হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2621)


2621 - حدَّثَناه أبو أحمد بكر بن محمد بن حَمْدان الصَّيْرفي بمَرُو من أصل كتابه، حدثنا أبو قِلابة عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي، حدثنا يحيى بن حماد، حدثنا أبو عَوَانة، عن الأعمش، عن سعد بن عُبيدة، حدثني عبد الله بن بُريدة الأسلمي، قال: إني لأمشي مع أبي إذ مرَّ بقومٍ يَتَنقَّصون عليًّا، ويقولُون فيه، فقام فقال: إني كنت أَنالُ من عليٍّ، وفي نفسي عليه شيءٌ، وكنت مع خالد بن الوليد في جيش فأصابوا غنائمَ، فعَمَدَ عليٌّ إلى جاريةٍ من الخُمس، فأخذها لنفسه، وكان بين علي وبين خالد شيءٌ، فقال خالد: هذه فُرصتك - وقد عرف خالدٌ الذي في نفسي على عليّ - فانطلِقْ إلى النبي صلى الله عليه وسلم فاذكُر ذلك له، فأتيتُ النبي صلى الله عليه وسلم، فحدَّثتُه وكنتُ رجلًا مِكْبابًا، وكنتُ إذا حدَّثْتُ الحديثَ أكبَبْتُ، ثم رفعتُ رأسي، فذكرتُ للنبي صلى الله عليه وسلم أمْرَ الجيشِ، ثم ذكرتُ له أمرَ عليٍّ، فرفعتُ رأسي، وأوداجُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم قد احمرَّت، قال: فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "مَن كنتُ وَلِيَّه فإنَّ عليًّا وليُّه"، وذهَبَ الذي في نفسي عليه [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، إنما أخرجه البخاري من حديث علي بن سُويد بن مَنْجُوف، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه، مختصرًا [2]، وليس في هذا الباب أصح من حديث أبي عَوَانة هذا عن الأعمش عن سعد بن عُبيدة.وهكذا رواه وكيع بن الجرّاح عن الأعمش:




বুরয়দাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমি আমার পিতার সাথে হাঁটছিলাম। এমতাবস্থায় তিনি এমন একদল লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যারা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সমালোচনা করছিল এবং তার সম্পর্কে খারাপ কথা বলছিল। তখন তিনি দাঁড়িয়ে বললেন: আমি আলীর প্রতি অসন্তুষ্ট ছিলাম এবং আমার মনে তার প্রতি কিছুটা বিদ্বেষ ছিল। আমি খালিদ ইবনু ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে এক সেনাদলে ছিলাম। তারা কিছু গণীমত লাভ করল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খুমুস (পঞ্চমাংশ)-এর মধ্য থেকে একটি দাসী গ্রহণ করলেন এবং তাকে নিজের জন্য রেখে দিলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে কিছুটা মনোমালিন্য ছিল। খালিদ বলল: 'এটিই তোমার সুযোগ!' - খালিদ আমার মনে আলীর প্রতি যে বিদ্বেষ ছিল তা জানতেন - 'সুতরাং তুমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট যাও এবং এই বিষয়টি তাঁর কাছে উল্লেখ করো।'

এরপর আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট আসলাম এবং তাঁকে বিষয়টি বললাম। আমি ছিলাম এমন লোক যে কথা বলার সময় মাথা ঝুঁকিয়ে দিত। যখনই আমি কোনো হাদীস বলতাম, মাথা ঝুঁকিয়ে দিতাম এবং তারপর মাথা তুলতাম। আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে সেনাবাহিনীর বিষয়টি উল্লেখ করলাম, অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিষয়টিও উল্লেখ করলাম। এরপর যখন মাথা তুললাম, তখন দেখলাম রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর গলার শিরাগুলো রাগে লাল হয়ে গেছে। তিনি বললেন: "আমি যার ওলী (অভিভাবক/বন্ধু), আলীও তার ওলী।" এরপর আমার মন থেকে তাঁর (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) প্রতি যে বিদ্বেষ ছিল তা দূর হয়ে গেল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل أبي قلابة، فهو صدوق لا بأس به، وقد توبع. أبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكُري، والأعمش: هو سليمان بن مهران. وأخرجه مختصرًا أحمد (38/ 22961)، والنسائي (8411)، وابن حبان (6930) من طريق أبي معاوية، عن الأعمش، بهذا الإسناد.وسيأتي بعده من طريق وكيع بن الجراح عن الأعمش. وسيأتي بنحوه برقم (4629) من طريق ابن عباس عن بريدة.وأخرجه بنحوه أحمد (38/ 23012)، والنسائي (8421) من طريق الأجلح بن عبد الله الكِنْدي، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه. ولفظ المرفوع آخره: "لا تَقَعَنَّ يا بُريدةُ في عليٍّ، فإنَّ عليًّا مني، وأنا منه، وهو وليُّكم بَعدي". هذا لفظ النسائي. والأجلح فيه لِينٌ.وانظر حديث عمران بن حُصين الآتي برقم (4630)، وحديث ابن عباس الآتي برقم (4702).والمِكباب: الكثير النظر إلى الأرض.وقد استُشكِل قسمة عليٍّ لنفسه، وهو جائز في مثل ذلك ممن هو شَريك فيما يقسمه، كالإمام إذا قسم بين الرعيّة وهو منهم، فكذلك من نصّبه الإمام قام مقامه. انظر "فتح الباري" 12/ 622.



[2] أخرجه برقم (4350)، لكن بلفظ: "يا بُريدة، أتُبغضُ عليًّا؟ " فقلت: نعم، قال: "لا تُبغضْه، فإنَّ له في الخُمس أكثر من ذلك".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2622)


2622 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا موسى بن إسحاق القاضي، حدثنا عبد الله [1] بن أبي شَيْبة، حدثنا وكيع، عن الأعمش، عن سعد بن عُبيدة، عن ابن بُريدة، عن أبيه: أنه مَرَّ على مجلسٍ، ثم ذكر الحديث بنحوه بطوله [2].




বুরীদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি একটি মজলিসের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। অতঃপর তিনি হাদিসটি অনুরূপভাবে পূর্ণরূপে বর্ণনা করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) إلى: عبيد الله، بالتصغير، وإنما هو بالتكبير، وهو الحافظ أبو بكر بن أبي شيبة، مشهور بكنيته لا باسمه.



[2] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد (38/ 23028) و (23057) عن وكيع بن الجراح، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2623)


2623 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل وعبد الله بن الحُسين القاضي، قالا: حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا رَوح بن عُبادة، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك: أنَّ هوازنَ جاءت يوم حُنين بالنساء والصِّبيان، والإبل والغنم، فصَفُّوهم صفوفًا ليَكْثُروا على رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فالتقى المسلمون والمشركون، فولَّى المسلمون مُدبِرين، كما قال الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنا عبدُ الله ورسولُه" وقال: "يا معشرَ الأنصار، أنا عبدُ الله ورسولُه" فهزمَ الله المشركين، ولم يُطْعَن بُرمْحٍ ولم يُضْرَب بسَيفٍ، فقال النبي صلى الله عليه وسلم يومئذٍ: "من قتل كافرًا فله سَلَبُه"، فقتل أبو قَتَادة يومئذٍ عشرين رجلًا، وأخذ أسلابهم، فقال أبو قَتَادة: يا رسول الله، ضربتُ رجلًا على حَبْل العاتِقِ وعليه دِرْعٌ له، فأعجَلْتُ عنه أن آخذ سَلَبَه، فانظر مع من هو يا رسول الله، فقال رجل: يا رسول الله، أنا أخذتها، فأرْضِهِ منها وأعطِنِيها، فسكتَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم، وكان لا يُسأل شيئًا إلّا أعطاهُ أو سكتَ، فقال عمر: لا واللهِ لا يُفيءُ اللهُ على أَسَدٍ من أُسْده ويُعطيكَها، فضحكَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [1]. حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হুনাইনের দিন হাওয়াযিন গোত্রের লোকেরা তাদের স্ত্রী-পুত্র, উট ও ছাগল-ভেড়া নিয়ে এসেছিল এবং তারা (এইগুলোকে) সারিবদ্ধভাবে দাঁড় করিয়েছিল যাতে করে তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের উপর আধিক্য প্রদর্শন করতে পারে। অতঃপর মুসলিম ও মুশরিকদের মাঝে মুকাবিলা হলো। আল্লাহ যেমন বলেছেন, মুসলিমরা তখন পৃষ্ঠপ্রদর্শন করে পালিয়ে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল।" তিনি আরও বললেন: "হে আনসারগণ, আমি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল।" এরপর আল্লাহ মুশরিকদের পরাজিত করলেন। (এই যুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে) কোনো বর্শা দ্বারা আঘাত করা হয়নি এবং কোনো তরবারি দ্বারাও আঘাত করা হয়নি। সেই দিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি কোনো কাফিরকে হত্যা করবে, তার জন্যই থাকবে নিহত ব্যক্তির সলাব (পোশাক ও অস্ত্রশস্ত্র)।" সেদিন আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিশজন লোককে হত্যা করলেন এবং তাদের সলাব নিলেন। আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি এক ব্যক্তিকে তার কাঁধের সংযোগস্থলে আঘাত করেছিলাম। তার গায়ে বর্ম ছিল। কিন্তু আমি দ্রুত তার সলাব নিতে পারিনি। ইয়া রাসূলাল্লাহ! দেখুন, সেটা কার সাথে আছে? তখন এক ব্যক্তি বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমিই সেটা নিয়েছি। আপনি তাকে এর বিনিময়ে সন্তুষ্ট করুন এবং আমাকে এটা দিয়ে দিন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব রইলেন। কেননা তাঁর কাছে কোনো কিছু চাওয়া হলে তিনি হয় তা দিয়ে দিতেন, নতুবা নীরব থাকতেন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আল্লাহ তাঁর সিংহদের মধ্যে একজন সিংহের (দ্বারা অর্জিত সম্পদ) আপনার ওপর ফায় (বন্টনের জন্য) করে দেবেন আর আপনি তা একে দিয়ে দেবেন—এমন হবে না! অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেসে ফেললেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. إلّا أنَّ قوله هنا عند المصنف: فقتل أبو قتادة يومئذٍ عشرين رجلًا، وهمٌ لا ندري هو من روح أو ممَّن دونه، لأن المحفوظ فيه أنَّ الذي قتل العشرين رجلًا هو أبو طلحة الأنصاري، وأنَّ أبا قتادة إنما قتل رجلًا واحدًا فقط، كما في تتمة الحديث هنا، كذلك رواه سائر أصحاب حماد بن سلمة عنه، فحماد بن سلمة ذكر قصة أبي طلحة وقصة أبي قتادة كلتيهما.وأخرجه أحمد (19/ 12131) عن يحيى بن سعيد القطان، و (12236) عن يزيد بن هارون، و (20/ 12977) عن بهز بن أسد العَمِّي، و (21/ 13975) عن عفان بن مسلم، وأبو داود (2718) عن موسى بن إسماعيل، وابن حبان (4836) من طريق عبد الله بن المبارك، و (4838) من طريق عبد الواحد بن غياث، كلهم عن حماد بن سلمة، به. ورواية بعضهم مختصرة بذكر سَلَب أبي طلحة، وقول النبي صلى الله عليه وسلم: "من قتل كافرًا فله سَلَبُه"، مثل الرواية الآتية برقم (5602) من طريق عفان عن حماد.وأخرجه مقتصرًا على هذا الحرف أحمد (20/ 13041)، وابن حبان (4841) من طريق أبي أيوب الإفريقي، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس، بلفظ: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين: "من تفرَّد بدم رجلٍ، فقتله، فله سلبه" فجاء أبو طلحة بسَلَب أحدٍ وعشرين رجلًا.وسيأتي مختصرًا بذكر فرار المسلمين يوم حنين في أول الغزوة ثم عودتهم ونزول النصر برقم (4416) من طريق الحسن البصري عن أنس.وقد روى أبو قتادة قصة قتله الرجلَ وفوات سَلَبه عليه، ثم أخذه بعد ذلك بالبينة مطولًا عند أحمد (37/ 22607)، والبخاري (3142)، ومسلم (1751)، وأبي داود (2717)، والترمذي (1562)، وابن حبان (4805)، لكن وقع فيه أنَّ الذي اعترض على الرجل في قوله: يا رسول الله، أنا أخذتها فأرضِه منها، إنما هو أبو بكر الصدِّيق لا عمر بن الخطاب. قال الحافظ في "الفتح" 12/ 570: هو الراجح، لأنَّ أبا قتادة هو صاحب القصة، فهو أتقنُ لما وقع له فيها من غيره. ويحتمل الجمعُ بأن يكون عمر أيضًا قال ذلك تقوية لقول أبي بكر، والله أعلم.والسَّلَب: ما يأخذه أحدُ القَرْنَين - يعني النظيرَين - من قَرْنه ممّا يكون معه من سلاح وثياب ودابة وغيرها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2624)


2624 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الأصفهاني الزاهد، حدثنا الحسن بن علي بن بحر البَرِّي، حدثني أبي، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثنا زهير بن محمد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبا بكر وعمر أحرَقوا مَتاعَ الغالِّ، ومَنَعوه سَهْمَه وضربوه [1].حديث غريب صحيح، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গনিমতের মালে খিয়ানতকারী ('আল-গাল্ল')-র মালপত্র পুড়িয়ে দিয়েছেন, তাকে তার অংশ দেওয়া বন্ধ করে দিয়েছেন এবং তাকে প্রহার করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، زهير بن محمد - وهو التميمي - رواية أهل الشام عنه غير مستقيمة، لأنَّه كان يحدث هناك من حفظه فيكثر غلطه، والوليد بن مسلم دمشقي، ولم يرو هذا الحديث عنه غيره، وقد اختُلِف عليه في هذا الحديث فروي عنه مرفوعًا موصولًا، كما في رواية المصنف، وروي عنه من قول عمرو بن شعيب مقطوعًا، وهذا يدلُّ على اضطراب زهير فيه.وأخرجه أبو داود (2715) من طريق موسى بن أيوب، عن الوليد بن مسلم بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود بإثر (2715) عن الوليد بن عُتبة وعبد الوهاب بن نجْدة، عن الوليد بن مسلم، عن زهير بن محمد، عن عمرو بن شعيب، لم يتجاوزه.وانظر ما تقدم برقم (2616).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2625)


2625 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، عن بشر بن المُفضَّل، حدثنا محمد بن زيد - هو ابن مُهاجِر الأنصاري - حدثني عُمير مولى آبي اللَّحْم، قال: شهدتُ خيبرَ [1] مع سادتي، فكلَّموا فيَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فأَمَرني فقُلِّدتُ سيفًا، فأخبر أني مملوكٌ، فأمَرَ لي بشيءٍ من خُرْثيِّ المَتاعِ [2].حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উমায়ের মাওলা আবী লাহাম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার মনিবদের সাথে খায়বার যুদ্ধে উপস্থিত ছিলাম। তারা (আমার ব্যাপারে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বললেন। অতঃপর তিনি আমাকে আদেশ করলেন এবং আমাকে একটি তরবারি পরানো হলো। এরপর তাঁকে জানানো হলো যে আমি একজন ক্রীতদাস। তখন তিনি আমার জন্য কিছু সাধারণ ব্যবহার্য জিনিসপত্র দেওয়ার আদেশ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّفت في النسخ الخطية إلى: حنين، من غير نصب بالألف، لكن وضع فوقها في (ز) تنوين فتح، فكأنها كانت في الأصل خيبر، ثم أثبتها بعض النُّسَّاخ: حُنين، ظنًّا منه أنَّ الراء التي في آخرها نون، وأنها تكتب على صورة المرفوع على لغة ربيعة، والصحيح أنها خيبر، كما في "تلخيص المستدرك" للذهبي، ويؤيده أنَّ الحديث في "مسند أحمد" (36/ 21940) وعنه أبو داود (2730) بذكر خيبر.



[2] إسناده صحيح.وهو في "مسند أحمد" (36/ 21940)، وأخرجه عنه أبو داود (2730).وقد تقدم برقم (1239) من طريق قتيبة بن سعيد عن بشر بن المُفضَّل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2626)


2626 - حدثنا أبو جعفر عبد الله بن إسماعيل بن إبراهيم بن المنصورِ أميرِ المؤمنين إملاءً في دار المنصور، حدثنا أبو جعفر محمد بن يوسف بن الطبّاع، حدثنا عمِّي محمد بن عيسى بن الطبّاع، حدثنا مجمِّع بن يعقوب بن مجمِّع بن يزيد الأنصاري قال: سمعت أبي يعقوبُ بن مُجمِّع يذكُر عن عمّه عبد الرحمن بن يزيد بن مُجمِّع الأنصاري، عن عمّه مجمِّع بن جارية الأنصاري - وكان أحدَ القُرّاء الذين قرؤوا القرآن - قال: شَهِدْنا الحُدَيبيَةَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما انصرفْنا عنها إذا الناسُ يَهُزُّون بالأباعِر، فقال بعض الناس لبعض: ما لِلناسِ؟ قالوا: أُوحيَ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فخرجنا مع الناس نُوجِفُ فوجَدْنا النبيَّ صلى الله عليه وسلم واقفًا على راحلته عند كُرَاع الغَمِيم، فلما اجتمعَ عَليه الناسُ قرأ عليهم: {إِنَّا فَتَحْنَا لَكَ فَتْحًا مُبِينًا}، فقال رجل: يا رسول الله، أفتْحٌ هو؟ قال: "نعم والذي نفسُ محمد بيدِه، إنه لَفَتحٌ". فقُسِمَت خيبرُ على أهل الحُدَيبيَة، فقَسَمها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على ستةَ عشرَ [1] سهمًا، وكان الجيشُ ألفًا وخمس مئة، منهم ثلاث مئة فارِسٍ، فأعطى الفارسَ سهمَين، وأعطى الراجِلَ سهمًا [2]. حديث كبير صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




মুজাম্মি' ইবনু জারিয়াহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি ছিলেন কুরআন তিলাওয়াতকারী ক্বারীদের অন্যতম। তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুদায়বিয়ার (সন্ধির সময়) উপস্থিত ছিলাম। যখন আমরা সেখান থেকে ফিরে আসছিলাম, তখন দেখলাম লোকেরা তাদের উটকে দ্রুত চালিত করছে। কিছু লোক অন্যদের জিজ্ঞেস করল: লোকদের কী হলো? তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর ওয়াহী নাযিল হয়েছে। তখন আমরাও লোকদের সাথে দ্রুত চললাম এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কুরা'উল গামীম নামক স্থানে তাঁর সওয়ারীর উপর দাঁড়িয়ে থাকতে দেখলাম। যখন লোকেরা তাঁর কাছে একত্রিত হলো, তিনি তাদের উপর তিলাওয়াত করলেন: "নিশ্চয়ই আমি আপনাকে সুস্পষ্ট বিজয় দান করেছি" (সূরা ফাতহ, ৪৮:১)। তখন এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল: হে আল্লাহর রাসূল, এটা কি বিজয়? তিনি বললেন: "হ্যাঁ। সেই সত্তার কসম, যাঁর হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ, নিশ্চয়ই এটা এক মহা বিজয়।" এরপর খায়বার (এর গনীমত) হুদায়বিয়ার অংশগ্রহণকারীদের মধ্যে বণ্টন করা হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা ষোল (১৬) অংশে বিভক্ত করলেন। সেনাবাহিনীতে ছিল দেড় হাজার (১৫০০) জন, যাদের মধ্যে তিনশ' (৩০০) জন ছিল অশ্বারোহী। তিনি অশ্বারোহীকে দুই অংশ এবং পদাতিককে এক অংশ প্রদান করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ب): ثلاثة عشر. وكلاهما خطأ، صوابه: ثمانية عشر، كما في سائر مصادر تخريج الحديث. وكُراع الغَميم: موضع بين مكة والمدينة يقع جنوب عُسفان بستة عشر كيلًا على الطريق إلى مكة، وهي على مسافة (64) كيلًا من مكة على طريق المدينة، وتعرف اليوم ببرقاء الغميم.



[2] إسناده فيه لِينٌ، يعقوب بن مجمِّع بن جارية إنما يُعتبر به في المتابعات والشواهد، وقد وهم في هذا الحديث بذكر عدد الفُرسان وفي تقسيم السِّهام عليهم، كما نَبَّه عليه أبو داود بإثر الحديث (3736)، وكذلك البيهقي في "الدلائل" 4/ 240، ونقل في "معرفة السنن والآثار" (13029) و (13030) عن الإمام الشافعي قوله: مجمِّع بن يعقوب راوي هذا الحديث شيخ لا يُعرف، فأخذنا بحديث عُبيد الله بن عمر، ولم نرَ خبرًا مثله يعارضُه. قلنا: بل مجمِّع معروف ثقة، وإنما الشأن في أبيه يعقوب، وحديث عبيد الله بن عمر الذي عناه الشافعي وأبو داود هو حديثه عن نافع عن ابن عمر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أسهم للرجل ولفرسه ثلاثة أسهم: سهمًا له وسهمين لفرسه. وهو عند البخاري (2863) ومسلم (1762) وغيرهما، وقال البيهقي في "الدلائل": وهذا هو الصحيح، وهو المعروف بين أهل المغازي.وقال في "المعرفة" (13031): في رواية ابن عباس وصالح بن كيسان وبشير بن يسار وأهل المغازي: أنَّ الخيل كانت مئتي فرس. قلنا: حديث ابن عباس سيأتي برقم (2648).وأخرج حديث مجمّعٍ أبو داود (2736) و (3015) عن محمد بن عيسى، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (24/ 15470) عن إسحاق بن عيسى بن الطبّاع أخي محمد بن عيسى، عن مجمع بن يعقوب، به.وسيأتي الشطر الأول منه في قصة نزول سورة الفتح برقم (3753) من طريق إسماعيل بن أبي أويس، عن مجمع بن يعقوب، عن أبيه، عن مجمع بن جارية، دون ذكر عبد الرحمن بن يزيد بن مجمِّع.ويشهد لكون هذه السورة نزلت بعد الحديبية بين مكة والمدينة حديث المِسوَر بن مَخرمَة الآتي برقم (3752)، وإسناده حسن.وحديث ابن مسعود عند أحمد (6/ 3710)، والنسائي (8802)، وإسناده حسن أيضًا.وحديث أنس عند مسلم (1786) وغيره. وانظر حديث أنس الآتي برقم (3754).قوله: "يهزُّون الأباعر" أي: يَحُثُّون الأباعر ويدفعونها، والأباعر جمع بعير. وكُراع الغَميم: موضع بين مكة والمدينة يقع جنوب عُسفان بستة عشر كيلًا على الطريق إلى مكة، وهي على مسافة (64) كيلًا من مكة على طريق المدينة، وتعرف اليوم ببرقاء الغميم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2627)


2627 - حدثني علي بن عيسى بن إبراهيم الحِيري، حدثنا أحمد بن النضر بن عبد الوهاب، حدثنا وَهْب بن بقيّة الواسطي، حدثنا خالد بن عبد الله، عن داود بن أبي هند، عن عِكرمة، عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم بدر: "من فعل كذا وكذا، فله من النَّفَل كذا وكذا" قال: فقَدِمَ الفِتيانُ ولَزِمَ المَشْيَخةُ الراياتِ فلم يَبْرَحُوها، فلما فتح الله عليهم قالت المَشْيَخةُ: كنا رِدْءًا لكم، لو انهزمتُم فِئْتُم إلينا، فلا تذهَبُوا بالمَغْنم ونَبقى، فأبى الفتيانُ، وقالوا: جعلَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لنا، فأنزل الله تعالى: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَنْفَالِ قُلِ الْأَنْفَالُ لِلَّهِ وَالرَّسُولِ … كَمَا أَخْرَجَكَ رَبُّكَ مِنْ بَيْتِكَ بِالْحَقِّ وَإِنَّ فَرِيقًا مِنَ الْمُؤْمِنِينَ لَكَارِهُونَ} [الأنفال: 1 - 5] يقول: فكان ذلك خيرًا لهم، فكذلك أيضًا فأَطيعوني فإني أعلَمُ بعاقبةِ هذا منكم [1].حديث صحيح فقد احتج البخاريُّ بعِكْرمة، واحتج مسلم بداود بن أبي هند، ولم يُخرجاه.حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في شهر ربيع الآخر سنة ثمان وتسعين وثلاث مئة:




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বদরের দিন বললেন: "যে ব্যক্তি এমন এমন কাজ করবে, তার জন্য এত এত পুরস্কার (নফল) থাকবে।" তিনি বললেন: তখন যুবকরা (যুদ্ধের জন্য) এগিয়ে গেল, কিন্তু বয়স্করা পতাকাসমূহ ধরে রাখলেন এবং সেখান থেকে নড়লেন না। যখন আল্লাহ তাদের (মুসলমানদের) বিজয় দান করলেন, তখন বয়স্করা বললেন: আমরা তোমাদের সহযোগী হিসেবে ছিলাম; যদি তোমরা পরাজিত হতে, তবে আমাদের কাছেই ফিরে আসতে। সুতরাং তোমরা গনীমতের সব নিয়ে যাও আর আমরা বঞ্চিত থাকি—তা হতে পারে না। কিন্তু যুবকরা তা প্রত্যাখ্যান করল এবং বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটি আমাদের জন্য নির্ধারণ করে দিয়েছেন। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "তারা আপনাকে আনফাল (যুদ্ধলব্ধ অতিরিক্ত সম্পদ) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করে। বলুন, আনফাল আল্লাহ ও রাসূলের... যেমনভাবে তোমার প্রতিপালক তোমাকে তোমার ঘর থেকে সত্যের সাথে বের করে এনেছেন, যদিও মুমিনদের একদল তা অপছন্দ করছিল।" (সূরা আনফাল: ১-৫) তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: সুতরাং এটি (আল্লাহর নির্দেশ) তাদের জন্য কল্যাণকর ছিল। তেমনিভাবে তোমরাও আমার অনুসরণ কর, কারণ আমি তোমাদের চেয়ে এর পরিণতি সম্পর্কে অধিক অবগত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أبو داود (2737) عن وهب بن بقية، بهذا الإسناد. وسيأتي برقم (2912) و (3299).والنَّفَل: ما زاد من العطاء على القدر المستحق منه بالقسمة يخص به الإمام من أبلى بلاءً حسنًا، وسعى سعيًا حميدًا.والمشيخة: جمع شيخ.وفئتم، أي: رجعتم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2628)


2628 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا أبو بكر وعثمان ابنا أبي شَيْبة، حدثنا أبو بكر بن عياش، عن عاصم، عن مصعب بن سعد، عن أبيه، قال: جئتُ إلى النبي صلى الله عليه وسلم يوم بدر بسَيفٍ، فقلت: يا رسول الله، قد شُفِيَ صدري اليومَ من العدوّ، فَهَبْ لي هذا السيفَ، فقال: "إنَّ هذا السيفَ ليس لي ولا لكَ" فذهبتُ وأنا أقولُ: يُعطاهُ اليومَ مَن لم يُبْلِ بَلائي، فبَيْنا [أنا] [1] إذ جاءني الرسولُ، فقال: أجِبْ، فظننتُ أنه قد نَزَل فيَّ شيءٌ من كلامي، فجئتُ، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "إنك سألتَني هذا السيفَ، وليس هو لي ولا لك، وإنَّ الله قد جعلَه لي، فهو لك" ثم قرأ: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَنْفَالِ قُلِ الْأَنْفَالُ لِلَّهِ وَالرَّسُولِ} إلى آخر الآية [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদরের যুদ্ধের দিন আমি একটি তলোয়ার নিয়ে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আজ শত্রুদের বিরুদ্ধে আমার অন্তর প্রশান্ত হয়েছে (প্রতিশোধ পূর্ণ হয়েছে), তাই এই তলোয়ারটি আমাকে প্রদান করুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই এই তলোয়ারটি আমারও নয়, তোমারও নয়।" আমি চলে গেলাম এবং মনে মনে বলছিলাম: আজ এটি এমন ব্যক্তিকে দেওয়া হবে, যে আমার মতো বীরত্ব দেখায়নি। আমি যখন এই অবস্থায় ছিলাম, তখন রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দূত আমার কাছে আসলেন এবং বললেন: উত্তর দাও (আস)। আমি মনে করলাম যে, আমার কথা প্রসঙ্গে নিশ্চয়ই কোনো কিছু নাযিল হয়েছে। তাই আমি আসলাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই তুমি আমার কাছে এই তলোয়ারটি চেয়েছিলে, আর এটি আমারও ছিল না, তোমারও ছিল না। কিন্তু আল্লাহ এটিকে আমার জন্য নির্ধারণ করেছেন, সুতরাং এটি তোমার জন্য।" অতঃপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: {লোকেরা আপনাকে যুদ্ধলব্ধ সম্পদ (আনফাল) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করে। বলুন: যুদ্ধলব্ধ সম্পদ আল্লাহ ও রাসূলের...} আয়াতের শেষ পর্যন্ত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] من "السنن الكبرى" للبيهقي 6/ 291 حيث رواه عن المصنف. وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 3/ 853: صالح الحديث. وحسَّن الترمذي له حديثًا، وصحَّح له ابن حبان وأبو عوانة.وأخرجه أبو داود (2747) عن أحمد بن صالح، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2674) من طريق يحيى بن سليمان الجُعفي، عن عبد الله بن وهب.وانظر كلام الحافظ في الجمع بين الروايات الواردة في عدة أهل بدر في "فتح الباري" 12/ 31 - 32.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عاصم - وهو ابن أبي النَّجُود. وقد توبع.وأخرجه أحمد (3/ 1538) عن أسود بن عامر، وأبو داود (2740)، والنسائي (11132) عن هنّاد بن السَّرِي، والترمذي (3079) عن أبي كريب محمد بن العلاء، ثلاثتهم عن أبي بكر بن عياش، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح.وأخرجه بنحوه أحمد (1567)، ومسلم (1748) و (2412) (43)، وابن حبان (5349) و (6992) من طريق سماك بن حرب، عن مصعب بن سعد، عن أبيه. لكن ليس فيه أنه صلى الله عليه وسلم أعطاه السيف بعد ذلك. وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 3/ 853: صالح الحديث. وحسَّن الترمذي له حديثًا، وصحَّح له ابن حبان وأبو عوانة.وأخرجه أبو داود (2747) عن أحمد بن صالح، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2674) من طريق يحيى بن سليمان الجُعفي، عن عبد الله بن وهب.وانظر كلام الحافظ في الجمع بين الروايات الواردة في عدة أهل بدر في "فتح الباري" 12/ 31 - 32.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2629)


2629 - أخبرني الأستاذ أبو الوليد حسان بن محمد الفقيه، حدثنا أبو بكر بن أبي داود، حدثنا أحمد بن صالح المصري، حدثنا عبد الله بن وهب، حدثني حُيَيّ، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن عبد الله بن عمرو: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج يومَ بدرٍ في ثلاث مئة وخمسةَ عشرَ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اللهم إنهم حُفاةٌ، فاحْمِلْهم، اللهم إنهم عُراةٌ، فاكْسُهم، اللهم إنهم جِياعٌ، فأشبِعْهم"، ففتح الله له يومَ بدر، فانقَلَبوا حين انقَلَبوا وما فيهم رجلٌ إلّا وقد رجعَ بجمَلٍ أو جمَلَين، فاكتَسَوا وشَبِعُوا [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد اتفق الشيخان على الاحتجاج بأبي عبد الرحمن المَذْحِجي [2] مولى سليمان بن عبد الملك.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের দিন তিনশত পনেরো জন (সাহাবী) সহ বের হয়েছিলেন। অতঃপর রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! তারা পদব্রজে এসেছে, তাই তাদের বাহনের ব্যবস্থা করে দাও। হে আল্লাহ! তারা বস্ত্রহীন, তাই তাদের পরিধানের ব্যবস্থা করে দাও। হে আল্লাহ! তারা ক্ষুধার্ত, তাই তাদের তৃপ্ত করো।" অতঃপর আল্লাহ বদরের দিন তাঁকে বিজয় দান করলেন। যখন তারা ফিরে এলেন, তখন তাদের মধ্যে এমন একজনও ছিল না যে একটি বা দুটি উট নিয়ে ফেরেনি। ফলে তারা বস্ত্র পরিধান করল এবং তৃপ্ত হলো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن كما قال الحافظ في "فتح الباري" 12/ 32، وحُيَي - وهو ابن عبد الله المَعافِري - مختلف فيه، ضعَّفه البخاري، وليَّنه أحمد والنسائي، وقال ابن معين وابن عدي: لا بأس به، وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 3/ 853: صالح الحديث. وحسَّن الترمذي له حديثًا، وصحَّح له ابن حبان وأبو عوانة.وأخرجه أبو داود (2747) عن أحمد بن صالح، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2674) من طريق يحيى بن سليمان الجُعفي، عن عبد الله بن وهب.وانظر كلام الحافظ في الجمع بين الروايات الواردة في عدة أهل بدر في "فتح الباري" 12/ 31 - 32.



[2] كذا قال الحاكم رحمه الله، وهو يقصد بذلك حُيَيًّا، وهو وهمٌ منه كما قدَّمنا بيانه بإثر الحديث (273)، لأنَّ حُيَيًّا هذا هو ابن عبد الله المَعافِري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2630)


2630 - أخبرني الأستاذ أبو الوليد، حدثنا أبو بكر بن أبي داود، حدثنا عبد الملك بن شعيب بن الليث، حدثني أبي، عن جدي، عن عُقيل، عن ابن شِهاب، عن سالم بن عبد الله بن عمر، عن عبد الله بن عمر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قد كان يُنَفِّل بعضَ مَن يبعثُ مِن السرايا لأنفُسهم خاصّةً سوى قَسْمِ عامّة الجيش، والخُمس في ذلك واجبٌ كلُّه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু সংখ্যক ব্যক্তিকে, যাদেরকে তিনি ছোট সামরিক অভিযানে (সারিয়্যা) প্রেরণ করতেন, তাদের নিজস্ব ব্যবহারের জন্য বিশেষ অতিরিক্ত অংশ (নফল) দিতেন, যা সাধারণ সেনাবাহিনীর ভাগের বাইরে ছিল। আর এর সবকিছুর মধ্যে এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রদান করা আবশ্যক ছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. الليث: هو ابن سعد، وعُقَيل: هو ابن خالد الأيلي.وأخرجه مسلم (1750)، وأبو داود (2746) عن عبد الملك بن شعيب، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد (10/ 6250) عن حجاج المِصِّيصي، والبخاري (3135) عن يحيى بن بكير، كلاهما عن الليث بن سعد، به. ولم يذكر البخاري في روايته الخمس.وأخرجه بنحوه مسلم (1750) من طريق يونس بن يزيد الأيلي، عن ابن شهاب، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2631)


2631 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا الحسن بن شَبيب المَعْمَري، حدثنا عبد الله بن أحمد بن ذَكْوان ومحمود بن خالد الدمشقيان، قالا: حدثنا مروان بن محمد الدمشقي، حدثنا يحيى بن حمزة، قال: سمعت أبا وهبْ يقول: سمعت مكحولًا يقول: كنتُ عبدًا بمصر لامرأة من هُذَيل، فأعتقتْني، فما خرجتُ من مصر وبها عِلمٌ إِلَّا حَوَيتُ عليه فيما أُرى، ثم أتيتُ الشامَ فغربَلْتُها، كلَّ ذلك أسألُ عن النَّفَل فلم أجد أحدًا يخبرُني فيه بشيءٍ، حتى لقيتُ شيخًا يقال له: زياد بن جارية التَّمِيمي، فقلت له: هل سمعتَ في النَّفَل شيئًا؟ فقال: نعم، سمعت حبيبَ بن مَسْلَمة الفِهْري يقول: شهدتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم نَفَّل الربعَ في البَدْأة، والثلُثَ في الرَّجْعة [1].




হাবীব ইবনে মাসলামা আল-ফিহরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (বর্ণনাকারী মাকহূল বলেন: আমি মিসরে হুযাইল গোত্রের এক মহিলার ক্রীতদাস ছিলাম। তিনি আমাকে মুক্ত করে দেন। আমি যতটুকু জানি, মিসরে এমন কোনো ইলম (জ্ঞান) ছিল না যা আয়ত্ত না করে আমি সেখান থেকে বের হইনি। এরপর আমি সিরিয়ায় (শাম) আসি এবং সেখানকার জ্ঞান যাচাই করি। এই পুরো সময় আমি 'নাফল' (অতিরিক্ত যুদ্ধলব্ধ পুরস্কার) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করছিলাম, কিন্তু কেউ আমাকে এ বিষয়ে কিছু জানাতে পারেনি, যতক্ষণ না আমি যিয়াদ ইবনে জারিয়াহ আত-তামিমী নামক এক বৃদ্ধের সাথে সাক্ষাৎ করি। আমি তাকে জিজ্ঞাসা করলাম: আপনি কি 'নাফল' সম্পর্কে কিছু শুনেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আমি হাবীব ইবনে মাসলামা আল-ফিহরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি), তিনি (হাবীব) বলেছেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উপস্থিত ছিলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অভিযানের শুরুর দিকে (বদ'আহ) নাফল হিসেবে এক-চতুর্থাংশ এবং ফিরে আসার সময় (রাজ'আহ) এক-তৃতীয়াংশ প্রদান করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو وهب: هو عُبيد الله بن عُبيد الكَلاعي.وأخرجه أبو داود (2750) عن عبد الله بن أحمد بن بَشير بن ذكوان ومحمود بن خالد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (29/ 17465)، وأبو داود (2749) من طريق العلاء بن الحارث، وابن ماجه (2853)، وابن حبان (4835) من طريق سليمان بن موسى الأشدق، كلاهما عن مكحول، به. بذكر المرفوع آخره، دون ذكر القصة، وسقط من إسناد ابن ماجه ذكر زياد بن جارية.وسيأتي بعده من طريق يزيد بن جابر، وبرقم (5563) من طريق ثابت بن ثوبان، وبرقم (5941) من طريق سعيد بن عبد العزيز، ثلاثتهم عن مكحول بذكر تنفيل الثلث فقط. (17462) عن عبد الرزاق، و (17468) عن يحيى بن سعيد القطان، ثلاثتهم عن سفيان الثَّوري، به.وأخرجه أحمد (17464) من طريق زياد بن سعد، عن يزيد بن يزيد بن جابر، به.وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2632)


2632 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو البَخْتَري عبد الله بن محمد بن شاكر، حدثنا مصعب بن المِقدام، عن سفيان.وأخبرنا أبو العباس المحبُوبي، حدثنا أحمد بن سَيَّار، حدثنا محمد بن كَثير، حدثنا سفيان، عن يزيد بن يزيد بن جابر الشامي، عن مكحول، عن زياد بن جاريَةَ التميمي، عن حبيب بن مَسْلَمة الفِهْري، أنه قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُنفِّل الثلُثَ بعد الخُمُس [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




হাবীব ইবনে মাসলামাহ আল-ফিহরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (গনীমতের সম্পদের) এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) বাদ দেওয়ার পর এক-তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত (নাফাল হিসেবে) দিতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أبو داود (2748) عن محمد بن كثير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (29/ 17462)، وابن ماجه (2851) من طريق وكيع بن الجراح، وأحمد (17462) عن عبد الرزاق، و (17468) عن يحيى بن سعيد القطان، ثلاثتهم عن سفيان الثَّوري، به.وأخرجه أحمد (17464) من طريق زياد بن سعد، عن يزيد بن يزيد بن جابر، به.وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2633)


2633 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا هُشَيم، حدثنا الشَّيباني وأشعث بن سَوّار، عن محمد بن أبي المُجالِد، قال: بعثني أهلُ المسجد إلى ابن أبي أَوفى أسألُه ما صنعَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم في طعام خيبرَ، فأتيتُه فسألتُه عن ذلك، فقلت: هل خَمَّسه؟ قال: لا، كان أقلَّ من ذلك، وكان أحدُنا إذا أراد شيئًا أخذَ منه حاجتَه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবন আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবন আবী মুজালিদ বলেন, মসজিদের লোকেরা আমাকে তাঁর (ইবন আবী আওফার) কাছে পাঠাল এই জিজ্ঞাসা করার জন্য যে, খায়বারের খাদ্যদ্রব্যের ব্যাপারে নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী করেছিলেন। আমি তাঁর কাছে গেলাম এবং তাঁকে সে বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। আমি বললাম, তিনি কি এর থেকে খুমুস (পঞ্চমাংশ) নিয়েছিলেন? তিনি বললেন, না, সেটা এর চেয়ে কম ছিল। আর আমাদের মধ্যে কেউ কিছু চাইলে সে তা থেকে তার প্রয়োজনমতো গ্রহণ করত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. مُسدَّد: هو ابن مُسَرْهَد، وهُشيم: هو ابن بَشير الواسطي، والشَّيبانيّ: هو أبو إسحاق سليمان بن أبي سليمان.وأخرجه أحمد (31/ 19124) عن هُشَيم بن بَشير، عن أبي إسحاق الشَّيباني وحده، به.وقد تقدم برقم (2610) من طريق أبي معاوية عن أبي إسحاق الشَّيباني. وسماع الحسن - وهو ابن أبي الحسن البصري - من أبي بَرْزة يصحُّ، كما قال أبو حاتم، خلافًا لقول ابن المديني حيث نفى سماعه منه، وقول أبي حاتم أولى بالصواب، فقد أدرك الحسنُ البصري أبا برزة الأسلمي بالبصرة لمدة طويلة، وتأخرت وفاة أبي برزة، فلا معنى لنفي سماع الحسن البصري منه، والله أعلم.وأخرجه البيهقي 9/ 60 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد بن مَنيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ (3162).وأخرجه الطبراني في "الكبير" في ملحق تابع للجزء (21) بتحقيق مخلف العرف، برقم (226) من طريق محمد بن سلّام الجُمحي، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 62/ 96 من طريق أبي عمار الحُسين بن حريث، كلهم (ابن منيع وابن سلّام وابن حُريث) عن إسماعيل ابن عُلَيَّة، عن أيوب السختياني، عن الحسن البصري، به. فذكروا أيوب بدل يونس بن عبيد.وأخرجه ابن أبي شيبة 8/ 277 و 12/ 249، وإبراهيم الحربي في "غريب الحديث" 1/ 329، والطبراني (21/ 225) من طريق هُشَيم بن بَشير، عن يونس بن عبيد، عن الحسن البصري، به.وأخرجه ابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 159، وابن عساكر 62/ 95 - 96 من طريق الحارث بن عمير، عن أيوب السختياني، عن الحسن البصري، به.قوله: "أجْهضْناهم" أي: أزَلْناهم عنها وأعجَلْناهم.وعِطْفا الإنسان: جانباه من لدن رأسه إلى وركه، سميا بذلك لأنَّ الإنسان يميل عليهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2634)


2634 - أخبرنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا موسى بن هارون، حدثنا أحمد بن حنبل ومُؤمَّل بن هشام، قالا: حدثنا إسماعيل، عن يونس، عن الحسن، عن أبي بَرْزَة الأسلمي، قال: كانت العربُ تقول: مَن أكل الخُبز سَمِنَ، فلما فتحنا خيبر أجهَضْناهم عن خُبزةٍ لهم، فقعدتُ عليها، فأكلتُ منها حتى شبعتُ، فجعلتُ أنظرُ في عِطْفَيَّ هل سَمِنتُ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু বারযাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আরবরা বলত, যে রুটি খায়, সে স্বাস্থ্যবান হয়। যখন আমরা খায়বার বিজয় করলাম, তখন আমরা তাদের কাছ থেকে তাদের একটি রুটি ছিনিয়ে নিলাম। আমি এটির উপর বসলাম এবং তা থেকে পেট ভরে খেলাম। এরপর আমি আমার দু’পাশে তাকাতে লাগলাম যে আমি কি মোটা হলাম?




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وقد اختُلف فيه على إسماعيل - وهو ابن عُلَيَّة - في تعيين شيخه، فوقع في رواية المصنف هنا أنه يونس - يعني ابن عُبيد - ووقع في رواية غيره أنه أيوب السختياني، كما نبَّه عليه البيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 60، قلنا: على أنَّ يونس بن عبيد قد روى هذا الخبر أيضًا، لكن من رواية هُشَيم بن بشير عنه، فلا يبعد أن يكون لإسماعيل ابن عُلَيَّة فيه شيخان، فإنَّ له روايةً عنهما، وعلى أيِّ حالٍ فحيث دار هذا الإسناد دار على ثقةٍ، فالإسناد صحيح. وسماع الحسن - وهو ابن أبي الحسن البصري - من أبي بَرْزة يصحُّ، كما قال أبو حاتم، خلافًا لقول ابن المديني حيث نفى سماعه منه، وقول أبي حاتم أولى بالصواب، فقد أدرك الحسنُ البصري أبا برزة الأسلمي بالبصرة لمدة طويلة، وتأخرت وفاة أبي برزة، فلا معنى لنفي سماع الحسن البصري منه، والله أعلم.وأخرجه البيهقي 9/ 60 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد بن مَنيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ (3162).وأخرجه الطبراني في "الكبير" في ملحق تابع للجزء (21) بتحقيق مخلف العرف، برقم (226) من طريق محمد بن سلّام الجُمحي، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 62/ 96 من طريق أبي عمار الحُسين بن حريث، كلهم (ابن منيع وابن سلّام وابن حُريث) عن إسماعيل ابن عُلَيَّة، عن أيوب السختياني، عن الحسن البصري، به. فذكروا أيوب بدل يونس بن عبيد.وأخرجه ابن أبي شيبة 8/ 277 و 12/ 249، وإبراهيم الحربي في "غريب الحديث" 1/ 329، والطبراني (21/ 225) من طريق هُشَيم بن بَشير، عن يونس بن عبيد، عن الحسن البصري، به.وأخرجه ابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 159، وابن عساكر 62/ 95 - 96 من طريق الحارث بن عمير، عن أيوب السختياني، عن الحسن البصري، به.قوله: "أجْهضْناهم" أي: أزَلْناهم عنها وأعجَلْناهم.وعِطْفا الإنسان: جانباه من لدن رأسه إلى وركه، سميا بذلك لأنَّ الإنسان يميل عليهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2635)


2635 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن غالب ومحمد بن شاذان الجوهري، قالا: حدثنا زكريا بن عَدِي، حدثنا عُبيد الله بن عمرو الرَّقِّي، عن زيد بن أبي أُنيسة، حدثنا قيس بن مسلم، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبيه، قال: شهدتُ فتحَ خيبرَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما انهزم القومُ وَقَعْنا في رِحالِهم، فأخذ الناسُ ما وجَدُوا من جُزُرٍ - قال زيد: وهي المواشي - فلم يكن بأسرعَ مِن أن فارَتِ القُدُور، فلما رأى ذلك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أمر بالقُدُور فأُكفئت، ثم قَسَم بيننا، فجعل لكلِّ عشرةٍ شاةً [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু লায়লা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে খায়বার বিজয়ে উপস্থিত ছিলাম। যখন শত্রুপক্ষ পরাজিত হলো, আমরা তাদের মাল-সামানপত্রের ওপর হামলা করলাম। লোকেরা যা পেল, উট ও অন্যান্য গৃহপালিত পশু নিয়ে নিল। (বর্ণনাকারী যায়েদ বলেন: অর্থাৎ গৃহপালিত পশু।) দ্রুতই দেখা গেল যে পাত্রগুলো ফুটন্ত অবস্থায় চলে এসেছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তা দেখলেন, তিনি হুকুম করলেন এবং পাত্রগুলো উল্টিয়ে দেওয়া হলো। অতঃপর তিনি আমাদের মাঝে (মালে গণিমত) বণ্টন করে দিলেন। তিনি প্রতি দশজনের জন্য একটি করে বকরী নির্ধারণ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وقد اختُلف فيه على عُبيد الله بن عمرو الرَّقِّي في تعيين شيخ زيد بن أبي أنيسة، فوقع في روايته زكريا بن عدي أنه قيس بن مسلم - وهو الجَدَلي - وخالفه عبد الله بن جعفر الرقي، فذكر أنه الحكم بن عُتيبة، والقول فيه قول زكريا، فقد تابعه يزيد بن عبد الرحمن الدالاني عن زيد بن أبي أُنيسة، فقال: عن قيس بن مسلم، وكذلك رواه غيلان بن جامع عن قيس بن مسلم، فالحديث حديث قيس، كما جزم به الدارمي في "مسنده" بإثر (2513)، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه الكبير" بإثر (4587).وأخرجه أحمد (31/ 19058) عن زكريا بن عدي، بهذا الإسناد.وخالفه عبد الله بن جعفر الرَّقِّي عند الدارمي (2512)، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (4586)، فرواه عن عبيد الله بن عمرو الرقي، عن زيد بن أبي أُنيسة، عن الحكم بن عتيبة، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى. فذكر الحكم بدل قيس بن مسلم الجدلي.لكن تابع زكريا بنَ عدي أبو خالد يزيد الدالاني فرواه عن زيد بن أبي أُنيسة عن قيس بن مسلم، أخرجه من هذه الطريق ابنُ أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (4587)، والطبراني في "الأوسط" (505).وكذلك رواه غيلان بن جامع عن قيس بن مسلم أبي يعلى في "مسنده الكبير" كما في "إتحاف الخيرة" للبوصيري (4502/ 2)، والطبراني في "الكبير" (6426)، والبيهقي في "السنن" 9/ 197.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2636)


2636 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا أبو عاصم الضحّاك بن مَخلَد، حدثنا شعبة، عن سِمَاك بن حَرب، عن ثعلبة بن الحَكَم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "النُّهبة لا تَحِلُّ، فأَكْفِئوا القُدُورَ" [1]. وهكذا رواه عُندَرٌ وابنُ أبي عَدِي عن شعبة، فذكروا سماعَ ثعلبة من النبي صلى الله عليه وسلم. وهو حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، لحديث سماك بن حرب، فإنه رواه مرةً عن ثعلبة بن الحكم عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم:




সা'লাবা ইবনুল হাকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "লুণ্ঠন হালাল নয়। অতএব, তোমরা হাঁড়িগুলো উল্টে দাও।" একইভাবে উন্দার এবং ইবনু আবী আদী শু‘বাহ থেকে এটি বর্ণনা করেছেন এবং তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর কাছ থেকে সা‘লাবার শোনার কথা উল্লেখ করেছেন। এই হাদীসের সনদ সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি, কারণ সি মাক ইবনু হারব একবার এটি সা‘লাবা ইবনুল হাকামের সূত্রে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাধ্যমে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل سماك بن حرب، وقد اختُلف عليه في إسناده، كما أشار إليه المصنف بإثره، فقد رواه جماعة من الثقات الحفاظ كما رواه شعبة، منهم سفيان الثَّوري وأبو الأحوص سلّام بن سُليم وإسرائيل بن يونس السَّبيعي وأبو عوانة الوضاح اليشكري وزكريا بن أبي زائدة وزهير بن معاوية والحسن بن صالح وغيرهم.وخالفهم أسباط بن نصر، وهو دونهم في الثقة والضبط، فرواه عن سماك، عن ثعلبة بن الحكم، عن ابن عباس، فجعله من مسند ابن عباس، وخطأه في ذلك البخاري في "تاريخه الكبير" 2/ 173 وكذا أبو حاتم وأبو زرعة فيما نقله عنهما ابن أبي حاتم في "العلل" (2222)، وقال أبو حاتم: ثعلبة بن الحكم قد سمع من النبي صلى الله عليه وسلم. وأخرجه أحمد (38/ 23116) عن محمد بن جعفر غُنْدَر، عن شعبة، عن سماك، قال: سمعت رجلًا من بني ليث قال: أسرني ناسٌ من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فكنت معهم، فأصابوا غنمًا، فذكر نحوه. فلم يسمِّ صحابيه، وسماه سائر الرواة لهذا الخبر عن شعبة، وكذا سماه سائر الرواة عن سماك.وأخرجه ابن ماجه (3938) من طريق أبي الأحوص سلّام بن سُليم، عن سماك، به.وتابع شعبةَ وأبا الأحوص فيه سفيانُ الثَّوري، عند الطبراني في "الكبير" (1380)، وإسرائيلُ بن يونس عند عبد الرزاق (18841)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 49، وأبو عوانة عند البخاري في "تاريخه" 2/ 173، والبَغَوي في "معجم الصحابة" (264)، وزكريا بنُ أبي زائدة عند البخاري في "تاريخه" 2/ 173، وابن المنذر في "الأوسط" (6066)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (302)، وفي "شرح المعاني" 3/ 49، والحسنُ بن صالح عند الطبراني في "الكبير" (1376)، وزهيرُ بن معاوية عند ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه الكبير" (315)، والطحاوي في "شرح المشكل" (1318)، وفي "شرح المعاني" 3/ 49، وابن قانع في "معجم الصحابة" 1/ 120، والطبراني في "الكبير" (1372)، وغيرهم.وأخرجه ابن حبان (5169) من طريق شريك النخعي، عن سماك، لكنه قال في روايته: عن ثعلبة بن الحكم وكان شهد حُنينًا، قال: سمعت منادي رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حُنين ينهى عن النُّهبة. كذا ذكر في روايته أنَّ النهي كان يوم حنين، وهو خطأ، لأنَّ ذلك كان يوم خيبر لا يوم حُنين، كما نصَّ عليه جماعة ممَّن تقدَّم ذكرهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2637)


2637 - حدَّثَناه أبو أحمد محمد بن محمد بن أحمد بن إسحاق العَدْل الصفّار، حدثنا أحمد بن محمد بن نصر، حدثنا عمرو بن طلحة القَنَّاد، حدثنا أسباطُ بن نَصْر، عن سِماك بن حرب، عن ثَعلَبة بن الحَكَم عن ابن عباس، قال: انتَهَبَ الناسُ غنَمًا يومَ خيبر [1] فذَبَحُوها فجعلوا يَطبُخون منها، فجاء رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فأمر بالقُدُور فأُكفِئت، وقال: "إنه لا تَصلُحُ النُّهْبةُ" [2].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খায়বার যুদ্ধের দিন লোকেরা কিছু বকরী লুণ্ঠন করেছিল। অতঃপর তারা সেগুলো যবেহ করল এবং তা রান্না করতে শুরু করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন। তিনি হাড়িগুলো উল্টে দেওয়ার নির্দেশ দিলেন, ফলে সেগুলো উপুড় করে দেওয়া হলো। এবং তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই লুণ্ঠিত জিনিস (ভোগের জন্য) উপযুক্ত নয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا جاء في النسخ الخطية، وصحَّح عليها في (ز)، وكتب في الهامش مقابلها كلمة "حنين"، وضبَّب فوقها، وكأنه أشار إلى أنه وقع في بعض الروايات عن أسباط ذكرُ حنين، وأنه غير مستقيم. قلنا: كذلك وقعت رواية أسباط للبخاري كما في "تاريخه الكبير" 2/ 173، وكذلك وقعت لابن أبي خيثمة في "تاريخه الكبير" (318)، وجزم البخاري بأنَّ من قال: يوم خيبر، فقوله أصح. لكن وقع في "العلل" لابن أبي حاتم (2222) في رواية أسباط ذكر خيبر لا حنين، وهذا يوافق ما وقع في النسخ الخطية عندنا، فالظاهر أنَّ ذكر حنين وقع في بعض الروايات عن أسباط دون بعضٍ، والله أعلم.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن كسابقه، لكن ذكر ابن عباس غير محفوظ فيه كما تقدم.وأخرجه ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "التاريخ الكبير" (318)، والطبراني في "الكبير" (10639) من طرق عن عمرو بن حماد بن طلحة القَنَّاد، بهذا الإسناد.وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2638)


2638 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله بن دينار، حدثنا الحسين بن الفضل البَجَلي، حدثنا عفّان بن مسلم، حدثنا أبو كُدَينة، عن قابُوس بن أبي ظَبْيان، عن أبيه، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ليس مِنّا من انتَهَب أو سَلَبَ، أو أشار بالسَّلْب" [1].قد احتجَّ البخاري بأبي كُدَينة يحيى بن المهلَّب، وهذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি লুট করে, অথবা ছিনতাই করে, কিংবা লুণ্ঠনের ইঙ্গিত দেয়, সে আমাদের অন্তর্ভুক্ত নয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف قابوس بن أبي ظبيان، وقد اختُلف عليه في وصله وإرساله، فوصله عنه أبو كُدينة - واسمه يحيى بن المهلَّب - ورواه عنه جرير بن عبد الحميد فأرسله، فلم يذكر في إسناده ابن عباس، وكأنَّ هذا أشبه، لأنَّ جريرًا أقوى حالًا من أبي كُدينة، على أنه قد يكون الاضطراب فيه من جهة قابوسٍ نفسه، وهو الأقرب.وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (2428)، والطبراني في "الكبير" (12612)، وأبو الفضل الزُّهْري في "حديثه" (494)، والضياء المقدسي في "مختارته" (9/ 546) من طريق أبي كُدَينة، بهذا الإسناد. لكن قال ابن الأعرابي في روايته: "أو أشار بسيف".وأخرجه أبو بكر الخلال في "السنة" (1570) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن قابوس، عن أبيه، مرسلًا. وقال في روايته: "أو أشار بالسلاح".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2639)


2639 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي، حدثنا محمد بن معاذ، حدثنا أبو عاصم الضحّاك بن مَخلَد، حدثني وهب بن خالد الحِمصي، حدثتني أم حَبيبة بنت العِرْباض بن ساريَة، قالت: حدثني أبي: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن الخَلِيسة [1] والمُجثَّمة، وأن تُوطأَ السَّبايا حتى يَضعْنَ ما في بُطونِهن [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইরবায ইবনু সারিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খালীসাহ (নিষিদ্ধ মিশ্রিত খাদ্য বা শিকারের পদ্ধতি) এবং মুজাচ্ছামাহ (বেঁধে রেখে লক্ষ্যবস্তু বানিয়ে হত্যা করা প্রাণী) খেতে নিষেধ করেছেন। আর যুদ্ধবন্দী মহিলাদের (দাসীদের) সাথে সহবাস করতেও নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তারা তাদের গর্ভে যা আছে তা প্রসব করে ফেলে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب) و (ع): الخُلْسة، والمثبت من (ص) مضبوطًا فيها، وهو الأشهر في ضبطها، وهو ما فسَّره به أبو عاصم الضحاك عند الترمذي كما سيأتي، وهو ما يُستخلَص من السَّبُع فيموت قبل أن يُذكَّى، من: خَلَستُ الشيءَ واختلستُه: إذا سلبْتَه، وهي فَعِيلة بمعنى مفعولة. قاله ابن الأثير.



[2] صحيح لغيره دون ذكر الخَلِيسة، وهذا إسناد حسن إن شاء الله، أم حبيبة بنت العرباض، وإن لم يرو عنها غير وهب بن خالد الحمصي، اعتبرنا حديثها على قِلَّته، فوجدناه غير منكر، بل توبعت عليه، وقال الذهبي: ما علمت في النساء من اتُّهِمت ولا من تركوها.وأخرجه أحمد (28/ 17153)، والترمذي (1474) و (1564) من طريق أبي عاصم الضحاك بن مخلد، بهذا الإسناد. وجاء عندهما أنَّ ذلك النهي كان يوم خيبر.وقال الترمذي في روايته: سئل أبو عاصم عن المُجثَّمة، قال: أن يُنصَب الطيرُ أو الشيء فيُرمى، وسئل عن الخَلِيسة، فقال: الذئب أو السبُع يدركه الرجلُ فيأخذه منه، فيموت في يده قبل أن يُذكّيها.ويشهد له دون ذكر السبايا الحَبَالي حديث جابر بن عبد الله عند أحمد (22/ 14463)، وإسناده قوي.ويشهد لقصة الحَبَالى من السبايا حديثُ ابن عباس المتقدم عند المصنف برقم (2367)، وإسناده صحيح. وذكر أيضًا أنَّ هذا النهي كان يوم خيبر.ويشهد للنهي عن المجثَّمة حديث ابن عباس المتقدم برقم (1645) و (2278)، وإسناده صحيح.وحديث أبي هريرة عند أحمد (14/ 8789)، والترمذي (1795).وحديث أبي الدرداء عند الترمذي (1473) ويشهد لذكر الخَلِيسة وحدها حديث زيد بن خالدالجهني عند أحمد (28/ 1752)، وإسناده ضعيف.وجاء في حديثي جابر وزيد بن خالد: الخُلْسة، بدل الخَلِيسة، لكن قدمنا أنَّ الخَليسة هو الأشهر على ما فسره به أبو عاصم أحد رواة حديثنا عند الترمذي، فهو الأولى، والله أعلم. وأما الخُلْسة فهو ما يؤخذ سَلْبًا ومكابَرة في نُهْزةٍ ومُخاتَلَة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2640)


2640 - أخبرني دَعْلَج بن أحمد السِّجِسْتاني، حدثنا عبد العزيز بن معاوية البصري، حدثنا محمد بن جَهضَم الخُراساني، حدثنا إسماعيل بن جعفر، حدثني عبد الرحمن بن الحارث، عن سليمان بن موسى [1] الأشْدق، عن مكحول، عن أبي سلَّام، عن أبي أُمامة الباهِلي صاحبِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، عن عُبادة بن الصامت، أنه قال: خَرجَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى بدر فلقي العدوّ، فلما هزمَهم اتَّبعهم طائفةٌ من المسلمين يقتلونهم، وأحْدَقَت طائفةٌ برسول الله صلى الله عليه وسلم، واستولت طائفةٌ بالعسكر، فلما كفى اللهُ العدوَّ، ورجع الذين قتلوهم قالوا: لنا النَّفَل، نحن قتلْنا العدوَّ، وبنا نفاهُم الله وهزمَهم، وقال الذين كانوا أحدَقُوا برسول الله صلى الله عليه وسلم: واللهِ ما أنتم بأحقَّ به منا، هو لنا، نحن أحدَقْنا برسول الله صلى الله عليه وسلم لا ينالُ العدوُّ منه غِرَّةً، وقال الذين استولَوا على العسكر: والله ما أنتم بأحقَّ به منا، نحن استولَينا على العسكر، فأنزل الله عز وجل: {يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَنْفَالِ قُلِ الْأَنْفَالُ لِلَّهِ وَالرَّسُولِ فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَصْلِحُوا ذَاتَ بَيْنِكُمْ} إلى قوله: {إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ}، فقسَمه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بينهم عن فُوَاقٍ [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ من حديث محمد بن إسحاق القرشي صحيح أيضًا على شرط مسلم:




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের উদ্দেশ্যে বের হলেন। অতঃপর তিনি শত্রুর মুখোমুখি হলেন। যখন তিনি তাদের পরাজিত করলেন, তখন মুসলিমদের একটি দল তাদের অনুসরণ করে হত্যা করতে লাগল। অপর একটি দল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে চারপাশ থেকে ঘিরে রাখল এবং অন্য একটি দল যুদ্ধশিবিরের উপর কর্তৃত্ব করল। অতঃপর যখন আল্লাহ শত্রুকে মোকাবিলা করতে যথেষ্ট হলেন, এবং যারা তাদের হত্যা করেছিল, তারা ফিরে এসে বলল: এই গনীমত (নফল) আমাদের প্রাপ্য। আমরা শত্রুদের হত্যা করেছি, আর আমাদের মাধ্যমেই আল্লাহ তাদের বিতাড়িত ও পরাজিত করেছেন। আর যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঘিরে রেখেছিল, তারা বলল: আল্লাহর কসম, তোমরা আমাদের চেয়ে এর বেশি হকদার নও। এটা আমাদেরই, কারণ আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঘিরে রেখেছিলাম যেন শত্রু অসতর্কতাবশত তাঁর ক্ষতি করতে না পারে। আর যারা যুদ্ধশিবিরের উপর কর্তৃত্ব করেছিল, তারা বলল: আল্লাহর কসম, তোমরা আমাদের চেয়ে এর বেশি হকদার নও। আমরাই যুদ্ধশিবিরের কর্তৃত্ব নিয়েছিলাম। ফলে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা নাযিল করলেন: "তারা আপনাকে আনফাল (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করে। বলুন, আনফাল আল্লাহ ও রাসূলের। অতএব তোমরা আল্লাহকে ভয় করো এবং নিজেদের মধ্যে সদ্ভাব স্থাপন করো" তাঁর বাণী "যদি তোমরা মুমিন হও" পর্যন্ত। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অল্প সময়ের মধ্যেই তা তাদের মাঝে ভাগ করে দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: محمد. عند ابن حبان كما قدَّمنا، حيث روى منها سفيان الثَّوري قطعة تنفيل الربع والثلث عند أحمد (37/ 22726)، وابن ماجه (2852)، والترمذي (1561)، على أنَّ أبا إسحاق الفزاري كان يذكر مكحولًا في أكثر الروايات عنه موافقًا جماعة أصحاب عبد الرحمن بن الحارث.وسيأتي بعده من طريق محمد بن إسحاق عن عبد الرحمن بن الحارث، لكن أسقط من إسناده أبا سلّام، وهو ثابت في رواية مَن تقدم ذكرُهم من أصحاب عبد الرحمن بن الحارث، فالصحيح ذكره.ويشهد له حديث ابن عباس المتقدم برقم (2627)، وإسناده صحيح.الغِرَّة، بكسر الغين: الغفلة.وقوله: "عن فُواق" أي: قَسَمَ الغنائم في قدر فُواق الناقة، وهو ما بين الحلبتين من الراحة، وتضم فاؤه وتُفتح. وقيل: أراد التفضيل في القسمة، كأنه جعل بعضهم أفوق من بعض على قدر غنائمهم وبَلائهم. قلنا: القول الأول هو الأصح كما تدلُّ عليه رواية محمد بن إسحاق التي قدمنا ذكرها، ففيها: فقسمه رسول الله صلى الله عليه وسلم فينا على بَوَاء، يقول: على السواء.وأحدقُوا: أطافوا وأحاطوا.



[2] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الرحمن بن الحارث - وهو ابن عبد الله بن عياش - ولحديثه هذا ما يشهد له. أبو سلّام: هو ممطور الحبشي، وأبو أمامة: هو صُدي بن عجلان.وأخرجه ابن حبان (4855) من طريق محمد بن المثنَّى، عن محمد بن جهضم، بهذا الإسناد.وزاد فيه تنفيلهم الربع والثلث وزيادات أخرى ليست في حديثنا أيضًا.وأخرجه أحمد (37/ 22762) من طريق أبي إسحاق الفزاري، عن عبد الرحمن بن الحارث، به. لكن لم يذكر الفزاريُّ في روايته مكحولًا، والصحيح ذكره كما رواه إسماعيل بن جعفر عند المصنف هنا، فقد تابع إسماعيلَ بنَ جعفر على ذكره المغيرةُ بن عبد الرحمن بن الحارث المخزومي وعبد الرحمن بن أبي الزِّناد ومحمد بن فُليح بن سليمان، كما تقدم بيانه برقم (2435)، وكذلك سفيان الثَّوري في روايته لقطعة من الحديث المطوَّل برواية محمد بن المثنى عن محمد بن جهضم عند ابن حبان كما قدَّمنا، حيث روى منها سفيان الثَّوري قطعة تنفيل الربع والثلث عند أحمد (37/ 22726)، وابن ماجه (2852)، والترمذي (1561)، على أنَّ أبا إسحاق الفزاري كان يذكر مكحولًا في أكثر الروايات عنه موافقًا جماعة أصحاب عبد الرحمن بن الحارث.وسيأتي بعده من طريق محمد بن إسحاق عن عبد الرحمن بن الحارث، لكن أسقط من إسناده أبا سلّام، وهو ثابت في رواية مَن تقدم ذكرُهم من أصحاب عبد الرحمن بن الحارث، فالصحيح ذكره.ويشهد له حديث ابن عباس المتقدم برقم (2627)، وإسناده صحيح.الغِرَّة، بكسر الغين: الغفلة.وقوله: "عن فُواق" أي: قَسَمَ الغنائم في قدر فُواق الناقة، وهو ما بين الحلبتين من الراحة، وتضم فاؤه وتُفتح. وقيل: أراد التفضيل في القسمة، كأنه جعل بعضهم أفوق من بعض على قدر غنائمهم وبَلائهم. قلنا: القول الأول هو الأصح كما تدلُّ عليه رواية محمد بن إسحاق التي قدمنا ذكرها، ففيها: فقسمه رسول الله صلى الله عليه وسلم فينا على بَوَاء، يقول: على السواء.وأحدقُوا: أطافوا وأحاطوا.