হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2381)


2381 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق وأبو محمد بن موسى، قالا: أخبرنا محمد بن أيوب، حدثنا أبو الوليد الطَّيالسي وموسى بن إسماعيل، قالا: حدثنا حماد بن سَلَمة، عن حماد، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "رُفع القلمُ عن ثلاثٍ: عن الصبيِّ حتى يَحتَلِم، وعن المَعتُوه حتى يُفِيق، وعن النائم حتى يَستيقِظ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তিন প্রকার ব্যক্তির উপর থেকে (আমলের) কলম উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে: শিশু, যতক্ষণ না সে সাবালক হয় (স্বপ্নদোষ ঘটে); পাগল, যতক্ষণ না সে সুস্থ হয় (জ্ঞান ফিরে পায়); এবং ঘুমন্ত ব্যক্তি, যতক্ষণ না সে জেগে ওঠে।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. محمد بن أيوب: هو ابن الضُّريس، وأبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك، وحماد: هو ابن أبي سليمان، وإبراهيم: هو ابن يزيد النخعي، والأسود: هو ابن يزيد النخعي.وأخرجه أحمد 41/ (24694) و (24703) و 42/ (25114)، وأبو داود (4398)، وابن ماجه (2041)، والنسائي (5596)، وابن حبان (142) من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد. وبعضهم يذكر المجنون بدل: المعتوه، وبعضهم يقول: "وعن المبتلى حتى يبرأ" بدل ذكر المعتوه والمجنون.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2382)


2382 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن موسى القاضي، حدثنا إبراهيم بن يوسف بن خالد الرازي، حدثنا الحارث بن مِسكين وأحمد بن عمرو، قالا: حدثنا ابن وهب، حدثنا جَرير بن حازم، عن سليمان بن مِهْران، عن أبي ظَبْيان، عن ابن عباس، قال: مُرَّ على عليٍّ بمجنونة بني فلان قد زَنَتْ، وأَمَر عمرُ بن الخطّاب برَجْمِها، فردَّها عليُّ بن أبي طالب وقال لعمر: يا أميرَ المؤمنين، أمرتَ برَجْمِ هذه؟ قال: نعم، قال: أما تذكُرُ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "رُفِعَ القلمُ عن ثلاثةٍ: عن المجنونِ المغلوبِ على عَقْله، وعن النائم حتى يَستيقِظ، وعن الصبيِّ حتى يَحتَلِم"؟ قال: صدقتَ، فخلَّى عنها [1].قال عبد الله [2]: فالحَجْر على المجنون والمجنونة ممّا لا أعلمُ فيه خلافًا بين العلماء.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ দিয়ে বনু অমুকের জনৈক উন্মাদ নারীকে নিয়ে যাওয়া হচ্ছিল, যে যেনা করেছিল। আর উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে রজম (পাথর নিক্ষেপ করে মৃত্যুদণ্ড) করার নির্দেশ দিয়েছিলেন। তখন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে ফিরিয়ে আনলেন এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: হে আমীরুল মুমিনীন! আপনি কি এই নারীকে রজম করার নির্দেশ দিয়েছেন? তিনি (উমার) বললেন: হ্যাঁ। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনার কি মনে নেই যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিন ব্যক্তির উপর থেকে কলম উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে: জ্ঞানবুদ্ধি লোপ পাওয়া উন্মাদ ব্যক্তির উপর থেকে, ঘুমন্ত ব্যক্তির উপর থেকে যতক্ষণ না সে জেগে ওঠে, এবং অপ্রাপ্তবয়স্ক বালকের উপর থেকে যতক্ষণ না সে বালেগ হয়?" তিনি (উমার) বললেন: আপনি সত্য বলেছেন। অতঃপর তিনি তাকে ছেড়ে দিলেন। আবদুল্লাহ (বর্ণনাকারী) বলেন: আমার জানা মতে, উন্মাদ পুরুষ ও উন্মাদ নারীর উপর (আইনগত বাধ্যবাধকতা) প্রত্যাহার করার বিষয়ে আলেমদের মধ্যে কোনো মতভেদ নেই।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات إلا أنه قد اختُلف فيه على الأعمش في رفعه ووقفه، كما سلف بيانه برقم (962). أحمد بن عمرو: هو ابن عبد الله بن السَّرْح، وأبو ظَبْيان: هو حُصين بن جُندب الجَنْبي.وأخرجه أبو داود (4401)، والنسائي (7303) عن أحمد بن عمرو بن السَّرْح، بهذا الإسناد.



[2] جاء في (ز) و (ص): قال عبد الله، بدل: أبو عبد الله، وجاء بعد هذا فيهما بياض بينه وبين المقول. ويغلب على ظننا صحة ما وقع في المطبوع، ويكون المقصود بأبي عبد الله هو الحاكم نفسه أو شيخه الذي هو أحد كبار فقهاء الحنفية، وإن صحَّ ما في (ز) و (ص) فعسى أن يكون المراد به عبد الله بن وهب، فليس في الإسناد من اسمه عبد الله غيره، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2383)


2383 - حدثنا أبو العباس محمد بن إسحاق الصِّبْغي، حدثنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا عبد الأعلى بن حماد، حدثنا عمر بن علي، حدثنا هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، قالت: نزلت هذه الآية {وَالصُّلْحُ خَيْرٌ} [النساء: 128] في رجلٍ كانت تحتَه امرأةٌ قد طالتْ صحبتُها ووَلَدت منه أولادًا، فأراد أن يَستبدِلَ بها، فراضَتْه على أن تَقِرَّ عنده ولا يَقسِمَ لها [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন, এই আয়াত—{আর সন্ধি করাই উত্তম} [সূরা নিসা: ১২৮]—এমন একজন ব্যক্তির সম্পর্কে নাযিল হয়েছিল, যার অধীনে এমন একজন স্ত্রী ছিলেন যার সাথে তার দীর্ঘদিন দাম্পত্য জীবন অতিবাহিত হয়েছে এবং সে তার সন্তানও জন্ম দিয়েছে। এরপর লোকটি তাকে পরিবর্তন করতে (অন্য স্ত্রী গ্রহণ করতে) চাইল। তখন স্ত্রীটি তাকে এই শর্তে রাজি করিয়েছিলেন যে, সে (স্ত্রী) তার কাছেই থাকবে, কিন্তু (স্বামীকে) তার জন্য (অধিকার) বণ্টন করতে হবে না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح وأبو العباس محمد بن إسحاق - وهو أخو الحافظ أبي بكر أحمد بن إسحاق الصِّبغي - كان سماعه صحيحًا كما يفيده كلام الحاكم فيما نقله عنه السمعاني في "الأنساب" في رسم الصِّبغي. عمر بن علي: هو المقدَّمي.وأخرجه ابن ماجه (1974) عن حفص بن عمرو الرَّبَالي، عن عُمر بن علي، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه البخاري (2450) و (2694) و (4601) و (5206)، ومسلم (3021)، والنسائي (11060) من طرق عن هشام بن عروة، به. وعندهم: أنها نزلت في الرجل تكون عنده المرأة … إلخ، فهذا على العموم، وليس واقعة عين كما هو ظاهر رواية المصنف.وانظر ما بعده. وأخرجه دون ذكر الآية أيضًا البخاري (2593)، وأبو داود (2138)، والنسائي (8874) من طريق الزُّهْري، عن عروة، به.وأخرج الترمذي (3040) من حديث ابن عباس، قال: خشيَت سودة أن يُطلِّقها النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: لا تطلقني وأمسكني، واجعل يومي لعائشة، ففعل، فنزلت: {فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَنْ يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًا وَالصُّلْحُ خَيْرٌ}. وحسَّنه الترمذي والحافظ في "الإصابة" 7/ 720.والأصح في سبب نزول الآية العموم لا خصوص قصة سودة كما في الحديث السابق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2384)


2384 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا العباس بن الفضل الأسفاطي، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة: أنَّ سَوْدة جعلت يومَها لعائشة، وأحسَبُ في ذلك نزلت {وَإِنِ امْرَأَةٌ خَافَتْ مِنْ بَعْلِهَا نُشُوزًا أَوْ إِعْرَاضًا} [النساء: 128] [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পালা (দিনের অধিকার) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য ছেড়ে দিয়েছিলেন। আর আমার ধারণা, এই ঘটনা সম্পর্কেই আল্লাহ তাআলার বাণী নাযিল হয়েছে: "আর যদি কোনো স্ত্রী তার স্বামীর কাছ থেকে দুর্ব্যবহার অথবা উপেক্ষা বা অবহেলা করার আশঙ্কা করে..." [সূরা আন-নিসা: ১২৮]।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح دون ذكر نزول الآية، وهذا إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، فهو حسن الحديث. وقد توبع على ذكر جعل سودة يومها لعائشة.وأخرجه بأطول ممّا هنا أبو داود (2135) عن أحمد بن يونس، بهذا الإسناد. وهو بنحو الرواية الآتية عند المصنف برقم (2795) من طريق الحسن بن علي بن زياد عن أحمد بن يونس.وأخرجه دون ذكر الآية أحمد 40/ (24395)، ومسلم (1463) من طريق شريك النخعي، وأحمد 41/ (24477) من طريق عبد الله بن المبارك، والبخاري (5212)، ومسلم (1463) من طريق زهير بن معاوية، ومسلم (1463)، والنسائي (8885)، وابن حبان (4211) من طريق جرير بن عبد الحميد، ومسلم، وابن ماجه (1972) من طريق عقبة بن خالد، وابن ماجه (1972) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، كلهم عن هشام بن عروة، به. وأخرجه دون ذكر الآية أيضًا البخاري (2593)، وأبو داود (2138)، والنسائي (8874) من طريق الزُّهْري، عن عروة، به.وأخرج الترمذي (3040) من حديث ابن عباس، قال: خشيَت سودة أن يُطلِّقها النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: لا تطلقني وأمسكني، واجعل يومي لعائشة، ففعل، فنزلت: {فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَنْ يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًا وَالصُّلْحُ خَيْرٌ}. وحسَّنه الترمذي والحافظ في "الإصابة" 7/ 720.والأصح في سبب نزول الآية العموم لا خصوص قصة سودة كما في الحديث السابق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2385)


2385 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبَري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا يحيى بن المغيرة، حدثنا عبد الله بن نافع، عن عاصم بن عمر، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، قال: كانت الهُدْنةُ بين النبي صلى الله عليه وسلم وبين أهلِ مكة بالحُدَيبِيَة أربعَ سنين [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, হুদাইবিয়াহতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং মক্কাবাসীর মাঝে চার বছরের জন্য সন্ধি হয়েছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وذلك لضعف عاصم بن عمر - وهو ابن حفص العمري - وقال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 8/ 472: وهو مع ضعف إسناده منكرٌ مخالفٌ للصحيح.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (7935) عن محمود بن علي بن مالك الشَّيباني، عن يحيى بن المغيرة، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 5/ 230، ومن طريقه البيهقي 9/ 222 من طريق يعقوب بن حميد بن كاسب، عن عبد الله بن نافع، به.وقد روي كذلك عن عروة بن الزُّبَير: أنَّ الهدنة كانت أربع سنين، عند أبي عبيد في "الأموال" (440)، لكن في الإسناد إليه ابن لهيعة، وهو سيئ الحفظ.وخالفه محمد بن إسحاق، فروى عن الزُّهْري، عن عروة بن الزُّبَير، عن المسور بن مخرمة ومروان بن الحكم: أنَّ مدة الهدنة كانت عشر سنين. أخرجه من طريقه أحمد 31/ (18910)، وأبو داود (2766)، وإسناده حسن. وصرَّح ابن إسحاق بسماعه عند البيهقي 9/ 221 وغيره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2386)


2386 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بحر بن نَصْر بن سابِق الخَوْلاني، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني أبو هانئ الخَولاني، عن عمرو بن مالك، أنه سمع فَضَالة بن عُبيد يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أنا زعيمٌ - والزعيم: الحَمِيل - لمن آمَن بي وأسلمَ وهاجرَ، ببيتٍ في رَبَضِ الجنة" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ফাদালাহ ইবনু উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমি সেই ব্যক্তির জন্য জামিনদার—আর ‘জামিনদার’ মানে অঙ্গীকারকারী—যে আমার প্রতি ঈমান আনল, ইসলাম গ্রহণ করল ও হিজরত করল, তার জন্য জান্নাতের উপকণ্ঠে একটি ঘরের।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو هانئ الخولاني: هو حميد بن هانئ، وعمرو بن مالك: هو الجَنْبي.وأخرجه بأطول ممّا هنا النسائي (4326)، وابن حبان (4619) من طريقين عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2422) بأطول ممّا هنا، لكن شيخ أبي العباس فيه هو محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم.قوله: "ربض الجنة" بفتح الباء: ما حولها خارجًا عنها، تشبيهًا بالأبنية التي تكون حول المدن وتحت القلاع. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6749) عن محمد بن عبدوس بن كامل، عن إبراهيم بن عبد الله الهروي، به. لكنه قال: عن جعفر: أنَّ أم سمرة، فذكره مرسلًا.وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 219 من طريق محمد بن عيسى بن الطباع، عن هُشَيم به. فقال: عن سمرة بن جندب.وأخرجه أحمد بن حنبل في "العلل" (5708) عن هُشَيم بن بشير، والروياني في "مسنده" (856) من طريق أبي الأحوص محمد بن حيان، وأبو القاسم البَغَوي في "معجم الصحابة" (1135) عن زياد بن أيوب، وأبو نعيم في "رياضة الأبدان" (1)، وفي "معرفة الصحابة" (3578) و (7957) من طريق يعقوب بن إبراهيم، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 301 من طريق سعيد بن عبد الحميد بن جعفر، كلهم عن هُشَيم بن بشير، عن عبد الحميد بن جعفر، عن أبيه: أنَّ أم سمرة، فذكروه مرسلًا، وذكر أحمد بن حنبل أنه سمعه من هُشَيم مرتين كذلك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2387)


2387 - حدثنا أبو الحَسَن محمد بن محمد بن الحسن، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا إبراهيم بن عبد الله الهَرَوي، حدثنا هُشَيم، حدثنا عبد الحميد بن جعفر الأنصاري، عن أبيه، عن سمرة بن جُندُب، قال: أيَّمَتْ أمّي وقَدمتِ المدينةَ، فخَطَبها الناسُ، فقالت: لا أتزوجُ إلّا برجلٍ يَكفُل لي هذا اليتيمَ، فتزوجها رجلٌ من الأنصار. قال: فكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَعرِضُ غلمانَ الأنصار في كل عامٍ فيُلحِقُ من أدركَ منهم، قال: فعُرِضتُ عامًا، فألحق غُلامًا وردَّني، فقلتُ: يا رسول الله، لقد ألحقتَه ورَدَدْتَني، ولو صارعتُه لصَرَعتُه، قال: "فصارِعْه"، فصارعتُه فصَرَعتُه، فألحَقَني [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সمرة ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার মা বিধবা হলেন এবং মদীনায় এলেন। অতঃপর লোকেরা তাঁকে বিবাহের প্রস্তাব দিল। তিনি বললেন: আমি এমন ব্যক্তি ছাড়া বিবাহ করব না, যে আমার জন্য এই ইয়াতীমের ভরণপোষণের ভার নেবে। অতঃপর আনসারদের এক ব্যক্তি তাঁকে বিবাহ করলেন। তিনি (সমরা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি বছর আনসারদের বালকদেরকে দেখতেন এবং যারা উপযুক্ত হয়েছে তাদের অন্তর্ভুক্ত করতেন। তিনি বলেন: এক বছর আমি পরিদর্শনের জন্য উপস্থিত হলাম। তিনি (অন্য) এক বালককে অন্তর্ভুক্ত করলেন এবং আমাকে ফিরিয়ে দিলেন। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি তাকে অন্তর্ভুক্ত করলেন আর আমাকে ফিরিয়ে দিলেন, অথচ আমি যদি তার সাথে কুস্তি লড়ি, তবে আমিই তাকে হারিয়ে দেব। তিনি বললেন: "তাহলে তার সাথে কুস্তি লড়ো।" আমি তার সাথে কুস্তি লড়লাম এবং তাকে হারিয়ে দিলাম। অতঃপর তিনি আমাকে অন্তর্ভুক্ত করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن أكثر من رواه عن هُشَيم جعلوه من حديث جعفر مرسلًا يحكي فيه قصة أم سمرة وابنها، وقد جزم ابن معين في "سؤالات ابن الجنيد" بأنَّ جعفرًا والد عبد الحميد - وهو جعفر بن عبد الله بن الحكم بن رافع بن سنان - لم يلق سمرة.وأخرجه البيهقي 9/ 22 و 10/ 18 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الله بن أحمد بن حنبل في "العلل" (5708) عن إبراهيم بن عبد الله الهروي، به. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (6749) عن محمد بن عبدوس بن كامل، عن إبراهيم بن عبد الله الهروي، به. لكنه قال: عن جعفر: أنَّ أم سمرة، فذكره مرسلًا.وأخرجه الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 219 من طريق محمد بن عيسى بن الطباع، عن هُشَيم به. فقال: عن سمرة بن جندب.وأخرجه أحمد بن حنبل في "العلل" (5708) عن هُشَيم بن بشير، والروياني في "مسنده" (856) من طريق أبي الأحوص محمد بن حيان، وأبو القاسم البَغَوي في "معجم الصحابة" (1135) عن زياد بن أيوب، وأبو نعيم في "رياضة الأبدان" (1)، وفي "معرفة الصحابة" (3578) و (7957) من طريق يعقوب بن إبراهيم، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 301 من طريق سعيد بن عبد الحميد بن جعفر، كلهم عن هُشَيم بن بشير، عن عبد الحميد بن جعفر، عن أبيه: أنَّ أم سمرة، فذكروه مرسلًا، وذكر أحمد بن حنبل أنه سمعه من هُشَيم مرتين كذلك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2388)


2388 - حدثنا أبو بكر أحمد بن كامل القاضي، حدثنا أحمد بن حَيَّان بن مُلاعِب ومحمد بن غالب بن حرب، قالا: حدثنا عفّان بن مسلم، حدثنا وُهَيب، حدثنا عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، عن مجاهد، عن السائب بن أبي السائب: أنه كان شريكَ النبي صلى الله عليه وسلم في أول الإسلام في التجارة، فلما كان يومُ الفتح قال: "مرحبًا بأخي وشَريكي، لا تُداري ولا تُمَاري"، وذكر باقي الحديث [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সায়িব ইবনু আবি সায়িব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইসলামের প্রথম দিকে ব্যবসার ক্ষেত্রে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অংশীদার (শরিক) ছিলেন। যখন মক্কা বিজয়ের দিন হলো, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার ভাই ও আমার শরিককে স্বাগতম! তুমি ছলনাপূর্ণ আচরণ করো না এবং ঝগড়া-বিবাদও করো না।" অবশিষ্ট হাদীসটি তিনি উল্লেখ করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، مجاهد - وهو ابن جبر المكي - لم يروه عن السائب، بينهما قائد السائب، وهو مجهول، وفيه اضطراب أيضًا كما بينه الحافظ ابن حجر في ترجمة السائب من "تهذيب التهذيب". وُهَيب: هو ابن خالد.وأخرجه أحمد 24/ (15505) عن عفان بن مسلم، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (10071) من طريق أبي هشام المغيرة بن سلمة المخزومي، عن وُهَيب، به.وأخرجه أحمد (15502)، وأبو داود (4836)، وابن ماجه (2287) من طريق إبراهيم بن المهاجر، عن مجاهد، عن قائد السائب، عن السائب.وأخرجه أحمد (15503) من طريق سيف بن أبي سليمان المخزومي، عن مجاهد، قال: كان السائب بن أبي السائب، فذكره مرسلًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2389)


2389 - أخبرنا أبو عون محمد بن أحمد بن ماهان الجزّار بمكة على الصّفا، أخبرنا محمد بن علي بن زيد، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا عبد العزيز بن محمد، حدثنا عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عيّاش بن أبي ربيعة، عن الزُّهْري، عن عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس، عن الصَّعْب بن جَثّامة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حَمَى النَّقيعَ، وقال: "لا حِمَى إِلَّا للهِ ولرَسولِه" [1].قد اتفقا على حديث يونس عن الزُّهْري بإسناده: "لا حِمَى إِلَّا للهِ ولرسولِه"، ولم يُخرجاه هكذا، وهو صحيح الإسناد.




সা'ব ইবনে জাসসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাকী’ নামক স্থানটিকে সংরক্ষিত ঘোষণা করেন, এবং তিনি বলেন: "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের জন্য ব্যতীত অন্য কারো জন্য কোনো সংরক্ষিত এলাকা (হিমা) নেই।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح دون ذكر حماية النَّقيع، فقد تفرَّد بوصله عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عياش، وليس هو بالقوي، وخالفه الثقة الحافظ يونس بن يزيد الأيلي، فروى الحديث عن الزُّهْري، فوصل قوله: "لا حمى إلّا لله ولرسوله"، وقال: بلغنا أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم حمى النقيع، لكنه مع كونه من بلاغات الزُّهْري له ما يشهد له كما سيأتي.وأخرجه أبو داود (3084) عن سعيد بن منصور، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" 27/ (16659) عن مصعب الزُّبَيري، عن عبد العزيز بن محمد - وهو الدراوردي - به.وأخرجه البخاري (2370)، وأبو داود (3083) من طريق يونس بن يزيد الأيلي، عن الزُّهْري، به بلفظ: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا حمى إلّا لله ولرسوله". وقال - يعني الزُّهْري، كما جاء موضحًا في رواية أبي داود -: بلغنا أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم حمى النقيع.وأخرجه دون ذكر حمى النقيع أحمد (16422) و (16425) و (16666)، وابنه عبد الله (16657) و (16679)، والبخاري (3012)، والنسائي (5743) و (8570)، وابن حبان (136) و (137) و (4684) و (4787) من طرق عن الزهري، به.ويشهد له حديث أبي هريرة عند ابن حبان (4685).ويشهد لبلاغ الزُّهْري حديث عبد الله بن عمر عند أحمد 9/ (5655)، وابن حبان (4683) من طريقين عن ابن عمر، لكن في كل منهما رجل ضعيف، فيجبُرُ كلٌّ منهما صاحبَه.ويشهد له أيضًا مرسل نوفل بن مساحق من رواية ابنه عبد الملك عنه، عند الخطيب في "تاريخه" 4/ 34، ورجاله ثقات، وهو أيضًا عند عمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 1/ 156 لكنه جعله من مرسل ابنه عبد الملك (وتحرّف في المطبوع اسم عبد الملك إلى: عبد الله).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2390)


2390 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن أبي الزُّبَير، عن جابر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نَهَى عن بَيع الماء [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه [2].وله شاهد بزيادةٍ في المتن:




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পানি বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 23/ (14639) و (14842) من طرق عن حماد بن سلمة، به.وقد تقدم من طريق ابن جُرَيج عن أبي الزُّبَير برقم (2319).ومن طريق عطاء بن أبي رباح عن جابر برقم (2320). يصحُّ فهو تصحيف لا شكَّ.



[2] قد أخرجه مسلم كما ذكرنا فيما تقدم، فلا يُستدرك عليه. يصحُّ فهو تصحيف لا شكَّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2391)


2391 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا يحيى بن يحيى، حدثنا داود بن عبد الرحمن المكي، عن عمرو بن دينار، عن أبي المِنْهال، عن إياس بن عبدٍ: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم نَهَى عن بيع فَضْل الماء [1].




ইয়াস ইবনে আব্দুল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অতিরিক্ত পানি বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو المنهال: هو عبد الرحمن بن مُطعم المكي.وأخرجه أبو داود (3478) عن عبد الله بن محمد النُّفيلي، والترمذي (1271) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن داود بن عبد الرحمن بهذا الإسناد. لكن لم يقع في رواية الترمذي ذكر الفضل، وإنما قال: عن بيع الماء.وقد تقدم من طريق سفيان بن عيينة ومن طريق ابن جُرَيج، كلاهما عن عمرو بن دينار برقم (2317) و (2318). يصحُّ فهو تصحيف لا شكَّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2392)


2392 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا عبد الله بن عبد الوهاب الحَجَبي، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الرِّجَال، قال: سمعتُ أبي يحدّث عن أمّه عَمْرة، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "لا يُمْنَعُ نَقْعُ [1] البئر"؛ وهو الرَّهْو [2].قال عبد الرحمن: سمعتُ أبي يقول: إنَّ الرَّهْو أن تكون البئر بين شركاءَ فيها الماءُ، فيكون للرجل فيها فضلٌ، فلا يَمنعُ صاحبَه.هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.إنما اتفقا من هذا الباب على حديث الزُّهْري، عن سعيد وأبي سلمة، عن أبي هريرة: "لا يُمنَعُ فضلُ الماء ليُمنَعَ به الكلأُ" [3].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কূপের অবশিষ্ট পানি (নাক্বউ) আটকে রাখা যাবে না।" আর এটিই হলো ‘আর-রাহও’। আব্দুর রহমান বলেন: আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছি, 'আর-রাহও' হলো যখন কূয়াটি অংশীদারদের মধ্যে থাকে এবং তাতে পানি থাকে। যদি কোনো ব্যক্তির (নিজ অংশের চেয়ে) অতিরিক্ত পানি থাকে, তবে সে তার অন্য অংশীদারকে তা থেকে বারণ করতে পারবে না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في (ز): نفع، بالفاء، وقد ضبطه القاضي عياض في "التنبيهات المستنبطة" ورقة 460، فقال: هو بالقاف الساكنة بعد النون المفتوحة، وهو المعروف في أكثر الروايات حيث وقع في المصنفات، وروِّيناه عن بعض شيوخنا في "الموطأ" بالفاء والقاف معًا، وإن كان للفاء معنًى يصحُّ فهو تصحيف لا شكَّ.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل عبد الرحمن بن أبي الرِّجَال - وأبو الرجال اسمه محمد بن عبد الرحمن بن عبد الله الأنصاري - فهو قوي الحديث لا بأس به، وقد تابعه غير واحد كما سيأتي بيانه. ورواه سفيان الثَّوري ومالك عن أبي الرِّجال، واختُلف عليهما في وصله وإرساله، كما بينه الدارقطني في "العلل" (3771)، وقال: هو صحيح عن عائشة. وكذلك مال إلى تصحيح وصله ابنُ عبد البر في "التمهيد" 13/ 123 - 124.وأخرجه أحمد 41/ (24741) عن أبي سعيد عبد الرحمن بن عبد الله مولى بني هاشم، عن عبد الرحمن بن أبي الرجال، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 41/ (24811) من طريق أبي أويس، وأحمد 42/ (25087) و 43/ (26311)، وابن حبان (4955) من طريق محمد بن إسحاق، وأحمد 43/ (26147) من طريق خارجة بن عبد الله من ولد زيد بن ثابت، ثلاثتهم عن أبي الرجال، به.وأخرجه ابن ماجه (2479) من طريق حارثة بن أبي الرِّجال، عن عمرة، به. وحارثة ضعيف، فالاعتماد على رواية من رواه عن أبي الرجال عن عمرة.وانظر تمام تخريجه وبيان الاختلاف فيه على مالك وسفيان الثَّوري في "مسند أحمد" (24811).



2392 [3] - أخرجه من هذا الطريق البخاري (2354)، ومسلم (1566) (37).وأخرجه أيضًا البخاري (2353)، ومسلم (1566) (36) من طريق الأعرج، عن أبي هريرة.والكلأ: العُشْب رطبًا كان أو يابسًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2393)


2393 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إسحاق الفقيه وأبو بكر بن عَبْدك القَزّاز الرازي ببغداد: قالا: حدثنا علي بن الحسين بن الجُنيد [حدثنا أحمد بن صالح المصري] [1] حدثنا إسحاق بن عيسى، حدثنا مالك بن أنس، عن أبي الرِّجَال، عن عَمْرة، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى في سَيْلِ مَهْزُورٍ ومِذنَب أَنَّ الأعلى يُرْسِلُ إلى الأسفل ويَحبِسُ قدرَ كَعبَينِ [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাহযূরের স্রোত ও খালের (পানির অধিকার) সম্পর্কে এই রায় প্রদান করেন যে, উপরের (জমির মালিক) নিচের (জমির মালিকের) দিকে পানি ছেড়ে দেবে, কিন্তু সে দুই গোড়ালির সমপরিমাণ (উচ্চতার) পানি ধরে রাখতে পারবে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من "إتحاف المهرة" للحافظ (2319). وأخرجه أحمد 39/ (24009/ 11) عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، عن حيوة بن شُريح، عن أبي الأسود، به. فذكر حيوة بن شريح، بدل: سعيد بن أبي أيوب، وقال أبو القاسم البَغَوي في "معجم الصحابة" (592): رواه المقرئ عن حيوة وسعيد بن أبي أيوب جميعًا.



[2] إسناده صحيح، وحسَّنه الحافظ ابن حجر في "الفتح" 7/ 486.وأخرجه الدارقطني في "غرائب مالك" كما في "فتح الباري" 7/ 486، ومن طريقه ابنُ عبد البر في "التمهيد" 17/ 409 عن أبي محمد بن صاعد وعلي بن محمد الإسكافي، كلاهما عن أبي الأحوص محمد بن الهيثم القاضي، عن أحمد بن صالح المصري، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث عبد الله بن عمرو عند أبي داود (3639) وابن ماجه (2482)، وإسناده حسن.وحديث ثعلبة بن أبي مالك عندهما أيضًا، وفي إسناده ضعف.ومرسل عبد الله بن أبي بكر عند مالك في "الموطأ" 2/ 744.وانظر حديث الزبير بن العوام الآتي برقم (5664).ومَهزور، بتقديم الزاي على الراء: وادي بني قريظة بالحجاز.ومِذْنَب: اسم موضع بالمدينة. وأخرجه أحمد 39/ (24009/ 11) عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، عن حيوة بن شُريح، عن أبي الأسود، به. فذكر حيوة بن شريح، بدل: سعيد بن أبي أيوب، وقال أبو القاسم البَغَوي في "معجم الصحابة" (592): رواه المقرئ عن حيوة وسعيد بن أبي أيوب جميعًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2394)


2394 - أخبرنا أبو محمد عبد الله بن محمد بن إسحاق الخُزاعي بمكة، حدثنا أبو يحيى بن أبي مَسَرّة، حدثنا عبد الله بن يزيد المُقرئ، حدثني سعيد بن أبي أيوب، حدثني أبو الأسود، عن بُكير بن عبد الله بن الأشجّ، عن بُسر بن سعيد، عن خالد بن عَدِي الجُهني، قال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن بَلَغَه معروفٌ عن أخيه مِن غير مَسألةٍ ولا إشرافِ نَفْسٍ، فليَقْبَلْه ولا يَرُدَّه، فإنما هو رِزْقٌ ساقَهُ اللهُ إِليهِ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




খালিদ ইবনু আদী আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তিকে তার ভাইয়ের পক্ষ থেকে কোনো প্রকারের চাওয়া কিংবা অন্তরের লোভ (আকাঙ্ক্ষা) ছাড়া কোনো অনুগ্রহ পৌঁছানো হয়, সে যেন তা গ্রহণ করে এবং প্রত্যাখ্যান না করে। কেননা তা আল্লাহ্‌র পক্ষ থেকে তার নিকট পাঠানো রিযিক (জীবিকা)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وصحَّحه الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 2/ 244. أبو الأسود: هو محمد بن عبد الرحمن بن نوفل. وقال الحافظ في "إتحاف المهرة" (4439): صحَّحه ابن حزم وعبد الحق وابن القطان.وأخرجه أحمد 29/ (17936)، وابن حبان (3404) و (5108) من طرق عن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 39/ (24009/ 11) عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، عن حيوة بن شُريح، عن أبي الأسود، به. فذكر حيوة بن شريح، بدل: سعيد بن أبي أيوب، وقال أبو القاسم البَغَوي في "معجم الصحابة" (592): رواه المقرئ عن حيوة وسعيد بن أبي أيوب جميعًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2395)


2395 - حدثني علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا بِشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، حدثنا عمرو بن دينار، قال: سمعت وهب بن مُنبِّه في داره بصنعاء وأطعَمَني خَزِيرةً [1] في داره، يحدِّث عن أخيه، عن معاوية بن أبي سفيان، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا تُلْحِفُوا في المسألةِ، واللهِ [2] لا يسألُني أحد منكم شيئًا، فتُخرِجَه له مني المسألةُ، فأُعطيَه إياه وأنا كارِهٌ، فيُبارَكَ له في الذي أعطَيتُه" [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة!




মুয়াবিয়া ইবনে আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা (কারো কাছে চাওয়ার সময়) অতিশয় পীড়াপীড়ি করো না। আল্লাহর কসম, তোমাদের মধ্যে কেউ যদি আমার কাছে এমন কিছু চায়, আর সেই চাওয়ার কারণে আমি তাকে তা দিতে বাধ্য হই, অথচ আমি তা দিতে অনিচ্ছুক থাকি, তবে আমি তাকে যা দেব, তাতে তার জন্য কোনো বরকত থাকবে না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا وقع في النسخ الخطية، والذي في مطبوع "مسند الحميدي" وسائر مصادر تخريج الحديث: أطعمني من جوزة في داره.



[2] في (ب): فوالله. وهو كذلك في مطبوعي "مسند الحميدي" وسائر مصادر تخريج الحديث.



2395 [3] - إسناده صحيح. الحميدي: هو عبد الله بن الزُّبَير المكي، وسفيان: هو ابن عُيينة.وأخرجه أحمد 28/ (16893)، ومسلم (1038)، والنسائي (2385)، وابن حبان (3389) من طرق عن سفيان بن عيينة بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.والخَزِيرة: لحم يُقطَّع صغارًا ويُصبُّ عليه ماء كثير، فإذا نضج ذُرَّ عليه الدقيق، فإن لم يكن فيها لحم فهي عَصيدة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2396)


2396 - أخبرني أبو الحُسين محمد بن أحمد القَنْطَري ببغداد وأبو أحمد بكر بن محمد الصَّيْرفي بمَرْو، قالا: حدثنا أبو قِلابةوأخبرني أبو عمرو بن نُجَيد، حدثنا أبو مُسلم؛ قالا: حدثنا أبو عاصم، عن ابن عَجْلان، عن المقبُري، عن أبي هريرة: أنَّ رجلًا أهدى إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم لِقْحة، فأثابَه منها بستِّ بَكَرات، فتسخَّطها الرجلُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن يَعذِرُني مِن فلانٍ، أَهدى إلي لِقْحةً، فكأني أنظُر إليها في وَجْه بعضِ أهلِه، فأثَبْتُه منها بسِتِّ بَكَرَاتٍ فتَسخَّطَها، لقد هممتُ أن لا أقبل هَديّةً إلّا أن تكونَ من قُرشيٍّ أو أنصارِيٍّ أو ثَقَفيٍّ أو دَوْسِيّ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট একটি দুধেল উটনী হাদিয়া দিল। তিনি তাকে এর বিনিময়ে ছয়টি বাচ্চা উট দিলেন। কিন্তু লোকটি এতে অসন্তুষ্ট হলো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "অমুক লোকের হাত থেকে আমাকে কে রক্ষা করবে? সে আমাকে একটি দুধেল উটনী উপহার দিল। আমি যেন এখনও তার পরিবারের কারো চেহারায় সেটা দেখতে পাচ্ছি (এর প্রতি তার আকর্ষণ); অতঃপর আমি তাকে এর বিনিময়ে ছয়টি বাচ্চা উট দিলাম, কিন্তু সে তাতে অসন্তুষ্ট হলো। আমি তো সংকল্প করেছিলাম যে, কুরাইশী, আনসারী, সাকাফী অথবা দাওসী ব্যতীত আর কারো হাদিয়া গ্রহণ করব না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل ابن عجلان - وهو محمد - وقد توبع.وأخرجه مختصرًا أحمد 12/ (7363) عن سفيان بن عيينة، والنسائي (6558) من طريق معمر بن راشد، كلاهما عن ابن عجلان، به.وأخرجه أحمد 13/ (7918) من طريق أبي معشر نجيح السِّنْدي، والترمذي (3945) من طريق أيوب بن أبي مسكين كلاهما عن سعيد المقبري، به. وتابعهما مسعر بن كدام عند ابن أبي شيبة 12/ 201.وأخرجه أبو داود (3537)، والترمذي (3946) من طريق محمد بن إسحاق، عن سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة، وصرَّح ابن إسحاق بسماعه عند إبراهيم الحربي في "غريب الحديث" 3/ 917.وقد سمع سعيد المقبري وأبوه من أبي هريرة، وسمع سعيد من أبيه عن أبي هريرة كذلك، فلا يبعد أن يكون سعيد سمعه مرة بواسطة أبيه ومرة سمعه من أبي هريرة مباشرة، فيكون الإسنادان صحيحين، والله أعلم.وأخرجه ابن حبان (6383) من طريق أبي سلمة، عن أبي هريرة مختصرًا.والبَكَرات: جمع بَكْرة، وهي الأنثى من الإبل.واللِّقْحة، بالكسر والفتح: الناقة القريبة العهد بالنِّتاج.وقوله: "من يَعذِرُني من فلان"، أي: من يقوم بعُذْري إذا جازَيتُه بصُنْعه فلا يلُومُني على ما أفعلُه به. الرازيان في "العلل" (2225)، وخالفهم سفيان الثَّوري، فقال: عن عبد الله بن سنان بدل: يعقوب بن بَحير، وعبد الله بن سنان ثقة. وصحَّح علي بن المديني وأبو حاتم وأبو زرعة رواية الجماعة، وأما يحيى بن معين، فقال في رواية العباس الدُّوري عنه: القول قول سفيان. ومالَ ابنُ القطّان في "بيان الوهم والإيهام" 4/ 505 إلى تصحيح رواية سفيان!وأخرجه أحمد 31/ (18905) و (18980)، وابن حبان (5283) من طريق وكيع، وأحمد (18905) عن أبي معاوية محمد بن خازم الضرير، وأحمد (18981) من طريق زهير بن معاوية، ثلاثتهم عن الأعمش، به.وسيأتي الحديث من طريق عبد الله بن المبارك عن الأعمش برقم (5115).وستأتي رواية سفيان الثَّوري عن الأعمش برقم (6748).ويشهد للمرفوع منه حديث نُقَادة الأسدي عند الطبري كما في "المؤتلف والمختلف" للدارقطني 3/ 1661 و 1731، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5701)، والطبراني في "الأوسط" (3743) من طريقين عن نُقَادة بلفظه، وحديثه حسن بمجموع الطريقين.وحديث عبد الله بن عمرو بن العاص عند الطبراني في "الكبير" (14702)، و"الأوسط" (885)، وأبي نعيم في "حلية الأولياء" 8/ 176، بلفظ: مرّ رسول الله صلى الله عليه وسلم برجلٍ يَحلُبُ شاةً، فقال: "أَيْ فلانُ، إِذا حَلَبتَ فأبْقِ لولدِها، فإنها من أَبرِّ الدّوابِّ". وإسناده حسن.وقوله: "دع داعي اللبن" أي: أبقِ في الضَّرع قليلًا من اللبن ولا تستوعبه كُلَّه، فإنَّ الذي تُبقيه فيه يدعو ما وراءه من اللبن فينزِلُه، وإذا استُقْصِيَ كلُّ ما في الضَّرع أبطأ دَرُّه على حالبه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2397)


2397 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا عبد الله بن داود، عن الأعمش، عن يعقوب بن بَحِير، عن ضِرار بن الأزوَر قال: بعثَني أهلي بلَقُوحٍ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم أهدَوْها له، فقال لي: "احلُبْها ودَعْ داعيَ اللَّبَنِ" [1]. حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في شهر رمضان سنة سبع وتسعين وثلاث مئة:




দিরাব ইবনুল আযওয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার পরিবার রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি দুধেল উটনী হাদিয়া হিসেবে দিয়ে আমার মাধ্যমে পাঠাল। তিনি আমাকে বললেন, “তুমি সেটির দুধ দোহন করো, তবে দুধের প্ররোচক অংশ (সামান্য দুধ) অবশিষ্ট রাখবে।” [১]। আমাদের নিকট হাকেম আবূ আবদুল্লাহ মুহাম্মাদ ইবনু আবদুল্লাহ হাফিয ৩৯৭ হিজরীর রমযান মাসে শ্রুতিলিপির মাধ্যমে বর্ণনা করেছেন:




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] مرفوعه حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات غير يعقوب بن بَحير، فلا يُعرف، وقد اختلف فيه على الأعمش، فرواه كذلك جماعة من الحفَّاظ عنه كما قال أبو زرعة وأبو حاتم الرازيان في "العلل" (2225)، وخالفهم سفيان الثَّوري، فقال: عن عبد الله بن سنان بدل: يعقوب بن بَحير، وعبد الله بن سنان ثقة. وصحَّح علي بن المديني وأبو حاتم وأبو زرعة رواية الجماعة، وأما يحيى بن معين، فقال في رواية العباس الدُّوري عنه: القول قول سفيان. ومالَ ابنُ القطّان في "بيان الوهم والإيهام" 4/ 505 إلى تصحيح رواية سفيان!وأخرجه أحمد 31/ (18905) و (18980)، وابن حبان (5283) من طريق وكيع، وأحمد (18905) عن أبي معاوية محمد بن خازم الضرير، وأحمد (18981) من طريق زهير بن معاوية، ثلاثتهم عن الأعمش، به.وسيأتي الحديث من طريق عبد الله بن المبارك عن الأعمش برقم (5115).وستأتي رواية سفيان الثَّوري عن الأعمش برقم (6748).ويشهد للمرفوع منه حديث نُقَادة الأسدي عند الطبري كما في "المؤتلف والمختلف" للدارقطني 3/ 1661 و 1731، والطحاوي في "مشكل الآثار" (5701)، والطبراني في "الأوسط" (3743) من طريقين عن نُقَادة بلفظه، وحديثه حسن بمجموع الطريقين.وحديث عبد الله بن عمرو بن العاص عند الطبراني في "الكبير" (14702)، و"الأوسط" (885)، وأبي نعيم في "حلية الأولياء" 8/ 176، بلفظ: مرّ رسول الله صلى الله عليه وسلم برجلٍ يَحلُبُ شاةً، فقال: "أَيْ فلانُ، إِذا حَلَبتَ فأبْقِ لولدِها، فإنها من أَبرِّ الدّوابِّ". وإسناده حسن.وقوله: "دع داعي اللبن" أي: أبقِ في الضَّرع قليلًا من اللبن ولا تستوعبه كُلَّه، فإنَّ الذي تُبقيه فيه يدعو ما وراءه من اللبن فينزِلُه، وإذا استُقْصِيَ كلُّ ما في الضَّرع أبطأ دَرُّه على حالبه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2398)


2398 - حدثنا الشيخ أبو بكر أحمد بن إسحاق، أخبرنا أبو مُسلم، حدثنا أبو الوليد، حدثنا إسحاق بن سعيد، حدثنا أبي، حدثتني أم خالد بنت خالد، قالت: أُتي النبيُّ صلى الله عليه وسلم بثيابٍ فيها خَمِيصةٌ سوداء صغيرة، فقال: "مَن تَرَون أكسُو هذه؟ " فسكتَ القومُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ائتُوني بأمِّ خالدٍ" قالت: فأُتِي بي فألبَسَنِيها بيده، وقال: "أَبْلِي وأخْلِفي [1] " يقولها مرتين، وجعل ينظُر إلى عَلَمٍ في الخَمِيصة أصفرَ وأحمرَ، ويقول: "يا أمَّ خالدٍ، هذا سَنَا" [2]. والسَّنا بلِسان الحَبَشة: الحَسَن.هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




উম্মে খালিদ বিনতে খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কিছু কাপড় আনা হলো, যার মধ্যে একটি ছোট কালো নকশা করা চাদর (খামীসা) ছিল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কাকে দেখছো, যাকে আমি এটি পরিধান করাবো?" এতে লোকেরা নীরব রইল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "উম্মে খালিদকে আমার কাছে নিয়ে এসো।" তিনি (উম্মে খালিদ) বলেন: তখন আমাকে আনা হলো এবং তিনি নিজ হাতে আমাকে সেটি পরিয়ে দিলেন এবং বললেন: "পুরাতন করো এবং পুনরায় (অন্যটি) পরিধান করো।"—এ কথা তিনি দু'বার বললেন। তিনি খামীসাটির মধ্যে থাকা হলুদ ও লাল রঙের নকশার দিকে দেখতে লাগলেন, আর বলতে লাগলেন: "হে উম্মে খালিদ! এটা 'সানা'।" আর হাবশার (আবিসিনিয়ার) ভাষায় 'সানা' অর্থ হলো: সুন্দর। এই হাদিসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্ত অনুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা এটি সংকলন করেননি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا أعجمت في (ز) بالفاء، وفي بقية النسخ الخطية: "وأخلقي" بالقاف، قال ابن حجر في "فتح الباري" 18/ 57 - 58: بالفاء أوجه من التي بالقاف، لأنَّ التي بالقاف تستلزم التأكيد، إذ الإبلاء والإخلاق بمعنًى، لكن جاز العطف لتغاير اللفظين، والثانية - يعني التي بالفاء - تفيد معنًى زائدًا، وهو أنها إذا أبلتْه أخلفت غيره، ويؤيده ما أخرجه أبو داود (4020) بسند صحيح عن أبي نَضْرة قال: كان أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا لبس أحدهم ثوبًا جديدًا قيل له: تُبلِي ويُخلِفُ الله.



[2] إسناده صحيح. أبو مسلم: هو إبراهيم بن عبد الله الكجّي، وأبو الوليد: هو هشام بن عبد الملك الطيالسي، وإسحاق بن سعيد: هو ابن عمرو بن سعيد بن العاص.وأخرجه البخاري (5845) عن أبي الوليد الطيالسي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 44/ (27057)، وأبو داود (4024) من طريق أبي النضر هاشم بن القاسم، عن إسحاق بن سعيد، به.وأخرجه البخاري (3071) و (5993) من طريق عبد الله بن المبارك، عن خالد بن سعيد - وهو أخو إسحاق بن سعيد - عن أبيه، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وسيأتي من طريق سفيان بن عيينة عن إسحاق بن سعيد برقم (4294).ومن طريق الحسن بن بشر عن إسحاق برقم (7579).وسيأتي كذلك من طريق عبد الله بن عمر بن أبان عن خالد بن سعيد أخي إسحاق برقم (5168) لكنه قال فيه: عن أبيه، عن عمه خالد بن سعيد الأكبر أنه قدم على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكره، وجعله من مسند خالد بن سعيد. ولم يدرك سعيدُ بن عمرو عمَّه خالد بن سعيد، ففيه انقطاع كما قال الذهبي في "التلخيص" وابن حجر في "إتحاف المهرة" (4438).والخَميصة: ثوب من خزٍّ أو صوف مُعْلَم، وقيل: لا تُسمَّى خميصةً إلّا أن تكون سوداء معلمة وكانت من لباس الناس قديمًا.والعَلَم: العلامة من طراز وغيره. وأخرجه أبو داود (4812) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (9938) من طريق يحيى بن حماد، عن حماد بن سلمة، به.وأخرجه أحمد 20/ (13075) و (13122)، والترمذي (2487) من طريق حميد بن أبي حميد الطويل، عن أنس. وقال الترمذي: حسن صحيح غريب من هذا الوجه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2399)


2399 - حدثني علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا هشام بن علي ومحمد بن أيوب، قالا: حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت، عن أنس: أنَّ المهاجرين قالوا للنبي صلى الله عليه وسلم: ذهبَ الأنصارُ بالأجرِ كُلِّه، قال: "لا، ما دعَوتُمُ اللهَ لهم وأَثنَيتُم" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাজিরগণ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন, আনসারগণ সমস্ত পুরস্কার (সাওয়াব) নিয়ে গেল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “না, যতক্ষণ তোমরা তাদের জন্য আল্লাহর কাছে দোয়া করবে এবং তাদের প্রশংসা করবে (ততক্ষণ তোমরাও সাওয়াব পাবে)।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ثابت: هو ابن أسلم البُناني. وأخرجه أبو داود (4812) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (9938) من طريق يحيى بن حماد، عن حماد بن سلمة، به.وأخرجه أحمد 20/ (13075) و (13122)، والترمذي (2487) من طريق حميد بن أبي حميد الطويل، عن أنس. وقال الترمذي: حسن صحيح غريب من هذا الوجه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2400)


2400 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا محمد بن عبد الوهاب العَبْدي.وحدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إسحاق بن الحسن بن ميمون الحَرْبي؛ قالا: حدثنا سُريج بن النعمان الجَوهري، حدثنا أبو عَوَانة، عن الأعمش، عن مجاهد، عن ابن عمر، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "من سألكُم بالله فأَعْطُوه، ومَن استعاذكُم باللهِ فأعيذُوه، ومَن آتى إليكُم معروفًا فكافِئوه، فإن لم تَجِدُوا فادعُوا له حتى تعلَمُوا أنكم كافأْتُموهُ، ومن استجارَكُم باللهِ فأجِيرُوه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، للخلاف الذي بين أصحاب الأعمش فيه [2].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে তোমাদের কাছে আল্লাহর নামে চায়, তাকে তোমরা দাও। আর যে তোমাদের কাছে আল্লাহর নামে আশ্রয় চায়, তাকে আশ্রয় দাও। আর যে তোমাদের প্রতি কোনো উপকার করে, তোমরা তার প্রতিদান দাও। যদি তোমরা (প্রতিদান দেওয়ার মতো কিছু) না পাও, তবে তার জন্য দু'আ করতে থাকো, যতক্ষণ না তোমরা মনে করো যে তোমরা তাকে প্রতিদান দিয়েছো। আর যে তোমাদের কাছে আল্লাহর নামে সাহায্য চায়, তাকে সাহায্য করো।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكُري، والأعمش: هو سليمان بن مهران، ومجاهد: هو ابن جبر المكي.وأخرجه أحمد 10/ (5743) عن سريج بن النعمان، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم من طريق مسلم بن إبراهيم عن أبي عوانة برقم (1519/ 1)، ومن ثلاثة طرق أخرى عن الأعمش بالأرقام (1519) و (1519/ 2) و (1519/ 3).



[2] قدّم المصنف بيان ذلك بالأرقام (1519 - 1519/ 3).