হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2581)


2581 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إسحاق بن الحسن الحَرْبي، حدثنا عفّان بن مسلم، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدثنا الحارث بن حَصِيرة، حدثنا القاسم بن عبد الرحمن، عن أبيه، قال: قال ابن مسعودٍ: كنتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يومَ حُنين، فولَّى عنه الناس وبقيتُ معه في ثمانين رجلًا من المهاجرين والأنصار، فكُنا على أقدامِنا نحوًا من ثمانين قدمًا ولم نُولِّهم الدُّبُرَ، وهم الذين أنزل الله عليهم السكينةَ، قال: ورسول الله صلى الله عليه وسلم على بغلته يمضي قُدُمًا، فحادَت بغلته، فمال عن السّرِج، فشَدَّ نحوه، فقلتُ: ارتفع رفعَكَ الله، قال: "ناوِلْني كفًّا من ترابٍ" فناولتُه، فضرب به وجوهَهم، فامتلأ أعينُهم ترابًا، قال: "أين المهاجرون والأنصار؟ " قلت: هم هنا، قال: "اهتِفْ بهم" فَهَتَفتُ بهم، فجاؤوا وسيوفُهم في أيمانهم كأنها الشُّهُب، وولَّى المشركون أدبارَهم [1]. حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হুনাইনের দিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ছিলাম। লোকেরা তাঁর কাছ থেকে পালিয়ে গিয়েছিল, কিন্তু আমি মুহাজির ও আনসারদের আশি জন লোকের সাথে তাঁর সাথে ছিলাম। আমরা প্রায় আশি কদম দূরে দাঁড়িয়েছিলাম এবং শত্রুদের দিকে পিঠ দেখাইনি। এরাই ছিল সেই লোক, যাদের উপর আল্লাহ প্রশান্তি (সাকীনাহ) নাযিল করেছিলেন। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খচ্চরের পিঠে আরোহণ করে সামনে এগিয়ে যাচ্ছিলেন। হঠাৎ তাঁর খচ্চরটি দিক পরিবর্তন করলে তিনি জিন থেকে হেলে গেলেন। আমি দ্রুত তাঁর কাছে গিয়ে বললাম: উঠে বসুন, আল্লাহ আপনাকে উন্নীত করুন! তিনি বললেন: "এক কোষ মাটি আমাকে দাও।" আমি তাঁকে মাটি দিলাম। তিনি তা দিয়ে মুশরিকদের মুখের দিকে নিক্ষেপ করলেন। ফলে তাদের চোখ মাটি দিয়ে ভরে গেল। তিনি বললেন: "মুহাজির ও আনসারগণ কোথায়?" আমি বললাম: তারা এখানেই আছেন। তিনি বললেন: "তাদের ডাকো।" আমি তাদের ডাকলাম। তারা তাদের ডান হাতে তলোয়ার নিয়ে এমনভাবে আসল যেন সেগুলো উল্কাপিণ্ড। অতঃপর মুশরিকরা পিঠ দেখিয়ে পালিয়ে গেল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه اختُلف في سماع عبد الرحمن - وهو ابن عبد الله بن مسعود - من أبيه، واختُلِف أيضًا على القاسم بن عبد الرحمن، فخالف فيه الحارثَ بنَ حصيرة عبدُ الرحمن بنُ عبد الله المسعودي، فرواه عن القاسم عن عبد الله بن مسعود، دون ذكر عبد الرحمن في إسناده، والمسعودي أوثق من الحارث وأعلم بحديث ابن مسعود من غيره، وخالفه أيضًا في متنه، فذكر في روايته أنه نُودي في الناس يوم حنين يا أصحاب سورة البقرة. هكذا بصيغة المجهول، وقد تبين من حديث العباس بن عبد المطلب عند مسلم (1775) والحميدي (459) وغيرهما أنَّ العباس هو الذي نادى: يا أصحاب البقرة ويا أصحاب السَّمرة. فليس هو ابن مسعود، كما وقع في رواية الحارث ابن حَصِيرة هذه، ولعلَّ هذا هو ما دعا الذهبي للحكم على هذا الحديث بالنكارة.وأما ذكر عدد من ثبت مع النبي صلى الله عليه وسلم، فلا نكارة فيه، ويؤيده حديث ابن عمر عند الترمذي (1689)، قال: لقد رأيتنا يوم حنين وإن الفئتين لمولّيتان، وما مع رسول الله صلى الله عليه وسلم منة رجل. وصحَّحه الترمذي وحسَّنه الحافظُ في "الفتح" 12/ 548، وجمع الحافظ بين ما وقع في رواية ابن مسعود ورواية ابن عمر، وبين ما قاله أهل السير الذين ذكروا أنَّ الذين ثبتوا تسعة أو عشرة رجال فقط، فقال: من زاد على العشرة يكون عجّل في الرجوع فعُدَّ فيمن لم ينهزم.وأخرجه أحمد 7/ (4336) عن عفان بن مسلم، بهذا الإسناد، وقال فيه: فنكصنا على أقدامنا نحوًا من ثمانين قدمًا. وهو يدل على أنَّ الثمانين الذين ثبتوا يشمل من رجع بعد أن فرَّ غير بعيدٍ.وهذا يؤكد صحة ما قاله الحافظ من الجمع المذكور، والله أعلم.وأخرجه مختصرًا ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 2/ 144 من طريق عبد الله بن المبارك، عن القاسم بن عبد الرحمن، عن عبد الله بن مسعود، قال: نُودي في الناس يوم حُنين: يا أصحاب سورة البقرة، فأقبلوا بسيوفهم كأنها الشُّهُب، فهزم الله المشركين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2582)


2582 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن علي بن ميمون الرَّقّي، حدثنا محمد بن يوسف الفريابي، حدثنا إسرائيل، عن أبي سنان، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: مَن قال: أستغفرُ الله الذي لا إله إلَّا هو الحىُّ القيُّومُ وأتوبُ إليه، ثلاثًا، غُفِرتْ ذنوبُه وإن كان فارًّا من الزَّحْفِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি তিনবার এই দু’আ পড়বে: "আস্তাগফিরুল্লাহাল্লাযী লা ইলাহা ইল্লা হুয়াল হাইয়্যুল ক্বাইয়্যুমু ওয়া আতূবু ইলাইহি" (আমি আল্লাহর নিকট ক্ষমা চাই, যিনি ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই, যিনি চিরঞ্জীব, সবকিছুর ধারক এবং আমি তাঁর কাছে তওবা করি), তার গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে, যদিও সে যুদ্ধের ময়দান থেকে পলায়নকারী হয়।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح: أبو سنان: هو ضرار بن مرة، وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك الجُشْمي. وأخرجه ابن خزيمة في التوكل كما في "إتحاف المهرة" 10/ 438 عن سعيد بن أبي زيد، عن الفريابي، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم برقم (1905) من طريق محمد بن سابق عن إسرائيل. طريق جُبير بن نُفير عن المقداد، وإسناده صحيح.والبَحُوث: بفتح الباء، على صيغة فَعُول، من أبنية المبالغة، ويقع على الذكر والأنثى كامرأة صَبُور، ويكون من باب إضافة الموصوف إلى الصفة، من البحث والتفتيش عن أسرار المنافقين، وضبطها ابن الأثير في"النهاية" بضم الباء ولذلك قال: جمع بحث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2583)


2583 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، قال: قرأتُ على أبي اليَمَان، أنَّ حَرِيز بن عثمان حدَّثه عن عبد الرحمن بن مَيسَرة، قال: حدثني أبو راشد الحُبْراني، قال: وافَيتُ المِقدادَ بنَ الأسود فارسَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم جالسًا على تابوتٍ من توابيت الصَّيارِفة [1] وفَضَلَ عنها عِظَمًا، وهو يريد الغزو، فقلت: لقد أعذَرَ اللهُ إليك، فقال: أبَتْ عليَّ سورة البَحُوث، قال الله عز وجل: {انْفِرُوا خِفَافًا وَثِقَالًا} [التوبة: 41]؛ يعني: سورة التوبة" [2]. حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু রাশিদ আল-হুবরানী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর অশ্বারোহী বীর মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করলাম। তখন তিনি সায়ারিফাদের (মুদ্রা বিনিময়কারীদের) একটি সিন্দুকের উপর বসেছিলেন এবং তিনি স্থূলতার কারণে সিন্দুকটির চেয়ে বড় লাগছিলেন। তিনি জিহাদের জন্য বের হওয়ার প্রস্তুতি নিচ্ছিলেন। আমি বললাম, আল্লাহ্ তা‘আলা অবশ্যই আপনাকে (যুদ্ধে না যাওয়ার) সুযোগ দিয়েছেন। তিনি বললেন, সূরাতুল বাহূছ (অর্থাৎ সূরা আত-তাওবা) আমাকে মানা করেছে। আল্লাহ্ তা‘আলা বলেছেন: {তোমরা হালকা বা ভারী যে কোনো অবস্থাতেই (জিহাদের জন্য) বেরিয়ে পড়ো।} [সূরা আত-তাওবা: ৪১]।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تابوت الصيرفي: هو الصندوق الذي يُحرز فيه مالَه. طريق جُبير بن نُفير عن المقداد، وإسناده صحيح.والبَحُوث: بفتح الباء، على صيغة فَعُول، من أبنية المبالغة، ويقع على الذكر والأنثى كامرأة صَبُور، ويكون من باب إضافة الموصوف إلى الصفة، من البحث والتفتيش عن أسرار المنافقين، وضبطها ابن الأثير في"النهاية" بضم الباء ولذلك قال: جمع بحث.



[2] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن ميسرة: وهو الحضرمي الشامي. وأخرجه أبو عُبيد القاسم بن سلّام في "الناسخ والمنسوخ" (368)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 6/ 1802، وأبو بكر الجصّاص في "أحكام القرآن" 4/ 309 - 310 من طريق أبي اليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو عُبيد في "الناسخ والمنسوخ" (368)، وفي "فضائل القرآن" ص 242 - ومن طريقه أبو بكر الجصّاص 4/ 309 - 310 - وابن أبي شيبة، 5/ 315، وابن سعد في "الطبقات" 3/ 150، وأبو جعفر المستغفري في "فضائل القرآن" (804) من طرق عن حَريز بن عثمان، به.وسيأتي برقم (5578) من طريق بقية بن الوليد عن حَريز بن عثمان، وبرقم (3321) من طريق جُبير بن نُفير عن المقداد، وإسناده صحيح.والبَحُوث: بفتح الباء، على صيغة فَعُول، من أبنية المبالغة، ويقع على الذكر والأنثى كامرأة صَبُور، ويكون من باب إضافة الموصوف إلى الصفة، من البحث والتفتيش عن أسرار المنافقين، وضبطها ابن الأثير في"النهاية" بضم الباء ولذلك قال: جمع بحث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2584)


2584 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان العامري، حدثنا زيد بن الحُباب، حدثنا عبد المؤمن بن خالد الحنفي، حدثنا نَجْدة ابن نُفيع، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم استنفر حيًّا من العرب، فتثاقَلُوا، فنزلت {إِلَّا تَنْفِرُوا يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا} [التوبة:39]، قال: كان عذابَهم حبسَ المطرِ عنهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وعبد المؤمن بن خالد الحنفي من ثِقات المَراوزة.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরবের একটি গোত্রকে (যুদ্ধে অংশগ্রহণের জন্য) আহ্বান করেছিলেন, কিন্তু তারা অলসতা দেখাল। অতঃপর এই আয়াতটি নাযিল হলো: "যদি তোমরা (আল্লাহর পথে) বেরিয়ে না পড়ো, তবে তিনি তোমাদেরকে যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি দেবেন" [সূরা তাওবা: ৩৯]। তিনি বলেন: তাদের শাস্তি ছিল তাদের থেকে বৃষ্টি বন্ধ করে দেওয়া।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة نجدة بن نُفيع.وأخرجه أبو داود (2506) عن عثمان بن أبي شيبة، عن زيد بن الحباب، بهذا الإسناد.وقد تقدم برقم (2535) من طريق علي بن الحسن بن شَقيق عن عبد المؤمن. على إرساله في "الإصابة" 2/ 195، لكن غَفَلَ عن إعلاله أيضًا بجهالة عبد الله بن أبي أمية، فإنه لم يرو عنه غير ابن جُرَيج، ولم يذكره غير ابن حبان في "الثقات"، وقيل: اسمه عبد ربّه، كما وقع مسمًّى في "المراسيل" لأبي داود و"المصنف" لعبد الرزاق في حديث آخر في قطع السارق.وأخرجه البيهقي 9/ 22 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" للهيثمي (662)، ومن طريقه الخطيب في "المتفق والمفترق" (789) عن معاوية بن عمرو، عن أبي إسحاق الفزاري، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2585)


2585 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا محبُوب بن موسى بن موسى الأَنطاكي، أخبرنا أبو إسحاق الفَزَاري، عن ابن جُرَيج، أخبرني عبد الله بن أبي أُميَّة، عن الحارث بن عبد الله بن أبي ربيعة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان في بعض مغازيه مَرَّ بأناس من مُزَينة، فاتّبَعه عبدٌ لامرأة منهم، فلما كان في بعض الطريق سلّم عليه، فقال: "فلانٌ؟ " قال: نعم، قال: "ما شأنُك؟ " قال: أُجاهِد معك، قال: "أذِنَتْ لك سيدتُك؟ " قال: لا، قال: "ارجع إليها، فإن مَثَلَك مَثَلُ عبدٍ لا يُصلي إن متَّ قبل أن تَرجِعَ إليها، واقرأْ عليها السلامَ" فرجع إليها، فأخبرها الخبرَ، فقالت: اللهِ هو أمَرَ أن تقرأ عليَّ السلام؟ قال: نعم، قالت: ارجِعْ فجاهِدْ معه [1]. حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আল-হারিথ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে আবি রাবি'আ থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কোনো এক যুদ্ধের সফরে মুযাইনা গোত্রের কিছু লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তাদের মধ্যকার একজন মহিলার গোলাম তাঁর পিছু নিল। যখন তারা কিছুটা পথ অতিক্রম করলেন, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে সালাম দিলেন, আর বললেন: "অমুক?" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তোমার কী অবস্থা?" সে বলল: আমি আপনার সাথে জিহাদ করতে এসেছি। তিনি বললেন: "তোমার মনিব কি তোমাকে অনুমতি দিয়েছে?" সে বলল: না। তিনি বললেন: "তুমি তার কাছে ফিরে যাও। কেননা, তোমার দৃষ্টান্ত এমন গোলামের মতো, যে সালাত আদায় করে না, যদি তুমি তার কাছে ফিরে যাওয়ার আগে মৃত্যুবরণ করো। আর তাকে আমার সালাম বলো।" এরপর সে তার মনিবের কাছে ফিরে গেল এবং ঘটনা জানালো। মনিব বলল: আল্লাহর কসম! তিনি কি নির্দেশ দিয়েছেন যে তুমি আমাকে তাঁর পক্ষ থেকে সালাম দাও? সে বলল: হ্যাঁ। মনিব বলল: তুমি ফিরে যাও এবং তাঁর সাথে জিহাদ করো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة عبد الله بن أبي أُمية، ولإرساله أيضًا، وقد نبَّه الحافظ ابن حجر على إرساله في "الإصابة" 2/ 195، لكن غَفَلَ عن إعلاله أيضًا بجهالة عبد الله بن أبي أمية، فإنه لم يرو عنه غير ابن جُرَيج، ولم يذكره غير ابن حبان في "الثقات"، وقيل: اسمه عبد ربّه، كما وقع مسمًّى في "المراسيل" لأبي داود و"المصنف" لعبد الرزاق في حديث آخر في قطع السارق.وأخرجه البيهقي 9/ 22 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" للهيثمي (662)، ومن طريقه الخطيب في "المتفق والمفترق" (789) عن معاوية بن عمرو، عن أبي إسحاق الفزاري، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2586)


2586 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا يزيد بن مَوهَب الرَّمْلي، حدثنا المفضَّل بن فَضَالة، عن عيّاش بن عبَّاس القِتْباني، عن عبد الله بن يزيد، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أَنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "يُعْفَرُ للشهيدِ كلُّ ذَنْبٍ إِلَّا الدَّينَ" [1].حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وشاهدُه حديث سهل بن حُنيف:




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শহীদের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে, তবে ঋণ (Dayn) ব্যতীত।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح يزيد بن مَوهَب: هو ابن خالد بن مَوهب، نسبه لجده، وعبد الله بن يزيد: هو أبو عبد الرحمن الحُبُلي، مشهور بكنيته.وأخرجه أحمد 11 / (7051) عن يحيى بن غيلان، ومسلم (1886) عن زكريا بن يحيى بن صالح المصري، كلاهما عن المفضَّل بن فَضالة، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه مسلم (1886) من طريق سعيد بن أبي أيوب، عن عياش بن عباس، به. وأخرجه أبو يعلى الموصلي في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" للحافظ (1926) عن هارون بن معروف، والطبراني في "الكبير" (5552) من طريق سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي، و (5553) من طريق أحمد بن صالح، والخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" (899) من طريق يحيى بن سليمان الجُعفي، أربعتهم عن عبد الله بن وهب، به. غير أنَّ سليمان الدمشقي قال في روايته عن عبد الرحمن بن شريح، بدل: ابن سعد، وقول الجماعة أثبت.ويشهد له ما قبله.وحديث المقدام بن معدي كرب عند أحمد 28/ (17182)، وابن ماجه (2799)، والترمذي (1663)، وصحَّحه الترمذي. ولفظه: " للشهيد عند الله ست خِصال: يغفر له في أول دفعة من دمه" الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2587)


2587 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني عبد الرحمن بن سعد المُزني، عن سَهْل بن أبي أُمامة ابن سهل بن حُنيف، عن أبيه، عن جده، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ أول ما يُهْرَاقُ من دمِ الشهيد تُغفَر له ذنوبه" [1].




সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: শহীদের রক্তের প্রথম যে ফোঁটাটি ঝরে, তার দ্বারা তার গুনাহসমূহ মাফ করে দেওয়া হয়।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عبد الرحمن بن سعد المزني.وأخرجه البيهقي 9/ 163 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو يعلى الموصلي في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" للحافظ (1926) عن هارون بن معروف، والطبراني في "الكبير" (5552) من طريق سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي، و (5553) من طريق أحمد بن صالح، والخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" (899) من طريق يحيى بن سليمان الجُعفي، أربعتهم عن عبد الله بن وهب، به. غير أنَّ سليمان الدمشقي قال في روايته عن عبد الرحمن بن شريح، بدل: ابن سعد، وقول الجماعة أثبت.ويشهد له ما قبله.وحديث المقدام بن معدي كرب عند أحمد 28/ (17182)، وابن ماجه (2799)، والترمذي (1663)، وصحَّحه الترمذي. ولفظه: " للشهيد عند الله ست خِصال: يغفر له في أول دفعة من دمه" الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2588)


2588 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا إسحاق بن إبراهيم الزُّبيدي، أنَّ عثمان بن سعيد بن كثير بن دينار حدثهم قال: حدثنا أبو مُطِيع معاوية بن يحيى، عن نصر بن علقمة عن أخيه محفوظ بن علقمة، عن أبي أيوب الأنصاري، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من لَقيَ فصبَرَ حتى يُقتَلَ أَو يَغلِبَ، لم يُفتَنْ في قبره" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি (যুদ্ধের ময়দানে শত্রুর) সম্মুখীন হয় এবং ধৈর্য ধারণ করে যতক্ষণ না সে নিহত হয় অথবা জয়লাভ করে, সে তার কবরে পরীক্ষার সম্মুখীন হবে না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكن محفوظ بن علقمة لم يسمع هذا الحديث من أبي أيوب، بينهما فيه واسطة وكأنه لم يُدرك أبا أيوب أصلًا، فلا تعرف له رواية عن أحد من الصحابة إلّا عن سلمان الفارسي وقيل فيها بأنها مرسلة، وجُلُّ رواية محفوظ هذا عن عبد الرحمن ابن عائذ الثُّمالي، وهو تابعي مشهور، قد سمع هذا الحديث منه، كما سيأتي بيانه.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الجهاد" (126) عن عمرو بن عثمان بن سعيد، عن أبيه، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الصبر والثواب" (145) من طريق علي بن عيّاش، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (1932) من طريق بقية بن الوليد، وابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (285) من طريق أبي عتبة الحسن بن علي بن مسلم السَّكُوني، والطبراني في "الكبير" (4094)، وفي "الأوسط" (8243)، وفي "مسند الشاميين" (2495) من طريق مصفَّى ابن البُهلول الحمصي، أربعتهم عن أبي مُطيع معاوية بن يحيى، به.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (4118) من طريق صدقة بن عبد الله السَّمين، عن نصر بن علقمة، عن محفوظ بن علقمة عن عبد الرحمن بن عائذ الثمالي، عن أبي هريرة عن أبي أيوب؛ فظهرت بذلك الواسطة بين محفوظ وأبي أيوب، وصدقة بن عبد الله هذا أعدل الأقوال فيه قول أبي حاتم الرازي بأن محله الصدق وأنه أُنكر عليه رأي القدر فقط.ويشهد له حديث المقام بن معدي كرب الذي ذكرناه عند الحديث الذي قبله، ففيه: "ويُجار من عذاب القبر".وحديث راشد بن سعد، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم عند النسائي (2191) أنَّ رجلًا قال: يا رسول الله، ما بالُ المؤمنين يُفتنون في قبورهم إلَّا الشهيد؟ قال: "كفى ببارِقة السيوف على رأسه فتنةً". وإسناده حسن، كما أشار إليه ابن القطان الفاسي في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 743.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2589)


2589 - أخبرني أبو الحسن أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا محبوب بن موسى، حدثنا أبو إسحاق الفَزاري، عن أبي حماد الحَنَفي، عن ابن عَقيل، قال: سمعت جابر بن عبد الله يقول: فَقَدَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حمزةَ حين فاءَ الناسُ من القتال، فقال رجل: رأيتُه عند تلك الشجّرات، وهو يقول: أنا أسدُ الله وأسدُ رسوله، اللهم أبرأُ إليك ممّا جاء به هؤلاء؛ أبو سفيان وأصحابه، وأعتذرُ إليك ممّا صنع هؤلاء بانهزامِهم، فحَنَا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم نحوَه، فلما رأى جنْبَه بكى، ولما رأى ما مُثِّل به شَهَقَ، ثم قال: "ألا كُفِّنَ"، فقام رجل من الأنصار فرمى بثوب عليه، ثم قام آخرُ من الأنصار فرمى بثوبٍ عليه، فقال: "يا جابر"، هذا الثوبُ لأبيك، وهذا لعمِّي حمزة"، ثم جيء بحمزة فصَلَّى عليه، ثم يُجاء بالشهداء فتُوضع إلى جانب حمزة، فيصلِّي عليهم، ثم تُرفَع ويُترك حمزة، حتى صلِّى على الشهداء كلهم.قال: فرجعتُ وأنا مُثقَلٌ قد تَرَك أبي عليَّ دَينًا وعيالًا، فلما كان عندَ الليل أرسل إلىَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "يا جابر، إنَّ الله تبارك وتعالى أحيا أباك وكلَّمه" قلت: وكلّمه كلامًا! قال: "قال له: تَمَنَّ، فقال: أتمنَّى أن تَرُدَّ روحي وتُنشئ خَلْقى كما كان، وتَرْجِعَني إلى نبيّك، فأقاتلَ في سبيلك فأُقتلَ مرةً أخرى، قال: إني قضيتُ أنهم لا يَرجِعون". قال: وقال صلى الله عليه وسلم: "سيدُ الشهداءِ عند الله يومَ القيامة حمزةُ" [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন লোকেরা যুদ্ধ থেকে ফিরে এলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খোঁজ করলেন। তখন এক ব্যক্তি বললেন: আমি তাঁকে সেই গাছগুলোর কাছে দেখেছি, তিনি বলছিলেন: আমি আল্লাহর সিংহ এবং তাঁর রাসূলের সিংহ। হে আল্লাহ! আবূ সুফিয়ান ও তার সাথীরা যা নিয়ে এসেছে, তা থেকে আমি আপনার কাছে সম্পর্কহীনতা ঘোষণা করছি। আর এই লোকেরা তাদের পরাজয়ের মাধ্যমে যা করেছে, সে জন্য আমি আপনার কাছে ওজর পেশ করছি (বা ক্ষমা প্রার্থনা করছি)।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (হামযার) দিকে গেলেন। যখন তিনি তাঁর পাশে দেখলেন, তখন কাঁদলেন। আর যখন তিনি দেখলেন, তাঁর অঙ্গহানি করা হয়েছে, তখন তিনি উচ্চস্বরে কেঁদে উঠলেন। এরপর তিনি বললেন: "তাকে কি কাফন দেওয়া হবে না?" তখন একজন আনসার সাহাবী উঠে দাঁড়ালেন এবং একটি কাপড় তার উপর রাখলেন। এরপর আরেকজন আনসার সাহাবী দাঁড়ালেন এবং একটি কাপড় তার উপর রাখলেন।

এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে জাবির! এই কাপড়টি তোমার পিতার জন্য, আর এটি আমার চাচা হামযার জন্য।" এরপর হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আনা হলো এবং তিনি তাঁর জানাযার সালাত আদায় করলেন। এরপর অন্যান্য শহীদদের আনা হচ্ছিল এবং হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশে রাখা হচ্ছিল। তিনি তাদের উপর জানাযার সালাত আদায় করছিলেন, এরপর তাদেরকে উঠিয়ে নেওয়া হচ্ছিল এবং হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রেখে দেওয়া হচ্ছিল, যতক্ষণ না তিনি সকল শহীদের উপর সালাত আদায় করলেন।

জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি ফিরে এলাম, আর আমি ভারাক্রান্ত ছিলাম। আমার পিতা আমার উপর ঋণ ও পরিবার পরিজন রেখে গেছেন। যখন রাত হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: "হে জাবির! আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা তোমার পিতাকে জীবিত করেছেন এবং তাঁর সাথে কথা বলেছেন।" আমি বললাম: তিনি তাঁর সাথে কথাও বলেছেন! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তাঁকে বললেন: কিছু চাও (বা আকাঙ্ক্ষা করো)।" তিনি বললেন: আমি আকাঙ্ক্ষা করি যে, আপনি আমার রূহকে ফিরিয়ে দিন এবং আমার সৃষ্টিকে আগের মতো করে দিন, আর আমাকে আপনার নবীর কাছে ফিরিয়ে দিন, যেন আমি আপনার পথে যুদ্ধ করতে পারি এবং আরেকবার শাহাদাত বরণ করতে পারি। আল্লাহ বললেন: "আমি তো ফয়সালা দিয়ে দিয়েছি যে, তারা (মৃতরা) ফিরে যাবে না।"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বললেন: "কিয়ামতের দিন আল্লাহর কাছে শহীদদের নেতা হলেন হামযা।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف أبي حماد الحنفي - واسمه المفضَّل بن صدقة - وقد توبع على بعض ألفاظ الحديث، وابن عقيل - وهو عبد الله بن محمد بن عَقيل - يُحسَّن حديثه في المتابعات والشواهد، وقد توبع على بعض ألفاظ الحديث أيضًا، ولكن انفرد هو أو أبو حماد الحنفي بقصة الصلاة على شهداء أحد، والصحيح عن جابر أنه لم يُصَلِّ عليهم، كما سيأتي بيانه.وأخرج قصة تكفين حمزة أحمد 22 / (14521)، والترمذي (997) من طريق زائدة بن قدامة، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كفَّن حمزة بن عبد المطلب في نَمِرةٍ في ثوب واحد.والصحيح في تكفين حمزة أن أخته صفية هي من جلبت له ثوبين لكفنه، فكُفِّن بأحدهما كما رواه الزُّبَير بن العوام عند أحمد 3 / (1418) وغيره، وكما رواه ابن عباس عند عبد الرزاق (6194)، وإسناداهما حسنان.وستأتي قصة استشهاد حمزة وحدها برقم (4961) من طريق عُبيد بن شريك عن أبي صالح محبوب بن موسى.وقصة تكليم الله لوالد جابر أخرجها أيضًا أحمد 23/ (14881) من طريق محمد بن علي السلمي، عن ابن عقيل، عن جابر. وستأتي بنحوها برقم (4976) من طريق طلحة بن خراش عن جابر.وسيأتي ذكر استشهاد عبد الله بن عمرو بن حرام والد جابر بأُحد برقم (4972) من طريق وهب ابن كيسان عن جابر، وبرقم (4974) و (4975) من طريق أبي نضرة عن جابر.وأخرج قصة استشهاده أيضًا البخاري (2781)، والنسائي (6430) من طريق الشعبي، وأحمد 23/ (15206)، والنسائي (6433) من طريق عمار بن أبي عمار، والبخاري (1293)، ومسلم (2471)، والنسائي (1984)، وابن حبان (7021) من طريق محمد بن المنكدر، ثلاثتهم عن جابر.وسيأتي ذكر بكائه صلى الله عليه وسلم على حمزة وشهيقه برقم (4954) من طريق عبد الله بن نمير عن أبي حماد.وستأتي قصة ترك عبد الله بن عمرو بن حرام دَينًا برقم (7273) من طريق نُبيح العَنَزي عن جابر. وأخرجها كذلك أحمد 23 / (15005) من طريق أبي المتوكل الناجي، والبخاري (2709) والنسائي (6434)، وابن حبان (6536) من طريق وهب بن كيسان وأحمد 23/ (14935)، والبخاري (2127) و (2781) و (3580) و (4053)، والنسائي (6430 - 6432) من طريق عامر الشعبي، والبخاري (6250)، وأبو داود (5187)، والترمذي (2711) من طريق محمد بن المنكدر، وابن ماجه (190)، والترمذي (3010) من طريق طلحة بن خراش، كلهم عن جابر بن عبد الله. وأخرج قصة إحياء الله تعالى لعبد الله بن عمرو بن حرام وتكليمه له: أحمد 23/ (14881) من طريق محمد بن علي بن ربيعة السلمي، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، به.وستأتي عند المصنف برقم (4976) من طريق طلحة بن خراش عن جابر بن عبد الله، بإسناد حسن.وقوله في آخر الحديث: "سيد الشهداء حمزة" سيأتي برقم (4945) من طريق عطاء عن جابر.وله طرق يمكن تحسينهُ باجتماعها كلها كما أوضحناه في تحقيقنا على "فتح الباري" 12/ 186 عند شرح الحديث (4072).وأما الصلاة على شهداء أحد، فثبت عن جابر بن عبد الله خلافُ ما جاء في رواية ابن عقيل هذه، وذلك فيما أخرجه البخاري (1343) و (1347) و (4079)، وابن ماجه (1514)، والترمذي (1036)، والنسائي (2093)، وابن حبان (3197) من طريق عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن جابر: أن النبي صلى الله عليه وسلم أمر بدفنهم في دمائهم، ولم يغسلوا، ولم يصل عليهم.وقد روي عن غير جابر بن عبد الله: أنه صلى عليهم، كحديث عبد الله بن الزُّبَير عند الطحاوي في "شرح المعاني" 1/ 503 وسنده حسن، وكمرسل أبي مالك الغفاري عند الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 503، والبيهقي 4/ 12، ومرسل عامر الشعبي عند أبي داود في "المراسيل" (428)، ورجالهما ثقات. وحديث ابن عباس الآتي برقم (4956).قال ابن القيم في "حاشيته على سنن أبي داود" 4/ 296: الذي يظهر من أمر شهداء أُحد أنه لم يُصلِّ عليهم عند الدفن، وقد قُتِل معه بأحدٍ سبعون نفسًا، فلا يجوز أن تخفي الصلاةُ عليهم، وحديث جابر بن عبد الله في ترك الصلاة عليهم صحيح صريح وأبوه عبد الله أحد القتلى يومئذ، فله من الخبرة ما ليس لغيره. وانظر تعليقنا على "سنن أبي داود" (3135) و (3223).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2590)


2590 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني أسامة بن زيد، حدثني الزُّهْري، عن أنس بن مالك قال: كُفِّن حمزة في نَمِرةٍ كانوا إذا مَدُّوها على رأسِه، خرجتْ رجلاهُ، وإذا مَدُّوها على رجلَيه خرج رأسُه، فأمرهم النبي صلى الله عليه وسلم أن يَمُدُّوها على رأسِه، ويجعَلُوا على رجلَيه من الإذخِر، وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لولا أن تَجزَعَ صفيةُ، لتركنا حمزةَ فلم ندفنْه، حتى يُحشَرَ حمزةُ من بُطون الطير والسِّباع" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে একটি চাদরে কাফন দেওয়া হয়েছিল। যখন তারা তা তাঁর মাথার উপর টানতেন, তখন তাঁর পা বেরিয়ে যেত, আর যখন তারা তা তাঁর পায়ের উপর টানতেন, তখন তাঁর মাথা বেরিয়ে যেত। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁদেরকে নির্দেশ দিলেন যে, তারা যেন তা তাঁর মাথার উপর টেনে দেন এবং তাঁর পায়ের উপর ইযখির (এক প্রকার সুগন্ধি ঘাস) দিয়ে দেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সাফিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিচলিত না হতেন, তবে আমরা হামযাকে দাফন না করেই ছেড়ে দিতাম, যেন হামযা কিয়ামতের দিন পাখি ও হিংস্র জন্তুর পেট থেকে উত্থিত হন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكن غلط فيه أسامة بن زيد -وهو الليثي- فقد خالفه الليث بن سعد، فرواه عن الزُّهْري عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك عن جابر بن عبد الله، ولا شكَّ بتقدُّم الليث على أسامة في الحفظ والإتقان، فقول الليث هو الصحيح، كما جزم به البخاري فيما سأله عنه الترمذي في "علله الكبير" (252). وانظر تمام الكلام عليه عند الرواية المتقدمة برقم (1367) من طريقين عن أسامة بن زيد.وسيأتي مختصرًا برقم (4948) من طريق عثمان بن عمر عن أسامة بن زيد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2591)


2591 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني، حدثنا أحمد بن مهران بن خالد الأصبهاني، حدثنا عُبيد الله بن موسى، حدثنا طلحة بن جَبر الأنصاري، عن المُطَّلب بن عبد الله، عن مصعب بن عبد الرحمن، عن عبد الرحمن ابن عوف، قال: افتَتَح رسول الله صلى الله عليه وسلم مكةَ، ثم انصرف إلى الطائف فحاصَرَهم ثمانيةً أو سبعةً، ثم أوْغَلَ غَدوةً أو رَوحةً، ثم نزل ثم هَجَّر، ثم قال: "أيها الناس، إني لكم فَرَطٌ، وإني أُوصيكم بعِتْرتي خيرًا، موعدكم الحوضُ، والذي نفسي بيده، لَتقيمُنَّ الصلاةَ، ولَتُؤْتون الزكاةَ، أو لأبعثنَّ عليكم رجلًا مني -أو كنفسي- فليَضْرِبَنَّ أعناقَ مُقاتِليهم، ولَيسبِيَنَّ ذَرارِيَّهم"، قال: فرأى الناسُ أنه يعني أبا بكر أو عمر، فأخذ بيدِ عليٍّ، فقال: "هذا" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয় করলেন। এরপর তিনি তায়েফের দিকে ফিরে গেলেন এবং আট বা সাত দিন তাদের অবরোধ করে রাখলেন। তারপর তিনি সকাল বা সন্ধ্যায় (অবরোধস্থল থেকে) কিছুটা ভেতরে ঢুকে পড়লেন, তারপর অবতরণ করলেন এবং দুপুরের গরমে (বিশ্রামের জন্য) রওনা হলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে লোক সকল! আমি তোমাদের জন্য অগ্রগামী (তোমাদের আগে আখিরাতে পৌঁছব)। আমি তোমাদের আমার বংশধরদের সাথে উত্তম আচরণের উপদেশ দিচ্ছি। তোমাদের প্রতিশ্রুত স্থান হলো হাউয (কাউসার)। যাঁর হাতে আমার প্রাণ, অবশ্যই তোমরা সালাত প্রতিষ্ঠা করবে এবং যাকাত প্রদান করবে, নতুবা আমি তোমাদের উপর এমন এক ব্যক্তিকে প্রেরণ করব যে আমার থেকে -অথবা আমার নিজের মতোই-। সে তাদের যুদ্ধবাজদের গর্দান কাটবে এবং তাদের সন্তানদেরকে বন্দী করবে।" তিনি বলেন, লোকেরা ধারণা করেছিল যে তিনি এর দ্বারা আবূ বকর অথবা উমারকে বুঝাচ্ছেন। অতঃপর তিনি আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাত ধরলেন এবং বললেন: "ইনি।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في إسناده ضعف، طلحة بن جبر مختلف فيه، وثقه ابن معين في رواية، وضعَّفه في رواية أخرى، ووهّاه أبو إسحاق الجُوزجاني، وذكره ابن حبان في "الثقات"، ولم يرو هذا الحديث غيره، ومع ذلك فقد صحَّح حديثه هذا المصنّف ومن قبله الطبري في "تهذيب الآثار" في الجزء المفرد بتحقيق علي رضا ص 159.وسيأتي عند المصنف بالأرقام (2608) و (2647) من طريق منصور بن المعتمر، عن ربعي ابن حراش، عن علي بن أبي طالب: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم مخاطب ببعض ما ورد هنا قريشًا.وأخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" 12/ 65 و 14/ 508، والفاكهي في "أخبار مكة" (1962)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 282 - 283، والبزار (1050)، ومحمد بن نصر المروَزي في "تعظيم قدر الصلاة" (968)، وأبو يعلى في "مسنده" (859)، والطبري في "تهذيب الآثار" في القسم المفرد بتحقيق علي رضا ص 159، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 342 من طرق عن عُبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد، وجاء عندهم جميعًا فحاصرهم تسع عشرة أو ثمان عشرة، إلّا الطبري فقال في روايته: سبع عشرة أو ثماني عشرة.قوله: "لكم فَرَط" أي: متقدَّم وسابق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2592)


2592 - أخبرني أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا أبو قُدامة ومحمد بن المثنَّى، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قَتَادة، عن سالم بن أبي الجعد، عن مَعْدان بن أبي طلحة اليَعْمَري، عن أبي نجيح السُّلَمي، قال: حاصَرْنا قَصْر الطائف، فسمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن رمى بسَهُمٍ في سبيل الله فله عَدْلُ محرّر، ومن بَلَغَ بسهمٍ في سبيل الله فله درجةٌ في الجنة"، فبلَّغتُ ستةَ عشَرَ سهمًا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، فإنَّ أبا نَجِيح هذا هو عَمرو بن عَبَسة السُّلَمي.




আবু নাজীহ সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আবু নাজীহ) বললেন: আমরা তায়েফের দুর্গে অবরোধ দিয়েছিলাম। তখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় (শত্রুর উদ্দেশ্যে) একটি তীর নিক্ষেপ করে, তার জন্য একটি গোলাম আযাদ করার সমপরিমাণ সওয়াব রয়েছে। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় (শত্রুর দিকে) একটি তীর পৌঁছে দেয়, তার জন্য জান্নাতে একটি বিশেষ মর্যাদা রয়েছে।” আমি (সেই যুদ্ধে) ষোলটি তীর নিক্ষেপ করে (শত্রু পর্যন্ত) পৌঁছে দিয়েছিলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو قُدامة: هو عبيد الله بن سعيد السرخسي، وهشام: هو ابن أبي عبد الله سنْبَر الدستُوائي، وقتادة: هو ابن دعامة، وأبو نجيح السُّلَمي: هو عمرو بن عَبَسَة.وأخرجه أبو داود (3965) عن محمد بن المثنَّى، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 28 / (17022) و 32/ (19428)، والنسائي (4336)، وابن حبان (4615) من طرق عن هشام الدستوائي، به.وأخرجه أحمد 32 / (19429) من طريق سعيد بن أبي عَروبة، عن قتادة، به.وسيأتي ضمن حديث مطول برقم (4419) من طريق عبد الرحمن بن محمد بن منصور عن معاذ ابن هشام.وتقدَّم شطره الأول مفردًا برقم (2500) من طريق عبد الرحمن بن محمد بن منصور عن معاذ ابن هشام، وبنحوه برقم (2501) من طريق القاسم مولى عبد الرحمن بن يزيد الدمشقي عن عمرو بن عنبسة.قوله: "بلغ بسهم" بالتخفيف، يعني: بَلَغَ العدوَّ بسهم، فالباء في قوله "بسهم" للتعدية، وقيل: بلّغ، بالتشديد، يعني مَنْ بلغ مكان الغزو ملتبسًا بسهم وإن لم يَرْمِ، فالباء في قوله: "بسهم" للمُلابسة. أفاده القاري في "المرقاة" 6/ 2503.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2593)


2593 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا الحسن بن علي القَبّاني [1]، حدثنا المنذر بن الوليد الجارودي، حدثنا عبد الأعلى [2]، حدثنا يحيى بن سعيد الأنصاري، حدثني أبو الزُّبَير، عن جابر بن عبد الله، قال: كنا مع رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بالطائف في غزوة حُنين، فلما بلغ الجغرانةَ قَسَم فِضَةً بين الناس [3]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুনাইনের যুদ্ধের সময় তায়েফে ছিলাম। যখন তিনি জি’ররানা নামক স্থানে পৌঁছলেন, তখন তিনি লোকজনের মাঝে রৌপ্য বণ্টন করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا جاء في (ص) و (ب) و (ع)، وفي (ز): أبو الحسن بن علي القباني، بزيادة لفظ "أبو".ولم نتبينه بعد البحث الشديد إلّا أن يكون هو حسين بن محمد بن زياد القباني، كما جاء في "إتحاف المهرة" لابن حجر (3678)، ويكون اسم "الحسين" تحرَّف في أصول الحاكم إلى: الحسن، واسم "محمد" تحرَّف إلى: علي، وكنية حسين بن محمد القباني أبو علي، فقد يكون جاء في رواية الحاكم: حسين بن محمد أبو علي القباني، فسقط اسم "محمد" ولفظ "أبو" فصار الاسم حسين بن علي، ثم تحرَّف "حسين" إلى: حسن، والله أعلم.



[2] وقع في (ب): عبد الأعلى بن عبد الأعلى. بزيادة "بن عبد الأعلى"، وهي زيادة مقحمة، فلا تُعرف لعبد الأعلى بن عبد الأعلى السامي رواية عن يحيى بن سعيد الأنصاري، وفي طبقة عبد الأعلى السامي رجل آخر اسمه عبد الأعلى بن محمد، ضعَّفه الأزدي، فهذا هو الصواب، والله أعلم.



2593 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الأعلى - وهو ابن محمد - كما بيناه قريبًا، وشيخه يحيى بن سعيد قُيِّد هنا بالأنصاري، وقد روى هذا الحديثَ يحيى بنُ سعيد بن قيس الأنصاري الثقة الكبير، لكن الظاهر أنه هنا الفارسي التميمي المازني، وربما نُسب أنصاريًا أيضًا، وربما قيل فيه: رجل من أهل الحجاز، كما أفاده الذهبي في "الميزان"، وابن حجر في "لسان الميزان"، وهو يروي عن أبي الزُّبَير أيضًا، وهو رجل ضعيف، لكن تابعه يحيى بن سعيد الأنصاري الثقةُ الإمام. وأخرجه مسلم (1063)، والنسائي (8033) من طريق الليث بن سعد، ومسلم (1063) من طريق عبد الوهاب الثقفي، وابن حبان (4819) من طريق مالك بن أنس، ثلاثتهم عن يحيى بن سعيد بن قيس الأنصاري، به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه مسلم (1063) من طريق قرة بن خالد، عن أبي الزُّبَير، به.وحُنين: وادٍ من أودية مكة، يقع شرقَها بقرابة 30 كم، يسمَّى اليوم وادي الشرائع، وأعلاه الصَّدر؛ صدر حنين.والجِعرانة: موضع شمال شرقيِّ مكة على نحو 29 كم منها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2594)


2594 - أخبرني أبو الحُسين محمد بن أحمد بن تَميم القَنْطري، حدثنا أبو قِلابة، حدثنا أبو عاصم، حدثنا عبد الله بن عبد الرحمن الأنصاري، أخبرني عبد الله بن عِياض ابن الحارث الأنصاري، عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أتى هَوازِنَ فِي اثني عشر ألفًا، فقُتِل مِن أهل الطائف يومَ حُنين مثلُ مَن قُتِل يومَ بدر، فأخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم كَفًّا من حَصْباء فرَمَى بها وجوهَنا فانهَزَمنا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াদ ইবনুল হারিস আল-আনসারী থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বারো হাজার সৈন্য নিয়ে হাওয়াযিন গোত্রের কাছে গেলেন। হুনাইনের দিনে তায়েফবাসীদের মধ্য থেকে ততজন নিহত হলো, যতজন বদরের দিনে নিহত হয়েছিল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক অঞ্জলি নুড়ি পাথর নিলেন এবং তা আমাদের চেহারায় নিক্ষেপ করলেন। ফলে আমরা পরাজিত হলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة عبد الله بن عياض. أبو قِلابةَ: هو عبد الملك بن محمد الرَّقاشي، وأبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد، وعبد الله بن عبد الرحمن: هو ابن يعلى بن كعب الطائفي، وانفرد أبو قِلابةَ في روايته هنا بنسبة عبد الله بن عبد الرحمن وشيخه عبد الله بن عياض بأنهما أنصاريان، وخالفه سائر الرواة عن أبي عاصم، وخالفهم كذلك بتسمية جد عبد الله بن عياض بالحارث، ولم يسمِّه غيره.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 142 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد 2/ 143، والبخاري في "تاريخه الكبير" تعليقًا 7/ 19، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1588)، والطبراني في "الكبير" 17/ (1010)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5435) من طرق عن أبي عاصم، به.وقد صحَّ منه ذكر رمي النبي صلى الله عليه وسلم المشركين بالحصباء حتى انهزموا في حديث العباس بن عبد المطلب، عند مسلم (1775). وفي حديث سلمة بن الأكوعَ عنده أيضًا (1777).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2595)


2595 - حدثنا مُكرَم بن أحمد القاضي، حدثنا عبد الله بن روح المدائني، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا المُستَلِم بن سعيد الثقفي، عن خُبيب بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن جده، قال: خرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في بعض غَزَواته، فأتيتُه أنا ورجلٌ قبل أن نُسلِمَ، فقلنا: إنا نستحيي أن يشهد قومُنا مشهدًا ولا نشهدُ، فقال: "أسْلِما" قلنا: لا، قال: "فإنا لا نستعينُ بالمشركين على المشركين"، فأسلمْنا، وشهِدنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقتلتُ رجلًا وضربَني الرجلُ ضربةً، فتزوجتُ ابنتَه، فكانت تقول: لا عَدِمْتُ رجلًا وَشَّحَك هذا الوِشاحَ، فقلت: لا عَدِمْتِ رجلًا عجَّل أباكِ إلى النار [1].هذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه.وخُبيب بن عبد الرحمن بن الأسود بن حارثة [2] جدُّه صحابي معروف.وله شاهد عن أبي حُميد الساعدي:




খুবাইব ইবনু আবদির রহমান-এর দাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কোনো এক যুদ্ধে বের হলেন। তখন আমরা ইসলাম গ্রহণ করার আগেই আমি ও অন্য একজন লোক তাঁর কাছে আসলাম। আমরা বললাম: আমাদের গোত্রের লোকেরা যুদ্ধে অংশ নেবে আর আমরা অংশ নেবো না—এটা ভাবতে আমরা লজ্জা পাচ্ছি। তিনি বললেন: "তোমরা ইসলাম গ্রহণ করো।" আমরা বললাম: না। তিনি বললেন: "আমরা মুশরিকদের বিরুদ্ধে মুশরিকদের সাহায্য গ্রহণ করি না।" অতঃপর আমরা ইসলাম গ্রহণ করলাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধে অংশগ্রহণ করলাম। আমি একজন লোককে হত্যা করলাম এবং লোকটি আমাকে একটি আঘাত করলো। অতঃপর আমি তার মেয়েকে বিবাহ করলাম। সে (আমার স্ত্রী) বলতো: সেই লোকটির সর্বনাশ হোক যে তোমাকে এই আঘাতের চিহ্ন দিয়েছে। আমি বললাম: সেই লোকটির সর্বনাশ হোক যে তোমার পিতাকে দ্রুত জাহান্নামে পাঠিয়েছে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن إن شاء الله. وعبد الرحمن والد خُبَيب: هو ابن خُبَيب بن إساف، ذكره ابن حبان في "الثقات"، وذُكر فيمن قتل يوم الحَرَّة.وأخرجه أحمد 25 (15763) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.ويشهد لقوله صلى الله عليه وسلم: "لا نستعين بالمشركين" حديث عائشة عند مسلم (1817). وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 2/ 45، وإسحاق بن راهويه، كما في "المطالب العالية" (4263)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2068)، وابن المنذر في "الأوسط" (6165)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2580)، والطبراني في "الأوسط" (5142)، وأبو بكر الحازمي في "الاعتبار في الناسخ والمنسوخ" ص 218 - 219 من طرق عن الفضل بن موسي، به.



[2] لم نجد للحاكم سلفًا في نسبة خبيب كما ساقه، والذي عليه أهل التراجم والرجال أنه خُبيب ابن عبد الرحمن بن خُبيب بن إساف - أو يساف - وقد جاء مقيَّدًا في بعض روايات الحديث كذلك، وقد نبه على ذلك الحافظُ ابن حجر في "الإصابة" 1/ 234. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 2/ 45، وإسحاق بن راهويه، كما في "المطالب العالية" (4263)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2068)، وابن المنذر في "الأوسط" (6165)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2580)، والطبراني في "الأوسط" (5142)، وأبو بكر الحازمي في "الاعتبار في الناسخ والمنسوخ" ص 218 - 219 من طرق عن الفضل بن موسي، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2596)


2596 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا يوسف بن عيسى المروزي، حدثنا الفضل بن موسى السِّيْناني، عن محمد بن عمرو عن سعد [1] بن المنذر عن أبي حُميد الساعِدي، قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى إذا خَلَّف ثَنيّةَ الوَداع إذا كتيبةٌ، قال: "مَن هؤلاء؟ " قالوا: بني [2] قَينُقاع، وهو رَهْط عبد الله بن سَلَام، قال: "وأسلَمُوا؟ " قالوا: لا، بل هم على دينهم، قال: "قُل لهم فليَرجِعُوا، فإِنَّا لا نَستعينُ بالمشركين" [3].




আবু হুমাইদ আস-সা'ইদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (মদীনা থেকে) বের হলেন। যখন তিনি ‘ছানিয়্যাতুল ওয়াদা’ নামক স্থান পার হলেন, তখন তিনি একটি সৈন্যদল দেখতে পেলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, “এরা কারা?” লোকেরা বলল, বনু কায়নুকা, যারা আব্দুল্লাহ ইবনু সালামের গোত্রের লোক। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, “তারা কি ইসলাম গ্রহণ করেছে?” তারা বলল, “না, বরং তারা তাদের নিজ ধর্মের উপরেই রয়েছে।” তিনি বললেন, “তাদের বলে দাও, যেন তারা ফিরে যায়। কেননা, আমরা মুশরিকদের সাহায্য গ্রহণ করি না।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ص): سعيد، وقد ذكر ذلك في اسمه أيضًا في بعض الروايات. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 2/ 45، وإسحاق بن راهويه، كما في "المطالب العالية" (4263)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2068)، وابن المنذر في "الأوسط" (6165)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2580)، والطبراني في "الأوسط" (5142)، وأبو بكر الحازمي في "الاعتبار في الناسخ والمنسوخ" ص 218 - 219 من طرق عن الفضل بن موسي، به.



[2] كذا جاء في (ز) و (ص) و (ع)، وكذلك هي رواية البيهقي في "سننه الكبرى" 9/ 37 عن أبي عبد الله الحاكم، والظاهر أنه منصوب بفعل مقدّر، وفي (ب) بنو، مرفوعًا على أنه خبر مبتدأ مقدّر، وكلاهما سائغ. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 2/ 45، وإسحاق بن راهويه، كما في "المطالب العالية" (4263)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2068)، وابن المنذر في "الأوسط" (6165)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2580)، والطبراني في "الأوسط" (5142)، وأبو بكر الحازمي في "الاعتبار في الناسخ والمنسوخ" ص 218 - 219 من طرق عن الفضل بن موسي، به.



2596 [3] - إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو - وهو ابن علقمة الليثي - ومن أجل سعد بن المنذر - وهو سعد بن المنذر بن أبي حميد الساعدي - وحسّنه الحافظ ابن حجر في "المطالب العالية" (4263).وأخرجه البيهقي 9/ 37 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 2/ 45، وإسحاق بن راهويه، كما في "المطالب العالية" (4263)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2068)، وابن المنذر في "الأوسط" (6165)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2580)، والطبراني في "الأوسط" (5142)، وأبو بكر الحازمي في "الاعتبار في الناسخ والمنسوخ" ص 218 - 219 من طرق عن الفضل بن موسي، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2597)


2597 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا إسماعيل بن أبي أُوَيس، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، عن أبيه، عن المُرقَّع ابن صَيفيَّ بن ربَاح أخي حنظلة الكاتب، أنَّ جده رباحًا أخبره: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم غزا غزوةً كان على مُقدِّمتِه فيها خالد بن الوليد فمرَّ ربَاحٌ وأصحابُه على امرأة مقتولةٍ ممّا أصاب المقدِّمةُ، فوقَفوا عليها يتعجّبون من خَلْقِها، حتى لَحِقهم رسولُ الله صلى الله عليه سلم ففرّجوا له، حتى نظر إليها، فقال: "ها، ما كانت هذه تُقاتِلُ"، ثم نظر في وجوه القوم، فقال لأحدهم: "الحَقْ بخالدِ بن الوليد، فلا يَقتُلَنَّ ذُرِّيةً ولا عَسِيفًا" [1]. وهكذا رواه المغيرة بن عبد الرحمن وابن جُرَيج عن أبي الزِّناد، فصار الحديث صحيحًا على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




রাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক যুদ্ধে অংশ নেন, যেখানে খালিদ ইবনু ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অগ্রবর্তী বাহিনীর দায়িত্বে ছিলেন। রাবাহ এবং তাঁর সঙ্গীরা অগ্রবর্তী বাহিনীর হাতে নিহত হওয়া এক মহিলার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তারা তার শারীরিক গঠন দেখে বিস্ময় প্রকাশ করতে লাগলেন। অবশেষে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে এসে পৌঁছালেন। তারা তাঁর জন্য জায়গা করে দিলে তিনি মহিলাটিকে দেখলেন এবং বললেন: "আহ! এ তো যুদ্ধে লিপ্ত ছিল না।" অতঃপর তিনি লোকজনের চেহারার দিকে তাকিয়ে তাদের একজনকে বললেন: "খালিদ ইবনু ওয়ালীদ-এর কাছে যাও এবং তাকে নির্দেশ দাও যে সে যেন কোনো শিশু অথবা কোনো শ্রমিক/ভৃত্যকে ('আসীফকে) হত্যা না করে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل إسماعيل بن أبي أُوَيس - وهو إسماعيل بن عبد الله - ومن أجل عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، وقد توبعا. والمرقَّع هذا قال عنه يحيى بن سعيد الأنصاري: كان رجلًا مَرضيًّا، وذكره ابن حبان في "الثقات"، ووثقه الذهبي.وأخرجه أحمد 25/ 15993 و 29 / (17612) عن إبراهيم بن أبي العباس، و 25/ (15994) و 29/ (17611) عن حسين بن محمد، كلاهما عن عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 25 (15992) و 31 / (19043) و (19044)، وابن ماجه (2842 م)، والنسائي (8572)، وابن حبان (4789) من طريق المغيرة بن عبد الرحمن الحِزامي، عن أبي الزِّناد، به. وإسناده صحيح.وأخرجه أحمد 25/ (15995) و 31/ (19042) عن عبد الرزاق، عن ابن جُرَيج: أُخبِرت عن أبي الزِّناد، به. وهو منقطع.وأخرجه أحمد 29/ (17610)، وابن ماجه (2842)، والنسائي (8573)، وابن حبان (4791) من طريق سفيان الثَّوري، عن أبي الزِّناد، عن المرقع بن صيفي، عن حنظلة الكاتب أخي رباح ابن الربيع التميمي. وجزم ابن أبي شيبة فيما نقله عنه ابن ماجه والبخاري في "تاريخه الكبير" 3/ 314 وغيرهما بأنَّ سفيان وهم فيه. وصحَّح ابن حبان الروايتين. وأخرجه أبو داود (2669)، والنسائي (8571) من طريق عمر بن مُرقَّع، عن أبيه، عن جده. وإسناده صحيح.والذُّرِّية: اسم يجمع نَسْلَ الإنسان من ذكر أو أنثى.والعسيف: الأجير أو المملوك المُستهان به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2598)


2598 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبيد الله بن المُنادي، حدثنا يونس بن محمد ابنُ المؤدِّب، حدثنا أبان بن يزيد عن قَتَادة، عن الحسن، عن الأسود بن سَريع: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثَ سريةً يومَ حُنين [1] فقاتَلُوا المشركين، فأفضى بهم القتلُ إلى الذُّرِّية، فلما جاؤوا قال النبي صلى الله عليه وسلم "ما حَمَلَكم على قتل الذُّرِّية؟ " قالوا: يا رسول الله، إنما كانوا أولادَ المشركين، قال: "وهل خيارُكم إلَّا أولادُ المشركين؟ والذي نفسُ محمدٍ بيَدِه ما من نَسَمَةٍ تُولد إلَّا على الفِطْرة، حتى يُعرِبَ عنها لِسانُها" [2].




আল-আসওয়াদ ইবনে সারী' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুনাইনের দিন একটি সেনাদল প্রেরণ করলেন। তারা মুশরিকদের সাথে যুদ্ধ করল, কিন্তু তাদের হত্যাকাণ্ড শিশুদের পর্যন্ত পৌঁছে গেল। অতঃপর যখন তারা ফিরে আসল, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমাদের কিসে শিশুদের হত্যা করতে উদ্বুদ্ধ করল?" তারা বলল, হে আল্লাহর রাসূল, তারা তো ছিল মুশরিকদের সন্তান। তিনি বললেন, "তোমাদের মধ্যে যারা উত্তম, তারাও কি মুশরিকদের সন্তান ছিল না?" তিনি আরও বললেন, "ঐ সত্তার শপথ, যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, প্রতিটি প্রাণই ফিতরাতের (স্বভাবজাত ইসলামের) উপর জন্মগ্রহণ করে, যতক্ষণ না তার জিহ্বা সেই ফিতরাত থেকে সরে আসার কথা স্পষ্ট করে তুলে ধরে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: خيبر، وضبب عليها في (ز)، والمثبت كما جاء في رواية البيهقي في "الكبرى" 9/ 130 عن أبي عبد الله الحاكم، وهو الصواب، كما يدلُّ عليه رواية أحمد عن يونس ابن محمد المؤدِّب. وكما يدلُّ عليه قول الصَّعْب بن جثَّامة عند ابن حبان (4787) في حديثه الذي قال فيه: سألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أولاد المشركين، أن نقتلهم معهم، قال: نعم، فإنهم منهم، ثم نهى عنهم يوم حُنين. وقال الحافظ في "الفتح" 9/ 270: ويؤيد كون النهي في غزوة حنين حديث رياح بن الربيع -كذلك ضبطه الحافظ بالتحتانية، بدل الباء، وحديثه تقدَّم عند المصنف هنا قبل هذا- فقال فيه لأحدهم: "الحق خالدًا فقل له: لا تقتل ذُّرّية ولا عسيفًا" وخالد أول مشاهده مع النبي صلى الله عليه وسلم غزوة الفتح، وفي ذلك العام كانت غزوة حنين. والذهبي في "سير أعلام النبلاء" 4/ 566، ونفاه أحمد بن حنبل في "مسائل أبي داود" له (2042) ظنًّا، فقال: ما أُرى سمع منه الحسن.قلنا: وخالفهم آخرون، فصحح سماعَه منه جماعة منهم الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (1396)، وابن حبان في "صحيحه" (132)، وابن عبد البر في "التمهيد" 18/ 68، وضياء الدين المقدسي في "المختارة" (1444)، وهو ما مال إليه البخاري فيما يظهر، حيث أورد في تاريخَيه "الكبير" و "الأوسط" في ترجمة الأسود بن سَريع عدةَ طرق لهذا الخبر صرَّح فيها الحسن بسماعه من الأسود، ووقع تصريحه بسماعه منه في الرواية التالية عند المصنِّف، وهي من طريق يونس ابن عبيد عن الحسن البصري، وقد روى قِطعًا من هذا الخبر عن الحسن جماعةٌ، وقع في رواية بعضهم كذلك تصريحُ الحسن بسماعه من الأسود، وهم السَّريّ بن يحيى وعوفٌ الأعرابي ومُبارك ابن فَضَالة والأشعث الحُمْراني، فالله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 24/ (15588) عن يونس بن محمد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (26/ 16303)، وابن حبان (132) من طريق السَّرِي بن يحيى، عن الحسن البصري، به.وتابعه يونس بن عبيد في رواية هُشَيم عنه، كما جاء في الطريق التالية عند المصنف، وأشعث ابن عبد الملك الحُمْراني عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (1396).



[2] رجاله ثقات، وقد اختُلف في سماع الحسن -وهو البصري- من الأسود بن سَريع، فقد نفى سماعَه منه عليُّ بن المديني في "علله" (63)، ويحيى بن معين في رواية العباس الدُّوري عنه (4094)، وأبو داود في "سؤالات الآجري" له (727)، وابن مَنْدَه في "معرفة الصحابة" 1/ 186، والذهبي في "سير أعلام النبلاء" 4/ 566، ونفاه أحمد بن حنبل في "مسائل أبي داود" له (2042) ظنًّا، فقال: ما أُرى سمع منه الحسن.قلنا: وخالفهم آخرون، فصحح سماعَه منه جماعة منهم الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (1396)، وابن حبان في "صحيحه" (132)، وابن عبد البر في "التمهيد" 18/ 68، وضياء الدين المقدسي في "المختارة" (1444)، وهو ما مال إليه البخاري فيما يظهر، حيث أورد في تاريخَيه "الكبير" و "الأوسط" في ترجمة الأسود بن سَريع عدةَ طرق لهذا الخبر صرَّح فيها الحسن بسماعه من الأسود، ووقع تصريحه بسماعه منه في الرواية التالية عند المصنِّف، وهي من طريق يونس ابن عبيد عن الحسن البصري، وقد روى قِطعًا من هذا الخبر عن الحسن جماعةٌ، وقع في رواية بعضهم كذلك تصريحُ الحسن بسماعه من الأسود، وهم السَّريّ بن يحيى وعوفٌ الأعرابي ومُبارك ابن فَضَالة والأشعث الحُمْراني، فالله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 24/ (15588) عن يونس بن محمد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (26/ 16303)، وابن حبان (132) من طريق السَّرِي بن يحيى، عن الحسن البصري، به.وتابعه يونس بن عبيد في رواية هُشَيم عنه، كما جاء في الطريق التالية عند المصنف، وأشعث ابن عبد الملك الحُمْراني عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (1396).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2599)


2599 - حدَّثَناه أبو بكر محمد بن المؤمَّل بن الحَسَن [1]، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا عمرو بن عَون، حدثنا هُشَيم، أخبرنا يونس بن عُبَيد، عن الحسن، قال: حدثنا الأسودُ بن سَريع، قال: كنا في غزوة لنا، فذكر الحديثَ بنحوه [2].حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আসওয়াদ ইবনু সারী' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা আমাদের একটি যুদ্ধে ছিলাম। এরপর তিনি অনুরূপভাবে হাদীসটি বর্ণনা করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الحسين، وجاء على الصواب في سائر مواضع رواياته في "المستدرك".



[2] رجاله ثقات كسابقه.وأخرجه النسائي (8562) عن زياد بن أيوب، عن هُشَيم بن بشير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (24/ 15589) عن إسماعيل ابن عُليَّة، عن يونس بن عبيد، به. لكن لم يُصرِّح فيه الحسنُ بسماعه من الأسود.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2600)


2600 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا الفضل بن عبد الجبار، حدثنا النَّضر بن شُميل، أخبرنا شعبة.وأخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، عن عبد الملك بن عُمير، عن عطية القُرظي، قال: عُرضتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم قريظة، فشَكُّوا فيَّ، فأمر النبي صلى الله عليه وسلم أن يُنظر إليَّ هل أَنبَتُّ؟ فنظروا إلىَّ، فلم يجدوني أنبتُّ، فخلَّى عني والحقَني بالسَّبْي [1].حديث رواه جماعة من أئمة المسلمين عن عبد الملك بن عُمير، ولم يُخرجاه، وكأنهما لم يتأمّلا متابعة مجاهد بن جَبْر عبدَ الملك على روايته عن عطية القُرَظي.




আতিয়্যা আল-কুরযী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বনু কুরায়যা (গোত্রের বিচারের) দিনের আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সামনে পেশ করা হলো। তখন লোকেরা আমার ব্যাপারে সন্দেহ পোষণ করল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নির্দেশ দিলেন যেন দেখা হয়, আমার (গুপ্তাঙ্গের) চুল গজিয়েছে কি না? তারা আমাকে দেখল এবং দেখতে পেল যে, আমার চুল গজায়নি। তখন তিনি আমাকে ছেড়ে দিলেন এবং যুদ্ধবন্দীদের সাথে যুক্ত করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 31/ (18776)، وأبو داود (4404)، وابن ماجه (2541)، والترمذي (1584)، والنسائي (8567) من طريق سفيان الثَّوري، وأحمد 32/ (19421) و 37/ (22659)، وابن حبان (4780) من طريق هُشَيم بن بشير، وأبو داود (4405)، والنسائي (8566)، وابن حبان (4783) من طريق أبي عوانة الوضاح بن عبد الله اليشكري وابن حبان (4781) و (4788) من طريق جرير بن عبد الحميد، كلهم عن عبد الملك بن عمير، به.وسيأتي عند المصنف برقم (4380) من طريق حماد بن سلمة، وبرقم (8372) من طريق سفيان ابن عُيينة، كلاهما عن عبد الملك.وسيأتي قبله برقم (8371) من طريق مجاهد، عن عطية القرظي.