আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
2801 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وهب، حدثني مُسلم بن خالد، عن موسى بن عُقبة، عن أمِّه، عن أم كُلْثوم بنت أبي سَلَمة، قالت: لما تزوج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أمَّ سلَمة، قال لها: "إني أَهدَيتُ إلى النَّجَاشيِّ أَواقيَّ [1] من مِسكٍ وحُلَّةً، وإني لا أُراه إلا قد ماتَ، ولا أُرى الهديةَ التي أَهدَيتُ إليه إلّا سَتُردُّ، فإذا رُدَّت إليَّ فهو لكِ - أو لكم [2] -"، فكان كما قال، هَلَكَ النجَاشيُّ، فلما رُدّت إليه الهديةُ، أعطى كلَّ امرأةٍ من نسائه أوقيّةً من ذلك المِسك، وأعطى سائرَه أمَّ سلَمةَ وأعطاها الحُلَّة [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উম্মে কুলসুম বিনতে আবি সালামাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করলেন, তখন তিনি তাঁকে বললেন: "আমি নাজ্জাশীর নিকট কয়েক 'আউকিয়াহ' পরিমাণ কস্তুরী এবং একটি পোশাক (হুলালা) উপঢৌকন হিসেবে পাঠিয়েছি। আমার ধারণা, তিনি সম্ভবত মৃত্যুবরণ করেছেন। আর আমার এই ধারণা যে, আমি তাঁকে যে উপঢৌকন পাঠিয়েছি, তা ফেরত আসবে। সুতরাং যখন সেটি আমার কাছে ফেরত আসবে, তখন তা তোমার হবে – অথবা তোমাদের হবে।" ঠিক তেমনই হয়েছিল যেমন তিনি বলেছিলেন। নাজ্জাশী (বাদশাহ) মারা গেলেন। যখন উপঢৌকনটি তাঁর নিকট ফেরত আসল, তখন তিনি সেই কস্তুরী থেকে তাঁর স্ত্রীদের প্রত্যেককে এক এক আউকিয়াহ করে দিলেন, আর অবশিষ্ট অংশ উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দিলেন এবং পোশাকটিও তাঁকে দিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] جاء في نسخنا الخطية: أواقًا؛ وهو جائزٌ عند بعض العرب كما مضى بيانه برقم (2240).
[2] هكذا في "تلخيص المستدرك" للذهبي، وفي النسخ الخطية: "أم لكم"، وجاء عند البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 26 في روايته عن الحاكم: "أو لكُنَّ" وهو شك من الراوي، كما توضحه رواية البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (11641) عن الحاكم بإسناد آخر غير هذا عن مسلم بن خالد، قال فيها: "فهي لك" أو قال: "لكنَّ".
2801 [3] - إسناده ضعيف لضعف مسلم بن خالد - وهو الزَّنجي - وقد تفرَّد به عن موسى بن عقبة، واضطرب فيه في ذكر أم موسى بن عقبة، فمرة يقول فيه: عن أمه عن أم كلثوم، كما وقع عند المصنف هنا، ومرة يقول: عن أمه أم كلثوم، فيجعل أمَّ كلثوم هي أمَّه. ابن وهب: هو عبد الله.وأخرجه أحمد 45/ (27276) عن يزيد بن هارون، وابن حبان (5114) من طريق هشام بن عمار، كلاهما عن مسلم بن خالد بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (27276) عن حسين بن محمد، عن مسلم بن خالد، عن موسى بن عقبة، عن أمِّه أمِّ كلثوم، به.
2802 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا محمد بن عبد الوهاب الفرّاء، أخبرنا جعفر بن عَوْن، حدثنا ربيعة بن عثمان، عن محمد بن يحيى بن حَبّان، عن نَهار العَبْدي - وكان من أصحاب أبي سعيد الخُدْري - عن أبي سعيد الخُدْري، قال: جاء رجلٌ إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم بابنةٍ له، فقال: يا رسول الله، هذه ابنتي قد أبَتْ أن تَزَوَّجَ، فقال لها النبي صلى الله عليه وسلم: "أَطِيعي أباكِ" فقالت: والذي بعثك بالحقّ لا أتزوَّجُ حتى تُخبرني ما حقُّ الزوج على زوجتِه، قال: "حقُّ الزوج على زوجته أن لو كانت به قُرْحةٌ فَلَحِسَتْها ما أدَّتْ حقَّه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি তার কন্যাকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার এই কন্যা বিবাহ করতে অস্বীকার করছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি তোমার পিতার আনুগত্য করো।" তখন মেয়েটি বললো: যাঁর কসম, যিনি আপনাকে সত্যসহকারে পাঠিয়েছেন, আমি বিবাহ করব না, যতক্ষণ না আপনি আমাকে স্ত্রীর উপর স্বামীর কী অধিকার, তা জানিয়ে দিচ্ছেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "স্ত্রীর উপর স্বামীর অধিকার হলো: যদি তার (স্বামীর) শরীরে কোনো ক্ষত (বা ঘা) থাকে এবং স্ত্রী যদি তা চেটে পরিষ্কারও করে দেয়, তবুও সে তার স্বামীর হক্ক (অধিকার) আদায় করতে পারবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده جيد كما قال المنذري في "الترغيب والترهيب" 3/ 35، وصحَّحه ابنُ حبان، وإنكار الذهبي له في "تلخيصه" بحجة قول أبي حاتم الرازي بأنَّ ربيعة بن عثمان منكر الحديث، غير مُسلَّم له، لأنَّ ربيعة هذا وثقه ابن معين وابن نمير والواقدي والحاكم في "سؤالات مسعود السِّجْزي"، وقال فيه أبو زرعة: إلى الصدق ما هو، وليس بذاك القوي. ثم إنَّ ما رواه ليس بمنكر لثبوته عن أنس بن مالك كما سيأتي، والله تعالى أعلم. وقد روى له مسلم حديثًا من روايته عن محمد بن يحيى بن حَبّان احتجاجًا.وأخرجه النسائي (5365)، وابن حبان (4164) من طريق أحمد بن عثمان بن حكيم، عن جعفر بن عون، بهذا الإسناد. وقال النسائي في شأن نهار العبدي: وهو مدنيٌّ لا بأس به. فكأنه يشير إلى تقوية الحديث، والله أعلم.ويشهد له حديث أنس بن مالك عند أحمد 20/ (12614) عن حسين بن محمد المرُّوذي، وابن أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (527) عن سعيد بن سليمان الواسطي، كلاهما عن خلف بن خليفة، عن حفص ابن أخي أنس بن مالك، عن أنس وكنا قد تكلمنا على إسناده في "المسند" بتفرد حسين المرُّوذي به عن خلف بن خليفة، وأنَّ خلفًا هذا قد اختلط، لعدم اطلاعنا وقتئذٍ على متابعة سعيد ابن سليمان الحافظ له، والذي يغلب على ظننا أنَّ رواية سعيد بن سليمان عن خلف بن خليفة قديمة، إذ كان بواسط، فالظاهر من كلام الإمام أحمد أنَّ خلفًا إنما تغير لدى مقدمه بغداد، والله تعالى أعلم. وقد جوَّد المنذري إسناد حديث أنس هذا في "الترغيب والترهيب" 3/ 35، وهو كما قال إن شاء الله.
2803 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن المُغيرة السُّكّري بهَمَذان، حدثنا القاسم بن الحَكَم العُرَني، حدثنا سليمان بن داود اليَمَامي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة، قال: جاءت امرأةٌ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: يا رسول الله، أنا فلانةُ بنت فلانٍ، قال: "قد عرفتُكِ، فما حاجتُك؟ " قالت: حاجتي إلى ابن عمِّي فلانٍ العابِد، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قد عرفتُه" قالت: يَخطُبني، فأخبِرْني ما حقُّ الزوج على الزوجةِ، فإن كان شيئًا أُطيقُه تزوّجتُه، وإن لم أُطِقْ لا أتزوّج، قال: "مِن حقِّ الزوج على الزوجةِ أن لو سالَ مَنْخِراهُ دمًا وقَيْحًا وصَديدًا فلَحِسَتْه بلسانها، ما أدَّت حقَّه، لو كانَ ينبغي لبشرٍ أن يَسجُدَ لبشرٍ، لأمرتُ المرأةَ أن تَسجُدَ لزوجِها إذا دخل عليها، لِمَا فضَّله اللهُ عليها"، قالت: والذي بعثك بالحقّ لا أتزوّجُ ما بقِيتُ في الدنيا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি অমুক বিনতে অমুক।" তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাকে চিনি। তোমার প্রয়োজন কী?" মহিলাটি বলল: "আমার প্রয়োজন হলো আমার চাচাতো ভাই সেই আবেদ (ইবাদতকারী) অমুককে নিয়ে।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তাকে চিনি।" সে বলল: "সে আমাকে বিবাহের প্রস্তাব দিয়েছে। অতএব, আমাকে জানিয়ে দিন, স্ত্রীর ওপর স্বামীর কী হক (অধিকার) রয়েছে? যদি তা এমন কিছু হয় যা আমি বহন করতে সক্ষম, তবে আমি তাকে বিবাহ করব। আর যদি তা বহন করতে সক্ষম না হই, তবে আমি বিবাহ করব না।" তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "স্ত্রীর ওপর স্বামীর হকের মধ্যে এটিও অন্তর্ভুক্ত যে, যদি তার স্বামীর নাক দিয়ে রক্ত, পূঁজ ও দুর্গন্ধযুক্ত স্রাব ঝরতে থাকে আর স্ত্রী তা তার জিভ দিয়ে চেটে পরিষ্কার করে দেয়, তবুও সে তার হক আদায় করতে পারবে না। যদি আল্লাহ ব্যতীত অন্য কারো জন্য সিজদা করা বৈধ হতো, তবে আমি স্ত্রীকে আদেশ করতাম যে সে তার স্বামীর নিকট প্রবেশ করার সাথে সাথেই তাকে সিজদা করবে; কারণ আল্লাহ তাকে (স্বামীর) তার ওপর মর্যাদা দিয়েছেন।" সে বলল: "যিনি আপনাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমি যতদিন দুনিয়ায় বেঁচে থাকব, বিবাহ করব না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل سليمان بن داود اليمامي، فهو واهٍ كما قال المنذري في "الترغيب والترهيب" 3/ 35، والذهبي في "تلخيص المستدرك"، وقد خالفَه محمد بن عمرو بن علقمة، فرواه عن أبي سلمة عن أبي هريرة مقتصِرًا على ذكر السجود، فهذا هو المحفوظ في حديث أبي هريرة.وأخرجه الترمذي (1159) من طريق النضر بن شُميل، وابن حبان (4162) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، كلاهما عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، بقصة السجود. وقال الترمذي: حسن غريب.وسيتكرر حديث سليمان بن داود برقم (7512).ويغني عنه ما قبله مع ما تقدم برقم (2798).
2804 - أخبرني أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا بِشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، عن يحيى بن سعيد، عن بُشَير بن يَسار، عن حُصين بن مِحْصَن قال: حدثتني عمّتي، قالت: أتيتُ النبي صلى الله عليه وسلم في بعض الحاجة، فقال: "أيْ هذه، أذاتُ بَعْلٍ أنتِ؟ " قلت: نعم، قال: "كيف أنتِ له؟ " قالت: ما آلُوه إلّا ما عَجَزْتُ عنه، قال: "فأين أنتِ منه، فإنما هو جَنّتُكِ ونارُكِ" [1].هكذا رواه مالك بن أنس، وحماد بن زيد، والدَّرَاوردي [2]، عن يحيى بن سعيد، وهو صحيح، ولم يُخرجاه.
হুসাইন ইবনে মিহসানের ফুফু (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি কোনো প্রয়োজনে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলাম। তিনি বললেন, "ওহে, তুমি কি বিবাহিত (স্বামীযুক্ত)?" আমি বললাম, হ্যাঁ। তিনি বললেন, "তুমি তার (স্বামীর) প্রতি কেমন?" তিনি বললেন, আমি আমার সাধ্যমতো তার (খেদমত করতে) কোনো ত্রুটি করি না, তবে যে বিষয়ে আমি অক্ষম। তিনি বললেন, "তবে তুমি তার ব্যাপারে কোথায় আছো (অর্থাৎ তার প্রতি তোমার আচরণ কেমন)? কেননা সে-ই তোমার জান্নাত এবং সে-ই তোমার জাহান্নাম।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن إن شاء الله من أجل حُصَين بن مِحْصَن، وقد ذكره بعضُهم في الصحابة، وبعضهم ذكره في التابعين كما نبَّه عليه الحافظُ في "الإصابة" 2/ 89، وكونه تابعيًا هو الأظهر، لأنه ليست له رواية عن النبي صلى الله عليه وسلم كما قال ابن السكن وما وقع في بعض طرق هذا الحديث عن يحيى بن سعيد - وهو الأنصاري - عن بُشَير عن حُصين بن مِحْصَن: أنَّ عمته أتت، فهو إرسال، كما نبَّه عليه الدارقطني في "العلل" (4111)، والصحيح أنه سمعه من عمته، كما وقع هنا، فهو إذًا تابعيٌّ، وروى عنه ثقتان، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وصحَّح له حديثًا، وقال الحافظ في "لسان الميزان": ثقة. وجوَّد إسناده المنذري في "الترغيب والترهيب" 3/ 34. سفيان: هو ابن عيينة، والحُميدي: هو عبد الله بن الزُّبَير المكي، صاحب "المسند".وأخرجه النسائي (8915) عن محمد بن منصور المكي، عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا (8913) من طريق الأوزاعي، و (8914) من طريق الليث بن سعد، و (8920) من طريق سعيد بن أبي هلال، ثلاثتهم عن يحيى بن سعيد الأنصاري، به. غير أنَّ الأوزاعي سمى حُصينًا عبدَ الله، وسمّاه على الصواب كالجماعة عند الطبراني في "الأوسط" (528).وأخرجه أحمد 31/ (19003)، والنسائي (8918) من طريق يزيد بن هارون، وأحمد 45/ (27352)، والنسائي (8917) من طريق يحيى بن سعيد القطان، والنسائي (8916) من طريق يعلى بن عبيد الطنافسي، و (8919) من طريق مالك بن أنس، كلهم عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن بُشير، عن حُصين بن مِحْصَن: أنَّ عمة له أتت النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره مرسلًا.وقد رُوي عن بعضهم موصولًا أيضًا كيعلى بن عبيد عند ابن سعد 10/ 425، ويحيى بن سعيد القطان عند مُسدَّد في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" للبوصيري (3199/ 1).وكذلك رواه موصولًا حماد بن زيد عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3357)، والطبراني في "المعجم الكبير" 25/ (450)، وحماد بن سلمة عند الطبراني 25/ (449)، وعبد الرحيم بن سليمان عند البيهقي في "الآداب" (58)، وفي "شعب الإيمان" (8357)، وأبي القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1519).
[2] لم نقف عليه من طريقه فيما بأيدينا من مصادر التخريج.
2805 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب وأبو عبد الله علي بن عبد الله الحَكِيمي، قالا: حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا بِشر بن عمر الزَّهْراني، حدثنا شعيب بن رُزَيق الطائفي، حدثنا عطاء الخُراساني، عن مالك بن يُخَامر السَّكْسَكي، عن معاذ بن جبل، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: "لا يَحِلُّ لامرأةٍ تُؤمن بالله واليوم الآخر أن تأذَنَ في بيت زوجها وهو كارِهٌ، ولا تَخرُجَ وهو كارِهٌ، ولا تُطيعَ فيه أحدًا، ولا تُخَشِّنَ بصَدْرِه، ولا تعتزلَ فِراشَه، ولا تُصَرِّبَهُ [1]، فإن كان هو أظلمَ، فلتأتِه حتى تُرضيَه، فإن كان هو قَبِلَ منها، فبِها ونِعْمَتْ، وقَبِلَ اللهُ عُذْرَها وأفْلَجَ حُجَّتَها، ولا إثمَ عليها، وإن هو أَبَى يَرضى عنها، فقد أبلغَتْ عند الله عُذْرَها" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেছেন: যে নারী আল্লাহ ও পরকালের প্রতি ঈমান রাখে, তার জন্য বৈধ নয় যে তার স্বামীর অপছন্দ সত্ত্বেও তার ঘরে (কাউকে প্রবেশের) অনুমতি দেবে। আর সে যেন তার অপছন্দ সত্ত্বেও (ঘর থেকে) বের না হয়, আর সে যেন (স্বামীর বিষয়ে) অন্য কারো আনুগত্য না করে, আর সে যেন তার স্বামীকে বিরক্ত বা রাগান্বিত না করে, আর সে যেন তার বিছানা পরিত্যাগ না করে এবং যেন তাকে (বিরুদ্ধাচারণের মাধ্যমে) কষ্ট না দেয়। যদি স্বামী জুলুম করে থাকেও, তবুও সে যেন তার (স্বামীর) কাছে আসে যতক্ষণ না সে তাকে সন্তুষ্ট করে। যদি স্বামী তার (স্ত্রীর) এই কাজ গ্রহণ করে নেয়, তবে তাই যথেষ্ট এবং এটি কতই না উত্তম! আল্লাহ তার ওযর কবুল করবেন, তার যুক্তিকে শক্তিশালী করবেন এবং তার উপর কোনো গুনাহ থাকবে না। আর যদি স্বামী তার প্রতি সন্তুষ্ট হতে অস্বীকার করে, তবে সে আল্লাহর কাছে তার ওযর পেশ করার দায়িত্ব পূরণ করলো।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] جاء في (ز) و (ع): ولا تُضِرَّ بِه، من الإضرار، وفي (ب): ولا تضربه، من الضرب، والمثبت من (ص)، وهو الوجه، وهو من الصَّرْب: وهو حَقْن اللبن حتى يحمض، فكأنَّ المرأة حين تعتزل فراش زوجها كأنها تسبّبت في احتقان مَنِيِّه حتى يفسد مِزاجَه ويفقد شهوته، وهو على المثل باللبن المجتمع الذي حُقِن أيامًا حتى اشتدَّ حمضه. وجاء في رواية البيهقي في "الكبرى" عن أبي عبد الله الحاكم: "ولا تَصرِمه" من الصَّرْم، وهو القطع، وهو معنًى وجيه أيضًا. عن مالك بن يخامر، عن معاذ. وقد تفرد به عن الزُّهْري عبد الرحمن بن يزيد هذا، وهو ضعيف، وقد نبَّه على تفرده به الدارقطني في "الغرائب والأفراد" كما في "أطرافه" لابن طاهر (4302).وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (1672) عن سفيان بن وكيع، عن أبيه، عن علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلّام، عن جده أبي سلّام، عن مالك بن يُخامر، عن معاذ؛ بزيادات منكرة ليست في حديثنا. وقال الحافظ ابن حجر مشيرًا إلى علة هذه الطريق: رجاله ثقات أثبات إلّا شيخ أبي يعلى، فهو من منكراته، وكان صدوقًا في نفسه إلّا أنَّ ورّاقه أدخل عليه ما ليس من حديثه، وكانوا يُحذّرونه من ذلك فلا يرضى.قوله في الحديث: "ولا تُخشِّن بصدره" أي: تُوغِره بالغَيظ.ولقوله: "لا يحل لامرأة تؤمن بالله واليوم الآخر أن تأذن في بيت زوجها وهو كاره" شاهد من حديث أبي هريرة عند أحمد 13/ (8188)، والبخاري (5195)، ومسلم (1026).وللنهي عن اعتزال المرأة فراش زوجها شاهد من حديث أبي هريرة أيضًا عند أحمد 15/ (9671)، والبخاري (3237)، ومسلم (1436) بلفظ: "وإذا دعا الرجل امرأتُه إلى فراشه فلم تأته، فبات غضبان عليها، لعنتها الملائكة حتى تصبح".
[2] إسناده حسن من أجل عطاء بن أبي مسلم الخراساني وشعيب بن رُزيق: وهو أبو شيبة الشامي، لا الطائفي كما وقع في رواية المصنف، فإنه وهمٌ، فالشامي هو المعروف بالرواية عن عطاء الخراساني. وقول الذهبي في "تلخيصه" بأنه منقطع، لا ندري ما وجهه، فإن كان أراد نفي سماع مالك من معاذ فغَير مُسَلَّم له، وهو صحيح ثابت، وقوله أيضًا بأنَّ هذا الحديث منكر، لم نتبيّن وجهَه، والله تعالى أعلم.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 293 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 20/ (211) من طريق محمد بن يحيى القطعي، عن بشر بن عمر الزهراني، به. ولم ينسب شعيبًا.وأخرجه أبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (2110) من طريق آدم بن أبي إياس، عن أبي شيبة شعيب بن رُزيق، به.وأخرجه الطبراني 20/ (210) من طريق عثمان بن عطاء الخراساني، عن أبيه، به. وعثمان متفق على ضعفه.وأخرجه الطبراني 20/ (114) من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن تَميم الدمشقي، عن الزُّهْري، عن مالك بن يخامر، عن معاذ. وقد تفرد به عن الزُّهْري عبد الرحمن بن يزيد هذا، وهو ضعيف، وقد نبَّه على تفرده به الدارقطني في "الغرائب والأفراد" كما في "أطرافه" لابن طاهر (4302).وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (1672) عن سفيان بن وكيع، عن أبيه، عن علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلّام، عن جده أبي سلّام، عن مالك بن يُخامر، عن معاذ؛ بزيادات منكرة ليست في حديثنا. وقال الحافظ ابن حجر مشيرًا إلى علة هذه الطريق: رجاله ثقات أثبات إلّا شيخ أبي يعلى، فهو من منكراته، وكان صدوقًا في نفسه إلّا أنَّ ورّاقه أدخل عليه ما ليس من حديثه، وكانوا يُحذّرونه من ذلك فلا يرضى.قوله في الحديث: "ولا تُخشِّن بصدره" أي: تُوغِره بالغَيظ.ولقوله: "لا يحل لامرأة تؤمن بالله واليوم الآخر أن تأذن في بيت زوجها وهو كاره" شاهد من حديث أبي هريرة عند أحمد 13/ (8188)، والبخاري (5195)، ومسلم (1026).وللنهي عن اعتزال المرأة فراش زوجها شاهد من حديث أبي هريرة أيضًا عند أحمد 15/ (9671)، والبخاري (3237)، ومسلم (1436) بلفظ: "وإذا دعا الرجل امرأتُه إلى فراشه فلم تأته، فبات غضبان عليها، لعنتها الملائكة حتى تصبح".
2806 - حدثنا بكر بن محمد بن حَمْدان المروَزي، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا شاذُّ بن فَيّاض، حدثنا عمر بن إبراهيم، عن قَتَادة، عن سعيد بن المسيّب، عن عبد الله بن عمرو، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا يَنظُرُ اللهُ إلى امرأةٍ لا تَشكُرُ لِزوجها وهي لا تَستغني عنه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা সেই নারীর দিকে তাকান না, যে তার স্বামীর প্রতি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না, অথচ সে তাকে ছাড়া চলতে পারে না (বা তার মুখাপেক্ষী)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، إلّا أنه قد اختلف فيه على قتادة، فرواه مرة مرفوعًا ومرة موقوفًا، وعمر بن إبراهيم - وهو العَبْدي - في روايته عن قتادة خاصةً كلامٌ، وقد اختلف عليه، فروي عنه مرة بذكر الحسن البصري بدل سعيد بن المسيب، والصحيح أنه بذكر سعيد بن المسيب كما رواه عنه شاذُّ بن فيّاض وعبد الصمد بن عبد الوارث، فقد توبع عليه بذكر ابن المسيب، كما سيأتي.وقد صحَّح رفعَه جماعةٌ من الأئمة، منهم ابن حزم في "المحلى" 10/ 334، وابنُ التركماني في "الجوهر النقي" 7/ 294، وابن حجر في "مختصر البزار" (1053)، ومال إلى تقويته النسائي كما يُفهم من كلامه بإثر الحديث (9086). على أنه لو ثبت وقفُه فإنَّ له حكم الرفع، لأنَّ مثله لا يقال بمحض الرأي، والله أعلم.وأخرجه البيهقي 7/ 294 عن المصنف، وقال عقبه: هكذا أتى به مرفوعًا، والصحيح أنَّه من قول عبد الله غيرُ مرفوعٍ.وأخرجه الخطيب في "تاريخ بغداد" 11/ 112 من طريق عبد الله بن حاضر البغدادي، عن شاذّ بن فيّاض، به.وسيأتي برقم (7522) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث، عن عمر بن إبراهيم، عن سعيد بن المسيب.وأخرجه النسائي (9087)، والعقيلي في "الضعفاء" (431) من طريق الخليل بن عمر بن إبراهيم، عن أبيه، عن قتادة عن الحسن البصري، عن عبد الله بن عمرو.وأخرجه النسائي (9086)، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1530) من طريق سرّار بن مجشّر، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن سعيد بن المسيب، به. وعلّقه العقيلي، لكنه قرن في روايته المعلَّقة بسعيد بن المسيب الحسنَ البصريَّ، ولا نظنه إلا وهمًا أو خطأً من بعض النساخ، لأن النسائي وأبا القاسم الأصبهاني لم يذكرا إلَّا سعيدًا، ولم نقف عليه من رواية سرَّار بذكر الحسن البصري، والله أعلم. وسرَّار ثقة.ووافق سعيد بنَ أبي عروبة على رفعه همامُ بنُ يحيى عند البزار (2349)، وعمرانُ القطان عند أبي العباس السرّاج في "حديثه" (593)، والطبراني (14184)، وابن عدي 6/ 133، وابن عبد البر في "التمهيد" 3/ 327.واختُلف فيه على شعبة، فرفعه عنه معاذ بن هشام كما سيأتي عند المصنف برقم (7523)، ووقفه عنه محمد بن جعفر كما سيأتي برقم (7524)، ويحيى القطان كما عند النسائي (9088).وكذا رواه موقوفًا هشام الدستوائي عن قتادة فيما ذكره العقيلي، وقال: هذا أَولى.
2807 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا سفيان، عن منصور والأَعمش، عن ذَرٍّ.وأخبرنا عبد الله بن محمد بن موسى العَدْل - واللفظُ له - حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا يحيى بن المغيرة السَّعْدي، حدثنا جَرير، عن منصور، عن ذَرٍّ، عن وائل بن مَهَانة السَّعدي، عن عبد الله بن مسعود، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا معشرَ النساء، تَصدَّقْنَ ولو من حُلِيِّكُنَّ، فإنكنَّ أكثرُ أهلِ جهنَّم"، فقالت امرأةٌ ليست من عِلْية النساء: وبِمَ يا رسول الله نحن أكثرُ أهل جهنّم؟ قال: "إنكن تُكثِرنَ اللَّعْن، وتَكفُرنَ العَشِيرَ.وما وُجِدَ من ناقصِ الدِّين والرأي أغْلبَ للرجال ذوي الأمر على أُمورهم، مِن النساء" قالوا: وما نَقْصُ دينِهنّ ورأيِهنّ؟ قال: "أمَّا نَقْصُ رأيهِن، فجُعلَت شهادةُ امرأتَين بشهادة رجلٍ، وأما نَقْصُ دينِهِنّ، فإنَّ إحداهن تقعُد ما شاء اللهُ من يومٍ وليلةٍ لا تَسجُدُ لله سجدةً" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে নারী সমাজ, তোমরা সাদকা করো, এমনকি তোমাদের অলঙ্কার থেকেও। কারণ তোমরাই জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী।" তখন এক নারী—যে উচ্চশ্রেণীর মহিলা ছিল না—বলল: হে আল্লাহর রাসূল, কী কারণে আমরা জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা বেশি বেশি অভিশাপ দাও এবং স্বামীর প্রতি অকৃতজ্ঞ হও (বা তার হক অস্বীকার করো)। ধর্ম ও বুদ্ধির দিক থেকে অপূর্ণ হওয়া সত্ত্বেও কর্তৃত্বশীল পুরুষদের ওপর তাদের বিষয়ে নারীদের চেয়ে বেশি প্রভাব বিস্তারকারী কাউকে পাওয়া যায় না।" লোকেরা বলল: তাদের ধর্ম ও বুদ্ধির অপূর্ণতা কী? তিনি বললেন: "তাদের বুদ্ধির অপূর্ণতা হলো, দুই জন নারীর সাক্ষ্যকে একজন পুরুষের সাক্ষ্যের সমান করা হয়েছে। আর তাদের ধর্মের অপূর্ণতা হলো, তোমাদের কেউ কেউ আল্লাহর ইচ্ছায় একদিন বা রাত ধরে বসে থাকে এবং আল্লাহর জন্য একটিও সিজদা করে না (অর্থাৎ ঋতুস্রাবের কারণে নামায থেকে বিরত থাকে)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن إن شاء الله، وائل بن مهانة تابعي كبير، ذكره ابن سعد ومسلم في الطبقة الأولى من أهل الكوفة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وصحَّح حديثه هذا، لكن قوله في الحديث: وما وُجد من ناقص … إلى آخره، إنما هو من قول ابن مسعود، كما جاء مبيّنًا مفصَّلًا عند غير المصنف، فأُدرج هنا في الحديث، فأوهم ذلك أنه مرفوع كسائر الحديث، على أنه قد صحَّ مرفوعًا من حديث غير ابن مسعود كما سيأتي. بقي أنَّ المعروف في نسبة وائل بن مهانة أنه تيمي، نسبة إلى تيم الرِّباب، بكسر الراء، وليس السَّعْدي كما نُسب هنا، فالله أعلم. سفيان: هو الثَّوري، ومنصور: هو ابن المعتمر، وجرير: هو ابن عبد الحميد، وذَرّ: هو ابن عبد الله المُرهِبي.والشطر الأول من الحديث في "مسند أحمد" 7/ (4019) عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك أحمد 6/ (3569)، والنسائي (9213) من طريق سفيان بن عيينة، وابن أبي شيبة 3/ 110 عن أبي الأحوص، كلاهما عن منصور بن المعتمر، به.وأخرجه أحمد أيضًا 7/ (4037) عن أبي معاوية، عن الأعمش، به.وأخرجه أبو يعلى (5144) عن أبي خيثمة زهير بن حرب، عن جرير، به.وخالفهم منصور بن أبي الأسود عند النسائي (9214) فرواه عن الأعمش موقوفًا على عبد الله بن مسعود قال: تصدقن يا معشر النساء …ووافقهم على رفعه الحكم بن عُتيبة: فقد أخرجه أحمد 7/ (4122) من طريق المسعودي، وأحمد (4151) و (4152)، والنسائي (9212)، وابن حبان (3323) من طريق شعبة بن الحجاج، كلاهما عن الحكم بن عتيبة، عن ذرٍّ المُرهِبي، به مرفوعًا إلى قوله: "العشير"، زاد ابن حبان في روايته بعدها: قال عبد الله: ما من ناقصات العقل والدين .... فذكر نحو ما ها هنا.وممّن أخرج الحديث بتمامه مع قول ابن مسعود مفصَّلًا عن المرفوع: الحميدي (92)، وابن أبي عمر العَدَني في "الإيمان" (35)، وابن عبد البر في "التمهيد" 3/ 325 من طريق سفيان بن عيينة، وأبو يعلى (5112) من طريق عبد العزيز بن عبد الصمد، كلاهما عن منصور بن المعتمر، به.وكذلك أخرجه الدارمي (1047)، والحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (297)، والهيثم بن كليب الشاشي في "مسنده" (871) من طريق الحكم بن عتيبة، عن ذرٍّ، به. وأخرج الشطر الثاني منه مفردًا من قول ابن مسعود: ابنُ أبي شيبة في "المصنف" 11/ 38، وفي "الإيمان" (59) عن أبي معاوية، وابن بطة في "الإبانة" 2/ 849 - 850 من طريق محاضر بن المورع، كلاهما عن الأعمش، به.وسيأتي عند المصنف برقم (8997) من طريق قبيصة بن عقبة عن سفيان الثَّوري، مُدرَجًا فيه الموقوف مع المرفوع. والشطر الأول بإثره من طريق يحيى بن يحيى عن جرير.وقد صحَّ هذا الحديث برُمّته من رواية عبد الله بن عمر بن الخطاب عند أحمد 9/ (5343)، ومسلم (79)، وأبي داود (4679)، وابن ماجه (4003). وصحَّ أيضًا من حديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8862)، والترمذي (2613)، وقال: حديث حسن.
2808 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلّام، عن جدِّه، قال: كتب معاويةُ إلى عبد الرحمن بن شِبْل: أَنْ عَلِّمِ الناسَ ما سمعتَ من رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إِنَّ الفُسّاق هم أهلُ النار" قالوا: يا رسول الله، ومَن الفُسّاق؟ قال: "النساءُ" قالوا: يا رسول الله، ألسنَ أمهاتِنا وبناتِنا وأخواتِنا؟ قال: "بلى، ولكنهنَّ إذا أُعطِينَ لم يَشكُرنَ، وإذا ابتُلِينَ لم يَصبِرنَ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আব্দুর রহমান ইবনে শিবল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার কাছে লিখে পাঠালেন যে, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে যা শুনেছেন, তা মানুষকে শিক্ষা দিন। তখন তিনি (আব্দুর রহমান ইবনে শিবল) বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই ফাসিকরাই হলো জাহান্নামের অধিবাসী।" লোকেরা জিজ্ঞেস করল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! ফাসিক কারা? তিনি বললেন: "নারীরা।" তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তারা কি আমাদের মা, আমাদের কন্যা ও আমাদের বোন নয়? তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই। কিন্তু যখন তাদের কিছু দেওয়া হয়, তারা কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না এবং যখন তাদের কোনো বিপদে ফেলা হয়, তারা ধৈর্য ধারণ করে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن وهم فيه معمر - وهو ابن راشد - بإسقاط أبي راشد الحُبراني بين جدِّ زيد بن سلّام؛ وهو أبو سلّام ممطور الحبشي، وبين عبد الرحمن بن شِبْل، وقد روي هذا الحديث بهذا الإسناد مجموعًا إلى حديثين آخرين تقدم أحدهما برقم (2174) و (2175)، وقدَّمنا الكلامَ هناك على وهم معمر في إسناده، فأغنى عن إعادته هنا، وقد روي الحديث عن يحيى بن أبي كثير عن أبي راشد الحُبراني مباشرة أيضًا كما سيأتي برقم (9002).وهو في "جامع معمر" برواية عبد الرزاق عنه برقم (19444)، وعن عبد الرزاق أخرجه أحمد 24/ (15666/ 3).وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (9346) من طريق علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلّام، عن جده أبي سلام، عن أبي راشد، عن عبد الرحمن بن شبل.
2809 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا بشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، عن الزُّهْري، عن عبيد الله بن عبد الله بن عمر، عن إياس بن عبد الله ابن أبي ذُباب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تضرِبُوا إماءَ الله" فجاء عمرُ إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، قد ذَئِرنَ النساءُ على أزواجهنّ، فأَذِنَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يَضربوهنّ، قال: فأطافَ بآل محمد صلى الله عليه وسلم سبعون امرأةً، كلُّهن يشتَكين أزواجَهنَّ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ليس [1] أولئك خِيارَكم" [2].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وله شاهد بإسناد صحيح عن أم كُلثوم بنت أبي بكر:
ইয়াস ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু আবী যুবাব থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আল্লাহর দাসীদের (নারীদের) প্রহার করো না।" অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! স্ত্রীরা তাদের স্বামীদের উপর ঔদ্ধত্য প্রকাশ করতে শুরু করেছে।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের প্রহার করার অনুমতি দিলেন। (বর্ণনাকারী) বলেন, এরপর সত্তরজন নারী মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের চারপাশে ভিড় জমালো, তাদের সকলেই তাদের স্বামীদের বিরুদ্ধে অভিযোগ করছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা তোমাদের মধ্যে উত্তম ব্যক্তি নয়।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظة "ليس" سقطت من (ز) و (ص) و (ب) ثم ألحقت بهامش (ص) بخط مغاير، وهي ثابتة في (ع)، والصواب إثباتها لفساد المعنى بدونها.
[2] إسناده صحيح، وقد تقدم برقم (2800).
2810 - أخبرَناه أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل السُّلمي، حدثنا سعيد بن كَثير بن عُفَير وسعيد بن أبي مريم، قالا: حدثنا الليث بن سعد، عن يحيى بن سعيد، عن حُميد بن نافع، عن أم كُلثوم بنت أبي بكر، قالت: كان الرجالُ نُهوا عن ضَرْب النساءِ، ثم شَكَوهُنَّ إِلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فخلَّى بينهم وبين ضربِهنَّ [1]، ثم قال: "لقد أطافَ الليلةَ بآل محمد صلى الله عليه وسلم سبعونَ امرأةً كلُّهن قد ضُربتْ". قال يحيى: وحسبتُ أنَّ القاسم قال: ثم قيل لهم بعدُ: "ولن يَضربَ خِيارُكم" [2].
উম্মে কুলসুম বিনতে আবি বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: পুরুষদেরকে স্ত্রীদের প্রহার করতে নিষেধ করা হয়েছিল। অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তাদের (স্ত্রীদের) ব্যাপারে অভিযোগ করল। ফলে তিনি তাদেরকে তাদের স্ত্রীদের প্রহার করার অনুমতি দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "আজ রাতে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের কাছে সত্তরজন মহিলা এসেছে, তাদের প্রত্যেকেই প্রহৃত হয়েছে।" ইয়াহইয়া (রহ.) বলেন: আমার ধারণা, কাসিম (রহ.) বলেছেন: এরপর তাদেরকে বলা হয়েছিল: "তোমাদের মধ্যে যারা উত্তম, তারা কখনও প্রহার করবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ص) و (ع): ضربهم، والمثبت من (ب) و"تلخيص الذهبي"، وهو الجادّة.
[2] رجاله ثقات، وهو مرسل، لأنَّ أم كلثوم بنت أبي بكر - وهو الصدِّيق - ولدت بعد وفاة أبيها الصدّيق رضي الله عنه. يحيى بن سعيد: هو الأنصاري.وأخرجه البيهقي 7/ 304 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي 7/ 304 من طريق يحيى بن بكير، عن الليث بن سعد، به.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (2217) عن جرير بن عبد الحميد، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، به. وزاد في حديثه: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما أُحبُّ أن أَرى الرجلَ ثائرًا غضبُه فريصًا رقبتُه على مُرَيَّتِه يقتلُها".وأخرجه مقتصرًا على هذه الزيادة الحسن بن سفيان في "مسنده"، كما في "الإصابة" لابن حجر 8/ 296، وأبو نعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (8021) من طريق قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، به.وأخرجه مقتصِرًا عليها أيضًا ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 10/ 194 من طريق سليمان بن بلال، وابن أبي الدنيا في "النفقة على العيال" (489) من طريق سفيان بن عيينة، كلاهما عن يحيى بن سعيد الأنصاري، به. قلنا: قد اختلف الرواة على عدي بن ثابت في هذا الحديث؛ فرواه زيد بن أبي أنيسة عند أبي داود (4457)، والنسائي (5465)، والحاكم في الرواية الآتية برقم (8255)، ومحمد بن إسحاق فيما ذكر الترمذي بإثر الحديث (1362)، وعبد الغفار بن القاسم عند أحمد 30/ (18610)، ثلاثتهم عن عدي بن ثابت، عن يزيد بن البراء، عن أبيه البراء. لكن عبد الغفار متروك.ورواه الربيع بن الركين عند أحمد (18578)، والنسائي (7183)، والحاكم (2812)، والسديُّ عند أحمد (18557)، والنسائي (5464) و (7184)، وابن حبان (4112)، والحاكم كما في هذه الرواية والرواية الآتية برقم (6799)، وسفيان الثَّوري عند البزار في "مسنده" (3795)، وحجاج بن أرطاة عند الروياني في "مسنده" (381)، أربعتهم عن عدي، عن البراء. لم يذكروا فيه يزيد بن البراء. ووقع في رواية حجاج التصريح بسماعه من عدي، وبسماع عدي من البراء، لكن حجاج بن أرطاة ليس بذاك القوي.ورواه أشعث بن سوار عن عدي بن ثابت، واختلف عليه فيه:فرواه معمر عند أحمد (18626)، والنسائي (7185)، وأبو خالد الأحمر سليمان بن حيان عند الترمذي في "العلل الكبير" (372)، والبيهقي 8/ 237، والفضل بن العلاء عند الطبري في مسند ابن عباس من "تهذيب الآثار" (893)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (2047)، ثلاثتهم عن أشعث، عن عدي، عن يزيد، عن أبيه البراء.ورواه هُشَيم عند أحمد (18579)، وابن ماجه (2607)، وحفص بن غياث عند ابن ماجه (2607)، والترمذي (1362)، كلاهما عن أشعث، عن عدي، عن البراء. ليس فيه يزيد، قال الترمذي: حسن غريب.ورواه خالد الواسطي فيما ذكر الدارقطني في "العلل" 6/ 21 عن أشعث، عن عدي بن ثابت، عن يزيد بن البراء، عن خاله. ليس فيه البراء، وهذا من سوء حفظ أشعث بن سوار.وقد رجح أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه (1207) الرواية التي فيها يزيد بن البراء، ولم يرجح البخاري أيًّا من الروايتين، فيما نقل عنه الترمذي في "العلل الكبير" ص 209 قال: سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: إن معمرًا روى هذا الحديث فقال: عن عدي بن ثابت عن يزيد بن البراء عن أبيه، ولم يذكر فيه أيَّ الروايات أصح. وكذا لم يرجح شيئًا أبو زرعة كما في "العلل" لابن أبي حاتم (1277)، والدارقطني في "العلل" (951).وذهب ابنُ حزم في "المحلى" 11/ 253 إلى أن كلا الطريقين صحيح، فقال: هذه آثار صحاح تجب بها الحجة، ولا يضرُّها أن يكون عدي بن ثابت حدث به مرة عن البراء، ومرة عن يزيد بن البراء عن أبيه، فقد يسمعه من البراء ويسمعه من يزيد بن البراء، فيحدث به مرةً عن هذا، ومرةً عن هذا. انتهى، وهذا صحيح لو ثبت في رواية صحيحة تصريح عدي بن ثابت بسماعه من البراء، مع أن سماعه من البراء وروايته عنه في "الصحيحين" في غير هذا الحديث، والله تعالى أعلم.واختُلف فيه أيضًا اختلاف آخر لا يقدح في صحة الحديث، وهو أنَّ بعضهم يقول فيه: عمي، بدل خالي، ورجّح أبو زرعة الرازي أنَّ الصحيح فيه ذكر خاله، وهو أبو بُردة بن نِيار، كما نقله عنه ابن أبي حاتم في "العلل" (1277)، وقال العُقيلي في "الضعفاء" 2/ 257: روي عن البراء بن عازب عن عمِّه أبي بُردة بن نِيار: قال: بعثني النبي صلى الله عليه وسلم إلى رجل أَعْرَسَ بامرأة أبيه أن أضرب عنقه، بإسناد صالح.وسيأتي عند المصنف برقم (2813) و (8254) من طريق أبي الجهم سليمان بن الجهم عن البراء. وإسناده حسن.وفي الباب عن معاوية بن قرة بن إياس المزني عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث أباه إلى رجل عرّس بامرأة أبيه فضرب عنقه وخمّس مالَه. أخرجه ابن ماجه (2608)، والنسائي (7186)، واللفظُ له. والظاهر أنَّ قرة إنما كان في هذه الواقعة بصحبة خال البراء، والله تعالى أعلم.وقال ابن معين فيما نقله عنه ابن حزم في "المحلى" 11/ 253: هذا الحديث صحيح، ومن رواه فأوقفه على معاوية فليس بشيء، قد كان ابن إدريس - يعني أحد رواته - أرسله لِقوم وأسنده لآخرين.وانظر أقوال الفقهاء في هذه المسألة في "شرح معاني الآثار" للطحاوي 3/ 148 - 151، و"المغني" لابن قدامة 12/ 341 - 343، و"شرح السنة" للبغوي 7/ 304 - 306.
2811 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان العامري، حدثنا يحيى بن فَصِيل، حدثنا الحسن بن صالح، عن السُّدِّي، عن عَدي بن ثابت، عن البراء بن عازب، قال: لَقِيتُ خالي ومعه الرايةُ، قلت: أين تريدُ؟ قال: بَعَثَني النبيُّ صلى الله عليه وسلم إلى رجلٍ تَزوّج امرأةَ أبيه من بعدِه، فأمرني أن أضربَ عُنقَه [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شواهد عن عَدِيّ بن ثابت، وعن البراء مِن غير حديث عَدِيِّ بن ثابت:
বারা ইবন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার মামার সাথে সাক্ষাৎ করলাম। তার হাতে ছিল পতাকা। আমি বললাম, আপনি কোথায় যেতে চান? তিনি বললেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এমন এক ব্যক্তির কাছে পাঠিয়েছেন, যে তার পিতার মৃত্যুর পর তার পিতার স্ত্রীকে বিবাহ করেছে। তাই তিনি আমাকে নির্দেশ দিয়েছেন যেন আমি তার গর্দান উড়িয়ে দিই।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح إن شاء الله، وهذا إسناد لا بأس برجاله غير يحيى بن فَصيل - وهو الغَنوي الكوفي - فحسن في المتابعات والشواهد، وقد توبع. وقد اختُلف على عدي بن ثابت فيه اختلافًا لا يضرُّ كما أشار ابن القيم في "حاشيته على سنن أبي داود" 6/ 266، وسنذكر هذه الخلافات، ليتضح حال الحديث. ومع ذلك فقد ثبت الحديثُ من غير طريق عدي بن ثابت كما سيأتي. وكان قد تقدَّم منا تضعيف هذا الحديث في "مسند أحمد" وغيره بالاضطراب، فيُستدرك من هنا، والله تعالى أعلم. قلنا: قد اختلف الرواة على عدي بن ثابت في هذا الحديث؛ فرواه زيد بن أبي أنيسة عند أبي داود (4457)، والنسائي (5465)، والحاكم في الرواية الآتية برقم (8255)، ومحمد بن إسحاق فيما ذكر الترمذي بإثر الحديث (1362)، وعبد الغفار بن القاسم عند أحمد 30/ (18610)، ثلاثتهم عن عدي بن ثابت، عن يزيد بن البراء، عن أبيه البراء. لكن عبد الغفار متروك.ورواه الربيع بن الركين عند أحمد (18578)، والنسائي (7183)، والحاكم (2812)، والسديُّ عند أحمد (18557)، والنسائي (5464) و (7184)، وابن حبان (4112)، والحاكم كما في هذه الرواية والرواية الآتية برقم (6799)، وسفيان الثَّوري عند البزار في "مسنده" (3795)، وحجاج بن أرطاة عند الروياني في "مسنده" (381)، أربعتهم عن عدي، عن البراء. لم يذكروا فيه يزيد بن البراء. ووقع في رواية حجاج التصريح بسماعه من عدي، وبسماع عدي من البراء، لكن حجاج بن أرطاة ليس بذاك القوي.ورواه أشعث بن سوار عن عدي بن ثابت، واختلف عليه فيه:فرواه معمر عند أحمد (18626)، والنسائي (7185)، وأبو خالد الأحمر سليمان بن حيان عند الترمذي في "العلل الكبير" (372)، والبيهقي 8/ 237، والفضل بن العلاء عند الطبري في مسند ابن عباس من "تهذيب الآثار" (893)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (2047)، ثلاثتهم عن أشعث، عن عدي، عن يزيد، عن أبيه البراء.ورواه هُشَيم عند أحمد (18579)، وابن ماجه (2607)، وحفص بن غياث عند ابن ماجه (2607)، والترمذي (1362)، كلاهما عن أشعث، عن عدي، عن البراء. ليس فيه يزيد، قال الترمذي: حسن غريب.ورواه خالد الواسطي فيما ذكر الدارقطني في "العلل" 6/ 21 عن أشعث، عن عدي بن ثابت، عن يزيد بن البراء، عن خاله. ليس فيه البراء، وهذا من سوء حفظ أشعث بن سوار.وقد رجح أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه (1207) الرواية التي فيها يزيد بن البراء، ولم يرجح البخاري أيًّا من الروايتين، فيما نقل عنه الترمذي في "العلل الكبير" ص 209 قال: سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: إن معمرًا روى هذا الحديث فقال: عن عدي بن ثابت عن يزيد بن البراء عن أبيه، ولم يذكر فيه أيَّ الروايات أصح. وكذا لم يرجح شيئًا أبو زرعة كما في "العلل" لابن أبي حاتم (1277)، والدارقطني في "العلل" (951).وذهب ابنُ حزم في "المحلى" 11/ 253 إلى أن كلا الطريقين صحيح، فقال: هذه آثار صحاح تجب بها الحجة، ولا يضرُّها أن يكون عدي بن ثابت حدث به مرة عن البراء، ومرة عن يزيد بن البراء عن أبيه، فقد يسمعه من البراء ويسمعه من يزيد بن البراء، فيحدث به مرةً عن هذا، ومرةً عن هذا. انتهى، وهذا صحيح لو ثبت في رواية صحيحة تصريح عدي بن ثابت بسماعه من البراء، مع أن سماعه من البراء وروايته عنه في "الصحيحين" في غير هذا الحديث، والله تعالى أعلم.واختُلف فيه أيضًا اختلاف آخر لا يقدح في صحة الحديث، وهو أنَّ بعضهم يقول فيه: عمي، بدل خالي، ورجّح أبو زرعة الرازي أنَّ الصحيح فيه ذكر خاله، وهو أبو بُردة بن نِيار، كما نقله عنه ابن أبي حاتم في "العلل" (1277)، وقال العُقيلي في "الضعفاء" 2/ 257: روي عن البراء بن عازب عن عمِّه أبي بُردة بن نِيار: قال: بعثني النبي صلى الله عليه وسلم إلى رجل أَعْرَسَ بامرأة أبيه أن أضرب عنقه، بإسناد صالح.وسيأتي عند المصنف برقم (2813) و (8254) من طريق أبي الجهم سليمان بن الجهم عن البراء. وإسناده حسن.وفي الباب عن معاوية بن قرة بن إياس المزني عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث أباه إلى رجل عرّس بامرأة أبيه فضرب عنقه وخمّس مالَه. أخرجه ابن ماجه (2608)، والنسائي (7186)، واللفظُ له. والظاهر أنَّ قرة إنما كان في هذه الواقعة بصحبة خال البراء، والله تعالى أعلم.وقال ابن معين فيما نقله عنه ابن حزم في "المحلى" 11/ 253: هذا الحديث صحيح، ومن رواه فأوقفه على معاوية فليس بشيء، قد كان ابن إدريس - يعني أحد رواته - أرسله لِقوم وأسنده لآخرين.وانظر أقوال الفقهاء في هذه المسألة في "شرح معاني الآثار" للطحاوي 3/ 148 - 151، و"المغني" لابن قدامة 12/ 341 - 343، و"شرح السنة" للبغوي 7/ 304 - 306.
2812 - أخبرَناه أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن الرَّبيع بن الرُّكَين بن الرَّبيع بن عُمَيلة، قال: سمعتُ عديّ بن ثابت يحدِّث عن البراء بن عازب، قال: مَرَّ بنا ناسٌ يَنطلِقون، فقلنا لهم: أين تَذهبُون؟ قالوا: بعثَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى رجلٍ يأتي امرأةَ أبيه أن نَقتُلَه [1]. وأما حديث أبي الجَهْم عن البراء:
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের পাশ দিয়ে কিছু লোক যাচ্ছিল। আমরা তাদের জিজ্ঞেস করলাম: তোমরা কোথায় যাচ্ছো? তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এমন এক ব্যক্তির কাছে পাঠিয়েছেন, যে তার পিতার স্ত্রীকে (সৎমাকে) বিবাহ করেছে— যেন আমরা তাকে হত্যা করি। আর বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আবূল জাহম-এর হাদীস সম্পর্কে (বলতে গেলে)...
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح إن شاء الله، وهذا إسناد رجاله ثقات غير الرَّبيع بن الرُّكين، فقد روى عنه شعبة ومروان بن معاوية الفَزاري، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد توبع في الطريق التي قبل هذه، وانظر تمام الكلام عليه هناك.وهو في "مسند أحمد" 30/ (18578).وأخرجه النسائي (7183) عن يحيى بن حكيم البصري، عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد. لكن أَثبتَ مُحقِّقُه في إسناده الرُّكَين بن الربيع، بدل الربيع بن الرُّكَين، مع أنه جاء على الصواب في أصله الخطّي، اغترارًا بقول المزي في "التحفة"، وهو خطأ من المزي رحمه الله مشى عليه في "تهذيب الكمال" وفي "التحفة"، وقد أشار غير واحدٍ من أهل العلم إلى هذه الرواية كأبي زرعة والدارقطني فسمَّوه على الصواب الربيع بن الركين، وينبني على خطأ المزي توهُّم صحة الإسناد، لأنَّ الرُّكين ثقة، وأما ابنه فدون الثقة.
2813 - فحدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان، حدثنا أسباط بن محمد، عن مُطَرِّف، عن أبي الجَهْم، عن البراء بن عازب، قال: إني لأطوفُ على إبلٍ لي ضَلّت في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبَيْنا أنا أجُول في أبيات، فإذا أنا برَكْبٍ وفوارسَ جاؤوا فأطافُوا فاستخرجُوا رجلًا، فما سألوه ولا كَلَّموه حتى ضربوا عنقَه، فلما ذهبُوا سألتُ عنه، قالوا: عَرَّس بامرأةِ أبيه [1].
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমার হারিয়ে যাওয়া উট খুঁজতে ঘুরে বেড়াচ্ছিলাম। আমি যখন কিছু বাড়ির আশেপাশে ঘুরছিলাম, তখন আমি দেখলাম যে কিছু আরোহী ও অশ্বারোহী এসে ভিড় করেছে এবং তারা এক ব্যক্তিকে বের করে আনলো। তারা তাকে কোনো প্রশ্ন করেনি বা তার সাথে কথা বলেনি, বরং তার গর্দান উড়িয়ে দিলো। যখন তারা চলে গেল, আমি (ঐ ব্যক্তি সম্পর্কে) জিজ্ঞাসা করলাম। তারা বললো: সে তার পিতার স্ত্রীকে (সৎমাকে) বিবাহ করেছিল (বা তার সাথে সহবাস করেছিল)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح إن شاء الله، وهذا إسناد حسن من أجل أبي الجهم: وهو سليمان بن الجَهْم بن أبي الجَهْم، وقال الذهبي في إسناده في "التلخيص": مليح. مُطرِّف: هو ابن طريف الحارثي.وأخرجه أحمد 30/ (18608) عن أسباط بن محمد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (18620)، والنسائي (5466) من طريق جرير بن عبد الحميد، وأبو داود (4456) من طريق خالد بن عبد الله الواسطي، والنسائي (7182) من طريق أبي زبيد عَبْثَر بن القاسم، ثلاثتهم عن مُطرّف بن طريف، به.
2814 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعدي، أخبرنا يزيد بن هارون.وأخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا سعيد بن أبي عَرُوبة. وأخبرنا الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، أخبرنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد، عن معمر، عن الزُّهْري، عن سالم، عن أبيه، قال: أسلم غَيلانُ بن سَلَمة الثَّقَفي وعنده عشرُ نِسوةٍ، فأمره النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن يأخذَ منهن أربعًا [1]. هكذا رواه المتقدّمون من أصحاب سعيد: يزيد بن زُريع وإسماعيلُ ابن عُلَيَّة وغُنْدَر والأئمة الحفاظ من أهل البصرة، وقد حكم الإمام مسلم بن الحجّاج أنَّ هذا الحديث ممّا وَهِمَ فيه معمرٌ بالبصرة، فإن رواه عنه ثقةٌ خارجَ البصريين حكمْنا له بالصحة، فوجدتُ سفيان الثَّوْري وعبدَ الرحمن بن محمد المُحارِبي وعيسى بن يونس، وثلاثتُهم كوفيون، حدَّثوا به عن معمر.أما حديث الثَّوْري:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: গাইলান ইবনু সালামা আস-সাকাফী ইসলাম গ্রহণ করলেন, যখন তাঁর অধীনে দশজন স্ত্রী ছিল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে আদেশ করলেন যেন তিনি তাদের মধ্য থেকে চারজনকে রেখে দেন। [১]। এরূপেই সাঈদ (ইবনু আবী আরুবা)-এর প্রাচীন ছাত্রগণ—ইয়াযিদ ইবনু যুরাই’, ইসমাঈল ইবনু উলাইয়্যা, গুন্দার এবং বসরা অঞ্চলের হাফিয ইমামগণ এটি বর্ণনা করেছেন। ইমাম মুসলিম ইবনু হাজ্জাজ এই রায় দিয়েছেন যে, এই হাদীসটি সেসব হাদীসের অন্তর্ভুক্ত, যা বর্ণনায় মা’মার বসরায় ভুল করেছেন। যদি বসরাবাসী ব্যতীত অন্য কোনো নির্ভরযোগ্য রাবী তার (মা’মারের) সূত্রে এটি বর্ণনা করেন, তবে আমরা সেটিকে সহীহ হিসেবে গণ্য করব। অতঃপর আমি সুফিয়ান আস-সাওরী, আবদুর রহমান ইবনু মুহাম্মাদ আল-মুহারিবী এবং ঈসা ইবনু ইউনুসকে পেলাম—এই তিনজনই কূফাবাসী—তারা মা'মারের সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন। তবে সাওরী'র হাদীস হলো: [এখানে সমাপ্ত]।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح بطرقه وشواهده وبعمل الأئمة به كما قال الترمذي، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه قد أُعِلَّ بالوصل والإرسال كما نبه عليه المصنف بإثره، لأنه تفرَّد بوصله معمر بن راشد، وخالفه أصحاب الزُّهْري، رووه عنه فأرسلوه، فلم يذكروا فيه سالمًا - وهو ابن عبد الله بن عمر بن الخطاب - ولا أباه، وبعضهم يقول فيه عن الزُّهْري: أنه بلغه عن عثمان بن محمد بن أبي سُويد مرسلًا أيضًا، وقد صحَّح الإرسال جماعةٌ منهم البخاريُّ وأبو حاتم وأبو زرعة وغيرهم، وصحَّح الوصل جماعةٌ غير المصنف، منهم ابن حبان وابن حزم والبيهقي وابنُ القطان الفاسي، ومال إليه الحافظ ابن حجر في "التلخيص"، وذكر الدارقطني والبيهقي وابن القطان له متابعةً من طريق سيف بن عُبيد الله الجرمي عن سرَّار بن مجشِّر عن أيوب عن نافع وسالم عن ابن عمر، وسيف وسرار ثقتان، كما قال الذهبي في "الرد على ابن القطان" 1/ 40، وقال: هو غريب جدًّا. قلنا: ونقل البيهقي عن أبي علي النيسابوري أنه رواه أيضًا السُّمَيدع بن واهب عن سرَّار، والسُّميدع هذا ثقة. وقال ابن القيم في "أحكام أهل الذمة" 3/ 376: وبالجملة فشهرة القصة تغني عن إسنادها. وانظر تمام الكلام عليه في "مسند أحمد" 8/ (4609).وأخرجه أحمد 9/ (5558) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد.وأخرجه الترمذي (1128) من طريق عَبْدة بن سليمان، عن سعيد بن أبي عروبة، به.وأخرجه أحمد 8/ (4609) و (2631)، وابن حبان (4156) من طريق إسماعيل ابن عُلَيَّة، وأحمد 8/ (4631) و 9/ (5027)، وابن ماجه (1953) من طريق محمد بن جعفر، وأحمد 9/ (5027) عن عبد الأعلى بن عبد الأعلى، ثلاثتهم عن معمر بن راشد، به.وانظر الطرق التالية بعده.وانظر تخريج طرقه المرسلة عن الزُّهْري في "مسند أحمد" (4609).وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (1680)، والدارقطني (3694)، وأبو نُعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 245، والبيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 183، وفي "معرفة السنن والآثار" (13963)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 48/ 138 من طريق سيف بن عُبيد الله الجرمي، عن سَرَّار بن مُجشِّر، عن أيوب السِّختياني، عن نافع وسالم، عن ابن عمر.
2815 - فحدَّثَناه علي بن حَمْشَاذَ العَدْل ويحيى بن منصور القاضي، قالا: حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا أبو عُبيد، حدثنا يحيى بن سعيد، عن سفيان، عن معمر، عن الزُّهْري، عن سالم، عن أبيه: أنَّ غَيلان بن سَلَمة أسلم وعنده عشرُ نِسوةٍ، فأمره رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يَختارَ منهن أربعًا [1].وأما حديث المُحارِبي:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, গাইলান ইবনু সালামা ইসলাম গ্রহণ করেন, আর তখন তাঁর অধীনে দশজন স্ত্রী ছিলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে আদেশ করলেন যেন তিনি তাদের মধ্য থেকে চারজনকে (স্ত্রী হিসেবে) নির্বাচন করে নেন। আর আল-মুহারিবীর হাদীসের ব্যাপারে...
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات كسابقه. أبو عُبيد: هو القاسم بن سلّام، ويحيى بن سعيد. هو القطّان.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 182 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وقرن به أبا عبد الرحمن السُّلمي.وأخرجه الدارقطني في "العلل" (2997) من طريق أحمد بن يوسف التغلبي، عن أبي عبيد، به.
2816 - فحدَّثَناه إسماعيل بن أحمد التاجر، أخبرنا علي بن أحمد بن الحسين العِجْلي، حدثنا محمد بن طَريف، حدثنا المُحارِبي، عن معمر، عن الزُّهْري، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه: أنَّ غَيلان بن سَلَمة أسلَم وعنده عشرُ نِسوةٍ في الجاهلية، وأسلَمْن معه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اختَرْ منهن أربعًا" [1].وأما حديث عيسى:
আবদুল্লাহ্ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, গায়লান ইবনু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইসলাম গ্রহণ করলেন। জাহিলিয়্যাতের যুগে তাঁর অধীনে দশজন স্ত্রী ছিল এবং ঐ স্ত্রীরাও তাঁর সাথে ইসলাম গ্রহণ করেছিল। তখন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি তাদের মধ্য থেকে চারজনকে (স্ত্রী হিসেবে) বেছে নাও।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات.
2817 - فحدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا إبراهيم بن موسى، أخبرنا عيسى بن يونس، عن معمر، عن الزُّهْري، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه، قال: أسلَم غَيلانَ بن سَلَمة الثَّقَفي وله عشرُ نِسوةٍ، فأمرَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يَتَخيّر منهن أربعًا، ويَتركَ سائرَهن [1].وهكذا وجدتُ الحديثَ عند أهل اليَمَامة عن معمر:
আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, গাইলান ইবনু সালামা আস-সাকাফী ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন, তখন তার অধীনে দশজন স্ত্রী ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে নির্দেশ দিলেন যে, তিনি যেন তাদের মধ্য থেকে চারজনকে বেছে নেন এবং বাকিদের ছেড়ে দেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات. عيسى بن يونس: هو ابن أبي إسحاق السَّبيعي.وأخرجه ابن حبان (4158) من طريق إسحاق بن راهويه، عن عيسى بن يونس، بهذا الإسناد. وأبو نعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (5629)، وأبو موسى المديني في "اللطائف من دقائق المعارف" (170) من طرق عن أحمد بن محمد بن عمر بن يونس، عن جده، عن يحيى بن عبد العزيز، عن يحيى بن أبي كثير، به. فلم يذكروا في رواياتهم محمد بن عمر بن يونس، وزادوا في الإسناد الرجل المذكور.
2818 - حدثني [أبو] [1] الحسين بن يعقوب الحافظ، أخبرنا محمد بن محمد بن سليمان، أنَّ أحمد بن محمد بن عمر بن يونس حدثهم، حدثني أَبي، حدثنا عمر بن يونس، حدثنا يحيى بن أبي كثير، أخبرنا معمر، عن الزُّهْري، عن سالم، عن أبيه، قال: أسلم غَيلانُ بن سَلَمة الثَّقَفي وله ثمانِ نسوةٍ، فأمره رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يَتخيّر منهن أربعًا [2]. وهكذا وجدتُ الحديث عن الأئمة الخُراسانيين عن معمر:
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, গাইলান ইবনে সালামাহ আস-সাকাফী ইসলাম গ্রহণ করেন। তখন তার আটজন স্ত্রী ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে নির্দেশ দিলেন যে, সে যেন তাদের মধ্য থেকে চারজনকে মনোনীত করে নেয়।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظة "أبو" سقطت من النسخ الخطية، والصواب إثباتها، فقد روى المصنف عن شيخه هذا عدة روايات، وكان يسميه فيها بأبي الحسين بن يعقوب الحافظ، وهو محمد بن محمد بن يعقوب الحجّاجي النيسابوري، له ترجمة في "سير أعلام النبلاء" 16/ 240. ومما يؤيد أنه هو أن له رواية عن محمد بن محمد بن سليمان - وهو الباغندي - عند غير المصنف، فقد روى الواحدي في "تفسيره الوسيط" 4/ 219 من طريقه عن الباغندي. وأبو نعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (5629)، وأبو موسى المديني في "اللطائف من دقائق المعارف" (170) من طرق عن أحمد بن محمد بن عمر بن يونس، عن جده، عن يحيى بن عبد العزيز، عن يحيى بن أبي كثير، به. فلم يذكروا في رواياتهم محمد بن عمر بن يونس، وزادوا في الإسناد الرجل المذكور.
[2] إسناده واهٍ بمرّة من أجل أحمد بن محمد بن عمر بن يونس، فقد كذّبه ابن صاعد كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وزاد في "الميزان" أنَّ أبا حاتم كذّبه أيضًا، وقال عنه الدارقطني: متروك، ومرة قال: ضعيف، وقال ابن عدي: حدث عن الثقات بمناكير. قلنا: وهذا الإسناد من مناكيره، فلم يروه من طريق يحيى بن أبي كثير غيره، ثم إنه اضطرب فيه، فروي عنه كما وقع عند المصنف هنا، ورواه جماعةٌ عنه عن جده، عن يحيى بن عبد العزيز الأردنيّ، عن يحيى بن أبي كثير، فأسقط ذكر أبيه، وزاد فيه بين هذه أبي كثير رجلًا هو يحيى بن عبد العزيز الأردني، ويُغني عنه الطرق المتقدمة قبله عن معمر.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 1/ 178، وأبو الشيخ الأصبهاني في "ذكر الأقران" (221)، وأبو نعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (5629)، وأبو موسى المديني في "اللطائف من دقائق المعارف" (170) من طرق عن أحمد بن محمد بن عمر بن يونس، عن جده، عن يحيى بن عبد العزيز، عن يحيى بن أبي كثير، به. فلم يذكروا في رواياتهم محمد بن عمر بن يونس، وزادوا في الإسناد الرجل المذكور.
2819 - حدثني أبو العباس أحمد بن سعيد المروَزي ببُخاري، حدثنا عبد الله بن محمود السَّعْدي، حدثنا محمد بن موسى الخلّال، حدثنا الفضل بن موسى، حدثنا معمر، عن الزُّهْري، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه: أنَّ غَيلان بن سَلَمة الثَّقَفي أَسلَم وعنده عشرُ نِسوةٍ، فأمره رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يُمسِكَ أربعًا، ويُفارقَ سائرَهنّ [1].والذي يؤدِّي إليه اجتهادي أنَّ معمر بن راشد حدَّث به على الوجهَين، أرسله مرةً ووصلَه مرةً، والدليل عليه أنَّ الذين وصلُوه عنه من أهل البصرة فقد أرسلوه أيضًا، والوصلُ أولَى من الإرسال، فإنَّ الزيادة من الثقة مقبولة، والله أعلم.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, গাইলান ইবনে সালামাহ আছ-ছাকাফী যখন ইসলাম গ্রহণ করেন, তখন তাঁর অধীনে দশজন স্ত্রী ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে আদেশ করলেন যেন তিনি চারজনকে রেখে দেন এবং বাকিদেরকে তালাক দিয়ে দেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات. أبو العباس أحمد بن سعيد: هو ابن معدان صاحب "تاريخ المراوزة"، ومحمد بن موسى الخلال يُعرف بالدولابي.وأخرجه ابن حبان (4157) من طريق أبي عمار الحسين بن حريث، عن الفضل بن موسى السِّيناني، بهذا الإسناد.وانظر ما تقدم برقم (2814). برقم (2733)، لكن دون ذكر القصة.وقد تابعه على ذكر القصة أبو الأشعث أحمد بن المقدام عند ابن المنذر في "الأوسط" (7386)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (4550)، وعفان عند أبي جعفر النحاس في "الناسخ والمنسوخ" ص 584، وزاد أبو الأشعث في روايته: "الزاني لا ينكح إلّا زانية مثله، والمجلود لا ينكح إلّا مجلودة مثله".
2820 - حدثنا أبو أحمد الحسين بن علي التميمي، حدثنا الإمام أبو بكر محمد بن إسحاق، حدثنا بشر بن معاذ العَقَدي، حدثنا يزيد بن زُريع، حدثنا حَبيبٌ المعلِّم، قال: جاء رجلٌ من أهل الكوفة إلى عمرو بن شعيب، فقال: ألا تَعجَبُ، إنَّ الحسن يقول: إنَّ الزانيَ المجلُودَ لا يَنكِحُ إِلّا مَجلُودةً مثلَه؟ فقال عمرو: وما يُعجِبُك، حدَّثَناه سعيدٌ المقبُري، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وكان عبدُ الله بن عمرو ينادي بها نداءً [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (হাবীব আল-মু'আল্লিম বলেন যে,) কূফাবাসীর একজন লোক আমর ইবনু শুআইবের নিকট এসে বললো: আপনি কি বিস্মিত হন না যে, আল-হাসান (বাসরী) বলেন: যে যেনাকারী ব্যক্তিকে বেত্রাঘাত করা হয়েছে, সে তার মতো বেত্রাঘাতপ্রাপ্তা নারী ছাড়া অন্য কাউকে বিবাহ করবে না? তখন আমর বললো: এতে আপনার আশ্চর্যের কী আছে? এই হাদীসটি আমাদের কাছে সাঈদ আল-মাকবুরী বর্ণনা করেছেন, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে (এই মর্মে বর্ণনা করেছেন)। আর আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই বিষয়টি জোরে ঘোষণা করতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل بشر بن معاذ، وقد توبع في الطريق المتقدمة برقم (2733)، لكن دون ذكر القصة.وقد تابعه على ذكر القصة أبو الأشعث أحمد بن المقدام عند ابن المنذر في "الأوسط" (7386)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (4550)، وعفان عند أبي جعفر النحاس في "الناسخ والمنسوخ" ص 584، وزاد أبو الأشعث في روايته: "الزاني لا ينكح إلّا زانية مثله، والمجلود لا ينكح إلّا مجلودة مثله".