হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (421)


421 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق، حدثنا سعيد بن عامر، حدثنا شُعْبة.وحدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن النَّضْر الزُّبَيري، حدثنا بكر بن بَكَّار، حدثنا شعبة.وأخبرنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة.وأخبرني أبو عمرو محمد بن جعفر - واللفظ له - حدثنا يحيى بن محمد، حدثنا عُبيد الله بن معاذ، حدثنا أبي، حدثنا شعبة، عن زياد بن عِلَاقة، سمع أسامةَ بن شَرِيك قال: أتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابُه عنده كأنما على رؤوسهم الطَّير، فسلَّمتُ وقعدتُ، فجاء أعرابٌ يسألونه عن أشياءَ حتى قالوا: أنتداوَى؟ قال: "تَداوَوْا، فَإِنَّ الله لم يَضَعْ داءً إلَّا وَضَعَ له دواءً"، فسألوه عن أشياءَ، فقال: "عبادَ الله، وَضَعَ اللهُ الحَرَجَ إِلَّا امْرَأً اقْتَرَضَ امرَأً ظُلمًا، فذلك حَرِجَ وهَلَكَ" قالوا: يا رسول الله، ما خيرُ ما أُعطيَ الناس؟ قال: "خُلُقٌ حَسَنٌ" [1].هذا حديث صحيح، ولم يُخرجاه، والعِلَّة عند مسلم فيه أن أسامة بن شَرِيك لا راوي له غير زياد بن عِلَاقة، وقد روي عن علي بن الأقمر عن أسامة بن شريك [2]، على أني قد أصَّلتُ كتابي هذا على إخراج الصحابة وإن لم يكن لهم غيرُ راوٍ واحد، ولهذا الحديث طرق سبيلُنا أن نُخرِجَها بمشيئة الله في كتاب الطب.




উসামা ইবনে শারীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এলাম, আর তাঁর সাহাবীগণ তাঁর পাশে এমনভাবে ছিলেন যেন তাদের মাথার উপর পাখি বসে আছে (অর্থাৎ তারা সম্পূর্ণ নীরব ছিলেন)। আমি সালাম দিলাম এবং বসলাম। এরপর কিছু বেদুইন লোক এসে তাঁকে বিভিন্ন বিষয়ে প্রশ্ন করতে লাগল। একপর্যায়ে তারা বলল: আমরা কি চিকিৎসা গ্রহণ করব (ঔষধ ব্যবহার করব)? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা চিকিৎসা গ্রহণ করো, কারণ আল্লাহ এমন কোনো রোগ দেননি, যার জন্য তিনি কোনো প্রতিষেধক সৃষ্টি করেননি।" তারা তাঁকে আরো কিছু বিষয়ে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: "হে আল্লাহর বান্দাগণ! আল্লাহ কষ্ট/সংকীর্ণতা তুলে নিয়েছেন, তবে সে ব্যক্তি ব্যতীত, যে অন্যের উপর অন্যায়ভাবে ঋণের দাবি করে (বা জুলুম করে পাওনা আদায় করে)। সেই ব্যক্তি সংকীর্ণতায় পড়ল এবং ধ্বংস হলো।" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! মানুষকে সর্বোত্তম যা কিছু দান করা হয়েছে তা কী? তিনি বললেন: "উত্তম চরিত্র।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح، وعبد الرحمن بن الحسن شيخ المصنف في الإسناد الثالث ضعيف، وكذا بكر بن بكار في الإسناد الثاني، لكنهما متابعان.وأخرجه تامًّا ومختصرًا: أحمد 30/ (18454)، وأبو داود (3855)، والنسائي (5844) و (5850) و (7511) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك أحمد 30/ (18453) و (18455) و (18456)، وأبو داود (2015)، وابن ماجه (3436)، والترمذي (2038)، والنسائي (7512)، وابن حبان (478) و (486) و (6061) و (6064) من طرق عن زياد بن علاقة، به.وسيأتي عند المصنف برقم (7618) و (8406) و (8407) من طرق عن زياد.قوله: "إلّا امرأً اقترض امرأً" أي إلّا من اغتاب أخاه أو سبَّه أو آذاه في نفسه، عبَّر عنها بالاقتراض لأنه يستردُّ منه في العقبى، ويحتمل أن يكون "اقترض" بمعنى: قطع، وقال السيوطي: أي: نال منه وقطعه بالغيبة. قاله السندي في حاشيته على "مسند أحمد". وأما العلة التي أشار إليها المصنف في عدم إخراج مسلم له، فقد سلف التعليق عليها عند الحديث (97).



[2] رواية علي بن الأقمر عن أسامة بن شريك وقعت عند الطبراني في "الكبير" (495)، في قصة صلاته على جنازة، والسند إليه ضعيف جدًّا. وأما العلة التي أشار إليها المصنف في عدم إخراج مسلم له، فقد سلف التعليق عليها عند الحديث (97).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (422)


422 - أخبرني أبو بكر محمد بن عبد الله بن أحمد بن عتَّاب العَبْدي ببغداد، حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن يزيد الرِّيَاحي، حدثنا سعيد بن عامر، حدثنا صالح بن رُسْتُم، عن حُمَيد بن هلال، عن عبد الرحمن بن قُرْط قال: دخلتُ المسجد فإذا حَلْقةٌ كأنما قُطِعت رؤوسُهم، وإذا رجلٌ يحدِّثهم، فإذا هو حُذَيفة، قال: كان الناس يسألون رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الخير، وكنت أسألُه عن الشرّ، وذكر الحديث بطوله [1]. مَتْن هذا الحديث مخرَّج في الكتابين، وإنما خرَّجتُه في هذا الموضع للإصغاء إلى المحدِّث وكيفية التوقير له، فإنَّ هذه اللفظة لم يُخرجاها في الكتابين.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুর রহমান ইবনু ক্বুর্‌ত বলেন: আমি মসজিদে প্রবেশ করে দেখলাম যে সেখানে এমন এক বৈঠক (হালকা) বসেছে, যাদের মাথা যেন কেটে ফেলা হয়েছে (অর্থাৎ তারা চরম নীরব ও নিবিষ্ট ছিল)। আর একজন লোক তাদের কাছে হাদিস বর্ণনা করছেন, আর তিনি হলেন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি বললেন: লোকেরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে কল্যাণ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করত, কিন্তু আমি তাঁকে অকল্যাণ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতাম। এরপর তিনি পূর্ণ হাদিসটি বর্ণনা করলেন। এই হাদিসের মূল পাঠ দুটি গ্রন্থে বর্ণিত হয়েছে। আমি এই স্থানে হাদিসটি বর্ণনা করেছি মুহাদ্দিসের প্রতি মনোযোগ দেওয়া এবং তাঁকে সম্মান দেখানোর পদ্ধতি বোঝানোর জন্য, কেননা এই বিশেষ শব্দাংশটি তারা (ঐ দুটি কিতাব) তাদের গ্রন্থে উল্লেখ করেননি।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث حسن، وهذا إسناد أخطأ فيه صالح بن رستم - وهو أبو عامر الخزّاز البصري - وهو قد اختُلف فيه بين موثِّق ومليِّن، وفي الجملة هو حسن الحديث إلّا أنَّ له أوهامًا، وقد وصفه بذلك ابن حبان في "مشاهير علماء الأمصار" (1190) فقال: هو من الحفاظ الذين كانوا يخطئون. قلنا: وهو كذلك، فقد أخطأ في إسناد هذا الحديث فجعله من حديث حميد بن هلال عن عبد الرحمن بن قرط عن حذيفة، وعبد الرحمن بن قرط هذا لا يُعرف في العراقيين إلّا في هذا الحديث من هذا الوجه والمحفوظ في هذا الحديث رواية حميد بن هلال عن نصر بن عاصم عن اليَشكُري - واختُلف في اسمه فقيل: سُبيع بن خالد، وقيل: خالد بن سُبيع، وقيل: خالد بن خالد: أنه أتى الكوفة فدخل المسجد … وذكر الحديث، هكذا رواه عن حميدٍ سليمانُ ابن المغيرة وهو ثقة ثقة، وأما نصر بن عاصم فثقة، وأما اليشكري فقد روى عنه غير واحدٍ وذكره العجلي وابن حبان في الثقات، فمثله حسن الحديث.أخرجه من حديث سليمان بن المغيرة عن حميد عن نصر بن عاصم: أحمد 38/ (23282)، وأبو داود (4246)، والنسائي (7978)، وابن حبان (5963)، وغيرهم. وانظر تمام تخريجه في "المسند".ورواه عن نصر بن عاصم أيضًا قتادةُ فيما سيأتي عند المصنف برقم (8537).وأما حديث صالح بن رستم عن حميدٍ، فسيأتي بطوله برقم (8535) من طريق عباس الدُّوري عن سعيد بن عامر. وأخرجه النسائي (7979) عن أحمد بن حرب، عن سعيد بن عامر، بهذا الإسناد.وأخرج طرفًا منه ابن ماجه (3981) عن محمد بن عمر بن علي المقدَّمي، عن سعيد بن عامر، به.وقد سلف بنحوه برقم (391) من طريق أبي إدريس الخولاني عن حذيفة وهو مخرَّج عند الشيخين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (423)


423 - حدثنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا أبو داود الطَّيالسي، أخبرنا الحَكَم بن عطيَّة، عن ثابت، عن أنس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا دخل المسجدَ لم يَرفَعْ أحدٌ منّا إليه رأسَه غير أبي بكر وعمر، فإنهما كانا يتبسَّمانِ إليه ويتبسَّمُ إليهما [1].هذا حديث تفرَّد به هذا الشيخ الحكم بن عطيّة، وليس من شرط هذا الكتاب.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মসজিদে প্রবেশ করতেন, তখন আমাদের মধ্যে আবু বকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছাড়া কেউ তাঁর দিকে মাথা তুলত না। কারণ তাঁরা দু’জন তাঁর দিকে তাকিয়ে মুচকি হাসতেন এবং তিনিও তাঁদের দিকে তাকিয়ে মুচকি হাসতেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف لضعف الحكم بن عطية.وأخرجه أحمد 19/ (12516)، والترمذي (3668) من طريق أبي داود سليمان بن داود الطيالسي، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 342 من طريق أحمد بن حنبل، عن سيار - وتحرَّف في المطبوع إلى: يسار - عن جعفر بن سليمان، عن ثابت البناني، عن سلمان. فأسقط الواسطة بين ثابت وسلمان فصار الإسناد بذلك منقطعًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (424)


424 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الخَضِرُ بن أبان الهاشمي، حدثنا سيّار بن حاتم، حدثنا جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أبي عثمان، عن سلمان الفارسي قال: كان سلمانُ في عِصَابة يذكرونَ الله، فمرَّ بهم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فجاء نحوَهم قاصدًا حتى دَنَا منهم، فكَفُّوا عن الحديث إعظامًا لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما كنتم تقولون؟ فإني رأيتُ الرَّحمةَ تَنزَّلُ عليكم، فأحببتُ أن أشارِكَكم فيها" [1]. هذا حديث صحيح ولم يُخرجاه، وقد احتجَّا بجعفر بن سليمان [2]، فأما أبو سلمة سيَّار بن حاتم الزاهد فإنه عابدُ عصره، وقد أكثر أحمدُ بن حنبلٍ الروايةَ عنه.




সালমান ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এমন একটি দলের সাথে ছিলেন, যারা আল্লাহর যিকির (স্মরণ) করছিল। তাদের পাশ দিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাচ্ছিলেন। তিনি উদ্দেশ্যমূলকভাবে তাদের দিকে এগিয়ে এলেন এবং তাদের কাছাকাছি পৌঁছলেন। তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি সম্মান প্রদর্শনস্বরূপ কথা বলা বন্ধ করে দিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কী বলছিলে? কেননা আমি দেখেছি তোমাদের উপর রহমত (আল্লাহর করুণা) বর্ষিত হচ্ছিল। তাই আমি চাইলাম যেন আমি তোমাদের সাথে তাতে শরিক হতে পারি।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف، الخضر بن أبان ضعفه الدارقطني والحاكم فيما قاله الذهبي في "ميزان الاعتدال" و "تاريخ الإسلام". أبو عثمان هو عبد الرحمن بن ملٍّ النهدي. وأخرجه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 342 من طريق أحمد بن حنبل، عن سيار - وتحرَّف في المطبوع إلى: يسار - عن جعفر بن سليمان، عن ثابت البناني، عن سلمان. فأسقط الواسطة بين ثابت وسلمان فصار الإسناد بذلك منقطعًا.



[2] البخاري لم يرو له شيئًا في "صحيحه". المُؤْدي: تامُّ السلاح كاملُ أداة الحرب. "النهاية" (أدو).والتَّغَب، بفتح الغين وتسكَّن: الغدير يكون في ظلّ جبل لا تصيبه الشمس فيبرد ماؤه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (425)


425 - أخبرنا أبو الحسن علي بن محمد بن عُقْبة الشَّيباني بالكوفة، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الزُّهْري، حدثنا جعفر بن عَوْن، أخبرنا الأعمش.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا موسى بن إسحاق الأنصاري، حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، حدثنا أَبي، حدثنا الأعمش.وحدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن النَّضْر الجارُودي، حدثنا يوسف بن موسى، حدثنا جَرِير وأبو معاوية، عن الأعمش، عن شَقيق، عن عبد الله قال: لقد سألني اليومَ رجلٌ عن شيء ما أدري ما أقولُ له، قال: أرأيتَ رجلًا مُؤْدِيًا نشيطًا حريصًا على الجهاد، يقول: يَعزِمُ علينا أمراؤُنا أشياء لا نُحصِيها، قال: فقلت: والله ما أدري ما أقول لك، إلّا أنَّا كنَّا نكون مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فلعلَّه لا يأمرُ بالشيء إلّا فعلناه، وما أشبَهَ ما غَبَرَ من الدنيا إلّا كالثَّعْب شُرِبَ صَفْوُه وبقيَ كَدَرُه، وإِنَّ أحدكم لن يزالَ بخير ما اتقى الله عز وجل، وإذا حاكَ في نفسه شيءٌ أتى رجلًا فسأله فشَفَاه، وايْمُ اللهِ ليُوشِكنَّ أن لا تجدوه [1]. هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين ولم يُخرجاه، وأظنُّه لتوقيفٍ فيه.




আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আজ আমাকে এক ব্যক্তি এমন এক বিষয়ে জিজ্ঞেস করেছে, যার উত্তরে আমি কী বলব তা বুঝতে পারিনি। লোকটি বলল: আপনি কি এমন এক ব্যক্তির কথা জানেন যিনি কর্তব্যপরায়ণ, কর্মঠ এবং জিহাদের ব্যাপারে খুবই আগ্রহী? সে (জিজ্ঞাসাকারী) বলল: আমাদের শাসকরা এমন সব কাজ আমাদের উপর চাপিয়ে দেয় যা গণনা করাও সম্ভব নয়। আমি (আবদুল্লাহ) বললাম: আল্লাহর কসম, আমি তোমাকে কী বলব তা বুঝতে পারছি না। তবে (স্মরণ রেখো) আমরা যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে থাকতাম, তখন তিনি কোনো কিছুর আদেশ করলে আমরা তা পালন করতাম। দুনিয়ার যা কিছু অবশিষ্ট আছে, তা কেবল একটি জলাশয়ের মতো, যার স্বচ্ছ অংশ পান করা হয়েছে এবং আবিলতা বা ঘোলা অংশ বাকি রয়েছে। নিশ্চয়ই তোমাদের মধ্যে যে কেউ আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার তাকওয়া অবলম্বন করবে, সে সর্বদা কল্যাণের মধ্যে থাকবে। আর যখন তার মনে কোনো বিষয়ে সন্দেহ জাগে বা খটকা লাগে, তখন সে কোনো আলেমের কাছে এসে জিজ্ঞেস করে এবং সে তাকে আরোগ্য করে (সঠিক সমাধান দেয়)। আল্লাহর শপথ! অচিরেই এমন সময় আসবে যখন তোমরা সেই ব্যক্তিকে (সঠিক সমাধান দেওয়ার মতো আলেমকে) আর খুঁজে পাবে না।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح. جرير هو ابن عبد الحميد، وأبو معاوية هو محمد بن خازم الضرير، وشقيق: هو ابن سلمة أبو وائل.وأخرجه البخاري (2964) عن عثمان بن أبي شيبة، عن جرير بن عبد الحميد، عن منصور بن المعتمر، عن أبي وائل شقيق، به. فاستدراكه ذهولٌ من الحاكم رحمه الله.وقوله: ما أَشبَهَ ما غَبَرَ من الدنيا إلا كالثَّغَب شُرِب صَفْرُه وبقي كَدَرُه، سيأتي عند المصنف برقم (8102) من طريق عاصم عن شقيق عن ابن مسعود مرفوعًا. المُؤْدي: تامُّ السلاح كاملُ أداة الحرب. "النهاية" (أدو).والتَّغَب، بفتح الغين وتسكَّن: الغدير يكون في ظلّ جبل لا تصيبه الشمس فيبرد ماؤه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (426)


426 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحَكَم، أخبرنا ابن وَهْب، أخبرني مالك بن خَيْر الزَّبَادي، عن أبي قَبِيل، عن عُبادةَ بن الصامت، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ليس منّا مَن لم يُجِلَّ كبيرنا، ويَرحَمْ صغيرَنا، ويَعرِفْ لعالِمِنا" [1].مالك بن خيرٍ الزَّبَادي مِصريٌّ ثقة، وأبو قَبِيل تابعيٌّ كبير.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "সে আমাদের দলভুক্ত নয়, যে আমাদের বড়দেরকে সম্মান করে না, ছোটদেরকে দয়া করে না এবং আমাদের আলেমদের (জ্ঞানীদের) অধিকার বা মর্যাদা স্বীকার করে না।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح لغيره دون قوله: "ويعرف لعالمنا"، وهذا إسناد حسن لولا انقطاعه، فإنَّ أبا قبيل - وهو حيي بن هانئ بن ناضر المعافري - لم يسمع من عبادة.وأخرجه أحمد 37/ (22755) عن هارون بن معروف عن عبد الله بن وهب، بهذا الإسناد.ويشهد له دون قوله: و"يعرف لعالمنا" غيرُ ما حديث، منها حديث عبد الله بن عمرو السالف عند المصنف برقم (210)، وانظر تمامها عند حديثه في "مسند أحمد" 11/ (6733).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (427)


427 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم أخبرنا وَكيع، عن علي بن صالح، عن عبد الله بن محمد بن عَقِيل، عن جابر بن عبد الله: {أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنْكُمْ} [النساء: 59] قال: أُولي الفقه والخير [1]. هذا حديث صحيح له شاهد، وتفسير الصحابي عندهما مُسنَد [2].




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (আল্লাহর বাণী): "তোমরা আল্লাহর আনুগত্য করো, রাসূলের আনুগত্য করো এবং তোমাদের মধ্যে যারা কর্তৃত্বশীল তাদের আনুগত্য করো" [সূরা নিসা: ৫৯]। তিনি বলেন: (কর্তৃত্বশীল বলতে বোঝানো হয়েছে) জ্ঞানী ও কল্যাণকামী ব্যক্তিবর্গকে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (268) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي شيبة 12/ 213 عن وكيع، به.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 3/ 988، والطحاوي في "مشكل الآثار" 4/ 182، وابن عبد البر في "بيان العلم وفضله" (1419) من طريق الحسن بن صالح، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، به.وأخرجه البيهقي في "المدخل" أيضًا (268)، والخطيب في "الفقيه والمتفقه" (91) من طريق ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر. وفي السند إليه ضعف.



[2] انظر تعليقنا على هذه المسألة عند الحديث رقم (73). "الجرح والتعديل" 8/ 447 ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا. أبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي، وعبد الله: هو ابن المبارك.هو في "الزهد" لابن المبارك برواية الحسين المروزي عنه برقم (574).وأخرجه ابن أبي شيبة 13/ 227 - 228، وعبد بن حميد (25)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 188، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10123)، والضياء المقدسي في "المختارة" (111) من طريق محمد بن بشر العبدي، عن إسماعيل بن أبي خالد، به.وخالف سويدُ بنُ نصر عند النسائي (11806) فرواه عن عبد الله بن المبارك، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن مصعب بن سعد بإسقاط الواسطة بينهما.وتابعه على ذلك يزيد بن هارون عند ابن سعد في "الطبقات" 3/ 258، وأحمد في "الزهد" (660)، وابن أبي الدنيا في "إصلاح المال" (372)، و "الجوع" (185)، وأبي نعيم في "الحلية" 1/ 48 - 49، والبيهقي في "الشعب" (10121)، وأبو أسامة حماد بن أسامة عند ابن سعد 3/ 258، وإسحاق بن راهويه في "مسنده" (1994)، ومن طريقه البيهقي في "الشعب" (5777)، كلاهما (يزيد بن هارون وأبو أسامة) عن إسماعيل بن أبي خالد، عن مصعب بن سعد. زاد يزيد بن هارون في تبيين المراد من قول عمر: "لأشاركنَّهما"؛ يعني رسولَ الله وأبا بكر.قلنا: وإسماعيل قد سمع من أخيه ومن مصعب بن سعد، فإن كان الإسنادان محفوظين فإن ذِكرَ أخيه النعمان في الإسناد من المَزيد في متصل الأسانيد، وجعل الدارقطني في "العلل" 2/ 139 (162) رواية من ذكر النعمان في الإسناد أَولى بالصواب، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (428)


428 - أخبرني أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا عبد الله بن صالح، عن معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طَلْحة، عن ابن عباس في قوله تعالى: {أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنْكُمْ} يعني: أهلَ الفقه والدِّين، وأهلَ طاعة الله الذين يُعلِّمون الناس معانِيَ دينهم، ويأمرونهم بالمعروف ويَنهوَنَهم عن المنكَر، فأوجَبَ اللهُ طاعتَهم [1].وهذه أحاديث ناطقة بما يَلزَمُ العلماء من التواضع لمن يعلِّمونهم:




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে: {তোমরা আল্লাহর আনুগত্য করো এবং রাসূলের আনুগত্য করো, আর তোমাদের মধ্যে যারা কর্তৃত্বশীল (উলিল আমর) তাদেরও} অর্থাৎ: তারা হলেন ফিকাহ ও দ্বীনের অনুসারীগণ (আহলুল ফিকহ ওয়াদ্দীন), এবং আল্লাহর অনুগত ব্যক্তিগণ, যারা মানুষকে তাদের দ্বীনের অর্থ শিক্ষা দেন, সৎ কাজের আদেশ করেন এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করেন। তাই আল্লাহ তাদের আনুগত্যকে আবশ্যক করেছেন। আর এই হাদিসগুলো সুস্পষ্টভাবে বর্ণনা করে যে, আলেমদের জন্য যারা তাদের শেখান, তাদের প্রতি বিনয়ী হওয়া আবশ্যক।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حسن إن شاء الله، وعلي بن أبي طلحة لم يسمع من ابن عباس، لكن ذهب جمهور أهل الحديث إلى أنَّ بينهما فيما يرويه عنه من التفسير مجاهدًا أو سعيد بن جبير أو عكرمة، وعليٌّ هذا صدوق حسن الحديث، وكذا عبد الله بن صالح إذا توبع أو جاء ما يشهد لحديثه.وأخرجه البيهقي في "المدخل" (266) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري 5/ 149، وابن المنذر (1929)، وابن أبي حاتم 3/ 989 - ثلاثتهم في "التفسير" - والطحاوي في "مشكل الآثار" 4/ 185 - 186 من طرق عن عبد الله بن صالح، به. "الجرح والتعديل" 8/ 447 ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا. أبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي، وعبد الله: هو ابن المبارك.هو في "الزهد" لابن المبارك برواية الحسين المروزي عنه برقم (574).وأخرجه ابن أبي شيبة 13/ 227 - 228، وعبد بن حميد (25)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 188، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10123)، والضياء المقدسي في "المختارة" (111) من طريق محمد بن بشر العبدي، عن إسماعيل بن أبي خالد، به.وخالف سويدُ بنُ نصر عند النسائي (11806) فرواه عن عبد الله بن المبارك، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن مصعب بن سعد بإسقاط الواسطة بينهما.وتابعه على ذلك يزيد بن هارون عند ابن سعد في "الطبقات" 3/ 258، وأحمد في "الزهد" (660)، وابن أبي الدنيا في "إصلاح المال" (372)، و "الجوع" (185)، وأبي نعيم في "الحلية" 1/ 48 - 49، والبيهقي في "الشعب" (10121)، وأبو أسامة حماد بن أسامة عند ابن سعد 3/ 258، وإسحاق بن راهويه في "مسنده" (1994)، ومن طريقه البيهقي في "الشعب" (5777)، كلاهما (يزيد بن هارون وأبو أسامة) عن إسماعيل بن أبي خالد، عن مصعب بن سعد. زاد يزيد بن هارون في تبيين المراد من قول عمر: "لأشاركنَّهما"؛ يعني رسولَ الله وأبا بكر.قلنا: وإسماعيل قد سمع من أخيه ومن مصعب بن سعد، فإن كان الإسنادان محفوظين فإن ذِكرَ أخيه النعمان في الإسناد من المَزيد في متصل الأسانيد، وجعل الدارقطني في "العلل" 2/ 139 (162) رواية من ذكر النعمان في الإسناد أَولى بالصواب، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (429)


429 - أخبرنا أبو العباس القاسم بن القاسم السَّيّاري بمرو، أخبرنا أبو الموجِّه، أخبرنا عَبْدانُ، أخبرنا عبد الله، أخبرنا إسماعيل بن أبي خالد، عن أخيه، عن مصعب بن سعد: أنَّ حَفْصةَ قالت لعمر: ألا تَلْبَسُ ثوبًا أليَنَ من ثوبك، وتأكلُ طعامًا أطيبَ من طعامك هذا، وقد فَتَحَ اللهُ عليك الأمرَ وأوسَعَ إليك الرّزق؟ فقال: سأخاصمُك إلى نفسك، فَذَكَرَ أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم وما كان يلقى من شِدَّة العيش، فلم يَزَلْ يَذكُرُ حتى بَكَتْ، فقال: إني قد قلت لأُشارِكنَّهما في مثل عيشهما الشديد، لعلي أُدرِكُ معهما عيشَهما الرِّخِيَّ [1]. هذا حديث صحيح على شرطهما، فإنَّ مصعب بن سعد كان يدخل على أزواج النبي صلى الله عليه وسلم، وهو من كبار التابعين من أولاد الصحابة.




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আপনি কি আপনার এই পোশাকের চেয়ে নরম কোনো পোশাক পরিধান করবেন না, এবং আপনার এই খাবারের চেয়ে উত্তম কোনো খাবার গ্রহণ করবেন না? অথচ আল্লাহ আপনার ওপর (পৃথিবীর) কর্তৃত্ব খুলে দিয়েছেন এবং আপনার রিজিককে প্রশস্ত করেছেন? তিনি (উমার) বললেন: আমি তোমাকে তোমার নিজের দিয়েই বিচার করব। অতঃপর তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অবস্থার কথা স্মরণ করালেন এবং জীবনের কঠিনতা ও কষ্ট যা তিনি ভোগ করতেন, তা উল্লেখ করলেন। তিনি ক্রমাগত উল্লেখ করতে থাকলেন, যতক্ষণ না সে (হাফসা) কেঁদে ফেলল। অতঃপর তিনি বললেন: আমি শপথ করেছি যে, আমি তাঁদের (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ও আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কঠোর জীবনের মতো জীবন যাপনে তাঁদের অংশীদার হবো, যাতে আমি তাঁদের সাথে তাঁদের (পরকালের) আরামদায়ক জীবনও লাভ করতে পারি।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده حسن إن كان مصعب بن سعد سمعه من حفصة بنت عمر، وإلّا فهو مرسل. أخو إسماعيل: هو النعمان بن أبي خالد كما جاء مسمًّى في رواية محمد بن بشر في بعض المصادر، ووثَّقه العجلي، وقال أحمد في "سؤالات المرُّوذي" (194): ليس به بأس، وذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 8/ 447 ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا. أبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي، وعبد الله: هو ابن المبارك.هو في "الزهد" لابن المبارك برواية الحسين المروزي عنه برقم (574).وأخرجه ابن أبي شيبة 13/ 227 - 228، وعبد بن حميد (25)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 188، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10123)، والضياء المقدسي في "المختارة" (111) من طريق محمد بن بشر العبدي، عن إسماعيل بن أبي خالد، به.وخالف سويدُ بنُ نصر عند النسائي (11806) فرواه عن عبد الله بن المبارك، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن مصعب بن سعد بإسقاط الواسطة بينهما.وتابعه على ذلك يزيد بن هارون عند ابن سعد في "الطبقات" 3/ 258، وأحمد في "الزهد" (660)، وابن أبي الدنيا في "إصلاح المال" (372)، و "الجوع" (185)، وأبي نعيم في "الحلية" 1/ 48 - 49، والبيهقي في "الشعب" (10121)، وأبو أسامة حماد بن أسامة عند ابن سعد 3/ 258، وإسحاق بن راهويه في "مسنده" (1994)، ومن طريقه البيهقي في "الشعب" (5777)، كلاهما (يزيد بن هارون وأبو أسامة) عن إسماعيل بن أبي خالد، عن مصعب بن سعد. زاد يزيد بن هارون في تبيين المراد من قول عمر: "لأشاركنَّهما"؛ يعني رسولَ الله وأبا بكر.قلنا: وإسماعيل قد سمع من أخيه ومن مصعب بن سعد، فإن كان الإسنادان محفوظين فإن ذِكرَ أخيه النعمان في الإسناد من المَزيد في متصل الأسانيد، وجعل الدارقطني في "العلل" 2/ 139 (162) رواية من ذكر النعمان في الإسناد أَولى بالصواب، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (430)


430 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا عبد الله بن مَسلَمة.وأخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه قال: قُرِئَ على عبد الملك بن محمد - هو ابن عبد الله الرَّقَاشي - حدثنا أبي قال: حدثنا مسلم بن خالد، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "كَرَمُ المؤمن دينُه، ومُرُوتُه عقلُه، وحَسَبُه خُلُقه" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، وله شاهد:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুমিনের সম্মান হলো তার দ্বীন (ধর্ম), তার পৌরুষত্ব হলো তার জ্ঞান (বা বুদ্ধি), আর তার বংশমর্যাদা হলো তার চরিত্র।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف من أجل مسلم بن خالد - وهو الزَّنجي - وضعَّفه الذهبي في "تلخيصه". وأخرجه أحمد 14/ (7884)، وابن حبان (483) من طريقين عن مسلم بن خالد بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (2724)، وانظر ما بعده.وقد صحَّ عن عمر أنه قال: حَسَب المرء دينُه، ومروءته خُلُقه، وأصله عقلُه. أخرجه البيهقي في "السنن" 10/ 195، وصحَّح إسناده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (431)


431 - حدثنا أبو سعيد إسماعيل بن أحمد، حدثنا محمد بن حسين بن مُكرَم بالبصرة، حدثنا أحمد بن المِقْدام، حدثنا المعتمِر، عن عبد الله بن سعيد بن أبي سعيد المَقبُري، عن جدِّه، عن أبي هريرة، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "كرمُ المؤمن دينُه، ومُروءتُه عقلُه، وحَسَبُه خُلُقه" [1].




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, “মুমিনের মর্যাদা হলো তার দ্বীনদারি, তার পৌরুষত্ব হলো তার জ্ঞান, আর তার বংশ-গৌরব হলো তার চরিত্র।”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف جدًّا، عبد الله بن سعيد المقبري، متروك، ووهَّاه الذهبي. وأخرجه البزار (9319) من طريق طلحة بن عمرو، عن عطاء بن أبي رباح، عن أبي هريرة. وطلحة هذا متروك الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (432)


432 - حدثني أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ حدثنا أبو سعيد محمد بن شاذانَ، حدثنا أبو عمَّار، حدثنا الفضل بن موسى، عن عبد بن سعيد المَقبُري، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنكم لا تَسَعُون الناسَ بأموالِكم، وليَسعهم منكم بَسْطُ الوجهِ وحُسْنُ الخُلُق" [1]. رواه سفيان الثَّوري عن عبد الله بن سعيد:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের ধন-সম্পদ দ্বারা সকল মানুষকে সন্তুষ্ট করতে পারবে না, কিন্তু তোমাদের পক্ষ থেকে প্রফুল্ল মুখমণ্ডল এবং উত্তম আচরণ যেন তাদের কাছে পৌঁছায়।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف جدًّا كسابقه.وأخرجه البزار (8544) من طريق القاسم بن مالك المزني، عن عبد الله بن سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة.وأخرجه أبو يعلى (6550) من طريق محمد بن فضيل، عن عبد الله بن سعيد، عن جدِّه أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة.وأخرجه كذلك ابن أبي شيبة 8/ 519 عن عبد الله بن إدريس الأودي، وأبو نعيم في "الحلية" 10/ 25 من طريق أحمد بن أبي الحواري، عن عبد الله بن إدريس، عن عبد الله بن سعيد، عن جدّه، عن أبي هريرة.وخالف ابنَ أبي شيبة وابنَ أبي الحواري الأسودُ بنُ سالم، فرواه عن عبد الله بن إدريس الأودي عن أبيه عن جدِّه عن أبي هريرة، أخرجه البزار (9651)، وابن أبي الدنيا في "التواضع والخمول" (190)، و"ومدارة الناس" (55)، وأبو نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 33، والأسود بن سالم هذا لا بأس به إلّا أنه قد خالف من هو أوثق منه بدرجات فيُدفَع تفرّده بهذا الإسناد. وأخرجه البزار (9319) من طريق طلحة بن عمرو، عن عطاء بن أبي رباح، عن أبي هريرة. وطلحة هذا متروك الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (433)


433 - حدثنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، حدثنا محمد بن عبد الرحمن الدَّغُولي، حدثنا محمد بن مُشْكان، حدثنا يزيد بن أبي حَكِيم، حدثنا سفيان، عن عبد الله بن سعيد المَقبُري، عن أبيه، عن أبي هريرة رفعه قال: "إنكم لا تَسَعُون الناسَ بأموالكم، ولكن ليَسَعُهم منكم بَسْطُ الوجهِ وحُسْنُ الخُلُق" [1].هذا حديث معناه يَقرُب من الأول، غير أنهما لم يخرجا عن عبد الله بن سعيد.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তোমরা তোমাদের সম্পদ দ্বারা মানুষের (সকল প্রয়োজন) মেটাতে পারবে না, বরং তোমাদের পক্ষ থেকে প্রশস্ত মুখাবয়ব (হাস্যোজ্জ্বলতা) ও উত্তম চরিত্রই তাদের জন্য যথেষ্ট হবে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف جدًّا كسابقه.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (536)، وابن أبي الدنيا في "مداراة الناس" (54)، وابن عدي في "الكامل" 4/ 163، والطبراني في "مكارم الأخلاق" (18)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (7695)، والخطيب في "الجامع لأخلاق الراوي والسامع" (817) من طريقين عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد - ووقع عند ابن عدي: عبد الله بن سعيد عن أبيه عن جده عن أبي هريرة. واحد من الصحابة مرفوعًا من أوجه لا يخلو أحدها من مقال، انظر "مجمع الزوائد" للهيثمي 7/ 262 - 263.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (434)


434 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا سِمْعان بن بَحْر العسكري أبو علي، حدثنا إسحاق بن محمد بن إسحاق العمِّي، حدثنا أَبي، عن يونس بن عُبيد، عن الحسن، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "صنائعُ المعروف إلى الناس تَقِي صاحبَها مصارعَ السُّوءِ والآفاتِ والهَلَكات، وأهلٌ المعروف في الدنيا هم أهلُ المعروف في الآخرة" [1].سمعتُ أبا علي الحافظ يقول: هذا الحديث لم أكتبه إلّا عن أبي عبد الله الصَّفّار، ومحمدُ بن إسحاق وابنه من البصريين لم نَعرِفْهما بجَرْح، وقوله: "أهل المعروف في الدنيا" قد رُوِيَ من غير وجهٍ عن المنكدر بن محمد عن أبيه عن جابر [2]. والمنكدرُ وإن لم يُخرجاه فإنه يُذكر في الشواهد.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মানুষের প্রতি অনুগ্রহমূলক কাজ তার কর্তাকে মন্দ পরিণতি, বালা-মুসিবত ও ধ্বংস থেকে রক্ষা করে। আর দুনিয়ায় যারা নেককার (দানশীল ও সৎকর্মশীল), আখেরাতেও তারাই নেককার (মর্যাদাপ্রাপ্ত)।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده ضعيف لجهالة بعض رواته، وضعَّفه البيهقي في "شعب الإيمان" (7704) بعدما أخرجه عن الحاكم وغيره، وقال: والحمل فيه على العسكري والعمِّي. وقال الذهبي في "تلخيصه": بهذا وبما قبله انحطَّت رتبة هذا المصنَّف المسمَّى بالصحيح. واحد من الصحابة مرفوعًا من أوجه لا يخلو أحدها من مقال، انظر "مجمع الزوائد" للهيثمي 7/ 262 - 263.



[2] لم نقف عليه من هذا الوجه، والمنكدر بن محمد ليِّن الحديث، وقد روي هذا القول عن غير واحد من الصحابة مرفوعًا من أوجه لا يخلو أحدها من مقال، انظر "مجمع الزوائد" للهيثمي 7/ 262 - 263.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (435)


435 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن بِشْر بن مَطَر، حدثنا عمرو بن محمد الناقد، حدثني محمد بن عبد الرحمن الطُّفَاوي، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن ابن عمر في قوله عز وجل: {خُذِ الْعَفْوَ} [الأعراف: 199]، قال: أَمَرَ اللهُ نبيَّه صلى الله عليه وسلم أن يأخذ العفوَ من أخلاق الناس [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري، وقد احتَجَّ بالطُّفَاوي، ولم يُخرجاه.وقد قيل فيه: عن عروة عن عبد الله بن الزُّبير:




ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহ তাআলার বাণী— {আপনি ক্ষমাশীলতা অবলম্বন করুন} [সূরা আল-আ'রাফ: ১৯৯] সম্পর্কে তিনি বলেন: আল্লাহ তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নির্দেশ দিয়েছেন যেন তিনি মানুষের স্বভাবের সহজ দিকগুলো গ্রহণ করেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح لكن من حديث عبد الله بن الزبير لا عبد الله بن عمر، فقد خولف الطفاوي فيه كما سيأتي، والطفاوي له أوهام.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1637 عن أبيه، عن عمرو بن محمد الناقد، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (1216) من طريق عثمان بن حفص، عن محمد بن عبد الرحمن الطفاوي، به.وخالف عمرًا الناقدَ وعثمانَ بن حفص فيه يعقوبُ بن إبراهيم - وهو الدَّوْرقي - عند أبي داود (4787)، فرواه عن الطفاوي، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله، قال: يعني ابن الزبير. وهو المحفوظ.ويؤيد هذا رواية وكيع عند البخاري (4643)، وأبي أسامة عنده أيضًا (4644)، وعبدة بن سليمان عند النسائي (11131)، ثلاثتهم عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله بن الزبير.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (436)


436 - أخبرَناه عَبْدانُ بن يزيد الدَّقّاق، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا عمرو بن عَوْن، حدثنا وكيع، عن ابن عُرْوة، عن أبيه، عن عبد الله بن الزُّبير قال: ما أَنزَلَ اللهُ هذه الآية إلّا في أخلاق الناس: {خُذِ الْعَفْوَ وَأْمُرْ بِالْعُرْفِ وَأَعْرِضْ عَنِ الْجَاهِلِينَ} [الأعراف: 199] [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.وقد قيل في هذا: عن عبد الله بن عمرو بن العاص، وليس من شرطه.




আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আল্লাহ তাআলা এই আয়াতটি মানুষের স্বভাব-চরিত্র সম্পর্কেই নাযিল করেছেন: "তুমি ক্ষমা অবলম্বন করো, ভালো কাজের আদেশ দাও এবং মূর্খদেরকে এড়িয়ে চলো।" (সূরা আল-আ'রাফ: ১৯৯)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح. وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (437)


437 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبَّاد، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن بهز بن حَكِيم، عن أبيه، عن جدِّه: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم حَبَسَ رجلًا من قومه في تُهْمة، فجاء رجلٌ من قومه إلى النبي صلى الله عليه وسلم وهو يخطُب فقال: يا محمد علامَ تَحبِسُ جِيرَتي؟ فَصَمَتَ النبي صلى الله عليه وسلم، وقال: إِنَّ أناسًا يقولون: إنك تَنَهى عن الشرَّ وتَستَخْلي به، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "ما تقولُ؟ " فجعلتُ أعرِّضُ بينهما بالكلام مخافةَ أن يفهمَها فيَدعُوَ على قومي دعوةً لا يفلحون بعدها، فلم يَزَلِ النبيُّ صلى الله عليه وسلم حتى فَهِمَها فقال: "قد قالوا - أو قائلُها منهم -؟ والله لو فعلتُ لكان عليَّ ما كان عليهم خَلُّوا عن جيرانِه" [1].قد تقدَّم [2] القولُ في صحيفة بَهْز بن حَكِيم ما أغنى عن إعادته، على أن شواهد هذا الحديث مخرَّجة في "الصحيحين".فمنها: حديث الأعمش عن أبي وائل عن عبد الله: قَسَمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قَسْمًا، فقال رجل من الأنصار: إنَّ هذه قسمة ما أُريدَ بها وجهُ الله [3].ومنها: حديث مالك عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة عن أنس: كنتُ أمشي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وعليه بُرْدٌ نجرانيٌّ غليظُ الحاشية، فجَبَذَ أعرابي بُرْدتَه … الحديث [4].ومنها: حديث شَريك بن عبد الله بن أبي نَمِرٍ عن أنس في قصة حُنَين: علامَ تَضطَرُّوني إلى هذه الشجرة [5]. وغير هذا مما يطول ذِكرُه.




মু'আবিয়া ইবন হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর গোত্রের এক ব্যক্তিকে একটি অভিযোগের কারণে আটক করেছিলেন। এরপর তাঁর গোত্রের একজন ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এলেন যখন তিনি খুতবা দিচ্ছিলেন। লোকটি বলল, “হে মুহাম্মাদ! আপনি কেন আমার প্রতিবেশীকে আটক করে রেখেছেন?” নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নীরব থাকলেন। তখন লোকটি আবার বলল, “নিশ্চয়ই কিছু লোক বলে যে, আপনি মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করেন, অথচ আপনি গোপনে তা করেন।” নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “তুমি কী বলছো?” (বর্ণনাকারী) বলেন, তখন আমি তাদের দুজনের মাঝে কথা দিয়ে আড়াল করতে শুরু করলাম—এই ভয়ে যে, তিনি (নবী) যেন কথাটি বুঝে না ফেলেন, আর যদি বুঝে ফেলেন, তাহলে তিনি আমার গোত্রের বিরুদ্ধে এমন বদদোয়া করে বসবেন যার পরে তারা আর কখনো সফল হবে না। কিন্তু নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থামলেন না, যতক্ষণ না তিনি কথাটি বুঝে ফেললেন। এরপর তিনি বললেন, “তারা কি এই কথা বলেছে—অথবা এই কথা তাদের মধ্য থেকে কেউ বলেছে? আল্লাহর কসম! আমি যদি এমনটি করতাম, তবে তাদের বিরুদ্ধে যা প্রযোজ্য হতো, তা আমার ওপরেও প্রযোজ্য হতো। তোমরা তার প্রতিবেশীদের ছেড়ে দাও।”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده حسن.وأخرجه أحمد 33/ (20019)، وأبو داود (3630) من طريق عبد الرزاق، بهذا الإسناد. ورواية أبي داود مختصرة بلفظ: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم حبس رجلًا في تهمة. وسيأتي بهذا اللفظ عند المصنف برقم (7240). وأخرجه كذلك مختصرًا الترمذي (1417)، والنسائي (7331) من طريق عبد الله بن المبارك، عن معمر به. وقال الترمذي حديث حسن.وأخرجه مطولًا أحمد 33/ (20017) و (20042)، وأبو داود (3631) من طريق إسماعيل - وهو ابن عُليَّة - عن بهز بن حكيم، به.وسيأتي برقم (6853) من طريق أبي قزعة عن حكيم بن معاوية.وانظر حديث أبي هريرة الآتي عند المصنف برقم (7241).قوله: "تستخلي به" أي: تستقلّ به وتنفرد.



[2] انظر الحديث (143).



437 [3] - أخرجه البخاري (3405)، ومسلم (1062).



437 [4] - أخرجه البخاري (3149)، ومسلم (1057).



437 [5] - عزو هذا الحديث إلى "الصحيحين" ذهولٌ من المصنف رحمه الله، وهو مخرَّج في "سنن سعيد بن منصور" (2755)، ومن طريقه أخرجه تمام في "فوائده" (630)، لكن معناه عند البخاري (2821) و (3148) من حديث محمد بن جبير بن مطعم عن أبيه جبير رضي الله عنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (438)


438 - حدثنا أبو محمد عبد الله بن جعفر بن دَرَستَوَيه الفارسي، حدثنا يعقوب بن سفيان، حدثنا عمر بن راشد مولى عبد الرحمن بن أبان بن عثمان التَّيْمي، حدثنا محمد بن عبد الرحمن بن أبي ذِئْب القرشي، عن هشام بن عُرْوة، عن محمد بن علي، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ثلاثٌ من كُنَّ فيه، آواهُ اللهُ فِي كَنَفِه، وسَتَرَ عليه برحمتِه، وأدخَلَه في محبَّتِه"، قيل: ما هنَّ يا رسول الله؟ قال: "مَن إِذا أُعطيَ شَكَر، وإذا قَدَرَ غَفَر، وإِذا غَضِبَ فَتَر" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد! فإنَّ عمر بن راشد شيخ من أهل الجارِ [2] من ناحية المدينة، قد روى عنه أكابر المحدِّثين.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তিনটি গুণ যার মধ্যে থাকবে, আল্লাহ তাকে তাঁর আশ্রয়ে স্থান দেবেন, তাকে তাঁর রহমত দ্বারা আবৃত করবেন এবং তাকে তাঁর ভালোবাসার অন্তর্ভুক্ত করবেন। জিজ্ঞাসা করা হলো: হে আল্লাহর রাসূল, সেগুলো কী কী? তিনি বললেন: (১) যখন তাকে কিছু দেওয়া হয়, সে শুকরিয়া আদায় করে, (২) যখন সে ক্ষমতা রাখে, সে ক্ষমা করে দেয় এবং (৩) যখন সে ক্রুদ্ধ হয়, তখন শান্ত হয়ে যায়।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده تالف، ووهّاه الذهبي في "تلخيصه"، فإنَّ علَّته عمر بن راشد، وهو شيخ مجهول كما قال ابن عدي في "الكامل" 5/ 17 والبيهقي بإثر حديثه في "شعب الإيمان" (4119)، واتهمه أبو حاتم الرازي كما في "الجرح والتعديل" 6/ 108 وابن حبان في "المجروحين" 2/ 93 بالوضع، وتعجب أبو حاتم من يعقوب بن سفيان كيف يروي عنه.وأخرجه البيهقي في "الشعب" (4119) عن أبي علي بن شاذان وأبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الخطيب البغدادي في "تلخيص المتشابه في الرسم" في ترجمة صالح بن عبد الله بن صالح ص 173 من طريق صالح بن عبد الله المصري، عن عمر بن راشد، به.



[2] تحرَّف في (ب) والمطبوع إلى: الحجاز. والجارُ مدينة كانت على ساحل البحر الأحمر غرب المدينة المنورة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (439)


439 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا أبو سهل بِشْر بن سهل، حدثنا أبو صالح عبد الله بن صالح، حدثني يحيى بن أيوب، عن عبد الرحمن بن حَرْمَلة الأسلَمي، عن سعيد بن المسيّب قال: لمّا وَلِيَ عمرُ بن الخطَّاب خَطَبَ الناسَ على مِنبَر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فحَمِدَ الله وأثنى عليه، ثم قال: أيها الناس، إني قد علمتُ أنكم تُؤنِسون مني شِدَّةً وغِلظةً، وذلك أني كنتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فكنت عبدَه وخادَمه، وكان - كما قال الله - بالمؤمنين رؤوفًا رحيمًا، فكنت بين يديهِ كالسيفِ المسلول إلّا أن يَغمِدَني أو ينهاني عن أمرٍ، فأكُفَّ، وإلّا أقدمتُ على الناس لمكان لِينِه [1].هذا حديث صحيح الإسناد، وأبو صالح فقد احتَجَّ به البخاري، فأما سماع سعيد عن عمر فمُختلَف فيه، وأكثر أئمَّتِنا على أنه قد سمع منه، وهذه ترجمة معروفة في المسانيد.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

যখন তিনি খিলাফতের দায়িত্ব নিলেন, তখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মিম্বরে দাঁড়িয়ে লোকদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন। তিনি আল্লাহর প্রশংসা করলেন এবং তাঁর স্তুতি বর্ণনা করলেন, অতঃপর বললেন: "হে লোকসকল! আমি নিশ্চয়ই জানি যে আপনারা আমার মধ্যে কঠোরতা ও রূঢ়তা লক্ষ্য করেছেন। এর কারণ হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ছিলাম, আর আমি ছিলাম তাঁর দাস ও খাদেম। তিনি ছিলেন—যেমন আল্লাহ বলেছেন—মু’মিনদের প্রতি অত্যন্ত দয়ালু ও মেহেরবান। আমি তাঁর সামনে খোলা তরবারির মতো ছিলাম। তবে যদি তিনি আমাকে খাপবদ্ধ করতে বলতেন অথবা কোনো কাজ থেকে নিষেধ করতেন, তাহলে আমি বিরত থাকতাম। অন্যথায়, তাঁর কোমলতার কারণে আমি লোকদের উপর এগিয়ে যেতাম (তাদের মোকাবিলা করতাম)।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده إلى سعيد بن المسيب حسن إن شاء الله، وهو عن عمر مرسل، فإنَّ سعيد بن المسيب لم يكن إذ ذاك قد وُلدَ، فإنَّ ولادته كانت لسنتين مضتا من خلافة عمر، لكن مراسيله عند جمهور أهل العلم قوية، ومع ذلك قال الذهبي في "تلخيصه": حديث منكر.وأخرجه البيهقي في "الاعتقاد" ص 360 - 361 عن أبي عبد الله الحاكم وآخرين معه، بهذا الإسناد - بأطول ممّا هنا.وأخرجه كذلك اللالكائي في "أصول الاعتقاد" (2526)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 44/ 264 - 265 و 265 - 266 من طرق عن عبد الله بن صالح، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (440)


440 - أخبرنا أبو حامد أحمد بن محمد بن شعيب الفقيه، حدثنا سَهْل بن عمَّار، حدثنا مُحاضِر بن المورِّع، حدثنا سعد بن سعيد الأنصاري، عن عمرو بن أبي عمرو، عن المطَّلِب، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: مَن كان هيّنًا لَيّنًا قريبًا، حَرَّمه اللهُ على النار" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি শান্ত, নম্র-কোমল স্বভাবের এবং মানুষের কাছাকাছি (সহজলভ্য) থাকে, আল্লাহ তাকে জাহান্নামের জন্য হারাম করে দেবেন।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حسن بطرقه وشواهده، وهذا إسناد ضعيف، سهل بن عمار مختلف في عدالته كما قال الحاكم نفسه فيما نقله عنه الذهبي في "السير" 13/ 33، وضعّفه ابن منده كما في ترجمته من "لسان الميزان"، لكنه متابع، وهو منقطع، المطَّلب - وهو ابن عبد الله بن حَنطَب - لا يُعرَف له سماع من أبي هريرة.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (7770) و "الآداب" (193) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي أيضًا في "السنن الكبرى" 10/ 194 من طريق أبي الأزهر - وهو أحمد بن الأزهر - عن محاضر بن المورِّع، به - إلّا أنه لم يذكر فيه المطلب، وفي الطريق إليه ضعف.وأخرجه كذلك دون ذكر المطَّلب: هنّادٌ في "الزهد" (1262) عن عبدة بن سليمان، عن سعد بن سعيد الأنصاري، به.وأخرجه العقيلي في "الضعفاء" (1875)، والطبراني في "الأوسط" (5725) من طريق وهب بن حكيم الأزدي، عن محمد، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة. ووهب بن حكيم فيه جهالة لا يكاد يُعرف.وأخرجه ابن شاهين في جزء فيه من حديثه (40) من طريق عبد الله بن كيسان، عن محمد بن واسع، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة. وابن كيسان هذا ليس بالقوي.وأخرجه تمّام في "فوائده" (837)، وأبو نعيم في "الحلية" 2/ 356، والبيهقي في "الشعب" (7771) من طرق عن محمد بن واسع، به. وهذه الطرق إما ضعيفة جدًّا أو تالفة لا يُشتغَل بها.وله شاهد بنحوه من حديث ابن مسعود عند أحمد 7/ (3938)، والترمذي (2488) وحسَّنه، وصحَّحه ابن حبان (469). والراوي فيه عن ابن مسعود فيه جهالة. وانظر تتمة شواهده في "مسند أحمد"، وكلها فيها ضعف.