আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
2241 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا بشر بن عُبيد الدّارِسي، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الدَّينُ رايةُ الله في الأرض، فإذا أراد أن يُذِلَّ عبدًا وَضَعَها في عُنُقِه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঋণ হলো জমিনে আল্লাহর নিশান। যখন তিনি কোনো বান্দাকে অপমানিত করতে চান, তখন তিনি তা তার গলায় ঝুলিয়ে দেন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، من أجل بشر بن عُبيد الدارسي، فهو واهٍ، كما قال المنذري في "الترغيب والترهيب" 2/ 370، والذهبي في "تلخيص المستدرك". وقد جاء الحديث من وجهين آخرين عن محمد بن غالب - وهو تمتام الحافظ المعروف بزيادة رجل بين بشر وحماد، وهو أبو موسى المقرئ، ولم نَتبيّن من هو. وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الفوائد المنتقاة" في الجزء الثالث عشر منها (209) عن محمد بن غالب، وأبو منصور الدَّيلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" منه للحافظ ابن حجر (1626)، و (1627) من طريق محمد بن عبد الله بن بَرْزَة، عن محمد بن غالب، عن بشر بن عبيد الدارسي، قال: حدثنا أبو موسى المقرئ، قال: حدثنا حماد بن سلمة، به.
2242 - أخبرني إسماعيل بن محمد الشَّعراني، حدثنا جدي، حدثنا إبراهيم بن حمزة الزُّبَيري، حدثنا ابن أبي حازم [1]، عن سُهيل بن أبي صالح، عن موسى بن عُقبة، عن عاصم بن أبي عُبيد، عن أم سَلَمة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنه كان يدعُو بهؤلاء الكلماتِ: "اللهم أنتَ الأولُ فلا شيءَ قبلَكَ، وأنت الآخِرُ فلا شيءَ بعدَك، أعوذُ بكَ من شَرِّ كلِّ دابّةٍ ناصيتُها بيدِك، وأعوذ بكَ من الإثمِ والكَسَل، ومن عذابِ القَبرِ، ومن عذابِ النارِ، ومِن فتنةِ الغِنى، ومن فتنةِ الفَقْر، وأعوذُ بكَ من المأثَمِ والمَغرمِ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এই বাক্যগুলো দ্বারা দু‘আ করতেন: "হে আল্লাহ! আপনিই আদি, তাই আপনার পূর্বে আর কিছুই নেই। আপনিই অন্ত, তাই আপনার পরে আর কিছুই নেই। আমি আপনার কাছে আশ্রয় চাই সেই সকল বিচরণশীল প্রাণীর অনিষ্ট থেকে, যাদের কপালের কেশগুচ্ছ (নিয়ন্ত্রণ) আপনার হাতে। আমি আপনার কাছে আশ্রয় চাই পাপ এবং অলসতা থেকে, কবরের আযাব থেকে, জাহান্নামের আযাব থেকে, ধন-সম্পদের পরীক্ষা থেকে এবং দারিদ্র্যের পরীক্ষা থেকে। আমি আপনার কাছে আশ্রয় চাই গুনাহের কাজ ও ঋণগ্রস্ততা থেকে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب): مزاحم، وهو خطأ، وابن أبي حازم: هو عبد العزيز.
[2] إسناده محتمل للتحسين من أجل عاصم بن أبي عبيد كما سلف برقم (1943).وأخرجه البيهقي في "الأسماء والصفات" (13)، وأبو القاسم الأصبهاني في "الحُجة في بيان المحجة" (33) من طريق أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.
2243 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ، حدثنا هشام بن علي، حدثنا عبد الله بن رجاء، حدثنا سعيد بن سلمة بن أبي الحُسام، حدثنا العلاء بن عبد الرحمن.وأخبرني أبو بكر بن أبي نصر، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا القَعْنبي، حدثنا عبد العزيز بن محمد، حدثنا العلاء بن عبد الرحمن، عن أبي كثير مولى محمد بن جَحْش، عن محمد بن جحش، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قاعدًا حيث تُوضَعُ الجنائز، فرفع رأسَه قِبَلَ السماءِ، ثم خَفَضَ بصرَه فوضع يدَه على جَبْهتِه، فقال: "سبحانَ اللهِ سبحان الله! ما أنزلَ اللهُ من التشديدِ! " قال: فعَرَفْنا وسَكَتْنا، حتى إذا كان الغدُ، سألتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقلتُ: يا رسول الله، ما التشديدُ الذي نَزَلَ؟ قال: "في الدَّيْن، والذي نفسُ محمدٍ بيدِه، لو قُتِلَ رجلٌ في سبيل الله، ثم عاشَ ثم قُتل ثم عاشَ، وعليه دَينٌ، ما دخَلَ الجنةَ حتَّى يُقضى دينُه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
মুহাম্মাদ ইবনু জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন এক স্থানে বসে ছিলেন যেখানে জানাযা রাখা হয়। অতঃপর তিনি আকাশের দিকে মাথা তুললেন, তারপর দৃষ্টি অবনত করলেন এবং নিজের হাত কপালে রাখলেন। অতঃপর বললেন: "সুবহানাল্লাহ! সুবহানাল্লাহ! আল্লাহ তাআলা কতই না কঠোরতা নাযিল করেছেন!" তিনি বলেন, আমরা তা বুঝতে পারলাম কিন্তু নীরব রইলাম। পরের দিন যখন হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম এবং বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! কী সেই কঠোরতা যা নাযিল হয়েছে? তিনি বললেন: "ঋণের (ব্যাপারে)। সেই সত্তার কসম, যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন! যদি কোনো ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় শহীদ হয়, তারপর জীবিত হয়, তারপর আবার শহীদ হয়, তারপর আবার জীবিত হয়, আর তার উপর ঋণ বাকি থাকে, তবে সে তার ঋণ পরিশোধ না করা পর্যন্ত জান্নাতে প্রবেশ করবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل أبي كثير مولي محمد بن جحش، فقد روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وكنا قد ضعفناه في "المسند" 37/ (22493) بهذه السياقة، لكونه روي بلفظ آخر سنذكره لاحقًا، ثم ظهر لنا أن لا تعارض بين اللفظين، لأنَّ ثاني اللفظين يمكن أن يكون مختصرًا من اللفظ الذي هنا، وقد جمع الدارقطني في "العلل" (3384) بين طُرق الحديث بلفظيه، فكأنه رآه حديثًا واحدًا، وهو الصحيح إن شاء الله تعالى، فلا يُعِلُّ أحدُ اللفظين الآخر، والله تعالى أعلم. عبد الله بن رجاء: هو الغُدَاني، والقعنبي: هو عبد الله بن مسلمة.وأخرجه أحمد 37/ (22493)، والنسائي (6237) من طريقين عن العلاء بن عبد الرحمن به.وأخرجه أحمد 28/ (17253) من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي كثير، عن محمد بن عبد الله بن جحش: أنَّ رجلًا جاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، ماذا لي إن قُتِلتُ في سبيل الله؟ قال: "الجنة"، فلما ولى قال: "إلّا الدَّين، سارّني به جبريل عليه السلام آنفًا" وإسناده حسن أيضًا.ويشهد له بهذا اللفظ الثاني المختصر حديث أبي قتادة الذي أخرجه مسلم (1885)، وحديث أبي هريرة عند النسائي (4348)، وإسناده صحيح، فهو صحيح لغيره.ويشهد للمرفوع وحده حديث عبد الله بن عمرو بن العاص عند مسلم (1886) بلفظ: "يغفر للشهيد كلُّ ذنب إلّا الدَّين".وقوله: حيث توضع الجنائز، يعني في مسجد النبي صلى الله عليه وسلم، كما جاء في حديث رجم اليهوديين عند البخاري (7332).قال ابن عبد البر في "التمهيد" 23/ 238: الدَّين الذي يُحبس به صاحبُه عن الجنة - والله أعلم - هو الذي قد ترك له وفاءً ولم يُوصِ به، أو قدر على الأداء فلم يُؤدِّ، أو ادّانه في غير حقٍّ، أو في سَرَف ومات ولم يؤدِّه، وأما من ادَّان في حقٍّ واجب لفاقةٍ وعُسر، ومات ولم يترك وفاءً، فإنَّ الله لا يحبسه به عن الجنة إن شاء الله، لأنَّ على السلطان فرضًا أن يؤدي عنه دَينَه، إما من جملة الصدقات، أو من سهم الغارمين، أو من الفَيْء الراجع على المسلمين من صنوف الفيء، وقد قيل: إنَّ قول رسول الله صلى الله عليه وسلم وتشديده في الدَّين كان قبل أن يفتح الله عليه ما يجب منه الفيء والصدقات لأهلها. وانظر لزامًا "شرح الزرقاني على الموطأ" 3/ 55 - 56.
2244 - حدثنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا محمد بن عبد الوهاب بن حبيب العَبْدي، حدثنا جعفر بن عَون، أخبرنا إسماعيل بن أبي خالد.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا محمد بن أحمد بن النضر، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا أبو إسحاق الفَزَاري، عن إسماعيل بن أبي خالد.وأخبرنا أبو عبد الله بن يعقوب، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد، عن إسماعيل بن أبي خالد، حدثني عامرٌ الشَّعبي، عن سَمُرة بن جُندُب، قال: صلَّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ذاتَ يومٍ، فلما أقبَلَ قال: "ها هنا مِن بني فُلانٍ أحدٌ؟ " فسكتَ القومُ - وكان إذا ابتغاهم بشيء سكتوا - ثم قال: "ها هنا من بني فُلانٍ أحدٌ؟ "، فقال رجلٌ: هذا فُلانٌ، فقال: "إنَّ صاحِبَكم قد حُبِسَ على باب الجنةِ بدَينٍ كان عليه" فقال رجلٌ: عَليَّ دَينُه، فقَضَاه [1].وهكذا رواه فراسٌ عن الشعبي:
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন সালাত আদায় করলেন। এরপর যখন তিনি (সালাত শেষে) লোকদের দিকে ফিরলেন, তিনি বললেন, "বনু ফূলান (অমুক গোত্রের) কেউ কি এখানে আছে?" লোকেরা নীরব রইল—তিনি যখনই তাদের কাছে কোনো বিষয়ে জানতে চাইতেন, তারা নীরব থাকত। এরপর তিনি আবার বললেন, "বনু ফূলানের কেউ কি এখানে আছে?" তখন এক ব্যক্তি বলল, "এই যে অমুক ব্যক্তি।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমাদের এই সাথী তার উপর থাকা ঋণের কারণে জান্নাতের দরজায় আটকে আছে।" তখন এক ব্যক্তি বলল, "তার ঋণ পরিশোধের দায়িত্ব আমার উপর রইল," অতঃপর সে তা পরিশোধ করল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وقد وقع تصريح الشعبي بسماعه هذا الحديثَ من سمرة عند أبي داود الطيالسي (932)، وسيأتي برقم (2246) أنَّ الشعبي رواه عن سمرة بواسطة سِمعان بن مُشَنَّج، وهو قوي الحديث، لكن لا يُنكر سماعُ الشعبي من سمرة أيضًا، فقد كان عمر الشعبي عند وفاة سمرة قريب الثمانية والثلاثين عامًا، فكيف إذا انضم إلى ذلك تصريحه بالسماع عند الطيالسي، فلا يبعد عند ذلك أن يكون الشعبيُّ قد سمعه على الوجهين، والله أعلم بالصواب.وأخرجه أحمد 33/ (20124) من طريق شعبة، عن إسماعيل بن أبي خالد، به.وقد تابع إسماعيلَ بنَ أبي خالد فراسُ بنُ يحيى، كما في الطريق التالية، والعلاء بن عبد الكريم الياميّ عند الطبراني في "الأوسط" (3049)، وإسناده قويّ.
2245 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصغَاني، حدثنا يحيى بن حماد وعفان بن مسلم، قالا: حدثنا أبو عَوَانة، عن فِراسٍ.وحدثنا علي بن حَمْشاذَ، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا محمد بن سعيد ابن الأصبهاني، حدثنا عبد الرحمن بن محمد المُحارِبي، عن يزيد الدّالاني، عن فِراسٍ.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو مسلم ومحمد بن غالب، قالا: حدثنا عمرو بن مرزُوق، حدثنا شعبة، عن فِراسٍ، عن الشعبي، عن سَمُرةَ بن جُندب، قال: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم ذاتَ يومٍ، فقال: "ها هنا أحدٌ من بني فُلانٍ؟ " فنادى ثلاثًا لا يجيبه أحدٌ، ثم قال: "إنَّ الرجلَ الذي ماتَ بينكم قد احتُبِس عن الجنة مِن أجْلِ الدَّين الذي عليه، فإن شئتُم فافْدُوه، وإن شئتُم فأسلِمُوه إلى عذابِ الله" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، لخلافٍ فيه من سعيدِ بن مَسروق الثَّوْري.
সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করলেন, অতঃপর বললেন: "এখানে কি বনি ফূলান (অমুক গোত্রের) কেউ আছে?" তিনি তিনবার ডাকলেন, কিন্তু কেউ উত্তর দিল না। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের মাঝে যে ব্যক্তি মারা গেছে, তার ওপর থাকা ঋণের কারণে সে জান্নাত থেকে আটকে আছে। যদি তোমরা চাও, তবে তার (ঋণ) পরিশোধ করে দাও, আর যদি তোমরা চাও, তবে তাকে আল্লাহর শাস্তির (আযাবের) জন্য ছেড়ে দাও।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح كسابقه. فراس: هو ابن يحيى المُكتِب، وأبو مسلم: هو الكَجِّي الحافظ. وأخرجه أحمد 33/ (20232) عن عفان بن مسلم، بهذا الإسناد. الطبراني في "الكبير" (6756).
2246 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إبراهيم بن محمد بن الهيثم، حدثنا عبد الله بن عمر بن أبان، حدثنا أبو الأحوص، عن سعيد بن مَسروق، عن الشعبي، عن سِمعان بن مُشنَّج.وأخبرني أبو بكر بن عبد الله الوَرَّاق، حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا أبو بكر بن أبي شَيْبة، حدثنا وكيع، عن أبيه، عن سعيد بن مسروق، عن الشعبي، عن سِمْعان بن مُشنَّج، عن سمرة بن جندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم، نحوه [1]. مُتعذِّرٌ أن تُعلَّلَ روايةُ إسماعيلَ بن أبي خالد وفراسِ بن يحيى من رواية الأئمة الأثبات عنهما، بمثلِ هذه الروايات، والله أعلم.
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ একটি বর্ণনা করেছেন। (২ ২৪৬) আবূ বকর ইবনে ইসহাক আমাদের কাছে তা বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, ইবরাহীম ইবনে মুহাম্মাদ ইবনে হাইসাম আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আবদুল্লাহ ইবনে উমার ইবনে আবান আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আবুল আহওয়াস আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি সাঈদ ইবনে মাসরূক, তিনি শা'বী, তিনি সিমআন ইবনে মুশান্নাজ থেকে (এটি বর্ণনা করেছেন)। আর আবূ বকর ইবনে আবদুল্লাহ আল-ওয়াররাক আমাকে অবহিত করেছেন, তিনি বলেন, হাসান ইবনে সুফিয়ান আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আবূ বকর ইবনে আবী শাইবা আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, ওয়াকী‘ তাঁর পিতা, তিনি সাঈদ ইবনে মাসরূক, তিনি শা'বী, তিনি সিমআন ইবনে মুশান্নাজ, তিনি সামুরা ইবনে জুনদুব থেকে, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন [১]। ইসমাইল ইবনে আবি খালিদ এবং ফিরাসে ইবনে ইয়াহইয়া কর্তৃক বর্ণিত ইমামগণের নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকে এ ধরনের বর্ণনার মাধ্যমে ত্রুটিযুক্ত করা কঠিন। আল্লাহই ভালো জানেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل سمعان بن مُشنَّج، فقد وثقه العجلي وابن ماكولا، وذكره ابن خلفون وابن حبان في "الثقات"، وقد صحَّ عن الشعبي عن سمرة مباشرة، دون ذكر سمعان فيه، كما تقدم في الطريقين اللتين قبله، بل جزم النسائي بإثر (6238) أنه لا يَعلَم أحدًا قال في هذا الحديث: عن سمعان، غير سعيد بن مسروق.وأخرجه أبو داود (3341) عن سعيد بن منصور، عن أبي الأحوص، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 33/ (20231)، والنسائي (6238) من طريق عبد الرزاق، وأحمد (20233) عن أبي سفيان المعمري، كلاهما عن سفيان الثَّوري، عن أبيه - وهو سعيد بن مسروق -، به.ورواه وكيع بن الجراح مرةً عن سفيان الثَّوري، فلم يذكر في إسناده سمعان، أخرجه من طريقه الطبراني في "الكبير" (6756).
2247 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سُليمان، حدثنا عبد الله بن وهب قال: سمعتُ حَيْوةَ بن شُريح يحدِّث عن بكر بن عمرو المَعَافِري، عن شعيب بن زُرْعة، عن عُقْبة بن عامر الجُهَني أنه قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقولُ لأصحابه: "لا تُخِيفُوا أنفُسَكم" فقيل: يا رسول الله، وما نُخِيفُ أنفُسَنا؟ قال: "بالدَّينِ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উকবাহ ইবন আমের আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর সাহাবীদেরকে বলতে শুনেছি: "তোমরা তোমাদের নিজেদেরকে ভয় দেখাবে না।" জিজ্ঞাসা করা হলো, "হে আল্লাহর রাসূল, আমরা কীভাবে আমাদের নিজেদেরকে ভয় দেখাই?" তিনি বললেন, "ঋণের (মাধ্যমে)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل بكر بن عمرو المعافري وشعيب بن زُرعة.وأخرجه أحمد 28/ (17407) عن عبد الله بن يزيد المقرئ، عن حيوة بن شريح، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا (17320) من طريق رشدين بن سعْد، عن بكر بن عمرو، به. وأخرجه أحمد 37/ (22427) عن عبد الوهاب بن عطاء الخفَّاف، بهذا الإسناد. لكنه قال في روايته: "الكبر" بالباء والراء بدل: "الكنز" بالنون والزاي. وقد وافق يحيى بنَ أبي طالب على روايته بالنون والزاي الحارثُ بنُ أبي أسامة عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1411).وأخرجه الترمذي (1573) من طريق ابن أبي عدي، والنسائي (8711) عن عمرو بن علي الفلَّاس، عن يزيد بن زُريع، كلاهما (ابن أبي عدي ويزيد بن زريع) عن سعيد بن أبي عروبة، به. فقالا في روايتهما: "الكنز" بالنون والزاي.وأخرجه أحمد (22427) عن محمد بن بكر البُرساني، وابن ماجه (2412) من طريق خالد بن الحارث، كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، وأخرجه النسائي (8711) عن محمد بن عبد الله بن بزيع، وابن حبان (198) من طريق محمد بن المنهال الضرير وأمية بن بسطام، ثلاثتهم (ابن بزيع وابن المنهال وأمية) عن يزيد بن زُريع، عن سعيد بن أبي عروبة، فقالوا جميعًا في رواياتهم: "الكبر" بالباء والراء.وأخرجه أحمد (22369) و (22390) و (22428) و (22434) من طريق همام بن يحيى، و (22369) من طريق أبان بن يزيد العطار، و (22428) عن محمد بن جعفر، عن شعبة، ثلاثتهم عن قَتَادة، به، ووقع في رواية همام وأبان: "الكبر" بالباء والراء، وأسقط أحمد هذا الحرفَ من رواية شعبة مع أنه ثابت في رواية محمد بن جعفر عنه بالنون والزاي، كما نصَّ عليه أحمد نفسُه فيما أسنده عنه أبو أحمد العسكري في "تصحيفات المحدثين" 1/ 140، وخطَّأ أحمدُ روايته وصحَّح الرواية بالباء والراء، وإنما دعا أحمد إلى ذلك أنَّ معظم الروايات التي وقعت له في "المسند" مما قدمنا ذكره إنما وقعت بالباء والراء، فصححها وخَطَّأ رواية محمد بن جعفر عن شعبة، وهذا بخلاف ما قدمنا ذكره في التعليق السابق من تخطئة الترمذي والدارقطني وغيرهما لرواية الباء والراء، وترجيحهم رواية النون والزاي وقولهم هو الراجح فيما نُرى، لأنَّ ابن عبد البر قد روى هذا الحديث في "الاستذكار" (12719) من طريق أبي بكر ابن أبي شيبة، عن عفان بن مسلم، عن أبان بن يزيد وهمام، عن قَتَادة به، ووقعت له الرواية بالنون والزاي، وأورد الحديث في باب ما جاء في الكنز من أبواب الزكاة، وهذا يؤيد أنَّ الأشبه في روايتهما ما وافقا عليه مَن رواه بالنون والزاي والله تعالى أعلم.
2248 - أخبرنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد، عن قَتَادة عن سالم بن أبي الجَعْد، عن مَعْدان بن أبي طلحة، عن ثَوْبان، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن فارقَ الرُّوحُ الجسدَ وهو بريءٌ من ثلاثٍ، دخلَ الجنةَ: الغُلولِ، والدَّينِ، والكَنْزِ [1] " [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . تابعه أبو عَوَانة عن قَتَادة في إقامة هذا الإسناد:
সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তির রূহ তার দেহ থেকে এমন অবস্থায় বিচ্ছিন্ন হয় যে, সে তিনটি বিষয় থেকে মুক্ত, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে: গনীমতের সম্পদ আত্মসাৎ (গূলূল), ঋণ এবং (যাকাতবিহীন) সঞ্চিত সম্পদ (কানয)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا قُيِّد في (ص) بالنون، وهو الموافق لكلام الترمذي الذي قاله بإثر الحديث (1573)، حيث قال: هكذا قال سعيد: الكنز، قال المنذري في "الترغيب والترهيب" 2/ 371: يعني بالزاي. قلنا: ونقل ابن الجوزي في "جامع المسانيد" 1/ 392 (796) عن الدارقطني قوله: إنما هو الكنز، بالنون، ونقل السيوطي في "قوت المغتذي" 1/ 414 عن العراقي قوله: من رواه بالموحدة والراء (يعني: الكِبْر) فهو تصحيف. قلنا: وقال العراقي في "تخريج أحاديث الإحياء" 3/ 338: وكذلك أيضًا ذكر ابن مردويه الحديث في تفسير {وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ} [التوبة: 34]. قلنا: وأورده ابن عبد البر في "الاستذكار" كما سيأتي في باب ما جاء في الكنز من أبواب الزكاة والفضة. وقال السِّندي في "حاشيته على ابن ماجه" 2/ 76: هذا هو الموافق لما بعده، إذ الكلام فيما يتعلق بالأموال. قلنا: وتصحف في (ز) و (ب) و (ع) إلى: الكبر، بالباء والراء، وانظر تمام الكلام عليه عند تخريج الحديث. وأخرجه أحمد 37/ (22427) عن عبد الوهاب بن عطاء الخفَّاف، بهذا الإسناد. لكنه قال في روايته: "الكبر" بالباء والراء بدل: "الكنز" بالنون والزاي. وقد وافق يحيى بنَ أبي طالب على روايته بالنون والزاي الحارثُ بنُ أبي أسامة عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1411).وأخرجه الترمذي (1573) من طريق ابن أبي عدي، والنسائي (8711) عن عمرو بن علي الفلَّاس، عن يزيد بن زُريع، كلاهما (ابن أبي عدي ويزيد بن زريع) عن سعيد بن أبي عروبة، به. فقالا في روايتهما: "الكنز" بالنون والزاي.وأخرجه أحمد (22427) عن محمد بن بكر البُرساني، وابن ماجه (2412) من طريق خالد بن الحارث، كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، وأخرجه النسائي (8711) عن محمد بن عبد الله بن بزيع، وابن حبان (198) من طريق محمد بن المنهال الضرير وأمية بن بسطام، ثلاثتهم (ابن بزيع وابن المنهال وأمية) عن يزيد بن زُريع، عن سعيد بن أبي عروبة، فقالوا جميعًا في رواياتهم: "الكبر" بالباء والراء.وأخرجه أحمد (22369) و (22390) و (22428) و (22434) من طريق همام بن يحيى، و (22369) من طريق أبان بن يزيد العطار، و (22428) عن محمد بن جعفر، عن شعبة، ثلاثتهم عن قَتَادة، به، ووقع في رواية همام وأبان: "الكبر" بالباء والراء، وأسقط أحمد هذا الحرفَ من رواية شعبة مع أنه ثابت في رواية محمد بن جعفر عنه بالنون والزاي، كما نصَّ عليه أحمد نفسُه فيما أسنده عنه أبو أحمد العسكري في "تصحيفات المحدثين" 1/ 140، وخطَّأ أحمدُ روايته وصحَّح الرواية بالباء والراء، وإنما دعا أحمد إلى ذلك أنَّ معظم الروايات التي وقعت له في "المسند" مما قدمنا ذكره إنما وقعت بالباء والراء، فصححها وخَطَّأ رواية محمد بن جعفر عن شعبة، وهذا بخلاف ما قدمنا ذكره في التعليق السابق من تخطئة الترمذي والدارقطني وغيرهما لرواية الباء والراء، وترجيحهم رواية النون والزاي وقولهم هو الراجح فيما نُرى، لأنَّ ابن عبد البر قد روى هذا الحديث في "الاستذكار" (12719) من طريق أبي بكر ابن أبي شيبة، عن عفان بن مسلم، عن أبان بن يزيد وهمام، عن قَتَادة به، ووقعت له الرواية بالنون والزاي، وأورد الحديث في باب ما جاء في الكنز من أبواب الزكاة، وهذا يؤيد أنَّ الأشبه في روايتهما ما وافقا عليه مَن رواه بالنون والزاي والله تعالى أعلم.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل يحيى بن أبي طالب وعبد الوهاب بن عطاء، فهما صدوقان لا بأس بهما، وقد توبعا. سعيد: هو ابن أبي عَرُوبة، وقتادة: هو ابن دِعامة. وأخرجه أحمد 37/ (22427) عن عبد الوهاب بن عطاء الخفَّاف، بهذا الإسناد. لكنه قال في روايته: "الكبر" بالباء والراء بدل: "الكنز" بالنون والزاي. وقد وافق يحيى بنَ أبي طالب على روايته بالنون والزاي الحارثُ بنُ أبي أسامة عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (1411).وأخرجه الترمذي (1573) من طريق ابن أبي عدي، والنسائي (8711) عن عمرو بن علي الفلَّاس، عن يزيد بن زُريع، كلاهما (ابن أبي عدي ويزيد بن زريع) عن سعيد بن أبي عروبة، به. فقالا في روايتهما: "الكنز" بالنون والزاي.وأخرجه أحمد (22427) عن محمد بن بكر البُرساني، وابن ماجه (2412) من طريق خالد بن الحارث، كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، وأخرجه النسائي (8711) عن محمد بن عبد الله بن بزيع، وابن حبان (198) من طريق محمد بن المنهال الضرير وأمية بن بسطام، ثلاثتهم (ابن بزيع وابن المنهال وأمية) عن يزيد بن زُريع، عن سعيد بن أبي عروبة، فقالوا جميعًا في رواياتهم: "الكبر" بالباء والراء.وأخرجه أحمد (22369) و (22390) و (22428) و (22434) من طريق همام بن يحيى، و (22369) من طريق أبان بن يزيد العطار، و (22428) عن محمد بن جعفر، عن شعبة، ثلاثتهم عن قَتَادة، به، ووقع في رواية همام وأبان: "الكبر" بالباء والراء، وأسقط أحمد هذا الحرفَ من رواية شعبة مع أنه ثابت في رواية محمد بن جعفر عنه بالنون والزاي، كما نصَّ عليه أحمد نفسُه فيما أسنده عنه أبو أحمد العسكري في "تصحيفات المحدثين" 1/ 140، وخطَّأ أحمدُ روايته وصحَّح الرواية بالباء والراء، وإنما دعا أحمد إلى ذلك أنَّ معظم الروايات التي وقعت له في "المسند" مما قدمنا ذكره إنما وقعت بالباء والراء، فصححها وخَطَّأ رواية محمد بن جعفر عن شعبة، وهذا بخلاف ما قدمنا ذكره في التعليق السابق من تخطئة الترمذي والدارقطني وغيرهما لرواية الباء والراء، وترجيحهم رواية النون والزاي وقولهم هو الراجح فيما نُرى، لأنَّ ابن عبد البر قد روى هذا الحديث في "الاستذكار" (12719) من طريق أبي بكر ابن أبي شيبة، عن عفان بن مسلم، عن أبان بن يزيد وهمام، عن قَتَادة به، ووقعت له الرواية بالنون والزاي، وأورد الحديث في باب ما جاء في الكنز من أبواب الزكاة، وهذا يؤيد أنَّ الأشبه في روايتهما ما وافقا عليه مَن رواه بالنون والزاي والله تعالى أعلم.
2249 - أخبرَناه أحمد بن سَلْمان الفقيه ببغداد، حدثنا جعفر بن محمد بن شاكر، حدثنا أبو الوليد الطَّيالسي وعفّان بن مسلم، قالا: حدثنا أبو عَوَانة، عن قَتَادة، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن مَعْدان بن أبي طلحة، عن ثوبان، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن ماتَ وهو بَريءٌ من ثلاثٍ: الكَنْزِ [1]، والغُلولِ، والدَّينِ، دخَلَ الجنةَ" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তিনটি বিষয় থেকে মুক্ত অবস্থায় মারা যায়— কান্য (যাকাত না দেওয়া সঞ্চিত সম্পদ), গূলুল (খেয়ানত বা আত্মসাৎ) এবং ঋণ— সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في النسخ الخطية: الكبر، ولم يظهر إعجامها في (ص)، وقد نصَّ البيهقي في "شعب الإيمان" (5151) أنه في كتابه عن أبي عبد الله الحاكم: "الكنز" مقيدٌ بالزاي، قال: والصحيح في حديث أبي عَوانة بالراء، ثم نقل كلام الترمذي الذي قاله بإثر الحديث (1573) حيث قال: قال أبو عوانة في حديثه: "الكبر". ابن عبد الرحمن بن عوف، وصحح روايتهم يحيى بن معين في رواية الدُّوري 3/ 288، والترمذي بإثر (1079)، والدارقطني في "العلل" (1780)، وابن التركماني في "الجوهر النقي" بهامش "السنن الكبرى" للبيهقي 6/ 76، وهو الصحيح إن شاء الله، وإن كان سعد بن إبراهيم قد روى عن عمِّه أبي سلمة عدة أحاديث غير هذا في "الصحيحين" وغيرهما، ويصير إسناد الحديث بزيادة عمر بن أبي سلمة فيه حسنًا، لأنَّ عمر هذا حسن الحديث.وأخرجه أحمد 16/ (10599)، والترمذي (1078) من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن سعد بن إبراهيم، به.وأخرجه ابن حبان (3061) من طريق إسحاق بن راهويه، عن عبد الرزاق، عن معمر، عن الزُّهْري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة. ولا يُعرف ذكر الزُّهْري إلّا من هذه الطريق عند ابن حبان وحده، ولم نقف عليه عند غيره، وهو غريب فردٌ، وقد أشار الدارقطني في "العلل" (1780) إلى أنَّ مسلم بن خالد قد رواه مرة عن صالح بن كيسان، فقال في إسناده: عن الزُّهْري عن أبي سلمة عن أبي هريرة. قال: وسعد بن إبراهيم زهري، فإن كان أراد بقوله: الزُّهْري سعد بن إبراهيم، وإلّا فقد وهم.وأخرجه أحمد 15/ (9679) و 16/ (10156) من طرق عن سفيان الثَّوري، وابن ماجه (4413)، والترمذي (1079) من طريق إبراهيم بن سعد، كلاهما عن سعد بن إبراهيم، عن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة. فزادا في الإسناد عمر بن أبي سلمة، وهذا إسناد حسنٌ.وتابعهما شعبة عند أبي الحسين بن المظفر في "حديث شعبة" (125)، والخطيب في "تلخيص المتشابه في الرسم" 2/ 876، وأبي القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1336).وقد صحَّ في هذا الباب غيرُ ما حديث، منها حديث سمرة بن جندب الذي تقدم برقم (2244).وحديث محمد بن جحش المتقدم برقم (2445)، وانظر تمام شواهده والكلام على فقهه هناك. وانظر ما بعده.
[2] إسناده صحيح. أبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك، وأبو عوانة: هو الوضّاح بن عبد الله اليشكري.وأخرجه الترمذي (1572) عن قتيبة بن سعيد، عن أبي عوانة، عن قتادة، عن سالم، عن ثوبان، فأسقط من إسناده معدان بن أبي طلحة.وقد وافق أبا الوليد الطيالسي وعفان بن مسلم على ذكر معدان جميع من روى هذا الحديث عن قتادة غير أبي عوانة، كما خرّجناه في الطريق السابقة، فلا شكَّ عندئذٍ أن يكون إسقاط معدان وهمًا من قتيبة، والله تعالى أعلم. ابن عبد الرحمن بن عوف، وصحح روايتهم يحيى بن معين في رواية الدُّوري 3/ 288، والترمذي بإثر (1079)، والدارقطني في "العلل" (1780)، وابن التركماني في "الجوهر النقي" بهامش "السنن الكبرى" للبيهقي 6/ 76، وهو الصحيح إن شاء الله، وإن كان سعد بن إبراهيم قد روى عن عمِّه أبي سلمة عدة أحاديث غير هذا في "الصحيحين" وغيرهما، ويصير إسناد الحديث بزيادة عمر بن أبي سلمة فيه حسنًا، لأنَّ عمر هذا حسن الحديث.وأخرجه أحمد 16/ (10599)، والترمذي (1078) من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن سعد بن إبراهيم، به.وأخرجه ابن حبان (3061) من طريق إسحاق بن راهويه، عن عبد الرزاق، عن معمر، عن الزُّهْري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة. ولا يُعرف ذكر الزُّهْري إلّا من هذه الطريق عند ابن حبان وحده، ولم نقف عليه عند غيره، وهو غريب فردٌ، وقد أشار الدارقطني في "العلل" (1780) إلى أنَّ مسلم بن خالد قد رواه مرة عن صالح بن كيسان، فقال في إسناده: عن الزُّهْري عن أبي سلمة عن أبي هريرة. قال: وسعد بن إبراهيم زهري، فإن كان أراد بقوله: الزُّهْري سعد بن إبراهيم، وإلّا فقد وهم.وأخرجه أحمد 15/ (9679) و 16/ (10156) من طرق عن سفيان الثَّوري، وابن ماجه (4413)، والترمذي (1079) من طريق إبراهيم بن سعد، كلاهما عن سعد بن إبراهيم، عن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة. فزادا في الإسناد عمر بن أبي سلمة، وهذا إسناد حسنٌ.وتابعهما شعبة عند أبي الحسين بن المظفر في "حديث شعبة" (125)، والخطيب في "تلخيص المتشابه في الرسم" 2/ 876، وأبي القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1336).وقد صحَّ في هذا الباب غيرُ ما حديث، منها حديث سمرة بن جندب الذي تقدم برقم (2244).وحديث محمد بن جحش المتقدم برقم (2445)، وانظر تمام شواهده والكلام على فقهه هناك. وانظر ما بعده.
2250 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه وعلي بن حَمْشاذَ العَدْل ودَعَلَجُ بن أحمد السِّجِسْتاني، قالوا: أخبرنا هشام بن علي السِّيرافي، حدثنا عبد الله بن رجاء، أخبرنا سعيد بن سلمة بن أبي الحُسام، حدثني صالح بن كَيسان، عن سَعْد بن إبراهيم، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "نفسُ المؤمنِ مُعَلَّقةٌ بدَينِه حتى يُقضَى عنه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه لِرواية الثَّوْري، قال فيها: عن سعد بن إبراهيم، عن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة.وإبراهيمُ بن سعد على حفظِه وإتقانِه أعرَفُ بحديث أبيه من غيره:
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুমিনের আত্মা তার ঋণের সাথে ঝুলে থাকে, যতক্ষণ না তা পরিশোধ করা হয়।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، وقد تابع صالح بن كيسان على روايته هذه زكريا بن أبي زائدة، لكن خالفهما شعبة وسفيان الثَّوري وإبراهيم بن سعد، فزادوا في إسناده بين سعد بن إبراهيم - وهو ابن عبد الرحمن بن عوف - وبين أبي سلمة رجلًا هو عمر بن أبي سلمة ابن عبد الرحمن بن عوف، وصحح روايتهم يحيى بن معين في رواية الدُّوري 3/ 288، والترمذي بإثر (1079)، والدارقطني في "العلل" (1780)، وابن التركماني في "الجوهر النقي" بهامش "السنن الكبرى" للبيهقي 6/ 76، وهو الصحيح إن شاء الله، وإن كان سعد بن إبراهيم قد روى عن عمِّه أبي سلمة عدة أحاديث غير هذا في "الصحيحين" وغيرهما، ويصير إسناد الحديث بزيادة عمر بن أبي سلمة فيه حسنًا، لأنَّ عمر هذا حسن الحديث.وأخرجه أحمد 16/ (10599)، والترمذي (1078) من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن سعد بن إبراهيم، به.وأخرجه ابن حبان (3061) من طريق إسحاق بن راهويه، عن عبد الرزاق، عن معمر، عن الزُّهْري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة. ولا يُعرف ذكر الزُّهْري إلّا من هذه الطريق عند ابن حبان وحده، ولم نقف عليه عند غيره، وهو غريب فردٌ، وقد أشار الدارقطني في "العلل" (1780) إلى أنَّ مسلم بن خالد قد رواه مرة عن صالح بن كيسان، فقال في إسناده: عن الزُّهْري عن أبي سلمة عن أبي هريرة. قال: وسعد بن إبراهيم زهري، فإن كان أراد بقوله: الزُّهْري سعد بن إبراهيم، وإلّا فقد وهم.وأخرجه أحمد 15/ (9679) و 16/ (10156) من طرق عن سفيان الثَّوري، وابن ماجه (4413)، والترمذي (1079) من طريق إبراهيم بن سعد، كلاهما عن سعد بن إبراهيم، عن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة. فزادا في الإسناد عمر بن أبي سلمة، وهذا إسناد حسنٌ.وتابعهما شعبة عند أبي الحسين بن المظفر في "حديث شعبة" (125)، والخطيب في "تلخيص المتشابه في الرسم" 2/ 876، وأبي القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1336).وقد صحَّ في هذا الباب غيرُ ما حديث، منها حديث سمرة بن جندب الذي تقدم برقم (2244).وحديث محمد بن جحش المتقدم برقم (2445)، وانظر تمام شواهده والكلام على فقهه هناك. وانظر ما بعده.
2251 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوْري، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه. وأخبرني أحمد بن سهل الفقيه ببُخارى، حدثنا صالح بن محمد بن حَبيب الحافظ.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أحمد بن بشر بن سعْد [1] المَرْثَدي؛ قالا: حدثنا محمد بن جعفر الوَرْكاني، حدثنا إبراهيم بن سعْد، عن أبيه، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "نفسُ المؤمِنِ مُعلَّقةٌ بدَينهِ حتى يُقضى عنه" [2].
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, “মুমিনের আত্মা তার ঋণের সাথে ঝুলন্ত থাকে, যতক্ষণ না তা পরিশোধ করা হয়।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: سعيد. وإنما هو سعْد، بدون الياء، وانظر ترجمته في "تاريخ بغداد" 5/ 87، و"معجم الأدباء" لياقوت 1/ 453.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات كسابقه، لكن جميع من روى هذا الحديث عن إبراهيم بن سعد عن أبيه، زادوا فيه عمر بن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف بين سعد بن إبراهيم وأبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، كالشافعي وعبد الرحمن بن مهدي وأبي سلمة موسى بن إسماعيل التبوذكي وأبي معمر إسماعيل بن إبراهيم الهذلي وأبي ثابت محمد بن عبد الله المديني ويونس بن محمد المؤدِّب، وغيرهم، حتى إنَّ البيهقي قد رواه في "سننه الكبرى" 6/ 49 عن أبي عبد الله الحاكم، بإسنادين آخرين له ليسا في "المستدرك" عن إبراهيم بن سعد - أحدهما من طريق الشافعي - فذكر في الإسنادين عمر بن أبي سلمة، فهذا هو المحفوظ في طريق إبراهيم بن سعد، وهو يوافق رواية سفيان الثَّوري وشعبة بن الحجاج اللتين خرجناهما آنفًا عند الطريق السابقة، وعليه فما وقع في إسناد الحاكم هنا من إسقاط عمر وهمٌ، والله أعلم بالصواب.أما رواية الشافعي فهي في "الأم" 1/ 318 و 3/ 216، وأما رواية ابن مهدي فهي عند الترمذي (1079)، وأما رواية موسى بن إسماعيل التبوذكي فهي عند ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" (4006)، وأما رواية أبي معمر الهُذلي فهي عند أبي يعلى (6026)، وأما رواية أبي ثابت فهي عند البيهقي 6/ 49، وأما رواية يونس بن محمد فهي عند أبي علي بن شاذان في الجزء الأول من "حديثه" (73).والإسناد بذكر عمر بن أبي سلمة حسن، لأنَّ عمر هذا حسن الحديث.
2252 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا خالد بن عبد الله، حدثنا إبراهيم الهَجَري، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ إبليسَ يَئِسَ أن تُعبدَ الأصنامُ بأرض العَرَب، ولكنه سيرضَى بدُونِ ذلك منكم، بالمحقَّرات من أعمالِكم، وهي المُوبِقاتُ، فاتَّقوا المظالمَ ما استطعتم، فإنَّ العبدَ يجيءُ يومَ القيامة وله مِن الحسناتِ ما يُرى أنه يُنجِيه، فلا يزالُ عبدٌ يقومُ فيقولُ: يا ربِّ، إنَّ فلانًا ظَلَمَني مَظلِمةً، فيقال: امحُوا من حَسَناتِه، حتى لا يَبقى له حَسَنةٌ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় ইবলিস আরব ভূমিতে মূর্তি পূজা করানো সম্পর্কে হতাশ হয়ে গেছে, তবে সে এর চেয়ে ছোট বিষয়ে তোমাদের কাছ থেকে সন্তুষ্ট থাকবে, যা হলো তোমাদের তুচ্ছ কাজগুলোর মাধ্যমে, আর এই ছোট কাজগুলোই ধ্বংসাত্মক (বা মহাপাপ)। অতএব, তোমরা যতটা সম্ভব অন্যের প্রতি জুলুম করা থেকে বেঁচে থাকো। কেননা কিয়ামতের দিন বান্দা এমন অনেক নেক আমল নিয়ে উপস্থিত হবে, যা দেখে মনে হবে যে তা তাকে মুক্তি দেবে, কিন্তু তখন এক বান্দা দাঁড়িয়ে বলবে: হে আমার রব! অমুক ব্যক্তি আমার প্রতি জুলুম করেছিল। তখন (ফেরেশতাদের) বলা হবে: তার (জুলুমকারীর) নেক আমলগুলো মুছে দাও, যতক্ষণ না তার কাছে কোনো নেক আমল অবশিষ্ট থাকে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن، إبراهيم الهَجَري - وهو ابن مسلم، وإن كان ضعيفًا - قد روى سفيان بن عيينة عنه الشطر الأول من هذا الحديث في يأس الشيطان أن تُعبد الأصنام في أرض العرب ورضاه بالمحقَّرات من الأعمال، ورواية ابن عيينة عنه صالحة كما بيّناه عند الحديث السالف برقم (2063)، وأما الشطر الثاني من الحديث فقد روي عن ابن مسعود من غير هذا الوجه، لكن قد اختُلف في رفعه ووقفه، ومثله لا يقال من قِبَل الرأي، وقد وردت فيه شواهد صريحة في الرفع، ولشطره الأول كذلك شواهد مرفوعة، فصحَّ الحديث في الجملة، والله تعالى أعلم.أبو المثنى: هو معاذ بن المثنَّى العَنْبري، وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك الجُشَمي.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (7067) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو يعلى (5122)، والبيهقي في "الشعب" (6877)، وفي "الآداب" (1019) من طريق محمد بن دينار بن أبي الفُرات، عن إبراهيم الهجري، به.وأخرج الشطر الأول منه الحميدي (98) عن سفيان بن عيينة، عن إبراهيم الهجري، به.وزاد سفيان ومحمد بن دينار في روايتهما: "فاتقوا المحقَّرات، فإنهن من المُوبِقات، أولًا أُخبركم بمَثَل ذلك، مثل رَكْبٍ نزلوا فلاةً من الأرض ليس بها حطبٌ، فتفرقوا، فجاء ذا بعُودٍ، وجاء ذا بعظمٍ، وجاء ذا برَوثةٍ، حتى أنضَجُوا الذي أرادوا، فكذلك الذُّنوب".ويشهد للشطر الأول حديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8810) وغيره، بلفظ: "قد أيس أن يُعبد بأرضكم"، وإسناده صحيح.وآخر من حديث سليمان بن عمرو بن الأحوص عن أبيه عند ابن ماجه (3055)، والترمذي (2159)، والنسائي (4085)، وقال: الترمذي: حسن صحيح. ولفظه: "أيس أن يُعبد في بلدكم".وثالث من حديث ابن عباس تقدم عند المصنف برقم (322)، وفي إسناده لين. ولفظه كحديث أبي هريرة.ورابع من حديث جابر عند مسلم (2812) لكن بلفظ: "إنَّ الشيطان قد أيس أن يعبده المصلُّون في جزيرة العرب، ولكن في التحريش بينهم".وأما الشطر الثاني منه فقد أخرجه الخرائطي في "مساوئ الأخلاق" (642) من طريق عمار بن محمد، عن إبراهيم الهَجَري، به.وأخرجه المعافى بن عمران في "الزهد" (41)، والدِّينوَري في "المجالسة" (2059) من طريق زاذان أبي عمر، عن ابن مسعود موقوفًا، وإسناده حسن.ورواه أبو عثمان النهدي عن ابن مسعود وغيره من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فيما سيأتي عند المصنف برقم (2299) و (8929)، واختلف في رفعه ووقفه كما سيأتي.ويشهد لهذا الشطر في المرفوع حديث أبي هريرة عند البخاري (2449) بلفظ: "من كانت له مَظلِمة لأخيه من عِرضه أو شيء، فليتحَلَّلْهُ من اليوم، قبل أن لا يكون دينارٌ ولا درهم، إن كان عَمَلٌ صالحٌ أُخذ منه بقدر مظلمته، وإن لم تكن له حسنات أخذ من سيئات صاحبه فحُمل عليه". وهو عند مسلم (2581) بنحوه.وآخر بمعناه من حديث عبد الله بن عمر بن الخطاب سيأتي عند المصنف بعده.وثالث من حديث بُريدة الأسلمي عند مسلم (1897).
2253 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا العباس بن الفضل الأسْفاطي، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا زُهير، حدثنا عُمارة بن غَزِيّة، عن يحيى بن راشد، عن عبد الله بن عمر [1]، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن حالَت شفاعتُه دون حَدٍّ مِن حُدُود الله، فقد ضادَّ اللهَ في أمرِه، ومن مات وعليه دَين، فليس ثَمَّ دينارٌ ولا دِرهمٌ، ولكنها الحسناتُ والسيئاتُ، ومن خاصم في باطلٍ وهو يعلمُ، لم يَزَلْ في سَخَطِ الله حتى يَنزِعَ، ومَن قال في مؤمنٍ ما ليس فيه، حُبِسَ في رَدْغةِ الخَبَالِ حتى يأتيَ بالمَخْرَج مما قالَ" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর নির্ধারিত কোনো শাস্তির (হদ) ক্ষেত্রে তার সুপারিশকে বাধা সৃষ্টি করে, সে আল্লাহর নির্দেশের বিরোধিতা করল। আর যে ব্যক্তি ঋণ রেখে মারা যায়, সেখানে কোনো দিনার বা দিরহাম থাকবে না, বরং তা হবে নেকি ও বদলা (সওয়াব ও গুনাহের মাধ্যমে পরিশোধ)। আর যে ব্যক্তি মিথ্যা জেনেও (কোনো বিষয়ে) ঝগড়া করে, সে তা ত্যাগ না করা পর্যন্ত আল্লাহর ক্রোধের মধ্যে থাকে। আর যে ব্যক্তি কোনো মুমিনের প্রতি এমন অপবাদ দেয়, যা তার মধ্যে নেই, তাকে ‘রাদগাতুল খাবাল’ নামক স্থানে আটকে রাখা হবে, যতক্ষণ না সে তার কৃত উক্তির বিষয়টি থেকে নিষ্কৃতি পায়।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في نسخنا الخطية: عبد الله بن عمرو، وهو خطأ، فإنَّ هذا الحديث لا يعرف إلَّا عن ابن عُمر كما في مصادر التخريج من هذا الوجه، وقد روي عنه أيضًا من غير وجه، ويحيى بن راشد لا تعرف له رواية عن عبد الله بن عَمرو، وقد أخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 82 من طريق أخرى عن عباس بن الفضل الأسفاطي، فذكره على الصواب. وأخرجه أبو داود (3597) عن أحمد بن يونس - وهو ابن عبد الله بن يونس، معروف بالنسبة إلى جده - بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 9/ (5385) عن حسن بن موسى، عن زهير بن معاوية، به.والشطر الأول منه في ذكر الشفاعة سيأتي من طريق عبد الله بن عامر عن ابن عمر برقم (8356)، وقصة الخصومة ستأتي برقم (7228) من طريق نافع عن ابن عمر.ورَدْغة الخَبَال: عُصارة أهل النار، والرَّدغة، بفتح الدال وسكونها: الماء والطين، والخَبال: الفساد.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل عباس الأسفاطي، وقد توبع. زهير: هو ابن معاوية الجُعْفي، ويحيى بن راشد: هو أبو هشام الدمشقي. وأخرجه أبو داود (3597) عن أحمد بن يونس - وهو ابن عبد الله بن يونس، معروف بالنسبة إلى جده - بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 9/ (5385) عن حسن بن موسى، عن زهير بن معاوية، به.والشطر الأول منه في ذكر الشفاعة سيأتي من طريق عبد الله بن عامر عن ابن عمر برقم (8356)، وقصة الخصومة ستأتي برقم (7228) من طريق نافع عن ابن عمر.ورَدْغة الخَبَال: عُصارة أهل النار، والرَّدغة، بفتح الدال وسكونها: الماء والطين، والخَبال: الفساد.
2254 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بحر بن نَصْر بن سابِق الخَوْلاني، حدثنا شعيب بن الليث بن سعد، حدثني أبي.وحدثنا علي بن حَمْشاذَ، حدثنا عُبيد بن عبد الواحد، حدثنا يحيى بن بُكَير، حدثنا الليث، عن ابن عَجْلان، عن زيد بن أسلَمَ، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: "إنَّ رجلًا لم يعمل خيرًا قطُّ، وكان يُدايِنُ الناسَ، فيقولُ لرسوله: خُذْ ما تيسَّر واتْرُكْ ما عَسُر، وتجاوَزْ لعلَّ اللهَ يتجاوزُ عنا، فلما هَلَكَ قال اللهُ: هل عَمِلتَ خيرًا قطُّ؟ قال: لا، إلّا أنه كان لي غلامٌ، وكنت أُدايِنُ الناسَ، فإذا بعثتُه يَتقاضَى قلتُ له: خُذ ما تيسَّر، واترُك ما تَعَسَّر، وتجاوَزْ لعلَّ الله يتجاوزُ عنا، قال الله: فقد تجاوزْتُ عنك" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই এক ব্যক্তি কখনও কোনো ভালো কাজ করেনি। সে মানুষের কাছে ঋণ দিত, আর তার দূতকে বলত: ‘যা সহজ হয় তা নাও, আর যা কঠিন হয় তা ছেড়ে দাও, এবং ক্ষমা করে দাও (নম্র হও), যাতে আল্লাহ আমাদের ক্ষমা করেন।’ অতঃপর যখন সে মারা গেল, তখন আল্লাহ জিজ্ঞেস করলেন: ‘তুমি কি কখনও কোনো ভালো কাজ করেছ?’ সে বলল: ‘না, তবে আমার একজন গোলাম ছিল, আর আমি মানুষকে ঋণ দিতাম। যখন আমি তাকে পাওনা আদায় করতে পাঠাতাম, তখন আমি তাকে বলতাম: যা সহজ হয় তা নাও, আর যা কঠিন হয় তা ছেড়ে দাও, এবং ক্ষমা করে দাও, যাতে আল্লাহ আমাদের ক্ষমা করেন।’ আল্লাহ বললেন: ‘আমি তোমায় ক্ষমা করে দিলাম।’"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي. الليث: هو ابن سعد، وابن عجلان: هو محمد، وأبو صالح: هو ذكوان السمّان.وأخرجه أحمد 14/ (8730) عن يونس بن محمد المؤدَّب، والنسائي (6247)، وابن حبان (5043) من طريق عيسى بن حماد، كلاهما عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 13/ (7579)، والبخاري (2078) و (3480)، ومسلم (1562)، والنسائي (6248)، وابن حبان (5042) و (5046) من طريق عُبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن أبي هريرة، مختصرًا.
2255 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا محمد ابن عبّاد المكي، حدثنا حاتم بن إسماعيل، عن أبي حَزْرة يعقوب بن مجاهد، عن عُبادة بن الوليد بن عبادة بن الصامت: قال خرجت أنا وأبي نطلب العلم في هذا الحيّ من الأنصار قبل أن يهلِكُوا، فكان أولَ من لَقِينا أبو اليَسَر صاحبُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم ومعه غُلامٌ له، وعليه بُردٌ ومَعافِريّ، وعلى غلامه بُرْدٌ ومَعافِريّ [1]، ومعه إضبارة [2] صُحُف، فقال له أبي: كأني أرى في وجهك سُفْعةً من غَضَب. قال: أجلْ، كان لي على فلانِ بن فلانٍ الحَراميّ [3] مالٌ، فأتيتُ أهلَه، فقلت: أثَمَّ هو؟ قالوا: لا، فخرج ابنٌ له، فقلت له: أين أبوك؟ قال: سمع كلامَك، فدخل أريكةَ أمي، فقلت: اخرُجْ، فقد علمتُ أين أنتَ، فخرج إليَّ، فقلتُ له: ما حَمَلك على أنِ اختبأتَ مني؟ قال: أنا واللهِ أُحدّثُك ولا أَكذِبُك، خشيتُ واللهِ أن أُحَدِّثَك فأَكذِبَك، أو أعِدَك فأُخلِفَك، وكنتَ صاحبَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وكنتُ واللهِ مُعسرًا، فقلتُ: آللهِ، قال: آللهِ، قال: فقلتُ: آللهِ، قال: آللهِ، قال: فنشر الصحيفةَ ومَحَا الحقَّ، وقال: إن وجدتَ قضاءً فاقضِ، وإلّا فأنتَ في حِلٍّ، فأشهَدُ لبَصُرَتْ عيناي هاتان - ووضع إصبعيه على عينيه - وسمعَتْه أذناي هاتان - ووضع إصبعيه في أذنيه - ووَعَاه قلبي - وأشار إلى نِيَاط قلبه - رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن أَنظَر مُعسِرًا أو وَضَعَ له، أظلَّه اللهُ في ظِلّه" [4]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وكذلك روي مختصرًا عن زيد بن أسلم [5] ورِبْعي بن حِراش [6] وحَنْظلة بن قيس [-4]، كلهم عن أبي اليَسَر.
আবূল ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: তিনি (উবাদাহ ইবনুল ওয়ালীদ) বলেন, আমি এবং আমার পিতা জ্ঞান অর্জনের জন্য আনসারদের এই মহল্লায় বের হলাম, তাদের (বয়সের কারণে) বিলীন হয়ে যাওয়ার পূর্বে। আমরা সর্বপ্রথম যাঁকে পেলাম, তিনি ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী আবূল ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তাঁর সাথে তাঁর একজন গোলাম ছিল। তাঁর (আবূল ইয়াসারের) পরিধানে ছিল একটি ইয়ামানী চাদর (বুরদ) এবং একটি মাআফিরী বস্ত্র, আর তাঁর গোলামের পরিধানেও ছিল একটি ইয়ামানী চাদর এবং একটি মাআফিরী বস্ত্র। তাঁর কাছে এক গোছা সহীফা (লিখিত কাগজ) ছিল। আমার পিতা তাঁকে বললেন, আমার মনে হচ্ছে আমি আপনার চেহারায় রাগের সামান্য চিহ্ন দেখতে পাচ্ছি। তিনি বললেন, হ্যাঁ। অমুক-অমুক গোত্রের হারাম গোত্রের এক ব্যক্তির কাছে আমার কিছু পাওনা ছিল। আমি তার পরিবারের কাছে গেলাম এবং বললাম, সে কি এখানে আছে? তারা বলল, না। অতঃপর তার এক ছেলে বের হয়ে এলো। আমি তাকে বললাম, তোমার পিতা কোথায়? সে বলল, আপনার কথা শুনে সে আমার মায়ের পালঙ্কে প্রবেশ করেছে। আমি বললাম, তুমি বের হয়ে আসো, আমি জেনে গেছি তুমি কোথায় আছো। তখন সে আমার কাছে বেরিয়ে এলো। আমি তাকে বললাম, আমার কাছ থেকে লুকিয়ে থাকার কারণ কী? সে বলল, আল্লাহর কসম! আমি আপনাকে বলছি এবং মিথ্যা বলছি না, আল্লাহর কসম! আমি ভয় পেয়েছিলাম যে, আমি যদি আপনাকে বলি, তবে হয়তো মিথ্যা বলে ফেলব, অথবা যদি আপনাকে প্রতিশ্রুতি দেই, তবে তা ভঙ্গ করব। আর আপনি তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী। আল্লাহর কসম! আমি অভাবগ্রস্ত ছিলাম (ঋণ পরিশোধে অক্ষম ছিলাম)। আমি জিজ্ঞেস করলাম, আল্লাহর কসম? সে বলল, আল্লাহর কসম। তিনি (আবূল ইয়াসার) বলেন, আমি আবার জিজ্ঞেস করলাম, আল্লাহর কসম? সে বলল, আল্লাহর কসম। তিনি বলেন, অতঃপর আমি সেই সহীফাটি খুলে পাওনা বাতিল করে দিলাম এবং বললাম, যদি তোমার কাছে পরিশোধ করার সামর্থ্য আসে, তবে পরিশোধ করো। অন্যথায় তুমি মুক্ত। তারপর তিনি (আবূল ইয়াসার) বলেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি, আমার এই দুটি চোখ দেখেছে— (তিনি তাঁর দুই আঙুল চোখের ওপর রাখলেন)— এবং আমার এই দুটি কান শুনেছে— (তিনি তাঁর দুই আঙুল কানের ভেতর রাখলেন)— এবং আমার হৃদয় তা সংরক্ষণ করেছে— (তিনি তাঁর হৃদপিণ্ডের দিকে ইঙ্গিত করে দেখালেন)— রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে: "যে ব্যক্তি কোনো অভাবগ্রস্তকে অবকাশ দেয় অথবা তার (ঋণের) ভার লাঘব করে দেয়, আল্লাহ তাকে তাঁর (আরশের) ছায়ায় স্থান দেবেন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المَعَافريُّ: ثياب تُعمل بقرية يقال لها: مَعَافِر، وقيل: هي نسبة إلى قبيلة نزلت تلك القرية، وهي بفتح الميم. والبُرْد: شَمْلة مخططة، وقيل: كساء مربّع فيه صِغَر يلبسه الأعراب.
[2] الإضبارة: الحُزمة.
2255 [3] - الحراميّ: نسبة إلى بني حَرَام.
2255 [4] - إسناده صحيح. أبو اليَسَر: هو كعب بن عمرو السَّلَمي.وأخرجه مسلم (3006) عن هارون بن معروف ومحمد بن عبّاد - واللفظ لهارون - عن حاتم، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه ابن حبان (5044) من طريق عمرو بن زرارة، عن حاتم بن إسماعيل، به.الأريكة: السرير المُرخَى عليه السَّتْر.ونِياط القلب: عِرْق غليظ عُلِّق به القلب بالرئتين.
2255 [5] - أخرجه من طريقه الواحدي في "التفسير الوسيط" 1/ 399، لكن زيد بن أسلم يُستبعد جدًّا إدراكه لأبي اليَسَر، فبين وفاتيهما واحد وثمانون عامًا. وهذه الصدقة المطلقة في الإنظار قبل حُلول أجل الدَّين قد جاء تقييدها في حديث ابن مسعود عند أحمد 7/ (3911) وغيره بأنها تعدل شَطْرَ الصدقة. يعني كأنه تصدّق بشطر ما أقرض.
2255 [6] - أخرجه من طريقه أحمد 24/ (15521)، وإسناده صحيح. وهذه الصدقة المطلقة في الإنظار قبل حُلول أجل الدَّين قد جاء تقييدها في حديث ابن مسعود عند أحمد 7/ (3911) وغيره بأنها تعدل شَطْرَ الصدقة. يعني كأنه تصدّق بشطر ما أقرض.
2255 [-4] - أخرجه من طريقه أحمد 24/ (15520)، وابن ماجه (2419)، وإسناده حسن في المتابعات. وهذه الصدقة المطلقة في الإنظار قبل حُلول أجل الدَّين قد جاء تقييدها في حديث ابن مسعود عند أحمد 7/ (3911) وغيره بأنها تعدل شَطْرَ الصدقة. يعني كأنه تصدّق بشطر ما أقرض.
2256 - حدثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني وأبو سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي، قالا: حدثنا أبو جعفر محمد بن عبد الله الحَضْرمي، حدثنا أبو بكر بن أبي شَيْبة، حدثنا عَفّان، حدثنا عبد الوارث بن سعيد، حدثنا محمد بن جُحَادة، عن سليمان بن بُريدة، عن أبيه، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن أنظَرَ مُعسِرًا فله بكلِّ يوم صدقةٌ قبل أن يَحِلَّ الدَّينُ، فإذا حَلَّ الدَّينُ فأنْظَرَه بعد ذلك فله بكلِّ يوم مثلُه صدقةً" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি কোনো অভাবগ্রস্তকে (ঋণ পরিশোধের জন্য) সময় দেয়, ঋণ পরিশোধের সময় হওয়ার আগে তার জন্য প্রতিদিন সাদকা (দানের সওয়াব) রয়েছে। আর যখন ঋণ পরিশোধের সময় হয়ে যায়, অতঃপর সে তাকে আরও সময় দেয়, তবে এরপর তার জন্য প্রতিদিন সেই (ঋণের) সমপরিমাণ সাদকা রয়েছে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. عفان: هو ابن مسلم الصَّفّار.وأخرجه أحمد 38/ (23046) عن عفان بن مسلم، بهذا الإسناد. لكن بلفظ: "من أنظر معسرًا فله بكل يوم مثله صدقة" قال: ثم سمعته يقول: "من أنظر مُعسرًا فله بكل يوم مثليه صدقة" قلت: سمعتك يا رسول الله تقول: "من أنظر معسرًا فله بكل يوم مثله صدقة" ثم سمعتك تقول: "من أنظر مُعسرًا فله بكل يوم مثليه صدقة" قال له: "بكل يوم صدقة قبل أن يَحِلَّ الدَّين، فإذا حلَّ الدَّين فأنظرَه فله بكل يوم مثليه صدقة".لكن لفظ الحاكم هو المعتمد، وهو الذي رواه جماعة أصحاب عفان غير أحمد، وكذلك هو الذي رواه جماعة أصحاب عبد الوارث.وأخرجه أحمد (22970)، وابن ماجه (2418) من طريق نُفيع بن الحارث أبي داود الأعمى، عن بريدة. ولفظه على الجادة، لكن أبا داود الأعمى متروك الحديث.ومعنى الحديث: أنه إن أنظره قبل حلول الدَّين كان له بكل يوم صدقة مطلقة غير محددة، وإن أنظره بعد حلول أجل الدَّين كان له بكل يوم مثلُ قدرِ ما أقرضَه صدقةً. وهذه الصدقة المطلقة في الإنظار قبل حُلول أجل الدَّين قد جاء تقييدها في حديث ابن مسعود عند أحمد 7/ (3911) وغيره بأنها تعدل شَطْرَ الصدقة. يعني كأنه تصدّق بشطر ما أقرض.
2257 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي - من أصل كتابه -، حدثنا أحمد بن سَيَّار، حدثنا محمد بن كثير، أخبرنا سفيان، حدثني الأعمش، عن أبي وائل، عن أبي مسعود البَدْري، قال: حُوسِب رجلٌ فلم يُوجَد له خَيرٌ، وكان ذا مالٍ، وكان يُدايِنُ الناسَ، وكان يقولُ لغِلْمانِه: من وَجَدتموه غنيًا، فخُذُوا منه، ومن وجدتموه مُعسِرًا، فتجاوَزُوا عنه، لعلَّ اللهَ يتجاوزُ عَنِّي، فقال اللهُ: أنا أحقُّ أن أتجاوَزَ عنه [1].هذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه [2].وقد أُسند عن عبد الله بن نُمير عن الأعمش:
আবূ মাসঊদ আল-বadri (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তির হিসাব নেওয়া হচ্ছিল, কিন্তু তার কোনো ভালো কাজ (সৎকর্ম) পাওয়া গেল না। সে ছিল সম্পদশালী এবং মানুষকে ঋণ দিত। সে তার কর্মচারীদের বলত: তোমরা যাকে ধনী পাবে, তার থেকে (ঋণ) নিয়ে নিও। আর যাকে অভাবী (অসচ্ছল) পাবে, তাকে মাফ করে দিও (বা তার পাওনা ছেড়ে দিও)। হয়তো আল্লাহ আমাকে ছাড় দেবেন। তখন আল্লাহ বললেন: আমিই তো তাকে ছাড় দেওয়ার বেশি উপযুক্ত।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وقد وقفه سفيان - وهو الثَّوري - لكن رفعه غيره، كما في الطريق التالية، وصحَّ مرفوعًا أيضًا من غير هذا الوجه عن أبي مسعود، كما سيأتي بيانه. الأعمش: هو سليمان بن مِهْران، وأبو وائل: هو شقيق بن سلمة، وأبو مسعود: هو عُقبة بن عمرو الأنصاري رضي الله عنه.وأخرجه أحمد 28/ (17083)، ومسلم (1561)، والترمذي (1307)، وابن حبان (5047) من طريق أبي معاوية محمد بن خازم الضرير، عن الأعمش، به مرفوعًا.وسيأتي بعده من طريق عبد الله بن نمير عن الأعمش مرفوعًا كذلك.وأخرجه بنحوه أحمد 28/ (17064) و 38/ (23384) و (23463)، والبخاري (2391)، ومسلم (1560)، وابن ماجه (2420) من طريق ربعيّ بن حِراش، عن حذيفة وأبي مسعود مرفوعًا.وسيأتي عند المصنف من هذا الوجه برقم (3236).وانظر ما بعده.
[2] إن أراد الحاكم طريق الأعمش عن أبي وائل، فقد بيّنا أنَّ مسلمًا أخرجه فلا استدراك عليه، وإن أراد أصل الحديث فقد أخرجاه كلاهما، فلا استدراك عليهما!!
2258 - حدَّثَناه أبو حامد أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا أبي، حدثنا عبد الله بن نُمير، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن أبي مسعود، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "حُوسِب رجلٌ فلم يُوجَد له خَيرٌ"، فذكره بنحوه [1].
আবু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “এক ব্যক্তির হিসাব নেওয়া হলো, কিন্তু তার কোনো ভালো (কাজ) পাওয়া গেল না।” অতঃপর তিনি অনুরূপভাবে বর্ণনা করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، محمد بن عثمان بن أبي شيبة - وإن كان تُكُلِّم فيه - قد توبع كما تقدَّم في الطريق التي قبله. ما فيه من ذهب أو فضة، وهو غرر، لأنه لا يُدرى هل يوجد فيه شيء أم لا؟قال: وفيه وجه آخر، وهو أنَّ معناه: ليس لها رَواجٌ، ولا لحاجتنا فيها نجاح، وذلك أنَّ الذي جاء به تَبْرٌ غير مضروب، وليس بحضرته من يضربه دنانير.قال: ويحتمل أن يكون إنما كرهه لما يقع فيه من الشبهة ويدخله من الغرر عند استخراجه من المعدن، وذلك أنهم استخرجوه بالعشر أو الخمس أو الثلث مما يصيبونه، وهو غرر لا يُدرى هل يُصيبُ العاملُ فيه شيئًا أم لا؟قال: وفيه أيضًا نوع من الخطر والتغرير بالأنفس، لأنَّ المعدن ربما انهار على من يعمل فيه، فكره من أجل ذلك معالجته واستخراج ما فيه.قلنا: وحمله الطحاوي في "شرح المشكل" 12/ 228 على وجهٍ استحسنه، وهو أنه لما كان هذا الذهب تبرًا غير مضروب، وهو عند الناس دون الدنانير المضروبة، وكان من شريعته صلى الله عليه وسلم أنَّ خيار الناس أحسنهم قضاءً، وكان هو أولى الناس بذلك، فلو دفع إليه النبي صلى الله عليه وسلم ذلك التبر لم يُحسِن قضاؤه، وهو صلى الله عليه وسلم أبعدُ الناس من ذلك، فكره أخذها لذلك وأدّى للذي تحمّل له بها من ماله دنانير لا نقص فيها.
2259 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا القَعْنبي، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن عمرو بن أبي عمرو، عن عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ رجلًا لَزِمَ غَريمًا له بعشرة دنانير، فقال له: والله ما عندي قضاءٌ أَقْضِيكَهُ اليومَ، قال: فواللهِ لا أُفارِقُكَ حتَّى تَقضِيَ أو تأتيَ بحَمِيلٍ يَحمِلُ عنك، قال: واللهِ ما عندي قضاءٌ، وما أجدُ أحدًا يَحمِلُ عني، قال: فَجَرَّه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، هذا لازِمي واستَنْظرتُه شهرًا واحدًا، فأَبى حتَّى أقضيَه أو آتيَه بحَمِيل، فقلتُ: والله ما أجدُ حَمِيلًا، ولا عندي قضاءٌ اليومَ. فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "هل تَستَنظِرُه إِلّا شهرًا واحدًا؟ " قال: لا، قال: "فأنا أتحمَّل بها عنكَ" قال: فتحمَّلها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عنه، فذهب الرجلُ فأتى بقَدْر ما وَعَدَه، فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "من أين أصبتَ هذا الذَّهَب؟ " قال: من مَعْدِنٍ، قال: "فاذهبْ، فلا حاجةَ لنا فيها، ليس فيها خَيرٌ"، فقضاها عنه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري لعمرو بن أبي عمرو، والدَّرَاوَرْدِي على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তার এক ঋণীর কাছে দশ দিনারের জন্য শক্তভাবে লেগে রইল। ঋণগ্রহীতা তাকে বলল: আল্লাহর শপথ, আজ আমার কাছে এমন পরিশোধের ব্যবস্থা নেই যা আমি আপনাকে দিতে পারি। সে (পাওনাদার) বলল: আল্লাহর শপথ, তুমি হয় পরিশোধ করো, না হয় তোমার পক্ষ থেকে দায়ভার গ্রহণ করার জন্য কোনো জামিনদার নিয়ে আসো—এর আগে আমি তোমাকে ছাড়ব না। সে বলল: আল্লাহর শপথ, আমার কাছে পরিশোধ করার মতো কিছু নেই, আর আমার পক্ষ থেকে জামিন হওয়ার মতো কাউকে আমি পাচ্ছি না। তখন সে তাকে টেনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে নিয়ে গেল এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এই লোকটি আমাকে ধরে আছে। আমি তার কাছে মাত্র এক মাসের সময় চেয়েছি, কিন্তু সে অসম্মত হয়েছে এই বলে যে, হয় আমি তাকে পরিশোধ করব, নতুবা জামিনদার নিয়ে আসব। আমি বলেছি: আল্লাহর শপথ, আমি কোনো জামিনদার পাচ্ছি না, আর আজ আমার কাছে পরিশোধ করার মতোও কিছু নেই। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কি কেবল এক মাসের সময় চাও?" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তবে আমি তোমার পক্ষ থেকে এর জামিন হলাম।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পক্ষ থেকে সেই দায়ভার নিলেন। লোকটি চলে গেল এবং সে যা ওয়াদা করেছিল, ঠিক সেই পরিমাণ অর্থ নিয়ে ফিরে এলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "এই সোনা তুমি কোথা থেকে পেলে?" সে বলল: একটি খনি থেকে। তিনি বললেন: "যাও, আমাদের এর কোনো প্রয়োজন নেই, এর মধ্যে কোনো কল্যাণ নেই।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পক্ষ থেকে তা পরিশোধ করে দিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده جيد. القَعْنبي: هو عبد الله بن مَسلمة، وعمرو بن أبي عمرو: هو مولى المطَّلب بن عبد الله حنَطْب.وأخرجه أبو داود (3328) عن عبد الله بن مسلمة القعنبي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (2406) عن محمد بن الصبّاح، عن عبد العزيز بن محمد، به.والحَميل: الكفيل.والمَعدِن: هو الموضع الذي يستخرج منه شيء من جواهر الأرض كالذهب والفضة والنحاس، وغير ذلك، وهو ما يُسمَّى أيضًا بالمنجم.وقوله: "لا حاجة لنا فيها، ليس فيها خير" قال الخطابي: يشبه أن يكون ذلك لسبب عَلِمَه فيه النبيُّ صلى الله عليه وسلم خاصة، لا من جهة أنَّ الذهب المستخرج من المعدن لا يباح تملكه وتموُّله، فإنَّ عامة الذهب والورِق مستخرجة من المعادن …قال: ويُحتمل أن يكون ذلك من أجل أنَّ أصحاب المعادن يبيعون ترابها ممن يُعالجه فيحصّل ما فيه من ذهب أو فضة، وهو غرر، لأنه لا يُدرى هل يوجد فيه شيء أم لا؟قال: وفيه وجه آخر، وهو أنَّ معناه: ليس لها رَواجٌ، ولا لحاجتنا فيها نجاح، وذلك أنَّ الذي جاء به تَبْرٌ غير مضروب، وليس بحضرته من يضربه دنانير.قال: ويحتمل أن يكون إنما كرهه لما يقع فيه من الشبهة ويدخله من الغرر عند استخراجه من المعدن، وذلك أنهم استخرجوه بالعشر أو الخمس أو الثلث مما يصيبونه، وهو غرر لا يُدرى هل يُصيبُ العاملُ فيه شيئًا أم لا؟قال: وفيه أيضًا نوع من الخطر والتغرير بالأنفس، لأنَّ المعدن ربما انهار على من يعمل فيه، فكره من أجل ذلك معالجته واستخراج ما فيه.قلنا: وحمله الطحاوي في "شرح المشكل" 12/ 228 على وجهٍ استحسنه، وهو أنه لما كان هذا الذهب تبرًا غير مضروب، وهو عند الناس دون الدنانير المضروبة، وكان من شريعته صلى الله عليه وسلم أنَّ خيار الناس أحسنهم قضاءً، وكان هو أولى الناس بذلك، فلو دفع إليه النبي صلى الله عليه وسلم ذلك التبر لم يُحسِن قضاؤه، وهو صلى الله عليه وسلم أبعدُ الناس من ذلك، فكره أخذها لذلك وأدّى للذي تحمّل له بها من ماله دنانير لا نقص فيها.
2260 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني معاوية بن صالح، عن سعيد بن هانئ، عن العِرباض بن ساريَة السُّلَمي، قال: بعتُ مِن رسولِ الله صلى الله عليه وسلم بَكْرًا، فجئتُ أتقاضَاهُ، فقلتُ: يا رسول الله، اقض ثمنَ بَكْري، قال: "نعم، لا أَقضيكَه إلّا لحِينِه"، ثم قضاني فأحسنَ قضائي، ثم جاءه أعرابيٌّ، فقال: يا رسول الله، اقضني بَكْري فقضاه بعيرًا مُسِنًّا، فقال: يا رسول الله، هذا أفضلُ من بَكْري، فقال: "هو لك، إنَّ خيرَ القومِ خيرُهم قَضاءً" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة [2].
ইরবাদ ইবনু সারিয়াহ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি অল্প বয়স্ক উট বিক্রি করেছিলাম। অতঃপর আমি তা পরিশোধের জন্য (রাসূলুল্লাহর নিকট) আসলাম এবং বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমার বাচুরের মূল্য পরিশোধ করুন। তিনি বললেন: “হ্যাঁ, তবে আমি নির্দিষ্ট সময় না হওয়া পর্যন্ত তোমাকে এর মূল্য পরিশোধ করব না।” এরপর তিনি আমাকে পরিশোধ করলেন এবং উত্তমভাবে পরিশোধ করলেন। এরপর তাঁর নিকট এক বেদুঈন এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার বাচুরটি (মূল্য) পরিশোধ করুন। তখন তিনি তাকে একটি বয়স্ক উট দ্বারা পরিশোধ করলেন। লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এটি তো আমার বাচুরের চেয়ে উত্তম। তিনি বললেন: “এটি তোমার জন্য। নিশ্চয়ই তোমাদের মধ্যে সর্বোত্তম সেই ব্যক্তি, যে পরিশোধের ক্ষেত্রেও উত্তম।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 28/ (17149)، والنسائي (6169)، وابن ماجه (2286) من طريقين عن معاوية بن صالح، به. والبَكْر، بفتح فسكون: الفتيُّ من الإبل، بمنزلة الغلام من الناس، والأنثى بَكْرة.
[2] يشير إلى أنهما أخرجاه بسياقة أخرى، فقد أخرجه البخاري (2305)، ومسلم (1601) من حديث أبي هريرة، ومسلم (1600) من حديث أبي رافع، بنحوه.