হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2601)


2601 - كما حدَّثَناه أبو العبَّاس محمد بن يعقوب أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب وأخبرني ابن جُرَيج وابن عُيينة، عن ابن أبي نَجيح، عن مجاهد، عن عطيةَ رجلٍ من بني قُريظة أخبره: أنَّ أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم جَرَّدُوه يوم قُريظة فلم يَرُوا المَوَاسي جَرَتْ على شعره - يعني عانَتَه - تركوه مِن القتل [1]. فصار الحديث بمتابعة مجاهد صحيحًا على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আতিয়্যাহ, যিনি বনু কুরাইযা গোত্রের একজন লোক, তিনি জানিয়েছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ কুরাইযা গোত্রের যুদ্ধের দিন তাঁকে বিবস্ত্র করে পরীক্ষা করলেন। অতঃপর তারা দেখতে পেলেন যে, তাঁর কেশের (অর্থাৎ তাঁর গুপ্তাঙ্গের কেশের) উপর ক্ষুর চালানো হয়নি। ফলে তাঁকে হত্যা করা থেকে রেহাই দেওয়া হলো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وقد سمع مجاهد من عطية هذا الخبر، كما صرَّح بذلك عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (5534). ابن وهب هو عبد الله، وابن جُرَيج هو عبد الملك بن عبد العزيز، وابن عُيينة: هو سفيان، وابن أبي نجيح: هو عبد الله.وأخرجه النسائي (8565) عن يونس بن عبد الأعلى، عن عبد الله بن وهب، عن ابن جُرَيج وحده، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2602)


2602 - أخبرَناه أبو جعفر أحمد بن عُبيد الأسدي الحافظ بَهَمذان، حدثنا إبراهيم ابن الحسين بن دِيْزِيل، حدثنا إسحاق بن محمد الفَرْوي وإسماعيل بن أبي أُوَيس، قالا: حدثنا محمد بن صالح التمار، عن سعد بن إبراهيم، عن عامر بن سعد، عن أبيه: أنَّ سعد بن معاذ حَكَم على بني قُريظة أن يُقتل منهم كلُّ مَن جَرَت عليه المُوسَى، وأن تُقْسَم أموالُهم وذَراريُّهم، فذُكر ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "لقد حَكَمَ اليومَ فيهم بحُكم الله الذي حَكَمَ به من فوقِ سبع سماوات" [1].




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ ইবনু মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বানূ কুরাইযা সম্পর্কে এই ফায়সালা দিয়েছিলেন যে, যাদের উপর ক্ষুর চালানো হয়েছে (অর্থাৎ যারা প্রাপ্তবয়স্ক হয়েছে), তাদের প্রত্যেককে হত্যা করা হবে এবং তাদের সম্পদ ও সন্তান-সন্ততি বন্টন করা হবে। যখন এই বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করা হলো, তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আজ সে তাদের ব্যাপারে আল্লাহর সেই ফায়সালা দিয়েছে, যা তিনি সাত আসমানের উপর থেকে ফায়সালা করেছেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد اختُلف فيه على سعد بن إبراهيم -وهو ابن عبد الرحمن بن عوف- فرواه محمد بن صالح التمار عنه، كما وقع عند المصنف، ورواه شعبة بن الحجاج عنه عن أبي أمامة بن سهل بن حُنيف عن أبي سعيد الخُذري، وخطّأ أبو حاتم فيما نقله عنه ابنُه في "العلل" (971) روايةَ محمد بن صالح التمار، وصوّب هو والدارقطني في "العلل" (605) رواية شعبة، وذكر البخاري في "تاريخه الكبير" 4/ 291 بأنَّ رواية شعبة أصح، لكن صحَّح الذهبي في "العلو" (62) حديثَ محمد بن صالح التمار، وقال ابن كثير في "تحفة الطالب بمعرفة أحاديث ابن الحاجب" (352): إسناده جيد، وقال ابن حجر في "الفتح" 12/ 279: رواية شعبة أصح، ويحتمل أن يكون لسعد بن إبراهيم فيه إسنادان.وأخرجه النسائي (5906) من طريق أبي عامر عبد الملك بن عمرو العَقَدي، عن محمد بن صالح التمار، بهذا الإسناد. وأورد قبله رواية شعبة، ولم يرجّح بينهما.وأخرجه أحمد 17 / (11168) و (11170) و (11171) و 18/ (11680)، والبخاري (3043) و (3804) و (4121) و (6262)، ومسلم (1768)، وأبو داود (5215)، والنسائي (5905) و (8165) و (8625)، وابن حبان (7026) من طرق عن شعبة، عن سعد بن إبراهيم، عن أبي أمامة بن سهل، عن أبي سعيد الخُدْري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2603)


2603 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا علي بن الحسن الهِلالي، حدثنا أبو مَعمَر عبد الله بن عمرو، حدثنا عبد الوارث، حدثنا محمد بن إسحاق، عن يعقوب بن عُتبة، عن مسلم بن عبد الله بن خُبيب، عن جُندب بن مَكِيث، قال: بعث رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عبدَ الله بن غالب الليثيَّ في سريّة، وكنتُ فيهم، وأمَرهم أن يشُنُّوا الغارةَ على بني المُلوِّح بالكَدِيد، فخرجنا حتى إذا كنا بالكَدِيد لَقِيْنا الحارثَ ابن البَرْصاء الليثيَّ، فأخذناه، فقال: إنما جئتُ أريدُ الإسلامَ، وإنما خرجتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلنا: إن تكن مُسلمًا لم يضُرَّك رباطنا يومًا وليلةً، وإن تكن غيرَ ذلك نَستَوثِق منك، فَشَدَدْناه وَثَاقًا [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জুণদুব ইবনে মাকীথ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল্লাহ ইবনু গালিব আল-লাইসীকে একটি ছোট অভিযানে (সারিয়্যাহ) প্রেরণ করলেন এবং আমিও তাদের মধ্যে ছিলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের আদেশ দিলেন যেন তারা আল-কাদীদ নামক স্থানে বানু মুলওয়াহ-এর উপর অতর্কিত আক্রমণ (গারা) করে। আমরা বের হলাম। যখন আমরা আল-কাদীদে পৌঁছলাম, তখন আমরা আল-হারিস ইবনু আল-বারসা আল-লাইসীকে পেলাম এবং তাকে ধরে ফেললাম। সে বলল: আমি তো কেবল ইসলাম গ্রহণ করতে এসেছি, আর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাওয়ার উদ্দেশ্যেই বের হয়েছি। তখন আমরা বললাম: যদি তুমি সত্যিই মুসলিম হয়ে থাকো, তবে আমাদের এই একদিন ও একরাতের বাঁধন তোমার কোনো ক্ষতি করবে না। আর যদি তুমি তা না হও, তবে আমরা তোমার ব্যাপারে নিশ্চিত হবো। অতঃপর আমরা তাকে শক্তভাবে বাঁধলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن إن شاء الله، وقد حسَّنه الحافظ في "الإصابة" 5/ 316 في ترجمة غالب بن عبد الله الليثي، ومسلم بن عبد الله بن خُبيب -وإن لم يرو عنه غير يعقوب بن عتبة- هو أحد ولد عبد الله بن خُبيب الصحابي، ولا يُعرف فيه جَرحة.ولا تُعرف صحبة جُندب بن مكيث إلَّا بهذا الإسناد، وأسانيد أخرى واهية عند الواقدي، ومع ذلك جزم بصحبته كلُّ من ألف في الصحابة، وكذا جزم بصحبته أبو حاتم كما في"الجرح والتعديل" لابنه، والذهبي في "التجريد" و "الكاشف"، وغيرهما.وقد صرَّح محمد بن إسحاق بسماعه عند ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 609، وعند غيره.وأخرجه أبو داود (2678) عن أبي معمر عبد الله بن عمرو بن أبي الحجاج، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 25/ (15844) عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن ابن إسحاق، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2604)


2604 - أخبرنا عبد الرحمن بن حمدان الجَلّاب بهمذان، حدثنا هلال بن العلاء الرَّقي، حدثنا عبد الله بن جعفر، حدثنا عبيد الله بن عمرو، عن زيد بن أبي أُنيسة، عن عمرو بن مُرَّة، عن إبراهيم قال: أراد الضحاك بن قيس أن يستعمل مسروقًا، فقال له عُمارة بن عُقبة: أتستعمل رجلًا من بقايا قَتَلةِ عثمان؟ فقال له مسروق: حدثنا عبد الله ابن مسعود - وكان في أنفُسنا موثوقَ الحديث - أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لما أراد قتلَ أبيك قال: مَن للصِّبْية؟ قال: "النارُ"، قد رضيتُ لك ما رضِيَ لك رسول الله صلى الله عليه وسلم [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (ইবরাহীম আন-নাখঈ বলেন,) দাহহাক ইবনু কাইস মাসরূককে (কোনো পদে) নিয়োগ করতে চাইলেন। তখন উমারাহ ইবনু উক্ববাহ তাকে বললেন, আপনি কি এমন ব্যক্তিকে নিযুক্ত করছেন, যে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হত্যাকারীদের অবশিষ্টদের একজন? তখন মাসরূক তাকে বললেন, আমাদের কাছে আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাদীস বর্ণনা করেছেন— আর তিনি আমাদের কাছে হাদীসের ক্ষেত্রে অত্যন্ত নির্ভরযোগ্য ছিলেন— যে যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তোমার পিতাকে হত্যা করতে চাইলেন, তখন তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: “ঐসব ছোট বাচ্চাদের জন্য কে আছে?” তিনি বললেন: “জাহান্নাম।” রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তোমার জন্য যা পছন্দ করেছেন, আমিও তোমার জন্য তাই পছন্দ করলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل هلال بن العلاء الرَّقِّي، وهو متابع، وإبراهيم -وهو ابن يزيد النخعي - روايته عن مسروق - وهو ابن الأجدع - معروفة، فالظاهر أنه سمع هذا الخبر منه، وإن كان صورته الإرسال والله تعالى أعلم. عبد الله بن جعفر: هو الرَّقِّي.وأخرجه أبو داود (2686) عن علي بن الحسين الرَّقِّي، عن عبد الله بن جعفر، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2605)


2605 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا أبو المثنَّى ومحمد بن غالب، قالا: حدثنا عبد الرحمن بن المبارك العَيْشي، حدثنا سفيان بن حبيب، حدثنا شعبة، عن أبي العَنْبَس، عن أبي الشَّعْثاء، عن ابن عباس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم جعل فِداءَ أهلِ الجاهلية يومَ بدرٍ أربعَ مئةٍ [1]. صحيح على شرطهما، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের দিন জাহিলিয়াতের লোকদের মুক্তিপণ চারশত (মুদ্রা) নির্ধারণ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن وأبو العَنْبَس سواء كان الكوفي الأكبر الذي قيل في اسمه: عبد الله بن مروان، وقيل: لا يُعرف اسمه، أو كان الحارث بن عُبيد جد يونس بن بكير، فكلاهما يروي عنه شعبة ومسعر، وكلاهما قال عنه الذهبي في "تاريخ الإسلام": صدوق، والله تعالى أعلم.وأخرجه أبو داود (2691)، والنسائي (8607) من طريق عبد الرحمن بن المبارك العَيْشي، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2653) من طريق أبي بحر البكراوي عن شعبة.وجاء عن ابن عباس من وجه آخر عند عبد الرزاق في "مصنفه" (9394)، ومن طريقه الطبراني في "الكبير" (12154) عن معمر، عن قتادة، قال معمر: وأخبرني عثمان الجزري، عن مقسم، عن ابن عباس قال: فادى النبي صلى الله عليه وسلم بأُسارى بدر، فكان فداء كل واحد منهم أربعة آلاف. وإسناده محتمل للتحسين.ومثله عن عكرمة مولى ابن عباس مرسلًا، عند ابن سعد في "الطبقات" الكبرى" 2/ 23، ورجاله ثقات.ومثله عن عباد بن عبد الله بن الزُّبَير مرسلًا أيضًا في ذكر فداء المطلب بن أبي وداعة لأبيه، عند ابن إسحاق في "السيرة" كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 648 - 649، ورواه الطبراني في "الكبير" (14828) موصولًا بذكر عبد الله بن الزُّبَير، لكن الأصح إرساله كما جاء في "سيرة ابن هشام"، ورجاله لا بأس بهم. لكن جاءت الأربعة الآلاف في هذه الرواية مقيَّدة بالدرهم.وبه يتضح الجمع بين رواية الأربع مئة وبين رواية الأربعة آلاف، بأنَّ الأربع مئة بالدينار وهي تساوي أربعة آلاف درهم، والله أعلم.على أنَّ غير واحد من أهل السير قد ذكر أنَّ فداء أُسارى بدر كان متفاضلًا، منهم موسى ابن عقبة عند البيهقي في "الدلائل" 3/ 142، وكذلك قال عكرمة في مرسله الذي قدَّمناه، فقد قال فيه: بلغ فداء أهل بدر يومئذ أربعة آلاف فما دون ذلك حتى إن كان الرجل يحسن الخطّ فُودِي على أن يُعلّم الخط. وأخرجه عنه أيضًا أبو عبيد في "الأموال" (309)، بلفظ: كان فداء أُسارى بدر مختلفًا، وكان منهم من فداؤه أن يُعلِّم غلمان الكُتّاب، أو قال: يعلِّم الغلمانَ الكِتاب.ومثله عن الشعبي عند أبي عبيد في "الأموال" (308)، وابن سعد في "الطبقات" 2/ 20.وممّا يؤيده أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أخذ من العبّاس بن عبد المطلب يومئذ عشرين أوقيَّة كما سيأتي عند المصنف برقم (5496)، وإسناده حسن. والأوقية: أربعون درهمًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2606)


2606 - حدثنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب العَدْل من أصل كتابه، حدثنا يحيى بن أبي طالب، أخبرنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا شُعبة، عن الحَكَم، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى عن علي، قال: أمرَني رسول الله صلى الله عليه وسلم أن أبيع أخوَين من السَّبْي فبعْتُهما [1]، ثم أتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فأخبرتُه بِبَيعهما، فقال: "فَرَّقْتَ بينهما؟ " قلت: نعم، قال: "فارتجِعْهما، ثم بِعْهما ولا تُفرّق بينهما" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وله إسناد آخر عن الحكم بن عتيبة صحيح أيضًا على شرطهما.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বন্দীদের মধ্য থেকে দুই ভাইকে বিক্রি করে দিতে আদেশ করলেন। আমি তাদের বিক্রি করে দিলাম। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাদের বিক্রির বিষয়টি জানালাম। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, "তুমি কি তাদের দুজনকে পৃথক করে দিয়েছ?" আমি বললাম, হ্যাঁ। তিনি বললেন, "তাহলে তুমি তাদের ফিরিয়ে নাও, এরপর তাদের বিক্রি করো, কিন্তু তাদের দুজনকে পৃথক করো না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظ "فبعتهما" من (ب) وحدها.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي، وهو مكرر الحديث المتقدم برقم (2362). وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2607)


2607 - حدثنا علي بن عيسى، حدثنا مُسدَّد بن قطن، حدثنا عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا إسحاق بن منصور، حدثنا عبد السلام بن حَرْب، عن يزيد بن عبد الرحمن، عن الحَكَم، عن ميمون بن أبي شَبيب، عن عليٍّ: أنه فَرَّق بين جاريةٍ وولدِها، فنهاهُ النبي صلى الله عليه وسلم عن ذلك، ورَدَّ البيعَ [1].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একজন দাসী ও তার সন্তানের মধ্যে বিচ্ছেদ ঘটিয়েছিলেন। তখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তা করতে নিষেধ করেন এবং সেই বিক্রয়টি বাতিল করে দেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه. وقد سلف برقم (2363).وانظر ما تقدم برقم (2386).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2608)


2608 - أخبرني أبو عبد الله أحمد بن قانِع قاضي الحرمَين ببغداد، حدثنا أبو شعيب عبد الله بن الحسن الحَرَّاني، حدثنا عبد العزيز بن يحيى الحَرّاني [1]، حدثنا محمد بن سلمة الحَرّاني، عن محمد بن إسحاق، عن أبان بن صالح، عن منصور بن المعتمِر، عن رِبْعي بن حِراش، عن علي بن أبي طالب، قال: خرج عبْدانٌ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الحُديبيَةِ قبل الصُّلْح، فكتب إليه مَوالِيهم، قالوا: يا محمد، والله ما خَرَجوا إليك رَغْبةً في دينك، وإنما خرجوا هِرابًا من الرِّقِّ، فقال ناسٌ: صدقوا يا رسول الله، رُدَّهم إليهم، فغَضِبَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "ما أُراكم تَنْتَهون يا معشرَ قريش، حتى يبعثَ الله عليكُم مَن يضربُ رقابَكم على هذا" وأبَى أن يرُدَّهم، فقال: "هُم عُتقاءُ الله" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, হুদায়বিয়ার দিনে সন্ধি হওয়ার পূর্বে দুইজন দাস রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল। তখন তাদের মালিকগণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট চিঠি লিখল। তারা বলল, হে মুহাম্মাদ! আল্লাহর শপথ, তারা আপনার দীনের প্রতি আগ্রহের কারণে আপনার নিকট আসেনি, বরং তারা দাসত্ব থেকে পলায়ন করে এসেছে। তখন কিছু লোক বলল, হে আল্লাহর রাসূল! তারা সত্য বলেছে, তাদেরকে তাদের মালিকদের নিকট ফিরিয়ে দিন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত হলেন এবং বললেন, "হে কুরাইশ সম্প্রদায়! আমি মনে করি না যে তোমরা এই কাজ থেকে বিরত হবে, যতক্ষণ না আল্লাহ তোমাদের উপর এমন কাউকে প্রেরণ করবেন, যে এর জন্য তোমাদের গর্দান উড়াবে।" আর তিনি তাদেরকে ফিরিয়ে দিতে অস্বীকার করলেন এবং বললেন, "তারা আল্লাহর মুক্ত দাস।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الخولاني، ولا يُعرف ذلك في نسبته، وإنما المعروف أنه البكائي مولاهم، وبنو البكاء هم بنو ربيعة بن عامر بن صعصعة، وهو من بلد حَرّان. قال أبو حاتم فيما نقله عنه ابنه في "العلل" (630) و (2773): وهو أشبه، وذكر بأنَّ رواية بشير ابن مهاجر وهمٌ. قلنا: ذلك فقد حسَّن إسناد رواية بشير هذه الحافظُ ابن حجر في "المطالب العالية" (2033)، وجوَّده في "فتح الباري" 17/ 536 - 537.وقد روي من طريق الفُضيل بن غزوان، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "ما منع قوم الزكاة إلّا ابتلاهم الله بالسِّنين"، والسِّنون: القحط والجُدوبة عامًا بعد عام. فهذا ما صحَّ عن بُريدة من الحديث، فدلَّ على أنَّ عبد الله بن بريدة روى عن أبيه هذا القدر من الحديث فقط باللفظ المذكور، وروى عن ابن عباس موقوفًا عليه الرواية بطولها، فوهم بشير بن مهاجر حيث جعل ما رواه عبد الله بن بريدة عن ابن عباس موقوفًا، من رواية ابن بريدة عن أبيه مرفوعًا، وعلى أي حال فللحديث شواهد يحسن بها.وأخرجه البيهقي في "السنن" 9/ 231 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر بن أبي شيبة في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ (950) و (2033)، والبزار (4463)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير"، وأبو بكر الروياني في "مسنده" كما في "المطالب" أيضًا، وابن المنذر في "الأوسط" (6289)، وابن أبي حاتم الرازي في "العلل" (2773)، والبيهقي في "السنن" 3/ 346 و 9/ 231، وفي "شعب الإيمان" (3040) من طرق عن عبيد الله بن موسي، به.وأخرجه البيهقي في "السنن" 3/ 346، وفي "الشُّعب" (3039) من طريق الحسين بن واقد، عن عبد الله بن بريدة، عن ابن عباس قوله موقوفًا عليه.وأخرج الطبراني في "الأوسط" (4577) و (6788)، وأبو عبد الله ابن مَنْدَهْ في "مجالس من أماليه" (145)، وتمام الرازي في "فوائده" (940) من طريق الفضيل بن غزوان. ووقع عند الطبراني في الموضع الأول: الفضيل بن مرزوق، وابن غزوان أصح -عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه بريدة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما منع قوم الزكاة إلّا ابتلاهم الله بالسنين". وإسناده حسن.ويشهد للحديث بطوله حديث ابن عمر الآتي عند المصنف برقم (8837)، وإسناده جيد.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن لولا عنعنة محمد بن إسحاق، لكن تابعه شريك النخعي، فتُغتفر عنعنتُه هنا.وأخرجه أبو داود (2700) عن عبد العزيز بن يحيى الحراني، بهذا الإسناد.وسيأتي بنحوه من طريق شريك النخعي عن منصور بن المعتمر برقم (2647) و (8013).وانظر ما تقدَّم برقم (2591). قال أبو حاتم فيما نقله عنه ابنه في "العلل" (630) و (2773): وهو أشبه، وذكر بأنَّ رواية بشير ابن مهاجر وهمٌ. قلنا: ذلك فقد حسَّن إسناد رواية بشير هذه الحافظُ ابن حجر في "المطالب العالية" (2033)، وجوَّده في "فتح الباري" 17/ 536 - 537.وقد روي من طريق الفُضيل بن غزوان، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "ما منع قوم الزكاة إلّا ابتلاهم الله بالسِّنين"، والسِّنون: القحط والجُدوبة عامًا بعد عام. فهذا ما صحَّ عن بُريدة من الحديث، فدلَّ على أنَّ عبد الله بن بريدة روى عن أبيه هذا القدر من الحديث فقط باللفظ المذكور، وروى عن ابن عباس موقوفًا عليه الرواية بطولها، فوهم بشير بن مهاجر حيث جعل ما رواه عبد الله بن بريدة عن ابن عباس موقوفًا، من رواية ابن بريدة عن أبيه مرفوعًا، وعلى أي حال فللحديث شواهد يحسن بها.وأخرجه البيهقي في "السنن" 9/ 231 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر بن أبي شيبة في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ (950) و (2033)، والبزار (4463)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير"، وأبو بكر الروياني في "مسنده" كما في "المطالب" أيضًا، وابن المنذر في "الأوسط" (6289)، وابن أبي حاتم الرازي في "العلل" (2773)، والبيهقي في "السنن" 3/ 346 و 9/ 231، وفي "شعب الإيمان" (3040) من طرق عن عبيد الله بن موسي، به.وأخرجه البيهقي في "السنن" 3/ 346، وفي "الشُّعب" (3039) من طريق الحسين بن واقد، عن عبد الله بن بريدة، عن ابن عباس قوله موقوفًا عليه.وأخرج الطبراني في "الأوسط" (4577) و (6788)، وأبو عبد الله ابن مَنْدَهْ في "مجالس من أماليه" (145)، وتمام الرازي في "فوائده" (940) من طريق الفضيل بن غزوان. ووقع عند الطبراني في الموضع الأول: الفضيل بن مرزوق، وابن غزوان أصح -عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه بريدة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما منع قوم الزكاة إلّا ابتلاهم الله بالسنين". وإسناده حسن.ويشهد للحديث بطوله حديث ابن عمر الآتي عند المصنف برقم (8837)، وإسناده جيد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2609)


2609 - أخبرَنا أبو جعفر محمد بن علي الشيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغفاري، حدثنا عُبيد الله بن موسى بن موسى، أخبرنا بَشير بن مُهاجِر، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما نَقَضَ قومٌ العهدَ قَطُّ إِلَّا كان القتلُ بينَهم، ولا ظهرتِ الفاحشةُ في قوم قَطُّ، إلَّا سلَّط الله عليهم الموتَ، ولا منعَ قومٌ الزكاةَ، إلَّا حَبَس الله عنهم القَطْرَ" [1]. صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখনই কোনো জাতি কখনো অঙ্গীকার (চুক্তি) ভঙ্গ করেছে, তাদের মাঝে কেবলই খুনখারাবি (হত্যাযজ্ঞ) বিস্তার লাভ করেছে। আর যখনই কোনো জাতির মধ্যে অশ্লীলতা (ফাহেশা) প্রকাশ পেয়েছে, আল্লাহ তাদের উপর মৃত্যু (মহামারি) চাপিয়ে দিয়েছেন। আর যখনই কোনো জাতি যাকাত দিতে বিরত থেকেছে, আল্লাহ তাদের থেকে বৃষ্টিপাত বন্ধ করে দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد وهم فيه بشير بن مُهاجر، وهو ليس بالقوي يخالف في بعض حديثه ويأتي بما يُنكر عليه، وقد خالفه في هذا الحديث الحسين بن واقد المروزي، وهو من أخص أصحاب عبد الله بن بُريدة، فرواه عن ابن بريدة عن عبد الله بن عباس، من قوله موقوفًا عليه. قال أبو حاتم فيما نقله عنه ابنه في "العلل" (630) و (2773): وهو أشبه، وذكر بأنَّ رواية بشير ابن مهاجر وهمٌ. قلنا: ذلك فقد حسَّن إسناد رواية بشير هذه الحافظُ ابن حجر في "المطالب العالية" (2033)، وجوَّده في "فتح الباري" 17/ 536 - 537.وقد روي من طريق الفُضيل بن غزوان، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "ما منع قوم الزكاة إلّا ابتلاهم الله بالسِّنين"، والسِّنون: القحط والجُدوبة عامًا بعد عام. فهذا ما صحَّ عن بُريدة من الحديث، فدلَّ على أنَّ عبد الله بن بريدة روى عن أبيه هذا القدر من الحديث فقط باللفظ المذكور، وروى عن ابن عباس موقوفًا عليه الرواية بطولها، فوهم بشير بن مهاجر حيث جعل ما رواه عبد الله بن بريدة عن ابن عباس موقوفًا، من رواية ابن بريدة عن أبيه مرفوعًا، وعلى أي حال فللحديث شواهد يحسن بها.وأخرجه البيهقي في "السنن" 9/ 231 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر بن أبي شيبة في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ (950) و (2033)، والبزار (4463)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير"، وأبو بكر الروياني في "مسنده" كما في "المطالب" أيضًا، وابن المنذر في "الأوسط" (6289)، وابن أبي حاتم الرازي في "العلل" (2773)، والبيهقي في "السنن" 3/ 346 و 9/ 231، وفي "شعب الإيمان" (3040) من طرق عن عبيد الله بن موسي، به.وأخرجه البيهقي في "السنن" 3/ 346، وفي "الشُّعب" (3039) من طريق الحسين بن واقد، عن عبد الله بن بريدة، عن ابن عباس قوله موقوفًا عليه.وأخرج الطبراني في "الأوسط" (4577) و (6788)، وأبو عبد الله ابن مَنْدَهْ في "مجالس من أماليه" (145)، وتمام الرازي في "فوائده" (940) من طريق الفضيل بن غزوان. ووقع عند الطبراني في الموضع الأول: الفضيل بن مرزوق، وابن غزوان أصح -عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه بريدة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما منع قوم الزكاة إلّا ابتلاهم الله بالسنين". وإسناده حسن.ويشهد للحديث بطوله حديث ابن عمر الآتي عند المصنف برقم (8837)، وإسناده جيد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2610)


2610 - حدثنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، حدثنا عبد الله بن محمد بن ناجيَة، حدثنا أبو كُريب، حدثنا أبو معاوية، حدثنا أبو إسحاق الشَّيباني، عن محمد ابن أبي المُجالِد، عن عبد الله بن أبي أَوفى قال: قلتُ: هل كنتم تخمِّسون الطعامَ في عهدِ رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال: أصبْنا طعامًا يوم خيبر، وكان الرجل يجيءُ فيأخذُ منه بمِقدار ما يكفيه، ثم ينصرفُ [1].صحيح على شرط البخاري، فقد احتجَّ بمحمد بن أبي المجالد وعبد الله بن أبي المجالد جميعًا، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনু আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জিজ্ঞেস করলাম: আপনারা কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে খাদ্যদ্রব্যের এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) গ্রহণ করতেন? তিনি বললেন: আমরা খায়বার যুদ্ধের দিন কিছু খাদ্যদ্রব্য লাভ করেছিলাম। লোকেরা আসত এবং যে পরিমাণ তাদের জন্য যথেষ্ট হত, সেই পরিমাণ নিত, অতঃপর চলে যেত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو كريب: هو محمد بن العلاء، وأبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير، وأبو إسحاق الشَّيباني: هو سليمان بن أبي سليمان.وأخرجه أبو داود (2704) عن أبي كريب محمد بن العلاء، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2633) من هُشَيم بن بَشير عن أبي إسحاق الشَّيباني وأشعث بن سَوَّار.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2611)


2611 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن الصَّنْعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عَبّاد الصَّنْعاني، أخبرنا عبد الرزاق.وأخبرنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ بنَيسابُور وأبو بكر أحمد بن جعفر القَطِيعي ببغداد، قالا: حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن قَتَادة، عن الحسن عن أبي بَكْرة، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "رِيحُ الجنة لَتُوجدُ من مَسِيرة مئة عامٍ، وما مِن عبد يَقتُل نفسًا مُعاهَدَةً إِلَّا حَرَّم الله عليه الجنةَ ورائحتَها أن يَجِدَها". قال أبو بكرة: أصمَّ اللهُ أُذني إن لم أكن سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول هذا [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.وله شاهد عن عبد الله بن عَمرو بإسناد صحيح:




আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “জান্নাতের সুঘ্রাণ একশো বছরের দূরত্ব থেকেও অনুভব করা যাবে। আর যে বান্দা কোনো চুক্তিবদ্ধ ব্যক্তিকে (মু'আহাদ) হত্যা করবে, আল্লাহ তার জন্য জান্নাত এবং তার সুবাস পাওয়া হারাম করে দেবেন।” আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি যদি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে এ কথা বলতে না শুনে থাকি, তবে আল্লাহ আমার কান বধির করে দিন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. الحسن: هو البصري.وهو في "مسند أحمد" (34/ 20469)، لكنه قال فيه: عن قتادة وغير واحد.وقد تقدم برقم (134) (135) من طريق يونس بن عبيد عن الحسن البصري.وبرقم (136) من طريق الأشعث بن ثُرْمُلة عن أبي بَكرة.وسيأتي برقم (2663) من طريق عبد الرحمن بن جَوشَن عن أبي بَكرة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2612)


2612 - أخبرَناه أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا الحسين بن إدريس الأنصاري، حدثنا علي بن مسلم الطُّوسي، حدثنا مروان بن معاوية الفَزَاري، أخبرنا الحسن بن عمرو الفُقَيمي، حدّثنا مجاهد، عن جُنادة بن أبي أُميّة، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن قَتَل قَتِيلًا من أهل الذِّمَّة، لم يَرَحْ رِيحَ الجنة، وإنَّ ريحَها لَتُوجدُ مِن كذا وكذا" [1].صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!وله شاهد من حديث أبي هريرة صحيح على شرط مسلم:




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি যিম্মী শ্রেণীভুক্ত কাউকে হত্যা করবে, সে জান্নাতের ঘ্রাণও পাবে না। অথচ জান্নাতের ঘ্রাণ এত এত দূর থেকেও পাওয়া যায়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وقد اختُلف فيه على الحسن بن عمرو الفُقيمي، فرواه عنه مروان بن معاوية الفزاري كما وقع عند المصنف هنا، وخالفه عبد الواحد بن زياد وعبد الرحمن بن مَغْراء وأبو معاوية الضرير، فرووه عن الحسن بن عمرو، عن مجاهد، عن عبد الله بن عمرو، دون ذكر جنادة بن أبي أمية في إسناده. وقد صوَّب الدارقطني في "التتبع" رواية مروان بن معاوية، لكن قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 9/ 499 ردًّا على الدارقطني: لكن سماع مجاهد من عبد الله بن عمرو ثابت، وليس هو بمدلّس، فيحتمل أن يكون مجاهد سمعه أولًا من جنادة، ثم لقي عبد الله بن عمرو، أو سمعاه معًا وثبَّته فيه جنادة، فحدّث به عن عبد الله بن عمرو تارة، وحدَّث به عن جنادة أُخرى.وأخرجه أحمد (11/ 6745) عن إسماعيل بن محمد المعَقِّب، والنسائي (6926) و (8689) عن عبد الرحمن بن إبراهيم دُحيم، كلاهما عن مروان بن معاوية، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (3166) و (6914) من طريق عبد الواحد بن زياد، وابن ماجه (2686) من طريق أبي معاوية الضرير، كلاهما عن الحسن بن عمرو، عن مجاهد، عن عبد الله بن عمرو. دون ذكر جنادة بن أبي أمية.وتابعهما عبد الرحمن بن مَغْراء عند البزار (2373).وقوله: "لم يَرَحْ ريح الجنة" أي: لم يَشَمَّ ريحها، يقال: راح يَرَاح، وراح يَريح، وأراح يُراح.وذكر الحافظ ابن حجر في "الفتح" 9/ 499 عن ابن التين قوله: الأول أجود، وعليه الأكثر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2613)


2613 - حدَّثَناه أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدّثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدّثنا نصر بن علي الجَهْضَمِي، حدثنا مَعْدِي بن سليمان، حدثنا ابن عَجْلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ألا مَن قتل معاهَدًا له ذِمّةُ الله وذِمّةُ رسولِه، فقد خَفَرَ ذِمّةَ الله، ولا يَرَحْ [1] ريحَ الجنةِ، وإنَّ ريحها لتُوجدُ من مسيرةِ سبعين خَرِيفًا" [2].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “সাবধান! যে ব্যক্তি কোনো চুক্তিবদ্ধ (অমুসলিম)-কে হত্যা করবে, যার জন্য আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের পক্ষ থেকে নিরাপত্তা রয়েছে, সে আল্লাহর নিরাপত্তা ভঙ্গ করলো। আর সে জান্নাতের ঘ্রাণও পাবে না, অথচ এর সুঘ্রাণ সত্তর বছরের দূরত্ব থেকেও পাওয়া যায়।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك جاءت الرواية بسكون آخر الفعل، مع أنَّ حرف "لا" هنا حرف نفي لا حرف نهي لزامًا، وذلك مستعمل في فصيح الكلام تخفيفًا، ومنه قوله صلى الله عليه وسلم: "لا تدخلوا الجنة حتى تؤمنوا"، ومنه قراءة أبي عمرو بن العلاء لقوله تعالى: (وما يُشعِرْكُم) [الأنعام: 109] بسكون الراء، مع أنه لا جازم قبل الفعل، وذلك على إسكان المرفوع تخفيفًا. انظر "المحتسب" لابن جني 1/ 227، و"الدر المصون" للسمين الحلبي 5/ 17. ابن سعيد السَّرْخَسي، عن يحيى بن سعيد القطان، به.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف معدي بن سليمان، لكن روي الحديث من وجه آخر صحيح عن أبي هريرة. ابن عجلان: هو محمد.وأخرجه ابن ماجه (2687)، والترمذي (1403) عن محمد بن بشار، عن معدي بن سليمان، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح، وقد روي من غير وجه عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (8011)، وأبو بكر الإسماعيلي في "معجم شيوخه" 3/ 725، وحمزة بن يوسف السهمي في "تاريخ جرجان" ص 323 من طريق محمد بن مهران الجمّال، عن عيسى بن يونس السَّبيعي، عن عوف الأعرابي، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة. لكن لفظه عندهم: "مسيرة مئة عام". ابن سعيد السَّرْخَسي، عن يحيى بن سعيد القطان، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2614)


2614 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد وبِشر بن المفضَّل، عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حَبّان، عن أبي عَمْرة، عن زيد بن خالد الجُهَني: أنَّ رجلًا من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم تُوفي يومَ خيبر [1] فذكروا لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "صلُّوا على صاحبِكم"، فتغيَّر وجوهُ الناسِ لتلك، فقال: "إنَّ صاحبَكم غَلَّ في سبيل الله"، ففتَّشْنا متاعَه فوجدنا خَرَزًا من خَرَز اليهود لا يُساوي درهمين [2]. حديث صحيح على شرط الشيخين، وأظنهما لم يخرجاه.




যায়িদ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের মধ্যে থেকে এক ব্যক্তি খায়বার যুদ্ধের দিন মৃত্যুবরণ করেন। অতঃপর তারা তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলে তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের সাথীর জানাযার সালাত আদায় করো।" এতে লোকদের মুখমণ্ডল বিবর্ণ হয়ে গেল। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের এই সাথী আল্লাহর পথে (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) আত্মসাৎ করেছে (খিয়ানত করেছে)।" অতঃপর আমরা তার জিনিসপত্র তন্ন তন্ন করে খুঁজলাম এবং তাতে ইহুদিদের থেকে নেওয়া একটি পুঁতির মালা পেলাম, যার মূল্য দুই দিরহামও ছিল না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) و (ع) إلى: حنين، والصواب من (ص) ومصادر التخريج. ابن سعيد السَّرْخَسي، عن يحيى بن سعيد القطان، به.



[2] إسناده حسن كما بيناه عند الرواية المتقدمة برقم (1362). يحيى بن سعيد شيخ مُسدَّد: هو القطان، وشيخ القطان: هو ابن قيس الأنصاري.وأخرجه أبو داود (2710) عن مُسدَّد، وابن حبان (4853) عن الفضل بن الحُبَاب، عن مُسدَّد، بهذا الإسناد. لكن لم يذكر الفضل في روايته بشر بن المفضل.وأخرجه أحمد (36/ 21675) عن يحيى بن سعيد القطان، والنسائي (2097) عن عُبيد الله ابن سعيد السَّرْخَسي، عن يحيى بن سعيد القطان، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2615)


2615 - أخبرنا أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا محبُوب بن موسى، أخبرنا أبو إسحاق الفَزَاري، عن عبد الله بن شَوْذَب، حدثني عامر بن عبد الواحد، عن عبد الله بن بُريدة، عن عبد الله بن عَمرو، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أصاب غَنيمةً أمر بلالًا فنادى في الناس، فيَجيئون بغنائمِهم، فيُخمِّسُه ويَقسِمُه، فجاء رجلٌ بعد ذلك بزِمَام من شَعر، فقال: يا رسول الله، هذا فيما كنّا أصَبْناه من الغنيمة، قال: "أسمعتَ بلالًا نادى ثلاثًا؟ " قال: نعم، قال: "فما مَنَعَك أن تجيءَ به؟ " قال: يا رسول الله، فاعتَذَرَ، قال: "كُنْ أَنتَ تَجيءُ به يومَ القيامة، فلن أقبَلَه عنكَ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো গণীমতের মাল পেতেন, তখন তিনি বিলালকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকদের মধ্যে ঘোষণা করার নির্দেশ দিতেন। লোকেরা তাদের গণীমতের মাল নিয়ে আসতো, অতঃপর তিনি তার পঞ্চমাংশ বের করতেন এবং তা বণ্টন করতেন। এরপর এক ব্যক্তি চুলের তৈরি একটি লাগাম নিয়ে আসলো এবং বললো, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), এটা সেইসব গণীমতের মালের অন্তর্ভুক্ত যা আমরা লাভ করেছিলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি কি বিলালকে তিনবার ঘোষণা দিতে শোনোনি?" লোকটি বললো, হ্যাঁ। তিনি বললেন, "তবে কী তোমাকে এটা নিয়ে আসতে বাধা দিয়েছিল?" লোকটি বললো, ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)!— এভাবে সে ওযর পেশ করলো। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমিই কিয়ামতের দিন এটা নিয়ে এসো, আমি তোমার পক্ষ থেকে এটি গ্রহণ করব না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل عامر بن عبد الواحد: وهو البصري الأحول. أبو إسحاق الفزاري: هو إبراهيم بن محمد بن الحارث، صاحب "السير".وأخرجه أبو داود (2712) عن أبي صالح محبوب بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن حبان (4809) و (4858) من طريق محمد بن عبد الرحمن بن سهم، عن أبي إسحاق الفزاري، به.وأخرجه أحمد (11/ 6996) من طريق عبد الله بن المبارك، عن عبد الله بن شوذب، به.وسيأتي برقم (2650) من طريق أيوب بن سويد عن عبد الله بن شوذب.والزِّمَام: خِطام الدابّة.وقال الطيبي في "شرح المشكاة" 9/ 2771: هذا واردٌ على سبيل التغليظ، لا أنَّ توبته غير مقبولة، ولا أنَّ المظالم على أصحابها أو الاستحلال منهم غير ممكن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2616)


2616 - حدثنا علي بن عيسى، حدثنا أحمد بن نَجْدة القرشي، حدثنا سعيد بن منصور، حدثنا عبد العزيز بن محمد، حدثني صالح بن محمد بن زائدة، قال: دخل مَسلَمةُ أرضَ الروم، فأُتي برجل قد غَلّ، فسأل سالمًا عنه، فقال: سمعتُ أبي يحدّث عن عمر بن الخطاب، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "إذا وجدتُم الرجلَ قد غَلَّ فأحرِقُوا مَتاعَه واضرِبُوه"، قال: فوجدنا في مَتاعِه مُصحفًا، فسُئل سالمٌ عنه، فقال: بِعْهُ وتَصدَّقُ بثمنِه [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ‌‌كتاب قَسم الفَيْءوالأصلُ فيه من كتاب الله عز وجل.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মাসলামা (রাহিমাহুল্লাহ) রোম সাম্রাজ্যে প্রবেশ করলেন। সেখানে গনীমতের মালে খিয়ানতকারী (গ—ল্ল) এক ব্যক্তিকে আনা হলো। তিনি (মাসলামা) সালিমকে তার সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। সালিম বললেন: আমি আমার পিতাকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি যে তিনি বলেছেন: "যখন তোমরা কোনো ব্যক্তিকে (গনীমতের মালে) খিয়ানতকারী (গ—ল্লা) হিসেবে পাবে, তখন তার মালপত্র জ্বালিয়ে দেবে এবং তাকে প্রহার করবে।" বর্ণনাকারী বলেন, আমরা তার মালামালের মধ্যে একটি মুসহাফ (কুরআন) পেলাম। সালিমকে এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: এটি বিক্রি করে দাও এবং এর মূল্য সদকা করে দাও।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف صالح بن محمد بن زائدة، فقد قال عنه البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "جامعه" بإثر الحديث (1461): هو منكر الحديث، وقال الترمذي عن حديثه هذا: حديث غريب. قلنا: ورواه صالح بن محمد هذا بسياقة أخرى عند أبي داود (2714) من طريق أبي إسحاق الفزاري، عنه: أنهم غزوا مع الوليد بن هشام، ومعهم سالم بن عبد الله بن عمر وعمر بن عبد العزيز، فغلَّ رجلٌ متاعًا، فأمر الوليد بمتاعه فأُحرق، وطيفَ به، ولم يُعطه سهمَه. وقال أبو داود بإثره: هذا أصح الحديثين.وتابعه الحافظ ابن حجر في "النكت الظراف" (6763)، لكنه جعل الوهم فيه من عبد العزيز بن محمد - وهو الدَّراوَردي - والأليق أن يكون الوهم فيه من صالح بن محمد نفسه كما أشار إليه الدارقطني والمنذري كما في "مختصر سنن أبي داود" 4/ 40، وبيان ذلك أن يكون اضطرب في ذكر القصة. ولم يضبط الرواية، فجعل ذكر الإحراق لمتاع الغالّ مرة مرفوعًا، ومرة مقطوعًا من فعل الوليد بن هشام. ومسلمة المذكور: هو ابن عبد الملك بن مروان.وأخرجه أبو داود (2713) عن سعيد بن منصور، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود أيضًا (2713) عن عبد الله بن محمد النُّفيلي، والترمذي (1461) عن محمد بن عمرو السَّواق، كلاهما عن عبد العزيز بن محمد الدراوردي، به.وقال البخاري فيما نقله عنه الترمذي: وقد روي في غير حديث عن النبي صلى الله عليه وسلم في الغالّ، فلم يأمر فيه بحرق متاعه.وانظر لزامًا كلام محمد بن الحسن الشَّيباني في "السير الكبير" 4/ 1206 - 1211.وفي الباب عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبا بكر وعمر حرقوا متاعَ الغالِّ وضربوه. وسيأتي عند المصنف برقم (2624)، وإسناده ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2617)


2617 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا هارون بن سليمان الأصبهاني، حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي، حدثنا سفيان الثَّوْري، عن قيس بن مُسلم [1]، قال: سألت الحسن بن محمد عن قول الله تبارك وتعالى: {وَاعْلَمُوا أَنَّمَا غَنِمْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَأَنَّ لِلَّهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ} [الأنفال: 41]، قال: هذا مِفتاحُ كلامٍ، للهِ [2] تعالى ما في الدنيا والآخرة، قال: اختلف الناسُ في هذين السهمَين بعد وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال قائلون: سَهْمُ القُربَى لقَرابة النبي صلى الله عليه وسلم، وقال قائلون: لقَرابة الخليفة، وقال قائلون: سهمُ النبي صلى الله عليه وسلم للخليفة مِن بعده، فاجتمع رأيُهم على أن يجعلوا هذين السهمَين في الخيل والعُدَّة في سبيل الله، فكانا على ذلك في خلافة أبي بكر وعمر رضي الله عنهما [3].




কাইস ইবনে মুসলিম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহ তা'আলার বাণী: "আর জেনে রাখো, তোমরা যা কিছু গনীমত হিসেবে লাভ করো, তার এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) আল্লাহ এবং রাসূলের জন্য..." (সূরা আল-আনফাল: ৪১) সম্পর্কে আল-হাসান ইবনে মুহাম্মাদকে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি (আল-হাসান) বললেন: এটি হলো কথার সূচনা। আল্লাহ তা'আলার জন্যই দুনিয়া ও আখিরাতে যা কিছু আছে। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাতের পর এই দুটি অংশ (আল্লাহ ও রাসূলের অংশ) নিয়ে মানুষের মধ্যে মতভেদ দেখা দেয়। তখন কেউ কেউ বললেন: নিকটাত্মীয়দের অংশ (সাহমুল কুরবা) হলো নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আত্মীয়দের জন্য। আবার কেউ কেউ বললেন: তা হলো খলীফার আত্মীয়দের জন্য। আর কেউ কেউ বললেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অংশ তাঁর পরবর্তী খলীফার জন্য। অতঃপর তাঁদের সম্মিলিত সিদ্ধান্ত হলো যে, এই দুটি অংশকে তারা আল্লাহর রাস্তায় ঘোড়া এবং যুদ্ধ-সরঞ্জাম প্রস্তুত করার কাজে ব্যয় করবেন। আর আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে এইভাবেই তা কার্যকর ছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: محمد، والمثبت على الصواب من رواية البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 338 عن أبي عبد الله الحاكم، وفاقًا لسائر مصادر التخريج التي خرَّجت هذا الخبر.



[2] وقع في (ص) و (ع): مفتاح كلام الله، بإضافة لفظ الجلالة إلى لفظة "كلام"، والمثبت من (ز) و (ب) وهو الصحيح، كما جاء في رواية البيهقي عن أبي عبد الله الحاكم، على الاستئناف.



2617 [3] - إسناده صحيح إلى الحسن بن محمد: وهو ابن علي بن أبي طالب، المعروف أبوه بابن الحنفية، لأنَّ أمَّه من بني حنيفة.وأخرجه النسائي (4429) من طريق أبي إسحاق الفَزَاري، عن سفيان الثَّوري، به.وقد جاء في رواية النسائي بيان المراد بالسهمين المذكورين بأنهما سهم الرسول صلى الله عليه وسلم وسهم ذوي القُربى.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2618)


2618 - حدثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا يعقوب بن يوسف القَزْويني، حدثنا محمد بن سعيد بن سابِق، حدثنا أبو جعفر الرازي، عن مُطرِّف، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، قال: سمعت عليًّا يقول: ولَّاني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم خَمْسَ الخُمس، فوضعتُه مَواضِعَه حياةَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وعمر رضي الله عنهما [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে খুমুসের (গনীমতের এক-পঞ্চমাংশের) এক-পঞ্চমাংশের (অর্থাৎ খুমুসের খুমুস-এর) দায়িত্ব দিয়েছিলেন। আমি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবদ্দশায় এবং আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জীবদ্দশায় তার সঠিক স্থানে ব্যবহার করেছিলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، أبو جعفر الرازي - وهو عيسى بن أبي عيسى - صدوق يعتبر به، لكن خالفه أبو عوانة الوضّاح بن عبد الله اليشكُري كما قال الدارقطني في "العلل" (405)، وهو ثقة حجة، فرواه عن مطرِّف - وهو ابن طَرِيف - عن رجل يقال له: كثير عن عبد الرحمن بن أبي ليلى. وقال علي بن المديني والدارقطني: كثير هذا مجهول، وقال الدارقطني: ومطرِّف لم يسمع من ابن أبي ليلى.قلنا: وقد احتمل الحافظان أبو زرعة ابنُ العراقي وابنُ حجر أن يكون كثيرٌ المذكور ابنَ عُبيد رضيعَ عائشة، فإن صحَّ قولهما فإسناد رواية أبي عوانة حسنٌ، والله أعلم. على أنه قد روي هذا الخبر من وجه آخر عن عبد الرحمن بن أبي ليلى كما سيأتي.وأخرجه أبو داود (2983) من طريق يحيى بن أبي بكير، عن أبي جعفر الرازي، بهذا الإسناد. وسيأتي من هذا الطريق عند المصنف برقم (4394).وأخرجه أبو داود (2984) من طريق الحسين بن ميمون الخِنْدِفي، عن عبد الله بن عبد الله الرازي، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن علي بن أبي طالب، قال: قلت: يا رسول الله إن رأيتَ أن تُولّيَني حقَّنا من هذا الخمس في كتاب الله، فأقسمه حياتك كي لا ينازعني أحدٌ بعدك، فافعل، قال: ففعل ذلك، قال: فقسمتُه حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم ولّانيه أبو بكر، حتى كانت آخر سنةٍ من سِني عمر … والحسين بن ميمون هذا يُعتبر به في المتابعات والشواهد، وقد توبع كما ترى.قوله: "خَمْسَ الخُمس، أي: قَبْض خُمس الغنيمة، من: خَمَسَهم خَمْسًا: أَخَذَ خُمس أموالهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2619)


2619 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصفّار، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو حذيفة وأبو نُعيم، قالا: حدثنا سفيان، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، قالت: كانت صفيَّةُ من الصَّفِيّ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সাফিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন ‘আস-সাফী’ (মনোনীত অংশ)-এর অন্তর্ভুক্ত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النَّهدي، وأبو نعيم: هو الفضل بن دُكين، وسفيان: هو الثَّوري.وسيأتي عند المصنف برقم (4393) من طريق أبي أحمد الزُّبَيري عن سفيان الثَّوري. وانظر تخريجه هناك.والصفيُّ: ما يأخذُه رئيس الجيش ويختارُه لنفسه من الغنيمة قبل القسمة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2620)


2620 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني ابن أبي الزِّناد، عن أبيه، عن عُبيد الله بن عبد الله بن عُتبة، عن ابن عباس، قال: تَنفَّل رسول الله صلى الله عليه وسلم سيفَه ذا الفَقَار يومَ بدرٍ، قال ابن عباس: وهو الذي رأى فيه الرؤيا يومَ أُحدٍ، وذلك أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لما جاءه المشركون يوم أُحد، كان رأيُ رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُقيم بالمدينة يقاتِلُهم فيها، فقال له ناس لم يكونوا شَهِدوا بدرًا: يخرجُ بنا رسولُ الله إليهم نقاتِلُهم بأحدٍ، وَتَرَجَّوا [1] أن يُصِيبوا من الفَضِيلة ما أصابَ أهلُ بدرٍ.فما زالوا برسول الله صلى الله عليه وسلم حتى لَبِسَ أداتَه، نَدِموا، وقالوا: يا رسول الله، أقِمْ، فالرأيُ رأيُك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما ينبغي لنبيٍّ أن يضعَ أدَاتَه بعد أن لَبِسَها، حتى يَحكُم اللهُ بينَه وبين عَدُوِّه"، قال: وكان لما قال لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ قبل أن يَلْبَس الأداةَ: "إني رأيتُ أني في دِرْعٍ حَصينةٍ، فأوّلتُها المدينةَ، وأني مُردِفٌ كَبْشًا، فَأَوَّلْتُه كَبْشَ الكَتيبةِ، ورأيتُ أن سيفي ذا الفَقَارِ فُلَّ، فأوّلْتُه فَلًّا فيكم، ورأيت بَقَرًا تُذبَح، فبَقْرٌ والله خيرٌ، فبَقْرٌ والله خيرٌ" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের যুদ্ধের দিন তাঁর তরবারি ‘যুল-ফাকার’ গনিমত হিসেবে গ্রহণ করেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এটিই সেই তরবারি, যা তিনি উহুদ যুদ্ধের দিন স্বপ্নে দেখেছিলেন। কারণ উহুদ যুদ্ধের দিন যখন মুশরিকরা তাঁর কাছে আগমন করলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মত ছিল যে তিনি মদীনার ভেতরে অবস্থান করবেন এবং সেখান থেকেই তাদের সাথে যুদ্ধ করবেন। তখন কিছু লোক, যারা বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেনি, তারা তাঁকে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আমাদের নিয়ে তাদের দিকে বের হন, আমরা উহুদে গিয়ে তাদের সাথে যুদ্ধ করবো। তারা এই আশা পোষণ করছিল যে তারা বদরবাসীদের মতো ফজিলত লাভ করবে। তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বারবার বলতে থাকল, যতক্ষণ না তিনি তাঁর যুদ্ধাস্ত্র পরিধান করলেন। (যখন তিনি পরিধান করলেন), তখন তারা অনুতপ্ত হলো এবং বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি (মদীনায়) অবস্থান করুন, আপনার মতই সঠিক মত। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কোনো নবীর জন্য এটা সমীচীন নয় যে তিনি একবার যুদ্ধাস্ত্র পরিধান করার পর তা খুলে ফেলবেন, যতক্ষণ না আল্লাহ তাঁর ও তাঁর শত্রুর মধ্যে ফায়সালা করে দেন।" তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: আর সেই দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুদ্ধাস্ত্র পরিধান করার আগে তাদের বলেছিলেন: "আমি স্বপ্নে দেখেছি যে আমি একটি মজবুত বর্মের ভেতরে আছি, আমি এর ব্যাখ্যা করেছি মদীনা (শহর) হিসেবে। এবং আমি দেখেছি যে আমি একটি ভেড়ার পিঠে আরোহণ করছি, আমি এর ব্যাখ্যা করেছি (শত্রু) বাহিনীর নেতা হিসেবে। আর আমি দেখেছি যে আমার তরবারি ‘যুল-ফাকার’ ভোঁতা হয়ে গেছে (আংশিক ভেঙে গেছে), আমি এর ব্যাখ্যা করেছি তোমাদের (সাহাবীদের) মধ্যে আঘাত (বা ক্ষতি) হিসেবে। আর আমি দেখেছি যে কিছু গরু জবাই করা হচ্ছে। আল্লাহর কসম! গরু দেখা কল্যাণকর, আল্লাহর কসম! গরু দেখা কল্যাণকর।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ب): ورَجَوا، وهما بمعنًى. ومن حديث جابر بن عبد الله عند أحمد (23/ 14787)، والنسائي (7600).قوله: "فُلَّ" أي: ثُلِمَ، والثُّلْمة: كَسْرٌ في حَدِّ السيف.وقوله: "فبَقْرٌ" بسكون القاف: هو شقُّ البطن، وهذا أحد وجوه التعبير أن يُشتق من الاسم معنًى مناسب. قاله الحافظ في "الفتح" 12/ 206 - 207.وقوله: "والله خير" إما أن يكون برفع لفظ الجلالة وخبره "خيرٌ" على تقدير محذوف، أي: وصُنع الله بالمقتولين خير لهم من مقامهم في الدنيا، وإما أن يكون بجرّ لفظ الجلالة على القسم، لتحقيق الرؤيا، ومعنى خير بعد ذلك على التفاؤل في تأويل الرؤيا. نقله القسطلّاني في "إرشاد الساري" 6/ 67 عن "المصابيح".والكتيبة: القطعة من الجيش.



[2] إسناده حسن كما قال البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 41، وقد رواه عن أبي عبد الله الحاكم، وذلك من أجل ابن أبي الزِّناد - واسمه عبد الرحمن - فهو حسن الحديث، وقصة الرؤيا وتأويلها صحيحة رُويَت من وجهين آخرين عن النبي صلى الله عليه وسلم. ابن وهب: هو عبد الله بن وهب المصري.وأخرجه مختصرًا بذكر سيف النبي صلى الله عليه وسلم ذي الفَقَار والرؤيا التي أُريها فيه: أحمد (4/ 2445) عن سُريج بن النعمان، عن ابن أبي الزِّناد، بهذا الإسناد.وأخرجه مختصرًا بذكر سيفه صلى الله عليه وسلم: ابنُ ماجه (2808) من طريق محمد بن الصَّلْت الأسدي، والترمذي (1561/ 2) عن هناد بن السري، كلاهما عن ابن أبي الزِّناد، به. وقال الترمذي: حسن غريب.وقد رُويَت هذه الرؤيا بعينها من حديث أبي موسى الأشعري عند البخاري (3622) ومسلم (2272). ومن حديث جابر بن عبد الله عند أحمد (23/ 14787)، والنسائي (7600).قوله: "فُلَّ" أي: ثُلِمَ، والثُّلْمة: كَسْرٌ في حَدِّ السيف.وقوله: "فبَقْرٌ" بسكون القاف: هو شقُّ البطن، وهذا أحد وجوه التعبير أن يُشتق من الاسم معنًى مناسب. قاله الحافظ في "الفتح" 12/ 206 - 207.وقوله: "والله خير" إما أن يكون برفع لفظ الجلالة وخبره "خيرٌ" على تقدير محذوف، أي: وصُنع الله بالمقتولين خير لهم من مقامهم في الدنيا، وإما أن يكون بجرّ لفظ الجلالة على القسم، لتحقيق الرؤيا، ومعنى خير بعد ذلك على التفاؤل في تأويل الرؤيا. نقله القسطلّاني في "إرشاد الساري" 6/ 67 عن "المصابيح".والكتيبة: القطعة من الجيش.