হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2521)


2521 - أخبرنا الحسن بن حَليم المروَزي، حدثنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا حَيوة بن شُريح، حدثني شُرَحْبيل بن شَريك، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "خيرُ الأصحابِ عند الله خيرُهم لصاحبه، وخيرُ الجِيران عند الله خيرُهم لجارِه" [1]هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর নিকট উত্তম সঙ্গী হলো সে, যে তার সঙ্গীর জন্য উত্তম। আর আল্লাহর নিকট উত্তম প্রতিবেশী হলো সে, যে তার প্রতিবেশীর জন্য উত্তম।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل شرحبيل بن شريك، فهو صدوق لا بأس به. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعَبْدان: هو عبد الله بن عثمان بن جَبَلة، وعبدان لقبه، وعبد الله: هو ابن المبارك، وأبو عبد الرحمن الحُبُلي: هو عبد الله بن يزيد المَعافِري.وأخرجه الترمذي (1944)، وابن حبان (518) و (519) من طرق عن عبد الله بن المبارك، بهذا الإسناد. وحسَّنه الترمذي.وسيتكرر برقم (7482)، وتقدَّم برقم (1637) من طريق عبد الله بن يزيد المقرئ عن حيوة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2522)


2522 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعْدي، أخبرنا رَوح بن عُبادة، أخبرنا ابن جُرَيج، أخبرني جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، قال: شكا ناسٌ إلى النبي صلى الله عليه وسلم المَشْيَ فدعا بهم، وقال: "عليكم بالنَّسَلانِ"، فنَسَلْنا فوجَدْناه أخَفَّ علينا [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে হাঁটার কষ্ট সম্পর্কে অভিযোগ করল। তখন তিনি তাদেরকে ডাকলেন এবং বললেন, "তোমরা 'নাসালান' (দ্রুত হালকা পদক্ষেপ) অবলম্বন করো।" অতঃপর আমরা 'নাসালান' করলাম এবং আমরা এটিকে আমাদের জন্য হালকা পেলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ابن جُرَيج هو عبد الملك بن عبد العزيز المكي، وجعفر بن محمد: هو ابن علي بن الحسين بن علي بن أبي طالب.وأخرجه البيهقي 5/ 256 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم برقم (1636) من طريق الحارث بن أبي أسامة عن روح بن عُبادة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2523)


2523 - أخبرنا أبو عمرو بن إسماعيل، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا محمد ابن أبي صفوان الثقفي، حدثنا عبد السلام بن هاشم، حدثنا عثمان بن سعد الكاتب، عن أنس بن مالك قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم ينزل منزلًا إلّا وَدَّعَه بركعتين [1].هذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه، وعثمان بن سعد ممّن يُجمع حديثُه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো স্থানে অবস্থান করার পর বিদায় গ্রহণের সময় দুই রাকাত সালাত (নামাজ) দ্বারা সেই স্থানকে বিদায় না জানিয়ে যেতেন না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف عثمان بن سعد وعبد السلام بن هاشم، بل أتَّهم أبو حفص عمرو بن علي الفلّاس هذا الثاني بالكذب، غير أنه قد توبع، فيبقى الشأن في شيخه عثمان بن سعد.وقد تقدَّم برقم (1203) عن أبي إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى عن محمد بن إسحاق بن خزيمة، وبرقم (1652) من طريق أبي عاصم الضحاك عن عثمان بن سعد.وقوله: ودعه، إما أن يكون بفتح الدال مخففة من وَدَعَ، أي: ترك، وإما أن يكون بفتح الدال مشددة من التوديع، كما قيل للطواف الذي يطوفه من كان آخر عهده بالبيت الحرام: طواف الوداع.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2524)


2524 - حدثنا الشيخ أبو بكر أحمد بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا بشر بن المفضَّل، حدثنا عاصم بن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر بن الخطاب، قال: سمعت أبي يقول: قال ابن عمر قال نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم: "لو يَعلمُ الناسُ ما في الوَحْدةِ ما أعلَمُ، إنْ [1] يسيرُ الراكبُ بليلٍ وحدَه أبدًا" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি মানুষ একাকী থাকার মধ্যে কী (বিপদ) আছে, তা জানতো, যা আমি জানি, তবে কোনো আরোহীই রাতে কখনো একা ভ্রমণ করতো না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] "إن" نافية، كما في قوله تعالى: {إِنْ أَدْرِي أَقَرِيبٌ مَا تُوعَدُونَ} [الجن: 25].



[2] إسناده صحيح أبو المثنَّى: هو معاذ بن المثنى بن معاذ العَنْبري.وأخرجه أحمد 8/ (4748) و (4770) و 9 / (5252) و (5581) و 10 / (6014)، والبخاري (2998)، وابن ماجه (3768)، والترمذي (1673)، والنسائي (8800)، وابن حبان (2704) من طرق عن عاصم بن محمد، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 10 / (5908) عن مؤمَّل بن إسماعيل، والنسائي (8799) من طريق محمد بن ربيعة الكلابي، كلاهما عن عمر بن محمد بن زيد العمري - وهو أخو عاصم المذكور هنا - عن أبيه، به.وقد بيَّن ابن المنيِّر وجه هذا الحديث فيما نقله عنه الحافظ في "الفتح" 9/ 253 معلقًا على حديث جابر بن عبد الله في انتداب الزبير يوم الخندق، حديث أورده البخاري قبل حديث ابن عمر هذا، فقال: يؤخذ من حديث جابر جواز السفر منفردًا للضرورة والمصلحة التي لا تنتظم إلَّا بالانفراد، كإرسال الجاسوس والطليعة، والكراهة لما عدا ذلك، ويحتمل أن تكون حالة الجواز مقيدة بالحاجة عند الأمن، وحالة المنع مقيدة بالخوف حيث لا ضرورة، وقد وقع في كتب المغازي بعْثُ كل من حذيفة ونُعيم بن مسعود وعبد الله بن أُنيس، وخوَّات بن جبير وعمرو بن أمية، وسالم بن عمير وبُسَيسة في عدة مواطن، وبعضها في الصحيح. قلنا: قصّة حذيفة عند مسلم (1788)، وكذا قصة بُسَيسة عنده كذلك (1901). والخَلْوة: السفر منفردًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2525)


2525 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العنبري وأبو بكر محمد بن جعفر المزكِّي، قالا: حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم العبدي، حدثنا عبد الله بن محمد النُّفَيلي، حدثنا عُبيد الله بن عمرو الرَّقِّي، عن عبد الكريم، عن عِكْرمة، عن ابن عباس، قال: خرج رجلٌ من خيبَرَ فتبعه رجلان ورجلٌ يَتلُوهما، يقول: ارجِعا، حتى أَدْرَكَهُما فرَدَّهما، ثم قال: إنَّ هذّين شيطانان، فاقرأْ على رسولِ الله صلى الله عليه وسلم السلامَ، وأعلِمْه أنّا في جَمْع صدقاتنا لو كانت تصلُح له لبَعثْنا بها إليه، قال: فلما قَدِمَ على النبي صلى الله عليه وسلم حدَّثه، فنهى عند ذلك عن الخَلْوة [1]. هذا حديث صحيح الإسناد على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খাইবার থেকে এক ব্যক্তি বের হলেন। তার পিছু নিল দুজন লোক। আর একজন লোক তাদের অনুসরণ করছিল, সে বলছিল: তোমরা ফিরে যাও। অবশেষে সে তাদের ধরে ফেলল এবং তাদের ফিরিয়ে দিল। এরপর সে বলল: এই দুজন শয়তান। তোমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আমার সালাম পৌঁছে দিও এবং তাঁকে জানিও যে, আমরা আমাদের সাদাকা (যাকাত) সংগ্রহ করছি। যদি তা তাঁর জন্য (গ্রহণ করা) হালাল হতো, তবে আমরা তা তাঁর নিকট পাঠিয়ে দিতাম। বর্ণনাকারী বলেন: যখন সে (ব্যক্তিটি) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছাল, তখন তাঁকে ঘটনাটি জানাল। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্জনবাস থেকে নিষেধ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح عبد الكريم: هو ابن مالك الجَزَري، وعكرمة: هو مولى ابن عباس.وأخرجه أحمد 4 / (2510) عن عبد الجبار بن محمد الخطابي، و 4 / (2719) عن زكريا بن عدي، كلاهما عن عبيد الله بن عمرو الرقي، بهذا الإسناد. والخَلْوة: السفر منفردًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2526)


2526 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، حدثنا محمد بن إسماعيل بن أبي فُدَيك، حدثني عبد الرحمن بن حَرْملة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أنَّ رجلًا قَدِمَ من سفر، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن صَحِبت؟ " فقال: ما صحبتُ أحدًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الراكبُ شيطانٌ، والراكبان شيطانان، والثلاثةُ رَكْبٌ" [1].وشاهدُه حديث أبي هريرة صحيح على شرط مسلم:




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি সফর থেকে আগমন করলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কার সাথে ছিলে?" তখন সে বলল: আমি তো কারো সাথে ছিলাম না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "একাকী আরোহী শয়তান, দু'জন আরোহী শয়তানদ্বয়, আর তিন জন হলে তবেই কাফেলা।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن، شُعيب -وهو ابن محمد بن عبد الله بن عمرو بن العاص- وعبد الرحمن بن - حرملة صدوقان حسنا الحديث.وأخرجه أحمد 11/ (6748) من طريق مسلم بن خالد، و (7007) من طريق إسماعيل بن عياش وأبو داود (2607)، والترمذي (1674)، والنسائي (8798) من طريق مالك بن أنس، ثلاثتهم عن عبد الرحمن بن حرملة، بهذا الإسناد. وحسَّنه الترمذي.قال الخطابي في "المعالم" 2/ 260: معناه - والله أعلم - أنَّ التفرد والذهاب وحده في الأرض من فعل الشيطان أو هو شيء يحمله عليه الشيطان ويدعوه إليه، فقيل على هذا: إنَّ فاعله شيطان، ويقال: إنَّ اسم الشيطان مشتق من الشطون، وهو البعد والنزوح، فيحتمل على هذا أن يكون المراد أن الممعن في الأرض وحده مضاهٍ للشيطان في فعله، وكذلك الاثنان ليس معهما ثالث. قال: فإذا صاروا ثلاثة فهم رَكْبٌ، أي: جماعة وصَحْب. تابع فيه المغيرةَ بنَ عبد الرحمن القاسمُ بنُ عبد الله بن عمر العمري، لكنه رجل متروك الحديث واتهمه بعضهم فلا يُعتدُّ بمتابعته، فتُقدَّم رواية يحيى بن سعيد القطان الحافظ على روايتهما، لأنَّ المغيرة بن عبد الرحمن هذا قال عنه ابن حبان في "مشاهير علماء الأمصار" (1053): كان يهم في الشيء بعد الشيء، ولعلَّ القاسمَ العمريَّ سَرَقَ هذا الحديث منه، والله أعلم.وأخرجه تمام في "فوائده" (953) من طريق القاسم بن عبد الله العمري، عن محمد بن عجلان، بهذا الإسناد.وأخرج البزار (7834)، وابن عبد البر في "التمهيد" 20/ 8 من طريق عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، عن عبد الرحمن بن حرملة، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الشيطان يهمُّ بالواحد والاثنين، فإذا كانوا ثلاثة لم يهتم بهم"، وهذا أيضًا معلول كما بينه الدارقطني في "العلل" (1714)، وذلك لأنَّ مالكًا خالف فيه ابن أبي الزناد، ولا شكَّ بتقدُّم مالكٍ في الجلالة والثقة، فرواه في "موطئه" 2/ 978 عن عبد الرحمن بن حرملة، عن سعيد بن المسيب، مرسلًا، دون خلاف عن مالك فيه كما قال ابن عبد البر.وعبد العزيز الراوي عن ابن أبي الزِّناد: هو ابن محمد، كذلك سماه قاسمُ بن أصبغ عند ابن عبد البر، وأبو الفضل سفيان بن محمد الجوهري كما في "المنتقى من مسموعات مرو" للضياء (833). وعبد العزيز بن محمد هذا هو ابن زكريا بن ميمون الأزدي الكوفي، قال عنه الدارقطني في "العلل" (2713): لا بأس به، وليس هو عبد العزيز بن عبد الله بن الأصم، كما وقع مقيدًا عند البزار في "مسنده". وإنما ذكرنا ذلك ليُعرف أنَّ الوهم فيه من ابن أبي الزِّناد لا ممّن دونه، فإنَّ ابن القطان الفاسي في "بيان الوهم" 4/ 405 و 408 قال عن عبد العزيز المذكور: لا تُعرف حاله، ولم أجد له ذكرًا في غير هذا الإسناد، وجزم بأنَّ العلة فيه جهالة عبد العزيز، وليس الأمر كما قال، لأنَّ الدارقطني عَرَفه وقوّى أمره كما قدَّمنا، وجزم بأنه عبد العزيز بن محمد الأزدي الكوفي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2527)


2527 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل، حدثنا جدي، حدثنا إبراهيم ابن حمزة، حدثنا المغيرة بن عبد الرحمن المخزومي، حدثنا ابن عَجْلان، عن أبي الزِّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "الواحِدُ شيطانٌ، والاثنانِ شيطانان، والثلاثة رَكْبٌ" [1].




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক জন শয়তান, আর দুজন হল দুই শয়তান, আর তিনজন হল একটি কাফেলা (দল)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكنه معلول، فقد خالف فيه المغيرة بن عبد الرحمن المخزوميَّ يحيى بنُ سعيد القطانُ، فرواه عن محمد بن عجلان، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، يعني أنه من حديث عبد الله بن عمرو بن العاص الذي تقدمت روايته عند المصنف قبل هذا، وقد تابع فيه المغيرةَ بنَ عبد الرحمن القاسمُ بنُ عبد الله بن عمر العمري، لكنه رجل متروك الحديث واتهمه بعضهم فلا يُعتدُّ بمتابعته، فتُقدَّم رواية يحيى بن سعيد القطان الحافظ على روايتهما، لأنَّ المغيرة بن عبد الرحمن هذا قال عنه ابن حبان في "مشاهير علماء الأمصار" (1053): كان يهم في الشيء بعد الشيء، ولعلَّ القاسمَ العمريَّ سَرَقَ هذا الحديث منه، والله أعلم.وأخرجه تمام في "فوائده" (953) من طريق القاسم بن عبد الله العمري، عن محمد بن عجلان، بهذا الإسناد.وأخرج البزار (7834)، وابن عبد البر في "التمهيد" 20/ 8 من طريق عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، عن عبد الرحمن بن حرملة، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الشيطان يهمُّ بالواحد والاثنين، فإذا كانوا ثلاثة لم يهتم بهم"، وهذا أيضًا معلول كما بينه الدارقطني في "العلل" (1714)، وذلك لأنَّ مالكًا خالف فيه ابن أبي الزناد، ولا شكَّ بتقدُّم مالكٍ في الجلالة والثقة، فرواه في "موطئه" 2/ 978 عن عبد الرحمن بن حرملة، عن سعيد بن المسيب، مرسلًا، دون خلاف عن مالك فيه كما قال ابن عبد البر.وعبد العزيز الراوي عن ابن أبي الزِّناد: هو ابن محمد، كذلك سماه قاسمُ بن أصبغ عند ابن عبد البر، وأبو الفضل سفيان بن محمد الجوهري كما في "المنتقى من مسموعات مرو" للضياء (833). وعبد العزيز بن محمد هذا هو ابن زكريا بن ميمون الأزدي الكوفي، قال عنه الدارقطني في "العلل" (2713): لا بأس به، وليس هو عبد العزيز بن عبد الله بن الأصم، كما وقع مقيدًا عند البزار في "مسنده". وإنما ذكرنا ذلك ليُعرف أنَّ الوهم فيه من ابن أبي الزِّناد لا ممّن دونه، فإنَّ ابن القطان الفاسي في "بيان الوهم" 4/ 405 و 408 قال عن عبد العزيز المذكور: لا تُعرف حاله، ولم أجد له ذكرًا في غير هذا الإسناد، وجزم بأنَّ العلة فيه جهالة عبد العزيز، وليس الأمر كما قال، لأنَّ الدارقطني عَرَفه وقوّى أمره كما قدَّمنا، وجزم بأنه عبد العزيز بن محمد الأزدي الكوفي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2528)


2528 - حدثنا جعفر بن محمد بن نصير الخُلْدي، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا الأسود بن عامر، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن قَتَادة، عن عِكرمة، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن الشُّرب من فِيْ السقاء، وعن رُكوب الجَلَّالة والمُجثَّمة [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه [2].وشاهدُه حديث عبد الله بن عمرو بزيادة ألفاظ فيه:




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মশকের মুখ থেকে সরাসরি পান করতে, জালালাহ (নাপাকভোজী) পশুর ওপর আরোহণ করতে এবং মুজাছছামাহ (নিশানা বানিয়ে হত্যা করা পশু) ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وقد تقدَّم برقم (1645) من طريق موسى بن إسماعيل والحجاج بن منهال عن حماد بن سلمة.وبرقم (2278) من طريق سعيد بن أبي عروبة عن قتادة. وانظر تمام فوائده ومعانيه فيما تقدم هناك.



[2] قد أخرج البخاري منه ذكر النهي عن الشرب من في السِّقاء برقم (5629) من طريق خالد الحذاء، عن عكرمة، عن ابن عباس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2529)


2529 - حدَّثَناه بكر بن محمد الصَّيرفي، حدثنا أحمد بن عبيد الله بن إدريس، حدثنا أحمد بن إسحاق الحضرمي، حدثنا، وَهْيب، حدثنا عبد الله بن طاووس، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدِّه عبد الله بن عمرو: أَنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نَهَى يوم خيبرَ عن لحوم الحُمُر الأهليّة، وعن الجَلَّالة وعن ركُوبِها وأكلِ لحومِها" [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের দিন গৃহপালিত গাধার গোশত, এবং জালাল্লাহ (নোংরা ভক্ষণকারী প্রাণী) থেকে নিষেধ করেছেন, এবং সেগুলোর উপর আরোহণ করতে ও সেগুলোর গোশত খেতেও নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن. وُهَيب: هو ابن خالد.وأخرجه أحمد 11 / (7039)، وأبو داود (3811)، والنسائي (4521)، من طريقين عن وُهَيب ابن خالد، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم من طريق عبد الله بن باباه عن عبد الله بن عمرو برقم (2300) ذكر النهي عن الجلالة أن يؤكل لحمها ويُشرَب لبنُها، وأن يُحمل عليها وأن تركب، لكن في الإسناد إليه راو ضعيف.على أنَّ هذه المعاني جميعًا قد صحَّت من غير حديث عبد الله بن عمرو كما بيناه عند حديث ابن عباس المتقدم برقم (2278).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2530)


2530 - أخبرني عبد الله بن محمد بن موسى، حدثنا محمد بن أيوب، حدثنا إبراهيم بن موسى ويحيى بن المغيرة، قالا حدثنا جَرير عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس قال: لمّا أنزل الله عز وجل {وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ} [الأنعام: 152]، {إِنَّ الَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَالَ الْيَتَامَى ظُلْمًا} إلى قوله: {سَعِيرًا} [النساء: 9]، قال: انطَلَق مَن كان عندَه يتيمٌ فعَزَلَ طعامَه من طعامِه، وشَرابَه من شرابِه، يَفصِلُ الشيءَ من طعامه فيُحبَس له حتى يأكُلَه، أو يَفْسُدَ فيُرمَى به، فاشتدَّ ذلك عليهم، فذَكَروا ذلك لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فأنزل الله عز وجل: {وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْيَتَامَى قُلْ إِصْلَاحٌ لَهُمْ خَيْرٌ وَإِنْ تُخَالِطُوهُمْ فَإِخْوَانُكُمْ} إلى {عَزِيزٌ حَكِيمٌ} [البقرة:220]، فخَلَطُوا طعامَهم بطعامِهم، وشرابَهم بشرابِهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وإنما خرَّجه أئمتنا في الرُّخصة في المُناهَدة [2] في الغزو. وشاهدُه المفسَّر حديثُ وحشيّ بن حَرْب:




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আল্লাহ্ তা'আলা এই আয়াতগুলো নাযিল করলেন: "আর তোমরা ইয়াতীমের সম্পদের নিকটবর্তী হবে না, তবে উত্তম পন্থায় ব্যতীত" [সূরা আল-আন'আম: ১৫২] এবং "নিশ্চয় যারা ইয়াতীমদের সম্পদ অন্যায়ভাবে খায়..." [সূরা আন-নিসা: ৯] তাঁর বাণী "অতীতে থাকবে" (সায়ীরান) পর্যন্ত। তিনি বলেন: যার কাছে ইয়াতীম ছিল, তারা ইয়াতীমের খাবার নিজেদের খাবার থেকে এবং পানীয় নিজেদের পানীয় থেকে পৃথক করে নিল। তারা তাদের খাবার থেকে ইয়াতীমের অংশ আলাদা করে রাখত যাতে সে তা খেতে পারে, অথবা তা নষ্ট হয়ে গেলে ফেলে দেওয়া হতো। এটা তাদের জন্য খুব কঠিন হয়ে গেল। তারা রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বিষয়টি উল্লেখ করল। তখন আল্লাহ্ তা'আলা নাযিল করলেন: "আর তারা তোমাকে ইয়াতীমদের ব্যাপারে জিজ্ঞাসা করে। বল, তাদের জন্য সুব্যবস্থা করা উত্তম। আর যদি তোমরা তাদের সাথে মিশে যাও, তবে তারা তোমাদের ভাই।" [সূরা আল-বাকারা: ২২০] তাঁর বাণী "মহাপরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময়" (আযীযুন হাকীম) পর্যন্ত। এরপর তারা তাদের খাবার ইয়াতীমদের খাবারের সাথে এবং তাদের পানীয় ইয়াতীমদের পানীয়ের সাথে মিশিয়ে দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن عطاء بن السائب اختلط، وجرير -وهو ابن عبد الحميد- ممّن سمع منه بعد اختلاطه، وقد تابعه جماعة لم يتميز سماع أحدهم من عطاء بن السائب، أكان قبل الاختلاط أم بعده وخالفهم حماد بن سلمة، وهو ممّن جزم غيرُ واحدٍ من الأئمة بسماعه من عطاء قبل اختلاطه، فرواه عن عطاء بن السائب عن سعيد بن جبير من قوله لم يذكر فيه ابن عباس، وتابعه على ذلك عمرو بن أبي قيس الرازي عن عطاء، وكذلك رواه سالم الأفطس عن سعيد بن جبير من قوله، فهذا أشبه والله أعلم، على أنه روي عن ابن عباس من وجه آخر حسن في المتابعات، كما سيأتي بيانه.وأخرجه أبو داود (2871) عن عثمان بن أبي شيبة، عن جرير بن عبد الحميد، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (6463) من طريق أبي كُدينة يحيى بن المهلّب، و (6464) من طريق عمران ابن عُيينة، كلاهما عن عطاء بن السائب به.وسيأتي من طريق جرير برقم (3223) و (3278)، ومن طريق إسرائيل عن عطاء برقم (3140). وخالفهم حماد بن سلمة عند ابن المنذر في "تفسيره" (1431) فرواه عن عطاء بن السائب عن سعيد بن جبير مقطوعًا من قوله.ووافقه سالم الأفطس عند أبي حذيفة النهدي في "تفسير سفيان الثَّوري" (203)، فرواه عن سعيد بن جبير من قوله كذلك.وقد روي عن ابن عباس من وجه آخر عند أبي عبيد القاسم في "الناسخ والمنسوخ" (437)، والطبري 2/ 371، والطبراني في "الكبير" (13020) من طريق عبد الله بن صالح، عن معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عباس. قال ابن حجر في "الأمالي المطلقة" ص 62: قالوا: لم يسمع علي بن أبي طلحة من ابن عباس، وإنما أخذ التفسير عن مجاهد وسعيد بن جبير عنه.قلت (القائل ابن حجر) بعد أن عُرفت الواسطة، وهي معروفة بالثقة، حصل الوثوق به، وقد اعتدَّ البخاري في أكثر ما يجزم به معلَّقًا عن ابن عباس في التفسير على نسخة معاوية بن صالح عن علي بن أبي طلحة. هذا قلنا: وعبد الله بن صالح حسن الحديث في المتابعات والشواهد.وانظر ما كتبناه على هذا الخبر في تحقيقنا على "سنن أبي داود".



[2] المُناهَدة: المُناهضة، بأن يُنهَض لقتال العدوّ، والصمود له.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2531)


2531 - أخبرنا أبو محمد عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلّاب، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي، حدثنا الوليد بن مسلم، عن وَحْشيّ بن حرب بن وحشي، عن أبيه، عن جدِّه وَحْشي بن حرب: أنَّ رجلًا قال: يا رسول الله، إنا نأكُلُ وما نَشبَعُ! قال: "فلعلَّكم تَفترِقُون عن طعامكم، اجتَمِعُوا عليه، واذكروا اسمَ الله، يُبارك لكم" [1].




ওয়াহশী ইবনু হারব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমরা খাবার খাই, কিন্তু পরিতৃপ্ত হই না! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সম্ভবত তোমরা তোমাদের খাবার থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে (আলাদা আলাদা) খাও। তোমরা এর উপর একত্রিত হও (একসাথে খাও) এবং আল্লাহর নাম স্মরণ করো (বিসমিল্লাহ বলো), তাহলে তোমাদের জন্য তাতে বরকত হবে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد فيه لين من أجل وحشي بن حرب بن وحشي، وقد حسنه الحافظ العراقي في "تخريج أحاديث الإحياء" 2/ 5.وأخرجه أحمد 25 / (16078)، وأبو داود (3764)، وابن ماجه (3286)، وابن حبان (5224) من طرق عن الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث جابر بن عبد الله عند أبي يعلى (2045)، والطبراني في "الأوسط" (7317)، وفي "مكارم الأخلاق" (161)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (9174) و (9175)، بلفظ: "أحب الطعام إلى الله ما كثرت عليه الأيدي"، ورجاله ثقات.وحديث عمر بن الخطاب عند ابن ماجه (3287) بلفظ: "كلوا جميعًا ولا تتفرقوا، فإنَّ البركة مع الجماعة". وإسناده ضعيف.وانظر تمام شواهده في "مسند أحمد". وأخرجه أحمد 18/ 11721) من طريق عبد الله بن لَهِيعة، عن دَرَّاج، به.وقوله: "قد هجرت من الشرك يُفسِّره قوله صلى الله عليه وسلم في حديث عبد الله بن عمرو عند البخاري (10):المهاجر من هَجَرَ ما نهى اللهُ عنه".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2532)


2532 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن دَرّاج أبي السَّمْح، عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد الخُدْري: أنَّ رجلًا هاجَرَ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم من اليمن، فقال: يا رسول الله، إني هاجَرْتُ، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: قد هَجَرْتَ من الشِّرك، ولكنه الجهادُ، هل لك أحدٌ باليمن؟ " قال: أبَوان، قال: "أَذِنا لك؟ " قال: لا، قال: "فارجِعْ فاستأذِنُهُما، فإن أَذِنا لك فجِاهْد، وإلّا فبِرَّهما" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، إنما اتفقا على حديث عبد الله بن عمرو: "ففيهما فجاهِدْ" [2].




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়ামান থেকে এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট হিজরত করে এলো। সে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমি হিজরত করেছি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: তুমি শির্ক থেকে দূরে সরে এসেছ (ত্যাগ করেছ), তবে এটি জিহাদ। ইয়ামানে কি তোমার কেউ আছে? সে বলল: আমার পিতা-মাতা আছেন। তিনি বললেন: তারা কি তোমাকে অনুমতি দিয়েছেন? সে বলল: না। তিনি বললেন: তবে তুমি ফিরে যাও এবং তাদের উভয়ের কাছে অনুমতি চাও। যদি তারা তোমাকে অনুমতি দেন, তবে জিহাদ করো। অন্যথায়, তাদের সেবা করো (তাদের সাথে সদাচরণ করো)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف درّاج أبي السَّمْح - وهو ابن سمعان - في روايته عن أبي الهيثم - وهو سليمان بن عمرو العُتَواري .. ابن وهب: هو عبد الله.وأخرجه أبو داود (2530)، وابن حبان (422) من طريقين عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 18/ 11721) من طريق عبد الله بن لَهِيعة، عن دَرَّاج، به.وقوله: "قد هجرت من الشرك يُفسِّره قوله صلى الله عليه وسلم في حديث عبد الله بن عمرو عند البخاري (10):المهاجر من هَجَرَ ما نهى اللهُ عنه".



[2] أخرجه البخاري برقم (3004)، ومسلم (2549).وانظر ما سيأتي برقم (7437) و (7442).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2533)


2533 - أخبرنا إسماعيل بن محمد الفقيه بالرَّيّ، حدثنا محمد بن الفَرَج الأزرق، حدثنا حجّاج بن محمد قال: قال ابن جُرَيج: أخبَرني محمد بن طلحة بن عبد الله بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن معاوية بن جاهِمَة: أَنَّ جَاهِمَةَ أَتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: إني أردتُ أن أغزوَ، فجئتُ أستشِيرُك، فقال: "ألك والدهٌ؟ " قال: نعم، قال: "اذهَبْ فالزَمْها، فإنَّ الجنة عند رِجْلَيها" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাহিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন: আমি যুদ্ধে (গাযওয়া) যেতে মনস্থ করেছি, তাই আপনার পরামর্শ নিতে এসেছি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: তোমার কি মাতা আছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: যাও, তার সেবা করো (বা তার সাথে লেগে থাকো), কেননা জান্নাত তার দু'পায়ের নিচে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن طلحة وأبيه، فهما صدوقان، وكذا محمد بن الفرج صدوق، لكنه متابع. ابن جُرَيج: هو عبد الملك بن عبد العزيز المكي.وأخرجه ابن ماجه (2781 م) عن هارون بن عبد الله الحَمَّال، والنسائي (4297) عن عبد الوهاب ابن الحكم الوراق، كلاهما عن حجاج بن محمد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 24 / (15538) عن روح بن عُبادة، عن ابن جُرَيج، به.وأخرجه ابن ماجه (2781) من طريق محمد بن إسحاق، عن محمد بن طلحة، عن معاوية بن جاهمة، قال: أتيت رسولَ الله … فوهم في موضعين: وهم في إسقاط ذكر طلحة من إسناده، وجعله من مسند معاوية بن جاهمة، وأثبت القصة له، وإنما القصة لأبيه، كما حققه الحافظ في "الإصابة" 1/ 446 - 447 في ترجمة جاهمة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2534)


2534 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا مُؤمَّل ابن إسماعيل، حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت عن أنس: أنَّ أبا طلحة قرأ القرآن {انْفِرُوا خِفَافًا وَثِقَالًا} [التوبة: 41]، فقال: أرى أن نَسْتَنْفِرَ شيوخًا وشبابًا، فقالوا: يا أبانا لقد غزوتَ مع النبي صلى الله عليه وسلم حتى مات، ومع أبي بكر وعمر، فنحن نَعْزُو عنك، قال: فأبَى، فركِبَ البحرَ حتى ماتَ، فلم يَجِدوا جزيرةً يدفنُوه إلَّا بعد سبعة أيام، قال: فما تَغيَّر [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কুরআনের এই আয়াতটি পাঠ করলেন: {তোমরা বের হও হালকা অবস্থায় এবং ভারী অবস্থায়} [সূরা আত-তাওবা: ৪১]। অতঃপর তিনি বললেন, আমার মনে হচ্ছে, যুবক ও বৃদ্ধ সবারই জিহাদের জন্য বের হওয়া উচিত। তারা (পরিবারের লোকেরা) বলল, হে আমাদের পিতা, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধ করেছেন তাঁর ইন্তেকাল পর্যন্ত, আর আবূ বকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও। এখন আমরা আপনার পক্ষ থেকে যুদ্ধে যাব। তিনি (আবু তালহা) তা প্রত্যাখ্যান করলেন এবং সমুদ্রে (জিহাদের উদ্দেশে) যাত্রা করলেন এবং সেখানেই ইন্তেকাল করলেন। সাত দিন অতিবাহিত হওয়ার আগে তারা তাকে দাফন করার জন্য কোনো দ্বীপ খুঁজে পেল না। রাবী বলেন, তার দেহের কোনো পরিবর্তন হয়নি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وقد توبع مُؤمَّل بن إسماعيل. ثابت: هو ابن أسلم البُناني.وأخرجه ابن حبان (7184) من طريق عبد الرحمن بن سلام الجُمحي، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (5605) من طريق عبد الله بن المبارك عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد وثابت، عن أنس.قوله: "فما تغيّر" أي ما أَنتن ولا خبُثت رائحته، كحال الأموات. وابن حبان (4743) من طرق عن يحيى بن آدم، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث ابن عباس الذي بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2535)


2535 - أخبرنا أبو العبَّاس السَّيّاري، حدثنا عبد العزيز بن حاتم، حدثنا علي ابن الحسن بن شَقيق، حدثنا عبد المؤمن بن خالد الحنفي، حدثني نَجْدة بن نُفيع، قال: سألتُ ابن عباس عن قول الله عز وجل: {إِلَّا تَنْفِرُوا يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا} [التوبة: 39] قال: استنفَرَ رسولُ الله حيًّا من أحياء العرب، فتثاقَلُوا، فأُمسك عنهم المطر، وكان عذابَهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর বাণী— {তোমরা যদি অভিযানে বের না হও, তবে তিনি তোমাদেরকে মর্মন্তুদ শাস্তি দেবেন} [সূরা আত-তাওবাহ: ৩৯]— সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরবের গোত্রগুলোর মধ্য থেকে একটি গোত্রকে (জিহাদের জন্য) অভিযানে বের হতে আহ্বান জানিয়েছিলেন, কিন্তু তারা অলসতা করে। ফলে তাদের থেকে বৃষ্টি বন্ধ করে দেওয়া হলো, আর এটাই ছিল তাদের শাস্তি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة نجدة بن نُفيع.وسيأتي برقم (2584) من طريق زيد بن الحُباب عن عبد المؤمن بن خالد. وابن حبان (4743) من طرق عن يحيى بن آدم، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث ابن عباس الذي بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2536)


2536 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان، حدثنا يحيى بن آدم، أخبرنا شَريك، عن عمار الدُّهْني، عن أبي الزُّبَير، عن جابر، رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم: أنه كان لواؤُه يوم دخلَ مكةَ أبيضَ [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وشاهدُه حديث ابن عباس:




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিশান (পতাকা) মক্কা বিজয়ের দিন সাদা ছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، شريك -وهو ابن عبد الله النخعي- يعتبر به في المتابعات والشواهد، وباقي رجال الإسناد لا بأس بهم.وأخرجه أبو داود (2592)، وابن ماجه (2817)، والترمذي (1679)، والنسائي (3835)، وابن حبان (4743) من طرق عن يحيى بن آدم، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث ابن عباس الذي بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2537)


2537 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا بشر بن موسى، حدثنا يحيى بن إسحاق السَّيْلَحِيني، حدثنا يزيد بن حيان، أخبرني أبو مِجْلَز لاحِق بن حُميد، عن ابن عباس، قال: كان لواءُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، أبيضَ، ورايتُه سوداءَ [1].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর লিওয়া (প্রধান পতাকা) ছিল সাদা এবং তাঁর রায়াহ (নিশান) ছিল কালো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، يزيد بن حيان - وهو النّبَطي، وإن كان فيه مقال - قد توبع.وأخرجه ابن ماجه (2818) عن عبد الله بن إسحاق الواسطي، والترمذي (1681) عن محمد ابن رافع، كلاهما عن يحيى بن إسحاق، بهذا الإسناد.وتابع يزيدَ بنَ حيانَ حيّانُ بن عُبيد الله أبو زهير البصري عند أبي يعلى (2370)، والطبراني في "الكبير" (1161)، و "الأوسط" (219)، وأبي الشيخ في "أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم (418)، وابن عدي 2/ 425. وحيان هذا قال عنه أبو حاتم صدوق، وقال ابن راهويه: حدثنا روح بن عُبادة حدثنا حيان بن عُبيد الله، وكان رجلَ صدق، وقال عنه ابن عدي عامة أحاديثه أفراد، يتفرد بها، وقال الدارقطني: ليس بقوي.فالحديث بمجموع الطريقين حسن إن شاء الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2538)


2538 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني أبو صخر، عن أبي معاوية البَجَلي، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عباس أنه حدثه، قال: بينما أنا في الحِجْر جالسٌ أتاني رجلٌ، فسألني عن (العادِياتِ ضَبْحًا)، فقلتُ له: الخيلُ حين تُغِيرُ في سبيل الله ثم تأوي إلى الليل، فيصنعون طعامَهم، ويُوقِدون نارهم، فانفَتَلَ عني فذهب إلى علي ابن أبي طالب وهو تحت سِقَاية زمزم، فسأله عن العاديات، فقال: سألتَ عنها أحدًا قبلي؟ قال: نعم، سألت عنها ابنَ عباس فقال: هي الخيل حين تُغير في سبيل الله، قال: فاذهب فادعُهُ لي، قال: فلما وَقَفَ على رأسه قال: تُفتي الناسَ بلا علمٍ لك، واللهِ إنْ كانت أولَ غزوة في الإسلام لَبدرٌ، وما كان معنا إلّا فَرَسان، فرس للزبير، وفرس للمِقْداد بن الأسود، فكيف تكون العادِيَاتُ ضَبْحًا؟ إنما العادِيَاتُ ضَبْحًا مِن عرفةَ إلى المزدلفةِ، ومن المزدلفةِ إلى مِنّى، {فَأَثَرْنَ بِهِ نَقْعًا}: الأرضَ حين تطؤُها بأخفافِها وحوافِرِها، قال ابن عباس: فنَزَعتُ عن قولي، ورجعتُ إلى الذي قال عليٌّ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، فقد احتجَّا [2] بأبي صخر، وهو حُميد بن زياد الخرَّاط المصري، وبأبي معاوية البَجَلي، وهو عمار بن أبي معاوية الدُّهْني الكوفي.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (সাঈদ ইবনে জুবাইরকে) বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমি একবার হিজরে (কাবা ঘরের পাশে) বসে ছিলাম, তখন একজন লোক এসে আমাকে (সূরা আদিয়াতের আয়াত) 'ওয়াল-আদিয়াতি দ্বাবহা' (দ্রুত ধাবমান অশ্বের হাঁপানির শব্দ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল।

আমি তাকে বললাম: আল্লাহর পথে জিহাদের উদ্দেশ্যে আক্রমণকারী সেই ঘোড়াগুলো, যা রাতে ফিরে এসে তাদের খাবার তৈরি করে এবং আগুন জ্বালায়।

লোকটি আমার কাছ থেকে চলে গেল এবং আলী ইবনে আবি তালিবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে গেল, যিনি তখন যমযমের হাউসের নিচে ছিলেন। সে তাঁকে আদিয়াত (দ্রুত ধাবমান অশ্ব) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি (আলী রাঃ) বললেন: তুমি কি এর আগে আর কারো কাছে জিজ্ঞাসা করেছ?

লোকটি বলল: হ্যাঁ, আমি ইবনে আব্বাসকে জিজ্ঞাসা করেছি। তিনি বলেছেন: এগুলো হলো সেই ঘোড়াগুলো, যা আল্লাহর পথে আক্রমণ করে। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যাও, তাকে (ইবনে আব্বাসকে) আমার কাছে ডেকে আনো।

ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন আমি তাঁর (আলী রাঃ-এর) সামনে দাঁড়ালাম, তিনি বললেন: তুমি জ্ঞান ছাড়া মানুষকে ফতোয়া দিচ্ছ! আল্লাহর শপথ, ইসলামের প্রথম যুদ্ধ ছিল বদর, আর আমাদের সাথে মাত্র দুটি ঘোড়া ছিল—একটি ছিল যুবাইরের এবং একটি ছিল মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদের। তাহলে আদিয়াতি দ্বাবহা (দ্রুত ধাবমান অশ্বের হাঁপানির শব্দ) কীভাবে (জিহাদের ঘোড়া) হতে পারে?

দ্রুত ধাবমান অশ্বের হাঁপানির শব্দ (আল-আদিয়াতি দ্বাবহা) হলো আরাফা থেকে মুযদালিফার দিকে এবং মুযদালিফা থেকে মিনার দিকে (ধাবমান অশ্ব)। (সূরা আদিয়াতের আয়াত) ‘ফা-আছারনা বিহী নাক‘আ’ (যাতে ধূলি উড়ানো হয়) – এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো জমিন, যখন সেগুলোকে (ঘোড়া) তাদের খুর ও পায়ের নিচে পিষে ফেলে।

ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন আমি আমার মত থেকে সরে এলাম এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা বলেছিলেন, তা গ্রহণ করলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، فإنَّ أبا معاوية البَجَلي - وهو عمار الدُّهني - لم يسمع من سعيد ابن جبير شيئًا. وأبو صخر - وهو حميد بن زياد الخراط - ليس بذاك الثقة لكنه متابَع. واستنكر الذهبي هذا الخبر في "تلخيصه".وهو عند عبد الله بن وهب في قسم التفسير من "جامعه" 2 / (136). وقرن بأبي صخر عبدَ الله ابن عياش، وهو ليس بذاك القوي، لكن يعتبر به في المتابعات والشواهد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 30/ 272 - 273، وابن أبي حاتم في "تفسيره" كما في "تفسير ابن كثير" 8/ 486 عن يونس بن عبد الأعلى، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وسيأتي مختصرًا بذكر فرسي الزُّبَير والمقداد يوم بدر برقمي (4344) و (5651).



[2] لم يخرج البخاري لعمار الدُّهني ولا لأبي صخر في "الصحيح" شيئًا، وإنما خرَّج لأبي صخر وحده في كتابه "الأدب المفرد".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2539)


2539 - حدثنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا عبد الله بن زَيْدان، حدثنا أبو سعيد عبد الله بن سعيد الكِندي، حدثني عُقْبة بن المغيرة أبو العلاء الشَّيباني، حدثني إسحاق بن أبي إسحاق الشَّيباني، عن أبيه، عن المُخارق بن سُلَيم، قال: كنت أُسايِر عمارًا يوم الجَمَل، ومعه قَرَنٌ مُسَمَّطَة [1] بسَرْجه، يبُول فيه إذا بال، فلما حضر القتالُ قال: يا مُخارِقُ، ائتِ رايةَ قومِك، فقلتُ: ما أنا بمُفارِقِك [2]، وأنا اليومَ على هذه الحال، قال: بل يا مُخارق ائتِ رايةَ قومك، فإني رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يَستَحِبُّ أن يقاتِلَ الرجلُ تحت رايةِ قومِه [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। মুখারিক ইবনে সুলাইম বলেন, আমি জঙ্গে জামালের (উট বাহিনীর যুদ্ধের) দিন আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। তাঁর হাওদার সাথে চামড়ার ছোট একটি পাত্র বাঁধা ছিল, যখন প্রয়োজন হতো, তিনি তাতে পেশাব করতেন। যখন যুদ্ধ শুরু হওয়ার উপক্রম হলো, তিনি বললেন, হে মুখারিক! তোমার গোত্রের পতাকার নিচে যাও। আমি বললাম, আমি আপনাকে ছাড়ব না, আমি আজ এই অবস্থায়ই থাকব। তিনি বললেন, না, হে মুখারিক! বরং তোমার গোত্রের পতাকার নিচে যাও। কেননা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে দেখেছি, তিনি পছন্দ করতেন যে, কোনো ব্যক্তি যেন তার গোত্রের পতাকার নিচে যুদ্ধ করে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أي: مُعلَّقة بالسُّمُوط وهي السُّيُور، أي: الجلود، والمقصود أنها معلَّقة بجلد السَّرْج.



[2] لفظ "بمفارقك" تحرَّف في نسخنا الخطية إلى بغار، وأنا والصواب ما أثبتنا من الجزء الأول من "أمالي أبي إسحاق البغدادي" (97) حيث رواه بتمامه عن أبي سعيد الأشج.



2539 [3] - إسناده حسن، المخارق بن سُلَيم -وهو الشَّيباني- روى عنه ثلاثة أولاد له وأبو إسحاق روى الشَّيباني، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقيل: إنَّ له صحبة، وكذلك عقبة بن المغيرة، روى وذكره ابن حبان في "الثقات"، وأما إسحاق بن أبي إسحاق فوثقه الدارقطني في رواية البرقاني، وروى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات". وكنا قد ضعَّفنا إسناده في "المسند" باضطرابه، ولا اضطراب فيه كما سنبيّنه.وأخرجه مختصرًا أحمد 30/ (18316) عن يحيى بن عبد الملك بن أبي غنية، قال: حدثنا عقبة بن المغيرة، عن جد أبيه المخارق، قال: لقيت عمارًا … فذكره. وهذا قُصارى ما فيه أنه أسقط الواسطة بينه وبين المخارق، وعُرفت من طريق غير ابن أبي غنية، كما وقع هنا.ورواه عبد الله بن عمر بن أبان عن ابن أبي غنية عند أبي يعلى (1641)، فقال: عن عقبة بن المغيرة، عمن حدثه عن جد أبيه المخارق. وهذا فيه بيان أن بينهما واسطة لكنها مبهمة، وقد جاء بيانها في غير رواية ابن أبي غنية، كما وقع عند المصنف هنا.فمثلُ هذا لا يُعدُّ اضطرابًا، ولكنه إبهام جاء بيانه في طريق أخرى للحديث صحيحة.وقد تابع عبدَ الله بنَ سعيد الكندي على ذكر الواسطة صدقةُ بن الفضل المروَزي عند البخاري في "تاريخه الكبير" 7/ 431والقَرَن، بالتحريك: هي الجَعْبة الصغيرة تكون من جلود وغيرها. وقوله: "ابغوني" بوصل الهمزة من الثلاثي، أي: اطلبوا لي، أو بقطعها من الرباعي، أي: أعينوني على الطلب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2540)


2540 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا بِشْر بن بكر، حدثني ابن جابر، عن زيد بن أرْطَاةَ، عن جُبَير بن نُفَير، عن أبي الدرداء، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ابغُوني الضعفاءَ، فإنما تُرزَقُون وتُنصَرُون بضعفائِكم" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، إنما أخرجا [2] حديث سعد بن أبي وقَّاص: أنه ظنَّ أنَّ له فَضْلًا على مَن دُونَه.




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা দুর্বলদেরকে আমার কাছে নিয়ে এসো (বা তাদের খোঁজ রাখো), কেননা তোমাদের দুর্বলদের মাধ্যমেই তোমাদেরকে রিযিক দেওয়া হয় এবং তোমাদেরকে সাহায্য করা হয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ابن جابر: هو عبد الرحمن بن يزيد بن جابر.وأخرجه أبو داود (2594) من طريق الوليد بن مسلم، والنسائي (4373) من طريق عمر بن عبد الواحد، كلاهما عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2673) من طريق عبد الله بن المبارك عن ابن جابر. وقوله: "ابغوني" بوصل الهمزة من الثلاثي، أي: اطلبوا لي، أو بقطعها من الرباعي، أي: أعينوني على الطلب.



[2] أخرجه البخاري (2896) وحده دون مسلم.