আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
2461 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ إملاءً، حدثنا إبراهيم بن عبد الله بن سُليمان السَّعْدي، حدثنا محمد بن القاسم الأسَدي، حدثنا عمر بن راشد اليَمَامي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ثلاثةُ أعيُنٍ لا تمَسُّها النارُ: عينٌ فُقِئتُ في سبيلِ الله، وعينٌ حَرَسَتْ في سبيلِ الله، وعينٌ بَكَتْ من خَشيةِ الله" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد روي بإسنادٍ آخرَ عن أبي هريرة:
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিনটি চোখকে জাহান্নামের আগুন স্পর্শ করবে না: এমন চোখ যা আল্লাহর পথে (জিহাদে) আঘাতপ্রাপ্ত/ক্ষতিগ্রস্ত হয়েছে; এমন চোখ যা আল্লাহর পথে পাহারা দিয়েছে; এবং এমন চোখ যা আল্লাহর ভয়ে ক্রন্দন করেছে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا لضعف عمر بن راشد اليمامي ومحمد بن القاسم الأسدي، بل كذَّب بعضُهم هذا الثاني، وقد توبعا بمتابعةٍ لا يُفرح بها كما سيأتي.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (774) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الجهاد" (148)، والبزار (8570)، وأبو طاهر المخلِّص في "المخلصيات" (2819)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 163، وقوام السنة في "الترغيب والترهيب" (497)، وابن عساكر في "الأربعين في الحث على الجهاد" (36) من طريق عمر بن محمد بن صُبْهان، عن صفوان بن سُليم، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، إلّا أنه قال: "عين غضّت عن محارم الله" بدل: "عين فُقئت في سبيل الله". ولا يُفرح بهذه المتابعة لأنَّ عمر بن محمد بن صُهبان ضعيف جدًّا.وما بعده يغني عنه.وقد صحَّ عن أبي هريرة من وجه آخر في ذكر العين التي تبكي من خشية الله، كما سيأتي عند المصنف برقم (7860).كما صحَّ عنه في حديث السبعة الذين يُظلهم اللهُ في ظله يوم لا ظل إلّا ظله، وذكر منهم "رجلٌ ذكر اللهَ خاليًا ففاضت عيناه"، وهو عند البخاري (660)، ومسلم (1031).وقد صحَّ أيضًا في ذكر العين التي تبكي من خشية الله والعين التي تحرس في سبيل الله حديثُ ابن عباس عند الترمذي (1639) وحَسَّنه، بلفظ: "عينان لا تمسهما النار: عين بكت من خشية الله، وعين باتت تحرس في سبيل الله". ونحوه لأنس بن مالك عند ابن أبي عاصم في "الجهاد" (147) وغيره، وإسناده حسن في المتابعات والشواهد، وانظر ما سيأتي عند المصنف برقم (7861).وذكرنا له شواهد أخرى انظرها في "مسند أحمد" عند حديث أبي ريحانة (17213)، وحديثه سيأتي بإثر التالي.
2462 - أخبرَناه حمزة بن العباس العَقَبي ببغداد، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا أبي، عن صالح بن كَيْسان، قال: قال أبو عبد الرحمن: سمعت أبا هريرة يقول: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "حُرِّم على عينَين أن تَنالَهُما النارُ: عينٌ بَكَتْ من خَشْية الله، وعينٌ باتَتْ تحرُسُ الإسلامَ وأهلَه من أهلِ الكُفْرِ" [1].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: দুটি চোখ রয়েছে, যাদেরকে আগুন স্পর্শ করা হারাম: এক, সেই চোখ যা আল্লাহর ভয়ে কেঁদেছে; এবং দুই, সেই চোখ যা কাফেরদের হাত থেকে ইসলাম ও তার অনুসারীদের রক্ষায় রাত জেগে পাহারা দিয়েছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، فإنه منقطع كما قال المنذري في "الترغيب والترهيب" 2/ 160، والذهبي في "تلخيص المستدرك"؛ يعني بين صالح بن كيسان وأبي عبد الرحمن، على أنَّ أبا عبد الرحمن هذا لا يُعرف من هو، ذكره البخاري في "تاريخه" 9/ 50، ولم يذكر له راويًا غير صالح بن كيسان، وذكر له هذا الحديث.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (3930) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد بن حميد (1447) عن يعقوب بن إبراهيم، به.وأخرجه أبو محمد البَغَوي في "شرح السنة" (2620) من طريق زهير بن عباد، عن داود بن هلال، عن المسعودي، عن محمد بن عبد الرحمن مولى آل طلحة، عن عيسى بن طلحة، عن أبي هريرة. كذا رواه داود بن هلال عن المسعودي، وداود بن هلال هذا هو أبو سليمان النصيبي ترجم له ابن أبي حاتم، ولم يذكر له راويًا غير زهير بن عبّاد، ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا، ولا يُعرف هل روى عن المسعودي قبل تغيره أم بعد ذلك، على أنَّ المحفوظ عن المسعودي بهذا الإسناد رواية الحديث بغير هذا اللفظ، كما سيأتي عند المصنف برقم (7860)، والله تعالى أعلم.وانظر شواهده عند الطريق الذي قبله.
2463 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، حدثني عبد الرحمن بن شُرَيح، عن محمد بن سُمَير [1]، عن أبي علي الجَنْبي، عن أبي رَيحانة، قال: خَرجْنا مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم في غزوةٍ، فأَوفَينا على شَرَفٍ، فأصابنا بَرْدٌ شديدٌ، حتى إن كان أحدُنا يَحفِرُ الحَفِير، ثم يدخُل فيه ويُغطِّي عليه بحَجَفَتِه، فلما رأى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ذلك من الناسِ، قال: "ألا رجلٌ يحرُسُنا الليلةَ أدعُو اللهَ له بدُعاءٍ يُصيبُ به فَضْلًا"، فقام رجلٌ من الأنصار، فقال: أنا يا رسول الله، فدعا له، قال أبو رَيحانة: فقلت: أنا، فدَعا لي بدُعاءٍ هو دُون ما دَعا به للأنصاريّ، ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "حُرِّمَت النارُ على عَينٍ دَمَعَتْ مِن خَشيةِ الله، حُرِّمت النارُ على عين سَهِرتْ في سبيلِ الله"، قال: ونَسيتُ الثالثةَ. قال أبو شُريح - وهو عبد الرحمن بن شُريح -: وسمعت بعدُ أنه قال: "حُرِّمَتِ النارُ على عَينٍ غَضَّتْ عن محارِمِ الله" أو "عينٍ فُقِئت في سبيلِ الله" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ রায়হানা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক যুদ্ধে বের হলাম। আমরা যখন একটি উঁচু স্থানে উঠলাম, তখন আমাদের উপর তীব্র ঠান্ডা জেঁকে ধরল। অবস্থা এমন হলো যে, আমাদের কেউ কেউ গর্ত খুঁড়ে তার ভেতরে প্রবেশ করত এবং নিজের ঢাল দিয়ে তা ঢেকে দিত। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকজনের এই অবস্থা দেখলেন, তখন তিনি বললেন: "এমন কি কোনো লোক নেই যে, আজ রাতে আমাদের পাহারা দেবে? আমি তার জন্য আল্লাহর নিকট এমন দো‘আ করব, যার মাধ্যমে সে বিশেষ মর্যাদা লাভ করবে।" তখন আনসারদের মধ্য থেকে একজন লোক দাঁড়িয়ে বললেন: "আমি আছি, ইয়া রাসূলুল্লাহ।" অতঃপর তিনি তার জন্য দো‘আ করলেন। আবূ রায়হানা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বললাম: "আমিও আছি।" তখন তিনি আমার জন্য এমন দো‘আ করলেন যা ওই আনসারী লোকের জন্য করা দো‘আ অপেক্ষা কম মর্যাদার ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওই চোখের জন্য জাহান্নামের আগুন হারাম, যা আল্লাহর ভয়ে অশ্রুসিক্ত হয়। ওই চোখের জন্য জাহান্নামের আগুন হারাম, যা আল্লাহর পথে (পাহারায়/জিহাদে) রাত জাগে।" তিনি (আবূ রায়হানা) বলেন, আমি তৃতীয়টি ভুলে গিয়েছি। আবূ শুরাইহ—তিনি হলেন আব্দুর রহমান ইবনু শুরাইহ—বলেন: আমি পরে শুনেছি যে, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "ওই চোখের জন্য জাহান্নামের আগুন হারাম, যা আল্লাহর হারামকৃত বিষয়সমূহ থেকে নিজেকে বাঁচিয়ে রাখে" অথবা "ওই চোখের জন্য (হারাম), যা আল্লাহর পথে আঘাতপ্রাপ্ত হয়/নষ্ট হয়ে যায়।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في المطبوع: شمير، بالشين المعجمة، وقد روي ذلك في اسمه أيضًا، لكن الذي في رواية ابن وهب بالسين المهملة، وكما نصَّ عليه البيهقي في "الأربعون الصُّغرى" (13)، ورَوى هذا الحديث بعينه عن أبي عبد الله الحاكم، وإلى ذلك أشار البخاري في "تاريخه" 1/ 113. وكذلك وقع في رواية النسائي من طريق ابن وهب، كما نصَّ عليه ابن القطان في "بيان الوهم" 4/ 347. والحَفِير: الموضع المحفور، فهو فعيل بمعنى مفعول.والحَجَفة: التُّرس.
[2] إسناده ضعيف لجهالة محمد بن سُمير - ويقال: شمير، ويقال: شمر - فلم يرو عنه غير عبد الرحمن بن شريح، وقد قال ابن حبان: روى عنه المصريون. كذا قال! مع أننا لم نقف على رواية غير عبد الرحمن بن شُريح عنه، ولم يذكر أحدٌ ممن ترجم له راويًا غير ابن شريح، على أنَّ ابن سمير هذا لم يضبط رواية الحديث كما ينبغي، كما هو ظاهر في رواية المصنف. أبو علي الجَنْبي: هو عمرو بن مالك الهَمْداني.وأخرجه النسائي (8818) عن الحارث بن مسكين، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. مختصرًا بذكر آخره المرفوع دون القصة.وأخرجه أحمد 28/ (17213)، والنسائي (4310) من طريق زيد بن الحباب، عن عبد الرحمن بن شُريح، به، لكن سمَّى زيد بن الحُباب في روايته عند أحمد شيخَ ابن سمير: أبا عامر التُّجيبي، وعند النسائي: أبا علي التُّجيبي، وهو خطأ.الشَّرَف: المكان المرتفع. والحَفِير: الموضع المحفور، فهو فعيل بمعنى مفعول.والحَجَفة: التُّرس.
2464 - أخبرني أحمد بن محمد بن سلمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا أبو تَوبة الربيعُ بن نافع الحَلَبي، حدثنا معاوية بن سلّام، أخبرني زيد بن سلّام، حدثني أبو كَبْشة السَّلُولي، أنه سمع سَهلَ ابن الحَنْظَلية يَذكُر: أنهم سارُوا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يومَ حُنينٍ، فأطنَبُوا السَّيرَ حتى كان عشيّةً، فحضرتُ الصلاةَ عند رسول الله صلى الله عليه وسلم، فجاء رجلٌ فارسٌ، فقال: يا رسول الله، إني انطلقتُ بين أيديكم حتى طَلَعتُ جَبَل كذا وكذا، فإذا أنا بهوازِنَ على بَكْرةِ أبيهم بظُعُنِهم ونَعَمِهم وشائِهم، فاجتمعوا إلى حُنينٍ، فتبسَّم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال: "تلكَ غَنيمةُ المسلمين غدًا إن شاء الله"، ثم قال: "من يَحرُسُنا الليلةَ؟ " فقال أنس بن أبي مَرثَد الغَنَوي: أنا يا رسول الله، فقال: "اركَبْ"، فركِبَ فرسًا له، فجاء إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "استقبِلْ هذا الشعْبَ حتى تكونَ في أعلاهُ، ولا نُغرَّنَّ من قِبَلِك الليلةَ".فلما أصبحنا خرجَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى مُصلّاهُ، فركع ركعتَين، ثم قال: "هل حَسَسْتُم فارِسَكم؟ " فقال رجلٌ: ما حَسَسْنا، فثُوِّبَ بالصلاةِ، فجعلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَلتَفِتُ إلى الشِّعبِ حتى قَضَى صلاتَه، فقال: "أبشِروا، فقد جاءَ فارِسُكُم"، قال: فجعلنا ننظُر إلى ظِلِّ الشجرِ في الشِّعْبِ، فإذا هو قد جاءَ حتى وَقَفَ على رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فسَلَّم، فقال: إني انطلقتُ حتى كنتُ في أعلى هذا الشِّعْبِ، حيث أمرني رسولُ الله، فلما أصبحتُ اطَّلَعتُ على الشِّعْبَين، فنَظَرتُ فلم أرَ أحدًا، فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "نزلتَ الليلةَ؟ " فقال: لا، إلّا مُصلِّيًا أو قاضيَ حاجةٍ، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قد أَوجَبْتَ، فلا عليكَ أن لا تَعمَلَ بعدَها" [1]. هذا الإسنادُ من أوّلِه إلى آخرِه صحيحٌ على شرط الشيخَين، غير أنهما لم يُخرجا مَسانيدَ سهل ابن الحَنْظَليّة، لقِلّة رواية التابعين عنه [2]، وهو من كِبار الصحابة على ما قَدّمتُ القول في أوانه.
সাহল ইবনুল হানযালিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা হুনাইনের দিনে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে পথ চলছিলেন। তাঁরা দীর্ঘ সময় পথ চললেন, এমনকি সন্ধ্যা হয়ে গেল। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট সালাতের সময় হলো, তখন একজন ঘোড়সওয়ার এসে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনাদের আগে আগে গেলাম এবং অমুক অমুক পাহাড়ে উঠলাম। তখন সেখানে আমি হাওয়াযিন গোত্রকে তাদের নারী, উট ও ছাগলসহ সম্পূর্ণরূপে দেখতে পেলাম। তারা হুনাইনের দিকে সমবেত হয়েছে।"
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মুচকি হাসলেন এবং বললেন: "ইনশাআল্লাহ, আগামীকাল তা মুসলিমদের গনীমত হবে।" এরপর তিনি বললেন: "আজ রাতে আমাদের কে পাহারা দেবে?" আনাস ইবনু আবী মারসাদ আল-গানাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আমি, হে আল্লাহর রাসূল!" তিনি (নবী) বললেন: "আরোহণ করো।" তখন সে তার ঘোড়ায় আরোহণ করে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট এলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "তুমি এই গিরিপথের মুখে যাও এবং এর উপরে অবস্থান নাও। আজ রাতে যেন তোমার দিক থেকে আমরা কোনো বিপদে না পড়ি।"
যখন সকাল হলো, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সালাতের স্থানে গেলেন এবং দু'রাক'আত সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি বললেন: "তোমাদের অশ্বারোহীর কোনো খোঁজ পেয়েছ কি?" একজন লোক বলল: আমরা তো কোনো খোঁজ পাইনি। এরপর সালাতের জন্য তাকবীর দেওয়া হলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সালাত শেষ না করা পর্যন্ত গিরিপথটির দিকে তাকাতে লাগলেন। এরপর তিনি বললেন: "তোমরা সুসংবাদ গ্রহণ করো, তোমাদের অশ্বারোহী এসে গেছে।" সাহাবী বললেন: আমরা তখন গিরিপথে গাছের ছায়ার দিকে তাকাতে লাগলাম, তখন সে (আনাস ইবনু আবী মারসাদ) এসে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে দাঁড়াল এবং সালাম দিলো।
সে বলল: আমি আপনার আদেশ অনুযায়ী এই গিরিপথের উপরে পৌঁছেছিলাম। যখন সকাল হলো, আমি দুই গিরিপথের দিকে তাকালাম, কিন্তু কাউকে দেখতে পেলাম না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "আজ রাতে কি তুমি অবতরণ করেছিলে?" সে বলল: না, কেবল সালাত আদায় অথবা কোনো প্রয়োজন পূরণ ছাড়া। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "তুমি (জান্নাত) ওয়াজিব করে নিয়েছ। এরপরে যদি তুমি আর কোনো (নফল) আমল নাও করো, তবুও তোমার কোনো ক্ষতি নেই।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسنادٌ رجاله ثقات، لكنه سقط منه في رواية الحاكم ذكر أبي سلَّام - واسمه ممطُور الحَبشي - بين زيد بن سلّام وأبي كبشة السَّلُولي، وإنما جزمْنا بسقوطه في رواية الحاكم لأنَّ البيهقي رواه عنه في "سننه الكبرى" 9/ 149، فلم يذكره أيضًا، والصحيح إثباته في الرواية، لأنَّ سائر من رواه عن أبي توبة ذكره، وقد تقدم عند المصنف برقم (784) من طريق إبراهيم بن الحسين - وهو المعروف بابن دِيزِيل - عن أبي توبة، بإثباته، فلا ندري الوهم هنا من عثمان بن سعيد أم ممّن دونه، على أنَّ زيد بن سلّام لم يدرك الرواية عن مثل أبي كبشة السَّلُولي، والله تعالى أعلم.وأخرجه أبو داود (2506) عن أبي توبة، وأخرجه النسائي (8819) عن محمد بن يحيى بن محمد بن كثير الحراني، عن أبي توبة، بهذا الإسناد.قوله: "فأطنبوا السير"، أي: بالغوا فيه.وقوله: "بَكْرة أبيهم" أي: جاؤوا بأسرِهم ولم يتخلَّف منهم أحدٌ.وقوله: "فثوِّب بالصلاة"، أي: نُودي إليها وأُقيمتوقوله: "بظُعُنهم" أي: بنسائهم، واحدته: ظَعِينة.وقوله: "ونَعَمهم" أي: إبلهم وشائهم وبقرهم، وسائر المال الراعي، وأكثر ما يقع على الإبل.وقوله: "أوجبْتَ" أي: فعلتَ فعلًا وجبتْ لك به الجنة.وقوله: "لا عليك أن لا تعمل بعدها" قال الطِّيبي في "شرح المشكاة" 12/ 3800: أي: لا بأس عليك أن لا تعمل بعد هذه الليلة من المَبَرّات والخيرات، فإنَّ عملك الليلة كافٍ لك عند الله مثوبةً وفضيلةً، أراد النوافلَ والتبرعاتِ من الأعمال، لا الفرائض، فإنَّ ذلك لا يسقط، ويمكن أن يُنزِّل على ما عليه من عمل الجهاد في ذلك اليوم جبرانًا لقلبه وتسلية له.
[2] بنى المصنِّف قولَه هذا على ما ادَّعاه في كتابه "المدخل إلى معرفة كتاب الإكليل" بأنَّ شرط الحديث عند البخاري ومسلم أن يكون كل راوٍ في الحديث له راويان ثقتان فأكثر من لدن الصحابي إليهما، وهذه الدعوى باطلة، كما بينه جملةٌ من العلماء ممَّن رد عليه فيها، كالحازمي ومحمد بن طاهر المقدسي وغيرهما، وقد نبهنا عليه غير مرة. وانظر الحديث السالف برقم (97).
2465 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني حَيْوة بن شُريح، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أسلمَ أبي عِمْران، قال: غَزَونا من المدينة نريد القُسطَنْطِينيّة، وعلى الجماعة عبدُ الرحمن بن خالد بن الوليد، والرومُ مُلْصِقُو ظُهورِهم بحائطِ المدينة، فحَمَل رجلٌ على العدوِّ، فقال الناسُ: مَهْ مَهْ، لا إله إلّا الله، يُلقي بيدَيهِ إلى التَّهْلُكَة، فقال أبو أيوب: إنما أُنزلت هذه الآيةُ فينا معشرَ الأنصارِ، لمّا نَصَرَ اللهُ نبيَّه وأظهرَ الإسلامَ، قلنا: هَلُمَّ نُقيمُ في أموالنا ونُصلِحُها، فأنزل الله عز وجل: {وَأَنْفِقُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلَا تُلْقُوا بِأَيْدِيكُمْ إِلَى التَّهْلُكَةِ} [البقرة: 195]، فالإلقاء بأَيدِينا إلى التَّهْلُكَةِ أن نُقيمَ في أموالِنا ونُصلِحَها، ونَدَعَ الجهاد. قال أبو عِمْران: فلم يَزَلْ أبو أيوبَ يجاهدُ في سبيلِ الله حتى دُفِنَ بالقُسطَنْطِينيّة [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আসলাম আবূ ইমরান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মদীনা থেকে কনস্ট্যান্টিনোপলের (কুস্তুনতানিয়া) উদ্দেশে অভিযানে বের হলাম। সেই সেনাদলের প্রধান ছিলেন আবদুর রহমান ইবনু খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ। তখন রোমানরা নিজেদের পিঠ শহরের প্রাচীরের সাথে মিশিয়ে রেখেছিল। এমন সময় এক ব্যক্তি শত্রুদের ওপর আক্রমণ করল। তখন লোকেরা বলতে লাগল: থামো, থামো, লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ! সে নিজের হাতে নিজেকে ধ্বংসের মুখে ঠেলে দিচ্ছে। তখন আবূ আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই আয়াতটি তো আমাদের আনসারদের সম্পর্কেই অবতীর্ণ হয়েছিল, যখন আল্লাহ তাঁর নবীকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহায্য করলেন এবং ইসলামকে প্রকাশ করলেন। তখন আমরা (আনসাররা) বললাম: চলো, আমরা আমাদের ধন-সম্পদের কাছে ফিরে যাই এবং সেগুলোর দেখাশোনা করি। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "তোমরা আল্লাহর পথে খরচ করো এবং নিজেদের হাতে নিজেদেরকে ধ্বংসের মুখে ঠেলে দিও না।" (সূরাহ আল-বাক্বারাহ: ১৯৫)। সুতরাং, নিজেদের হাতে নিজেদেরকে ধ্বংসের মুখে ঠেলে দেওয়া হলো এই যে, আমরা আমাদের ধন-সম্পদের কাছে ফিরে যাবো, সেগুলোর দেখাশোনা করব এবং জিহাদ ছেড়ে দেবো। আবূ ইমরান বলেন: এরপর আবূ আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর পথে জিহাদ করা অব্যাহত রাখেন, অবশেষে তিনি কনস্ট্যান্টিনোপলে (কুস্তুনতানিয়াতে) সমাহিত হন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ابن وهب: هو عبد الله، وأسلم أبو عمران: هو ابن يزيد التجيبي.وأخرجه أبو داود (2512) عن أحمد بن عمرو بن السّرْح، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد، وقرن بحيوة عبدَ الله بن لهيعة.وأخرجه الترمذي (2972)، والنسائي (10961)، وابن حبان (4711) من طريق الضحاك بن مخلد أبي عاصم، والنسائي (10962) من طريق عبد الله بن المبارك، كلاهما عن حيوة بن شُريح، به. لكن جاء في رواية أبي عاصم: وعلى أهل مصر عقبة بن عامر، وعلى الجماعة فَضَالة بن عبيد، وفي رواية ابن المبارك: وعلى أهل مصر عقبة بن عامر، وعلى أهل الشام فَضَالة بن عُبيد، وكذلك جاء في رواية عبد الله بن يزيد المقرئ عن حيوة، كما سيأتي عند المصنف برقم (3125).وانظر ما سيأتي برقم (6041).
2466 - أخبرنا أبو أحمد بَكْر بن محمد الصَّيرفي بمَرْو، حدثنا أبو الأحوص محمد بن الهيثم القاضي، حدثنا حَيْوة بن شُريح الحَضْرمي، حدثنا بَقيّة بن الوليد، حدثني بَحِير بن سعْد، عن خالد بن مَعْدانَ، عن أبي بَحْريّةَ، عن معاذ بن جبل، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: "الغَزْوُ غَزْوان: فأما مَن ابتغَى وجهَ الله، وأطاعَ الإمامَ، وأنفقَ الكَريمةَ، وياسَرَ الشَّريكَ، واجتَنَبَ الفَسادَ، فإنَّ نَومَه ونُبْهَه أجرٌ كُلُّه، وأما مَن غزا فَخْرًا ورِياءً وسُمْعةً، وعَصَى الإمام، وأفْسَدَ في الأرض، فإنه لن يَرجِعَ بكَفَافٍ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
মুআয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যুদ্ধাভিযান (গায্ও) দুই প্রকার। প্রথমত, যে ব্যক্তি আল্লাহর সন্তুষ্টি কামনা করে, নেতার আনুগত্য করে, উত্তম সম্পদ ব্যয় করে, অংশীদারের সাথে সহজ আচরণ করে এবং বিপর্যয় (ফাসাদ) পরিহার করে চলে, তবে তার ঘুম ও তার জাগ্রত থাকা— সবই তার জন্য প্রতিদান। আর যে ব্যক্তি গর্ব, রিয়া (লোক-দেখানো) ও খ্যাতি অর্জনের জন্য যুদ্ধাভিযান করে, নেতার অবাধ্যতা করে ও পৃথিবীতে বিপর্যয় সৃষ্টি করে, তবে সে সামান্য লাভ নিয়েও ফিরতে পারবে না।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن موقوفًا، وهذا إسناد ضعيف لضعف بقيّة بن الوليد، ثم إنه يدلس تدليس التسوية، ولم يصرح بسماعه في سائر طبقات الإسناد. أبو بحرية: هو عبد الله بن قيس. وحيوة بن شريح الحضرمي غير حيوة بن شريح في إسناد حديث أبي أيوب الذي قبله، لأنَّ هذا الحضرمي حمصيٌّ، وذاك التجيبي هو مصري.وأخرجه أحمد 36/ (22042)، وأبو داود (2515) عن حيوة بن شريح، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (22042) عن يزيد بن عبد ربّه، والنسائي (4382) و (7770) و (8677) عن عمرو بن عثمان بن سعيد بن كثير، كلاهما عن بقيّة، به.وأخرجه سعيد بن منصور (2323) من طريق جنادة بن أبي أمية، عن معاذ، موقوفًا، وإسناده حسن.وأخرجه مالك في "موطئه" 2/ 466 - 467 عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن معاذ بن جبل موقوفًا كذلك، وهو منقطع، فإنَّ يحيى بن سعيد لم يدرك معاذًا.قوله: "أنفق الكريمة"، هي واحدة الكرائم، وهي النفائس التي تتعلق بها نفس مالكها.وقوله: "ياسَرَ الشريك" معناه الأخذ باليسير في الأمر، والسهولة فيه مع الشريك والصاحب، والمعاونة لهما. والصحيح في إسناد هذا الحديث زيادة ذكر القاسم بن عباس الهاشمي بين ابن أبي ذئب - وهو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة - وبين بُكير بن عبد الله بن الأشج، لأنَّ أكثر أصحاب ابن المبارك قد ذكروه كحبّان بن موسى وأبي توبة الربيع بن نافع، وهو ثابت في "الجهاد" لابن المبارك أيضًا (227)، وكذلك هو ثابت في رواية غير ابن المبارك، كآدم بن أبي إياس ويزيد بن هارون وحُسين بن محمد المرُّوذي وغيرهم، ولعلَّ الوهم فيه هنا من عبد الله الغَزّال، والقاسم بن عباس هذا ثقة.وسيأتي الحديث عند المصنف من وجه آخر برقم (3444) من طريق سعيد بن مسعود المروَزي، عن يزيد بن هارون، عن ابن أبي ذئب، عن بكير بن الأشج، لكن قال فيه: عن الوليد بن سَرْح عن أبي هريرة، كذا جاء هذا الإسناد أيضًا بإسقاط ذكر القاسم بن عباس من إسناده، وبذكر الوليد بن سرح بدل أيوب بن مكرز، ورواية الجمهور عن ابن أبي ذئب أولى بالقبول، ثم إنَّ أحمد بن حنبل قد رواه عن يزيد بن هارون بموافقة الجماعة، فروايته أَولى من رواية سعيد بن مسعود المروَزي، والله الموفق.وأخرجه أبو داود (2516) عن أبي توبة الربيع بن نافع، وابن حبان (4637) من طريق حبّان بن موسى، كلاهما عن عبد الله بن المبارك، عن ابن أبي ذئب، عن القاسم بن عباس، عن بكير بن الأشج، به.وأخرجه أحمد 13/ (7900) عن يزيد بن هارون، و 14/ (8793) عن حسين بن محمد المَرُّوذي، كلاهما عن ابن أبي ذئب، عن القاسم بن عباس، عن بكير بن الأشج، به.وفي الباب عن أبي أمامة عند النسائي (4333)، وجوّد إسناده الحافظ في "الفتح" 9/ 55.وقال البيهقي في "السنن" 9/ 167 ما معناه: هذا يُحتمل أن يكون فيمن لا ينوي بغزوه إلّا الدنيا وما يرجع إلى أسبابها، دون من يبتغي الأجر ويرجو أن يصيب غنيمةً، وذكر حديث عبد الله بن حَوَالة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثنا على أقدامنا حول المدينة لنَغنَم. وهو الحديث الآتي عند المصنف برقم (8514). وانظر "فتح الباري" 9/ 54 - 55 عند شرح (2810).
2467 - أخبرنا أبو العباس قاسم بن القاسم السَّياري، حدثنا عبد الله بن علي الغزّال، حدثنا علي بن الحَسَن بن شَقيق، حدثنا عبد الله بن المبارك، أخبرنا ابن أبي ذئب، عن بُكير بن عبد الله بن الأشَجّ، عن أيوب بن مِكْرَز، عن أبي هريرة: أنَّ رجلًا قال: يا رسول الله، رجلٌ يُريدُ الجِهادَ في سبيل الله، وهو يبتغي عَرَضًا من عَرَض الدنيا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا أَجْرَ له"، فسأله الثانيةَ والثالثةَ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا أَجْرَ له" [1]. هذا حديث صحيحُ الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বলল, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এক ব্যক্তি আল্লাহর পথে জিহাদ করতে চায়, অথচ সে দুনিয়ার কোনো সাময়িক বস্তু পেতে ইচ্ছুক।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তার জন্য কোনো প্রতিদান নেই।" অতঃপর সে দ্বিতীয়বার ও তৃতীয়বার জিজ্ঞেস করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তার জন্য কোনো প্রতিদান নেই।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وأيوب بن مِكْرز: هو أيوب بن عبد الله بن مِكْرَز العامري، وهو حسن الحديث، كما حققناه في "سنن أبي داود" (2516). وعبد الله بن علي الغزال - وإن كان مجهولًا - قد توبع. والصحيح في إسناد هذا الحديث زيادة ذكر القاسم بن عباس الهاشمي بين ابن أبي ذئب - وهو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة - وبين بُكير بن عبد الله بن الأشج، لأنَّ أكثر أصحاب ابن المبارك قد ذكروه كحبّان بن موسى وأبي توبة الربيع بن نافع، وهو ثابت في "الجهاد" لابن المبارك أيضًا (227)، وكذلك هو ثابت في رواية غير ابن المبارك، كآدم بن أبي إياس ويزيد بن هارون وحُسين بن محمد المرُّوذي وغيرهم، ولعلَّ الوهم فيه هنا من عبد الله الغَزّال، والقاسم بن عباس هذا ثقة.وسيأتي الحديث عند المصنف من وجه آخر برقم (3444) من طريق سعيد بن مسعود المروَزي، عن يزيد بن هارون، عن ابن أبي ذئب، عن بكير بن الأشج، لكن قال فيه: عن الوليد بن سَرْح عن أبي هريرة، كذا جاء هذا الإسناد أيضًا بإسقاط ذكر القاسم بن عباس من إسناده، وبذكر الوليد بن سرح بدل أيوب بن مكرز، ورواية الجمهور عن ابن أبي ذئب أولى بالقبول، ثم إنَّ أحمد بن حنبل قد رواه عن يزيد بن هارون بموافقة الجماعة، فروايته أَولى من رواية سعيد بن مسعود المروَزي، والله الموفق.وأخرجه أبو داود (2516) عن أبي توبة الربيع بن نافع، وابن حبان (4637) من طريق حبّان بن موسى، كلاهما عن عبد الله بن المبارك، عن ابن أبي ذئب، عن القاسم بن عباس، عن بكير بن الأشج، به.وأخرجه أحمد 13/ (7900) عن يزيد بن هارون، و 14/ (8793) عن حسين بن محمد المَرُّوذي، كلاهما عن ابن أبي ذئب، عن القاسم بن عباس، عن بكير بن الأشج، به.وفي الباب عن أبي أمامة عند النسائي (4333)، وجوّد إسناده الحافظ في "الفتح" 9/ 55.وقال البيهقي في "السنن" 9/ 167 ما معناه: هذا يُحتمل أن يكون فيمن لا ينوي بغزوه إلّا الدنيا وما يرجع إلى أسبابها، دون من يبتغي الأجر ويرجو أن يصيب غنيمةً، وذكر حديث عبد الله بن حَوَالة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثنا على أقدامنا حول المدينة لنَغنَم. وهو الحديث الآتي عند المصنف برقم (8514). وانظر "فتح الباري" 9/ 54 - 55 عند شرح (2810).
2468 - أخبرنا أبو الفضل محمد بن إبراهيم المُزكِّي، حدثنا أحمد بن سَلَمة، حدثنا إسحاق بن منصور، حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي، حدثني محمد بن أبي الوضّاح، عن العلاء بن عبد الله بن رافع، عن حَنَان بن خارِجة، عن عبد الله بن عمرو، أنه قال: يا رسول الله، أخبرني عن الجهاد والغزو، فقال: "يا عبدَ الله بن عمرو، إن قاتلتَ صابرًا محتسِبًا، بَعثَكَ اللهُ صابرًا محتسِبًا، وإن قاتلتَ مُرائيًا مُكاثرًا، بَعَثَك الله مُرائيًا مُكاثرًا، يا عبدَ الله بن عمرو، على أيِّ حالٍ قاتلتَ أو قُتِلتَ، بَعَثَكَ اللهُ على تلك الحالِ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، ومحمد بن أبي الوضّاح هذا: هو أبو سعيد محمد بن مسلم بن أبي الوضاح المُؤدِّب، ثقةٌ مأمونٌ.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাকে জিহাদ ও যুদ্ধ সম্পর্কে অবহিত করুন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: হে আবদুল্লাহ ইবনে আমর! তুমি যদি ধৈর্যশীল ও আল্লাহর কাছে (সাওয়াবের) প্রত্যাশী হয়ে যুদ্ধ করো, তবে আল্লাহ তোমাকে ধৈর্যশীল ও সাওয়াবের প্রত্যাশী হিসেবেই পুনরুত্থিত করবেন। আর যদি তুমি লোক দেখানো ও দম্ভ প্রকাশকারী হয়ে যুদ্ধ করো, তবে আল্লাহ তোমাকে লোক দেখানো ও দম্ভ প্রকাশকারী হিসেবেই পুনরুত্থিত করবেন। হে আবদুল্লাহ ইবনে আমর! তুমি যে অবস্থাতেই যুদ্ধ করো অথবা নিহত হও, আল্লাহ তোমাকে সেই অবস্থাতেই পুনরুত্থিত করবেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة حنان بن خارجة على اختلاف في رفع الحديث ووقفه كما أوضحناه في "سنن أبي داود" (2519)، حيث أخرجه أبو داود عن مسلم بن حاتم الأنصاري، عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2561) من طريق أحمد بن حنبل عن عبد الرحمن بن مهدي.
2469 - أخبرني أبو الحُسين محمد بن أحمد بن تَميم القَنْطَرِي، حدثنا محمد بن إسماعيل السُّلَمي، حدثنا عبد العزيز بن عبد الله الأُوَيسي، حدثني محمد بن صالح بن قيس الأزرق، عن صالح بن محمد بن زائدة، عن عمر بن عبد العزيز، عن أبيه، عن عُقْبة بن عامر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رَحِمَ اللهُ حارِسَ الحَرَسِ" [1]هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আল্লাহ প্রহরার প্রহরীর প্রতি রহম করুন।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف صالح بن محمد بن زائدة، ومحمد بن صالح الأزرق قال عنه أبو حاتم: شيخ، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وذكره كذلك في "الضعفاء" وقال: يروي المناكير لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد. قلنا: لكنه قد توبع فيبقى الشأن في صالح بن محمد بن زائدة، وقد اضطرب صالح هذا في إسناده، كما هو مُبيَّن في تحقيقنا على "سنن ابن ماجه" (2769)، والمحفوظ فيه أنه من رواية عمر بن عبد العزيز عن عقبة مرسلًا، كما قال الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 5/ 460 في ترجمة قيس بن الحارث التميمي.وأخرجه ابن ماجه (2769) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن صالح بن محمد، عن عمر بن عبد العزيز، عن عقبة بن عامر الجهني.وانظر ما تقدم برقم (2455).
2470 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله بن أحمد بن عَتَّاب العَبْدي ببغداد، حدثنا أبو بكر محمد بن أبي العَوّام الرِّيَاحي، حدثنا قُريش بن أنس، حدثنا أشعث بن عبد الملك، عن الحسن.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه - واللفظ له - حدثنا أبو المثنَّى معاذ بن المثنى العَنْبَري، حدثنا مُسدَّد، حدثنا بشر بن المفضَّل، حدثنا يونس، عن الحسن، عن صَعْصَعة بن معاوية، قال: قلتُ لأبي ذَرٍّ: ما مالُكَ؟ قال: لي عَمَلي، لي عَمَلي، قال: قلتُ: حَدِّثني، قال: نعم، قال النبي صلى الله عليه وسلم: "ما من عبدٍ يُنفِقُ من كلِّ مالٍ له زَوجَين في سبيلِ الله، إلا استَقبَلَتْه حَجَبةُ الجنةِ، كلُّهم يَدعُوه إلى ما عندَه". قال: قلتُ: وكيف ذاك؟ قال: إن كان رِجالًا فرجُلَين، وإن كان إبلًا فبَعِيرَين، وإن كان بقرًا فبقرتَين [1].هذا حديث صحيح الإسناد، وصَعْصَعة بن معاوية من مَفَاخِر العرب، وقد رواه أصحابُ الحسن عنه.2470/ 1 - سمعت أبا العباس محمد بن يعقوب يقول: سمعتُ العباس بن محمد الدُّورِي يقول: سمعتُ يحيى بن مَعين يقول: صعصعةُ بن معاوية هو صاحب أبي ذَرٍّ، وهو أخو جَزِي [2] بن معاوية.2470/ 2 - سمعتُ أبا حفص عمر بن جعفر البصري الحافظ غيرَ مرّةٍ يقول: ليس للبصريين بابٌ أحسنَ من طُرقِ حديثِ الحسن عن صَعْصَعة. قال الحاكم: فطلبتُ طُرقَ هذا الحديث وجمعتُه، فلما اجتمعنا في الكَرَّة الثانية ببغداد ذاكرتُه به، وأفادَني فيه ما لم يكن عندي، فحدَّثْتُ الحاكمَ أبا أحمد الحافظ رحمه الله يومًا بهذه القصة، وذاكَرْتُه به، فقال لي: من حدَّث بهذا الحديث عن أبي ذرٍّ غيرُ صعصعةَ؟ فلم أحفظ.
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা’সাআহ ইবনে মু'আবিয়াহ বলেন, আমি আবূ যারকে জিজ্ঞাসা করলাম: আপনার সম্পদ কী? তিনি বললেন: আমার আমলই আমার সম্পদ, আমার আমলই আমার সম্পদ। আমি বললাম: আমাকে একটি হাদীস বলুন। তিনি বললেন: হ্যাঁ। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে কোনো বান্দা তার সমস্ত সম্পদ থেকে আল্লাহর পথে দুই জোড়া (বস্তু) দান করে, জান্নাতের রক্ষকগণ তাকে অভ্যর্থনা জানায়, তাদের প্রত্যেকেই তাকে তার নিজের দিকে আহ্বান করে।" আমি বললাম: সেটা কীভাবে? তিনি বললেন: যদি তা দাস বা মানুষ হয়, তবে দুইজন; যদি উট হয়, তবে দুইটি উট; আর যদি গরু হয়, তবে দুইটি গরু।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. يونس: هو ابن عُبيد، والحسن: هو البصري.وأخرجه النسائي (4379) عن إسماعيل بن مسعود، عن بشر بن المفضَّل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 35/ (21341) عن إسماعيل ابن عُلَيَّة، عن يونس بن عبيد، به.وأخرجه أحمد (21358) و (21413)، وابن حبان (4645) من طريق قرة بن خالد، وابن حبان (4643) و (4644) من طريق جرير بن حازم، وأحمد (21453) من طريق هشام بن حسان، ثلاثتهم عن الحسن البصري، به.
[2] اختلف في ضبط هذا الاسم اختلافًا كثيرًا، كما بيّنه مجدُ الدين بن الأثير في "جامع الأصول" في قسم التراجم ص 266، وصحح أنه جَزْء.
2471 - فحدَّثني قال: أخبرنا محمد بن محمد بن سليمان الواسطي، حدثنا أبو التَّقِي هشام بن عبد الملك اليَزَني، حدثنا محمد بن حَرْب، عن الزُّبَيدي، حدثني سُلَيم بن عامر، أنه بلَغَه: أنَّ رجلًا سألَ أبا ذَرٍّ: ما مالُكَ؟ قال: مالي عَمَلي، ثم ساق الحديثَ بطوله [1].وقد اتَّفقَ الشيخانِ على إخراج حديث الزُّهْري، عن حُميد بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن أنفقَ زَوجَينِ من مالِه في سبيلِ الله" [2]، وسِياقتُه مخالفةٌ لسِياقةِ حديث صَعْصَعةَ.
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞেস করল: "আপনার সম্পদ কী?" তিনি বললেন: "আমার সম্পদ হলো আমার আমল (কর্ম)।" তারপর তিনি পুরো হাদীসটি বর্ণনা করলেন।
আর ইমাম বুখারী ও মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) যুহরী থেকে, তিনি হুমাইদ ইবনু আবদির রহমান থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এবং তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত এই হাদীসটি সংকলনের ব্যাপারে একমত হয়েছেন: তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে তার সম্পদ থেকে দুই জোড়া খরচ করল..." আর এর বর্ণনাভঙ্গি সা'সা'আর হাদীসের বর্ণনাভঙ্গির চেয়ে ভিন্ন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكنه منقطع. الزُّبَيدي: هو محمد بن الوليد. (10960)، وابن حبان (4647) من طريق عبد الله بن المبارك، كلاهما عن زائدة بن قدامة، به.وأخرجه النسائي (4380) من طريق سفيان بن الثَّوري، عن الرُّكين، به.وانظر ما بعده.
[2] أخرجه البخاري (1897)، ومسلم (1027).وأخرجه كذلك البخاري (2841)، ومسلم (1027) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة. (10960)، وابن حبان (4647) من طريق عبد الله بن المبارك، كلاهما عن زائدة بن قدامة، به.وأخرجه النسائي (4380) من طريق سفيان بن الثَّوري، عن الرُّكين، به.وانظر ما بعده.
2472 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن النَّضْر الأزدي، ابنُ ابنة معاوية بن عمرو، حدثنا جَدِّي معاوية بن عمرو، حدثنا زائدة، حدثنا الرُّكَين بن الربيع بن عُمَيلةَ الفَزَاري، عن أبيه، عن يُسَير بن عُمَيلةَ، عن خُرَيم بن فاتِكٍ الأسَدي، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "مَن أنفَقَ نفقةً في سبيلِ الله، كُتِبَ بسبع مئة ضِعْفٍ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وقد احتجَّ مسلمٌ بالرُّكَين بن الرَّبيع، وهو كوفيٌّ عَزيزُ الحديث، ويُسَير بن عُمَيلة عمُّه
খুরাইম ইবনু ফাাতিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে কোনো খরচ করে, তার জন্য সাতশত গুণ (সওয়াব) লেখা হয়।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي، ويُسير بن عُميلة روى عنه اثنان، ووثقه الدارقطني في "الإلزامات"، وذكره ابن حبان في "الثقات". زائدة: هو ابن قدامة.وأخرجه أحمد 31/ (19036) عن معاوية بن عمرو، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (19038)، والترمذي (1625) من طريق حسين بن علي الجعفي، والنسائي (10960)، وابن حبان (4647) من طريق عبد الله بن المبارك، كلاهما عن زائدة بن قدامة، به.وأخرجه النسائي (4380) من طريق سفيان بن الثَّوري، عن الرُّكين، به.وانظر ما بعده.
2473 - حدثني بصحَّة ما ذكرتُه أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن أحمد بن النضر، حدثني معاوية بن عمرو، حدثنا مَسلَمة بن جعفر، من بَجِيلة، عن الرُّكين بن الربيع، قال: حدثني عمِّي، عن أبي يحيى خُرَيم بن فاتِك، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: "الناسُ أربعةٌ، والأعمالُ سِتةٌ: فمُوجِبانِ، ومِثلٌ بمِثلٍ، وعشرةُ أضعافٍ، وسبعُ مئة ضِعْفٍ، فمن ماتَ كافرًا وَجَبَتْ له النارُ، ومن مات مؤمنًا وَجَبَتْ له الجنةُ، والعبدُ يعملُ بالسيئةِ فلا يُجزَى إلّا بمثلِها، والعبدُ يهُمُّ بالحسنة فتُكتَبُ له عَشْرًا، والعبدُ يُنفِقُ النفقةَ في سبيلِ الله فتُضاعَفُ له سبعَ مئةِ ضعفٍ.والناسُ أربعةٌ: فمُوسَّعٌ عليه في الدنيا، ومُوسَّعٌ عليه في الآخِرة، ومُوسَّع عليه في الدنيا مُقَتَّرٌ عليه في الآخِرة، ومُقَتَّرٌ عليه في الدنيا مُوسَّعٌ عليه في الآخِرة، وشَقِيٌّ في الدنيا والآخِرة" [1].
খুরাইম ইবন ফা-তিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষ চার প্রকার এবং আমল ছয় প্রকার। সেগুলো হলো: দুটি অবশ্যম্ভাবী, একটি সমান-সমান (প্রতিদান), দশগুণ (প্রতিদান), এবং সাতশো গুণ (প্রতিদান)। যে ব্যক্তি কাফির অবস্থায় মারা যায়, তার জন্য জাহান্নাম আবশ্যক হয়ে যায়। আর যে ব্যক্তি মুমিন অবস্থায় মারা যায়, তার জন্য জান্নাত আবশ্যক হয়ে যায়। বান্দা যখন কোনো মন্দ কাজ করে, তখন তাকে তার সমপরিমাণ ছাড়া প্রতিদান দেওয়া হয় না। বান্দা যখন কোনো ভালো কাজের ইচ্ছা করে, তখন তার জন্য দশগুণ লেখা হয়। আর বান্দা যখন আল্লাহর রাস্তায় কোনো খরচ করে, তখন তার জন্য তা সাতশো গুণ বৃদ্ধি করে দেওয়া হয়।
আর মানুষ চার প্রকার:
প্রথমত, এমন ব্যক্তি, যার জন্য দুনিয়াতে সচ্ছলতা রয়েছে এবং আখিরাতেও সচ্ছলতা রয়েছে।
দ্বিতীয়ত, এমন ব্যক্তি, যার জন্য দুনিয়াতে সচ্ছলতা রয়েছে কিন্তু আখিরাতে সংকীর্ণতা রয়েছে।
তৃতীয়ত, এমন ব্যক্তি, যার জন্য দুনিয়াতে সংকীর্ণতা রয়েছে কিন্তু আখিরাতে সচ্ছলতা রয়েছে।
চতুর্থত, এবং সে ব্যক্তি, যে দুনিয়া ও আখিরাত উভয় জায়গাতেই হতভাগ্য।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد ضعيف، مسلمة بن جعفر البَجَلي ضعَّفه الأزدي، وأسقَطَ من إسناد الحديثِ ذكرَ الربيع بن عُميلة بين الرُّكَين وعمه يُسَير بن عُميلة، والصحيح ذكره كما نبَّه عليه البخاري في "تاريخه الكبير" 8/ 423، يعني كما وقع في رواية زائدة بن قدامة وشيبان النحوي وسفيان الثَّوري، كلهم عن الرُّكين.وأخرجه أحمد 31/ (19035)، وابن حبان (6171) من طريق شيبان بن عبد الرحمن النحوي، عن الرُّكين بن الربيع بن عُميلة، عن أبيه، عن يُسَير بن عُميلة، عن خُريم. فزاد في إسناده الربيع بن عُميلة.وأخرجه أحمد (18900) عن يزيد بن هارون، و (19039) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، كلاهما عن المسعودي - وهو عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة - عن الرُّكين، عن أبيه - وقال أبو النضر: عن رجل، بدل: عن أبيه - عن خُريم. فأسقط المسعودي من إسناده هذا رجلًا، ويزيد بن هارون وأبو النضر سمعا من المسعودي بعد اختلاطه، فالصحيح رواية شيبان بن عبد الرحمن النحوي ومن تابعه.وقد تقدَّم قبله مختصرًا بذكر النفقة في سبيل الله، من طريق زائدة بن قدامة عن الرُّكين.
2474 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يحيى بن أيوب، عن زَبَّان بن فائدٍ، عن سَهْل بن مُعاذ الجُهَني، عن أبيه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن قرأ ألفَ آيةٍ في سبيلِ الله، كَتَبَه اللهُ مع النبيِّين والصِّدِّيقين والشُّهداءِ والصالحين" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
মু‘আয আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় এক হাজার আয়াত পাঠ করবে, আল্লাহ তাকে নবীগণ, সিদ্দীকগণ, শহীদগণ এবং নেককারদের (সালেহীন) সাথে লিপিবদ্ধ করবেন।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف زبَّان بن فائد، وقد توبع بمتابعة لا يُعتدُّ بها كما سيأتي.وأخرجه أحمد 24/ (15611) من طريق عبد الله بن لهيعة، ومن طريق رشدين بن سعد، كلاهما عن زبَّان بن فائد، به.وتابع زبَّانَ يحيى بنُ أبي أسيد المصري عند الطبراني في "الكبير" 20/ (401) لكن في الإسناد إليه شيخ الطبراني يحيى بن عثمان بن صالح السهمي، وهو مُتكلَّم فيه، ويُحدِّث من غير كتبه، فطُعِنَ فيه لأجل ذلك. وأخرجه أبو داود (2520) عن عثمان بن أبي شيبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 4/ (2388) من طريق إبراهيم بن سعد الزُّهْري، عن محمد بن إسحاق، به - لكن لم يذكر سعيد بن جبير في إسناده.وكذلك رواه أكثر أصحاب محمد بن إسحاق، لم يذكروا سعيد بن جبير، وهو كذلك في "سيرة ابن هشام" 2/ 119، لكن جزم ابنُ كثير في "تفسيره" 2/ 141 بأن ذكر سعيد بن جبير في إسناده أثبت. وقال: وكذا رواه سفيان الثَّوري، عن سالم الأفطس، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس. قلنا: أخرجه من هذه الطريق البيهقي في "إثبات عذاب القبر" (214) من طريق أبي عامر القاسم بن محمد الأسدي عن سفيان الثَّوري، وأبو عامر هذا روى عنه أبو كُريب وأبو تُميلة ومِنجاب بن الحارث وغيرهم، ولم يُؤثر فيه جرح ولا تعديل، فمثله يعتبر به في المتابعات والشواهد.وأخرجه كذلك البيهقي في "إثبات عذاب القبر" (214) من طريق أسامة بن زيد الليثي، عن إسماعيل بن أمية، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس. ورجاله لا بأس بهم، لكن الصحيح أنَّ إسماعيل بن أمية يرويه عن أبي الزُّبَير عن ابن جبير. عن ابن عباس. وهذه متابعة قوية تؤيد صحة ذكر سعيد بن جبير في إسناده، كما رجَّحه البيهقي، والله تعالى أعلم.وانظر ما سيأتي مختصرًا موقوفًا على ابن عباس برقم (3498).وفي الباب عن عبد الله بن مسعود عند مسلم (1887).قوله: "ينكلوا عن الحرب" مثلثة الكاف، أي: يجبنوا ويتأخَّروا عن الجهاد.
2475 - حدثني علي بن عيسى الحِيْري، حدثنا مُسدَّد بن قَطَن، حدثنا عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا عبد الله بن إدريس، عن محمد بن إسحاق، عن إسماعيل بن أُمية، عن أبي الزُّبَير، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لمّا أُصيبَ إخوانُكُم بأحدٍ جعلَ اللهُ أرواحَهم في جَوف طَيرٍ خُضْرٍ تَرِدُ أنهارَ الجنة، تأكُلُ من ثِمارِها، وتَأوي إلى قَنادِيلَ مِن ذهبٍ مُعَلَّقةٍ في ظِلِّ العَرْشِ، فلما وَجَدُوا طِيبَ مَأكَلِهم ومَشرَبهم ومَقِيلِهم، قالوا: مَن يُبلِّغُ إخوانَنا أنَّا أحياءٌ في الجنةِ نُرزَقُ، لئلّا يَزهَدُوا في الجهاد، ولا يَنْكُلُوا عن الحرب؟ فقال الله تبارك وتعالى: أنا أُبلِّغهم عنكُم" قال: وأنزلَ اللهُ: {وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ قُتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتًا} [آل عمران: 169] [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের ভাইয়েরা উহুদের যুদ্ধে শহীদ হয়েছিলেন, আল্লাহ তাদের রূহসমূহকে সবুজ পাখির পেটে (অভ্যন্তরে) স্থাপন করেন। তারা জান্নাতের নদ-নদীসমূহে বিচরণ করে, তার ফল-ফলাদি ভক্ষণ করে এবং তারা আরশের ছায়াতলে ঝোলানো স্বর্ণের প্রদীপে আশ্রয় গ্রহণ করে। যখন তারা তাদের উত্তম খাবার, পানীয় এবং বিশ্রামস্থল পেলেন, তখন তারা বললেন: "কে আমাদের ভাইদেরকে এই সংবাদ পৌঁছে দেবে যে আমরা জান্নাতে জীবিত আছি এবং জীবিকা প্রাপ্ত হচ্ছি, যাতে তারা জিহাদ থেকে বিমুখ না হয় এবং যুদ্ধ থেকে বিরত না থাকে?" তখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা'আলা বললেন: "আমি তোমাদের পক্ষ থেকে তাদের নিকট পৌঁছাব।" তিনি বলেন, অতঃপর আল্লাহ্ তা'আলা নাযিল করেন: "আর যারা আল্লাহর পথে নিহত হয়েছে, তাদেরকে কখনো মৃত মনে করো না..." (সূরা আলে ইমরান: ১৬৯)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد صرَّح بالتحديث عند أحمد وغيره، فانتفت شبهة تدليسه. وحسَّنه ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام" 4/ 338. وسيأتي مكررًا برقم (3203). وأخرجه أبو داود (2520) عن عثمان بن أبي شيبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 4/ (2388) من طريق إبراهيم بن سعد الزُّهْري، عن محمد بن إسحاق، به - لكن لم يذكر سعيد بن جبير في إسناده.وكذلك رواه أكثر أصحاب محمد بن إسحاق، لم يذكروا سعيد بن جبير، وهو كذلك في "سيرة ابن هشام" 2/ 119، لكن جزم ابنُ كثير في "تفسيره" 2/ 141 بأن ذكر سعيد بن جبير في إسناده أثبت. وقال: وكذا رواه سفيان الثَّوري، عن سالم الأفطس، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس. قلنا: أخرجه من هذه الطريق البيهقي في "إثبات عذاب القبر" (214) من طريق أبي عامر القاسم بن محمد الأسدي عن سفيان الثَّوري، وأبو عامر هذا روى عنه أبو كُريب وأبو تُميلة ومِنجاب بن الحارث وغيرهم، ولم يُؤثر فيه جرح ولا تعديل، فمثله يعتبر به في المتابعات والشواهد.وأخرجه كذلك البيهقي في "إثبات عذاب القبر" (214) من طريق أسامة بن زيد الليثي، عن إسماعيل بن أمية، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس. ورجاله لا بأس بهم، لكن الصحيح أنَّ إسماعيل بن أمية يرويه عن أبي الزُّبَير عن ابن جبير. عن ابن عباس. وهذه متابعة قوية تؤيد صحة ذكر سعيد بن جبير في إسناده، كما رجَّحه البيهقي، والله تعالى أعلم.وانظر ما سيأتي مختصرًا موقوفًا على ابن عباس برقم (3498).وفي الباب عن عبد الله بن مسعود عند مسلم (1887).قوله: "ينكلوا عن الحرب" مثلثة الكاف، أي: يجبنوا ويتأخَّروا عن الجهاد.
2476 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، حدثنا محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم التَّيمي، عن محمد بن عبد الله بن عَتِيك، أخي بني سَلِمة، عن أبيه، قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن خَرَجَ من بَيتِه مجاهدًا في سبيلِ الله - قال: ثم ضَمَّ أصابِعَه الثلاثَ: وأينَ المُجاهِدُون في سبيلِ الله؟ - مَن خرجَ في سبيلِ الله، فَخَرَّ عن دابّتِه، فماتَ فقد وَقَعَ أَجْرُه على الله، وإن لَدَغَتْه دابَّةٌ فماتَ، فقد وَقَعَ أجْرُه على الله، ومَن ماتَ حَتْفَ أنفِه - قال: وإنها لكلمةٌ ما سمِعْتُها من أحدٍ من العربِ أوّلَ مِن رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، يعني بحتفِ أنفِه: على فِراشِه - قد وَقَعَ أجْرُه على الله، ومَن قُتِلَ قَعْصًا فقد استَوجَبَ الجنةَ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আতীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে জিহাদকারী হিসেবে তার বাড়ি থেকে বের হলো"—বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর তিনি তাঁর তিনটি আঙ্গুল একত্রিত করে বললেন: "আল্লাহর পথের মুজাহিদরা কোথায়?"— "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে বের হলো, অতঃপর তার বাহন থেকে পড়ে গিয়ে মারা গেল, তার পুরস্কার আল্লাহর উপর নিশ্চিত হয়ে গেল। যদি তাকে কোনো বিষাক্ত প্রাণী দংশন করে এবং সে মারা যায়, তবে তার পুরস্কারও আল্লাহর উপর নিশ্চিত হয়ে গেল। আর যে ব্যক্তি তার স্বাভাবিক মৃত্যুতে মারা গেল—" বর্ণনাকারী বলেন, "এটি এমন একটি শব্দ যা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আগে আরবের অন্য কারো মুখ থেকে শুনিনি। 'হাতফা আনফিহি' (স্বাভাবিক মৃত্যু) দ্বারা উদ্দেশ্য হলো: তার বিছানায়—" "তার পুরস্কারও আল্লাহর উপর নিশ্চিত হয়ে গেল। আর যে ব্যক্তি আঘাতের কারণে নিহত হলো (তৎক্ষণাৎ আঘাতের শিকার হয়ে মারা গেল), সে জান্নাতের অধিকারী হয়ে গেল।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم غير محمد بن عبد الله بن عَتيك، فلا يُعرف روى عنه غير محمد بن إبراهيم التيمي، وقد صرَّح محمد بن إسحاق بسماعه عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (4374)، فيبقى الشأن في جهالة ابن عَتِيك.وأخرجه أحمد 26/ (16414) عن يزيد بن هارون، عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث أبي أمامة الباهلي الذي تقدم عند المصنف برقم (2431) بلفظ: "ثلاثة كلهم ضامنٌ على الله: "رجل خرج غازيًا في سبيل الله، فهو ضامن على الله حتى يتوفاه فيدخله الجنة" الحديث، وإسناده صحيح.ونحوه من حديث أبي هريرة عند مسلم (1876).وحديث عقبة بن عامر عند ابن أبي عاصم في "الجهاد" (237)، وأبي يعلى (1752) وغيرهما، بلفظ: "من صُرع عن دابته في سبيل الله فهو شهيد". وإسناده صحيح أيضًا.وعموم حديث أبي هريرة عند مسلم (1915) بلفظ: "من قُتل في سبيل الله فهو شهيد، ومن مات في سبيل الله فهو شهيد".وعن يحيى بن أبي كثير مرسلًا عند ابن المبارك في "الجهاد" (67) بلفظ: "من وضع رجله في ركابه فاصِلًا في سبيل الله، فلدغته هامّة، أو وَقَصتْه دابّة، أو بأي حَتْفٍ مات فهو شهيد"، ورجاله ثقات.وانظر أحاديث معاذ بن جبل وأنس وسهل بن حُنيف المتقدمة بالأرقام (2441) و (2442) و (2443).والقَعْص: أن يُضرَب الإنسان فيموت مكانه، يعني إذا قُتل قتلًا سريعًا.
2477 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا الأسود بن شَيبان السَّدُوسِي، عن يزيد بن عبد الله بن الشِّخِّير أبي العلاء، عن مُطرِّف بن عبد الله، قال: كان يَبلُغُني عن أبي ذرٍّ حديثٌ، فكنتُ أشتهي لقاءه فلقِيتُه، فقلتُ: يا أبا ذَرّ، كان يبلُغُني عنك حديثٌ، فكنتُ أشتهي لقاءك، قال: لِلَّهِ أبوك، فقد لقِيتَني، قال: قلتُ: حديثٌ بَلَغني أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم حدَّثك، قال: "إِنَّ الله يحبُّ ثلاثةً، ويُبغِضُ ثلاثةً" قال: فلا إخالُني أكذِبُ على خَلِيلي، فلا إخالُني أكذب على خليلي، فلا إخالُني أكذب على خليلي، قال: قلتُ: مَنْ هؤلاء الذين يحبُّهم الله؟ قال: "رجلٌ غزا في سبيلِ الله صابرًا محتسبًا مجاهدًا، فلقي العدوَّ، فقاتَلَ حتى قُتِلَ، وأنتم تجِدونَه عندكم في كتاب الله المُنزَل" ثم قرأ هذه الآية: {إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الَّذِينَ يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِهِ صَفًّا كَأَنَّهُمْ بُنْيَانٌ مَرْصُوصٌ} [الصف: 4]، قلت: ومَن؟ قال: "رجلٌ له جارُ سَوءٍ يُؤذيه، فيَصبِرُ على أذاهُ حتى يَكفيَه الله إياه، إما بحياةٍ أو موتٍ" قلت، ومَن؟ قال: "رجلٌ مسافرٌ مع قومٍ، فأدْلَجوا، حتى إذا كانوا مِن آخرِ الليل وقع عليهم الكَرَى والنُّعاس، فضربوا رؤوسهم، ثم قامَ فتطهَّر رَهْبةً لله ورَغْبةً لما عندَه".قلت: فمن الثلاثة الذين يُبغِضُهم الله؟ قال: "المختالُ الفَخُور، وأنتم تَجِدونَه في كتاب الله المُنزَل {إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍ} [لقمان: 18] " قلت: ومَن؟ قال: "البَخيلُ المَنَّانُ" قال: ومن؟ قال: "التاجِرُ الحَلّاف" أو "البائعُ الحَلّاف" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত... (মুতাররিফ ইবনু আব্দুল্লাহ বলেন,) আমার কাছে আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে একটি হাদীস পৌঁছাতো। তাই আমি তার সাথে সাক্ষাৎ করার আকাঙ্ক্ষা করতাম। এরপর আমি তার সাথে সাক্ষাৎ করলাম এবং বললাম: হে আবু যর! আপনার থেকে একটি হাদীস আমার কাছে পৌঁছাতো, তাই আমি আপনার সাক্ষাতের আকাঙ্ক্ষা করতাম। তিনি বললেন: আল্লাহ তোমার পিতাকে উত্তম প্রতিদান দিন! তুমি তো আমার সাথে সাক্ষাৎ করেই ফেলেছ।
আমি বললাম: (আমি সেই) হাদীসটির কথা বলছি যা আমার কাছে পৌঁছেছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আপনাকে বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তিন প্রকার লোককে ভালোবাসেন এবং তিন প্রকার লোককে ঘৃণা করেন।"
তিনি (আবু যর) বললেন: আমি মনে করি না যে আমি আমার বন্ধুর (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর মিথ্যা আরোপ করছি। আমি মনে করি না যে আমি আমার বন্ধুর উপর মিথ্যা আরোপ করছি। আমি মনে করি না যে আমি আমার বন্ধুর উপর মিথ্যা আরোপ করছি।
আমি বললাম: আল্লাহ কাদেরকে ভালোবাসেন?
তিনি বললেন: "প্রথমত, সেই ব্যক্তি যে আল্লাহর পথে ধৈর্যশীল, প্রতিদান প্রত্যাশী ও সংগ্রামকারী হিসেবে জিহাদ করে এবং শত্রুর সম্মুখীন হয়ে শহীদ হওয়া পর্যন্ত যুদ্ধ চালিয়ে যায়। আর তোমরা তাকে তোমাদের নিকট অবতীর্ণ আল্লাহর কিতাবে খুঁজে পাও।"
এরপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "নিশ্চয় আল্লাহ ভালোবাসেন তাদেরকে, যারা তাঁর পথে সারিবদ্ধভাবে যুদ্ধ করে, যেন তারা সীসাঢালা প্রাচীর।" (সূরা সাফ: ৪)।
আমি বললাম: আর কে?
তিনি বললেন: "দ্বিতীয়ত, সেই ব্যক্তি যার কোনো খারাপ প্রতিবেশী আছে, যে তাকে কষ্ট দেয়। কিন্তু সে তার কষ্টে ধৈর্য ধারণ করে, যতক্ষণ না আল্লাহ নিজেই তাকে (সেই প্রতিবেশীর কষ্ট থেকে) মুক্তি দেন—হয় প্রতিবেশীর জীবনাবসানের মাধ্যমে, অথবা (নিজের) মৃত্যুর মাধ্যমে।"
আমি বললাম: আর কে?
তিনি বললেন: "তৃতীয়ত, সেই ব্যক্তি যে একদল লোকের সাথে সফরে থাকে। তারা রাতে (শেষ ভাগে) চলা শুরু করে এবং যখন তারা শেষ রাতে পৌঁছায়, তখন ক্লান্তি ও নিদ্রা তাদের আচ্ছন্ন করে ফেলে। ফলে তারা মাথা ঝুঁকিয়ে (ঘুমিয়ে) পড়ে। এরপরও সে (ব্যক্তিটি) আল্লাহর ভয়ে এবং তাঁর কাছে যা আছে তার আকাঙ্ক্ষায় ওঠে এবং পবিত্রতা অর্জন করে (সালাত আদায়ের জন্য)।"
আমি বললাম: আর সেই তিনজন কারা, যাদেরকে আল্লাহ ঘৃণা করেন?
তিনি বললেন: "প্রথমত, অহংকারী ও গর্বকারী। আর তোমরা তাকে তোমাদের নিকট অবতীর্ণ আল্লাহর কিতাবে খুঁজে পাও: 'নিশ্চয় আল্লাহ কোনো অহংকারী, আত্মম্ভরীকে ভালোবাসেন না।' (সূরা লুকমান: ১৮)।"
আমি বললাম: আর কে?
তিনি বললেন: "দ্বিতীয়ত, কৃপণ এবং দান করে খোটা প্রদানকারী।"
আমি বললাম: আর কে?
তিনি বললেন: "তৃতীয়ত, অধিক কসমকারী ব্যবসায়ী" অথবা "অধিক কসমকারী বিক্রেতা।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 35/ (21530) عن يزيد بن هارون عن الأسود بن شيبان، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد أيضًا (21340) عن إسماعيل ابن عُلَيَّة، عن سعيد بن إياس الجُريري، أبي العلاء بن الشِّخِّير، عن ابن الأحمس، عن أبي ذرّ. وابن الأحمس هذا مجهول، وابن علية ممَّن سمع من الجريري قبل اختلاطه، لكن خالفه معمر بن راشد في "جامعه" (20282) و (20285) - وهو ممَّن سمع من الجريري قبل الاختلاط أيضًا، ورواه ابن المبارك في "الزهد" برواية الحسين المروَزي (1212) عنه - عن الجُريري بإسقاط ذكر ابن الأحمس من إسناده.وقد تقدم بنحوه برقم (1534)، وسيأتي برقم (2564) من طريق زيد بن ظبيان عن أبي ذر.والكَرَى: النُّعاس.وقوله: "أدلجوا"، أي: ساروا من أول الليل.وقوله: "فضربوا رؤوسهم"، يعني: وضعوها للنوم.
2478 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إسحاق، أخبرنا أحمد بن إبراهيم بن مِلْحان، حدثنا يحيى بن بُكير، حدثنا الليث بن سعد، عن يزيد بن الهاد، حدثنا أبو عثمان الوليد بن أبي الوليد، عن عثمان بن عبد الله بن سُرَاقة العَدَوي، عن عمر بن الخطاب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أظلَّ رأس غازٍ أظلَّه اللهُ يومَ القيامة، ومن جَهَّز غازيًا حتى يَستقِلَّ بجَهَازه فله مثلُ أجرِه" [1]. هذا حديث صحيح الإسنادوقد احتجَّ البخاري بعثمان بن عبد الله بن سُراقة، وهو ابنُ ابنة أمير المؤمنين عثمان بن عفّان [2].ولهذا الحديث شاهدٌ من حديث سهل بن حُنيف:
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো যোদ্ধার (গাজী) মাথায় ছায়া দান করল, কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাকে ছায়া দান করবেন। আর যে ব্যক্তি কোনো যোদ্ধাকে (যুদ্ধাভিযানের জন্য) এমনভাবে সাজ-সরঞ্জাম দিয়ে প্রস্তুত করে দিল যে সে তার সরঞ্জামাদিতে স্বয়ংসম্পূর্ণ হয়ে গেল, তবে তার জন্য সেই যোদ্ধার অনুরূপ পুরস্কার রয়েছে।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن رواية عثمان بن عبد الله بن سُراقة عن جده لأمه عمر بن الخطاب مرسلة، كما جزم به علي بن المديني فيما نقله عنه ابن كثير في "مسند الفاروق" (623)، وبذلك جزم أيضًا الحافظان المزي في "تهذيب الكمال" 19/ 413، والذهبي في "تاريخ الإسلام" 3/ 276، وما ردَّ به الحافظُ ابنُ حجر على المزي في "تهذيب التهذيب" غير مُسلَّم، لأمرين، أولها: أنَّ المزي لم ينفرد بالحكم بإرساله، بل وافقه على ذلك الذهبي، وسبقهما إمام المحدثين علي بن المديني، وثانيهما: أنَّ الواقدي لم ينفرد بما قال من وفاة عثمان بن عبد الله بن سراقة وعمره الذي عاشه، بل تابعه على ذلك الكلبي كما في "أنساب الأشراف" للبلاذري 10/ 475 حيث جزما بأنه مات سنة ثماني عشرة ومئة عن عُمر ثلاثة وثمانين عامًا، وهذا يعني أنه ولد في حدود سنة خمس وثلاثين، أي: بعد وفاة عمر بن الخطاب باثني عشر عامًا تقريبًا، ولم يأت ابن حجر بحجة على تضعيفه لقول الواقدي، بل إنَّ الواقدي والكلبي وتبعهما ابن سعد في "طبقاته" 7/ 240 جزموا بأنَّ أم عثمان وهي زينب بنت عمر بن الخطاب هي أصغر ولد عمر بن الخطاب، وهذا ممّا يقوي عدم سماعه من جده. وما احتجَّ به ابن حجر من حجر من أنه وقع تصريحه بسماعه منه في "تهذيب الآثار" لابن جرير الطبري غير مسلَّم، لأنَّ الفاكهي قد روى الحديث في "أخبار مكة" (1943) بإسناد الطبري نفسه، غير أنه قال فيه: عن عثمان بن عبد الله بن سراقة، عن أبيه، عن ابن عمر بن الخطاب، فيصح الحديثُ بهذا الإسناد إن شاء الله، وبذلك يتضح أنَّ في الإسناد الذي وقع للحافظ في "تهذيب الآثار" سقطًا، والله ولي التوفيق، وكنا قد تبعنا الحافظ رحمه الله في "المسند" وفي "سنن ابن ماجه" وغيرهما فصححنا سماع عثمان بن عبد الله بن سراقة من عمر، فيُستدرك من هنا.وأخرجه أحمد 1/ (126)، وابن ماجه (2758)، وابن حبان (4628) من طرق عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (376) عن حسن بن موسى الأشيب، عن عبد الله بن لهيعة، عن الوليد بن أبي الوليد، به.وفي باب الإظلال في سبيل الله مطلقًا انظر حديث عدي بن حاتم الآتي برقم (2483).وفي باب تجهيز الغازي انظر حديث زيد بن خالد عند البخاري (2843)، ومسلم (1895).
[2] هذا وهم من المصنف رحمه الله، والظاهر أنه سبق قلم، لأنَّ عثمان هو ابن زينب بنت عمر بن الخطاب، وليس هو ابن ابنة عثمان بن عفان.
2479 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا يحيى بن أبي بُكير، حدثنا زهير بن محمد، عن عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن عبد الله بن سهل بن حُنَيف، أنَّ سهلًا حدثه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن أَعانَ مجاهدًا في سبيل الله، أو غارمًا في عُسْرتِه، أو مُكاتَبًا في رقَبتِهِ، أظلَّه اللهُ في ظِلِّه يوم لا ظِلَّ إلَّا ظِلُّه" [1].
সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে কোনো মুজাহিদকে সাহায্য করে, অথবা কষ্টের মধ্যে থাকা কোনো ঋণগ্রস্ত ব্যক্তিকে সাহায্য করে, অথবা তার মুক্তির জন্য কোনো মুকাতাবকে (চুক্তিভুক্ত দাসকে) সাহায্য করে, আল্লাহ তাকে সেই দিন তাঁর (আরশের) ছায়ায় স্থান দেবেন, যেদিন তাঁর ছায়া ছাড়া আর কোনো ছায়া থাকবে না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في إسناده ضعف عبد الله بن سهل بن حنيف ذكر ابن منده أنه ولد في حياة النبي صلى الله عليه وسلم، ولكنه لم يرو عنه غير عبد الله بن محمد بن عَقيل، وابن عقيل هذا ضعيف يُعتبر به في المتابعات والشواهد، لكن لم يتابع عليه بهذا اللفظ، ومع ذلك حسَّن هذا الحديث ابن عساكر في "معجمه" (606)، وابن حجر في "الأمالي المُطلقة" (101)، وصحَّحه ابنُ الملقِّن في "البدر المنير" 9/ 741، فبالغ بذلك.وأخرجه أحمد 25/ (15987) عن يحيى بن أبي بُكير، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا (15986) من طريق عُبيد الله بن عمرو، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، به.وسيأتي برقم (2896) من طريق عمرو بن ثابت عن ابن عقيل.وفي باب معونة المجاهد حديث زيد بن خالد عند البخاري (2843)، ومسلم (1895) بلفظ: "من جهّز غازيًا في سبيل الله فقد غزا، ومن خَلَفَه في أهله بخير فقد غزا".وفي باب إعانة الغارم والمكاتَب حديث أبي اليَسَر عند مسلم (3006) بلفظ: "من أنظر معسرًا أو وضع عنه، أظله الله في ظله". والغارم والمكاتب كلٌّ منهما مُعسِرٌ، وأحق من يُعينُهما هما الدائن والمولى، والله أعلم.
2480 - أخبرني عبد الله بن محمد بن موسى العَدْل، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا يحيى بن المغيرة السَّعْدي، حدثنا جَرير، عن الأعمش، عن أبي عمرو الشَّيباني، عن أبي مسعود، قال: جاء رجلٌ بناقةٍ مَخْطُومة، فقال: هذا في سبيل الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لك بها يومَ القيامةِ سبعُ مئة ناقةٍ، كلُّها مَخْطُومة" [1]هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجه البخاري.
আবূ মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি লাগামযুক্ত (নাকের দড়ি লাগানো) একটি উটনি নিয়ে এসে বলল, এটি আল্লাহর রাস্তায় (দান করলাম)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এর বিনিময়ে কিয়ামতের দিন তোমার জন্য সাত শত উটনি থাকবে, সেগুলোর সবকটিতেই লাগাম লাগানো থাকবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. جرير: هو ابن عبد الحميد، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وأبو عمرو الشَّيباني: هو سعد بن إياس.وأخرجه مسلم (1892)، وابن حبان (4649) من طريقين عن جرير بن عبد الحميد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 28/ (17094) و 37/ (22357) و (22358)، ومسلم (1892)، والنسائي (4381)، وابن حبان (4650) من طريقين عن الأعمش، به.قوله: "مخطومة" أي: لها خَطْم تُقاد به، كالرسَن للدابة، فيتمكن صاحبها منها ولا تفرُّ منه.