আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
401 - ما أخبرنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا سهل بن أحمد بن عثمان الواسطي من كتابه، حدثنا يحيى بن حبيب بن عَرَبيّ، حدثنا المعتمِر بن سليمان قال: قال أبو سفيان سليمان بن سفيان المَدِيني، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر، أنَّ نبيّ الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا يَجمَعُ الله أمَّتي على ضلالةٍ أبدًا، ويد الله على الجماعةِ هكذا، فاتَّبِعوا السَّوادَ الأعظمَ، فإنه مَن شَذَّ شَذَّ في النار" [1].والخلاف السابع على المعتمِر فيه:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তা‘আলা আমার উম্মাতকে কখনো গোমরাহীর ওপর একত্রিত করবেন না। আর জামা‘আতের (ঐক্যবদ্ধ দলের) ওপর আল্লাহর হাত এভাবে (রয়েছে)। সুতরাং তোমরা বৃহত্তর জনসমষ্টিকে অনুসরণ কর। কারণ যে ব্যক্তি দলছুট হবে, সে (আসলে) জাহান্নামে দলছুট হবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف سليمان بن سفيان.وأخرجه الطبراني (13624) عن سهل بن أبي سهل الواسطي، عن يحيى بن حبيب بن عربي، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (368) من طريق محمد بن هشام بن أبي خيرة، عن المعتمر بن سليمان، به.وأخرجه الطبراني (13623) من طريق محمد بن أبي بكر المقدمي عن معتمر بن سليمان، عن مرزوق مولي آل طلحة، عن عمرو بن دينار، به - وهذا اختلاف آخر في إسناد هذا الحديث لم يذكره الحاكم، ومرزوق هذا لا يعرف، والمحفوظ سليمان المدني، وهو مولى آل طلحة بن عبيد الله.
402 - ما حدَّثناه أبو الحسن محمد بن الحسين بن منصور، حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن يونس البَزَّاز، حدثنا أبو بكر بن نافع، حدثنا معتمِر بن سليمان، حدثني سليمان أبو عبد الله المدني، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الله لا يَجمَعُ أمَّتي - أو قال: أمَّة محمد صلى الله عليه وسلم على ضلالةٍ أبدًا، ويدُ الله على الجماعة - وقال بيده يَبسُطُها - إِنَّه مَن شَذَّ شَذَّ في النار" [1].قال الحاكم: فقد استقرَّ الخلافُ في إسناد هذا الحديث على المعتمر بن سليمان - وهو أحد أركان الحديث - من سبعة أوجهٍ لا يَسَعُنا أن نَحكُم أَنَّ كلَّها محمولة على الخطأ، ولا أنَّ كلَّها محمولة على الصواب، وقد كنتُ أسمع أبا علي الحسين بن علي الحافظ يحكم بالصواب لقول من قال: عن المعتمر عن سليمان بن سفيان المديني عن عبد الله بن دينار، ونحن إذا قلنا هذا القول نَسَبْنا الراوي إلى الجهالة فوَهَّنّا به الحديث، ولكنا نقول: إنَّ المعتمر بن سليمان أحدُ أئمَّة الحديث، وقد رُوِيَ عنه هذا الحديث بأسانيدَ يَصِحُّ بمثلها الحديث، فلا بدَّ من أن يكون له أصل بأحد هذه الأسانيد.ثم وَجَدْنا للحديث شواهدَ من غير حديث المعتمر لا أدَّعي صحتَها ولا أحكمُ بتوهينها، بل يَلْزَمُني ذِكرُها لإجماع أهل السُّنّة على هذه القاعدة من قواعد الإسلام، فممَّن رُوِيَ عنه هذا الحديث من الصحابة عبدُ الله بن عباس:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা আমার উম্মতকে – অথবা তিনি বললেন: মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের উম্মতকে – কখনোই ভ্রষ্টতার উপর একত্রিত করবেন না। আর আল্লাহর হাত (সাহায্য) জামা‘আতের (ঐক্যবদ্ধ দলের) উপর রয়েছে।” (তিনি তাঁর হাত বাড়িয়ে এভাবে ইশারা করলেন।) “নিশ্চয় যে ব্যক্তি বিচ্ছিন্ন হবে, সে জাহান্নামে বিচ্ছিন্ন হবে।” [১]
হাকিম বলেন: মু'তামির ইবনু সুলাইমানকে কেন্দ্র করে এই হাদীসের সনদে সাতটি দিক থেকে মতানৈক্য স্থায়ী হয়েছে – আর তিনি (মু'তামির) হাদীসের অন্যতম প্রধান স্তম্ভ। আমাদের পক্ষে এই রায় দেওয়া সম্ভব নয় যে, সবগুলোই ভুল অথবা সবগুলোই সঠিক। আমি আবু আলী আল-হুসাইন ইবনু আলী আল-হাফিজকে এমন ব্যক্তির বক্তব্যকে সঠিক বলে রায় দিতে শুনেছি যিনি বলেছেন: মু'তামির, সুলাইমান ইবনু সুফইয়ান আল-মাদানী, আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার সূত্রে (বর্ণনা করেছেন)। কিন্তু আমরা যদি এই বক্তব্য গ্রহণ করি, তবে বর্ণনাকারীকে অজ্ঞাত বলে গণ্য করব এবং এর দ্বারা হাদীসটিকে দুর্বল করে দেব। তবে আমরা বলব: মু'তামির ইবনু সুলাইমান হাদীসশাস্ত্রের ইমামদের মধ্যে একজন। তার সূত্রে এই হাদীস এমন একাধিক সনদে বর্ণিত হয়েছে যার মাধ্যমে হাদীসটি সহীহ হতে পারে। সুতরাং এর মূল অবশ্যই এই সনদগুলোর মধ্যে কোনো একটিতে থাকতে হবে।
এরপর আমরা মু'তামিরের হাদীস ছাড়াও এই হাদীসের জন্য সহায়ক প্রমাণ (শাওয়াহিদ) পেয়েছি, যার বিশুদ্ধতা আমি দাবি করি না এবং এটিকে দুর্বল বলে রায়ও দেই না। বরং ইসলামের এই মূলনীতির ব্যাপারে আহলুস সুন্নাহর ইজমার কারণে আমার জন্য তা উল্লেখ করা আবশ্যক। যেসব সাহাবী থেকে এই হাদীসটি বর্ণিত হয়েছে, তাদের মধ্যে আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস অন্যতম:
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وانظر ما سلف برقم (398).
403 - حدثنا أبو الوليد حسَّان بن محمد الفقيه إملاءً وقراءةً، حدثنا محمد بن سليمان بن خالد، حدثنا سَلَمة بن شَبِيب، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا إبراهيم بن ميمون، أخبرني عبد الله بن طاووس، أنه سمع أباه يحدِّث، أنه سمع ابنَ عباس يحدِّث، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا يَجمَعُ الله أمَّتي - أو قال: هذه الأُمة - على الضلالةِ أبدًا، ويدُ الله على الجماعة" [1].
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ আমার উম্মতকে—অথবা তিনি বলেছেন: এই উম্মতকে—কখনোই পথভ্রষ্টতার ওপর একত্রিত করবেন না। আর আল্লাহর হাত জামা‘আতের (ঐক্যবদ্ধ দলের) সঙ্গে রয়েছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح، ومحمد بن سليمان بن خالد - وهو العبدي الميداني النيسابوري - ذكره الحاكم في "تاريخ نيسابور" (كما في "منتخبه" للخليفة النيسابوري ص 55) وقال شيخ مشهور، وقد توبع في الذي يليه، وباقي رجال الإسناد ثقات.وأخرجه الترمذي (2166) عن يحيى بن موسى، عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد. واقتصر على قوله: "يد الله مع الجماعة"، وقال: حديث حسن. وانظر ما بعده.
404 - حدَّثَناه أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا موسى بن هارون، حدثنا العباس بن عبد العظيم، حدثنا عبد الرزاق، حدثنا إبراهيم بن ميمون العَدَني - وكان يُسمَّى قُريشَ اليمن، وكان من العابدين المجتهدين - قال: قلت لأبي جعفرٍ: والله لقد حدَّثني ابن طاووس عن أبيه قال: سمعت ابنَ عباس يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يَجمَعُ اللهُ أمَّتي على ضلالةٍ أبدًا، ويدُ الله على الجماعة" [1]. قال الحاكم: فإبراهيمُ بن ميمون العَدَني هذا قد عدَّله عبدُ الرزاق وأثنى عليه، وعبد الرزاق إمامُ أهل اليمن وتعديلُه حُجَّة.وقد رُوِيَ هذا الحديث عن أنس بن مالك:
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আল্লাহ তাআলা কখনোই আমার উম্মতকে পথভ্রষ্টতার উপর একত্রিত করবেন না এবং আল্লাহর হাত জামা‘আতের (ঐক্যবদ্ধ দলের) উপর থাকে।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. وانظر ما قبله.
405 - حدَّثَناه علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن عيسى بن السَّكَن الواسطي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا مبارَك أبو سُحَيم مولى عبد العزيز بن صهيب، حدثنا عبد العزيز بن صهيب، عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه سأل ربَّه أربعًا: سأل ربَّه أن لا تموتَ أُمَّتُه [1] جوعًا، فأُعطيَ ذلك، وسأل ربَّه أن لا يجتمعوا على ضلالةٍ، فأُعطيَ ذلك، وسأل ربَّه أن لا يرتدُّوا كفارًا، فأُعطيَ ذلك، وسأل ربَّه أن لا يَغلِبَهم عدوٌّ لهم فيستبيحَ بَيْضتَهم، فأُعطيَ ذلك، وسأل ربَّه أن لا يكونَ بأسُهم بينهم، فلم يُعطَ ذلك [2].أما مُبارَك بن سُحَيم، فإنه ممَّن لا يُمشَّي في مثل هذا الكتاب، لكني ذكرتُه اضطرارًا.الحديث الثالث في حُجَّة العلماء بأنَّ الإجماع حُجَّة:
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর রবের কাছে চারটি জিনিস চাইলেন। তিনি তাঁর রবের কাছে চাইলেন যেন তাঁর উম্মত অনাহারে মৃত্যুবরণ না করে, ফলস্বরূপ তাঁকে তা প্রদান করা হলো। তিনি তাঁর রবের কাছে চাইলেন যেন তারা কোনো ভ্রান্তির ওপর ঐক্যবদ্ধ না হয়, ফলস্বরূপ তাঁকে তা প্রদান করা হলো। তিনি তাঁর রবের কাছে চাইলেন যেন তারা মুরতাদ হয়ে কাফির না হয়ে যায়, ফলস্বরূপ তাঁকে তা প্রদান করা হলো। তিনি তাঁর রবের কাছে চাইলেন যেন তাদের কোনো শত্রু তাদের ওপর জয়লাভ করে তাদের কেন্দ্রস্থল বা ঐক্য ধ্বংস না করে দেয়, ফলস্বরূপ তাঁকে তা প্রদান করা হলো। আর তিনি তাঁর রবের কাছে চাইলেন যেন তাদের নিজেদের মধ্যে কোনো সংঘাত না হয়, কিন্তু তাঁকে তা প্রদান করা হয়নি।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] لفظ "أمته" سقط من (ز) و (ب) وأثبتناه من (ص) و (ع). وأخرجه أحمد 35/ (21560 - 21562)، وأبو داود (4758) من طرق عن مطرف، عن أبي الجهم، عن خالد بن وهبان به وانظر ما بعده.ويشهد له بلفظه حديثا ابن عمر والحارث الأشعري التاليان وهما صحيحان.وفي معناه في الباب غير ما حديث، انظرها عند حديث ابن عمر في "مسند أحمد" 9/ (5386).قِيد شبر: أي: قدر شبر.والرِّبقة، قال ابن الأثير في "النهاية": الرِّبقة في الأصل: عُرْوة في حبل تُجعل في عنق البهيمة أو يدها تمسكها، فاستعارها للإسلام، يعني: ما يشدُّ به المسلم نفسه من عرى الإسلام، أي: حدوده وأحكامه وأوامره ونواهيه.
[2] إسناده ضعيف جدًّا، مبارك أبو سحيم - وهو ابن سحيم - متروك. وأخرجه أحمد 35/ (21560 - 21562)، وأبو داود (4758) من طرق عن مطرف، عن أبي الجهم، عن خالد بن وهبان به وانظر ما بعده.ويشهد له بلفظه حديثا ابن عمر والحارث الأشعري التاليان وهما صحيحان.وفي معناه في الباب غير ما حديث، انظرها عند حديث ابن عمر في "مسند أحمد" 9/ (5386).قِيد شبر: أي: قدر شبر.والرِّبقة، قال ابن الأثير في "النهاية": الرِّبقة في الأصل: عُرْوة في حبل تُجعل في عنق البهيمة أو يدها تمسكها، فاستعارها للإسلام، يعني: ما يشدُّ به المسلم نفسه من عرى الإسلام، أي: حدوده وأحكامه وأوامره ونواهيه.
406 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا عمرو بن عَوْن.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا عمرو بن عَوْن، حدثنا خالد بن عبد الله، عن مُطرِّف، عن خالد بن وَهْبان، عن أبي ذرٍّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من فارقَ الجماعةَ قِيدَ شِبْرٍ، فقد خَلَعَ رِيْقةَ الإسلام من عُنقِه" [1]. تابعه جريرُ بن عبد الحميد الضّبي عن مطرِّف:
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জামাআত (মুসলিম সমাজ) থেকে এক বিঘত পরিমাণও বিচ্ছিন্ন হয়, সে যেন ইসলামের রজ্জু (বন্ধন) তার গলা থেকে খুলে ফেলল।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة خالد بن وهبان، ثم إنه منقطع هنا بينه وبين مطرِّف، بينهما فيه أبو الجهم كما عند غير المصنف، وأبو الجهم هو الذي تفرَّد بالرواية عن خالد بن وهبان، واسمه سليمان بن الجهم مطرف: هو ابن طريف الحارثي. وأخرجه أحمد 35/ (21560 - 21562)، وأبو داود (4758) من طرق عن مطرف، عن أبي الجهم، عن خالد بن وهبان به وانظر ما بعده.ويشهد له بلفظه حديثا ابن عمر والحارث الأشعري التاليان وهما صحيحان.وفي معناه في الباب غير ما حديث، انظرها عند حديث ابن عمر في "مسند أحمد" 9/ (5386).قِيد شبر: أي: قدر شبر.والرِّبقة، قال ابن الأثير في "النهاية": الرِّبقة في الأصل: عُرْوة في حبل تُجعل في عنق البهيمة أو يدها تمسكها، فاستعارها للإسلام، يعني: ما يشدُّ به المسلم نفسه من عرى الإسلام، أي: حدوده وأحكامه وأوامره ونواهيه.
407 - حدَّثَناه أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا جعفر بن سَوَّار، حدثنا قتيبة بن سعيد، حدثنا جَرير، عن مُطرِّف، عن خالد بن وَهْبان، عن أبي ذرٍّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن خالَفَ جماعةَ المسلمين شِبرًا، فقد خَلَعَ رِبْقةَ الإسلام من عُنقِه" [1].خالد بن وَهْبان لم يُذكَر بجَرْح في رواياته، وهو تابعي معروف، إلّا أنَّ الشيخين لم يخرجاه.وقد رُوِي هذا المتنُ عن عبد الله بن عمر بإسناد صحيح على شرطهما:
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মুসলিম জামা'আত থেকে এক বিঘত পরিমাণও বিচ্ছিন্ন হলো, সে তার গলা থেকে ইসলামের বন্ধন খুলে ফেলল।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره كسابقه. ويشهد له ما في الحديثين السابق واللاحق.
408 - أخبرَناه أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أبو إسماعيل محمد بن إسماعيل، حدثنا أبو صالح، حدثني الليث، حدثني يحيى بن سعيد قال: كَتَبَ إليَّ خالدُ بن أبي عِمران قال: حدثني نافع، عن عبد الله بن عمر، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من خَرَجَ من الجماعةِ قِيدَ شِبْرٍ، فقد خَلَعَ رِبْقةَ الإسلام من عُنقِه حتى يُراجِعَه"، وقال: "من مات وليس عليه إمامُ جماعةٍ، فإِنَّ مَوْتتَه مَوتةٌ جاهليَّة" [1]. الحديث الرابع فيما يدلُّ على أنَّ إجماع العلماء حُجَّة:
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জামাআত (ঐক্যবদ্ধতা) থেকে এক বিঘত পরিমাণও বিচ্ছিন্ন হয়, সে ইসলামে গলার রশি (বন্ধন) খুলে ফেলল, যতক্ষণ না সে তাতে ফিরে আসে।" তিনি আরও বলেছেন: "যে ব্যক্তি এমন অবস্থায় মারা যায় যে, তার উপর (যার আনুগত্যে) কোনো জামাআতের ইমাম নেই, তবে তার মৃত্যু হবে জাহিলিয়াতের মৃত্যু।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن إن شاء الله، أبو صالح - وهو عبد الله بن صالح كاتب الليث - حسن الحديث في المتابعات والشواهد، وهذا الحديث منها، وقد سلف عند المصنف برقم (261). ويشهد له ما في الحديثين السابق واللاحق.
409 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بكَّار بن قُتيبة القاضي بمصر، حدثنا أبو داود سليمان بن داود الطَّيالسي، حدثنا علي بن المبارَك، عن يحيى بن أبي كَثير، عن زيد بن سَلَّام، عن جدِّه قال: حدثني الحارث الأشعَري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "آمرُكم بخمس كَلِماتٍ أمرَني اللهُ بهنَّ: الجماعةِ، والسمعِ، والطاعةِ، والهجرةِ، والجهادِ في سبيل الله، فمن خَرَجَ من الجماعة قِيدَ شِبْر، فقد خَلَعَ رِبْقةَ الإسلام من رأسِه إلّا أن يَرجعَ" [1].وهكذا رواه بطوله معاويةُ بن سَلَّام وأبَانُ بن يزيد العطَّار عن يحيى بن أبي كثير.أما حديث معاوية:
হারেস আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে এমন পাঁচটি কাজের নির্দেশ দিচ্ছি, যা আল্লাহ আমাকে নির্দেশ দিয়েছেন: জামা‘আত (ঐক্যবদ্ধতা), শোনা, আনুগত্য করা, হিজরত এবং আল্লাহর পথে জিহাদ। সুতরাং, যে ব্যক্তি জামা‘আত থেকে এক বিঘত পরিমাণও বাইরে চলে গেল, সে তার গর্দান থেকে ইসলামের বন্ধন খুলে ফেলল, যদি না সে ফিরে আসে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. وانظر ما بعده.
410 - فحدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ، أخبرنا محمد بن غالب، أنَّ حفص بن عمر العُمَري حدثهم، قال: حدثنا معاوية بن سلَّام، عن يحيى بن أبي كثير، حدثني زيد بن سلَّام، أنه سمع أبا سلَّام يقول: حدثني الحارث الأشعَري، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إِنَّ الله أمَرني بخمسٍ أعملُ بهنَّ … " فذكر الحديث بطوله [1].وأما حديث أبانَ بن يزيد عن يحيى:
হারিছ আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ্ আমাকে পাঁচটি (বিষয়ের) নির্দেশ দিয়েছেন যা আমি যেন আমল করি..." অতঃপর তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করলেন। আর ইয়াহইয়া থেকে আবান ইবনু ইয়াযীদের হাদীস হলো:
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، حفص بن عمر العُمري هذا لعله هو حفص بن عمر بن سويد أبو عمر الخطّابي العدوي البغدادي، ترجمه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 14/ 423 - 425، والخطيب في "تاريخ بغداد" 9/ 89، وذكرا أنه روى عن معاوية بن سلام، إلّا أنهما لم يأثُرا فيه جرحًا أو تعديلًا، وباقي رجاله ثقات. وانظر ما بعده.
411 - فحدَّثَناه علي بن حَمْشاذَ، حدثنا تَميم بن محمد، حدثنا هُدْبة بن خالد، حدثنا أبانُ بن يزيد، حدثنا يحيى بن أبي كثير، أنَّ زيدًا حدَّثه، أنَّ أبا سلّام حدَّثه، أنَّ الحارث الأشعري حدَّثه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ الله أمرَ يحيى بنَ زكريا بخمسٍ فقال: تعملُ بهنَّ وأْمُرْ بني إسرائيل أن يعملوا بهنَّ" فذكر الحديث، وقال فيه: "إنَّ الله أمَرَني بخمسٍ" فذكره بطوله [1].هذا حديث صحيح على ما أصَّلْناه في الصحابة إذا لم نجد لهم إلّا راويًا واحدًا، فإنَّ الحارث الأشعريَّ صحابيٌّ معروف سمعتُ أبا العباس محمد بن يعقوب يقول: سمعت العباس الدُّورِيَّ يقول: سمعت يحيى بن مَعِين يقول: الحارث الأشعريُّ له صُحْبة.ولهذه اللفظة من من الحديث شاهد عن رسول الله صلى الله عليه وسلم:
হারিস আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা ইয়াহইয়া ইবনে যাকারিয়্যাকে পাঁচটি কাজের আদেশ করেছিলেন। তিনি বললেন: 'তুমি নিজে এই কাজগুলো করো এবং বনী ইসরাঈলকেও এই কাজগুলো করার জন্য আদেশ করো।'" অতঃপর তিনি (বর্ণনাকারী) সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করেন, এবং এতে (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বলেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ আমাকে পাঁচটি কাজের আদেশ করেছেন।" এরপর তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি বর্ণনা করলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو سلّام: هو ممطور الحبشي جدُّ زيد بن سلّام.وأخرجه ابن حبان (6233) عن عمران بن موسى بن مجاشع، عن هدبة بن خالد، بهذا الإسناد.وأخرجه بطوله الترمذي (2863) من طريق موسى بن إسماعيل، و (2864) من طريق أبي داود الطيالسي، كلاهما عن أبان بن يزيد، به. وقال: حديث حسن صحيح. وسيأتي عند المصنف برقم (1548) من طريق الطيالسي عن أبان.وأخرجه أحمد 28/ (17170) و 29/ (17800) من طريق موسى بن خلف، عن يحيى بن أبي كثير، به.ورواه مختصرًا معمر بن يحيى عن أبي كثير فقال فيه: عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أُراه أبا مالك الأشعري، أخرجه من طريقه أحمد 37/ (22910).وروى منه قطعة مختصرةً النسائي (11286) من طريق محمد بن شعيب، عن معاوية بن سلّام، عن أخيه زيد بن سلام، به. وقطعة منه ستأتي برقم (782) من طريق الربيع بن نافع عن معاوية. والمحفوظ في الحديث ما أخرجه أحمد 28/ (16876) عن أسود بن عامر، وابن حبان (4573) من طريق محمد بن يزيد بن رفاعة كلاهما عن أبي بكر بن عياش، بهذا الإسناد، بلفظ: "من مات بغير إمام، مات ميتة جاهلية". وإسناده حسن.
412 - حدَّثَناه أبو بكر بن أبي دارِمٍ الحافظ بالكوفة، حدثنا عبد الله بن غنَّام بن حفص بن غِيَاث، حدثني أَبي، حدثنا أبو بكر بن عيّاش، عن عاصم، عن أبي صالح، عن معاوية قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن فارق الجماعةَ شِبرًا، دَخَلَ النار" [1]. الحديث الخامس فيما يدلُّ على أنَّ الإجماع حُجَّة:
মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জামাআত (ঐক্যবদ্ধ মুসলিম সমাজ) থেকে এক বিঘত পরিমাণও বিচ্ছিন্ন হলো, সে জাহান্নামে প্রবেশ করলো।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لجهالة حال غنام بن حفص، وأبو بكر بن أبي دارم متكلَّم فيه. عاصم: هو ابن أبي النّجود، وأبو صالح: هو ذكوان السَّمّان، ومعاوية: هو ابن أبي سفيان. والمحفوظ في الحديث ما أخرجه أحمد 28/ (16876) عن أسود بن عامر، وابن حبان (4573) من طريق محمد بن يزيد بن رفاعة كلاهما عن أبي بكر بن عياش، بهذا الإسناد، بلفظ: "من مات بغير إمام، مات ميتة جاهلية". وإسناده حسن.
413 - أخبرنا أبو بكر محمد بن أحمد بن حاتم الدَاربردي بمَرْو، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى البِرْتي، حدثنا القَعنَبي.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه - واللفظ له - أخبرنا أبو المثنَّى، حدثنا القَعنَبي، حدثنا أسامة بن زيد، عن أبيه، جدّه، عن عن ابن عمر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من فارَقَ أُمّتَه، أو عادَ أعرابيًّا بعد هجرتِه، فلا حُجَّةَ له" [1].قد اتَّفق الشيخانٍ [2] على إخراج حديث غَيْلان بن جَرير عن زياد بن رِيَاح عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "مَن فارقَ الجماعةَ فمات مات مَوْتةً جاهليّة"، وهذا المتنُ غيرُ ذاك.الحديث السادس فيما يدلُّ على أنَّ الإجماع حُجّة:
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি তার উম্মত (সমাজ) থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়, অথবা হিজরতের পর পুনরায় বেদুঈন (মরুচারী) জীবনে ফিরে যায়, তার জন্য কোনো প্রমাণ বা অজুহাত নেই।"
শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) গাইলান ইবনু জারীর, যিয়াদ ইবনু রিয়াহ সূত্রে আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই হাদীছটি বর্ণনা করার বিষয়ে ঐকমত্য পোষণ করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জামাআত থেকে বিচ্ছিন্ন হয় এবং মারা যায়, সে জাহিলিয়্যাতের মৃত্যু বরণ করলো।" কিন্তু এই মতন (মূল বক্তব্য) তার থেকে ভিন্ন। ইজমা' (ঐকমত্য) যে একটি প্রমাণ, তার ওপর প্রমাণকারী ষষ্ঠ হাদীছ:
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لضعف أسامة بن زيد: وهو ابن أسلم العَدَوي مولى عمر أبو المثنى: هو معاذ بن المثنى بن معاذ العنبري، والقعنبي: هو عبد الله بن مسلمة.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 2/ 23 عن عبد الله بن مسلمة القعنبي، بهذا الإسناد.ونقل عن علي بن المَدِيني توثيق أسامة بن زيد، إلّا أنَّ الجمهور على تضعيفه.والمحفوظ من حديث زيد بن أسلم عن أبيه عن ابن عمر ما رواه هشام بن سعد عنه عند مسلم (1851) بلفظ: "من خلع يدًا من طاعة لقي الله يوم القيامة لا حجة له، ومن مات وليس في عنقه بيعة، مات مِيتة جاهلية".
[2] بل انفرد به مسلم في "صحيحه" برقم (1848)، وإنما اتفقا على إخراج حديث أبي رجاء العُطاردي عن ابن عباس، فهو عند البخاري برقم (7054) ومسلم برقم (1849) بنحو اللفظ المذكور.
414 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا حامد بن أبي حامد المقرئ، حدثنا إسحاق بن سليمان القارئ، حدثنا كثير بن أبي كثير أبو النَّضْر [1]، عن رِبْعيِّ بن حِرَاش قال: أتيتُ حُذيفةَ بن اليَمَان لياليَ سارَ الناسُ إلى عثمان، فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن فارَقَ الجماعةَ واستَذَلَّ الإمارةَ، لقيَ الله ولا حُجَّةَ له" [2].تابعه أبو عاصم عن كَثير:
হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তাঁর শিষ্য) রিবঈ ইবনু খিরাশ বলেন, আমি হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসেছিলাম সেই রাতে যখন লোকেরা উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর (বিদ্রোহের উদ্দেশ্যে) দিকে অগ্রসর হচ্ছিল। তখন তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি জামা‘আত (মুসলিম ঐক্যবদ্ধ দল) থেকে বিচ্ছিন্ন হলো এবং নেতৃত্বকে তুচ্ছজ্ঞান করল, সে আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় মিলিত হবে যে তার পক্ষে কোনো যুক্তি (বা প্রমাণ) থাকবে না।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: حدثنا كثير بن النضر، وهو خطأ.
[2] إسناده حسن من أجل كثير أبي النضر. وسيتكرر عند المصنف برقم (4610).وأخرجه أحمد 38/ (23283) عن إسحاق بن سليمان، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد أيضًا 38/ 23284) و (23452) عن محمد بن بكر، عن كثير بن أبي كثير، به.
415 - أخبرَناه أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي بمَرْو، حدثنا محمد بن معاذ، حدثنا أبو عاصم، حدثنا كَثير بن أبي كَثير، حدثني رِبْعيُّ بن حِراش: أنه أتى حذيفةَ بن اليَمَان يزورُه - وكانت أختُه تحتَ حذيفة - فقال له حذيفة: يا ربعيُّ، ما فعل قومُك؟ وذلك زمنَ خَرَجَ الناسُ إلى عثمان، قال: قد خرج منهم ناس قال: فسمَّى منهم نفرًا، فقال حذيفة: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن فارقَ الجماعةَ واستَذَلَّ الإمارةَ، لقيَ الله ولا حُجَّةَ له عند الله" [1].هذا حديث صحيح، فإنَّ كثير بن أبي كثير كوفيٌّ سكن البصرةَ، روى عنه يحيى بن سعيد القطّان وعيسى بن يونس، ولم يُذكَر بجَرْح.الحديث السابع فيما يدلُّ على أنَّ الإجماع حُجَّة:
হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রি’বি ইবনু হিরাশ তাঁকে (হুযাইফাকে) দেখতে তাঁর কাছে এলেন—আর রি’বির বোন হুযাইফার স্ত্রী ছিলেন—তখন হুযাইফা তাঁকে বললেন: “হে রি’বি, তোমার কওম কী করছে?” এটা ছিল সেই সময়ের কথা যখন মানুষ উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিরুদ্ধে বিদ্রোহ করে বের হয়েছিল। রি’বি বললেন: “তাদের মধ্যে কিছু লোক বের হয়ে গেছে।” রি’বি তাদের মধ্যে কয়েকজনের নাম উল্লেখ করলেন। অতঃপর হুযাইফা বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি জামা‘আত (মুসলিম ঐক্য) থেকে বিচ্ছিন্ন হলো এবং শাসনক্ষমতাকে তুচ্ছজ্ঞান করল, সে আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে তার জন্য আল্লাহর কাছে কোনো প্রমাণ (ওজর) থাকবে না।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن كسابقه. ومحمد بن معاذ في هذه الطبقة يغلب على ظننا أنه ابن يوسف أبو بكر السلمي المروزي، وهذا قد روى عنه غير واحد من الحفّاظ كمحمد بن نصر المروزي وغيره، إلا أننا لم نقف له على ترجمة، لكنه متابع فيما يرويه من الأحاديث، فأقل أحواله أن يكون حسن الحديث وأبو عاصم: هو الضحاك مخلد.وأخرجه أحمد 38/ (23288) عن أبي عاصم، بهذا الإسناد.
416 - أخبرنا أبو محمد عبد الله بن إسحاق بن إبراهيم الفاكِهي بمكة، حدثنا أبو يحيى عبد الله بن أحمد بن زكريا بن أبي مَسَرَّة، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا حَيْوة، أخبرني أبو هانئ، أنَّ أبا علي الجَنْبي عمرو بن مالك، حدَّثه عن فَضَالة بن عُبيد، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: "ثلاثةٌ لا تَسأَل عنهم: رجل فارقَ الجماعة وعصى إمامَه فمات عاصيًا، وأَمَةٌ أو عبدٌ أَبَقَ من سيِّدِه فمات، وامرأةٌ غاب عنها زوجُها وقد كَفَاها مُوْنةَ الدنيا فتبَرَّجَت بعده؛ فلا تَسأَلْ عنهم" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، فقد احتجَّا بجميع رواته [2]، ولم يُخرجاه، ولا أعرف له عِلَّة.الحديث الثامن على أن الإجماع حُجَّة:
ফাদালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তিন প্রকার লোক রয়েছে, তাদের সম্পর্কে (তাদের শাস্তির কথা) জিজ্ঞেস করো না: (১) যে ব্যক্তি জামাআত (মুসলমানদের দল) থেকে বিচ্ছিন্ন হলো এবং তার শাসকের অবাধ্য হলো, অতঃপর অবাধ্য থাকা অবস্থায় মারা গেল; (২) এবং এমন দাসী বা গোলাম যে তার মনিবের কাছ থেকে পালিয়ে গেল অতঃপর মারা গেল; (৩) এবং এমন নারী যার স্বামী অনুপস্থিত এবং সে তার দুনিয়ার যাবতীয় খরচ মিটিয়ে দিয়েছে, আর সে তার স্বামীর অনুপস্থিতিতে সাজসজ্জা করে নিজেকে প্রদর্শন করলো; সুতরাং তাদের (শাস্তি) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করো না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. حيوة: هو ابن شريح، وأبو هانئ: هو حميد بن هانئ.وأخرجه أحمد 39/ (23943)، وابن حبان (4559) من طريق عبد الله بن يزيد أبي عبد الرحمن المقرئ بهذا الإسناد. وقال: هو صدوق؛ أما عبد الله بن السائب فلم ينسب أنصاريًا إلّا في رواية سعيد بن مسعود هذه، وقد ذُكِر في هذه الطبقة ممن روى عن أبي هريرة أبو السائب الأنصاري، وهو من رجال مسلم، وقال الحافظ ابن حجر في "التقريب": يقال: اسمه عبد الله بن السائب. قلنا: لكن وقع في رواية هشيم عن العوام بن حوشب عند البيهقي في "شعب الإيمان" (3348): عبد الله بن السائب الكندي، فإن كان هذا محفوظًا - وهشيم أوثق وأحفظ من سعيد بن مسعود - فإنَّ عبد الله بن السائب الكندي هذا قد ذكر له الحافظ المزي في "تهذيب الكمال" رواية عن أبي هريرة أيضًا، لكن أكثر روايته عن التابعين، وسواء كان هذا أو ذاك فكلاهما ثقة.وأخرجه أحمد 16/ (10576) عن يزيد بن هارون فخالف سعيدَ بنَ مسعود فقال: عن العوام بن حوشب، عن عبد الله بن السائب، عن رجل من الأنصار، عن أبي هريرة. فزاد في الإسناد واسطة مبهمة.وممّا يؤيد رواية سعيد بن مسعود بإسقاط هذه الواسطة روايةُ هشيم عند أحمد 12/ (7129)، ورواية إسحاق بن يوسف الأزرق عند المصنف فيما سيأتي برقم (7858)، كلاهما عن العوام بن حوشب، عن عبد الله بن السائب، عن أبي هريرة وهشيم وإسحاق الأزرق ثقتان مشهوران.وذكره الدارقطني في "العلل" (2119) ولم يذكر سوى رواية هشيم ورواية يزيد بن هارون التي فيها الواسطة المبهمة، ثم قال: وقول يزيد أشبه بالصواب. كذا قال، مع أن بعض أهل العلم بالرجال كأبي حاتم الرازي قد قدَّم هشيمًا في الحفظ على يزيد بن هارون.وأخرج أوله أحمد 15/ (9197)، ومسلم (233) (16) من طريق عمر بن إسحاق مولى زائدة، عن أبيه، عن أبي هريرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول: "الصلوات الخمس، والجمعة إلى الجمعة، ورمضان إلى رمضان، مكفِّرات ما بينهنَّ إذا اجتُنبت الكبائر". وهذا هو المشهور في حديث أبي هريرة بإطلاق الكيائر دون حصرها بالثلاث، وهكذا رواه عنه جمع عند مسلم وغيره، انظر تخريج الحديث (7129) عند أحمد.
[2] هذا ذهول من المصنف، فإنَّ أبا هانئ من أفراد مسلم، وعمرو بن مالك الجنبي لم يخرجا له شيئًا. وقال: هو صدوق؛ أما عبد الله بن السائب فلم ينسب أنصاريًا إلّا في رواية سعيد بن مسعود هذه، وقد ذُكِر في هذه الطبقة ممن روى عن أبي هريرة أبو السائب الأنصاري، وهو من رجال مسلم، وقال الحافظ ابن حجر في "التقريب": يقال: اسمه عبد الله بن السائب. قلنا: لكن وقع في رواية هشيم عن العوام بن حوشب عند البيهقي في "شعب الإيمان" (3348): عبد الله بن السائب الكندي، فإن كان هذا محفوظًا - وهشيم أوثق وأحفظ من سعيد بن مسعود - فإنَّ عبد الله بن السائب الكندي هذا قد ذكر له الحافظ المزي في "تهذيب الكمال" رواية عن أبي هريرة أيضًا، لكن أكثر روايته عن التابعين، وسواء كان هذا أو ذاك فكلاهما ثقة.وأخرجه أحمد 16/ (10576) عن يزيد بن هارون فخالف سعيدَ بنَ مسعود فقال: عن العوام بن حوشب، عن عبد الله بن السائب، عن رجل من الأنصار، عن أبي هريرة. فزاد في الإسناد واسطة مبهمة.وممّا يؤيد رواية سعيد بن مسعود بإسقاط هذه الواسطة روايةُ هشيم عند أحمد 12/ (7129)، ورواية إسحاق بن يوسف الأزرق عند المصنف فيما سيأتي برقم (7858)، كلاهما عن العوام بن حوشب، عن عبد الله بن السائب، عن أبي هريرة وهشيم وإسحاق الأزرق ثقتان مشهوران.وذكره الدارقطني في "العلل" (2119) ولم يذكر سوى رواية هشيم ورواية يزيد بن هارون التي فيها الواسطة المبهمة، ثم قال: وقول يزيد أشبه بالصواب. كذا قال، مع أن بعض أهل العلم بالرجال كأبي حاتم الرازي قد قدَّم هشيمًا في الحفظ على يزيد بن هارون.وأخرج أوله أحمد 15/ (9197)، ومسلم (233) (16) من طريق عمر بن إسحاق مولى زائدة، عن أبيه، عن أبي هريرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول: "الصلوات الخمس، والجمعة إلى الجمعة، ورمضان إلى رمضان، مكفِّرات ما بينهنَّ إذا اجتُنبت الكبائر". وهذا هو المشهور في حديث أبي هريرة بإطلاق الكيائر دون حصرها بالثلاث، وهكذا رواه عنه جمع عند مسلم وغيره، انظر تخريج الحديث (7129) عند أحمد.
417 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا العوَّام بن حَوشَب، عن عبد الله بن السائب الأنصاري، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الصلاةُ المكتوبةُ إلى الصلاة المكتوبة التي بعدها كفَّارةٌ لما بينهما، والجُمُعة إلى الجمعة، والشهرُ إلى الشهر - من شهر رمضانَ إلى شهر رمضان - كفَّارةٌ لما بينهما"، ثم قال بعد ذلك: "إلّا من ثلاث"، فعرفتُ أنَّ ذلك من أمرٍ حَدَثَ، فقال: "إلّا من الإشراك بالله، ونَكْثِ الصَّفْقة، وتَرْكِ السُّنَّة" قلت: يا رسول الله، أمّا الإشراك بالله فقد عَرَفْناه، فما نَكْثُ الصَّفْقة وتركُ السُّنّة؟ قال: "أمّا نَكْثُ الصَّفْقة: أن تبايعَ رجلًا بيمينِك، ثم تُخالِفَ إليه فتقابلَه بسيفك، وأمّا تركُ السُّنّةِ: فالخروجُ من الجماعة" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، فقد احتجَّ بعبد الله بن السائب بن أبي السائب الأنصاري [2]، ولا أعرفُ له علَّةً.الحديث التاسع في أنَّ الإجماع حُجَّة:
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক ফরয সালাত থেকে পরবর্তী ফরয সালাত পর্যন্ত, এক জুমুআ থেকে অন্য জুমুআ পর্যন্ত, এবং এক মাস থেকে অন্য মাস পর্যন্ত—অর্থাৎ এক রমযান মাস থেকে অন্য রমযান মাস পর্যন্ত—এই সবগুলোর মাঝের (সগীরা গুনাহের) কাফ্ফারা হয়ে যায়।" এরপর তিনি বললেন: "তবে তিনটি জিনিস ব্যতীত।" আমি (আবূ হুরাইরাহ) বুঝতে পারলাম যে, এই বিষয়টি কোনো নতুন ঘটনার কারণে বলা হয়েছে। অতঃপর তিনি বললেন: "তা হলো: আল্লাহর সাথে শির্ক করা, অঙ্গীকার ভঙ্গ করা (নাকছুস সফক্বা) এবং সুন্নাত পরিহার করা (তারকিস সুন্নাহ) ব্যতীত।" আমি বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর সাথে শির্ক করা সম্পর্কে আমরা অবগত আছি। কিন্তু অঙ্গীকার ভঙ্গ করা ও সুন্নাত পরিহার করা বলতে কী বোঝায়?" তিনি বললেন: "অঙ্গীকার ভঙ্গ করা হলো: তুমি কোনো ব্যক্তির সাথে তোমার ডান হাত দিয়ে (আনুগত্যের) শপথ বা বায়আত করবে, অতঃপর তার বিরোধিতা করে তার মোকাবেলায় তোমার তরবারি নিয়ে দাঁড়াবে। আর সুন্নাত পরিহার করা হলো: জামাআত থেকে বিচ্ছিন্ন হওয়া।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات، غريب بهذا السِّياق، سعيد بن مسعود: هذا هو ابن عبد الرحمن المروزي، ذكره الخليلي في "الإرشاد في معرفة علماء الحديث" (818) ووثّقه، وترجم له الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 12/ 504 وقال: أحد الثقات، وسماه ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 4/ 95 سعدًا وقال: هو صدوق؛ أما عبد الله بن السائب فلم ينسب أنصاريًا إلّا في رواية سعيد بن مسعود هذه، وقد ذُكِر في هذه الطبقة ممن روى عن أبي هريرة أبو السائب الأنصاري، وهو من رجال مسلم، وقال الحافظ ابن حجر في "التقريب": يقال: اسمه عبد الله بن السائب. قلنا: لكن وقع في رواية هشيم عن العوام بن حوشب عند البيهقي في "شعب الإيمان" (3348): عبد الله بن السائب الكندي، فإن كان هذا محفوظًا - وهشيم أوثق وأحفظ من سعيد بن مسعود - فإنَّ عبد الله بن السائب الكندي هذا قد ذكر له الحافظ المزي في "تهذيب الكمال" رواية عن أبي هريرة أيضًا، لكن أكثر روايته عن التابعين، وسواء كان هذا أو ذاك فكلاهما ثقة.وأخرجه أحمد 16/ (10576) عن يزيد بن هارون فخالف سعيدَ بنَ مسعود فقال: عن العوام بن حوشب، عن عبد الله بن السائب، عن رجل من الأنصار، عن أبي هريرة. فزاد في الإسناد واسطة مبهمة.وممّا يؤيد رواية سعيد بن مسعود بإسقاط هذه الواسطة روايةُ هشيم عند أحمد 12/ (7129)، ورواية إسحاق بن يوسف الأزرق عند المصنف فيما سيأتي برقم (7858)، كلاهما عن العوام بن حوشب، عن عبد الله بن السائب، عن أبي هريرة وهشيم وإسحاق الأزرق ثقتان مشهوران.وذكره الدارقطني في "العلل" (2119) ولم يذكر سوى رواية هشيم ورواية يزيد بن هارون التي فيها الواسطة المبهمة، ثم قال: وقول يزيد أشبه بالصواب. كذا قال، مع أن بعض أهل العلم بالرجال كأبي حاتم الرازي قد قدَّم هشيمًا في الحفظ على يزيد بن هارون.وأخرج أوله أحمد 15/ (9197)، ومسلم (233) (16) من طريق عمر بن إسحاق مولى زائدة، عن أبيه، عن أبي هريرة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول: "الصلوات الخمس، والجمعة إلى الجمعة، ورمضان إلى رمضان، مكفِّرات ما بينهنَّ إذا اجتُنبت الكبائر". وهذا هو المشهور في حديث أبي هريرة بإطلاق الكيائر دون حصرها بالثلاث، وهكذا رواه عنه جمع عند مسلم وغيره، انظر تخريج الحديث (7129) عند أحمد.
[2] المشهور بهذا الاسم عبد الله بن السائب بن أبي السائب المخزومي المكي، وهذا له ولأبيه صحبة، وهو قرشي لا أنصاري، ومسلم روى له حديثًا عن النبي صلى الله عليه وسلم، فلعلَّ ما وقع للحاكم هنا وهمٌ، والله تعالى أعلم.
418 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا بِشْر بن موسى، حدثنا خَلّاد بن يحيى قال. وأخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا داود بن عمرو الضَّبِّي؛ قالا: حدثنا نافع بن عمر الجُمَحي، حدثنا أُميَّة بن صفوان، عن أبي بكر بن أبي زهير الثقفي، عن أبيه قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم بالنَّبَاءَة - أو بالنَّباوَة - يقول: "يُوشِكُ أن تَعرِفوا أهلَ الجنة من أهل النار" أو قال: "خِيارَكم من شِرَارِكم" قيل يا رسول الله، بماذا؟ قال: "بالثَّناءِ الحَسَن، والثناءِ السَّيِّئ، أنتم شهداءُ بعضُكم على بعضٍ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، وقال البخاري: أبو زهير الثقفي سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم واسمه معاذ. فأما أبو بكر بن أبي زهير فمن كبار التابعين، وإسناد الحديث صحيح ولم يُخرجاه.فقد ذكرنا تسعةَ أحاديث بأسانيدَ صحيحةٍ يُستَدلُّ بها على الحُجَّة بالإجماع، واستقصيتُ فيه تحرِّيًا لمذاهب الأئمة المتقدِّمين رضي الله عنهم. هذه أخبار صحيحة في الأمر بتوقير العالِم عند الاختلافِ إليه والقعودِ بين يديه، ممّا لم يُخرجاه
আবূ যুহাইর আস-সাকাফী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আন-নাবা’আহ—অথবা আন-নাবাওয়া—নামক স্থানে বলতে শুনেছি: "অচিরেই তোমরা জান্নাতবাসীকে জাহান্নামবাসী থেকে চিনে নিতে পারবে।" অথবা তিনি বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে উত্তমদেরকে তোমাদের মন্দ লোকদের থেকে (চিনে নিতে পারবে)।" জিজ্ঞাসা করা হলো, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! কিসের মাধ্যমে?" তিনি বললেন: "উত্তম প্রশংসা এবং মন্দ প্রশংসার মাধ্যমে। তোমরা একে অপরের ওপর সাক্ষী।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل أبي بكر بن أبي زهير، فهو تابعي روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، وأمية بن صفوان - وهو ابن عبد الله بن صفوان بن أمية الجمحي - روى عنه جمع وذكره ابن حبان أيضًا في "الثقات"، وباقي رجاله ثقات.وأخرجه أحمد 24/ (15439) و 39/ (24009/ 64) و 45/ (27645)، وابن ماجه (4221)، وابن حبان (7384) من طرق عن نافع بن عمر الجُمحي، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (8549).ويشهد له حديث أنس عند البخاري (1367) ومسلم (949) في قصة الجنازة التي مُرَّ عليها، وفيه قال النبي صلى الله عليه وسلم: "هذا أثنيتم عليه خيرًا فوجب له الجنة، وهذا أثنيتم عليه شرًا فوجبت له النار، أنتم شهداء الله في الأرض".
419 - أخبرنا أبو الحسن ميمون بن إسحاق الهاشمي ببغداد، حدثنا أحمد بن عبد الجبار العُطَارِدي، حدثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن المِنْهال بن عمرو، عن زاذانَ، عن البَرَاء بن عازِب: قال خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في جنازةِ رجلٍ من الأنصار، فانتهينا إلى القبر ولمَّا يُلحَدْ، فجَلَسَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وجلسنا حولَه كأنَّ على رؤوسِنا الطيرَ، وذَكَرَ الحديث [1].قد ثبت صحَّةُ هذا الحديث في كتاب الإيمان، وأنهما لم يخرجاه.
বারাআ ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আনসারদের এক ব্যক্তির জানাযায় বের হলাম। আমরা কবরের কাছে পৌঁছলাম, কিন্তু তখনো লহদ (কবরের ভেতরের অংশ) তৈরি করা হয়নি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসলেন এবং আমরা তাঁর চারপাশে এমনভাবে বসলাম যেন আমাদের মাথার উপর পাখি বসে আছে। অতঃপর তিনি অবশিষ্ট হাদীস বর্ণনা করলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن عبد الجبار. وقد سلف الحديث في كتاب الإيمان برقم (107).
420 - أخبرنا أبو حامد أحمد بن محمد بن يحيى الخطيب بمَرْو، حدثنا إبراهيم بن هلال البُوزَنْجِرْدي، حدثنا علي بن الحسن بن شَقِيق، حدثنا الحسين بن واقد، عن عبد الله بن بُرَيدة، عن أبيه قال: كنَّا إذا قَعَدْنا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم لم نَرفَعْ رؤوسنا إليه، إعظامًا له [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين [2]، ولا أحفَظُ له علَّةً، ولم يُخرجاه.
বুরায়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসতাম, তখন তাঁর প্রতি সম্মান প্রদর্শনের জন্য আমরা তাঁর দিকে আমাদের মাথা উঁচু করতাম না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن إن شاء الله من أجل إبراهيم بن هلال، فقد روى عنه جمع من الثقات عند المصنف وغيره، ولم يؤثر فيه جرح أو تعديل، وترجمه السمعاني في "الأنساب" وذكر وفاته سنة تسع وثمانين ومئتين ولم ينفرد بما يُنكَر.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (658) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث المسور بن مخرمة الطويل في صلح الحديبية عند البخاري (2731)، ففيه قال عروة بن مسعود في وصف النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه وما يُحِدُّون إليه النظر تعظيمًا له.
[2] كذا قال هنا، وقد سلف عند الحديث (11) تنصيصه أنَّ الحسين بن واقد احتجَّ به مسلم فقط، وهو الصواب.