হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2201)


2201 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا موسى بن الحسن بن عبّاد، حدثنا عبد الله بن بكر السَّهْمي، حدثنا هشام الدَّستُوائي.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا إسماعيل بن إبراهيم، عن هشام الدَّستُوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سَلّام، عن جدِّه ممطور، عن أبي أمامة: أنَّ رجلًا سأل النبيَّ صلى الله عليه وسلم: ما الإيمانُ؟ قال: "إذا سرَّتْك حسنتُك وساءتك سيئتُك، فأنت مؤمنٌ" قال: يا رسولَ الله، ما الإثمُ؟ قال: "إذا حاكَ في صدرك شيءٌ فدَعْهُ" [1].




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল: ঈমান কী? তিনি বললেন: যখন তোমার নেকি তোমাকে আনন্দিত করে এবং তোমার গুনাহ তোমাকে ব্যথিত করে, তখন তুমি মুমিন। লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! পাপ কী? তিনি বললেন: যখন কোনো কিছু তোমার অন্তরে দ্বিধা সৃষ্টি করে (বা খটকা লাগে), তখন তুমি তা ছেড়ে দাও।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، كما تقدم برقم (33). وهو في "مسند أحمد" 36/ (22199). على ما وقع في بعض طرق حديثه هنا من تصريحه بالسماع من النواس، فهو خطأ من الراوي عن صفوان بن عمرو كما قال أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "العلل".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2202)


2202 - أخبرَناه أبو الحسن أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد، حدثنا عبد الله بن صالح، أخبرني معاوية بن صالح.وأخبرنا أحمد بن جعفر، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن بن مَهْدي، عن معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن جُبَير بن نُفَير، عن أبيه، عن نَوَّاس بن سِمْعان الأنصاري، قال: سألتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم عن البِرِّ والإثمِ، قال: "البِرُّ حسنُ الخُلُق، والإثمُ ما حاكَ في صدرِك وكرهتَ أن يَطَّلعَ عليه الناسُ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




নওয়াস ইবনু সাম‘আন আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পুণ্য এবং পাপ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: “পুণ্য হলো উত্তম চরিত্র। আর পাপ হলো সেই জিনিস যা তোমার অন্তরে খচখচ করে (সন্দেহ সৃষ্টি করে) এবং যা মানুষ জেনে ফেলুক তা তুমি অপছন্দ করো।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وهو في "مسند أحمد" 29/ (17631).وأخرجه مسلم (2553) عن محمد بن حاتم بن ميمون، عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد (17633)، والترمذي (2389)، وابن حبان (397) من طريق زيد بن الحُباب، ومسلم (2553) من طريق عبد الله بن وهب، كلاهما عن معاوية بن صالح، به.وأخرجه أحمد (17632) من طريق صفوان بن عمرو، عن يحيى بن جابر القاصّ، عن النواس بن سمعان. قال أبو حاتم فيما نقله عنه ابنه في "العلل" (1849): لم يلق ابنُ جابر النواسَ، قلنا: ذلك أنَّ يحيى بن جابر هذا إنما يروي عن عبد الرحمن بن جبير عن أبيه عن النواس، فقد روى عدة أحاديث من أحاديث النواس بهذا الإسناد، وكان ابنُ جابر هذا معروفًا بالإرسال ولا اعتماد على ما وقع في بعض طرق حديثه هنا من تصريحه بالسماع من النواس، فهو خطأ من الراوي عن صفوان بن عمرو كما قال أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "العلل".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2203)


2203 - أخبرنا أبو العباس القاسم بن القاسم السَّيّاري، حدثنا أبو المُوجِّه، حدثنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله بن المبارك، أخبرنا أسامة بن زيد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم تَضَوَّرَ ذاتَ ليلةٍ، فقيل له: ما أسهَرَك؟ قال: "إني وَجدتُ تمرةً ساقِطةً فأكلتُها، ثم ذَكَرتُ تمرًا كان عندنا من تمر الصَّدقة، فما أدري أمِن ذلك كانتِ التمرةُ، أو من تمرِ أهلي، فذلك أسْهَرَني" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আমর ইবনে শুআইবের দাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক রাতে অস্থির হয়ে এপাশ ওপাশ করছিলেন। তখন তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: কিসে আপনাকে বিনিদ্র রেখেছে? তিনি বললেন: "আমি একটি পড়ে থাকা খেজুর পেয়েছিলাম এবং তা খেয়েছিলাম। অতঃপর আমার স্মরণ হলো যে আমাদের কাছে সাদকার খেজুর ছিল। সুতরাং আমি জানি না যে খেজুরটি সাদকার খেজুরের অংশ ছিল, নাকি আমার পরিবারের খেজুরের অংশ ছিল। এটাই আমাকে বিনিদ্র করে রেখেছে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل أسامة بن زيد: وهو الليثي. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري المروَزي، وعَبْدان: هو عبد الله بن عثمان بن جبلة المروَزي، وعبدان لقبُه.وأخرجه أحمد 11/ (6720) عن أبي بكر الحنفي، و (6820) عن وكيع، كلاهما عن أسامة بن زيد، بهذا الإسناد.تَضَوَّر: أي: تَلَوَّى وتَقَلَّب ظهرًا لبطن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2204)


2204 - حدثنا محمد بن صالح، حدثنا أبو سعيد محمد بن شاذان، حدثنا إسحاق بن إبراهيم ومحمد بن رافع ومحمد بن يحيى، قالوا: حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن ابن أبي ذئب، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما أدري أتُبَّعٌ لعينًا كان أم لا، وما أدري ذو القَرْنين أنَبيًّا كان أم لا، وما أدري الحدودُ كفاراتٌ لأهلِها أم لا؟ " [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি জানি না, তুব্বা অভিশাপগ্রস্ত ছিল কি না। আমি জানি না, যুল-কারনাইন নবী ছিলেন কি না। আর আমি জানি না, (শরীয়তের) দণ্ডসমূহ তার প্রাপকদের জন্য কাফফারা (পাপমোচনকারী) হবে কি না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح إن شاء الله كما قدّمنا بيانه برقم (104).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2205)


2205 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عيسى اللَّخْمي، حدثنا عمرو بن أبي سلمة، حدثنا أبو مُعَيد حفص بن غَيلان، حدثنا سليمان بن موسى، عن نافع، عن ابن عُمر، وعن عطاء بن أبي رَبَاح، عن ابن عبّاس؛ أنهما كانا يقولان: عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن اشترى بَيعًا فوَجَبَ له، فهو بالخيار ما لم يُفارِقْه صاحبُه، إن شاء أخذَه، فإن فارقَه فلا خِيارَ له" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ.




ইবন উমর ও ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণনা করতেন: “যে ব্যক্তি কোনো জিনিস ক্রয় করল এবং তা তার জন্য আবশ্যক হলো, সে ততক্ষণ পর্যন্ত ইখতিয়ার (পছন্দ) রাখবে, যতক্ষণ পর্যন্ত তার সঙ্গী (বিক্রেতা) তাকে ছেড়ে চলে না যায়। যদি সে চায়, তবে সেটি গ্রহণ করতে পারে। কিন্তু যদি সে তাকে ছেড়ে চলে যায়, তবে তার আর কোনো ইখতিয়ার থাকবে না।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف أحمد بن عيسى اللَّخْمي، لكنه متابع.وأخرجه ابن حبان (4914) و (4915) من طريق زيد بن يحيى بن عُبيد، عن أبي مُعَيد حفص بن غيلان، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 9/ (5418) و 10/ (6006)، والبخاري (2107) و (2109) و (2111) و (2112)، ومسلم (1531)، وأبو داود (3154)، وابن ماجه (2181)، والترمذي (1245)، والنسائي (6014 - 6022)، وابن حبان (4912) و (4916) من طرق عن نافع، عن ابن عمر. زادوا "إلّا بيع الخيار" ولفظ بعضهم: "أو يقول أحدهما لصاحبه: اختر" وبعضهم يقول: "أو يكون بيع خيار"، وكلها بمعنًى.وأخرجه أحمد 8/ (4566) و 9/ (5130)، والبخاري (2113)، ومسلم (1531)، والنسائي (6023 - 6028)، وابن حبان (4913) من طريق عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، بلفظ: "كل بَيِّعين لا بيع بينهما حتى يتفرقا، إلّا بيع الخيار".قال الترمذي: معنى قوله صلى الله عليه وسلم: "إلّا بيع الخيار" معناه: أن يُخيِّر البائعُ المشتري بعد إيجاب البيع، فإذا خيّره فاختار البيع فليس له خِيار بعد ذلك في فسخ البيع، وإن لم يتفرقا.قلنا: وقد جاء بيان ذلك في رواية الليث بن سعد عن نافع عن ابن عمر عند أحمد 10/ (6006)، والبخاري (2112)، ومسلم (1531)، وابن ماجه (2181)، والنسائي (6020). والشواهد، وقد تابعه عمر بن علي المقدَّمي عند الترمذي، وجرير بن عبد الحميد عند أبي عوانة (5493)، وله طريق أخرى عن عروة ستأتي، وقد تلقّى العلماء هذا الحديث بالقَبول، والعمل عليه عندهم كما قال الترمذي.وأخرجه أحمد 41/ (24514) و (24847)، وأبو داود (3510)، وابن ماجه (2243)، وابن حبان (4927) من طرق عن مسلم بن خالد، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (1286) من طريق عمر بن علي المقدمي، عن هشام بن عروة، به. وقال: حديث حسن غريب.وانظر ما بعده.قوله: "الخراج بالضمان" معناه: أن ما يحصُل من غَلّة العين المبتاعة عبدًا كان أو أمةً أو مِلكًا، وذلك أن يشتريه فيستغلّه زمانًا، ثم يعثُر منه على عيب قديم لم يُطلعه البائع عليه، أو لم يعرفه، فله ردُّ العين المبيعة وأخذ الثمن، ويكون للمشتري ما استغلَّه، لأنَّ المبيع لو كان تلف في يده لكان من ضمانه، ولم يكن له على البائع شيء. والباء في قوله: "بالضمان" متعلقة بمحذوف تقديره: الخراج مستحق بالضمان، أي: بسببه. قاله ابن الأثير.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2206)


2206 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا يحيى بن يحيى، حدثنا مسلم بن خالد، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة: أنَّ رجلًا اشترى مِن رجل غلامًا في زمن النبي صلى الله عليه وسلم، فكان عنده ما شاء الله، ثم رَدَّه مِن عَيْبٍ وَجَدَ به، فقال الرجل حين ردَّ عليه الغلام: يا رسول الله، إنه كان استغلَّ غلامي منذ كان عنده، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "الخَرَاجُ بالضَّمَان" [1].




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তি অন্য এক ব্যক্তির কাছ থেকে একটি গোলাম ক্রয় করল। গোলামটি তার কাছে কিছুকাল থাকার পর সে তাতে একটি ত্রুটি খুঁজে পেয়ে তাকে ফিরিয়ে দিল। যখন সে লোকটি গোলামটিকে ফেরত দিল, তখন বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! যখন গোলামটি তার কাছে ছিল, তখন সে আমার গোলামের দ্বারা ফায়দা গ্রহণ করেছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "খারাজ (প্রাপ্ত লাভ) হলো জিম্মাদারীর (ক্ষতির ঝুঁকি) বিনিময়ে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح إن شاء الله، مسلم بن خالد - وهو الزَّنجي - ضعيف يُعتبَر به في المتابعات والشواهد، وقد تابعه عمر بن علي المقدَّمي عند الترمذي، وجرير بن عبد الحميد عند أبي عوانة (5493)، وله طريق أخرى عن عروة ستأتي، وقد تلقّى العلماء هذا الحديث بالقَبول، والعمل عليه عندهم كما قال الترمذي.وأخرجه أحمد 41/ (24514) و (24847)، وأبو داود (3510)، وابن ماجه (2243)، وابن حبان (4927) من طرق عن مسلم بن خالد، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (1286) من طريق عمر بن علي المقدمي، عن هشام بن عروة، به. وقال: حديث حسن غريب.وانظر ما بعده.قوله: "الخراج بالضمان" معناه: أن ما يحصُل من غَلّة العين المبتاعة عبدًا كان أو أمةً أو مِلكًا، وذلك أن يشتريه فيستغلّه زمانًا، ثم يعثُر منه على عيب قديم لم يُطلعه البائع عليه، أو لم يعرفه، فله ردُّ العين المبيعة وأخذ الثمن، ويكون للمشتري ما استغلَّه، لأنَّ المبيع لو كان تلف في يده لكان من ضمانه، ولم يكن له على البائع شيء. والباء في قوله: "بالضمان" متعلقة بمحذوف تقديره: الخراج مستحق بالضمان، أي: بسببه. قاله ابن الأثير.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2207)


2207 - حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا يحيى بن محمد، حدثنا مُسدَّد، حدثنا مسلم بن خالد، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة: أنَّ رجلًا اشترى غلامًا في زمن النبي صلى الله عليه وسلم وبه عَيبٌ لم يَعلَمْ به، فاستغلَّه، ثم عَلِمَ العيبَ فردَّه، فخاصمَه إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، إنه استغلَّه منذ زمان، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الغَلَّةُ بالضَّمَان" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد رواه ابنُ أبي ذئب، عن مَخلَد بن خُفَافٍ، عن عُرْوة، عن عائشة مختصرًا [2].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তি একটি গোলাম কিনল, যার মধ্যে এমন একটি ত্রুটি ছিল যা সে জানত না। অতঃপর সে তাকে কাজে লাগিয়ে উপকৃত হল। এরপর যখন সে ত্রুটি সম্পর্কে জানতে পারল, তখন সে তাকে ফেরত দিয়ে দিল। (প্রথম ক্রেতা) বিষয়টি নিয়ে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে মামলা দায়ের করল এবং বলল, "হে আল্লাহর রাসূল, সে তো তাকে বেশ কিছুদিন যাবত কাজে লাগিয়েছে।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মুনাফা হলো ক্ষতির (দায়িত্ব) গ্রহণের বিনিময়ে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح كسابقه.



[2] لكن أخرجه بعضهم من هذه الطريق مطولًا بنحو لفظ مسلم بن خالد كأبي داود الطيالسي والشافعي وغيرهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2208)


2208 - أخبرَناه عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلّاب، حدثنا محمد بن الجَهْم، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا ابن أبي ذِئب. وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن أيوب، والحسن بن علي بن زياد، قالا: حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا ابن أبي ذِئب.وأخبرنا أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا عمر بن حفص السَّدُوسي، حدثنا عاصم بن علي، حدثنا ابن أبي ذئب.وأخبرني عبد الله بن محمد بن موسى، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا علي بن الجَعد، حدثنا ابن أبي ذئب، عن مَخلَدِ بن خُفَافٍ، عن عُرْوة، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الخَرَاجَ بالضَّمان" [1].وحديث عاصم: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم أَنَّ الخَرَاج بالضَّمان [2].رواه الثَّوْري وابنُ المبارك ويحيى بنُ سعيد عن ابن أبي ذئب.أما حديث الثَّوري:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "ফলন (উৎপন্ন বস্তু বা লাভ) হলো দায়ভার (বা ঝুঁকি গ্রহণের) বিনিময়ে।" এবং আসিমের হাদীসে রয়েছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ মর্মে ফায়সালা দিয়েছেন যে, ফলন বা লাভ হলো দায়ভারের বিনিময়ে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل مخلد بن خُفافٍ، فقد وثقه ابن وضَّاح فيما نقله عنه ابن القطان والذهبي، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وصحح حديثه هذا الترمذي وابن القطّان في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 211 - 212، ثم هو متابع كما في الطريقين اللتين قبله. ابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة.وأخرجه أحمد 43/ (25999) عن يزيد بن هارون، وأبو داود (3508) عن أحمد بن يونس، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 42/ (25276) عن قُرّان بن تمّام، وابن ماجه (2242)، والنسائي (6037) من طريق وكيع بن الجراح، والترمذي (1285) من طريق عثمان بن عمر بن فارس وأبي عامر العقدي، والنسائي (6037) من طريق عيسى بن يونس، وابن حبان (4928) من طريق جعفر بن عون، كلهم عن ابن أبي ذئب، به.وسيأتي من طرق أخرى عن ابن أبي ذئب سيخرجها المصنف بعده.



[2] وأخرجه البيهقي في "السنن" 5/ 321 عن أبي عبد الله الحاكم بإسناده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2209)


2209 - فأخبرَناه بَكْر بن محمد الصَّيرفي، حدثنا عبد الصمد بن الفضل، حدثنا قَبيصة، حدثنا سفيان. وحدثنا أبو عبد الله الصَّفار، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى، حدثنا أبو حُذيفة، حدثنا سفيان، عن ابن أبي ذئب، عن مخلد بن خُفاف، عن عُرْوة، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى أنَّ الخَرَاج بالضَّمان [1].وأما حديث ابن المبارك:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রায় দিয়েছেন যে, মুনাফা তার, যার উপর ক্ষতিপূরণের দায়ভার বর্তায়।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن كسابقه. قبيصة: هو ابن عقبة السُّوَائي، وأبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النَّهْدي.وأخرجه أبو داود (3509) من طريق محمد بن يوسف الفريابي، عن سفيان الثَّوري به عن مخلد قال: كان بيني وبين أناس شركة في عبدٍ، فاقتَويتُه (أي: استخدمته) وبعضنا غائب، فأغلَّ عليّ غلَّةً، فخاصمني في نصيبه إلى بعض القضاة، فأمرني أن أردّ الغَلّة، فأتيت عروة بن الزُّبَير، فحدثتُه، فأتاه عروة، فحدّثه عن عائشة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "الخراج بالضمان".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2210)


2210 - فأخبرَناه الحسن بن حَلِيم، أخبرنا أبو الموجِّه، حدثنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا ابنُ أبي ذئب، عن مَخْلَد بن خُفاف، عن عُرْوة، عن عائشة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "الخَراج بالضَّمان" [1].وأما حديث يحيى بن سعيد:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “উৎপন্ন বস্তুর ফল সেই ব্যক্তির প্রাপ্য, যার উপর ক্ষতিপূরণের দায়িত্ব বা ঝুঁকি ছিল।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن كسابقه. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعَبْدان: هو عبد الله بن عثمان بن جَبَلة، وعبد الله: هو ابن المبارك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2211)


2211 - فأخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى، عن ابن أبي ذئب، عن مَخْلَد بن خُفاف، عن عُرْوة، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى أنَّ الخَرَاج بالضَّمان [1].




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা দিয়েছেন যে, খেরাজ (উৎপন্ন আয়) জামানতের (দায়ভারের) সাথে সম্পর্কিত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن. أبو المثنّى: هو معاذ بن المثنى العَنْبري، ومُسدَّد: هو ابن مُسَرْهَد، ويحيى: هو ابن سعيد القطان.وأخرجه أحمد 40/ (24224) عن يحيى القطّان، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2212)


2212 - أخبرنا الشيخ أبو الوليد، أخبرنا أحمد بن الحسن بن عبد الجبار، حدثنا أبو خَيْثمة زُهير بن حَرْب، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قَتَادة، عن الحسن، عن سَمُرة بن جُندُب، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "البَيِّعانِ بالخِيار ما لم يَتَفَرّقا ويأخُذُ كلُّ واحدٍ منهما من البيع ما يَهْوَى" قالها ثلاثًا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه الزيادة [2].حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في جمادى الآخرة سنة سبع وتسعين وثلاث مئة:




সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ক্রেতা ও বিক্রেতা উভয়েই ইখতিয়ারের (চুক্তি বহাল বা বাতিলের) অধিকারী, যতক্ষণ না তারা বিচ্ছিন্ন হয়ে যায় এবং তাদের প্রত্যেকে ক্রয়-বিক্রয়ের বিষয়ে তার পছন্দের অংশ গ্রহণ করে।" তিনি এই কথাটি তিনবার বলেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وقد ثبت سماع الحسن - وهو البصري - من سمرة كما بيناه برقم (151).قتادة: هو ابن دِعامة السَّدُوسي، وهشام: هو ابن أبي عبد الله الدَّستُوائي.وأخرجه النسائي (6029) عن عمرو بن علي الفلّاس، عن معاذ بن هشام، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 33/ (20182) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن هشام: به. دون قوله: "ويأخذ كل واحد" إلى آخره.وأخرجه أحمد (20142) و (20253) من طريق سعيد بن أبي عَروبة، وأحمد أيضًا (20189) و (20252)، والنسائي (6030) من طريق همام بن يحيى، وأحمد (20241)، وابن ماجه (2183) من طريق شعبة بن الحجاج، ثلاثتهم عن قتادة، به. ولم يذكر سعيد وشعبة في روايتهما قوله في الحديث: "ويأخذ كل واحدٍ" إلى آخره، ولفظ همام: "ويأخذ كل واحدٍ منهما ما رضي من البيع".



[2] يعني بزيادة قوله: "ويأخذ كل واحدٍ منهما من البيع ما يهوى".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2213)


2213 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن إسحاق، حدثنا موسى بن إسحاق القاضي، حدثنا عبد الله بن أبي شَيْبة، حدثنا زيد بن الحُباب، عن الحسين بن واقد، حدثني عبد الله بن بُريدة، عن أبيه: أنَّ سلمان لما قَدِم المدينة أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بهديةٍ على طَبَقٍ، فوضعها بين يديه، فقال: "ما هذا يا سلمانُ؟ " قال: صدقةٌ عليك وعلى أصحابك، قال: "إني لا آكُلُ الصدقةَ" فرفعها، ثم جاءه من الغدِ بمثلها، فوضعها بين يديه، فقال: "ما هذا؟ " قال: هديةٌ لك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه: "كُلُوا" قال: "لمن أنت؟ " قال: لقومٍ، قال: "فاطلُب إليهم أن يُكاتِبُوك"، قال: فكاتَبُوني على كذا وكذا نخلةً أغرِسُها لهم، ويقومُ عليها سلمانُ حتى تُطعِمَ، قال: ففَعَلُوا، قال: فجاء النبيُّ صلى الله عليه وسلم فغَرَسَ النخلَ كلَّه إلّا نخلةً واحدةً غرسَها عمرُ، وأطعَمَ نخلُه مِن سَنَتِه إِلَّا تلك النخلةَ، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن غَرَسَها؟ " قالوا: عمرُ، فَغَرَسَها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من يده، فحَمَلَت من عامِها [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، أخرجه الشيخُ أبو بكر في باب الرخصة في اشتراط البائع خدمةَ العبد المَبيع وقتًا معلومًا.وله شاهد من حديث ابن عباس عن سلمانَ صحيحٌ على شرط مسلم:




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
সালমান (ফারসী) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন মদীনায় আগমন করলেন, তখন তিনি একটি থালায় করে রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে একটি হাদিয়া (উপহার) নিয়ে আসলেন এবং তা তাঁর সামনে রাখলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে সালমান! এটা কী?" তিনি বললেন: "এটি আপনার ও আপনার সাহাবীগণের জন্য সদকা।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি সদকা খাই না।" ফলে তিনি সেটি তুলে নিলেন। এরপর পরের দিনও তিনি অনুরূপ জিনিস নিয়ে আসলেন এবং তাঁর সামনে রাখলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি কী?" তিনি বললেন: "এটি আপনার জন্য হাদিয়া।" তখন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে বললেন: "তোমরা খাও।"

এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কার ক্রীতদাস?" তিনি বললেন: "এক গোত্রের।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাদের কাছে অনুরোধ করো, যেন তারা তোমাকে মুকাতাবা (মুক্তির চুক্তি) করে নেয়।" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "তারা আমাকে এত এত খেজুর গাছের বিনিময়ে মুকাতাবা করল, যা আমি তাদের জন্য রোপণ করব এবং সালমান তাতে ফল আসা পর্যন্ত এর পরিচর্যা করবে।" রাবী বললেন: "তারা তাই করল।"

রাবী বললেন: এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন এবং তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি খেজুর গাছ ছাড়া বাকি সব গাছ রোপণ করলেন, যা উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রোপণ করেছিলেন। তাঁর (নবীজীর) রোপণ করা খেজুর গাছগুলো সেই বছরই ফল দিল, তবে শুধু ঐ গাছটি ছাড়া। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি কে রোপণ করেছে?" তারা বললেন: "উমার।" তখন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে সেটি রোপণ করলেন। ফলে সেই বছরই তাতে ফল ধরল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي، الحسين بن واقد صدوق لا بأس به.وأخرجه أحمد 38/ (22997) عن زيد بن الحباب، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده.قوله: "يُكاتبوك" من المكاتبة: وهو أن يُكاتِب الرجلُ عبدَه على مالٍ يؤدّيه إليه العبدُ منجّمًا (أي: مقسَّطًا) فإذا أدّاه صار حُرًّا، وسميت كذلك لأنه يكتب على نفسه لمولاه ثمنه، ويكتب مولاه له عليه العتق.وقوله: "أطعَمَ نخلُه" أي: أثمر، أي: صار ذا طَعْم وشيئًا يؤكل منه.وقد اختلفت الروايات فيما أدَّاهُ سلمان الفارسي مقابل مكاتبته، ففي رواية بُريدة هنا أنه أدَّى كذا وكذا نخلة. هكذا دون تقييد، وزاد أحمد في روايته: فاشتراه رسول الله صلى الله عليه وسلم بكذا وكذا درهمًا، وعلى أن يغرس نخلًا.وفي رواية ابن عباس، عن سلمان، وستأتي بعده: أنه كاتب على ثلاث مئة نخلة وبأربعين أوقية. وقد ساق ابن إسحاق في "السيرة" روايةَ ابن عباسٍ بطولها.وفي رواية أبي عثمان النهدي عن سلمان الآتية برقم (2898): أنه كاتب على خمس مئة فَسيلة (أي: فسيلة النخل).وفي رواية أبي الطُّفيل عن سلمان الآتية برقم (6689): أنه كاتب على مئة نخلة، وعلى قطعة من ذهب بوزن نواة. ويوافقه مرسل سعيد بن المسيب عند عبد الرزاق (15765) وغيره، بذكر عدد النخل، لكن دون ذكر قطعة الذهب. ورجاله ثقات.وفي رواية زيد بن صوحان عن سلمان الآتية برقم (6688): أنَّ أبا بكر اشتراه فأعتقه.واختلفت هذه الروايات أيضًا فيما نبت من النخل المذكور، ففي رواية بُريدة هنا أنها نبتت كلها إلّا واحدة، كان عمر بن الخطاب غرسها بيده. وكذلك في رواية أبي عثمان، غير أنه ذكر أنَّ التي لم تنبت كان سلمان نفسه هو من غرسها.وفي رواية ابن عباس أنه ما مات منها نخلة واحدة.وقد أشار البيهقيُّ في "سننه الكبرى" 10/ 322 إلى بعض هذه الاختلافات، ثم قال: وفي ثبوت بعض هذه الروايات نظر.وقال ابن كثير في "البداية والنهاية" 3/ 520: وطريق محمد بن إسحاق أقوى إسنادًا، وأحسن اقتصاصًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2214)


2214 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن شاذان الجَوهَري، حدثنا مُعلَّى بن منصور، حدثنا يعقوب أبو يوسف، أخبرنا محمد بن إسحاق، عن عاصم بن عمر، عن محمود بن لَبيد، عن ابن عباس، حدثني سلمانُ: أنَّ رجلًا من اليهود اشتراهُ، فقَدِم به المدينةَ، قال: فأَتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بهديةٍ، فقلتُ: هذه صدقةٌ، فقال لأصحابه: "كُلُوا"، ولم يأكل. ثم ذكر الحديث نحوه [1].




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক ইহুদি তাঁকে ক্রয় করে মদীনায় নিয়ে আসে। তিনি বলেন, এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি হাদিয়া নিয়ে এসে বললাম: এটি সাদকা (দান)। তখন তিনি তাঁর সাহাবীদেরকে বললেন: “তোমরা খাও।” কিন্তু তিনি নিজে খেলেন না। এরপর অনুরূপ হাদীস উল্লেখ করা হয়েছে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق - وهو المطّلبي، صاحب المغازي والسيرة - وقد صرَّح بسماعه في "السيرة النبوية" برواية ابن هشام 1/ 214، فانتفت شبهة تدليسه. يعقوب أبو يوسف: هو يعقوب بن إبراهيم بن حبيب صاحب الإمام أبي حنيفة.وأخرجه أحمد 39/ (23722) عن يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، و (23737) عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد الزُّهْري، عن أبيه، كلاهما عن محمد بن إسحاق، به. وصرَّح ابن إسحاق أيضًا في رواية إبراهيم بن سعد بسماعه، ورواية ابن أبي زائدة مختصرة بذكر الصدقة والهدية.وسيأتي كذلك عند المصنف من طريق أبي قرة الكندي عن سلمان برقم (7263).وسيأتي مطولًا برقم (6688) من طريق زيد بن صوحان وبرقم (6689) من طريق أبي الطفيل، كلاهما عن سلمان.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2215)


2215 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْلُ، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن زيد.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا عبد الوارث بن سعيد.وحدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يزيد بن زُريع؛ كلهم عن أيوب، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يَحِلُّ سَلَفٌ وبَيعٌ، ولا شَرطانِ في بيعٍ، ولا رِبْحُ ما لم يُضْمَن، ولا بيعُ ما ليس عِندَك" [1]. هذا حديث على شرطِ جملةٍ من أئمة المسلمين صحيحٌ، وهكذا رواه داود بن أبي هند وعبد الملك بن أبي سليمان وغيرُهم عن عمرو بن شعيب.ورواه عطاء بن مسلم الخُراساني عن عمرو بن شعيب بزيادات ألفاظٍ:




আমর ইবনে শুআইব-এর দাদা (আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ঋণ এবং বিক্রি একত্রিত করা বৈধ নয়, আর একই বিক্রয়ে দুটি শর্ত আরোপ করা বৈধ নয়, এবং যে জিনিসের দায়িত্ব (ঝুঁকি) তুমি নাওনি তার লাভ গ্রহণ করা বৈধ নয়, আর যা তোমার কাছে নেই তা বিক্রি করাও বৈধ নয়।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن. أيوب: هو ابنُ أبي تَميمة السَّخْتياني.وأخرجه النسائي (6160) عن عمرو بن علي الفلاس وحميد بن مسعدة، عن يزيد بن زريع، بهذا الإسناد. دون قوله: "ولا ربحُ ما لم يُضمَن".وأخرجه ابن ماجه (2188) عن أزهر بن مروان، عن حماد بن زيد، به. دون ذكر السلف والبيع والشرطين في بيع.وأخرجه أحمد 11/ (6671)، وأبو داود (3504)، وابن ماجه (2188)، والترمذي (1234)، والنسائي (6181) من طريق إسماعيل ابن عُليَّة، عن أيوب السختياني، به. وقال الترمذي: حسن صحيح.وانظر ما بعده.وقوله: "لا يحلُّ سلف وبيع .. " يدخل في باب النهي عن بيعتين في بيعة، وذلك مثل أن يقول: أبيعك هذا العبد بخمسين دينارًا على أن تسلفني ألف درهم في متاع أبيعه منك إلى أجل، أو على أن تقرضني ألف درهم، ويكون معنى السلف: القرض، وذلك فاسد لأنه إنما يقرضه على أن يحابيه في الثمن، فيدخل الثمن في حد الجهالة، ولأنَّ كل قرض جرَّ نفعًا مشروطًا فهو ربا، ولأنَّ في العقد شرطًا ولا يصح.وقوله: "ولا شرطان في بيع" وهو أيضًا بمنزلة بيعتين في بيعة، وهو مثل أن يقول: بعتك هذا الثوب حالًا بدينار ونسيئة بدينارين، فهذا بيع تضمن شرطين يختلف المقصود منه باختلافهما، وهو الثمن ويدخله الغرر والجهالة، ولا فرق في مثل ذلك بين شرط واحد أو شرطين أو أكثر عند أكثر العلماء لأنَّ العلة في ذلك واحدة، وفرَّق أحمدُ بين شرط وبين شرطين عملًا بظاهر الحديث.والمراد من هذه الشروط ما يناقض البيوع ويفسدها كالشروط التي تدخل الثمن في حدّ الجهالة أو ما يوقع في العقد أو في تسليم المبيع غررًا، أو يمنع المشتري من اقتضاء حق الملك في المبيع. ولا تدخل في ذلك الشروطُ التي هي من مصلحة العقد أو من مقتضاه، فهي جائزة.وقوله: "ولا ربحُ ما لم يُضمن" فهو أن يبيعه سلعةً قد اشتراها ولم يكن قبضها فهي من ضمان البائع الأول، ليس من ضمانه، فهذا لا يجوز بيعه حتى يقبضه، فيكون من ضمانه.وقوله: "ولا بيع ما ليس عندك" يعني بيع العين دون بيع الصفة، وهو بيع ما ليس عند البائع في الحال، ويدخل في ذلك بيع كل ما ليس بمضمون على البائع أن يحصله، وكذا بيع الرجل مال غيره موقوفًا على إجازة المالك، وعلة النهي عن ذلك كله الغررُ واحتمال الوجود أو العدم، أفاد ذلك كلَّه الخطابي في "معالم السنن" 3/ 140 - 143، وابن الأثير في "النهاية" في المواد (سلف وشرط وضمن).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2216)


2216 - أخبرَناه أبو بكر أحمد بن إسحاق، أخبرنا علي بن محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب القرشي، حدثنا أبو الوليد الطيالسي، حدثنا يزيد بن زُرَيع الرَّمْلي، حدثنا عطاءٌ الخُراساني، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: قلت: يا رسولَ الله، إني أسمعُ منك أشياءَ أخافُ أن أنساها، فتأذنُ لي أن أكتُبَها؟ قال: "نعم". قال: فكان فيما كَتَبَ عن رسولِ الله صلى الله عليه وسلم: أنه لما بَعَثَ عَتَّابَ بن أَسِيدٍ إلى أهل مكة، قال: "أخبِرْهُم أنه لا يجوزُ بيعانِ فِي بَيعٍ، ولا بَيعُ ما لا يُملَكُ، ولا سلفٌ وبَيعٌ، ولا شرطانِ في بَيعٍ" [1].




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি আপনার নিকট থেকে এমন কিছু বিষয় শুনি যা ভুলে যাওয়ার ভয় করি। আপনি কি আমাকে তা লিখে রাখার অনুমতি দেবেন? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে যা কিছু আমি লিখেছিলাম, তার মধ্যে একটি হলো— তিনি যখন আত্তাব ইবনু আসীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মক্কার অধিবাসীদের কাছে প্রেরণ করেন, তখন তাকে বলেছিলেন: "তাদেরকে জানিয়ে দাও যে, এক বিক্রয়চুক্তির মধ্যে দু'টি বিক্রয়চুক্তি, যা মালিকানায় নেই তা বিক্রি করা, কর্জ (ঋণ) ও বিক্রয় একত্রিত করা, এবং এক বিক্রয়চুক্তিতে দু'টি শর্তারোপ করা বৈধ নয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لضعف يزيد بن زُريع الرمْلي، وهو غير يزيد بن زريع البصري الحافظ الثقة، ولكنه متابع.وأخرجه عبد الرزاق (14222)، وسحنون في "المدونة" 2/ 457، والنسائي (5010)، وابن حبان (4321) من طريق ابن جُرَيج، عن عطاء الخراساني، أنَّ عبد الله بن عمرو بن العاص قال … وعند النسائي وابن حبان: عن عبد الله بن عمرو بن العاص. وهذا مرسل، وقال النسائي فيما نقله عنه المزي في "تحفة الأشراف" 6/ 362 (8885): هذا منكر، وهو عندي خطأ، ونقل عنه الزيلعي في "نصب الراية" 4/ 19 قوله: هذا خطأ، وعطاء الخُراساني لم يسمع من عبد الله بن عمرو بن العاص.وأخرجه أبو سعيد عيسى بن سالم الشاشي في "جزئه" (93) من طريق زيد بن أبي أُنيسة، وابن أبي شيبة 6/ 572 من طريق حجاج بن أرطاة، والطبراني في "الأوسط" (1498) من طريق أيوب السختياني، والبيهقي 5/ 313 من طريق محمد بن عجلان وعبد الملك بن أبي سليمان، و 5/ 339 من طريق الأوزاعي، كلهم عن عمرو بن شعيب، به بقصة عتاب بن أسِيد فقط وما بعثه النبي صلى الله عليه وسلم به.وقد تقدَّمت قصة عبد الله بن عمرو دون قصة عتّاب بن أَسِيد من طريق عُقَيل بن خالد عن عمرو ابن شعيب عن أبيه ومجاهد عن عبد الله بن عمرو بن العاص برقم (363)، ومن طريق يوسف بن ماهك عن عبد الله بن عمرو برقم (364).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2217)


2217 - أخبرني أبو الحسن علي بن أحمد بن قُرقُوب التمّار بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا أبو اليمان، أخبرني شعيب بن أبي حمزة، عن الزُّهْري، عن عُمارة بن خُزيمة، أنَّ عمَّه حدثه - وكان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.وحدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْلُ، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي والحسن بن علي بن زياد، قالا: حدثنا إسماعيل بن أبي أُويس، حدثنا أخي أبو بكر، عن سُليمان بن بلال، عن محمد بن أبي عَتيق، عن ابن شهاب، عن عُمارة بن خُزيمة، أنَّ عمَّه أخبره - وكان من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ابتاعَ فرسًا من رجل من الأعراب، فاستَتْبعَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ليقضيَ ثمنَ فرسِه، فأسرع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم المشيَ، وأبطأ الأعرابيُّ، فطَفِقَ رجالٌ يَعترِضُون الأعرابيَّ ويُساوِمونه الفرسَ، ولا يَشعُرون أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قد ابتاعَه، حتى زاد بعضُهم الأعرابيَّ في السَّومِ، فلما زادُوا، نادى الأعرابيُّ: يا رسولَ الله، إن كنتَ مبتاعًا هذا الفرس فابتَعْه، وإلّا بِعتُه، فقامَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حين سمع نداءَ الأعرابيِّ، حتى أتى الأعرابيَّ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أوَلَيس قد ابتَعْتُ منكَ؟ " قال: لا، والله ما بِعتُكَهُ، قال: "بل ابتَعْتُه منكَ"، فطَفِقَ الناس يَلُوذُون برسول الله صلى الله عليه وسلم وبالأعرابيِّ وهما يَتراجَعان، فَطَفِقَ الأعرابيُّ يقول: هَلُمَّ شهيدًا أني بايَعْتُك، فقال خُزيمةُ: أشهدُ أنك بايَعْتَه، فأقبَلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على خُزيمة، فقال: "بمَ تَشهدُ؟ " فقال: بتصديقِك، فجعلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم شهادةَ خُزيمةَ شهادةَ رجُلين [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ورجاله باتفاق الشيخين ثقاتٌ، ولم يُخرجاه، وعُمارة بن خزيمة سمعَ هذا الحديث من أبيه أيضًا:




খুযাইমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একজন বেদুঈন (আরব)-এর কাছ থেকে একটি ঘোড়া ক্রয় করেছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তার সাথে আসতে বললেন, যেন তিনি ঘোড়ার মূল্য পরিশোধ করতে পারেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দ্রুত হাঁটতে শুরু করলেন, কিন্তু ঐ বেদুঈন ধীরগতিতে চলছিল। তখন কিছু লোক বেদুঈনটিকে পথিমধ্যে থামিয়ে ঘোড়াটির দাম-দর করতে লাগল, তারা জানত না যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা আগেই ক্রয় করে নিয়েছেন। এমনকি তাদের মধ্যে কেউ কেউ বেদুঈনটির কাছে দাম বাড়িয়ে দিতে লাগল।

যখন তারা (দাম) বাড়িয়ে দিল, তখন বেদুঈনটি আওয়াজ দিয়ে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! যদি আপনি এই ঘোড়াটি ক্রয় করতে চান, তবে ক্রয় করে নিন, অন্যথায় আমি এটি বিক্রি করে দেব।

বেদুঈনের আহ্বান শুনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে গেলেন এবং তার কাছে আসলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কি তোমার কাছ থেকে তা ক্রয় করিনি?" সে বলল: না, আল্লাহর শপথ! আমি আপনার কাছে তা বিক্রি করিনি।

তিনি বললেন: "বরং আমি তোমার কাছ থেকে তা ক্রয় করেছি।" তখন লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং ঐ বেদুঈনটির চারপাশে ভিড় করতে লাগল, আর তারা দু'জন বিতর্ক করছিলেন। বেদুঈনটি বলতে লাগল: আপনি (আপনার দাবির পক্ষে) একজন সাক্ষী নিয়ে আসুন যে আমি আপনার কাছে এটি বিক্রি করেছি।

তখন খুযাইমাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনি তার কাছে তা ক্রয় করেছেন।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুযাইমাহর দিকে মনোনিবেশ করলেন এবং বললেন: "কীসের ভিত্তিতে তুমি সাক্ষ্য দিচ্ছ?" তিনি বললেন: আপনাকে সত্য মনে করার কারণে (বা আপনার সত্যবাদিতার প্রমাণস্বরূপ)।

অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুযাইমাহর এই সাক্ষ্যকে দুইজন লোকের সাক্ষ্য হিসেবে গণ্য করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. إبراهيم بن الحسين: هو ابن ديزيل، وأبو اليمان: هو الحكم بن نافع، ومحمد بن أبي عتيق: هو ابن عبد الله بن محمد بن عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق، وهو ثقة، وثقه الدارقطني في "سؤالات الحاكم"، والذهبي في "تاريخ الإسلام" 3/ 729، وإنما ذكرنا ذلك في شأن ابن أبي عتيق، لأنه فات الحافظين المزي وابن حجر ذكر توثيق الدارقطني. وأخرجه أحمد 36/ (21883)، وأبو داود (367) من طريق أبي اليمان الحكم بن نافع، بإسناده.وأخرجه النسائي (6198) من طريق محمد بن الوليد الزُّبَيدي، عن ابن شهاب الزُّهْري، به.قوله: يلوذُون، أي: يُحيطون.قال الخطابي في "معالم السنن" 4/ 173: هذا حديث يضعه كثير من الناس في غير موضعه، وقد تذرّع به قوم من أهل البدع إلى استحلال الشهادة لمن عُرف عنده بالصدق على كل شيء ادّعاه، وإنما وجه الحديث ومعناه: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم إنما حكم على الأعرابي بعلمه، إذ كان النبي صلى الله عليه وسلم صادقًا بارًّا في قوله، وجرت شهادة خزيمة في ذلك مجرى التوكيد لقوله، والاستظهار بها على خصمه، فصارت في التقدير شهادته له وتصديقه إياه على قوله كشهادة رجلين في سائر القضايا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2218)


2218 - حدَّثَناه الأستاذُ أبو الوليد، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب ومحمد بن إسحاق، قالا: حدثنا عَبْدة بن عبد الله الخُزاعي، حدثنا زيد بن الحُبَاب، حدثني محمد بن زُرَارة بن عبد الله بن خُزيمة بن ثابت، حدثني عُمارة بن خُزيمة، عن أبيه خُزيمة بن ثابت: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ابتاعَ من سَواء بن الحارث المُحاربي [1] فرسًا، فجَحَدَهُ، فشَهِدَ له خُزيمةُ بن ثابت، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما حَمَلَك على الشهادة ولم تَكُنْ معه؟ " قال: صدَقْتَ يا رسول الله، ولكن صدَّقتُك بما قُلتَ، وعرفتُ أنك لا تقول إلّا حقًّا، فقال: "مَن شَهِدَ له خُزيمةُ أو شَهِدَ عليه فحَسْبُه" [2].




খুযাইমা ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সুওয়া ইবনুল হারিস আল-মুহারিবি নামক এক ব্যক্তির কাছ থেকে একটি ঘোড়া ক্রয় করেছিলেন। কিন্তু সে তা (বিক্রয়ের বিষয়টি) অস্বীকার করল। তখন খুযাইমা ইবনে সাবিত তাঁর (রাসূলের) পক্ষে সাক্ষ্য দিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বললেন: "তোমার সাক্ষ্য দেওয়ার কারণ কী, অথচ তুমি তো তাঁর (ক্রয়-বিক্রয়ের) সাথে ছিলে না?" তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি সত্য বলেছেন। কিন্তু আপনি যা বলেছেন, আমি তা সত্য বলে বিশ্বাস করেছি এবং আমি জানি যে, আপনি সত্য ছাড়া অন্য কিছু বলেন না। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার পক্ষে খুযাইমা সাক্ষ্য দেবে অথবা যার বিপক্ষে সাক্ষ্য দেবে, সেটাই তার জন্য যথেষ্ট।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في (ز): المحارمي، بالميم بدل الباء الموحدة، مصححًا عليها، وهو خطأ، والصواب المحاربي، كما وقع في (ص) وغيرها، وقد ذكر هذا الرجلَ في وفد بني محارب غيرُ واحد من أصحاب السير والمغازي، كابن سعد في "الطبقات" 1/ 258، وانظر "أسد الغابة" لابن الأثير 2/ 330. في "المعرفة" (3564)، وهذا أشبه في رواية محمد بن زرارة، لأنَّ الزُّهْري قد خالفه كما في الطريق الذي قبله فأسنده عن عمارة بن خزيمة عن عمه، فجعله عن عم عمارة بن خزيمة، وليس عن أبيه، وإن كان عمارة يروي عن أبيه غير ما حديثٍ، والله تعالى أعلم.وأخرجه البيهقي 10/ 146 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة في "مسنده" (19)، والبخاري في "تاريخه الكبير" 1/ 87، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2084)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (4019/ 3)، وابن المنذر في "الأوسط" (6752)، والطبراني في "الكبير" (3730)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2357)، والخطيب في "الأسماء المبهمة" ص 121 - 122، وفي "موضح أوهام الجمع والتفريق" 2/ 106، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 16/ 366، وابن بشكوال في "غوامض الأسماء" ص 360، وابن الأثير في "أسد الغابة" 2/ 331 من طرق عن زيد بن الحباب، به. وبعضهم سمى الأعرابي في روايته: سواء بن قيس، قال الحافظ في "الإصابة" 3/ 251: أظنه وهمًا، ثم ذكر رواية المطلب بن عبد الله بن حنطب التي أشرنا إليها قريبًا، وقد جاء اسمه فيها سواء ابن الحارث، كرواية الأكثرين.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة محمد بن زرارة بن عبد الله بن خزيمة، فلم يرو عنه غير زيد بن الحُباب، وقد روى عبدة بن عبد الله أيضًا عن زيد بن الحباب عن محمد بن زرارة قال: حدثني المطلب بن عبد الله بن حنطب، قال: قلت لبني سواء بن الحارث: أبوكم الذي جحد بيعة رسول الله صلى الله عليه وسلم … أخرجه ابن منده في "معرفة الصحابة" 1/ 809، وعنه أبو نعيم في "المعرفة" (3564)، وهذا أشبه في رواية محمد بن زرارة، لأنَّ الزُّهْري قد خالفه كما في الطريق الذي قبله فأسنده عن عمارة بن خزيمة عن عمه، فجعله عن عم عمارة بن خزيمة، وليس عن أبيه، وإن كان عمارة يروي عن أبيه غير ما حديثٍ، والله تعالى أعلم.وأخرجه البيهقي 10/ 146 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة في "مسنده" (19)، والبخاري في "تاريخه الكبير" 1/ 87، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2084)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (4019/ 3)، وابن المنذر في "الأوسط" (6752)، والطبراني في "الكبير" (3730)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2357)، والخطيب في "الأسماء المبهمة" ص 121 - 122، وفي "موضح أوهام الجمع والتفريق" 2/ 106، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 16/ 366، وابن بشكوال في "غوامض الأسماء" ص 360، وابن الأثير في "أسد الغابة" 2/ 331 من طرق عن زيد بن الحباب، به. وبعضهم سمى الأعرابي في روايته: سواء بن قيس، قال الحافظ في "الإصابة" 3/ 251: أظنه وهمًا، ثم ذكر رواية المطلب بن عبد الله بن حنطب التي أشرنا إليها قريبًا، وقد جاء اسمه فيها سواء ابن الحارث، كرواية الأكثرين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2219)


2219 - أخبرني أبو عون محمد بن أحمد بن ماهَان الجزّار بمكة، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا حجاج بن مِنْهال، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن قيس بن سعد، عن عطاء، عن جابر، قال: بِعْنا أمهاتِ الأولاد على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر، فلما كان عمرُ نهانا فانتَهَينا [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهد صحيح:




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের যুগে এবং আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে উম্মাহাতুল আওলাদ (মালিকের সন্তানধারণকারী দাসী) বিক্রি করতাম। কিন্তু যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (খলীফা) হলেন, তখন তিনি আমাদেরকে তা নিষেধ করলেন এবং আমরা বিরত হলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. عطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه أبو داود (3954)، وابن حبان (4324) من طريقين عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 22/ (14446)، وابن ماجه (2517)، والنسائي (5021) و (5022)، وابن حبان (4323) من طريق ابن جُرَيج، أخبرني أبو الزُّبَير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: كنا نبيع سَرَاريَّنا وأمهاتِ أولادنا والنبي صلى الله عليه وسلم فينا حيٌّ، لا نرى بذلك بأسًا.قال البيهقي في "سننه الكبرى" 10/ 348: ليس في شيء من الطرق أنه اطلع على ذلك وأقرهم عليه صلى الله عليه وسلم.وقال ابن حزم في "المحلى" 9/ 219: ليس فيه أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم علم ذلك.وقد ثبت عن علي بن أبي طالب أنه قال: اجتمع رأيي ورأي عمر في أمهات الأولاد أن لا يُبَعن، ثم رأيتُ بعد أن يُبعن، قال عَبيدة السَّلماني: فقلت له: فرأيك ورأي عمر في الجماعة أحبّ إليَّ من رأيك وحدك في الفُرقة. أخرجه عبد الرزاق (13224).لكن ثبت عن علي أنه رجع عن ذلك أخيرًا إلى رأي عمر، وذلك فيما قاله لِعَبيدة السَّلْماني وشريح: اقضوا كما كنتم تقضون، فإني أكره الاختلاف، حتى يكون للناس جماعة، أو أموت كما مات أصحابي. أخرجه البخاري (3707).قال البَغَوي في "شرح السنة" 9/ 370: هذا يدلُّ على أنه وافق الجماعة على أنها لا تُباع، واختلاف الصحابة إذا خُتم باتفاق وانقرض العصر عليه، كان إجماعًا.قلنا: لكن يعكّر على القول بالإجماع ما رواه سفيان بن عيينة في "جزئه" برواية زكريا بن يحيى (19) عن عمرو بن دينار، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس، قال: والله ما أمُ ولدك إلّا بمنزلة شاتك أو بعيرك. قال البخاري في "تاريخه الكبير" 2/ 388: هذا المعروف من فُتيا ابن عباس. قلنا: ولعلَّ قصد ابن عباس أنَّ حكمها كذلك في حال حياة سيدها من حيث عدم استحقاقها حقوق الزوجة الحرة، وعدم ترتب الآثار اللازمة فيه كما في نكاح المسلم للمرأة الحرة، كعدم جواز الزيادة على الأربع في النكاح، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2220)


2220 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب ويوسف بن يعقوب، قالا: حدثنا عمرو بن مرزوق، أخبرنا شعبة، عن زيدٍ العَمِّي، عن أبي الصِّدِّيق الناجِيّ، عن أبي سعيد الخُدْري، قال: كنا نبيعُ أمهاتِ الأولاد على عهدِ رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে উম্মাহাতুল আওলাদ (অর্থাৎ যে দাসী তার মনিবের সন্তান জন্ম দিয়েছে) বিক্রি করতাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف زيد العَمّي: وهو ابن الحواري أبو الصِّدّيق الناجي: هو بكر بن عمرو، ويقال: ابن قيس.وأخرجه أحمد 17/ (11164)، والنسائي (523) من طريقين عن شعبة، بهذا الإسناد. - وهو ابن عبد الله النخعي - في حفظه سوء.وأخرجه أحمد 4/ (2759) و 5/ (2910)، وابن ماجه (2515) من طرق عن شريك النخعي، بهذا الإسناد.ورواه بنحو هذا اللفظ الدارقطني في "السنن" (4232) من طريق سفيان الثوري، عن حسين بن عبد الله، به. وإسناده واهٍ، فيه من اتُّهم بالكذب.