর সালাম পাঠ করব।’ সুতরাং আমি আল্লাহর শুকরিয়াস্বরূপ সিজদা করলাম।
تحقيق الشيخ د. أحمد برهوم:
[1] حديث حسن إن شاء الله بمجموع طرقه على خلاف في إسناده كما هو مبيَّن في التعليق على الحديث في "مسند أحمد"، وفي "علل الدارقطني" (577).وأخرجه أحمد 3/ (1664) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، عن سليمان بن بلال، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم عند المصنِّف برقم (905) من طريق يزيد بن الهاد عن عمرو بن أبي عمرو عن عبد الرحمن بن الحويرث عن محمد بن جُبير بن نُفير عن عبد الرحمن بن عوف.
2043 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا حَجَّاج بن محمد.وحدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا أبو المثنَّى العَنبَري، حدثنا يحيى بن مَعِين، حدثنا حجّاج، قال: قال ابن جُرَيج: أخبرني أَبي، أنَّ سعيد بن جُبير أخبره قال: {وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ سَبْعًا مِنَ الْمَثَانِي} [الحجر: 87]، قال: هي أمُّ القرآن، قال أَبي: وقرأها عليَّ سعيدُ بن جُبير: "بسم الله الرحمن الرحيم" الآيةُ السابعة، قال سعيد بن جبير: وقرأَها عليَّ ابنُ عباس [1] كما قرأتُها عليك، ثم قال: "بسم الله الرحمن الرحيم" الآيةُ السابعة، قال ابن عباس: فأخرجَها الله لكم، وما أخرجَها لأحدٍ قبلَكم [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد رواه عبد الله بن المبارَك، ومحمد بن بكر البُرْساني، وعبد الرزاق بن همّام، وحفص بن غياث وعثمان بن عُمر [3]، وعبد المجيد بن عبد العزيز، عن ابن جُرَيج بألفاظ مختلفة.أما حديث عبد الله بن المبارَك:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আল্লাহর বাণী) {وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ سَبْعًا مِنَ الْمَثَانِي} (আল-হিজর: ৮৭) সম্পর্কে সাঈদ ইবনে জুবাইর বলেন, এটি হলো উম্মুল কুরআন (আল-ফাতিহা)। [ইবনে জুবাইরের] পিতা বলেন: সাঈদ ইবনে জুবাইর আমার নিকট তা তিলাওয়াত করে শোনালেন, [আর বললেন:] “বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম” হলো সপ্তম আয়াত। সাঈদ ইবনে জুবাইর বলেন: ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার নিকট এটি তিলাওয়াত করে শোনালেন, যেমন আমি আপনার নিকট তিলাওয়াত করলাম, অতঃপর বললেন: “বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম” হলো সপ্তম আয়াত। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহ এটি তোমাদের জন্য প্রকাশ করেছেন, তোমাদের পূর্বে অন্য কারো জন্য তা প্রকাশ করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في النسخ الخطية: وقرأها علي أبي، وهو خطأ، والتصويب من "تلخيص الذهبي" و"الشعب" للبيهقي. وأخرجه الطبري في "تفسيره" 14/ 55، والضياء 10/ (238) من طريق سفيان الثَّوري، الطبري 14/ 55 من طريق يحيى بن سعيد الأموي، ومن طريق عبد الله بن وهب، والطحاوي في "مشكل الآثار" 3/ 244، وفي "معاني الآثار" 1/ 200 من طريق أبي عاصم الضحاك بن مخلد، والضياء 10/ (239) من طريق حماد بن زيد خمستهم عن ابن جُرَيج، به.وله طرق أخرى سيخرجها الحاكم بعد هذه الطريق.وقد صحَّ أنَّ السبع المثاني هي سورة الفاتحة عن غير ابن عباس، كما في حديث أبي سعيد بن المعلّى عند البخاري (4474)، وحديث أُبي بن كعب الآتي برقم (2071).
[2] إسناده ضعيف لضعف عبد العزيز بن جُرَيج والد ابن جُرَيج المذكور - واسمه عبد الملك - وقد انفرد بهذا الخبر عن ابن عباس، وخالفه غيره كما سيأتي برقم (3393)، فرووه عن سعيد بن جبير عن ابن عباس: أنَّ السبع المثاني هي السبع الطُّوَل، وكذلك رواه مجاهد عن ابن عباس. وجاء في بعض الطرق عن سعيد بن جبير تفسير الطُّوَل بأنها: البقرة، وآل عمران، والنساء، والمائدة، والأنعام، والأعراف، ويونس، وعند الحاكم (3393) ذكر سورة الكهف بدل: يونس.أبو المثنى العنبري: هو معاذ بن المثنَّى، وحجاج بن محمد: هو المِصِّيصي الأعور.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (2117) عن أبي عبد الله الحاكم وآخرين، عن أبي العباس، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو عُبيد القاسم بن سلّام في "فضائل القرآن" ص 222، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (1210)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 2/ 44، وابن عبد البر في "الإنصاف" ص 277، وضياء الدين المقدسي في "الأحاديث المختارة" 10/ (239) و (240) من طرق عن حجاج بن محمد، به. وأخرجه الطبري في "تفسيره" 14/ 55، والضياء 10/ (238) من طريق سفيان الثَّوري، الطبري 14/ 55 من طريق يحيى بن سعيد الأموي، ومن طريق عبد الله بن وهب، والطحاوي في "مشكل الآثار" 3/ 244، وفي "معاني الآثار" 1/ 200 من طريق أبي عاصم الضحاك بن مخلد، والضياء 10/ (239) من طريق حماد بن زيد خمستهم عن ابن جُرَيج، به.وله طرق أخرى سيخرجها الحاكم بعد هذه الطريق.وقد صحَّ أنَّ السبع المثاني هي سورة الفاتحة عن غير ابن عباس، كما في حديث أبي سعيد بن المعلّى عند البخاري (4474)، وحديث أُبي بن كعب الآتي برقم (2071).
2043 [3] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عمرو، بزيادة الواو، وإنما هو عثمان بن عُمر بن فارس العَبْدي. وأخرجه البيهقي 2/ 47 عن أبي عبد الله الحاكم، بالإسنادين جميعًا.وأخرجه ابن الضُّريس في "فضائل القرآن" (159) عن سهل بن عثمان، عن ابن المبارك، به. لكن دون ذكر البسملة. وانظر ما قبله.
2044 - فأخبرَناه الحسنُ بن حَلِيم المروَزي، أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله.وحدثنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى، حدثنا أحمد بن محمد بن حُرَيث، حدثنا سعيد بن يعقوب الطّالْقاني، حدثنا عبد الله بن المبارَك، عن ابن جُرَيج، عن أبيه، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس، في السَّبع المَثَاني، قال: هنَّ فاتحةُ الكتاب. قرأَها ابنُ عباس ببِسْم الله الرحمن الرحيم سبعًا، قال ابن جُرَيج: فقلت لأبي: أخبرك سعيد بن جُبير عن ابن عباس أنه قال: "بسم الله الرحمن الرحيم" آيةٌ من كتاب الله؟ قال: نعم، ثم قال: قرأها ابن عباس ببسم الله الرحمن الرحيم في الركعتين جميعًا [1]. وأما حديث محمد بن بَكْر:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, 'সাব'উল মাসানী' (সাতটি পুনরাবৃত্তিমূলক আয়াত) সম্পর্কে তিনি বলেন: এগুলি হলো সূরা ফাতিহা। ইবনে আব্বাস তা (সূরা ফাতিহা) সাতবার بِسْمِ اللهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ (বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম) সহ পাঠ করতেন। ইবনে জুরাইজ বলেন: আমি আমার পিতাকে জিজ্ঞেস করলাম: সাঈদ ইবনে জুবাইর কি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর বরাতে আপনাকে জানিয়েছিলেন যে, "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম" আল্লাহর কিতাবের একটি আয়াত? তিনি (পিতা) বললেন: হ্যাঁ। এরপর তিনি বললেন: ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উভয় রাকাআতেই "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম" সহ তা পাঠ করতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف كسابقه، وأحمد بن محمد بن حريث هو السجستاني، وهو واهٍ. وأخرجه البيهقي 2/ 47 عن أبي عبد الله الحاكم، بالإسنادين جميعًا.وأخرجه ابن الضُّريس في "فضائل القرآن" (159) عن سهل بن عثمان، عن ابن المبارك، به. لكن دون ذكر البسملة. وانظر ما قبله.
2045 - فحدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق، حدثنا محمد بن بكر البُرْساني.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حَنبَل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن بكر، أخبرنا ابن جُرَيج، أخبرني أَبي، أنَّ سعيد بن جُبير أخبره، أنَّ ابن عباس قال: {وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ سَبْعًا مِنَ الْمَثَانِي وَالْقُرْآنَ الْعَظِيمَ}، قال: وقرأها عليَّ سعيد بن جُبير ببسم الله الرحمن الرحيم، حِين خَتَمها، وقال: "بسم الله الرحمن الرحيم" الآيةُ السابعة، قال: وقال لي سعيد بن جُبير: قد أخرجَها اللهُ لكم، فما أخرجها لأحد قبلَكم [1].وأما حديث عبد الرزاق:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আল্লাহর বাণী): {আর আমি তো তোমাকে দিয়েছি বারবার পঠিতব্য সাতটি আয়াত এবং সুমহান কুরআন} প্রসঙ্গে বলেন, সাঈদ ইবনু জুবাইর আমার নিকট 'বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম' সহ তা পাঠ করলেন যখন তিনি তা সমাপ্ত করলেন। তিনি বললেন, “বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম” হলো সপ্তম আয়াত। তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন, সাঈদ ইবনু জুবাইর আমাকে বললেন: আল্লাহ তোমাদের জন্য তা (সাতটি আয়াত) প্রদান করেছেন, তোমাদের পূর্বে অন্য কাউকে তা প্রদান করেননি। আর আব্দুর রাযযাকের হাদীস প্রসঙ্গে...
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف كما تقدم بيانه.وأخرجه الطحاوي في "مشكل الآثار" 3/ 244 عن إبراهيم بن مرزوق بهذا الإسناد.
2046 - فحدَّثَناه أبو الوليد الفقيه، حدثنا جعفر بن محمد وعبد الله بن شِيرَوَيهِ قالا: حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جُرَيج، عن أبيه، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس: {وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ سَبْعًا مِنَ الْمَثَانِي}، قال: فاتحةُ الكتاب، ثم قال: {بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ (1) الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ}، فقلت لأبي: فقد أخبرك سعيدٌ أنَّ ابن عباس قال: "بسم الله الرحمن الرحيم" آيةٌ؟ قال: نعم [1]. وأما حديث حفص بن غِيَاث:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তা'আলার বাণী: "নিশ্চয়ই আমি আপনাকে সাতটি পুনরাবৃত্ত আয়াত (সাব'আ মিনাল মাসানি) দিয়েছি।" (সূরা হিজর, ১৫:৮৭)। তিনি বলেন: এটি হলো ফাতিহাতুল কিতাব (সূরা ফাতিহা)। এরপর তিনি বললেন: "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম। (১) আল-হামদু লিল্লাহি রাব্বিল আলামীন।" আমি আমার পিতাকে বললাম: সা'ঈদ কি আপনাকে জানিয়েছেন যে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম" একটি আয়াত? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আর হাফস ইবনু গিয়াসের হাদীসের ব্যাপারে...
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف كما تقدم.وهو في "مصنف عبد الرزاق" (2609)، وفي "تفسيره" 1/ 350، ومن طريقه أخرجه ابن المنذر في "الأوسط" (1346).
2047 - [فحدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبّار، حدثنا حفص بن غِياث. وحدثنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا أحمد بن سَلَمة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، حدثنا حفص بن غِياث] [1] عن ابن جُرَيج، عن أبيه، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس في قوله تعالى: {وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ سَبْعًا مِنَ الْمَثَانِي}، قال: فاتحةُ الكتاب، قيل لابن عباس: فأين السابعةُ؟ قال: "بسم الله الرحمن الرحيم" [2].وأما حديث عثمان بن عُمر:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী: {আর আমি তোমাকে দিয়েছি বারবার পঠিতব্য সাতটি আয়াত} সম্পর্কে তিনি বলেন, তা হলো সূরা ফাতিহা (ফাতিহাতুল কিতাব)। ইবনে আব্বাসকে জিজ্ঞাসা করা হলো: তবে সপ্তম আয়াতটি কোনটি? তিনি বললেন: তা হলো, "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম"। আর উসমান ইবনে উমারের হাদিস সম্পর্কে...
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر (7366)، وسيأتي مكررًا من طريق أبي العباس برقم (3055).
[2] إسناده ضعيف كما سبق.وأخرجه البيهقي 2/ 45 عن أبي عبد الله الحاكم وأبي سعيد بن أبي عمرو، كلاهما عن أبي العباس محمد بن يعقوب، بهذا الإسناد.
2048 - فأخبرَناه أبو بكر أحمد بن سلْمان الفقيه ببغداد، حدثنا الحسن بن مُكْرَم، حدثنا عثمان بن عمر، أخبرنا ابن جُرَيج، عن أبيه، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس، في قوله: "السَّبْعُ المَثَاني" قال: عدَّها عليَّ في يدي: {بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ (1) الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ (2) الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ (3) مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ (4) إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ (5) اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ (6) صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ (7)}، ثم قال: أخرجَها اللهُ لكم، فما أخرجَها لِغَيركم [1].وأما حديث عبد المجيد:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহ তাআলার বাণী, "আস-সাবউল মাসানী" (সাতটি পুনঃপুনঃ পঠিতব্য আয়াত) সম্পর্কে বলেন: তিনি আমার হাতে গুনে দেখালেন: {বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহিম (১) আল-হামদু লিল্লাহি রাব্বিল আলামীন (২) আর-রাহমানির রাহীম (৩) মালিকি ইয়াওমিদ দীন (৪) ইয়্যাকা না'বুদু ওয়া ইয়্যাকা নাসতা'ঈন (৫) ইহদিনাস সিরাত্বাল মুসতাকীম (৬) সিরাত্বাল লাযীনা আন'আমতা 'আলাইহিম গাইরিল মাগদূবি 'আলাইহিম ওয়ালাদ্ দ্বাল্লীন (৭)}। এরপর তিনি বললেন: আল্লাহ এটি তোমাদের জন্য প্রকাশ করেছেন, তোমাদের ব্যতীত অন্য কারও জন্য এটি প্রকাশ করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف كما سبق.
2049 - فأخبرَنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا الربيع بن سليمان، أخبرنا الشافعي، أخبرنا عبد المجيد، عن ابن جُرَيج، أخبرني أبي، عن سعيد بن جبير، {وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ سَبْعًا مِنَ الْمَثَانِي}، قال: هي أمُّ القرآن، قال أبي: وقرأها عليَّ سعيد بن جبير حين خَتَمها، ثم قال: "بسم الله الرحمن الرحيم" السابعةُ، قال ابن عباس: وقد ادَّخَرها الله لكم، فما أخرجَها لأحدٍ قبلَكم [1].
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর বাণী, "{আর অবশ্যই আমরা আপনাকে দিয়েছি বার বার পঠিত সাতটি আয়াত (সাব'আন মিনাল মাছানী)}" প্রসঙ্গে সাঈদ ইবনে জুবাইর (রহ.) বলেছেন: তা হলো উম্মুল কুরআন (সূরা ফাতিহা)। আমার পিতা বললেন: সাঈদ ইবনে জুবাইর যখন এটি (সূরা) শেষ করলেন, তখন তিনি আমার কাছে তা পাঠ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম" হলো সপ্তম আয়াত। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আল্লাহ এটি তোমাদের জন্য সংরক্ষণ করেছেন এবং তোমাদের আগে অন্য কারও জন্য তিনি তা প্রকাশ করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف كسابقه.وهو في "الأم" للشافعي 1/ 129، ومن طريقه أخرجه البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (3044)، والواحدي في "التفسير الوسيط" 1/ 59، والبَغَوي في "شرح السنة" (580).
2050 - حدثني جعفر بن محمد بن الحارث، أخبرنا علي بن أحمد بن سليمان المصري، حدثنا جعفر بن مُسافر التِّنِّيسي، حدثنا زيد بن المبارك الصنعاني، حدثنا سلّام بن وهب الجَنَدي، حدثني أبي، عن طاووس، عن ابن عباس: أنَّ عثمان بن عفّان سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن "بسم الله الرحمن الرحيم"، فقال: "هو اسمٌ من أسماء الله، وما بينَه وبينَ اسمِ الله الأكبر، إلَّا كما بين سَوَادِ العين وبياضِها من القُرْب" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. أخبار في فضائل القرآن جملة
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে 'বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম' সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলেন। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি আল্লাহর নামসমূহের মধ্য থেকে একটি নাম। আর এর (এই নাম) এবং আল্লাহর ইসমে আযমের (মহানতম নাম) মধ্যে নৈকট্য কেবল ততটুকুই, যতটুকু চোখের কালো অংশ এবং সাদা অংশের মধ্যে (নৈকট্য) থাকে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، سلام بن وهب الجَنَدي وأبوه مجهولان، وقال أبو حاتم الرازي عن هذا الحديث كما في "العلل" لابنه (2029): حديث منكر. وقال العقيلي في ترجمة سلام من "الضعفاء" 2/ 193: لا يُتابع على حديثه هذا ولا يُعرف إلَّا به. وقال الذهبي في خبره هذا في ترجمته من "المغني": موضوع لا يُعرف.وأخرجه العقيلي (624)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 1/ 25 و 1/ 2714، والبيهقي في "شعب الإيمان" (2123) من طريق جعفر بن مسافر، بهذا الإسناد. إلَّا أنه وقع في رواية العقيلي: سلام بن وهب عن ابن طاووس عن أبيه عن ابن عباس.وأخرجه الخطيب في "تاريخه" 8/ 274، ومن طريقه الذهبي في "الميزان" 2/ 182 من طريق جعفر بن محمد القلانسي، عن زيد بن المبارك؛ كرواية العقيلي.
2051 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا يحيى بن عثمان بن صالح السَّهْمي، حدثنا عمرو بن الربيع بن طارق، حدثنا يحيى بن أيوب، حدثنا خالد بن أبي يزيد، عن ثَعلَبة بن يزيد، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من قرأ القرآنَ فقد استَدرَجَ النبوَّةَ بين جنبَيهِ غيرَ أنه لا يُوحَى إليه، لا ينبغي لصاحبِ القرآن أن يَحِدَّ مع مَن حَدَّ [1]، ولا يَجهَلَ مع من جَهِل، وفي جوفِه كلامُ الله" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কুরআন পাঠ করে, সে নবুওয়াতকে তার দুই পাঁজর বা শরীরের মধ্যে স্থান করে নেয়, তবে তার নিকট ওহী আসে না। কুরআন পাঠকের জন্য শোভনীয় নয় যে, যে ব্যক্তি কঠোরতা করে সেও তার সাথে কঠোরতা করবে, আর যে ব্যক্তি মূর্খতা করে সেও তার সাথে মূর্খতা করবে, অথচ তার উদরে (অন্তরে) রয়েছে আল্লাহর বাণী।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تصحف في (ز) و (ب) إلى: يجدّ مع من جدَّ، بالجيم بدل الحاء، وإنما هي بالحاء، بمعنى: يغضب مع من غضب. فقد أخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "تخريج أحاديث الكشاف" للزيلعي 2/ 217، ومحمد بن نصر المروَزي في قيام الليل كما في "مختصره" لتقي الدين المقريزي ص 175، والطبراني في "الكبير" (14575) من طريق عيسى بن يونس، والطبراني أيضًا من طريق يحيى بن أبي الحجاج التميمي، كلاهما عن إسماعيل بن رافع، عن إسماعيل بن عُبيد الله بن أبي المهاجر، عن عبد الله بن عمرو بن العاص مرفوعًا.وأخرجه ابن المبارك في "الزهد" (799) عن إسماعيل بن رافع وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 467، وابن الضُّريس في "فضائل القرآن" (65)، والخطيب في "الفقيه والمتفقه" (196) من طريق وكيع، عن إسماعيل بن رافع، كلاهما (ابن المبارك ووكيع) روياه عنه موقوفًا.وإسماعيل بن رافع ضعيف، وإسماعيل بن عبيد الله كان سنُّه يوم توفي عبد الله بن عمرو أربع سنين على صحيح الأقوال في وفاة عبد الله بن عمرو سنة خمس وستين، فلم يسمع منه. وعلى تقدير صحة سماعه منه جدلًا تترجح رواية الوقف، فقد رواه أبو رجاء مُحرز بن عبد الله الشامي عن إسماعيل بن عُبيد الله أبي المهاجر عن عبد الله بن عمرو موقوفًا، أخرجه من طريقه البيهقي في "الشعب" (2352)، ومحرز صدوق.
[2] حسن موقوفًا، فقد خالف يحيى بنَ عثمان بن صالح فيه أبو عبيد القاسم بن سلّام، فرواه عن عمرو بن الربيع بن طارق موقوفًا، وكذلك رواه عبد الله بن وهب عن يحيى بن أيوب - وهو الغافقي - موقوفًا.ثعلبة بن يزيد - وهو ثعلبة بن أبي الكَنود، وقيل: ثعلبة أبو الكنود - روى عنه عبد الله بن سليمان الطويل وسليمان بن أبي زينب وخالد بن يزيد - وليس ابن أبي يزيد كما وقع عند الحاكم - الجمحي المصري، وذكره ابن حبان في "الثقات".وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (2353) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو عُبيد القاسم بن سلّام في "فضائل القرآن" ص 113 عن عمرو بن الربيع بن طارق، به موقوفًا على عبد الله بن عمرو.وأخرجه كذلك موقوفًا أبو بكر الآجُرِّي في "أخلاق أهل القرآن" (13)، ومن طريقه أبو الفضل الرازي المقرئ في "فضائل القرآن" (52) عن أبي بكر بن أبي داود، عن أبي طاهر، عن عبد الله بن وهب، عن يحيى بن أيوب الغافقي، به. وهذا الإسناد إلى يحيى أقوى من إسناد الحاكم إليه، ولهذا قال الحافظ في "إتحاف المهرة" (11634) وأورد رواية أبي بكر بن أبي داود هذه: فظهرت علّة الخبر؛ يعني خبر الحاكم وأنَّ الرفع فيه مُعَلٌّ.وقد رواه أيضًا إسماعيل بن رافع عن إسماعيل بن عبيد الله بن أبي المهاجر عن عبد الله بن عمرو، واختُلف عليه: فقد أخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "تخريج أحاديث الكشاف" للزيلعي 2/ 217، ومحمد بن نصر المروَزي في قيام الليل كما في "مختصره" لتقي الدين المقريزي ص 175، والطبراني في "الكبير" (14575) من طريق عيسى بن يونس، والطبراني أيضًا من طريق يحيى بن أبي الحجاج التميمي، كلاهما عن إسماعيل بن رافع، عن إسماعيل بن عُبيد الله بن أبي المهاجر، عن عبد الله بن عمرو بن العاص مرفوعًا.وأخرجه ابن المبارك في "الزهد" (799) عن إسماعيل بن رافع وأخرجه ابن أبي شيبة 10/ 467، وابن الضُّريس في "فضائل القرآن" (65)، والخطيب في "الفقيه والمتفقه" (196) من طريق وكيع، عن إسماعيل بن رافع، كلاهما (ابن المبارك ووكيع) روياه عنه موقوفًا.وإسماعيل بن رافع ضعيف، وإسماعيل بن عبيد الله كان سنُّه يوم توفي عبد الله بن عمرو أربع سنين على صحيح الأقوال في وفاة عبد الله بن عمرو سنة خمس وستين، فلم يسمع منه. وعلى تقدير صحة سماعه منه جدلًا تترجح رواية الوقف، فقد رواه أبو رجاء مُحرز بن عبد الله الشامي عن إسماعيل بن عُبيد الله أبي المهاجر عن عبد الله بن عمرو موقوفًا، أخرجه من طريقه البيهقي في "الشعب" (2352)، ومحرز صدوق.
2052 - أخبرني عبد الله بن محمد بن علي بن زياد العَدْل، حدثنا محمد بن إسحاق الإمام، حدثنا عبد الوارث بن عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثنا أبي، حدثنا شُعبة، عن عاصم عن ذَكْوان، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "يجيءُ صاحبُ القرآن يومَ القيامة فيقول القرآنُ: يا ربِّ، حَلِّهِ، فيُلبَسُ تاجَ الكَرامة، ثم يقول: يا ربِّ، زِدْهُ، يا ربِّ، ارْضَ عنه، فيَرضى عنه، ويقال له: اقرَهْ وارقَهْ، ويُزادُ بكل آيةٍ حسنةً" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "কিয়ামতের দিন কুরআন-পাঠকারী (সাহিবুল কুরআন) আগমন করবে। তখন কুরআন বলবে: হে রব! তাকে ভূষিত করুন। ফলে তাকে সম্মানের মুকুট পরানো হবে। অতঃপর কুরআন বলবে: হে রব! তাকে আরো বৃদ্ধি করে দিন। হে রব! তার প্রতি সন্তুষ্ট হোন। ফলে আল্লাহ তার প্রতি সন্তুষ্ট হবেন। এবং তাকে বলা হবে: তুমি পাঠ করতে থাকো ও (জান্নাতের স্তরে) আরোহণ করতে থাকো। আর প্রতিটি আয়াতের বিনিময়ে তাকে একটি করে নেকি বাড়িয়ে দেওয়া হবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل عاصم - وهو ابن أبي النجود، المعروف بابن بَهْدلة - وقد اختُلف عليه في رفع هذا الحديث ووقفه، ورجَّح الموقوفَ الترمذيُّ وصوَّبه الدارقطني، ولكنه على تسليم رُجحان الوقف له حكم المرفوع، كما قال الحافظ في ترجمة أبي توبة أحمد بن سالم العسقلاني من "لسان الميزان". ذكوان: هو أبو صالح السمان.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (1841) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار في "مسنده" (9035)، وضياء الدين المقدسي في "فضائل القرآن" (14) من طريق عبد الوارث بن عبد الصمد، به. لكن ما جاء في رواية البيهقي: "ويُزاد بكل آية حُلَّتين"، بدل: "حسنة".وأخرجه الترمذي (2915) عن نصر بن علي الجهضمي، والبزار (9036) عن بشر بن آدم، كلاهما عن عبد الصمد بن عبد الوارث، به. وقال الترمذي: حديث حسن.وأخرجه أبو نُعيم في "حلية الأولياء" 7/ 206، ومن طريقه الجورقاني في "الأباطيل والصحاح" (687) من طريق أبي قتيبة سَلْم بن قتيبة، عن شعبة، به، نحوه إلَّا أنه قال في آخره: "يا رب ارض عنه، فيرضى عنه، فليس بعد رضا الله شيء"، ولم يقل: ويقال له: اقره وارقه … " إلى آخره.وقد خالف عبدَ الصمد وسَلْمَ بن قتيبة في رفعه حجاجُ بن محمد ومحمدُ بن جعفر، فروياه عن شعبة موقوفًا:فقد أخرجه أبو عبيد القاسم في "فضائل القرآن" ص 83 عن حجاج بن محمد، والترمذي (2915)، والبيهقي في "الشعب" (1842) من طريق محمد بن جعفر، كلاهما عن شعبة، به موقوفًا. وقال الترمذي: هذا أصح عندنا من حديث عبد الصمد عن شعبة.وكذلك رواه زائدة بن قدامة وزيد بن أبي أُنيسة عن عاصم موقوفًا:فقد أخرجه ابن أبي شيبة 10/ 495، وابن الضُّريس في "فضائل القرآن" (101) و (109)، والجورقاني في "الأباطيل الصحاح" (689) من طريق زائدة بن قدامة، والدارمي (3354) من طريق زيد بن أبي أنيسة، كلاهما عن عاصم به موقوفًا. قال الدارقطني في "العلل" 10/ 158: وهو الصواب.وأخرج ابن أبي شيبة 10/ 498، وأحمد 16/ (10087)، وابن الضُّريس (110)، والبيهقي (1840) من طريق وكيع، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة أو عن أبي سعيد - شك الأعمش - قال: يقال لصاحب القرآن يوم القيامة: اقرأ وارقَ، فإنَّ منزلتك عند آخر آية تقرؤها. هكذا روى منه هذه الجملة، موقوفةً، وهذا يؤيد رجحان الوقف في حديث الباب، على أنه ثبت رفع هذه الجملة لكن من غير حديث أبي هريرة، كما سيأتي بعده.قوله: "اقْرَهْ وارقَهْ" الهاء فيه هاء السَّكْت.
2053 - حدَّثَناه علي بن عيسى الحِيْري، حدثنا مُسدَّد بن قَطَن، حدثنا عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا وكيع بن الجرّاح عن سفيان، عن عاصم بن أبي النَّجُود، عن زِرِّ بن حُبيش، عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "يُقال لصاحب القرآن يومَ القيامة: اقرَهْ وارقَهْ، ورَتِّل كما كنتَ تُرتِّل، فإنَّ منزلتَك في آخر آيةٍ تقرؤُها" [1].
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কিয়ামতের দিন কুরআনের তিলাওয়াতকারীকে বলা হবে: তুমি তিলাওয়াত করো এবং উপরে আরোহণ করতে থাকো। আর তারতীলের সাথে পাঠ করো, যেমন তুমি দুনিয়াতে তারতীলের সাথে পাঠ করতে। কেননা তোমার স্থান হবে সেই শেষ আয়াতটির কাছে, যা তুমি তিলাওয়াত করবে।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل عاصم بن أبي النجود. سفيان: هو الثَّوري.وأخرجه أحمد 11/ (6799)، والنسائي (8002)، وابن حبان (766) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، وأبو داود (1464) من طريق يحيى بن سعيد القطّان، كلاهما عن سفيان الثَّوري، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.ويشهد له حديث أبي هريرة أو أبي سعيد المذكور في آخر التعليق السابق. لم يذكر فيه ابنَ مسعود.وأخرجه مختصرًا دون قوله: "زاجرا وآمرًا … إلخ" أحمد 7/ (4252)، والنسائي (7930) من طريق فُلفُلة الجُعْفي، عن ابن مسعود موقوفًا عليه من قوله. وفي إسناده لِين.وسيأتي الحديث مرة أخرى عند المصنف برقم (3181) من طريق الحسن بن أحمد بن الليث عن عبد الله بن وهب.
2054 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثنا أبو همَّام، حدثنا ابن وهب، أخبرني حَيوة بن شُريح، عن عُقيل بن خالد، عن سَلَمة بن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبيه، عن ابن مسعود، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "نزل الكتابُ الأولُ من بابٍ واحدٍ على حرفٍ واحدٍ، ونزل القرآنُ من سبعةِ أبواب على سبعة أحرف؛ زاجرًا وآمرًا، وحلالًا وحرامًا، ومُحكَمًا ومُتشابهًا، وأمثالًا، فأَحِلُّوا حلالَه، وحَرِّموا حرامَه، وافعلوا ما أُمرتُم به، وانتَهُوا عما نُهِيتُم عنه، واعتبِروا بأمثاله، واعْمَلُوا بمُحكَمِه، وآمِنُوا بمُتشابِهه، وقولوا: آمنَّا به كلٌّ مِن عند ربِّنا" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রথম কিতাব (ঐশী গ্রন্থসমূহ) একটি মাত্র দরজা ও একটি মাত্র হরফে (পদ্ধতি বা রূপে) নাযিল হয়েছিল। কিন্তু কুরআন সাতটি দরজা ও সাতটি হরফে নাযিল হয়েছে; (যা হলো) ধমক ও আদেশ, হালাল ও হারাম, মুহকাম (সুস্পষ্ট) ও মুতাশাবিহ (অস্পষ্ট/রূপক), এবং আমثال (উপদেশমূলক দৃষ্টান্তসমূহ)। অতএব, তোমরা এর হালালকে হালাল মনে করো, এর হারামকে হারাম মনে করো, যা তোমাদেরকে আদেশ করা হয়েছে তা করো এবং যা থেকে নিষেধ করা হয়েছে তা থেকে বিরত থাকো। এর দৃষ্টান্তসমূহ থেকে শিক্ষা গ্রহণ করো, এর মুহকাম (সুস্পষ্ট বিধান) অনুযায়ী আমল করো, এবং এর মুতাশাবিহ (রূপক বিষয়সমূহে) বিশ্বাস স্থাপন করো। আর বলো: আমরা এতে ঈমান আনলাম, সবকিছুই আমাদের রবের পক্ষ থেকে এসেছে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، أبو سلمة - وهو ابن عبد الرحمن بن عوف - لم يلق ابنَ مسعود فيما قاله الطحاوي في "مشكل الآثار" 8/ 116، وابن عبد البر في "التمهيد" 8/ 275، وأعلَّه ابنُ عبد البر أيضًا بسلمة بن أبي سلمة فقال: ليس ممَّن يُحتَج به. وكذلك أعلَّه بالانقطاع الذهبي في "تلخيصه"، وابن حجر في "فتح الباري" 15/ 58 وردَّ على ابن حبان والحاكم تصحيحَهما له.وأخرجه ابن حبان (745) عن أبي يعلى، عن أبي همّام بن أبي بدر - وهو الوليد بن شجاع السَّكوني - بهذا الإسناد.وأخرجه الطحاوي في "مشكل الآثار" (3102) من طريق أبي زرعة وهب الله بن راشد، عن حيوة بن شريح، به.وخالف حيوةَ فيه الليثُ بن سعد عند أبي عبيد في "فضائل القرآن" ص 100، والطحاوي أيضًا (3103) فرواه عن عقيل بن خالد، عن ابن شهاب الزُّهْري، عن سلمة بن أبي سلمة، به مرسَلًا لم يذكر فيه ابنَ مسعود.وأخرجه مختصرًا دون قوله: "زاجرا وآمرًا … إلخ" أحمد 7/ (4252)، والنسائي (7930) من طريق فُلفُلة الجُعْفي، عن ابن مسعود موقوفًا عليه من قوله. وفي إسناده لِين.وسيأتي الحديث مرة أخرى عند المصنف برقم (3181) من طريق الحسن بن أحمد بن الليث عن عبد الله بن وهب.
2055 - أخبرني أبو جعفر محمد بن علي الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري، حدثنا أبو غسان مالك بن إسماعيل، حدثنا زهير بن معاوية، حدثنا شعيب بن خالد الرازي، عن عاصم، عن زِرٍّ، عن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تَعاهَدُوا هذا القرآنَ، فإنه وَحْشِيٌّ؛ أشدُّ تَفَصِّيًا من صُدور الرِّجال من الإبل من عُقُلِها، ولا يقولَنَّ أحدُكم: نَسِيتُ آيةَ كَيتَ وكَيتَ، بل هو نُسِّيَ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه [2].
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা এই কুরআনের নিয়মিত চর্চা করো/দেখভাল করো। কারণ এটি বন্য প্রকৃতির; এটি মানুষের হৃদয় থেকে তার রশি বাঁধা উট অপেক্ষা দ্রুত বিচ্ছিন্ন/পলায়ন করে। তোমাদের কেউ যেন না বলে যে, ‘আমি অমুক অমুক আয়াত ভুলে গেছি,’ বরং তাকে ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات غير عاصم - وهو ابن أبي النَّجود - فهو صدوق له أوهام، وقد اختُلف عليه في رفع هذا الحديث ووقفه، وفي تسمية تابعيّه، كما سيأتي بيانه، على أنَّ رفع الحديث صحيح من غير طريقه.وأخرجه الشاشي في "مسنده" (640)، والطبراني في "الكبير" (10231)، وأبو نعيم في "الحلية" 4/ 188 من طريق أبي غسان مالك بن إسماعيل، بهذا الإسناد. وتحرَّف اسم شعيب بن خالد في المطبوع من "الحلية" إلى: شعبة عن خالد.وأخرجه الطبراني (10231)، وأبو نعيم 4/ 188 من طريق عبد الله بن صالح العجلي، عن زهير، به.وأخرجه أحمد 7/ (4416) عن عفان بن مسلم عن حماد بن زيد، والطبراني (10415) من طريق أبان بن يزيد العطار، كلاهما (حماد وأبان) عن عاصم، عن أبي وائل، عن عبد الله بن مسعود، مرفوعًا. وقرن حماد في روايته بعاصمٍ منصورَ بن المعتمر.وأخرجه سعيد بن منصور في قسم التفسير من "سننه" (17) عن حماد بن زيد، عن عاصم ومنصور، عن أبي وائل، عن ابن مسعود، موقوفًا عليه.وأخرجه عبد الرزاق (5968) عن معمر، عن عاصم، عن أبي الضحى أو أبي وائل، عن ابن مسعود مرفوعًا. وأخرجه أبو عبيد القاسم بن سلّام في "فضائل القرآن" ص 203 عن أبي بكر بن عياش، عن عاصم، عن أبي الأحوص عن ابن مسعود، موقوفًا.وأخرجه أيضًا ص 203 من طريق شيبان بن عبد الرحمن، عن عاصم، عن المسيب بن رافع، عن ابن مسعود، موقوفًا.وأرجح هذه الطرق عن عاصم وأشبهها ما ذَكَر فيه أبا وائل كما رواه عنه أبان العطّار وحماد بن زيد، لمتابعة منصور بن المعتمر له على ذلك، فقد أخرجه البخاري (5032)، ومسلم (790) من طريق، منصور عن أبي وائل، عن ابن مسعود، مرفوعًا.وتابعه على ذلك أيضًا الأعمش عند مسلم (790)، إلَّا أنه وَقَفَ شطر الحديث الأول في تعاهد القرآن، ورَفَعَ شطره الثاني في النهي عن قول: نسيت.والظاهر أنَّ ابن مسعود نفسه يرفع الحديث أحيانًا، وأحيانًا لا يرفعه، وأحيانًا يرفع شطره الثاني، ولا يرفع الشطر الأول.على أنَّ الشطر الأول في تعاهد القرآن قد جاء مرفوعًا من حديث أبي موسى الأشعري عند البخاري (5033)، ومسلم (791).قوله: وحشيٌّ، أي: لا يُقدر على إمساكه إذا أفْلَتَ.وقوله: تفصّيًا، أي: خروجًا وتخلُّصًا.وقوله: عُقُلها، جمع عِقال، وهو الحبل.
[2] كذا قال الحاكم! وقد تقدَّم أنَّ الشيخين قد أخرجاه من طريق أبي وائل عن عبد الله بن مسعود. ابن موسى كما وقع عند المصنّف هنا، وتابعه على ذلك عبد الله بن صالح كاتب الليث، وخالفهما عبدُ الله بن يوسف وقتيبةُ بن سعيد فروياه عن الليث عن ابن شهاب عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك: أنَّ أُسيد بن حضير، مرسلًا، ووافقهما سفيان بن عُيينة في الرواية التالية عند الحاكم. فالأشبه أنه مرسلٌ من هذه الطريق.وأخرجه أبو عبيد القاسم بن سلام في "فضائل القرآن" ص 63 عن عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" 5/ 313 تعليقًا عن عبد الله بن يوسف، والفريابي في "فضائل القرآن" (96) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن الليث، عن ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك: أنَّ أسيد بن حضير، فذكره مرسلًا.وقد رواه معمر عن الزُّهْري أيضًا، واختلف فيه على معمر:فقد رواه معمر عن الزُّهْري عن ابن كعب بن مالك، قال: إنَّ أسيد بن حضير قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره مرسلًا، يعني كرواية عبد الله بن يوسف عن الليث، أخرجه كذلك إسحاق بن راهويه كما في "المطالب العالية" (3548) عن عبد الرزاق عن معمر، به.ورواه عبد الرزاق مرة أخرى عن معمر، فقال: عن الزُّهْري ويحيى بن أبي كثير عن أبي سلمة، قال: بينما أسيد بن حضير الأنصاري يصلي، فذكره مرسلًا. أخرجه كذلك في "مصنفه" (4182).وخالف عبدَ الرزاق فيه ابنُ المبارك في "الزهد" (812)، فرواه عن معمر عن الزُّهْري ويحيى بن أبي كثير، قالا: بينما أسيد بن حضير يصلي، فذكره مرسلًا دون ذكر أبي سلمة في إسناده.ورواه ابن جُرَيج عن الزُّهْري، قال: قال أسيد بن حضير: بينا أنا يا رسول الله البارحة أقرأ، فذكره مرسلًا، يعني كرواية معمر من طريق ابن المبارك عنه. أخرجه كذلك عبد الرزاق (4183).ورواه إسحاق بن راشد عن الزُّهْري، عن ابن كعب، عن أبيه، أنَّ أسيد بن حضير، فذكره وجعله من مسند كعب بن مالك. أخرجه من طريقه البزار في "مسنده" (3209)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (880).تنبيه: للّيث بن سعد في قصة أسيد بن حضير هذه إسناد آخر، فقد علَّقه عنه البخاري في "صحيحه" (5018) فقال: وقال الليث: حدثني يزيد بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن أُسيد بن حضير، قال: بينما هو يقرأ، فذكره نحوه، ثم قال: قال ابن الهاد، وحدثني هذا الحديث عبد الله بن خباب، عن أبي سعيد الخُدْري، عن أسيد بن حضير. قال الحافظ في "فتح الباري" 15/ 128: محمد بن إبراهيم هو التيمي، ولم يُدرك أسيد بن حُضير، فروايته عنه منقطعة، لكن الاعتماد في وصل الحديث المذكور على الإسناد الثاني. قلنا: أخرجه بالإسناد الثاني مسلم (796).وستتكرر طريق أبي العباس محمد بن يعقوب هذه برقم (5341). وانظر تالييه.وأخرج قصة أسيد هذه أيضًا لكن دون التصريح باسمه، البخاري (3614)، ومسلم (795) من حديث البراء بن عازب.
2056 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا أسد بن موسى، حدثنا الليث بن سعد، حدثني ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن أُسَيد بن حُضَير: أنه كان يقرأ وهو على ظهر بيته، وهو حَسَنُ الصوت، فجاء رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال: بَيْنا أنا أقرأُ إِذ غَشِيَني شيءٌ كالسحاب، والمرأةُ في البيت، والفرسُ في الدار، فتخوّفتُ أن تُسقِطَ المرأةُ وتَنفَلِتَ الفرسُ، فانصرفتُ، فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "اقرأْ يا أُسَيدُ، فإنما هو مَلَكٌ استَمَعَ القرآنَ" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
উসায়দ ইবনু হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তার ঘরের ছাদে সুমধুর কণ্ঠে কুরআন তিলাওয়াত করছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে এলেন। তিনি (উসায়দ) বললেন: আমি যখন তিলাওয়াত করছিলাম, তখন মেঘের মতো কিছু আমাকে ঢেকে ফেলল। ঘরে আমার স্ত্রী ছিল এবং আঙিনায় ঘোড়া ছিল। আমি ভয় পেলাম যে স্ত্রী (ভয়ে) সন্তান প্রসব করে ফেলবে অথবা ঘোড়াটি পালিয়ে যাবে, তাই আমি (তিলাওয়াত থেকে) বিরত হলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: হে উসায়দ, তুমি পড়তে থাকো। নিশ্চয়ই এটি ছিল একজন ফেরেশতা, যে কুরআন শুনছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه اختُلف فيه على الليث بن سعد، فقد رواه عنه أسد ابن موسى كما وقع عند المصنّف هنا، وتابعه على ذلك عبد الله بن صالح كاتب الليث، وخالفهما عبدُ الله بن يوسف وقتيبةُ بن سعيد فروياه عن الليث عن ابن شهاب عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك: أنَّ أُسيد بن حضير، مرسلًا، ووافقهما سفيان بن عُيينة في الرواية التالية عند الحاكم. فالأشبه أنه مرسلٌ من هذه الطريق.وأخرجه أبو عبيد القاسم بن سلام في "فضائل القرآن" ص 63 عن عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" 5/ 313 تعليقًا عن عبد الله بن يوسف، والفريابي في "فضائل القرآن" (96) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن الليث، عن ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك: أنَّ أسيد بن حضير، فذكره مرسلًا.وقد رواه معمر عن الزُّهْري أيضًا، واختلف فيه على معمر:فقد رواه معمر عن الزُّهْري عن ابن كعب بن مالك، قال: إنَّ أسيد بن حضير قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره مرسلًا، يعني كرواية عبد الله بن يوسف عن الليث، أخرجه كذلك إسحاق بن راهويه كما في "المطالب العالية" (3548) عن عبد الرزاق عن معمر، به.ورواه عبد الرزاق مرة أخرى عن معمر، فقال: عن الزُّهْري ويحيى بن أبي كثير عن أبي سلمة، قال: بينما أسيد بن حضير الأنصاري يصلي، فذكره مرسلًا. أخرجه كذلك في "مصنفه" (4182).وخالف عبدَ الرزاق فيه ابنُ المبارك في "الزهد" (812)، فرواه عن معمر عن الزُّهْري ويحيى بن أبي كثير، قالا: بينما أسيد بن حضير يصلي، فذكره مرسلًا دون ذكر أبي سلمة في إسناده.ورواه ابن جُرَيج عن الزُّهْري، قال: قال أسيد بن حضير: بينا أنا يا رسول الله البارحة أقرأ، فذكره مرسلًا، يعني كرواية معمر من طريق ابن المبارك عنه. أخرجه كذلك عبد الرزاق (4183).ورواه إسحاق بن راشد عن الزُّهْري، عن ابن كعب، عن أبيه، أنَّ أسيد بن حضير، فذكره وجعله من مسند كعب بن مالك. أخرجه من طريقه البزار في "مسنده" (3209)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (880).تنبيه: للّيث بن سعد في قصة أسيد بن حضير هذه إسناد آخر، فقد علَّقه عنه البخاري في "صحيحه" (5018) فقال: وقال الليث: حدثني يزيد بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن أُسيد بن حضير، قال: بينما هو يقرأ، فذكره نحوه، ثم قال: قال ابن الهاد، وحدثني هذا الحديث عبد الله بن خباب، عن أبي سعيد الخُدْري، عن أسيد بن حضير. قال الحافظ في "فتح الباري" 15/ 128: محمد بن إبراهيم هو التيمي، ولم يُدرك أسيد بن حُضير، فروايته عنه منقطعة، لكن الاعتماد في وصل الحديث المذكور على الإسناد الثاني. قلنا: أخرجه بالإسناد الثاني مسلم (796).وستتكرر طريق أبي العباس محمد بن يعقوب هذه برقم (5341). وانظر تالييه.وأخرج قصة أسيد هذه أيضًا لكن دون التصريح باسمه، البخاري (3614)، ومسلم (795) من حديث البراء بن عازب.
2057 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، حدثنا الزُّهْري، عن ابن كعب بن مالك: أنَّ أُسيد بن حُضَير أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث بنحوه، وقال فيه: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اقرأْ أُسيدُ، اقرأْ أُسيدُ، فإنَّ ذلك مَلَكٌ يَستمِعُ القرآن" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ على شرط مسلم، من حديث عبد الرحمن بن أبي ليلى عن أُسيد:
উসাইদ ইবনু হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, অতঃপর তিনি অনুরূপভাবে হাদীসটি বর্ণনা করলেন এবং তাতে বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি পড়ো, হে উসাইদ! তুমি পড়ো, হে উসাইদ! কেননা, এ হলো একজন ফেরেশতা, যিনি কুরআন শ্রবণ করছিলেন।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات.وأخرجه إسحاق بن راهويه كما في "المطالب العالية" (3548)، وابن بَشكُوال في "غوامض الأسماء المبهمة" 2/ 782 من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وانظر ما قبله، وما بعده. وأخرجه ابن حبان (779) من طريق هدبة بن خالد، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وتابع ثابتًا البُنانيَّ عليه قتادة بن دعامة، أخرجه من طريقه إسحاق بن راهويه كما في "المطالب العالية" (3546)، ومحمد بن نصر المروَزي في "قيام الليل - مختصره" ص 141، والفريابي في "فضائل القرآن" (28)، والطبراني في "الكبير" (567)، وفي "الأوسط" (8117)، وأبو طاهر المخلِّص في "المخلِّصيات" (285)، وأبو نعيم في "حلية الأولياء" 9/ 237.وقوله: تَطَلَّق، يجوز أن يكون بضم القاف، فعلًا مضارعًا حذفت إحدى تائيه تخفيفًا، ويجوز أن يكون بفتح القاف، فعلًا ماضيًا، والمعنى أنَّ الفرس مَضَتْ تعدو لا تَلْوي على شيء، والفَرس يذكَّر ويؤنَّث. ويجوز أن يكون من: طَلَق يَطلُق، من باب قعد: إذا انحلَّ وثاق الفرس.
2058 - أخبرَناه أبو بكر إسماعيل بن محمد الفقيه بالرَّي، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا عفّان بن مسلم وموسى بن إسماعيل، قالا: حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت البُنَاني، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أُسَيد بن حُضَير، أنه قال: بينا أنا أقرأُ ليلةً سورةَ البقرة، فلما انتهيتُ إلى آخرها سمعتُ وَجْبةً مِن خَلْفي، فظننتُ أنَّ فرسي تَطَلَّق، فقال: اقرأْ أبا عَتِيك، فالتفتُّ، فإذا أمثالُ المصابيح مدلّاةٌ بين السماء والأرض، فقال: يا رسول الله، والله ما استطعتُ أن أمضِيَ، قال: فقال: "تلكَ الملائكةُ نزلتْ لِقراءة القرآنِ، أمَا إنك لو مَضَيتَ لرأيتَ العَجائب" [1].
উসাইদ ইবনে হুদাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে আমি সূরা আল-বাকারা তিলাওয়াত করছিলাম। যখন আমি শেষাংশে পৌঁছলাম, তখন আমার পেছন থেকে একটি শব্দ শুনতে পেলাম। আমি ধারণা করলাম, আমার ঘোড়াটি বুঝি বাঁধন ছিঁড়েছে। (তখন মনে হলো) বলা হলো: হে আবূ আতীক, তুমি তিলাওয়াত করো। এরপর আমি তাকালাম, দেখি আসমান ও যমীনের মাঝখানে প্রদীপসদৃশ কিছু জিনিস ঝুলন্ত অবস্থায় আছে। অতঃপর তিনি (উসাইদ) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আল্লাহর কসম, আমি আর (তিলাওয়াতে) অগ্রসর হতে পারিনি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওরা ছিল ফেরেশতা, যারা কুরআন তিলাওয়াত শোনার জন্য অবতরণ করেছিল। শোনো, তুমি যদি তিলাওয়াতে অগ্রসর হতে, তবে তুমি আরও আশ্চর্যজনক বিষয় দেখতে পেতে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن عبد الرحمن بن أبي ليلى لم يَلحق أُسيد بن حضير فيسمعَ منه، كما قال الذهبي في "سير أعلام النبلاء" في ترجمة أُسيد 1/ 341. وأخرجه ابن حبان (779) من طريق هدبة بن خالد، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وتابع ثابتًا البُنانيَّ عليه قتادة بن دعامة، أخرجه من طريقه إسحاق بن راهويه كما في "المطالب العالية" (3546)، ومحمد بن نصر المروَزي في "قيام الليل - مختصره" ص 141، والفريابي في "فضائل القرآن" (28)، والطبراني في "الكبير" (567)، وفي "الأوسط" (8117)، وأبو طاهر المخلِّص في "المخلِّصيات" (285)، وأبو نعيم في "حلية الأولياء" 9/ 237.وقوله: تَطَلَّق، يجوز أن يكون بضم القاف، فعلًا مضارعًا حذفت إحدى تائيه تخفيفًا، ويجوز أن يكون بفتح القاف، فعلًا ماضيًا، والمعنى أنَّ الفرس مَضَتْ تعدو لا تَلْوي على شيء، والفَرس يذكَّر ويؤنَّث. ويجوز أن يكون من: طَلَق يَطلُق، من باب قعد: إذا انحلَّ وثاق الفرس.
2059 - حدثنا عبد الله بن سَعْدٍ الحافظ، أخبرني موسى بن عبد المؤمن، حدثنا هارون بن سعيد الأَيْلي، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني حُيَيُّ بن عبد الله، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن عبد الله بن عمرو، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "الصيامُ والقرآنُ يَشفعان للعبدِ، يقولُ الصيام: ربِّ إني مَنعتُه الطعامَ والشهواتِ بالنهار، فَشَفِّعني فيه، ويقول القرآن: منعتُه النومَ بالليل، فشَفِّعني فيه، فيُشَفَّعان" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: রোযা ও কুরআন বান্দার জন্য সুপারিশ করবে। রোযা বলবে, হে আমার প্রতিপালক! আমি তাকে দিনের বেলায় খাদ্য ও প্রবৃত্তি থেকে বিরত রেখেছি। অতএব, তার ব্যাপারে আমার সুপারিশ কবুল করুন। আর কুরআন বলবে, আমি তাকে রাতের বেলায় ঘুম থেকে বিরত রেখেছি। অতএব, তার ব্যাপারে আমার সুপারিশ কবুল করুন। ফলে উভয়ের সুপারিশ কবুল করা হবে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف حُيَيّ بن عبد الله: وهو المَعَافري. أبو عبد الرحمن الحُبُلي: هو عبد الله بن يزيد المَعَافري.وأخرجه أحمد 11/ (6626) من طريق عبد الله بن لهيعة، عن حُيي بن عبد الله، به.ويشهد لشفاعة القرآن حديث جابر بن عبد الله الذي أخرجه ابن حبان (124) ولفظه: "القرآن شافع مشفَّع"، وإسناده جيد كما قال المنذري في "الترغيب والترهيب" 1/ 42.وحديث أبي أمامة عند أحمد 36/ (22147)، وسيأتي برقم (2096)، وهو صحيح.
2060 - أخبرني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو سعيد محمد بن شاذان، حدثنا قُتيبة بن سعيد.وحدثنا عبد الله بن سعد، حدثنا إبراهيم بن إسحاق، حدثنا إسحاق بن إبراهيم ويعقوب بن إبراهيم الدَّوْرَقي؛ قالوا: حدثنا جَرير، عن قابُوس بن أبي ظَبْيان، عن أبيه، عن ابن عباس، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ الذي ليس في جوفه من القرآن شيءٌ، كالبيتِ الخَرِبِ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় যে ব্যক্তির অন্তরে কুরআনের সামান্য অংশও নেই, সে যেন একটি বিরান (ধ্বংসপ্রাপ্ত) ঘরের মতো।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده فيه لين من أجل قابوس بن أبي ظبيان. جرير: هو ابن عبد الحميد.وأخرجه أحمد 3/ (1947)، والترمذي (2913) من طريق جرير بن عبد الحميد بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وفي الباب عن ابن مسعود موقوفًا قال: البيت الذي لا يُقرأ فيه القرآن كمثل البيت الخرب الذي لا عامر له. أخرجه ابن أبي شيبة 10/ 486، والفريابي في "فضائل القرآن" (41) وغيرهما. وإسناده صحيح. وانظر تمام تخريجه فيما سيأتي برقم (2106). عن يزيد. وهذا من صالح حديث ابن لهيعة، لأنَّ ابن وهب راويه عنه ممَّن سمع منه قبل احتراق كتبه.