আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
281 - أخبرنا أبو بكر محمد بن أحمد بن حاتم المعدَّل بمَرْو، حدثنا عبد الله بن رَوْح المدائني، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يُؤتَى بالموت يومَ القيامة في هيئةِ كبشٍ أملَحَ، فيقال: يا أهلَ الجنة، فيَطَّلِعون خائفينَ وَجِلِينَ مخافةَ أن يُخرَجوا مما هم فيه، فيقال: تعرفون هذا؟ فيقولون: نعم، هذا الموتُ، ثم يقال: يا أهلَ النار، فيَطَّلِعونَ مُستبشِرين فَرِحينَ أن يُخرَجوا ممّا هم فيه، فيقال: أتعرفون هذا؟ فيقولون: نعم، هذا الموتُ، فيأمرُ به فيُذبَح على الصِّراط، فيقال للفريقين: خلودٌ فيما تَجِدُون، لا موتَ فيها أبدًا" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، فإنَّ يزيد بن هارون ثبتٌ وقد أسنده في جميع الروايات عنه، وأَوقَفَه [2] الفضلُ بن موسى السِّيناني وعبدُ الوهاب بن عبد المجيد عن محمد بن عمرو.أما حديثُ الفضل بن موسى:
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিয়ামতের দিন মৃত্যুকে একটি সাদা-কালো (ধূসর) বর্ণের ভেড়ার আকৃতিতে নিয়ে আসা হবে। অতঃপর বলা হবে: হে জান্নাতবাসীরা! তারা ভয় ও শঙ্কা নিয়ে মাথা তুলে দেখবে, এই ভয়ে যে হয়তো তাদেরকে তাদের বর্তমান স্থান থেকে বের করে দেওয়া হবে। অতঃপর বলা হবে: তোমরা কি একে চেনো? তারা বলবে: হ্যাঁ, এটিই হলো মৃত্যু। এরপর বলা হবে: হে জাহান্নামবাসীরা! তারা উৎফুল্ল ও আনন্দিত অবস্থায় মাথা তুলে দেখবে, এই ভেবে যে হয়তো তাদেরকে তাদের বর্তমান স্থান থেকে বের করে দেওয়া হবে। অতঃপর বলা হবে: তোমরা কি একে চেনো? তারা বলবে: হ্যাঁ, এটিই হলো মৃত্যু। অতঃপর এর (মৃত্যুরূপী ভেড়ার) ব্যাপারে নির্দেশ দেওয়া হবে এবং পুলসিরাতের ওপর তাকে জবাই করা হবে। এরপর উভয় দলকে বলা হবে: তোমরা যেখানে আছো, সেখানে তোমরা চিরকাল থাকবে, সেখানে আর কখনো মৃত্যু আসবে না।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة بن وقّاص الليثي.وأخرجه أحمد 12/ (7546) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد - وقرن بيزيد عبدَ الله بنَ نمير.وأخرجه أحمد 14/ (8906) من طريق أبي بكر بن عياش، وهنّاد في "الزهد" (212) عن عبدة بن سليمان، وابن ماجه (4327) من طريق محمد بن بشر العبدي، ثلاثتهم عن محمد بن عمرو، به. فهؤلاء مع من قبلهم خمسةٌ ثقات رووه عن محمد بن عمرو مرفوعًا، وهو المحفوظ، وستأتي الإشارة إلى الموقوف لاحقًا عند المصنف.وأخرجه أحمد 14/ (8817)، والترمذي (2557) في آخر حديث طويل من طريق العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح. وأخرجه أحمد 14/ (8907) و 15/ (9449) من طريق عاصم بن بهدلة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة.وأخرجه مختصرًا أحمد 14/ (8535)، والبخاري (6545)، وابن حبان (7449) من طريق أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة - بلفظ: "إذا دخل أهل الجنة الجنة، وأهل النار النار، نادى منادٍ: يا أهل الجنة؛ خلود فلا موت فيه، ويا أهل النار، خلود فلا موت فيه".
[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: ووافقه، وكانت كذلك في (ز) ثم صححت إلى: وأوقفه، وهو الصواب.
282 - فأخبرنا الحسن بن محمد بن حَليم المروَزي، حدثنا أبو الموجِّه، حدثنا يوسف [1] بن عيسى، حدثنا الفضل بن موسى، حدثنا محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، عن أبي هريرة قال: يُؤتَى بالموت يومَ القيامة، فذكر الحديث موقوفًا [2].وأما حديث عبد الوهاب بن عبد المجيد:
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, কিয়ামতের দিন মৃত্যুকে আনা হবে। [এরপর তিনি] মাওকূফ হিসেবে হাদীসটির বাকি অংশ উল্লেখ করেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: سفيان، وكذا هو في "إتحاف المهرة" 16/ 185، وقد تكرر هذا الإسناد عند المصنف في بضعة مواضع بذكر يوسف على الصواب.
[2] إسناده حسن وقد تابع يوسفَ بنَ عيسى - وهو ثقة - في روايته هذا الحديث موقوفًا عن الفضل بن موسى: الحسينُ المروزيُّ في زياداته على "زهد ابن المبارك" (1533)، وخالفهما عليُّ بن خشرم عند ابن حبان (7450) فرواه عن الفضل مرفوعًا، وهو المحفوظ كما في الحديث السابق.
283 - فأخبرَناه أبو محمد بن زياد العَدْل، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا بُندَارٌ، حدثنا عبد الوهاب؛ فذكره بإسناده موقوفًا عن أبي هريرة [1]. وقد اتَّفق الشيخانِ على إخراج هذا الحديث بغير هذا اللفظ من حديث الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي سعيد [2].
২৯৩ - অতঃপর আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আবূ মুহাম্মাদ ইবনু যিয়াদ আল-আদল। তিনি বলেছেন, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক। তিনি বলেছেন, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন বুন্দার। তিনি বলেছেন, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আব্দুল ওয়াহ্হাব। অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ তা আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে ‘মাওকুফ’ হিসাবে উল্লেখ করেছেন [১]। আর দুই শায়খ (বুখারী ও মুসলিম) এই হাদীসটি এই শব্দাবলী ব্যতীত আ'মাশ থেকে, তিনি আবূ সালিহ থেকে, তিনি আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে সংকলন করার বিষয়ে ঐকমত্য পোষণ করেছেন [২]।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن كسابقه. بندار: هو محمد بن بشار. ولم نقف على رواية عبد الوهاب هذه عند غير المصنف فيما بين أيدينا من المصادر
[2] أخرجه البخاري برقم (4730)، ومسلم برقم (2849).ويشهد له أيضًا حديث ابن عمر عند البخاري (6548)، ومسلم (2850).
284 - أخبرنا أبو محمد عبد الله بن محمد بن إسحاق الفاكِهي بمكة، حدثنا أبو يحيى عبد الله بن أحمد بن أبي مَسَرَّة، حدثنا أحمد بن محمد بن الوليد الأزرَقي، حدثنا مُسلم بن خالد، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين، عن ابن سابِطٍ، عن عمرو بن ميمون الأَوْدي قال: قام فينا معاذُ بن جبل فقال: يا بني أَوْدٍ، إني رسولُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، تعلمون! المَعَادُ إلى الله، ثم إلى الجنة أو إلى النار، وإقامةٌ لا ظَعْنَ فيها [1]، وخلودٌ لا موتَ، في أجسادٍ لا تموت [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، رواتُه مكِّيُّون، ومسلم بن خالد الزَّنْجي إمام أهل مكة ومُفتِيهم، إلّا أنَّ الشيخين قد نَسَبَاه إلى أنَّ الحديث ليس من صَنْعته، والله أعلم.
মু‘আয ইবন জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমাদের মাঝে দাঁড়িয়ে বললেন: হে বানু আওদ গোত্রের লোকেরা! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে আগত দূত (বা প্রতিনিধি)। তোমরা জেনে রাখো! প্রত্যাবর্তন অবশ্যই আল্লাহর দিকে হবে, অতঃপর (তা হবে) জান্নাতের দিকে অথবা জাহান্নামের দিকে। আর (সেখানে এমন) স্থায়ী বসবাস হবে যেখান থেকে কোনো প্রস্থান নেই, এবং এমন চিরস্থায়ীত্ব হবে যেখানে কোনো মৃত্যু নেই, এমনসব দেহের মধ্যে (বাস হবে) যাদের মৃত্যু হবে না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا في (ب)، وفي بقية النسخ: فيه.
[2] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل مسلم بن خالد - وهو الزَّنجي - فإنه ضعيف يعتبر به، وقد توبع، وباقي رجال الإسناد ثقات. ابن سابط: هو عبد الرحمن.وأخرجه البيهقي في "البعث والنشور" (586) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (3688 - كشف الأستار)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 2/ 630، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 236، و"معرفة الصحابة" (5140) من طرق عن مسلم بن خالد، به.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 20/ (375)، و"الأوسط" (1651)، و"مسند الشاميين" (1117)، وأبو نعيم في "صفة الجنة" (107) من طريق بقية بن الوليد، عن حبيب بن صالح الطائي، عن ابن سابط، عن معاذ بن جبل. فأسقط عمرَو بنَ ميمون.وأخرجه ابن المبارك في "الزهد" (1566)، وابن أبي شيبة 13/ 236، والخلّال في "السنة" (1193)، والشاشي في "مسنده" (1403)، وابن بطة في "الإبانة" 2/ 677 من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن الشعبي، عن معاذ بن جبل. ورجاله ثقات إلّا أنه منقطع بين الشعبي ومعاذ.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ ابن حجر (2862) من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق السبيعي، عن سعيد بن وهب الهمداني، عن معاذ بن جبل. قال الحافظ: هذا إسناد صحيح.
285 - حدثنا عَبْدانُ بن يزيد الدَّقَّاق، بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا حمَّاد بن سَلَمة، عن ثابت البُناني وأبي عِمران الجَوْني، عن أبي بكر بن أبي موسى الأشعري، عن أبي موسى في قوله عز وجل: {وَلِمَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِ جَنَّتَانِ} [الرحمن: 46]، قال: جنَّتَانِ من ذهبٍ للسابقين، وجنَّتانِ من فِضّة للتابعين [1].هذا إسناد صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه هكذا، إنما خرَّجا من حديث الحارث بن عُبيد وعبد العزيز بن عبد الصمد، عن أبي عِمران الجَوْني، عن أبي بكر بن أبي موسى، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "جَنَّتانِ من فضَّة" الحديث، وليس فيه ذكرُ السابقين والتابعين [2]. 285 م - سمعتُ أبا الحسن عليَّ بن عمر الحافظ يقول: سمعت أبا الفضل الوزير يقول: سمعت مأمون المصري يقول: قلت لأبي عبد الرحمن النَّسَائي: لمَ تَرَكَ محمدُ بن إسماعيل حديثَ حمّاد بن سلمة؟ فقال: والله إنَّ حماد بن سلمة أخيرُ وأصدقُ من إسماعيل بن أبي أُويس؛ وذكر حكايةً طويلة شبيهة بالاستبدال بالحارث بن عبيد عن حماد.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আল্লাহ তাআলার বাণী— {আর যে তার রবের সামনে দণ্ডায়মান হওয়ার ভয় করে, তার জন্য রয়েছে দুটি জান্নাত।} [সূরা আর-রাহমান: ৪৬] প্রসঙ্গে বর্ণিত। তিনি বলেন: (আমলে) দ্রুত অগ্রগামীদের (সাবেকিনদের) জন্য স্বর্ণের দুটি জান্নাত এবং তাদের অনুসারীদের (তাবিয়িনদের) জন্য রৌপ্যের দুটি জান্নাত।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو عمران الجوني: هو عبد الملك بن حبيب الأزدي.وأخرجه البيهقي في "البعث والنشور" (219) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدينوري في "المجالسة" (1414) من طريق سليمان بن حرب، وأبو نعيم في "صفة الجنة" (142) من طريق معاذ العنبري، كلاهما عن حماد بن سلمة، به.وخالف مؤمَّل بن إسماعيل عند البيهقي في "البعث" (220) فرواه عن حماد بن سلمة بهذا اللفظ مرفوعًا، ومؤمَّل سيئ الحفظ.وتابع حمادَ بنَ سلمة عليه موقوفًا حمادُ بن زيد عند البيهقي في "البعث" (218).وسيأتي عند المصنف برقم (3814) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث عن حماد بن سلمة. أما حديث الحارث بن عبيد فهو بنحوه، أخرجه أحمد 32/ (19731)، والحارث بن عبيد ليس بذاك القوي، وحديثه هذا ليس عند أحدهما، وله عند مسلم (2838) بهذا الإسناد عن أبي موسى مرفوعًا قال: "إنَّ للمؤمن في الجنة لخيمةً من لؤلؤة مجوَّفة، طولها ستون ميلًا، للمؤمن فيها أهلون يطوف عليهم المؤمن فلا يرى بعضهم بعضًا"، وهو متابعٌ عليه عنده، وأخرجه البخاري (3243) من طريق همام عن أبي عمران الجوني، ثم ذكر الحارثَ بن عبيد في المتابعات.
[2] أخرجه البخاري (4878) و (7444)، ومسلم (180) من طرق عن عبد العزيز بن عبد الصمد، بهذا الإسناد - بلفظ: "جنتان من فضة آنيتهما وما فيهما، وجنتان من ذهب آنيتهما وما فيهما، وما بين القوم وبين أن ينظروا إلى ربهم إلّا رداء الكِبْر على وجهه في جنة عدن". ولتمام تخريجه انظر "مسند أحمد" 32/ (19682). أما حديث الحارث بن عبيد فهو بنحوه، أخرجه أحمد 32/ (19731)، والحارث بن عبيد ليس بذاك القوي، وحديثه هذا ليس عند أحدهما، وله عند مسلم (2838) بهذا الإسناد عن أبي موسى مرفوعًا قال: "إنَّ للمؤمن في الجنة لخيمةً من لؤلؤة مجوَّفة، طولها ستون ميلًا، للمؤمن فيها أهلون يطوف عليهم المؤمن فلا يرى بعضهم بعضًا"، وهو متابعٌ عليه عنده، وأخرجه البخاري (3243) من طريق همام عن أبي عمران الجوني، ثم ذكر الحارثَ بن عبيد في المتابعات.
286 - حدثني عبد الله بن عمر بن علي [1] الجَوهَري بمَرْو من أصل كتابه، حدثنا يحيى بن ساسَوَيهِ بن عبد الكريم، حدثنا سُوَيد بن نصر، حدثنا ابن المبارَك، عن مَعمَر، عن قتادة، عن زُرَارة بن أَوفى، عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "يومُ القيامةِ كقَدْرِ ما بينَ الظُّهر والعصر" [2].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين إن كان سويد بن نصر حَفِظَه، على أنه ثقةٌ مأمونٌ.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিয়ামতের দিনটি (দৈর্ঘ্যে) যোহর ও আসরের মধ্যবর্তী সময়ের পরিমাণের মতো হবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] كذا وقع في النسخ الخطية: علي، والمشهور: علَّك، وله ترجمة في "سير أعلام النبلاء" 16/ 168.
[2] صحيح موقوفًا، يحيى بن ساسويه أو شيخه سويد بن نصر قد رواه من هو أوثق منهما عن عبد الله بن المبارك موقوفًا كما سيأتي في الحديث التالي.وأخرجه أبو منصور الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (3554) من طريق الحاكم في "المستدرك".
287 - فقد أخبرنا الحسن بن محمد بن حَلِيم، أخبرنا أبو الموجِّه، أخبرنا عَبْدانُ، حدثنا عبد الله، عن [1] مَعمَر، عن قَتَادة، عن زُرَارة بن أَوفى، عن أبي هريرة قال: يومُ القيامة على المؤمنين كقَدْر ما بينَ الظُّهر والعصر [2].
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কিয়ামত দিবস মুমিনদের উপর যোহর ও আসরের মধ্যবর্তী সময়ের পরিমাণের মতো হবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف لفظ "عن" في النسخ الخطية إلى: بن.
[2] إسناده صحيح وهو موقوف. أبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي، وعبد الله: هو ابن المبارك.وهو في "الزهد" لابن المبارك برواية نعيم بن حماد برقم (348)، ولفظه فيه: يقصر يومئذ على المؤمن حتى يكون كوقت الصلاة.ورواه عن عبد الله بن المبارك أيضًا أبو أسامة حماد بن أسامة عند ابن أبي حاتم في "تفسيره" 9/ 3049. والحديث في "سنن أبي داود" برقم (4691). وانظر التعليق على "مسند أحمد" 9/ (5584).
288 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّرِيّ بن خُزَيمة، حدثنا أبو عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الله بن يزيد، حدثنا سعيد بن [أبي] أيوب، أخبرني أبو صَخْر، عن نافع قال: كان لابن عمر صديقٌ من أهل الشام يكاتبُه، فكَتَبَ إليه عبدُ الله بن عُمر: أنه بَلَغَني أنك تكلَّمت في شيءٍ من القَدَر، فإياك أن تكتبَ إليَّ، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّه سيكون في أمَّتي أقوامٌ يكذِّبون بالقَدَر" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، فقد احتجَّ بأبي صخرٍ حميد بن زياد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাফে’ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শামের (সিরিয়া) একজন বন্ধু ছিলেন, যিনি তাঁর সাথে চিঠিপত্রের মাধ্যমে যোগাযোগ করতেন। আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে চিঠি লিখেছিলেন: আমার কাছে খবর পৌঁছেছে যে আপনি তাকদীর (ভাগ্য) সম্পর্কে কোনো বিষয়ে কথা বলেছেন। অতএব, সাবধান! আপনি যেন আমাকে আর কখনও চিঠি না লেখেন। কেননা, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই আমার উম্মতের মধ্যে এমন কিছু লোক আসবে যারা তাকদীরকে মিথ্যা সাব্যস্ত করবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن إن شاء الله، وذلك من أجل أبي صخر: وهو حميد بن زياد.والحديث في "مسند أحمد" 9/ (5639)، وعن أحمد أخرجه أيضًا أبو داود (4613). والحديث في "سنن أبي داود" برقم (4691). وانظر التعليق على "مسند أحمد" 9/ (5584).
289 - حدثنا أبو بكر أحمد بن سلمان بن الحسن الفقيه إملاءً، حدثنا أبو داود سليمان بن الأشعث، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "القَدَريَّة مَجُوسُ هذه الأُمَّة، إن مَرِضُوا فلا تَعُودُوهم، وإن ماتوا فلا تَشْهَدُوهم" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين إن صحَّ سماعُ أبي حازم من ابن عمر، ولم يُخرجاه.وشاهدُه:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: কাদারিয়্যা (তাকদীরের অস্বীকারকারী গোষ্ঠী) হলো এই উম্মতের অগ্নি উপাসক। তারা অসুস্থ হলে তোমরা তাদের দেখতে যেও না এবং তারা মারা গেলে তাদের জানাযায় উপস্থিত হয়ো না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه، أبو حازم - وهو سلمة بن دينار - لم يسمع من ابن عمر، وبهذا أعلَّه المنذري في "مختصر سنن أبي داود" 7/ 58. والحديث في "سنن أبي داود" برقم (4691). وانظر التعليق على "مسند أحمد" 9/ (5584).
290 - ما حدَّثَناه أبو أحمد بكر بن محمد الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل البَلْخي، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثني سعيد بن أبي أيوب، حدثني عطاء بن دينار، حدثني حَكِيم بن شَرِيك الهُذَلي، عن يحيى بن ميمون الحضرمي، عن رَبِيعة الجُرَشي، عن أبي هريرة، عن عمر بن الخطاب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا تُجالِسوا أهلَ القَدَر ولا تُفاتحوهم" [1].هذا آخر كتاب الإيمان كتاب العلم
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, "তোমরা কদরপন্থীদের (যারা তাকদীর অস্বীকার করে) সাথে বসো না এবং তাদের সাথে আলোচনা শুরু করো না।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لجهالة حكيم بن شريك.وأخرجه أحمد 1/ (206)، وأبو داود (4710)، وابن حبان (79) من طريق عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود (4720) من طريق ابن وهب، عن ابن لهيعة وعمرو بن الحارث وسعيد بن أبي أيوب، به.
291 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم المصري، أخبرنا ابن وَهْب، أخبرني أبو يحيى فُلَيح بن سليمان الخُزاعي، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن مَعمَر الأنصاري، عن سعيد بن يَسَار، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن تعلَّم علمًا مما يُبتغَى به وجهُ الله، لا يَتعلَّمُه إلّا ليُصيبَ به عَرَضًا من الدنيا، لم يَجِدْ عَرْفَ الجنةِ يومَ القيامة" [1]. هذا حديث صحيح سندُه، ثِقاتٌ رواتُه على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وقد أسنده ووَصَلَه عن فُليح جماعةٌ غيرُ ابن وهب:
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি এমন জ্ঞান শিক্ষা করে যার মাধ্যমে আল্লাহর সন্তুষ্টি কামনা করা হয়, কিন্তু সে তা শুধু দুনিয়ার সামান্য স্বার্থ লাভের উদ্দেশ্যেই শিক্ষা করে, সে কিয়ামতের দিন জান্নাতের সুঘ্রাণও পাবে না।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لمخالفة فليح بن سليمان من هو أوثق منه في إسناده كما سيأتي، وفليح ليس بذاك القوي.وأخرجه ابن حبان (78) من طريقين عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 14/ (8457)، وأبو داود (3664)، وابن ماجه (252) من طريقين عن فليح بن سليمان، به.وخالف فليحًا زائدةُ بن قدامة - وهو أحد الثقات - فرواه عن عبد الله بن عبد الرحمن بن معمر، عن محمد بن يحيى بن حَبّان قال: حدثني رهطٌ من أهل العراق، أنهم مرُّوا على أبي ذر فسألوه، فحدَّثهم فقال لهم … فذكر نحو هذا الحديث موقوفًا من قول أبي ذر، أخرجه ابن المبارك في "الزهد" (44) - ومن طريقه ابن عبد البر في "جامع بيان العلم" (1129) - عن زائدة. وبهذا أعلَّه أبو زُرْعة الرازي فيما نقله عنه ابن أبي حاتم في "علل الحديث" (2819)، وهذا الإسناد ضعيف لجهالة الرهط العراقيين. وانظر ما بعده.ويشهد له غير حديثي جابر بن عبد الله وكعب بن مالك الآتيين عند المصنف: حديثُ ابن عمر عند ابن ماجه (253)، وحديث حذيفة عنده أيضًا (259)، وحديث أنس عند البزار (7295)، وأسانيدها ضعيفة جدًّا، وفي إسناد حديث أنس سليمان بن زياد بن عبيد الله، قال الذهبي فيه في كتابه "المغني في الضعفاء" (2585): لا يعرف، وحديثه منكر بل باطل.قلنا: وأحسن حديث في هذا الباب وأصحُّه حديث أبي هريرة مرفوعًا في أول من يقضى فيه يوم القيامة ثلاثة، وذكر منهم: "ورجل تعلَّم العلمَ وعلَّمه وقرأ القرآن، فأُتي به فعرَّفه نعمه فعرفها، قال: فما عملت فيها؟ قال: تعلَّمتُ العلم وعلَّمتُه وقرأت فيك القرآن، قال: كذبت، ولكنك تعلَّمت العلم ليقال: عالم، وقرأت القرآن ليقال: هو قارئ، فقد قيل، ثمّ أمر به فسُحِب على وجهه حتى أُلقي في النار"، أخرجه مسلم (1905) وغيره، وسيأتي عند المصنف برقم (369).
292 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد السُّرِّيّ.وحدثنا أبو عبد الله محمد بن علي الجوهري ببغداد، حدثنا إبراهيم بن الهيثم البَلَدي.وأخبرنا أبو العباس السَّيّاري والحسن بن حَليم بمرو، قالا: حدثنا أبو الموجِّه؛ قالوا: حدثنا سعيد بن منصور المكي، حدثنا فُلَيح، عن أبي طُوَالةَ، عن سعيد بن يَسَار، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن تعلَّمَ علمًا يُبتغَى به وجهُ الله، لا يتعلَّمُه إلّا ليصيبَ به عَرَضًا من الدنيا، لم يَجِدْ عَرْفَ الجنة". قال فُليح: وعَرْفُها: ريحُها [1].وقد رُوِيَ هذا الحديث بإسنادين صحيحين عن جابر بن عبد الله وكعب بن مالك.أما حديث جابر:
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি এমন জ্ঞান অর্জন করে যা দ্বারা আল্লাহর সন্তুষ্টি কামনা করা হয়, কিন্তু সে তা কেবল দুনিয়ার কোনো সম্পদ লাভের জন্য অর্জন করে, সে জান্নাতের সুঘ্রাণও পাবে না। ফালীহ (নামক রাবী) বলেন: এর 'আর্ফ' (আভিধানিক অর্থ) হলো এর সুঘ্রাণ।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف كسابقه. أبو طوالة: هو عبد الله بن عبد الرحمن بن معمر الأنصاري.وأخرجه أبو الحسن بن القطان في زياداته على "سنن ابن ماجه" بإثر (252) عن أبي حاتم الرازي، عن سعيد بن منصور، بهذا الإسناد. يذكر المصنف نفسه فجعله من حديث ابن جريج عن النبي صلى الله عليه وسلم، وابن وهب ثقة حافظ، فروايته مقدَّمة راجحة، وستأتي عند المصنف برقم (295).وأخرجه ابن ماجه (254)، وابن حبان (77) من طريقين عن سعيد بن أبي مريم، بهذا الإسناد.قوله: "تماروا" أي: تجادلوا.وقوله: "لتحيّزوا" كذا عند المصنف، وعند غيره: "لتخيَّروا" وهو بمعناه، أي: لتختاروا به خيار المجالس وصدورها.وقوله: "فالنار" أي: فله النارُ، أو فيستحق النارَ.
293 - فأخبرَناه أبو الحسين محمد بن أحمد بن تميم القَنطَري ببغداد، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل السُّلَمي.وأخبرنا أحمد بن محمد بن سلمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، قالا: حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا يحيى بن أيوب، عن ابن جُرَيج، عن أبي الزُّبير، عن جابر بن عبد الله، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا تَعلَّموا العلمَ لتُباهُوا به العلماءَ أو تمارُوا به السُّفهاء، ولا لتَحيَّزوا به المجلسَ، فمن فَعَلَ ذلك فالنارُ النارُ" [1].
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা জ্ঞান অর্জন করো না যাতে এর দ্বারা আলিমদের সাথে অহংকার করতে পারো, অথবা বোকা লোকদের সাথে তর্ক করতে পারো, এবং না এর মাধ্যমে মজলিসে (বিশেষ) স্থান দখল করতে পারো। সুতরাং, যে ব্যক্তি এমন করবে, তার জন্য আগুনই আগুন রয়েছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف، فيحيى بن أيوب - وهو الغافقي المصري - ليس بذاك الضابط الثقة وقد خالف في هذا الحديث من هو أوثق منه بدرجات فأسنده، بينما أرسله عبد الله بن وهب كما يذكر المصنف نفسه فجعله من حديث ابن جريج عن النبي صلى الله عليه وسلم، وابن وهب ثقة حافظ، فروايته مقدَّمة راجحة، وستأتي عند المصنف برقم (295).وأخرجه ابن ماجه (254)، وابن حبان (77) من طريقين عن سعيد بن أبي مريم، بهذا الإسناد.قوله: "تماروا" أي: تجادلوا.وقوله: "لتحيّزوا" كذا عند المصنف، وعند غيره: "لتخيَّروا" وهو بمعناه، أي: لتختاروا به خيار المجالس وصدورها.وقوله: "فالنار" أي: فله النارُ، أو فيستحق النارَ.
294 - Null
294 - حدَّثَناه أبو أحمد بن محمد بن الحسين الشَّيباني من أصل كتابه، حدثنا أحمد بن حماد بن زُغْبة التُّجِيبي بمصر، حدثنا ابن أبي مريم، حدثنا يحيى بن أيوب، سمعتُ ابن جُرَيج يحدِّث عن أبي الزُّبير، فذكره بمثله.هذا إسناد حَفِظَه يحيى بن أيوب المصري عن ابن جريج فوَصَله، ويحيى متَّفَق على إخراجه في "الصحيحين"، وقد أرسله عبد الله بن وَهْب، فأنا على أصلي الذي أصَّلتُه في قَبُول الزيادة من الثقة في الأسانيد والمتون.
২৯৪ - আমাদের কাছে তা বর্ণনা করেছেন আবু আহমাদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু হুসাইন আশ-শাইবানী তার মূল কিতাব থেকে। তিনি (আবু আহমাদ) বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মিশরে আহমাদ ইবনু হাম্মাদ ইবনু যু'গবা আত-তুজীবি। তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবনু আবী মারইয়াম। তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু আইয়্যুব। আমি ইবনু জুরাইজকে আবুয-যুবাইর থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি। এরপর তিনি অনুরূপ উল্লেখ করেন। এই সনদটি ইয়াহইয়া ইবনু আইয়্যুব আল-মিসরী ইবনু জুরাইজ থেকে মুখস্থ করেছেন এবং তিনি তা ওয়াসল (সংযুক্ত) করেছেন। ইয়াহইয়ার হাদীস সহীহাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এ গ্রহণ করার ব্যাপারে ঐকমত্য রয়েছে। আর এটিকে আব্দুল্লাহ ইবনু ওয়াহব মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আমি আমার সেই মূলনীতির ওপর প্রতিষ্ঠিত, যা আমি সানাদ এবং মাতন (মূল বক্তব্য)-এর ক্ষেত্রে বিশ্বস্ত রাবীর অতিরিক্ত বর্ণনা গ্রহণ করার জন্য প্রণয়ন করেছি।
295 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وَهْب قال: وسمعتُ ابنَ جُرَيج يحدِّث: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا تَعلَّموا العلمَ لتُباهُوا به العلماء، ولا لتُمارُوا به السُّفهاء، ولا لتتحدَّثوا به في المجالس، فمَن فَعَلَ ذلك فالنارُ النارُ" [1].وأما حديث كعب بن مالك:
ইবনু জুরাইজ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা এই উদ্দেশ্যে জ্ঞান অর্জন করো না যে, এর মাধ্যমে আলেমদের সাথে অহংকার করবে, অথবা মূর্খদের সাথে তর্ক-বিতর্ক করবে, অথবা মজলিসসমূহে এর দ্বারা (নিজেদের শ্রেষ্ঠত্ব জাহির করে) আলোচনা করবে। যে ব্যক্তি এমন করবে, তার জন্য নিশ্চিতভাবেই আগুন, আগুনই।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ضعيف لإعضاله، فإنَّ بين ابن جريج والنبي صلى الله عليه وسلم اثنان أو أكثر.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (479) عن أبي عبد الله الحاكم محمد بن عبد الله، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.
296 - فحدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا ابن أبي أُوَيس، حدثني أخي، عن سليمان بن بلال، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة، عن عبد الله بن كعب بن مالك، عن أبيه، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن ابتَغَى العلمَ ليُباهيَ به العلماء، أو يُمارِيَ به السُّفهاء، أو يَقبَلَ إفادةَ الناس إليه، فإلى النار" [1].لم يُخرج الشيخان لإسحاق بن يحيى شيئًا، وإنما جعلته شاهدًا لما قدَّمتُ من شرطهما، وإسحاق بن يحيى من أشراف قريش.
ক'আব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আলেমদের সাথে গর্ব করার জন্য, অথবা বোকাদের সাথে ঝগড়া করার জন্য, অথবা মানুষের কাছ থেকে সুযোগ-সুবিধা লাভের উদ্দেশ্যে জ্ঞান অন্বেষণ করে, তবে তার স্থান জাহান্নাম।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، إسحاق بن يحيى بن طلحة متروك الحديث. ابن أبي أويس: هو إسماعيل بن عبد الله، وهو ليس بذاك القوي، وأخوه ثقة: وهو أبو بكر عبد الحميد بن أبي أويس.وأخرجه الترمذي (2654) من طريق أمية بن خالد، عن إسحاق بن يحيى بن طلحة، بهذا الإسناد.وقال: حديث غريب، وضعَّف إسحاق. وثالث من حديث ابن مسعود عند الترمذي (2658)، ورجاله ثقات، وهو مختصر عند أحمد 7/ (4157).ورابع من حديث النعمان بن بشير، وسيأتي عند المصنف برقم (300)، وإسناده حسن.وانظر تتمة شواهده عند حديثي ابن مسعود وأنس في "مسند أحمد".قوله: "نضَّر اللهُ" أي: نعَّمه، ويروى بالتخفيف والتشديد من النَّضارة، وهي في الأصل: حُسْن الوجه والبريق، وإنما أراد: حسَّن خُلُقه وقَدْره، قاله ابن الأثير في "النهاية".وقوله: "لا يُغِلُّ" قال في "النهاية": هو من الإغلال: الخيانة في كل شيء، ويروى: "يَغِلُّ" بفتح الياء، من الغِلِّ: وهو الحقد والحسد، أي: لا يدخله حقدٌ يزيله عن الحق، وروي: "يَغِلُ" بالتخفيف، من الوُغول: الدخول في الشر. والمعنى: أنَّ هذه الخِلَال الثلاث تُستَصلح بها القلوب، فمن تمسَّك بها طَهُرَ قلبُه من الخيانة والدَّغَل والشر، و"عليهنَّ" في موضع الحال، تقديره: لا يغلُّ كائنًا عليهنَّ قلبُ مؤمن.وقوله: "تحيط من ورائهم" قال: أيضًا: أي: تحوطهم وتكنفهم وتحفظهم، يريد أهلَ السُّنة دون أهل البدعة.
297 - حدثنا أبو محمد عبد الله بن إسحاق بن إبراهيم العَدْل ببغداد، حدثنا أبو الأحوَص محمد بن الهيثم القاضي.وحدثنا أبو الحسن أحمد بن محمد العَنَزي من أصل كتابه - وسأله عنه أبو علي الحافظ - حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي؛ قالا: حدثنا نُعَيم بن حمّاد، حدثنا إبراهيم بن سعد، عن صالح بن كَيْسان، عن الزُّهْري، عن محمد بن جُبير بن مُطعِم، عن أبيه جُبير قال: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم بالخَيْف فقال: "نَضَّرَ اللهُ عبدًا سَمِعَ مَقالَتي فوَعَاها ثم أدَّاها إلى مَن لم يَسمَعْها، فرُبَّ حاملِ فقهٍ لا فقهَ له، ورُبَّ حاملِ فقهٍ إلى مَن هو أفقهُ منه.ثلاثٌ لا يُغِلُّ عليهنَّ قلبُ مؤمنٍ: إخلاصُ العمل لله، والطاعةُ لذَوِي الأمر، ولزومُ جماعة المسلمين، فإنَّ دعوتهم تُحِيطُ من ورائِهم" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، قاعدةٌ من قواعد أصحاب الرِّوايات، ولم يُخرجاه، فأما البخاري فقد روى في "الجامع الصحيح" عن نُعَيم بن حماد، وهو أحد أئمة الإسلام.وله أصلٌ في حديث الزُّهري من غير حديث صالح بن كَيْسان، فقد رواه محمد بن إسحاق بن يسار من أوجهٍ صحيحةٍ عنه عن الزهري:
জুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল-খায়ফে (নামক স্থানে) দাঁড়ালেন এবং বললেন: "আল্লাহ সেই বান্দাকে সজীব (উজ্জ্বল) করুন, যে আমার কথা শুনল, অতঃপর তা হৃদয়ে ধারণ করল, এরপর তা এমন ব্যক্তির কাছে পৌঁছে দিল যে তা শোনেনি। কেননা, অনেক জ্ঞানের বাহক আছে যার জ্ঞান (গভীর উপলব্ধি) নেই, আবার অনেক জ্ঞানের বাহক আছে যে তা এমন ব্যক্তির কাছে পৌঁছে দেয় যে তার চেয়েও বেশি জ্ঞানী। তিনটি বিষয়—যাতে মুমিনের অন্তর বিদ্বেষপরায়ণ (বা বিশ্বাসঘাতক) হয় না: আল্লাহর জন্য ইখলাসের (আন্তরিকতার) সাথে কাজ করা, প্রশাসকদের (উলুল আমর) আনুগত্য করা এবং মুসলমানদের জামাআতকে (সমষ্টিকে) আঁকড়ে ধরে থাকা। কারণ, তাদের দাওয়াত (বা নিরাপত্তা) তাদের পিছন থেকে ঘিরে রাখে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد خولف فيه نعيم بن حماد، وهو ليس بذاك القوي عند المخالفة، خالفه من هو أوثق منه بدرجات وهو يعقوب بن إبراهيم بن سعد، فرواه - كما سيأتي في الحديث التالي - عن أبيه إبراهيم بن سعد عن ابن إسحاق عن الزهري، وابن إسحاق لم يسمعه من الزهري كما سيأتي.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1544) عن يحيى بن عثمان بن صالح، عن نعيم بن حماد، بهذا الإسناد.وله شاهد من حديث زيد بن ثابت عند أحمد 35/ (21590)، وابن ماجه (230)، وابن حبان (67) و (680)، وإسناده صحيح.وآخر من حديث أنس بن مالك عند أحمد 21/ (13350)، وابن ماجه (236)، وإسناده حسن. وثالث من حديث ابن مسعود عند الترمذي (2658)، ورجاله ثقات، وهو مختصر عند أحمد 7/ (4157).ورابع من حديث النعمان بن بشير، وسيأتي عند المصنف برقم (300)، وإسناده حسن.وانظر تتمة شواهده عند حديثي ابن مسعود وأنس في "مسند أحمد".قوله: "نضَّر اللهُ" أي: نعَّمه، ويروى بالتخفيف والتشديد من النَّضارة، وهي في الأصل: حُسْن الوجه والبريق، وإنما أراد: حسَّن خُلُقه وقَدْره، قاله ابن الأثير في "النهاية".وقوله: "لا يُغِلُّ" قال في "النهاية": هو من الإغلال: الخيانة في كل شيء، ويروى: "يَغِلُّ" بفتح الياء، من الغِلِّ: وهو الحقد والحسد، أي: لا يدخله حقدٌ يزيله عن الحق، وروي: "يَغِلُ" بالتخفيف، من الوُغول: الدخول في الشر. والمعنى: أنَّ هذه الخِلَال الثلاث تُستَصلح بها القلوب، فمن تمسَّك بها طَهُرَ قلبُه من الخيانة والدَّغَل والشر، و"عليهنَّ" في موضع الحال، تقديره: لا يغلُّ كائنًا عليهنَّ قلبُ مؤمن.وقوله: "تحيط من ورائهم" قال: أيضًا: أي: تحوطهم وتكنفهم وتحفظهم، يريد أهلَ السُّنة دون أهل البدعة.
298 - أخبرَناه أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أَبي.وحدثنا أبو علي الحافظ، أخبرنا أبو يَعلى، حدثنا أبو خَيْثمة؛ قالا: حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق.وأخبرني أبو الحسن محمد بن عبد الله الجَوهَري، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا محمد بن يحيى، حدثنا يعلى بن عُبيد الطَّنافِسي وأحمد بن خالد الوَهْبي قالا: حدثنا محمد بن إسحاق. وأخبرني محمد بن المظفَّر الحافظ، حدثنا محمد بن هارون، حدثنا سليمان بن عمر، حدثنا يحيى بن سعيد الأُمَوي، عن محمد بن إسحاق.وأخبرني أبو عمرو محمد بن أحمد بن إسحاق العَدْل، حدثنا محمد بن خُرَيم الدمشقي، حدثنا هشام بن عمّار، حدثني سعيد بن يحيى اللَّخْمي، حدثنا ابن إسحاق.وحدثني علي بن عيسى - واللفظ له - حدثنا مسدَّد بن قَطَن، حدثنا عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا يعلى بن عُبيد، حدثنا محمد بن إسحاق، عن الزُّهري، عن محمد بن جُبير بن مُطعِم، عن أبيه قال: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم بالخَيْف من مِنًى فقال: "نَضَّرَ اللهُ عبدًا سمع مَقالَتي فوَعَاها ثم أدَّاها إلى مَن لم يَسمَعْها، فرُبَّ حاملِ فقهٍ لا فقهَ له، ورُبَّ حاملِ فقهٍ إلى مَن هو أفقهُ منه.ثلاثٌ لا يُغِلُّ عليهنَّ قلبُ مؤمن: إخلاصُ العمل لله، والنصيحةُ لأُولي الأمر، ولزومُ الجماعة، فإنَّ دعوتَهم تُكِنُّ [1] من ورائِهم [2].قد اتَّفق هؤلاء الثِّقات على رواية هذا الحديث عن محمد بن إسحاق عن الزُّهري، وخالفهم عبدُ الله بن نُمير وحده فقال: عن محمد بن إسحاق عن عبد السلام - وهو ابن أبي الجَنُوب - عن الزهري، وابنُ نُمير ثقة، والله أعلم [3]. ثم نَظَرْناه فوجدنا للزُّهريِّ فيه متابِعًا عن محمد بن جُبير:
জুবাইর ইবনু মুতঈম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মিনার খায়ফে দাঁড়িয়ে বললেন: “আল্লাহ তাকে সতেজ ও লাবণ্যময় করুন যে আমার কথা শুনল, তারপর তা হৃদয়ংগম করল এবং তারপর তা এমন ব্যক্তির কাছে পৌঁছে দিল যে তা শোনেনি। কেননা অনেক সময় জ্ঞানের বাহক (আহরিত জ্ঞান) নিজে জ্ঞানের অধিকারী হয় না, এবং অনেক জ্ঞানের বাহক তার চেয়েও অধিক জ্ঞানী ব্যক্তির কাছে জ্ঞান পৌঁছে দেয়। তিনটি বিষয় রয়েছে, যার প্রতি মুমিনের অন্তর বিদ্বেষ পোষণ করে না (বা কলুষিত হয় না): আল্লাহর জন্য কর্মে একনিষ্ঠতা, শাসকগণের (উলিল আমর) প্রতি কল্যাণ কামনা করা, এবং জামাআতকে (মুসলিম সমাজকে) আঁকড়ে ধরা। কারণ, তাদের (জামাআতের) দোয়া তাদের পিছন থেকে নিরাপত্তা (বা ঢাল) প্রদান করে।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في المطبوع: تكون، وهي كذلك في المصادر التي خرَّجته، وفي النسخ الخطية: تكنّ، وهي صحيحة أيضًا، معناها: تحفظهم وتسترهم. عن أبيه، عن ابن إسحاق، عن عبد السلام بن أبي الجنوب، عن الزهري، به. وهذا إسناد ضعيف جدًّا، عبد السلام هذا متفق على ضعفه، فإن كان ابن نمير حفظه عن ابن إسحاق، فإنه يكون قد دلَّسه، والله تعالى أعلم. وقد قال الدارقطني في "العلل" 13/ 419: قول ابن نمير أشبه بالصواب؛ يعني بزيادة عبد السلام هذا، ولابن إسحاق فيه إسناد آخر كما في الحديث التالي، وهو حسن.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن لولا أنَّ ابن إسحاق مدلِّس ولم يصرِّح بسماعه من الزهري، وقد أدخل عبد الله بن نمير في روايته عن ابن إسحاق بينهما رجلًا كما سيأتي.والحديث في "مسند أحمد" 27/ (16738) عن يعلى بن عبيد الطنافسي.وأخرجه أيضًا من طريق يعلى بن عبيد ابنُ ماجه برقم (231 م).وأخرجه أحمد 27/ (16754) عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، به.وأخرجه ابن ماجه (231 م) من طريق سعيد بن يحيى اللخمي، عن محمد بن إسحاق، به. وانظر ما قبله. عن أبيه، عن ابن إسحاق، عن عبد السلام بن أبي الجنوب، عن الزهري، به. وهذا إسناد ضعيف جدًّا، عبد السلام هذا متفق على ضعفه، فإن كان ابن نمير حفظه عن ابن إسحاق، فإنه يكون قد دلَّسه، والله تعالى أعلم. وقد قال الدارقطني في "العلل" 13/ 419: قول ابن نمير أشبه بالصواب؛ يعني بزيادة عبد السلام هذا، ولابن إسحاق فيه إسناد آخر كما في الحديث التالي، وهو حسن.
298 [3] - رواية ابن نمير أخرجها ابن ماجه (231) و (3056) عن محمد بن عبد الله بن نمير، عن أبيه، عن ابن إسحاق، عن عبد السلام بن أبي الجنوب، عن الزهري، به. وهذا إسناد ضعيف جدًّا، عبد السلام هذا متفق على ضعفه، فإن كان ابن نمير حفظه عن ابن إسحاق، فإنه يكون قد دلَّسه، والله تعالى أعلم. وقد قال الدارقطني في "العلل" 13/ 419: قول ابن نمير أشبه بالصواب؛ يعني بزيادة عبد السلام هذا، ولابن إسحاق فيه إسناد آخر كما في الحديث التالي، وهو حسن.
299 - أخبرَناه أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عمرو بن أبي عمرو مولى المطَّلِب، عن عبد الرحمن بن الحُوَيرِث، عن محمد بن جُبير بن مُطعِم عن أبيه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول وهو بالخَيْف من مِنًى: "رَحِمَ اللهُ عبدًا سمع مَقالَتي فوَعَاها ثم أدَّاها إلى مَن لم يَسمَعْها، فرُبَّ حاملِ فقهٍ لا فقهَ له، ورُبَّ حاملِ فقهٍ إلى مَن هو أفقهُ منه.ثلاثٌ لا يُغِلُّ عليهنَّ قلبُ المؤمن: إخلاصُ العمل، ومناصحةُ ذوي الأمر، ولزومُ الجماعة، فإنَّ دعوتهم تكون مِن ورائهم" [1].وفي الباب عن جماعة من الصحابة منهم عمر وعثمان وعلي وعبد الله بن مسعود ومعاذ بن جَبَل وابن عمر وابن عباس وأبو هريرة وأنس، وغيرهم عِدَّةٌ، وحديث النُّعمان بن بَشِير من شرط الصحيح.
জুবাইর ইবন মুত’ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিনার খায়ফ নামক স্থানে (দাঁড়িয়ে) বলতে শুনেছি: "আল্লাহ সেই বান্দার প্রতি রহম করুন, যে আমার কথা মনোযোগ দিয়ে শুনল, তা স্মরণ রাখল এবং যে শোনেনি তার কাছে তা পৌঁছে দিল। অনেক জ্ঞান বহনকারী আছে, যার নিজের সেই জ্ঞান নেই। আর অনেক জ্ঞান বহনকারী এমনও আছে, যে তার চেয়েও অধিক জ্ঞানী ব্যক্তির কাছে জ্ঞান পৌঁছে দেয়। তিনটি বিষয় আছে, যার ব্যাপারে মুমিনের অন্তর কখনো বিদ্বেষ ভাব পোষণ করে না (বা কলুষিত হয় না): কাজেকর্মে একনিষ্ঠতা (ইখলাস), শাসকবর্গের প্রতি কল্যাণকামিতা এবং মুসলিম জামাআতকে (ঐক্যকে) দৃঢ়ভাবে আঁকড়ে ধরা। কেননা তাদের (জামাআতের) আহ্বান তাদের পেছনে থাকা লোকদের (তাদের সদস্যদের) জন্য (কল্যাণ ও সুরক্ষার) কারণ হয়ে থাকে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن إن شاء الله. عبد الرحمن بن الحويرث: هو عبد الرحمن بن معاوية بن الحويرث أبو الحويرث، نُسب هنا إلى جدِّه.والحديث في "مسند أحمد" 27/ (16754).
300 - سمعتُ أبا العباس محمد بن يعقوب غيرَ مرَّةٍ يقول: حدثنا إبراهيم بن بكر المروَزي ببيت المَقدِس، حدثنا عبد الله بن بكر السَّهْمي، حدثنا حاتم بن أبي صَغِيرة، عن سِمَاك بن حَرْب، عن النُّعمان بن بَشِير قال: خَطَبَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال: "نَضَّرَ اللهُ وجهَ امرِئٍ سَمِعَ مَقالَتي فحَمَلَها، فرُبَّ حاملِ فقهٍ غيرُ فقيه، ورُبَّ حاملِ فقهٍ إلى مَن هو أفقهُ منه. ثلاثٌ لا يُغِلُّ عليهنَّ قلبُ مؤمن: إخلاصُ العمل لله، ومناصحةُ وُلَاةِ الأمر، ولزومُ جماعةِ المسلمين" [1].قد احتَجَّ مسلم في "المسند الصحيح" بحديث سِمَاك بن حَرْب عن النُّعمان بن بَشِير أنه قال: لقد رأيت نبيَّنا صلى الله عليه وسلم وما يملأُ بطنَه من الدَّقَل [2]، وعن سِمَاك عن النعمان قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يسوِّي صفوفَنا … الحديث [3]، وحاتم بن أبي صَغِيرة وعبد الله بن بكر السَّهْمي متَّفَق على إخراجهما.وقد روي عن الشَّعْبي ومجاهد عن النعمان بن بشير عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوُه.
নু'মান ইবনে বাশির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে খুতবা দিলেন এবং বললেন: "আল্লাহ ঐ ব্যক্তির চেহারা উজ্জ্বল করুন, যে আমার কথা শুনল এবং তা (স্মরণ করে) বহন করল। কেননা, এমন অনেক ফিকহের বহনকারী আছে, যারা নিজেরা ফকীহ (আইনজ্ঞ) নয়, এবং এমন অনেক ফিকহের বহনকারী আছে, যারা তা তাদের চেয়ে অধিক ফকীহর কাছে পৌঁছে দেয়। তিনটি বিষয় এমন, যার উপর কোনো মুমিনের হৃদয় বিদ্বেষ পোষণ করে না (বা পাক থাকে): আল্লাহর জন্য কর্মে নিষ্ঠা, শাসকের প্রতি আন্তরিক কল্যাণ কামনা এবং মুসলিমদের জামাতকে আঁকড়ে ধরে থাকা।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن.وأخرجه الرامهرمزي في "المحدّث الفاصل" (11)، والطبراني في "الكبير" 21/ (94)، وأبو نعيم في "مستخرجه على مسلم" (9) من طريق عيسى بن أبي عيسى الحناط، عن الشعبي، عن النعمان بن بشير. وعند الطبراني: عن الشعبي ومجاهد. وعيسى الحناط متروك الحديث.وأخرجه ابن حكيم المديني الأصبهاني في "جزء نضَّر الله امرأً" (43) من طريق عطاء بن عجلان الحنفي، عن نعيم بن أبي هند، عن الشعبي، به. وعطاء هذا متروك الحديث أيضًا.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 2/ (1224) من طريق محمد بن كثير الكوفي، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن الشعبي، عن النعمان بن بشير، عن أبيه مرفوعًا. ومحمد بن كثير ضعيف الحديث. (16) بأنَّ عباد بن العوام سمع من الجريري - وهو سعيد بن إياس - قبل اختلاطه. وقد ذكرنا في تعليقنا على الحديث (247) من "سنن ابن ماجه" أنه سمع منه بعد الاختلاط، وهو تعجُّل منا لا دليل عليه، فيستدرك من هنا.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 540، و"المدخل إلى السنن الكبرى" (621) عن أبي عبد الله الحاكم، بإسناديه.وأخرجه ابن أبي حاتم في مقدمة "الجرح والتعديل" 2/ 12، والرامهرمزي في "المحدث الفاصل" (21)، وأبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" (938)، وتمّام في "فوائده" (23) من طريقين عن سعيد بن سليمان الواسطي، به.وأخرجه بنحوه الرامهرمزي (20) من طريق بشر بن معاذ العقدي، عن أبي عبد الله، جار لحماد بن زيد، عن الجريري، به - وزاد: أمرنا أن نحفّظكم الحديث ونوسِّع لكم في المجالس. وأبو عبد الله هذا لا يُعرف، وقال الذهبي في ترجمته من "ميزان الاعتدال" بعد أن ساق له هذا الحديث: غريب جدًّا، والمحفوظ عن الجريري مختصر: وهو أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يوصينا بكم.وأخرج الرامهرمزي أيضًا (23) من طريق يحيى الحمّاني، عن ابن الغسيل، عن أبي خالد مولى ابن الصباح الأسدي، عن أبي سعيد أنه كان يقول: مرحبًا بوصية رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا جاؤوه في العلم. وإسناده ضعيف لضعف يحيى الحماني، وجهالة أبي خالد.وأخرجه بنحوه ابن ماجه (247)، والترمذي (2650) و (2651) من طريق أبي هارون العبدي، عن أبي سعيد - وزاد فيه كلامًا مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم. وأبو هارون - واسمه عُمارة بن جُوين - متروك وكذّبه بعضهم. وقد ذهب الإمام أحمد كما في "المنتخب من علل الخلّال" (66) إلى أنَّ المحفوظ في هذا الحديث حديث أبي هارون العبدي لا حديث أبي نضرة، والله تعالى أعلم.
[2] هو عند مسلم برقم (2977)، وسيأتي عند المصنف برقم (8118). (16) بأنَّ عباد بن العوام سمع من الجريري - وهو سعيد بن إياس - قبل اختلاطه. وقد ذكرنا في تعليقنا على الحديث (247) من "سنن ابن ماجه" أنه سمع منه بعد الاختلاط، وهو تعجُّل منا لا دليل عليه، فيستدرك من هنا.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 540، و"المدخل إلى السنن الكبرى" (621) عن أبي عبد الله الحاكم، بإسناديه.وأخرجه ابن أبي حاتم في مقدمة "الجرح والتعديل" 2/ 12، والرامهرمزي في "المحدث الفاصل" (21)، وأبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" (938)، وتمّام في "فوائده" (23) من طريقين عن سعيد بن سليمان الواسطي، به.وأخرجه بنحوه الرامهرمزي (20) من طريق بشر بن معاذ العقدي، عن أبي عبد الله، جار لحماد بن زيد، عن الجريري، به - وزاد: أمرنا أن نحفّظكم الحديث ونوسِّع لكم في المجالس. وأبو عبد الله هذا لا يُعرف، وقال الذهبي في ترجمته من "ميزان الاعتدال" بعد أن ساق له هذا الحديث: غريب جدًّا، والمحفوظ عن الجريري مختصر: وهو أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يوصينا بكم.وأخرج الرامهرمزي أيضًا (23) من طريق يحيى الحمّاني، عن ابن الغسيل، عن أبي خالد مولى ابن الصباح الأسدي، عن أبي سعيد أنه كان يقول: مرحبًا بوصية رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا جاؤوه في العلم. وإسناده ضعيف لضعف يحيى الحماني، وجهالة أبي خالد.وأخرجه بنحوه ابن ماجه (247)، والترمذي (2650) و (2651) من طريق أبي هارون العبدي، عن أبي سعيد - وزاد فيه كلامًا مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم. وأبو هارون - واسمه عُمارة بن جُوين - متروك وكذّبه بعضهم. وقد ذهب الإمام أحمد كما في "المنتخب من علل الخلّال" (66) إلى أنَّ المحفوظ في هذا الحديث حديث أبي هارون العبدي لا حديث أبي نضرة، والله تعالى أعلم.
300 [3] - هو عند مسلم برقم (436). (16) بأنَّ عباد بن العوام سمع من الجريري - وهو سعيد بن إياس - قبل اختلاطه. وقد ذكرنا في تعليقنا على الحديث (247) من "سنن ابن ماجه" أنه سمع منه بعد الاختلاط، وهو تعجُّل منا لا دليل عليه، فيستدرك من هنا.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 540، و"المدخل إلى السنن الكبرى" (621) عن أبي عبد الله الحاكم، بإسناديه.وأخرجه ابن أبي حاتم في مقدمة "الجرح والتعديل" 2/ 12، والرامهرمزي في "المحدث الفاصل" (21)، وأبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" (938)، وتمّام في "فوائده" (23) من طريقين عن سعيد بن سليمان الواسطي، به.وأخرجه بنحوه الرامهرمزي (20) من طريق بشر بن معاذ العقدي، عن أبي عبد الله، جار لحماد بن زيد، عن الجريري، به - وزاد: أمرنا أن نحفّظكم الحديث ونوسِّع لكم في المجالس. وأبو عبد الله هذا لا يُعرف، وقال الذهبي في ترجمته من "ميزان الاعتدال" بعد أن ساق له هذا الحديث: غريب جدًّا، والمحفوظ عن الجريري مختصر: وهو أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يوصينا بكم.وأخرج الرامهرمزي أيضًا (23) من طريق يحيى الحمّاني، عن ابن الغسيل، عن أبي خالد مولى ابن الصباح الأسدي، عن أبي سعيد أنه كان يقول: مرحبًا بوصية رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا جاؤوه في العلم. وإسناده ضعيف لضعف يحيى الحماني، وجهالة أبي خالد.وأخرجه بنحوه ابن ماجه (247)، والترمذي (2650) و (2651) من طريق أبي هارون العبدي، عن أبي سعيد - وزاد فيه كلامًا مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم. وأبو هارون - واسمه عُمارة بن جُوين - متروك وكذّبه بعضهم. وقد ذهب الإمام أحمد كما في "المنتخب من علل الخلّال" (66) إلى أنَّ المحفوظ في هذا الحديث حديث أبي هارون العبدي لا حديث أبي نضرة، والله تعالى أعلم.