হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2641)


2641 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، حدثنا محمد بن إسحاق، عن عبد الرحمن بن الحارث، عن سليمان بن الأشْدق، عن مكحول، عن أبي أُمامة الباهِلي، قال: سألتُ عُبادة بن الصامت عن الأنفال، فقال: فينا معشرَ أصحابِ بدرٍ نزلت، ثم ذكر الحديث بطُوله [1].




আবূ উমামাহ আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আনফাল (গনীমতের বিধান) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তিনি বললেন, (সূরা আনফালের আয়াত) আমাদের অর্থাৎ বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী সাহাবীদের দলের প্রসঙ্গে নাযিল হয়েছিল। এরপর তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد كسابقه، لكن لم يذكر فيه ابنُ إسحاق في روايته أبا سلَّام ممطورًا الحبشيَّ بين مكحول وأبي أمامة، والصحيح ذكره كما في رواية إسماعيل بن جعفر السالفة قبله، ورواية غيره ممَّن تابعه ممَّن روى الحديثَ بطوله، كما تقدم بيانه برقم (2435).وأخرجه مختصرًا أحمد (37/ 22747) عن محمد بن سلمة، و (22753) من طريق إبراهيم بن سعد، كلاهما عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد عن أبي أمامة قال: سألت عبادة بن الصامت عن الأنفال، فقال: فينا معشر أصحاب بدر نزلت حين اختلفنا في النَّفَل وساءت فيه أخلاقُنا، فانتزعه الله من أيدينا، وجعله إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقسمه رسول الله صلى الله عليه وسلم بين المسلمين عن بَوَاء؛ يقول: على السَّواء.وسيأتي بقطعة أخرى من الحديث المطوَّل برقم (3298) من طريق جرير بن حازم عن ابن إسحاق.وبقطع أخرى من الحديث المطوَّل أيضًا برقم (4418) من طريق إسماعيل بن جعفر عن عبد الرحمن بن الحارث.وتقدمت منه قطعة برقم (2435) من طريق أبي إسحاق الفزاري عن عبد الرحمن بن عياش، وهو عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عياش نفسُه، نسبه لجد أبيه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2642)


2642 - أخبرني أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا أحمد بن صالح، حدثنا ابن وهب، أخبرني حَيْوة بن شُرَيح، عن ابن الهادِ، عن شُرَحْبيل بن سعد، عن جابر بن عبد الله، قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة خيبر، خَرَجت سريّةٌ فأخذوا إنسانًا معه غنمٌ يرعاها، فجاؤوا به إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكلَّمه النبيُّ صلى الله عليه وسلم ما شاء الله أن يُكَلِّمه، فقال له الرجلُ: إني قد آمنتُ بك وبما جئتَ به، فكيف بالغَنَم يا رسول الله، فإنها أمانةٌ، وهي للناس، الشاةُ والشاتان وأكثرُ من ذلك؟ قال: "احصِبْ وجوهَها تَرجِعْ إلى أهلِها" فأخذَ قَبْضةً من حَصْباء - أو تراب - فرمى به وجُوهَها، فخرجت تَشْتَدُّ حتى دخلتْ كلُّ شاةٍ إلى أهلها، ثم تقدّم إلى الصفّ، فأصابه سهمٌ فقتَلَه ولم يصلِّ لله سجدةً قطُّ، قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أدخِلُوه الخِباءَ" فأُدخل خِباءَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، حتى إذا فرغَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم دَخَلَ عليه ثم خرج، فقال: "لقد حَسُنَ إسلامُ صاحبِكم، لقد دخلتُ عليه وإن عندَه لَزوجتَين له من الحُورِ العِينِ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা খায়বার যুদ্ধের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। একটি ছোট সৈন্যদল বের হলো এবং তারা এমন একজন ব্যক্তিকে ধরে আনলো, যার সাথে কিছু বকরী ছিল, যা সে চরাচ্ছিল। তারা তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে নিয়ে আসলো। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর ইচ্ছানুযায়ী তার সাথে কথা বললেন। লোকটি তখন বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনার প্রতি এবং আপনি যা নিয়ে এসেছেন তার প্রতি ঈমান এনেছি। কিন্তু এই বকরীগুলোর কী হবে? এগুলো তো আমানত, এগুলো বিভিন্ন লোকের—কারো একটি, কারো দুটি, আবার কারো এর চেয়েও বেশি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এগুলোর মুখে কঙ্কর নিক্ষেপ করো, তাহলে এরা তাদের মালিকের কাছে ফিরে যাবে।" লোকটি তখন এক মুঠো কঙ্কর—অথবা মাটি—নিয়ে সেগুলোর মুখে নিক্ষেপ করল। ফলে বকরীগুলো দ্রুত ছুটতে শুরু করল, আর প্রত্যেকটি বকরী নিজ নিজ মালিকের কাছে চলে গেল। অতঃপর সে (যুদ্ধের) সারির দিকে এগিয়ে গেল। সেখানে তাকে একটি তীর আঘাত করল এবং তাকে হত্যা করে দিল। সে আল্লাহর উদ্দেশ্যে কখনো একটি সিজদাও করেনি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে তাঁবুর মধ্যে নিয়ে যাও।" সুতরাং তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তাঁবুতে প্রবেশ করানো হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন অবসর হলেন, তখন তার কাছে প্রবেশ করলেন। এরপর তিনি বেরিয়ে এসে বললেন: "তোমাদের সঙ্গীর ইসলাম কতই না উত্তম হয়েছে! আমি তার কাছে প্রবেশ করেছিলাম, আর দেখলাম তার নিকট রয়েছে জান্নাতের সুকোমলা চক্ষুবিশিষ্ট (হুর আল-ঈন) দুইজন স্ত্রী।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح، وهذا إسناد ضعيف من أجل شرحبيل بن سعد، وقد روي ما يشهد لخبره هذا، وقال الذهبي عن حديثه هذا في "تاريخ الإسلام" 1/ 281: حديث حسن أو صحيح. قلنا: وهذا أحسن من قوله في "تلخيص المستدرك" بأنَّ شرحبيل كان متهمًا، استنادًا إلى قول ابن أبي ذئب فيه. وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 143، وفي "دلائل النبوة" 4/ 220 - 221 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو القاسم الأصبهاني في "دلائل النبوة" (241) من طريق يونس بن عبد الأعلى، عن عبد الله بن وهب، به.ويشهد له مرسل موسى بن عقبة ومرسل عروة بن الزُّبَير عند البيهقي في "الدلائل" 4/ 219 - 220، ورجال مرسل موسى بن عقبة لا بأس بهم.ومرسل إسحاق بن يسار المطلبي مولاهم عند ابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 92.ويشهد له أيضًا لكن دون قصة الغنم حديث أنس بن مالك المتقدم عند المصنف برقم (2494)، وإسناده صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2643)


2643 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا عثمان بن عمر، أخبرنا ابن أبي ذِئب، عن القاسم بن عباس، عن عبد الله بن نِيَار، عن عُرْوة، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أُتيَ بظَبْيةٍ فيها خَرَزٌ من الغنيمة، فقسمها بين الحُرّةِ والأمَة سواءً [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গনীমতের (যুদ্ধলব্ধ) মালের মধ্য থেকে একটি হরিণের চামড়া আনা হলো, যাতে কিছু পুঁতি বা অলঙ্কার ছিল। অতঃপর তিনি তা স্বাধীন নারী ও দাসী—উভয়ের মধ্যে সমানভাবে ভাগ করে দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة.وأخرجه أحمد (42/ 25261) عن عثمان بن عمر، بهذا الإسناد. دون قوله: سواءً.وأخرجه أحمد (42/ 25229) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، و (43/ 26010) عن يزيد بن هارون، وأبو داود (2952) من طريق عيسى بن يونس السَّبيعي، ثلاثتهم عن ابن أبي ذئب، به.ولم يذكر أبو النضر ولا عيسى في روايتهما قوله: سواءً.والظِّبْية: هي جِراب صغير عليه شعر، وقيل: هو شبهُ الخريطة والكيس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2644)


2644 - أخبرني عبد الله بن محمد بن حَمُّويه، حدثني أبي، حدثنا أحمد بن حفص بن عبد الله، حدثني أبي، حدثني إبراهيم بن طَهْمان، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن عمرو بن شعيب، عن عبد الله بن أبي نَجيح، عن مجاهد، عن ابن عباس، قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم يومَ خيبر عن بيع المَغانم حتَّى تُقسَم، وعن الحَبَالى أن يُوطأنَ حتى يَضعْن ما في بُطونهن، وقال: "أتسقي زَرْعَ غيرِك؟ "، وعن أكلِ لحوم الحُمُر الإنسيّة، وعن لحم كل ذي نابٍ من السِّباع [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাইবার যুদ্ধের দিন গণিমতের মাল বন্টন করার পূর্বে তা বিক্রি করতে নিষেধ করেছিলেন, এবং গর্ভবতী দাসীদের সাথে সহবাস করতে নিষেধ করেছিলেন যতক্ষণ না তারা তাদের পেটের বোঝা (সন্তান) প্রসব করে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি অন্যের ক্ষেতে পানি ঢালছো?" তিনি গৃহপালিত গাধার গোশত খেতে এবং নখর বা দাঁত বিশিষ্ট সকল হিংস্র পশুর গোশত খেতেও নিষেধ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناد صحيح، وهو مكرر الحديث السالف برقم (2367).وانظر تالييه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2645)


2645 - أخبرَناه أبو بكر أحمد بن إسحاق الفقيه، أخبرنا عُبيد بن شَريك، أخبرنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، حدثني عبد الرحمن بن الحارث، عن ابن أبي نَجيح، عن مجاهد، عن ابن عباس، قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم يومَ خيبر عن بيع المَغانم حتى تُقسَم [1].وقد روي بعض هذا المتن بإسناد صحيح على شرط الشيخين:




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খায়বার যুদ্ধের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গণীমতের সম্পদ বণ্টন না হওয়া পর্যন্ত তা বিক্রি করতে নিষেধ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات، وهو مكرر الحديث السالف برقم (2304) غير أنَّ شيخ المصنف هناك علي بن حَمْشاذَ العدل.وانظر ما قبله وما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2646)


2646 - أخبرَناه أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا شَيبان، عن الأعمش، عن مجاهد، عن ابن عباس قال: نهى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومَ خيبر عن لحوم الحُمُر الأهليّة، وعن النساء الحَبَالى أن يُوطأنَ حتى يَضعْن ما في بُطونهن، وعن كُلّ ذي نابٍ من السِّباع، وعن بيع الخُمُس حتى يُقسَم [1].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারের দিনে গৃহপালিত গাধার মাংস, এবং গর্ভবতী মহিলাদের সাথে সহবাস করা থেকে নিষেধ করেছেন—যতক্ষণ না তারা তাদের পেটের বোঝা প্রসব করে—এবং প্রতিটি হিংস্র প্রাণী যার ছেদন দাঁত আছে তা থেকে, এবং খুমুস (গনীমতের এক পঞ্চমাংশ) বণ্টন না করা পর্যন্ত তা বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وقد تقدَّم من هذا الطريق نفسه برقم (2303)، لكن بلفظ: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن كل ذي نابٍ من السِّباع، وعن قتل الوِلْدان، وعن شراء المغنم حتى يُقسَم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2647)


2647 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن علي الشَّيباني، حدثنا ابن أبي غَرَزة، حدثنا محمد بن سعيد بن الأصبهاني، حدثنا شَريك، عن منصور، عن رِبعي بن حِراش، عن علي، قال: لمَّا افتَتَح رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مكة، أتاهُ ناسٌ من قريش فقالوا: يا محمد، إنا حُلفاؤُك وقومُك، وإنه لَحِقَ بك أرِقّاؤُنا ليس لهم رغبةٌ في الإسلام، وإنهم فَرُّوا من العَمَل فاردُدْهم علينا، فشاوَرَ أبا بكر في أمرهم، فقال: صدَقوا يا رسول الله، وقال لعُمر: "ما تَرى؟ " فقال مثلَ قول أبي بكر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا معشرَ قُريش، لَيَبعثَنَّ الله عليكم رجلًا منكم امتَحَنَ اللهُ قلبَه للإيمان، يضربُ رقابَكم على الدِّين"، فقال أبو بكر: أنا هو يا رسول الله؟ قال: "لا" قال عمر: أنا هو يا رسول الله؟ قال: "لا، ولكن خاصِفُ النَّعْل في المسجد"، وقد كان ألقَى نعلَه إلى عليٍّ يَخصِفُها.ثم قال: أما إني سمعتُه يقول: "لا تَكذِبُوا عليَّ، فإنه مَن يَكذِبْ عليَّ يَلِجِ النارَ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা বিজয় করলেন, তখন কুরাইশদের কিছু লোক তাঁর কাছে এসে বলল: হে মুহাম্মাদ, আমরা আপনার মিত্র ও আপনার গোত্রের লোক। আমাদের এমন কিছু দাস আপনার কাছে এসে আশ্রয় নিয়েছে, যাদের ইসলামের প্রতি কোনো আগ্রহ নেই এবং তারা কাজ থেকে পালিয়ে এসেছে। অতএব, আপনি তাদেরকে আমাদের কাছে ফিরিয়ে দিন।

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের বিষয়ে আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে পরামর্শ করলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল, তারা সত্য বলেছে। তিনি উমারকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "তুমি কী মনে করো?" তিনিও আবূ বাকরের রায়ের মতোই বললেন।

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "হে কুরাইশ সম্প্রদায়, আল্লাহ অবশ্যই তোমাদের ওপর তোমাদের মধ্য থেকে এমন এক ব্যক্তিকে প্রেরণ করবেন, যার অন্তরকে আল্লাহ ঈমানের জন্য পরীক্ষা করেছেন (বা খাঁটি করেছেন); সে দ্বীনের কারণে তোমাদের ঘাড়গুলো কর্তন করবে।"

আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: হে আল্লাহর রাসূল, আমি কি সেই ব্যক্তি? তিনি বললেন: "না।" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: হে আল্লাহর রাসূল, আমি কি সেই ব্যক্তি? তিনি বললেন: "না, বরং সে হচ্ছে সেই ব্যক্তি যে মসজিদে জুতা সেলাই করছে।" আর তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জুতাটি আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দিকে ফেলে দিয়েছিলেন, আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা সেলাই করছিলেন।

এরপর তিনি (আলী) বললেন: সাবধান! আমি তাঁকে (নবীকে সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতে শুনেছি: "তোমরা আমার ওপর মিথ্যা আরোপ করো না। কারণ যে আমার ওপর মিথ্যা আরোপ করবে, সে জাহান্নামে প্রবেশ করবে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف بهذا السياق، تفرّد به شريك النخعي وهو سيّئ الحفظ، وقد اضطرب في متنه فأدخل حديثًا في حديث، فقد روى الحديثَ عن منصور بن المعتمر أبانُ بنُ صالح - وهو أحد الثقات - فيما سلف برقم (2608) وفيه أنَّ القصة حدثت في صلح الحديبية وليس فيه ذكر عليٍّ في وعيده صلى الله عليه وسلم لقريش.وأما الحديث الآخر، فقد رواه أبو سعيد الخُدْري مرفوعًا بلفظ: "إنَّ منكم من يقاتل على تأويل القرآن كما قاتلتُ على تنزيله"، وفيه قصة استشراف أبي بكر وعمر لذلك، وسيأتي عند المصنف برقم (4671)، وإسناده صحيح.وأخرجه أحمد (2/ 1336)، والنسائي (8362) من طريق أسود بن عامر، والترمذي (3715) من طريق وكيع بن الجراح، كلاهما عن شريك النخعي، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح غريب.وسيأتي من طريق أبي نعيم وأبي غسان عن شريك النخعي برقم (8013).وانظر ما تقدم برقم (2591).وروى زيد بن يُثيع عن أبي ذر الغفاري عند النسائي (8403) قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لينتهين بنو وَلِيعة أو لأبعثن إليهم رجلًا كنفسي ينفذ فيهم أمري، فيقتل المقاتلة ويسبي الذريّة" قال أبو ذرّ: فما راعني إلّا وكفُّ عمر في حُجزتي من خلفي: مَن يعني؟ فقلت: ما إيّاك يعني، ولا صاحبك، قال: فمن يعني؟ قال: خاصف النعل، قال: وعليٌّ يَخصِف نعلًا. وإسناده فيه لِين، زيد بن يثيع تفرد بالرواية عنه أبو إسحاق السبيعي ولا يعرف له سماع من أبي ذر. وبنو وليعة قوم من كِندة. وأخرج القطعة الأخيرة من حديث الباب - وهو قوله: "لا تكذبوا عليَّ … " - أحمد 2/ (629) و (630) و (1000) و (1001) و (1292)، والبخاري (106)، ومسلم (1) من طريق شعبة، عن منصور، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2648)


2648 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، قال: قال لي يحيى بن أيوب: حدثني إبراهيم بن سعد، عن كثير مولى بني مَخزُوم، عن عطاء، عن ابن عباس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قَسَمَ لمئتَي فرسٍ يومَ خيبر سهمَين سهمَين [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ، وقد احتجَّ البخاري بيحيى بن أيوب وكثير بن كثير المخزومي.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের দিন দুইশত ঘোড়ার জন্য দুই দুই অংশ করে ভাগ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد لا بأس برجاله غير كثير مولى بني مخزوم، فلم يرو عنه غير إبراهيم بن سعد - وهو ابن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف - ولم يؤثر توثيقه عن أحد، وليس هو كثير بن كثير المخزومي، كما جزم به المصنف بإثر الحديث، لأنَّ كثير بن كثير سهمي من أنفسهم، لا مخزوميٌّ، ولا مولى لبني مخزوم، وفرَّق بينهما البخاري وغيره، ومع ذلك صحَّح إسناده الطبريُّ في "تهذيب الآثار" في القسم المفرد الذي حققه علي رضا (996) و (997)! وقد روي ما يشهد لروايته.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 6/ 326 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن المنذر في "الأوسط" (6147) عن محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، به.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" تعليقًا 7/ 215، والطبري في "تهذيب الآثار" (996) و (997)، والطبراني في "الكبير" (11464)، وابن عدي في "الكامل" 1/ 249، والدارقطني (4174) و (4175)، والبيهقي في "الدلائل" 4/ 237 - 238 من طرق عن عبد الله بن وهب، به.وأخرج ابن أبي شيبة في "مصنفه" 12/ 397 و 14/ 151، وأبو يعلى (2528)، والطبري في "تهذيب الآثار" (998)، وابن المنذر في "الأوسط" (6146) من طريق حجاج بن أرطاة، ويحيى بن آدم في "الخراج" (100)، وعمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 1/ 186، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 3/ 43 و 50، وعبد الله بن أحمد في "العلل" (2191) من طريق محمد بن السائب الكلبي، كلاهما عن أبي صالح باذام مولى أم هانئ، عن ابن عباس.ويشهد له حديث عبد الله بن عمر. عند أحمد (8/ 4448)، والبخاري (2863)، ومسلم (1762).ومرسل صالح بن كيسان عند ابن أبي شيبة 12/ 397 و 14/ 151، والبيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 238، ورجاله ثقات. وانظر ما تقدم برقم (2626).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2649)


2649 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مَهدي بن رُستُم، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا أبي، قال: سمعت عبد الله بن مَلَاذٍ يحدّث عن نُمير بن أوس، عن مالك بن مَسرُوح، عن عامر بن أبي عامر الأشعري، عن أبيه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "نِعمَ الحيُّ الأَسْدُ والأشعرِيّون، لا يَفِرُّون في القتال، ولا يُخِلّون، هم مني وأنا منهم".قال: فحدّثتُ به معاوية، فقال: ليس هكذا، إنما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هم مني وإليّ"، فقلتُ: ليس هكذا حدثني أبي، ولكن حدثني أنه قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "هم مني وأنا منهم"، قال: فأنت إذًا أعلمُ بحديثِ أبيك [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ আমির আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আসদ ও আশআর গোত্রদ্বয় কতই না উত্তম গোত্র! তারা যুদ্ধে পলায়ন করে না এবং দুর্বলতা দেখায় না। তারা আমার এবং আমি তাদের।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর আমি এটি মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট বর্ণনা করলাম। তিনি বললেন: হাদিসটি এমন নয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো বলেছেন: "তারা আমার এবং আমার আশ্রয়ভূক্ত।" আমি বললাম: আমার পিতা আমাকে এভাবে বর্ণনা করেননি। বরং তিনি আমাকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "তারা আমার এবং আমি তাদের।" তিনি (মুয়াবিয়া) বললেন: তবে তুমিই তোমার পিতার বর্ণিত হাদিস সম্পর্কে অধিক অবগত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة عبد الله بن مَلاذٍ ومالك بن مسروح. جرير: هو ابن حازم.وأخرجه أحمد (28/ 17166) و (29/ 17501) عن وهب بن جرير، والترمذي (3947) عن إبراهيم بن يعقوب وغير واحد، عن وهب بن جرير، بهذا الإسناد.والأسْد، بسكون السين هم الأزْد، يقال بالزاي وبالسين.وقوله: "لا يُخلّون" كذلك جاء في نسخنا الخطية من "المستدرك"، وهو إما أن يكون من: أخلّ بالمكان: إذا غاب عنه وتركه، يعني أنهم لا يغيبون في المَشاهِد، أو من: أخلَّ؛ أي: افتَقَر، يعني أنهم لا يَفتَقِرون، لأنهم يُواسُون بعضهم بعضًا عند فناء أزوادهم أو قلّتها، ويقتسمون أرزاقهم، ويؤيد هذا المعنى الثاني حديث أبي موسى الأشعري عند البخاري (2486)، ومسلم (2500) قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الأشعريين إذا أَرْمَلُوا في الغزو أو قلّ طعام عيالهم بالمدينة، جمعوا ما كان عندهم في ثوبٍ واحدٍ، ثم اقتسموا بينهم في إناءٍ واحدٍ بالسَّوِيَّة، فهم مني وأنا منهم".ووقع عند سائر من خرَّج الحديث غير المصنف: يَغُلُّون، بدل: يُخلّون؛ من الغُلول من الغنيمة، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2650)


2650 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بحر بن نصر بن سابق الخَوْلاني، حدثنا أيوب بن سُوَيد، حدثنا عبد الله بن شَوذَب، عن عامر بن عبد الواحد، عن عبد الله بن بُريدة الأسلمي، عن عبد الله بن عَمرو، قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا أصابَ غنيمةً أمر بلالًا فنادى ثلاثًا، فيرفعُ الناسُ ما أصابُوا، ثم يأمُر به فيُخمَّس، فأتاهُ رجلٌ بزِمَامٍ من شَعر، وقد قُسمتِ الغَنيمةُ، فقال له: "هل سمعتَ بلالًا ينادي ثلاثًا؟ " قال: نعم، قال: "فما مَنَعَك أن تأتيَ به؟ " فاعتَذَر إليه، فقال له: "كن أنت الذي تُوافي به يومَ القيامة، فإني لن أقبلَه منك" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো গণীমত লাভ করতেন, তখন তিনি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিতেন, আর তিনি তিনবার ঘোষণা করতেন। ফলে লোকেরা তাদের প্রাপ্ত জিনিসসমূহ (জমা দেওয়ার জন্য) উঠিয়ে আনতো। অতঃপর তিনি তা (গণীমত) পাঁচ ভাগ করার নির্দেশ দিতেন। এরপর একজন লোক তাঁর নিকট চুলের তৈরি একটি লাগাম নিয়ে আসলো, অথচ গণীমত ইতোমধ্যে বণ্টন হয়ে গিয়েছিল। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি বিলালকে তিনবার ঘোষণা দিতে শোনোনি?" লোকটি বললো: "হ্যাঁ (শুনেছি)।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তবে কেন তুমি এটি নিয়ে আসোনি?" সে তখন ওযর পেশ করলো। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "কিয়ামতের দিন তুমি নিজেই এর সাথে মিলিত হবে। কারণ আমি এখন আর তোমার কাছ থেকে এটি গ্রহণ করবো না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لضعف أيوب بن سُويد، لكنه لم ينفرد به، فقد توبع فيما تقدَّم برقم (2615)، وعامر بن عبد الواحد صدوق حسن الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2651)


2651 - أخبرنا أبو محمد عبد الله بن إسحاق الخراساني ببغداد، حدثنا إبراهيم بن الهيثم البَلَدي، حدثنا الهيثم بن جَميل، حدثنا مُبارك بن فَضَالة، عن عُبيد الله [1] بن عمر، عن سعيد المقبُري، قال: سمعت أبا هريرة، وكنت جالسًا عنده، فقال أبو هريرة: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ نبيًّا من الأنبياء قاتَلَ أهلَ مدينةٍ، حتى إذا كاد أن يَفتَتحَها خشيَ أن تَغرُبَ الشمسُ، فقال لها: أيّتها الشمسُ، إنك مأمُورةٌ وأنا مأمُورٌ، بحُرْمتي عليكِ إلّا رَكَدْتِ ساعةً من النهار. قال: فحَبَسها الله حتى افتتح المدينة.وكانوا إذا أصابُوا الغنائمَ قَرَّبوها في القُربان، فجاءتِ النارُ فأكلتْها، فلما أصابوا وَضَعُوا القُربان، فلم تجيءِ النارُ تأكلُه، فقالوا: يا نبيَّ الله، ما لنا لا يُقبلُ قُربانُنا؟ قال: فيكم غُلول، قالوا: وكيف لنا أن نعلمَ مَن عنده الغُلُول؟ قال: وهم اثنا عشر سِبْطًا، قال: يُبايِعُني رأسُ كل سِبْطٍ منكم، فبايَعَه رأسُ كلِّ سِبْطٍ" قال: "فَلَزِقَت كفُّ النبي بكفِّ رجل منهم، فقال له: عندك الغُلول، فقال: كيف لي أن أعلمَ عند أي سِبْطٍ هو؟ قال: تدعو سِبْطك فتبايعُهم رجلًا رجلًا، قال: ففعل، فلزِقَتْ كفُّه بكفِّ رجلٍ منهم، قال: عندك الغُلول؟ قال: نعم، عندي الغُلول، قال: وما هو؟ قال: رأسُ ثورٍ من ذهب أعجبَني، فغلَلْتُه، فجاء به فوضعه في الغنائم، فجاءتِ النارُ فأكلتْه".فقال كعب: صدق اللهُ ورسولُه، هكذا واللهِ في كتاب الله - يعني في التوراة - قال: يا أبا هريرة، أحدَّثكُم النبي صلى الله عليه وسلم أيَّ نبي كان؟ قال: لا، قال كعب: هو يُوشَع بن نُون، قال: فحدَّثكُم أيُّ قرية هي؟ [قال: لا] [2] قال: هي مدينة أَريحا [3]. هذا حديث غريب صحيح، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি:

"নিশ্চয়ই নবীদের মধ্যে একজন নবী কোনো এক জনপদের অধিবাসীদের সাথে যুদ্ধ করছিলেন। যখন তিনি তা প্রায় জয় করে ফেলেছিলেন, তখন তিনি সূর্য ডুবে যাওয়ার ভয় করলেন। তাই তিনি সূর্যকে বললেন: হে সূর্য, তুমিও আদিষ্ট এবং আমিও আদিষ্ট। আমার সম্মানের দোহাই, তুমি দিনের কিছুটা সময় স্থির থাকো।

ফলে আল্লাহ সেটিকে স্থির করে দিলেন, যতক্ষণ না তিনি শহরটি জয় করলেন। (পূর্ববর্তী নবীদের যুগে) তারা যখন যুদ্ধলব্ধ সম্পদ (গনিমত) পেত, তখন সেগুলোকে কুরবানীর জন্য একত্রিত করত, অতঃপর আগুন আসত এবং তা গ্রাস করে নিত। কিন্তু যখন তারা (এই যুদ্ধলব্ধ) গনিমত পেল এবং কুরবানী রাখল, তখন আগুন এসে তা খেলো না।

তখন তারা বলল: হে আল্লাহর নবী, কী হলো যে আমাদের কুরবানী কবুল হলো না? তিনি বললেন: তোমাদের মধ্যে গনীমতের সম্পদ আত্মসাৎকারী (গুলূল) রয়েছে। তারা বলল: যার কাছে আত্মসাৎকৃত সম্পদ আছে, আমরা তা কীভাবে জানতে পারব? তিনি বললেন—আর তারা ছিল বারোটি গোত্র—তোমাদের প্রতিটি গোত্রের প্রধান যেন আমার কাছে বাইয়াত গ্রহণ করে। অতঃপর প্রতিটি গোত্রের প্রধান তাঁর কাছে বাইয়াত গ্রহণ করল।

(নবী) বললেন: তখন নবীর হাত তাদের মধ্যেকার এক ব্যক্তির হাতের সাথে আটকে গেল। তিনি তাকে বললেন: তোমার কাছেই আত্মসাৎকৃত সম্পদ রয়েছে। লোকটি বলল: আমি কীভাবে জানব যে, কোন গোত্রের কাছে তা আছে? তিনি বললেন: তুমি তোমার গোত্রকে ডাকো এবং তাদের প্রত্যেকের কাছ থেকে পৃথক পৃথকভাবে বাইয়াত নাও। বর্ণনাকারী বলেন: লোকটি তাই করল। অতঃপর তার হাত তাদের মধ্যেকার এক ব্যক্তির হাতের সাথে আটকে গেল। সে বলল: তোমার কাছে কি আত্মসাৎকৃত সম্পদ আছে? সে বলল: হ্যাঁ, আমার কাছেই আত্মসাৎকৃত সম্পদ রয়েছে। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: সেটা কী? লোকটি বলল: একটি স্বর্ণের ষাঁড়ের মাথা, যা আমার ভালো লেগেছিল, তাই আমি তা আত্মসাৎ করেছিলাম। সে তা নিয়ে এসে গনীমতের মধ্যে রাখল। অতঃপর আগুন এল এবং তা খেয়ে ফেলল।"

অতঃপর কা'ব (আহবার) বললেন: আল্লাহ ও তাঁর রাসূল সত্য বলেছেন। আল্লাহর কসম, আল্লাহর কিতাবে (অর্থাৎ তাওরাতে) এমনই আছে। তিনি বললেন: হে আবূ হুরায়রা, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আপনাদেরকে জানিয়েছিলেন যে তিনি কোন নবী ছিলেন? আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: না। কা'ব বললেন: তিনি ছিলেন ইউশা' ইবনু নূন। কা'ব জিজ্ঞেস করলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আপনাদেরকে জানিয়েছিলেন যে, সেটা কোন জনপদ ছিল? আবূ হুরায়রা বললেন: না। কা'ব বললেন: সেটা ছিল আরীহা শহর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز): عبد الله، بالتكبير، وهو خطأ، والمثبت من (ص) و (ب) و (ع)، هو الموافق لسائر من خرَّج الحديث من طريق مبارك بن فَضالة.



[2] عبارة: "قال: لا" ليست في النسخ الخطية، وثبتت لجميع من خرَّج الحديث غير المصنف، ولا بد منها لدفع توهم الرفع في قوله بعدها: هي مدينة أريحا.



2651 [3] - حديث صحيح، وهذا إسناد حسن لولا عنعنة مبارك بن فَضَالة - وهو البصري - وقد تابعه محمد بن عجلان، فتُغتفَر بذلك عنعنته إن شاء الله، وروي الحديث من وجه آخر عن أبي هريرة كما سيأتي.وأخرجه البزار (8458) من طريق أبي همام محمد بن الزِّبْرقان والطبراني في "الأوسط" (6600) من طريق سعيد بن سليمان الواسطي، كلاهما عن مبارك بن فضالة، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو سعيد النقَّاش في "فنون العجائب" (66)، والخطيب البغدادي في "الأسماء المبهمة" ص 332 من طريق محمد بن عجلان، عن سعيد المقبري، به وإسناده قوي.وأخرجه بنحوه دون قصة كعب - وهو كعب بن ماتِع الحِمْيَري، المعروف بكعب الأحبار - أحمد (13/ 8238)، والبخاري (3124)، ومسلم (1747)، وابن حبان (4808) من طريق همام بن مُنبِّه، والنسائي (8827)، وابن حبان (4807) من طريق سعيد بن المسيب، كلاهما عن أبي هريرة. وزاد ابن المسيب في روايته وكذا همام بنحوه: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم عند ذلك: "إنَّ الله أطعمنا الغنائم رحمةً رحمنا بها وتخفيفًا خففه عنا، لما عَلِمَ من ضعفنا".قوله: "رَكَدْتِ" أي: سكنْتِ ولم تجري.والسِّبْط: واحد الأسباط، وهم في أولاد إسحاق بن إبراهيم الخليل، بمنزلة القبائل في ولد إسماعيل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2652)


2652 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد بن يحيى الشهيد، حدثنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن عَرْعَرة السامي، حدثنا أزهر [1] بن سعْد السَّمّان، حدثنا ابن عَون، عن محمد، عن [2] عُبيدة، عن علي، قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم في الأُسارى يوم بدرٍ: "إن شئتم قَتلْتُموهم، وإن شئتم فاديتُم، واستمتعتُم بالفِداء، واستُشهِد منكم بعِدَّتهم"، فكان آخرَ السبعين ثابتُ بنُ قيس، استُشهِد باليَمامة [3]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, বদরের যুদ্ধের বন্দীদের সম্পর্কে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তোমরা চাও, তবে তাদের হত্যা করো, আর যদি তোমরা চাও, তবে মুক্তিপণ নাও এবং মুক্তিপণ উপভোগ করো। তবে তোমাদের মধ্য থেকে তাদের (বন্দীদের) সংখ্যার সমান সংখ্যক লোক শহীদ হবে।" সত্তর জনের মধ্যে সর্বশেষ শহীদ হয়েছিলেন সাবিত ইবনু কায়স, যিনি ইয়ামামার যুদ্ধে শহীদ হন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ص) و (ع) إلى إبراهيم، والمثبت على الصواب من (ب) و"سنن البيهقي الكبرى" 6/ 321 حيث روى هذا الحديث عن أبي عبد الله الحاكم، ورواه أيضًا في "السنن الكبرى" 9/ 68، وفي "الدلائل" 3/ 139 عن أبي عبد الله الحاكم عن أبي العباس محمد بن يعقوب الأصم، عن ابن عرعرة، عن أزهر. فذكره على الصواب كذلك، ورواية الأصم هذه ليست في "المستدرك". الطبري 4/ 166 و 10/ 46 في روايتهما عن ابن سيرين.وقال البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل" (470): روى أكثر الناس هذا الحديث عن ابن سيرين عن عُبيدة، مرسلًا. وقال الدارقطني في "العلل" (418): المرسل أشبه بالصواب.وأخرجه الترمذي (1567)، والنسائي (8608)، وابن حبان (4795) من طريق سفيان الثَّوري، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، به. وقال الترمذي: حسن غريب. قلنا: وجاء في رواية سفيان الثَّوري أنَّ جبريل هو من أمر النبي صلى الله عليه وسلم بتخيير أصحابه، لا أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قاله من عند نفسه برأي رآه.ورواية جرير بن حازم عند الطبري تبين أنَّ مجيء جبريل إنما كان بعد أن تم اختيار الفداء، إذ يقول في روايته: جاء جبريل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال له: يا محمد، إِنَّ الله كره ما صنع قومُك في أخذهم الأُسارى، وقد أمرك أن تُخيِّرهم بين أمرين …فظهر بذلك أنَّ نزول جبريل كان بعد أن أُخذ الفداء من الأَسرى، وبعد مُعاتبة الله تعالى للنبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه في اختيارهم الفداءَ على قتل الأسرى، وبذلك يزول الإشكال الذي أشار إليه بعض شُرَّاح "المصابيح" كما في "المرقاة" للقاري، والله أعلم.



[2] تحرَّف في (ز) و (ص) و (ع) إلى: بن، فأوهم أنه محمد بن عَبيدة، وإنما محمد هو ابن سيرين، وشيخه عَبِيدة هو السَّلْماني وجاء على الصواب في (ب) وِفاقًا لما في روايتي البيهقي الآنِفِ ذكرهما. الطبري 4/ 166 و 10/ 46 في روايتهما عن ابن سيرين.وقال البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل" (470): روى أكثر الناس هذا الحديث عن ابن سيرين عن عُبيدة، مرسلًا. وقال الدارقطني في "العلل" (418): المرسل أشبه بالصواب.وأخرجه الترمذي (1567)، والنسائي (8608)، وابن حبان (4795) من طريق سفيان الثَّوري، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، به. وقال الترمذي: حسن غريب. قلنا: وجاء في رواية سفيان الثَّوري أنَّ جبريل هو من أمر النبي صلى الله عليه وسلم بتخيير أصحابه، لا أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قاله من عند نفسه برأي رآه.ورواية جرير بن حازم عند الطبري تبين أنَّ مجيء جبريل إنما كان بعد أن تم اختيار الفداء، إذ يقول في روايته: جاء جبريل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال له: يا محمد، إِنَّ الله كره ما صنع قومُك في أخذهم الأُسارى، وقد أمرك أن تُخيِّرهم بين أمرين …فظهر بذلك أنَّ نزول جبريل كان بعد أن أُخذ الفداء من الأَسرى، وبعد مُعاتبة الله تعالى للنبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه في اختيارهم الفداءَ على قتل الأسرى، وبذلك يزول الإشكال الذي أشار إليه بعض شُرَّاح "المصابيح" كما في "المرقاة" للقاري، والله أعلم.



2652 [3] - إسناده صحيح. وقد اختُلف في وصل هذا الحديث وإرساله، فوصله ابن عون - وهو عبد الله - في رواية أزهر بن سعْد عنه كما في رواية المصنف هنا، ووافقه على وصله هشام بن حسان في رواية سفيان الثَّوري وأبي أسامة حماد بن أسامة، كما أشار إليه الدارقطني في "العلل" (418)، ووافقه على وصله أيضًا جرير بن حازم عند الطبري في "تفسيره" 4/ 166.لكن رواه إسماعيل ابن عُلَيَّة، عن ابن عون، عند الطبري 4/ 166 و 10/ 46، فأرسله.وذكر الدارقطني في "العلل" (418): أنَّ خالد بن الحارث وعثمان بن عمر ومعاذ بن معاذ قد رووه عن ابن عون كذلك مرسلًا.قلنا: وكذلك رواه محمد بن عبد الله الأنصاري عن هشام بن حسان عند ابن سعد 2/ 20 مرسلًا.وأرسله كذلك أيوب السختياني عند عبد الرزاق في "مصنفه" (9402)، وأشعث بن سَوَّار عند الطبري 4/ 166 و 10/ 46 في روايتهما عن ابن سيرين.وقال البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل" (470): روى أكثر الناس هذا الحديث عن ابن سيرين عن عُبيدة، مرسلًا. وقال الدارقطني في "العلل" (418): المرسل أشبه بالصواب.وأخرجه الترمذي (1567)، والنسائي (8608)، وابن حبان (4795) من طريق سفيان الثَّوري، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، به. وقال الترمذي: حسن غريب. قلنا: وجاء في رواية سفيان الثَّوري أنَّ جبريل هو من أمر النبي صلى الله عليه وسلم بتخيير أصحابه، لا أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قاله من عند نفسه برأي رآه.ورواية جرير بن حازم عند الطبري تبين أنَّ مجيء جبريل إنما كان بعد أن تم اختيار الفداء، إذ يقول في روايته: جاء جبريل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال له: يا محمد، إِنَّ الله كره ما صنع قومُك في أخذهم الأُسارى، وقد أمرك أن تُخيِّرهم بين أمرين …فظهر بذلك أنَّ نزول جبريل كان بعد أن أُخذ الفداء من الأَسرى، وبعد مُعاتبة الله تعالى للنبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه في اختيارهم الفداءَ على قتل الأسرى، وبذلك يزول الإشكال الذي أشار إليه بعض شُرَّاح "المصابيح" كما في "المرقاة" للقاري، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2653)


2653 - أخبرني عبد الله بن سعد الحافظ، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا عمرو بن علي وأحمد بن المِقْدام، قالا: حدثنا أبو بحر البَكْراوي، حدثنا شعبة، حدثنا أبو العَنْبس، عن أبي الشَّعْثاء، عن ابن عباس، قال: جعلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في فِداء الأُسارى أهلِ الجاهلية أربعَ مئة [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম জাহেলী যুগের বন্দীদের মুক্তির বিনিময়ে চারশো (দিরহাম/দিনার) নির্ধারণ করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وقد تقدَّم برقم (2605) من طريق سفيان بن حبيب عن شعبة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2654)


2654 - أخبرني أبو بكر محمد بن عبد الله بن عَتّاب العَبْدي، حدثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبْرِقان، حدثنا علي بن عاصم، حدثنا داود بن أبي هند.وحدثنا علي بن عيسى، حدثنا محمد بن المسيّب، حدثنا إسحاق بن شاهين، حدثنا خالد بن عبد الله، عن داود بن أبي هند، عن عِكرمة، عن ابن عباس، قال: كان ناسٌ من الأُسارى يوم بدر ليس لهم فِداءٌ، فجعلَ رسول الله صلى الله عليه وسلم فِداءَهم أن يُعلِّموا أولادَ الأنصار الكتابةَ، قال: فجاء غلامٌ من أولاد الأنصار إلى أبيه، فقال: ما شأنُك؟ قال: ضربني مُعلِّمي، قال: الخبيثُ يَطلبُ بِذَحْلِ بدرٍ، والله لا تأتيه أبدًا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদরের দিনের বন্দীদের মধ্যে কিছু লোক ছিল যাদের মুক্তিপণ দেওয়ার মতো সামর্থ্য ছিল না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মুক্তিপণ হিসেবে স্থির করলেন যে তারা আনসারদের সন্তানদের লেখা শেখাবে। বর্ণনাকারী বলেন: তখন আনসারদের সন্তানদের মধ্য থেকে একটি ছেলে তার পিতার কাছে এলো। তিনি (পিতা) জিজ্ঞেস করলেন: তোমার কী হয়েছে? সে বলল: আমার শিক্ষক আমাকে মেরেছেন। তিনি (পিতা) বললেন: এই দুষ্ট লোকটি বদরের প্রতিশোধ নিতে চাইছে! আল্লাহর কসম, তুমি আর কখনো তার কাছে যাবে না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح من جهة خالد بن عبد الله: وهو الواسطي الطحّان.وأخرجه أحمد (4/ 2216) عن علي بن عاصم، بهذا الإسناد.وأخرج منه ذكر تعليم الكتابة دون قصة الغلام الأنصاري: أبو عبيد في "الأموال" (309)، وابن سعد في "الطبقات الكبرى" 2/ 23 من طريقين عن أيوب السختياني، عن عكرمة، مرسلًا.والذَّحْل: الثأر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2655)


2655 - حدثنا أبو جعفر أحمد بن عُبيد بن إبراهيم الأسدي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين بن دِيزِيل، حدثنا أبو اليَمَان الحَكَم بن نافع، حدثنا صفوان بن عمرو، عن عبد الرحمن بن جُبَير بن نُفَير، عن أبيه، عن عوف بن مالك الأشجعي، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا جاءه فَيءٌ قَسَمه من يومِه، فأعطى الآهِلَ حَظَّين والعَزَبَ حظًّا [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، فقد أخرج بهذا الإسناد بعَينِه أربعةَ أحاديث، ولم يُخرجاه.




আওফ ইবনে মালিক আল-আশজাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যখন কোনো ‘ফাই’ (বিনা যুদ্ধে প্রাপ্ত সম্পদ) আসত, তিনি সেদিনই তা বণ্টন করে দিতেন। তিনি বিবাহিত ব্যক্তিকে দু’টি অংশ দিতেন এবং অবিবাহিত ব্যক্তিকে একটি অংশ দিতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 39/ (23986) و (24004)، وأبو داود (2953) من طريقين عن صفوان بن عمرو، بهذا الإسناد.والآهل: الذي له زوجة وعيال، والعزب: الذي لا زوجة له.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2656)


2656 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا رَوْح بن عُبادة وعبد الوهاب الخَفَّاف، قالا: حدثنا سعيد بن أبي عَرُوبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يحيى عن سعيد، عن قَتَادة، عن الحسن، عن قيس بن عُبَاد، قال: دخلتُ أنا والأشْتَرُ على عليّ بن أبي طالب يومَ الجَمَل، فقلت: هل عَهِد إليك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عهدًا دون العامّة؟ فقال: لا، إلّا هذا، وأخرج من قِرابِ سيفه، فإذا فيها: "المؤمنون تَكَافأُ دماؤُهم، يَسعى بذِمَّتِهم أدناهُم، وهم يدٌ على مَن سِواهم، لا يُقتَلُ مؤمنٌ بكافر، ولا ذو عَهْدٍ في عَهْدِه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه [2].وله شاهد عن أبي هريرة وعمرو بن العاص، أما حديث أبي هريرة:




আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কায়স ইবনে উবাদ বলেন: জামালের যুদ্ধের দিন আমি ও আশতার তাঁর (আলী রাঃ-এর) নিকট প্রবেশ করলাম। আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: সাধারণ লোকদের ব্যতীত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আপনাকে বিশেষভাবে কোনো উপদেশ দিয়েছিলেন? তিনি বললেন: না, তবে এটি ছাড়া। অতঃপর তিনি তাঁর তরবারির খাপ থেকে একটি লিপি বের করলেন, যাতে লেখা ছিল: "মুমিনদের রক্ত একে অপরের জন্য সমান (মর্যাদাপূর্ণ)। তাদের মধ্যেকার নিম্নতম ব্যক্তিও অন্যের জন্য নিরাপত্তামূলক অঙ্গীকার দিতে পারবে। তারা (সকল মুমিন) তাদের ভিন্ন অন্য সবার বিরুদ্ধে ঐক্যবদ্ধ শক্তি। কোনো মুমিনকে কোনো কাফিরের হত্যার বিনিময়ে হত্যা করা হবে না এবং চুক্তিবদ্ধ থাকা অবস্থায় কোনো চুক্তিবদ্ধ ব্যক্তিকে (তার চুক্তির কারণে) হত্যা করা হবে না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. يحيى: هو ابن سعيد القطان، وسعيد: هو ابن أبي عَروبة، والحسن: هو البصري، والأشتر المذكور: هو مالك بن الحارث النخعي.وهو في "مسند أحمد" (2/ 993)، وعنه أخرجه أبو داود (4530).وأخرجه أبو داود (4530) عن مُسدَّد بن مُسَرْهَد، والنسائي (6910) و (8629) عن محمد بن المثنَّى، كلاهما عن يحيى بن سعيد، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (6922) و (8628) من طريق أبي حسان الأعرج، عن الأشتر النخعي، عن علي بن أبي طالب.وأخرجه أحمد (959) و (991)، والنسائي (6911) و (6921) من طريق أبي حسان الأعرج، عن علي. دون ذكر الأشتر، والصحيح ذكره.وأخرج أحمد (599)، والبخاري (111)، وابن ماجه (2658)، والترمذي (1412)، والنسائي (6920) من طريق أبي جُحيفة، عن علي، وذَكَر الصحيفة، قال: فيها العَقْل، وفكاك الأسير، ولا يُقتل مسلم بكافر. قلنا: العَقْل: يعني الدية.وأخرج أحمد (615)، والبخاري (1870) و (3179)، ومسلم (1370) و (1508) (20)، وأبو داود (2034)، والترمذي (2127)، وابن حبان (3716) من طريق يزيد بن شريك التيمي، عن علي، وذكر الصحيفة وذكر فيها أشياء ليست في حديثنا، وقال فيها: "وذمة المسلمين واحدة، يسعى بها أدناهم، فمن أخفر مسلمًا فعليهِ لعنةُ الله والملائكة والناس أجمعين، لا يُقبل منه صرف ولا عَدْل"، ولم يذكر تكافؤ الدماء ولا قتل المؤمن وذي العهد.وقِراب السيف: جَفْنُه، وهو وعاء يكون فيه السيف بغِمْده وحمالَته.وقوله: "تَكَافأُ دماؤهم"، أي: تتساوى في القصاص والديات.وقوله: "يسعى بذِمّتهم أدناهم"، أي: إذا أعطى أحد الجيش العدوّ أمانًا جاز ذلك على المسلمين، وليس لهم أن يُخفِروه، ولا أن ينقضوا عهدَه.وقوله: "وهم يدٌ على من سِواهم" أي: إذا استُنفِروا رجب عليهم النَّفير، وإن استُنجِدوا أنجَدُوا، ولم يتخلَّفوا ولم يتخاذلوا. وقوله: "لا يُقتل مؤمن بكافر" يدخل فيه كل كافر له عهد وذمة، أو لا عهد له ولا ذمّة.وقوله: "ولا ذو عهد في عهده" أي: لا يقتل معاهَدٌ ما دام في عهده.



[2] قد أخرجا منه بعض حروفه كما قدمنا من طريقين آخرين عن علي بن أبي طالب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2657)


2657 - فأخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل، حدثنا جدي، حدثنا إبراهيم بن حمزة الزُّبَيري، حدثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن كثير بن زيد، عن الوليد بن رَبَاح، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "يُجِيرُ على أُمتي أدناهُم" [1].وأما حديثُ عمرو بن العاص فمعروف في قتلِه محمدَ بن أبي بكر لما دَخَلَ عليه، قال له: محمدُ بن أبي بكر؟ قال: نعم، قال: بأمانٍ جئتَ؟ قال: لا، قال: فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "المسلمون تَتكافأُ دماؤُهم" الحديث [2].




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "আমার উম্মতের মধ্যে সর্বনিম্ন ব্যক্তিও অন্যদের আশ্রয় দিতে পারে।"

আর আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি প্রসিদ্ধ—যখন মুহাম্মাদ ইবনু আবী বাকর তাঁর কাছে প্রবেশ করেন তখন তাঁকে হত্যার ঘটনাটি। (আমর) তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন: তুমি কি মুহাম্মাদ ইবনু আবী বাকর? তিনি বললেন: হ্যাঁ। (আমর) বললেন: তুমি কি নিরাপত্তা নিয়ে এসেছ? তিনি বললেন: না। তিনি (আমর) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "সকল মুসলমানের রক্ত সমমর্যাদার অধিকারী।" এই হাদীসটি...




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل كثير بن زيد - وهو الأسلَمي - والوليد بن رباح.وأخرجه أحمد (14/ 8780) من طريق سليمان بن بلال، عن كثير بن زيد، به.وأخرجه أيضًا (15/ 9173) من طريق أبي صالح، عن أبي هريرة، بلفظ: "ذِمّة المسلمين واحدة، يسعى بها أدناهم، فمن أخفر مسلمًا فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل اللهُ منه يوم القيامة صَرْفًا ولا عدلًا". وإسناده صحيح.وسيأتي عند المصنف بلفظ رواية الوليد بن رباح من حديث عائشة برقم (5110) بسند حسن، ومن حديث أم سلمة برقم (7015) بسند حسن أيضًا.



[2] كذا قال المصنف، والمعروف في رواية هذا الحديث أنَّ عمرو بن العاص قال له: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يُجير على المسلمين أدناهم" ولم يقل له سوى ذلك، فهذا نص رواية عمرو بن العاص كما أخرجه أحمد (29/ 17765) وغيره من طريق شعبة، عن عمرو بن دينار، عن رجل من أهل مصر يُحدّث عن عمرو بن العاص، أنه قال: أُسِر محمد بن أبي بكر، قال: فجعل عمرو يسأله يُعجِبُه أن يدّعيَ أمانًا، قال: فقال عمرو … فذكره. وهذا إسناد ضعيف لإبهام الرجل المصري، لكن مرفوعه صحيح بحديثي علي وأبي هريرة السابقين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2658)


2658 - أخبرنا أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا محبُوب بن موسى، حدثنا أبو إسحاق الفَزَاري، عن عمرو بن مُرّة، عن أبي البَخْتَري، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ذِمّةُ المسلمين واحدةٌ، فإن جارَتْ عليهم جائرة، فلا تخفِروها، فإنَّ لكل غادر لواءً يُعرَفُ به يومَ القيامة" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، إنما اتفقا على ذكر الغادر فقط [2].




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুসলিমদের নিরাপত্তা বা অঙ্গীকার অভিন্ন (একটি)। যদি তাদের পক্ষ থেকে কোনো দুর্বল ব্যক্তিও সেই নিরাপত্তা দেয়, তবে তোমরা তা ভঙ্গ করো না। কেননা, কিয়ামতের দিন প্রত্যেক বিশ্বাসঘাতকের জন্য একটি পতাকা থাকবে, যার দ্বারা তাকে পরিচিত করা হবে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، وقد سقط من إسناد هذه الرواية رجلٌ بين أبي إسحاق الفزاري - واسمه إبراهيم بن محمد بن الحارث - وبين عمرو بن مُرة - وهو بن عبد الله الجَمَلي - وهذا الرجل هو أبو سَعْد البقّال - واسمه سعيد بن المَرْزُبان - وهو رجل ضعيف الحديث، وقد أثبته في إسناد هذا الحديث كل من رواه عن أبي إسحاق الفزاري من ثقات أصحابه غير محبوب، وكذلك أثبته عُبيد بن عبد الواحد بن شريك البزار في روايته عن محبوب بن موسى، فالظاهر أنَّ الوهم هنا ممَّن دون محبوب، والله تعالى أعلم، وجزم أبو حاتم الرازي بأنَّ رواية أبي البَختَري - وهو سعيد بن فيروز - عن عائشة مرسلة.وأخرجه ابن عبد البر في "التمهيد" 21/ 188 من طريق عُبيد بن عبد الواحد البزار، عن محبوب بن موسى، عن أبي إسحاق الفزاري، عن أبي سعد، قال: أخبرنا عمرو بن مرة، به.وأخرجه الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (671)، وأبو عوانة (6526) من طريق معاوية بن عمرو، وأبو عوانة (6526)، والخرائطي في "اعتلال القلوب" (430)، وفي "مساوئ الأخلاق" (399) من طريق عاصم بن يوسف الكوفي، وأبو يعلى (4392) عن محمد بن عبد الرحمن بن سهم، ثلاثتهم عن أبي إسحاق الفزاري، عن أبي سعد البقال الأعور، عن عمرو بن مرة، به.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (5628) من طريق علي بن هاشم بن البَريد، عن أبي سعْد البقّال، به.وقد صحَّ عن عائشة كما سيأتي عند المصنف برقم (5110): أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أجاز جِوارَ ابنته زينب لزوجها أبي العاص، وقال: "إنه يجير على المسلمين أدناهم، وإسناده حسن.وصحَّ عن عائشة أيضًا عند أبي داود (2764)، والنسائي (8630) أنها قالت: إن كانتِ المرأةُ لتُجِير على المؤمنين فيجوزُ. هذا لفظ أبي داود، وإسناده صحيح. بحديث أبي سعيد الخُدْري. انظر "صحيح البخاري" (3186) و (3188) و"صحيح مسلم" (1735) و (1736) و (1737) و (1738).



[2] إنما اتفقا عليه من غير حديث عائشة، كابن مسعود وأنس وابن عمر، وانفرد مسلم أيضًا بحديث أبي سعيد الخُدْري. انظر "صحيح البخاري" (3186) و (3188) و"صحيح مسلم" (1735) و (1736) و (1737) و (1738).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2659)


2659 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا إسحاق بن إدريس، حدثنا همّام، عن قَتَادة عن الحسن، عن سَمُرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا تُساكِنُوا المشركين ولا تُجامِعُوهم، فمن ساكَنَهم أو جامَعَهم فليس مِنّا" [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মুশরিকদের সাথে বসবাস করো না এবং তাদের সাথে একত্রিত (বা মেলামেশা) করো না। কারণ যে ব্যক্তি তাদের সাথে বসবাস করবে অথবা তাদের সাথে একত্রিত হবে, সে আমাদের দলভুক্ত নয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل إسحاق بن إدريس - وهو الأُسواري - فهو متروك الحديث، واتهمه بعضهم بوضع الحديث، وبعضهم بسرقته. وقد رواه عن همام - وهو ابن يحيى - أيضًا بهذا الإسناد محمد بن عبد الملك أبو جابر الأزدي، وهو ليس بالقوي، وفي الإسناد إليه من ليس بمشهور.وخالفهما نصر بن عطاء الواسطي، فرواه عن همام، عن قتادة عن أنس بن مالك. فذكر أنسًا، بدل سمرة، ولم يذكر الحسن - وهو البصري - لكن نصرًا هذا لم نعرف راويًا عنه غير الفضل بن سهل الأعرج، ولم يؤثر توثيقه عنه أحدٍ، فهو مجهول العين.وخالفهم جميعًا حجاج بن منهال، فرواه عن همام، عن قتادة، عن الحسن البصري مرسلًا، وهو الصواب، لأنَّ حجاجًا ثقة حافظ.وقد روي ما يشهد لمُرسل الحسن البصري هذا كما سيأتي.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 142 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (4569)، والطبراني في "المعجم الكبير" (6905) من طرق عن إسحاق بن إدريس، به.وأخرجه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 123 من طريق محمد بن عبد الملك الأزدي، عن همام، به.وأخرجه أسلم بن سهل في "تاريخ واسط" ص 171 من طريق نصر بن عطاء الواسطي، عن همام، عن قتادة، عن أنس.وأخرجه ابن المنذر في "الأوسط" (6339) من طريق حجاج بن منهال، عن همام، عن قتادة، عن الحسن، مرسلًا، لكنه قال في آخره: "فمن ساكنهم وجامعهم فهو مثلهم". ورجاله ثقات إلّا أنَّ مراسيل الحسن واهنة.وفي الباب عن جرير بن عبد الله عند أبي داود (2645)، والترمذي (1604)، ولفظه: "أنا بريء من كل مسلم يُقيم بين أظهُر المشركين" قالوا: يا رسول الله، لمَ؟ قال: "لا تَراءَى ناراهما".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2660)


2660 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ وإبراهيم بن عِصمة بن إبراهيم، قالا: حدثنا السَّرِيّ بن خُزيمة، حدثنا عمر بن حفص بن غِياث، حدثنا أبي، عن داود بن أبي هند، عن عِكرمة، عن ابن عباس، قال: كان رجلٌ من الأنصار أسلم ثم ارتدّ، فلحِق بالمشركين، ثم ندم فأرسل إلى قومه: أن سَلُوا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم هل لي مِن توبةٍ؟ قال: فنزلت: {كَيْفَ يَهْدِي اللَّهُ قَوْمًا كَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ} إلى قوله: {إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِنْ بَعْدِ ذَلِكَ وَأَصْلَحُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [آل عمران: 86 - 89]، قال: فأرسل إليه قومُه فأسلَمَ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আনসারদের মধ্য থেকে একজন লোক ইসলাম গ্রহণ করেছিল, তারপর সে মুরতাদ (ধর্মত্যাগী) হয়ে গেল। এরপর সে মুশরিকদের সাথে মিশে গেল, পরে সে অনুতপ্ত হলো। অতঃপর সে তার কওমের কাছে বার্তা পাঠালো যে, তোমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করো, আমার জন্য কি তওবার কোনো সুযোগ আছে? তিনি বললেন: তখন এই আয়াত নাযিল হলো: "আল্লাহ কীভাবে সেই কওমকে হিদায়াত করবেন, যারা ঈমান আনার পর কুফরি করেছে..." থেকে শুরু করে তাঁর বাণী: "...তবে যারা এরপর তওবা করবে এবং নিজেদেরকে সংশোধন করে নেবে, নিশ্চয় আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।" (সূরা আলে ইমরান: ৮৬-৮৯)। তিনি বললেন: অতঃপর তার কওমের লোকেরা তার কাছে বার্তা পাঠালো এবং সে ইসলাম গ্রহণ করল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد (4/ 2218) عن علي بن عاصم، والنسائي (3517) و (10999)، وابن حبان (4477) من طريق يزيد بن زُريع، كلاهما عن داود بن أبي هند، به. وأخرجه أحمد (32/ 19720) عن علي بن المديني، وأبو داود (1537)، والنسائي (10362) عن محمد بن المثنّى، والنسائي (8577) عن عُبيد الله بن سعيد، وابن حبان (4765) من طريق إسحاق بن إبراهيم بن كامَجْرا، كلهم عن معاذ بن هشام، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (19719) من طريق عمران بن داور القطان، عن قتادة، به.