হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3141)


3141 - أخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلَّاب، حدثنا هلال بن العلاء الرَّقِّي، حدثنا عبد الله بن جعفر، حدثنا عُبيد الله بن عمرو، عن زيد بن أبي أُنيسة، عن أبي إسحاق، عن زائدة بن عُمير قال: سألت ابنَ عبَّاس عن العَزْل، فقال: إنكم قد أكثرتُم، فإن كان قال فيه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم شيئًا، فهو كما قال، وإن لم يكن قال فيه شيئًا، فأنا أقول: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة:223]، فإن شئتم فاعزِلُوا، وإن شئتم فلا تَفعَلوا [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যায়িদাহ ইবনে উমায়র বলেন: আমি ইবনে আব্বাসকে ‘আযল’ (সহবাসে বীর্যপাত বাইরে করা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: তোমরা এ বিষয়ে অনেক বেশি প্রশ্ন করেছ। যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ বিষয়ে কিছু বলে থাকেন, তবে তা তেমনই, যেমন তিনি বলেছেন। আর যদি তিনি এ বিষয়ে কিছু না বলে থাকেন, তবে আমি বলছি: "তোমাদের স্ত্রীগণ তোমাদের জন্য শস্যক্ষেত্রস্বরূপ। সুতরাং তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা গমন করো।" (সূরাহ আল-বাক্বারাহ, ২২৩) সুতরাং তোমরা চাইলে আযল করতে পারো এবং চাইলে তা নাও করতে পারো।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (1171) عن أحمد بن عبد الرحمن بن عِقال، عن عبد الله بن جعفر، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه ابن أبي شيبة 4/ 217 و 229، والطحاوي في "معاني الآثار" 41/ 3 من طريقين عن أبي إسحاق، به.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 2/ 395، والطبراني في "الكبير" (12663)، والضياء المقدسي في "المختارة" 10 / (30) و (32) و (33) من طريق يونس بن أبي إسحاق، عن زائدة بن عمير، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3142)


3142 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرحمن بن محمد المحارِبي، عن محمد بن إسحاق سَمِعَ أبانَ بن صالح يحدِّث عن مجاهد قال: عَرَضتُ القرآن على ابن عبَّاس ثلاثَ عَرَضات، أُوقِفُه على كل آية أسألُه فيما أُنزلت وكيف كانت، فأَتيتُ على قوله: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} الآية، قال: كان هذا الحيُّ من المهاجرين يَشرَحُون النساءَ شَرْحًا مُنكَرًا حيثما لَقُوهُنَّ مُقبلاتٍ ومدبراتٍ، فلما قَدِموا المدينةَ تزوَّجوا النساءَ من الأنصار، فأرادوهنَّ على ما كانوا يفعلون بالمهاجرات، فأنكرنَ ذلك فشَكَيْنَ ذلك إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأنزل الله عز وجل: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ}، يقول: مُقبِلاتٍ ومُدبِراتٍ من دُبُرِها بعد أن يكون للفَرْج، قال ابن عبَّاس: وإنما كان من قِبَل دُبُرها في قُبُلها [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুজাহিদ বলেছেন: আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সামনে তিনবার কুরআন পেশ করেছি। আমি তাকে প্রতিটি আয়াতের উপর থামিয়ে জিজ্ঞাসা করতাম, এই আয়াত কী সম্পর্কে এবং কীভাবে নাযিল হয়েছিল। একবার আমি যখন এই আয়াতের কাছে পৌঁছলাম—"তোমাদের স্ত্রীরা হলো তোমাদের শস্যক্ষেত্র। সুতরাং তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা গমন করো" [সূরা বাকারা: ২২৩]। তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: মুহাজিরদের মধ্যে এমন এক গোত্র ছিল, যারা নারীদের সাথে এমন নিকৃষ্ট আচরণ করত, যেদিক থেকে তাদের পেত, তারা সেদিক থেকেই আসতো—সম্মুখ বা পশ্চাৎ দিক থেকে। যখন তারা মদিনায় এলো এবং আনসারদের নারীদের বিয়ে করলো, তখন তারা তাদের সাথেও একই আচরণ করতে চাইলো, যা তারা মুহাজির নারীদের সাথে করত। আনসারী নারীরা এতে আপত্তি জানালো এবং এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অভিযোগ করলো। ফলে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল নাযিল করলেন: "তোমাদের স্ত্রীরা হলো তোমাদের শস্যক্ষেত্র। সুতরাং তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা গমন করো।" তিনি বলেন: অর্থাৎ সামনে বা পিছন দিক থেকে (যৌন সম্পর্ক স্থাপন করতে পারো), যতক্ষণ পর্যন্ত তা যোনিপথের মাধ্যমে সম্পন্ন হয়। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটি কেবল পিছন দিক থেকে (আগমনের ভঙ্গিতে হলেও) যোনিপথের মাধ্যমেই হবে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن. وقد سلف برقم (2827).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3143)


3143 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن الحسين بن الجُنَيد، حدثنا يعقوب بن حُميد بن كاسِب، حدثنا يعلى بن شَبِيب المكي، حدثنا هشام بن عُرُوة، عن أبيه، عن عائشة قالت: كان الرجل يُطلِّق امرأته ما شاء أن يطلِّقَها وإن طلَّقها مئةً أو أكثر، إذا ارتَجَعَها قبل أن تنقضي عِدَّتُها، حتى قال الرجل لامرأته: والله لا أطلِّقُكِ فتبيني مني، ولا آوِيكِ إليَّ، قالت: وكيف ذاك؟ قال: أطلِّقك وكلَّما هَمَّت عِدَّتُك أن تنقضيَ ارتجعتُك، ثم أطلِّقُك، وأفعل هكذا، فشكت المرأة ذلك إلى عائشة، فذَكَرَت ذلك عائشةُ للنبي صلى الله عليه وسلم، فَسَكَتَ فلم يقل شيئًا حتى نزل القرآن: {الطَّلَاقُ مَرَّتَانِ فَإِمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ} [البقرة:229]، [فاستأنَفَ الناسُ الطلاقَ، مَن شاءَ طلَّق ومَن شاءَ لم يطلِّقْ] [1].[هذا حديث] [2] صحيح الإسناد، ولم يتكلَّم أحدٌ في يعقوب بن حميد بحُجَّة، وناظَرَني شيخُنا أبو أحمد الحافظ وذكر أنَّ البخاري روى عنه في "الصحيح"، فقلت: هذا يعقوبُ بن محمد الزُّهْري، وثَبَتَ هو على ما قال [3].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, কোনো ব্যক্তি তার স্ত্রীকে যতবার ইচ্ছা তালাক দিতে পারত, এমনকি সে যদি একশ বা তার অধিকবারও তালাক দিত, তবুও যদি ইদ্দত শেষ হওয়ার আগেই তাকে ফিরিয়ে নিত (রুজু করে নিত), তাহলে তা বৈধ ছিল। একসময় এক ব্যক্তি তার স্ত্রীকে বলল: আল্লাহর কসম! আমি তোমাকে এমনভাবে তালাক দেব যে তুমি আমার কাছ থেকে পৃথকও হতে পারবে না, আর আমি তোমাকে আমার কাছে স্থানও দেব না। স্ত্রী বলল: এটা কীভাবে সম্ভব? সে বলল: আমি তোমাকে তালাক দেব, আর যখনই তোমার ইদ্দত শেষ হতে চাইবে, তখনই আমি তোমাকে ফিরিয়ে নেব (রুজু করব)। এরপর আবার তোমাকে তালাক দেব এবং এভাবেই করতে থাকব। তখন সেই মহিলাটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বিষয়টি নিয়ে অভিযোগ করল। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিষয়টি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট উল্লেখ করলেন। তিনি নীরব রইলেন এবং কিছু বললেন না, যতক্ষণ না কুরআনের এই আয়াতটি নাযিল হলো: "তালাক হলো দুইবার। অতঃপর হয় তাকে প্রচলিত নিয়ম অনুযায়ী রেখে দেবে, না হয় সদ্ব্যবহারের সাথে বিদায় দেবে।" (সূরা আল-বাক্বারা: ২২৯)। [এরপর] লোকেরা নতুন করে তালাক দেওয়া শুরু করল। যে চাইত, সে তালাক দিত, আর যে চাইত না, সে দিত না।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ما بين المعقوفين مكانه بياض في النسخ الخطية، واستدركناه من "السنن الكبرى" للبيهقي 7/ 333 حيث رواه عن المصنف بإسناده ومتنه.وأما الخبر فالصحيح أنه مُرسَل، فقد خولف يعلى بن شبيب -وقد انفرد ابن حبان بتوثيقه- في وصله بذِكْر عائشة كما سيأتي، ويعقوب بن حميد قال الذهبي في "تلخيصه": قد ضعَّفه غير واحدٍ قلنا: لكنه متابَع في روايته هذه عن يعلى.فقد أخرجه الترمذي (1192) عن قتيبة بن سعيد، عن يعلى بن شبيب بهذا الإسناد.ثم أخرجه عن أبي كريب، عن عبد الله بن إدريس، عن هشام بن عروة، عن أبيه بنحوه، ولم يذكر فيه عائشةَ، وقال: وهذا أصحُّ من حديث يعلى بن شبيب.وتابع عبدَ الله بنَ إدريس على إرساله مالك في "الموطأ" 2/ 588، وعنه الشافعي في "الأم" 6/ 616 - 617، ومن طريقه البيهقي في "السنن" 7/ 333، ثم قال البيهقي: هذا مرسل، وهو الصحيح، قاله البخاري وغيره. حجر في "هُدى الساري" 2/ 44، وفي فتح الباري" 8/ 395 أن يكون يعقوب بن إبراهيم في رواية الأصيلي وأبي ذرٍّ هو يعقوب بن إبراهيم بن سعد، وخطّأ ذلك المزي في "تهذيب الكمال" 32/ 321، والذهبي في "تاريخ الإسلام" 5/ 1290، وفي "سير أعلام النبلاء" 11/ 161، والحافظ ابن حجر في "هُدى الساري" 2/ 478 وفي "فتح الباري" 8/ 395، وغيرهم، وذلك لكون البخاري لم يلقَ يعقوبَ بن إبراهيم بن سعد.وجزم أبو علي الصَّدَفي فيما نقله عنه الحافظ في "الفتح" بأنه الدورقي، يعني كما قال أبو ذر الهروي في الموضع الثاني، واحتمله الذهبيُّ في "السير" 11/ 161، ورجَّحه ابن حجر في "هدي الساري" 2/ 479 وفي "الفتح" 8/ 395.وجزم بخلاف ذلك كله أبو نصر الكَلَاباذي في "رجال البخاري" ترجمة (1392)، وأبو الوليد الباجي في "التعديل والتجريح" الترجمة (1533)، حيث جزما بأنه يعقوب بن حميد بن كاسب، وجزم به كذلك أبو أحمد الحاكم كما نقله عنه المصنف، وجزم به أيضًا الذهبي في "الكاشف" (6387) وفي "تذكرة الحفاظ" 2/ 466، ورجَّحه في "سير أعلام النبلاء" 11/ 160 - 161، واحتمله المزي في "تهذيب الكمال". ونقل الحافظ في "هدى الساري" 2/ 44 و 478 وفي "فتح الباري" 8/ 95 و 12/ 65 أنه أيضًا قول أبي عبد الله بن منده وأبي إسحاق الحبّال. وقال الحافظ بعد ذلك 8/ 395: ردَّ ذلك البرقاني بأنَّ يعقوب بن حميد ليس من شرط البخاري، وأيد في "الفتح" 12/ 65 قول البرقاني هذا فقال بعد أن نقل قول أبي أحمد الحاكم وابن منده والحبّال: هو متعقَّبٌ بما في رواية الأصيلي وأبي ذرٍّ.وأما أبو علي الجياني فكأنه مال في "تقييد المهمل" إلى القول بأنه يعقوب بن محمد الزهري، يعني كما قُيِّد في رواية ابن السكن، وكما جزم به أبو عبد الله الحاكم، إذ ختم الجياني الخلاف في ذلك بقوله: وقال البخاري في "تاريخه": يعقوب بن محمد بن عيسي بن عبد الملك بن حميد بن عبد الرحمن بن عوف أبو يوسف الزهري، سمع إبراهيم بن سعد والمَخْرَمي.



[2] ما بين المعقوفين من المطبوع. حجر في "هُدى الساري" 2/ 44، وفي فتح الباري" 8/ 395 أن يكون يعقوب بن إبراهيم في رواية الأصيلي وأبي ذرٍّ هو يعقوب بن إبراهيم بن سعد، وخطّأ ذلك المزي في "تهذيب الكمال" 32/ 321، والذهبي في "تاريخ الإسلام" 5/ 1290، وفي "سير أعلام النبلاء" 11/ 161، والحافظ ابن حجر في "هُدى الساري" 2/ 478 وفي "فتح الباري" 8/ 395، وغيرهم، وذلك لكون البخاري لم يلقَ يعقوبَ بن إبراهيم بن سعد.وجزم أبو علي الصَّدَفي فيما نقله عنه الحافظ في "الفتح" بأنه الدورقي، يعني كما قال أبو ذر الهروي في الموضع الثاني، واحتمله الذهبيُّ في "السير" 11/ 161، ورجَّحه ابن حجر في "هدي الساري" 2/ 479 وفي "الفتح" 8/ 395.وجزم بخلاف ذلك كله أبو نصر الكَلَاباذي في "رجال البخاري" ترجمة (1392)، وأبو الوليد الباجي في "التعديل والتجريح" الترجمة (1533)، حيث جزما بأنه يعقوب بن حميد بن كاسب، وجزم به كذلك أبو أحمد الحاكم كما نقله عنه المصنف، وجزم به أيضًا الذهبي في "الكاشف" (6387) وفي "تذكرة الحفاظ" 2/ 466، ورجَّحه في "سير أعلام النبلاء" 11/ 160 - 161، واحتمله المزي في "تهذيب الكمال". ونقل الحافظ في "هدى الساري" 2/ 44 و 478 وفي "فتح الباري" 8/ 95 و 12/ 65 أنه أيضًا قول أبي عبد الله بن منده وأبي إسحاق الحبّال. وقال الحافظ بعد ذلك 8/ 395: ردَّ ذلك البرقاني بأنَّ يعقوب بن حميد ليس من شرط البخاري، وأيد في "الفتح" 12/ 65 قول البرقاني هذا فقال بعد أن نقل قول أبي أحمد الحاكم وابن منده والحبّال: هو متعقَّبٌ بما في رواية الأصيلي وأبي ذرٍّ.وأما أبو علي الجياني فكأنه مال في "تقييد المهمل" إلى القول بأنه يعقوب بن محمد الزهري، يعني كما قُيِّد في رواية ابن السكن، وكما جزم به أبو عبد الله الحاكم، إذ ختم الجياني الخلاف في ذلك بقوله: وقال البخاري في "تاريخه": يعقوب بن محمد بن عيسي بن عبد الملك بن حميد بن عبد الرحمن بن عوف أبو يوسف الزهري، سمع إبراهيم بن سعد والمَخْرَمي.



3143 [3] - وأعاد المصنف الكلام في ذلك بإثر الحديث (4950)، وذلك أنَّ البخاري روى في موضعين من "صحيحه" (2697) و (3988) عن يعقوب (هكذا غير مقيَّد في روايات البخاري) عن إبراهيم بن سعد.فقُيِّد يعقوبُ في الموضعين في رواية ابن السَّكَن لصحيح البخاري بابن محمد، يعني يعقوب بن محمد الزهري، لكنه قُيِّد في رواية الأصيلي وأبي ذر الهروي بابن إبراهيم، يعني يعقوب بن إبراهيم الدَّورَقي، كما وقع في رواية أبي ذر في الموضع الثاني، حيث قال: يعقوب بن إبراهيم، أي: الدورقي.وجوَّز أبو مسعود الدمشقي فيما نقله عنه أبو علي الجيّاني في "تقييد المهمل" 3/ 1064، وابن حجر في "هُدى الساري" 2/ 44، وفي فتح الباري" 8/ 395 أن يكون يعقوب بن إبراهيم في رواية الأصيلي وأبي ذرٍّ هو يعقوب بن إبراهيم بن سعد، وخطّأ ذلك المزي في "تهذيب الكمال" 32/ 321، والذهبي في "تاريخ الإسلام" 5/ 1290، وفي "سير أعلام النبلاء" 11/ 161، والحافظ ابن حجر في "هُدى الساري" 2/ 478 وفي "فتح الباري" 8/ 395، وغيرهم، وذلك لكون البخاري لم يلقَ يعقوبَ بن إبراهيم بن سعد.وجزم أبو علي الصَّدَفي فيما نقله عنه الحافظ في "الفتح" بأنه الدورقي، يعني كما قال أبو ذر الهروي في الموضع الثاني، واحتمله الذهبيُّ في "السير" 11/ 161، ورجَّحه ابن حجر في "هدي الساري" 2/ 479 وفي "الفتح" 8/ 395.وجزم بخلاف ذلك كله أبو نصر الكَلَاباذي في "رجال البخاري" ترجمة (1392)، وأبو الوليد الباجي في "التعديل والتجريح" الترجمة (1533)، حيث جزما بأنه يعقوب بن حميد بن كاسب، وجزم به كذلك أبو أحمد الحاكم كما نقله عنه المصنف، وجزم به أيضًا الذهبي في "الكاشف" (6387) وفي "تذكرة الحفاظ" 2/ 466، ورجَّحه في "سير أعلام النبلاء" 11/ 160 - 161، واحتمله المزي في "تهذيب الكمال". ونقل الحافظ في "هدى الساري" 2/ 44 و 478 وفي "فتح الباري" 8/ 95 و 12/ 65 أنه أيضًا قول أبي عبد الله بن منده وأبي إسحاق الحبّال. وقال الحافظ بعد ذلك 8/ 395: ردَّ ذلك البرقاني بأنَّ يعقوب بن حميد ليس من شرط البخاري، وأيد في "الفتح" 12/ 65 قول البرقاني هذا فقال بعد أن نقل قول أبي أحمد الحاكم وابن منده والحبّال: هو متعقَّبٌ بما في رواية الأصيلي وأبي ذرٍّ.وأما أبو علي الجياني فكأنه مال في "تقييد المهمل" إلى القول بأنه يعقوب بن محمد الزهري، يعني كما قُيِّد في رواية ابن السكن، وكما جزم به أبو عبد الله الحاكم، إذ ختم الجياني الخلاف في ذلك بقوله: وقال البخاري في "تاريخه": يعقوب بن محمد بن عيسي بن عبد الملك بن حميد بن عبد الرحمن بن عوف أبو يوسف الزهري، سمع إبراهيم بن سعد والمَخْرَمي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3144)


3144 - أخبرنا أحمد بن جعفر القطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، أخبرنا وَكِيع، حدثنا الفضل بن دَلْهَم عن الحسن، عن مَعقِل بن يَسَار: أنَّ أخته طلَّقها زوُجها، فأراد أن يراجعَها فمَنَعَها معقلٌ، فأنزل الله في ذلك: {وَإِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ أَنْ يَنْكِحْنَ أَزْوَاجَهُنَّ إِذَا تَرَاضَوْا بَيْنَهُمْ بِالْمَعْرُوفِ} [البقرة: 232] [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه [2]!




মা'কিল ইবন ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর বোনকে তাঁর স্বামী তালাক দিয়েছিল। অতঃপর সে (স্বামী) তাকে পুনরায় বিবাহ করতে চাইলো, কিন্তু মা'কিল তাকে বাধা দিলেন। তখন এ ব্যাপারে আল্লাহ তা'আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "আর যখন তোমরা স্ত্রীদেরকে তালাক দাও এবং তারা তাদের ইদ্দতকাল পূর্ণ করে, তখন তারা যদি নিজেদের মধ্যে প্রচলিত নিয়মে সন্তুষ্ট হয়, তবে তাদের স্বামীদেরকে বিবাহ করতে তাদেরকে বাধা দিও না।" (সূরা আল-বাকারা: ২৩২)




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد الفضل بن دلهم ليس بذاك القوي، وبه أعلَّه الذهبي في "تلخيصه"، لكنه يعتبر به، وقد توبع فيما سلف برقم (2753).



[2] بل أخرجه البخاري بنحوه لكن من غير هذا الوجه عن الحسن البصري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3145)


3145 - حدثني علي بن عيسى الحِيري، حدثنا الحسين بن محمد بن زياد وإبراهيم بن أبي طالب، قالا: حدثنا سعيد بن يحيى بن سعيد الأُمَوي، حدثنا حفص ابن غِيَاث، عن داود بن أبي هند، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس قال: إذا حَمَلَته تسعةَ أشهر، أرضَعَته واحدًا وعشرين، وإذا حَمَلَته ستةَ أشهر، أرضَعَته أربعًا وعشرين، ثم قرأ: {وَحَمْلُهُ وَفِصَالُهُ ثَلَاثُونَ شَهْرًا} [الأحقاف: 15] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন তার গর্ভাবস্থা নয় মাস হয়, তখন তার দুধ পান করানো হয় একুশ মাস। আর যখন তার গর্ভাবস্থা ছয় মাস হয়, তখন তার দুধ পান করানো হয় চব্বিশ মাস। অতঃপর তিনি এই আয়াত পাঠ করেন: "আর তার গর্ভধারণ ও দুধ ছাড়ানো হলো ত্রিশ মাস।" (সূরা আল-আহকাফ: ১৫)




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه الطحاوي في "مشكل الآثار" 7/ 292 من طريق نعيم بن حماد، عن حفص بن غياث، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه الطبري في تفسيره 2/ 491، والطحاوي 7/ 291، والبيهقي 7/ 442 و 462 - 463، والضياء المقدسي في "المختارة" 11/ (397) من طرق عن داود بن أبي هند به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3146)


3146 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا وَرْقاءُ، عن ابن أبي نجيح، عن عطاء، عن ابن عباس، قال: نَسَخَت هذه الآيةُ عِدَّتَها في أهلها، فتعتدُّ حيث شاءت، لقول الله: {غَيْرَ إِخْرَاجٍ} [البقرة: 240].قال عطاء: إن شاءت اعتدَّت في أهلها، وإن شاءت خَرَجَت، لقول الله عز وجل: {فَإِنْ خَرَجْنَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِي مَا فَعَلْنَ فِي أَنْفُسِهِنَّ} [البقرة: 240] [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه [2]!




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, এই আয়াতটি তাদের (স্বামীর) পরিবারের মধ্যে ইদ্দত পালনের বিধানকে রহিত করেছে। সুতরাং সে যেখানে ইচ্ছা ইদ্দত পালন করতে পারে। কারণ আল্লাহ্‌র বাণী: {তাদেরকে বের করে দেওয়া ব্যতীত} [সূরা আল-বাক্বারাহ: ২৪০]। আতা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, যদি সে চায়, তবে সে তার পরিবারের মধ্যেই ইদ্দত পালন করবে; আর যদি সে চায়, তবে সে বেরিয়ে যাবে। কারণ আল্লাহ্‌ তা‘আলার বাণী: {অতঃপর যদি তারা নিজেরা বেরিয়ে যায়, তাহলে তারা নিজেদের জন্য যা করে, তাতে তোমাদের কোনো পাপ নেই} [সূরা আল-বাক্বারাহ: ২৪০]।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الرحمن بن الحسن شيخ المصنف، وقد روي من غير هذا الوجه، فانظر ما سلف برقم (2875). ورقاء: هو ابن عمر اليَشكُري.



[2] بل أخرجه البخاري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3147)


3147 - أخبرني محمد بن يزيد العدل، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا يعقوب بن إبراهيم الدَّورَقي، حدثنا إسماعيل -وهو ابن عُليَّة- عن يونس، عن ابن سِيرِين، عن ابن عبَّاس: أنه قام فخَطَبَ الناسَ هاهنا، فقرأ عليهم سورةَ البقرة ويبيِّن لهم منها، فأتى على هذه الآية: {إِنْ تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ} [البقرة: 180] فقال: نُسِخَت هذه؛ ثم قرأ حتى أتى على هذه الآية: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا} إلى قوله: {غَيْرَ إِخْرَاجٍ} [البقرة: 234 - 240] فقال: وهذه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এখানে দাঁড়িয়ে লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন, অতঃপর তিনি তাদের সামনে সূরাহ আল-বাকারা তিলাওয়াত করলেন এবং এর ব্যাখ্যা দিলেন। যখন তিনি এই আয়াতে পৌঁছলেন: {যদি সে সম্পদ রেখে যায়, তবে যেন পিতা-মাতা ও নিকটাত্মীয়দের জন্য ওসিয়ত করে} [সূরাহ আল-বাকারা: ১৮০], তখন তিনি বললেন: এটি মানসূখ (রহিত) হয়ে গেছে। এরপর তিনি আবার তিলাওয়াত করতে থাকলেন, যতক্ষণ না তিনি এই আয়াতে পৌঁছলেন: {আর তোমাদের মধ্যে যারা মৃত্যুবরণ করবে এবং স্ত্রী রেখে যাবে...} থেকে শুরু করে তাঁর বাণী {…যেন তাদেরকে বের করে দেওয়া না হয়} [সূরাহ আল-বাকারা: ২৩৪-২৪০] পর্যন্ত, তখন তিনি বললেন: এবং এটিও (মানসূখ)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، رجاله ثقات إلَّا أنه منقطع كما سلف بيانه برقم (3120).وأخرجه البيهقي 7/ 427 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 2/ 118 و 581 عن يعقوب بن إبراهيم الدورقي، به.وانظر ما سلف برقم (2875).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3148)


3148 - حدثني علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا بِشْر بن موسى حدثنا عبد الله بن الزُّبير الحُميدي، حدثنا سفيان بن عُيينة، عن ابن جُرَيج، عن عطاء، عن ابن عبَّاس: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا} لم يقل: يَعتَدِدنَ في بيوتهنَّ، المتوفَّى عنها زوجُها تعتدُّ حيث شاءت [1].




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [আল্লাহর বাণী:] “আর তোমাদের মধ্যে যারা মৃত্যুবরণ করবে এবং নিজেদের স্ত্রীদেরকে রেখে যাবে, তারা (স্ত্রীগণ) নিজেদেরকে চার মাস দশ দিন অপেক্ষায় রাখবে” (সূরা বাকারা: ২৩৪)। এতে এই কথা বলা হয়নি যে, তারা যেন তাদের ঘরসমূহে ইদ্দত পালন করে। যার স্বামী মারা গেছে, সে যেখানে ইচ্ছা ইদ্দত পালন করতে পারে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه ابن حزم في "المحلَّى" 10/ 284 من طريق علي بن المديني، عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق (12051)، وابن أبي شيبة 5/ 189، والطبري 2/ 514 من طرق عن ابن جريج، به.وانظر ما سلف برقم (2875).تنبيه: وقع بعد الحديث في نسخنا الخطية بياض قدر بضع كلمات ومكانه في النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان: هذا الإسناد صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3149)


3149 - أخبرني مُكرَم بن أحمد القاضي، حدثنا يحيى بن جعفر بن الزِّبرِقان، حدثنا أبو [أحمد بن الزُّبيري] [1] حدثنا فُضَيل بن مرزوق، حدثني شَقِيق بن عُقْبة العَبْدي، حدثني البَرَاء بن عازب قال: نزلت (حافِظُوا على الصَّلَواتِ وصلاة العصرِ) فقرأناها على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ما شاء أن نقرأها، ثم إنَّ الله نَسَخَها فأنزل: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى} [البقرة:238]، فقال له رجل: أهي صلاةُ العصر؟ فقال: قد خبَّرتُك كيف نَزَلَت وكيف نَسَخَها الله، والله أعلم [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!




আল-বারাআ ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বললেন: (আল্লাহর বাণী) নাযিল হয়েছিল, "তোমরা সালাতসমূহ এবং আসরের সালাতের প্রতি যত্নবান হও।" অতঃপর আমরা তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে তত দিন পর্যন্ত তেলাওয়াত করেছিলাম, যত দিন আল্লাহ ইচ্ছা করেছিলেন আমরা যেন তা তেলাওয়াত করি। এরপর আল্লাহ তা রহিত করে দেন এবং নাযিল করেন: "তোমরা সালাতসমূহ এবং মধ্যবর্তী সালাতের প্রতি যত্নবান হও।" (সূরা বাকারা: ২৩৮)। তখন এক লোক তাঁকে জিজ্ঞেস করলো, তা কি আসরের সালাত? তিনি বললেন: কীভাবে তা নাযিল হয়েছিল এবং কীভাবে আল্লাহ তা রহিত করেছেন, সে বিষয়ে আমি তোমাকে অবহিত করেছি। আর আল্লাহই ভালো জানেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ما بين المعقوفين مكانه بياض في الأصول، واستدركناه من "السنن الكبرى" للبيهقي 1/ 459 حيث رواه عن المصنف بإسناده ومتنه. ووقع مكانه في "إتحاف المهرة" لابن حجر (2067): حدثنا أبو نعيم، وهو ذهول منه أو سبق قلم.



[2] إسناده جيد من أجل فضيل بن مرزوق، فهو صدوق لا بأس به.وأخرجه أحمد 30 / (18673)، ومسلم (630) من طريق يحيى بن آدم، عن فضيل بن مرزوق، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهول منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3150)


3150 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا وكيع، حدثنا سفيان عن مَيسَرة النَّهْدي، عن المِنهال ابن عمرو، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس في قوله: {أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ خَرَجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ وَهُمْ أُلُوفٌ حَذَرَ الْمَوْتِ} [البقرة:243] قال: كانوا أربعة آلاف، خرجوا فرارًا من الطاعون وقالوا: نأتي أرضًا ليس بها موتٌ، فقال لهم الله: مُوتُوا، فماتوا، فمَرَّ بهم نبيٌّ، فسأل الله أن يُحيِيَهم فأحياهم، فهم الذين قال الله عز وجل: {وَهُمْ أُلُوفٌ حَذَرَ الْمَوْتِ} [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর বাণী: {তুমি কি তাদেরকে দেখনি যারা মৃত্যুর ভয়ে হাজার হাজার সংখ্যায় নিজেদের ঘরবাড়ি ছেড়ে বেরিয়েছিল?} (সূরা আল-বাকারা: ২৪৩) প্রসঙ্গে বলেন: তারা ছিল চার হাজার লোক। তারা প্লেগ (মহামারি) থেকে পালিয়ে গিয়েছিল এবং বলেছিল: আমরা এমন এক স্থানে যাই যেখানে মৃত্যু নেই। তখন আল্লাহ্‌ তাদেরকে বললেন: তোমরা মরে যাও। ফলে তারা মারা গেল। অতঃপর একজন নবী তাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি আল্লাহর কাছে তাদের জীবিত করার প্রার্থনা করলেন, এবং আল্লাহ্‌ তাদেরকে জীবিত করলেন। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল এই লোকদের সম্পর্কেই বলেছেন: {এবং তারা ছিল হাজার হাজার, মৃত্যুর ভয়ে।} (আল-বাকারা: ২৪৩)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي. سفيان هو الثوري.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 2/ 586، والضياء المقدسي في "المختارة" 10/ (405) من طريقين عن وكيع، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري أيضًا 2/ 586 من طريق أبي أحمد الزبيري، عن سفيان، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3151)


3151 - أخبرنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق ابن إبراهيم، أخبرنا معاذ بن هشام، صاحب الدَّستُوائي، حدثنا أَبي، عن قَتَادة، عن عِكْرمة، عن ابن عبَّاس قال: ما تَعجَبُون أن تكون الخُلَّةُ لإبراهيمَ، والكلامُ لموسى، والرؤيةُ لمحمدٍ [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, তোমরা অবাক হও কেন যে, বন্ধুত্ব (খুল্লাত) ইবরাহীম (আঃ)-এর জন্য, কথা (আল্লাহর সাথে কথোপকথন) মূসা (আঃ)-এর জন্য এবং দর্শন (আল্লাহর দর্শন) মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য নির্ধারিত হয়েছে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه النسائي (11475) عن إسحاق بن إبراهيم -وهو ابن راهويه- بهذا الإسناد.وسيأتي مكررًا برقم (3789)، وسلف برقم (217). "يا أبا المنذر، أتدري أي آية من كتاب الله معك أعظم؟ " قال: قلت: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ}، قال: فضرب في صدري وقال: "ليَهنِكَ العلمُ أبا المنذر".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3152)


3152 - أخبرني علي بن عبد الرحمن السَّبِيعي، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري، حدثنا يعلى بن عُبيد، حدثنا المسعودي، عن أبي عمرو الشَّيباني [1]، عن عُبيد بن الحَسحَاسِ، عن أبي ذرٍّ قال: انتهيتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو في المسجد فجلستُ إليه، فذَكَرَ فضلَ الصلاة والصيام والصَّدقة، قال: قلت: يا رسول الله، فأيُّما آيةٍ أَنزل الله عليك أعظمُ؟ قال: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ} [البقرة: 255]؛ وذكر الآية حتى خَتَمَها [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছলাম যখন তিনি মসজিদে ছিলেন। অতঃপর আমি তাঁর পাশে বসলাম। তিনি সালাত (নামাজ), সাওম (রোজা) ও সাদাকার (দান) ফযীলত সম্পর্কে আলোচনা করলেন। আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল, আল্লাহ তা'আলা আপনার প্রতি যে আয়াত নাযিল করেছেন, তার মধ্যে কোনটি সর্বশ্রেষ্ঠ?" তিনি বললেন: "{আল্লাহ্, তিনি ব্যতীত অন্য কোনো ইলাহ্ নেই, তিনি চিরঞ্জীব, সর্বসত্তার ধারক} [সূরা আল-বাক্বারা: ২৫৫]। আর তিনি আয়াতটি শেষ পর্যন্ত উল্লেখ করলেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا وقع في النسخ الخطية: الشيباني، وكذلك هو في "إتحاف المهرة" (17574)، ويغلب على ظننا أنه تحريف عن الشامي، فإنَّ عبيد بن الحسحاس -ويقال: الخشخاش- لا يعرف له راوٍ غير أبي عمرو -ويقال: أبو عمر- الدمشقي الشامي، ولم ينسب إلّا شاميًّا. "يا أبا المنذر، أتدري أي آية من كتاب الله معك أعظم؟ " قال: قلت: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ}، قال: فضرب في صدري وقال: "ليَهنِكَ العلمُ أبا المنذر".



[2] إسناده ضعيف جدًا لضعف أبي عمرو الدمشقي وعبيد بن الحسحاس، ونقل البرقاني عن الدارقطني أنه قال في المسعودي عن أبي عمرو الدمشقي: متروك، وكذا قال في أبي عمرو عن عبيد بن الحسحاس المسعودي: هو عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة بن عبد الله بن مسعود.وأخرجه ضمن حديثٍ أحمد في "المسند" (35/ 21546) و (21552) من طريقين عن المسعودي، بهذا الإسناد.وفي الباب ما يغني عنه، وهو حديث أُبي بن كعب عند مسلم (810)، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أبا المنذر أتدري أي آية من كتاب الله معك أعظم؟ " قال: قلت: الله ورسوله أعلم، قال: "يا أبا المنذر، أتدري أي آية من كتاب الله معك أعظم؟ " قال: قلت: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ}، قال: فضرب في صدري وقال: "ليَهنِكَ العلمُ أبا المنذر".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3153)


3153 - حدثنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا محمد بن معاذ، حدثنا أبو عاصم، حدثنا سفيان، عن عمَّار الدُّهْني، عن مسلم البَطِين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عبَّاس قال: الكرسيُّ موضعُ قَدَميه، والعرشُ لا يُقدَرُ قَدْرُه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, "কুরসি হলো আল্লাহর দুই পায়ের রাখার স্থান, আর আরশের মর্যাদা বা পরিধি অনুমান করা যায় না।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن معاذ -وهو ابن يوسف السلمي- وقد توبع. أبو عاصم: هو الضحاك بن مخلد، وسفيان هو الثوري، وعمار الدُّهني: هو ابن معاوية، ومسلم البطين: هو ابن عمران.وأخرجه أبو جعفر بن أبي شيبة في "العرش" (61)، وابن خزيمة في "التوحيد" 1/ 248، والطبراني في "الكبير" (12404)، والدارقطني في "الصفات" (36)، والهروي في "الأربعون في دلائل التوحيد" (14) من طرق عن أبي عاصم، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 251، والدارمي في "النقض على المريسي" 1/ 399 - 400، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (586) و (1020)، وابن خزيمة 1/ 249، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 2/ 491، والدارقطني (37)، والهروي (14)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 10/ 348 من طرق عن سفيان الثوري به.وخالف الجمهورَ شجاعُ بن مخلد، فرواه عن أبي عاصم مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم فيما أخرجه الخطيب في "تاريخه" 10/ 348، وأبو منصور الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" لابن حجر (2820)، وهو وهمٌ من شجاع.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3154)


3154 - [أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا] [1] أحمد بن مهران، حدثنا عبيد الله ابن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن أبي إسحاق عن ناجيةَ بن كعب، عن عليٍّ قال: خرج عُزيرٌ نبيُّ الله من مدينتِه وهو رجل شابٌّ، فمرَّ على قرية وهي خاويةٌ على عُروشِها، قال: أنَّى يُحْيي هذه اللهُ بعد موتها، فأماته الله مئةَ عام ثم بَعَثَه، فأولُ ما خلق عيناه [2]، فجعل يَنظُر إلى عظامه، يُنظَمُ بعضها إلى بعض، ثم كُسِيَت لحمًا، ونُفِخَ فيه الرُّوحُ، فقيل له: كم لَبِثْتَ؟ قال: يومًا أو بعضَ يوم، قال: بل لبثتَ مئةَ عام، فأتى المدينة وقد تَرَكَ جارًا له إسكافًا شابًا، فجاء وهو شيخٌ كبير [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আল্লাহর নবী উযাইর (আঃ) যুবক থাকা অবস্থায় তাঁর শহর থেকে বের হলেন। অতঃপর তিনি একটি জনপদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যা তার ছাদগুলোর উপর উপুড় হয়ে পড়ে (ধ্বংস) ছিল। তিনি বললেন: আল্লাহ কীভাবে এটিকে মৃত্যুর পর আবার জীবিত করবেন? তখন আল্লাহ তাকে একশ বছর মৃত্যু দিলেন, এরপর তাকে পুনরায় জীবিত করলেন। প্রথম যা সৃষ্টি করা হলো তা হলো তার দু'টি চোখ। তিনি দেখতে লাগলেন, কীভাবে তার হাড়গুলো একটির সাথে অন্যটি জোড়া লাগছিল, এরপর তা গোশত দ্বারা আবৃত হলো এবং তাতে রূহ (প্রাণ) ফুঁকে দেওয়া হলো। তখন তাকে বলা হলো: তুমি কতকাল অবস্থান করেছ? তিনি বললেন: একদিন বা দিনের কিছু অংশ। বলা হলো: বরং তুমি একশ বছর অবস্থান করেছ। অতঃপর তিনি শহরে ফিরে এলেন। তিনি (যখন বের হয়েছিলেন) তখন তার একজন যুবক মুচি প্রতিবেশীকে রেখে গিয়েছিলেন। কিন্তু তিনি (উযাইর) যখন ফিরে এলেন, তখন তিনি ছিলেন অতিশয় বৃদ্ধ।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ما بين المعقوفين مكانه في النسخ الخطية بياض، واستدركناه من "إتحاف المهرة" لابن حجر (14772). والمصنف لا يروي في كتابه هذا عن أحمد بن مهران إلَّا بواسطة أبي عبد الله الصفار.



[2] في النسخ الخطية: عينيه، منصوبًا، والمثبت من المطبوع مرفوعًا على الخبرية، وهو أوجه. وقرأها من السبعة بكسر الراء نافع وأبو عمرو وابن كثير وحمزة والكسائي، وقرأ عاصم وابن عامر: (برَبْوَةٍ) بفتح الراء. انظر "السبعة" لابن مجاهد ص 190.



3154 [3] - إسناده محتمل للتحسين من أجل ناجية بن كعب.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 2/ 502 من طريق آدم بن إياس، عن إسرائيل، بهذا الإسناد. وقرأها من السبعة بكسر الراء نافع وأبو عمرو وابن كثير وحمزة والكسائي، وقرأ عاصم وابن عامر: (برَبْوَةٍ) بفتح الراء. انظر "السبعة" لابن مجاهد ص 190.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3155)


3155 - حدثنا عبد الباقي بن قانع الحافظ، حدثنا عُبيد بن محمد بن حاتم العِجْلُ [1]، حدثني أبو بكر بن أبي النَّضْر، حدثنا أَبي، حدثنا زياد بن عبد الله بن عُلَاثة، حدثنا موسى بن محمد بن إبراهيم التَّيمي، عن أبيه، عن أنس بن مالك: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سأَل البراءَ بن عازِبٍ فقال: "يا براءُ، كيف نَفَقتك على أهلِك؟ " -قال: وكان موسِّعًا على أهله- فقال: يا رسول الله، ما أحسُبُها، قال: "فإنَّ نفقتَك على أهلِك وولدِك وخادمِك صدقةٌ، فلا تُتبِعْ ذلك مَنًّا ولا أذًى" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন: "হে বারা! তোমার পরিবারের জন্য তোমার খরচ কেমন?" বর্ণনাকারী বললেন: আর তিনি (বারা) তাঁর পরিবারের জন্য উদারভাবে খরচ করতেন। তিনি (বারা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তো তা গণনা করি না। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই তোমার পরিবারের, তোমার সন্তানের এবং তোমার খাদেমের জন্য তোমার খরচ হলো সাদাকা (দান)। সুতরাং এর পেছনে অনুযোগ (খোটা) এবং কষ্ট দেওয়া যুক্ত করো না।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية العجلي، وهو خطأ، فإنَّ عبيدًا كان يلقب العجل، وليس هو نسبة له. وقرأها من السبعة بكسر الراء نافع وأبو عمرو وابن كثير وحمزة والكسائي، وقرأ عاصم وابن عامر: (برَبْوَةٍ) بفتح الراء. انظر "السبعة" لابن مجاهد ص 190.



[2] إسناده ضعيف لضعف موسى بن محمد بن إبراهيم التيمي، وبه أعلَّه الذهبي في "تلخيصه".ولم نقف عليه عند غير المصنف. وقرأها من السبعة بكسر الراء نافع وأبو عمرو وابن كثير وحمزة والكسائي، وقرأ عاصم وابن عامر: (برَبْوَةٍ) بفتح الراء. انظر "السبعة" لابن مجاهد ص 190.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3156)


3156 - حدثنا الحسن بن يعقوب، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب ابن عطاء، أخبرنا هارون بن موسى، عن خالد الحذَّاء، عن عبد الله الله بن الحارث، عن عبد الله بن عبَّاس: أنه كان يقرؤها: (برِبْوَةٍ) [البقرة: 265] بكسر الراء، قال: والرِّبوة: النَّشْرُ من الأرض [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি এটিকে (সূরা আল-বাক্বারাহর ২৬৫ নং আয়াত) র-এর নিচে কাসরা (যের) দিয়ে ‘বি-রিবওয়াতিন’ (برِبْوَةٍ) পড়তেন। তিনি বললেন: আর ‘রিবওয়াহ’ হলো মাটির উঁচু সমতল ভূমি।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي. وقرأها من السبعة بكسر الراء نافع وأبو عمرو وابن كثير وحمزة والكسائي، وقرأ عاصم وابن عامر: (برَبْوَةٍ) بفتح الراء. انظر "السبعة" لابن مجاهد ص 190.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3157)


3157 - حدثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا حجَّاج بن محمد، عن ابن جُرَيج، سمعت ابنَ أبي مُلَيكة يُخبر عن عُبيد بن عُمير أنه سمعه يقول: سأل عمرُ أصحابَ النبي صلى الله عليه وسلم فقال: فيمَ ترونَ أُنزلت: {أَيَوَدُّ أَحَدُكُمْ أَنْ تَكُونَ لَهُ جَنَّةٌ} [البقرة: 266]؟ فقالوا: الله أعلمُ، فغَضِبَ فقال: قولوا: نعلمُ أو لا نعلمُ، فقال ابن عبَّاس: في نفسي منها شيءٌ يا أمير المؤمنين، فقال عمر: قل يا ابنَ أخي ولا تَحقِرْ نفسَك، قال ابن عبَّاس: ضُرِبَت مثلًا لعَملٍ، فقال عمر: أيُّ عملٍ؟ فقال: لعملٍ، فقال عمر: رجلٌ غنيٌّ يعمل الحسناتِ، ثم بَعَثَ الله له الشياطين فعَمِلَ بالمعاصي، حتى أَغرَقَ أعمالَه كلَّها [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণকে জিজ্ঞেস করলেন: তোমাদের মতে, এই আয়াতটি কিসের ব্যাপারে নাযিল হয়েছে: {তোমাদের মধ্যে কি এমন কেউ আছে যে কামনা করে যে তার খেজুর ও আঙ্গুরের একটি বাগান থাকবে?} [সূরা বাকারা: ২৬৬]? তাঁরা বললেন: আল্লাহই ভালো জানেন। এতে তিনি (উমার) রাগান্বিত হলেন এবং বললেন: হয় তোমরা বলো, 'আমরা জানি', অথবা বলো, 'আমরা জানি না'। তখন ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আমীরুল মু'মিনীন, এ সম্পর্কে আমার মনে কিছু আছে (ধারণা)। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আমার ভাতিজা, বলো এবং নিজেকে ছোট ভেবো না। ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটি একটি কাজের জন্য দৃষ্টান্তস্বরূপ পেশ করা হয়েছে। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কোন্ কাজ? তিনি বললেন: (একটি) কাজের জন্য। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: (এর দৃষ্টান্ত হলো) একজন ধনী লোক, যে ভালো কাজ করত, এরপর আল্লাহ তার জন্য শয়তানদেরকে পাঠালেন, ফলে সে পাপ কাজে লিপ্ত হলো, এমনকি তার সকল আমল ডুবিয়ে (নষ্ট করে) দিল।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل ابن أبي مليكة: وهو أبو بكر بن أبي مليكة أخو عبد الله، كما جاء مبيَّنًا عند البخاري في "صحيحه".فقد أخرجه البخاري برقم (4538) من طريق هشام -وهو ابن يوسف الصنعاني- عن ابن جريج قال: سمعت عبد الله بن أبي مليكة يحدَّث عن ابن عبَّاس. قال -أي: أبي جريج-: وسمعت أخاه أبا بكر بن أبي مليكة يحدِّث عن عبيد بن عمير قال: قال عمر … إلخ. فاستدراك الحاكم له ذهول منه.وسيأتي برقم (6440) من طريق أيوب عن ابن أبي مليكة: أنَّ عمر … وأخرجه ابن أبي الدنيا في "المطر والرعد والبرق" (162) من طريق الفريابي، سفيان، به.وأخرجه أبو داود في "الزهد" (357) من طريق عبيد الله الأشجعي، عن هارون بن عنترة به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3158)


3158 - حدثنا بكر بن محمد حَمْدان الصَّيرَفي بمَرْو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل البَلْخي، حدثنا قَبِيصة بن عُقْبة، حدثنا سفيان، عن هارون بن عَنتَرة، عن أبيه، عن ابن عبَّاس في قوله عز وجل: {إِعْصَارٌ فِيهِ نَارٌ} [البقرة: 266] قال: ريحٌ فيها سَمُومٌ شديدٌ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহ্‌ তা‘আলার বাণী, "{إِعْصَارٌ فِيهِ نَارٌ} (অর্থ: তাতে অগ্নিযুক্ত ঘূর্ণিঝড়), [সূরা আল-বাক্বারাহ: ২৬৬] সম্পর্কে তিনি বলেন: এর অর্থ হলো তীব্র উষ্ণ বিষাক্ত বায়ু (সামুম)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي. سفيان هو الثوري.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 2/ 524 عن أبيه، عن قبيصة بن عقبة، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي الدنيا في "المطر والرعد والبرق" (162) من طريق الفريابي، سفيان، به.وأخرجه أبو داود في "الزهد" (357) من طريق عبيد الله الأشجعي، عن هارون بن عنترة به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3159)


3159 - حدثنا أحمد بن سهل بن حَمدَوَيهِ الفقيه ببُخارَي، حدثنا قيس بن أُنَيف، حدثنا قُتيبة بن سعيد، حدثنا حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر قال: أَمر النبيُّ صلى الله عليه وسلم بزكاة الفِطْر بصاعٍ من تمر، فجاء رجل بتمرٍ رديءٍ، فقال النبي صلى الله عليه وسلم لعبد الله بن رَوَاحة: "لا تَخرُصُ هذا التمر"، فنزل القرآن: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَنْفِقُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا كَسَبْتُمْ وَمِمَّا أَخْرَجْنَا لَكُمْ مِنَ الْأَرْضِ وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنْفِقُونَ} [البقرة: 267] [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক সা' খেজুর দ্বারা ফিতরের যাকাত আদায়ের নির্দেশ দিলেন। অতঃপর এক ব্যক্তি নিম্নমানের খেজুর নিয়ে এলো। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "এই খেজুরের মূল্য নির্ধারণ করো না (বা এটাকে পরিমাণ হিসেবে গণ্য করো না)।" অতঃপর আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "হে মুমিনগণ, তোমরা যা উপার্জন করেছ এবং আমরা ভূমি থেকে তোমাদের জন্য যা উৎপন্ন করেছি তার উত্তম জিনিস থেকে ব্যয় কর, আর এর নিকৃষ্ট অংশ ব্যয় করার ইচ্ছা করো না।" (সূরা আল-বাকারা: ২৬৭)




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ليِّن، حاتم بن إسماعيل -وإن كان ثقة في الجملة- تكلَّم ابن المديني في أحاديثه عن جعفر بن محمد -وهو ابن علي بن الحسين الملقَّب بالصادق- فقال: روى عن جعفر عن أبيه أحاديث مراسيل أسندَها، وقال أحمد: زعموا أن حاتمًا كان فيه غفلة. وأما قيس بن أُنيف فقد روى عنه جماعة ولم يؤثر فيه جرح أو تعديل، وقد توبع في جملة ما رواه من الأحاديث، فهو صالح حسن الحديث إن شاء الله.وأخرجه الواحدي في "أسباب النزول" (172) من طريق محمد بن عبد الله بن نُعيم -وهو الحاكم- بهذا الإسناد. أوهامه سفيانُ كما في "سنن البيهقي" 7/ 480، وعدَّها أبو داود السجستاني في "سننه" بإثر الحديث (3529) من منكراته.وأخرجه بهذا اللفظ البيهقي 7/ 480 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك الثعلبي في "تفسيره" 8/ 325 من طرق عن علي بن الحسن بن شقيق، به.وخالف في لفظه حمادُ بن سلمة فيما أخرجه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 288، ومن طريقه الذهبي في "تذكرة الحفاظ" 3/ 888 بإسناد صحيح إليه، فرواه عن حماد بن أبي سليمان بهذا الإسناد إلى عائشة مرفوعًا بلفظ: "إنَّ أولادكم من أطيب كَسبكم، فكلوا من كسبَ أولادكم"، وهذا هو المحفوظ في حديث عائشة، وقد تابع حمادَ بنَ أبي سليمان عليه بهذا اللفظ الأعمشُ عن إبراهيم النخعي كما سبق تخريجه عند الحديث (2325).وقد غَفَلَ الشيخ ناصر الدين الألباني رحمه الله في "السلسلة الصحيحة" (2564) عن العلل الواردة في حديث حماد بن أبي سليمان باللفظ الوارد عند الحاكم فصححه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (3160)


3160 - حدثني أبو عبد الرحمن محمد بن محمود الحافظ، حدثنا حماد بن أحمد القاضي،، حدثنا محمد بن علي بن الحسن بن شقيق قال: سمعت أَبي يقول: أخبرنا أبو حمزة، عن إبراهيم الصائغ، عن حماد، عن إبراهيم، عن الأَسود، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ أولادَكم هِبةُ الله لكم {يَهَبُ لِمَنْ يَشَاءُ إِنَاثًا وَيَهَبُ لِمَنْ يَشَاءُ الذُّكُورَ} [الشورى: 49]، فهم وأموالُهم لكم إذا احتَجتُم إليها" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه هكذا، إنما اتَّفقا على حديث عائشة: "أطيبُ ما أَكل الرجلُ من كَسْبه، وولدُه من كَسْبه" [2].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের সন্তানেরা তোমাদের জন্য আল্লাহর দান। {তিনি যাকে চান কন্যা সন্তান দান করেন এবং যাকে চান পুত্র সন্তান দান করেন} [সূরা শূরা: ৪৯]। সুতরাং যখন তোমাদের তাদের প্রয়োজন হয়, তখন তারা এবং তাদের সম্পদ তোমাদেরই।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ضعيف بهذا اللفظ، انفرد به حماد -وهو ابن أبي سليمان- عن إبراهيم -وهو ابن يزيد النخعي- وحماد على ثقته تقع له أوهام في الآثار، وهذا منها، وقد عدَّ قولَه فيه: "إذا احتجتم إليها" من أوهامه سفيانُ كما في "سنن البيهقي" 7/ 480، وعدَّها أبو داود السجستاني في "سننه" بإثر الحديث (3529) من منكراته.وأخرجه بهذا اللفظ البيهقي 7/ 480 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك الثعلبي في "تفسيره" 8/ 325 من طرق عن علي بن الحسن بن شقيق، به.وخالف في لفظه حمادُ بن سلمة فيما أخرجه أبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 1/ 288، ومن طريقه الذهبي في "تذكرة الحفاظ" 3/ 888 بإسناد صحيح إليه، فرواه عن حماد بن أبي سليمان بهذا الإسناد إلى عائشة مرفوعًا بلفظ: "إنَّ أولادكم من أطيب كَسبكم، فكلوا من كسبَ أولادكم"، وهذا هو المحفوظ في حديث عائشة، وقد تابع حمادَ بنَ أبي سليمان عليه بهذا اللفظ الأعمشُ عن إبراهيم النخعي كما سبق تخريجه عند الحديث (2325).وقد غَفَلَ الشيخ ناصر الدين الألباني رحمه الله في "السلسلة الصحيحة" (2564) عن العلل الواردة في حديث حماد بن أبي سليمان باللفظ الوارد عند الحاكم فصححه.



[2] قد وهم الحاكم رحمه الله في قوله هنا: اتفقا على حديث عائشة، بينما استدركه على الشيخين فيما سلف عنده برقم (2325)، وهو ليس عندهما. سلف الحديث عند المصنف برقم (1478) من طريق علي بن عبد العزيز عن سعيد بن سليمان.