হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2841)


2841 - أخبرَنيهِ أبو بكر محمد بن المؤمَّل بن الحسن، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا أبو صالح، حدثنا الليث بن سعد، قال: سمعت مِشرَحَ بن هاعان يحدِّث عن عُقبة بن عامر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ألا أُخبركم بالتَّيس المُستعار؟ هو المُحِلُّ"، ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لَعَنَ الله المُحِلَّ والمُحلَّلَ له [1] " [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি কি তোমাদেরকে ভাড়া করা পুরুষ ছাগল সম্পর্কে অবহিত করব না? সে হল 'মুহাল্লিল' (যে হালাল করার উদ্দেশ্যে বিয়ে করে)।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তাআলা লা'নত করেছেন 'মুহাল্লিল'-কে এবং যার জন্য 'মুহাল্লিল' (বিবাহ) করা হয়েছে তাকেও।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظة "له" سقطت من (ز) و (ص) و (ع)، وأثبتناها من (ب)، وهي ثابتة في رواية عثمان بن صالح عن الليث في الطريق التي قبل هذه، وإن كان اللعن يطال أيضًا المرأةَ إذا شرطت ذلك.



[2] صحيح لغيره كسابقه. وما وقع من تصريح الليث هنا بسماعه من مِشْرح فيه نظر، لما قدّمنا بيانه في الطريق السابقة من نفي يحيى بن عبد الله بن بكير أن يكون الليث سمع من مشرح شيئًا وأنَّ الليث إنما حدثه بهذا الحديث عن سليمان بن عبد الرحمن مرسلًا، ويحيى هذا أوثق الناس في الليث، كما قال ابن عدي، إذ كان جارًا له، وممّا يؤيد الوهم في ذكر السماع هنا في رواية أبي صالح - وهو عبد الله بن صالح - مخالفة عثمان بن صالح المصري له في الطريق السابقة في روايته عن الليث إذ لم يصرح فيها بالسماع، بل أورد الرواية على صورة تقوي عدم سماعه منه، وقال البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل" (274): لم يكن أخرجه عبد الله بن صالح في أيامنا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2842)


2842 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا سعيد بن أبي مريم، حدثنا أبو غسان محمد بن مُطرِّف المدني، عن عمر بن نافع، عن أبيه، أنه قال: جاء رجل إلى ابن عمر، فسأله عن رجل طلَّق امرأتَه ثلاثًا، فتزوجها أخٌ له عن غير مُؤامَرة منه، لِيُحلَّها لأخيه: هل تَحِلُّ للأول؟ قال: لا، إلّا نِكاحَ رَغبةٍ، كنا نَعُدُّ هذا سِفاحًا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু ওমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে এমন এক ব্যক্তির ব্যাপারে জিজ্ঞেস করল, যে তার স্ত্রীকে তিন তালাক দিয়েছে। অতঃপর তার এক ভাই সে স্ত্রীটিকে এমনভাবে বিয়ে করল যে, সেখানে প্রথম স্বামীর কোনো পরামর্শ ছিল না, বরং উদ্দেশ্য ছিল তাকে তার ভাইয়ের জন্য হালাল করা। (জিজ্ঞেস করা হলো:) সে কি প্রথম স্বামীর জন্য হালাল হবে? তিনি (ইবনু ওমর) বললেন: না, যতক্ষণ না তা আগ্রহের (স্বাভাবিক) বিবাহ হবে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে আমরা এই কাজটিকে ব্যভিচার (সিফাহ) হিসেবে গণ্য করতাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وجوَّد إسناده الإمام ابن تيمية كما في "الفتاوى الكبرى" 6/ 242.وأخرجه البيهقي 7/ 208 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (6246) من طريق محمد بن فليح، وأبو نعيم في "الحلية" 7/ 96 من طريق سفيان الثَّوري، كلاهما عن أبي غسان محمد بن مُطرِّف، به. طريق قبيصة بن عقبة، خمستهم عن جرير بن حازم، عن الزُّبَير بن سعيد، عن عبد الله بن علي بن يزيد بن ركانة، عن أبيه، عن جده. فزادوا جميعًا في إسناده علي بن يزيد بن رُكانة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2843)


2843 - أخبرني أبو جعفر محمد بن علي الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزَة، حدثنا عُبيد الله بن موسى، حدثنا جرير بن حازم، عن الزُّبَير بن سعيد، عن عبد الله بن علي بن يزيد بن رُكَانة، عن جده [1] رُكانة بن عبد يَزيد: أنه طلَّق امرأتَه البَتّةَ على عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم، قال: فسألتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم عن ذلك، فقال: "ما أردتَ بذلك؟ " قال: أردتُ به واحدةً، قال: "آللهِ"، قال: آللهِ، قال: "فهو ما أردتَ" [2]. قد انحرف الشيخان عن الزُّبَير بن سعيد الهاشمي في "الصحيحين"، غير أنَّ لهذا الحديث متابعًا من بيت رُكانة بن عبد يَزيد المُطَّلبي، فيَصحُّ به الحديثُ:




রুকানা ইবনু আব্দ ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে তাঁর স্ত্রীকে 'আল-বাত্তা' (চূড়ান্ত তালাক) দিলেন। তিনি বলেন: অতঃপর আমি এ বিষয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "এর দ্বারা তুমি কী উদ্দেশ্য করেছিলে?" তিনি বললেন: আমি এর দ্বারা একটি (তালাক) উদ্দেশ্য করেছিলাম। তিনি (নবী) বললেন: "আল্লাহর কসম?" তিনি বললেন: আল্লাহর কসম। তিনি বললেন: "তাহলে তুমি যা উদ্দেশ্য করেছ, সেটাই হবে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا وقع عند المصنف رواية عبد الله بن علي عن جده مباشرة، وعند غيره أنَّ عبد الله يرويه عن أبيه عن جده، هذا في رواية جرير بن حازم خاصة. طريق قبيصة بن عقبة، خمستهم عن جرير بن حازم، عن الزُّبَير بن سعيد، عن عبد الله بن علي بن يزيد بن ركانة، عن أبيه، عن جده. فزادوا جميعًا في إسناده علي بن يزيد بن رُكانة.



[2] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لضعف الزُّبَير بن سعيد وجهالة عبد الله بن علي بن يزيد بن رُكانة، وقد اضطرب فيه الزُّبَير أيضًا كما قال البخاري فيما نقله عنه الترمذي، وبيَّنه الدارقطني في "سننه" (3981 - 3983)، لكن روي الحديث من وجه آخر عن ركانة بإسناد حسن في الطريق التالية.وأخرجه أحمد 39/ (24009/ 91) عن يزيد بن هارون، و (24009/ 92) عن إسحاق بن عيسى الطباع، وأبو داود (2208)، وابن حبان (4274) من طريق أبي الربيع سليمان بن داود الزهراني العَتَكي، وابن ماجه (2051) من طريق وكيع بن الجراح، والترمذي (1177) من طريق قبيصة بن عقبة، خمستهم عن جرير بن حازم، عن الزُّبَير بن سعيد، عن عبد الله بن علي بن يزيد بن ركانة، عن أبيه، عن جده. فزادوا جميعًا في إسناده علي بن يزيد بن رُكانة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2844)


2844 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا الربيع بن سليمان، أخبرنا الشافعي، أخبرني عَمِّي محمد بن علي بن شافِع [عن عبد الله بن علي بن السائب] [1] عن نافع بن عُجَير بن عبدِ يزيد: أنَّ رُكانةَ بن عبدِ يزيد طلَّق امرأتَه سُهَيمةَ البتّةَ، ثم أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقال: إني طلقتُ امرأتي سُهَيمة البتّةَ، ووالله ما أردتُ إلّا واحدةً، فردَّها إليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فطلَّقها الثانيةَ في زمن عُمر، والثالثة في زمن عثمان [2]. قد صحَّ الحديثُ بهذه الرواية، فإنَّ الإمام الشافعي قد أتقنَه، وحفِظه عن أهل بيتِه، والسائبُ بن عبد يزيد أبو الشافِع بن السائب، وهو أخو رُكانة بن عبد يزيد، ومحمدُ بن علي بن شافع عمُّ الشافعي شيخُ قريش في عصره.




রুকানা ইবনে আবদ ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তিনি তাঁর স্ত্রী সুহাইমাকে 'আল-বাত্তাহ' (চূড়ান্ত তালাক) দিলেন। এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বললেন: আমি আমার স্ত্রী সুহাইমাকে 'আল-বাত্তাহ' (চূড়ান্ত তালাক) দিয়েছি, আল্লাহর শপথ! আমি একটির (এক তালাকের) বেশি উদ্দেশ্য করিনি। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে (স্ত্রীকে) তার কাছে ফিরিয়ে দিলেন। এরপর তিনি দ্বিতীয়বার তাকে তালাক দিলেন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে এবং তৃতীয়বার দিলেন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে। এই বর্ণনা দ্বারা হাদীসটি সহীহ প্রমাণিত। কেননা, ইমাম শাফিঈ এটিকে অত্যন্ত নিখুঁতভাবে তাঁর পরিবারের সদস্যগণ থেকে সংরক্ষণ করেছেন। সাইব ইবনে আবদ ইয়াযিদ হলেন শাফে' ইবনে সাইবের পিতা এবং তিনি রুকানা ইবনে আবদ ইয়াযিদের ভাই। আর মুহাম্মদ ইবনে আলী ইবনে শাফে', যিনি ইমাম শাফিঈর চাচা, তিনি তাঁর যুগের কুরাইশদের মধ্যে ছিলেন শ্রেষ্ঠ।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط اسم عبد الله بن السائب من النسخ الخطية، وهو ثابت في إسناد هذه الرواية بلا شَكٍّ، وهو ثابت أيضًا للحاكم في "معرفة علوم الحديث" ص 175 حيث أورده بهذا الإسناد بعينه، وقد ذكر الشافعي هذا الحديث في "الأم" في عدة مواضع منه - وهذا الكتاب من رواية الربيع بن سليمان كما هو معلوم - كل ذلك يذكر فيه عبد الله بن علي بن السائب، فالصواب إثباته. وممَّن رواه كرواية الحميدي عن الشافعي أبو داود الطيالسي في "مسنده" (1284) عن شيخ بمكة، عن عبد الله بن علي بن السائب عن نافع بن عجير، عن ركانة.ولا يُعارض هذا الحديثُ حديثَ ابن عباس الذي أخرجه أحمد 4/ (2387)، قال: طلَّق ركانة بن عبد يزيد أخو بني المطلب امرأته ثلاثًا في مجلس واحد، ثم ذكر نحوه. لأنَّ البتّةَ والثلاثَ شيء واحد لا فرق بينهما، وهو ظاهر صنيع مالك في "موطئه" كما قال ابن عبد البر في "الاستذكار" (25005)، وكذلك هو ظاهر صنيع البخاري في "صحيحه"، كما قال الحافظ في "الفتح" 16/ 47 وقال: وهذا الحَمْل قويٌّ. وانظر "معالم السنن" للخطابي 3/ 248، "المسالك في شرح موطأ مالك" لابن العربي 5/ 546.



[2] إسناده حسن من أجل محمد بن علي بن شافع وعبد الله بن علي بن السائب، فقد وثقهما الشافعي في "الأم" 6/ 444، وروى عن كلٍّ منهما جمعٌ، ونافع بن عُمير روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقيل: له صحبة. وقد صحَّحه من هذه الطريق أبو داود كما نقله عنه الدارقطني بإثر (3979) من "سننه" وابنُ عبد البر في "الاستذكار" (25104) و (25105)، وقال ابن عبد البر: والشافعي وعمه وجده أهل بيت رُكانة من بني عبد المطلب بن مناف، وهم أعلم بالقصة التي عرض لها.وأخرجه أبو داود (2206) عن ابن السَّرْح وأبي ثور إبراهيم بن خالد الكلبي في آخرين، قالوا: حدثنا محمد بن إدريس الشافعي، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو داود أيضًا (2207) من طريق عبد الله بن الزُّبَير الحميدي، عن الشافعي، به. غير أنه قال في روايته: عن نافع بن عُجير، عن ركانة بن عبد يزيد. وإنما أراد أبو داود بفصل طريق الحميدي هذه لما فيها من فائدة بيان أنَّ نافعًا أخذه عن عمه ركانة صاحب القصة، فهو موصول، خلافًا لما توهمه رواية الآخرين من أنَّ نافعًا أرسله ولم يأخذه عن عمِّه. وممَّن رواه كرواية الحميدي عن الشافعي أبو داود الطيالسي في "مسنده" (1284) عن شيخ بمكة، عن عبد الله بن علي بن السائب عن نافع بن عجير، عن ركانة.ولا يُعارض هذا الحديثُ حديثَ ابن عباس الذي أخرجه أحمد 4/ (2387)، قال: طلَّق ركانة بن عبد يزيد أخو بني المطلب امرأته ثلاثًا في مجلس واحد، ثم ذكر نحوه. لأنَّ البتّةَ والثلاثَ شيء واحد لا فرق بينهما، وهو ظاهر صنيع مالك في "موطئه" كما قال ابن عبد البر في "الاستذكار" (25005)، وكذلك هو ظاهر صنيع البخاري في "صحيحه"، كما قال الحافظ في "الفتح" 16/ 47 وقال: وهذا الحَمْل قويٌّ. وانظر "معالم السنن" للخطابي 3/ 248، "المسالك في شرح موطأ مالك" لابن العربي 5/ 546.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2845)


2845 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن أبي قِلابة، عن أبي أسماء الرَّحَبي، عن ثوبان، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أيُّما امرأةٍ سألتْ زوجَها الطلاقَ من غير بأسٍ، حَرّم اللهُ عليها أن تَرِيحَ رائحةَ الجنة" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে নারী কোনো ন্যায্য কারণ ছাড়াই তার স্বামীর কাছে তালাক চায়, আল্লাহ তার জন্য জান্নাতের সুঘ্রাণ গ্রহণ করা হারাম করে দেবেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أيوب: هو ابن أبي تَميمة السَّختِياني، وأبو قِلابة: هو عبد الله بن زيد الجَرْمي، وأبو أسماء الرَّحَبي: هو عمرو بن مَرْثَد.وأخرجه أبو داود (2226) عن سليمان بن حرب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 37/ (22440) عن عبد الرحمن بن مهدي، وابن ماجه (2055) من طريق محمد بن الفضل السدوسي، كلاهما عن حماد بن زيد، به.وأخرجه ابن حبان (4184) من طريق وُهَيب بن خالد، عن أيوب، به.وأخرجه أحمد (22379) عن إسماعيل ابن عُلَيَّة، والترمذي (1187) من طريق عبد الوهاب بن عبد المجيد الثقفي، كلاهما عن أيوب، عن أبي قلابة، عمّن حدثه عن ثوبان. وقد عُلمت الواسطةُ من طريق غيرهما.قوله: "أن تَريحَ"، بفتح المثناة، من راح يَريح، وبضمها من أراح يُريح: إذا وجد رائحة الشيء.وقوله: "من غير بأس" أي: من غير شدة تلجئها إلى سؤال المفارقة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2846)


2846 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن سِمَاك، عن عِكرمة، عن ابن عباس، قال: أسلمتِ امرأة على عهد النبي صلى الله عليه وسلم، فتزوجتْ، فجاء زوجُها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: إني قد أسلمتُ معها وعَلِمَت بإسلامي معها، فنزعَها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مِن زوجها الآخِرِ ورَدَّها إلى زوجِها الأول [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، وهو من النوع الذي أقولُ: إنَّ البخاري احتَّجَ بعِكْرمة، ومسلم بسِمَاك.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে একজন নারী ইসলাম গ্রহণ করলেন, অতঃপর তিনি (অন্য একজনকে) বিবাহ করলেন। তখন তার (প্রথম) স্বামী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন: আমি তার সাথে ইসলাম গ্রহণ করেছি এবং সে আমার ইসলাম গ্রহণের বিষয়টি জানতো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তার পরবর্তী স্বামীর কাছ থেকে সরিয়ে দিলেন এবং তাকে তার প্রথম স্বামীর কাছে ফিরিয়ে দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن كما قال ابنُ عبد البر في "التمهيد" 12/ 19، وسماك - وهو ابن حرب - وإن كان في روايته عن عكرمة اضطراب في الجملة، لم يُختلَف عليه في هذا الحديث، وقد مشى الترمذي وابن الجارود وابن خزيمة وابن حبان والمصنِّفُ وغيرهم على تصحيح حديثه عن عكرمة ما لم يُخالَف أو يضطرب، أو ينفرد بما يُنكر، وخصوصًا إذا روى عنه شعبة والثَّوري، هذا هو الحق إن شاء الله، على أنه قد روي من حديث ابن عباس أيضًا ما يشهد لروايته هذه، كما سيأتي إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي.وأخرجه أحمد 3/ (2059) و 5/ (2972)، وأبو داود (2238)، والترمذي (1144)، وابن حبان (4159) من طرق عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وصحَّحه الترمذيُّ.وأخرجه ابن ماجه (2008) من طريق حفص بن جُميع، عن سماك، به.ويشهد له حديثُ ابن عباس الآتي بعده.ومراسيلُ صحيحة عن عامر الشعبي وقتادة وعكرمة بن خالد عند ابن سعد 10/ 33، وعبد الرزاق (12647)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 2/ 149. فانتفت شبهة تدليسه. وقد صحَّح الإمامُ أحمد هذا الحديث في "المسند" بإثر الحديث (6938)، وقال الترمذي (1143): ليس بإسناده بأس.وأخرجه أحمد 5/ (3290)، وأخرجه أبو داود (2240) عن الحسن بن علي الخلال، كلاهما (أحمد والخلال) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. وزادا: بعد سنتين.وأخرجه أحمد 3/ (1876)، وأبو داود (2240) من طريق محمد بن سلمة، وأحمد 4/ (2366) من طريق إبراهيم بن سعد، وأبو داود (2240) من طريق سلمة بن الفضل، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به. زاد إبراهيم بن سعد وسلمة بن الفضل: بعد ست سنين.وسيأتي برقم (7018) من طريق إبراهيم بن عبد الله السعدي عن يزيد بن هارون، وزاد: بعد سنتين. وبرقم (5109) من طريق يونس بن بُكير، وبرقم (6839) من طريق أحمد بن خالد الوهبي، كلاهما عن محمد بن إسحاق. زاد يونس وحده بعد ست سنين.ويشهد له عدة مراسيل صحيحة عن قتادة والشعبي وعمرو بن دينار، انظرها في "سنن أبي داود" بتحقيقنا.ويُخالف هذا الحديث حديث عبد الله بن عمرو بن العاص عند أحمد 11/ (6938)، وابن ماجه (2010)، والترمذي (1142) - وسيأتي عند المصنف برقم (6840) -: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم ردَّ زينب بمهر جديد ونكاح جديد. وفي إسناده الحجاج بن أرطاة، وهو مدلِّس، وقد دلَّس فيه ذكرَ محمد بن عبيد الله العرزمي، وهذا متروك، ولهذا ضعّف الإمام أحمد هذا الحديث بإثره، ورجَّح يزيدُ بن هارون والبخاريُّ حديثَ ابن عباس عليه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2847)


2847 - أخبرنا عبد الله بن الحسين القاضي، حدثنا الحارث بن أبي أسامة، حدثنا يزيد بن هارون، عن محمد بن إسحاق، عن داود بن الحُصَين، عن عِكْرمة، عن ابن عباس، قال: رَدَّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم ابنتَه زينب على زوجها أبي العاص بن الربيع بالنكاح الأول، ولم يُحدِثْ شيئًا [1].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কন্যা যয়নবকে তাঁর স্বামী আবুল 'আস ইবনু রাবী‘-এর কাছে প্রথম বিবাহের মাধ্যমে ফিরিয়ে দেন এবং তিনি (নতুন করে) কোনো ব্যবস্থা গ্রহণ করেননি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن، وقد صرَّح محمد بن إسحاق بسماعه فيما سيأتي برقم (5109) و (7018) فانتفت شبهة تدليسه. وقد صحَّح الإمامُ أحمد هذا الحديث في "المسند" بإثر الحديث (6938)، وقال الترمذي (1143): ليس بإسناده بأس.وأخرجه أحمد 5/ (3290)، وأخرجه أبو داود (2240) عن الحسن بن علي الخلال، كلاهما (أحمد والخلال) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. وزادا: بعد سنتين.وأخرجه أحمد 3/ (1876)، وأبو داود (2240) من طريق محمد بن سلمة، وأحمد 4/ (2366) من طريق إبراهيم بن سعد، وأبو داود (2240) من طريق سلمة بن الفضل، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به. زاد إبراهيم بن سعد وسلمة بن الفضل: بعد ست سنين.وسيأتي برقم (7018) من طريق إبراهيم بن عبد الله السعدي عن يزيد بن هارون، وزاد: بعد سنتين. وبرقم (5109) من طريق يونس بن بُكير، وبرقم (6839) من طريق أحمد بن خالد الوهبي، كلاهما عن محمد بن إسحاق. زاد يونس وحده بعد ست سنين.ويشهد له عدة مراسيل صحيحة عن قتادة والشعبي وعمرو بن دينار، انظرها في "سنن أبي داود" بتحقيقنا.ويُخالف هذا الحديث حديث عبد الله بن عمرو بن العاص عند أحمد 11/ (6938)، وابن ماجه (2010)، والترمذي (1142) - وسيأتي عند المصنف برقم (6840) -: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم ردَّ زينب بمهر جديد ونكاح جديد. وفي إسناده الحجاج بن أرطاة، وهو مدلِّس، وقد دلَّس فيه ذكرَ محمد بن عبيد الله العرزمي، وهذا متروك، ولهذا ضعّف الإمام أحمد هذا الحديث بإثره، ورجَّح يزيدُ بن هارون والبخاريُّ حديثَ ابن عباس عليه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2848)


2848 - أخبرني أبو أحمد بكر بن محمد بن حمدان الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل، حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا يحيى بن أيوب، حدثني ابن الهادِ، حدثني عُمر بن عبد الله بن عُرْوة بن الزُّبَير، عن عُرْوة بن الزُّبَير، عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لما قدم المدينةَ خرجت ابنتُه زينبُ من مكة مع كِنانةَ - أو ابن كنانة - فخرجوا في أَثَرها، فأدركها هَبّار بن الأسود، فلم يَزَلْ يَطعُن بعيرَها برُمْحِه حتى صَرَعَها، والقَتْ ما في بطنها، وأُهريقتْ دمًا، فاشتَجَر فيها بنو هاشم وبنو أُميّة، فقالت بنو أُمية: نحن أحقُّ بها، وكانت تحت ابن عمّهم أبي العاص، فكانت عند هند بنت عُتْبة بن رَبيعة، فكانت تقول لها هند: هذا بسبب أبيك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لزيد بن حارثة: "ألا تنطلقُ تَجيئُني بزينبَ؟ " قال: بلى يا رسول الله، قال: "فخُذْ خاتمي" فأعطاهُ إياهُ، فانطلق زيد وترك بعيرَه، فلم يزَلْ يَتلطّف حتى لقيَ راعيًا، فقال: لمن تَرعَى؟ فقال: لأبي العاص، قال: فلِمن هذه الأغنامُ؟ قال: لزينب بنت محمد، فسارَ معه شيئًا، ثم قال له: هل لك أن أُعطيَك شيئًا تُعطِيه إياها ولا تَذكرُه لأحدٍ؟ قال: نعم، فأعطاهُ الخاتم، فانطلق الراعي فأدخل غنمَه، وأعطاها الخاتمَ، فعرفَتْه، فقالت: من أعطاك هذا الخاتم؟ قال: رجلٌ، قالت: فأين تركتَه؟ قال: بمكانِ كذا وكذا، قال: فسكَتَت، حتى إذا كان الليلُ خرجت إليه، فلما جاءته، قال لها: اركَبي، بين يديه على بعيره، قالت: لا، ولكن اركَبْ أنت بين يديّ، فركب وركبَتْ وراءَه، حتى أتَت. فكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "هي أفضلُ بناتي؛ أُصيبَت فيَّ".فبلغ ذلك عليَّ بن الحسين، فانطلق إلى عُرْوة، فقال: ما حديثٌ بَلَغَني عنك تُحدّثُه تَنتقِصُ فيه حقَّ فاطمة؟ فقال عُرْوة: والله ما أُحب أنَّ لي ما بين المشرق والمغرب وإني أَنتقِصُ فاطمةَ حقًّا هو لها، وأما بعدُ فلَكَ أن لا أُحدِّثَ به أبدًا. قال عُرْوة: وإنما كان هذا قبل نزول الآية: {ادْعُوهُمْ لِآبَائِهِمْ هُوَ أَقْسَطُ عِنْدَ اللَّهِ} [الأحزاب: 5] [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মদিনায় আগমন করলেন, তখন তাঁর কন্যা যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কিনানাহ (বা ইবনু কিনানাহ)-এর সাথে মক্কা থেকে রওনা হন। লোকেরা তাদের পিছু নেয়। হাব্বার ইবনুল আসওয়াদ তাঁকে ধরে ফেলে এবং তার উটকে বর্শা দিয়ে আঘাত করতে থাকে যতক্ষণ না উটটি তাঁকে ফেলে দেয়। ফলে তাঁর গর্ভপাত হয় এবং রক্তক্ষরণ হতে থাকে। এ নিয়ে বনু হাশিম ও বনু উমাইয়াদের মধ্যে ঝগড়া হয়। বনু উমাইয়া বলল: আমরাই তার (যায়নাবের) অধিক হকদার, কেননা সে তাদের চাচাতো ভাই আবূল আস-এর বিবাহে ছিল। যায়নাব হিন্দা বিনতু উতবা ইবনু রাবী‘আর কাছে ছিলেন। হিন্দা তাকে বলতেন: এটা তোমার বাবার কারণেই হয়েছে।

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি কি গিয়ে যায়নাবকে আমার কাছে নিয়ে আসবে না?" তিনি বললেন: হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি বললেন: "তাহলে আমার আংটিটি নাও।" অতঃপর তিনি আংটিটি তাকে দিলেন। যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রওনা হলেন এবং তার উট রেখে দিলেন। তিনি কৌশলে ঘুরতে ঘুরতে এক রাখালের দেখা পেলেন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: তুমি কার ছাগল চরাও? সে বলল: আবূল আসের। তিনি বললেন: আর এই ছাগলগুলো কার? সে বলল: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মেয়ে যায়নাবের। তিনি তার সাথে কিছুক্ষণ পথ চললেন। তারপর তাকে বললেন: আমি যদি তোমাকে কিছু দেই, যা তুমি তাকে দেবে এবং এ সম্পর্কে কাউকে কিছু বলবে না, তাহলে কি তুমি রাজি আছো? সে বলল: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি তাকে আংটিটি দিলেন। রাখালটি চলে গেল এবং তার ছাগলগুলো ভেতরে ঢুকিয়ে যায়নাবকে আংটিটি দিল। তিনি তা চিনতে পারলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: এই আংটি তোমাকে কে দিয়েছে? সে বলল: এক লোক। তিনি বললেন: তাকে কোথায় রেখে এসেছো? সে বলল: অমুক অমুক জায়গায়। অতঃপর তিনি চুপ করে গেলেন।

যখন রাত হলো, তিনি তার (যায়দের) কাছে বেরিয়ে এলেন। যখন তিনি তার কাছে এলেন, যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: উটের সামনে আমার সাথে আরোহণ করুন। তিনি বললেন: না, বরং আপনি আমার সামনে আরোহণ করুন। তখন তিনি আরোহণ করলেন এবং যায়নাব তাঁর পেছনে আরোহণ করলেন, অবশেষে তিনি মদিনায় পৌঁছালেন।

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলতেন: "সে (যায়নাব) আমার কন্যাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ; সে আমার (দ্বীনের) কারণে আঘাতপ্রাপ্ত হয়েছে।"

এ কথা আলী ইবনু হুসাইন (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট পৌঁছালে তিনি উরওয়ার কাছে গেলেন এবং বললেন: আমার কাছে আপনার এমন এক হাদীস পৌঁছেছে, যা আপনি বর্ণনা করেন, যার মাধ্যমে আপনি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অধিকার খর্ব করছেন? উরওয়া বললেন: আল্লাহর কসম! আমার কাছে যদি পূর্ব ও পশ্চিমের মধ্যবর্তী সবকিছুও থাকে, তবুও আমি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রাপ্য অধিকার খর্ব করতে পছন্দ করি না। আর এখন থেকে আমি আর কখনোই এই হাদীস বর্ণনা করব না।

উরওয়া (ব্যাখ্যা করে) বললেন: এই ঘটনাটি সংঘটিত হয়েছিল আয়াত নাযিল হওয়ার আগে: "তোমরা তাদেরকে তাদের পিতাদের নামে ডাকো; এটিই আল্লাহর কাছে অধিক ন্যায়সঙ্গত।" [সূরা আল-আহযাব: ৫]।

এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তাঁরা এটি সংকলন করেননি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن إن شاء الله من أجل يحيى بن أيوب - وهو الغافقي المصري - ففيه كلام كما قال الذهبي، واستنكره عند الموضع الآتي برقم (7007)، وقد انفرد به، وصحَّحه الحافظ ابن حجر في "مختصر زوائد البزار" (2009). ابن الهاد: هو يزيد بن عبد الله ابن أسامة بن الهاد، مشهور بالنسبة لجد أبيه.وأخرجه المصنّف في مقدمة "فضائل فاطمة الزهراء" ص 32، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 3/ 147 عن أبي الحسين عُبيد الله بن محمد البلخي التاجر، عن محمد بن إسماعيل السُّلَمي، بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 251، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2975)، والبزار (93)، والدُّولابي في "الذرية الطاهرة" (53)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (142)، والطبراني في "الكبير" 22/ (1051)، وابن مَنْده في "معرفة الصحابة" 1/ 927، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (7348)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 156، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 3/ 146 من طرق عن سعيد بن أبي مريم، به.وسيأتي برقم (7007) من طريق أبي الأحوص محمد بن الهيثم عن سعيد بن أبي مريم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2849)


2849 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن كامل بن خَلَف القاضي، حدثنا أحمد بن الوليد الفحّام، حدثنا الحسين بن محمد المَرْوَرُّوذِي، حدثنا جرير بن حازم، عن أيوب، عن عِكرمة، عن ابن عباس، قال: لما قَذَفَ هلالُ بن أُميّة امرأتَه قيل له: والله ليجلدنَّكَ رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمانين جلدةً، قال: الله أعدَلُ من ذلك أن يضربَني ثمانين ضربةً، وقد عَلِم أني رأيتُ حتى استيقَنْتُ، وسمعتُ حتى استثْبَتُّ، لا والله لا يضربُني أبدًا. فنزلت آية المُلاعَنة، فدعا بهما رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حين نزلتِ الآيةُ، فقال: "الله يعلمُ أنَّ أحدَكما كاذِبٌ، فهل منكما تائبٌ"، فقال هلالٌ: والله إني لَصادِقٌ، فقال: "احلِفْ بالله الذي لا إله إلَّا هو إني لَصادقٌ، تقول ذلك أربعَ مرات، فإن كنتُ كاذبًا فعليَّ لعنةُ الله"، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قِفُوه عند الخامسة، فإنها مُوجِبةٌ"، فحلفتُ، ثم قالت أربعًا: والله الذي لا إله إلا هو إنه لمن الكاذِبِين، فإن كان صادقًا فعليها غضبُ الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قِفُوها عند الخامسة، فإنها مُوجِبةٌ"، فردَّدَتْ وهَمَّتْ بالاعترافِ، ثم قالت: لا أفضحُ قومي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إن جاءت به أكحَلَ أَدعَجَ سابِغَ الأَلْيَتَين، ألَفَّ الفخذين، خَدَلَّجَ الساقَين، فهو للذي رُميَتْ به، وإن جاءت به أصفَرَ قَضِيفًا سَبِطًا، فهو لهلالِ بن أُمية" فجاءت به على الصِّفة البَغيّ.قال أيوب: وقال محمد بن سيرين: كان الرجلُ الذي قذَفَها به هلالُ بن أمية شَريكَ بن سَحْماء، وكان أخا البراء بن مالك أخي أنس بن مالك لأُمّه، وكانت أمُّه سوداءَ، وكان شَريك يأوي إلى منزل هلالٍ ويكون عنده [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجه بهذه السِّياقة، إنما أخرج حديث هشام بن حسّان، عن عِكْرمة مختصرًا [2].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: যখন হিলাল ইবনু উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর স্ত্রীর প্রতি অপবাদ দিলেন, তখন তাকে বলা হলো: আল্লাহর শপথ! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম অবশ্যই আপনাকে আশিটি বেত্রাঘাত করবেন। তিনি বললেন: আল্লাহ এর চেয়েও বেশি ন্যায়পরায়ণ যে, তিনি আমাকে আশিটি আঘাত করবেন, অথচ তিনি জানেন যে, আমি দেখে নিশ্চিত হয়েছি এবং শুনে তা সুদৃঢ়ভাবে গ্রহণ করেছি। আল্লাহর শপথ! তিনি কখনোই আমাকে আঘাত করবেন না। অতঃপর মুলাআনার (শপথের মাধ্যমে মিথ্যা অপবাদ থেকে মুক্তির) আয়াত নাযিল হলো।

আয়াত নাযিল হওয়ার পর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের উভয়কে ডাকলেন এবং বললেন: "আল্লাহ জানেন যে, তোমাদের দু'জনের মধ্যে একজন মিথ্যাবাদী। তোমাদের কেউ কি তাওবা করবে?"

হিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর শপথ, আমি অবশ্যই সত্যবাদী। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আল্লাহর নামে শপথ করো, যিনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, আমি অবশ্যই সত্যবাদী—এ কথা তুমি চারবার বলবে। যদি আমি মিথ্যাবাদী হই, তবে আমার উপর আল্লাহর লা'নত (অভিসম্পাত) বর্ষিত হোক।"

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "পঞ্চম বারের সময় তাকে থামাও, কারণ তা (লা'নত) অবশ্যম্ভাবী করে দেয়।" অতঃপর তিনি (হিলাল) শপথ করলেন।

এরপর মহিলাটি চারবার বললেন: আল্লাহর শপথ, যিনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, সে (হিলাল) অবশ্যই মিথ্যাবাদীদের অন্তর্ভুক্ত। যদি সে সত্যবাদী হয়, তবে তার (মহিলাটির) উপর আল্লাহর ক্রোধ (গজব) বর্ষিত হোক।

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "পঞ্চম বারের সময় তাকে থামাও, কারণ তা (গজব) অবশ্যম্ভাবী করে দেয়।" সে পুনরায় এই কথা বলার সময় দ্বিধান্বিত হয়ে স্বীকারোক্তি দিতে চেয়েছিল, কিন্তু পরে বলল: আমি আমার গোত্রের লোকদেরকে অপমানিত করব না।

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যদি সে এমন সন্তান জন্ম দেয়, যার চোখ সুর্মা-মাখা, টানা টানা (বড়) ও নিতম্ব পুরু ও ভারি, উরুদ্বয় পেশিবহুল এবং গোছা পুরু ও মোটা হয়, তবে সে সন্তানটি হবে ওই ব্যক্তির, যার দ্বারা তাকে অপবাদ দেওয়া হয়েছিল। আর যদি সে এমন সন্তান জন্ম দেয়, যার রং হলুদ, শরীর হালকা-পাতলা ও চুল সোজা হয়, তবে সে সন্তানটি হবে হিলাল ইবনু উমাইয়ার।"

অতঃপর সে অপবাদপ্রাপ্ত ব্যক্তির বৈশিষ্ট্যের মতোই সন্তান প্রসব করলো।

আইয়ূব বলেন, মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন বলেছেন: যে ব্যক্তির মাধ্যমে হিলাল ইবনু উমাইয়া (তাঁর স্ত্রীকে) অপবাদ দিয়েছিলেন, সে ছিল শারীক ইবনু সাহমা। সে ছিল আনাস ইবনু মালিকের আপন ভাই বারা ইবনু মালিকের বৈমাত্রেয় ভাই। তার মা ছিলেন কালো। শারীক হিলালের বাড়িতে আশ্রয় নিত এবং তার কাছে থাকতো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وقد اختلف فيه على أيوب - وهو السختياني - في وصله وإرساله:فأخرجه عنه موصولًا بذكر ابن عباس جريرُ بن حازم كما عند المصنف هنا - وعنه البيهقي 7/ 395 - وأحمد 4/ (2468)، والطبري في "تفسيره" 18/ 82 - 83، وحمادُ بن زيد عند النسائي (8169). وروايتا أحمد والنسائي مختصرتان.وأخرجه عنه عن عكرمة مرسلًا معمرٌ عند عبد الرزاق (12444)، وإسماعيلُ ابن علية عند الطبري 18/ 81.وأخرجه بنحوه أحمد 4/ (2131)، وأبو داود (2256) من طريق عباد بن منصور، عن عكرمة، به. وفي أوله قصة سعد بن عبادة في شدة غيرته، وفي آخره قول النبي صلى الله عليه وسلم لما جاءت به على صفة شريك بن سحماء: "لولا الأيمان لكان لي ولها شأن".وقد روى القاسم بن محمد بن أبي بكر الصّدّيق عن ابن عباس أنَّ الذي لاعن امرأته هو رجل من بني العجلان، أخرجه أحمد 5/ (3106) و (3360) و (3449)، والبخاري (5310) و (5316)، ومسلم (1497)، وابن ماجه (2560)، والنسائي (5635) و (7295) و (7296). وهلال بن أمية من بني واقف، فهما قصتان لرجلين، قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 14/ 12: لا مانع أن تتعدد القصص ويتحد النزول.وسيأتي مختصرًا برقم (8310) من طريق هشام بن حسان عن عكرمة عن ابن عباس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لهلال أول ما قذف امرأته: "البيّنة أو حدٌّ في ظهرك". هكذا ذكره مختصرًا، وأصله مطوّل بنحو رواية المصنف هنا، وجزم في روايته المطولة بأنَّ الذي رُمِيَت المرأةُ به شريك بن سحماء.وفي الباب عن أنس عند مسلم (1496).الأكحل: هو أسود أجفان العين.والأدعج: هو شديد سواد سواد العين.وسابغ الأليتين: عظيمُهما تامُّهما، من سبوغ الثوب والنعمة.وألفُّ الفخذين: هو تدانيهما من السِّمَن وهو عيب في الرجل مدح في المرأة.وخَدلَّج الساقين: عظيمهما ممتلئهما.والقَضيف: الدقيق العظم القليل اللحم.والسَّبِط، بسكون الباء الموحدة وكسرها: هو الممتدُّ الأعضاء تام الخَلْق.



[2] سيأتي تخريج طريق هشام بن حسان عند الرواية الآتية برقم (8310).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2850)


2850 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا الرَّبيع بن سليمان، أخبرنا الشافعي، أخبرنا عبد العزيز بن محمد، عن يزيد بن الهَادِ، عن عبد الله بن يونس، أنه سمع المقبُري يحدِّث قال: حدثني أبو هريرة، أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول لما نزلت آية المُلَاعنة، قال النبي صلى الله عليه وسلم: "أيُّما امرأةٍ أدخَلَت على قومٍ مَن ليس منهم، فليست مِن الله في شيءٍ، ولن يُدخلَها اللهُ جنتَه، وأيُّما رجلٍ جَحَد ولدَه وهو ينظُر إليه، احتجَبَ اللهُ منه وفَضَحَه على رؤوس الخلائق مِن الأولين والآخِرين" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মুলাআ'নাহ (পরস্পর অভিসম্পাত) সম্পর্কিত আয়াত নাযিল হওয়ার সময় বলতে শুনেছেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে নারী এমন কাউকে কোনো গোত্রের মধ্যে অন্তর্ভুক্ত করে, যে তাদের অন্তর্ভুক্ত নয়, সে আল্লাহর কোনো কিছুর সাথেই সম্পর্কযুক্ত নয় এবং আল্লাহ তাকে কখনো জান্নাতে প্রবেশ করাবেন না। আর যে ব্যক্তি তার সন্তানের দিকে তাকিয়ে থাকা সত্ত্বেও তাকে অস্বীকার করে, আল্লাহ তার থেকে নিজেকে আড়াল করে নিবেন এবং প্রথম ও শেষ সকল সৃষ্টির সামনে তাকে অপমানিত ও লাঞ্ছিত করবেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة عبد الله بن يونس، فلا يُعرف إلّا في هذا الحديث كما قال ابن أبي حاتم والدارقطني وابن القطان. يزيد بن الهاد: هو ابن عبد الله بن أسامة بن الهاد، والمقبري: هو سعيد بن أبي سعيد كيسان.وأخرجه أبو داود (2264)، وابن حبان (4108) من طريق عمرو بن الحارث والنسائي (5645) من طريق الليث بن سعد، كلاهما عن ابن الهاد، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (2743) من طريق موسى بن عبيدة، عن يحيى بن حرب، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة. وموسى بن عُبيدة ضعيف، ويحيى بن حرب مجهول.ويشهد لشطره الأول مرسل القاسم بن محمد بن أبي بكر الصديق عند ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 406، بلفظ: "اشتد غضبُ الله على امرأة أدخلت على قوم من ليس منهم، فأكل حرائبهم واطّلع على عوراتهم"، ورجاله لا بأس بهم. والحرائب: جمع حَرِيبة، وهو مالُ الرجل الذي يعيشُ به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2851)


2851 - أخبرنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، أخبرنا يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن إسحاق، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن سليمان بن يَسَار، عن سلمة بن صَخْر الأنصاري، قال: كنتُ امرَأً قد أُوتِيتُ من جِماع النساء ما لم يُؤتَ غَيري، فلما دخلَ رمضانُ ظاهرتُ من امرأتي مخافةَ أن أُصيبَ منها شيئًا في بعض الليل، وأتتَابَعَ [1] من ذلك، ولا أستطيع أن أَنزِعَ حتى يُدركَني الصبحُ، فبينا هي ذاتَ ليلة تَخدُمني إذ انكشفَ لي منها شيءٌ، فوَثَبتُ عليها، فلما أصبحتُ، غدَوتُ على قومي فأخبرتهم خَبَري، فقلتُ: انطلقوا معي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالوا: لا والله لا نذهبُ معك، نَخافُ أن يَنزِلَ فينا قرآنٌ ويقولَ فينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مَقالةً يبقى علينا عارُها، فاذهب أنت فاصنَعْ ما بَدَا لك، فأتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فأخبرتُه خَبَري، فقال: "أنت ذاكَ؟ " فقلتُ: أنا ذاك، فاقضِ فِيَّ حكمَ الله، فإني صابِرٌ مُحتَسِبٌ، قال: "اعتِقْ رقَبةً"، فضربتُ صفحةَ عُنقِ رقَبتي بيدي، فقلت: والذي بعثكَ بالحقّ، ما أصبحتُ أملِكُ غيرَها، قال: "صُمْ شَهرَين متتابِعَين" فقلتُ: يا رسول الله، وهل أصابني ما أصابني إلّا في الصيام؟ قال: "فأطعِمْ ستين مِسكينًا" قلتُ: يا رسول الله، والذي بعثكَ بالحقّ، لقد بِتْنا ليلتَنا هذه وَحْشًا ما نجدُ عشاءً، قال: "انطلِقْ إلى صاحب الصدقة صدقةِ بني زُرَيق، فليدفَعْها لك، فأطعِمْ منها وَسْقًا ستين مسكينًا، واستعِنْ بسائرها على عيالِك"، فأتيتُ قومي، فقلت: وجدتُ عندكم الضّيقَ [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شاهد من حديث يحيى بن أبي كثير عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، غير أنه قال: سلمان بن صخر:




সালমা ইবনু সাখর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এমন একজন পুরুষ ছিলাম, যাকে নারীদের সাথে সহবাসের ক্ষেত্রে এমন ক্ষমতা দেওয়া হয়েছিল যা অন্য কাউকে দেওয়া হয়নি। যখন রমযান মাস এলো, তখন আমি আমার স্ত্রীর সাথে 'যিহার' করলাম (তাকে মায়ের পিঠের সাথে তুলনা করলাম), এই ভয়ে যে রাতের বেলা হয়তো আমি তার সাথে কোনো কাজে লিপ্ত হয়ে পড়ব, আর এতে আমি এমনভাবে লেগে যাবো যে ভোর না হওয়া পর্যন্ত নিজেকে বিরত রাখতে পারবো না। এক রাতে সে যখন আমাকে খেদমত করছিল, তখন তার কিছু অংশ আমার কাছে উন্মোচিত হলো। ফলে আমি তার ওপর ঝাঁপিয়ে পড়লাম (সহবাস করলাম)।

যখন সকাল হলো, আমি আমার গোত্রের লোকদের কাছে গেলাম এবং তাদেরকে আমার ঘটনাটি জানালাম। আমি বললাম: চলো, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে যাই। তারা বলল: আল্লাহর কসম! আমরা তোমার সাথে যাব না। আমরা ভয় পাই, আমাদের ব্যাপারে হয়তো কোনো আয়াত নাযিল হবে অথবা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এমন কোনো কথা বলবেন যার লজ্জা আমাদের উপর রয়ে যাবে। সুতরাং তুমি যাও এবং যা তোমার জন্য ভালো মনে হয়, তা করো।

তখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এসে আমার ঘটনা জানালাম। তিনি বললেন: "তুমি কি সেই লোক?" আমি বললাম: আমিই সেই লোক। সুতরাং আপনি আমার ব্যাপারে আল্লাহর বিধান অনুযায়ী ফায়সালা দিন। কারণ আমি ধৈর্যশীল এবং আল্লাহর কাছ থেকে পুরস্কার প্রত্যাশী। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি একজন গোলাম (দাস) আযাদ করো।" তখন আমি আমার হাতের দ্বারা আমার নিজের ঘাড়ের পাশে আঘাত করে বললাম: যিনি আপনাকে সত্য সহকারে প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমি তো সকালবেলা সে (আমার স্ত্রী) ছাড়া আর কারো মালিক ছিলাম না। তিনি বললেন: "তুমি পরপর দুই মাস সওম (রোযা) পালন করো।" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! রোযার কারণেই তো আমার এই দশা হয়েছে! তিনি বললেন: "তাহলে তুমি ষাটজন মিসকিনকে (দরিদ্রকে) খাদ্য প্রদান করো।" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! যিনি আপনাকে সত্য সহকারে প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমরা গত রাত অভুক্ত অবস্থায় কাটিয়েছি, রাতের খাবারও আমাদের কাছে ছিল না। তিনি বললেন: "তুমি বনু যুরাইকের সাদকার দায়িত্বে থাকা ব্যক্তির কাছে যাও। সে তোমাকে (সাদকার মাল) দেবে। তুমি তা থেকে এক ‘ওয়াসক্ব’ (নির্দিষ্ট পরিমাণ খাদ্য) ষাটজন মিসকিনকে খাওয়াও, আর অবশিষ্ট অংশ তোমার পরিবারের জন্য ব্যবহার করো।" এরপর আমি আমার গোত্রের কাছে ফিরে এসে বললাম: তোমাদের কাছে আমি সংকীর্ণতা পেলাম (তোমরা আমাকে সাহায্য করতে রাজি হওনি, কিন্তু রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উদারতা পেলাম)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هو بالياء التحتانية، كما أُعجمت في (ز)، والتتابع: الوقوع في الشر من غير فكر ولا رَويّة، والمتابعة عليه، ولا يكون في الخير.



[2] صحيح بطرقه وشاهده، وهذا إسناد ضعيف لعنعنة محمد بن إسحاق، وجزم البخاري - فيما نقله عنه الترمذي - بأنَّ سليمان بن يسار لم يدرك سلمة بن صخر، ومع ذلك فقد حسّن الحديثَ من هذه الطريق الترمذيُّ وصحّحه ابن خُزيمة (2378)، وحسَّن إسنادَه الحافظُ ابن حجر في "الفتح" 16/ 198.وأخرجه أحمد 26/ (16421)، والترمذي (3299) من طريق يزيد بن هارون بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن.وأخرجه أحمد 39/ (23700)، وأبو داود (2213) من طريق عبد الله بن إدريس، وابن ماجه (2062) من طريق عبد الله بن نمير، كلاهما عن محمد بن إسحاق، به.ورواه بُكير بن الأشج عن سليمان بن يسار: أنَّ رجلًا من بني زُريق يقال له: سلمة بن صخر، كان أُوتي حَظًّا من الجماع، فذكره. أخرجه من طريقه القاضي إسماعيل الجهضمي في "أحكام القرآن" (277)، والطحاوي في "أحكام القرآن" (1963)، فهذا مرسل، وإسناده أقوى من إسناد ابن إسحاق، ورجاله أثبت، لكن يشهد له حديث ابن عباس الآتي بعده، ويشدُّه المراسيلُ الأخرى الآتي ذكرها للقصة نفسها، والله أعلم.وقد روى حديثَ سلمة بن صخر هذا أيضًا سعيدُ بنُ المسيّب مرسلًا، أخرجه من طريقه القاضي إسماعيل الجهضمي في "أحكام القرآن" (278)، والطحاوي في "أحكام القرآن" (1960)، وعبد الغني بن سعيد في "الغوامض والمبهمات" (38). ورجاله ثقات.وسيأتي بعده من طريق أبي سلمة بن عبد الرحمن ومحمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، مرسلًا أيضًا.وأخرج ابن ماجه (2064)، والترمذي (1198) من طريق عبد الله بن إدريس، عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد عن النبي صلى الله عليه وسلم في المظاهر يُواقِع قبل أن يكفّر، قال: "كفارة واحدة". وحَسَّنه الترمذي.قوله: "وَحْشًا" أي: جائعِين لا طعام لنا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2852)


2852 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا هشام بن علي، حدثنا عبد الله بن رجاء، حدثنا حرب بن شَدّاد، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، ومحمد بن عبد الرحمن بن ثوبان: أنَّ سلمان بن صَخْر الأنصاري جعل امرأتَه عليه كظَهْر أمّه، ثم ذكر الحديث بنحوه منه [1].هذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




সালমান ইবনে সখর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর স্ত্রীকে নিজের জন্য মায়ের পিঠের মতো (অর্থাৎ যিহার) করে নিয়েছিলেন। অতঃপর অনুরূপভাবে হাদীসটি বর্ণনা করা হয়েছে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح بطرقه وشاهده الآتي بعده.وأخرجه الترمذي (1200) من طريق علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، به. وقال: حديث حسن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2853)


2853 - أخبرنا أبو أحمد بكر بن محمد الصَّيرفي بمَرْو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل البَلْخي، حدثنا حفص بن عمر العَدَني، حدثنا الحَكَم بن أبان، عن عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ رجلًا أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، وقد ظاهَرَ من امرأته فوقَعَ عليها، فقال: يا رسول الله، إني ظاهَرتُ من امرأتي فوقعتُ عليها مِن قبلِ أن أُكفِّر، قال: "وما حَمَلَك على ذلك يَرحمُك اللهُ؟ "، قال: رأيتُ خَلْخالَها في ضَوْء القمر، قال: "فلا تَقْربُها حتى تفعلَ ما أَمر الله" [1].شاهدُه حديث إسماعيل بن مسلم عن عمرو بن دينار، ولم يحتجَّ الشيخان بإسماعيل ولا بالحَكَم بن أبان إلّا أنَّ الحكم بن أبان صَدُوق.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট আসলো, যে তার স্ত্রীর সাথে জিহার করার পর সহবাস করে ফেলেছিল। সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি আমার স্ত্রীর সাথে জিহার করার পর কাফফারা আদায়ের পূর্বেই তার সাথে সহবাস করে ফেলেছি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ্‌ তোমাকে রহম করুন! কিসে তোমাকে এমনটি করতে বাধ্য করলো? সে বলল: আমি চাঁদের আলোয় তার গোড়ালির নূপুর দেখতে পেলাম। তিনি বললেন: তুমি তার কাছেও যাবে না, যতক্ষণ না আল্লাহ যা আদেশ করেছেন তা করো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح بطرقه وشاهده، وهذا إسناد ضعيف لضعف حفص بن عمر العَدَني كما قال الذهبي في "تلخيصه"، لكنه قد توبع، وقد اختُلف في وصل هذا الحديث وإرساله، وقد صحَّح وصله الترمذي وابن الجارود وابن حزم والضياء وغيرهم، وحسَّنه الحافظ في "الفتح" 16/ 198، ورجح أبو حاتم والنسائي إرسالَه، لكن يشهد له حديث سلمة بن صخر الذي قبله، والله أعلم.وأخرجه أبو داود (2225 م)، والترمذي (1199)، والنسائي (5622) من طريق معمر بن راشد، عن الحكم بن أبان، به.وذكر البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 386 أنَّ سعيد بن كليب قاضي عدن رواه بنحوه عن الحكم بن أبان.وكذلك رواه موصولًا مسلم بن خالد الزنجي عند الطحاوي في "أحكام القرآن" (1959)، وحميد بن حماد بن خوار عن ابن جُرَيج عند الطبراني في "الكبير" (11599)، والوليد بن مسلم عن ابن جُرَيج كما في "علل ابن أبي حاتم" (1307)، كلاهما (مسلم بن خالد وابن جُرَيج) عن الحكم بن أبان، به. وهذه الطرق جميعًا فيها مقال، لكنها تصلح للاعتبار.وخالفهم إسماعيلُ ابن عُلَيَّة عند أبي داود (2223)، وسفيان بن عيينة عند أبي داود أيضًا (2221) و (2222)، ومعتمر بن سليمان عند أبي داود (2225)، والنسائي (5624)، ثلاثتهم عن الحكم بن أبان، عن عكرمة مرسلًا.وأخرجه أبو داود (2224) من طريق خالد الحذاء، عن مُحدِّثٍ، عن عكرمة مرسَلًا.لكن رواه موصولًا كذلك إسماعيل بن مسلم المكي، عن عمرو بن دينار، عن طاووس، عن ابن عباس، في الطريق التالية، وإسماعيل وإن كان ضعيفًا يكتب حديثه للاعتبار.ويشهد له حديث سلمة بن صخر الذي قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2854)


2854 - حدثنا أبو الوليد الفقيه، حدثنا الحسن بن سفيان، حدثنا عمار بن خالد ومحمد بن معاوية، قالا: حدثنا علي بن هاشم حدثنا إسماعيل بن مسلم، عن عمرو بن دينار، عن طاووس، عن ابن عباس: أنَّ رجلًا ظاهَرَ من امرأته، فرأى خَلْخالَها في ضَوْء القمر، فأعجبَه فوَقَع عليها، فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فذكر ذلك له، فقال: "قال الله عز وجل: {مِنْ قَبْلِ أَنْ يَتَمَاسَّا} [المجادلة: 3] "، فقال: قد كان ذلك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أمسِكْ حتى تُكفِّرَ" [1].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তার স্ত্রীর সাথে জিহার (মাতৃতুল্যা ঘোষণা) করেছিল। এরপর সে চাঁদের আলোয় তার স্ত্রীর পায়ের নূপুর দেখল, যা তাকে মুগ্ধ করল এবং সে তার সাথে সহবাসে লিপ্ত হলো। অতঃপর সে নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বিষয়টি উল্লেখ করল। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল বলেছেন: {তোমরা একে অপরের স্পর্শ করার পূর্বে} (সূরা মুজাদালাহ: ৩)।" লোকটি বলল: হ্যাঁ, এটি তো ঘটে গেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি বিরত থাকো, যতক্ষণ না তুমি কাফফারা আদায় করো।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح بطرقه وشاهده كسابقه، وهذا إسناد ضعيف لضعف إسماعيل بن مسلم - وهو المكي - فهو ضعيف كما أشار إليه الذهبي في "تلخيصه"، وقد تقدم قبله من طريق أخرى عن ابن عباس، لكنه اختُلف فيها في الوصل والإرسال كما بيَّنّاه هناك، والحكم بوصله بجملة طرقه غير مستبعد.وأخرجه البيهقي 7/ 386 من طريق إبراهيم بن إسحاق الصيني، عن علي بن هاشم، بهذا الإسناد.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" قسم مسند ابن عباس (773) عن عبد الله بن نمير، والدارقطني (3855) من طريق عبد الرحمن المحاربي، كلاهما عن إسماعيل بن مسلم، به. في "الأوسط" (8224) من طريق محمد بن المنهال، عن أبي بكر الحنفي، به. ووقع عند حرب وعند أبي يعلى في رواية "المسند الصغير" تصريح ابن أبي ذئب بتحديث عطاء له.وسيأتي برقم (3615) من طريق وكيع عن ابن أبي ذئب، عن عطاء. ولم يُصرِّح فيه ابن أبي ذئب بتحديث عطاء له، وقرن فيه بعطاءٍ محمدَ بنَ المنكدر، وحديث ابن المنكدر فيه اضطراب سيأتي بيانه في موضعه، وهو عند المصنف أيضًا برقم (3614) من رواية صدقة بن عبد الله -أحد الضعفاء - عن ابن المنكدر عن جابر.وأخرجه البزار في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (1714)، وابن المنذر في "الأوسط" (7708)، وأبو علي الحسن بن حبيب الحَصَائري في "جزئه" كما في "تغليق التعليق" لابن حجر 4/ 449 من طريق أيوب بن سويد، عن ابن أبي ذئب، به. ووقع عند الحصائري تصريح ابن أبي ذئب بتحديث عطاء له، لكن أيوب هذا ضعيف، كما قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 16/ 92، وقال: وفي كلٍّ من ذلك (يعني مما وقع فيه التصريح بالتحديث) نظر، والمحفوظ فيه العنعنة، ثم ذكر رواية الطيالسي والمرُّوذي.وأخرجه الطيالسي (1787)، وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (627) من طريق حسين بن محمد المرُّوذي، كلاهما (الطيالسي وحسين) عن ابن أبي ذئب، عن رجل، عن عطاء، به.ورواه ابن جُرَيج، عن عطاء، عن ابن عباس من قوله موقوفًا عليه، أخرجه من طريقه عبد الرزاق في "المصنف" (11448)، وابن أبي شيبة 5/ 16، وأحمد بن حنبل في "مسائل ابنه له" (1320)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 320، وفي "معرفة السنن والآثار" (14611). وقال الحافظ ابن حجر في "التغليق": هذا الإسناد أصح ما ورد فيه.وسيأتي من طريق عطاء عن ابن عباس مرفوعًا برقم (3612)، لكن ما هنا هو الصحيح، لأنَّ عكرمة رواه عن ابن عباس أيضًا في الطريق الآتية برقم (2857) موقوفًا عليه كذلك.وأحسن شيء في المرفوع حديثُ عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، الآتي بعده.وحديثُ عائشة الآتي عند المصنف برقم (3611)، ورجاله ثقات إلا أن فيه اضطرابًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2855)


2855 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سِنان القزّاز، حدثنا أبو بكر الحنفي، حدثنا ابن أبي ذئب، حدثنا عطاء، حدثني جابر، قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول: "لا طلاقَ لمن لم يَملِكْ، ولا عَتاقَ لمن لم يَملِكْ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وشاهدُه الحديث المشهور في الباب عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جدِّه:




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (জাবির) বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি (বিবাহের) মালিকানা লাভ করেনি, তার তালাক কার্যকর হবে না। আর যে ব্যক্তি (দাসের) মালিকানা লাভ করেনি, তার দাস মুক্তি কার্যকর হবে না।" এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তাঁরা এটি তাঁদের কিতাবে অন্তর্ভুক্ত করেননি। এই অনুচ্ছেদে আমর ইবনু শুআইব তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে বর্ণিত মশহুর হাদীসটি এর সাক্ষী হিসেবে বিদ্যমান।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لاضطرابه وانقطاعه، وذكرُ صيغة التحديث فيه بين ابن أبي ذئب - وهو محمد بن عبد الرحمن بن المغيرة - وبين عطاء - وهو ابن أبي رباح - وهمٌ نظنُّه من أبي بكر الحنفي - وهو عبد الكبير بن عبد المجيد - فإن محمد بن سنان القزّاز - وإن كان فيه مقال - قد تابعه على ذكر التحديث فيه محمدُ بنُ منهال الضرير عن أبي بكر الحنفي عند حرب بن إسماعيل الكرماني في "مسائله" 1/ 377 وغيره، والصحيح أنَّ ابن أبي ذئب لم يسمعه من عطاء كما جزم به أبو زرعة وأبو حاتم الرازيان كما في "العلل" لابن أبي حاتم (1220)، والدليل على صحة قولهما أنَّ أبا داود الطيالسي وحسين بن محمد المرُّوذي - وهما ثقتان حافظان - قد روياه عن ابن أبي ذئب عن رجل عن عطاء.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 319، وفي "الصغرى" (2646) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه حرب الكرماني في "مسائله" 1/ 377، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" وفي "مسنده الصغير" كما في "تغليق التعليق" للحافظ ابن حجر 4/ 448 ـ وعنه ابن عدي في "الكامل" 6/ 18 - والطبراني في "الأوسط" (8224) من طريق محمد بن المنهال، عن أبي بكر الحنفي، به. ووقع عند حرب وعند أبي يعلى في رواية "المسند الصغير" تصريح ابن أبي ذئب بتحديث عطاء له.وسيأتي برقم (3615) من طريق وكيع عن ابن أبي ذئب، عن عطاء. ولم يُصرِّح فيه ابن أبي ذئب بتحديث عطاء له، وقرن فيه بعطاءٍ محمدَ بنَ المنكدر، وحديث ابن المنكدر فيه اضطراب سيأتي بيانه في موضعه، وهو عند المصنف أيضًا برقم (3614) من رواية صدقة بن عبد الله -أحد الضعفاء - عن ابن المنكدر عن جابر.وأخرجه البزار في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (1714)، وابن المنذر في "الأوسط" (7708)، وأبو علي الحسن بن حبيب الحَصَائري في "جزئه" كما في "تغليق التعليق" لابن حجر 4/ 449 من طريق أيوب بن سويد، عن ابن أبي ذئب، به. ووقع عند الحصائري تصريح ابن أبي ذئب بتحديث عطاء له، لكن أيوب هذا ضعيف، كما قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 16/ 92، وقال: وفي كلٍّ من ذلك (يعني مما وقع فيه التصريح بالتحديث) نظر، والمحفوظ فيه العنعنة، ثم ذكر رواية الطيالسي والمرُّوذي.وأخرجه الطيالسي (1787)، وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (627) من طريق حسين بن محمد المرُّوذي، كلاهما (الطيالسي وحسين) عن ابن أبي ذئب، عن رجل، عن عطاء، به.ورواه ابن جُرَيج، عن عطاء، عن ابن عباس من قوله موقوفًا عليه، أخرجه من طريقه عبد الرزاق في "المصنف" (11448)، وابن أبي شيبة 5/ 16، وأحمد بن حنبل في "مسائل ابنه له" (1320)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 7/ 320، وفي "معرفة السنن والآثار" (14611). وقال الحافظ ابن حجر في "التغليق": هذا الإسناد أصح ما ورد فيه.وسيأتي من طريق عطاء عن ابن عباس مرفوعًا برقم (3612)، لكن ما هنا هو الصحيح، لأنَّ عكرمة رواه عن ابن عباس أيضًا في الطريق الآتية برقم (2857) موقوفًا عليه كذلك.وأحسن شيء في المرفوع حديثُ عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، الآتي بعده.وحديثُ عائشة الآتي عند المصنف برقم (3611)، ورجاله ثقات إلا أن فيه اضطرابًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2856)


2856 - حدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ العدل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا حسين المعلّم، عن عمرو بن شعيب. وحدثنا عليٌّ، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا عمرو بن عَون، حدثنا هُشَيم، حدثنا عامر الأحول، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا طلاقَ قبل نِكاح"، وفي حديث هُشَيم: "لا نَذْرَ لابن آدمَ فيما لا يَملِكُ، ولا طلاقَ فيما لا يَملِكُ، ولا عَتاقَ فيما لا يَملِك" [1].




আমর ইবনে শুআইব-এর দাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিবাহের পূর্বে কোনো তালাক নেই।" আর হুশাইমের হাদীসে (বর্ণনায়) রয়েছে: "আদম সন্তানের জন্য এমন বিষয়ে কোনো মানত নেই যা সে মালিকানাভুক্ত করে না, এমন বিষয়ে কোনো তালাক নেই যা সে মালিকানাভুক্ত করে না এবং এমন বিষয়ে কোনো গোলাম আজাদ করা নেই যা সে মালিকানাভুক্ত করে না।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن. حسين المعلم: هو ابن ذكوان، وعامر الأحول: هو ابن عبد الواحد، وهُشيم: هو ابن بَشير.وأخرجه أحمد 11/ (6780)، وابن ماجه (2047)، والترمذي (1181) من طريق هُشَيم بن بَشير، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح، وهو أحسن شيء روي في هذا الباب.وأخرجه أحمد (6932) من طريق محمد بن إسحاق، وأبو داود (2190) من طريق مطر الورّاق، كلاهما عن عمرو بن شعيب، به.وسيأتي برقم (8016) من طريق عبد الرحمن بن الحارث المخزومي عن عمرو بن شعيب.وأخرج منه قوله: "لا نذر فيما لا يملك" أحمدُ (6990)، وأبو داود (3274)، والنسائي (4715) من طريق عُبيد الله بن الأخنس، عن عمرو بن شعيب، به.ويشهد له حديث عائشة الآتي برقم (3611)، ورجاله ثقات. وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 2/ 139 عن أحمد بن عبد المؤمن المروَزي، عن علي بن الحسن بن شقيق، عن أبي حمزة السكري وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق (11553)، وسعيد بن منصور (1022)، وابن المنذر في "الأوسط" (7739)، والبيهقي 7/ 383 من طريق محمد بن عجلان، والبيهقي 7/ 320 من طريق قتادة، وحرب بن إسماعيل في "مسائله" 1/ 379 من طريق عاصم الأحول، ثلاثتهم عن عكرمة، عن ابن عباس. ولفظ ابن عجلان: أنَّ ابن عباس كان لا يرى الظِّهار قبل النكاح شيئًا، ولا الطلاقَ قبل النكاح شيئًا. ولفظ قتادة: عن ابن عباس أنه قال: إنما الطلاق من بعد النكاح، ولفظ عاصم: لا طلاق إلّا بعد نكاح، ولا عتق إلّا بعد ملك.وأخرجه عبد الرزاق (11449)، وابن أبي شيبة 5/ 16 من طريق عبد الأعلى بن عامر، وابن أبي شيبة 5/ 18، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 10/ 3142 من طريق آدم بن سليمان مولى خالد بن خالد بن عقبة، كلاهما عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس. ولفظ عبد الأعلى بنحو لفظ عاصم الأحول عن عكرمة، ولفظ آدم بنحو لفظ يزيد النحوي عن عكرمة دون ذكر ابن مسعود.وسيأتي برقم (3609) من طريق طاووس عن ابن عباس، بنحو لفظ يزيد النحوي عن عكرمة دون ذكر ابن مسعود أيضًا.وقد تقدم عند الطريق التي قبله تخريجه من طريق عطاء عن ابن عباس، ولفظه بنحو لفظ عاصم الأحول عن عكرمة.وسيأتي عن ابن عباس مرفوعًا برقم (3612) من طريق عطاء بن أبي رباح عنه، وهو وهمٌ، والصواب وقفه كما ورد في الطرق التي هنا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2857)


2857 - أخبرني أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرْو، حدثنا الفضل بن عبد الجبار، حدثنا علي بن الحَسَن [1] بن شَقيق، أخبرنا الحسين بن واقِد وأبو حمزة جميعًا، عن يزيد النَّحْويّ، عن عِكرمة، عن ابن عباس قال: ما قالها ابنُ مسعود، وإن يكن قالها فزَلَّةٌ من عالِم؛ في الرجل يقول: إن تزوّجتُ فلانةَ فهي طالِق، قال الله عز وجل: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نَكَحْتُمُ الْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ} [الأحزاب: 49]، ولم يقُل: إذا طَلّقتم المؤمناتِ ثم نَكحتُموهن [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটি বলেননি। যদি তিনি বলেও থাকেন, তবে তা একজন আলেমের ভুল (ত্রুটি)। এটি ঐ ব্যক্তির প্রসঙ্গে, যে বলে: 'যদি আমি অমুক মহিলাকে বিবাহ করি, তবে সে তালাকপ্রাপ্তা হবে।' আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "হে মুমিনগণ, যখন তোমরা মুমিন নারীদেরকে বিবাহ করবে, অতঃপর তাদেরকে স্পর্শ করার (সহবাসের) পূর্বেই তালাক দেবে..." (সূরা আহযাব: ৪৯)। আল্লাহ এটা বলেননি যে, "যখন তোমরা মুমিন নারীদেরকে তালাক দেবে, অতঃপর তাদেরকে বিবাহ করবে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) والمطبوع إلى: الحسين. وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 2/ 139 عن أحمد بن عبد المؤمن المروَزي، عن علي بن الحسن بن شقيق، عن أبي حمزة السكري وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق (11553)، وسعيد بن منصور (1022)، وابن المنذر في "الأوسط" (7739)، والبيهقي 7/ 383 من طريق محمد بن عجلان، والبيهقي 7/ 320 من طريق قتادة، وحرب بن إسماعيل في "مسائله" 1/ 379 من طريق عاصم الأحول، ثلاثتهم عن عكرمة، عن ابن عباس. ولفظ ابن عجلان: أنَّ ابن عباس كان لا يرى الظِّهار قبل النكاح شيئًا، ولا الطلاقَ قبل النكاح شيئًا. ولفظ قتادة: عن ابن عباس أنه قال: إنما الطلاق من بعد النكاح، ولفظ عاصم: لا طلاق إلّا بعد نكاح، ولا عتق إلّا بعد ملك.وأخرجه عبد الرزاق (11449)، وابن أبي شيبة 5/ 16 من طريق عبد الأعلى بن عامر، وابن أبي شيبة 5/ 18، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 10/ 3142 من طريق آدم بن سليمان مولى خالد بن خالد بن عقبة، كلاهما عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس. ولفظ عبد الأعلى بنحو لفظ عاصم الأحول عن عكرمة، ولفظ آدم بنحو لفظ يزيد النحوي عن عكرمة دون ذكر ابن مسعود.وسيأتي برقم (3609) من طريق طاووس عن ابن عباس، بنحو لفظ يزيد النحوي عن عكرمة دون ذكر ابن مسعود أيضًا.وقد تقدم عند الطريق التي قبله تخريجه من طريق عطاء عن ابن عباس، ولفظه بنحو لفظ عاصم الأحول عن عكرمة.وسيأتي عن ابن عباس مرفوعًا برقم (3612) من طريق عطاء بن أبي رباح عنه، وهو وهمٌ، والصواب وقفه كما ورد في الطرق التي هنا.



[2] إسناده صحيح. أبو حمزة: هو محمد بن ميمون السُّكّري، ويزيد النَّحْوي: هو ابن أبي سعيد.وأخرجه البيهقي في "الكبرى" 7/ 320، وفي "المعرفة" (14612) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 2/ 139 عن أحمد بن عبد المؤمن المروَزي، عن علي بن الحسن بن شقيق، عن أبي حمزة السكري وحده، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق (11553)، وسعيد بن منصور (1022)، وابن المنذر في "الأوسط" (7739)، والبيهقي 7/ 383 من طريق محمد بن عجلان، والبيهقي 7/ 320 من طريق قتادة، وحرب بن إسماعيل في "مسائله" 1/ 379 من طريق عاصم الأحول، ثلاثتهم عن عكرمة، عن ابن عباس. ولفظ ابن عجلان: أنَّ ابن عباس كان لا يرى الظِّهار قبل النكاح شيئًا، ولا الطلاقَ قبل النكاح شيئًا. ولفظ قتادة: عن ابن عباس أنه قال: إنما الطلاق من بعد النكاح، ولفظ عاصم: لا طلاق إلّا بعد نكاح، ولا عتق إلّا بعد ملك.وأخرجه عبد الرزاق (11449)، وابن أبي شيبة 5/ 16 من طريق عبد الأعلى بن عامر، وابن أبي شيبة 5/ 18، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 10/ 3142 من طريق آدم بن سليمان مولى خالد بن خالد بن عقبة، كلاهما عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس. ولفظ عبد الأعلى بنحو لفظ عاصم الأحول عن عكرمة، ولفظ آدم بنحو لفظ يزيد النحوي عن عكرمة دون ذكر ابن مسعود.وسيأتي برقم (3609) من طريق طاووس عن ابن عباس، بنحو لفظ يزيد النحوي عن عكرمة دون ذكر ابن مسعود أيضًا.وقد تقدم عند الطريق التي قبله تخريجه من طريق عطاء عن ابن عباس، ولفظه بنحو لفظ عاصم الأحول عن عكرمة.وسيأتي عن ابن عباس مرفوعًا برقم (3612) من طريق عطاء بن أبي رباح عنه، وهو وهمٌ، والصواب وقفه كما ورد في الطرق التي هنا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2858)


2858 - حدثنا أبو النضر محمد بن محمد بن يوسف الفقيه، حدثنا أبو بكر محمد بن سليمان الواسطي، حدثنا أبو عاصم، حدثنا ابن جُرَيج، عن مُظاهِر بن أسلم، عن القاسم، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "طَلاقُ الأَمَة تطليقتان وقُرْؤُها حَيضتانِ".قال أبو عاصم: فذكرتُه لِمُظاهر بن أسلم، فقلت: حدِّثْني كما حدثتَ ابنَ جُرَيج، فحدَّثَني مُظاهِر، عن القاسم، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "طَلاقُ الأَمَة تطليقتان، وقُرؤُها حَيضتان"، مثلَ ما حدّثَه [1]. مُظاهِر بن أسلم شيخٌ من أهل البصرة، لم يذكره أحدٌ من مُقَدَّمي مشايخنا بجَرْح، فإذًا الحديثُ صحيح، ولم يُخرجاه.وقد روي عن ابن عباس حديث يُعارضه:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দাসী নারীর তালাক হলো দু'বার এবং তার ইদ্দতকাল হলো দু'টি ঋতুস্রাব।"

আবূ আসিম বলেন: আমি মুযাহির ইবনু আসলামের কাছে এটি উল্লেখ করলাম এবং বললাম, তুমি যেমন ইবনু জুরাইজকে বর্ণনা করেছো, আমাকেও তেমন বর্ণনা করো। তখন মুযাহির, কাসিম থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করলেন, তিনি বললেন: "দাসী নারীর তালাক হলো দু'বার এবং তার ইদ্দতকাল হলো দু'টি ঋতুস্রাব।"—যা তিনি পূর্বে বর্ণনা করেছিলেন, তারই অনুরূপ। মুযাহির ইবনু আসলাম বসরা অঞ্চলের একজন শাইখ। আমাদের অগ্রবর্তী শাইখদের মধ্যে কেউ তাকে দুর্বলতা দ্বারা উল্লেখ করেননি। সুতরাং এই হাদীসটি সহীহ, কিন্তু তাঁরা (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও এমন হাদীস বর্ণিত আছে যা এর বিপরীত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف مُظاهِر بن أسلم، وقد وهم في هذا الحديث بذكر عائشة ورفعِه، والصحيح أنه من قول القاسم - وهو ابن محمد بن أبي بكر الصدّيق - كما جزم به البخاري في "التاريخ الأوسط" 3/ 559، والدارقطني في "العلل" (3885)، والبيهقي في "الكبرى" 7/ 426، بل قال القاسم في رواية عنه - عند الدارقطني والبيهقي - وسئل: أبلغك عن النبي صلى الله عليه وسلم في هذا؟ فقال: لا.أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد، وابن جُرَيج: هو عبد الملك بن عبد العزيز.وأخرجه أبو داود (2189)، وابن ماجه (2080)، والترمذي (1182) من طرق عن أبي عاصم، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث غريب، لا نعرفه مرفوعًا إلّا من حديث مُظاهر بن أسلم، ومُظاهر لا نعرف له في العلم غير هذا الحديث، والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم، وهو قول سفيان الثَّوري والشافعي وأحمد وإسحاق.وقد خالف مظاهرًا في إسناده زيدُ بن أسلم، فرواه عن القاسم بن محمد من قوله، غير أنه اختُلف عليه في لفظه، فرواه هشام بن سعد عن زيد بن أسلم عنه، فقال: طلاق الأمة اثنتان وعدّتها حيضتان.أخرجه الدارقطني (4005)، ومن طريقه البيهقي 7/ 370.وقيل عنه: عدة الأَمة حيضتان، لا يذكر طلاقها، أخرجه أبو بكر النيسابوري في "زياداته على مختصر المزني" (463)، وعنه الدارقطني (4006)، ومن طريقه البيهقي 7/ 370.ورواه أسامة بن زيد بن أسلم عن أبيه عنه، فقال: عدة الأمة حيضتان، وطلاق الحرِّ الأمةَ ثلاث، وطلاق العبدِ الحرةَ تطليقتان، وعدتها ثلاث حيض. أخرجه البخاري في "التاريخ الأوسط" 3/ 559، وأورده ابن عبد البر بتمامه في "التمهيد" 3/ 241 عن ابن وهب عن أسامة بن زيد.وقد صحَّ عن عمر بن الخطاب: أنَّ العبد يُطلّق تطليقتين وتعتد الأمة حيضتين. أخرجه عبد الرزاق (12872)، وسعيد بن منصور (1277) و (2186) وغيرهما.وصحَّ عن ابن عمر أنه كان يقول: إذا طلق العبد امرأته تطليقتين فقد حرمت عليه حتى تنكح زوجًا غيره حرةً كانت أو أمةً، وعدة الحرة ثلاث حيض، وعدة الأَمة حيضتان. أخرجه مالك في "الموطأ" 2/ 574 وغيره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2859)


2859 - أخبرَناه الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى بن سعيد، حدثنا علي بن المبارك، حدثني يحيى بن أبي كثير، أنَّ عُمر [1] بن مُعتِّب، أخبره، أنَّ أبا حسن مولى بني نَوفَل أخبره: أنه استفتَى ابنَ عباس في مملوك كانت تحتَه مملوكةٌ فطلّقَها تطليقتين، ثم أُعتقا بعد ذلك، هل يَصلُحُ له أن يَخطُبَها، قال: نعم، قَضَى بذلك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [2].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু হাসান বানু নাওফাল-এর আযাদকৃত গোলাম ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এমন এক গোলাম সম্পর্কে ফাতওয়া চাইলেন, যার অধীনে একজন দাসী স্ত্রী ছিল এবং সে তাকে দু’তালাক দিয়েছিল। এরপর তাদের উভয়কেই আযাদ (মুক্ত) করে দেওয়া হয়। এখন কি তার জন্য ঐ দাসীকে বিবাহের প্রস্তাব দেওয়া বৈধ হবে? তিনি বললেন: হ্যাঁ, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনই ফয়সালা দিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ع) و (ب): عَمرو، والمثبت من (ص) و"تلخيص الذهبي"، وهو المشهور في اسمه، وجاء في بعض المصادر تسميته بعمرو.



[2] إسناده ضعيف لضعف عمر بن معتِّب.وأخرجه أحمد 3/ (2031)، وأبو داود (2187)، والنسائي (5591) من طريق يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 5/ (3088)، وابن ماجه (2082)، والنسائي (5592) من طريق معمر بن راشد، عن يحيى بن أبي كثير، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (2860)


2860 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الأصبهاني، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن زيد، قال: قلت لأيوب: هل تعلمُ أحدًا قال بقول الحسن في "أمرُكِ بيدِكِ" أنه ثلاث؟ فقال: لا، إلّا شيء حدّثَنا به قَتَادة، عن كثيرٍ مولى عبد الرحمن بن سَمُرة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، بنحوه [1]. قال أيوب: فقدم علينا كثيرٌ فسألتُه، فقال: ما حدَّثْتُ بهذا قَطُّ، فذكرتُه لقَتَادة، فقال: بلى، ولكن قد نَسِيَ.هذا حديث غريب صحيح من حديث أيوب السَّختِياني، وقد ذكرتُ في باب النكاح بغير وليٍّ أساميَ جماعةٍ من ثقات المحدّثين من الصحابة والتابعين وأتباعِهم حدَّثوا بالحديث ثم نَسُوه [2].




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত একটি বর্ণনার আলোচনা প্রসঙ্গে (হাম্মাদ ইবনু যায়দ বলেন), আমি আইয়্যুব (আস-সাখতিয়ানী)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কি এমন কাউকে জানেন যিনি "তোমার কর্তৃত্ব তোমার হাতে" (অর্থাৎ তালাকের ক্ষমতা স্ত্রীকে অর্পণ করা) বিষয়ে আল-হাসানের (আল-বাসরী) মত পোষণ করেন যে এটি (একবার বললে) তিন তালাক হিসেবে গণ্য হবে? তিনি বললেন: না, তবে একটি বর্ণনা আছে যা আমাদের নিকট কাতাদাহ বর্ণনা করেছেন কাসীর (আব্দুর রহমান ইবনু সামুরাহ-এর গোলাম)-এর সূত্রে, তিনি আবু সালামার সূত্রে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এর অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। আইয়্যুব (আস-সাখতিয়ানী) বলেন: এরপর কাসীর আমাদের কাছে আসলেন। আমি তাকে (ঐ হাদীস সম্পর্কে) জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: আমি কখনও এটি বর্ণনা করিনি। তখন আমি কাতাদাহর নিকট তা উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন: হ্যাঁ, (সে বর্ণনা করেছে) কিন্তু সে ভুলে গেছে। (মুহাদ্দিস বলেন:) এই হাদীসটি আইয়্যুব আস-সাখতিয়ানির বর্ণনার দিক থেকে গারীব (বিরল) ও সহীহ। আমি ‘অভিভাবক ছাড়া বিয়ে’ শীর্ষক অধ্যায়ে সাহাবা, তাবিঈন ও তাদের অনুসারীদের মধ্য থেকে নির্ভরযোগ্য মুহাদ্দিসদের একটি দলের নাম উল্লেখ করেছি যারা হাদীস বর্ণনা করার পর ভুলে গিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات غير كثير مولى عبد الرحمن: وهو ابن أبي كثير البصري، روى عنه جمع، ووثقه العجلي، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد انفردَ بهذا الحديث، وقد أعلّه البخاري بالوقف فيما نقله عنه الترمذي في "الجامع"، وفي "العلل الكبير" (300)، إذ رواه البخاري عن سليمان بن حرب موقوفًا، وأعلَّه النسائي في "المجتبى" (3410) بالنكارة.وأخرجه أبو داود (2204) عن الحسن بن علي الخلّال، والترمذي (1178)، والنسائي (5573) عن علي بن نصر بن علي الجهضمي، كلاهما عن سليمان بن حرب، بهذا الإسناد، مرفوعًا.وأخرجه الترمذي بإثر (1178) عن محمد بن إسماعيل البخاري، عن سليمان بن حرب، به موقوفًا كما توضحه رواية "العلل الكبير" (300).



[2] كذا ذكر الحاكم! مع أنه لم يتعرض في الموضع الذي أشار إليه إلّا ذكر نسيان الزُّهْري أنه حدّث بحديث "لا نكاح إلّا بولي" بإثر الرواية (2743)، فلعله كان بسط القول فيه هناك، ثم رأى حذفه، وهذا أحد علوم الحديث التي صُنِّف فيها مصنفاتٌ مفردةٌ، وممّن صنف فيه الدارقطني والخطيب البغدادي، وسميا كتابيهما: "من حَدَّث ونسي".