আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
2681 - حدَّثَناه أحمد بن عثمان البَزّاز ببغداد، حدثنا أبو إسحاق إبراهيم بن الهيثم البَلَدي، حدثنا محمد بن كثير المِصِّيصي، حدثنا الأوزاعي، عن قَتَادة، عن أنس بن مالكٍ، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "سيكون في أمتي اختِلافٌ وفُرقةٌ، قومٌ يُحسِنون القِيلَ ويُسيئون الفِعلَ، يقرؤون القرآنَ لا يُجاوزُ تَراقِيهَم، يَحقِرُ أحدُكم صلاتَه مع صَلاته، وصيامَه مع صيامه، يَمرُقون من الدِّين مُروقَ السهْم من الرَّمِيَّة، لا يرجعُ حتى يُرَدَّ السهمُ على فُوقِه، وهم شِرارُ الخلق والخليقة، طُوبَى لمن قتَلَهم وقتَلُوه، يَدعُون إلى كتاب الله، وليسُوا منه في شيءٍ، مَن قاتلهم كان أَولى بالله منهم" قالوا: يا رسول الله، ما سِيماهُم؟ قال: "التَّحْلِيق" [1].
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের মধ্যে মতভেদ ও অনৈক্য দেখা দেবে। এমন এক সম্প্রদায় হবে যারা কথায় খুব ভালো কিন্তু কাজে খুবই মন্দ। তারা কুরআন তিলাওয়াত করবে, কিন্তু তা তাদের কণ্ঠনালী অতিক্রম করবে না। তোমাদের কেউ তাদের সালাতের তুলনায় নিজের সালাতকে এবং তাদের সিয়ামের তুলনায় নিজের সিয়ামকে তুচ্ছ মনে করবে। তারা দ্বীন থেকে এমনভাবে বেরিয়ে যাবে, যেমন তীর শিকার ভেদ করে বেরিয়ে যায়। তারা আর (দ্বীনের মধ্যে) ফিরে আসবে না, যতক্ষণ না তীর তার ধনুকের স্থানে ফিরে আসে। আর তারা হলো সৃষ্টির মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট। সেই ব্যক্তির জন্য সুসংবাদ, যে তাদের হত্যা করে এবং যাদেরকে তারা হত্যা করে। তারা আল্লাহর কিতাবের দিকে আহ্বান করবে, অথচ এর সাথে তাদের কোনো সম্পর্কই থাকবে না। যে তাদের সাথে যুদ্ধ করবে, সে তাদের চেয়ে আল্লাহ তা'আলার কাছে অধিক প্রিয় হবে।" সাহাবীগণ বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তাদের চিহ্ন কী?" তিনি বললেন: "মাথা মুণ্ডন (করা) বা মাথা কামানো।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل محمد بن كثير المِصِّيصي.وأخرجه أحمد (21/ 13338) عن أبي المغيرة عبد القدوس بن الحجاج الخَولاني، وأبو داود (4765) من طريق الوليد بن مسلم ومُبشِّر بن إسماعيل الحلبي، ثلاثتهم عن أبي عمرو الأوزاعي، به. وقرنوا في رواياتهم بأنس أبا سعيد الخُدْري، كما في رواية بشر بن بكر الآتية بعده.وفُوْق السهم: موضع الوَتَر منه.
2682 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا بِشْر بن بكر، حدثنا الأوزاعي، حدثني قَتَادة بن دِعامة، عن أنس بن مالك وأبي سعيد الخُدْري، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "سيكونُ في أمتي اختِلافٌ وفُرقةٌ، قومٌ يُحسِنون القِيل ويُسيئون الفِعل، يقرؤون القرآنَ لا يجاوِزُ تَراقيَهم، يَمرُقون من الدِّين مُروقَ السهم من الرَّمِيَّة، لا يَرجِعون حتى يَرْتدَّ على فُوقِه، شرُّ الخلق والخَلِيقة، طُوبَى لمن قتَلَهم وقتَلُوه، يَدعُون إلى كتاب الله، وليسوا منه في شيءٍ، من قاتلَهم كان أَولى بالله منهم" قالوا: يا رسول الله، فما سِيْماهم؟ قال: "التَّحْليق" [1].لم يسمع هذا الحديث قَتَادة من أبي سعيد الخُدْري، إنما سمعه من أبي المتوكِّل الناجِيّ عن أبي سعيد:
আনাস ইবনে মালিক ও আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের মধ্যে মতভেদ ও বিভেদ দেখা দেবে। এমন এক সম্প্রদায় হবে যারা কথায় ভালো কিন্তু কাজে মন্দ। তারা কুরআন পাঠ করবে, কিন্তু তা তাদের কণ্ঠনালী অতিক্রম করবে না। তারা দ্বীন থেকে এমনভাবে বেরিয়ে যাবে, যেমন ধনুক থেকে তীর লক্ষ্য ভেদ করে বেরিয়ে যায়। তারা আর ফিরে আসবে না, যেমনিভাবে (লক্ষ্য ভেদ করে বেরিয়ে যাওয়া) তীর তার ছিলাতে ফিরে আসে না। তারা সৃষ্টির মধ্যে নিকৃষ্টতম। শুভ সংবাদ (তূবা) তার জন্য, যে তাদের হত্যা করবে এবং যাকে তারা হত্যা করবে। তারা আল্লাহর কিতাবের দিকে আহ্বান করবে, অথচ কিতাবের সাথে তাদের কোনো সম্পর্ক নেই। যারা তাদের সাথে যুদ্ধ করবে, তারা তাদের (ঐ সম্প্রদায়ের) চেয়ে আল্লাহর নিকট অধিক প্রিয় হবে।" সাহাবীরা জিজ্ঞেস করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল, তাদের চিহ্ন কী?" তিনি বললেন: "মাথা কামিয়ে ফেলা।"
ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) এই হাদীসটি আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে সরাসরি শুনেননি; বরং তিনি এটি আবু আল-মুতাওয়াক্কিল আন-নাজী-এর নিকট থেকে আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে শুনেছেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده عن أنس صحيح، وأما عن أبي سعيد، فإنَّ قتادة لم يسمع منه كما جزم به المزي، وقد نفى أحمد وأبو حاتم سماعه من أحدٍ من الصحابة غير أنس، وزاد أبو حاتم وأبو زرعة عبدَ الله بن سَرْجِس، وزاد ابنُ المديني أبا الطُّفيل عامر بن واثلة. وعبارة المصنف بإثره تُوهم عدم سماعه لهذا الخبر فقط، والصحيح عدم سماعه من أبي سعيد مطلقًا، والله تعالى أعلم، وبينهما فيه واسطة كما سنبينه في الطريق التالية، وقد روي هذا الخبر عن أبي سعيد الخُدْري من وجوه أخرى صحيحة.وأخرجه أحمد (21/ 13338) عن أبي المغيرة الخَولاني، وأبو داود (4765) من طريق الوليد بن مسلم ومُبشِّر بن إسماعيل، ثلاثتهم عن أبي عمرو الأوزاعي، به.وأخرجه بنحوه أحمد (17/ 11291)، والبخاري (5058) و (6931)، ومسلم (1064)، وابن ماجه (169)، والنسائي (8035)، وابن حبان (6737) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، وأحمد (18/ 11614)، والبخاري (7562) من طريق معبد بن سيرين، وأحمد 17/ (11196) و (11275) و 18/ (11448) و (11750)، ومسلم (1064) من طريق أبي نَضْرة المنذر بن مالك بن قِطْعة، وأحمد (18/ 11488) من طريق يزيد بن صهيب الفقير، والبخاري (6931)، ومسلم (1064) من طريق عطاء بن يسار، كلهم عن أبي سعيد الخُدْري. وقال معبد في روايته: "يخرج أناس من قبل المشرق"، ورواية أبي نضرة مختصرة، بلفظ: "تمرُق مارِقةٌ عند فُرقة من المسلمين، يقتلها أَولى الطائفتين بالحق"، وله لفظ آخر بنحو لفظ الرواية الآتية عند المصنف بعده.وسيأتي بعده من طريق قتادة، عن المتوكِّل الناجي، عن أبي سعيد.وبرقم (2691) من طريق عبد الملك بن أبي نضرة، عن أبيه، عن أبي سعيد الخُدْري، ضمن قصة ذي الخويصرة التميمي، وسيأتي هناك تمامُ تخريجه.
2683 - أخبرَنيهِ أبو النضر محمد بن محمد بن يوسف الفقيه بالطابَرَان، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي بهَراةَ وعُبيد بن عبد الواحد بن شَريك ببغداد، قالا: حدثنا أبو الجُماهر محمد بن عثمان التَّنُوخي، حدثنا سعيد بن بَشير، عن قَتَادة، عن عليّ الناجِيّ، عن أبي سعيد الخُدْري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "مَثَلُهم مَثَل رجل يَرمي رَميّةً، فيَتَوخّى السهمَ حيث وقعَ، فأخذه فنَظَر إلى فُوقِه فلم يَرَ به دسَمًا ولا دمًا، ثم نظر إلى رِيشه فلم يَرَ به دسَمًا ولا دمًا، ثم نظر إلى نَصْلِه فلم يَرَ به دسمًا ولا دمًا، كما لم يتعلَّقْ به شيءٌ من الدسَمِ والدمِ، كذلك لم يتعلَّقْ هؤلاء بشيءٍ من الإسلام" [1].
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তাদের (খাওয়ারেজদের) উদাহরণ হলো এমন ব্যক্তির মতো, যে শিকারের উদ্দেশ্যে তীর নিক্ষেপ করে। অতঃপর সে (শিকার পরীক্ষা করার জন্য) তীরটি যেখানে পড়েছে, সেখান থেকে তুলে নেয়। সে তীরের 'ফওক' (যে অংশ দিয়ে ধনুকের সাথে যুক্ত হয়) এর দিকে তাকায়, কিন্তু তাতে কোনো চর্বি বা রক্ত দেখতে পায় না। এরপর সে তার পালকের দিকে তাকায়, কিন্তু তাতেও কোনো চর্বি বা রক্ত দেখতে পায় না। এরপর সে তার ফলার দিকে তাকায়, কিন্তু তাতেও কোনো চর্বি বা রক্ত দেখতে পায় না। যেভাবে সেই তীরের সাথে চর্বি বা রক্তের কিছুই লেগে রইল না, ঠিক তেমনি এই লোকেরা ইসলামের কোনো কিছুর সাথেই সম্পৃক্ত হলো না।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف سعيد بن بَشير ضعيف يُعتبر به في المتابعات لكنه لم يتابع على ذكر أبي المتوكل علي بن داود الناجيّ في إسناده بين قتادة وأبي سعيد، فقد رواه الأوزاعي في الرواية السابقة وغيره عن قتادة عن أبي سعيد الخُدْري مباشرة دون واسطة، لكن روى أبو عَوانة بعضَ الرواية التي قبل هذه عن قتادة عن أبي نَضْرة المنذر بن مالك بن قِطْعة عن أبي سعيد الخُدْري، فالذي يغلب على ظننا أنَّ هذا هو الصواب في الواسطة، لأنَّ أبا عوانة ثقة حافظ، فروايته مقدَّمة على رواية سعيد بن بشير، والله أعلم، ويؤيده أنَّ سليمان التيمي روى نحو هذه الرواية التي هنا عن أبي نضرة عن أبي سعيد كما سيأتي.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (4369)، وفي "مسند الشاميين" (2711) من طريق محمد بن بكار، عن سعيد بن بشير، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 18/ (11416) و (11611)، ومسلم (1064) واللفظ له، والنسائي (8502) من طريق أبي عوانة، عن قتادة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخُدْري، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تكون في أمتي فرقتان، فتخرج من بينهما مارِقة، يلي قَتْلَهم أَولاهم بالحق"، وهذه قطعة من حديث الأوزاعي عن قتادة المتقدم قبله.وأخرجه بنحو الرواية التي هنا: أحمد (17/ 11018)، ومسلم (1064) واللفظ له، من طريق سليمان التيمي، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم ذكر قومًا يكونون في أمته، يخرجون في فرقة من الناس، سيماهم التحالُق، قال: "هم شر الخلق - أو من شر الخلق - يقتلهم أدنى الطائفتين من الحق" قال: فضرب النبي صلى الله عليه وسلم لهم مثلًا، أو قال قولًا: "الرجل يرمي الرميّة - أو قال: الغَرضَ - فينظر في النصل فلا يرى بَصيرة، وينظر في النَّضِيّ فلا يرى بَصيرة، وينظر في الفُوق فلا يرى بَصيرة". وأخرجه بنحو هذه الرواية أيضًا أحمد 17/ (11291) و 18/ (11537) و (11579)، والبخاري (3610) و (6163) و (6933)، ومسلم (1064)، وابن ماجه (169)، والنسائي (8507) و (8508) و (11156)، وابن حبان (6741) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، وبعضهم قرن فيه بأبي سلمة الضحاك المِشْرَقيَّ.والنَّضِيُّ: السهم قبل أن يُنحت إذا كان قِدْحًا. والبَصيرة: شيء من الدم يُستَدَلُّ به على الرَّمِيَّة.
2684 - أخبرنا إسحاق بن محمد بن خالد الهاشمي بالكوفة، حدثنا محمد بن علي بن عفّان العامِري، حدثنا مالك بن إسماعيل النَّهْدي، أخبرنا إسرائيل بن يونس، عن مسلم الأَعْور، عن حَبَّة [1] العُرَني، قال: دخلتُ أنا وأبو سعيد الخُدْري على حُذيفة، فقلنا: يا أبا عبد الله، حدِّثنا ما سمعتَ من رسول الله صلى الله عليه وسلم في الفتنة، قال حذيفةُ: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "دُورُوا مع كتابِ الله حيثُما دارَ"، فقلنا: فإذا اختلف الناسُ فمع من نكون؟ فقال: انظُروا الفئةَ التي فيها ابنُ سُمَيّة، فالْزَمُوها، فإنه يَدُور مع كتابِ الله، قال: فقلت: ومَن ابنُ سُمَيّة؟ قال: أوَما تعرفُه؟ قلت: بَيِّنه لي، قال: عمّار بن ياسر، سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول لعمار: "يا أبا اليَقْظانِ، لن تموتَ حتى تَقتُلَك الفئةُ الباغِيةُ عن الطريق" [2]. هذا حديث له طرق بأسانيد صحيحة، أخرجا بعضها، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হব্বাহ আল-উরানি বলেন: আমি এবং আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করে বললাম, হে আবূ আব্দুল্লাহ! ফিতনা (বিপর্যয়) সম্পর্কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে আপনি যা শুনেছেন, তা আমাদের কাছে বর্ণনা করুন। হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর কিতাব যেদিকে যায়, তোমরাও সেদিকে যেও (অর্থাৎ আল্লাহর কিতাব যেখানে পরিচালিত করে, তোমরা সেখানেই পরিচালিত হও)।" আমরা বললাম: যখন লোকেরা মতভেদ করবে, তখন আমরা কার সাথে থাকব? তিনি বললেন: তোমরা সেই দলটির খোঁজ করো, যার মধ্যে ইবনু সুমাইয়্যাহ রয়েছে। তোমরা তাদের সাথে লেগে থাকো। কারণ সে (ইবনু সুমাইয়্যাহ) আল্লাহর কিতাবের সাথে ফেরে। (হব্বাহ বলেন) আমি বললাম: ইবনু সুমাইয়্যাহ কে? তিনি বললেন: তুমি কি তাকে চেনো না? আমি বললাম: আপনি আমাকে স্পষ্ট করে দিন। তিনি বললেন: তিনি হলেন আম্মার ইবনু ইয়াসির। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আম্মারকে বলতে শুনেছি: "হে আবুল ইয়াকযান! তুমি মারা যাবে না, যতক্ষণ না বিদ্রোহী (বাগী) দলটি তোমাকে পথের উপর হত্যা করে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: خالد، وجاء على الصواب في "إتحاف المهرة" للحافظ (4233). وقد روي قوله: "دوروا مع كتاب الله حيثما دار" من حديث معاذ بن جبل عند الطبراني في "الكبير" 20/ (172)، وفي "الصغير" (749)، وفي "مسند الشاميين" (658)، وعنه أبو نعيم في "الحلية" 5/ 165، ورجاله لا بأس بهم، لكن تابعيّه لم يدرك معاذًا.وقوله صلى الله عليه وسلم لعمار: "تقتلك الفئة الباغية" مروي عن جملة من الصحابة، كحديث أبي سعيد الخُدْري الآتي بعده، وحديث عمرو بن حزم وعمرو بن العاص الآتي برقم (2695)، وحديث أم سلمة عند مسلم (2916).وانظر تمام شواهده في "مسند أحمد" عند حديث عبد الله بن عمرو بن العاص 11/ (6499).
[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل مسلم الأعور - وهو ابن كيسان المُلائي - وقد تركه بعضهم كما نَبَّه عليه الذهبي في "تلخيصه". وقد اختلف عليه في ذكر من كان بصحبة حَبّة العُرَني لما دخل على حذيفة، فذكر هنا في رواية إسرائيل عنه أبا سعيد الخُدْري، وذكر في رواية أبي أسامة الآتية برقم (5780)، وكذا في رواية محمد بن فضيل عند غير المصنف أبا مسعود، وذكر في رواية علي بن مسهر ابنَ مسعود! حبّة العُرَني: هو ابن جُوَين، وهو ضعيف.وأخرجه البزار (2948)، والطبري في "تاريخه" 5/ 38 - 39، والطبراني في "الكبير" (14430)، وأبو الحسن علي بن عمر السُّكَّري في "مشيخته" (96)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 197 من طريق محمد بن فضيل، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" للحافظ (4413)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 43/ 428 من طريق علي بن مسهر، كلاهما عن مسلم الأعور، به. دون قوله: "دُوروا مع كتاب الله حيثما دار". وقد روي قوله: "دوروا مع كتاب الله حيثما دار" من حديث معاذ بن جبل عند الطبراني في "الكبير" 20/ (172)، وفي "الصغير" (749)، وفي "مسند الشاميين" (658)، وعنه أبو نعيم في "الحلية" 5/ 165، ورجاله لا بأس بهم، لكن تابعيّه لم يدرك معاذًا.وقوله صلى الله عليه وسلم لعمار: "تقتلك الفئة الباغية" مروي عن جملة من الصحابة، كحديث أبي سعيد الخُدْري الآتي بعده، وحديث عمرو بن حزم وعمرو بن العاص الآتي برقم (2695)، وحديث أم سلمة عند مسلم (2916).وانظر تمام شواهده في "مسند أحمد" عند حديث عبد الله بن عمرو بن العاص 11/ (6499).
2685 - حدثنا أبو أحمد الحسين بن علي التميمي، حدثنا أبو القاسم عبد الله بن محمد البَغَوي، حدثنا أبو كامل الجَحْدَري، حدثنا عبد العزيز بن المختار، حدثنا خالد الحَذّاء، عن عِكْرمة، عن ابن عباس، أنه قال له ولابنِه عليّ: انطلِقا إلى أبي سعيد فاسمَعا منه حديثَه في شأن الخوارج، فانطلقا فإذا هو في حائطٍ له يُصلِح، فلما رآنا أخذ رداءه ثم احتَبَى، ثم أنشأ يحدِّثنا حتى علا ذِكرُه في المسجد [1]، فقال: كنا نَحمِل لَبِنةً لَبِنةً، وعمارٌ يحمِل لَبِنتَين لَبِنتَين، فرآه النبي صلى الله عليه وسلم، فجعل يَنفُضُ الترابَ عن رأسِه ويقول: "يا عمارُ، ألا تحملُ لَبِنةً لَبِنةً كما يحملُ أصحابُك؟ " قال: إني أريد الأجرَ عند الله، قال: فجعل يَنفُض عنه الترابَ، ويقول: "وَيْحَ عمارٍ، تقتُلُه الفئةُ الباغِيةُ" قال: ويقولُ عمار: أعوذُ بالله من الفِتَن [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه بهذه السّياقة.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ইবনু আব্বাস) তাকে (ইকরিমাকে) এবং তার ছেলে আলীকে বললেন: তোমরা দু'জন আবু সাঈদের নিকট যাও এবং তাঁর নিকট থেকে খারেজিদের বিষয়ে তাঁর হাদীস শোনো। অতঃপর তারা দু'জন গেলেন। গিয়ে দেখলেন তিনি তাঁর একটি বাগানে সংস্কার কাজ করছেন। যখন তিনি আমাদেরকে দেখলেন, তখন তিনি তাঁর চাদর নিলেন, তারপর হাঁটু গেড়ে বসলেন এবং আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা শুরু করলেন, এমনকি তাঁর আলোচনা মসজিদেও পৌঁছে গেল [১]। তিনি (আবু সাঈদ) বললেন: আমরা একটি করে ইট বহন করছিলাম, আর আম্মার দু'টি করে ইট বহন করছিলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে দেখলেন এবং তাঁর মাথার ধুলো ঝেড়ে দিতে লাগলেন এবং বললেন: "হে আম্মার, তুমি কি একটি করে ইট বহন করবে না, যেমন তোমার সাথীরা বহন করছে?" আম্মার বললেন: আমি আল্লাহর কাছে সওয়াব পেতে চাই। বর্ণনাকারী বলেন: তখন তিনি (নবী) তার (আম্মারের) থেকে ধুলো ঝেড়ে দিতে লাগলেন এবং বললেন: "আফসোস আম্মারের জন্য! তাকে বিদ্রোহী দল হত্যা করবে।" বর্ণনাকারী বলেন: আর আম্মার বলছিলেন: আমি ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই [২]।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا جاء هذا الحرف في النسخ الخطية: حتى علا ذكره في المسجد، وعند سائر من خرَّج الحديث غير المصنف: حتى أتى على ذكر بناء المسجد، وهو كذلك في رواية البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 546 عن أبي عبد الله الحاكم، عن أبي عمرو بن أبي جعفر، عن أبي القاسم البَغَوي. فهذه رواية أخرى عن الحاكم اختلف فيها شيخه فقط، ولم تقع في "مستدركه" هذا، وقد يجوز أن يكون معناها هنا: حتى علا أبو سعيد في حديثه في السَّرْد التاريخي لما حدَّث به النبي صلى الله عليه وسلم عن الخوارج من لدن حديثه عنهم يوم حنين وما قاله له ذو الخويصرة حتى رجع في التاريخ إلى حديثه في شأن المسجد، أي مسجد النبي صلى الله عليه وسلم. وقد يجوز أن يكون وقع في العبارة سقط وتحريف. وعكرمة: هو أبو عبد الله البربري مولى ابن عباس. وقوله في الحديث: "تقتلك الفئة الباغية" لم يسمعه أبو سعيد من النبي صلى الله عليه وسلم كما سيأتي بيانه، لكن ذلك لا يضر بصحة الحديث، لأنه يكون عندئذٍ مرسل صحابي.وأخرجه البخاري (447) عن مُسدَّد، عن عبد العزيز بن المختار، بهذا الإسناد. لكن لفظ المرفوع آخره عنده: "ويح عمار، يدعوهم إلى الجنة، ويدعونه إلى النار" دون عبارة: "تقتلك الفئة الباغية" لأكثر رواة البخاري، وقد ثبتت لبعضهم كما بيَّنه الحافظ في "الفتح" 2/ 367 - 368.وبيَّن أيضًا أنَّ البخاري حذفها عمدًا - كأنه قصد بعد أن أثبتها أولًا - لنُكتة خفية، وهي أنَّ أبا سعيد لم يسمعها من النبي صلى الله عليه وسلم كما صرَّح به هو نفسه في بعض روايات أبي نضرة عنه عند أحمد، وأنه إنما سمعها من أبي قتادة الأنصاري كما صرَّح به في بعض طرق أحمد ومسلم كما سيأتي واقتصر البخاري على هذا القدر الذي سمعه أبو سعيد من النبي صلى الله عليه وسلم وحَذَفَ المدرج. قلنا: لكن إدراجها في حديث أبي سعيد لا يضر بصحة الحديث، لأنَّ غاية ما فيه عندئذٍ أن يكون مرسلًا لصحابي، وهو حُجّة، فكيف إذا عرفنا أنَّ شعبة اقتصر عليها في روايته عن خالد الحذاء كما سيأتي، ولم يذكر واسطةً بين أبي سعيد الخُدْري وبين النبي صلى الله عليه وسلم؟!وأخرجه أحمد 17/ (11166)، والنسائي (8494) من طريق شعبة بن الحجاج، وأحمد 18/ (11861) عن محبوب بن الحسن، والبخاري (2812) من طريق عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، وابن حبان (7078) من طريق يزيد بن زُريع، و (7079) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي، كلهم عن خالد الحذّاء، به. ولم يذكر شعبة ولا يزيد بن زريع في روايتهما قصة إرسال ابن عباس لعكرمة ولابنه علي بن عبد الله بن عباس. وزاد محبوب بن الحسن وكذا يزيد بن زريع وخالد الواسطي في رواياتهم: "يدعوهم إلى الجنة ويدعونه إلى النار". وعبارة "تقتلك الفئة الباغية" حُذفت من رواية أبي ذر الهروي لصحيح البخاري، فوافق صنيعُ البخاري في رواية عبد الوهاب صنيعَهُ في رواية عبد العزيز بن المختار، وثبتت لغير أبي ذرّ، واقتصر شعبة في روايته عليها.وأخرجه أحمد 17/ (11221) من طريق أبي هشام، عن أبي سعيد الخُدْري، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وأبو هشام هذا مجهول.وأخرجه أحمد (11011) من طريق داود بن أبي هند، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخُدْري قال: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم ببناء المسجد، فجعلنا ننقل لبنة لبنة، وكان عمار ينقل لبنتين لبنتين، فتتَرَّب رأسه، قال: فحدثني أصحابي، ولم أسمعه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، أنه جعل ينفض رأسه ويقول: "ويحك يا ابن سُميّة، تقتلك الفئة الباغية". وأخرجه أحمد 37/ (22609)، ومسلم (2915) من طريق أبي مسلمة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخُدْري، قال: أخبرني من هو خير مني؛ أبو قتادة، فذكره.تنبيه: قد روى هذا الحديث شعبة أيضًا عن خالد الحذّاء، عن الحسن البصري وأخيه سعيد، عن أمهما، عن أم سلمة. أخرجه من هذه الطريق أحمد 44/ (26563) و (26650)، ومسلم (2916)، والنسائي (8490)، وتابع خالدًا الحذاء على هذا عبدُ الله بن عون عند أحمد 44/ (26563)، ومسلم (2916)، والنسائي (8217) و (8492)، وأيوب السختياني عند أحمد (26563)، والنسائي (8491)، فدلَّ ذلك على أنه محفوظ عن خالد الحذاء على الوجهين، وتكفي رواية شعبة عنه لكليهما، والله أعلم.
[2] إسناده صحيح. أبو كامل الجحدري: هو فضيل بن حسين، وخالد الحذّاء: هو ابن مهران، وعكرمة: هو أبو عبد الله البربري مولى ابن عباس. وقوله في الحديث: "تقتلك الفئة الباغية" لم يسمعه أبو سعيد من النبي صلى الله عليه وسلم كما سيأتي بيانه، لكن ذلك لا يضر بصحة الحديث، لأنه يكون عندئذٍ مرسل صحابي.وأخرجه البخاري (447) عن مُسدَّد، عن عبد العزيز بن المختار، بهذا الإسناد. لكن لفظ المرفوع آخره عنده: "ويح عمار، يدعوهم إلى الجنة، ويدعونه إلى النار" دون عبارة: "تقتلك الفئة الباغية" لأكثر رواة البخاري، وقد ثبتت لبعضهم كما بيَّنه الحافظ في "الفتح" 2/ 367 - 368.وبيَّن أيضًا أنَّ البخاري حذفها عمدًا - كأنه قصد بعد أن أثبتها أولًا - لنُكتة خفية، وهي أنَّ أبا سعيد لم يسمعها من النبي صلى الله عليه وسلم كما صرَّح به هو نفسه في بعض روايات أبي نضرة عنه عند أحمد، وأنه إنما سمعها من أبي قتادة الأنصاري كما صرَّح به في بعض طرق أحمد ومسلم كما سيأتي واقتصر البخاري على هذا القدر الذي سمعه أبو سعيد من النبي صلى الله عليه وسلم وحَذَفَ المدرج. قلنا: لكن إدراجها في حديث أبي سعيد لا يضر بصحة الحديث، لأنَّ غاية ما فيه عندئذٍ أن يكون مرسلًا لصحابي، وهو حُجّة، فكيف إذا عرفنا أنَّ شعبة اقتصر عليها في روايته عن خالد الحذاء كما سيأتي، ولم يذكر واسطةً بين أبي سعيد الخُدْري وبين النبي صلى الله عليه وسلم؟!وأخرجه أحمد 17/ (11166)، والنسائي (8494) من طريق شعبة بن الحجاج، وأحمد 18/ (11861) عن محبوب بن الحسن، والبخاري (2812) من طريق عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، وابن حبان (7078) من طريق يزيد بن زُريع، و (7079) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي، كلهم عن خالد الحذّاء، به. ولم يذكر شعبة ولا يزيد بن زريع في روايتهما قصة إرسال ابن عباس لعكرمة ولابنه علي بن عبد الله بن عباس. وزاد محبوب بن الحسن وكذا يزيد بن زريع وخالد الواسطي في رواياتهم: "يدعوهم إلى الجنة ويدعونه إلى النار". وعبارة "تقتلك الفئة الباغية" حُذفت من رواية أبي ذر الهروي لصحيح البخاري، فوافق صنيعُ البخاري في رواية عبد الوهاب صنيعَهُ في رواية عبد العزيز بن المختار، وثبتت لغير أبي ذرّ، واقتصر شعبة في روايته عليها.وأخرجه أحمد 17/ (11221) من طريق أبي هشام، عن أبي سعيد الخُدْري، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وأبو هشام هذا مجهول.وأخرجه أحمد (11011) من طريق داود بن أبي هند، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخُدْري قال: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم ببناء المسجد، فجعلنا ننقل لبنة لبنة، وكان عمار ينقل لبنتين لبنتين، فتتَرَّب رأسه، قال: فحدثني أصحابي، ولم أسمعه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، أنه جعل ينفض رأسه ويقول: "ويحك يا ابن سُميّة، تقتلك الفئة الباغية". وأخرجه أحمد 37/ (22609)، ومسلم (2915) من طريق أبي مسلمة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخُدْري، قال: أخبرني من هو خير مني؛ أبو قتادة، فذكره.تنبيه: قد روى هذا الحديث شعبة أيضًا عن خالد الحذّاء، عن الحسن البصري وأخيه سعيد، عن أمهما، عن أم سلمة. أخرجه من هذه الطريق أحمد 44/ (26563) و (26650)، ومسلم (2916)، والنسائي (8490)، وتابع خالدًا الحذاء على هذا عبدُ الله بن عون عند أحمد 44/ (26563)، ومسلم (2916)، والنسائي (8217) و (8492)، وأيوب السختياني عند أحمد (26563)، والنسائي (8491)، فدلَّ ذلك على أنه محفوظ عن خالد الحذاء على الوجهين، وتكفي رواية شعبة عنه لكليهما، والله أعلم.
2686 - أخبرنا أبو الحسين أحمد بن عثمان بن يحيى المقرئ ببغداد، حدثنا أبو جعفر محمد بن الحسين بن موسى الحُنيني، حدثنا أبو حذيفة النَّهْدي، حدثنا عِكْرمة بن عمار، عن شدّاد بن عبد الله أبي عمار، قال: شهدتُ أبا أمامة الباهِلي وهو واقف على رأس الحَرُورية عند باب دمشق، وهو يقول: "كلابُ أهل النار - قالها ثلاثًا - خيرُ قَتْلى من قَتَلوا" قال: ودَمَعَت عيناه، فقال له رجل: يا أبا أُمامة، أرأيت قولَك: هؤلاء كلابُ النار، أشيء سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، أو رأي رأيتَه في نفسك؟ قال: إني إذًا لجريءٌ، لو لم أسمعْه من رسول الله صلى الله عليه وسلم إلّا مرّة أو مرّتين أو ثلاثًا - وعدّ سبع مرات - ما حدّثْتُكموه، قال له رجل: إني رأيتك قد دَمَعت عيناك، قال: إنهم لما كانوا مؤمنين وكفروا بعد إيمانهم، ثم قرأ: {وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَاخْتَلَفُوا مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ} الآية [آل عمران: 105]، فهي لهم مرتين [1].
শাদ্দাদ ইবনে আবদুল্লাহ আবু আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দামেস্কের দরজায় হারুরিয়্যা (খারেজী) সম্প্রদায়ের নিকট দাঁড়ানো অবস্থায় দেখলাম। তিনি বলছিলেন: "এরা হলো জাহান্নামবাসীদের কুকুর" – তিনি কথাটি তিনবার বললেন – "তারা যাদেরকে হত্যা করেছে, তারা উত্তম নিহত ব্যক্তি।" বর্ণনাকারী বলেন: এ সময় তার দু'চোখ অশ্রুসিক্ত হয়ে গেল। এক ব্যক্তি তাকে জিজ্ঞাসা করল: হে আবূ উমামা! আপনি যে বললেন, 'এরা হলো জাহান্নামের কুকুর', এটি কি এমন কোনো কথা যা আপনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে শুনেছেন, নাকি এটি আপনার নিজস্ব অভিমত?
তিনি বললেন: যদি তাই হতো, তবে তো আমি (আল্লাহর উপর মিথ্যা আরোপের ক্ষেত্রে) অবশ্যই দুঃসাহসী হতাম! আমি যদি এই কথা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট থেকে একবার বা দুইবার বা তিনবার না শুনতাম—এবং তিনি সাতবার পর্যন্ত গুনে বললেন—তবে আমি তোমাদের কাছে এটি বর্ণনা করতাম না। এক ব্যক্তি তাকে বলল: আমি দেখলাম আপনার চোখ অশ্রুসিক্ত হয়ে গেল। তিনি বললেন: এর কারণ হলো, তারা মুমিন ছিল, কিন্তু ঈমান আনার পর কুফরি করেছে। এরপর তিনি তিলাওয়াত করলেন: {তোমরা তাদের মতো হয়ো না, যাদের নিকট সুস্পষ্ট প্রমাণ আসার পর তারা বিভক্ত হয়েছে ও মতানৈক্য সৃষ্টি করেছে} [সূরা আলে ইমরান: ১০৫]। তিনি বললেন: এই আয়াতটি তাদের জন্য দুইবার প্রযোজ্য।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل أبي حُذيفة النَّهْدي - واسمه موسى بن مسعود - لكنه قد تُوبع في الطريق التالية، وقد روي الحديث عن أبي أمامة أيضًا من وجهين آخرين.وأخرجه أحمد 36/ (22151) من طريق سيّار الشامي مولى معاوية بن أبي سفيان، وأحمد (22183) و (22208)، وابن ماجه (176)، والترمذي (3000) من طريق أبي غالب كلاهما عن أبي أمامة.وأخرجه أحمد (22314) من طريق صفوان بن سُليم، يقول: دخل أبو أمامة الباهلي دمشق فرأى رؤوس حروراء، فذكره. ورجاله ثقات، لكن صفوان لم يُدرك هذه القصة كما تُوهم روايته هذه وسيأتي بعده من طريق النضر بن محمد بن موسى الجُرَشي عن عكرمة بن عمار.ويشهد للمرفوع منه حديث عبد الله بن أبي أوفى الآتي برقم (6577)، وإسناده لا بأس به.
2687 - أخبرنا أبو محمد بن زياد، حدثنا محمد بن إسحاق بن خُزيمة، حدثنا أحمد بن يوسف السُّلمي، حدثنا النضر بن محمد، حدثنا عِكْرمة بن عمار، حدثنا شدّاد بن عبد الله أبو عمّار، قال: سمعت أبا أمامة، وهو واقف على رؤوس الحَرُورية على باب حمص أو باب دمشق، وهو يقول: كلابُ النار، كلابُ النار، شرُّ قَتلى تحت ظِلّ السماء، خيرُ قتلى مَن قتلوهُم؛ ثم ساق الحديث نحو حديث أبي حذيفة [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وحدَّثَ مسلم في "المسند الصحيح" عن نصر بن علي، بن عمر بن يونس بن القاسم، عن عِكْرمة بن عمار، عن شدّاد أبي عمار، عن أبي أمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "يقول الله: يا ابنَ آدم، إنك إن تَبذُلِ الفضلَ" الحديث [2].وإنما شرحنا القولَ فيه، لأنَّ الغالب على هذا المتن طرق حديث أبي غالب عن أبي أمامة، ولم يُخرجاه.
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আবু মুহাম্মাদ ইবনু যিয়াদ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, [তিনি বললেন] আমাদের কাছে মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক ইবনু খুযাইমাহ বর্ণনা করেছেন, [তিনি বললেন] আমাদের কাছে আহমাদ ইবনু ইউসুফ আস-সুল্লামী বর্ণনা করেছেন, [তিনি বললেন] আমাদের কাছে আন-নাদর ইবনু মুহাম্মাদ বর্ণনা করেছেন, [তিনি বললেন] আমাদের কাছে ইকরিমাহ ইবনু আম্মার বর্ণনা করেছেন, [তিনি বললেন] আমাদের কাছে শাদ্দাদ ইবনু আব্দুল্লাহ আবু আম্মার বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, আমি আবু উমামাকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হিমসের বা দামেস্কের দরজায় হারূরিয়্যাহ্ (খারেজীদের) মাথার উপর দাঁড়িয়ে থাকতে শুনেছি। তিনি বলছিলেন:
"জাহান্নামের কুকুরেরা! জাহান্নামের কুকুরেরা! তারা হলো আকাশের নিচে সবচেয়ে নিকৃষ্ট নিহত ব্যক্তি। আর যারা তাদের হাতে নিহত হয়েছে, তারাই হলো সর্বোত্তম নিহত ব্যক্তি (শহীদ)।"
অতঃপর তিনি (রাবী) আবু হুযাইফার হাদীসের অনুরূপ হাদীসটি বর্ণনা করলেন [১]।
এই হাদীসটি ইমাম মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি সংকলন করেননি।
আর ইমাম মুসলিম “সহীহুল মুসনাদ”-এ নাসর ইবনু আলী, ইবনু উমার ইবনু ইউনুস ইবনু কাসিম থেকে, তিনি ইকরিমাহ ইবনু আম্মার থেকে, তিনি শাদ্দাদ আবু আম্মার থেকে, তিনি আবু উমামা থেকে, তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি (আল্লাহ) বলেছেন: "আল্লাহ বলেন, 'হে আদমের সন্তান, নিশ্চয় তুমি যদি অতিরিক্ত সম্পদ দান করো—' [২]" (সম্পূর্ণ হাদীসটি)।
আমরা এই বিষয়ে ব্যাখ্যা করলাম, কারণ এই মতনটির অধিকাংশই আবু গালিবের সূত্রে আবু উমামার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বর্ণিত হাদীসের মাধ্যমে এসেছে, অথচ তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি সংকলন করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.
[2] أخرجه مسلم (1036) عن نصر بن علي وزهير بن حرب وعبد بن حميد، ثلاثتهم عن عمر بن يونس.والحديث أخرجه أيضًا الترمذي (2343) عن محمد بن بشار، عن عمر بن يونس، به. وليس في رواية مسلم ولا الترمذي ما ذكره الحاكم في اللفظ الذي ساقه: "يقول الله" وإن كان ذلك معلومًا من دلالة نصِّ الحديث، على أنه قد جاء التصريحُ به في رواية للبيهقي في "شعب الإيمان" (3143).
2688 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب من أصل كتابه، حدثنا أبو أُميّة محمد بن إبراهيم الطَّرَسُوسي، حدثنا عمر بن يونس بن القاسم بن معاوية اليَمامي، حدثنا عِكرمة بن عمار العِجْلي، حدثنا أبو زُمَيل سِماك الحَنَفي، حدثنا عبد الله بن عباس، قال: لما خرجتِ الحَرُورية اجتمعوا في دارٍ وهم ستة آلاف، أتيتُ عليًّا، فقلت: يا أمير المؤمنين، أبرِدْ بالظُّهر لَعلِّي آتي هؤلاء القوم فَأُكلّمَهم، قال: إني أخافُ عليك، قلت: كلا.قال: فخرجتُ إليهم، ولبستُ أحسنَ ما يكون من حُلل اليمن، قال أبو زُميل: كان ابن عباس جميلًا جَهِيرًا، قال ابن عباس: فأتيتُهم وهم مجتمِعُون في دارهم قائلون، فسلَّمتُ عليهم، فقالوا: مرحبًا بك يا ابن عباس، فما هذه الحُلّة؟ قال: قلت: ما تَعيبون عليَّ، لقد رأيتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم أحسنَ ما يكون من الحُلَل، ونَزَلَ: {قُلْ مَنْ حَرَّمَ زِينَةَ اللَّهِ الَّتِي أَخْرَجَ لِعِبَادِهِ وَالطَّيِّبَاتِ مِنَ الرِّزْقِ} [الأعراف: 32]، قالوا: فما جاء بك؟ قلت: أتيتُكم مِن عند صحابة النبي صلى الله عليه وسلم من المهاجرين والأنصار، لأُبلِّغكم ما يقولون، وتُخبروني [1] بما تقولون، فعليهم نزل القرآن، وهم أعلمُ بالوحي منكم وفيهم أُنزل، وليس فيكم منهم أحدٌ. فقال بعضهم: لا تُخاصِموا قريشًا، فإنَّ الله يقول: {بَلْ هُمْ قَوْمٌ خَصِمُونَ} [الزخرف: 58].قال ابن عباس: وأتيتُ قومًا لم أرَ قومًا قطُّ أشدَّ اجتهادًا منهم، مُسهَمَةً وجوهُهم من السَّهر، كأنَّ أيديهم ورُكبَهم ثَفِنٌ [2]، عليهم قُمُصٌ مُرَحَّضة [3]، فقال بعضُهم: لنُكلِّمنَّه ولنَنظُرنَّ ما يقول، قلت: أخبِروني ماذا نَقَمتُم على ابن عمِّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وصهرِه والمهاجرين والأنصار؟ قالوا: ثلاثًا، قلت: ما هنّ؟ قالوا: أما إحداهنّ: فإنه حَكَّم الرجالَ في أمر الله، وقال الله: {إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ} [يوسف: 40]، وما للرِّجال وما للحكم؟ فقلت: هذه واحدة، قالوا: وأما الأُخرى: فإنه قاتَلَ ولم يَسْبِ ولم يَغْنَم، فلئن كان الذي قاتَلَ كفارًا، لقد حَلَّ سَبْيُهم [4] وغنيمتُهم، ولئن كانوا مؤمنين ما حَلّ قتالُهم. قلت: هذه ثِنتان، فما الثالثة؟ قالوا: إنه مَحَا نفسَه مِن أمير المؤمنين، فهو أمير الكافرين، قلت: أعندكم سوى هذا؟ قالوا: حسبُنا هذا.فقلت لهم: أرأيتُم إن قرأتُ عليكم من كتاب الله ومن سنة نبيه صلى الله عليه وسلم ما يردُّ به قولَكم، أتَرْضَون؟ قالوا: نعم، فقلت لهم: أمّا قولكم: حَكَّم الرجالَ في أمر الله، فأنا أقرأ عليكم ما قد رُدَّ حكمُه إلى الرجال في ثمن رُبع درهم في أرنبٍ ونحوِها من الصيد، فقال: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَقْتُلُوا الصَّيْدَ وَأَنْتُمْ حُرُمٌ} إلى قوله: {يَحْكُمُ بِهِ ذَوَا عَدْلٍ مِنْكُمْ} [المائدة: 95]، فنشَدتُكم بالله، أحُكمُ الرجالِ في أرنبٍ ونحوها من الصيد أفضلُ، أم حُكمُهم في دمائهم وصلاحِ ذاتِ بينِهم، وأن تَعلَمُوا أنَّ الله لو شاء لحكَم ولم يُصيِّر ذلك إلى الرجال؟وفي المرأة وزوجها قال الله عز وجل: {وَإِنْ خِفْتُمْ شِقَاقَ بَيْنِهِمَا فَابْعَثُوا حَكَمًا مِنْ أَهْلِهِ وَحَكَمًا مِنْ أَهْلِهَا إِنْ يُرِيدَا إِصْلَاحًا يُوَفِّقِ اللَّهُ بَيْنَهُمَا} [النساء: 35]، فجعل الله حُكمَ الرجالِ سنةً ماضية. أخَرَجتُ عن هذه؟ قالوا: نعم.قال: وأما قولكم: قاتَلَ ولم يَسْبِ، ولم يَغْنَم، أتسْبُون أمَّكم عائشة، ثم تَستحلُّون منها ما يُستحلُّ من غيرها؟ فلئن فعلتُم لقد كفرتُم وهي أمُّكم، ولئن قلتم: ليست بأمِّنَا، لقد كفرتم، فإنَّ الله يقول: {النَّبِيُّ أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنْفُسِهِمْ وَأَزْوَاجُهُ أُمَّهَاتُهُمْ} [الأحزاب: 6]، فأنتم تدُورون بين ضلالَتَين، أيُّهما صِرتُم إليها صِرتُم إلى ضلالةٍ، فنظر بعضُهم إلى بعض. قلت: أخَرَجتُ من هذه؟ قالوا: نعم.قال: وأما قولكم: مَحَا اسمَه من أمير المؤمنين، فأنا آتيكُم بمن تَرضَون، وأُراكم قد سمعتُم: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم يومَ الحُدَيبيَة كاتَبَ سُهيلَ بن عمرو وأبا سفيان بن حَرْب، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأمير المؤمنين: "اكتُبْ يا عليُّ: هذا ما اصطَلَح عليه محمدٌ رسول الله" فقال المشركون: لا والله ما نعلم أنك رسولُ الله، لو نعلم أنك رسولُ الله ما قاتَلْناك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اللهم إنك تَعلمُ أني رسولُ الله، اكتُبْ يا عليُّ: هذا ما اصطَلَح عليه محمدُ بنُ عبد الله"، فوالله لَرسولُ الله خيرٌ من عليٍّ، وما أخرَجَه من النبوّة حين مَحَا نفسه.قال عبد الله بن عباس: فرجع من القوم أَلفان، وقُتل سائرُهم على ضلالةٍ [5].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন হারূরীয়াহ (খাওয়ারিজ) বের হলো এবং তারা ছয় হাজার লোক একটি ঘরে একত্রিত হলো, তখন আমি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বললাম, "হে আমীরুল মু'মিনীন, যোহরের সালাত কিছুটা বিলম্বে আদায় করুন। হয়তো আমি এই কওমের কাছে গিয়ে তাদের সাথে কথা বলতে পারব।" তিনি বললেন, "আমি তোমার জন্য ভয় পাচ্ছি।" আমি বললাম, "না, (ভয়ের কিছু নেই)।"
তিনি বলেন, অতঃপর আমি তাদের কাছে গেলাম এবং ইয়ামানের সবচেয়ে সুন্দর পোশাকটি পরিধান করলাম। আবু জুমাইল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন সুদর্শন ও সুঠাম দেহের অধিকারী। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তাদের কাছে গেলাম। তারা তখন তাদের ঘরে দুপুরের বিশ্রামে একত্রিত ছিল। আমি তাদের সালাম দিলাম। তারা বলল, "স্বাগতম হে ইবনে আব্বাস! এ কেমন পোশাক?" তিনি বললেন, "তোমরা আমার কিসের উপর দোষ ধরছো? আমি তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এর চেয়েও উত্তম পোশাক পরিধান করতে দেখেছি। আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করেছেন: 'বলুন, আল্লাহ তাঁর বান্দাদের জন্য যে সকল শোভা ও উত্তম রিযিক সৃষ্টি করেছেন, তা কে হারাম করেছে?' (সূরা আল-আ‘রাফ: ৩২)।"
তারা বলল, "আপনি কেন এসেছেন?" আমি বললাম, "আমি আপনাদের কাছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুহাজির ও আনসার সাহাবীগণের পক্ষ থেকে এসেছি। আমি তাদের কথা আপনাদের জানাতে এবং আপনারা কী বলছেন, তা জানতে এসেছি। তাদের উপরেই কুরআন নাযিল হয়েছে, তারা আপনাদের চেয়ে ওহী সম্পর্কে অধিক অবগত এবং তাদের মাঝেই ওহী অবতীর্ণ হয়েছে, কিন্তু আপনাদের মাঝে তাদের একজনও নেই।" তখন তাদের কেউ কেউ বলল, "কুরাইশদের সাথে ঝগড়া করো না, কেননা আল্লাহ বলেন: 'বরং তারা হচ্ছে ঝগড়াটে সম্প্রদায়।' (সূরা যুখরুফ: ৫৮)।"
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি এমন কওমের কাছে এসেছিলাম, যাদের চেয়ে বেশি ইজতিহাদকারী (ইবাদতে কঠোর সাধনা) অন্য কাউকে আমি কখনো দেখিনি। রাতের জাগরণের কারণে তাদের চেহারাগুলো ছিল শুকনো, আর তাদের হাত ও হাঁটুগুলো যেন উটের ঘাড়ের মতো শক্ত হয়ে গিয়েছিল। তাদের পরিধানে ছিল ধৌত করা পোশাক। তাদের কেউ কেউ বলল, "আমরা তার সাথে কথা বলব এবং সে কী বলে দেখব।" আমি বললাম, "আপনারা আমাকে বলুন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চাচাতো ভাই, জামাতা এবং মুহাজির ও আনসারদের উপর আপনারা কিসের দোষ ধরেছেন?"
তারা বলল, "তিনটি বিষয়ে।" আমি বললাম, "সেগুলো কী?" তারা বলল, "প্রথমত: তিনি আল্লাহর ব্যাপারে পুরুষদেরকে বিচারক বানিয়েছেন। অথচ আল্লাহ বলেছেন: 'বিধান আল্লাহরই জন্য।' (সূরা ইউসুফ: ৪০)। পুরুষদের কী আছে আর বিচারের কী আছে?" আমি বললাম, "এটি একটি।" তারা বলল, "দ্বিতীয়ত: তিনি যুদ্ধ করেছেন, কিন্তু বন্দী করেননি এবং গনীমতও নেননি। যদি তিনি যাদের সাথে যুদ্ধ করেছেন তারা কাফির হয়, তবে তাদের বন্দী ও গনীমত গ্রহণ হালাল ছিল। আর যদি তারা মু'মিন হয়, তবে তাদের সাথে যুদ্ধ করা হালাল ছিল না।" আমি বললাম, "এই হলো দুটি, তৃতীয়টি কী?" তারা বলল, "তিনি নিজেকে আমীরুল মু'মিনীন থেকে মুছে দিয়েছেন। তাই তিনি কাফিরদের আমীর।" আমি বললাম, "এর বাইরে আপনাদের কাছে আর কিছু আছে কি?" তারা বলল, "এগুলোই আমাদের জন্য যথেষ্ট।"
আমি তাদের বললাম, "যদি আমি তোমাদের জন্য আল্লাহর কিতাব ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত থেকে এমন কিছু পড়ে শোনাই যা তোমাদের কথা খণ্ডন করে, তবে কি তোমরা সন্তুষ্ট হবে?" তারা বলল, "হ্যাঁ।"
আমি তাদের বললাম, "তোমাদের প্রথম কথা, তিনি আল্লাহর ব্যাপারে পুরুষদের বিচারক বানিয়েছেন—এর জবাবে আমি তোমাদের কাছে এমন আয়াত পাঠ করছি যেখানে খরগোশ বা এ জাতীয় শিকারের এক-চতুর্থাংশ দিরহামের মূল্যের ক্ষেত্রেও আল্লাহর হুকুমকে পুরুষদের হাতে ন্যাস্ত করা হয়েছে। আল্লাহ বলেছেন: 'হে মু’মিনগণ, তোমরা ইহরাম অবস্থায় শিকারকে হত্যা করো না...' এই পর্যন্ত যে, 'তোমাদের মধ্য থেকে দুজন ন্যায়পরায়ণ লোক দিয়ে তার ফায়সালা করিয়ে নেবে।' (সূরা আল-মায়েদা: ৯৫)। আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, খরগোশ বা এ জাতীয় শিকারের ব্যাপারে পুরুষদের বিচার করা উত্তম, নাকি তাদের রক্তপাত বন্ধ করা এবং নিজেদের মধ্যে সুসম্পর্ক স্থাপন করার ব্যাপারে তাদের বিচার করা উত্তম? আর তোমরা তো জানোই যে আল্লাহ যদি চাইতেন, তবে নিজেই হুকুম দিতে পারতেন এবং পুরুষদের উপর তা অর্পণ করতেন না। আর স্ত্রী ও তার স্বামীর ব্যাপারে আল্লাহ তা‘আলা বলেছেন: 'যদি তোমরা স্বামী-স্ত্রীর মধ্যে বিচ্ছেদের আশঙ্কা করো, তবে স্বামীর পরিবার থেকে একজন এবং স্ত্রীর পরিবার থেকে একজন বিচারক পাঠাও। যদি তারা সংশোধন চায়, তবে আল্লাহ তাদের মধ্যে মিল করিয়ে দেবেন।' (সূরা আন-নিসা: ৩৫)। এভাবে আল্লাহ পুরুষদের বিচারকে একটি প্রতিষ্ঠিত সুন্নাত বানিয়ে দিয়েছেন। আমি কি এই অভিযোগ থেকে মুক্ত হলাম?" তারা বলল, "হ্যাঁ।"
তিনি বলেন, "আর তোমাদের এই অভিযোগ যে, তিনি যুদ্ধ করেছেন কিন্তু বন্দী করেননি এবং গনীমত নেননি—তোমরা কি তোমাদের মা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বন্দী করবে? অতঃপর অন্যান্য (বন্দিনী) নারীদের ক্ষেত্রে যা হালাল করা হয়, তা কি তোমরা তাঁর ক্ষেত্রেও হালাল মনে করবে? যদি তোমরা এমন করো, তবে তোমরা কাফির হয়ে যাবে, অথচ তিনি তোমাদের মা। আর যদি তোমরা বলো যে, তিনি আমাদের মা নন, তবে তোমরা কাফির হয়ে যাবে। কারণ আল্লাহ বলেছেন: 'নবী মু’মিনদের কাছে তাদের নিজেদের চেয়েও বেশি আপন। আর তাঁর স্ত্রীগণ তাদের মা।' (সূরা আহযাব: ৬)। সুতরাং তোমরা দুটি ভ্রষ্টতার মাঝে ঘুরপাক খাচ্ছো। যেদিকেই তোমরা যাবে, ভ্রষ্টতার দিকেই পতিত হবে।" অতঃপর তারা একে অপরের দিকে তাকাতে লাগল। আমি বললাম, "আমি কি এই অভিযোগ থেকেও মুক্ত হলাম?" তারা বলল, "হ্যাঁ।"
তিনি বলেন, "আর তোমাদের এই অভিযোগ যে, তিনি আমীরুল মু'মিনীন থেকে তাঁর নাম মুছে দিয়েছেন—আমি তোমাদের কাছে এমন একটি ঘটনার কথা বলছি যা তোমরাও মেনে নাও। আমি ধারণা করি যে, তোমরা শুনেছো: হুদায়বিয়ার দিনে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সুহাইল ইবনে আমর এবং আবু সুফিয়ান ইবনে হারবের সাথে চুক্তিনামা লেখেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমীরুল মু'মিনীন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, 'হে আলী! লেখো: এই সেই চুক্তি, যা সম্পাদিত হলো মুহাম্মাদ রাসূলুল্লাহ-এর পক্ষ থেকে।' তখন মুশরিকরা বলল, 'আল্লাহর কসম! আমরা যদি আপনাকে আল্লাহর রাসূল বলে জানতাম, তাহলে আমরা আপনার সাথে যুদ্ধ করতাম না।' তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'হে আল্লাহ! তুমিই জানো যে আমি তোমার রাসূল। হে আলী! লেখো: এই সেই চুক্তি, যা সম্পাদিত হলো মুহাম্মাদ বিন আব্দুল্লাহ-এর পক্ষ থেকে।' আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তো আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে শ্রেষ্ঠ হওয়া সত্ত্বেও যখন তিনি তাঁর নাম মুছে দিলেন, তখন তা তাঁকে নবুওয়াত থেকে বের করে দেয়নি।"
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর সেই কওম থেকে দুই হাজার লোক (ভুল পথ থেকে) ফিরে এসেছিল, আর বাকিরা তাদের ভ্রষ্টতার উপরই নিহত হয়েছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في النسخ الخطية: المخبرون، والمثبت من رواية البيهقي في "سننه الكبرى" 8/ 179 عن أبي عبد الله الحاكم، وهو الموافق لرواية عبد الرحمن بن مهدي عن عكرمة بن عمار، حيث جاء فيها: وأبلّغهم ما تقولون.
[2] تحرَّف في النسخ إلى: تثنى، وجاء على الصواب في رواية البيهقي. والثَّفِن: ما ولي الأرض من كل ذات أربع إذا بَرَكت، ويحصل فيه غِلَظٌ.
2688 [3] - تحرَّفت العبارة في النسخ، وجاءت على الصواب في رواية البيهقي. والقُمُص المُرحَّضة: المغسُولة.
2688 [4] - تحرَّف في (ز) إلى: سلبهم.
2688 [5] - إسناده صحيح.وأخرجه أبو داود (4037) عن إبراهيم بن خالد أبي ثور الكلبي، عن عمر بن يونس، بهذا الإسناد. مختصرًا بذكر خروج ابن عباس للحرورية لابسًا أحسن الحلل.وأخرجه أحمد 5/ (3187)، والنسائي (8522) و (11747) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن عكرمة بن عمار به ورواية أحمد والنسائي في الموضع الثاني مختصرة بذكر صلح الحديبية.وسيأتي برقم (7555) من طريق محمد بن عيسى بن حيان المدائني، عن عمر بن يونس، لكن بزيادة رجل بين أبي زُميل وابن عباس. وانفرد بذلك المدائني وهو إلى الضعف أقرب.وقوله: "أبرِد بالظهر" أي: أخّر الصلاة حتى يخفّ الحَرّ.والحَرُورية: نسبة إلى حَرُوراء، وهي موضع قريب من الكوفة كان أول ما اجتمعت فيه الخوارج، فنسبوا إليه، وخروجهم هو انتقاضهم على أمير المؤمنين علي بن أبي طالب رضي الله عنه.والجَهِير: ذو المنظر الجليل الحسن.ومُسهَمَة، أي: متغيّرة.
2689 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ، حدثنا هشام بن علي السَّدُوسي، حدثنا محمد بن كَثير العَبْدي، حدثنا يحيى بن سُليم وعبد الله [1] بن واقِد، عن عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، عن عبد الله بن شَدّاد بن الهادِ، قال: قَدِمتُ على عائشة، فبينما نحنُ عندها جلوسٌ مَرجِعَها من العراق لياليَ قُوتل عليٌّ، إذ قالت: يا عبدَ الله بن شدّاد، هل أنت صادقِي عمَّا أسألك عنه؟ حَدِّثني عن هؤلاء القومِ الذين قتَلَهم عليٌّ، قلت: وما لي لا أَصدُقُكِ؟ قالت: فحدِّثني عن قصتهم، قلت: إنَّ عليًّا لما كاتَبَ معاويةَ وحَكَّم الحكَمَين، خرج عليه ثمانية آلاف من قُرّاء الناس، فنزلوا أرضًا من جانب الكوفة يقال لها: حَرُوراء، وإنهم أنكَروا عليه، فقالوا: انسلخْتَ من قميصٍ ألبَسَكَهُ اللهُ وأسماكَ به، ثم انطلقتَ فحكَّمْتَ في دِين الله، ولا حُكمَ إِلَّا لله، فلما بلغ عليًّا ما عَتَبوا عليه وفارَقُوه، أمَرَ فأذَّن مُؤذِّن: لا يَدخُلَنَّ على أمير المؤمنين إلّا رجلٌ قد حَمَلَ القرآن، فلما أن امتلأ من قرّاء الناس الدارُ، دعا بمصحف عظيم، فوضعَه عليٌّ بين يديه، فطَفِقَ يَصُكُّه بيده، ويقول: أيها المصحفُ حَدَّثَ الناسَ، فناداه الناسُ، فقالوا: يا أمير المؤمنين، ما تسألُه عنه؟ إنما هو وَرَقٌ ومِدادٌ، ونحن نتكلّم بما رأينا منه، فماذا تريد؟ قال: أصحابكم الذين خرجوا بيني وبينهم كتابَ الله، يقول اللهُ عز وجل في امرأة ورجل: {وَإِنْ خِفْتُمْ شِقَاقَ بَيْنِهِمَا} [النساء: 35]، فأُمَّةُ محمد صلى الله عليه وسلم أعظمُ حُرمةً من امرأة ورجل.ونَقَمُوا عليَّ أني كاتبتُ معاويةَ وكتبتُ [2] عليَّ بن أبي طالب، وقد جاء سُهيل بن عمرو ونحن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالحُدَيبيَة حين صالَحَ قومَه قريشًا، فكتب رسول الله صلى الله عليه وسلم: بسم الله الرحمن الرحيم، فقال سُهيلٌ: لا تَكتُبْ: بسم الله الرحمن الرحيم، قال: "فكيف أكتُبُ؟ " قال: اكتُبْ: باسمِك اللهمَّ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اكتُبْ" ثم قال: "اكتُبْ: من محمدٍ رسول الله" قال: لو نعلمُ أنك رسولُ الله لم نُخالِفْك، فكتب: هذا ما صالَحَ عليه محمدُ بن عبد الله قريشًا. يقول الله في كتابه: {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ} [الأحزاب: 21]. فبعثَ [3] إليهم عليُّ بن أبي طالب [عبدَ الله بنَ عباس] [4]، فخرجتُ معهم، حتى إذا تَوسَّطْنا عسكَرَهم قام ابن الكَوّاء فخطب الناسَ، فقال: يا حَمَلةَ القرآن، هذا عبد الله بن عباس، فمن لم يكن يَعرِفُه فأنا أَعرِفُه مِن كتاب الله، هذا مَن نزل في قومه: {بَلْ هُمْ قَوْمٌ خَصِمُونَ} [الزخرف: 58]، فرُدُّوه إلى صاحبِه، ولا تُواضِعُوه كتابَ الله، قال: فقام خطباؤهم، فقالوا: لا والله، لنُواضِعنَّه كتابَ الله، فإذا جاء بالحقّ نَعرفُه استطَعْناه، ولئن جاء بالباطل لنُبَكِّتَنَّه بباطِلِه، ولنَرُدَّنّه إلى صاحبِه، فواضَعُوه على كتابِ الله ثلاثةَ أيامٍ، فرجع منهم أربعةُ آلافٍ كلُّهم تائبٌ، منهم ابن الكوّاء، حتى أدخلَهم على عليٍّ، فبعث عليٌّ إلى بقيّتهم فقال: قد كان مِن أمرنا وأمر الناس ما قد رأيتُم، فقِفُوا حيثُ شئتم، حتى تجتمعَ أمّةُ محمد صلى الله عليه وسلم، وتنزلوا فيها حيث شئتم، بيننا وبينكم أن نَقِيَكم رماحَنا ما لم تقطعُوا سبيلًا أو تطلبوا دمًا، فإنكم إن فعلتُم ذلك فقد نَبَذْنا إليكم الحربَ على سَواءٍ، إن الله لا يحبُّ الخائنين.فقالت له عائشة: يا ابنَ شدّاد، فقد قتلهم، فقال: واللهِ ما بعثَ إليهم حتى قَطَعوا السبيلَ، وسَفَكوا الدماءَ بغير حقِّ الله، وقتلوا ابنَ خَبّاب، واستَحَلُّوا أهلَ الذِّمّة، فقالت: آللهِ؟ فقلت: آللهِ الذي لا إله إلّا هو.قالت: فما شيءٌ بلغني عن أهل العراق يتحدّثون به يقولون: ذو الثُّدَيّ، ذو الثُّدَيّ، قلتُ: قد رأيتُه ووقفتُ عليه مع عليٍّ في القَتْلى، فدعا الناسَ، فقال: هل تعرفون هذا؟ فكان أكثرُ من جاء يقول: قد رأيتُه في مسجد بني فلان يصلي، ورأيتُه في مسجد بني فلان يصلي، فلم يأتِ بثَبَتٍ يُعرَف إلّا ذلك، قالت: فما قول عليٍّ حين قام عليه كما يَزعُم أهلُ العراق؟ قلت: سمعتُه يقول: صَدَق اللهُ ورسولُه، قالت: وهل سمعتَ أنت منه قال غيرَ ذلك؟ قلت: اللهم لا، قالت: أجَلْ، صدقَ اللهُ ورسولُه، يَرحَمُ اللهُ عليًا، إنه من كلامه، كان لا يرى شيئًا يُعجِبُه إلّا قال: صدق الله ورسوله [5].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه إِلَّا ذكرَ ذي الثُّدَيّة، فقد أخرجه مسلم بأسانيد كثيرة.
আবদুল্লাহ ইবনু শাদ্দাদ ইবনুল হাদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একবার আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। আমরা যখন তাঁর কাছে বসেছিলাম—এটা ছিল তাঁর ইরাক থেকে প্রত্যাবর্তনের সময়, যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে যুদ্ধ চলছিল—তখন তিনি বললেন: হে আবদুল্লাহ ইবনু শাদ্দাদ, আমি তোমাকে যে বিষয়ে জিজ্ঞেস করব, তুমি কি সে বিষয়ে আমাকে সত্য কথা বলবে? আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যে লোকদের হত্যা করেছিলেন, তাদের সম্পর্কে আমাকে বলো। আমি বললাম: আমি কেন আপনাকে সত্য কথা বলব না?
তিনি বললেন: আমাকে তাদের ঘটনা বর্ণনা করো।
আমি বললাম: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন মু'আবিয়ার সাথে পত্রালাপ করলেন এবং দুই সালিশ নিযুক্ত করলেন, তখন প্রায় আট হাজার কারী (কুরআন পাঠক) তাঁর বিরুদ্ধে বিদ্রোহ করে কূফার পার্শ্ববর্তী হারূরা নামক এক জায়গায় অবস্থান নিল। তারা তাঁর এই কাজের নিন্দা করে বলল: আপনি সেই পরিচ্ছদ থেকে বেরিয়ে গেলেন যা আল্লাহ আপনাকে পরিয়েছিলেন এবং যে নামে তিনি আপনাকে ভূষিত করেছিলেন (আমীরুল মু'মিনীন)। অতঃপর আপনি আল্লাহর দ্বীনের বিষয়ে সালিশ নিয়োগ করলেন, অথচ আল্লাহ ছাড়া কারো হুকুম নেই।
যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে তাদের এই অসন্তোষ ও বিচ্ছিন্ন হওয়ার সংবাদ পৌঁছাল, তিনি নির্দেশ দিলেন, যেন ঘোষক ঘোষণা করে দেয়: আমীরুল মু'মিনীন-এর কাছে যেন শুধু সেই ব্যক্তি প্রবেশ করে যে কুরআন মুখস্থ করেছে। যখন কারীদের দ্বারা ঘর পূর্ণ হয়ে গেল, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি বিশাল মুসহাফ (কুরআন) আনালেন এবং তা তাঁর সামনে রাখলেন। এরপর তিনি তাঁর হাত দিয়ে তাতে আঘাত করে বললেন: হে মুসহাফ, তুমি লোকদের সাথে কথা বলো।
তখন উপস্থিত লোকজন তাঁকে ডেকে বলল: হে আমীরুল মু'মিনীন! আপনি এর কাছে কী জিজ্ঞেস করছেন? এটি তো কাগজ আর কালি মাত্র। আমরা যা দেখেছি, সে বিষয়েই কথা বলছি। আপনি কী চান?
তিনি বললেন: তোমাদের সেই সাথীরা, যারা বেরিয়ে গেছে, তাদের ও আমার মাঝে আল্লাহর কিতাবই মীমাংসাকারী। আল্লাহ তা‘আলা এক পুরুষ ও এক নারী সম্পর্কে বলেন: {যদি তোমরা তাদের উভয়ের মাঝে বিচ্ছেদ আশঙ্কা করো} [সূরা নিসা: ৩৫]। সুতরাং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মাত এক পুরুষ ও এক নারীর চেয়ে অধিক সম্মানিত।
আর তারা আমার ওপর দোষারোপ করেছে যে, আমি মু'আবিয়ার সাথে পত্রালাপকালে ‘আলী ইবনু আবী তালিব’ লিখেছিলাম। অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন হুদাইবিয়ায় কুরাইশদের সাথে সন্ধি করছিলেন, তখন সুহাইল ইবনু আমর এলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লিখলেন: ‘বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম।’ সুহাইল বললেন: ‘বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম’ লিখবেন না। তিনি বললেন: “তাহলে কী লিখব?” সে বলল: ‘বিসমিকা আল্লাহুম্মা’ লিখুন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “লেখো।” এরপর বললেন: “লেখো: মুহাম্মাদ, আল্লাহর রাসূলের পক্ষ থেকে।” সে বলল: যদি আমরা জানতাম যে আপনি আল্লাহর রাসূল, তবে আমরা আপনার বিরোধিতা করতাম না। তখন তিনি লিখলেন: ‘এটা সেই চুক্তি যা মুহাম্মাদ ইবনু আবদুল্লাহ কুরাইশদের সাথে করেছেন।’
আল্লাহ তাঁর কিতাবে বলেন: {নিশ্চয় তোমাদের জন্য রয়েছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মধ্যে উত্তম আদর্শ—যে আল্লাহ ও শেষ দিনের আশা রাখে} [সূরা আহযাব: ২১]।
অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাদের কাছে পাঠালেন। আমি তাদের সাথে বের হলাম। যখন আমরা তাদের শিবিরের মাঝখানে পৌঁছলাম, তখন ইবনুল কাওয়া দাঁড়িয়ে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: হে কুরআনের ধারকগণ! ইনি আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস। যারা তাঁকে চেনে না, আমি আল্লাহর কিতাব থেকে তাঁকে চিনি। এ সেই ব্যক্তি যার সম্প্রদায় সম্পর্কে অবতীর্ণ হয়েছে: {বরং তারা এক কলহপ্রিয় জাতি} [সূরা যুখরুফ: ৫৮]। সুতরাং তাঁকে তাঁর সাথীর কাছে ফিরিয়ে দাও এবং আল্লাহর কিতাব নিয়ে তাঁর সাথে আলোচনা করো না।
তখন তাদের বক্তারা উঠে দাঁড়িয়ে বলল: আল্লাহর শপথ! আমরা অবশ্যই তাঁর সাথে আল্লাহর কিতাব নিয়ে আলোচনা করব। যদি তিনি হক নিয়ে আসেন, আমরা তা চিনতে পারলে গ্রহণ করব। আর যদি বাতিল নিয়ে আসেন, তবে আমরা তাঁর বাতিলকে স্পষ্ট করে দেব এবং তাঁকে তাঁর সাথীর কাছে ফিরিয়ে দেব।
অতঃপর তারা তিন দিন আল্লাহর কিতাব নিয়ে তাঁর সাথে আলোচনা করলেন। তাদের মধ্যে চার হাজার লোক তাওবাকারী হিসেবে ফিরে এল। তাদের মধ্যে ইবনুল কাওয়াও ছিল। তিনি (আবদুল্লাহ ইবনু শাদ্দাদ) তাদের আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে প্রবেশ করালেন।
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের অবশিষ্টদের কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: আমাদের ও অন্যান্য লোকদের মাঝে যা ঘটেছে, তা তোমরা দেখেছ। এখন তোমরা যেখানে খুশি অবস্থান করো, যতক্ষণ না মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মাত একত্রিত হয় এবং তোমরা যেখানে খুশি সেখানে অবতরণ করো। আমাদের ও তোমাদের মধ্যে চুক্তি এই যে, তোমরা যতক্ষণ পথ বন্ধ না করো বা কারো রক্ত না চাও, ততক্ষণ আমরা তোমাদের বর্শা দ্বারা তোমাদের রক্ষা করব। যদি তোমরা তা করো, তবে আমরা তোমাদের সাথে সমানভাবে যুদ্ধের ঘোষণা দিলাম। নিশ্চয় আল্লাহ বিশ্বাসঘাতকদের ভালোবাসেন না।
তখন আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: হে ইবনু শাদ্দাদ! তিনি কি তাদের হত্যা করেছিলেন?
তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! তিনি তাদের কাছে লোক পাঠাননি, যতক্ষণ না তারা পথ বন্ধ করেছে, অন্যায়ভাবে রক্তপাত করেছে, ইবনু খাব্বাবকে হত্যা করেছে এবং আহলে যিম্মাকে (অমুসলিম প্রজা) হত্যা করা বৈধ মনে করেছে।
তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ করে বলছো?
আমি বললাম: সেই আল্লাহর শপথ, যিনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই।
তিনি বললেন: তাহলে ইরাকের লোকেরা ‘যূস সুদাই’ (স্তনসদৃশ মাংসপিণ্ড বিশিষ্ট) সম্পর্কে যে কথা বলে, তা কী?
আমি বললাম: আমি তাকে দেখেছি এবং আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে নিহতদের মাঝে তার কাছে দাঁড়িয়েছিলাম। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকদের ডাকলেন এবং বললেন: তোমরা কি একে চেনো? যারা এসেছিল, তাদের বেশিরভাগই বলছিল: আমরা তাকে অমুক গোত্রের মসজিদে সালাত আদায় করতে দেখেছি, অমুক গোত্রের মসজিদে সালাত আদায় করতে দেখেছি। কিন্তু পরিচিত হওয়ার মতো সুনির্দিষ্ট কোনো প্রমাণ তারা দিতে পারেনি।
তিনি বললেন: ইরাকবাসীরা যা ধারণা করে, যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার কাছে দাঁড়ালেন, তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা কী ছিল?
আমি বললাম: আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: “আল্লাহ ও তাঁর রাসূল সত্য বলেছেন।”
তিনি বললেন: তুমি কি তাঁর কাছ থেকে আর কোনো ভিন্ন কথা শুনেছ?
আমি বললাম: না, আল্লাহর কসম!
তিনি বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহ ও তাঁর রাসূল সত্য বলেছেন। আল্লাহ আলীর ওপর রহম করুন। এটা তাঁর কথার অংশ ছিল। কোনো কিছু তাঁর কাছে পছন্দনীয় মনে হলে তিনি বলতেন: ‘আল্লাহ ও তাঁর রাসূল সত্য বলেছেন।’
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) إلى: ويحيى، وهو خطأ.
[2] وقع في النسخ الخطية: وكتب، بصيغة الغائب، والمثبت بصيغة المتكلم من رواية البيهقي في "الكبرى" 8/ 179 - 180 عن أبي عبد الله الحاكم، وكذلك جاء في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 27/ 102 - 103 حيث رواه من طريق البيهقي عن الحاكم.
2689 [3] - وقع في النسخ الخطية: فبعثه، بزيادة ضمير الغائب، ولا مذكورَ سابِقٌ فيعودَ عليه الضمير، والمثبت على الصواب من رواية البيهقي عن أبي عبد الله الحاكم، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر، بحذف الضمير، وسيُذكر مفعولُه عندهما، وهو عبد الله بن عباس.
2689 [4] - سقط من النسخ وأثبتناه من رواية البيهقي عن الحاكم، ومن طريقه ابن عساكر.
2689 [5] - حديث حسن، وهذا إسناد لا بأس برجاله، لكن عبد الله بن عثمان بن خثيم لم يسمع هذا الخبر من عبد الله بن شداد، بينهما فيه عبيدُ الله بن عياض القاريّ، كما في رواية غير الحاكم، وإن كان سماع ابن خُثيم من ابن شداد محتمل، لكن لم نقف له على رواية عنه مباشرة، وعُبيد الله بن عياض المذكور ثقة.وما وقع في إسناد الحاكم هنا من نسبة محمد بن كثير عَبْديًّا فيه نظر، لأنَّ عبد الله بن واقد المذكور في الإسناد - وهو أبو رجاء الهروي - المشهور بالرواية عنه محمد بن كثير المِصِّيصي، وليس العَبْدي، وإذا ثبت ذلك فإنَّ محمد بن كثير المِصِّيصي ضعيف يعتبر به، فالظاهر أنَّ إسقاط ذكر عُبيد الله بن عياض جاء من قِبَله، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 2/ (656) عن إسحاق بن عيسى الطبّاع، عن يحيى بن سُليم، عن ابن خُثيم، عن عبيد الله بن عياض، عن عبد الله بن شداد. وإسناده حسن. وأحمد 2/ (672) من طريق أبي كثير مولى الأنصار، وأبو داود (4769) من طريق أبي الوضيء عبّاد بن نُسيب - وسيأتي من هذا الطريق عند المصنف مطوَّلًا برقم (8831) - والنسائي (8514) من طريق سُليم بن بَلْج، و (8515) من طريق كليب بن شهاب، والنسائي (8520) من طريق عَبيدة السَّلْماني، كلهم عن علي بن أبي طالب في قصة الْتماسه المُخدَج في القتلى يوم النهروان، وأكثرهم يقول في روايته: قال علي: صدق الله، بدل: ما كَذَبتُ ولا كُذِبت، وقال عبيدة في روايته: الله أكبر، ثلاث مرات، ولم يذكر أحد من هؤلاء سجود عليٍّ لما رأى المخدج.وقد رواه عن علي بن أبي طالب جماعة فذكروا سجوده لما رأى المخدج:فقد أخرجه أحمد (848) و (1255)، والنسائي (8513) من طريق طارق بن زياد الكوفي، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (1515)، والبزار (900) من طريق أبي المؤمن الواثلي، والبزار (564) من طريق أبي وائل شقيق بن سلمة، والخطيب في "تاريخ بغداد" 14/ 464 من طريق قيس بن أبي حازم، كلهم عن علي بن أبي طالب. بأسانيد حِسان.والمُخدَج: ناقص الخَلْق. وقد كان ذلك المخدج مُخدج اليد كما صُرِّح به في بعض الروايات.
2690 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن علي بن دُحَيم الشَّيباني، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزَة الغِفاري، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن محمد بن قيس، قال: سمعت مالك بن الحارث يقول: شهدتُ عليًّا يوم النَّهْروان طلبَ المُخْدَجَ فلم يَقدِرْ عليه، فجَعَلَت جبينُه تَعرَقُ وأخذه الكَرْب، ثم إنه قَدَرَ عليه، فخَرّ ساجدًا، فقال: والله ما كَذَبتُ ولا كُذِبتُ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بذكر سجدة الشُّكر، وهو غريب صحيح في سجود الشكر.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মালিক ইবনুল হারিস বলেন: আমি নাহরাওয়ানের দিন দেখেছি, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুকদাজকে খুঁজছিলেন, কিন্তু তাকে পাচ্ছিলেন না। তখন তাঁর কপাল ঘেমে যাচ্ছিল এবং তিনি অস্থিরতা বোধ করছিলেন। এরপর তিনি তাকে খুঁজে পেলেন, তখন তিনি সিজদায় লুটিয়ে পড়লেন। অতঃপর তিনি (আলী) বললেন: আল্লাহর কসম! আমি মিথ্যা বলিনি, আর আমার প্রতিও মিথ্যা আরোপ করা হয়নি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل مالك بن الحارث - وقيل: اسمه الحارث بن قيس، وهو أبو موسى الهَمْداني - لم يرو عنه غير محمد بن قيس - وهو المُرهِبي - كان ممن شهد مع عليٍّ قتال الخوارج، وقد رُوي خبرُه هذا من وجوه عن عليّ بن أبي طالب. إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي.وأخرجه مسلم (1066)، والنسائي (8509)، وابن حبان (6939) من طريق عُبيد الله بن أبي رافع، ومسلم (1066)، وأبو داود (4768)، والنسائي (8516 - 8518) من طريق زيد بن وهب، وأحمد 2/ (672) من طريق أبي كثير مولى الأنصار، وأبو داود (4769) من طريق أبي الوضيء عبّاد بن نُسيب - وسيأتي من هذا الطريق عند المصنف مطوَّلًا برقم (8831) - والنسائي (8514) من طريق سُليم بن بَلْج، و (8515) من طريق كليب بن شهاب، والنسائي (8520) من طريق عَبيدة السَّلْماني، كلهم عن علي بن أبي طالب في قصة الْتماسه المُخدَج في القتلى يوم النهروان، وأكثرهم يقول في روايته: قال علي: صدق الله، بدل: ما كَذَبتُ ولا كُذِبت، وقال عبيدة في روايته: الله أكبر، ثلاث مرات، ولم يذكر أحد من هؤلاء سجود عليٍّ لما رأى المخدج.وقد رواه عن علي بن أبي طالب جماعة فذكروا سجوده لما رأى المخدج:فقد أخرجه أحمد (848) و (1255)، والنسائي (8513) من طريق طارق بن زياد الكوفي، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (1515)، والبزار (900) من طريق أبي المؤمن الواثلي، والبزار (564) من طريق أبي وائل شقيق بن سلمة، والخطيب في "تاريخ بغداد" 14/ 464 من طريق قيس بن أبي حازم، كلهم عن علي بن أبي طالب. بأسانيد حِسان.والمُخدَج: ناقص الخَلْق. وقد كان ذلك المخدج مُخدج اليد كما صُرِّح به في بعض الروايات.
2691 - أخبرنا مُكرَم بن أحمد بن مكرم القاضي، حدثنا أبو قِلابة عبد الملك بن محمد بن عبد الله الرَّقَاشي، حدثنا أبو عَتَّاب سهل بن حمّاد، حدثنا عبد الملك بن أبي نَضْرة، عن أبيه، عن أبي سعيد الخُدْري: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أتاه مال، فجعل يَضرِب بيده فيه فيُعطي يمينًا وشمالًا، وفيهم رجل مُقَلَّص الثياب، ذو سِيْماءَ، بين عَينَيه أثرُ السجود، فجعل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يضرب يدَه يمينًا وشمالًا حتى نَفِد المالُ، فلما نَفِدَ المالُ ولَّى مُدبرًا، وقال: والله ما عدلتَ منذ اليومِ. قال: فجعل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُقلِّب كفّه، ويقول: "إذا لم أعدِلْ فمن ذا يَعدلُ بعدي؟ أَمَا إِنه سَتَمْرُق مارِقةٌ، يَمرُقون من الدِّين مُروق السهم من الرَّمِيّة، ثم لا يعُودون إليه حتى يَرجِعَ السهمُ على فُوقِه، يقرؤون القرآن لا يجاوز تَراقِيهَم، يُحسِنون القولَ ويُسيئون الفعلَ، فمن لقيَهم فليقاتلْهم، فمن قتلهم فله أفضلُ الأجر، ومن قتَلُوه فله أفضل الشهادة، هم شرُّ البَرّيّة، بَرِئ اللهُ منهم، تقتلهم أَولى الطائفتَين بالحقّ" [1].هذا حديث صحيح ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة [2]، وعبد الملك بن أبي نَضْرة من أعزّ البصريين حديثًا، ولا أعلم أني عَلَوت له في حديث غير هذا.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে সম্পদ (মাল) এসেছিল। তিনি তাতে হাত দিয়ে ডানে ও বামে দিতে লাগলেন। তাদের মধ্যে ছিল একজন লোক, যার পোশাক ছিল গুটিয়ে রাখা (বা খাটো), তার ছিল একটি বিশেষ চিহ্ন, তার দুই চোখের মাঝখানে সিজদার চিহ্ন ছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ডানে ও বামে হাত দ্বারা দিতে লাগলেন, যতক্ষণ না সম্পদ শেষ হয়ে গেল। যখন সম্পদ শেষ হয়ে গেল, তখন সে পিঠ ফিরিয়ে চলে গেল এবং বলল: আল্লাহর কসম! আজকের পর থেকে আপনি ন্যায়বিচার করেননি। বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর হাত উল্টাতে লাগলেন এবং বললেন: "যদি আমিই ন্যায়বিচার না করি, তবে আমার পরে আর কে ন্যায়বিচার করবে? সাবধান! নিশ্চয়ই এমন একটি বিদ্রোহী দল বের হবে, যারা ধর্ম থেকে এমনভাবে বেরিয়ে যাবে, যেমন তীর শিকার হওয়া বস্তু ভেদ করে বেরিয়ে যায়। এরপর তারা আর ধর্মে ফিরে আসবে না, যতক্ষণ না তীর তার ধনুকের শেষ প্রান্তে ফিরে আসে। তারা কুরআন পাঠ করবে, কিন্তু তা তাদের কণ্ঠনালী অতিক্রম করবে না। তারা কথা বলবে উত্তম, কিন্তু কাজ করবে মন্দ। অতএব যে তাদের সাথে সাক্ষাৎ করবে, সে যেন তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করে। যে তাদের হত্যা করবে, তার জন্য রয়েছে সর্বোত্তম প্রতিদান। আর যাদেরকে তারা হত্যা করবে, তাদের জন্য রয়েছে সর্বোত্তম শাহাদাত। তারা সৃষ্টির নিকৃষ্টতম। আল্লাহ তাদের থেকে মুক্ত। হক্বের নিকটবর্তী দুই দলের মধ্যে যেটি উত্তম, সেটিই তাদের হত্যা করবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عبد الملك بن أبي نضرة وسهل بن عتَّاب. وأخرجه بنحوه أحمد 18/ (11537) و (11621)، والبخاري (6163) و (6933)، ومسلم (1064)، والنسائي (8507) و (8508) و (11156) من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن، وأحمد 18/ (11621)، والبخاري (6163)، ومسلم (1064)، والنسائي (8508) من طريق الضحاك المِشْرقي، وأحمد 17/ (111008) و 18/ (11648) و (11695)، والبخاري (4351) و (4667) و (7432)، ومسلم (1064)، وأبو داود (4764)، والنسائي (2370) و (3550) و (11157)، وابن حبان (25) من طريق عبد الرحمن بن أبي نُعْم، كلهم عن أبي سعيد الخُدْري، وسموا في روايتهم هذا الرجل المذكور بذي الخويصرة التميمي، وذكر ابن أبي نعم في روايته أنَّ هذا كان في قسم ذهيبة أرسل بها علي بن أبي طالب للنبي صلى الله عليه وسلم من اليمن، وأنه صلى الله عليه وسلم قسمها بين أربعة من المؤلفة قلوبهم، ووقع وصف هذا الرجل المذكور عنده بأنه كان غائر العينين، مشرِفَ الوجنتين، ناشز الجبهة، كثّ اللحية، مشمّر الإزار، محلوق الرأس.وزاد أبو سلمة والضحاك: أنَّ عمر بن الخطاب سأل النبي صلى الله عليه وسلم قتلَه، وفي رواية ابن أبي نُعْم أنَّ خالد بن الوليد هو مَن سأل النبي صلى الله عليه وسلم ذلك. قال الحافظ في "الفتح" 12/ 626: لا تنافي بينهما، لاحتمال أن يكون كلٌّ منهما سأل في ذلك.وزاد أبو سلمة والضحاك في روايتهما أيضًا تمثيل النبي صلى الله عليه وسلم لمروق هؤلاء بنحو ما تقدم برقم (2682) من طريق قتادة، عن أبي المتوكل الناجيّ، عن أبي سعيد الخُدْري.وقد تقدَّم منه ذكر مروق هذه المارقة إلى آخر الحديث بنحوه برقم (2681) من طريق قتادة عن أنس بن مالك وأبي سعيد الخُدْري. وانظر تمام تخريجه هناك.
[2] قد أخرج الشيخان نحوه بزيادات ليست في حديثنا هنا كما تقدَّم التنبيه عليه.
2692 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، أخبرنا الحارث بن أبي أسامة، أنَّ كثير بن هشام حدثهم، حدثنا جعفر بن بُرْقان، حدثنا ميمون بن مِهْران، عن أبي أُمامة، قال: شهدتُ صِفِّين، فكانوا لا يُجِيزون [1] على جَريح، ولا يقتلون مُولِّيًا، ولا يَسلُبون قَتيلًا [2].هذا حديث صحيح الإسناد في هذا الباب.وله شاهد صحيح:
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি সিফফিনের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলাম। তারা (যোদ্ধারা) আহতকে আঘাত হানতো না, পলায়নকারীকে হত্যা করত না এবং নিহত ব্যক্তির মালামাল লুণ্ঠন করত না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في المطبوع: يُجهزون، وهما بمعنًى.
[2] إسناده صحيح.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 182، وفي "معرفة السنن والآثار" (16492)، وفي "الاعتقاد" ص 375 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 9/ 415، وابن أبي شيبة 12/ 424، وأبو القاسم اللالكائي في "أصول الاعتقاد" (2014)، وابن العَديم في "بغية الطلب في تاريخ حلب" 1/ 301 - 302 من طرق عن كثير بن هشام، به. "الخراج" ص 234، وابن أبي شيبة 12/ 424، والبيهقي 8/ 181، ووصله عنه ثقتان فلا يُعلّه المرسل.وأخرجه أيضًا ابن أبي شيبة 15/ 286 من طريق زيد بن وهب، قال: قال عليٌّ، فذكره، وإسناده صحيح كما قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 23/ 113.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 4/ 490 - 493 من طريق كليب بن شهاب، قال: نادى عليّ، فذكره. وإسناده حسن.يُذْأف: يقال بالهمز وتخفيف الفاء، ويقال بألف غير مهموزة وتشديد الفاء، من: ذأَف وذَافَّ. والمعنى: أجهز عليه.
2693 - حدَّثَناه محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو سعيد محمد بن شاذان، حدثنا علي بن حُجْر، حدثنا شَريك، عن السُّدِّي، عن يزيد بن ضُبَيعة العَبْسي، قال: نادى مُنادي عمارٍ يوم الجمَل، وقد ولَّى الناسُ: ألا لا يُذْأفُ على جَريح، ولا يُقتَل مُوَلِّي [1]، ومن ألقى السلاحَ فهو آمِن، فشقَّ ذلك علينا [2]. وقد رُوي في هذا الباب حديث مسنَد:
ইয়াযীদ ইবনু দুবাই'আ আল-আবসী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, জংগে জামালের দিন যখন লোকেরা পৃষ্ঠপ্রদর্শন করছিল, তখন আম্মার (ইবনু ইয়াসির)-এর ঘোষক ঘোষণা দিলেন: শোনো! কোনো আহতকে (পুনরায়) আঘাত করা হবে না, পৃষ্ঠপ্রদর্শনকারীকে হত্যা করা হবে না এবং যে অস্ত্র ফেলে দেবে, সে নিরাপদ। এতে আমরা ব্যথিত হলাম। এই অধ্যায়ে একটি মুসনাদ হাদীসও বর্ণিত হয়েছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا في نسخنا الخطية بإثبات الياء، والجادّة حذفها، وقد سلف التنبيه على مثلها عند الحديث رقم (2009). "الخراج" ص 234، وابن أبي شيبة 12/ 424، والبيهقي 8/ 181، ووصله عنه ثقتان فلا يُعلّه المرسل.وأخرجه أيضًا ابن أبي شيبة 15/ 286 من طريق زيد بن وهب، قال: قال عليٌّ، فذكره، وإسناده صحيح كما قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 23/ 113.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 4/ 490 - 493 من طريق كليب بن شهاب، قال: نادى عليّ، فذكره. وإسناده حسن.يُذْأف: يقال بالهمز وتخفيف الفاء، ويقال بألف غير مهموزة وتشديد الفاء، من: ذأَف وذَافَّ. والمعنى: أجهز عليه.
[2] خبر صحيح، وقد روي عن شريك - وهو ابن عبد الله النخعي - على غير وجه، كما سيأتي بيانه، وروي عن علي بن أبي طالب من وجوه أخرى، ويؤيده خبر أبي أمامة الذي قبله. السُّدِّي: هو إسماعيل بن عبد الرحمن.وأخرجه البيهقي في "الكبرى" 8/ 181 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 263 عن يحيى بن آدم، عن شريك، عن السُّدِّي، عن عَبْد خير، عن عليٍّ أنه قال يوم الجمل، فذكره.وأخرجه ابن أبي شيبة أيضًا 15/ 282 عن يحيى بن آدم، عن شريك، عن سليمان بن المغيرة، عن يزيد بن ضُبيعة، عن علي، أنه قال يوم الجمل، فذكره.وأخرجه بنحوه سعيد بن منصور في "سننه" (2947)، والبَلاذُري في "أنساب الأشراف" 3/ 57 من طريق جعفر بن محمد، عن أبيه، عن علي بن الحسين، عن مروان بن الحكم، قال: صرخ صارخ لعلي، فذكره. وإسناده صحيح. وروي عن جعفر عن أبيه مرسلًا عند أبي يوسف في "الخراج" ص 234، وابن أبي شيبة 12/ 424، والبيهقي 8/ 181، ووصله عنه ثقتان فلا يُعلّه المرسل.وأخرجه أيضًا ابن أبي شيبة 15/ 286 من طريق زيد بن وهب، قال: قال عليٌّ، فذكره، وإسناده صحيح كما قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 23/ 113.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 4/ 490 - 493 من طريق كليب بن شهاب، قال: نادى عليّ، فذكره. وإسناده حسن.يُذْأف: يقال بالهمز وتخفيف الفاء، ويقال بألف غير مهموزة وتشديد الفاء، من: ذأَف وذَافَّ. والمعنى: أجهز عليه.
2694 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا يوسف بن عبد الله الخُوارزمي ببيت المقدس، حدثنا عبد الملك بن عبد العزيز التمَّار.وحدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا أحمد بن علي الخزّاز [1]، حدثنا أبو نصر التمّار، حدثنا كَوثَر بن حَكيم، عن نافع، عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعبد الله بن مسعود: "يا ابنَ مسعود، أتدري ما حُكم اللهِ فيمن بَغَى مِن هذه الأُمة؟ " من قال ابن مسعود: الله ورسوله أعلم، قال: "فإنَّ حُكم الله فيهم أن لا يُتبَعَ مُدبِرُهم، ولا يُقتَلَ أسِيرُهم، ولا يُذفَّفَ على جَريحِهم" [2].
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "হে ইবনে মাসউদ! তুমি কি জানো, এই উম্মতের মধ্যে যারা সীমালঙ্ঘন করে (বিদ্রোহী হয়), তাদের ব্যাপারে আল্লাহর হুকুম কী?" ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভালো জানেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয় তাদের ব্যাপারে আল্লাহর হুকুম হলো—যারা পালিয়ে যায় তাদের পিছু ধাওয়া করা হবে না, তাদের বন্দীকে হত্যা করা হবে না, এবং তাদের আহতদের দ্রুত আঘাত করে শেষ করে দেওয়া হবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تصحف في (ز) إلى: الجزار، ولم تعجم في بقية النسخ، وهو بخاء وزايين، وهو أحمد بن علي بن الفُضيل الخزاز المقرئ، وهو مترجم في "تاريخ بغداد" 5/ 496، وفي "تلخيص المتشابه" 1/ 582.
[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل كوثر بن حكيم، فهو متروك كما قال الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه البيهقي 8/ 182 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ ابن حجر (4395)، والحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" للهيثمي (705)، والرُّوياني في "مسنده" (1437)، والبيهقي 8/ 182 من طرق عن كوثر بن حكيم، به.يُذفَّف، أي: يُجهَز.
2695 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصَّنْعاني، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبّاد، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن عبد الله بن طاووس، عن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حَزْم، عن أبيه، قال: لما قُتل عمار بن ياسر دخل عمرو بن حَزْم على عمرو بن العاص، فقال: قُتل عمار، وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تقتلُه الفئةُ الباغِية"، فقام عمرو بن العاص فَزِعًا حتى دخل على معاوية، فقال له معاوية: ما شأنُك؟ فقال: قُتل عمار، فقال معاوية: قُتل عمار، فماذا؟! فقال عمرو: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "تقتله الفئةُ الباغِيةُ"، فقال له معاوية: دَحَضْتَ في بَولِك، أوَنحن قتلناه؟! إنما قتلَه عليٌّ، وأصحابُه، جاؤوا به حتى ألقَوه بين رماحِنا؛ أو قال: بين سيوفنا [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السّياقة.
আমর ইবন হাযম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আম্মার ইবন ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে শহীদ করা হলো, তখন আমর ইবন হাযম আমর ইবনুল আসের কাছে গেলেন এবং বললেন: আম্মার শহীদ হয়েছেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন, "তাকে বিদ্রোহী দল হত্যা করবে।" একথা শুনে আমর ইবনুল আস ভীত-সন্ত্রস্ত অবস্থায় মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলেন। মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: আপনার কী হয়েছে? তিনি বললেন: আম্মার শহীদ হয়েছেন। মু'আবিয়া বললেন: আম্মার শহীদ হয়েছেন, তাতে কী? তখন আমর (ইবনুল আস) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তাকে বিদ্রোহী দলটি হত্যা করবে।" মু'আবিয়া তাকে বললেন: আপনি আপনার মূত্রের মধ্যে পিছলে গেলেন (অমূলক কথা বলছেন)। আমরা কি তাকে হত্যা করেছি? তাকে তো হত্যা করেছেন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর সাথীরা, যারা তাকে নিয়ে এসেছিল এবং আমাদের বর্শার সামনে ফেলে দিয়েছিল; অথবা তিনি (বর্ণনাকারী) বলেছেন: আমাদের তলোয়ারের সামনে ফেলে দিয়েছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وسيأتي مكررًا برقم (5763).وأخرجه أحمد 29/ (17778) عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد.دَحَضْتَ، أي: زَلِقْتَ، كأنه يدعو عليه، ويروى بالصاد المهملة أيضًا بدل المعجمة، بمعنى: بَحَثْتَ في بولك برجلك.
2696 - أخبرنا أبو بكر محمد بن المؤمَّل بن الحسن بن عيسى، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا إسماعيل بن أبي أُويس، حدثنا أبي، عن محمد بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حَزْم، عن أبيه، عن عَمْرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة، أنها قالت: ما رأيتُ مثلَ ما رَغِبَتْ عنه هذه الأُمة مِن هذه الآية: {وَإِنْ طَائِفَتَانِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ اقْتَتَلُوا فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا فَإِنْ بَغَتْ إِحْدَاهُمَا عَلَى الْأُخْرَى فَقَاتِلُوا الَّتِي تَبْغِي حَتَّى تَفِيءَ إِلَى أَمْرِ اللَّهِ} [الحجرات: 9] [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: এই উম্মত এই আয়াতটি থেকে যা ছেড়ে দিয়েছে (অথবা: যার প্রতি উদাসীনতা দেখিয়েছে), এর মতো আর কিছু আমি দেখিনি: "আর মু’মিনদের দু’টি দল যদি যুদ্ধে লিপ্ত হয়ে পড়ে, তবে তোমরা তাদের মধ্যে সন্ধি স্থাপন কর। অতঃপর যদি তাদের এক দল অন্য দলের প্রতি বাড়াবাড়ি করে, তবে যে দলটি বাড়াবাড়ি করে, তোমরা তার বিরুদ্ধে যুদ্ধ কর, যতক্ষণ না তারা আল্লাহর নির্দেশের দিকে ফিরে আসে।" (সূরা হুজুরাত: ৯)
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل إسماعيل بن أبي أويس وأبيه، وقد توبعا.وأخرجه البيهقي 8/ 172 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه محمد بن الحسن الشَّيباني في "موطئه" (1003) عن مالك، عن محمد بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، به.
2697 - أخبرنا أبو العباس السَّيّاري وأبو محمد الحَليميّ جميعًا بمَرْو، وأبو إسحاق إبراهيم بن أحمد الفقيه البُخاري بنَيسابور، قالوا: حدثنا أبو المُوجِّه محمد بن عمرو الفَزَاري، حدثنا عَبْدان بن عثمان، حدثنا أبو حمزة محمد بن ميمون، عن زياد بن عِلَاقة، عن عَرْفجة بن شُريح الأسلميّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنها ستكون بعدي هَنَاتٌ وهَنَاتٌ - ورفع يديه - فمن رأيتُموه يريدُ أن يُفرِّقَ أَمرَ أمةِ محمدٍ وهم جَميعٌ، فاقتُلُوه، كائنًا مَن كان من الناس" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه! وإنما حكمتُ به على الشيخين، لأنَّ شعبة بن الحجّاج وسفيان بن سعيد وشَيبان بن عبد الرحمن ومَعمَر بن راشد قد رَوَوه عن زياد بن عِلاقة، ثم وجدتُ أبا حازم الأشجعي [2] وعامرًا الشعبي وأبا يَعفُور العَبْدي وغيرَهم تابعوا زياد بن عِلاقة على روايتِه عن عَرْفجة، والباب عندي مجموع في جزء، فأغنى ذلك عن ذكر هذه الروايات.وقد أخرج مسلم حديث أبي نَضْرة، عن أبي سعيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إذا بُويع للخليفتَين، فاقتُلُوا الآخِرَ منهما" [3]. وشرَحَه حديث عبد الرحمن بن عبد ربّ الكعبة عن عبد الله بن عمرو، وقد أخرجه مسلم [4].
আরফাজাহ ইবনু শুরাইহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমার পরে নানা প্রকার ফেতনা ও সমস্যা সৃষ্টি হবে।" - তিনি তাঁর উভয় হাত উপরে তুললেন - "অতঃপর তোমরা যখন দেখবে কেউ মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতের ঐক্যবদ্ধ বিষয়ে বিভেদ সৃষ্টি করতে চায়, তখন তাকে হত্যা করো, সে মানুষ হিসেবে যেই হোক না কেন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وقد رواه صدقة بن الفضل المروَزي عن أبي حمزة محمد بن ميمون السّكري عند أبي عوانة (7142) فزاد فيه بين أبي حمزة وبين زياد ليث بن أبي سُليم، وليث بن أبي سليم حسن الحديث في المتابعات والشواهد، لكن أبا حمزة السُّكري لا يُعرف بتدليس، فالظاهر أنه سمعه على الوجهين، وعلى أي حالٍ فقد رواه جماعة عن زياد بن علاقة كما سيأتي.وأخرجه النسائي (3470) عن أبي علي محمد بن يحيى، عن عبد الله بن عثمان يعني عَبْدان، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 30/ (18295) و (18296) و 31/ (19000) و 33/ (20277)، ومسلم (1852)، وأبو داود (4762)، والنسائي (3471)، وابن حبان (4406) من طريق شعبة بن الحجاج، وأحمد 31/ (18999)، ومسلم (1852) من طريق شيبان بن عبد الرحمن، ومسلم (1852) من طريق أبي عوانة، ومن طريق إسرائيل بن يونس السَّبيعي، ومن طريق عبد الله بن المختار، والنسائي (3469) من طريق يزيد بن مَرْدانْبة، وابن حبان (4577) من طريق يحيى بن أيوب البجلي، كلهم عن زياد بن علاقة، به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه مسلم (1852) من طريق أبي يعفُور، عن عرفجة، بنحوه.
[2] أخرجه من طريقه عبد الباقي بن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 281، والطبراني في "الأوسط" (2137).
2697 [3] - أخرجه مسلم (1853).
2697 [4] - برقم (1844).
2698 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصنعاني، حدثنا إسحاق بن إبراهيم الدَّبَري، أخبرنا عبد الرزاق.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن أبي عِمران الجَوْني، عن عبد الله بن الصامِت، عن أبي ذرٍّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أبا ذر، كيف أنتَ وموتٌ يصيبُ الناسَ حتَّى يكون البيتُ بالوَكِيف [1]؟ " - يعني: القَبْرَ - قلتُ: ما خارَ اللهُ لي ورسولُه، ثم قال: "كيف أنتَ وجوعٌ يصيبُ الناسَ حتى تأتيَ مسجدَك، فلا تستطيعَ أن ترجعَ إلى فِراشِك، ولا تستطيعَ أن تقومَ من فِراشِك إلى مسجدك؟ " قلت: ما خارَ لي اللهُ ورسولُه، قال: "عليك بالعِفّة"، ثم قال: "كيف أنتَ وقتلٌ يصيب الناسَ حتى تَغرقَ حجارةُ الزيتِ بالدم؟ " قال: قلت: ما خارَ اللهُ لي ورسولُه - أو الله ورسوله أعلم - قال: "الْزَمْ منزلَك" قال: فقلت: يا رسول الله، أفلا آخُذُ سيفي فأضربَ به مَن فعل ذاك؟ قال: "فقد شاركتَ القومَ إذًا" قلت: يا رسول الله، فإن دُخِل بيتي؟ قال: "إن خشيتَ أَن يَبْهَرَك شُعاعُ السَّيف، فقُلْ هكذا، فألْقِ طَرَفَ ثوبِك على وجهِك، فيَبُوءُ بإثمِه وإثمِك، ويكونُ من أصحاب النار" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، لأنَّ حماد بن زيد رواه عن أبي عمران الجَوْني، عن المُشعَّث بن طَريف، عن عبد الله بن الصامت:
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আবূ যার, তুমি কেমন থাকবে যখন মানুষের ওপর এমন মহামারি নেমে আসবে যে একটি বাড়ি বিক্রিফের (ভাড়ার/অল্প মূল্যের) মতো হয়ে যাবে?" - অর্থাৎ কবর। আমি বললাম: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল আমার জন্য যা ভালো মনে করবেন (তাই হবে)। এরপর তিনি বললেন: "তুমি কেমন থাকবে যখন মানুষের ওপর এমন ক্ষুধা নেমে আসবে যে তুমি তোমার মসজিদে যাবে, কিন্তু সেখান থেকে তোমার বিছানায় ফিরে যেতে পারবে না, আর তোমার বিছানা থেকে তোমার মসজিদেও যেতে পারবে না?" আমি বললাম: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল আমার জন্য যা ভালো মনে করবেন (তাই হবে)। তিনি বললেন: "তুমি সংযম অবলম্বন করবে।" এরপর তিনি বললেন: "তুমি কেমন থাকবে যখন মানুষের ওপর এমন হত্যাকাণ্ড নেমে আসবে যে (তেলের) জাইতের পাথরগুলো রক্তে ডুবে যাবে?" তিনি বলেন, আমি বললাম: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল আমার জন্য যা ভালো মনে করবেন (তাই হবে) - অথবা আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন: "তুমি তোমার ঘরে অবস্থান করবে।" তিনি বলেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তবে কি আমি আমার তরবারি তুলে নেব না এবং যে এমন করবে তাকে আঘাত করব না? তিনি বললেন: "তাহলে তুমিও ওই সম্প্রদায়ের অন্তর্ভুক্ত হয়ে যাবে।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! যদি আমার ঘরে প্রবেশ করা হয় (আমাকে হত্যার উদ্দেশ্যে)? তিনি বললেন: "যদি তুমি আশঙ্কা করো যে তরবারির ঝলকানি তোমাকে আলোড়িত করবে, তবে এভাবে বলো— এবং তোমার কাপড়ের এক পাশ তোমার চেহারার ওপর ফেলে দাও। ফলে সে তোমার ও তার পাপের ভার বহন করবে এবং জাহান্নামীদের অন্তর্ভুক্ত হবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا جاء في نسخنا الخطية، والوكيف في معاجم اللغة: مصدر وَكَفَ الشيءُ، أي: سالَ وقَطَر، ويقال للقطر نفسه أيضًا: وَكِيف، لكن هناك الوَكوف: وهي الناقة الغزيرة اللبن، فقد يكون جائزًا أن تُوصف أيضًا بالوَكيف، لكننا لم نقف عليه منصوصًا في معاجم اللغة، والقياس يجوِّزه، ففي صيغ المبالغة لفاعل: فَعُول وفَعِيل، والله أعلم. والذي في سائر مصادر تخريج الحديث: بالوصيف، بالصاد، وكذلك جاء في النسخة المحمودية من "المستدرك" كما في طبعة الميمان، والوصيف: الغُلام الخادم.
[2] إسناده صحيح. وقد رواه حماد بن زيد - كما سيأتي بعده - فزاد فيه بين أبي عمران الجوني - واسمه عبد الملك بن حبيب - وبين عبد الله بن الصامت رجلًا هو المشعَّث بن طريف - ويقال في اسمه: المنبعث - وهو رجل معروف جليل القدر كما وصفه الحافظ صالح جزرة، وكان المنبعث هذا قاضي هَراة، ولم يذكره أحد غيره من أصحاب أبي عمران، فلعلَّ أبا عمران سمعه مرة بواسطة ومرة بغير واسطة، لأنَّ سماعه من عبد الله بن الصامت ثابت مشهور، وقد أخرج مسلم قطعة من هذا الحديث الذي ذكره بطوله بعض أصحاب أبي عمران عند أحمد 35/ (21445) في حثِّ النبي صلى الله عليه وسلم أبا ذر على الصلاة لوقتها عند تأخير بعض الأمراء لها، وليست في حديثنا هنا، وقد رواها مسلم (648) من طريق حماد بن زيد، عن أبي عمران، عن عبد الله بن الصامت مباشرة، دون ذكر المُشعَّث. وقد أشار الدارقطني في "العلل" (1140) إلى أنَّ هذه القطعة في الصلاة لوقتها هي جزء من الحديث المطوّل أيضًا.وأخرجه أحمد 35/ (21325)، وابن حبان (6685) من طريق مرحوم بن عبد العزيز العطار، وأحمد (21445) عن عبد العزيز بن عبد الصمد العَمّي، كلاهما عن أبي عمران الجوني، به. وزاد عبد العزيز بن العَمّي في روايته عند أحمد ذكر الصلاة لوقتها.وسيأتي برقم (8509) من طريق حماد بن سلمة عن أبي عمران الجوني.وسيأتي بعده وبرقم (8510) من طريق حماد بن زيد، عن أبي عمران الجوني، عن المُشعَّث بن طريف، عن عبد الله بن الصامت.وتفسير البيت بالقبر في هذا الحديث من تفسير أبي عمران الجوني، كما تدل عليه رواية حماد بن زيد عند البزار (2928)، وكذا رواية مرحوم بن عبد العزيز عنده أيضًا (3959).وحجارة الزيت: موضع بالمدينة، قريب من الزَّوراء موضع صلاة النبي صلى الله عليه وسلم في الاستسقاء، وهي في الحَرّة، سميت بذلك لسواد أحجارها، كأنها طُليت بالزيت.وشُعاع السيف: بَريقه وضَوْؤه.وقوله: "حتى يكون البيت بالوصيف" معناه: أنَّ الناس يُشغَلون عن دفن موتاهم، حتى لا يوجد فيهم من يحفر قبرًا لميت ويدفنه إلّا أن يُعطى وصيفًا أو قيمته، أو أنَّ مواضع القبور تضيق فيبتاعون كل قبر بوصيف.
2699 - أخبرَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، أخبرنا سليمان بن حَرْب، حدثنا حماد بن زيد قال: حدثني المُشعَّث بن طَرِيف، وكان قاضيًا بهَراة، عن عبد الله بن الصامِت، عن أبي ذر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، نحوه [1].
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ একটি বর্ণনা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد تفرَّد حماد بن زيد فيه بزيادة المشعَّث بن طريف في إسناده كما أوضحناه عند الطريق السابق. والمشعَّث هذا رجل جليل القدر كما وصفه الحافظ صالح بن محمد جزرة، فلو فرضنا ثبوته في هذا الإسناد فإنه يكون صحيحًا أيضًا، ويكون من المزيد في متصل الأسانيد، لكن يعكّر عليه أنَّ مسلمًا أخرج قطعة من الحديث الطويل الذي رواه بطوله أحمد، فلم يذكر في إسناده المشعَّث، وقد رواها مسلم من طريق حماد بن زيد نفسه، فالله تعالى أعلم.وأخرجه أبو داود (4261) و (4409) عن مُسدَّد بن مُسَرهد، وابن ماجه (3958) عن أحمد بن عَبْدة، كلاهما عن حماد بن زيد، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (8510) من طريق سعيد بن هبيرة عن حماد بن زيد. بذكر قيس بن أبي حازم، ومن بين هؤلاء الذين لم يذكروه شعبة ويحيى القطان، وكلهم أجلّ من جعفر بن عون.وقد جزم إسماعيلُ بن أبي خالد فيما أسنده عنه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 10/ 44 بأنَّ عامرًا الشعبي لم يسمع هذا الخبر، يعني لم يسمعه من أيمن بن خُريم ولا من مروان بن الحكم، وجزم إسماعيل أيضًا فيما أسنده عنه ابن عساكر 10/ 45 بأنه لم يسمع هذا الشعر المذكور من عامر الشعبي. واختُلف فيه عن الشعبي في تعيين الواقعة التي شهدها خريم بن فاتك وأخوه، فوقع في بعض الروايات عنه أنها بدر، وفي بعضها الآخر أنها الحديبية، وخطّأ الواقدي فيه ذكر بدر، لكن اعتمده البخاري وأبو حاتم وابن منده وابن السكن في إثبات شهودهما بدرًا، فيما نقله عنهم ابن عساكر 16/ 347، وابن العديم في "بغية الطلب" 7/ 3235، وقال ابن عساكر 16/ 351: ذكر الحديبية هو الصواب.وأخرجه البيهقي 8/ 193 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه محمد بن يحيى بن أبي عمر العدني في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ (2864)، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 6/ 267 - 268 و 11/ 196، والطبراني في "الكبير" (851) و (852)، والدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 2/ 852 - 853، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2515)، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (104)، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 61، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (2337)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 10/ 43 و 44، وابن العديم في "بغية الطلب" 7/ 3234. والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة أيمن بن خريم 3/ 445 من طرق عن إسماعيل بن أبي خالد، عن عامر الشعبي وحده، به. وبعضهم يقول في روايته: عن أيمن بن خُريم قال: دعاني مروان، وبعضهم يذكر عبد الملك بن مروان بدل أبيه مروان بن الحكم، وذلك وهم، كما جزم به ابنُ عساكر، وبيان ذلك أنَّ هذه الواقعة إنما كانت بمَرْج راهِط كما وقع مصرَّحًا به في بعض طرقه، وذلك سنة (65) هجرية، حيث استقام الأمر لمروان بن الحكم بالشام بعد هزيمته للضحّاك بن قيس، فالأليق أن يكون الذي دعا أيمن هو مروان. وقد يكون عبد الملك قال ذلك له أيضًا، إذ كان بصحبة أبيه. وذكر أبو القاسم الأصبهاني في روايته الحديبية بدل بدر.وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (1773)، وأبو يعلى (947)، وأبو عمرو الداني (105)، وابن عساكر 10/ 43 و 44 و 46، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 188 - 189 من طريق مطرِّف بن طريف، عن الشعبي: أنَّ عبد الملك بن مروان قال لخريم بن فاتك أو ابنه. إلّا أبو يعلى فقال في روايته: لما قاتل مروان الضحاك بن قيس أرسل إلى أيمن بن خُريم. وهذا هو الصحيح الموافق لرواية إسماعيل بن أبي خالد عن الشعبي. وكلهم ذكر في روايته الحديبية بدل بدر، إلّا أبا يعلى ومن طريقه ابن الأثير، فذكر بدرًا.
2700 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفَّار، حدثنا أحمد بن يونس بن المسيَّب الضَّبِّي، حدثنا جعفر بن عَوْن، حدثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم وعامر الشَّعْبي، قالا: قال مروان بن الحكم لأيمن بن خُريم: ألا تخرجُ فتُقاتلَ معنا، فقال: إِنَّ أبي وعمِّي شهدا بدرًا، وإنهما عَهِدا إليّ أن لا أُقاتل أحدًا يقول: لا إله إلّا الله، فإن أنت جئتني ببراءةٍ من النار قاتلتُ معك، قال: فاخرُجْ عنا، قال: فخرج وهو يقول:ولست بقاتلٍ رجلًا يصلّي … على سلطانِ آخرَ من قريشِله سُلْطانُه وعليَّ إثمي … معاذَ اللهِ مِن جَهلٍ وطَيشِأأقتُلُ مسلمًا في غير جُرْمٍ … فليسَ بنافعي ما عشتُ عَيشي [1] . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.والصحابيان اللذان ذُكِرا وشَهِدا بدرًا يصير الحديثُ به في حدود المسانيد.
কায়স ইবনু আবী হাযিম ও আমের আশ-শা'বী থেকে বর্ণিত, মারওয়ান ইবনুল হাকাম আইমান ইবনু খুবাইমকে বললেন: তুমি কি বের হবে না এবং আমাদের সাথে যুদ্ধ করবে না? তিনি (আইমান) বললেন: আমার পিতা ও আমার চাচা বদরের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন। তারা দু'জন আমার কাছে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে, আমি এমন কারও সাথে যুদ্ধ করব না, যে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলে। সুতরাং, আপনি যদি আমাকে জাহান্নাম থেকে মুক্তির পরোয়ানা এনে দেন, তবে আমি আপনার সাথে যুদ্ধ করব। তিনি (মারওয়ান) বললেন: তুমি আমাদের কাছ থেকে চলে যাও। তিনি বললেন: অতঃপর তিনি বের হয়ে গেলেন এবং বলতে লাগলেন:
আমি এমন ব্যক্তিকে হত্যা করব না যে সালাত আদায় করে,
অন্য কুরাইশ শাসকের কর্তৃত্বের অধীনে।
তার কর্তৃত্ব তার জন্য, আর পাপের বোঝা আমার জন্য,
অজ্ঞতা ও হঠকারিতা থেকে আল্লাহর আশ্রয় চাই!
আমি কি কোনো মুসলিমকে বিনা অপরাধে হত্যা করব?
তাহলে আমি যতদিন বেঁচে থাকি, আমার জীবন অর্থহীন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن تفرَّد جعفر بن عون من بين سائر أصحاب إسماعيل بن أبي خالد بذكر قيس بن أبي حازم، ومن بين هؤلاء الذين لم يذكروه شعبة ويحيى القطان، وكلهم أجلّ من جعفر بن عون.وقد جزم إسماعيلُ بن أبي خالد فيما أسنده عنه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 10/ 44 بأنَّ عامرًا الشعبي لم يسمع هذا الخبر، يعني لم يسمعه من أيمن بن خُريم ولا من مروان بن الحكم، وجزم إسماعيل أيضًا فيما أسنده عنه ابن عساكر 10/ 45 بأنه لم يسمع هذا الشعر المذكور من عامر الشعبي. واختُلف فيه عن الشعبي في تعيين الواقعة التي شهدها خريم بن فاتك وأخوه، فوقع في بعض الروايات عنه أنها بدر، وفي بعضها الآخر أنها الحديبية، وخطّأ الواقدي فيه ذكر بدر، لكن اعتمده البخاري وأبو حاتم وابن منده وابن السكن في إثبات شهودهما بدرًا، فيما نقله عنهم ابن عساكر 16/ 347، وابن العديم في "بغية الطلب" 7/ 3235، وقال ابن عساكر 16/ 351: ذكر الحديبية هو الصواب.وأخرجه البيهقي 8/ 193 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه محمد بن يحيى بن أبي عمر العدني في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ (2864)، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 6/ 267 - 268 و 11/ 196، والطبراني في "الكبير" (851) و (852)، والدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 2/ 852 - 853، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2515)، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (104)، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 61، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (2337)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 10/ 43 و 44، وابن العديم في "بغية الطلب" 7/ 3234. والمزي في "تهذيب الكمال" في ترجمة أيمن بن خريم 3/ 445 من طرق عن إسماعيل بن أبي خالد، عن عامر الشعبي وحده، به. وبعضهم يقول في روايته: عن أيمن بن خُريم قال: دعاني مروان، وبعضهم يذكر عبد الملك بن مروان بدل أبيه مروان بن الحكم، وذلك وهم، كما جزم به ابنُ عساكر، وبيان ذلك أنَّ هذه الواقعة إنما كانت بمَرْج راهِط كما وقع مصرَّحًا به في بعض طرقه، وذلك سنة (65) هجرية، حيث استقام الأمر لمروان بن الحكم بالشام بعد هزيمته للضحّاك بن قيس، فالأليق أن يكون الذي دعا أيمن هو مروان. وقد يكون عبد الملك قال ذلك له أيضًا، إذ كان بصحبة أبيه. وذكر أبو القاسم الأصبهاني في روايته الحديبية بدل بدر.وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (1773)، وأبو يعلى (947)، وأبو عمرو الداني (105)، وابن عساكر 10/ 43 و 44 و 46، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 188 - 189 من طريق مطرِّف بن طريف، عن الشعبي: أنَّ عبد الملك بن مروان قال لخريم بن فاتك أو ابنه. إلّا أبو يعلى فقال في روايته: لما قاتل مروان الضحاك بن قيس أرسل إلى أيمن بن خُريم. وهذا هو الصحيح الموافق لرواية إسماعيل بن أبي خالد عن الشعبي. وكلهم ذكر في روايته الحديبية بدل بدر، إلّا أبا يعلى ومن طريقه ابن الأثير، فذكر بدرًا.