হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2821)


2821 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا أبو المُثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا المُعتمِر، عن أبيه، قال: حدثنا الحَضرميُّ بن لاحِق، عن القاسم بن محمد، عن عبد الله بن عمرو: أنَّ رجلًا من المسلمين استأذن نبيَّ الله صلى الله عليه وسلم في امرأةٍ يُقال لها: أم مَهزُول، كانت تُسافِح وتشترط أن تُنفِقَ [1] عليه، وأنه استأذنَ فيها نبيَّ الله صلى الله عليه وسلم، وذكَرَ له أمرَها، فقرأ نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم: {الزَّانِي لَا يَنْكِحُ إِلَّا زَانِيَةً أَوْ مُشْرِكَةً}، ونزلت {وَالزَّانِيَةُ لَا يَنْكِحُهَا إِلَّا زَانٍ أَوْ مُشْرِكٌ} [النور: 3] [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন মুসলিম ব্যক্তি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উম্মে মাহযুল নামক এক মহিলাকে (বিবাহ করার জন্য) অনুমতি চাইল। সে ছিল ব্যভিচারিণী এবং এই শর্ত করত যে সে ঐ ব্যক্তির উপর খরচ করবে। সে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তার ব্যাপারে অনুমতি চাইল এবং তার অবস্থা বর্ণনা করল। তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাঠ করলেন: {ব্যভিচারী পুরুষ ব্যভিচারিণী নারী বা মুশরিক নারী ছাড়া অন্য কাউকে বিবাহ করে না}, আর নাযিল হলো: {আর ব্যভিচারিণী নারী, ব্যভিচারী পুরুষ বা মুশরিক পুরুষ ছাড়া অন্য কেউ তাকে বিবাহ করে না} (সূরা নূর: ৩)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] بالمثناة على البناء للمعلوم، يعني أنها تكفيه النفقة، كما جاء مفسَّرًا في بعض روايات الحديث، يعني أن تنفق عليه هي من كسبها.



[2] إسناده حسن إن شاء الله من أجل الحضرمي، وهو ليس بابن لاحق، كما جاء مقيَّدًا في رواية مُسدَّد خطأً، وإنما هو رجلٌ آخر جهَّله ابنُ المَديني، وقال عنه ابن مَعين وابن عَدي: ليس به بأس. المعتمر: هو ابن سليمان بن طَرْخان التيمي، وأبو المثنَّى: هو معاذ بن المثنَّى العنبري.وأخرجه أحمد 11/ (6480) و (7099) عن محمد بن الفضل عارم، والنسائي (11295) عن عمرو بن علي الفلّاس، كلاهما عن المعتمر بن سليمان بهذا الإسناد. والحضرمي عندهما مهمل غير مقيَّد.وسيأتي بنحوه برقم (3537) من طريق هُشَيم بن بَشير عن سليمان التيمي عن القاسم بن محمد. فلم يذكر هُشَيم في إسناده الحضرميَّ!وتقدَّم بنحوه أيضًا برقم (2734) من طريق عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2822)


2822 - أخبرنا الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا أبو يحيى بن أبي مَسَرّة، حدثنا خَلّاد بن يحيى وعبد الصمد بن حسان، قالا: حدثنا سفيان بن سعيد، عن حبيب بن أبي عَمْرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس: {الزَّانِي لَا يَنْكِحُ إِلَّا زَانِيَةً أَوْ مُشْرِكَةً} قال: أمَا إنه ليس بالنكاح، ولكنه الجِماعُ؛ لا يزني بها إلّا زانٍ أو مشركٌ [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর বাণী: "ব্যভিচারী পুরুষ ব্যভিচারিণী নারী অথবা মুশরিক নারী ব্যতীত বিবাহ করে না।" তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন, এটি বিবাহের (নিকাহ) বিষয়ে নয়, বরং এটা হলো ব্যভিচার (জিমাহ) সংক্রান্ত। তার সাথে কোনো ব্যভিচারী অথবা মুশরিক ছাড়া অন্য কেউ ব্যভিচার করে না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. سفيان بن سعيد: هو الثَّوري.وأخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 7/ 154 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 51، وابن أبي شيبة 4/ 272، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 8/ 2521 و 2522، والبيهقي 7/ 154، والذهبي في "مشيخته" المسمى بـ "المعجم اللطيف" (32) من طرق عن سفيان الثَّوري، به.وأخرجه الضياء المقدسي في "المختارة" 10/ (148) من طريق سفيان بن عيينة، عن حبيب بن أبي عمرة، به.وأخرجه أبو حذيفة النَّهدي في "تفسير سفيان الثَّوري" (711) عن سفيان عن حماد بن أبي سليمان، وأبو عبيد في "الناسخ والمنسوخ" (192) من طريق حُصين بن عبد الرحمن السُّلمي، وابن أبي حاتم 8/ 2522 من طريق أبي حَصِين عثمان بن عاصم، ثلاثتهم عن سعيد بن جبير، به.وأخرجه بنحوه يحيى بن سلام الإفريقي في "تفسيره" 1/ 427، وسحنون في "المدونة" 2/ 173، وابن أبي حاتم 8/ 2521 من طريق شعبة بن دينار مولى ابن عباس، والطبري في "تفسيره" 18/ 74 من طريق عكرمة، كلاهما عن ابن عباس. وقوّاه ابنُ القطان في "بيان الوهم" 5/ 293.وأخرجه أحمد 23/ (15092) من طريق همام بن يحيى، عن القاسم، به.وأخرجه أحمد 22/ (14212)، وأبو داود (2078) من طريق الحسن بن صالح، وأحمد 23/ (15031)، والترمذي (1112) من طريق ابن جُرَيج، والترمذي (1111) من طريق زهير بن محمد، ثلاثتهم عن عبد الله بن محمد بن عقيل، به.وأخرجه ابن ماجه (1959) عن أزهر بن مروان، عن عبد الوارث بن سعيد، عن القاسم بن عبد الواحد، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن ابن عمر، فذكر ابن عمر بدل جابر، وقال البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (270): عبد الله بن محمد بن عقيل عن جابر أصح.وفي الباب عن ابن عمر مرفوعًا، لكن بلفظ: "فهو باطل" أخرجه أبو داود (2079)، وإسناده ضعيف، والصحيح أنه موقوف على ابن عمر كما قال أبو داود والدارقطني. وقد أخرجه موقوفًا عليه عبد الرزاق (12981) و (12982)، وابن أبي شيبة 4/ 261 وغيرهما بأسانيد صحيحة عن نافع عنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2823)


2823 - أخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه، قال: قُرئ على عبد الملك بن محمد وأنا أسمع، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثني أبي، حدثنا القاسم بن عبد الواحد، عن عبد الله بن محمد بن عَقِيل، عن جابر بن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا تَزوّج العبدُ بغير إذنِ سيّده، كان عاهرًا" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কোনো গোলাম তার মনিবের অনুমতি ছাড়া বিবাহ করে, তখন সে যেন ব্যভিচারী হয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن إن شاء الله، وقد روي عن ابن عمر موقوفًا عليه ما يشدُّه، وعليه العمل، كما قال الترمذي وابن المنذر في "الأوسط" بين يدي الحديث (7472)، وقد صحَّحه الترمذي، وقوّاه ابنُ القطان في "بيان الوهم" 5/ 293.وأخرجه أحمد 23/ (15092) من طريق همام بن يحيى، عن القاسم، به.وأخرجه أحمد 22/ (14212)، وأبو داود (2078) من طريق الحسن بن صالح، وأحمد 23/ (15031)، والترمذي (1112) من طريق ابن جُرَيج، والترمذي (1111) من طريق زهير بن محمد، ثلاثتهم عن عبد الله بن محمد بن عقيل، به.وأخرجه ابن ماجه (1959) عن أزهر بن مروان، عن عبد الوارث بن سعيد، عن القاسم بن عبد الواحد، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن ابن عمر، فذكر ابن عمر بدل جابر، وقال البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (270): عبد الله بن محمد بن عقيل عن جابر أصح.وفي الباب عن ابن عمر مرفوعًا، لكن بلفظ: "فهو باطل" أخرجه أبو داود (2079)، وإسناده ضعيف، والصحيح أنه موقوف على ابن عمر كما قال أبو داود والدارقطني. وقد أخرجه موقوفًا عليه عبد الرزاق (12981) و (12982)، وابن أبي شيبة 4/ 261 وغيرهما بأسانيد صحيحة عن نافع عنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2824)


2824 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أحمد بن محمد بن نصر، حدثنا أبو نُعيم وأبو غسان، قالا: حدثنا شَريك، عن أبي رَبيعة الإيادِي، عن ابن بُريدة، عن أبيه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعَليّ: "يا عليُّ، لا تُتْبعِ النَّظْرةَ النَّظْرَةَ، فَإِنَّ لك الأُولى وليست لك الآخرةُ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "হে আলী! এক দৃষ্টির পর আরেক দৃষ্টি অনুসরণ করো না। কারণ, তোমার জন্য প্রথম দৃষ্টি (যা অনিচ্ছাকৃত) বৈধ, কিন্তু পরের দৃষ্টি বৈধ নয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل شريك - وهو ابن عبد الله النخعي - وأبي ربيعة الإيادي - واسمه عمر بن ربيعة - على أنَّ شريكًا رواه أيضًا عن أبي إسحاق السبيعي مقرونًا بأبي ربيعة. أبو نعيم: هو الفضل بن دُكين، وأبو غسان: هو مالك بن إسماعيل.وأخرجه أحمد 38/ (22974) عن وكيع، و (22991) عن هاشم بن القاسم، و (23021) عن أحمد بن عبد الملك الحَرَّاني، وأبو داود (2149) عن إسماعيل بن موسى الفزاري، والترمذي (2777) عن علي بن حُجر، خمستهم عن شريك النخعي، بهذا الإسناد. وقرن شريكٌ في رواية أحمد بن عبد الملك الحَرَّاني بأبي ربيعة أبا إسحاق السَّبيعي.وفي الباب عن علي بن أبي طالب نفسه سيأتي عند المصنف برقم (4673)، وفيه ضعفٌ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2825)


2825 - أخبرنا أبو النضر محمد بن محمد بن يوسف الفقيه، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا عبد الله بن محمد النُّفَيلي، حدثنا مِسكين بن بُكير، حدثنا شعبة، عن يزيد بن خُمَير، عن عبد الرحمن بن جُبير بن نُفير، عن أبيه، عن أبي الدرداء: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان في غزوة، فرأى امرأةً مُجِحَّة [1]، فقال: "لعلَّ صاحبَها ألَمَّ بها؟ " قالوا: نعم، قال: "لقد هَمَمتُ أن أَلْعنَه لعنةً تدخلُ معه في قبرِه، كيف يُورِّثه وهو لا يَحِلُّ له، وكيف يَستخدِمُه وهو لا يَحِلُّ له" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি যুদ্ধে ছিলেন। তিনি একটি গর্ভবতী মহিলাকে দেখে বললেন: "সম্ভবত তার স্বামী তার সাথে সহবাস করেছে?" তারা বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "আমি তো তাকে এমন অভিশাপ দিতে চেয়েছিলাম যা তার কবরেও তার সাথে থাকবে। সে কিভাবে তাকে উত্তরাধিকারী বানাবে যখন সে তার জন্য হালাল নয়? আর কিভাবেই বা সে তাকে ব্যবহার (সেবা গ্রহণ) করবে যখন সে তার জন্য হালাল নয়?"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تصحف في بعض النسخ الخطية إلى: مجخة، بالخاء المعجمة بعد الجيم، بدل الحاء المهملة. وهو من: أجَحَّت الحامل، إذا ظهر حملها. وأخرجه أبو داود (2157) عن عمرو بن عون، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 17/ (11228) و 18/ (11596) عن يحيى بن إسحاق، و (11596) عن أسود بن عامر، كلاهما عن شريك النخعي، به.وأخرج مسلم (1456) من طريق أبي علقمة الهاشمي، عن أبي سعيد الخُدْري: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين بعث جيشًا إلى أوطاس، فلقوا عدوًّا، فقاتلوهم فظهروا عليهم، وأصابوا لهم سبايا، فكأنَّ ناسًا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم تحرّجوا من غشيانهن من أجل أزواجهن من المشركين، فأنزل الله عز وجل: {وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ} أي: فهن لكم حلال إذا انقضت عدتهن.ويشهد لرواية شريك مُرسَلا طاووسٍ والشعبيِّ عند عبد الرزاق (12903) و (12904)، وابن أبي شيبة 4/ 369، ورجالهما لا بأس بهم.ويشهد للنهي عن وطء الحامل حتى تضع حديث ابن عباس المتقدم برقم (2367).وانظر لاستبراء الأَمة بحيضة "مصنف ابن أبي شيبة" 4/ 224.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل مسكين بن بُكير، وقد توبع.وأخرجه أبو داود (2156) عن عبد الله بن محمد النُّفَيلي، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 36/ (21703) عن يحيى بن سعيد القطان، وأحمد 45/ (27519)، ومسلم (1441) من طريق محمد بن جعفر، ومسلم (1441) من طريق يزيد بن هارون ومن طريق أبي داود الطيالسي، أربعتهم عن شعبة، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.قوله: "ألمَّ بها" أي: وَطِئها.وقوله: "كيف يُورِّثه وهو لا يحل له، وكيف يستخدمه وهو لا يحل له": يريد أنَّ ذلك الحَمل قد يكون من زوجها المشرك، فلا يحلّ له استلحاقه ولا توريثه، وقد يكون منه إذا وطئها أن ينفشَّ ما كان في الظاهر حملًا وتَعلَق من وطئه، فلا يجوز نفيُه ولا استخدامه. قاله الخطابي في "معالم السنن" 3/ 224. وأخرجه أبو داود (2157) عن عمرو بن عون، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 17/ (11228) و 18/ (11596) عن يحيى بن إسحاق، و (11596) عن أسود بن عامر، كلاهما عن شريك النخعي، به.وأخرج مسلم (1456) من طريق أبي علقمة الهاشمي، عن أبي سعيد الخُدْري: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين بعث جيشًا إلى أوطاس، فلقوا عدوًّا، فقاتلوهم فظهروا عليهم، وأصابوا لهم سبايا، فكأنَّ ناسًا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم تحرّجوا من غشيانهن من أجل أزواجهن من المشركين، فأنزل الله عز وجل: {وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ} أي: فهن لكم حلال إذا انقضت عدتهن.ويشهد لرواية شريك مُرسَلا طاووسٍ والشعبيِّ عند عبد الرزاق (12903) و (12904)، وابن أبي شيبة 4/ 369، ورجالهما لا بأس بهم.ويشهد للنهي عن وطء الحامل حتى تضع حديث ابن عباس المتقدم برقم (2367).وانظر لاستبراء الأَمة بحيضة "مصنف ابن أبي شيبة" 4/ 224.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2826)


2826 - أخبرَناهُ إسماعيلُ بن محمد بن الفضل، حدثنا جدي، حدثنا عمرو بن عَون، حدثنا شَريك، عن قيس بن وهب، عن أبي الوَدّاك، عن أبي سعيد الخُدْري، رفعه، أنه قال في سبايا أَوطاسٍ: "لا تُوطأُ حاملٌ حتى تَضَعَ، ولا غيرُ ذاتِ حَمْل حتى تَحيضَ حَيضة" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আওতাস-এর যুদ্ধবন্দিনীদের (দাসীদের) ব্যাপারে বলেছেন: গর্ভবতী (দাসী) সন্তান প্রসব না করা পর্যন্ত তার সাথে সহবাস করা যাবে না। আর যে গর্ভবতী নয়, তার সাথেও এক হায়েয (মাসিক) অতিবাহিত না হওয়া পর্যন্ত সহবাস করা যাবে না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل شريك - وهو ابن عبد الله النخعي - وحسّنه الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 1/ 172. أبو الودّاك: هو جَبْر بن نَوف. وأخرجه أبو داود (2157) عن عمرو بن عون، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 17/ (11228) و 18/ (11596) عن يحيى بن إسحاق، و (11596) عن أسود بن عامر، كلاهما عن شريك النخعي، به.وأخرج مسلم (1456) من طريق أبي علقمة الهاشمي، عن أبي سعيد الخُدْري: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين بعث جيشًا إلى أوطاس، فلقوا عدوًّا، فقاتلوهم فظهروا عليهم، وأصابوا لهم سبايا، فكأنَّ ناسًا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم تحرّجوا من غشيانهن من أجل أزواجهن من المشركين، فأنزل الله عز وجل: {وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ} أي: فهن لكم حلال إذا انقضت عدتهن.ويشهد لرواية شريك مُرسَلا طاووسٍ والشعبيِّ عند عبد الرزاق (12903) و (12904)، وابن أبي شيبة 4/ 369، ورجالهما لا بأس بهم.ويشهد للنهي عن وطء الحامل حتى تضع حديث ابن عباس المتقدم برقم (2367).وانظر لاستبراء الأَمة بحيضة "مصنف ابن أبي شيبة" 4/ 224.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2827)


2827 - أخبرنا أبو النضر الفقيه وأبو الحسن العَنَزي، قالا: حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا أبو الأصبَغ عبد العزيز بن يحيى الحرّاني، حدثنا محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن أبان بن صالح، عن مجاهد، عن ابن عباس، قال: إنَّ ابن عمر - واللهُ يغفرُ له - وَهِمَ، إنما كان هذا الحيُّ من الأنصار وهُم أهلُ وَثَن مع هذا الحي من اليهود وهم أهل كتاب، كانوا يَرَون لهم فضلًا عليهم، فكانُوا يَقتدُون بكثيرٍ من فِعْلهم، وكان مِن أمر أهل الكتاب أن لا يأتُوا النساءَ إلّا على حَرْفٍ واحدٍ، وذلك أستَرُ ما تكون المرأة، فكان هذا الحي من الأنصار قد أخذوا بذلك من فِعْلهم، وكان هذا الحي من قريش يَشْرَحُون النساء شَرْحًا منكرًا، ويتلذَّذون منهن مُقبِلاتٍ ومُدبِراتٍ ومُستلْقِياتٍ، فلما قَدِمَ المهاجرون المدينة، تزوج رجل منهم امرأةً من الأنصار، فذهب يصنعُ بها ذلك، فأنكرتْه عليه، وقالت: إنما كنا نُؤتى على حَرْفٍ، فاصنَعْ ذلك وإلّا فاجتَنِبْني، حتى شَرِيَ [1] أمرُهما، فبلغ ذاك رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فأنزل الله تبارك وتعالى: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة: 223]، أي: مُقبِلات ومُدبِرات ومُستلْقِيات، يعني بذلك موضعَ الولد [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، إنما اتفقا [3] على حديث محمد بن المُنكَدِر عن جابر في هذا الباب.هذا آخر كتاب النكاح، وأول كتاب الطلاق ‌‌كتاب الطلاقبسم الله الرحمن الرحيم




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—আল্লাহ তাকে ক্ষমা করুন—ভুল করেছেন। ব্যাপারটি হলো, আনসারদের এই গোত্রের লোকেরা ছিল মূর্তিপূজক। তারা ইয়াহুদী গোত্রের সাথে বসবাস করত, যারা ছিল কিতাবধারী (আহলে কিতাব)। আনসারগণ ইয়াহুদীদেরকে নিজেদের ওপর শ্রেষ্ঠ মনে করত। তাই তারা তাদের (ইয়াহুদীদের) অনেক কাজ অনুকরণ করত। আহলে কিতাবদের নিয়ম ছিল যে তারা স্ত্রীদের সাথে শুধুমাত্র এক ভঙ্গিতে মিলিত হতো। আর সেটি হলো যখন স্ত্রী সবচেয়ে বেশি আবৃত অবস্থায় থাকে (পার্শ্বমুখী)। ফলে আনসারদের এই গোত্রের লোকেরা তাদের (ইয়াহুদীদের) এই কাজটি গ্রহণ করে নিয়েছিল। পক্ষান্তরে কুরাইশ গোত্রের লোকেরা তাদের স্ত্রীদেরকে বিভিন্ন ভঙ্গিতে অবাধ সুযোগ দিত এবং সম্মুখ দিক, পশ্চাৎ দিক ও চিৎ হয়ে শুয়েও তাদের সাথে আনন্দ উপভোগ করত। যখন মুহাজিরগণ মদীনায় আসলেন, তাদের মধ্যে একজন আনসারী মহিলাকে বিবাহ করলেন। তিনি তার সাথে পূর্বের মতো মিলিত হতে চাইলেন, কিন্তু মহিলাটি তা অপছন্দ করলেন। তিনি বললেন, আমরা তো শুধু এক ভঙ্গিতেই মিলিত হতাম। আপনি হয় সেইভাবে করুন, না হয় আমাকে পরিহার করুন। ফলে তাদের দুজনের বিষয়টি গুরুতর হয়ে উঠল এবং বিষয়টি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট পৌঁছাল। অতঃপর আল্লাহ তা'আলা নাযিল করলেন: "তোমাদের স্ত্রীরা হলো তোমাদের শস্যক্ষেত্র। সুতরাং তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা আসতে পারো।" [সূরাহ আল-বাক্বারাহ: ২২৩] অর্থাৎ সম্মুখ দিক, পশ্চাৎ দিক এবং চিৎ হয়ে শুয়েও (আসতে পারো)। এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো সন্তান জন্মদানের স্থান।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ص) و (ع) و (ب): سرى، بالسين المهملة وآخره ألف مقصورة، والمثبت من (ز) و"تلخيص الذهبي" بالشين المعجمة وآخره ياء تحتانية، وكذلك جاء في رواية البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 195 عن الحاكم، ومعنى شَرِيَ: ارتفع وعظم.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد صرَّح بسماعه في الطريق الآتية برقم (3142).وأخرجه أبو داود (2164) عن أبي الأصبغ الحراني، بهذا الإسناد.وأخرج أحمد 4/ (2703)، والترمذي (2980)، والنسائي (8928) و (10973)، وابن حبان (4202) من طريق سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال: جاء عمر بن الخطاب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، هلكتُ، قال: "وما الذي أهلكك؟ " قال: حوّلتُ رحلي البارحة، قال: فلم يردّ عليه شيئًا، قال: فأوحى الله إلى رسوله هذه الآية {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} "أَقبِل وأَدبِر، واتق الدُّبُر والحيضة". وإسناده حسن.وأخرج أحمد 44/ (26601)، والترمذي (2979) عن أم سلمة، قالت: إنَّ الأنصار كانوا لا يَجبُّون النساء (يعني وطأَهُن وهنّ مُنكبّات على وجوههن) وكانت اليهود تقول: إنَّ من جَبّى امرأته كان ولده أحول، فلما قدم المهاجرون المدينة نكحوا نساء الأنصار، فجبُّوهن، فأبت امرأة أن تطيع زوجها فقالت لزوجها: لن تفعل ذلك حتى آتي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فدخلت على أم سلمة، فذكرت ذلك لها، فقالت: اجلسي حتى يأتي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما جاء رسولُ الله صلى الله عليه وسلم استحيتْ الأنصارية أن تسأله فخرجت، فحدثت أم سلمة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "ادعي الأنصارية، فدُعيَت" فتلا عليها {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} صِمامًا واحدًا. وإسناده قوي.قوله: "يشرحون النساء" أي: يأتونهنَّ وهنّ مستلقيات على أقفائهنّ أو على وجوههنّ.وقوله: "على حَرْفٍ واحدٍ" أي: إتيانهنَّ على جَنْب.



2827 [3] - البخاري (4528) ومسلم (1435)، بلفظ: كانت اليهود تقول: إذا جامعها من ورائها، جاء الوليد أحوَل، فنزلت … وذكر الآية.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2828)


2828 - أخبرني أبو الحسين محمد بن أحمد بن تَميم القَنْطري ببغداد، حدثنا أبو قِلابة، حدثنا أبو عاصم، حدثنا عبد الله بن المؤمَّل، عن ابن أبي مُلَيكة: أنَّ أبا الجَوزاء أتى ابنَ عباس، فقال: أتعلَمُ أنَّ ثلاثًا كُنّ يُردَدْن على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى واحدةٍ؟ قال: نعم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আবুল জাওযাআ তাঁর (ইবনে আব্বাসের) নিকট আসলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কি জানেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে তিন তালাককে এক তালাক হিসেবে গণ্য করা হতো? তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: হ্যাঁ।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن المؤمَّل، فهو ضعيف يعتبر به، وقد روي هذا الحديث من وجه آخر صحيح عن ابن عباس سيأتي بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2829)


2829 - أخبرنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، أخبرني ابن طاووس، عن أبيه، عن ابن عباس، قال: كان الطلاقُ على عهدِ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وسنتين من خلافة عُمر طلاقُ الثلاثِ واحدةً، فقال عُمر: إن الناس قد استعجَلُوا في أمرٍ كانت لهم فيه أَناة، فلو أمضَيناهُ عليهم؛ فأمضَاهُ عليهم [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগ, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগ এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের প্রথম দুই বছর— এই সময়ে তিন তালাককে এক তালাক হিসেবে গণ্য করা হতো। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যে বিষয়ে মানুষের ধীরে-সুস্থে কাজ করার সুযোগ ছিল, তারা সে বিষয়ে দ্রুততা করেছে। সুতরাং যদি আমরা এটি তাদের উপর কার্যকর করি (তাহলে কেমন হয়?)। অতঃপর তিনি (উমার রাঃ) সেটি তাদের উপর কার্যকর করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. إسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه، ومحمد بن عبد السلام: هو النيسابوري الورّاق، ومعمر: هو ابن راشد، وابن طاووس: هو عبد الله بن طاووس بن كيسان اليماني.وأخرجه مسلم (1472) (15) عن إسحاق بن راهويه بهذا الإسناد. وقرن بإسحاق محمدَ بنَ رافع. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 5/ (2875) عن عبد الرزاق، به.وأخرجه مسلم (1472) (16) من طريق ابن جُرَيج، عن عبد الله بن طاووس، به. إلّا أنه قال: وثلاثًا من إمارة عمر.وأخرجه أيضًا (1472) (17) من طريق إبراهيم بن ميسرة، عن طاووس، به. إلّا أنه قال: فلما كان في عهد عمر تتابع الناس في الطلاق، فأجازه عليهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2830)


2830 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا مُعرِّف بن واصِل، عن مُحارِب بن دِثار، عن عبد الله بن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما أحلَّ اللهُ شيئًا أبغضَ إليه مِن الطلاق" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، ومن حُكْم هذا الحديث أن يُبدَا به في كتاب الطلاق.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন, “আল্লাহ যা কিছু হালাল করেছেন, তার মধ্যে তালাকের চেয়ে তাঁর কাছে অধিক অপছন্দনীয় আর কিছু নেই।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات إلّا أنه قد اختُلف في وصله وإرساله على مُعرِّف بن واصل، وقد صحَّح إرسالَه أبو حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه (1297)، ورجَّحه الدارقطني في "العلل" (3123)، والبيهقي في "سننه الكبرى" 7/ 322، وقال: المرسل هو المشهور. وخالفهم آخرون فصحَّحوه موصولًا، منهم ابن القطان الفاسي في "بيان الوهم" 5/ 422 في باب أحاديث ضعفها عبد الحق الإشبيلي وهي صحيحة أو حسنة وما أعلَّها به ليس بعلة، وكذلك مال إلى ترجيح الوصل ابنُ التركماني في "الجوهر النقي" 7/ 323.وأخرجه أبو داود (2177) عن أحمد بن يونس عن معرِّف، عن محارب، مرسلًا.وأخرجه أبو داود أيضًا (2178) من طريق محمد بن خالد الوهبي، عن معرف، عن محارب، عن ابن عمر، موصولًا.وأخرجه ابن أبي شيبة 5/ 253 عن وكيع بن الجراح، وأخرجه ابن المبارك في "البر والصلة" كما في "التذكرة" للزركشي (1)، وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 322، وفي "السنن الصغرى" (2653) من طريق يحيى بن أبي بكير الكرماني، ثلاثتهم (وكيع وابن المبارك وابن أبي بكير) عن مُعرِّف، عن محارب، مرسلًا.وأخرجه ابن ماجه (2018) من طريق عبيد الله بن الوليد الوَصّافي، عن محارب، عن ابن عمر موصولًا. لكن الوصّافي ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2831)


2831 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصغَاني، حدثنا الأحوص بن جَوّاب، حدثنا عمار بن رُزَيق، عن عبد الله بن عيسى، عن عِكْرمة، عن يحيى بن يَعمَر، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ليس منا من خَبَّب امرأةً على زوجِها، أو عبدًا على سيِّدِه" [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “সে আমাদের দলভুক্ত নয়, যে ব্যক্তি কোনো স্ত্রীকে তার স্বামীর বিরুদ্ধে উত্তেজিত করে (বা প্ররোচিত করে), অথবা কোনো দাসকে তার মনিবের বিরুদ্ধে উত্তেজিত করে (বা প্ররোচিত করে)।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد قوي من أجل عمار بن رزيق.وأخرجه أحمد 15/ (9157) عن أبي الجوّاب الأحوص بن جوّاب، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (2175) و (5170)، والنسائي (9170)، وابن حبان (5560) من طريقين عن عمار بنُ رزيق، به.ويشهد له حديث بريدة الأسلمي عند أحمد 38/ (22980) وغيره.قوله: "خبّب" أي: أفسَدَ وخدع، والمراد بالنسبة للمرأة أن تُذكر مساوئ الزوج عندها، أو محاسن أجنبيّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2832)


2832 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه وعلي بن حَمْشاذَ العَدْل، قالا: أخبرنا محمد بن عيسى بن السَّكَن الواسطي، حدثنا عمرو بن عون، حدثنا هُشَيم، أخبرنا حميد، عن أنس، قال: لما طَلَّق النبيُّ صلى الله عليه وسلم حفصةَ، أُمِرَ أَن يُراجِعَها فراجَعَها [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তালাক দিলেন, তখন তাঁকে নির্দেশ দেওয়া হলো যে তিনি যেন তাঁকে ফিরিয়ে নেন (রুযূ করেন)। অতঃপর তিনি তাঁকে ফিরিয়ে নিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 367 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه سعيد بن منصور (2158)، وابن سعد في "الطبقات الكبرى" 10/ 83، والدارمي (2311)، والحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" للهيثمي (1002)، وأبو يعلى (3815)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7400)، والبيهقي 7/ 367، والخطيب في "تاريخ بغداد" 5/ 441، والضياء المقدسي في "المختارة" 6/ (1982) و (1983) من طرق عن هُشَيم بن بشير، به.وسيأتي برقم (6907) من طريق ثابت عن أنس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2833)


2833 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الخَضِر بن أبانَ الهاشمي، حدثنا يحيى بن آدم، حدثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن صالح بن صالح، عن سَلَمة بن كُهيل، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، عن عمر: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم طلَّق حفصةَ، ثم راجَعَها [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাফসাকে তালাক দিয়েছিলেন, অতঃপর তাঁকে ফিরিয়ে নিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف الخضر بن أبان الهاشمي، وقد توبع.وأخرجه النسائي (5723) عن عَبْدة بن عبد الله البصري، عن يحيى بن آدم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (2283)، والنسائي (5723) عن سهل بن محمد بن الزُّبَير العسكري، وابن ماجه (2016) عن سويد بن سعيد وعبد الله بن عامر بن زرارة، وابن ماجه (2016)، وابن حبان (4275) من طريق مسروق بن المَرْزُبان، كلهم عن يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، به. لكن قال سهل بن محمد في رواية النسائي: نُبئت عن يحيى بن زكريا، مع أنه صرَّح في رواية أبي داود بسماعه منه، فالظاهر أنه لم يكن سمعه منه ثم سمعه بعد ذلك، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2834)


2834 - أخبرنا أبو جعفر أحمد بن عُبيد الأسَدي الحافظ بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا ابن أبي ذِئْب، حدثني خالي الحارث بن عبد الرحمن، عن حمزة بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، قال: كانت تحتي امرأةٌ أُحبُّها، وكان عمر يكرهُها، فقال عمر: طلِّقْها، فأبَيتُ، فذَكَر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال: "أطِعْ أباكَ وطلِّقْها"، فطلَّقتُها [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه. والحارث بن عبد الرحمن هو: ابن أبي ذُباب المدني خالُ ابن أبي ذئب، قد احتجّا جميعًا به!




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার বিবাহে এমন একজন স্ত্রী ছিলেন, যাকে আমি ভালোবাসতাম, কিন্তু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে অপছন্দ করতেন। তাই উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাকে তালাক দাও। কিন্তু আমি মানলাম না। অতঃপর তিনি (উমর) বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার পিতার আনুগত্য কর এবং তাকে তালাক দাও।" অতঃপর আমি তাকে তালাক দিলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده جيد من أجل الحارث بن عبد الرحمن - وهو القرشي العامري - فهو صدوق لا بأس به، وليس هو بابن أبي ذُباب، كما جزم به المصنف بإثر الحديث، وبنَى عليه أن الشيخين قد احتجا به، على أنَّ ابن أبي ذُباب من رجال مسلم وحده، وإنما أخرج له البخاري في "الأدب المفرد". ابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة.وأخرجه أحمد 8/ (4711)، وأبو داود (5138)، وابن ماجه (2088)، وابن حبان (426) من طريق يحيى بن سعيد القطان، وأحمد 9/ (5011) عن يزيد بن هارون، و 9/ (5144) عن أبي عامر عبد الملك بن عمرو العَقَدي، و 10/ (6470)، عن حماد بن خالد الخياط، وابن ماجه (2088) من طريق عثمان بن عمر، والنسائي (5631) من طريق خالد بن الحارث، وابن حبان (426) من طريق عمر بن علي المُقدَّمي، و (427) من طريق علي بن الجعد، ثمانيتهم عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (7440) من طريق عبد الله بن المبارك عن ابن أبي ذئب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2835)


2835 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا إسماعيل، أخبرنا عطاء بن السائب، عن أبي عبد الرحمن السُّلَمي: أنَّ رجلًا أتى أبا الدَّرْداء، فقال: إنَّ أمي لم تَزَلْ بي حتى تزوجتُ، وإنها تأمُرُني بطلاقِها، وقد أبَتْ عَلَيَّ إلّا ذاك، فقال: ما أنا بالذي آمُرُك أن تَعُقَّ والدتَك، ولا أنا بالذي آمُرُك أن تُطلِّق امرأتَك غير أنك إن شئتَ حدثتُك بما سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "الوالدُ أوسَطُ أبواب الجنة"، فحافِظْ على ذلك الباب إن شئتَ أو أَضِعْه [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবুদ্ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বলল: আমার মা আমার পেছনে লেগেই ছিলেন যতক্ষণ না আমি বিবাহ করেছি। আর এখন তিনি আমাকে সেই স্ত্রীকে তালাক দেওয়ার নির্দেশ দিচ্ছেন। তিনি তালাক ছাড়া আর কিছুই মানতে রাজি নন। তিনি (আবুদ্ দারদা) বললেন: আমি তোমাকে তোমার মায়ের অবাধ্য হতে নির্দেশ দিতে পারি না, আবার আমি তোমাকে তোমার স্ত্রীকে তালাক দিতেও নির্দেশ দিতে পারি না। তবে তুমি যদি চাও, আমি তোমাকে সেই কথা বলতে পারি যা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "পিতা হলেন জান্নাতের দরজাগুলোর মধ্যবর্তী।" সুতরাং তুমি যদি চাও, সেই দরজাটিকে রক্ষা করো, অথবা তাকে নষ্ট করে দাও।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن أبا عبد الرحمن السُّلَمي - واسمه عبد الله بن حبيب - لم يسمع هذا الحديث من أبي الدرداء، كما توضحه رواية سفيان الثَّوري وحماد بن زيد، وهما ممن سمع من عطاء بن السائب قبل تغيُّره، حيث قالا في روايتهما: إنَّ هذا الرجل رحل إلى أبي الدرداء بالشام، ومعلوم أنَّ أبا عبد الرحمن السُّلمي لم يُذكَر أنه رحل إلى الشام، وإنما مُكْثه كان في الكوفة وبها توفي، فالرجل المذكور هو الذي أخبره بما أفتاه به أبو الدرداء، وهو رجلٌ مُبهَم لم يُبيَّن. ولم نجد أحدًا من أهل العلم نبَّه على هذا، بل صحَّح الحديثَ بعضُهم، لعلَّ ذلك لأجل أنَّ أبا عبد الرحمن السُّلَمي من كبار التابعين، فيُقبَل مرسَلُه كحال سعيد بن المسيّب عن عمر بن الخطاب مثلًا، والله أعلم بالصواب. إسماعيل: هو ابن عُليَّة.وأخرجه ابن حبان (425) من طريق أبي خيثمة زهير بن حرب، عن إسماعيل ابن عُلَيَّة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 36/ (21726) من طريق شريك النخعي، و 45/ (27511) و (27528) من طريق سفيان الثَّوري، كلاهما عن عطاء بن السائب، به.وسيأتي برقم (7438) من طريق سفيان بن عيينة، وبرقم (7439) من طريق شعبة، كلاهما عن عطاء بن السائب.وقد رواه كرواية سفيان الثَّوري مفصَّلًا مبيَّنًا حماد بن زيد عند أبي محمد البَغَوي في "شرح السنة" (3421)، وهو ممن سمع من عطاء قبل اختلاطه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2836)


2836 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني سليمان بن بلال، عن عبد الرحمن بن حَبيب، أنه سمع عطاء بن أبي رباح يقول: أخبرني يوسف بن ماهَك، أنه سمع أبا هريرة يحدِّث، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، سمعه يقول: "ثلاثٌ جِدُّهُنّ جِدٌّ، وهَزْلُهن جِدٌّ: النكاحُ، والطلاقُ، والرَّجْعة" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، وعبد الرحمن بن حبيب هذا هو: ابن أرْدَك من ثِقات المدنيِّين، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: “তিনটি বিষয় এমন যে, সেগুলোর গুরুত্বের সাথে করাও গুরুত্ব, আর হাসি-ঠাট্টার সাথে করাও গুরুত্ব: বিবাহ (নিকাহ), তালাক (ত্বলাক) এবং স্ত্রীকে ফিরিয়ে নেওয়া (রাজ‘আত)।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات غير عبد الرحمن بن حبيب - وهو ابن أرْدك - فقد قال عنه النسائي: منكر الحديث. قلنا: وهذا الحديث مسندًا من منكراته، وذلك أنَّ ابن جُرَيج قد روى عن عطاء بن أبي رباح، قال: يُقال: من نكح لاعِبًا أو طلق لاعِبًا فقد جاز. قال ابن عبد البر: لو كان - والله أعلم - صحيحًا عن عطاء (قلنا: يعني حديثه الذي هنا عن أبي هريرة) لما خفي (يعني على ابن جُرَيج) فإنه أقعد الناس بعطاء وأثبتهم فيه. قلنا: لكن في الباب ما يشهد له، وعليه العمل باتفاق كما قال الترمذي بإثر الحديث (1184)، وابن المنذر في "الأوسط" 9/ 259، وأبو بكر الجصّاص في "أحكام القرآن" 2/ 99، وابن عبد البر في "الاستذكار" (24963)، وذكروا شواهده.وأخرجه أبو داود (2194) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، وابن ماجه (2039)، والترمذي (1184) من طريق حاتم بن إسماعيل، كلاهما عن عبد الرحمن بن حبيب، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حسن غريب.وله شواهد موقوفة ومقطوعة انظرها في "مصنف عبد الرزاق" (10244 - 10253) و"مصنف ابن أبي شيبة" 5/ 105 - 106، لكن كلها بذكر العَتَاق بدل الرجْعة.والرّجْعة، بكسر الراء وفتحها، أي: عَوْد المُطلِّق إلى طليقته.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2837)


2837 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بحر بن نصر بن سابِق الخَولاني، حدثنا بِشر بن بَكر.وحدثنا أبو العباس غير مرة، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا أيوب بن سويد؛ قالا: حدثنا الأوزاعي، عن عطاء بن أبي رباح، عن عُبيد بن عُمير، عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تجاوزَ اللهُ عن أمتي الخطأَ، والنسيانَ، وما استُكرِهُوا عليه" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ আমার উম্মতের জন্য ভুলবশত কৃত কাজ, বিস্মৃতি এবং যে কাজের জন্য তাদের বাধ্য করা হয়, তা ক্ষমা করে দিয়েছেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح من جهة بشر بن بكر، ضعيف من جهة أيوب بن سويد. الأوزاعي: هو عبد الرحمن بن عمرو. وقال الحافظ في "الفتح" 8/ 125: هو حديث جليل، وقد أُعلَّ بعلة غير قادحة.وأخرجه ابن حبان (7219) عن وصيف بن عبد الله الحافظ، عن الربيع بن سليمان المرادي، عن بشر بن بكر، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (2045) من طريق الوليد بن مسلم، حدثنا الأوزاعي، عن عطاء، عن ابن عباس. فأسقط من إسناده عبيد بن عُمير، والوليد معروف بتدليس التسوية كما قال البُوصيري في "مصباح الزجاجة" (728)، قال: فليس ببعيد أن يكون السقط من صنعة الوليد، وجزم بذلك الحافظ ابن حجر في "تخريج أحاديث مختصر ابن الحاجب" 1/ 510.وقال أبو العباس القرطبي في "المفهم" 7/ 322 في شرح الحديث: أي رفع إثم ذلك، وهذا لم يُختلَف فيه أنَّ الإثم مرفوع، وإنما اختُلف فيما يتعلق على ذلك من الأحكام، هل ذلك مرفوع لا يلزم منه شيءٌ، أو يلزم أحكام ذلك كله؟ اختُلِف فيه، والصحيح أنَّ ذلك يختلف بحسب الوقائع، فقسم لا يسقط بالخطأ والنسيان باتفاق، كالغرامات والديات والصلوات، وقسم يسقط باتفاق كالقِصاص والنطق بكلمة الكفر ونحو ذلك، وقسم ثالث يُختلَف فيه، وصُوره لا تنحصر، ويُعرف تفصيل ذلك في الفروع. وأخرجه أحمد 43/ (26360)، وأبو داود (2193) من طريق إبراهيم بن سعد، عن محمد بن إسحاق، به.وسيأتي بعده من طريق ثور بن يزيد، عن صفية بنت شيبة، دون واسطة بينهما.الإغلاق: هو الإكراه.وانظر فقه الحديث في "سنن أبي داود" بتحقيقنا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2838)


2838 - حدثنا الأستاذ الإمام أبو الوليد حسان بن محمد القرشي، أخبرنا الحسن بن سفيان، حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، حدثنا أبي، حدثنا محمد بن إسحاق، عن ثَور بن يَزيد، عن محمد بن عُبيد بن أبي صالح، قال: بعثني عَدِيّ بن عَدِيّ إلى صفيّة بنت شَيْبة أسألُها عن أشياءَ كانت ترويها عن عائشة، فقالت: حدثتني عائشةُ، أنها سمعت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا طلاقَ ولا عَتاقَ في إغلاقٍ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وقد تابع أبو صفوان الأُموي محمدَ بن إسحاق على روايته عن ثَوْر بن يزيد، فأسقط من الإسناد محمد بن عُبيد.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "ইগলাকের (অর্থাৎ জবরদস্তি বা চরম রাগের) অবস্থায় কোনো তালাক নেই এবং কোনো দাসমুক্তি নেই।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف محمد بن عُبيد بن أبي صالح كما قال الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه ابن ماجه (2046) عن أبي بكر بن أبي شيبة، عن عبد الله بن نُمير، بهذا الإسناد. لكنه سمى في روايته محمد بن عُبيد: عبيد بن أبي صالح. قال المزي وابن عبد الهادي: هو وهم. وأخرجه أحمد 43/ (26360)، وأبو داود (2193) من طريق إبراهيم بن سعد، عن محمد بن إسحاق، به.وسيأتي بعده من طريق ثور بن يزيد، عن صفية بنت شيبة، دون واسطة بينهما.الإغلاق: هو الإكراه.وانظر فقه الحديث في "سنن أبي داود" بتحقيقنا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2839)


2839 - أخبرني أحمد بن محمد بن سلمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا نُعيم بن حماد، حدثنا أبو صفوان عبد الله بن سعيد الأُموي، عن ثَوْر بن يزيد، عن صفيّة بنت شَيْبة، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا طَلاقَ ولا عَتاقَ في إغلاقٍ" [1].




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইগলাকের (অত্যন্ত রাগ, চাপ বা বাধ্যবাধকতার) অবস্থায় কোনো তালাক নেই এবং কোনো দাস মুক্তি নেই।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، نُعيم بن حماد صاحب مناكير كما قال الذهبي في "تلخيصه"، قلنا: والظاهر أنه وهم هنا في إسناد الحديث بإسقاط ذكر محمد بن عبيد بن أبي صالح بين ثور وصفية، فلا بد من ذكره في الإسناد، إذ هو صاحب القصة الذي سمع الخبر من صفية كما توضحه رواية محمد بن إسحاق السابقة. فيما نقله عنه الترمذي في "العلل" (274)، حيث قال: ما أرى الليث سمعه من مشرح بن هاعان. واستدلَّ البخاري على ذلك برواية حيوة بن شريح المصري، عن بكر بن عمرو، عن مشرح، وبيان ذلك أنَّ حيوة هذا في طبقة الليث، ومع ذلك لا يروي عن مشرح إلّا بواسطة.قلنا: ومع ذلك فقد حسَّن إسنادَه عبدُ الحق في "أحكامه الوسطى" 3/ 157، وأقرَّه ابن القطان في "بيان الوهم" 3/ 504، وصحَّحه الذهبي في "الكبائر"! فلم يُصيبوا، والله تعالى أعلم.وأخرجه ابن ماجه (1936) عن يحيى بن عثمان بن صالح، بهذا الإسناد.وسيأتي بعده من طريق عبد الله بن صالح كاتب الليث بن سعد، عنه.وقد صحَّ لعن المحلِّل والمحلَّل له من حديث عبد الله بن مسعود عند أحمد 7/ (4283)، والترمذي (1120)، والنسائي (5511) و (5579). وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.ومن حديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8287)، وحسَّن البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (273).ومن حديث ابن عمر كما سيأتي عند المصنف برقم (2842).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2840)


2840 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا أبو زكريا يحيى بن عثمان بن صالح بن صفوان السَّهْمي بمصر، حدثنا أبي، قال: سمعتُ الليث بن سعد، في المسجد الجامع يقول: قال أبو مصعب مِشرَحُ بن هاعانَ: قال عُقْبة بن عامر الجُهَني: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ألا أُخبركم بالتَّيس المُستعارِ؟ "، قالوا: بلى يا رسول الله، قال: "هو المُحِلُّ، فلعنَ اللهُ المُحِلَّ والمُحَلَّلَ له" [1]. وقد ذكر أبو صالح كاتب الليث عن الليث سماعَه من مِشرَحِ بن هاعان:




উকবাহ ইবন আমের আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমি কি তোমাদের ধার করা ষাঁড় (বা ভাড়াটে পাঁঠা) সম্পর্কে বলব না?" তারা বলল: "হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ!" তিনি বললেন: "সে হল হালালাকারী (মুহিল্ল)। আল্লাহ হালালাকারী এবং যার জন্য হালালা করা হয় (মুহাল্লালু লাহ), তাদের উভয়ের ওপর লা'নত (অভিশাপ) করেছেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره دون ذكر التشبيه بالتيس المستعار، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكن جزمِ يحيى بن عبد الله بن بكير فيما نقله عنه أبو زرعة الرازي كما في "العلل" لابن أبي حاتم (1233) بأنَّ الليث لم يسمع هذا الحديث من مشرح، وأنه لم يرو عنه شيئًا، وأنَّ الليث حدثه بهذا الحديث عن سليمان بن عبد الرحمن: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، يعني مرسلًا. وقال البخاري نحو ذلك أيضًا فيما نقله عنه الترمذي في "العلل" (274)، حيث قال: ما أرى الليث سمعه من مشرح بن هاعان. واستدلَّ البخاري على ذلك برواية حيوة بن شريح المصري، عن بكر بن عمرو، عن مشرح، وبيان ذلك أنَّ حيوة هذا في طبقة الليث، ومع ذلك لا يروي عن مشرح إلّا بواسطة.قلنا: ومع ذلك فقد حسَّن إسنادَه عبدُ الحق في "أحكامه الوسطى" 3/ 157، وأقرَّه ابن القطان في "بيان الوهم" 3/ 504، وصحَّحه الذهبي في "الكبائر"! فلم يُصيبوا، والله تعالى أعلم.وأخرجه ابن ماجه (1936) عن يحيى بن عثمان بن صالح، بهذا الإسناد.وسيأتي بعده من طريق عبد الله بن صالح كاتب الليث بن سعد، عنه.وقد صحَّ لعن المحلِّل والمحلَّل له من حديث عبد الله بن مسعود عند أحمد 7/ (4283)، والترمذي (1120)، والنسائي (5511) و (5579). وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.ومن حديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8287)، وحسَّن البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (273).ومن حديث ابن عمر كما سيأتي عند المصنف برقم (2842).