আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
2761 - فأخبرَناه أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي، حدثنا الحسين بن عبد الله بن شاكر، حدثنا أبو حُمَة، حدثنا أبو قُرَّة، عن عبد العزيز بن أبي رَوَّاد وعبد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر: أنَّ عمر بن الخطاب خطب الناس، ثم قال: أيها الناس، أقِلُّوا مُهور النساء، فإنَّ كثرة مُهورهن لو كان تقوى عند الله ومَكَرُمَةً في الدنيا؛ كان أَولاكُم بذلك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، ما علِمنا أعطى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم امرأةً من نسائه أكثرَ من اثنتي عشرة أُوقيّةً - والوُقيّة أربعون درهمًا، فذلك ثمانون وأربعُ مئة درهم - وذلك أعلى ما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أمْهَرَ، فلا أعْلمَنَّ أحدًا زاد على أربع مئة درهم [1].وقد رُويَ من وجه صحيح عن عبد الله بن عباس عن عمر:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জনগণের সামনে খুতবা দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: হে লোক সকল! তোমরা নারীদের মহর কম রাখো। কারণ, তাদের মহর বেশি রাখা যদি আল্লাহ্র কাছে তাকওয়া (খোদাভীতি) এবং দুনিয়াতে মর্যাদা লাভের বিষয় হতো, তাহলে এই ব্যাপারে তোমাদের চেয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)ই বেশি হকদার ছিলেন। আমরা জানি না যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে কাউকেও বারো উকিয়ার চেয়ে বেশি মহর দিয়েছেন— আর এক উকিয়া হলো চল্লিশ দিরহাম, সুতরাং মোট হলো চারশো আশি দিরহাম— আর এটাই ছিল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নির্ধারিত সর্বোচ্চ মহর। সুতরাং আমি যেন কারো ব্যাপারে জানতে না পারি যে, সে চারশো দিরহামের বেশি মহর দিয়েছে। আর এ হাদীসটি আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সহীহ্ সনদে বর্ণিত হয়েছে:
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح، وهذا إسناد ضعيف من جهة عبد الله بن عمر - وهو العمري - لكنه من جهة ابن أبي رَوّاد لا بأس به، إلّا أنه اختُلف فيه عنه في وصله وإرساله، فقد رواه عنه أبو قُرَّة - وهو موسى بن طارق - موصولًا كما في هذا الإسناد، وخالف أبا قرة عبدُ الرزاق ووكيعٌ، فروياه عن ابن أبي روّاد، عن نافع، عن عمر بن الخطاب مرسلًا، دون ذكر ابن عمر، وهو الأشبه، فإنَّ في الطريق إلى أبي قُرّة بعضَ اللِّين، لكن قد رُوي ذلك عن عمر من وجه آخر صحيح كما في الحديث السابق. وقال الدارقطني في "العلل" (241): لا يصح هذا الحديث إلا عن أبي العجفاء.أبو حُمة: هو محمد بن يوسف الزُّبيدي.وأخرجه عبد الرزاق في "مصنفه" (10401)، وأخرجه ابن أبي شيبة 6/ 175 عن وكيع بن الجراح، كلاهما (عبد الرزاق ووكيع)، عن عبد العزيز بن أبي رَوّاد، عن نافع، قال: قال عمر بن الخطاب، فذكره مرسلًا. ورواية وكيع مختصرة. وكلاهما قال في روايته: أربع مئة درهم، بدل: ثمانون وأربع مئة درهم.وأخرج منه قيمة ما كان يعطيه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مهرًا: البزار (158)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5042) و (5044) وغيرهما من طريق أبي نعيم الفضل بن دكين، عن عبد الله بن عمر، به.
2762 - حدَّثَناه محمد بن مُظفَّر الحافظ، حدثنا أبو محمد بن صاعِد، حدثني محمد بن علي بن ميمون الرَّقِّي، حدثني سعيد بن عبد الملك بن واقِد الحَرّاني، حدثنا محمد بن فُضيلٍ الضَّبِّي، عن أبيه، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس، قال: قال عمر: لا تُغالُوا بمُهور النساء، قال: وذكر الحديث [1].وكذلك رُوي عن سعيد بن المسيّب عن عمر:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: তোমরা নারীদের মোহরের (দেনমোহর) ক্ষেত্রে বাড়াবাড়ি করো না। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি [এ সম্পর্কিত] আরও হাদীস উল্লেখ করেছেন। অনুরূপভাবে সাঈদ ইবনু মুসাইয়্যাব থেকেও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل سعيد بن عبد الملك الحَرَّاني، فقد قال أبو حاتم: يتكلمون فيه، ورأيتُ فيما حدَّث أحاديث كذب. قلنا: ومجيئه بهذه الطريق يدل على صحة ذلك، فلا يُعرف إلّا من طريقه، كما أشار إليه الدارقطني في "الأفراد" كما في "أطرافه" لابن طاهر (118)، وقد اضطرب فيه أيضًا، فروي عنه بذكر محمد بن فضيل الضبي، كما في رواية المصنف هنا، وروي عنه مرة أخرى بذكر محمد بن الفضل بن عطية وهو متروك الحديث وكذّبه كثيرون. وقد رَوى هذا الخبر هشام بن سعد المدني عن عطاء الخراساني قال: قال عمر بن الخطاب. وعطاء الخراساني لم يدرك عمر، ويغلب على ظننا أنَّ هذا هو أصل الطريق، ثم رُكّب فيها ما رُكّب، وغُيِّر ما غُيِّر. لكن الخبر صحيح من طريق أبي العَجفاء عن عمر، وقد تقدمت برقم (2759).وأخرجه أبو عثمان البحيري في الثاني من "فوائده" (81) من طريق أحمد بن عبد الله بن زياد الحداد، عن سعيد بن عبد الملك، عن محمد بن الفضل بن عطية، عن أبيه، عن عطاء بن أبي رباح.وأخرجه يونس بن بكر في زياداته على "سيرة ابن إسحاق" (348)، وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 10/ 155، عن أبي نعيم الفضل بن دُكين، كلاهما (يونس وأبو نعيم) عن هشام بن سعد، عن عطاء الخراساني، قال: قال عمر بن الخطاب. وعطاء لم يدرك عمر بن الخطاب. وأخرج ابن أبي شيبة 4/ 188 عن جرير بن عبد الحميد، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، قال: السُّنَّة في النكاح اثنا عشر أوقيّة ونصف، فذلك خمس مئة درهم. ورجاله ثقات.
2763 - حدَّثَناه أبو الحسن بن منصور، حدثنا عبد الله بن محمد بن ناجيَة، حدثنا كُردُوس بن محمد أبو الحسن القافِلَاني، حدثنا مُعلَّى بن عبد الرحمن، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، عن الزُّهْري، عن سعيد بن المسيّب: أنَّ عمر بن الخطاب قام على مِنبره، فحمِد اللهَ وأثنى عليه، فقال: ألا لا تُغالُوا في صَدُقات النساء، فإنها لو كانت مَكرُمةً في الدنيا أو تقوى عند الله، كان أَولاكُم بها نبيُّكم صلى الله عليه وسلم، والله ما زِيدَتِ امرأةٌ من نسائه ولا بناتِه على اثنتي عشرةُ أُوقيّة؛ وذلك أربع مئة درهم وثمانون درهمًا، الأُوقية أربعون درهمًا [1]. فقد تواترت الأسانيدُ الصحيحة بصحَّة خطبة أمير المؤمنين عمر بن الخطاب رضي الله عنه، وهذا البابُ لي مجموعٌ في جزء كبير، ولم يُخرجاه.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর মিম্বরে দাঁড়িয়ে আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করলেন, অতঃপর বললেন: সাবধান! তোমরা নারীদের মহর নির্ধারণে বাড়াবাড়ি করো না, কেননা এটি যদি পৃথিবীতে সম্মানজনক বা আল্লাহর নিকট তাকওয়ার বিষয় হতো, তবে তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) এর জন্য তোমাদের চেয়ে বেশি উপযোগী হতেন। আল্লাহর কসম, তাঁর (নবীর) স্ত্রী বা কন্যাদের কাউকেই বারো উকিয়ার (وقية) বেশি মহর দেওয়া হয়নি; আর তা হলো চারশত আশি দিরহাম, এক উকিয়া চল্লিশ দিরহামের সমান।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل مُعلَّى بن عبد الرحمن، فهو متروك الحديث، واتهمه بعضهم بوضع الحديث، وقد انفرد بهذه الطريق، والصحيح عن سعيد بن المسيب من قوله كما سيأتي. على أنه صحَّ عن عمر بن الخطاب من رواية أبي العَجفاء والسُّلَمي، كما سبق. وأخرج ابن أبي شيبة 4/ 188 عن جرير بن عبد الحميد، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، قال: السُّنَّة في النكاح اثنا عشر أوقيّة ونصف، فذلك خمس مئة درهم. ورجاله ثقات.
2764 - أخبرني الشيخ أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا علي بن الحسين بن الجُنيد، حدثنا المُعَافى بن سليمان الحرّاني، حدثنا زهير، حدثنا أبو إسماعيل الأسْلمي، أنَّ أبا حازم حدّثه عن أبي هريرة: أنَّ رجلًا أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: إني تزوّجتُ امرأةً من الأنصار على ثماني أَواقٍ، فتَفزَّع لها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "كأنما تَنحِتُون الفضةَ من عُرْضِ هذا الجبل، هل رأيتَها، فإنَّ في عُيون الأنصار شيئًا؟ " قال: قد رأيتُها، قال: "ما عندنا شيءٌ، ولكنا سنبعثُك في بَعْثٍ، وأنا أرجو أن تُصيبَ خيرًا"، فبعثه في ناسٍ إلى ناسٍ من بني عَبْس، وأمر لهم النبي صلى الله عليه وسلم بناقةٍ فحَمَلُوا عليها متاعَهم، فلم تَرِمْ إلّا قليلًا حتى بَرَكَتْ فأعْيَتْهم أن تَنبَعِثَ، فلم يكن في القوم أصغرَ من الذي تزوّج، فجاء إلى نبيّ الله صلى الله عليه وسلم وهو مُستلْقٍ في المسجد، فقام عند رأسه كراهيةَ أن يُوقظه، فانتبه نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا نبيّ الله، إنَّ الذي أعطيتَنا أحببنا أن تَبتَعِثَه، فناولَه نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم يمينَه، وأخذَ رداءه بشمالِه فوضعه على عاتِقِه، وانطلق يمشي حتى أتاها، فضربها بباطن قدمِه، والذي نفسُ أبي هريرة بيده لقد كانت بعدَ ذلك تَسبِقُ القائد، وإنهم نزلوا بحَضْرة العدوّ، وقد أوقَدُوا النيران، فأحاط بهم فتفرَّقوا عليهم، وكبَّروا تكبيرةَ رجلٍ واحدٍ، وإِنَّ الله هَزمَهم وأَسَرَ منهم [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، إنما أخرج مسلم من حديث شعبة [2]، عن أبي إسماعيل، عن أبي حازم، عن أبي هريرة: أنَّ رجلًا تزوج، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هلّا نظرتَ إليها" فقط، وأبو إسماعيل هذا هو بَشير بن سلْمان، وقد احتجا جميعًا به.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন, আমি আট উকিয়া (স্বর্ণ বা রৌপ্য) এর বিনিময়ে আনসারী এক নারীকে বিবাহ করেছি। এ কথা শুনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছুটা চিন্তিত (বা বিস্মিত) হলেন এবং বললেন: "তোমরা যেন এই পাহাড়ের পাশ থেকে রৌপ্য খুঁড়ে বের করছো (অর্থাৎ মহর অত্যধিক)। তুমি কি তাকে দেখেছো? কেননা আনসারীদের চোখে (দৃষ্টিতে) কিছুটা সমস্যা থাকে।" লোকটি বললেন: হ্যাঁ, আমি তাকে দেখেছি। তিনি (নবী) বললেন: "আমাদের কাছে (মহর দেওয়ার মতো) কোনো কিছু নেই। তবে আমরা তোমাকে একটি অভিযানে পাঠাব, আমি আশা করি তুমি সেখানে কিছু ভালো কিছু অর্জন করবে।"
এরপর তিনি তাকে বনু আবস গোত্রের কিছু লোকের কাছে লোকজনের সাথে পাঠালেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জন্য একটি উটনী দিতে আদেশ করলেন। তারা এর ওপর তাদের আসবাবপত্র বোঝাই করল। কিন্তু উটনীটি সামান্যই চলল, তারপর বসে পড়ল এবং তারা তাকে আর ওঠাতে পারল না। সেই লোকটির (নববিবাহিত ব্যক্তি) চেয়ে বয়সে ছোট কেউ সেই দলের মধ্যে ছিল না। সে তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো, যখন তিনি মসজিদে শুয়ে ছিলেন। সে তাঁকে জাগানো অপছন্দ করে তাঁর মাথার কাছে দাঁড়িয়ে রইল। এরপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জেগে উঠলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহর নবী! আপনি আমাদের যে (উটনীটি) দিয়েছেন, আমরা চেয়েছিলাম যে সেটি যেন আবার চলতে শুরু করে।"
এরপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার ডান হাত বাড়িয়ে দিলেন এবং বাম হাতে নিজের চাদর নিয়ে কাঁধের উপর রাখলেন। তিনি হেঁটে চলতে শুরু করলেন যতক্ষণ না উটনীটির কাছে পৌঁছলেন। এরপর তিনি উটনীটির পায়ের তলা দিয়ে আঘাত করলেন। আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: "যার হাতে আবু হুরায়রার জীবন, তাঁর কসম! এরপর থেকে সেটি (উটনীটি) দ্রুতগামী পশুর চেয়েও দ্রুত চলতো।"
তারা শত্রুদের উপস্থিতিতে, যেখানে তারা আগুন জ্বালিয়ে রেখেছিল, সেখানে শিবির স্থাপন করলো। শত্রু তাদের ঘিরে ফেললো। তখন তারা শত্রুদের ওপর ছড়িয়ে পড়লো এবং একজন মানুষের মতো একক কণ্ঠে তাকবীর দিলো। আর আল্লাহ তাদের পরাজিত করলেন এবং তাদের থেকে বন্দী গ্রহণ করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وأبو إسماعيل الأسلمي هو بَشير بن سلمان، كما جَزَمَ المصنِّف، ويؤيده أنه وقع مقيدًا بذلك في إسناد حديث آخر من طريق زهير - وهو ابن معاوية - عنه عن أبي حازم - وهو سلمان الأشجعي - عن أبي هريرة، عند أبي عوانة (8305)، حيث قال فيه زهير: حدثنا بشير أبو إسماعيل، ولم ينسبه، لكن نسبته هنا بالأسلمي فيها نظر، لأنَّ بشيرًا المذكور نَهْدي لا أسلمي، إلّا إن كان الأسلمي بضم اللام فهو يجتمع مع النَّهدي، فإنَّ في أجداد نَهْد أَسْلُم بن الحاف بن قضاعة. وليس أبو إسماعيل هو يزيد بن كيسان، وإن كان يُكنى أيضًا بأبي إسماعيل، وشاركه في هذا الحديث بعينه كذلك وفي غيره، كما أفاده ابن الجارود في "الكنى" فيما نقله عنه أبو علي الجياني في "تقييد المهمل" 3/ 931 ووافقه عليه. قلنا: ولأنه لا تعرف لزهير رواية عن يزيد بن كيسان، ولأنَّ يزيد بن كيسان مشهور باسمه لا بكنيته، كما أفاده المزّي في "التحفة" (13395)، ولأنَّ يزيد بن كيسان يشكريٌّ وأبا إسماعيل أسلميٌّ نَهْدي، ولا يجتمعون، كما أفاده المزّي أيضًا.وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5058) من طريق سفيان بن عيينة، عن أبي إسماعيل، به. دون ذكر قصة الناقة.وأخرجه مسلم (1424)، والنسائي (5329)، وابن حبان (4041) من طريق سفيان بن عيينة، ومسلم (1424)، وابن حبان (4094) من طريق مروان بن معاوية الفزاري، والنسائي (5330) من طريق علي بن هاشم بن البريد، ثلاثتهم عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، به. لكن اقتصر سفيان وعلي بن هاشم في روايتهما على أمر النبي صلى الله عليه وسلم لذلك الرجل بالنظر للمرأة الأنصارية لأنَّ في أعين الأنصار شيئًا. ولم يذكر مروان في روايته قصة الناقة. وسمَّى المهرَ في روايته أربع أواق، بدل ثماني أواق.وقوله: "فلم تُرِم" أي: لم تَبرَح.
[2] لم يخرج مسلم هذا الحديث من طريق شعبة، وإنما أخرجه من طريق سفيان، كما قدَّمنا، وهو ابن عيينة، فلعلَّ ما وقع هنا تحريف، تحرَّف فيه سفيان إلى شعبة، إذ كان يُكتَب سفيان في كثير من الأصول القديمة بغير ألف، وأخطأ المصنف رحمه الله في تسمية شيخ سفيان عند مسلم بأبي إسماعيل، وإنما هو يزيد بن كيسان، فإنَّ مسلمًا لم يخرج هذا الحديث من طريق أبي إسماعيل، وإن كان سفيانُ بن عيينة قد روى هذا الحديث عنهما جميعًا كما بيناه في تخريجه.
2765 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعْدي، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا يحيى بن سعيد.وأخبرني الحسن بن حَلِيم المروَزي، أخبرنا أبو الموجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا يحيى بن سعيد، عن محمد بن إبراهيم التَّيمي، عن أبي حَدْرد الأسلَمي: أنه أتى النبي صلى الله عليه وسلم يَستعينُه في مهر امرأةٍ، فقال: "كم أمهَرْتَها؟ "، فقال: مئتي درهم، فقال صلى الله عليه وسلم: "لو كنتم تَعْرِفُون من بُطحانَ ما زِدْتُم" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু হাদ্রাদ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি এক মহিলার মোহরের বিষয়ে সাহায্য চাইতে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে কত মোহর দিয়েছ?" সে বলল: দুইশত দিরহাম। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তোমরা বুতহান সম্পর্কে জানতে, তবে এর চেয়ে বেশি বাড়াতে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح إن شاء الله لكن بذكر ابن أبي حدرد بدل أبي حدرد، وهو عبد الله بن أبي حدرد، فقد رُوي هذا الحديث من غير وجه عنه كما سيأتي. وقال الواقدي فيما نقله عنه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 5/ 215: إنما الحديث أنَّ ابن أبي حدرد الأسلمي استعان رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في مهر امرأته.قلنا: وقد وقع تصريح محمد بن إبراهيم التيمي بسماعه من ابن أبي حدرد في رواية عبد الرزاق، عن سفيان الثَّوري، عن يحيى بن سعيد - وهو الأنصاري - غير أنه وقع في روايته تسميته بأبي حدرد، كسائر من رواه عن يحيى بن سعيد عن محمد بن إبراهيم، وذكرنا أنه وهم وأنَّ الصواب رواية من قال: ابن أبي حدرد. وقد عاش ابن أبي حدرد إلى سنة إحدى وسبعين، كما قال الواقدي وغيره، فلا يُستبعد سماعُ محمد بن إبراهيم التيمي منه.وأخرجه أحمد 24/ (15706) عن وكيع بن الجراح، و (15707) عن عبد الرزاق، كلاهما عن سفيان الثَّوري، عن يحيى بن سعيد، به.وأخرجه أحمد 39/ (23882) من طريق عبد الواحد بن أبي عون، عن جدته، عن ابن أبي حدرد، ضمن حديث طويل، وجدة عبد الواحد وإن كانت مبهمة تُقبل روايتها في المتابعات والشواهد.وأخرجه ابنُ إسحاق في "السيرة" كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 629 - 630، قال: عمن لا أتَّهم، عن ابن أبي حدرد. وبعضهم يرويه عن ابن إسحاق عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن عبد الله بن أبي حدرد، كما في "تاريخ الطبري" 3/ 34.وأخرجه الواقدي في "مغازيه" 2/ 777 عن محمد بن سهل بن أبي حثمة، عن أبيه، قال: قال عبد الله بن أبي حدرد. وهذا سند يصلح للاعتبار، فأعدل الأقوال في الواقدي أنَّ حديثه يُكتب اعتبارًا، وفق ما قرره الذهبي في ترجمته من "سير أعلام النبلاء".وأخرجه محمد بن الحسن بن قتيبة في "فوائده" كما في "الإصابة" للحافظ 4/ 55، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 132، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 27/ 340 - 340، والضياء المقدسي في "المختارة" 9/ (221) من طريق إسماعيل بن القعقاع بن عبد الله بن أبي حدرد، أنه قال: تزوج جدي عبد الله بن أبي حدرد، فذكر نحوه. قال الضياء: لا أتحقق سماع إسماعيل من جده. قلنا: روايته صريحة في الإرسال، ولكنها مع ذلك تصلح للاعتبار، والله أعلم. ويشهد له حديث أبي هريرة الذي قبله.
2766 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عيسى بن زيد اللَّخْمي بتِنِّيس، حدثنا عمرو بن أبي سلمة، حدثنا زهير بن محمد، حدثنا حميد الطويل ورجل آخر، عن أنس بن مالك، قال: سُئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن قول الله عز وجل: {وَالْقَنَاطِيرِ الْمُقَنْطَرَةِ} [آل عمران: 14]، قال: "القِنطار ألفا أُوقيّة" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আল্লাহ তাআলার বাণী: {وَالْقَنَاطِيرِ الْمُقَنْطَرَةِ} [আল ইমরান: ১৪] সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "এক ক্বিনত্বার হলো দুই হাজার উকিয়্যা।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل أحمد بن عيسى بن زيد اللخمي، فهو متروك الحديث وكذَّبه بعضهم. وقد رواه أحمد بن عبد الله بن عبد الرحيم البرقي - وهو صدوق - عن عمرو بن أبي سلمة، فخالفه في نصّه كما سيأتي، وزهير بن محمد - وهو التميمي - رواية أهل الشام عنه غير مستقيمة، وهذا منها لأنَّ عمرو بن أبي سلمة دمشقي.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 2/ 608 عن أحمد بن عبد الرحيم البرقي، عن عمرو بن أبي سلمة، عن زهير بن محمد، به بلفظ: "قنطار يعني ألف دينار".وأخرجه ابن أبي حاتم 2/ 608، وابن أبي الدنيا في "التهجد" (346) من طريق يزيد الرقاشي، عن أنس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "القنطار ألف دينار". ويزيد الرقاشي - وهو ابن أبان - ضعيف. وقد فَرَّق ابنُ معين وأبو حاتم وأبو زرعة والترمذي بين هذا الرجل، وبين سَميِّه عيسى بن ميمون المدني الذي روى عن القاسم بن محمد عن عائشة حديث: "أعلنوا هذا النكاح"، وروى أيضًا عن محمد بن كعب، وأنَّ هذا الثاني هو الضعيف الذي ضعفه الأئمة، وأخطأ ابن أبي حاتم فذكر أنَّ عيسى بن ميمون المدني الضعيف هو الذي يقال له: ابن تليدان وهو من ولد أبي قحافة، وحكاه المزي بصيغة التمريض في ترجمة الضعيف.وإذا ثبت ذلك فراوي هذا الحديث سماه حمادُ بنُ سلمة ابنَ سَخْبرة على اختلاف عنه في تسميته، وسماه يزيد بن هارون ومحمد بن مصعب القرقساني: عيسى بن ميمون، وسماه أبو داود الطيالسي: موسى بن تليدان، وكذا سماه أبو نعيم الفضلُ بن دكين موسى لكن نسبه إلى كنية أبيه، فقال: موسى بن أبي بكر، فالمقصود بهذا كله رجل واحد، وهو ثقة، وثقه أبو حاتم وابن معين وأبو داود والترمذي وغيرهم، والله تعالى أعلم.وإنما بسطنا القول فيه هنا ليُعلم أنَّ ما حكم به على إسناد هذا الحديث في "المسند" 41/ (24529) بالضعف فيه مجازفة نشأت عن عدم التروِّي في معرفة الرجل المذكور، والله ولي التوفيق والسداد. على أنَّ هذا الحديث روي نحوه عن عائشة من وجه آخر حسن.وأخرجه أحمد 41/ (24529) عن عفان بن مسلم، وأحمد 42/ (25119)، والنسائي (9229) من طريق يزيد بن هارون، كلاهما عن حماد بن سلمة، قال عفان عن حماد: أخبرني ابن طفيل بن سخبرة، وقال يزيد بن هارون عن حماد: عن ابن سخبرة، به.وسيأتي نحو هذا الحديث عند المصنف برقم (2774) من طريق عُروة عن عائشة، وإسناده حسن.
2767 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إسحاق بن الحسن الحَرْبي، حدثنا عفّان، حدثنا حماد بن سَلَمة، أخبرني عمر بن طُفيل بن سَخْبرة المدني، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "أعظمُ النساء بَرَكةً أيسَرُهنَّ صَدَاقًا" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সেই মহিলারাই বরকতের দিক থেকে শ্রেষ্ঠ, যাদের মোহরানা সবচেয়ে সহজ।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح إن شاء الله. ابن طُفيل بن سَخْبرة، قال عنه ابن معين في رواية عبد الله بن أحمد بن حنبل وابن الجُنيد والعباس الدوري: هو عيسى بن ميمون الجُرَشي المكي، وهو الذي يسميه حمادُ بنُ سلمة ابنَ سَخْبرة، وهو الذي يقال له: ابن تَليدان، وهو من ولد أبي قحافة، وهو الذي روى حديث: "أعظم النكاح بركة"، وذكر عبد الله بن أحمد عنه: أنَّ ابن تليدان أو تليدان لقبه، ونقل الخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 1/ 305 قول ابن معين، ووافقه عليه. وقد فَرَّق ابنُ معين وأبو حاتم وأبو زرعة والترمذي بين هذا الرجل، وبين سَميِّه عيسى بن ميمون المدني الذي روى عن القاسم بن محمد عن عائشة حديث: "أعلنوا هذا النكاح"، وروى أيضًا عن محمد بن كعب، وأنَّ هذا الثاني هو الضعيف الذي ضعفه الأئمة، وأخطأ ابن أبي حاتم فذكر أنَّ عيسى بن ميمون المدني الضعيف هو الذي يقال له: ابن تليدان وهو من ولد أبي قحافة، وحكاه المزي بصيغة التمريض في ترجمة الضعيف.وإذا ثبت ذلك فراوي هذا الحديث سماه حمادُ بنُ سلمة ابنَ سَخْبرة على اختلاف عنه في تسميته، وسماه يزيد بن هارون ومحمد بن مصعب القرقساني: عيسى بن ميمون، وسماه أبو داود الطيالسي: موسى بن تليدان، وكذا سماه أبو نعيم الفضلُ بن دكين موسى لكن نسبه إلى كنية أبيه، فقال: موسى بن أبي بكر، فالمقصود بهذا كله رجل واحد، وهو ثقة، وثقه أبو حاتم وابن معين وأبو داود والترمذي وغيرهم، والله تعالى أعلم.وإنما بسطنا القول فيه هنا ليُعلم أنَّ ما حكم به على إسناد هذا الحديث في "المسند" 41/ (24529) بالضعف فيه مجازفة نشأت عن عدم التروِّي في معرفة الرجل المذكور، والله ولي التوفيق والسداد. على أنَّ هذا الحديث روي نحوه عن عائشة من وجه آخر حسن.وأخرجه أحمد 41/ (24529) عن عفان بن مسلم، وأحمد 42/ (25119)، والنسائي (9229) من طريق يزيد بن هارون، كلاهما عن حماد بن سلمة، قال عفان عن حماد: أخبرني ابن طفيل بن سخبرة، وقال يزيد بن هارون عن حماد: عن ابن سخبرة، به.وسيأتي نحو هذا الحديث عند المصنف برقم (2774) من طريق عُروة عن عائشة، وإسناده حسن.
2768 - أخبرني محمد بن عبد الله بن قُريش، حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا أبو ثَوْر، حدثنا إبراهيم بن خالد الصنعاني، حدثنا عبد الله بن مصعب بن ثابت، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد، قال: زَوَّج رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلًا امرأةً بخاتم من حديد فَصُّهُ فِضّةٌ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সহজ ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন পুরুষের সাথে একজন মহিলার বিবাহ দিলেন একটি লোহার আংটির বিনিময়ে, যার নগীনা ছিল রূপার।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف بهذه السياقة، عبد الله بن مصعب بن ثابت، قال عنه ابن معين: ضعيف الحديث، لم يكن عنده كتاب إنما كان يحفظ. قلنا: وانظر كلامنا عليه عند حديثه الآتي برقم (4657)، أما هنا فقد أخطأ في رواية هذا الحديث، وخالفه الثقات من أصحاب أبي حازم - وهو سلمة بن دينار - كما سيأتي بيانه. أبو ثور: هو إبراهيم بن خالد الكلبي الفقيه المشهور. وأخرجه أبو بكر النيسابوري في "زياداته على مختصر المزني" (553)، والطبراني في "الكبير" (5837) من طريق أحمد بن منصور الرمادي، عن إبراهيم بن خالد الصنعاني، بهذا الإسناد. والصحيح في هذا الحديث ما أخرجه أحمد 37/ (22798) و (22850)، والبخاري (5029) و (5030) و (5087) و (5121) و (5132) و (5135) و (5149) و (5150)، ومسلم (1425)، وأبو داود (2111)، وابن ماجه (1889)، والترمذي (1114)، والنسائي (5289) و (5479) و (5499) من طرق ثمانية عن أبي حازم عن سهل بن سعد، في قصة الرجل الذي طلب من النبي صلى الله عليه وسلم أن يزوّجه المرأة الواهبة نفسها، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "التمس ولو خاتمًا من حديد"، فالتمس فلم يجد خاتمًا ولا غيره، فزوَّجه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بما معه من القرآن. فظهر بذلك نكارةُ رواية عبد الله بن مصعب الزُّبَيري.
2769 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت البُناني، حدثني عمر بن أبي سلمة، عن أمه أم سَلَمة، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أصابَه مُصيبةٌ فليقُل: إنا لله وإنا إليه راجعون، اللهم عندك أحتسِبُ مُصيبتي، فأْجُرْنِي فيها وأَبدِلْني خيرًا منها"، فلما مات أبو سلمة قُلتُها، فجعلتُ كلّما بلغتُ أبدِلْني بها خيرًا منها، قلت في نفسي: ومَن خيرٌ من أبي سلمة؟! ثم قلتُها. فلما انقَضَت عِدّتُها بعثَ إليها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عمرَ بنَ الخطاب يَخطُبها عليه، فقالت لابنها: يا عمرُ، قم فزَوِّجْ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فزوَّجَه، فكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يأتيها ليدخُلَ بها، فإذا رأتْه أخذت ابنتَها زينبَ فجعلتْها في حَجْرها، فيَنقلِبُ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فعَلِمَ بذلك عمارُ بن ياسر، وكان أخاها من الرَّضاعة، فجاء إليها، فقال: أين هذه المَقبُوحة المَنبُوحة التي قد آذتْ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فأخذها فذهب بها، فجاءَها [1] رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فدخل عليها، فجعلَ يَضرِبُ ببصره في جوانب البيت، فقال: "ما فعلتْ زُنابُ؟ " قالت: جاء عمارٌ فأخذها فذهب بها. فبَنَى بها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وقال: "إني لا أنقُصُكِ شيئًا مما أعطيتُ فلانةَ: رَحَاءَينِ وجَرَّتين ومِرفَقةً حَشْوُها لِيفٌ"، وقال: "إن سَبَّعتُ لكِ، سَبَّعتُ لنسائي" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যার ওপর কোনো মুসিবত (বিপদ) আপতিত হয়, সে যেন বলে: 'ইন্না লিল্লা-হি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন (নিশ্চয়ই আমরা আল্লাহর জন্য এবং আমরা তাঁরই দিকে প্রত্যাবর্তনকারী)। হে আল্লাহ, আমি আমার মুসিবতের হিসাব (সওয়াব) আপনার কাছেই কামনা করি। আপনি আমাকে এর প্রতিদান দিন এবং এর বিনিময়ে আমাকে এর চেয়ে উত্তম কিছু দান করুন।'"
যখন আবূ সালামা (আমার স্বামী) ইন্তেকাল করলেন, তখন আমি এই দু'আটি পড়লাম। যখনই আমি 'এর বিনিময়ে আমাকে এর চেয়ে উত্তম কিছু দান করুন' এই বাক্যটিতে পৌঁছতাম, তখনই মনে মনে বলতাম: আবূ সালামার চেয়ে উত্তম আর কে হতে পারে?! তবুও আমি তা (পুরো দু'আটি) বললাম। যখন তাঁর ইদ্দতকাল শেষ হলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর কাছে তাঁকে বিবাহের প্রস্তাব দেওয়ার জন্য পাঠালেন। তিনি তাঁর পুত্র উমারকে বললেন: হে উমার, তুমি ওঠো এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে আমার বিবাহ সম্পন্ন করো। অতঃপর সে (পুত্র) তাঁর বিবাহ সম্পন্ন করিয়ে দিল।
এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাথে সহবাসের উদ্দেশ্যে তাঁর কাছে আসতেন। যখনই তিনি তাঁকে দেখতেন, তখনই তাঁর কন্যা যায়নাবকে নিয়ে নিজের কোলে বসিয়ে রাখতেন। ফলে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফিরে যেতেন। ব্যাপারটি আম্মার ইবনু ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (যিনি তাঁর দুধ-ভাই ছিলেন) জানতে পারলেন। তিনি তাঁর কাছে এসে বললেন: এই অপছন্দিতা, তাড়িয়ে দেওয়া (অবাঞ্ছিত) মেয়েটি কোথায়, যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে কষ্ট দিচ্ছে? অতঃপর তিনি (আম্মার) মেয়েটিকে নিলেন এবং নিয়ে চলে গেলেন।
এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কাছে আসলেন এবং তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন। তিনি ঘরের চারদিকে দৃষ্টি বুলিয়ে বললেন: "জুনা-ব (যায়নাব) কী করেছে?" তিনি বললেন: আম্মার এসে তাকে নিয়ে চলে গেছে। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাথে বাসর করলেন এবং বললেন: "আমি তোমাকে সেই জিনিসগুলো থেকে সামান্যও কম দেব না যা আমি অমুককে দিয়েছিলাম: দুটি যাঁতা, দুটি মাটির কলসি এবং খেজুরের ছাল দ্বারা ভরা একটি বালিশ।" তিনি আরও বললেন: "যদি আমি তোমার কাছে সাত দিন থাকি, তবে আমি আমার অন্যান্য স্ত্রীদের কাছেও সাত দিন করে থাকব।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في نسخنا الخطية: فجاء بها، والمثبت من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن الصحيح في رواية يزيد بن هارون عن حماد بن سلمة ذكرُ ابن عمر بن أبي سلمة بين ثابت وعمر بن أبي سلمة، فقد رواه كذلك عنه أحمد 44/ (26697)، ومحمد بن إسماعيل ابن عُليَّة عند النسائي (10843)، ويعقوب بن إبراهيم الدَّورقي عند ابن حبان (2949)، ثلاثتهم عن يزيد بن هارون، عن حماد بن سلمة، عن ثابت، قال: حدثني ابن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أم سلمة.وتابع يزيدَ عليه بذكر ابن عمر بن أبي سلمة روحُ بن عُبادة عند أحمد 26/ (16343)، وعفانُ بن مسلم عنده أيضًا 44/ (26669)، ومحمدُ بن كثير عند النسائي (10844)، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن ابن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أم سلمة، عن أبي سلمة. فجعلوه من حديث أم سلمة عن أبي سلمة في قصة الدعاء، ورواية عفان مطولة.ورواه كذلك عمرو بن عاصم عند الترمذي (3511)، وآدم بن أبي إياس عند النسائي (10842)، وأبو داود الطيالسي عند ابن حجر في "نتائج الأفكار" 4/ 316، ثلاثتهم عن حماد ابن سلمة، به - دون ذكر الواسطة بين ثابت وعمر بن أبي سلمة، وصرَّح ثابت بسماعه منه في رواية آدم. وقال الترمذي: حسن غريب.ورواه عن حماد بن سلمة بذكر الواسطة موسى بنُ إسماعيل التبوذكي عند أبي داود السجستاني (3119) والحاكم فيما سيأتي برقم (6912)، ولم يذكر فيه أبا سلمة.ورواه الحاكم أيضًا برقم (6787) من طريق التبوذكي نفسه عن حماد، فلم يذكر فيه الواسطة وذكر فيه أبا سلمة!وقد أشار الحافظ ابن حجر إلى هذين الاختلافين في إسناد الحديث في "نتائج الأفكار" 4/ 316، فقال: يمكن الجمع بأن يكون ثابت سمعه من ابن عمر عن أبيه، ثم لقي عمرَ فحدَّثه، وأن تكون أم سلمة سمعته عن أبي سلمة عن النبي صلى الله عليه وسلم، ثم لما مات أبو سلمة وأمرها النبي صلى الله عليه وسلم أن تقوله لما سألته، فتذكرت ما كان أبو سلمة حدَّثها، فكانت تحدّث به على الوجهين. قال: ويؤيد هذا الحمل اختلافُ السياقين لفظًا وزيادة ونقصًا.ورواه عن ثابت جماعة غير حماد بن سلمة فلم يذكروا ابنَ عمر بن أبي سلمة في إسناده، فقد أخرجه عبد الرزاق (6701)، وأحمد 44/ (26670)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5754)، والطبراني في "الدعاء" (1230) من طريق جعفر بن سليمان الضُّبَعي.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (1827) عن النضر بن شُميل، وأحمد 44/ (26670) عن عفان بن مسلم، وأحمد بن منيع في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" للبوصيري (3267) عن أبي النضر هاشم بن القاسم، وأبو يعلى في "مسنده" (6908)، وأبو القاسم البَغَوي في "معجم الصحابة" (1398) عن هُدبة بن خالد، وابن حجر في "نتائج الأفكار" 4/ 316 من طريق أبي داود الطيالسي، خمستهم عن سليمان بن المغيرة.وأخرجه الطحاوي في "شرح المشكل" (5755) من طريق زهير بن العلاء.ثلاثتهم (زهير بن العلاء وجعفر بن سليمان وسليمان بن المغيرة) عن ثابت البُناني؛ قال جعفر في روايته: حدثني عمر بن أبي سلمة، وقال زهير: عن عمر بن أبي سلمة، وقال سليمان بن المغيرة: حدثني ابن أبي سلمة، وقيده أبو النضر هاشم بن القاسم وأبو داود الطيالسي في روايتهما عن سليمان بن المغيرة، فقالا: عمر بن أبي سلمة، فوافقت روايته رواية جعفر بن سليمان وزهير. وقد أرسله سليمان بن المغيرة فقال في روايته: عن عمر بن أبي سلمة قال: جاء أبو سلمة إلى أم سلمة، فذكره، وهذا لا يضر، لأنَّ عمر بن أبي سلمة صحابي، ومرسله حجة.وأخرجه ابن ماجه (1598) من طريق عبد الملك بن قدامة بن إبراهيم الجمحي، عن أبيه، عن عمر بن أبي سلمة، عن أم سلمة، عن أبي سلمة. وعبد الملك ضعيف لكن يعتبر به.وأخرجه أحمد 26/ (16344) من طريق المطلب بن عبد الله بن حنطب، عن أم سلمة، عن أبي سلمة.وأخرجه أحمد 44/ (26635)، ومسلم (918) من طريق ابن سفينة مولى أم سلمة، عن مولاته أم سلمة، قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول …وأكثر من تقدَّم يرويه مختصرًا، لكن زاد عفان ويزيد بن هارون في روايتهما عن حماد بن سلمة: أنَّ أبا بكر وعمر خطبا أم سلمة فأبت، ثم خطبها رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخبرته أنها تغار، وأنها ذات صِبية، وأنه ليس لها وليّ شاهد، وأنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أجابها عن كل ذلك. وذكر المطلب في روايته ذلك أيضًا غير أنه ذكر أنها ذكرت للنبي صلى الله عليه وسلم أنها دخلت في السنّ، بدل ذكر الوليّ. واقتصر ابن سفينة في روايته على ذكر الغَيرة وأنَّ لها بنتًا، ووقع في روايته: أنَّ الذي خطبها للرسول صلى الله عليه وسلم هو حاطب بن أبي بلتعة، بدل عمر بن الخطاب.وسيأتي عند المصنف برقم (6911) من طريق أبي وائل شقيق بن سلمة، عن أم سلمة قالت: لما توفي أبو سلمة أتيتُ النبي صلى الله عليه وسلم، فقلت: كيف أقول؟ قال: "قولي: اللهم اغفر لنا وله، وأعقبني منه عقبى صالحة"، فقلتها، فأعقبني الله محمدًا صلى الله عليه وسلم.وأخرجه دون قصة الدعاء أحمد 44/ (26619)، والنسائي (8877)، وابن حبان (4065) من طريق أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث، عن أم سلمة. وفيه: أنها أخبرت النبي صلى الله عليه وسلم بأنها ذات عيال وأنها غيور وأنها كبرت ولا ولد فيها.وأخرج منه آخره المرفوع في تخييرها في التسبيع من هذا الطريق: أحمد 44/ (26504)، ومسلم (1460)، وأبو داود (2122)، وابن ماجه (1917)، والنسائي (8876)، وابن حبان (4210).والرَّحاءان: مثنّى رَحَاء، وهو الطاحون، ويُقصَر فيقال: رَحَى، وهو أشهر، ومثنّاه: رَحَيان ورَحَوان. والمِرفقة: المخدّة والمُتّكأ.
2770 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا مسلم بن إبراهيم وحجاج بن مِنهال، قالا: حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت وإسماعيل بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس: أنَّ أبا طلحة خَطَب أمَّ سُلَيم، فقالت: يا أبا طلحة، ألستَ تعلمُ أنَّ إلهكَ الذي تعبُدُ خشبةٌ نَبَتَت من الأرض نَجَرَها حَبَشيُّ بني فلان؟! إن أنت أسلمتَ لم أُرِدْ منك من الصَّداق غيرَه، قال: حتى أنظُرَ في أمري، قال: فذهب ثم جاء فقال: أشهد أن لا إله إلّا الله وأشهد أنَّ محمدًا رسولُ الله، قالت: يا أنس، زَوِّج أبا طلحة [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ صحيح على شرط الشيخين:
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উম্মু সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তখন তিনি (উম্মু সুলাইম) বললেন: হে আবূ তালহা! তুমি কি জানো না যে, তোমার উপাস্য হলো মাটির থেকে উৎপন্ন একটি কাঠ, যা অমুক গোত্রের এক আবিসিনীয় (হাবশী) লোক তৈরি করেছে? তুমি যদি ইসলাম গ্রহণ করো, তবে তোমার ইসলাম গ্রহণ ছাড়া আমি অন্য কোনো মোহর চাই না। আবূ তালহা বললেন: আমি আমার বিষয়টি বিবেচনা করব। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তিনি চলে গেলেন। অতঃপর ফিরে এসে বললেন: "আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়া আশহাদু আন্না মুহাম্মাদান রাসূলুল্লাহ।" (আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো সত্য মাবুদ নেই এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল।) তখন তিনি (উম্মু সুলাইম) বললেন: হে আনাস, আবূ তালহার সাথে আমার বিবাহ সম্পন্ন করে দাও।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه النسائي (5374) من طريق يزيد بن هارون، عن حماد بن سلمة، به.وأخرجه بنحوه النسائي (5478) من طريق جعفر بن سليمان، عن ثابت وحده، به.وأخرجه أيضًا بنحوه (5478/ 2) من طريق عبد الله بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (4678) عن محمد بن عبد الله الحضرمي، عن عبد الوارث، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (7310)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 19/ 403 من طريق يونس بن محمد، عن حرب بن ميمون، به.
2771 - أخبرني أبو عمرو بن إسماعيل، حدثنا أبو بكر محمد بن إسحاق، حدثنا عبد الوارث بن عبد الصمد بن عبد الوارث بن سعيد العَنْبري، حدثني أبي، حدثنا حَرْب بن ميمون، عن النضر بن أنس، عن أنس: أنَّ أمّ سليم تَزوّجت أبا طلحة على إسلامِه [1].
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ তালহাকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ইসলাম গ্রহণের শর্তে বিবাহ করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (4678) عن محمد بن عبد الله الحضرمي، عن عبد الوارث، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (7310)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 19/ 403 من طريق يونس بن محمد، عن حرب بن ميمون، به.
2772 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن علي الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزة، حدثنا إسماعيل بن الخَليل، حدثنا علي بن مُسهِر، حدثنا داود بن أبي هند، عن الشَّعْبي، عن علقمة بن قيس: أنَّ قومًا أتوا عبد الله بن مسعود، فقالوا له: إنَّ رجلًا منا تزوّج امرأةً ولم يَفْرِضْ لها صداقًا، ولم يَجمَعْها إليه حتى مات، فقال لهم عبد الله: ما سُئلتُ عن شيءٍ منذ فارقتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أشدَّ عليَّ من هذه، فأْتُوا غيري، قالوا: فاختلفوا إليه فيها شهرًا، ثم قالوا له في آخر ذاك: مَن نسألُ إذا لم نسألك وأنت آخِيّةُ أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم في هذا البلد، ولا نَجِدُ غيرك، فقال: سأقول فيها بجُهد رأيي، فإن كان صوابًا فمِن الله وحدَه لا شريك له، وإن كان خطأً فمنّي، واللهُ ورسولُه منه بَريء، أَرى أن أجعلَ لها صَداقًا كصَداق نسائها، لا وَكْسَ ولا شَطَطَ، ولها الميراث، وعليها العِدّة أربعةَ أشهر وعشرًا، قال: وذلك يَسمعُ ناسٌ من أشجَعَ، فقاموا، فقالوا: نشهدُ أنك قضيتَ بمثل الذي قضى به رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في امرأةٍ منا يقال لها: بَرْوَعُ بنتُ واشِقٍ، قال: فما رُئِيَ عبدُ الله فَرِحَ بشيءٍ ما فرحَ يومئذٍ إلّا بإسلامه، ثم قال: اللهم إن كان صوابًا فمنك وحدَك لا شريك لك، وإن كان خطأً فمنّي ومن الشيطان، واللهُ ورسولُه منه بَريءٌ [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.2772 م - سمعتُ أبا عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ وقيل له: سمعتَ الحسن بن سفيان يقول: سمعتُ حرملة بن يحيى يقول: سمعتُ الشافعي يقول: إن صحَّ حديث بَرْوَعَ بنتِ واشِقٍ قلتُ به. فقال أبو عبد الله: لو حضرتُ الشافعيَّ رضي الله عنه لقمتُ على رؤوس أصحابه، وقلتُ: فقد صحَّ الحديثُ، فقُلْ به.قال الحاكم: فالشافعي إنما قال: لو صحَّ الحديثُ، لأنَّ هذه الرواية وإن كانت صحيحةً فإنَّ الفتوى فيه لعبد الله بن مسعود، وسنَدُ الحديث لِنَفَر من أشجَعَ، وشيخُنا أبو عبد الله رحمه الله إنما حَكَمَ بصحّة الحديث لأنَّ الثقة قد سمَّى فيه رجلًا من الصحابة، وهو مَعقِلُ بن سِنان الأشجعي.وبصحة ما ذكرتُه:
আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদল লোক তাঁর কাছে এসে বললেন: আমাদের মধ্য থেকে একজন লোক এক মহিলাকে বিবাহ করেছে, কিন্তু তার জন্য মোহর নির্ধারণ করেনি এবং তার সাথে মিলিতও হয়নি, এমনকি লোকটি মারা গেছে।
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদের বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছ থেকে বিদায় নেওয়ার (তাঁর মৃত্যুর) পর এর চেয়ে কঠিন আর কোনো বিষয়ে আমাকে প্রশ্ন করা হয়নি। তোমরা আমার ছাড়া অন্য কারো কাছে যাও।
তারা (বর্ণনাকারী) বলেন: তারা এক মাস ধরে এই বিষয়ে তাঁর কাছে আসা-যাওয়া করতে থাকল। অবশেষে তারা তাঁকে বলল: আপনি ছাড়া আর কাকে জিজ্ঞাসা করব? অথচ আপনিই এই শহরে মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবীদের মধ্যে প্রধান স্তম্ভ এবং আমরা আপনাকে ছাড়া অন্য কাউকে পাচ্ছি না।
তখন তিনি বললেন: আমি এতে আমার নিজস্ব মত অনুসারে চেষ্টা করে একটি ফায়সালা দেব। যদি তা সঠিক হয়, তবে তা আল্লাহর পক্ষ থেকে, যিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। আর যদি তা ভুল হয়, তবে তা আমার পক্ষ থেকে, আর আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা থেকে মুক্ত।
আমার মনে হয়, তার স্ত্রীদের সাধারণ মোহরের মতো তার জন্য মোহর নির্ধারণ করব—তা যেন খুব কমও না হয় আবার খুব বেশিও না হয়। আর সে মিরাসের (উত্তরাধিকার) অধিকারী হবে, এবং তাকে চার মাস দশ দিন ইদ্দত পালন করতে হবে।
তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: আশজা' গোত্রের কিছু লোক এ কথা শুনছিল। তারা উঠে দাঁড়াল এবং বলল: আমরা সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি সেই একই রায় দিয়েছেন, যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের মধ্যের বারওয়া' বিনতু ওয়াশিক্ব নামক এক মহিলার ব্যাপারে দিয়েছিলেন।
তিনি বলেন: আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইসলাম গ্রহণের দিনের আনন্দের পরে আর কোনো কিছুতেই ততটা খুশি হতে দেখা যায়নি, যতটা তিনি সেদিন খুশি হয়েছিলেন। এরপর তিনি বললেন: হে আল্লাহ! যদি এটি সঠিক হয়, তবে তা একমাত্র আপনার পক্ষ থেকে, আপনার কোনো শরীক নেই। আর যদি এটি ভুল হয়, তবে তা আমার পক্ষ থেকে ও শয়তানের পক্ষ থেকে, আর আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা থেকে মুক্ত।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. الشعبي: هو عامر بن شراحيلوأخرجه النسائي (5494)، وابن حبان (4101) من طريق علي بن حجر، عن علي بن مُسهِر، بهذا الإسناد.وأخرجه مختصرًا أحمد 30/ (18462) من طريق حماد بن سلمة، و (18463) من طريق يحيى ابن زكريا بن أبي زائدة، كلاهما عن داود بن أبي هند، به.وأخرجه مختصرًا أيضًا أحمد 25/ (15943) و 30/ (18461) و (18465) و (18466)، وابن ماجه (1891 م)، والترمذي (1145)، والنسائي (5489) و (5490) و (5493) و (5688)، وابن حبان (4100) من طريق إبراهيم النخعي، عن علقمة، به. وقُرن به في بعض طرقه الأسود بن يزيد النخعي.وسيأتي بعده من طريق مسروق بن الأجدع عن عبد الله بن مسعود.آخيَّة: أي: بقيّة.والوَكْس: النقص، والشَّطَط: الجَوْر.
2773 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن بن مَهدي، عن سفيان، عن فِراس، عن الشَّعبي، عن مسروق، عن عبد الله: في رجلٍ تزوّج امرأةً، فمات ولم يَدخُل بها، ولم يَفْرِض لها، فقال: لها الصَّداقُ كاملًا وعليها العِدّة، ولها الميراث، فقام مَعقِل بن سِنان فقال: شهدتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قَضَى به في بَرْوَعَ بنتِ واشِقٍ [1]. فصار الحديث صحيحًا على شرط الشيخين.
আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি এক মহিলাকে বিবাহ করল, অতঃপর সে তার সাথে সহবাস করার পূর্বেই এবং তার জন্য কোনো মোহর নির্ধারণ করার আগেই মারা গেল। তিনি (আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ) বললেন: তার জন্য পূর্ণ মোহর রয়েছে, তাকে ইদ্দত পালন করতে হবে এবং সে মিরাছের (উত্তরাধিকারের) অংশও পাবে। তখন মা'কিল ইবনু সিনান উঠে দাঁড়ালেন এবং বললেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বারওয়া' বিনতু ওয়াশিক্বের ব্যাপারে এই মর্মে ফায়সালা দিয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. سفيان: هو الثَّوري، وفراس: هو ابن يحيى، والشعبي: هو عامر بن شراحيل، ومسروق: هو ابن الأجدع، وعبد الله: هو ابن مسعود.وهو في "مسند أحمد" 30/ (18464). وأخرجه أبو داود (2114)، وابن ماجه (1891)، والنسائي (5492)، وابن حبان (4098) من طرق عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.
2774 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب حدثنا الربيع بن سليمان المُرادي، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني أسامة بن زيد، أنَّ صفوان بن سُليم حدّثه عن عُرْوة بن الزُّبَير، عن عائشة، أنها قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مِن يُمنِ المرأةِ أن يُتَيسَّرَ في خِطبتِها، وأن يَتَيَسَّر صَدَاقُها، وأن يَتَيسَّر رَحِمُها" [1].قال عُرْوة: يعني يَتَيسَّر رحمُها للولادة. قال عُرْوة: وأنا أقول من عندي: من أول شُؤْمها أن يَكثُر صَداقُها.هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নারীর শুভ লক্ষণসমূহের মধ্যে এই বিষয়গুলো অন্তর্ভুক্ত: তার বিবাহের প্রস্তাব সহজ হওয়া, তার মোহরানা সহজ হওয়া এবং তার গর্ভধারণ সহজ হওয়া।" উরওয়াহ বলেন: অর্থাৎ তার গর্ভধারণ (সন্তান প্রসবের জন্য) সহজ হওয়া। উরওয়াহ আরও বলেন: আর আমি আমার পক্ষ থেকে বলি: তার (নারীর) প্রথম দুর্ভাগ্যের বিষয় হলো তার মোহরানা বেশি হওয়া।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل أسامة بن زيد: وهو الليثي.وأخرجه ابن حبان (4095) عن محمد بن جبريل الشهروزوري، عن الربيع بن سليمان، بهذا الإسناد. لكن بلفظ: "من يمن المرأة تسهيل أمرها وقلة صداقها".وأخرجه أحمد 41/ (24478)، و (24607) من طريقين عن أسامة بن زيد الليثي، به.وقد تقدم برقم (2767) من طريق القاسم بن محمد عن عائشة، بلفظ: "أعظم النساء بركةً أيسَرُهن صَداقًا"، وإسناده صحيح. وسيأتي عند المصنف برقم (6928) من طريق مصعب بن عبد الله الزُّبَيري عن عبد العزيز بن محمد.
2775 - أخبرني محمد بن المؤمَّل، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا عبد الله بن محمد النُّفَيلي، حدثنا عبد العزيز بن محمد، حدثنا يزيد بن الهَادِ، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، قال: سألتُ عائشةَ عن صَدَاقِ النبي صلى الله عليه وسلم، قالت: ثنتا عشرة أُوقِيّةً ونَشٌّ، فقلت: ما نَشٌّ؟ قالت: نصفُ أُوقِيّة [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দেনমোহর সম্পর্কে তাঁকে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: বারো উকিয়া ও এক নাশ। আমি জিজ্ঞেস করলাম: নাশ কী? তিনি বললেন: আধা উকিয়া।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل عبد العزيز بن محمد: وهو الدَّراوردي. محمد بن إبراهيم: هو التيمي.وأخرجه أبو داود (2105) عن عبد الله بن محمد النُّفَيلي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 41/ (24626)، ومسلم (1426)، وابن ماجه (1886)، والنسائي (5487) من طرق عن عبد العزيز بن محمد، به. وزادوا فيه: وذلك خمس مئة درهم. وسيأتي عند المصنف برقم (6928) من طريق مصعب بن عبد الله الزُّبَيري عن عبد العزيز بن محمد.
2776 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا أبو بكر محمد بن شاذان الجَوهَري، حدثنا مُعلَّى بن منصور، حدثنا ابن المُبارك، أخبرنا مَعمَر، عن الزُّهْري، عن عُرْوة، عن أم حَبيبة: أنها كانت تحت عُبيد الله بن جَحْش، فمات بأرضِ الحبشة، فزَوَّجَها النجاشيُّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، وأَمهَرَها عنه أربعةَ آلافٍ، وبعث بها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم مع شُرَحْبيل بن حَسَنةَ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনে জাহশ-এর বিবাহাধীনে ছিলেন। অতঃপর তিনি আবিসিনিয়ার (হাবশা) ভূমিতে মৃত্যুবরণ করেন। তখন নাজ্জাশী (বাদশাহ) তাঁকে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিবাহ দেন এবং তাঁর পক্ষ থেকে চার হাজার মোহর ধার্য করেন। আর শুরাহবিল ইবনে হাসনাহ-এর সাথে তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রেরণ করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وقد اختلف فيه على الزُّهْري في وصله وإرساله، كما بيناه في "مسند أحمد" 45/ (27408)، وقد تابع معمرًا - وهو ابن راشد - على وصله عبد الرحمن بن خالد بن مسافر، كما سيأتي. ابن المبارك: هو عبد الله.وأخرجه أبو داود (2107) عن حجاج بن أبي يعقوب الثقفي، عن معلّى بن منصور، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (27408)، والنسائي (5486) من طرق عن عبد الله بن المبارك، به. وسيأتي من طريقه مختصرًا (5286).وأخرجه مختصرًا أبو داود (2086) من طريق عبد الرزاق، عن معمر، به.وأخرجه ابن حبان (6027) من طريق عبد الرحمن بن خالد بن مسافر، عن ابن شهاب الزُّهْري، به. لكن دون ذكر صداق أم حبيبة.وأخرجه أبو داود (2108) من طريق يونس بن يزيد، عن الزُّهْري مرسلًا. وقُيِّدت به الأربعة آلاف بالدرهم.وسيأتي كذلك عند المصنف برقم (6929) من طريق عبد الرحمن بن عبد العزيز، وبرقم (6923) من طريق عُبيد الله بن أبي زياد الرُّصافي، كلاهما عن الزُّهْري، مرسلًا. لكن ذكر هذا الأخير في مرسله أنَّ صداق أم حبيبة كان أربعين أوقية. وهو غريب، ولم يذكر الآخر الصداق.ويشهد لذكر صداق أم حبيبة مرسل أبي جعفر محمد بن علي بن الحسين الباقر عند ابن إسحاق في "السيرة" كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 224 لكنه قال: أربع مئة دينار، قلنا: والأربع مئة دينار تساوي أربعة آلاف درهم تقريبًا، فاتفقا. وسيأتي هذا المرسل برقم (6927) من طريق أخرى غير طريق ابن إسحاق، وطريق ابن إسحاق أمثل. وانظر ما تقدم برقم (2760).
2777 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل السُّلَمي، حدثني أبو الأَصبَغ عبد العزيز بن يحيى الحرّاني، أخبرنا محمد بن سلمة، عن أبي عبد الرحيم خالد بن أبي يزيد، عن زيد بن أبي أُنَيسة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مَرثَد بن عبد الله، عن عُقْبة بن عامر: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لرجل: "أترضى أن أُزوِّجَك فلانةَ؟ " قال: نعم، وقال للمرأة: "أترضَينَ أن أُزوِّجَك فلانًا؟ " قالت: نعم، فزوَّج أحدَهما صاحبَه، ولم يُفرِضْ لها صَداقًا، ولم يُعطِها شيئًا، وكان ممَّن شهد الحُديبيَة، وكان مَن شهد الحُديبيَةَ له سهمٌ بخيبر، فلما حَضَرتْه الوفاةُ قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم زَوَّجني فلانةَ ولم أفرضْ لها صَداقًا، ولم أُعطِها شيئًا، وإني أُشْهِدُكم أني أعطيتُها صَداقَها سَهمِي بخيبر، فأخذتْ سهمَه فباعتْه بمئة ألفٍ. قال: وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خيرُ الصَّداقِ أيسَرُه" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উকবাহ ইবনে আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে বললেন: "তুমি কি এতে সম্মত যে আমি তোমাকে অমুক মহিলার সাথে বিবাহ দেব?" সে বলল: "হ্যাঁ।" এবং তিনি মহিলাকে বললেন: "তুমি কি এতে সম্মত যে আমি তোমাকে অমুক পুরুষের সাথে বিবাহ দেব?" সে বলল: "হ্যাঁ।" অতঃপর তিনি একজনকে তার সঙ্গীর সাথে বিবাহ দিয়ে দিলেন। তিনি তখন তার জন্য কোনো মোহর নির্ধারণ করেননি এবং তাকে কোনো কিছু দেননি।
আর সেই লোকটি হুদায়বিয়ার সাক্ষীদের অন্তর্ভুক্ত ছিল। যারা হুদায়বিয়ায় উপস্থিত ছিল, তাদের জন্য খায়বারের (লুটের সম্পদে) একটি অংশ (শেয়ার) ছিল। যখন তার মৃত্যু উপস্থিত হলো, তখন সে বলল: "নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে অমুক মহিলার সাথে বিবাহ দিয়েছিলেন, কিন্তু আমি তার জন্য কোনো মোহর নির্ধারণ করিনি এবং তাকে কিছুই দেইনি। আর আমি তোমাদেরকে সাক্ষী রাখছি যে আমি খায়বারে প্রাপ্ত আমার অংশটি তাকে তার মোহর হিসাবে দিয়ে দিলাম।" এরপর সে (মহিলাটি) তার অংশটি নিলো এবং তা এক লক্ষ (দিরহাম/টাকার) বিনিময়ে বিক্রি করলো।
(বর্ণনাকারী) বলেন: আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "উত্তম মোহর হলো, যা সহজে প্রদান করা যায়।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أبو داود (2117) عن محمد بن يحيى الذُّهْلي ومحمد بن المثنّى وعمر بن الخطاب السِّجِسْتاني، ثلاثتهم عن أبي الأصبغ الحَرّاني، بهذا الإسناد. والمرفوع الذي في آخر الحديث هنا في تيسير الصداق لم يذكره غير عمر بن الخطاب السِّجستاني لكن بلفظ: "خير النكاح أيسره"، وذكر أبو داود أنه زاده في أول الحديث.وأخرجه ابن حبان (4072) من طريق هاشم بن القاسم الحرّاني، عن محمد بن سلمة، به.وذكر فيه المرفوع الذي في آخر الحديث في أوله أيضًا.
2778 - أخبرني أبو عمرو بن إسماعيل، حدثنا أبو بكر محمد بن إسحاق الإمام، حدثنا عبد الوارث بن عبد الصمد بن عبد الوارث العَنْبري، حدثني أبي، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، عن محمد بن سِيرِين، عن ابن عمر، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ أعظمَ الذُّنوب عند الله رجلٌ تَزوّج امرأةً، فلما قضى حاجتَه منها طَلَّقها وذَهَب بمَهرِها [1]، ورجلٌ استعملَ رجلًا فذهب بأُجرتِه، وآخَرُ يَقتُل دَابَّةً [2] عَبَثًا" [3].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহর নিকট সবচেয়ে বড় গুনাহ হলো— ঐ ব্যক্তির, যে কোনো নারীকে বিবাহ করল, অতঃপর যখন তার থেকে নিজের প্রয়োজন পূর্ণ করে নিল, তখন তাকে তালাক দিয়ে দিল এবং তার মোহর নিয়ে গেল; আর ঐ ব্যক্তির, যে অন্য কোনো ব্যক্তিকে কাজে লাগাল কিন্তু তার মজুরি আত্মসাৎ করল; এবং আরেক ঐ ব্যক্তির, যে কোনো পশুকে অনর্থক হত্যা করে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في (ز) و (ص) و (ع): مهرها. بإسقاط الباء، والمثبت من (ب) وهو الموافق لرواية البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 241 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الجادة. ابن جعفر، وأحمد (3721) عن عثمان بن مسلم، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 7/ (4115)، وأبو داود (2118) من طريق سفيان الثَّوري، وأحمد (4116)، وأبو داود (2118)، والنسائي (10254) من طريق إسرائيل بن يونس السَّبيعي، والنسائي (10253) من طريق إسماعيل بن حماد بن أبي سليمان، ثلاثتهم عن أبي إسحاق السَّبيعي، به.وأخرجه أحمد 6/ (3721) من طريق شعبة، وأحمد 7/ (4116)، وأبو داود (2118)، والنسائي (10254) من طريق إسرائيل بن يونس السبيعي، وابن ماجه (1892) من طريق يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، والترمذي (1105)، والنسائي (10249) من طريق الأعمش، والنسائي (10250) من طريق عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي، خمستهم عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن أبي الأحوص عوف بن مالك الجُشمي، عن عبد الله بن مسعود.وأخرجه النسائي (10251) من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود، موقوفًا. وهذا لا يضر لثبوت رفعه من غير طريقه.وأخرجه أبو داود (2119) من طريق أبي عياض، عن ابن مسعود. وأبو عياض هذا مجهول.تنبيه: زاد بعضهم في روايته بعدَ قوله: "شرور أنفسنا": "ومن سيئات أعمالنا".
[2] في (ز) و (ص): دابته، والمثبت من (ب) و (ع)، وهو الموافق لرواية البيهقي عن الحاكم، وهو أنسب وأليق. ابن جعفر، وأحمد (3721) عن عثمان بن مسلم، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 7/ (4115)، وأبو داود (2118) من طريق سفيان الثَّوري، وأحمد (4116)، وأبو داود (2118)، والنسائي (10254) من طريق إسرائيل بن يونس السَّبيعي، والنسائي (10253) من طريق إسماعيل بن حماد بن أبي سليمان، ثلاثتهم عن أبي إسحاق السَّبيعي، به.وأخرجه أحمد 6/ (3721) من طريق شعبة، وأحمد 7/ (4116)، وأبو داود (2118)، والنسائي (10254) من طريق إسرائيل بن يونس السبيعي، وابن ماجه (1892) من طريق يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، والترمذي (1105)، والنسائي (10249) من طريق الأعمش، والنسائي (10250) من طريق عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي، خمستهم عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن أبي الأحوص عوف بن مالك الجُشمي، عن عبد الله بن مسعود.وأخرجه النسائي (10251) من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود، موقوفًا. وهذا لا يضر لثبوت رفعه من غير طريقه.وأخرجه أبو داود (2119) من طريق أبي عياض، عن ابن مسعود. وأبو عياض هذا مجهول.تنبيه: زاد بعضهم في روايته بعدَ قوله: "شرور أنفسنا": "ومن سيئات أعمالنا".
2778 [3] - إسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، فهو صدوق.وأخرجه البيهقي 7/ 241 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. ابن جعفر، وأحمد (3721) عن عثمان بن مسلم، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 7/ (4115)، وأبو داود (2118) من طريق سفيان الثَّوري، وأحمد (4116)، وأبو داود (2118)، والنسائي (10254) من طريق إسرائيل بن يونس السَّبيعي، والنسائي (10253) من طريق إسماعيل بن حماد بن أبي سليمان، ثلاثتهم عن أبي إسحاق السَّبيعي، به.وأخرجه أحمد 6/ (3721) من طريق شعبة، وأحمد 7/ (4116)، وأبو داود (2118)، والنسائي (10254) من طريق إسرائيل بن يونس السبيعي، وابن ماجه (1892) من طريق يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، والترمذي (1105)، والنسائي (10249) من طريق الأعمش، والنسائي (10250) من طريق عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي، خمستهم عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن أبي الأحوص عوف بن مالك الجُشمي، عن عبد الله بن مسعود.وأخرجه النسائي (10251) من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود، موقوفًا. وهذا لا يضر لثبوت رفعه من غير طريقه.وأخرجه أبو داود (2119) من طريق أبي عياض، عن ابن مسعود. وأبو عياض هذا مجهول.تنبيه: زاد بعضهم في روايته بعدَ قوله: "شرور أنفسنا": "ومن سيئات أعمالنا".
2779 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرْو، حدثنا الفضل بن عبد الجبار، حدثنا النضر بن شُميل، حدثنا شعبة.وأخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، قال: سمعت أبا إسحاق يحدِّث عن أبي عُبيدة، عن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه عَلَّمنا خُطبةَ الحاجَةِ: "الحمدُ لله نَحَمَدُه ونَستعينُه ونَستَغفِرُه، ونَعوذُ بالله من شُرور أنفُسِنا، من يَهْدِه اللهُ فلا مُضِلَّ له، ومن يُضلِلْ فلا هادي له، وأشهدُ أن لا إله إلا الله، وأشهدُ أنَّ محمدًا عبده ورسوله"، ثم يقرأُ ثلاث آيات: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِ وَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنْتُمْ مُسْلِمُونَ} [آل عمران: 102]، {يَاأَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَبَثَّ مِنْهُمَا رِجَالًا كَثِيرًا وَنِسَاءً وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي تَسَاءَلُونَ بِهِ وَالْأَرْحَامَ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَيْكُمْ رَقِيبًا} [النساء: 1]، {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَقُولُوا قَوْلًا سَدِيدًا (70) يُصْلِحْ لَكُمْ أَعْمَالَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ فَازَ فَوْزًا عَظِيمًا} [الأحزاب: 70، 71]، ثم يذكر حاجتَه [1].
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে ‘খুতবাতুল হাজাহ’ (প্রয়োজনীয় ভাষণ) শিক্ষা দিয়েছেন। তা হলো: "সকল প্রশংসা আল্লাহর, আমরা তাঁর প্রশংসা করি, তাঁর কাছে সাহায্য চাই এবং তাঁর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করি। আমরা আমাদের আত্মার অনিষ্টসমূহ থেকে আল্লাহর নিকট আশ্রয় চাই। আল্লাহ যাকে পথ দেখান, তাকে পথভ্রষ্টকারী কেউ নেই, আর আল্লাহ যাকে পথভ্রষ্ট করেন, তাকে পথপ্রদর্শনকারী কেউ নেই। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আরও সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল।"
এরপর তিনি তিনটি আয়াত তিলাওয়াত করতেন:
(হে মুমিনগণ, তোমরা আল্লাহকে যথার্থভাবে ভয় কর এবং মুসলিম না হয়ে মৃত্যুবরণ করো না।) [সূরা আলে ইমরান: ১০২]
(হে মানবজাতি, তোমরা তোমাদের রবকে ভয় কর, যিনি তোমাদেরকে এক ব্যক্তি থেকে সৃষ্টি করেছেন এবং তার থেকে তার জোড়া সৃষ্টি করেছেন। আর তাদের দু’জন থেকে বহু পুরুষ ও নারী ছড়িয়ে দিয়েছেন। আর আল্লাহকে ভয় কর, যার মাধ্যমে তোমরা একে অপরের কাছে কিছু চাও এবং (ভয় কর) রক্ত-সম্পর্ককে। নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের উপর পর্যবেক্ষক।) [সূরা আন-নিসা: ১]
(হে মুমিনগণ, তোমরা আল্লাহকে ভয় কর এবং সঠিক কথা বল। (৭০) তিনি তোমাদের জন্য তোমাদের আমল-কর্মসমূহ সংশোধন করে দেবেন এবং তোমাদের পাপরাশি ক্ষমা করে দেবেন। আর যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের আনুগত্য করে, সে তো মহাসাফল্য লাভ করল।) [সূরা আহযাব: ৭০-৭১]
এরপর তিনি তাঁর প্রয়োজন উল্লেখ করতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات إلّا أنَّ عُبيدة - وهو ابن عبد الله بن مسعود - لم يسمع من أبيه، لكنه قد توبع، وعبد الرحمن بن الحسن القاضي متابع أيضًا.وأخرجه أحمد 6/ (3720)، والنسائي (1721) و (5503) و (10252) من طريق محمد ابن جعفر، وأحمد (3721) عن عثمان بن مسلم، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 7/ (4115)، وأبو داود (2118) من طريق سفيان الثَّوري، وأحمد (4116)، وأبو داود (2118)، والنسائي (10254) من طريق إسرائيل بن يونس السَّبيعي، والنسائي (10253) من طريق إسماعيل بن حماد بن أبي سليمان، ثلاثتهم عن أبي إسحاق السَّبيعي، به.وأخرجه أحمد 6/ (3721) من طريق شعبة، وأحمد 7/ (4116)، وأبو داود (2118)، والنسائي (10254) من طريق إسرائيل بن يونس السبيعي، وابن ماجه (1892) من طريق يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، والترمذي (1105)، والنسائي (10249) من طريق الأعمش، والنسائي (10250) من طريق عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي، خمستهم عن أبي إسحاق السَّبيعي، عن أبي الأحوص عوف بن مالك الجُشمي، عن عبد الله بن مسعود.وأخرجه النسائي (10251) من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود، موقوفًا. وهذا لا يضر لثبوت رفعه من غير طريقه.وأخرجه أبو داود (2119) من طريق أبي عياض، عن ابن مسعود. وأبو عياض هذا مجهول.تنبيه: زاد بعضهم في روايته بعدَ قوله: "شرور أنفسنا": "ومن سيئات أعمالنا".
2780 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا جعفر بن محمد بن سَوّار ومحمد بن نُعَيم، قالا: حدثنا قُتيبة بن سعيد، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن سُهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا رَفّأ الإنسانَ إذا تَزوّج قال: "بارَكَ اللهُ لك وبارَكَ عليكَ، وجَمَعَ بينكما في خَيرٍ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো ব্যক্তিকে বিবাহ উপলক্ষে শুভেচ্ছা জানাতেন, তখন বলতেন: "আল্লাহ তোমার জন্য বরকত দান করুন এবং তোমার উপর বরকত বর্ষণ করুন, আর তোমাদের উভয়কে কল্যাণের সাথে একত্রিত করুন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل عبد العزيز بن محمد: وهو الدراوردي. سهيل: هو ابن أبي صالح السمّان.وأخرجه أحمد 14/ (8957)، وأبو داود (2130)، والترمذي (1091) عن قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد (8956)، وابن ماجه (1905)، والنسائي (10017)، وابن حبان (4052) من طرق عن عبد العزيز بن محمد، به.رفّأ، يُهمَز ولا يُهمز؛ أي: دعا له بالرِّفاء، وهو الالتئام والاتفاق والبركة والنَّماء.