আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
2721 - حدَّثَناه علي بن عيسى، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا زياد بن أيوب، حدثنا عِكْرمة بن إبراهيم، عن هشام بن عُرْوة، فذكره بإسناده مثله [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
২৭১১ - আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আলী ইবনে ঈসা, তিনি বলেন, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনে আবী তালিব, তিনি বলেন, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন যিয়াদ ইবনে আইয়্যুব, তিনি বলেন, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন ইকরামা ইবনে ইবরাহীম, তিনি হিশাম ইবনে উরওয়াহ থেকে বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ এটি অনুরূপভাবে উল্লেখ করেছেন। এই হাদীসের সনদ সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি সংকলন করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن كسابقه، وهذا إسناد ضعيف لضعف عكرمة بن إبراهيم، لكن تابعه غيره كما سبق.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (131)، وأبو محمد المخلدي في "فوائده" (783)، والبيهقي 7/ 133 من طريق عكرمة بن إبراهيم، بهذا الإسناد.
2722 - حدثنا أبو بكر أحمد بن سلمان بن الحسن الفقيه الزاهد ببغداد، حدثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبْرِقان، حدثنا زيد بن الحُبَاب، حدثنا الحسين بن واقِد.وأخبرنا أبو العباس القاسم بن القاسم السَّيَّاري بمَرْو، حدثنا إبراهيم بن هلال، حدثنا علي بن الحسن بن شَقيق، أخبرنا الحسين بن واقِد، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ أحسابَ أهلِ الدنيا الذي يَذهبُون إليه لَهذا المالُ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
বুরায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই দুনিয়াবাসীর সেই মান-মর্যাদা, যার পিছনে তারা ছুটে, তা হলো এই সম্পদ।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل الحسين بن واقد، فهو صدوق لا بأس به.وأخرجه أحمد 38/ (22990) عن زيد بن الحُباب، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا (23059) عن علي بن الحسن بن شقيق، به.وأخرجه النسائي (5316) من طريق أبي تُميلة يحيى بن واضح، عن الحسين بن واقد، به.
2723 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبيد الله بن أبي داود المُنادي، حدثنا يونس بن محمد المؤدِّب، حدثنا سلَّام بن أبي مُطيع، عن قَتَادة، عن الحسن، عن سَمُرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الحَسَبُ المالُ، والكَرَمُ التقوى" [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.
সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "উচ্চ বংশমর্যাদা হলো সম্পদ, আর মহত্ত্ব (বা সম্মান) হলো তাকওয়া (আল্লাহভীতি)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، والحسن - وهو البصري - سماعه من سمرة صحيح كما بيّنّاه في تعليقنا على الحديث (151).وأخرجه أحمد 33/ (20102) عن يونس بن محمد بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (4219)، والترمذي (3271) من طريقين عن يونس بن محمد، به. وقال الترمذي: حسن صحيح غريب.ويشهد له ما قبله.وسيتكرر الحديث بإسناده ومتنه برقم (8120).
2724 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحَسن بن علي بن زياد، حدثنا إبراهيم بن موسى الفرّاء، حدثنا مسلم بن خالد، حدثنا العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كَرَمُ المؤمن دينُه، ومُروءتُه عقلُه، وحَسَبُه خُلُقُه" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুমিনের সম্মান তার দীন, তার ব্যক্তিত্ব তার বুদ্ধি এবং তার বংশমর্যাদা তার চরিত্র।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، وقد سلف برقم (430) من طريقين عن مسلم بن خالد الزنجي.وأخرجه البيهقي في "الشعب" (4335) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر بن زياد النيسابوري في "زياداته على مختصر المزني" (391) من طريق محمد بن يحيى الذهلي، عن إبراهيم بن موسى، به.
2725 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا هاشم بن يونس العَصّار بمصر، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني الليث، حدثني عبد الرحمن ابن خالد - هو ابن مُسافِر - عن ابن شِهاب، عن عُرْوة بن الزُّبَير وعَمْرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة: أنَّ أبا حذيفة بن عُتْبة بن ربيعة بن عبد شمس - وكان ممَّن شهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم تبنَّى سالمًا وأنكَحَه ابنةَ أخيه هندَ بنت الوليد بن عُتبة بن ربيعة بن عبد شمس - وكان ممَّن شهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم [1] وهو مولًى لامرأة من الأنصار، فتبنّاهُ كما تبنَّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم زيدًا، فكان من تبنّى رجلًا في الجاهلية، دعاه الناس إليه، ووَرِثَ من ميراثه، حتى أنزل الله في ذلك: {ادْعُوهُمْ لِآبَائِهِمْ هُوَ أَقْسَطُ عِنْدَ اللَّهِ فَإِنْ لَمْ تَعْلَمُوا آبَاءَهُمْ فَإِخْوَانُكُمْ فِي الدِّينِ وَمَوَالِيكُمْ} [الأحزاب: 5]، فرُدُّوا إلى آبائهم، فمن لم يُعلَم له أبٌ، كان مولاهُ أو أخاهُ في الدِّين.قالت عائشة: وإِنَّ سَهْلة بنت سُهيل بن عمرو القرشي ثم العامري - وكانت تحت أبي حذيفة بن عُتبة بن ربيعة - جاءت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم حين أنزل الله ذلك، فقالت: يا رسول الله، إنا كنا نَرى سالمًا ولدًا - وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم قد آواه، فكان يأوي معه ومع أبي حذيفة في بيت واحد - ويَراني وأنا فُضُلٌ، وقد أُنزِلَ فيهم ما قد علمتَ، فما ترى في شأنه يا رسولَ الله؟ فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أرضِعيهِ"، فأرضعته خمسَ رَضَعات، فحَرُم بهنّ، وكان بمنزلة ولدِها من الرَّضاعة [2]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه، وفيه أنَّ الشَّريفة تَزوَّجُ من كل مسلم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আবু হুযাইফা ইবনু উৎবাহ ইবনু রাবী'আহ ইবনু আব্দ শামস (যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন) সালিমকে পালক পুত্র বানিয়েছিলেন এবং তার সাথে তার আপন ভাতিজি হিন্দ বিনতু আল-ওয়ালীদ ইবনু উৎবাহ ইবনু রাবী'আহ ইবনু আব্দ শামসের বিবাহ দিয়েছিলেন। (সালিম ছিলেন আনসারী এক মহিলার আযাদকৃত গোলাম।) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেমন যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পালক পুত্র বানিয়েছিলেন, তেমনি তিনি (আবু হুযাইফা) সালিমকে পালক পুত্র বানিয়েছিলেন।
জাহিলিয়্যাতের যুগে, যে কেউ কোনো ব্যক্তিকে পালক পুত্র বানালে, লোকেরা তাকে ঐ পালক পিতার নামে ডাকতো এবং সে তার মীরাসের অংশ পেত। শেষ পর্যন্ত আল্লাহ তা'আলা এ প্রসঙ্গে এই আয়াত অবতীর্ণ করেন: “তোমরা তাদেরকে তাদের পিতাদের নামে ডাকো; এটাই আল্লাহর কাছে অধিক ইনসাফপূর্ণ। যদি তোমরা তাদের পিতাদেরকে না জানো, তবে তারা তোমাদের দ্বীনি ভাই এবং আযাদকৃত দাস-দাসী।” [সূরা আহযাব: ৫]
অতঃপর (ঐ আয়াত দ্বারা) তাদেরকে তাদের পিতাদের দিকে ফিরিয়ে দেওয়া হলো। যাদের পিতার পরিচয় জানা যেতো না, তারা দ্বীনের ক্ষেত্রে তার আযাদকৃত গোলাম বা ভাই হিসেবে গণ্য হতো।
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সুহাইল ইবনু আমর আল-কুরাশী আল-আমিরীর কন্যা সাহলা (তিনি আবু হুযাইফা ইবনু উৎবাহ ইবনু রাবী'আহর স্ত্রী ছিলেন) যখন আল্লাহ তা’আলা এই আয়াত নাযিল করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, “হে আল্লাহর রাসূল, আমরা সালিমকে সন্তানের মতোই মনে করতাম। (রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে আশ্রয় দিয়েছিলেন এবং সে তাঁর ও আবু হুযাইফার সাথে একই ঘরে থাকতো)। সে আমাকে সামান্য পোশাকে দেখতো। আর তাদের (পালক সন্তানদের) ব্যাপারে তো আপনি যা জানেন, তা নাযিল হয়ে গেছে। হে আল্লাহর রাসূল, আপনি এখন তার বিষয়ে কী মনে করেন?”
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন, “তাকে দুধ পান করাও।”
অতঃপর তিনি তাকে পাঁচবার দুধ পান করালেন। এর ফলে সে হারাম (মাহরাম) হয়ে গেল এবং দুধপানের মাধ্যমে সে তার সন্তানের মর্যাদায় আসলো।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] قوله: "وكان ممّن شهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم" في المرة الثانية في حق سالم، لأنه قد شهد بدرًا مع أبي حذيفة. من طريق شعيب بن أبي حمزة، وأبو داود (2061) من طريق يونس بن يزيد، والنسائي (5426) من طريق جعفر بن ربيعة، و (5315) من طريق يحيى بن سعيد الأنصاري، سبعتهم عن الزُّهْري، عن عروة، عن عائشة. وقرن يحيى بعروة رجلًا آخر هو ابن عبد الله بن أبي ربيعة، وقرن أيضًا بعائشة أم سلمة. وبعضهم يزيد فيه على بعض.وقد اختُلف فيه على يحيى بن سعيد الأنصاري على غير ما وجه، هذا أحدها.وسيأتي الحديث مختصرًا برقم (7076) من طريق يحيى بن سعيد الأنصاري، عن عمرة، عن سهلة امرأة أبي حذيفة.وبرقم (7077) من طريق يحيى الأنصاري وربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن القاسم، عن عائشة.وبرقم (5072) من طريق يحيى الأنصاري، عن عمرة: أنَّ امرأة أبي حذيفة ذكرت، هكذا رواه مرسلًا.وبرقم (5072) من طريق يحيى الأنصاري، عن عمرة، عن عائشة، لكن في الإسناد إليه سويد بن سعيد، وقد كبر فعَمِي فصار يتلقّن ما ليس من حديثه.وأخرجه مسلم (1453)، والنسائي (5455) من طريق زينب بنت أم سلمة، عن عائشة، بنحوه. قولها: وأنا فُضُل، بضم الفاء والضاد، أي: مُتبذِّلة في ثياب المَهنة.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن صالح، وقد ذكر الذهلي في "الزُّهْريات" - فيما نقله عنه الحافظ ابن حجر في "الفتح" 15/ 264 - أن ذكر عمرة غير محفوظ في إسناده.وأخرجه الطبراني 24/ (741) عن مطلب بن شعيب، عن عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (4000) من طريق الليث بن سعد، عن عقيل بن خالد، عن الزُّهْري، عن عروة وحده، عن عائشة. ولم يسُق لفظَه بتمامه.وكذلك أخرجه أحمد 42/ (25650) من طريق ابن جُرَيج، و 43/ (26179) من طريق مالك، و 43/ (26330) من طريق ابن أخي الزُّهْري، والبخاري (5088)، والنسائي (5312) و (5314) من طريق شعيب بن أبي حمزة، وأبو داود (2061) من طريق يونس بن يزيد، والنسائي (5426) من طريق جعفر بن ربيعة، و (5315) من طريق يحيى بن سعيد الأنصاري، سبعتهم عن الزُّهْري، عن عروة، عن عائشة. وقرن يحيى بعروة رجلًا آخر هو ابن عبد الله بن أبي ربيعة، وقرن أيضًا بعائشة أم سلمة. وبعضهم يزيد فيه على بعض.وقد اختُلف فيه على يحيى بن سعيد الأنصاري على غير ما وجه، هذا أحدها.وسيأتي الحديث مختصرًا برقم (7076) من طريق يحيى بن سعيد الأنصاري، عن عمرة، عن سهلة امرأة أبي حذيفة.وبرقم (7077) من طريق يحيى الأنصاري وربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن القاسم، عن عائشة.وبرقم (5072) من طريق يحيى الأنصاري، عن عمرة: أنَّ امرأة أبي حذيفة ذكرت، هكذا رواه مرسلًا.وبرقم (5072) من طريق يحيى الأنصاري، عن عمرة، عن عائشة، لكن في الإسناد إليه سويد بن سعيد، وقد كبر فعَمِي فصار يتلقّن ما ليس من حديثه.وأخرجه مسلم (1453)، والنسائي (5455) من طريق زينب بنت أم سلمة، عن عائشة، بنحوه. قولها: وأنا فُضُل، بضم الفاء والضاد، أي: مُتبذِّلة في ثياب المَهنة.
2726 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا أَسَد بن موسى، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: يا بني بَيَاضةَ، أَنكِحُوا أبا هندٍ وانكِحُوا إليه". قال: وكان حجّامًا [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “হে বনু বায়াযা! তোমরা আবু হিন্দের সাথে (তোমাদের নারীদের) বিবাহ দাও এবং তাদের থেকেও (তোমাদের পুরুষদের জন্য পাত্রী) গ্রহণ করো।” তিনি ছিলেন শিঙ্গা লাগানেওয়ালা (রক্তমোক্ষণকারী/হাজ্জাম)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة الليثي.وأخرجه ابن حبان (4067) عن ابن خزيمة، عن الربيع بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (2102) عن عبد الواحد بن غياث، وابن حبان (6078) من طريق عبد الأعلى بن حماد، كلاهما عن حماد بن سلمة، به.
2727 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ وإبراهيم بن عِصْمة بن إبراهيم، قالا: حدثنا السَّرِيّ بن خُزيمة، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، عن أبي مَرحُوم، عن سهل بن معاذ - وهو ابن أنس الجُهَني - عن أبيه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن أعطى لله، ومَنَع لله، وأحبَّ لله، وأبغَضَ لله، وأنكَحَ لله، فقد استَكمَل إيمانَهُ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
মু‘আয ইবনে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর জন্য দান করল, আল্লাহর জন্য বারণ (বিরত) থাকল, আল্লাহর জন্য ভালোবাসল, আল্লাহর জন্য ঘৃণা করল এবং আল্লাহর জন্য বিবাহ দিল, সে তার ঈমানকে পূর্ণ করল।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره دون قوله: "وأنكح لله"، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل أبي مرحوم: وهو عبد الرحيم بن ميمون.وأخرجه الترمذي (2521) عن عباس بن محمد الدُّوري، عن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد.وقد اختلفت نسخ الترمذي في حكمه فيه، ففي بعضها قال: حديث حسن، وفي بعضها الآخر: حديث منكر، والأصح ما قال فيه: حسن فإنَّ الترمذي قد مشى على تحسين حديثه في عدة مواضع من "جامعه" بالإسناد نفسه الذي روى به هذا الحديث.ويشهد له دون ذكر الإنكاح حديث أبي أمامة عند أبي داود (4681)، وإسناده حسن. ولا ابنُ القطان في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 206، ولا المزي في "تحفة الأشراف" (15485)، وكان قد فاتنا نحن أيضًا في تحقيقنا للترمذي (1109) في طبعة دار الرسالة العالمية، وتصويب هذا التحريف من "علل الترمذي الكبير" (263)، ومن مصادر تخريج الحديث كما سيأتي.وقد خالف محمدَ بنَ عجلان فيه حاتمُ بن إسماعيل عند الترمذي كما سيأتي، فرواه عن عبد الله بن هرمز، عن سعيد ومحمد ابني عبيد، عن أبي حاتم المزني. وسعيد ومحمد ابنا عبيد مجهولان، وعبد الله بن هرمز هذا نُسب في روايةٍ: الفَدَكي، وفي أخرى: اليماني، وقيل: إنه عبد الله بن مسلم بن هرمز المكي، فإن يكن هو فهو ضعيف الحديث، وإلّا فهو مجهول.وقوله في إسناد الحاكم: وثيمة، خطأ، صوابه: ابن وثيمة، وهو زُفَر بن وثيمة.وكنا قد حسَّنا هذا الحديث في عملنا على الترمذي وابن ماجه، اغترارًا بطريق أبي حاتم المزني، وقد ظهر لنا أنها وجه من وجوه الاختلاف في إسناد حديثنا هذا، فيُستدرك من هنا.وأخرجه ابن ماجه (1967) عن محمد بن عبد الله بن سابُور الرَّقِّي، والترمذي (1084) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن عبد الحميد بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه سعيد بن منصور (590) عن عبد العزيز بن محمد الدَّرَاوَرْدي، وأبو داود في "المراسيل" (225) عن قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، كلاهما (الدراوردي والليث) عن محمد بن عجلان، عن عبد الله بن هرمز اليماني مرسلًا.وأخرجه الترمذي (1085) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن عبد الله بن هرمز، عن محمد وسعيد ابني عبيد، عن أبي حاتم المزني. ووقع في أصولنا في "جامع الترمذي" (1110): عبد الله بن مسلم بن هرمز، بدل: عبد الله بن هرمز، وخطّأ ذلك المزيُّ في "التحفة"، لكن عدَّه ابن حجر في "التقريب" رجلًا واحدًا، وأنه نُسب في هذه الرواية لجده، وجزم بذلك قبله عبدُ الحق الإشبيلي فيما نقله عنه ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 204 - 205 ووافقه.
2728 - أخبرني عبد الله بن الحسين القاضي، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا عبد الحميد بن سليمان، حدثنا محمد بن عَجْلان، عن وَثِيمة النَّصْري [1]، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا أتاكُم مَن تَرْضَوْنَ خُلُقَه ودِينَه، فأنكِحُوه، إلّا تفعَلُوا تَكُن فتنةٌ في الأرض وفَسادٌ عَريضٌ" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের নিকট এমন কেউ আসে যার চরিত্র ও দীনদারী তোমরা পছন্দ করো, তখন তোমরা তার সাথে [বিবাহ সম্পন্ন করো/বিবাহ দাও]। যদি তোমরা তা না করো, তাহলে পৃথিবীতে চরম ফিতনা এবং ব্যাপক বিশৃঙ্খলা সৃষ্টি হবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] النصري، بالنون، نسبة إلى بني نصر بن معاوية بن هوازن. ولا ابنُ القطان في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 206، ولا المزي في "تحفة الأشراف" (15485)، وكان قد فاتنا نحن أيضًا في تحقيقنا للترمذي (1109) في طبعة دار الرسالة العالمية، وتصويب هذا التحريف من "علل الترمذي الكبير" (263)، ومن مصادر تخريج الحديث كما سيأتي.وقد خالف محمدَ بنَ عجلان فيه حاتمُ بن إسماعيل عند الترمذي كما سيأتي، فرواه عن عبد الله بن هرمز، عن سعيد ومحمد ابني عبيد، عن أبي حاتم المزني. وسعيد ومحمد ابنا عبيد مجهولان، وعبد الله بن هرمز هذا نُسب في روايةٍ: الفَدَكي، وفي أخرى: اليماني، وقيل: إنه عبد الله بن مسلم بن هرمز المكي، فإن يكن هو فهو ضعيف الحديث، وإلّا فهو مجهول.وقوله في إسناد الحاكم: وثيمة، خطأ، صوابه: ابن وثيمة، وهو زُفَر بن وثيمة.وكنا قد حسَّنا هذا الحديث في عملنا على الترمذي وابن ماجه، اغترارًا بطريق أبي حاتم المزني، وقد ظهر لنا أنها وجه من وجوه الاختلاف في إسناد حديثنا هذا، فيُستدرك من هنا.وأخرجه ابن ماجه (1967) عن محمد بن عبد الله بن سابُور الرَّقِّي، والترمذي (1084) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن عبد الحميد بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه سعيد بن منصور (590) عن عبد العزيز بن محمد الدَّرَاوَرْدي، وأبو داود في "المراسيل" (225) عن قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، كلاهما (الدراوردي والليث) عن محمد بن عجلان، عن عبد الله بن هرمز اليماني مرسلًا.وأخرجه الترمذي (1085) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن عبد الله بن هرمز، عن محمد وسعيد ابني عبيد، عن أبي حاتم المزني. ووقع في أصولنا في "جامع الترمذي" (1110): عبد الله بن مسلم بن هرمز، بدل: عبد الله بن هرمز، وخطّأ ذلك المزيُّ في "التحفة"، لكن عدَّه ابن حجر في "التقريب" رجلًا واحدًا، وأنه نُسب في هذه الرواية لجده، وجزم بذلك قبله عبدُ الحق الإشبيلي فيما نقله عنه ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 204 - 205 ووافقه.
[2] إسناده ضعيف لضعف عبد الحميد بن سليمان، فإنه - وإن حسَّن الرأيَ فيه أحمدُ والبخاريُّ - قد ضعَّفه غيرهما من أهل النقد، وقال البخاري: ربما يهم في الشيء. قلنا: وقد وهم في وصل هذا الحديث، فقد خالفه الليث بن سعد الحافظ الحجة وعبد العزيز بن محمد الدَّرَاوَرْدي، وهو قوي الحديث، فروياه عن محمد بن عجلان عن عبد الله بن هرمز مرسلًا، وذكر البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "جامعه" أنَّ المرسل هو الأشبه، بل خطّأ أبو داود في "المراسيل" بإثر (225) وصلَه جَزْمًا. وقد وقع في "جامع الترمذي" في رواية الليث: عن أبي هريرة، بدل: عبد الله بن هرمز، وهو تحريف قديم، لم يتفطّن له أبو علي الطُّوسي في "مستخرجه على الترمذي" (986)، ولا ابنُ القطان في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 206، ولا المزي في "تحفة الأشراف" (15485)، وكان قد فاتنا نحن أيضًا في تحقيقنا للترمذي (1109) في طبعة دار الرسالة العالمية، وتصويب هذا التحريف من "علل الترمذي الكبير" (263)، ومن مصادر تخريج الحديث كما سيأتي.وقد خالف محمدَ بنَ عجلان فيه حاتمُ بن إسماعيل عند الترمذي كما سيأتي، فرواه عن عبد الله بن هرمز، عن سعيد ومحمد ابني عبيد، عن أبي حاتم المزني. وسعيد ومحمد ابنا عبيد مجهولان، وعبد الله بن هرمز هذا نُسب في روايةٍ: الفَدَكي، وفي أخرى: اليماني، وقيل: إنه عبد الله بن مسلم بن هرمز المكي، فإن يكن هو فهو ضعيف الحديث، وإلّا فهو مجهول.وقوله في إسناد الحاكم: وثيمة، خطأ، صوابه: ابن وثيمة، وهو زُفَر بن وثيمة.وكنا قد حسَّنا هذا الحديث في عملنا على الترمذي وابن ماجه، اغترارًا بطريق أبي حاتم المزني، وقد ظهر لنا أنها وجه من وجوه الاختلاف في إسناد حديثنا هذا، فيُستدرك من هنا.وأخرجه ابن ماجه (1967) عن محمد بن عبد الله بن سابُور الرَّقِّي، والترمذي (1084) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن عبد الحميد بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه سعيد بن منصور (590) عن عبد العزيز بن محمد الدَّرَاوَرْدي، وأبو داود في "المراسيل" (225) عن قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، كلاهما (الدراوردي والليث) عن محمد بن عجلان، عن عبد الله بن هرمز اليماني مرسلًا.وأخرجه الترمذي (1085) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن عبد الله بن هرمز، عن محمد وسعيد ابني عبيد، عن أبي حاتم المزني. ووقع في أصولنا في "جامع الترمذي" (1110): عبد الله بن مسلم بن هرمز، بدل: عبد الله بن هرمز، وخطّأ ذلك المزيُّ في "التحفة"، لكن عدَّه ابن حجر في "التقريب" رجلًا واحدًا، وأنه نُسب في هذه الرواية لجده، وجزم بذلك قبله عبدُ الحق الإشبيلي فيما نقله عنه ابن القطان في "بيان الوهم والإيهام" 5/ 204 - 205 ووافقه.
2729 - أخبرني أبو بكر محمد بن عبد الله بن قريش، حدثنا الحسن بنُ سفيان، حدثنا محمد بن أبي بكر المُقدَّمي، أخبرني عُمَرُ بنُ علي بن مُقدَّم، حدثنا محمد بن إسحاق، عن داود بن الحُصين، عن واقِد بن عمرو بن معاذ، عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِذا خَطَبَ أحدُكم امرأةً، فإنِ استطاعَ أن يَنظُرَ إِلى بعضِ ما يَدعُو إلى نِكاحِها فليَفعَلْ"، فخطبتُ امرأةً من بني سُلَيم، فكنت أتخبّأُ لها في أُصولِ النخل، حتى رأيتُ منها ما دعاني إلى نِكاحها فتزوجتُها [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، وإنما أخرج مسلم في هذا الباب حديث يزيد بن كَيْسان عن أبي حازم [2] مختصرًا.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যখন কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেবে, যদি সে তার এমন কিছু দেখতে সক্ষম হয় যা তাকে বিবাহ করতে উদ্বুদ্ধ করে, তবে সে যেন তা করে।" (জাবির বললেন) অতঃপর আমি বনু সুলাইম গোত্রের এক নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দিলাম। আমি তার জন্য খেজুর গাছের গোড়ায় লুকিয়ে থাকতাম, অবশেষে আমি তার এমন কিছু দেখতে পেলাম যা আমাকে তাকে বিবাহ করতে উদ্বুদ্ধ করল। তারপর আমি তাকে বিবাহ করলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المرفوع منه صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن، وقد صرَّح محمد بن إسحاق بسماعه من داود بن الحصين عند أحمد (14869).وأخرجه أحمد 22/ (14586)، وأبو داود (2082) من طريق عبد الواحد بن زياد، وأحمد 23/ (14869) من طريق إبراهيم بن سعد، كلاهما عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.وقوله في رواية الحاكم: امرأة من بني سُليم، وهمٌ، صوابه: امرأة من بني سَلِمة، كذلك جاء في رواية غير الحاكم، وكذلك جاء في رواية البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 84 من طريق أحمد بن خالد الوهبي عن محمد بن إسحاق.ويشهد له حديث أنس بن مالك الذي بعده.وحديث أبي هريرة عند مسلم (1424) وغيره.وانظر تمام شواهده في "سنن أبي داود" بتحقيقنا. وأخرجه ابن ماجه (1866) من طريق عبد الرزاق، عن معمر، عن ثابت، وأحمد 30/ (18137)، والترمذي (1087)، والنسائي (5328) من طريق عاصم الأحول، كلاهما (ثابت وعاصم) عن بكر بن عبد الله المزني، عن المغيرة بن شعبة، قال: خطبتُ … فذكر الحديث. وهذا إسناد صحيح إن صحَّ سماع بكر من المغيرة، فقد نفاه ابن معين، وأثبته الدارقطني في "العلل" (1260). وقال الترمذي: حديث حسن.ويشهد له ما قبله.
[2] يعني عن أبي هريرة، برقم (1424). وأخرجه ابن ماجه (1866) من طريق عبد الرزاق، عن معمر، عن ثابت، وأحمد 30/ (18137)، والترمذي (1087)، والنسائي (5328) من طريق عاصم الأحول، كلاهما (ثابت وعاصم) عن بكر بن عبد الله المزني، عن المغيرة بن شعبة، قال: خطبتُ … فذكر الحديث. وهذا إسناد صحيح إن صحَّ سماع بكر من المغيرة، فقد نفاه ابن معين، وأثبته الدارقطني في "العلل" (1260). وقال الترمذي: حديث حسن.ويشهد له ما قبله.
2730 - حدثني علي بن حَمْشاذَ العَدْل وأحمد بن جعفر القَطِيعي، قالا: حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن ثابت، عن أنس: أنَّ المغيرة بن شعبة خطب امرأةً، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اذهب فانظُرْ إليها، فإنه أحْرَى أن يُؤدَمَ [1] بينكما"، قال: فذهب فنَظَر إليها، فذكر من مُوافَقَتِها [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুগীরা ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একজন মহিলাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি যাও এবং তাকে দেখে নাও, কারণ এটা তোমাদের উভয়ের মধ্যে মিল বা আন্তরিকতা সৃষ্টিতে অধিক কার্যকর হবে।" মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অতঃপর তিনি গেলেন এবং তাকে দেখলেন, এবং তিনি তার উপযুক্ততা সম্পর্কে জানালেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في (ز): يدوم، وصُحِّح عليها، والمثبت من (ص) و (ب) و (ع)، وهو الموافق لرواية جميع من خرَّجه من طريق عبد الرزاق. وأخرجه ابن ماجه (1866) من طريق عبد الرزاق، عن معمر، عن ثابت، وأحمد 30/ (18137)، والترمذي (1087)، والنسائي (5328) من طريق عاصم الأحول، كلاهما (ثابت وعاصم) عن بكر بن عبد الله المزني، عن المغيرة بن شعبة، قال: خطبتُ … فذكر الحديث. وهذا إسناد صحيح إن صحَّ سماع بكر من المغيرة، فقد نفاه ابن معين، وأثبته الدارقطني في "العلل" (1260). وقال الترمذي: حديث حسن.ويشهد له ما قبله.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات إلّا أنَّ بعض أهل العلم قد ضعف رواية معمر - وهو ابن راشد - عن ثابت - وهو ابن أسلم - وقال الدارقطني: الصواب عن ثابت عن بكر. قلنا: يعني بكر بن عبد الله المزني، عن المغيرة بن شعبة من حديثه.وأخرجه ابن ماجه (1865) عن الحسن بن علي الخلّال وزهير بن محمد ومحمد بن عبد الملك، ثلاثتهم عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن ماجه (1866) من طريق عبد الرزاق، عن معمر، عن ثابت، وأحمد 30/ (18137)، والترمذي (1087)، والنسائي (5328) من طريق عاصم الأحول، كلاهما (ثابت وعاصم) عن بكر بن عبد الله المزني، عن المغيرة بن شعبة، قال: خطبتُ … فذكر الحديث. وهذا إسناد صحيح إن صحَّ سماع بكر من المغيرة، فقد نفاه ابن معين، وأثبته الدارقطني في "العلل" (1260). وقال الترمذي: حديث حسن.ويشهد له ما قبله.
2731 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني ابنُ شُريح، أنَّ الوليد بن أبي الوليد أخبره، أنَّ أيوب بن خالد بن أبي أيوب الأنصاري حدثه عن أبيه، عن جده، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "اكتُم الْخِطبةَ ثم توضأْ فأحسِنْ وُضوءَك، ثم صلِّ ما كَتَبَ الله تعالى لكَ، ثم احمَدْ ربك ومَجِّدْه، ثم قل: اللهمَّ إنك تَقدِرُ ولا أَقدِرُ، وتَعلمُ ولا أَعلمُ، وأنت عَلّامُ الغُيوب، فإن رأيتَ لي في فلانة - يُسمِّيها باسمِها - خيرًا لي في دِيني ودُنياي وآخرتي، فاقدُرْها لي، فإن كان غيرُها خيرًا لي في دِيني ودُنياي وآخرتي، فاقدُرْها لي" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা বিবাহের প্রস্তাব (খিতবা) গোপন রাখো। এরপর উযু করো এবং উত্তমভাবে উযু করো, অতঃপর আল্লাহ তোমার জন্য যা নির্ধারণ করে রেখেছেন, সেই পরিমাণ (নফল) সালাত আদায় করো। এরপর তোমার প্রতিপালকের প্রশংসা ও মহিমা বর্ণনা করো, অতঃপর বলো: 'হে আল্লাহ! নিশ্চয় তুমি সক্ষম, আমি সক্ষম নই; তুমি জানো, আমি জানি না; আর তুমিই তো অদৃশ্যের বিষয়ে সম্যক অবগত। অতএব, যদি তুমি অমুক মেয়ের মধ্যে (এখানে তার নাম উল্লেখ করবে) আমার দ্বীন, দুনিয়া ও আখেরাতের জন্য মঙ্গল দেখতে পাও, তাহলে তাকে আমার জন্য নির্ধারিত করে দাও। আর যদি সে ব্যতীত অন্য কেউ আমার দ্বীন, দুনিয়া ও আখেরাতের জন্য উত্তম হয়, তাহলে তাকেই আমার জন্য নির্ধারিত করে দাও।'"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد فيه لِين كما سلف بيانه برقم (1195). ابن وهب هو عبد الله، وابن شُريح: هو حيوة. مستقيم الحديث، وقد خالفه أبو داود في "المراسيل" (216) فرواه عن موسى بن إسماعيل، عن حماد، عن ثابت مرسلًا، واقتصر على أول الحديث إلى قوله: "عرقوبيها".لكن تابع هشامًا السِّيرافي على وصله محمدُ بن كثير المِصِّيصي عند ابن المنذر في "الأوسط" (7144) فرواه عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس. وذكره بطوله، ومحمد بن كثير حسن الحديث في المتابعات والشواهد.وكذلك رواه موصولًا عُمارة بن زاذان عن ثابت عن أنس، عند أحمد 21/ (13424)، وعمارة وإن كان له عن ثابت عن أنس مناكير، ليس هذا منها، لأنه توبع عليه.وفي الجملة فيشبه أن يكون ذكر أنس في إسناده هو المحفوظ، والله أعلم.والعوارض: الأسنان التي في عُرض الفم، وهي ما بين الثنايا والأضراس، واحدها: عارض.والعُرقوبان: مثنّى عُرقوب، وهو الوتر الذي خلف الكعبين فُويق العقب، قيل: أمرها بالنظر إليها لأنه إذا اسودَّ عرقوباها اسودَّ سائر جسدها. قاله ابن الأثير.وقال ابن الملقن في "البدر المنير" 7/ 59: أراد بالنظر إلى عرقوبيها حتى تكون ممتلئة الساقين.وقوله: افليني: من فَلْي الشعر وأخذ القمل منه.
2732 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا هشام بن علي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت، عن أنس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أراد أن يتزوج امرأةً، فبعث امرأةً لِتنظُرَ إليها، فقال: "شُمِّي عَوارِضَها، وانظُري إلى عُرقُوبَيها"، قال: فجاءت إليهم فقالوا: ألا نُغدِّيكِ يا أمَّ فلانٍ؟ فقالت: لا آكلُ إلّا من طعامٍ جاءت به فُلانةُ، قال: فصَعِدَتْ في رفٍّ لهم، فنظرَتْ إلى عُرقُوبَيها، ثم قالت: افْلِيني يا بُنيّةُ، قال: فجعلَتْ تَفْلِيها وهي تَشَمُّ عَوارِضَها، قال: فجاءتْ فَأَخبَرَتْ [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন মহিলাকে বিবাহ করার ইচ্ছা করলেন। তাই তিনি তাকে দেখে আসার জন্য একজন মহিলাকে পাঠালেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার মুখের সামনের দিকের দাঁতগুলোর গন্ধ নাও এবং তার গোড়ালির সংযোগস্থল দেখো।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর সে (প্রেরিত মহিলাটি) তাদের (পাত্রীর) কাছে এলো। তখন তারা বলল: হে অমুকের মা, আমরা কি আপনাকে সকালের নাস্তা করাবো না? সে বলল: আমি শুধু সেই খাবারই খাবো যা অমুক নিয়ে এসেছে। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর সে তাদের একটি তাকের উপরে উঠল এবং তার গোড়ালির সংযোগস্থল দেখল। এরপর সে বলল: ওহে আমার ছোট্ট মেয়ে, আমার চুল থেকে উকুন খুঁজে বের করো। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর সে (পাত্রী) যখন তার (প্রেরিত মহিলার) উকুন পরিষ্কার করছিল, তখন সে (প্রেরিত মহিলা) পাত্রীর মুখের সামনের দিকের দাঁতগুলো শুঁকে দেখল। বর্ণনাকারী বলেন: এরপর সে ফিরে এসে (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) খবর দিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. هشام بن علي - وهو أبو علي السِّيرافي - وثقه الدارقطني، وقال ابن حبان: مستقيم الحديث، وقد خالفه أبو داود في "المراسيل" (216) فرواه عن موسى بن إسماعيل، عن حماد، عن ثابت مرسلًا، واقتصر على أول الحديث إلى قوله: "عرقوبيها".لكن تابع هشامًا السِّيرافي على وصله محمدُ بن كثير المِصِّيصي عند ابن المنذر في "الأوسط" (7144) فرواه عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس. وذكره بطوله، ومحمد بن كثير حسن الحديث في المتابعات والشواهد.وكذلك رواه موصولًا عُمارة بن زاذان عن ثابت عن أنس، عند أحمد 21/ (13424)، وعمارة وإن كان له عن ثابت عن أنس مناكير، ليس هذا منها، لأنه توبع عليه.وفي الجملة فيشبه أن يكون ذكر أنس في إسناده هو المحفوظ، والله أعلم.والعوارض: الأسنان التي في عُرض الفم، وهي ما بين الثنايا والأضراس، واحدها: عارض.والعُرقوبان: مثنّى عُرقوب، وهو الوتر الذي خلف الكعبين فُويق العقب، قيل: أمرها بالنظر إليها لأنه إذا اسودَّ عرقوباها اسودَّ سائر جسدها. قاله ابن الأثير.وقال ابن الملقن في "البدر المنير" 7/ 59: أراد بالنظر إلى عرقوبيها حتى تكون ممتلئة الساقين.وقوله: افليني: من فَلْي الشعر وأخذ القمل منه.
2733 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا علي بنُ الحسن الهِلالي، حدثنا أبو مَعمَر، حدثنا عبد الوارث بن سعيد، عن حَبيب المعلِّم، عن عمرو بن شعيب. قال أبو مَعمَر: وقد حدَّثَناه حَبيبٌ المعلّم، عن عمرو بن شعيب، عن سعيد المقبُري، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يَنكِحُ الزاني المجلودُ إلّا مثلَه" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বেত্রাঘাতপ্রাপ্ত ব্যভিচারী তার সমতুল্য ছাড়া অন্য কাউকে বিবাহ করে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو معمر: هو عبد الله بن عمرو المِنْقَري المُقعَد.وأخرجه أبو داود (2052) عن أبي معمر، بإسناديه.وأخرجه أحمد 14/ (8300) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، وأبو داود (2052) عن مُسدَّد، كلاهما عن عبد الوارث بن سعيد، به.وسيأتي برقم (2820) من طريق يزيد بن زريع عن حبيب المعلم.
2734 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد، حدثني عبيد الله بن الأخْنَس، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده: أنَّ مَرثَد بن أبي مَرثَد الغَنَوي كان يَحمِل الأُسارى بمكة، وكان بمكة بَغِيٌّ يقال لها: عَنَاقٌ، وكانت صديقتَه، قال: فجئتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقلتُ: يا رسولَ الله، أنكِحُ عَنَاقًا؟ قال: فسكت عنّي، فنزلت: {الزَّانِي لَا يَنْكِحُ إِلَّا زَانِيَةً أَوْ مُشْرِكَةً وَالزَّانِيَةُ لَا يَنْكِحُهَا إِلَّا زَانٍ أَوْ مُشْرِكٌ وَحُرِّمَ ذَلِكَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ} [النور: 3]، فقرأه عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال: "لا تَنكِحْها" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মারছাদ ইবনু আবী মারছাদ আল-গানাবী মাক্কায় বন্দীদের বহন করতেন। মাক্কায় ‘আনাক’ নামে এক বেশ্যা ছিল, সে ছিল মারছাদ-এর পরিচিত। তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কি ‘আনাক’কে বিবাহ করব? তিনি আমার ব্যাপারে চুপ থাকলেন। অতঃপর এই আয়াত নাযিল হলো: “ব্যভিচারী পুরুষ ব্যভিচারিণী নারী বা মুশরিক নারী ব্যতীত অন্য কাউকে বিবাহ করে না এবং ব্যভিচারিণী নারীকে ব্যভিচারী পুরুষ বা মুশরিক পুরুষ ব্যতীত অন্য কেউ বিবাহ করে না, আর মুমিনদের ওপর এটা হারাম করা হয়েছে।” (সূরা আন-নূর: ৩)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তা পড়ে শোনালেন এবং বললেন: তুমি তাকে বিবাহ করো না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن. أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى العنبري، ومُسدَّد: هو ابن مُسرهد، ويحيى بن سعيد: هو القطان.وأخرجه أبو داود (2051)، والنسائي (5319) عن إبراهيم بن محمد التيمي، عن يحيى بن سعيد، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (3177) من طريق روح بن عبادة، عن عبيد الله بن الأخنس، به. وقال الترمذي: حسن غريب.وقد وقع في رواية الحاكم هذه صرف كلمة "عناق" وإعرابها، وكذلك وقع في رواية الترمذي، وكذا في رواية أبي داود التي وقعت لابن الجوزي في "التحقيق" (1745)، مع أنَّ المعروف في المؤنث الذي على وزن "فَعَال" أحدُ وجهين: إما المنع من الصرف على لغة بني تَميم، وأما البناء على الكسر على لغة أهل الحجاز.وسيأتي بنحوه برقم (2821) و (3537) من طريق القاسم بن محمد عن عبد الله بن عمرو. أبي قَطَن عمرو بن الهيثم، ثلاثتهم عن يونس بن أبي إسحاق، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (19657) عن أسود بن عامر، عن إسرائيل بن يونس بن أبي إسحاق، عن جده أبي إسحاق، عن أبي بردة، به. وهذا إسناد صحيح.
2735 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد، حدثنا أحمد بن مِهْران، حدثنا عُبيد الله بن موسى، حدثنا يونس بن أبي إسحاق، عن أبي بُردة، عن أبي موسى سَمِعَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: "تُستأمَرُ اليتيمةُ في نفسها، فإن سَكَتَت فهو رضاها، وإن كَرِهَتْ، فلا كُرْهَ عليها" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وله شاهد بإسناد صحيح عن أبي هريرة:
আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "এতিম মেয়ের তার নিজের ব্যাপারে (বিয়ের জন্য) অনুমতি/পরামর্শ গ্রহণ করতে হবে। যদি সে চুপ থাকে, তবে তা-ই তার সম্মতি। আর যদি সে অপছন্দ করে, তবে তার উপর কোনো জবরদস্তি নেই।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن.وأخرجه أحمد 32/ (19516) عن وكيع بن الجراح وإسحاق بن يوسف، و (19688) عن أبي قَطَن عمرو بن الهيثم، ثلاثتهم عن يونس بن أبي إسحاق، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (19657) عن أسود بن عامر، عن إسرائيل بن يونس بن أبي إسحاق، عن جده أبي إسحاق، عن أبي بردة، به. وهذا إسناد صحيح.
2736 - أخبرَناه الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، حدثنا محمد بن عمرو.وحدثنا أبو الوليد الفقيه، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا عمرو بن علي، حدثنا المعتمِر، قال: سمعت محمد بن عمرو يُحدّث عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "تُستأمَرُ اليتيمةُ في نفسها، فإن سَكَتَت فهو رضاها، وإن أبَتْ فلا جَوازَ عليها" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইয়াতিম মেয়ের নিজের (বিবাহের) বিষয়ে তার অনুমতি চাওয়া হবে। যদি সে নীরব থাকে, তবে সেটাই তার সম্মতি। আর যদি সে অসম্মতি জানায়, তবে তার উপর কোনো জোর খাটানো যাবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة الليثي.وأخرجه أحمد 12/ (7527) عن عبد الواحد بن واصل الحداد، وأبو داود (2093) من طريق يزيد بن زُريع، ومن طريق حماد بن سلمة، والترمذي (1109) من طريق عبد العزيز بن محمد الدَّرَاوَرْدي، والنسائي (5360) من طريق يحيى القطان، خمستهم عن محمد بن عمرو، به.وأخرجه البخاري (5136)، ومسلم (1419)، وأبو داود (2092)، وابن ماجه (1871)، والترمذي (1107)، والنسائي (5357) من طريق يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، بلفظ: "لا تُنكح الأيِّم حتَّى تُستأمَر، ولا تُنكح البكرُ حتى تُستأذَن" قالوا: يا رسول الله، وكيف إذنُها؟ قال: "أن تسكت".ويشهد للفظ محمد بن عمرو حديث أبي موسى الأشعري الذي قبله، ويشهد لمعناه حديث ابن عمر الذي بعده.وكذا يشهد لمعناه حديث ابن عباس عند أحمد 4/ (2469)، وأبي داود (2096)، وابن ماجه (1875)، والنسائي (5366)، وإسناده صحيح.وقوله: "لا جَوازَ عليها" أي: لا ولاية عليها مع الامتناع.
2737 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، حدثنا ابن أبي فُدَيك، عن ابنِ أبي ذئب، عن عمر بن حسين، عن نافع، عن ابن عمر: أنه تزوج ابنةَ خاله عثمان بن مَظْعُون، قال: فذهبتْ أمُّها إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: إنَّ ابنتي تَكْرَه والله، فأمره رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُفارقها، ففارَقَها، وقال: "لا تُنكِحُوا النساءَ حتى تَستأمروهُنّ، فإذا سَكتْنَ فهو إذنُهُنَّ". فتزوّجها بعدَ عبدِ الله المغيرةُ بن شُعبة [1].هذا حديث كبيرٌ صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর মামা উসমান ইবন মায'ঊন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যাকে বিবাহ করলেন। (বর্ণনাকারী) বলেন, তখন তার মা নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন এবং বললেন: আল্লাহর কসম! আমার কন্যা (এই বিবাহে) অনাগ্রহী/অসম্মতি জানাচ্ছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (ইবন উমরকে) নির্দেশ দিলেন যেন সে তাকে বিচ্ছেদ ঘটিয়ে দেয়। ফলে সে তাকে বিচ্ছেদ ঘটিয়ে দিল। আর তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নারীদেরকে ততক্ষণ পর্যন্ত বিবাহ দিও না যতক্ষণ না তোমরা তাদের অনুমতি চাও। যখন তারা নীরব থাকে, সেটাই হলো তাদের অনুমতি।" আব্দুল্লাহর (ইবন উমর) পরে মুগীরা ইবন শু'বা তাকে বিবাহ করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ابن أبي فُديك: هو محمد بن إسماعيل بن مسلم بن أبي فُديك، وابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة، وعمر بن حسين: هو ابن عبد الله الجُمحي.وأخرجه أحمد 10/ (6136) من طريق محمد بن إسحاق، حدثني عمر بن حسين به. ولفظ المرفوع عنده: "هي يتيمة، ولا تُنكَح إلّا بإذنها".وأخرجه ابن ماجه (1878) من طريق عبد الله بن نافع، عن أبيه، عن ابن عمر، بنحوه.
2738 - أخبرنا مَخْلَد [1] بن جعفر الباقَرْحِيّ، حدثنا محمد بن جَرير [2]، حدثنا سعيد بن يحيى بن سعيد الأُموي، حدثنا أبي، حدثنا محمد بن عمرو بن علقمة، حدثنا يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، عن عائشة قالت: لما تُوفِّيَت خديجةُ قالت خولة بنت حكيم بنِ أُميّة بن الأَوْقَص امرأة عثمان بن مَظْعُون، وذلك بمكة: أيْ رسولَ الله، ألا تَزَوَّجُ؟ قال: "ومَن؟ " قالت: إن شئت بِكرًا، وإن شئت ثيِّبًا، قال: "ومَن البِكرُ؟ " قالت: ابنةُ أحبِّ خلق الله إليك، عائشةُ بنت أبي بكر، قال: "ومَن الثيِّبُ؟ " قالت: سَوْدَةُ بنت زَمْعة بن قيس، قد آمنتْ بك واتبعتْك على ما أنتَ عليه، قال: "فاذهبي فاذكُرِيهما"، فجاءت فدخلتْ بيت أبي بكر، فقالت: يا أبا بكر، ماذا أدخلَ اللهُ عليك من الخير والبَرَكة، أرسلَني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أخطُبُ عليه عائشةَ، قال: ادعِي لي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فدعَتْه، فجاء فأنكحه، وهي يومئذٍ ابنةُ سبع سنين [3].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন, তখন খাওলা বিনত হাকীম ইবনে উমাইয়াহ ইবনে আওকাস (যিনি উসমান ইবনে মাযউন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী ছিলেন) মক্কায় বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনি কি বিবাহ করবেন না?" তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কাকে?" তিনি বললেন: "যদি আপনি চান, তবে কুমারী; আর যদি চান, তবে বিধবা (অথবা তালাকপ্রাপ্তা)।" তিনি বললেন: "আর কুমারীটি কে?" তিনি বললেন: "আল্লাহর সৃষ্টির মধ্যে আপনার কাছে যিনি সবচেয়ে প্রিয়, তাঁর কন্যা— আয়েশা বিনত আবূ বকর।" তিনি বললেন: "আর বিধবাটি কে?" তিনি বললেন: "সাওদা বিনত যামআ ইবনে কায়স। তিনি আপনার প্রতি ঈমান এনেছেন এবং আপনি যে অবস্থায় আছেন, তার উপর আপনাকে অনুসরণ করেছেন।" তিনি বললেন: "তাহলে তুমি যাও এবং তাদের দুজনের বিষয়ে আলোচনা করো।" অতঃপর তিনি (খাওলা) এসে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে প্রবেশ করলেন এবং বললেন: "হে আবূ বকর! আল্লাহ আপনার জন্য কী কল্যাণ ও বরকত নিয়ে এসেছেন! আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে পাঠিয়েছেন যেন আমি তাঁর জন্য আয়েশার বিয়ের প্রস্তাব দেই।" তিনি বললেন: "আমার জন্য আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ডেকে আনো।" তিনি (খাওলা) তাঁকে ডাকলেন। অতঃপর তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন এবং তাঁকে বিবাহ করালেন, আর সেদিন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বয়স ছিল সাত বছর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) إلى: محمد، وانظر ترجمته في "سير أعلام النبلاء" 16/ 254.
[2] تحرَّف "جرير" في النسخ الخطية إلى: حرب. ومخلد معروف بالرواية عن محمد بن جرير الطبري كما في ترجمته من "تاريخ بغداد" 15/ 230 وسعيد بن يحيى الأُموي قد روى عنه ابن جرير الطبري في عشرات المواضع من كتبه.
2738 [3] - إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة.وأخرجه أحمد 42/ (25769) عن محمد بن بشر العبدي، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن ويحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، قالا: لما هلكت خديجة، فذكراه هكذا على صورة المرسل. قال ابن كثير في "البداية والنهاية" 4/ 331: هذا السياق كأنه مرسلٌ، وهو متصلٌ لما رواه البيهقي من طريق أحمد بن عبد الجبار، حدثنا عبد الله بن إدريس الأَوْدِي، عن محمد بن عمرو، عن يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب قال: قالت عائشة.قلنا: فات ابنَ كثير أنه من الطريق المذكورة عند الحاكم أيضًا فيما سيأتي برقم (4494)، وفاته أيضًا طريق يحيى بن سعيد الأموي التي عند الحاكم هنا أيضًا، فتأكد وصل الحديث، وقد حسَّن إسناده الذهبي في قسم السيرة من "سير أعلام النبلاء" ص 230، وابن حجر في "فتح الباري" 11/ 429.وقد وقع في رواية أحمد أنَّ عائشة كانت حينئذٍ بنت ست سنين، وهنا عند الحاكم: ابنة سبع سنين، وما عند أحمد يوافقه رواية عروة عن عائشة عند البخاري (3894) ومسلم (1422)، وما عند الحاكم يوافقه رواية أخرى عن عروة عند مسلم (1422)، وأخرى عنه أيضًا عند أحمد 43/ (26397). ويمكن أن يُحمل على أنها كانت في آخر السادسة وأول السابعة من عمرها، والله أعلم. وأخرجه النسائي (5310)، وابن حبان (6948) من طريق الحسين بن حُريث، عن الفضل بن موسى، عن الحسين بن واقد، بهذا الإسناد.
2739 - أخبرنا أبو العباس القاسم بن القاسم السَّيَّاري بمَرْو، حدثنا محمد بن موسى بن حاتم الباشاني، حدثنا علي بن الحسن بن شقيق، حدثنا الحسين بن واقِد، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه قال: خطب أبو بكر وعمرُ فاطمةَ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّها صغيرة"، فخطبها عليٌّ فزَوَّجَها [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
বুরাইদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ বকর এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই সে (এখনও) ছোট।" অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে প্রস্তাব দিলেন এবং তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাথে তাঁর বিবাহ দিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد حسن، محمد بن موسى بن حاتم حسن الحديث كما بيناه عند الحديث (127)، وقد توبع. وأخرجه النسائي (5310)، وابن حبان (6948) من طريق الحسين بن حُريث، عن الفضل بن موسى، عن الحسين بن واقد، بهذا الإسناد.
2740 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المَحبُوبي بمَرْو، حدثنا محمد بن معاذ. وأخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلّاب بهَمَذان، حدثنا محمد بن الجَهْم السِّمَّري؛ قالا: حدثنا أبو عاصم الضحّاك بن مَخْلد، حدثنا ابن جُرَيج، قال: سمعت سليمان بن موسى يقول: حدثنا الزُّهْري، قال: سمعتُ عُروة يقول: سمعت عائشةَ تقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أيُّما امرأةٍ نَكَحَتْ بغير إذن وليِّها، فنِكاحُها باطِلٌ، فنِكاحُها باطِلٌ، فنِكاحُها باطِلٌ، فإن أصابها فلها مهرُها بما أصابها، وإن تَشاجَرُوا، فالسلطانُ وَليُّ مَن لا وَليَّ له" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد تابع أبا عاصم على ذكر سماع ابنِ جُرَيج من سليمان بن موسى وسماع سليمان بن موسى من الزُّهْري: عبد الرزاق بن همّام ويحيى بن أيوب وعبد الله بن لَهِيعة وحَجّاج بن محمد المِصِّيصي.أما حديث عبد الرزاق:
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যে কোনো নারী তার অভিভাবকের অনুমতি ব্যতীত বিবাহ করে, তার বিবাহ বাতিল, তার বিবাহ বাতিল, তার বিবাহ বাতিল। অতঃপর যদি সে (স্বামী) তার সাথে সহবাস করে থাকে, তবে এর বিনিময়ে তার জন্য মোহর নির্ধারিত হবে। আর যদি তাদের মধ্যে মতবিরোধ হয়, তবে শাসকই হলো তার অভিভাবক, যার কোনো অভিভাবক নেই।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، محمد بن معاذ - وهو ابن يوسف السُّلَمي المروَزي - روى عنه جمع من الحفاظ، ولا يُعرف بجرح، وسليمان بن موسى قوي الحديث.وأخرجه أحمد 40/ (24205)، وأبو داود (2083)، وابن ماجه (1879)، والترمذي (1102)، والنسائي (5373)، وابن حبان (4074) و (4075) من طرق عن ابن جُرَيج، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن. وانظر تمام الكلام عليه في "مسند أحمد".وأخرجه أحمد 40/ (24372)، وأبو داود (2084) من طريق ابن لهيعة، عن جعفر بن ربيعة، عن الزُّهْري، به.وانظر الأحاديث الثلاثة التالية.