আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
2481 - أخبرنا أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني الليث بن سعد، عن الحارث بن يعقوب، عن قيس بن رافع، عن عبد الرحمن بن جُبير، عن عبد الله بن عمرو: أنه مَرَّ بمعاذ بن جبل وهو قائمٌ على بابه، فقال معاذ: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن جاهَدَ في سبيلِ الله، كان ضامِنًا على الله، ومن دخل على إمام يُعزِّرُه، كان ضامِنًا على الله، ومَن جلس في بيتِه لم يَغتَبْ أحدًا بسوءٍ، كان ضامِنًا على الله" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যখন তিনি তাঁর দরজায় দাঁড়িয়ে ছিলেন। তখন মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে জিহাদ করল, সে আল্লাহর জিম্মায় (দায়িত্বে/নিরাপত্তায়) রইল। আর যে ব্যক্তি এমন শাসকের (ইমামের) নিকট গেল যাকে সে শক্তিশালী করে (বা সাহায্য করে), সেও আল্লাহর জিম্মায় রইল। আর যে ব্যক্তি নিজ ঘরে বসে রইল এবং খারাপভাবে কারো গীবত (পরনিন্দা) করল না, সেও আল্লাহর জিম্মায় রইল।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن.وقد تقدم برقم (861) من طريق يحيى بن بكير عن الليث بن سعد.يُعزِّره، أي: يُوقِّره ويَنصُره ويُعِينُه.
2482 - أخبرني أبو بكر محمد بن عبد الله الورّاق، حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا أبو بكر بن أَبي شَيْبة، حدثنا عَبِيدة بن حُميد، حدثنا الأسود بن قيس، عن نُبَيح العَنَزي، عن جابر بن عبد الله، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنه أراد أن يغزوَ، فقال: "يا معشرَ المهاجرين والأنصار، إنَّ من إخوانِكم قومًا ليس لهم مالٌ ولا عَشِيرةٌ، فليَضُمَّ أحدُكم إليه الرجلَين أو الثلاثةَ، وما لأحدنا مِن ظهرِ جملِه إِلَّا عُقْبةٌ كَعُقْبةِ أحدِهم"، قال: فضمَمْتُ إليَّ اثنين أو ثلاثة، ما لي إلّا عُقبةٌ كعُقْبة أحدِهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার যুদ্ধে যেতে চাইলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে মুহাজির ও আনসার সম্প্রদায়! তোমাদের ভাইদের মধ্যে এমন কিছু লোক আছে যাদের কোনো সম্পদ নেই এবং কোনো গোত্রও নেই। সুতরাং তোমাদের মধ্যে প্রত্যেকে যেন তার সাথে দুই বা তিনজনকে শামিল করে নেয়। আর তোমাদের কারোর জন্যেই তার উটের পিঠে আরোহণের পালা তাদের একজনের পালার চেয়ে বেশি হবে না।" তিনি (জাবির) বললেন: "অতঃপর আমি আমার সাথে দুই বা তিনজনকে শামিল করে নিলাম, আর আমার জন্যও তাদের একজনের পালার মতো ছাড়া অন্য কোনো অংশ ছিল না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. نُبيح العَنَزي: هو ابن عبد الله الكوفي.وأخرجه أحمد 23/ (14863) عن عَبيدة بن حميد، وأخرجه أبو داود (2534) عن محمد بن سليمان الأنباري، عن عَبيدة بن حميد، بهذا الإسناد.والعُقبة، بالضم: ركوب مركبٍ واحدٍ بالنَّوبة على التعاقب. ابن يزيد، وكذا ابن زَحْر فيه ضعف وبخاصّة في روايته عن علي بن يزيد، ويغني عن هذا رواية الوليد بن جميل عن القاسم.وفي باب طروقة الفحل حديث أبي كبشة الأنماري عند أحمد 29/ (18032)، وابن حبان (4679)، وغيرهما بلفظ: "من أطرق مسلمًا فعقبَ له الفرسُ، كان له كأجر سبعين فرسًا حُمل عليها في سبيل الله" زاد ابن حبان: "وإن لم تُعقب كان له كأجر فرسٍ حُمل عليها في سبيل الله". وإسناده صحيح.وحديث جابر بن عبد الله عند مسلم (988) بلفظ: يا رسول الله صلى الله عليه وسلم، وما حقُّها؟ - يعني الإبل والبقر والغنم - قال: "إطراق فحلها، وإعارة دلوها، ومَنيحتُها، وحلبها على الماء، وحملٌ عليها في سبيل الله".
2483 - أخبرنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا زيد بن الحُباب، حدثنا معاوية بن صالح، حدثني كثير بن الحارث، عن القاسم بن عبد الرحمن، عن عَدي بن حاتم الطائي: أنه سأل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم: أيُّ الصدقةِ أفضلُ؟ قال: "خِدمةُ عبدٍ في سبيل الله، أو ظلُّ فُسْطاطٍ، أو طَرُوقةُ فَحْلٍ في سبيل الله" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আদী ইবনে হাতেম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করলেন: "কোন প্রকারের সাদকা সর্বোত্তম?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "(তা হলো) আল্লাহর পথে (জিহাদের উদ্দেশ্যে) নিয়োজিত কোনো গোলামের সেবা, অথবা (মুজাহিদদের জন্য) তাঁবুর ছায়া (ব্যবস্থা করা), অথবা আল্লাহর পথে প্রজননের জন্য ব্যবহৃত কোনো পুরুষ পশু (উট বা ঘোড়া) দান করা।।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن، وهذا إسناد اختُلف فيه على القاسم بن عبد الرحمن، فرواه عنه كثير بن الحارث كما وقع عند المصنف هنا، وكثير هذا صالح الحديث، وخالفه الوليد بن جميل، وهو صالح الحديث أيضًا، فرواه عن القاسم، غير أنه قال: عن أبي أمامة، بدل: عدي بن حاتم، ومثل هذا الاختلاف لا يضر لأنَّ مداره على صحابي، وإن كانت رواية الوليد بن جميل أشبه، لأنه اختُلف على معاوية بن صالح في وصل الحديث وإرساله عن عدي بن حاتم، فرواه عبد الله بن صالح، عن معاوية بن صالح، عن كثير بن الحارث، عن القاسم: أنَّ عدي بن حاتم سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم، مرسلًا، كما أشار إليه البخاري فيما سأله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (492)، ولهذا قال الترمذي عن حديث أبي أمامة بأنه أصح.وأخرجه الترمذي في "جامعه" (3626) عن محمد بن رافع، عن زيد بن الحباب، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا (1627) من طريق الوليد بن جميل، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة. وقال: حديث حسن صحيح غريب، وهو أصحُّ عندي من حديث معاوية بن صالح.وأخرجه أحمد 36/ (22321) من طريق مُطَّرِح بن يزيد الكناني، عن عُبيد الله بن زَحْر، عن علي بن يزيد الألهاني، عن القاسم، عن أبي أمامة. وهذا إسناد ضعيف جدًّا لضعف مطَّرِح وعلي ابن يزيد، وكذا ابن زَحْر فيه ضعف وبخاصّة في روايته عن علي بن يزيد، ويغني عن هذا رواية الوليد بن جميل عن القاسم.وفي باب طروقة الفحل حديث أبي كبشة الأنماري عند أحمد 29/ (18032)، وابن حبان (4679)، وغيرهما بلفظ: "من أطرق مسلمًا فعقبَ له الفرسُ، كان له كأجر سبعين فرسًا حُمل عليها في سبيل الله" زاد ابن حبان: "وإن لم تُعقب كان له كأجر فرسٍ حُمل عليها في سبيل الله". وإسناده صحيح.وحديث جابر بن عبد الله عند مسلم (988) بلفظ: يا رسول الله صلى الله عليه وسلم، وما حقُّها؟ - يعني الإبل والبقر والغنم - قال: "إطراق فحلها، وإعارة دلوها، ومَنيحتُها، وحلبها على الماء، وحملٌ عليها في سبيل الله".
2484 - أخبرني عبد الله بن إسحاق بن الخُراساني العَدْل ببغداد، حدثنا الحسن بن مُكرَم البَزّاز، حدثنا رَوْح بن عُبادة، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن عاصم بن بَهْدَلة، عن زِرٍّ، عن عبد الله بن مسعود، قال: كنا يومَ بدر نَتَعاقَبُ ثلاثةً على بَعيرٍ، فكان عليٌّ وأبو لُبَابة زَمِيلَي رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فكانت إذا كانت عُقبةُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم يقولان له: اركَبْ حتى نمشيَ، فيقول: "إني لستُ بأَغنى عن الأجر منكما، ولا أنتما بأقوى على المشيِ مِنّي" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদরের যুদ্ধের দিন আমরা তিনজন করে একটি উটের উপর পালাক্রমে আরোহণ করতাম। আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আবূ লুবাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাওয়ারীর সাথী (জমিল)। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আরোহণের পালা আসত, তখন তাঁরা দুজন তাঁকে বলতেন: আপনি আরোহণ করুন, আমরা হেঁটে যাই। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "আমি তোমাদের চেয়ে সওয়াবের (পুণ্যের) বেশি মুখাপেক্ষী নই, আর তোমরাও আমার চেয়ে হাঁটতে বেশি সক্ষম নও।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل عاصم بن بَهْدلة: وهو ابن أبي النَّجُود. زِرّ: هو ابن حُبيش.وأخرجه أحمد 7/ (3901) و (3965) و (4009) و (4029)، والنسائي (8756) من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وسيأتي من طريق أبي الوليد الطيالسي عن حماد برقم (4345).والعُقْبة، بالضم: ركوب مركب واحد بالنَّوبة على التعاقب.
2485 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، قال: سمعت معاوية بن صالح يقول: حدثني نُعيم بن زياد، أنه سمع أبا كَبْشة صاحبَ النبي صلى الله عليه وسلم يقول عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "الخيلُ معقودٌ في نَواصِيها الخيرُ، وأهلُها مُعانُون عليها، والمُنفِقُ عليها كالباسِطِ يدَه بالصدقةِ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه الزيادة [2].وفيها له شاهد:
আবূ কাবশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ঘোড়ার কপালের অগ্রভাগে কল্যাণ বাঁধা আছে। আর এর মালিকদেরকে এগুলোর জন্য সাহায্য করা হবে। আর যে ব্যক্তি এর (ঘোড়ার) জন্য খরচ করে, সে ঐ ব্যক্তির মতো যে সাদকা দেওয়ার জন্য তার হাত প্রসারিত করে।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ابن وهب: هو عبد الله.وأخرجه ابن حبان (4674) من طريق حرملة بن يحيى، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.
[2] يعني قوله: "وأهلها مُعانُون" إلى آخر الحديث. وهو كذلك، فقد أخرجه البخاري (2850)، ومسلم (1873) من حديث عروة البارقي، والبخاري (3645) من حديث أنس بن مالك، ومسلم (987) من حديث أبي هريرة، و (1871) من حديث ابن عُمر، و (1872) من حديث جرير بن عبد الله، كلهم بلفظ: "الخيل معقود في نواصيها الخير إلى يوم القيامة"، زاد جرير في روايته وعروة في بعض رواياته: "الأجر والمغنم".
2486 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الوهاب بن حبيب العَبْدي، حدثنا جعفر بن عَون، حدثنا هشام بن سعد، حدثني قيس بن بِشْر التَّغلِبي قال: كان أَبي جليسًا لأبي الدرداء بدمشق، وكان بدمشقَ رجلٌ من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يقال له: ابن الحنظَلِية الأنصاري، فمرَّ بنا يومًا فسَلّم، فقال له أبو الدرداء: كلمةً تَنفعُنا ولا تَضرُّك، قال: قال لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ المُنفِق على الخيلِ في سبيل الله كباسِطِ يدَيهِ بالصدقةِ لا يَقبِضُها" [1].
কায়স ইবনু বিশর আত-তাগলিবি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার পিতা দামেস্কে আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সহচর (জলিস) ছিলেন। দামেস্কে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে ইবনু হানযালিয়্যা আল-আনসারী নামে একজন লোক ছিলেন। একদিন তিনি আমাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন এবং সালাম দিলেন। তখন আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: এমন একটি কথা বলুন যা আমাদের উপকারে আসে এবং আপনার কোনো ক্ষতি না হয়। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের বলেছেন: "নিশ্চয় যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে ঘোড়ার পিছনে খরচ করে, সে ঐ ব্যক্তির মতো, যে তার দুই হাত সদকা করার জন্য প্রসারিত করে এবং তা গুটিয়ে নেয় না (অর্থাৎ সর্বদা দান করতে থাকে)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح بما قبله، وهذا إسناد محتمل للتحسين، فإنَّ بشرًا - وهو ابن قيس - تابعي كبير يروي عن عمر بن الخطاب، وكان جَليسًا لأبي الدرداء، وروى عنه ابنه وزياد بن عِلاقة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وهشام بن سعد حسن الحديث في المتابعات والشواهد، وقيس بن بشر - وهو يروي هذا الخبر عن أبيه - تفرَّد بالرواية عنه هشام وقال عنه: كان رجل صدق، وقال أبو حاتم: ما أرى به بأس. وقد حسَّن الحافظُ ابن حجر هذا الحديث في "الأمالي المطلقة" ص 35 في المجلس الثمانين.وأخرجه أحمد 29/ (17622)، وأبو داود (4089) ضمن حديث من طريق أبي عامر عبد الملك بن عمرو العَقَدي، عن هشام بن سعد، بهذا الإسناد.
2487 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، حدثنا طلحة بن أبي سعيد، أنَّ سعيد المَقبُري حدثه عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن احتَبَسَ فرسًا في سبيل الله إيمانًا بالله وتَصديقَ مَوعُودِ الله، كان شِبَعُه ورِيُّه ورَوثُه وبَولُه حسناتٍ في مِيزانِه يومَ القيامة" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর প্রতি ঈমান রেখে এবং আল্লাহর প্রতিশ্রুতির সত্যতা বিশ্বাস করে আল্লাহর পথে (জিহাদের উদ্দেশ্যে) একটি ঘোড়া প্রস্তুত রাখে/ধরে রাখে, কিয়ামতের দিন তার ঐ ঘোড়ার খাবার, পানীয়, গোবর এবং পেশাব তার মীযানের পাল্লায় নেকি (হাসানাত) হিসেবে গণ্য হবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ابن وهب: هو عبد الله.وأخرجه النسائي (4407) عن الحارث بن مسكين، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 14/ (8866)، والبخاري (2853)، وابن حبان (4673) من طريق عبد الله بن المبارك، عن طلحة بن أبي سعيد، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه بنحوه أحمد (8977)، والبخاري (2371)، ومسلم (987)، وابن ماجه (2788)، والترمذي (1636)، والنسائي (4387) و (4388)، وابن حبان (4672) من طريق أبي صالح، عن أبي هريرة. من معاوية بن حُديج، كما توضحه رواية ابن عبد الحَكَم في "فتوح مصر والمغرب" ص 254 - 255.وقد تابع الليثَ بنَ سعد على روايته هذه عمرو بنُ الحارث، كما نبَّه عليه أحمد بن حنبل بإثر الحديث، وروايته هذه عند سعيد بن منصور في "سننه" (2444)، وابن عبد الحَكَم ص 254، وغيرهما موقوفًا كذلك.قوله: "خَوَّلْتني" أي: مَلَّكْتَني ومَنحْتَني.
2488 - أخبرني عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا رَوح بن عُبادة، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، حدثني يزيد بن أبي حَبيب، حدثني سُويد بن قيس، حدثني معاوية بن حُدَيج، عن أبي ذرٍّ الغِفاري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ما مِن فَرسٍ عَربيٍّ إلّا يُؤذَنُ له كلَّ يومٍ بدَعْوتَين، يقول: اللهمَّ كما خَوَّلْتَني مَن خَوَّلْتَني، فاجعلْني مِن أحبِّ مالِه وأهلِه إليه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু যর গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন কোনো আরবি ঘোড়া নেই, যাকে প্রতিদিন দু'টি দু'আ করার অনুমতি দেওয়া হয় না। ঘোড়াটি বলে: হে আল্লাহ! আপনি আমাকে যার হাতে অর্পণ করেছেন, আমাকে তার কাছে তার মাল ও পরিবারের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয় করে দিন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح موقوفًا، فقد انفرد برفعه عبد الحميد بن جعفر، وخالفه الليث بن سعد وعمرو بن الحارث، وهما أجلُّ من عبد الحميد بن جعفر وأوثق، فوقفاه على أبي ذرّ، وهو المحفوظ، كما قال الدارقطني في "العلل" (1123)، وخالفاه أيضًا في تعيين شيخ يزيد بن أبي حبيب، فذكرا أنه عبد الرحمن بن شُماسَة. وانفرد ابنُ جعفر أيضًا بتقييد الفرس بكونه عربيًا، وأطلقاه.وسيأتي برقم (2670) من طريق يحيى بن سعيد القطان عن عبد الحميد بن جعفر.وأخرجه أحمد 35/ (21442) من طريق الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عبد الرحمن بن شُماسة: أنَّ معاوية بن حُديج مرَّ على أبي ذر، فذكره موقوفًا. وهذا يُوهم أنَّ ابن شُماسَة حضر القصة، وابن شماسة له سماع من أبي ذر، لكن هذا الحديث إنما سمعه ابن شماسة من معاوية بن حُديج، كما توضحه رواية ابن عبد الحَكَم في "فتوح مصر والمغرب" ص 254 - 255.وقد تابع الليثَ بنَ سعد على روايته هذه عمرو بنُ الحارث، كما نبَّه عليه أحمد بن حنبل بإثر الحديث، وروايته هذه عند سعيد بن منصور في "سننه" (2444)، وابن عبد الحَكَم ص 254، وغيرهما موقوفًا كذلك.قوله: "خَوَّلْتني" أي: مَلَّكْتَني ومَنحْتَني.
2489 - أخبرنا مُكرَم بن أحمد القاضي ببغداد، حدثنا أبو قِلابة بن الرَّقَاشي، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا أبي، قال: سمعتُ يحيى بن أيوب يحدِّث عن يزيد بن أبي حَبيب، عن عُليّ بن رَبَاح، عن أبي قَتَادة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "خَيرُ الخيل الأدْهَمُ الأقْرَحُ المحجَّلُ الأرثَم، طَلْقُ اليدِ اليُمنى، فإن لم يكن أدْهَمَ فكُمَيتٌ على هذه الشِّيَةِ" [1]. هذا حديث غريب صحيحٌ، وقد احتجَّ الشيخان بجميع رُواتِه [2]، ولم يُخرجاه.
আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "উত্তম ঘোড়া হলো কালো, যার কপালে সাদা চিহ্ন রয়েছে, যার পায়ে সাদা চিহ্ন রয়েছে, এবং যার ঠোঁটের উপরের অংশে সাদা চিহ্ন আছে, আর তার ডান পা সাদা চিহ্ন মুক্ত। যদি তা কালো না হয়, তবে একই ধরনের বৈশিষ্ট্যের লালচে-কালো ঘোড়াই (উত্তম)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل يحيى بن أيوب - وهو الغافقي المصري - وقد توبع. جرير: هو ابن حازم، وأبو قلابة الرقاشي: هو عبد الملك بن محمد.وأخرجه ابن ماجه (2789)، والترمذي (1697) عن محمد بن بشار، وابن حبان (4676) من طريق إبراهيم بن محمد بن عَرْعرة، كلاهما عن وهب بن جرير، بهذا الإسناد. ولكنه شكَّ في رواية ابن عرعرة، فقال: عن عقبة بن عامر أو أبي قتادة، لكن الصحيح أبو قتادة، كما جزم به غيرهوأخرجه أحمد 37/ (22561) عن حسن بن موسى الأشيب ويحيى بن إسحاق، والترمذي (1696) من طريق عبد الله بن المبارك، ثلاثتهم عن عبد الله بن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، به. وهذا إسناد حسن أيضًا، لأنَّ رواية ابن المبارك عن ابن لهيعة جيدة قبل أن تحترق كتب ابن لهيعة.وانظر ما بعده.الأدهم: الأسود.والأقرح: ما كان في جبهته قُرحة، بالضم، وهو بياض يسير دون الغُرّة.والأرثم: هو الذي أنفه أبيض وشفته العليا. والمُحجَّل: هو الذي في قوائمه بياض.وطلق اليد اليمنى: أي ليس فيها تحجيل.والكُميت: هو الذي لونه بين السواد والحمرة، يستوي فيه المذكر والمؤنث.والشِّيَة: هو اللون المخالف لغالب اللون.
[2] لم يخرِّج البخاري لعُليّ بن رباح في "صحيحه" شيئًا، إنما أخرج له في "الأدب المفرد". من رواية ابن خثيم عن نافع بن جبير عن نافع بن سرجس، وهذا خطأ يقينًا، فإن نافع بن سرجس قد تفرّد ابن خثيم بالرواية عنه، ولا يعرف هذا الحديث إلَّا من روايته عنه.
2490 - أخبرني أبو عمرو محمد بن أحمد السُّكري، حدثنا محمد بن إسحاق بن خُزيمة، حدثنا موسى بن عبد الرحمن المَسْروقي، حدثنا عُبيد بن الصَّبّاح، أخبرنا موسى بن عُليّ بن رَبَاح، عن أبيه، عن عُقبة بن عامر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا أردت أن تغزوَ فاشتَرِ فرسًا أدْهمَ أغرَّ محجَّلًا مطلَقَ اليُمنى، فإنك تَغْنَمُ وتَسلَمُ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
উক্ববাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তুমি জিহাদ বা যুদ্ধে যেতে চাও, তখন তুমি একটি কালো ঘোড়া খরিদ করো—যার কপালে সাদা চিহ্ন আছে, যার পা সাদা রংযুক্ত (সাদা মোজা পরিহিতের মতো), কিন্তু ডান পা সাদা চিহ্নমুক্ত, কেননা তুমি গনীমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) লাভ করবে এবং নিরাপদ থাকবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف عُبيد بن الصبّاح - وهو الكوفي الخَزّاز - وخالفه الفضل بن دكين، وهو ثقة حافظ - فرواه عن موسى بن عُلَيّ عن أبيه مرسلًا، فهذا هو المحفوظ في رواية موسى بن علي، كما أفاد ذلك أبو حاتم الرازي في سؤالات ابنه له في "العلل" (911).قلنا: على أنه قد صحَّ موصولًا بسياقة قريبة عن عُلي بن رباح، كما في الطريق التي قبل هذه، لكن عن أبي قتادة الأنصاري، وليس عن عقبة بن عامر.وأخرجه البيهقي 6/ 330 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني 17/ (809) من طريقين عن موسى بن عبد الرحمن، به.وأخرجه ابن أبي شيبة 12/ 224 عن الفضل بن دكين، عن موسى بن عُليّ، عن أبيه - مرسلًا -: أنَّ رجلًا أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: إني أريد أن أقيد فرسًا أو أبتاع فرسًا، قال: "فعليك به أقرحَ أرثَمَ كُميتًا، أو أدهمَ مُحجّلًا طَلْقَ اليُمنى"، وهذا اللفظ أوفق للفظ أبي قتادة. من رواية ابن خثيم عن نافع بن جبير عن نافع بن سرجس، وهذا خطأ يقينًا، فإن نافع بن سرجس قد تفرّد ابن خثيم بالرواية عنه، ولا يعرف هذا الحديث إلَّا من روايته عنه.
2491 - أخبرنا أحمد بن محمد العَنَزِي، حدثنا عثمان بن سعيد، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا زهير، حدثنا عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، عن نافع بن سَرْجِس [1]، أنه سمع أبا هريرة يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أَظلَّتْكم فِتنٌ كقِطَع الليل المُظلِم، أنجَى الناسِ منها صاحبُ شاهقةٍ يأكلُ من رِسْلِ غَنَمِه، أو رجلٌ مِن وراء الدُّروب آخذٌ بعِنانِ فَرسِه يأكلُ من فَيْءِ سيفِه" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদেরকে অন্ধকার রাতের অংশের মতো ফিতনাসমূহ আচ্ছন্ন করে ফেলেছে। তা থেকে সবচেয়ে মুক্তিপ্রাপ্ত ব্যক্তি সে, যে উচ্চ চূড়ার (পাহাড়ের) অধিকারী হবে এবং তার ছাগলের দুধ (বা ফলন) থেকে আহার করবে। অথবা সেই ব্যক্তি যে পথে-ঘাটের আড়ালে অবস্থান করে তার ঘোড়ার লাগাম ধরে রাখবে এবং তার তরবারির অর্জিত সম্পদ থেকে আহার করবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أُقحم في الإسناد بين ابن خثيم ونافع بن سرجس في النسخ الخطية نافع بن جبير، فصار من رواية ابن خثيم عن نافع بن جبير عن نافع بن سرجس، وهذا خطأ يقينًا، فإن نافع بن سرجس قد تفرّد ابن خثيم بالرواية عنه، ولا يعرف هذا الحديث إلَّا من روايته عنه.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، نافع بن سرجس - وإن لم يرو عنه غير عبد الله بن عثمان بن خثيم - وثَّقه ابن سعد في "الطبقات" 5/ 477، وذكره ابنُ حبان في "الثقات" 5/ 468، وقال الإمام أحمد في "العلل ومعرفة الرجال" (1620): ما أعلم إلَّا خيرًا. وأما ابن خثيم فصدوق لا بأس به، وقد اختُلف عليه في رفع هذا الحديث ووقفه، فرواه عنه مرفوعًا زهير بنُ معاوية وزائدةُ بن قُدامة فيما سيأتي عند المصنف برقم (8782)، ووقفه عنه معمر بن راشد فيما سيأتي عنده أيضًا برقم (8536) و (8643)، واللذان رفعاه حافظان، فرفعه صحيح، والله أعلم.وتقدم برقم (2410) من طريق سعيد بن يسار عن أبي هريرة مرفوعًا، بلفظ قريب من لفظه الذي هنا، لكن ليس فيه أنَّ ذلك زمن الفتن، ويُحمَل مُطلَق ما جاء هناك على ما قُيّد به هنا من أنَّ المقصود كون ذلك أيام الفتن، كما أفاده الحافظ ابن رجب الحنبلي في "شرح البخاري" 1/ 107.قوله: "كقطع الليل المظلم" أي: كل فتنة كقطعة من الليل المظلم في شدتها وظلمتها وعدم تبيُّن أمرها.والشاهقة: الجبل العالي.ورِسْل الغنم، بكسر الراء: لبنها.والعِنان، بكسر العين: سَيْر لجام الفرس.وفَيء السيف: هو ما يغنمه المجاهد، وهو من أحلِّ الكسب.
2492 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل الشَّعْراني، حدثنا جَدّي، حدثنا عبد الله بن صالح، أنَّ أبا شُريح المَعَافِري حدثه عن أبي هانئٍ، عن أبي علي الجَنْبي، عن أبي سعيد الخُدْري، أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن رَضِيَ بالله رَبًّا، وبالإسلام دِينًا، وبمحمدٍ رسولًا، وَجَبتْ له الجنةُ"، قال أبو سعيد: فحَمِدتُ الله وكبّرتُ وسُرِرتُ به، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "وأُخرى يرفعُ اللهُ بها أهلَها في الجنة مئةَ درجةٍ، ما بين كلِّ درجتَين كما بين السماء والأرض - أو أبعدَ ما بين السماء والأرض -" قال: قلتُ: وما ذاك يا رسول الله؟ قال: "الجهادُ في سبيل الله، الجهادُ في سبيل الله" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহকে রব হিসেবে, ইসলামকে দীন (জীবনব্যবস্থা) হিসেবে, এবং মুহাম্মাদকে রাসূল হিসেবে মেনে সন্তুষ্ট হয়েছে, তার জন্য জান্নাত অবধারিত হয়ে গেল।" আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তখন আল্লাহর প্রশংসা করলাম, তাকবীর বললাম এবং এতে খুবই আনন্দিত হলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আরও একটি বিষয় আছে, যার কারণে আল্লাহ এর অনুসারীদের জান্নাতে একশো স্তর বা মর্যাদা উন্নীত করবেন। প্রতিটি স্তরের মধ্যবর্তী দূরত্ব আসমান ও যমীনের মধ্যবর্তী দূরত্বের সমান – অথবা আসমান ও যমীনের মধ্যবর্তী দূরত্বের চেয়েও বেশি।" তিনি (আবূ সাঈদ) বলেন, আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! সেটি কী?' তিনি বললেন: "আল্লাহর পথে জিহাদ, আল্লাহর পথে জিহাদ।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد اختُلف فيه على أبي هانئٍ - وهو حميد بن هانئ - في تعيين شيخه، كما مضى بيانه برقم (1925)، وبينّا هناك أنه اختلاف لا يضرُّ لثقة الرجلَين.أبو شُريح: هو عبد الرحمن بن شُريح، وأبو علي الجَنْبي: هو عمرو بن مالك الهَمْداني، وعبد الله بن صالح - وهو كاتب الليث بن سعد - يعتبر به في المتابعات والشواهد، وقد تابعه زيد بن الحُباب فيما تقدم برقم (1925) على الشطر الأول من الحديث، وتابعه أيضًا على الشطر الثاني كما سيأتي.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (3953) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (8742) عن مُطَّلِب بن شعيب، عن عبد الله بن صالح، به.وأخرج الشطر الثاني منه في ذكر درجات الجنة: عبدُ بن حميد (922)، وابن أبي الدنيا في "صفة الجنة" (192)، وأبو نُعيم في "صفة الجنة" (230) من طريق زيد بن الحُباب، عن أبي شُريح عبد الرحمن بن شريح، به.وأخرجه بشطريه مسلم (1884)، والنسائي (4324) و (9749)، وابن حبان (4612) من طريق ابن وهب، عن أبي هانئ، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن أبي سعيد.وأخرجه بنحوه أحمد 17/ (11102) من طريق ابن لهيعة، عن خالد بن أبي عمران، عن أبي عبد الرحمن الحبلي، عن أبي سعيد. وأخرجه أحمد 24/ (15608) و 29/ (18080) عن عفان بن مسلم، عن عبد الواحد بن زياد، بهذا الإسناد.وانظر حديث أبي موسى الأشعري في "مسند أحمد" 32/ (19528) و (19743) و (19744) بلفظ: "فَنَاءُ أمتي بالطَّعْن والطاعون"، فقيل: يا رسول الله، هذا الطعن قد عرفناه، فما الطاعون؟ قال: "وخْز أعدائكم من الجنّ، وفي كلٍّ شُهداء". وتقدَّم بعضه عند المصنف برقم (159).والطَّعْن: القتل في سبيل الله.وانظر ما قاله الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" في بيان معنى الطاعون 17/ 508 - 510.
2493 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدثنا عاصمٌ الأَحْول، عن كُريب بن الحارث، عن أبي بُردة بن قيس أخي أبي موسى، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "اللهمّ اجعَلْ فَنَاءَ أمتي قتلًا في سبيلِك بالطَّعْن والطاعون" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু বুরদাহ ইবনু কাইস থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আল্লাহ! তুমি আমার উম্মতের বিনাশকে তোমার পথে বর্শার আঘাত এবং প্লেগ বা মহামারীর মাধ্যমে শাহাদাত হিসেবে নির্ধারণ করো।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل كريب بن الحارث - وهو ابن أبي موسى الأشعري - فقد روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات". أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري، وعاصم الأحول: هو ابن سليمان. وأخرجه أحمد 24/ (15608) و 29/ (18080) عن عفان بن مسلم، عن عبد الواحد بن زياد، بهذا الإسناد.وانظر حديث أبي موسى الأشعري في "مسند أحمد" 32/ (19528) و (19743) و (19744) بلفظ: "فَنَاءُ أمتي بالطَّعْن والطاعون"، فقيل: يا رسول الله، هذا الطعن قد عرفناه، فما الطاعون؟ قال: "وخْز أعدائكم من الجنّ، وفي كلٍّ شُهداء". وتقدَّم بعضه عند المصنف برقم (159).والطَّعْن: القتل في سبيل الله.وانظر ما قاله الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" في بيان معنى الطاعون 17/ 508 - 510.
2494 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، أخبرنا ثابت، عن أنس: أنَّ رجلًا أسودَ أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، إني رجل أسودُ مُنتِنُ الرِّيحِ، قبيحُ الوجه، لا مالَ لي، فإن أنا قاتلتُ هؤلاء حتى أُقتَل، فأين أنا؟ قال: "في الجنة"، فقاتل حتى قُتِل، فأتاه النبيُّ صلى الله عليه وسلم فقال: "قد بَيَّض الله وجهَك، وطَيَّبَ رِيحَك، وأكثرَ مالَكَ"، وقال لهذا أو لغيره: "لقد رأيتُ زوجتَه مِن الحُور العِين نازعَتْه جُبّةً له من صُوفٍ، تَدخُل بينَه وبين جُبَّتِه" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক কালো ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, “ইয়া রাসূলুল্লাহ, আমি একজন কালো, দুর্গন্ধযুক্ত, কুৎসিত চেহারার এবং সম্পদহীন মানুষ। যদি আমি এই শত্রুদের সাথে যুদ্ধ করি এবং শহীদ হয়ে যাই, তবে আমার স্থান কোথায় হবে?” তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “জান্নাতে।” অতঃপর সে যুদ্ধ করল এবং শহীদ হয়ে গেল। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার নিকট এলেন এবং বললেন, “আল্লাহ তোমার চেহারা উজ্জ্বল করে দিয়েছেন, তোমার সুগন্ধি সুবাসিত করেছেন এবং তোমার সম্পদকে প্রাচুর্যময় করেছেন।” এবং তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই ব্যক্তির সম্পর্কে অথবা অন্য কারো সম্পর্কে বললেন, “আমি তার জান্নাতি স্ত্রী হুরুল ঈনকে দেখেছি, সে তার পশমের তৈরি জুব্বা (পোশাক) ধরে টানছিল এবং তার ও তার জুব্বার মাঝখানে প্রবেশ করছিল।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. حماد: هو ابن سلمة، وثابت: هو ابن أسلم البُناني.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 221 من طريق أبي الأزهر، عن مؤمَّل بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، به. غير أنه قال في روايته: "رأيت زوجتيه من الحور العين تنازعانه جبته عنه تدخلان فيما بين جلده وجبته".وانظر حديث جابر بن عبد الله الآتي برقم (2642).
2495 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن علي بن عبد الحميد الصَّنْعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبّاد الصَّنْعاني، أخبرنا عبد الرزاق.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا سفيان بن سعيد الثَّوري، عن الأعمش، عن زياد بن الحُصَين، عن أبي العاليَة، عن ابن عباس، قال: مَرَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بقومٍ يَرمُون فقال: "رَمْيًا بني إسماعيلَ، فإنَّ أباكُم كان راميًا" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهد صحيح على شرط مسلم أيضًا:
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এমন এক দলের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যারা তীর নিক্ষেপ করছিল। তিনি বললেন, “হে ইসমাঈলের বংশধরগণ, তোমরা তীর নিক্ষেপ করতে থাকো! কারণ তোমাদের পিতা (ইসমাঈল) ছিলেন তীরন্দাজ।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. الأعمش: هو سليمان بن مِهْران، وأبو العالية: هو رُفَيع بن مِهْران. وهو في "مسند أحمد" 5/ (3444).وأخرجه ابن ماجه (2815) عن محمد بن يحيى الذُّهْلي، عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد.وقوله: رَمْيًا، منصوب بفعل مُضمر، تقديره: ارموا رَمْيًا، أو الزمُوا رَمْيًا.قال المناوي في "فيض القدير" 4/ 40: فيه فضل الرمي والمناضلة، والاعتناء بذلك بنيّة التمرن على الجهاد والتدرُّب ورياضة الأعضاء لذلك، وأنَّ الجد الأعلى يُسمّى أبًا، والتنويه بذكر الماهر في صناعته ببيان فضله، وحسن خُلق المصطفى صلى الله عليه وسلم، ومعرفته بأمور الحرب، وفيه الندب إلى اتباع خصال الآباء المحمودة والعمل بمثلها. وابن الأدْرَع المذكور قيل: اسمه مِحْجَن، وقيل: سلمة.والقِسِيّ: جمعٌ للقَوس.
2496 - أخبرَناه أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، حدثنا الحسن بن مُكْرَم، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن عمرو بن علقمة.وأخبرني الحسن بن حَليم المَروَزي - واللفظ له - حدثنا أبو المُوجِّه، حدثنا الحُسين بن حُرَيث، حدثنا الفضل بن موسى، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال: خرج النبيُّ صلى الله عليه وسلم وقومٌ من أسلمَ يَرمُون، فقال: "ارمُوا بني إسماعيلَ، فإنَّ أباكُم كان راميًا، ارمُوا وأنا مع ابن الأدْرَع"، فأمسك القومُ قِسِيَّهم، فقالوا: يا رسولَ الله، مَن كنتَ معه غَلَبَ! قال: "ارمُوا وأنا معكم [1] كُلِّكم" [2].
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং আসলাম গোত্রের কিছু লোক তীর নিক্ষেপ করার জন্য বের হলেন। তিনি বললেন: "হে ইসমাঈলের বংশধরেরা, তোমরা তীর নিক্ষেপ করো। কারণ তোমাদের পিতা (ইসমাঈল) ছিলেন তীরন্দাজ। তোমরা তীর নিক্ষেপ করো, আর আমি ইবনু আল-আদরা'র পক্ষে আছি।" তখন লোকেরা তাদের ধনুক ধরে রাখল (থেমে গেল)। তারা বলল: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি যার পক্ষে থাকবেন, সেই তো বিজয়ী হবে!" তিনি বললেন: "তোমরা তীর নিক্ষেপ করো। আমি তোমাদের সকলের সঙ্গে আছি।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) وهامش (ص): مع. وابن الأدْرَع المذكور قيل: اسمه مِحْجَن، وقيل: سلمة.والقِسِيّ: جمعٌ للقَوس.
[2] إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري.وأخرجه ابن حبان في "صحيحه" (4695) من طريق محمد بن إبراهيم بن أبي عدي، عن محمد بن عمرو، به.وانظر ما بعده. وابن الأدْرَع المذكور قيل: اسمه مِحْجَن، وقيل: سلمة.والقِسِيّ: جمعٌ للقَوس.
2497 - أخبرني أبو عمرو بن إسماعيل، حدثنا محمد بن إسحاق بن خُزيمة، حدثنا محمد بن مِسكين اليَمَامي وإسماعيل بن إسرائيل اللُّؤلؤي، قالا: حدثنا يحيى بن حسّان، حدثنا سليمان بن بلال، عن عبد الرحمن بن حَرْملة، عن محمد بن إياس بن سَلَمة، عن أبيه، عن جده: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مَرَّ على ناسٍ يَنْتَضِلون فقال: "حَسَنٌ هذا اللهوُ [1] - مرتين أو ثلاثًا - ارمُوا وأنا مع ابن الأدْرَع [2] " فأمسكَ القومُ بأيديهم، فقالوا: لا والله لا نَرمي معه وأنت معه يا رسول الله، إذًا يَنْضُلَنا، فقال: "ارمُوا [3] وأنا معكم جميعًا"، وقالا: فقال: لقد رَمَوا عامّةَ يومِهم ذلك، ثم تفرَّقوا على السَّواء، ما نَضَل بعضُهم بعضًا [4].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সালামা ইবনুল আকওয়া’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন একদল লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যারা তীর নিক্ষেপ প্রতিযোগিতা করছিল। তিনি বললেন: "এই বিনোদনটি উত্তম।" (কথাটি দুই অথবা তিন বার বললেন)। তিনি বললেন: "তোমরা তীর নিক্ষেপ করো, আর আমি ইবনুল আদরা’-এর সাথে আছি।" তখন লোকেরা (তীর নিক্ষেপ থেকে) হাত গুটিয়ে নিলো এবং বললো: "হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর শপথ! আমরা তার সাথে তীর নিক্ষেপ করবো না, যখন আপনি তার সাথে আছেন, কারণ এতে সে আমাদের হারিয়ে দেবে।" তিনি বললেন: "তোমরা তীর নিক্ষেপ করো, আমি তোমাদের সকলের সাথেই আছি।" বর্ণনাকারীদ্বয় বলেন: এরপর তারা সেদিন প্রায় সারা দিনই তীর নিক্ষেপ করলো এবং তারা সকলে সমানভাবে শেষ করলো, কেউ কাউকে হারাতে পারেনি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: اللهم، وجاء على الصواب في "دلائل النبوة" للبيهقي 6/ 255 حديث رواه عن الحاكم بسنده، وكذا هو لفظه عند سائر من خرَّج هذا الحديث.
[2] تحرَّف في (ز) و (ص) و (ع) إلى: ابن الأكوع، وجاء على الصواب في (ب) وفي "دلائل النبوة" للبيهقي، وكذا جاء على الصواب في "إتحاف المهرة" للحافظ، (5997)، وفاقًا لحديث أبي هريرة الذي قبله.
2497 [3] - جاء في (ز) و (ص): "إذًا" بدل: "ارموا"، والمثبت هو الموافق لرواية البيهقي في "الدلائل" وغيره من مصادر التخريج.
2497 [4] - حديث صحيح، ومحمد بن إياس بن سلمة - وإن لم يرو عنه غير عبد الرحمن بن حرملة، ولم يذكره غير ابن حبان في "الثقات" - متابع.وأخرجه أحمد 27/ (16528)، والبخاري (2899) و (3373)، و (3507)، وابن حبان (4693) و (4694) من طريق يزيد بن أبي عبيد، عن سلمة بن الأكوع. بنحو لفظ أبي هريرة الذي قبله.
2498 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا العباس بن الوليد بن مَزْيَد البَيْروتي، حدثنا محمد بن شعيب، حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، حدثنا أبو سَلَّام الأسود، عن خالد بن زيد، قال: كنت رامِيًا أُرامي عقبةَ بن عامر، فمرَّ بي ذاتَ يوم، فقال: يا خالد، اخرُج بنا نَرمي، فأبطأتُ عليه، فقال: يا خالد، تعالَ أُحدِّثْك ما حدثني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أو أقول لك كما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الله يُدخِلُ بالسهم الواحد ثلاثة نَفَرٍ الجنةَ: صانِعَه الذي احتَسَبَ في صَنْعتِه الخيرَ، ومُنبِلَه [1]، والراميَ، ارمُوا واركَبوا، وأن تَرمُوا أحبُّ إلي من أن تَركَبوا.وليس من اللهو إلّا ثلاثةٌ: تأديبُ الرجل فرسَه، ومُلاعبتُه زوجتَه، ورميُه بنَبْلِه عن قومِه، ومَن عَلِمَ الرميَ ثم تَركَه فهي نِعمةٌ كَفَرَها" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهد على الاختصار صحيحٌ على شرط مسلم:
উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, খালিদ ইবন যায়িদ বলেন: আমি উকবাহ ইবন আমিরের সাথে তীর নিক্ষেপের প্রতিযোগিতা করতাম। একদিন তিনি আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন এবং বললেন: "হে খালিদ, চলো, আমরা তীর নিক্ষেপ করতে যাই।" আমি যেতে বিলম্ব করলাম। তখন তিনি বললেন: "হে খালিদ, আসো, আমি তোমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বলা একটি কথা শোনাই," অথবা তিনি বললেন: "আমি তোমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথাটি বলি।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ একটি তীরের মাধ্যমে তিন ব্যক্তিকে জান্নাতে প্রবেশ করান: তীরের কারিগর, যে তার নির্মাণে কল্যাণের উদ্দেশ্য রাখে; যে ব্যক্তি তীর সরবরাহ করে (মুনবিল), এবং যে ব্যক্তি তীর নিক্ষেপ করে (তিরন্দাজ)। তোমরা তীর নিক্ষেপ করো এবং আরোহণ করো। তবে আমার কাছে আরোহণ করার চেয়ে তীর নিক্ষেপ করা অধিক প্রিয়। তিনটি বিষয় ছাড়া অন্য সব আনন্দদায়ক কাজই অনর্থক: পুরুষের তার ঘোড়াকে প্রশিক্ষণ দেওয়া, স্ত্রীর সাথে তার হাস্যরস করা, এবং স্বীয় জাতির পক্ষ হয়ে তীর নিক্ষেপ করা। আর যে ব্যক্তি তীর নিক্ষেপ শেখার পর তা ছেড়ে দেয়, সে (আল্লাহর দেওয়া) এক নেয়ামতের অকৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] بتخفيف الموحدة وتشديدها، وهو الذي يناول الرامي النَّبْل، أي: السهام، أو يَردُّه عليه بعد رميه. وأخرجه أحمد (7300)، وابن ماجه (2811)، والترمذي (1732) من طريق هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلّام، عن عبد الله بن زيد الأزرق، عن عقبة بن عامر. ورواية يحيى عن أبي سلّام إنما هي كتاب وليس سماعًا، كما ثبت عنه أنه صرَّح بذلك فيما أسنده عنه يعقوب في "المعرفة" 3/ 10، وإنما سمع كتاب أبي سلّام من حفيده زيد بن سلّام الذي سمع منه يحيى بن أبي كثير.ويؤيده ما أخرجه أحمد (17337) من طريق معمر بن راشد، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلّام، عن عبد الله بن زيد الأزرق، عن عقبة. فصرَّح هنا يحيى بذكر زيد بن سلّام لكنه أسقط ذكر أبي سلّام، وإنما أخذه زيد بن سلّام من جده أبي سلّام، كما أشار إليه البخاري في "تاريخه" 3/ 150 و 5/ 93، وما دامت الواسطة قد عُرفت بين يحيى بن أبي كثير وبين أبي سلّام، فلا يكون ذلك اختلافًا على يحيى، لأنه مرةً كان يرويه من كتاب أبي سلّام على طريق الوجادة، ومرة بواسطة حفيده زيد عنه سماعًا، فصار الرواة لهذا الحديث عن أبي سلّام ثلاثة، وهم عبد الرحمن بن يزيد بن جابر ومعاوية بن سلّام وأخوه زيد، والله أعلم.وأخرج القطعة الأخيرة منه مسلم (1919) من طريق عبد الرحمن بن شماسة، عن عقبة بن عامر، لكن بلفظ: "من علم الرمي ثم تركه فليس منا - أو قد عصى -".ويشهد له دون هذه القطعة حديث أبي هريرة الذي بعده، وإن كان ضعيفًا.كما يشهد له مرسل يحيى بن أبي كثير عند سعيد بن منصور (2451) من طريق حماد بن زيد، عن أيوب، عنه. ورجاله ثقات.ويشهد لقوله: "وليس من اللهو إلّا ثلاثة … " إلى آخره، حديث جابر بن عبد الله أو جابر بن عمير عند النسائي (8938 - 8940)، والبزار كما في "كشف الأستار" (1704)، والطبراني في "الكبير" (1785)، وفي "الأوسط" (8147)، وغيرهم، وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب والترهيب" 2/ 180، وصحَّحه ابن حجر في "الإصابة" 1/ 439 في ترجمة جابر بن عمير.قال البيهقي في "السنن الصغير" (3975): قوله: "ليس من اللهو إلّا ثلاثة" يعني: ليس من اللهو المباح المندوب إليه إلّا ثلاثة، والله أعلم.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن إن شاء الله، خالد بن زيد ذكره يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 501 في ثقات التابعين من أهل مصر، وروى عنه أبو سلّام وإسماعيل بن رافع، وهو نفسه عبد الله بن زيد الأزرق، كما أشار إليه البخاري في "تاريخه الكبير" 3/ 150 و 5/ 93 وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 5/ 58 وغيرهما، وذلك أنَّ عبد الرحمن بن يزيد بن جابر ومعاوية بن سلّام قد رويا هذا الحديث عن أبي سلّام، فسمياه خالد بن يزيد، ورواه يحيى بن أبي كثير عن زيد بن سلّام عن جده أبي سلّام، فسماه عبد الله بن زيد الأزرق، فهما رجل واحدٌ، ومما يؤيد ذلك أنه وقع في كلا الروايتين أنَّ عقبة بن عامر كان يَستتبِعُه للرمي، فدلَّ أنهما واحد اختُلف في اسمه، بل ذهب ابن حبان في "ثقاته" 5/ 15 وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 28/ 312، وتبعهما الذهبي في "تاريخ الإسلام" 3/ 78 إلى أنه القاصّ الراوي عن عوف بن مالك، وبذلك يكون روى عنه جمع غير من ذكرنا، لكن فرق البخاري وتبعه ابن أبي حاتم والمزي بين الأزرق والقاصّ، والله أعلم.على أنَّه قد صحَّح حديثه هذا ابنُ الجارود وابنُ خزيمة وأبو عوانة، وحسَّنه الترمذي، وكنا قد ضعَّفنا إسناد الحديث في "المسند" و"سنن أبي داود"، فليستدرك من هنا.وأخرجه أحمد 28/ (17321) و (17335)، وأبو داود (2513)، والنسائي (4339) و (4404) من طرق عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، بهذا الإسناد.وتابعه معاوية بن سلّام عند الرُّوياني في "مسنده" (248)، وقد أشار إلى روايته هذه البخاري في "تاريخه الكبير" كما سبق. وأخرجه أحمد (7300)، وابن ماجه (2811)، والترمذي (1732) من طريق هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلّام، عن عبد الله بن زيد الأزرق، عن عقبة بن عامر. ورواية يحيى عن أبي سلّام إنما هي كتاب وليس سماعًا، كما ثبت عنه أنه صرَّح بذلك فيما أسنده عنه يعقوب في "المعرفة" 3/ 10، وإنما سمع كتاب أبي سلّام من حفيده زيد بن سلّام الذي سمع منه يحيى بن أبي كثير.ويؤيده ما أخرجه أحمد (17337) من طريق معمر بن راشد، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلّام، عن عبد الله بن زيد الأزرق، عن عقبة. فصرَّح هنا يحيى بذكر زيد بن سلّام لكنه أسقط ذكر أبي سلّام، وإنما أخذه زيد بن سلّام من جده أبي سلّام، كما أشار إليه البخاري في "تاريخه" 3/ 150 و 5/ 93، وما دامت الواسطة قد عُرفت بين يحيى بن أبي كثير وبين أبي سلّام، فلا يكون ذلك اختلافًا على يحيى، لأنه مرةً كان يرويه من كتاب أبي سلّام على طريق الوجادة، ومرة بواسطة حفيده زيد عنه سماعًا، فصار الرواة لهذا الحديث عن أبي سلّام ثلاثة، وهم عبد الرحمن بن يزيد بن جابر ومعاوية بن سلّام وأخوه زيد، والله أعلم.وأخرج القطعة الأخيرة منه مسلم (1919) من طريق عبد الرحمن بن شماسة، عن عقبة بن عامر، لكن بلفظ: "من علم الرمي ثم تركه فليس منا - أو قد عصى -".ويشهد له دون هذه القطعة حديث أبي هريرة الذي بعده، وإن كان ضعيفًا.كما يشهد له مرسل يحيى بن أبي كثير عند سعيد بن منصور (2451) من طريق حماد بن زيد، عن أيوب، عنه. ورجاله ثقات.ويشهد لقوله: "وليس من اللهو إلّا ثلاثة … " إلى آخره، حديث جابر بن عبد الله أو جابر بن عمير عند النسائي (8938 - 8940)، والبزار كما في "كشف الأستار" (1704)، والطبراني في "الكبير" (1785)، وفي "الأوسط" (8147)، وغيرهم، وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب والترهيب" 2/ 180، وصحَّحه ابن حجر في "الإصابة" 1/ 439 في ترجمة جابر بن عمير.قال البيهقي في "السنن الصغير" (3975): قوله: "ليس من اللهو إلّا ثلاثة" يعني: ليس من اللهو المباح المندوب إليه إلّا ثلاثة، والله أعلم.
2499 - حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني، حدثنا الحسن بن علي بن بحرٍ البَرِّيّ، حدثنا أبي، حدثنا سُويد بن عبد العزيز، حدثنا محمد بن عجلان، عن سعيد المقبُري، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "كلُّ شيءٍ من لهو الدنيا باطلٌ إلّا ثلاثةً: انتضالُك بقوسِك، وتأديبُك فرسَك، ومُلاعَبَتُك أهلَكَ، فإنها من الحق".وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "انتَضِلُوا واركَبُوا، وأن تَنتَضِلُوا أحبُّ إليَّ، إنَّ الله ليُدخِلُ بالسَّهمِ الواحدِ ثلاثةً الجنةَ: صانعَه يحتَسِبُ فيه الخيرَ، والمُتنبِّلَ به، والراميَ [1] " [2].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুনিয়ার সকল প্রকার খেলাধুলা বাতিলামূলক (নিষিদ্ধ), তবে তিনটি ব্যতীত: তোমার ধনুক দ্বারা তীর নিক্ষেপ, তোমার ঘোড়াকে প্রশিক্ষণ দেওয়া এবং তোমার স্ত্রীর (পরিবারের) সাথে হাস্যরস ও খেলাধুলা করা। কারণ এগুলো হকের (সত্য/সঠিক কাজের) অন্তর্ভুক্ত।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরো বলেছেন: "তোমরা তীর নিক্ষেপ অনুশীলন করো এবং আরোহণ (ঘোড়া চালনা) করো। আর তোমাদের তীর নিক্ষেপ অনুশীলন করা আমার নিকট অধিক প্রিয়। নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা একটি মাত্র তীরের বদৌলতে তিন ব্যক্তিকে জান্নাতে প্রবেশ করান: তার নির্মাতা যে তা নির্মাণে কল্যাণের নিয়ত করে, যে ব্যক্তি তা সরবরাহ করে, এবং নিক্ষেপকারী।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز): والممسك به والرامي، وفي المطبوع: والمتنبّل والرامي به، بتأخير لفظة "به".والمتنبّل: الذي يحمل النَّبْل، وهي السِّهام. عن عنبسة بن مهران الحداد، عن الزُّهْري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة. ويحيى وشيخه ضعيفان.وأخرجها كذلك القرَّاب في "فضل الرمي" (1)، ومن طريقه الذهبي في "معجم شيوخه الكبير" 1/ 410 من طريق مالك بن سليمان الهروي، عن إبراهيم بن طهمان، عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة. ومالك هذا ضعيف الحديث، وفي الإسناد إليه رجلٌ مجهول، وفيه اختلاف على إبراهيم بن طهمان فقد تقدم عنه من طريق أخرى وذاك أصح، والله أعلم.والانتضال: هو الرميُ للسَّبْق.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف سويد بن عبد العزيز، وقد أخطأ سويد فيه كما نبَّه عليه أبو حاتم وأبو زرعة الرّازيّان، فيما نقله عنهما ابن أبي حاتم في "العلل" (905)، فقالا: إنما هو عن ابن عجلان عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حُسين، قال: بلغني أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال … كذا رواه الليث وحاتم بن إسماعيل وجماعة، وهو الصحيح مرسَلٌ.قلنا: وإذا صحَّ أنه مرسلٌ وأنَّ رجاله ثقات فإنه ينجبِر بحديثِ عقبة بن عامر الذي قبله، وبما ذكرناه من شواهد، فيصحّ، والله تعالى أعلم.وله طرق أخرى عن أبي هريرة كما سيأتي، لكن لا يُفرح بشيء منها.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (5309) من طريق الحكم بن موسى، عن سويد، بهذا الإسناد.وأخرج منه القطعة الأولى ابنُ أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (554)، وفي "مداراة الناس" (161) عن سويد بن سعيد، عن سويد بن عبد العزيز، به.وأخرجه دون القطعة الثانية منه في الانتضال والركوب: إسحاق القرّاب في "فضل الرمي" (12) من طريق عمر بن صبح، عن مقاتل بن حيان، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة. لكن عمر بن صبح هذا متروك واتهمه بعضهم.وأخرج منه القطعة الأخيرة أبو نعيم الأصبهاني في "رياضة الأبدان" (17)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 4/ 215 من طريق إبراهيم بن طهمان، عن أبي زهدم، عن مظاهر بن محمد، عن سعيد، عن أبي هريرة. وتحرَّف في مطبوع أبي نعيم إلى: مظاهر عن محمد بن سعيد، ومظاهر هذا هو ابن أسلم، وهو ضعيف، والراوي عنه لا يُعرف.وأخرجها أيضًا الطبراني في "الأوسط" (4994)، والخطيب 7/ 392 من طريق يحيى بن المتوكل، عن عنبسة بن مهران الحداد، عن الزُّهْري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة. ويحيى وشيخه ضعيفان.وأخرجها كذلك القرَّاب في "فضل الرمي" (1)، ومن طريقه الذهبي في "معجم شيوخه الكبير" 1/ 410 من طريق مالك بن سليمان الهروي، عن إبراهيم بن طهمان، عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة. ومالك هذا ضعيف الحديث، وفي الإسناد إليه رجلٌ مجهول، وفيه اختلاف على إبراهيم بن طهمان فقد تقدم عنه من طريق أخرى وذاك أصح، والله أعلم.والانتضال: هو الرميُ للسَّبْق.
2500 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمّاك ببغداد، حدثنا عبد الرحمن بن منصور الحارِثي، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قَتَادة، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن مَعْدان بن أبي طلحة اليَعْمَري، عن أبي نَجيح السُّلَمي - وهو عمرو بن عَبَسَة - قال: حاصَرْنا قصرَ الطائف، فسمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن رَمَى بسهمٍ في سبيلِ الله، فله عَدْلُ محرَّرٍ"، قال: فبَلَّغتُ يومئذ ستةَ عشرَ سهمًا [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وله شاهد عن عمرو بن عَبَسة:
আমর ইবনু আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা তায়েফের দুর্গে অবরোধ সৃষ্টি করেছিলাম, তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় একটি তীর নিক্ষেপ করবে, তার জন্য একজন গোলাম আযাদ করার সমপরিমাণ প্রতিদান রয়েছে।" তিনি (আমর ইবনু আবাসা) বলেন, সেদিন আমি ষোলোটি তীর নিক্ষেপ করেছিলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. هشام: هو ابن أبي عبد الله الدَّستُوائي.وأخرجه الترمذي (1638) عن محمد بن بشار، عن معاذ بن هشام، بهذا الإسناد. وقال: حسن صحيح.وأخرجه ضمن حديث مطوَّل أحمد 28/ (17022) و 32/ (19428)، والنسائي (1336) من طرق عن هشام، به.وأخرجه أحمد 28/ (17020)، والنسائي (4335) و (4338) من طريق شُرَحبيل بن السِّمْط، وأحمد 28/ (17023) و 32/ (19438) من طريق شهر بن حوشب، عن أبي ظَبْية الكَلاعي، وأحمد 28/ (17024) من طريق رجل، عن عبد الرحمن بن عُسَيلة الصُّنابحي، و 32/ (19437) من طريق الفرج بن فضالة، عن لقمان بن عامر، عن أبي أُمامة، أربعتهم عن عمرو بن عَبَسةَ. وهذه الأسانيد الأربعة فيها مقال كلها، وزاد بعضهم في روايته: "بسهم فأصاب أو أخطأ"، وزاد بعضهم: "رقبة من ولد إسماعيل"، ولا تصح هذه الزيادة الأخيرة.وسيتكرر ضمن حديث مطول برقم (4419).وسيأتي بعده من طريق القاسم أبي عبد الرحمن عن عمرو بن عَبَسة.وبرقم (2592) من طريق أبي قدامة ومحمد بن المثنى عن معاذ بن هشام.