আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
2781 - حدثنا يحيى بن منصور القاضي، حدثنا أبو بكر محمد بن محمد بن رجاء، حدثنا محمد بن أبي السَّرِي العَسْقلاني، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جُرَيج، عن صفوان بن سُليم، عن سعيد بن المسيّب، عن رجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم من الأنصار، يقال له: نَضْرة، قال: تزوّجتُ امرأة بِكْرًا في سِتْرها، فدخلتُ عليها فإذا هي حُبلَى، فقال لي النبي صلى الله عليه وسلم: "لها الصَّداقُ بما استَحلَلْتَ من فَرجِها، والولدُ عَبدٌ لك، فإذا وَلَدَت فاجلِدُوها" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهدٌ من حديث يحيى بن أبي كثير:
নধরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি একজন কুমারী মহিলাকে বিবাহ করলাম, অতঃপর আমি তার নিকট প্রবেশ করার পর দেখি যে সে গর্ভবতী। তখন নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: তুমি তার লজ্জাস্থান হালাল করে নেওয়ায় সে মোহর পাবে। আর সন্তান হবে তোমার গোলাম (দাস)। যখন সে জন্ম দেবে, তখন তোমরা তাকে বেত্রাঘাত করো।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لعلتين، الأُولى: أنَّ ابن جُرَيج - وهو عبد الملك بن عبد العزيز المكي - لم يسمعه من صفوان بن سُليم، كما توضحه رواية عبد الرزاق التي في "المصنف" (10705) حيث جاء فيها: عن ابن جُرَيج قال: حُدِّثتُ عن صفوان بن سُليم؛ وقد عُرفت الواسطة بينهما في رواية إسحاق بن إبراهيم بن كامَجرا عن عبد الرزاق عند الدارقطني (3616)، حيث قال فيها عبد الرزاق: حديث ابن جُرَيج عن صفوان: هو ابن جُرَيج عن إبراهيم بن أبي يحيى عن صفوان بن سليم. قلنا: وإبراهيم هذا متروك. والعلة الثانية: أنه رواه عن سعيد بن المسيب جماعةٌ غيرُ صفوان كما أشار إليه أبو داود بإثر (2131) فأرسلوه، وهو الصواب، وقد نبَّه على هاتين العلتين جماعةٌ، منهم أبو حاتم الرازي في "العلل" لابنه (1259)، وعبد الحق الإشبيلي في "أحكامه الوسطى" 3/ 156، والبيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 157، وابن القيم في "تهذيب سنن أبي داود" 3/ 60 - 61.وضعَّف الإمامُ أحمد الحديث في الجملة كما نقله عنه إسحاق بن منصور الكوسج في "مسائله" (2708).وأخرجه أبو داود (2131) عن محمد بن أبي السَّرِيّ ومخلد بن خالد والحسن بن علي، عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد.وانظر تمام تخريجه موصولًا ومرسلًا في "سنن أبي داود" بتحقيقنا.وسيأتي برقم (6659) من طريق محمود بن غيلان عن عبد الرزاق.وبعده من طريق يزيد بن نُعيم عن سعيد بن المسيب، موصولًا كذلك، لكنه مُعَلٌّ.تنبيه: قد اختُلف في ضبط اسم صحابي الحديث كما بيّنه ابن القيم في "تهذيب السنن"، وابن حجر في "الإصابة" 1/ 319، فقيل أيضًا: إنه بالباء الموحدة والصاد المُهملة، وقيل: نضلة، بالنون والضاد المعجمة واللام.
2782 - حدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا الحسين بن محمد بن زياد، حدثنا محمد بن المثنّى، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن يزيد بن نُعيم، عن سعيد بن المسيّب، عن نَضْرة بن أكْثم: أنه نكَحَ امرأةً بِكرًا، ودخل بها، فوجَدَها حُبلَى، فجعل النبي صلى الله عليه وسلم ولدها عبدًا له، وفَرّق بينهما [1].
নযরা ইবনে আকসাম থেকে বর্ণিত, তিনি একজন কুমারী মহিলাকে বিবাহ করলেন এবং তার সাথে সহবাস করলেন। অতঃপর তিনি দেখলেন যে সে গর্ভবতী। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সন্তানকে তার জন্য গোলাম বানিয়ে দিলেন এবং তাদের দু'জনের মাঝে বিচ্ছেদ ঘটিয়ে দিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن وصله وهمٌ من الحسين بن محمد بن زياد أو ممَّن دونه، فقد رواه أبو داود السِّجستاني عن محمد بن المثنى مرسلًا، ويؤيده أنه رواه عبد الله بن المبارك عن علي بن المبارك مرسلًا، وقال أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه (1259): رواه يحيى بن أبي كثير عن يزيد بن نعيم عن سعيد بن المسيب لا يجاوزه، مرفوعًا.وأخرجه أبو داود (2132) عن محمد بن المثنى، بهذا الإسناد عن سعيد بن المسيب: أنَّ رجلًا يقال له: بَصْرة بن أكثم، فذكره.وأخرجه سعيد بن منصور (693)، ومن طريقه حرب بن إسماعيل في "مسائله" 1/ 307، والبيهقي 7/ 155 عن عبد الله بن المبارك، عن علي بن المبارك، به مرسلًا أيضًا.
2783 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، أخبرنا عبد الله بن الأسود القُرشي، عن عامر بن عبد الله بن الزُّبَير، عن أبيه، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: "أعلِنُوا النكاحَ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা বিবাহকে প্রকাশ করো।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل عبد الله بن الأسود القرشي، فقد قال عنه الدارقطني: مصري لا بأس به، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وصحَّح حديثه هذا، وروى عنه عبد الله بن وهب وعبد الله بن عياش القِتْباني.وأخرجه أحمد 26/ (16130) عن هارون بن معروف، وابن حبان (4066) من طريق حرملة بن يحيى، كلاهما عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.
2784 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مِهْران، حدثنا محمد بن سابِق، حدثنا إسرائيل، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، قالت: نَقَلْنا امرأةً من الأنصار إلى زوجها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هل كان معكم لهوٌ، فإنَّ الأنصارَ يُحِبُّون اللهوَ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা আনসার সম্প্রদায়ের একজন মহিলাকে তার স্বামীর কাছে পৌঁছে দিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "তোমাদের সাথে কি কোনো আমোদ-প্রমোদ ছিল? কেননা আনসাররা আমোদ-প্রমোদ পছন্দ করে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن مهران - وهو ابن خالد الأصبهاني - وقد توبع.وأخرجه البخاري (5162) عن الفضل بن يعقوب، عن محمد بن سابق، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه بنحوه أحمد 43/ (26313)، وابن حبان (5875) من طريق سهل بن أبي حَثْمة، عن عائشة. لكن بلفظ: "يُحبُّون الغناء". وإسناده حسن.
2785 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا عمرو بن عَوْن، أخبرنا وكيع، عن شعبة، عن أبي بَلْج يحيى بن سُلَيم، قال: قلت لمحمد بن حاطِب: تَزَوّجتُ، امرأتين ما كان في واحدةٍ منهما صوتٌ - يعني دُفًّا - فقال محمد: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "فَصْلُ ما بين الحَلالِ والحرامِ الصوتُ بالدُّفِّ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
মুহাম্মাদ ইবনু হাতিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাবী আবু বালজ ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম বলেন) আমি তাঁকে বললাম: আমি দু’জন মহিলাকে বিয়ে করেছি, তাদের কারো বিয়েতে কোনো শব্দ—অর্থাৎ দফ—ছিল না। তখন মুহাম্মাদ ইবনু হাতিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "হালাল ও হারামের (বিবাহের) মধ্যে পার্থক্য হলো দফের (ঢোলের) আওয়াজ।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل أبي بَلْج يحيى بن سليم، ويقال في اسم أبيه غير ذلك.وأخرجه أحمد 30/ (18280) عن محمد بن جعفر، والنسائي في "المجتبى" (3370) من طريق خالد بن الحارث، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 24/ (15451)، وابن ماجه (1896)، والترمذي (1088)، والنسائي في "الكبرى" (5537)، وفي "المجتبى" (3369) من طريق هُشَيم بن قشير، وأحمد 30/ (18279) من طريق أبي عوانة، كلاهما عن أبي بَلْج، به. وقال الترمذي: حديث حسن. وقال عبد الحق الإشبيلي في "أحكامه الوسطى" 3/ 160: وغير الترمذي يقول: صحيح.قال ابن الأثير: المراد به إعلان النكاح.
2786 - أخبرني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب.وحدثنا أبو علي الحافظ، أخبرنا علي بن العباس البَجَلي؛ قالا: حدثنا محمد بن بشار، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، سمعتُ أبا إسحاقَ يحدّث عن عامر بن سَعْد، أنه قال: كنت مع ثابت بن وَدِيعةَ وقَرَظة بن كعب في عُرس، فسمعتُ صوتًا، فقلت: ألا تَسمعان؟! فقالا: إنه رُخِّص في الغناء في العُرس، والبكاءِ على الميت مِن غير نِياحَةٍ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد رواه شَريك بن عبد الله عن أبي إسحاق مُفسَّرًا مُلخَّصًا:
কারাযাহ ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমের ইবনে সা'দ বলেন: আমি সাবিত ইবনে ওয়াদী'আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং কারাযাহ ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে একটি বিয়েতে উপস্থিত ছিলাম। আমি একটি শব্দ শুনতে পেলাম। আমি বললাম: আপনারা কি শুনতে পাচ্ছেন না?! তখন তাঁরা দুজন বললেন: নিশ্চয়ই বিয়েতে গান করার এবং মৃত ব্যক্তির জন্য বিলাপ (উচ্চস্বরে ক্রন্দন/নিয়াহা) ছাড়া কাঁদার অনুমতি দেওয়া হয়েছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل عامر بن سعد: وهو البَجَلي.وانظر ما بعده. عند أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (1680)، فلا مُخالفة عندئذٍ.
2787 - حدَّثَناه أبو بكر بن أبي دارِم، الحافظ، حدثنا عمر بن جعفر المُزَني، حدثنا أبو غسان مالك بن إسماعيل، حدثنا شَريك، عن أبي إسحاق، عن عامر بن سعد، قال: دخلتُ على قَرَظةَ بن كعب وأبي مسعود الأنصاري في عُرس، وإذا جَوارٍ يُغنِّين، فقلت: أنتم أصحابُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأهلُ بدر يُفعَل هذا عندكم؟! فقالا: إن شئتَ فأقِمْ معنا، وإن شئتَ فاذهب، فإنه قد رُخِّص لنا في اللَّهو عند العُرس، وفي البُكاء عند المُصيبة؛ قال شريك: أُراه قال: في غير نَوْحٍ [1].
আমির ইবনে সা'দ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি কারাজা ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আবূ মাসউদ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে একটি বিবাহ অনুষ্ঠানে প্রবেশ করলাম, আর সেখানে দেখলাম কিছু যুবতী গান গাইছে। তখন আমি বললাম: আপনারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবী এবং বদর যুদ্ধের লোক, আপনাদের কাছে এই কাজ করা হচ্ছে?! তারা দুজন বললেন: আপনি চাইলে আমাদের সাথে থাকুন, আর চাইলে চলে যান। কারণ, আমাদের জন্য বিবাহ অনুষ্ঠানে আনন্দ-ফুর্তি এবং বিপদের সময় ক্রন্দন করার অনুমতি দেওয়া হয়েছে। শারিক বলেন: আমার ধারণা, তিনি (আবু ইসহাক) বলেছেন: তবে বিলাপ (নওহা) করা যাবে না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن بما قبله، وابن أبي دارم مُتكلَّم فيه، وعمر بن جعفر المزني - وهو ابن إبراهيم أبو بكر، وإن روى عنه اثنان غير ابن أبي دارم، وكان صاحب كتاب - لم يؤثر توثيقه عن أحد، لكنهما قد توبعا.فقد أخرجه النسائي (5539) عن علي بن حُجْر، عن شريك النخعي، بهذا الإسناد.وقد خالف عليَّ بنَ حُجر يحيى بنُ عبد الحميد الحِمّانيُّ، فرواه فيما تقدم برقم (353) عن شريك النخعي، عن عثمان بن أبي زُرعة، عن عامر بن سعد. فذكر عثمانَ بن أبي زُرعة بدل أبي إسحاق السَّبيعي، لكن يحيى الحِمّاني فيه ضعف، وأما علي بن حجر فثقة، فروايته مُقدَّمة، ويؤيده أنه قد رواه شعبة أيضًا عن أبي إسحاق في الطريق السابقة، وكذا رواه غير واحدٍ عن أبي إسحاق، وذلك يدلُّ قطعًا على وهم يحيى الحِمّاني فيه، وإن كان عثمانُ المذكورُ ثقةً.لكن بقي فيه مخالفة شريك لشعبة في ذكر أبي مسعود الأنصاري بدل ثابت بن وَديعة، وقد ثبت أنَّ الثلاثة المذكورين كانوا حاضرين وقتئذٍ، كما تدل عليه رواية يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي عن أبيه عند أحمد بن منيع في "مسنده" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (1680)، فلا مُخالفة عندئذٍ.
2788 - حدثني علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا إسماعيل بن أبي أويس، حدثني أبي، عن يحيى بن سعيد، عن عَمْرة، عن عائشة، قالت: سمع النبي صلى الله عليه وسلم ناسًا يتغنَّون في عُرس لهم:وأهدى لها أكبُشًا … تَبَحبَحْنَ فِي مِربَدِوحِبُّكِ في النادي … ويَعلَمُ ما في غدِفقال النبي صلى الله عليه وسلم: "لا يَعلمُ ما في غَدٍ إلَّا اللهُ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কোনো এক বিবাহ অনুষ্ঠানে কিছু লোককে গান গাইতে শুনলেন। তারা গাইছিল:
“সে তাকে ভেড়া উপহার দিয়েছে... যা খোঁয়াড়ে শুয়ে আছে,
আর তোমার প্রিয়তম মজলিশে রয়েছে... এবং সে জানে আগামীকালের (ভবিষ্যতের) কথা।”
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আগামীকালের (ভবিষ্যতের) কথা আল্লাহ্ ছাড়া আর কেউ জানে না।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف أبي أويس - وهو عبد الله بن عبد الله الأصبحي - وقد خالفه في إسناد هذا الحديث سفيانُ بن عيينة وحماد بن زيد، كما نبّه عليه أبو حاتم الرازي في "العلل" لابنه (2300)، والدارقطني في "العلل" (3917)، حيث رويا الحديث عن يحيى بن سعيد - وهو الأنصاري - عن عجوز، عن عجوز أُخرى، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وقد رواه سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن عَمرة بنت عبد الرحمن، مرسلًا دون ذكر عائشة. وما قاله ابن عيينة وحماد بن زيد هو المحفوظ، وهاتان العجوزان مبهمتان، وبذلك يتبين لنا أنَّ تحسين الحافظ ابن حجر لإسناده في "الفتح" 15/ 402 فيه ترخُّص وتساهل.وأخرجه البيهقي 7/ 289 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (2108 - كشف الأستار)، وابن المنذر في "الأوسط" (7164)، والطبراني في "الأوسط" (3401)، و"الصغير" (343)، والبيهقي 7/ 289 من طرق عن ابن أبي أويس، به.وأخرجه البيهقي 7/ 289 من طريق سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة، قالت: كان النساء … فذكره مرسلًا.وأخرجه ابن أبي حاتم الرازي في "العلل" (2300) عن أبيه، عن أبي غسان يوسف بن موسى التُّسْتَري، عن سفيان بن عيينة، عن يحيى بن سعيد، قال: حدثتني عجوز لنا، عن عجوز لهم، قالت …تَبحبحنَ: أي تمكَّنَّ وتوسَّطنَ.
2789 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن السُّدِّي، عن أبي صالح، عن أم هانئ بنت أبي طالب، قالت: خَطَبني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فاعتَذَرْتُ إليه، فعَذَرني، ثم أُنزل عليه {إِنَّا أَحْلَلْنَا لَكَ أَزْوَاجَكَ} الآية [الأحزاب: 50]، فقالت: لم أكُن أَحِلُّ له، لم أُهاجِرْ معه، وكنتُ مع الطُّلَقاء [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উম্মে হানি বিনতে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তখন আমি তাঁর কাছে অপারগতা প্রকাশ করলাম, আর তিনি আমাকে ক্ষমা করে দিলেন। অতঃপর তাঁর উপর এই আয়াতটি নাযিল হলো: {নিশ্চয় আমি আপনার জন্য হালাল করেছি আপনার স্ত্রীদেরকে...} আয়াতটি (সূরা আহযাব: ৫০)। তিনি (উম্মে হানি) বললেন: আমি তাঁর জন্য হালাল ছিলাম না, কারণ আমি তাঁর সাথে হিজরত করিনি, আর আমি ছিলাম ‘তুলাকা’দের (মক্কা বিজয়ের পর মুক্তিপ্রাপ্তদের) অন্তর্ভুক্ত।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف أبي صالح - وهو باذام أو باذان مولى أم هانئ - ومع ذلك حسَّن الترمذي حديثه هذا إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، والسُّدِّي: هو إسماعيل بن عبد الرحمن.وأخرجه الترمذي (3214) عن عبد بن حُميد، عن عبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 10/ 147 عن أبي نعيم الفضل بن دُكين، عن عبد السلام بن حرب المُلائي، عن إسماعيل بن عبد الرحمن السُّدِّي، عن أبي صالح مولى أم هانئ مرسلًا، قال: خطب رسول الله صلى الله عليه وسلم أم هانئ بنت أبي طالب، فقالت: يا رسول الله، إني مُؤْيِمة وبَنِيَّ صِغار، قال: فلما أدرَكَ بنوها عرضت نفسها عليه، فقال: "أما الآن فلا"؛ لأنَّ الله أنزل عليه … فذكر الآية، ولم تكن من المهاجرات.وسيتكرر برقم (3616) و (7046). بلفظ: بعث معها بخَميلة ووسادة من أدَم حَشْوُها ليف ورَحَيين وسقاء وجرّتين.وأخرجه ابن ماجه (4152) من طريق محمد بن فضيل، عن عطاء، به. وفسَّرَ الخميل في روايته بالقطيفة البيضاء من الصوف. وروايته بنحو رواية زائدة.
2790 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، الفقيه وأبو بكر بن بالَوَيهِ؛ قال الشيخ أبو بكر: أخبرنا، وقال ابن بالَوَيهِ: حدثنا محمد بن أحمد بن النضر، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا زائدة، عن عطاء بن السائب، عن أبيه، عن علي، قال: جَهَّز رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فاطمةَ في خَمِيل وقِرْبةٍ ووِسادة من أَدَمٍ حَشْوُها لِيفٌ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতেমাকে একটি পশমী চাদর (খামিল), একটি মশক (পানি বহনের চামড়ার পাত্র) এবং একটি চামড়ার বালিশ, যার ভেতরে খেজুর গাছের আঁশ ভরা ছিল— এসব উপকরণ দিয়ে সজ্জিত করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. زائدة - وهو ابن قدامة - سماعه من عطاء بن السائب قبل اختلاطه.وأخرجه أحمد 2/ (853) عن معاوية بن عمرو، بهذا الإسناد. وقرن أحمد بمعاوية أبا سعيد مولى بني هاشم.وأخرجه أحمد (819) و (838) عن عفان بن مسلم، عن حماد بن سلمة، عن عطاء بن السائب، به، ضمن قطعة مطولة في شكوى علي وفاطمة إلى النبي صلى الله عليه وسلم ما يجدانه من التعب وسؤالهما منه خادمًا. وحماد بن سلمة ممن سمع عطاء قبل اختلاطه أيضًا، وجاء في روايته زيادةٌ على ما في رواية زائدة، بلفظ: بعث معها بخَميلة ووسادة من أدَم حَشْوُها ليف ورَحَيين وسقاء وجرّتين.وأخرجه ابن ماجه (4152) من طريق محمد بن فضيل، عن عطاء، به. وفسَّرَ الخميل في روايته بالقطيفة البيضاء من الصوف. وروايته بنحو رواية زائدة.
2791 - أخبرنا إسماعيل بن محمد بن إسماعيل الفقيه بالرَّي، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا نوح بن يزيد المؤدِّب، حدثنا إبراهيم بن سعد، عن محمد بن إسحاق، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، قالت: أرادتْ أمي أن تُسَمِّنِّي لِدُخولي على رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فلم أُقبِلْ عليها بشيءٍ مما تُريدُ، حتى أَطعَمتْني القِثّاء والرُّطَب، فَسَمِنْتُ عليه كأحسنِ السِّمَن [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার মা চাইলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আমার গমনের (বিবাহের) জন্য তিনি যেন আমাকে মোটা-তাজা করেন। কিন্তু তিনি যা চাইছিলেন, তার কোনো কিছুতেই আমি সাড়া দিচ্ছিলাম না (আমার ওজন বাড়ছিল না)। অবশেষে তিনি আমাকে কিস্সা’ (শসা জাতীয় ফল) ও রুতাব (পাকা টাটকা খেজুর) খাওয়ালেন, ফলে আমি খুব সুন্দরভাবে মোটা হয়ে গেলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن إسحاق - وهو ابن يسار - وهو وإن لم يصرح بسماعه، متابَع.وأخرجه أبو داود (3903) عن محمد بن يحيى الدُّهْلي، عن نوح بن يزيد، بهذا الإسناد.وأخرجه النسائي (6691) من طريق إسحاق بن منصور، عن إبراهيم بن سعد، به. لكنه قال في روايته: القثاء بالتمر.وأخرجه ابن ماجه (3324) من طريق يُونُس بن بكير، قال: حدثنا هشام بن عروة، به.وقول عائشة: فلم أُقبِل عليها بشيء مما تريد، معناه: لم أَستجب لذلك. وأخرجه النسائي (9998) عن عمرو بن علي الفلّاس، عن يحيى القطان، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (2160)، وابن ماجه (1918)، و (2252) من طريقين عن ابن عجلان، به.قوله: "جُبِلت عليه" أي: خُلِقت وطُبعت عليه من الأخلاق.
2792 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى الشهيد، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد، حدثنا ابن عَجْلان، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا أفادَ أحدُكم الجاريةَ أو المرأةَ أو الدابَّة، فليأخُذ بناصيَتِها وليَدْعُ بالبَرَكة، وليقل: اللهم إني أسألك خيرَها وخير ما جُبِلَتْ عليه، وأعوذ بك من شَرِّها وشَرِّ ما جُبِلَتْ عليه، وإن كان بعيرًا فليأخُذ بذِرْوةِ سَنامِه" [1]. هذا حديث صحيح على ما ذَكَرناه من روايات الأئمة الثقات عن عمرو بن شُعيب، ولم يُخرجاه عن عمرو في الكتابَين.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ কোনো দাসী, মহিলা অথবা কোনো চতুষ্পদ জন্তু লাভ করে, তখন সে যেন তার কপালের সম্মুখভাগের চুল ধরে বরকতের জন্য দু'আ করে এবং বলে: "হে আল্লাহ! আমি এর কল্যাণ এবং যে স্বভাবের উপর একে সৃষ্টি করা হয়েছে তার কল্যাণ আপনার কাছে প্রার্থনা করি। আর আমি এর অনিষ্ট ও যে স্বভাবের উপর একে সৃষ্টি করা হয়েছে তার অনিষ্ট থেকে আপনার আশ্রয় চাই।" আর যদি তা উট হয়, তবে সে যেন এর কুঁজের অগ্রভাগ ধরে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن. ابن عجلان: هو محمد، ويحيى بن سعيد: هو القطان. وأخرجه النسائي (9998) عن عمرو بن علي الفلّاس، عن يحيى القطان، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (2160)، وابن ماجه (1918)، و (2252) من طريقين عن ابن عجلان، به.قوله: "جُبِلت عليه" أي: خُلِقت وطُبعت عليه من الأخلاق.
2793 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا أسَد بن موسى، حدثنا حمّاد [1] بن سَلَمة، عن سعيد بن جُمْهان، عن سَفِينة: أنَّ عليًّا أضافَ رجلًا وصنع له طعامًا، فقال: لو دَعَونا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فأكَلَ معنا، فدعَوَا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فجاء فرأى فِراشًا [2] قد ضُرِب في ناحيةِ البَيت فرجَعَ، فقالت فاطمةُ: ارجِعْ فقل له: ما رَجَعَكَ يا رسول الله؟ فذهب، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ليس لنبيٍّ أن يدخُلَ بيتًا مُزوَّقًا" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
সাফীনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একজন মেহমানকে আতিথেয়তা করলেন এবং তার জন্য খাবার তৈরি করলেন। অতঃপর (কেউ) বললেন, "যদি আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দাওয়াত দিতাম আর তিনি আমাদের সাথে খেতেন!" অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দাওয়াত দিলেন। তিনি এলেন এবং ঘরের এক কোণে একটি সজ্জিত পর্দা (বা সজ্জা) টাঙানো দেখে ফিরে গেলেন। তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "ফিরে যাও এবং তাঁকে বলো: হে আল্লাহর রাসূল! কিসে আপনাকে ফিরিয়ে দিল?" সে গেল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "কোনো নবীর জন্য কারুকার্যময় (বা অতিরিক্ত সজ্জিত) ঘরে প্রবেশ করা উচিত নয়।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في (ز): أحمد، وهو خطأ.
[2] كذا جاء في النسخ الخطية: فراشًا، وفي سائر مصادر تخريج هذا الحديث: قِرامًا، بالقاف بدل الفاء، وبالميم بدل الشين المعجمة، وقد فُسِّر القِرام بأنه ثوب فيه رُقوم ونقوش، وفُسِّر أيضًا بأنه ثوب من صوف غليظ جدًّا يُفرَش في الهودج، فلعله كان مما يُفرش في البيت أيضًا، فيكون معنى الفراش القِرام، أو هو تحريف عن القِرام، والله تعالى أعلم.
2793 [3] - إسناده قوي من أجل سعيد بن جمهان.وأخرجه ابن حبان (6354) عن ابن خزيمة، عن الربيع بن سليمان، به. لكن مختصرًا بلفظ: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يكن يدخل بيتًا مرقومًا.وأخرجه أحمد 36/ (21922) و (21934) عن أبي كامل مظفّر بن مدرك، وأحمد (21926) وابن ماجه (3360) من طريق عفّان بن مسلم، وأحمد (21933) عن بهز بن أسد، وأبو داود (3755) عن موسى بن إسماعيل، أربعتهم عن حماد بن سلمة، به.والمزوّق: المُزيَّن.
2794 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سَلْمان الفقيه، حدثنا جعفر بن أبي عثمان الطيالسي، حدثنا عفان ومحمد بن سِنان، قالا: حدثنا همّام، عن قَتَادة، عن النضْر بن أنس، عن بَشير بن نَهِيك، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "إذا كانت عند الرجُل امرأتانِ فلم يَعدِلْ بينَهما، جاء يومَ القيامة وشِقُّه ساقِطٌ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখন কোনো পুরুষের কাছে দুজন স্ত্রী থাকে, আর সে তাদের মাঝে ইনসাফ করে না, তখন সে কিয়ামতের দিন এমন অবস্থায় আসবে যে তার শরীরের অর্ধেক অংশ (এক পাশ) ঝুলে পড়বে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. همام: هو ابن يحيى العَوْذي.وأخرجه أحمد 14/ (8568) عن عفان بن مسلم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 13/ (7936) و 14/ (8568) و 16/ (10090)، وأبو داود (3133)، وابن ماجه (1969)، والترمذي (1141)، والنسائي (8839)، وابن حبان (4207) من طرق عن همام بن يحيى، به.وذكر الترمذي بإثره أنَّ هشامًا الدستوائي رواه عن قتادة فقال: كان يقال. ولم يسنده، ولم نقف علي طريق هشام هذه مسندة عند غيره.وأخرجه الترمذي أيضًا في "العلل الكبير" (287) من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، قال: كان يقال، فذكره. وصوّب في "الجامع" وفي "العلل الكبير" رواية همام بأنَّه حافظ ثقة. ومقصوده بذلك أنَّ القول قوله، لأنه حفظ ما لم يحفظه الآخران على ثقتهما وجلالتهما.قال ابن حجر الهيتمي في "الزواجر" 2/ 60: المراد المَيل بظاهره بأن يُرجّح إحداهما في الأمور الظاهرة التي حرَّم الشارع الترجيح فيها، لا المَيلَ القلبي لخبر أصحاب "السنن"؛ وذكر الحديث الآتي عند المصنف برقم (2796).
2795 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، أنها قالت له: يا ابن أُختي، كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لا يُفضِّل بعضَنا على بعض في مُكثِه عندنا، وكان قَلَّ يومٌ إلّا وهو يَطُوف علينا، فيَدنُو من كل امرأةٍ مِن غير مَسِيسٍ، حتى يَبلُغَ إلى من هو يومُها فيَبيتُ عندها، ولقد قالت سَودة بنت زَمْعة حين أسنَّت وفَرِقَت أن يُفارِقَها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله، يومي هو لعائشة، فقَبِل ذاك منها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم. قالت عائشة: في ذلك أَنزل اللهُ عز وجل فيها وفي أشباهِها: {وَإِنِ امْرَأَةٌ خَافَتْ مِنْ بَعْلِهَا نُشُوزًا} [النساء: 128] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাকে (হিশাম ইবনে উরওয়াকে) বললেন: হে আমার ভাগ্নে! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের (স্ত্রীদের) কাছে অবস্থানের ক্ষেত্রে আমাদের কারো ওপর কাউকে প্রাধান্য দিতেন না। এমন দিন খুব কমই যেত যেদিন তিনি আমাদের মাঝে পরিভ্রমণ করতেন না। তিনি সহবাস ব্যতীত প্রত্যেক স্ত্রীর কাছে যেতেন এবং কাছে আসতেন, যতক্ষণ না যার দিন আসত তার কাছে পৌঁছতেন এবং তার কাছে রাত কাটাতেন। সওদা বিনত যাম‘আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন বার্ধক্যে পৌঁছলেন এবং ভয় করলেন যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হয়তো তাকে তালাক দেবেন, তখন তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার দিনটি আয়িশার জন্য। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কাছ থেকে তা গ্রহণ করলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাদের (সওদা ও তার মতো স্ত্রীদের) ব্যাপারে আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করেন: "আর যদি কোনো স্ত্রী তার স্বামীর পক্ষ থেকে অবজ্ঞা বা উপেক্ষা আশঙ্কা করে..." (সূরা নিসা: ১২৮)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزِّناد، وكذا الحسن بن علي بن زياد وقد توبع.وأخرجه أبو داود (2135) عن أحمد بن يونس، بهذا الإسناد.وأخرجه مختصرًا أحمد 41/ (24765) عن سريج بن النعمان، عن ابن أبي الزِّناد، به.وقد تقدم منه قصة وهب سودة يومَها لعائشة برقم (2384) من طريق العباس بن الفضل الأسفاطي، عن ابن أبي الزِّناد.قولها: من غير مسيس، أي: من غير وِقاع.
2796 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن أيوب، عن أبي قِلَابة، عن عبد الله بن يزيد الخَطْمي، عن عائشة، قالت: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَقسِم فيَعدِل، فيقول: "اللهم هذا قَسْمِي فيما أَملِكُ، فلا تَلُمْني فيما تَملِكُ ولا أَملِكُ" [1].قال إسماعيلُ القاضي: يعني القلبَ. وهذا في العَدْل بين نسائه.هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (স্ত্রীদের মাঝে সময়) বন্টন করতেন এবং ন্যায়বিচার করতেন। অতঃপর তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! এই হলো আমার বন্টন, যা আমার অধিকারে রয়েছে। সুতরাং যা তোমার অধিকারে আছে এবং আমার অধিকারে নেই, সে ব্যাপারে আমাকে ভর্ৎসনা করো না।"
ইসমাঈল আল-ক্বাদী বলেন: এর দ্বারা অন্তর (হৃদয়) উদ্দেশ্য করা হয়েছে। আর এটি স্ত্রীদের মধ্যে ইনসাফ (ন্যায়বিচার) সংক্রান্ত।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح كما قال ابن كثير في "تفسيره" 2/ 382، إلّا أنه اختُلف في وصله وإرساله، ورجَّحَ الإرسالَ غير واحدٍ من الأئمة، والقولُ فيه كالقول في الحديث المتقدم برقم (2794)، وفي معناه حديث عائشة الذي قبله، ويشهد لمعناه أيضًا قوله تعالى: {وَلَنْ تَسْتَطِيعُوا أَنْ تَعْدِلُوا بَيْنَ النِّسَاءِ وَلَوْ حَرَصْتُمْ فَلَا تَمِيلُوا كُلَّ الْمَيْلِ فَتَذَرُوهَا كَالْمُعَلَّقَةِ}.أيوب: هو ابن أبي تَميمة السَّختِياني، وأبو قلابة: هو عبد الله بن زيد الجرمي.وأخرجه أبو داود (2134) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 42/ (25111)، وابن ماجه (1971)، والنسائي (8840) من طريق يزيد بن هارون، وأحمد (25111) عن عفان بن مسلم، والترمذي (1140) من طريق بشر بن السَّرِيّ، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، به.وقد روى هذا الحديثَ غيرُ واحدٍ عن أيوب عن أبي قلابة مرسلًا، منهم: معمر عند عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 120، وإسماعيل ابن عُلَيَّة عند ابن أبي شيبة 4/ 386 وغيره، وحماد بن زيد عند الطبري في "تفسيره" 5/ 315.
2797 - أخبرني أحمد بن سَهْل الفقيه ببُخارى، حدثنا صالح بن محمد بن حَبيب القاضي، حدثنا يحيى بن مَعين، حدثنا عبّاد بن عبّاد، عن عاصم، عن مُعاذة، عن عائشة، قالت: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَستأذِننا إذا كان في يوم المرأةِ مِنّا بعدَما نَزَلَ: {تُرْجِي مَنْ تَشَاءُ مِنْهُنَّ وَتُؤْوِي إِلَيْكَ مَنْ تَشَاءُ} [الأحزاب: 51]، قالت مُعاذة: فقلت لعائشة: ما كنتِ تَقولين لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم؟ قالت: كنت أقولُ: إن كان ذاك إليَّ، لم أُوثر أحدًا على نفسي [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: {আপনি আপনার স্ত্রীদের মধ্যে যাকে ইচ্ছা দূরে সরিয়ে রাখতে পারেন এবং যাকে ইচ্ছা আপনার কাছে রাখতে পারেন} [সূরা আহযাব: ৫১], এরপরও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের স্ত্রীদের মধ্যে যার দিন থাকতো, তার কাছে অনুমতি চাইতেন। মু'আযাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কী বলতেন? তিনি বললেন: আমি বলতাম, যদি বিষয়টি আমার ইচ্ছার ওপর নির্ভরশীল হয়, তবে আমি কাউকে আমার ওপর অগ্রাধিকার দেব না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. عاصم: هو ابن سليمان الأحول، وعبّاد بن عبّاد: هو المهلَّبي.وأخرجه أبو داود (2136) عن يحيى بن معين بهذا الإسناد.وأخرجه مسلم (1476)، وأبو داود (2136)، والنسائي (8887)، وابن حبان (4206) من طرق عن عباد بن عباد، به.وأخرجه أحمد 41/ (24476)، والبخاري (4789)، ومسلم (1476) من طريق عبد الله بن المبارك، عن عاصم الأحول، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه. سمعه أولًا بواسطة إسحاق الأزرق، ثم لقي شريكًا فسمعه منه، أو يكون سمعه من شريك النخعي، وثبّته فيه إسحاق الأزرق، فرواه على الوجهين، ولذلك نظائر عديدة، والله أعلم. حُصَين: هو ابن عبد الرحمن السُّلَمي، والشعبي: هو عامر بن شراحيل.وأخرجه أبو داود (2140) عن عمرو بن عون، عن إسحاق بن يوسف، عن شريك النخعي، به.وقد وافق أبا داود على ذكر إسحاق الأزرق، الدارميُّ في "مسنده" (1504)، ومحمد بن سليمان الباغَنْدي عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (1487)، وعلي بن عبد العزيز البَغَوي عند الطبراني في "الكبير" 18/ (895)، وغيرهم.ويشهد لقوله: "لو كنت آمرًا أحدًا أن يسجد لأحد لأمرت النساء … " حديث أبي هريرة عند الترمذي (1193)، وابن حبان (4162)، وحسّنه الترمذي، وهو كما قال.وحديث ابن عباس عند ابن أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (539)، والطبراني في "الكبير" (12003)، وإسناده قويّ.وانظر تمام شواهده في "سنن أبي داود" بتحقيقنا.والحيرة: مدينة كانت على ثلاثة أميال من الكوفة، فُتحت سنة 12 هـ.والمَرزُبان: الفارس الشجاع المقدَّم على القوم دُون الملك، وهو معرَّب.
2798 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الفضل بن محمد بن المسيّب، حدثنا عمرو بن عَوْن، حدثنا شَريك، عن حُصين، عن الشعبي، عن قيس بن سعد، قال: أتيتُ الحِيْرةَ فرأيتُهم يسجدون لِمَرزُبانٍ لهم، فقلتُ: رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أحقُّ أن يُسجَدَ له، فأتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقلتُ: إني أتيتُ الحِيْرةَ فرأيتُهم يسجدون لِمَرزُبان لهم، فأنت يا رسولَ الله أحقُّ أن يُسجَد لك، فقال: "أرأيتَ لو مَرَرْتَ بقبري، أكنت تَسجُد له؟ " قال: قلت: لا، قال: "فلا تفعلوا، لو كنتُ آمِرًا أحدًا أن يَسجُد لأحدٍ، لأمرتُ النساءَ أن يَسجُدنَ لأزواجِهِنّ، لِما جَعَلَ اللهُ لهم عليهن من حقٍّ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
কায়েস ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি হীরা (নামক স্থানে) এসে দেখলাম যে তারা তাদের এক মারযুবানের (শাসক/নেতার) উদ্দেশ্যে সিজদা করছে। তখন আমি বললাম, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উদ্দেশ্যে সিজদা করা অধিকতর সঙ্গত। এরপর আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম: আমি হীরাতে এসে দেখলাম তারা তাদের এক মারযুবানের জন্য সিজদা করছে। তাই, হে আল্লাহর রাসূল! আপনার উদ্দেশ্যে সিজদা করা অধিকতর সঙ্গত। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি মনে করো, যদি তুমি আমার কবরের পাশ দিয়ে যাও, তবে কি তুমি তাকে সিজদা করবে?" আমি বললাম, না। তিনি বললেন: "তবে তোমরা (অন্য কারো জন্য) তা করবে না। যদি আমি কাউকে অন্য কারো উদ্দেশ্যে সিজদা করার আদেশ দিতাম, তবে আমি মহিলাদেরকে আদেশ দিতাম যেন তারা তাদের স্বামীদের উদ্দেশ্যে সিজদা করে, কারণ আল্লাহ তাদের ওপর স্বামীদের যে হক (অধিকার) প্রদান করেছেন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل شريك - وهو ابن عبد الله النخعي القاضي - وقد روى هذا الحديث جماعةٌ عن عمرو بن عون غير الفضل بن محمد، فزادوا فيه بين ابن عون وبين شريك رجلًا، هو إسحاق بن يوسف الأزرق، وهو ثقة، كذلك وقع لهم مع أنَّ لعمرو بن عون رواية عن شريك مباشرة يُصرِّح فيها بسماعه منه، فإن كان ما عند المصنف محفوظًا، فيحتمل أن يكون عمرو بن عون سمعه أولًا بواسطة إسحاق الأزرق، ثم لقي شريكًا فسمعه منه، أو يكون سمعه من شريك النخعي، وثبّته فيه إسحاق الأزرق، فرواه على الوجهين، ولذلك نظائر عديدة، والله أعلم. حُصَين: هو ابن عبد الرحمن السُّلَمي، والشعبي: هو عامر بن شراحيل.وأخرجه أبو داود (2140) عن عمرو بن عون، عن إسحاق بن يوسف، عن شريك النخعي، به.وقد وافق أبا داود على ذكر إسحاق الأزرق، الدارميُّ في "مسنده" (1504)، ومحمد بن سليمان الباغَنْدي عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (1487)، وعلي بن عبد العزيز البَغَوي عند الطبراني في "الكبير" 18/ (895)، وغيرهم.ويشهد لقوله: "لو كنت آمرًا أحدًا أن يسجد لأحد لأمرت النساء … " حديث أبي هريرة عند الترمذي (1193)، وابن حبان (4162)، وحسّنه الترمذي، وهو كما قال.وحديث ابن عباس عند ابن أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (539)، والطبراني في "الكبير" (12003)، وإسناده قويّ.وانظر تمام شواهده في "سنن أبي داود" بتحقيقنا.والحيرة: مدينة كانت على ثلاثة أميال من الكوفة، فُتحت سنة 12 هـ.والمَرزُبان: الفارس الشجاع المقدَّم على القوم دُون الملك، وهو معرَّب.
2799 - أخبرنا أبو النضر محمد بن محمد بن يوسف الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، حدثنا أبو قَزَعة سُوَيد بن حُجَير الباهِلي، عن حَكيم بن معاوية القُشَيري، عن أبيه، قال: قلتُ: يا رسول الله، ما حَقُّ زوجةِ أحدِنا عليه؟ قال: "أن يُطعِمَها إذا طَعِمَ، وَيَكْسوها إذا اكتَسَى، ولا يضربَ الوجهَ، ولا يُقبِّحَ، ولا يَهجُرَ إلّا في البيت [1] " [2]. صحيحُ الإسناد، ولم يُخرجاه.
মু‘আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জিজ্ঞাসা করলাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের কারো ওপর তার স্ত্রীর কী অধিকার? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যখন সে আহার করবে, তখন তাকেও আহার করাবে, আর যখন সে পরিধান করবে, তখন তাকেও পরিধান করাবে। আর (স্ত্রীর) মুখমণ্ডলকে প্রহার করবে না, আর তাকে মন্দ বলবে না (বা অপমান করবে না), আর ঘর ছাড়া অন্য কোথাও তাকে বর্জন করবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] جاء في (ز) و (ص) و (ع): الثلاث، بدل: البيت، والمثبت من (ب) و"تلخيص الذهبي" ومن نسخة أشار إليها في (ص)، وكذلك رواه البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 305 عن أبي عبد الله الحاكم، وهو المعروف في رواية الحديث عند غير المصنف. وقد يكون المقصود بالثلاث إن صحَّ الأيامَ، يعني عدم الهجر أكثر من ثلاثة أيام، ويكون بمعنى الحديث الآخر: "لا يحل لمسلم أن يهجر فوق ثلاث"، والله تعالى أعلم. وأخرجه أبو داود (2142) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 33/ (20022) عن عفان بن مسلم، عن حماد بن سلمة، به.وأخرجه أحمد (20011) و (20013)، وابن ماجه (1850)، والنسائي (9126) و (9136)، و (11038)، وابن حبان (4175) من طرق عن أبي قزعة سويد بن حُجير، به.وأخرجه أبو داود (2144)، والنسائي (9106) من طريق داود الورّاق، عن سعيد بن حكيم بن معاوية، عن أبيه، به. وداود روى عنه جمع، لكن لم يؤثر توثيقه عن أحد، ولم يروه عن سعيد بن حكيم غيره، والمعروف أنه من رواية أبي قزعة، والله أعلم.قوله: "ولا يُقبِّح" معناه: لا يقول: قبَّح الله وجهك، كما جاء مفسَّرًا في حديث أبي هريرة الذي أخرجه أحمد 12/ (7420)، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا ضرب أحدُكم فليجتنب الوجه، ولا يقل: قبّح الله وجهك ووجه من أشبه وجهك، فإنَّ الله خلق آدم على صورته". وإسناده قوي.
[2] إسناده حسن من أجل حكيم بن معاوية. وأخرجه أبو داود (2142) عن موسى بن إسماعيل، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 33/ (20022) عن عفان بن مسلم، عن حماد بن سلمة، به.وأخرجه أحمد (20011) و (20013)، وابن ماجه (1850)، والنسائي (9126) و (9136)، و (11038)، وابن حبان (4175) من طرق عن أبي قزعة سويد بن حُجير، به.وأخرجه أبو داود (2144)، والنسائي (9106) من طريق داود الورّاق، عن سعيد بن حكيم بن معاوية، عن أبيه، به. وداود روى عنه جمع، لكن لم يؤثر توثيقه عن أحد، ولم يروه عن سعيد بن حكيم غيره، والمعروف أنه من رواية أبي قزعة، والله أعلم.قوله: "ولا يُقبِّح" معناه: لا يقول: قبَّح الله وجهك، كما جاء مفسَّرًا في حديث أبي هريرة الذي أخرجه أحمد 12/ (7420)، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا ضرب أحدُكم فليجتنب الوجه، ولا يقل: قبّح الله وجهك ووجه من أشبه وجهك، فإنَّ الله خلق آدم على صورته". وإسناده قوي.
2800 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا بِشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، عن الزُّهْري، عن عُبيد الله بن عبد الله، عن إياس بن عبد الله بن أبي ذُبَاب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تَضرِبُوا إماءَ اللهِ".فجاء عمرُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، ذَئِرنَ النساءُ على أزواجهنّ. فرَخَّص في ضَرْبهن، فأطافَ بآلِ رسول الله صلى الله عليه وسلم نساءٌ كثيرٌ يَشكين أزواجَهُنَّ، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "لقد طافَ بآلِ محمدٍ نساءٌ كثيرٌ يَشكين أزواجَهُنَّ، ليس أُولائك بخِيارِكم" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইয়াস ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু আবি যুবাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আল্লাহর দাসীদের (নারীদের) প্রহার করো না।" অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল, নারীরা তাদের স্বামীদের উপর প্রবল হয়ে উঠেছে (বা অবাধ্য ও দুঃসাহসী হয়ে উঠেছে)।" এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের প্রহার করার অনুমতি দিলেন। ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের চারপাশে বহু নারী তাদের স্বামীদের বিরুদ্ধে অভিযোগ করতে লাগল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মুহাম্মাদের পরিবারের চারপাশে বহু নারী তাদের স্বামীদের বিরুদ্ধে অভিযোগ করেছে। তারা তোমাদের মধ্যেকার উত্তম লোক নয়।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. إياس بن عبد الله بن أبي ذباب، أثبت صحبته أبو حاتم وأبو زرعة، وجزم به أبو عمر بن عبد البر، ورجّح الحافظ صحبته في "التهذيب"، وصحَّح إسناد حديثه هذا في "الإصابة" 2/ 280، ونفى صحبته أحمد بن حنبل والبخاري، واختلف فيه قول ابن حبان، فأثبته مرة ونفاه أخرى.عبيد الله بن عبد الله: هو ابن عمر بن الخطاب.وأخرجه أبو داود (2146) عن أحمد بن أبي خلف وأحمد بن عمرو بن السَّرْح، وابن ماجه (1985) عن محمد بن الصبّاح، والنسائي (9122) عن قتيبة بن سعيد، أربعتهم عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. لكن قال ابن أبي خلف وقتيبة وابن الصبّاح في رواياتهم: عبد الله بن عبد الله مكبرًا، وهو ثقة أيضًا كأخيه عبيد الله.وأخرجه ابن حبان (4189) من طريق معمر، عن الزُّهْري، عن عبد الله بن عبد الله، به. وذكره بالتكبير أيضًا.وسيأتي برقم (2809) عن أبي بكر بن إسحاق عن بشر بن موسى.ذئرن: معناه: سوء الخُلُق والجرأة على الأزواج، والذائر: المغتاظ على خصمه. وقد عبّر هنا بقوله: ذئرن، على لغة من يقول: أكلوني البراغيث.