আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
361 - حدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن نُعَيم، حدثنا قُتيبة بن سعيد، حدثنا خلف بن خَلِيفة، عن حفصٍ ابن أخي أنس، عن أنس قال: كان من دعاءِ النبي صلى الله عليه وسلم: "اللهمَّ إني أعوذُ بك من علمٍ لا يَنفَع، وقلبٍ لا يخشَع، ونفسٍ لا تَشبَع، ودعاءٍ لا يُسمَع"، ويقول في آخر ذلك: "اللهمَّ إني أعوذُ بك من هؤلاءِ الأربع" [1].وقد بلغني أنَّ مسلم بن الحَجّاج أخرجه من حديث زيد بن أرقَمَ عن النبي صلى الله عليه وسلم [2].
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দো‘আসমূহের মধ্যে এটিও ছিল: "হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট এমন জ্ঞান থেকে আশ্রয় চাই যা কোনো উপকারে আসে না, এমন হৃদয় থেকে যা বিনম্র হয় না, এমন আত্মা থেকে যা তৃপ্ত হয় না এবং এমন দো‘আ থেকে যা শোনা (কবুল করা) হয় না।" আর এর শেষে তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! আমি এই চারটি জিনিস থেকে আপনার নিকট আশ্রয় প্রার্থনা করছি।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي.وأخرجه النسائي (7821) عن قتيبة بن سعيد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 21/ (14023) عن عفان بن مسلم، عن خلف بن خليفة، به.وأخرجه أحمد 20/ (13003) و 21 / (13674)، وابن حبان (83) من طريق حماد بن سلمة، عن قتادة، عن أنس - لكن قال فيه بدلَ "ونفس لا تشبع": "وعمل لا يُرفَع".
[2] هو عنده في "صحيحه" برقم (2722).
362 - حدثنا أبو بكر إسماعيل بن محمد بن إسماعيل الضَّرير بالرَّيّ، حدثنا أبو حاتم محمد بن إدريس، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني الليث بن سعد.وأخبرنا أبو قُتيبة سَلْم بن فضل الأَدَمي بمكة، حدثنا عبد الله بن محمد بن ناجِيَة، حدثنا عَبْدة بن عبد الله الخُزَاعي، حدثنا زيد بن حُبَاب، حدثنا ليث بن سعد المِصري، حدثني خالد بن يزيد، عن عبد الواحد بن قيس، عن عبد الله بن عمرو قال: قالت لي قريش: تكتبُ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإنما هو بشرٌ يَعْضَبُ كما يَعْضَب البشرُ؟ فأتيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله، إنَّ قريشًا تقول: تكتبُ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإنما هو بشرٌ يَعْضَبُ كما يَعْضَب البشر؟ قال: فأَوْمأَ إِلى شَفَتَيهِ فقال: "والذي نفسي بيده، ما يَخرُجُ مما بينهما إلّا حقٌّ، فاكتُبْ" [1].هذا حديث صحيح الأسانيد أصلٌ في نَسْخ الحديث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولم يُخرجاه، وقد احتجَّا بجميع رُواته إلّا عبد الواحد بن قيس، وهو شيخ من أهل الشام، وابنُه عمر بن عبد الواحد الدمشقي أحد أئمة الحديث. وقد روى عبد الواحد بن قيس عن جماعة من الصحابة منهم أبو هريرة وأبو أُمامة الباهلي ووائلة بن الأسقَع، وروى عنه الأوزاعيُّ أحاديث.ولهذا الحديث شاهدٌ قد اتَّفقا على إخراجه على سبيل الاختصار عن همَّام بن مُنبِّه عن أبي هريرة أنه قال: ليس أحدٌ من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أكثر حديثًا مني إلّا عبد الله بن عمرو، فإنه كان يَكتُب وكنت لا أكتُب. وعن عمرو بن دينار عن وَهْب بن مُنبِّه عن أخيه همَّام عن أبي هريرة نحوه [2].فأما عبد الواحد بن قيس وحديثُه عن عبد الله بن عمرو، فقد وجدتُ له فيه شاهدًا من حديث عَمرو بن شعيب.362 م - وقد سمعتُ أبا الوليد حسّان بن محمد الفقيه يقول: سمعت الحسن بن سفيان يقول: سمعت إسحاق بن إبراهيم الحَنظَلي يقول: إذا كان الراوي عن عمرو بن شعيب ثقةً، فهو كأيوب عن نافع عن ابن عمر.فأما حديث الشاهد:
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরাইশরা আমাকে বলল: আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে (হাদীস) লেখেন? অথচ তিনি তো একজন মানুষ, মানুষের মতোই রাগ করেন? আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! কুরাইশরা বলছে: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে লেখেন, অথচ তিনি একজন মানুষ—মানুষের মতোই রাগ করেন? তিনি তখন তাঁর দু' ঠোঁটের দিকে ইশারা করলেন এবং বললেন: "যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! এই দুটির (ঠোঁটের) মধ্য থেকে যা বের হয়, তা সত্য ছাড়া আর কিছুই নয়। সুতরাং আপনি লিখতে থাকুন।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. ولم نقف عليه من هذا الوجه عند غير المصنف، وانظر ما بعده.
[2] أخرجه من هذا الطريق البخاري وحده في "صحيحه" برقم (113).
363 - فحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وَهْب، أخبرني عبد الرحمن بن سلمان، عن عُقَيل بن خالد، عن عَمْرو بن شعيب، أنَّ شعيبًا حدَّثه ومجاهد، أنَّ عبد الله بن عمرو حدَّثهم أنه قال: يا رسول الله، أكتبُ ما أسمَعُ منك؟ قال: "نعم" قلت: عند الغضب وعند الرِّضا؟ قال: "نَعَم، إنه لا يَنبَغي لي أن أقولَ إلّا حقًّا" [1].فليَعلَمْ طالبُ هذا العلم أنَّ أحدًا لم يتكلَّم قَطُّ في عمرو بن شعيب [2]، وإنما تكلَّم مسلم في سماع شعيب من عبد الله بن عمرو، فإذا جاء الحديث عن عمرو بن شعيب عن مجاهد عن عبد الله بن عمرو، فإنه صحيح، على أني إنما ذكرتُه شاهدًا لحديث عبد الواحد بن قيس.وقد رُوِيَ هذا الحديث بعَيْنه عن يوسف بن ماهَكَ:
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি কি আপনার নিকট থেকে যা শুনি, তা লিখে রাখব? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" আমি বললাম: রাগ ও সন্তুষ্টি উভয় অবস্থাতেই? তিনি বললেন: "হ্যাঁ। কেননা আমার মুখ দিয়ে সত্য ছাড়া অন্য কিছু বের হওয়া উচিত নয়।" এই ইলমের শিক্ষার্থীকে অবশ্যই জানা উচিত যে, কেউ কখনো আমর ইবনু শুআইব সম্পর্কে কথা বলেনি। বরং কেবল মুসলিম (ইমাম মুসলিম) শুআইব কর্তৃক আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে শ্রবণের বিষয়ে কথা বলেছেন। অতএব, যখন হাদীসটি আমর ইবনু শুআইব থেকে মুজাহিদ হয়ে আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে আসে, তখন তা সহীহ (বিশুদ্ধ)। তদুপরি, আমি এটিকে আব্দুল ওয়াহিদ ইবনে কাইসের হাদীসের সমর্থন (শাহিদ) হিসেবেই উল্লেখ করেছি। এই একই হাদীস ইউসুফ ইবনু মাহাক থেকেও বর্ণিত হয়েছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل عمرو بن شعيب، فهو صدوق حسن الحديث.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (754)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 31/ 259 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 4/ 318، وأبو طاهر المخلِّص في "المخلصيات" (692)، والخطيب البغدادي في "تقييد العلم" ص 79 من طريقين عن عبد الله بن وهب، به.وسيأتي برقم (6376) من طريق محمد بن إسحاق عن عمرو بن شعيب وحده عن أبيه عن جده. وأخرجه أبو داود (3646) عن مسدَّد، بهذا الإسناد. وقرن بمسدَّد أبا بكر بن أبي شيبة.وأخرجه أحمد 11/ (6510) عن يحيى بن سعيد، به.
[2] بل تكلَّم فيه غير واحد كيحيى القطان ويحيى بن معين وليَّنوا حديثه، راجع ترجمته في "تهذيب الكمال". وأخرجه أبو داود (3646) عن مسدَّد، بهذا الإسناد. وقرن بمسدَّد أبا بكر بن أبي شيبة.وأخرجه أحمد 11/ (6510) عن يحيى بن سعيد، به.
364 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن السَّمّاك ببغداد، حدثنا عبد الرحمن بن محمد بن منصور الحارِثي، حدثنا يحيى بن سعيد.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه - واللفظ له - حدثنا أبو المثنَّى، حدثنا مُسدَّد، حدثنا يحيى، عن عبيد الله بن الأخنَس، عن الوليد بن عبد الله، عن يوسف بن ماهَك، عن عبد الله بن عمرو قال: كنت أكتبُ كلَّ شيءٍ أسمعُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم وأريدُ حِفظَه، فنَهَتْني قريش وقالوا: تكتبُ كلَّ شيءٍ تسمعُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم بشرٌ يتكلَّم في الرِّضا والغضب؟! قال: فأمسكتُ، فذَكَرتُ ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "اكتُبْ، فوالَّذي نفسي بيده ما خَرَج منه إلّا حقٌّ"، وأشار بيده إلى فيهِ [1]. رواةُ هذا الحديث قد احتجَّا بهم عن آخرهم غير الوليد هذا، وأظنُّه الوليدَ بن أبي الوليد الشامي فإنه الوليد بن عبد الله [2]، وقد غَلَبَ على أبيه الكُنْية، فإن كان كذلك فقد احتجَّ به مسلم.وقد صحَّت الروايةُ عن أمير المؤمنين عمر بن الخطّاب أنه قال: قيِّدوا العلمَ بالكِتاب:
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে যা কিছু শুনতাম, মুখস্থ করার জন্য তা লিখে রাখতাম। তখন কুরাইশরা আমাকে বারণ করল এবং বলল: তুমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে শোনা সবকিছু লিখে রাখছ, অথচ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একজন মানুষ, যিনি সন্তুষ্টি ও রাগের সময় কথা বলেন?! তিনি বলেন, এরপর আমি লেখা বন্ধ করে দিলাম। আমি বিষয়টি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন: "লেখো। যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! তাঁর মুখ থেকে সত্য ছাড়া কিছুই বের হয় না।" এবং তিনি তাঁর মুখের দিকে হাত দিয়ে ইশারা করলেন।
আমীরুল মুমিনীন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সহীহ সনদে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন: "লেখা দ্বারা জ্ঞানকে বেঁধে রাখো।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. يحيى: هو ابن سعيد القطّان، وأبو المثنى: هو معاذ بن المثنى بن معاذ. وأخرجه أبو داود (3646) عن مسدَّد، بهذا الإسناد. وقرن بمسدَّد أبا بكر بن أبي شيبة.وأخرجه أحمد 11/ (6510) عن يحيى بن سعيد، به.
[2] الوليد بن عبد الله هذا راوٍ آخر غير الوليد بن أبي الوليد، وهو ابن أبي المغيث مكيٌّ، وهو راوي هذا الحديث، ولم يخرج له الشيخان أو أحدهما شيئًا، أما الوليد بن أبي الوليد الذي احتجَّ به مسلم فهو أكبر من هذا يروي عن عبد الله بن عمرو بلا واسطة، واسم أبي الوليد عثمان، وهو مدني لا شامي. السعدي: ورواه غيره عن أبي عاصم عن ابن جريج قال: حدَّث عبد الملك بن عبد عبد الله بن أبي سفيان، وكأنه أرسله عنه.
365 - حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعْدي، حدثنا أبو عاصم، عن ابن جُرَيج، عن عبد الملك بن عبد الله بن أبي سفيان، أنه سمع عمر بن الخطّاب يقول: قيِّدوا العلمَ بالكتاب [1]. وكذلك الرواية عن أنس بن مالك صحيحٌ من قوله، وقد أُسنِدَ من وجهٍ غير مُعتمَد، فأما الرواية من قوله:
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা জ্ঞানকে লিখে বেঁধে রাখো। অনুরূপভাবে, আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকেও তাঁর নিজস্ব বক্তব্য হিসেবে এই বর্ণনাটি সহীহ। যদিও তা একটি অ-নির্ভরযোগ্য সূত্রে বর্ণিত হয়েছে, তবে তাঁর বক্তব্য হিসেবে এটি সঠিক। আর তাঁর নিজস্ব বক্তব্য হিসেবে বর্ণিত...
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف من أجل عنعنة ابن جريج - وهو عبد الملك بن عبد العزيز بن جريج - ثم إنَّ في الإسناد من هذا الطريق هنا سقطًا بين عبد عبد الملك الله وعمر بن الخطاب، بينهما فيه عمرو بن أبي سفيان عمُّ عبد الملك كما سيأتي وهو ثقة. أبو عاصم هو الضحاك بن مخلد النبيل.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن" (758) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 9/ 49 - ومن طريقه ابن عبد البر في بيان العلم وفضله" (396) - والدارمي (514) عن أبي عاصم، عن ابن جريج، عن عبد الملك بن عبد الله بن أبي سفيان، عن عمه عمرو بن أبي سفيان، أنه سمع عمر بن الخطاب يقول … فذكره.وأخرجه كذلك الرامهرمزي في "المحدث الفاصل" (358)، والخطيب البغدادي في "تقييد العلم" ص 88 من طريق عمر بن حفص بن صبيح، عن أبي عاصم، عن ابن جريج قال: حدَّث عبدُ الملك؛ هكذا عند الخطيب، وفي المطبوع من الرامهرمزي: حدثني عبد الملك، فيصير الإسناد بهذا متصلًا، لكن الذي يرجح ما عند الخطيب قولُ البيهقي في "المدخل" (759) بإثر حديث إبراهيم بن عبد الله السعدي: ورواه غيره عن أبي عاصم عن ابن جريج قال: حدَّث عبد الملك بن عبد عبد الله بن أبي سفيان، وكأنه أرسله عنه.
366 - فحدَّثَناه أبو عبد الرحمن محمد بن عبد الله التاجر، حدثنا محمد بن إدريس الرازي، حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، حدثني أَبي، عن ثُمَامة، عن أنس: أنه كان يقول لبَنيهِ: قيِّدوا العلمَ بالكتاب [1]. أسنَدَه بعضُ البصريِين عن الأنصاري.وكذلك أسنده شيخٌ من أهل مكة غيرُ مُعتمَدٍ عن ابن جُرَيج:
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর ছেলেদেরকে বলতেন: জ্ঞানকে কিতাবের (লেখার) মাধ্যমে আবদ্ধ করে রাখো।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل عبد الله بن المثنى الأنصاري، والد محمد ثمامة: هو ابن عبد الله بن أنس بن مالك.وأخرجه البيهقي في "المدخل" (761) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 5/ 337 و 9/ 22، وزهير بن حرب في "العلم" (120)، والخطيب في "تقييد العلم" ص 96 من طريق محمد بن عبد الله الأنصاري، به.وأخرجه الدارمي (508)، والرامهرمزي في "المحدث الفاصل" (326)، والطبراني في "الكبير" (700)، والخطيب ص 97، وابن عبد البر في "بيان العلم وفضله" (410)، والقاضي عياض في "الإلماع" ص 147 من طرق عن عبد الله بن المثنى، به.وخالف عبدُ الحميد بن سليمان الخزاعي فرواه عن عبد الله بن المثنى بهذا الإسناد مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم، رواه عنه لُوَين في "جزئه" (54)، ومن طريقه أخرجه الرامهرمزي (327)، وأبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" (909)، وابن شاهين في "ناسخ الحديث ومنسوخه" (624)، وأبو طاهر في "المخلِّصيات" (556)، والخطيب في "تاريخ بعداد" 11/ 234، و "الجامع لأخلاق الراوي والسامع" (440)، و"تقييد العلم" ص 69، وابن عبد البر في "بيان العلم وفضله" (395)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (94)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 37/ 352 - 353.وعبد الحميد بن سليمان ضعيف، ووهم في رفعه كما قال الدارقطني في "العلل" 12/ 43 (2389)، قال: والصواب عن ثمامة: أنَّ أنسًا كان يقول ذلك لبنيه، ولا يرفعه. ونقل القاضي عياض في "الإلماع" عن موسى بن هارون الحافظ أنه قال: رفعه عبد الحميد، ولا يصحُّ رفعه.ورواه مرفوعًا أيضًا إسماعيل بن أبي أويس، عن إسماعيل بن إبراهيم بن عقبة، عن عمّه موسى بن عقبة، عن ابن شهاب الزهري، عن أنس بن مالك، أخرجه أبو نعيم في "أخبار أصبهان" 2/ 228، والقضاعي في "مسند الشهاب" (637). وإسماعيل بن أبي أويس متكلَّم فيه وهو يعتبر به في المتابعات والشواهد، إلا أنَّ عبد الله بن المثنى أحسن حالًا منه، فحديثه موقوفًا مقدَّم على حديث إسماعيل مرفوعًا، والله تعالى أعلم.
367 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن شاذانَ الجوهري.وأخبرني أحمد بن سهل الفقيه ببُخارَى، حدثنا صالح بن محمد بن حبيب؛ قالا: حدثنا سعيد بن سليمان الواسطي، حدثنا عبد الله بن المؤمَّل، حدثنا ابن جُرَيج، عن عطاء، عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قَيِّدوا العلمَ" قلت: وما تقييدُه؟ قال: "كِتابتُه" [1].
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ইলমকে (জ্ঞানকে) বন্দী করো।" আমি বললাম: কিভাবে তা বন্দী করা হবে? তিনি বললেন: "তা লিখে রাখার মাধ্যমে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف، عبد الله بن المؤمَّل ضعيف منكر الحديث، وقد اضطرب فيه.أخرجه الرامهرمزي في "المحدث الفاصل" (315)، والطبراني في "الكبير" (14330)، و "الأوسط" (548)، وأبو نعيم في "الحلية" 3/ 321، والبيهقي في "المدخل إلى السنن" (763)، والخطيب في "تقييد العلم" ص 68، وابن عبد البر في "بيان العلم وفضله" (412) و (413)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (96) من طرق عن سعيد بن سليمان، بهذا الإسناد. وسقط ابن جريج من "الأوسط" للطبراني.ورواه سُريج بن النعمان عن عبد الله بن المؤمَّل، عن ابن أبي مُليكة، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أخرجه الخطيب في "تقييد العلم" ص 68، و"الجامع لأخلاق الراوي والسامع" (439)، وابن الجوزي في "العلل" (95).ورواه معن بن عيسى عن عبد الله بن المؤمَّل أيضًا، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد الله بن عمرو بن العاص، أخرجه الخطيب في "التقييد" ص 69 و 75.وتابعه على روايته عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده إسماعيلُ بنُ يحيى عن ابن أبي ذئب عن عمرو بن شعيب به، أخرجه الرامهرمزي (318)، والخطيب في "التقييد" ص 69، وابن الجوزي في "العلل" (97)، وإسماعيل بن يحيى إن كان هو أبا يحيى التيمي، فإنه متَّهم بالكذب، وبه أعلَّه ابن الجوزي، فلا يفرح بهذه المتابعة.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 43/ 522 - 523 من طريق زيد بن يحيى الدمشقي، عن عمران بن موسى عن مكحول، عن عبد الله بن عمرو وعمران بن موسى لا يعرف، ومكحول لم يسمع من عبد الله بن عمرو، فالإسناد ضعيف.وأصحُّ ما ورد في هذا الباب عن عبد الله بن عمرو هو ما سلف عند المصنف برقم (364).
368 - حدثني عبد الله بن الحسين القاضي بمَرْو، حدثنا الحارث بن محمد، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا جرير بن حازم، عن يعلى بن حَكِيم، عن عِكْرمة، عن ابن عباس، قال: لما قُبِضَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قلتُ لرجل من الأنصار: هَلُمَّ فلنسأَلْ أصحابَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإنهم اليومَ كثير، فقال: واعجبًا لك يا ابنَ عباس، أترى الناسَ يَفتقِرون إليك وفي الناس من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم مَن فيهم؟! قال: فتركتُ ذاك، وأقبلتُ أسألُ أصحابَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإن كان يَبلُغُني الحديثُ عن الرجل فآتي بابَه وهو قائلٌ، فأتوسَّدُ ردائي على بابه تَسْفي الريحُ عليَّ من التراب، فيخرج فيراني فيقول: يا ابنَ عمّ رسول الله، ما جاءَ بك، هلَّا أرسلت إليَّ فآتيَك؟ فأقول: لا، أنا أحقُّ أن آتيَك، قال: فأسأله عن الحديث.فعاش هذا الرجلُ الأنصاريُّ حتى رآني وقد اجتمع الناسُ حولي يسألونني، فيقول: هذا الفتى كان أعقلَ منِّي [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، وهو أصلٌ في طلب الحديث وتوقير المحدِّث.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাত হলো, তখন আমি আনসার সম্প্রদায়ের এক ব্যক্তিকে বললাম: এসো, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের কাছে জিজ্ঞাসা করি, কারণ আজকে তাঁরা অনেক। সে বলল: হে ইবনু আব্বাস! তোমার জন্য আশ্চর্যের বিষয়! তুমি কি মনে করো যে, লোকেরা তোমার মুখাপেক্ষী হবে, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ তাদের মাঝে উপস্থিত আছেন?! ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি তার কথা ছেড়ে দিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের কাছে জিজ্ঞাসা করা শুরু করলাম। যদি কোনো ব্যক্তি সম্পর্কে আমার কাছে কোনো হাদীস পৌঁছাত, তবে আমি তার দরজায় যেতাম যখন সে দুপুরে বিশ্রামরত থাকত (ঘুমিয়ে থাকত)। আমি আমার চাদর তার দরজার সামনে বালিশ হিসেবে ব্যবহার করতাম এবং বাতাস আমার ওপর ধুলাবালি নিক্ষেপ করত। অতঃপর যখন সে (সাহাবী) বের হতেন এবং আমাকে দেখতেন, তখন বলতেন: হে রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চাচাতো ভাই! কী কারণে তুমি এসেছ? তুমি কি আমাকে খবর পাঠাতে পারতে না, তাহলে আমি তোমার কাছে আসতাম? আমি বলতাম: না, বরং আপনার কাছে আসা আমার জন্যই অধিক উপযুক্ত। তিনি বলেন: এরপর আমি তাঁকে হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতাম। এই আনসারী ব্যক্তিটি এরপর দীর্ঘদিন বেঁচে ছিলেন। এমনকি তিনি আমাকে দেখলেন যে, লোকেরা আমার চারপাশে সমবেত হয়ে আমাকে জিজ্ঞাসা করছে। তখন তিনি বলতেন: এই যুবকটি আমার চেয়ে বেশি বুদ্ধিমান ছিল।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. صحيح الحارث بن محمد: هو ابن أبي أسامة.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (673) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 2/ 317، والدارمي (590)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 542، والخطيب البغدادي في "الجامع لأخلاق الراوي والسامع" (215) من طرق عن يزيد بن هارون، به.وأخرجه عبد الله بن أحمد في "فضائل الصحابة" (1925)، والطبراني (10592) من طريق وهب بن جرير بن حازم، عن أبيه جرير، به.وسيأتي برقم (6427) من طريق سعيد بن مسعود المروزي عن يزيد بن هارون، لكن ذكر فيه سعيد بن جبير مكان عكرمة، وهي رواية شاذة، فكل من رواه عن يزيد ذكر فيه عكرمة.
369 - حدثنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرني ابن جُرَيج، أخبرني يونس بن يوسف، عن سليمان بن يَسَار قال: تفرَّق الناسُ عن أبي هريرة، فقال له ناتِلٌ أخو أهل الشام: يا أبا هريرة، حدِّثنا حديثًا سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ أولَ الناس يُقضَى فيه يومَ القيامة ثلاثةٌ: رجلٌ اسْتُشْهِدَ، فَأُتِيَ به فعرَّفه نِعَمَه فَعَرَفَهَا، فقال: ما عملتَ فيها؟ قال: قاتلتُ في سبيلِك حتى استُشهِدتُ، قال: كذبتَ، إنما أردتَ أن يقال: فلانٌ جريءٌ، فقد قيل، فيُؤمَرُ به فيُسحَبُ على وجهه حتى أُلقيَ في النار.ورجلٌ تعلَّم العلمَ وقرأ القرآنَ، فأُتيَ به فعرَّفه نِعمَه فعَرَفَها، فقال: ما عملتَ فيها؟ قال: تعلَّمتُ العلمَ وقرأتُ القرآن وعلَّمتُه فيك، قال: كذبتَ، إنما أردتَ أن يقال: فلانٌ عالمٌ، وفلانٌ قارئٌ، فقد قيل، فأُمِرَ به فسُحِبَ على وجهه حتى أُلقيَ في النار.ورجلٌ آتاه الله من أنواع المال، فأُتيَ به فعرَّفه نِعمَه فعَرَفَها، فقال: ما عملتَ فيها؟ قال: ما تركتُ من شيء تحبُّ أن أُنفِقَ فيه إلّا أنفقتُ فيه لك، قال: كذبتَ، إنما أردتَ أن يقال: فلانٌ جَوَاد، فقد قيل، فأُمِرَ به فسُحِبَ على وجهه حتى أُلقيَ في النار" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّيَاقة، ويونس بن يوسف: هو ابن عمرو بن حِمَاس الذي يروي عنه مالك بن أنس في "الموطأ"، ومالكٌ الحَكَم في كلِّ من رَوَى عنه، وقد خرَّجه مسلم.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সুলাইমান ইবনু ইয়াসার (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: লোকেরা যখন আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে চলে গেল, তখন শামের অধিবাসী নাতিল তাঁকে বললেন: হে আবূ হুরায়রা! আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শোনা একটি হাদীস আমাদের শোনান। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি:
কিয়ামতের দিন সর্বপ্রথম যে তিনজন মানুষের বিচার করা হবে, তারা হলো:
১. একজন শহীদ। তাকে নিয়ে আসা হবে। আল্লাহ তাকে তাঁর নিয়ামতসমূহ স্মরণ করিয়ে দেবেন। সে তা স্বীকারও করবে। আল্লাহ জিজ্ঞেস করবেন: তুমি এর বিনিময়ে কী আমল করেছ? সে বলবে: আমি তোমার রাস্তায় যুদ্ধ করেছি, এমনকি শহীদ হয়ে গেছি। আল্লাহ বলবেন: তুমি মিথ্যা বলেছ। তুমি চেয়েছিলে যেন লোকেরা বলে, 'অমুক ব্যক্তি সাহসী', তা বলা হয়ে গেছে। অতঃপর তাকে জাহান্নামে নিক্ষেপের আদেশ দেওয়া হবে এবং তাকে তার মুখের ওপর টেনেহিঁচড়ে জাহান্নামে ফেলে দেওয়া হবে।
২. এমন একজন লোক, যে জ্ঞান অর্জন করেছে ও কুরআন পাঠ করেছে। তাকে নিয়ে আসা হবে। আল্লাহ তাকে তাঁর নিয়ামতসমূহ স্মরণ করিয়ে দেবেন। সে তা স্বীকারও করবে। আল্লাহ জিজ্ঞেস করবেন: তুমি এর বিনিময়ে কী আমল করেছ? সে বলবে: আমি তোমার জন্য জ্ঞান অর্জন করেছি, কুরআন পাঠ করেছি এবং তা শিক্ষা দিয়েছি। আল্লাহ বলবেন: তুমি মিথ্যা বলেছ। তুমি চেয়েছিলে যেন লোকেরা বলে, 'অমুক ব্যক্তি আলেম' এবং 'অমুক ব্যক্তি ক্বারী (কুরআন তিলাওয়াতকারী)', তা বলা হয়ে গেছে। অতঃপর তাকে জাহান্নামে নিক্ষেপের আদেশ দেওয়া হবে এবং তাকে তার মুখের ওপর টেনেহিঁচড়ে জাহান্নামে ফেলে দেওয়া হবে।
৩. এমন একজন লোক, যাকে আল্লাহ বিভিন্ন প্রকার সম্পদ দান করেছিলেন। তাকে নিয়ে আসা হবে। আল্লাহ তাকে তাঁর নিয়ামতসমূহ স্মরণ করিয়ে দেবেন। সে তা স্বীকারও করবে। আল্লাহ জিজ্ঞেস করবেন: তুমি এর বিনিময়ে কী আমল করেছ? সে বলবে: তুমি যে সমস্ত বিষয়ে খরচ করা পছন্দ কর, আমি তার কোনোটাই বাদ দিইনি, বরং তোমার জন্যই তাতে খরচ করেছি। আল্লাহ বলবেন: তুমি মিথ্যা বলেছ। তুমি চেয়েছিলে যেন লোকেরা বলে, 'অমুক ব্যক্তি দানশীল', তা বলা হয়ে গেছে। অতঃপর তাকে জাহান্নামে নিক্ষেপের আদেশ দেওয়া হবে এবং তাকে তার মুখের ওপর টেনেহিঁচড়ে জাহান্নামে ফেলে দেওয়া হবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي.وأخرجه أحمد 14/ (8277)، ومسلم (1905)، والنسائي (4330) و (8029) و (11495) من طرق عن ابن جريج، بهذا الإسناد فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه. وسيأتي برقم (2556).وبنحوه سيأتي برقم (1541) من طريق عقبة بن مسلم عن شُفي عن أبي هريرة، وبرقم (2560) من طريق سهيل بن أبي صالح عن أبيه عن أبي هريرة. وانظر الحديث التالي.
370 - أخبرني أبو بكر بن إسحاق الفقيه من أصل كتابه، أخبرنا عُبيد بن محمد بن حاتم الحافظ - المعروف بالعِجْل - حدثنا إبراهيم بن زياد سَبَلان، حدثنا عبَّاد ابن عبَّاد، حدثنا يونس - وهو ابن عُبيد - عن سعيد المَقبُري، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ثلاثةٌ يَهلِكون عند الحساب: جوادٌ، وشجاعٌ، وعالمٌ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرطهما، وهو غريبٌ شاذٌّ إلّا أنه مختصر من الحديث الأول شاهدٌ له.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হিসাবের সময় তিন ব্যক্তি ধ্বংস হবে: একজন দাতা, একজন বীর এবং একজন আলেম।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح بما قبله، وهذا إسناد رجاله ثقات إلّا أنه مظنّة الانقطاع بين يونس بن عبيد وسعيد المقبري، فيونس بن عبيد لا يعرف له سماع من سعيد، وقد كان يُدخل بينهما في بعض الأحاديث واسطة مجهولة، ولعلَّ النسائي لهذا رماه بالتدليس، والله تعالى أعلم.عباد بن عباد: هو ابن حبيب بن المهلَّب الأزدي، أو الرملي الأُرسوفي، وكلاهما ثقة إلّا أنَّ المهلبي أوثق من الأرسوفي.وأخرجه أبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" (798)، ومن طريقه الشجري في "الأمالي" 2/ 221 - 222 من طريق عثمان بن خُرَّزاد - وهو عثمان بن عبد الله بن محمد الأنطاكي الحافظ - عن إبراهيم بن زياد، بهذا الإسناد مطولًا بنحو الحديث السابق.وقد أخطأ الألباني رحمه الله بإيراده هذا الحديث في "السلسلة الضعيفة" (3455) وإعلاله إياه بعبّاد بن عباد وأنه اختصره، فقد روي عنه مطولًا كما ترى عند غير الحاكم فوافق غيره ممَّن رواه مطوَّلًا، والله وليُّ التوفيق.
371 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا سليمان بن حَرْب، حدثنا حمَّاد بن سَلَمة، عن ثابت، عن أبي رافع قال: قال أبو هريرة: لولا ما أَخَذَ اللهُ على أهل الكتاب، ما حدَّثتُكم بشيءٍ، ثم تَلَا: {وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ لَتُبَيِّنُنَّهُ لِلنَّاسِ وَلَا تَكْتُمُونَهُ} [آل عمران: 187] [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولا أعلمُ له علَّةً، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আহলে কিতাবদের (কিতাবপ্রাপ্তদের) উপর আল্লাহ্ যে অঙ্গীকার গ্রহণ করেছেন, তা না থাকলে আমি তোমাদের কাছে কোনো কিছু বর্ণনা করতাম না। এরপর তিনি এই আয়াতটি তেলাওয়াত করলেন: “আর স্মরণ করো, যখন আল্লাহ্ কিতাবপ্রাপ্তদের কাছ থেকে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে, তোমরা তা অবশ্যই মানুষের কাছে সুস্পষ্টভাবে বর্ণনা করবে এবং তা গোপন করবে না।” [সূরা আলে ইমরান: ১৮৭]।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. ثابت: هو ابن أسلم البُناني، وأبو رافع: هو نُفيع الصائغ.وأخرجه أبو عوانة في "صحيحه" (8568)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 67/ 354 من طريقين عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وسيأتي معناه من وجه آخر عن أبي هريرة برقم (3111)، لكن تلا فيه الآية (159) من سورة البقرة، وانظر تتمة تخريجه هناك.
372 - أخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا عاصم بن محمد بن زيد، عن أبيه قال: كان أبو هريرة يقوم يومَ الجمعة إلى جانب المنبر فيَطرَحُ أعقابَ نعليه في ذراعَيهِ، ثم يَقبِضُ على رُمَّانة المنبر، يقول: قال أبو القاسم صلى الله عليه وسلم … ، قال محمدٌ صلى الله عليه وسلم … ، قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم .... قال الصادقُ المصدوق صلى الله عليه وسلم .... ثم يقول في بعض ذلك: "ويلٌ للعرب من شرٍّ قد اقتَرَب"، فإذا سمع حركةَ باب المقصورة بخروج الإمام جَلَس [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه هكذا، وليس الغَرَضُ في تصحيح حديث: "ويلٌ للعرب من شرٍّ قد اقترب"، فقد أخرجاه [2]، إنما الغرضُ فيه استحبابُ رواية الحديث على المنبر قبل خروج الإمام.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি জুমার দিন মিম্বরের পাশে দাঁড়াতেন এবং তাঁর জুতার পিছনের অংশগুলো দুই বাহুতে ঝুলিয়ে রাখতেন। এরপর তিনি মিম্বরের ফলকটি ধরতেন এবং বলতেন: ‘আবুল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন...’, ‘মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন...’, ‘আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন...’, ‘সত্যবাদী, যার সত্যতা প্রমাণিত (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন...’। অতঃপর তিনি এর মধ্যে মাঝে মাঝে বলতেন: "আরবদের জন্য আসন্ন অনিষ্টের কারণে দুর্ভোগ!" যখনই তিনি ইমামের বের হওয়ার কারণে মা‘সূরার (নির্দিষ্ট কক্ষ) দরজার শব্দ শুনতেন, তখনই বসে যেতেন।
এটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ হাদীস, যদিও তারা এটি এভাবে বর্ণনা করেননি। "আরবদের জন্য আসন্ন অনিষ্টের কারণে দুর্ভোগ" এই হাদীসের বিশুদ্ধতা প্রমাণ করা এখানে উদ্দেশ্য নয়, কারণ তারা এটি বর্ণনা করেছেন। বরং এর উদ্দেশ্য হলো ইমাম বের হওয়ার পূর্বে মিম্বরে হাদীস বর্ণনা করা মুস্তাহাব হওয়া।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح، وأعلَّه الذهبي بالانقطاع، مع أنَّ سماع محمد بن زيد - وهو ابن عبد الله بن عمر - من أبي هريرة محتمل جدًّا، فقد روى عمَّن هو أقدم وفاةً من أبي هريرة، ومحمد بن زيد مدنيٌّ وهو بَلَديُّ أبي هريرة، وقد وقع التصريح برؤيته وسماعه لأبي هريرة وهو يفعل ذلك فيما سيأتي برقم (6297) بإسناد صحيح من طريق شبابة بن سوّار عن عاصم بن محمد. أحمد بن يونس: هو أحمد بن عبد الله بن يونس، نسب هنا إلى جده.وهذا الخبر قد انفرد الحاكم بإخراجه فيما وقفنا عليه، إلّا قوله: "ويل للعرب من شر قد اقترب" فقد روي من وجوه أخرى عن أبي هريرة عند أحمد 15/ (9073) و (10926)، وأبي داود (4249)، وابن حبان (6705)، وغيرهم. وسيأتي عند المصنف برقم (8561) و (8699).
[2] البخاري (3346) ومسلم (2880) من حديث زينب بنت جحش. أما حديث أبي هريرة فلم يخرجاه كما سبق.
373 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا الربيع بن سليمان، أخبرنا الشافعي، أخبرنا سفيان.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه - واللفظ له - أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا الحُمَيدي، حدثنا سفيان، حدثني أبو النَّضْر سالم مولى عمر بن عبيد الله بن مَعمَر، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا أُلفِيَنَّ [1] أحدكم متَّكِئًا على أَريكتِه، يأتيه الأمرُ من أمري ممّا أمرتُ به أو نَهيتُ عنه، فيقول: ما أدري، ما وَجَدْنا في كتاب الله اتَّبعناه" [2].قد أقام سفيانُ بن عُيينة هذا الإسنادَ وهو صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، والذي عندي أنهما تَرَكاه لخلافٍ للمصريين في هذا الإسناد:
আবূ রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি যেন তোমাদের কাউকে এমন অবস্থায় না পাই যে, সে তার আসনে হেলান দিয়ে বসে আছে, আর তার কাছে আমার আদেশ-নিষেধ সম্পর্কিত কোনো নির্দেশ পৌঁছালো, তখন সে বলে, ‘আমি জানি না; আল্লাহর কিতাবে যা পেয়েছি, আমরা কেবল তাই অনুসরণ করব’।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا في "تلخيص المستدرك" والمطبوع ومصادر الحديث الأخرى، وفي النسخ الخطية: "لأُلفين".
[2] إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة.وأخرجه أحمد 39/ (23876)، وأبو داود (3605)، وابن ماجه (13)، والترمذي (2663) من طريق سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد - وفيه عند ابن ماجه: عن سالم أبي النضر أو زيد بن أسلم، وهذا لا يضر، فكلاهما ثقة، ووقع عند الترمذي محمد بن المنكدر مقرونًا بسالم، ثم بيَّن الترمذي أن رواية محمد بن المنكدر عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلة.وأخرجه بنحوه أحمد (23861) من طريق عبد الله بن المبارك، عن عبد الله بن لهيعة، عن سالم أبي النضر، به.
374 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وَهْب، أخبرني مالك، عن أبي النَّضْر، عن عبيد الله بن أبي رافع، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا أعرِفنَّ الرجلَ متَّكئًا، يأتيه الأمرُ من أمري ممّا أمرت به أو نهيتُ عنه، فيقول: ما نَدْري، هذا هو كتابُ الله، وليس هذا فيه" [1].
উবাইদুল্লাহ ইবনু আবী রাফি' থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "আমি যেন তোমাদের কাউকে হেলান দিয়ে বসে থাকা অবস্থায় না পাই, যার কাছে আমার কোনো নির্দেশ পৌঁছাল—যা আমি আদেশ করেছি বা নিষেধ করেছি—কিন্তু সে বলল: 'আমরা এটি জানি না। এটি তো আল্লাহর কিতাব (কুরআন), আর এই (হুকুম) এর মধ্যে নেই'।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح رجاله ثقات، وقد خولف ابن وهب عن مالك في إرساله، فرواه أبو إسحاق الفزاري عن مالك موصولًا بذِكْر أبي رافع فيه أخرجه من طريقه ابن حبان في "صحيحه" (13).
375 - قال [1]: وأخبرني عمرو بن الحارث، عن أبي النضر، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن النبي صلى الله عليه وسلم. قال: وأخبرني الليث بن سعد، عن أبي النضر، عن موسى بن عبد الله بن قيس، عن أبي رافع، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال والناسُ حولَه: "لا أعرفَنَّ أحدَكم يأتيه الأمرُ من أمري قد أمرتُ به أو نهيتُ عنه، وهو متَّكئٌ على أَريكتِه، فيقول: ما وَجَدْنا في كتاب الله عَمِلْنا به، وإلَّا فلا" [2].قال الحاكم: أنا على أصلي الذي أصَّلتُه في خُطْبة هذا الكتاب: أنَّ الزيادة من الثِّقة مقبولة، وسفيان بن عُيَينة حافظ ثقة ثبت، وقد مَيَّز وحَفِظَ واعْتَمَدْنا حفظَه بعد أن وجدنا للحديث شاهدين بإسنادين صحيحين، أمّا أحدهما:
আবূ রাফে’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর আশেপাশে উপস্থিত লোকেদের উদ্দেশ্যে বললেন: আমি যেন তোমাদের মধ্যে এমন কাউকে না পাই, যার কাছে আমার কোনো নির্দেশ আসে—যা আমি আদেশ করেছি বা নিষেধ করেছি—আর সে তার পালঙ্কে হেলান দিয়ে বসে আছে, আর বলে: আল্লাহর কিতাবে যা আমরা পাব, তা দিয়েই আমল করব; অন্যথায় নয়।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] القائل هو عبد الله بن وهب.وحديث عمرو بن الحارث هذا أخرجه الطحاوي في "معاني الآثار" 4/ 209 عن يونس بن عبد الأعلى، عن ابن وهب عن عمرو بن الحارث، عن أبي النضر، عن أبي رافع، عن النبي صلى الله عليه وسلم. هكذا وقع عنده، وعند الدارقطني في "العلل" 7/ 9 و (1672) كما عند الحاكم سواءٌ.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة موسى بن عبد الله بن قيس.وأخرجه الطحاوي 4/ 209 من طريق ابن وهب، والطبراني في "الكبير" (975)، و "الأوسط" (8671) من طريق عبد الله بن صالح، كلاهما عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد. عوف الجرشي، عن المقدام بن معدي كرب دون قوله: "وإن ما حرَّم رسولُ الله كما حرَّم الله"، وإسناده صحيح.
376 - فأخبرَناه أبو الحسن أحمد بن محمد بن عَبْدُوس، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا عبد الله بن صالح، أن معاوية بن صالح أخبره.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حَنْبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن - وهو ابن مَهْدي - حدثنا معاوية بن صالح، حدثني الحسن بن جابر، أنه سمع المِقدامَ بن مَعْدِي كَرِبَ الكِنْدي صاحب النبي صلى الله عليه وسلم يقول: حَرَّم النبيُّ صلى الله عليه وسلم أشياءَ يومَ خَيبر منها الحمارُ الأهلي وغيره، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يُوشِكُ أن يَقعُدَ الرجلُ منكم على أَريكتِه يحدَّثُ بحديثي فيقول: بيني وبينَكم كتابُ الله، فما وَجَدْنا فيه حلالًا استَحَلْلناه، وما وَجَدْنا فيه حرامًا حرَّمناه، وإنَّ ما حرَّمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم كما حَرَّمَ اللهُ" [1]. وأما الحديث الثاني:
মিকদাম ইবনে মা'দী কারিব আল-কিন্দি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী, তিনি বলেন: নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারের দিন কিছু জিনিস হারাম করেছিলেন, যার মধ্যে গৃহপালিত গাধা ও অন্যান্য ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "শীঘ্রই তোমাদের মধ্যে এমন লোক আসবে, যে তার পালঙ্কে হেলান দিয়ে বসে থাকবে। তাকে যখন আমার কোনো হাদীস শোনানো হবে, সে বলবে: 'আমার ও তোমাদের মধ্যে আল্লাহর কিতাবই যথেষ্ট। আমরা তাতে যা হালাল পেয়েছি, তাকে হালাল মনে করেছি এবং যা হারাম পেয়েছি, তাকে হারাম মনে করেছি।' অথচ, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা হারাম করেছেন, তা আল্লাহ যা হারাম করেছেন তারই অনুরূপ।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن إن شاء الله، الحسن بن جابر روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات".والحديث في "مسند أحمد" 28/ (17194)، وقرن فيه بعبد الرحمن بن مهدي زيدَ بنَ الحُباب. وأخرجه ابن ماجه (12) من طريق زيد بن الحُباب، والترمذي (2664) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، كلاهما عن معاوية بن صالح، به. وقال الترمذي حديث حسن.وأخرجه أحمد (17174)، وأبو داود (4604)، وابن حبان (12) من طريق عبد الرحمن بن أبي عوف الجرشي، عن المقدام بن معدي كرب دون قوله: "وإن ما حرَّم رسولُ الله كما حرَّم الله"، وإسناده صحيح.
377 - فحدَّثَناه أبو بكر محمد بن عبد الله بن عَتَّاب العَبْدي ببغداد، حدثنا محمد بن خَليفة العاقُولي عَنبَرٌ، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا عُقْبة بن خالد الشَّنِّي، حدثنا الحسن قال: بينما عِمرانُ بن حصين يحدِّث عن سُنَّة نبيِّنا صلى الله عليه وسلم، إذ قال له رجل: يا أبا نُجَيد، حدِّثنا بالقرآن، فقال له عمران: أنت وأصحابُك تقرؤون القرآن، أكنتَ محدِّثِي عن الصلاة وما فيها وحدودِها؟ أكنتَ محدِّثي عن الزكاة في الذهب والإبل والبقر وأصناف المال؟ ولكن قد شَهِدتُ وغِبتَ أنت، ثم قال: فَرَضَ علينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في الزكاة كذا وكذا، وقال الرجل: أحييتني أحْياكَ الله. قال الحسن: فما مات ذلك الرجل حتى صارَ من فقهاءِ المسلمين [1]. عُقْبة بن خالد الشَّنِّي من ثقات البصريين وعُبّادهم، وهو عزيز الحديث، يُجمَع حديثه فلا يَبلُغ تمام العشرة. وصلَّى الله على محمد وآله أجمعين.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত সম্পর্কে বর্ণনা করছিলেন। তখন এক ব্যক্তি তাঁকে বলল: হে আবু নুজাইদ, আপনি আমাদের কুরআন থেকে বলুন। ইমরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: তুমি এবং তোমার সাথীরা তো কুরআন পাঠ করো। সালাত (নামাজ) এবং তাতে যা কিছু রয়েছে, আর তার সীমা-পরিসীমা (বিধি-বিধান) সম্পর্কে কি তুমি আমাকে জানাতে পারবে? তুমি কি আমাকে সোনা, উট, গরু এবং অন্যান্য প্রকার সম্পদের যাকাত সম্পর্কে জানাতে পারবে? অথচ আমি উপস্থিত ছিলাম আর তুমি অনুপস্থিত ছিলে। অতঃপর তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাকাতের ক্ষেত্রে আমাদের উপর এ রকম এ রকম ফরয করেছেন। লোকটি বলল: আপনি আমাকে জীবন দিলেন, আল্লাহ আপনাকে জীবন দান করুন। [রাবী] হাসান [আল-বাসরী] (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ওই ব্যক্তি মুসলিম ফুকাহাদের (ইসলামী আইনজ্ঞ) একজন না হওয়া পর্যন্ত মৃত্যুবরণ করেনি।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حسن إن شاء الله، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عقبة بن خالد الشَّنِّي، فقد انفرد بالرواية عنه مسلم ابن إبراهيم الفراهيدي، ومع ذلك فقد ذكره ابن حبان في "الثقات"، ووثقه المصنف كما سيأتي لاحقًا، وهما من المتساهلين في إطلاق التوثيق، والحسن - وهو البصري - في سماعه من عمران بن حصين خلاف كما سلف عند الحديث (78)، لكن كلاهما - أي: عقبة والحسن - قد توبعا.وأخرجه ابن حبان في "الثقات" 7/ 247 - 248، والخطيب البغدادي في "الفقيه والمتفقه" (238) من طريق أبي خليفة الفضل بن الحباب، والطبراني في "الكبير" 18/ (369) عن علي بن عبد العزيز، وابن مخلد في "حديثه" (70) من طريق حامد بن سهل الثغري، ثلاثتهم عن مسلم بن إبراهيم، بهذا الإسناد - ووقع في رواية الفضل بن الحباب وحده تصريحُ الحسن البصري أنه كان عند عمران بن حصين عندما وقعت هذه القصة.وأخرج نحوه الخطيب (237) من طريق عبد الوهاب الثقفي، عن عنبسة الغَنَوي، عن الحسن البصري، به وعنبسة الغنوي - وهو ابن أبي رائطة - لا يكاد يُعرَف.وأخرجه كذلك الخطيب (236) من طريق معمر، عن علي بن زيد بن جُدْعان، عن أبي نضرة - وهو المنذر بن مالك - عن عمران بن حصين وابن جدعان ضعيف، لكن باجتماع هذه الطرق يَحسُن الخبر إن شاء الله تعالى.
378 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا الربيع بن سليمان، أخبرنا الشافعي، أخبرنا سفيان، عن هشام بن حُجَير قال: كان طاووسٌ يصلي ركعتين بعد العصر، فقال له ابن عباس: اترُكْها، فقال: إنما يُنهَى عنهما أن تُتَّخَذَ سُلَّمًا أن يُوصِلَ ذلك إلى غروب الشمس، قال ابن عباس: فإنَّ النبي صلى الله عليه وسلم وقد نهى عن صلاةٍ بعد العصر، وما أدري أيُعذَّب عليه أم يُؤجَر، لأنَّ الله يقول: {وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَمْرًا أَنْ يَكُونَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ} [الأحزاب: 36] [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين موافقٌ لما قدَّمنا ذِكرَه من الحثِّ على اتباع السُّنة، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাউস আসরের পরে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। তখন ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: এটা ছেড়ে দিন। তিনি (তাউস) বললেন: আসরের পর সালাত আদায় করতে নিষেধ করা হয়েছে শুধু এই কারণে, যাতে সেগুলোকে এমন সিঁড়ি হিসেবে ব্যবহার করা না হয় যা সূর্য ডোবার সময় পর্যন্ত টেনে নিয়ে যায় (অর্থাৎ মাকরূহ ওয়াক্তে সালাতে লিপ্ত হওয়া থেকে বাঁচানোর জন্য)। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসরের পর সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন। আমি জানি না এর কারণে তাকে শাস্তি দেওয়া হবে, নাকি পুরস্কার দেওয়া হবে। কারণ আল্লাহ তাআলা বলেছেন: "আল্লাহ ও তাঁর রাসূল কোনো বিষয়ে ফয়সালা দিলে কোনো মুমিন পুরুষ বা মুমিন নারীর সে বিষয়ে ভিন্ন কোনো এখতিয়ার থাকে না।" (সূরা আল-আহযাব: ৩৬)
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن إن شاء الله من أجل هشام بن حجير سفيان: هو ابن عيينة.وأخرجه الدارمي (448)، والبزار (4871)، والبيهقي في "السنن" 2/ 453، والخطيب البغدادي في "الفقيه والمتفقه" (386)، وابن عبد البر في "بيان العلم وفضله" (2339) من طرق عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه مختصرًا النسائي (368) عن أحمد بن حرب، عن سفيان، به واقتصر على قوله: إنَّ النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن الصلاة بعد العصر.وأخرجه بنحو رواية المصنف وغيره: الشافعي في "السنن المأثورة" (393)، والبزار (4870)، والطحاوي في "معاني الآثار" 1/ 305، والبيهقي في "معرفة السنن والآثار" (113) و (5147)، والخطيب (385) من طريق عامر بن مصعب، عن طاووس، عن ابن عباس. وهذا إسناد يصلح للاعتبار به في المتابعات والشواهد.وأما النهي عن الصلاة بعد العصر فقد صحَّ في عدة أحاديث عن غير واحدٍ من الصحابة، انظر تخريج حديث ابن عمر في "مسند أحمد" 8/ (4612)
379 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا عفَّان، حدثنا شُعْبة. وأخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا أبو عمر الحَوْضي، حدثنا شعبة، عن سعد بن إبراهيم، عن أبيه: أنَّ عمر بن الخطَّاب قال لابن مسعود ولأبي الدَّرداء ولأبي ذر: ما هذا الحديثُ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم؟! وأحسبُه حَبَسَهم بالمدينة حتى أُصيب [1].
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইবনু মাসঊদ, আবূ দারদা ও আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর পক্ষ থেকে এই কেমন হাদীস?! আর আমি ধারণা করি যে, তিনি (উমর) তাদের (এই তিনজনকে) মদীনায় আবদ্ধ করে রেখেছিলেন যতক্ষণ না তিনি (নিজে) শাহাদাত বরণ করেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو عمر الحوضي: هو حفص بن عمر، وإبراهيم: هو ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه الطحاوي في "مشكل الآثار" 15/ 311 - 312 من طريق أبي النضر هاشم بن القاسم، عن شعبة، بهذا الإسناد. وانظر ما بعده.
380 - حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن الحسن بن علي بن بَحْر البَرِّي، حدثنا عبد الله بن جعفر البَرمَكي، حدثنا مَعْن بن عيسى.وحدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري وعلي بن عيسى الحِيري قالا: حدثنا أبو عبد الله محمد بن إبراهيم العَبْدي، حدثنا إسحاق بن موسى الأنصاري، حدثنا معن بن عيسى، حدثنا مالك بن أنس، حدثني عبد الله بن إدريس، عن شُعْبة، فذكر الحديث بإسناده نحوه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، وإنكارُ عمرَ أميرُ المؤمنين على الصحابة كَثْرة الرواية عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه سُنَّة، ولم يُخرجاه.
৩৮০ - আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ আব্দুল্লাহ মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ আস-সাফফার, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আল-হাসান ইবনু আলী ইবনু বাহর আল-বাররী, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু জা'ফর আল-বারমাকী, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মা'ন ইবনু ঈসা। আর আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ যাকারিয়া ইয়াহইয়া ইবনু মুহাম্মাদ আল-আম্বারী ও আলী ইবনু ঈসা আল-হীরী। তারা দুজন বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ আব্দুল্লাহ মুহাম্মাদ ইবনু ইবরাহীম আল-আবদী, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইসহাক ইবনু মূসা আল-আনসারী, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মা'ন ইবনু ঈসা, তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মালিক ইবনু আনাস, তিনি বলেন, আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু ইদরীস, তিনি বর্ণনা করেছেন শু'বাহ থেকে। তিনি হাদীসটি তার ইসনাদসহ প্রায় অনুরূপভাবে উল্লেখ করেছেন [১]। এটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ হাদীস। আর আমীরুল মু'মিনীন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে সাহাবীগণকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বেশি পরিমাণে হাদীস বর্ণনা করা নিয়ে আপত্তি জানানো (বা নিরুৎসাহিত করা) একটি সুন্নাহ (পদ্ধতি)। কিন্তু তারা (শাইখাইন) এটি সংকলন করেননি।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. ورواية مالك هنا عن عبد الله بن إدريس من باب رواية الشيخ عن تلميذه، فمالكٌ شيخ ابن إدريس.وأخرجه الطحاوي 15/ 312، وابن الأعرابي في "معجمه" (2284) من طريقين عن أبي موسى إسحاق بن موسى الأنصاري، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 8/ 756 عن عبد الله بن إدريس، به.