হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2701)


2701 - أخبرنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، عن عمرو بن مُرّة، عن أبي البَخْتَري، عن أبي ثَوْر الحُدّاني، قال: بعث عثمانُ بن عفان يومَ الجَرَعة سعيدَ بن العاص إلى الكوفة، قال: فخرجوا إليه فردُّوه، قال: وكنت قاعدًا مع أبي مسعود [1] وحذيفة، فقال أبو مسعود: ما كنتُ أرى أن يرجعَ هؤلاء ولم يُهرَقْ فيها مِحجَمةٌ من دمٍ، وما علمتُ من ذلك شيئًا إلّا شيئًا علمتُه ومحمدٌ صلى الله عليه وسلم حيٌّ: أنَّ الرجل يُصبح مؤمنًا ويُمسي وما معه شيءٌ، ويُمسي مؤمنًا ويصبحُ وما معه شيءٌ، يُقاتِل في الفتنة اليومَ ويقتلُه اللهُ غدًا، يُنكِّسُ [2] قلبَه وتَعلُوه اسْتُه، قلت: أسفلُه؟ قال: بلِ استُه [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু থাওর আল-হুদ্দানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উসমান ইবনু আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল-জারা'আহ-এর দিন সাঈদ ইবনু আল-আসকে কূফায় প্রেরণ করলেন। তিনি বলেন: তখন তারা (কূফাবাসী) তার বিরুদ্ধে বেরিয়ে পড়ল এবং তাকে ফিরিয়ে দিল। তিনি (আবু থাওর) বলেন: আমি আবূ মাসঊদ ও হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বসে ছিলাম। আবূ মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তো ভাবিনি যে এরা ফিরে আসবে এবং এর মধ্যে এক ফোঁটা রক্তও ঝরবে না। আর আমি এ বিষয়ে তেমন কিছু জানতাম না, শুধু একটি বিষয় ছাড়া, যা আমি জেনেছিলাম যখন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জীবিত ছিলেন। (তা হলো:) মানুষ সকালে মুমিন অবস্থায় থাকে এবং সন্ধ্যায় এমন অবস্থায় পৌঁছায় যে তার সাথে (ঈমানের) কিছুই থাকে না। আবার সে সন্ধ্যায় মুমিন অবস্থায় থাকে এবং সকালে এমন অবস্থায় পৌঁছায় যে তার সাথে (ঈমানের) কিছুই থাকে না। সে আজ ফিতনার মধ্যে যুদ্ধ করে এবং আল্লাহ্ তাকে আগামীকাল হত্যা করেন। তার হৃদয় উল্টে যায় এবং তার পশ্চাৎদেশ উপরে উঠে যায়। আমি (আবু থাওর) বললাম: তার কি নিচের দিকটা? তিনি (আবূ মাসঊদ) বললেন: না, বরং তার পশ্চাৎদেশ।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف اسم أبي مسعود في النسخ الخطية في الموضعين إلى: ابن مسعود، وجاء على الصواب في بعض النسخ الخطية في الروايتين الآتيتين برقم (8555) و (8855)، وكذلك جاء في سائر مصادر تخريج هذا الخبر، وقد وقع مُقيَّدًا في بعض الروايات بالبدري، وهي نسبة أبي مسعود، بل وقع في بعض الروايات أيضًا مذكورًا باسمه عقبة بن عمرو، وهذا ممّا يدفع الإشكال بِرُمَّته، ويؤكد على أنَّ ما وقع ها هنا تحريف: أنَّ أيام الجرعة هذه كانت في سنة 34 هـ، وعبد الله بن مسعود رضي الله عنه كان قد توفي قبلها بسنة أو سنتين، والله الموفق. والجَرَعة: موضع بالكوفة. إلى حدأ، فقال: الحدإي، وصحَّح الخطيب هذه النسبة، وخطّأ نسبته إلى حُدَّان، وحُدَّان حي من الأزد، وحدأ حي من مراد، لكن ذكر غير واحدٍ من أهل النسب أنه دخل في مراد من الأزدِ ومن غيرهم، فلعلَّ هذا وجه قول من قال: حدّان حي من مراد، كما وقع في "موضح أوهام الجمع والتفريق" للخطيب 2/ 6، وحبيب هذا وثقه أبو زرعة. لكن بقي أنَّ حبيبًا هذا نُسب في كتب التراجم بالنهدي، والنهد لا يجامع الأزد ولا مراد في النسب، ولم نقف على هذه النسبة في شيء من رواياته إلّا في رواية واحدة هي رواية أبي إسحاق الفزاري، عن كليب بن وائل، عن هانئ بن قيس، عن حبيب، عن ابن عمر في غياب عثمان بن عفان عن بيعة الرضوان، ولم ينسبه بذلك غيره ممَّن روى خبر عثمان كزائدة بن قدامة وخالد بن عبد الله الواسطي وعبد الواحد بن زياد ومعتمر بن سليمان، فرجع الأمر إلى الأزد ومراد.وإن لم يكن أبو ثور هذا هو حبيب بن أبي مُلَيكة، وكان رجلًا آخر، كما يظهر من صنيع مسلم وابن أبي حاتم وأبي أحمد الحاكم وغيرهما، فهو رجل صدوق، فقد وصفه أبو داود بأنه تابعي جليل، وروى عنه الشعبي وأبو البختري سعيد بن فيروز، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 38/ (23348) عن محمد بن جعفر، عن شعبة، بهذا الإسناد. وفيه أنَّ القائل: "ما علمت من ذلك شيئًا إلَّا شيئًا … " هو حذيفة لا أبو مسعود. وكذلك هو في بقية المصادر.



[2] وقع في (ز) و (ص): ينكسر، ويغلب على ظننا أنه تحريف، والمثبت على الصواب من نسخة بهامش (ز) ومن "تلخيص المستدرك" للذهبي، وِفاقًا لجميع مصادر تخريج الخبر التي ذكرت هذا الحرف فيه، وجاء على الصواب أيضًا في الروايتين الآتيتين. إلى حدأ، فقال: الحدإي، وصحَّح الخطيب هذه النسبة، وخطّأ نسبته إلى حُدَّان، وحُدَّان حي من الأزد، وحدأ حي من مراد، لكن ذكر غير واحدٍ من أهل النسب أنه دخل في مراد من الأزدِ ومن غيرهم، فلعلَّ هذا وجه قول من قال: حدّان حي من مراد، كما وقع في "موضح أوهام الجمع والتفريق" للخطيب 2/ 6، وحبيب هذا وثقه أبو زرعة. لكن بقي أنَّ حبيبًا هذا نُسب في كتب التراجم بالنهدي، والنهد لا يجامع الأزد ولا مراد في النسب، ولم نقف على هذه النسبة في شيء من رواياته إلّا في رواية واحدة هي رواية أبي إسحاق الفزاري، عن كليب بن وائل، عن هانئ بن قيس، عن حبيب، عن ابن عمر في غياب عثمان بن عفان عن بيعة الرضوان، ولم ينسبه بذلك غيره ممَّن روى خبر عثمان كزائدة بن قدامة وخالد بن عبد الله الواسطي وعبد الواحد بن زياد ومعتمر بن سليمان، فرجع الأمر إلى الأزد ومراد.وإن لم يكن أبو ثور هذا هو حبيب بن أبي مُلَيكة، وكان رجلًا آخر، كما يظهر من صنيع مسلم وابن أبي حاتم وأبي أحمد الحاكم وغيرهما، فهو رجل صدوق، فقد وصفه أبو داود بأنه تابعي جليل، وروى عنه الشعبي وأبو البختري سعيد بن فيروز، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 38/ (23348) عن محمد بن جعفر، عن شعبة، بهذا الإسناد. وفيه أنَّ القائل: "ما علمت من ذلك شيئًا إلَّا شيئًا … " هو حذيفة لا أبو مسعود. وكذلك هو في بقية المصادر.



2701 [3] - خبر حسنٌ، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الرحمن بن الحسن القاضي، لكنه قد توبع في الروايتين الآتيتين برقم (8555) و (8855)، وكما سيأتي.وأبو ثور الحُدّاني إن كان هو حبيب بن أبي مُلَيكة، كما جزم به أحمد والترمذي وابن حبان والخطيب البغدادي، واستظهره ابن ناصر الدين الدمشقي في "توضيح المشتبه"، غير أنَّ الإمام أحمد نسبه إلى حدأ، فقال: الحدإي، وصحَّح الخطيب هذه النسبة، وخطّأ نسبته إلى حُدَّان، وحُدَّان حي من الأزد، وحدأ حي من مراد، لكن ذكر غير واحدٍ من أهل النسب أنه دخل في مراد من الأزدِ ومن غيرهم، فلعلَّ هذا وجه قول من قال: حدّان حي من مراد، كما وقع في "موضح أوهام الجمع والتفريق" للخطيب 2/ 6، وحبيب هذا وثقه أبو زرعة. لكن بقي أنَّ حبيبًا هذا نُسب في كتب التراجم بالنهدي، والنهد لا يجامع الأزد ولا مراد في النسب، ولم نقف على هذه النسبة في شيء من رواياته إلّا في رواية واحدة هي رواية أبي إسحاق الفزاري، عن كليب بن وائل، عن هانئ بن قيس، عن حبيب، عن ابن عمر في غياب عثمان بن عفان عن بيعة الرضوان، ولم ينسبه بذلك غيره ممَّن روى خبر عثمان كزائدة بن قدامة وخالد بن عبد الله الواسطي وعبد الواحد بن زياد ومعتمر بن سليمان، فرجع الأمر إلى الأزد ومراد.وإن لم يكن أبو ثور هذا هو حبيب بن أبي مُلَيكة، وكان رجلًا آخر، كما يظهر من صنيع مسلم وابن أبي حاتم وأبي أحمد الحاكم وغيرهما، فهو رجل صدوق، فقد وصفه أبو داود بأنه تابعي جليل، وروى عنه الشعبي وأبو البختري سعيد بن فيروز، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 38/ (23348) عن محمد بن جعفر، عن شعبة، بهذا الإسناد. وفيه أنَّ القائل: "ما علمت من ذلك شيئًا إلَّا شيئًا … " هو حذيفة لا أبو مسعود. وكذلك هو في بقية المصادر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2702)


2702 - أخبرنا بكر بن محمد الصَّيرفي بمَرْو، حدثنا أبو الأحوص محمد بن الهيثم القاضي، حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا سليمان بن بلال، عن علقمة بن أبي علقمة، عن أمّه: أنَّ غلامًا كان لبابَى [1]، وكان بابَى يضربه في أشياء ويُعاقِبه، وكان الغلامُ يُعادي سيِّدَه فباعه [2]، فلقيه الغلامُ يومًا ومع الغلام سيفٌ، وذلك في إمْرة سعيد بن العاص، فشَهَرَ العبدُ على بابَى السيفَ وتَفلَّت به عليه، فأمسكَه الناسُ عنه، فدخل بابَى على عائشة، فأخبرها بما فعل العبدُ، فقالت عائشة: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن أشار بحديدةٍ إلى أحدٍ من المسلمين يريد قتلَه، فقد وَجَبَ دمُه".قالت: فخرج بابَى من عندها، فذهب إلى سيد العبدِ الذي ابتاعه منه فاستقالَه فأقالَه، وردَّ إليه، فأخذَه بابَى فقتلَه [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বা-বা (Bābā) নামক এক ব্যক্তির একটি গোলাম (ক্রীতদাস) ছিল। বা-বা তাকে বিভিন্ন বিষয়ে প্রহার করত ও শাস্তি দিত। গোলামটি তার মালিকের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করত, তাই বা-বা তাকে বিক্রি করে দিল। একদিন গোলামটির সাথে বা-বা'র দেখা হলো। গোলামটির সাথে একটি তরবারি ছিল। ঘটনাটি ছিল সাঈদ ইবনুল আস-এর শাসনামলে। দাসটি বা-বা'র দিকে তরবারি তাক করল এবং তাকে আঘাত করার জন্য উদ্যত হলো, কিন্তু লোকেরা তাকে নিবৃত্ত করল।

এরপর বা-বা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেল এবং দাসটি যা করেছে, তা তাঁকে জানাল। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি কোনো মুসলিমকে হত্যা করার উদ্দেশ্যে তার দিকে কোনো ধারালো বস্তু (অস্ত্র) দিয়ে ইশারা করে, তার রক্তপাত করা বৈধ হয়ে যায়।"

তিনি (আয়িশা) বললেন: এরপর বা-বা তাঁর নিকট থেকে বেরিয়ে গেল এবং সেই দাসের মালিকের কাছে গেল, যার কাছ থেকে সে দাসটিকে কিনেছিল। সে তার কাছে চুক্তি বাতিল চাইল এবং সেও চুক্তি বাতিল করল ও দাসটিকে (বা-বা'র কাছে) ফিরিয়ে দিল। বা-বা তাকে নিয়ে গেল এবং তাকে হত্যা করল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع هذا الاسم معجمًا في (ز) وفي سائر المواضع في الخبر بموحدة ثم تاء مثناة ثم ياء تحتانية، والمثبت بموحدتين ثانيتهما مفتوحة من بقية النسخ، وفي "الثقات" لابن حبان 4/ 83: بابى أبو عبد الله مولى عائشة؛ فلعله هذا، والله تعالى أعلم.



[2] تحرَّف في (ز) و (ص) و (ع) إلى: فيدعّه، وجاء على الصواب في (ب) و"تلخيص الذهبي"، وفاقًا لما في "المحلى" لابن حزم، وهو الذي يدل عليه قوله آخر الحديث: فذهب إلى سيد العبد الذي ابتاعه منه.



2702 [3] - رجاله ثقات، وأم علقمة روى عنها اثنان، وذكرها العجلي وابن حبان في الثقات، وقال ابن سعد: روى عنها ابنُها أحاديث صالحة. قلنا: وقد تفردت بهذا الحديث، وقد احتجَّ الإمام أحمد بخبرها في الحامل ترى الدم أنها لا تصلي، ووافقه على ذلك إسحاق بن راهويه، حكاه عنهما ابن القيم في "زاد المعاد" 5/ 649.وأخرجه ابن حزم في "المحلى" 11/ 302 من طريق يحيى بن أيوب، عن سعيد بن أبي مريم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 43/ (26294) عن عبيد بن أبي قرة، عن سليمان بن بلال، به. دون ذكر القصة، مع أنه أشار إليها بقوله: في قصة ذكرها.قوله: "فقد وجب دمه" أي: حلَّ للمقصود أن يدفعه عن نفسه ولو قتله، فوجب ها هنا بمعنى: حلَّ. وأخرجه أيضًا (3548) من طريق ابن جُرَيج، عن عبد الله بن طاووس، به موقوفًا كذلك.قوله: "فدمُه هدر" أي: لم يُطلب بثأره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2703)


2703 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّريّ بن خُزيمة، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا وُهَيب، عن معمر بن راشد، عن عبد الله بن طاووس، عن أبيه، عن ابن الزُّبَير، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن شَهَرَ سيفَه ثم وَضَعَه، فدَمُه هَدْرٌ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনুয-যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি তার তরবারি উত্তোলন করে (ভীতি প্রদর্শন করে) এরপর তা রেখে দেয়, তার রক্ত মূল্যহীন।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح موقوفًا على عبد الله بن الزُّبَير، قد اختُلف في رفعه ووقفه عن معمر، فرواه عنه وهيب - وهو ابن خالد - والفضل بن موسى السِّيناني مرفوعًا، ورواه عنه عبد الرزاق موقوفًا، وكذلك رواه ابن جُرَيج عن عبد الله بن طاووس موقوفًا، ولهذا أنكر رفعه عليُّ بن المديني كما في "التعديل والتجريح" للباجي 3/ 1048، والبخاريُّ في "علل الترمذي الكبير" (429)، ومالَ إلى تصحيح وصله ابن حزم في "المحلى" 11/ 307، وعبد الحق في "أحكامه الوسطى" 4/ 73، وكذلك الحافظُ في "الدراية" 2/ 267.وأخرجه النسائي (3546) من طريق الفضل بن موسى، عن معمر، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (3547) من طريق عبد الرزاق، عن معمر، به موقوفًا. وأخرجه أيضًا (3548) من طريق ابن جُرَيج، عن عبد الله بن طاووس، به موقوفًا كذلك.قوله: "فدمُه هدر" أي: لم يُطلب بثأره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2704)


2704 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر بن سابق الخَوْلاني، حدثنا عبد الله بن وهب، حدثني يعقوب بن عبد الرحمن، عن عُمارة بن حَزْم، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "كيف بكم وبزمانٍ - أو [1] يُوشِك أن يأتيَ زمانٌ - يُغربَلُ الناسُ غَربلةً، ويَبقى حُثالةٌ من الناس قد مَرِجَتْ عهودُهم وأماناتُهم، واختَلَفوا فكانوا هكذا" وشَبَّك بين أصابعه، قالوا: فكيف بنا يا رسول الله؟ قال: "تأخذون ما تَعرِفون، وتَدَعُون ما تُنكِرون، وتُقبِلون على أمر خاصّتِكم، وتَدَعُون أمرَ عامّتِكم" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.هذا آخر كتاب الجهاد ‌‌كتاب النكاح




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কেমন হবে তোমাদের অবস্থা এমন এক সময়ে—অথবা বলেছেন: এমন এক সময় আসতে পারে—যখন মানুষদের ভালোভাবে ঝেড়ে ফেলা হবে (বা ছেঁকে নেওয়া হবে), এবং থেকে যাবে মানুষের এমন কিছু আবর্জনা (বা নিকৃষ্ট অংশ), যাদের অঙ্গীকার ও আমানত (বিশ্বাসযোগ্যতা) মিশ্রিত হয়ে যাবে (বা নষ্ট হয়ে যাবে), এবং তারা মতবিরোধ করবে। ফলে তারা হবে এমন," এই বলে তিনি তাঁর আঙ্গুলগুলো একে অপরের সাথে ঢুকিয়ে দিলেন (বা বাঁধলেন)। তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! তাহলে আমাদের কী করণীয়? তিনি বললেন: "তোমরা যা ভালো জানো তা গ্রহণ করবে, আর যা মন্দ জানো তা বর্জন করবে। তোমরা নিজেদের বিশেষ (বা ব্যক্তিগত) বিষয়ের প্রতি মনোযোগ দেবে এবং সাধারণ মানুষের (বা সমষ্টিগত) বিষয়সমূহ পরিত্যাগ করবে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] قوله: "كيف بكم وزمان أو" والمثبت على الصواب من رواية أبي طاهر المخلِّص في "المخلِّصيات" (1467) حيث روى هذا الخبر عن يحيى بن محمد بن صاعد عن بحر بن نصر الخولاني، ونحوه في المصادر الأخرى. وقولهما أشبه بالصواب، وقد يكون الحديث محفوظًا على الوجهين، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 11/ (6508) من طريق الحسن البصري، عن عبد الله بن عمرو.وأخرج بعضه البخاري برقم (478) من طريق واقد بن محمد العُمري، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو.وسيأتي الحديث برقم (8544) من طريق سعيد بن منصور، عن يعقوب بن عبد الرحمن، عن أبي حازم، عن عمارة بن عمرو بن حزم، عن عبد الله بن عمرو.وسيأتي أيضًا برقم (7951) و (8813) من طريق عكرمة عن عبد الله بن عمرو.وانظر حديث أبي ذر الآتي برقم (5553).قوله: "يُغربَل الناس غربلة" أي: يذهب خيارهم ويبقى أرذالهم، والمغربَل: المُنتقى، كأنه نُقّي بالغِربال.والحُثالة: الرديء من كل شيء.وقوله: "مَرِجت" أي: اختلطت وفسدت.وقوله: "تُقبلون على أمر خاصتكم وتدَعُون أمر عامتكم" أي: الزموا أمر أنفسكم واحفظوا دينكم، واتركوا الناس ولا تتبعوهم، وهذا رخصة في ترك الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر إذا كثر الأشرار وضَعُف الأخيار.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن المحفوظ فيه ذكر أبي حازم سلمة بن دينار بين يعقوب بن عبد الرحمن - وهو الإسكندراني - وبين عُمارة بن حزم - وهو عمارة بن عمرو بن حزم - كما في رواية سعيد بن منصور الآتية عند المصنف برقم (8544)، وكما في رواية سعيد ابن كثير بن عُفير عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (1177)، ورواية عبد الله ابن صالح كاتب الليث عند الطبراني في "الكبير" (13654/ 5) و (14589)، ورواية قتيبة بن سعيد عند أبي العباس المستغفري في "دلائل النبوة" (279). وثبت أيضًا في رواية يحيى بن محمد بن صاعد عن بحر بن نصر عند أبي طاهر المخلِّص في "المخلِّصيات" (1467). ولا يمكن ليعقوب إدراك عمارة بن حزم أصلًا، إذ بين وفاتيهما ما يزيد على مئة سنة على أعلى تقدير في وفاة عمارة.وأخرجه أبو داود (4342)، وابن ماجه (3957) من طريق عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن عمارة بن حزم، به.وخالف محمدُ بنُ مطرِّف المدني فيه يعقوبَ بنَ عبد الرحمن وعبدَ العزيز بنَ أبي حازم، فرواه عن أبي حازم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. أخرجه من طريقه أحمد 11/ (7049). وقولهما أشبه بالصواب، وقد يكون الحديث محفوظًا على الوجهين، والله تعالى أعلم.وأخرجه أحمد 11/ (6508) من طريق الحسن البصري، عن عبد الله بن عمرو.وأخرج بعضه البخاري برقم (478) من طريق واقد بن محمد العُمري، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو.وسيأتي الحديث برقم (8544) من طريق سعيد بن منصور، عن يعقوب بن عبد الرحمن، عن أبي حازم، عن عمارة بن عمرو بن حزم، عن عبد الله بن عمرو.وسيأتي أيضًا برقم (7951) و (8813) من طريق عكرمة عن عبد الله بن عمرو.وانظر حديث أبي ذر الآتي برقم (5553).قوله: "يُغربَل الناس غربلة" أي: يذهب خيارهم ويبقى أرذالهم، والمغربَل: المُنتقى، كأنه نُقّي بالغِربال.والحُثالة: الرديء من كل شيء.وقوله: "مَرِجت" أي: اختلطت وفسدت.وقوله: "تُقبلون على أمر خاصتكم وتدَعُون أمر عامتكم" أي: الزموا أمر أنفسكم واحفظوا دينكم، واتركوا الناس ولا تتبعوهم، وهذا رخصة في ترك الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر إذا كثر الأشرار وضَعُف الأخيار.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2705)


2705 - أخبرنا أبو عمرو عثمانُ بنُ أحمد البزاز [1] ببغداد، حدثنا الحسين بن أبي مَعْشَر، حدثنا وكيع بن الجرَّاح، حدثني خارجةُ بن مُصعب، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يَسار، عن أبي سعيد الخُدْري قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ما مِنْ صباحٍ إلّا ومُنادِيان ينادِيان: ويلٌ للرِّجالِ من النساء، وويلٌ للنساءِ من الرِّجال" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কোনো সকাল নেই, যেখানে দুজন ঘোষণাকারী এই বলে ঘোষণা না করে: পুরুষদের জন্য নারীদের পক্ষ থেকে দুর্ভোগ এবং নারীদের জন্য পুরুষদের পক্ষ থেকে দুর্ভোগ।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا وقعت نسبة أبي عمرو عثمان بن أحمد هنا بزازًا، ولا يُعرف ذلك في نسبته، ولم يَرد في غير هذا الموضع، وإنما المعروف في نسبته ابن السّمّاك، والدّقّاق، وكان يقال له: الباز الأشهب، فلعلَّ البزاز هنا تحريف عن الباز، والله أعلم.



[2] إسناده ضعيف جدًّا، خارجة بن مصعب واهٍ كما قال الذهبي، وحسين بن أبي معشر - وهو حسين بن محمد بن أبي معشر - ضعيف، لكنه متابَع.فقد أخرجه ابن ماجه (3999) عن أبي بكر بن أبي شيبة وعلي بن محمد، كلاهما عن وكيع، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (8893) من طريق يحيى بن يحيى عن خارجة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2706)


2706 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو الحَسَن محمد بن سِنان القزّاز، حدثنا محمد بن بكر البُرْساني، حدثنا ابن جُرَيج، أخبرني عمر بن عطاء، عن عِكرمة، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا صَرُورةَ في الإسلامِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলামে সরূরাহ (বিশেষ ধরণের বাধ্যতামূলক কুরবানী) নেই।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف كما تقدم بيانه برقم (1661).وأخرجه أحمد 5/ (2844) عن محمد بن بكر، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2707)


2707 - أخبرنا أبو الحسن علي بن محمد بن عُقْبة الشَّيباني بالكوفة، حدثنا محمد بن علي بن عفّان العامري، حدثنا عبيد الله بن موسى، حدثنا سفيان، عن المغيرة بن النعمان، عن سعيد بن جُبير، قال: قال لي عبد الله بن عباس: تزوجتَ؟ قلتُ: لا، قال: تَزَوَّجْ؛ فإنَّ خيرَ هذه الأُمّة صلى الله عليه وسلم أكثرُها نساءً، ومهما في صُلبِك مُستودَعٌ، فإنه سيَخرُج قبلَ يوم القيامة [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد تابع عطاءُ بن السائب المغيرةَ بن النعمان في روايته:




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনে জুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: তিনি (ইবনে আব্বাস) আমাকে জিজ্ঞেস করলেন, তুমি কি বিবাহ করেছ? আমি বললাম: না। তিনি বললেন: বিবাহ কর; কেননা এই উম্মতের শ্রেষ্ঠ ব্যক্তি (মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এরই স্ত্রীদের সংখ্যা অন্যদের চেয়ে অধিক ছিল। আর তোমার মেরুদণ্ডে যা আমানত হিসেবে গচ্ছিত আছে, তা অবশ্যই কিয়ামতের আগে নির্গত হবে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. سفيان: هو الثَّوري.وأخرجه البخاري (5069) من طريق طلحة بن مُصرِّف الياميّ، عن سعيد بن جبير، به. دون قوله: ومهما في صُلبك مستودع.وقول ابن عباس في آخره: ومهما في صلبك مستودع، إلى آخره: أخرجه سعيد بن منصور في "سننه" (495)، وفي قسم التفسير أيضًا من "سننه" (893)، والطبري في "تفسيره" 7/ 288 و 289 من طريق أبي بشر جعفر بن إياس، عن سعيد بن جبير، به. وانظر ما بعده. عن الأوزاعي، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك. وقد تكلم بعضهم في رواية يحيى المذكور عن هقل، لكنه لم ينفرد بالحديث، بل تابعه عمرو بن هاشم البيروتي على هذا الإسناد بذكر الصلاة عند الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 4/ (1532).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2708)


2708 - أخبرَناه الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن زيد، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبير، قال: قال لي ابنُ عباس: يا سعيد، تزوَّجْ، فإنَّ خيرَ هذه الأمة كان أكثرَهم نساءً [1].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (সাঈদ ইবনু জুবাইরকে) বললেন: হে সাঈদ, তুমি বিবাহ করো। কারণ এই উম্মতের যিনি শ্রেষ্ঠ ছিলেন, তিনি তাদের মধ্যে সর্বাধিক সংখ্যক স্ত্রী গ্রহণকারী ছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 3/ (2048) عن أسباط بن محمد، عن عطاء بن السائب، به. عن الأوزاعي، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك. وقد تكلم بعضهم في رواية يحيى المذكور عن هقل، لكنه لم ينفرد بالحديث، بل تابعه عمرو بن هاشم البيروتي على هذا الإسناد بذكر الصلاة عند الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 4/ (1532).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2709)


2709 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الخَضِرُ بن أبان الهاشمي، حدثنا سيَّار بنُ حاتِم، حدثنا جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "حُبِّب إليَّ النساءُ والطِّيبُ، وجُعِلَ قُرَّةُ عَيني في الصلاة" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার কাছে নারী ও সুগন্ধিকে প্রিয় করা হয়েছে, আর আমার চক্ষু শীতলতা (মনের শান্তি) রাখা হয়েছে সালাতের (নামাজের) মধ্যে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف الخضر بن أبان، لكنه متابع، وسيار بن حاتم يُعتبر به، وقد روي الحديث من وجهين آخرين.وأخرجه النسائي (8837) عن علي بن مسلم الطُّوسي، عن سيار بن حاتم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 19/ (12293) من طريق أبي المنذر سلّام بن سليمان، عن ثابت، به. وسلّام صدوق، وقوَّى الذهبي إسناده في ترجمته في "الميزان".وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (5772) من طريق يحيى بن عثمان الحربي، عن الهقل بن زياد، عن الأوزاعي، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك. وقد تكلم بعضهم في رواية يحيى المذكور عن هقل، لكنه لم ينفرد بالحديث، بل تابعه عمرو بن هاشم البيروتي على هذا الإسناد بذكر الصلاة عند الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 4/ (1532).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2710)


2710 - أخبرني إبراهيم بن فِراس الفقيه بمكة، حدثنا بكر بن سهْل الدِّمياطي، حدثنا عبد الله بن يوسف، حدثنا محمد بن مسلم الطائفيُّ، عن إبراهيم بن مَيْسَرة، عن طاووس، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لم يُرَ للمتحابَّين مِثلُ التزوُّج" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، لأنَّ سفيان بن عُيينة ومعمر بن راشد أوقفاهُ عن إبراهيم بن ميسرة عن ابن عباس [2].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পরস্পর ভালোবাসাকারী দু'জনের জন্য বিবাহ বন্ধনের মতো আর কিছু দেখা যায় না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح إن شاء الله، بكر بن سهل - وإن كان ضعيفًا - قد توبع، ومحمد بن مسلم حسن الحديث، وقد توبع أيضًا. طاووس: هو ابن كَيسان اليماني.وأخرجه ابن ماجه (1847) من طريق سعيد بن سليمان الواسطي، عن محمد بن مسلم الطائفي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن جُميع الصيداوي في "معجم الشيوخ" ص 243 - 244 الترجمة (200)، وأبو يعلى الخليلي في "الإرشاد" 2/ 653 و 3/ 947 من طريق عبد الصمد بن حسان المَرْوَرُّوذي، والبزار (4857)، والخليلي 3/ 947 من طريق مؤمَّل بن إسماعيل، كلاهما عن سفيان الثَّوري، عن إبراهيم بن ميسرة، به. وجاء اسم سفيان في إسناد البزار مقيدًا بابن عيينة، وهو خطأ تصويبه من كلام البزار بإثر الحديث. وإسناد عبد الصمد قوي.



[2] هذا وهمٌ من المصنف، بل إنهما روياه عن إبراهيم بن ميسرة عن طاووس مرسلًا عن النبي صلى الله عليه وسلم، لم يذكرا فيه ابنَ عباس. أما رواية سفيان بن عيينة فأخرجها سعيد بن منصور (492)، وأبو يعلى في "مسنده" (2747)، والعقيلي في "الضعفاء" (1645). ورجّح العقيلي هذه الرواية المرسلة.وأما رواية معمر فأخرجها عبد الرزاق (10319) و (10377)، وقرن به في الموضع الثاني ابنَ جُرَيج.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2711)


2711 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد، حدثنا ابن عَجْلان، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ثلاثةٌ حقٌّ على الله أن يُعِينَهم: المجاهدُ في سبيل الله، والناكحُ يريد أن يَستعِفَّ، والمكاتَبُ يريدُ الأداءَ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিনজন ব্যক্তিকে সাহায্য করা আল্লাহর দায়িত্ব: আল্লাহর রাস্তায় জিহাদকারী, যে বিবাহকারী যে চারিত্রিক পবিত্রতা অর্জন করতে চায় এবং সেই চুক্তিবদ্ধ দাস যে তার মুক্তির মূল্য পরিশোধ করতে চায়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي، ابن عجلان - وهو محمد - صدوق لا بأس به. سعيد بن أبي سعيد: هو المقبُري، ويحيى بن سعيد: هو القطّان، ويحيى بن محمد بن يحيى: هو الذُّهْلي.وأخرجه أحمد 12/ (7416) عن يحيى بن سعيد، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (2518) من طرق، والترمذي (1655)، والنسائي (4313) و (4995) من طرق عن محمد بن عجلان، به. وقال الترمذي: حديث حسن.وسيأتي برقم (2895) من طريق معاذ بن المثنى عن مُسدَّد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2712)


2712 - حدثنا عليّ بن عيسى بن إبراهيم، حدثنا الحُسين بن محمد بن زياد، حدثنا أبو السائب سَلْم بن جُنَادة، حدثنا أبو أسامة، حدثنا هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تَزوَّجُوا النساء، فإنهن يأتينَكُم بالمالِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه لتفرُّد سَلْم بن جُنادة بسنده، وسَلْم ثقةٌ مأمونٌ.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মহিলাদেরকে বিবাহ করো, কেননা তারা তোমাদের জন্য সম্পদ নিয়ে আসে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات عن آخرهم، لكن انفرد بوصله أبو السائب سَلْم بنُ جُنادة، كما قال الحاكم، وخالفه غيره فجعلوه عن عروة مرسلًا، ورجَّحه البزار والدارقطني. على أنَّ أبا السائب نفسه قد رواه مرة أخرى مرسلًا.وأخرجه البزار (1402 - كشف الأستار)، وابن المقرئ في "معجمه" (260)، والدارقطني في "العلل" (3834)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 10/ 212 من طريق أبي السائب سلم بن جُنادة، بهذا الإسناد. وجاء عند الدارقطني والخطيب بإثر الرواية ما نصُّه: قال أبو السائب سَلْم بن جُنادة في موضع آخر: عن هشام عن أبيه، وليس فيه عن عائشة.وأخرجه ابنُ أبي شيبة 74/ 127 عن أبي أسامة حماد بن أسامة، وأبو داود في "المراسيل" (203) عن أبي توبة الربيع بن نافع، عن أبي أسامة، به مرسلًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2713)


2713 - أخبرنا محمّد بن علي بن دُحَيم الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزَة، حدثنا خالد بن مَخْلد، حدثني محمد بن موسى، عن سعد بن إسحاق ابن كعب بن عُجْرة، عن عمّته، قالت: حدثني أبو سعيد الخُدْري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تُنكَحُ المرأةُ على إحدى خِصالٍ ثلاثٍ: تُنكَح المرأةُ على جَمالِها، وتُنكَح المرأة على دِينها وخُلُقها، فعليكَ بذات الدِّين تَرِبَتْ يَمينُك" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه الزيادة [2].




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নারীকে তিনটি বৈশিষ্ট্যের মধ্যে যেকোনো একটির জন্য বিবাহ করা হয়: নারীকে তার সৌন্দর্যের কারণে বিবাহ করা হয়, এবং নারীকে তার দীন (ধর্ম) ও চরিত্রের কারণে বিবাহ করা হয়। সুতরাং, তুমি দীনদার (ধার্মিক) নারীকে বেছে নাও, তুমি সাফল্য লাভ করো।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن، خالد بن مخلد - وهو القَطَواني - صدوق، وقد توبع، وعمّة سعد: هي زينب بنت كعب بن عجرة، زوجة أبي سعيد الخدري، روى عنها ابنا أخويها، وذكرها ابن حبان في "الثقات". محمد بن موسى: هو الفِطْري.وأخرجه أحمد 18/ (11765) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن محمد بن موسى، بهذا الإسناد. وزاد فيه ذكر المال.



[2] يعني زيادة ذكر الخُلُق، وذلك أنَّ هذا الحديث رواه أيضًا أبو هريرة عند البخاري (5090)، ومسلم (1466) وغيرهما، وكذلك رواه جابر بن عبد الله عند مسلم (1466) (54) وغيره، بذكر الدّين دون الخُلُق. وزادا فيه خصلة رابعة: وهي الحَسَب؛ يعني شرف نسبها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2714)


2714 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عيسى بن زيد اللَّخْمي بتِنِّيس، حدثنا عمرو بن أبي سلمة التِّنِّيسي، حدثنا زهير بن محمد، أخبرني عبد الرحمن بن زيد، عن أنس بن مالك، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من رزقَه اللهُ امرأةً صالحةً، فقد أعانَه على شَطْرِ دينِه، فليتَّقِ اللهَ في الشَّطْر الباقي" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وعبد الرحمن هذا: هو ابن زيد بن عُقبة الأزرق، مدني ثقة مأمون.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ যাকে নেককার স্ত্রী দান করেছেন, তিনি যেন তার দীনের অর্ধেকের উপর সাহায্য পেয়েছেন। অতএব, বাকি অর্ধেকের ব্যাপারে সে যেন আল্লাহকে ভয় করে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف أحمد بن عيسى بن زيد، ولأنَّ زهير بن محمد - وهو التميمي - رواية أهل الشام عنه غير مستقيمة، والراوي عنه هنا شامي.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (5101) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (972) من طريق عمرو بن أبي سلمة، به.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (7647)، والخطيب في "تلخيص المتشابه" 1/ 63 - 64، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (2457) من طريق خالد العبدي، والطبراني في "الأوسط" (8794)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (5100) من طريق الخليل بن مرة، وكلاهما عن يزيد بن أبان الرقاشي، عن أنس بن مالك وخالد متروك والخليل ويزيد الرقاشي ضعيفان، وقد تحرَّف اسم خالد عند الطبراني إلى: جابر، والظاهر أنه تحريف قديم، لأنَّ الهيثمي قيَّده في "المجمع" 4/ 252 بقوله: جابر الجعفي، وعلى فرض كونه جابرًا الجعفي فهو ضعيف أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2715)


2715 - أخبرني أبو الحُسين محمدُ بن أحمد بن تَميم الحنْظَلِي ببغداد، حدثنا عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي، حدثنا أبو عاصم، حدثنا ابن عَجْلان، عن سعيد بن أبي سعيد المَقبُري، عن أبي هريرة قال: سئل النبيُّ صلى الله عليه وسلم: أيُّ النساء خيرٌ؟ فقال: "خيرُ النساء مَن تَسُرُّ إذا نَظَر، وتُطيعُ إِذا أمَر، ولا تُخالِفُه في نفسِها ومالِها" [1].




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হলো, সর্বোত্তম স্ত্রীলোক (বা নারী) কে? তিনি বললেন: সর্বোত্তম নারী সে, যে তাকে দেখলে আনন্দিত করে, যখন সে নির্দেশ দেয় তখন সে তার আনুগত্য করে এবং তার নিজের (সত্তার) ক্ষেত্রে ও তার (স্বামীর) সম্পদের ক্ষেত্রে সে তার বিরোধিতা করে না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد حسن من أجل أبي الحسين محمد بن أحمد بن تَميم، وقد توبع في الإسناد التالي. أبو عاصم: هو الضحاك بن مَخلَد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2716)


2716 - حدَّثَناه أبو بكر بنُ إسحاق الفقيه، أخبرنا عُبيد بن شَريك، حدثنا الليث بن سعد.وحدثنا أبو بكر، أخبرنا أبو المثنّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد؛ كلاهما عن محمد بن عَجْلان، عن سعيد المقبُري، قال: سمعت أبا هريرة يُحدّث عن النبي صلى الله عليه وسلم، مثلَه [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل محمد بن عجلان. أبو المثنّى: هو معاذ بن المثنّى العَنْبَري، ويحيى بن سعيد: هو القطّان.وأخرجه النسائي (5324) عن قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 12/ (7421) عن يحيى القطان، والنسائي (8912) عن عمرو بن علي الفلّاس عن يحيى القطان، به. إلّا أنه قال في روايته: "وماله" بدل: "ومالها". وانظر "المحلى" لابن حزم 8/ 315 - 316.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2717)


2717 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن بُطّة الأصبَهاني، حدثنا عبد الله بن محمد بن زكريا الأصبَهاني، حدثنا محمد بن بُكير الحَضْرمي، حدثنا خالد بن عبد الله، حدثنا أبو إسحاق الشَّيباني، عن أبي بكر بن حَفْص، عن محمد بن سعد، عن أبيه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ثلاث من السَّعادة، وثلاث من الشَّقاوة، فمن السَّعادة: المرأةُ تراها تُعجِبُك، وتَغيبُ فتَأمنُها على نفسِها ومالِك، والدابةُ تكون وَطِيَّةً فتُلحِقُك بأصحابِك، والدارُ تكونُ واسعةً كثيرةَ المَرافقِ، ومن الشَّقاوة: المرأة تَراها فتَسوءُك، وتَحمِلُ لسانَها عليك، وإن غِبتَ عنها لم تأمنْها على نفسِها ومالِك، والدابةُ تكون قَطُوفا فإن ضربتَها أتعبَتكَ، وإن تركتَها لم تُلحِقْكَ بأصحابِك، والدارُ تكون ضيقةً قليلةَ المَرافق" [1].هذا حديث صحيح الإسناد مِن خالد بن عبد الله الواسطي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، تفرَّد به محمد بن بُكير عن خالد، إن كان حَفِظَه فإنه صحيح على شرط الشيخين.




সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তিনটি জিনিস হলো সৌভাগ্যের এবং তিনটি জিনিস হলো দুর্ভাগ্যের। সৌভাগ্যজনক জিনিসগুলো হলো: এমন স্ত্রী, যাকে দেখলে তোমার মন মুগ্ধ হয়, এবং তুমি অনুপস্থিত থাকলে তুমি তার নিজের উপর ও তোমার সম্পদের উপর তাকে বিশ্বস্ত মনে করো। আর এমন আরোহী পশু যা বিনীত ও অনুগত, ফলে সে তোমাকে তোমার সঙ্গীদের সাথে মিলিয়ে দেয়। আর এমন ঘর যা প্রশস্ত এবং তার সুযোগ-সুবিধা অনেক। আর দুর্ভাগ্যের জিনিসগুলো হলো: এমন স্ত্রী, যাকে দেখলে তোমার খারাপ লাগে, এবং সে তার জিভ তোমার বিরুদ্ধে ব্যবহার করে, আর তুমি তার থেকে অনুপস্থিত থাকলে তার নিজের উপর ও তোমার সম্পদের উপর তুমি তাকে বিশ্বস্ত মনে করো না। আর এমন আরোহী পশু যা খুঁড়িয়ে চলে (বা মন্দ গতিসম্পন্ন), তুমি তাকে প্রহার করলে সে তোমাকে ক্লান্ত করে দেয়, আর তুমি তাকে ছেড়ে দিলে সে তোমাকে তোমার সঙ্গীদের সাথে মিলিয়ে দেয় না। আর এমন ঘর যা সংকীর্ণ এবং তার সুবিধাগুলো কম।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل محمد بن بُكير الحضرمي، فهو صدوق لا بأس به. خالد بن عبد الله: هو الواسطي، وأبو إسحاق الشَّيباني: هو سليمان بن أبي سليمان فيروز، وأبو بكر بن حفص: كذا وقع مسمًّى هنا، وهو وهمٌ، صوابه: أبو بكر بن أبي موسى، وهو الأشعري، كما وقع مسمًّى عند ابن المنذر والبزار، وسعد: هو ابن أبي وقاص.وأخرجه ابن المنذر في "الأوسط" (7123) عن محمد بن إسماعيل الصائغ، عن محمد بن بُكير، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (1187) من طريق عمرو بن عون، عن خالد بن عبد الله، به. مختصرًا بلفظ: "مِن السعادة المرأة الصالحة والمنزل الواسع والمركب الهنيء".وقد تقدم برقم (2672) من طريق إسماعيل بن محمد بن سعد عن أبيه، بنحوه مختصرًا.والقَطوف: البطيء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2718)


2718 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المَحْبُوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون أخبرنا المُستلِم بن سعيد، حدثنا منصور بن زاذان، عن معاويةَ بن قُرّة، عن مَعقِل بن يَسَار، قال: جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، إني أَصبتُ امرأةً ذاتَ حَسَبٍ ومَنصِبٍ ومالٍ، إلّا أنها لا تَلِدُ، أفأتزوّجُها؟ فنهاهُ، ثم أتاه الثانيةَ، فقال له مثلَ ذلك، فنهاهُ، ثم أتاه الثالثةَ، فقال له مثلَ ذلك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تزوّجُوا الوَدُودَ الولُودَ، فإني مُكاثِرٌ بكم الأُممَ" [1].هذا حديث صحيح [2] الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السياقة.




মা’কিল ইবনু ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি এক সম্ভ্রান্ত বংশীয়, মর্যাদাসম্পন্ন ও সম্পদশালিনী নারীর সন্ধান পেয়েছি, কিন্তু সে বন্ধ্যা (সন্তান জন্ম দিতে পারে না)। আমি কি তাকে বিবাহ করব?" তিনি তাকে নিষেধ করলেন। লোকটি দ্বিতীয়বার তাঁর কাছে এসে একই কথা জিজ্ঞেস করল। তিনি আবারও তাকে নিষেধ করলেন। লোকটি তৃতীয়বার তাঁর কাছে এসে একই কথা জিজ্ঞেস করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা অধিক প্রেমময়ী ও অধিক সন্তান জন্মদানকারিনী নারীকে বিবাহ করো। কেননা আমি তোমাদের দ্বারা অন্যান্য উম্মতদের ওপর সংখ্যাধিক্যের গৌরব করব।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل المُستلِم بن سعيد، فهو صدوق لا بأس به.وأخرجه أبو داود (2050)، والنسائي (5323) من طريقين عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. ضعيف لضعف الحارث بن عمران، وقد تابعه غير واحدٍ، كما بيَّنّاه مفصَّلًا في "سنن ابن ماجه".فقد أخرجه ابن ماجه (1968) عن عبد الله بن سعيد الكندي، بهذا الإسناد.وأمثَلُ متابعاته ما أخرجه ابن أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (130)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 15/ 84 من طريقين عن أبي النضر إسحاق بن إبراهيم الدمشقي، عن الحكم بن هشام، عن هشام بن عروة.وانظر ما بعده.



[2] وقع في (ز) و (ص) و (ع) مكان كلمة "صحيح" بياضٌ، ثم أُلحق في (ص) في موضع البياض بخطٍّ مغاير متأخر لفظة "صحيح"، وثبتت في (ب)، وقد نقل المنذري في "الترغيب والترهيب" أنَّ الحاكم قال: صحيح الإسناد، وكذلك نقل نصَّه ابنُ المُلقِّن في "البدر المنير" 7/ 496، ولذلك أثبتناه. ضعيف لضعف الحارث بن عمران، وقد تابعه غير واحدٍ، كما بيَّنّاه مفصَّلًا في "سنن ابن ماجه".فقد أخرجه ابن ماجه (1968) عن عبد الله بن سعيد الكندي، بهذا الإسناد.وأمثَلُ متابعاته ما أخرجه ابن أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (130)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 15/ 84 من طريقين عن أبي النضر إسحاق بن إبراهيم الدمشقي، عن الحكم بن هشام، عن هشام بن عروة.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2719)


2719 - أخبرني الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني هارون بن معروف، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني سعيدُ بنُ عبد الرحمن الجُمَحي، أنَّ محمد بن عمر بن علي بن أبي طالب حدثه عن أبيه، عن جده علي بن أبي طالب، أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال: "ثلاثٌ يا عليُّ لا تُؤخِّرُهُنَّ: الصلاةَ إذا أَتَتْ، والجِنازةَ إذا حَضَرتْ، والأيِّمَ إذا وَجَدَت كُفْؤًا" [1].هذا حديث غريب صحيح، ولم يُخرجاه.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আলী! তিনটি কাজ দেরি করা উচিত নয়: সালাতের (নামাযের) সময় যখন আসে, জানাযা যখন উপস্থিত হয়, এবং বিধবা বা তালাকপ্রাপ্তা (আইয়্যিম) নারী যখন তার জন্য উপযুক্ত পাত্র (কুফউ) পায়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة سعيد: وهو ابن عبد الله الجهني، وليس ابن عبد الرحمن الجمحي كما وقع في إسناد الحاكم، قال الحافظ ابن حجر في "التلخيص" 1/ 186: هو من أغلاط الحاكم الفاحشة. قلنا: لأنَّ الجمحي معروف وهو قاضي بغداد في عسكر المهدي زمن الرشيد، وقوّاهُ أحمد وابن معين وغيرهما، والجهني لا يُعرف.وهو على الصواب في زوائد عبد الله بن أحمد بن حنبل على "المسند" لأبيه 2/ (828).وأخرجه الترمذي (171) و (1075) عن قتيبة بن سعيد، عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.والأيّم: من لا زوج له رجلًا كان أو امرأةً، ثيِّبًا كان أو بِكْرًا. ضعيف لضعف الحارث بن عمران، وقد تابعه غير واحدٍ، كما بيَّنّاه مفصَّلًا في "سنن ابن ماجه".فقد أخرجه ابن ماجه (1968) عن عبد الله بن سعيد الكندي، بهذا الإسناد.وأمثَلُ متابعاته ما أخرجه ابن أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (130)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 15/ 84 من طريقين عن أبي النضر إسحاق بن إبراهيم الدمشقي، عن الحكم بن هشام، عن هشام بن عروة.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2720)


2720 - حدثنا عليُّ بن عيسى، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا عبد الله بن سعيد الكِنْدي، حدثنا الحارث بن عمران الجَعفَري، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم "تخيَّروا لنُطَفِكُم، فَأَنكِحُوا الأَكْفاءَ، وانكِحُوا إليهم" [1]. تابعه عِكْرمة بن إبراهيم عن هشام بن عُرْوة:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের শুক্রের জন্য ভালো (পাত্র-পাত্রী) নির্বাচন করো, সুতরাং তোমরা সমকক্ষদের সাথে বিবাহ সম্পাদন করো এবং তাদের কাছেও (তোমরা) বিবাহ করো।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن إن شاء الله كما قال الحافظ ابن حجر في "التلخيص" 3/ 146، وهذا إسناد ضعيف لضعف الحارث بن عمران، وقد تابعه غير واحدٍ، كما بيَّنّاه مفصَّلًا في "سنن ابن ماجه".فقد أخرجه ابن ماجه (1968) عن عبد الله بن سعيد الكندي، بهذا الإسناد.وأمثَلُ متابعاته ما أخرجه ابن أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (130)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 15/ 84 من طريقين عن أبي النضر إسحاق بن إبراهيم الدمشقي، عن الحكم بن هشام، عن هشام بن عروة.وانظر ما بعده.