আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4021 - حدثني علي بن عيسى، حدَّثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدَّثنا ابن أبي عمر، حدَّثنا سفيان، عن ابن أبي نَجِيحٍ، عن مجاهدٍ، عن عليّ: {وَيَمْنَعُونَ الْمَاعُونَ} قال: هي الزكاةُ المفروضةُ، يُراؤون بصلواتهم ويَمنعُون زكاتَهم [1].هذا إسناد صحيح مُرسَل، فإنَّ مجاهدًا لم يَسمَعْ من علي. 108 - سورة (إنا أعطيناك الكوثر)بسم الله الرحمن الرحيم
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র বাণী: {আর তারা মা'ঊন (সামান্য প্রয়োজনীয় বস্তু) প্রদান করা থেকে বিরত থাকে} সম্পর্কে তিনি বলেন: এটা হল ফরয যাকাত। তারা তাদের সালাত (নামায) আদায়ের ক্ষেত্রে লোক-দেখানো কাজ করে এবং তাদের যাকাত প্রদান থেকে বিরত থাকে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات إلّا أنه منقطع، مجاهد لم يسمع من علي كما قال المصنف. سفيان: هو ابن عيينة.وأخرجه البيهقي 4/ 184 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 3/ 202، والطحاوي في "مشكل الآثار" 14/ 87 من طريق سفيان بن عيينة، به.وأخرجه بنحوه الطبري 30/ 314 و 315 من طرق عن عبد الله بن أبي نجيح، به.ورواه عن مجاهدٍ أيضًا الحكم بن عتيبة عند ابن أبي شيبة 3/ 203.وأخرجه الطبري 30/ 314 من طريق السدي، عن أبي صالح، عن علي. وأبو صالح - وهو باذام - ضعيف. أبي بكر بن خزيمة، أي زوج ابنته، انظر ترجمته في "الأنساب" للسمعاني 3/ 314 في رسم (الجنجروذي)، و "تاريخ الإسلام" 7/ 792.
4022 - حدَّثنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق وعلي بن حَمْشَاذَ العَدْل، وأحمد بن يعقوب الثَّقفي وعَمرو بن محمد بن منصور العَدْلُ الخَتَنُ [1]، قالوا: حدَّثنا عمر بن حفص السَّدُوسي، حدَّثنا عاصم بن علي، حدَّثنا أبو أُوَيس، عن الزُّهْري، عن أخيه عبد الله بن مُسلم بن شِهاب، عن أنس بن مالك قال: سُئِلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن الكَوثَر، قال: "هو نهرٌ أعطانيه الله في الجنة: ترابُها [2] مِسكٌ أبيضُ من اللبَن، وأحلى من العَسَل، يَرِدُه طائرٌ [3] أعناقُها مثلُ أعناق الجُزُر" فقال أبو بكر: يا رسول الله، إنها لناعمةٌ، فقال: "آكِلُها أنعمُ منها" [4].قد أخرج مسلم هذا الحديث من حديث عبد الواحد بن زياد عن المختار بن فُلفُل عن أنس: لما نَزَلَت {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ} [5]، أتمَّ وأطولَ، لكني أخرجتُه في أفراد عاصم ابن علي فإنَّ أبا أُويسٍ ثقة! ولا نحفظ للزُّهريِّ عن أخيه حديثًا مسندًا غيرَ هذا، والمشهور هذا من حديث محمد بن عبد الله بن مُسلِم عن أبيه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কাওসার সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: "এটি জান্নাতে আমাকে আল্লাহ প্রদত্ত একটি নদী। এর মাটি হবে কস্তুরী (মিশক)। এটি দুধের চেয়ে সাদা এবং মধুর চেয়েও মিষ্টি। সেখানে এমন পাখি আসবে, যাদের ঘাড়গুলো হবে উটের ঘাড়ের মতো।" তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'ইয়া রাসূলুল্লাহ! নিশ্চয়ই এগুলো (পাখিগুলো) অত্যন্ত নরম (ও উপভোগ্য)।' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি এগুলো খাবে, সে এর চেয়েও বেশি নরম (ও সুখকর অবস্থায়) থাকবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تُقرأ في بعض النسخ الخطية: الحسن، وهو تحريف. وإنما قيل له: الختن، لأنه كان ختن أبي بكر بن خزيمة، أي زوج ابنته، انظر ترجمته في "الأنساب" للسمعاني 3/ 314 في رسم (الجنجروذي)، و "تاريخ الإسلام" 7/ 792.
[2] كذا هما في نسخنا الخطية: ترابها … طائر. والصواب كما في مصادر التخريج: ترابه، أي: النهر، وطَيْر: وهو جمع، وطائر مفرده. وأما حديث عبد الواحد بن زياد، فأخرجه أبو القاسم بن بشران في "أماليه" (221) من طريق إسحاق بن راهويه، عن المغيرة بن سلمة، عنه.وانظر حديث قتادة عن أنس عند البخاري (6581) وأحمد 20/ (12675)، وحديث شريك بن عبد الله عن أنس عند البخاري (7517)، وحديث حميد عن أنس عند أحمد 19/ (12008)، وحديث ثابت عن أنس عنده 20/ (12542).
4022 [3] - كذا هما في نسخنا الخطية: ترابها … طائر. والصواب كما في مصادر التخريج: ترابه، أي: النهر، وطَيْر: وهو جمع، وطائر مفرده. وأما حديث عبد الواحد بن زياد، فأخرجه أبو القاسم بن بشران في "أماليه" (221) من طريق إسحاق بن راهويه، عن المغيرة بن سلمة، عنه.وانظر حديث قتادة عن أنس عند البخاري (6581) وأحمد 20/ (12675)، وحديث شريك بن عبد الله عن أنس عند البخاري (7517)، وحديث حميد عن أنس عند أحمد 19/ (12008)، وحديث ثابت عن أنس عنده 20/ (12542).
4022 [4] - حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل أبي أُويس - وهو عبد الله بن عبد الله بن أُويس الأصبحي - وقد توبع، وعاصم بن علي صدوق حسن الحديث، وباقي رجاله ثقات. الزهري: هو محمد بن مسلم بن عبيد الله بن عبد الله بن شهاب القرشي الزهري.وأخرجه أحمد 21/ (13480) و (13484) من طريقين عن أبي أُويس، بهذا الإسناد. وذكر فيه عمر بدل أبي بكر في آخره.وأخرجه أحمد (13475) و (13485) عن إبراهيم بن سعد الزهري، والترمذي (2542) من طريق عبد الله بن مسلمة، كلاهما عن محمد بن عبد الله بن مسلم، عن أبيه، به. وذكر عبد الله بن مسلمة فيه عمر بدل أبي بكر، وقال الترمذي: حديث حسن.ورواه عبد الوهاب بن أبي بكر عند أحمد (13306)، والنسائي (11639) عن عبد الله بن مسلم، عن ابن شهاب الزهري، عن أنس. فقلبه، وذكر فيه عمر أيضًا.والجُزُر: جمع جَزُور، وهو البعير. وأما حديث عبد الواحد بن زياد، فأخرجه أبو القاسم بن بشران في "أماليه" (221) من طريق إسحاق بن راهويه، عن المغيرة بن سلمة، عنه.وانظر حديث قتادة عن أنس عند البخاري (6581) وأحمد 20/ (12675)، وحديث شريك بن عبد الله عن أنس عند البخاري (7517)، وحديث حميد عن أنس عند أحمد 19/ (12008)، وحديث ثابت عن أنس عنده 20/ (12542).
4022 [5] - كذا عزاه المصنف إلى مسلم من حديث عبد الواحد بن زياد عن المختار، فوهمَ، وإنما أخرجه مسلم في "صحيحه" (400) من حديث علي بن مسهر ومحمد بن فضيل عن مختار بن فلفل، وانظر تتمة تخريجه في "مسند أحمد" 19/ (11996). وأما حديث عبد الواحد بن زياد، فأخرجه أبو القاسم بن بشران في "أماليه" (221) من طريق إسحاق بن راهويه، عن المغيرة بن سلمة، عنه.وانظر حديث قتادة عن أنس عند البخاري (6581) وأحمد 20/ (12675)، وحديث شريك بن عبد الله عن أنس عند البخاري (7517)، وحديث حميد عن أنس عند أحمد 19/ (12008)، وحديث ثابت عن أنس عنده 20/ (12542).
4023 - أخبرني إبراهيم بن عِصْمةَ بن إبراهيم العَدْل، حدَّثنا أبي، حدَّثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا هُشَيم، أخبرنا أبو بِشْر، عن سعيد بن جُبير، عن ابن عبَّاس: {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ} قال: الكوثرُ: الخيرُ الكثير الذي أعطاه الله إياه. قال أبو بِشْر: فقلتُ لسعيد: إنَّ ناسًا يَزعُمون أنه نهرٌ في الجنة، فقال: والنهرُ من الخير الكثير [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!فأما قولُه عز وجل: {فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ}، فقد اختلف الصحابةُ في تأويلها، وأحسنُها ما رُوي عن أمير المؤمنين عليّ بن أبي طالب في روايتين: الأولى منهما:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র বাণী: {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ} (নিশ্চয় আমি তোমাকে আল-কাউসার দান করেছি) সম্পর্কে তিনি বলেন, আল-কাউসার হলো সেই অফুরন্ত কল্যাণ যা আল্লাহ তাঁকে দান করেছেন। আবু বিশর বলেন: আমি সাঈদকে বললাম, নিশ্চয় কিছু লোক ধারণা করে যে এটি জান্নাতের একটি নদী। তিনি বলেন: আর নদীও সেই অফুরন্ত কল্যাণের অংশ। এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তাঁরা এটি সংকলন করেননি। আর আল্লাহ্ আয্যা ওয়া জাল্লার বাণী: {فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ} (সুতরাং তুমি তোমার রবের উদ্দেশ্যে সালাত আদায় করো এবং কুরবানি করো) প্রসঙ্গে, সাহাবীগণ এর ব্যাখ্যা নিয়ে মতভেদ করেছেন। সেগুলোর মধ্যে সর্বোত্তম হলো আমীরুল মু'মিনীন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত দুটি বর্ণনা, যার প্রথমটি হলো:
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. يحيى بن يحيى: هو النيسابوري، وأبو بشر: هو جعفر بن أبي وحشية.وأخرجه البخاري (4966) و (6578)، والنسائي (11640) من طرق عن هشيم، بهذا الإسناد.فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وانظر ما سيأتي برقم (6387). رواية المصنف وعنه البيهقي في "السنن الكبرى" 2/ 29، وهو مجهول لا يُعرَف، ولم يعرفه الإمام أحمد كما في "علل الرجال" (1644)، ومع ذلك ذكره ابن حبان في "ثقاته" 5/ 227.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 6/ 437، والطبري في "تفسيره" 30/ 325، وابن المنذر في "الأوسط" (1280)، والثعلبي في "تفسيره" 10/ 310، والبيهقي 2/ 30 من طرق عن حماد بن سلمة، به - بعضهم جعله من رواية حماد عن عاصم الجحدري عن أبيه عن عقبة عن علي، وبعضهم جعله من روايته عن عاصم عن عقبة عن أبيه عن علي. فهذه علة أخرى في الإسناد وهي الاضطراب، وزادوا في آخره: ثم وضعها على صدره.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 401، وابن أبي شيبة 1/ 390، والبخاري 6/ 437، والطبري 30/ 325، والدارقطني في "السنن" (1099)، والثعلبي 10/ 310 - 311، والضياء في "الأحاديث المختارة" 2/ (673) من طريق يزيد بن زياد بن أبي الجعد، عن عاصم الجحدري، عن عقبة بن ظهير - كذا سمّاه - عن علي.
4024 - ما حدَّثَناه علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدَّثنا هشام بن علي ومحمد بن أيوب قالا: حدَّثنا موسى بن إسماعيل، حدَّثنا حماد بن سلمة، عن عاصم الجَحْدَري، عن عُقْبة بن صُهبان، عن علي: {فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ}، قال: هو وَضْعُك يمينَك على شمالِك في الصلاة [1]. والرواية الثانية:
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহর বাণী: “অতএব আপনি আপনার রবের উদ্দেশ্যেই সালাত আদায় করুন এবং কুরবানী করুন” এর ব্যাখ্যায় বলেন: এর অর্থ হলো, সালাতের মধ্যে তোমার ডান হাতকে বাম হাতের উপর রাখা।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف، عقبة الراوي عن علي: هو ابن ظَبْيان، وليس ابن صهبان كما وقع في رواية المصنف وعنه البيهقي في "السنن الكبرى" 2/ 29، وهو مجهول لا يُعرَف، ولم يعرفه الإمام أحمد كما في "علل الرجال" (1644)، ومع ذلك ذكره ابن حبان في "ثقاته" 5/ 227.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 6/ 437، والطبري في "تفسيره" 30/ 325، وابن المنذر في "الأوسط" (1280)، والثعلبي في "تفسيره" 10/ 310، والبيهقي 2/ 30 من طرق عن حماد بن سلمة، به - بعضهم جعله من رواية حماد عن عاصم الجحدري عن أبيه عن عقبة عن علي، وبعضهم جعله من روايته عن عاصم عن عقبة عن أبيه عن علي. فهذه علة أخرى في الإسناد وهي الاضطراب، وزادوا في آخره: ثم وضعها على صدره.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 401، وابن أبي شيبة 1/ 390، والبخاري 6/ 437، والطبري 30/ 325، والدارقطني في "السنن" (1099)، والثعلبي 10/ 310 - 311، والضياء في "الأحاديث المختارة" 2/ (673) من طريق يزيد بن زياد بن أبي الجعد، عن عاصم الجحدري، عن عقبة بن ظهير - كذا سمّاه - عن علي.
4025 - حدَّثَناه أبو محمد عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلّاب بهَمَذان، حدَّثنا أبو حاتم محمد بن إدريس الرّازي، حدَّثنا وهب [1] بن أبي مَرحُوم، حدَّثنا إسرائيل بن حاتم، عن مقاتل بن حيَّان، عن الأصبَغ بن نُبَاتة، عن علي بن أبي طالب قال: لما نَزَلَت هذه الآيةُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم: {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ (1) فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ}، قال النبي صلى الله عليه وسلم جبريل: "ما هذه النَّحِيرةُ التي أَمَرني بها ربِّي؟ قال: إنها ليست بنَحيرةٍ، ولكنه يأمرُك إذا تَحرَّمتَ للصلاة أن تَرفَعَ يديك إذا كبَّرت، وإذا ركعتَ وإذا رفعتَ رأسَك من الركوع، فإنها صلاتُنا وصلاةُ الملائكة الذين في السماوات السَّبْع"، قال النبي صلى الله عليه وسلم: "رفعُ الأيدي من الاستكانةِ التي قال الله عز وجل: {فَمَا اسْتَكَانُوا لِرَبِّهِمْ وَمَا يَتَضَرَّعُونَ} [المؤمنون: 76] " [2]. 109 - تفسير سورة (قل يا أيها الكافرون)بسم الله الرحمن الرحيم
আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর এই আয়াতটি নাযিল হলো: {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ (1) فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ} (নিশ্চয়ই আমি আপনাকে কাওসার দান করেছি। অতএব আপনার রবের জন্য সালাত আদায় করুন এবং কুরবানী করুন বা নহর করুন।), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিবরাঈল (আঃ)-কে জিজ্ঞেস করলেন, "আমার রব আমাকে যে 'নহীরাহ্' (কুরবানী/নহর) করতে আদেশ করেছেন, তা কী?" তিনি (জিবরাঈল) বললেন, "এটা কুরবানী নয়। বরং তিনি আপনাকে আদেশ করছেন যে, যখন আপনি সালাতের জন্য তাকবীরে তাহরীমা বাঁধবেন, তখন আপনার হাত উত্তোলন করবেন, যখন আপনি রুকুতে যাবেন এবং যখন রুকু থেকে মাথা উঠাবেন (তখনও হাত উত্তোলন করবেন)। কেননা এটাই আমাদের সালাত এবং সাত আসমানে অবস্থিত ফেরেশতাদের সালাত।" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হাত উত্তোলন করা হলো সেই বিনম্রতা (ইসতিকানাহ্) যা সম্পর্কে আল্লাহ আযযা ওয়াজাল্ল বলেছেন: {فَمَا اسْتَكَانُوا لِرَبِّهِمْ وَمَا يَتَضَرَّعُونَ} (সুতরাং তারা তাদের রবের প্রতি বিনয়ী হয়নি এবং কাকুতি-মিনতিও করেনি)। [সূরা মুমিনুন: ৭৬]"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في (ز) إلى: وهيب. ووهب هذا: هو ابن إبراهيم الفاميّ أبو علي الرازي، كان جليس أبي زرعة الرازي كما قال ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 9/ 29 وقال: سمعت منه مع أبي، وهو صدوق ثقة. وذكره ابن حبان في "الثقات" 9/ 229 إلّا أنه وقع في المطبوع منه: وهب بن إبراهيم بن أبي مرجوّ!
[2] إسناده تالف، أصبغ بن نباتة متروك، وإسرائيل بن حاتم يروي عن مقاتل بن حيان الموضوعات كما قال ابن حبان في "المجروحين"، وقال الذهبي في "تلخيص المستدرك": إسرائيل صاحب عجائب لا يعتمد عليه، وأصبغ شيعي متروك عند النسائي، وقال الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 1/ 273: إسناده ضعيف جدًّا.وأخرجه البيهقي 2/ 75 - 76 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" - كما في "تفسير ابن كثير" 8/ 524 وقال ابن كثير: حديث منكر جدًّا - وابن الأعرابي في "معجمه" (967)، وابن حبان في "المجروحين" 1/ 177 - 178، والواحدي في "الوسيط" 4/ 562 من طريق وهب بن إبراهيم الفامي - وهو ابن أبي مرحوم - بهذا الإسناد. وقرن ابن الأعرابي بوهبٍ محمدَ بنَ إبراهيم الوراق، وتحرَّف الفامي في مطبوع "المجروحين" إلى: القاضي.وأما وضع اليمين على الشمال في الصلاة، فقد جاء في رواية عدّةٍ من الصحابة، ولم يأت عن النبي صلى الله عليه وسلم فيه خلاف، وهو قول الجمهور من الصحابة والتابعين. انظر "فتح الباري" 3/ 305.
4026 - حدَّثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدَّثنا أبو جعفر الحَضْرمي، حدَّثنا أحمد بن يونُس، حدَّثنا زُهَير، عن أبي إسحاق، عن فَرْوة بن نوفل الأشجعي، عن أبيه، أنه قال للنبي صلى الله عليه وسلم: مُرْني بشيءٍ أقولُه، فقال: "إذا أَوَيتَ إلى مَضجَعِك فاقرأ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} إلى خاتمتِها، فإنها بَراءةٌ من الشِّرْك" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. 110 - تفسير سورة (إذا جاء نصرُ الله)بسم الله الرحمن الرحيم
নওফল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: আমাকে এমন কিছুর নির্দেশ দিন যা আমি বলব। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যখন তুমি তোমার শয্যায় যাবে, তখন তুমি {ক্বুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরুন} সূরাটির শেষ পর্যন্ত পড়বে, কেননা তা শির্ক থেকে মুক্তকারী।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث حسن كما سلف برقم (2102). أبو جعفر الحضرمي: هو الحافظ محمد بن عبد الله بن سليمان المعروف بمطيَّن، وأحمد بن يونس: هو أحمد بن عبد الله بن يونس، نُسب إلى جدِّه، وزهير هو ابن معاوية الجُعْفيّ، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي.وأخرجه أحمد 39/ (24009/ 49)، وأبو داود (5055)، والنسائي (10569) و (11645)، وابن حبان (790) من طرق عن زهير بن معاوية، بهذا الإسناد.
4027 - أخبرنا أبو العبَّاس محمد بن أحمد المحبُوبي، حدَّثنا الفَضْل بن عبد الجبار، حدَّثنا النَّضْر بن شُمَيل، حدَّثنا شُعبة، حدَّثنا أبو إسحاق: سمعتُ أبا عُبيدة يحدِّث عن عبد الله قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُكثِرُ أن يقول: "سُبحانَك ربَّنا وبحمدِك"، فلما نزلت: {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ}، قال: "سبحانَك ربَّنا وبحمدِك، اللهمَّ اغْفِرْ لي إنَّك أنت التوابُ الرَّحيم" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. 111 - تفسير سورة (تبَّت يدا أبي لَهَب)بسم الله الرحمن الرحيم
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রায়ই বলতেন: "সুবহানাকা রাব্বানা ওয়া বিহামদিকা" (হে আমাদের প্রতিপালক! আপনি পবিত্র এবং আপনার জন্যই সব প্রশংসা)। এরপর যখন (কুরআনের আয়াত) {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ} (যখন আল্লাহর সাহায্য ও বিজয় আসবে) নাযিল হলো, তখন তিনি বললেন: "সুবহানাকা রাব্বানা ওয়া বিহামদিকা, আল্লাহুম্মাগফির লী, ইন্নাকা আনতাত তাওয়াবুর রাহীম" (হে আমাদের প্রতিপালক! আপনি পবিত্র এবং আপনার জন্যই সব প্রশংসা। হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করুন। নিশ্চয়ই আপনি তওবা কবুলকারী ও পরম দয়ালু)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، إلا أنه منقطع، فأبو عبيدة - وهو ابن عبد الله بن مسعود - لم يسمع من أبيه. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي.وقد سلف برقم (1870). (6050) و (6926) فسماه عبَّاس بن الفضل الأزرق، وهو المحفوظ فيه، فقد رواه هكذا إبراهيم بن أبي الجحيم - وهو إبراهيم بن محمد بن إسحاق بن أبي الجحيم - عند أبي القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (2141)، ومحمد بن غالب تمتام عند البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 338، كلاهما عن عبَّاس بن الفضل الأزرق، بهذا الإسناد. وابن أبي الجحيم لا بأس به، وكذا أبو بكر بن خلاد، وتمتام حافظ ثقة.وأما ذكر لهب بن أبي لهب فيه، فقد قال البيهقي في "الدلائل": كذا قال عبَّاس بن الفضل وليس بالقوي: لهب بن أبي لهب، وأهل المغازي يقولون: عتبة بن أبي لهب، وقال بعضهم: عُتَيبة. قلنا: والأخير هو المشهور، فإنَّ عتبة قد ذكر غير واحد ممن ألف في الصحابة أنه أسلم عام الفتح وحَسُن إسلامه.وله شاهد من حديث هبّار بن الأسود عند ابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 207، وابن منده في "معرفة الصحابة" - كما في "الإصابة" لابن حجر 6/ 527 - وأبي نعيم في "دلائل النبوة" (380)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 38/ 301 - 302 من طريق هشام وعثمان ابني عروة بن الزبير، عن أبيهما، عن هبار. وهذا إسناد منقطع، عروة لم يدرك هبارًا. وبعضهم ذكر فيه عتبة بن أبي لهب، وبعضهم عتيبة.وروي من وجه آخر ضعيف عن هشام بن عروة - عند الطبراني في "الكبير" 22/ (1060)، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 339 - عن أبيه مرسلًا، لم يذكر فيه هبارًا.وروي أيضًا من وجه آخر عن محمد بن كعب القرظي عن عثمان بن عروة - عند أبي نعيم في "الدلائل" (381) - عن رجال من أهل بيته قالوا … فذكروا القصة. وهو عند الدَّوْلابي في "الذرية الطاهرة" (77) من رواية محمد بن كعب القرظي وعثمان بن عروة مرسلًا.وله شاهد آخر عن قَتادةَ مرسلًا، أخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 250، وكذا الطبري 27/ 40 و 41، والدولابي (76)، والطبراني 22/ (1060)، والبيهقي 2/ 338 - 339، وقوام السنة الأصبهاني في "دلائل النبوة" (305).وشاهد ثالث عن طاووس اليماني مرسلًا، أخرجه عبد الرزاق 2/ 250، والطبري 27/ 41، وأبو نعيم في "الدلائل" (383).ورابع عن الواقدي عن موسى بن محمد بن إبراهيم عن أبيه مرسلًا عند أبي نعيم أيضًا (383).ومحمد بن إبراهيم هذا أغلب الظن أنه التيمي.
4028 - أخبرني أبو بكر بن أبي نصر المزكِّي بمَرْو، حدَّثنا الحارث بن أبي أسامة، حدَّثنا العبَّاس بن الفضل الأنصاري، حدَّثنا الأسوَد بن شَيْبان، عن أبي نَوفَل بن أبي عَقرَب، عن أبيه قال: كان لهبُ بن أبي لهبٍ يَسُبُّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "اللهمَّ سلِّطْ عليه كَلْبَك"، فخرج في قافلةٍ يريد الشام، فنزلوا منزلًا، فقال: إِنِّي أخافُ دعوةَ محمدٍ، قالوا له: كلَّا، فحَطُّوا مَتاعَهم [1] حولَه وقعدوا يَحرُسونه، فجاء الأسدُ فانتزَعَه فذهبَ به [2]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু নওফাল ইবনে আবী আকরাব-এর পিতা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লাহাব ইবনে আবু লাহাব রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গালি দিত। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হে আল্লাহ! তার উপর তোমার কুকুরকে চাপিয়ে দাও।” এরপর সে (লাহাব ইবনে আবু লাহাব) সিরিয়াগামী একটি কাফেলার সাথে বের হলো। তারা এক স্থানে বিরতির জন্য নামল। তখন সে বলল: আমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বদ-দোয়াকে ভয় করি। কাফেলার লোকেরা তাকে বলল: না (কোনো ভয় নেই)। অতঃপর তারা তার আশেপাশে তাদের মালপত্র রাখল এবং তাকে পাহারা দেওয়ার জন্য বসে রইল। তখন একটি সিংহ এসে তাকে ছিঁড়ে তুলে নিয়ে গেল।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في نسخنا الخطية: متاعه، والمثبت من المطبوع، وهو أوجه. (6050) و (6926) فسماه عبَّاس بن الفضل الأزرق، وهو المحفوظ فيه، فقد رواه هكذا إبراهيم بن أبي الجحيم - وهو إبراهيم بن محمد بن إسحاق بن أبي الجحيم - عند أبي القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (2141)، ومحمد بن غالب تمتام عند البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 338، كلاهما عن عبَّاس بن الفضل الأزرق، بهذا الإسناد. وابن أبي الجحيم لا بأس به، وكذا أبو بكر بن خلاد، وتمتام حافظ ثقة.وأما ذكر لهب بن أبي لهب فيه، فقد قال البيهقي في "الدلائل": كذا قال عبَّاس بن الفضل وليس بالقوي: لهب بن أبي لهب، وأهل المغازي يقولون: عتبة بن أبي لهب، وقال بعضهم: عُتَيبة. قلنا: والأخير هو المشهور، فإنَّ عتبة قد ذكر غير واحد ممن ألف في الصحابة أنه أسلم عام الفتح وحَسُن إسلامه.وله شاهد من حديث هبّار بن الأسود عند ابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 207، وابن منده في "معرفة الصحابة" - كما في "الإصابة" لابن حجر 6/ 527 - وأبي نعيم في "دلائل النبوة" (380)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 38/ 301 - 302 من طريق هشام وعثمان ابني عروة بن الزبير، عن أبيهما، عن هبار. وهذا إسناد منقطع، عروة لم يدرك هبارًا. وبعضهم ذكر فيه عتبة بن أبي لهب، وبعضهم عتيبة.وروي من وجه آخر ضعيف عن هشام بن عروة - عند الطبراني في "الكبير" 22/ (1060)، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 339 - عن أبيه مرسلًا، لم يذكر فيه هبارًا.وروي أيضًا من وجه آخر عن محمد بن كعب القرظي عن عثمان بن عروة - عند أبي نعيم في "الدلائل" (381) - عن رجال من أهل بيته قالوا … فذكروا القصة. وهو عند الدَّوْلابي في "الذرية الطاهرة" (77) من رواية محمد بن كعب القرظي وعثمان بن عروة مرسلًا.وله شاهد آخر عن قَتادةَ مرسلًا، أخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 250، وكذا الطبري 27/ 40 و 41، والدولابي (76)، والطبراني 22/ (1060)، والبيهقي 2/ 338 - 339، وقوام السنة الأصبهاني في "دلائل النبوة" (305).وشاهد ثالث عن طاووس اليماني مرسلًا، أخرجه عبد الرزاق 2/ 250، والطبري 27/ 41، وأبو نعيم في "الدلائل" (383).ورابع عن الواقدي عن موسى بن محمد بن إبراهيم عن أبيه مرسلًا عند أبي نعيم أيضًا (383).ومحمد بن إبراهيم هذا أغلب الظن أنه التيمي.
[2] حسن بشواهده إن شاء الله، وحسَّنه الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 6/ 129، وهذا إسناد ضعيف جدًّا من أجل العبَّاس بن الفضل، وذكر الأنصاريِّ في نسبه وهمٌ لعله من المصنف أو من شيخه، فإنَّ هذا الخبر عند الحارث بن أبي أسامة في "مسنده" كما في "بغية الباحث" (511) وذكره فيه مهملًا لم ينسبه، ورواه عنه أبو بكر بن خلاد عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (6050) و (6926) فسماه عبَّاس بن الفضل الأزرق، وهو المحفوظ فيه، فقد رواه هكذا إبراهيم بن أبي الجحيم - وهو إبراهيم بن محمد بن إسحاق بن أبي الجحيم - عند أبي القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (2141)، ومحمد بن غالب تمتام عند البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 338، كلاهما عن عبَّاس بن الفضل الأزرق، بهذا الإسناد. وابن أبي الجحيم لا بأس به، وكذا أبو بكر بن خلاد، وتمتام حافظ ثقة.وأما ذكر لهب بن أبي لهب فيه، فقد قال البيهقي في "الدلائل": كذا قال عبَّاس بن الفضل وليس بالقوي: لهب بن أبي لهب، وأهل المغازي يقولون: عتبة بن أبي لهب، وقال بعضهم: عُتَيبة. قلنا: والأخير هو المشهور، فإنَّ عتبة قد ذكر غير واحد ممن ألف في الصحابة أنه أسلم عام الفتح وحَسُن إسلامه.وله شاهد من حديث هبّار بن الأسود عند ابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 207، وابن منده في "معرفة الصحابة" - كما في "الإصابة" لابن حجر 6/ 527 - وأبي نعيم في "دلائل النبوة" (380)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 38/ 301 - 302 من طريق هشام وعثمان ابني عروة بن الزبير، عن أبيهما، عن هبار. وهذا إسناد منقطع، عروة لم يدرك هبارًا. وبعضهم ذكر فيه عتبة بن أبي لهب، وبعضهم عتيبة.وروي من وجه آخر ضعيف عن هشام بن عروة - عند الطبراني في "الكبير" 22/ (1060)، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 339 - عن أبيه مرسلًا، لم يذكر فيه هبارًا.وروي أيضًا من وجه آخر عن محمد بن كعب القرظي عن عثمان بن عروة - عند أبي نعيم في "الدلائل" (381) - عن رجال من أهل بيته قالوا … فذكروا القصة. وهو عند الدَّوْلابي في "الذرية الطاهرة" (77) من رواية محمد بن كعب القرظي وعثمان بن عروة مرسلًا.وله شاهد آخر عن قَتادةَ مرسلًا، أخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 250، وكذا الطبري 27/ 40 و 41، والدولابي (76)، والطبراني 22/ (1060)، والبيهقي 2/ 338 - 339، وقوام السنة الأصبهاني في "دلائل النبوة" (305).وشاهد ثالث عن طاووس اليماني مرسلًا، أخرجه عبد الرزاق 2/ 250، والطبري 27/ 41، وأبو نعيم في "الدلائل" (383).ورابع عن الواقدي عن موسى بن محمد بن إبراهيم عن أبيه مرسلًا عند أبي نعيم أيضًا (383).ومحمد بن إبراهيم هذا أغلب الظن أنه التيمي.
4029 - أخبرني محمد بن المؤمَّل بن الحسن، حدَّثنا الفضل بن محمد، حدَّثنا أحمد بن حَنبَل، قال: قُرِئَ على سفيان بن عُيينة وأنا شاهدٌ: الزُّهْرِيُّ، عن عُبيد الله، عن ابن عباس: {مَا أَغْنَى عَنْهُ مَالُهُ وَمَا كَسَبَ}، قال: كَسْبُه: ولدُه [1].قال أحمدُ بن حَنبَل: لم يَذكُر ابن عُيينة سماعَه فيه، ثم بَلَغني أنه سمعه من عمر بن حَبِيب.
আবদুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর বাণী: {মَا أَغْنَى عَنْهُ مَالُهُ وَمَا كَسَبَ} (তার সম্পদ এবং সে যা উপার্জন করেছে, তা তার কোনো কাজে আসবে না) প্রসঙ্গে তিনি বলেন: তার উপার্জন হলো: তার সন্তানসন্ততি। আহমাদ ইবনু হাম্বল বলেন: ইবনু উয়ায়না (এ বিষয়ে) তাঁর সরাসরি শ্রবণের কথা উল্লেখ করেননি। পরবর্তীতে আমার নিকট খবর পৌঁছায় যে, তিনি তা উমার ইবনু হাবীবের নিকট থেকে শুনেছিলেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، رجاله ثقات إلّا أنَّ سفيان لم يذكر فيه سماعه من الزهري كما قال أحمد بن حنبل، فإن ثبت أنه سمعه من عمر بن حبيب فالإسناد متصل صحيح، فعمر بن حبيب هذاهو المكي القاضي سكن اليمن، وهو ثقة حافظ، وذهلَ الذهبي في "تلخيصه" فظنه العدوي البصري الضعيف فوهاه، ولكليهما ترجمة في "التهذيب". الفضل بن محمد: هو الشَّعراني، وعبيد الله: هو ابن عبد الله بن عتبة بن مسعود.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 406 عن معمر، عن قَتادةَ، عن ابن عبَّاس. وهو منقطع، قتادة لم يسمع من ابن عبَّاس. الإخلاص في فضائل القرآن برقم (2103) و (2105) و (2109) والموضع الأخير فيه فضيلة المعوذتين أيضًا، وفضيلتهما أيضًا في الحديث رقم (2110).
4030 - وأخبرني محمد بن المؤمَّل، حدَّثنا الفضل، حدَّثنا أحمد بن حَنبَل، حدَّثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن ابن خُثَيم، عن أبي الطُّفَيل قال: كنت عند ابن عبَّاس يومًا، فجاءه بنو أبي لهبٍ يختصمون في شيءٍ لهم، فقام يُصلِحُ بينهم، فدَفَعه بعضُهم فوَقَع على الفِراش، فغَضِبَ ابن عبَّاس وقال: أخرِجوا عني الكَسْب الخبيثَ - يعني: ولدَه - {مَا أَغْنَى عَنْهُ مَالُهُ وَمَا كَسَبَ} [1].بسم الله الرحمن الرحيم 112 - تفسير سورة الإخلاصقد ذكرتُ فضائل هذه السُّورة [2] في كتاب فضائل القرآن.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আমি ইবনে আব্বাসের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে ছিলাম, তখন আবু লাহাবের ছেলেরা তাদের কোনো এক বিষয় নিয়ে ঝগড়া করতে আসল। তিনি তাদের মাঝে মীমাংসা করার জন্য দাঁড়ালেন। তখন তাদের মধ্যে থেকে কেউ একজন তাকে ধাক্কা দিল, ফলে তিনি বিছানার (অথবা গদির) উপর পড়ে গেলেন। এতে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগান্বিত হয়ে বললেন: আমার কাছ থেকে এই 'খবিস উপার্জন'কে (অর্থাৎ: তার সন্তানদের) দূর করো! (এবং তিনি তিলাওয়াত করলেন): "তার ধন-সম্পদ ও যা সে উপার্জন করেছে, তা তার কোনো কাজে আসবে না।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده قوي من أجل ابن خثيم: وهو عبد الله بن عثمان بن خثيم. أبو الطفيل: هو عامر بن واثلة.وهو في "تفسير عبد الرزاق" 2/ 406، ومن طريق عبد الرزاق أخرجه الطبري في "تفسيره" 30/ 337 - 338، وكذا الثعلبي 10/ 325 - 326. الإخلاص في فضائل القرآن برقم (2103) و (2105) و (2109) والموضع الأخير فيه فضيلة المعوذتين أيضًا، وفضيلتهما أيضًا في الحديث رقم (2110).
[2] هكذا في النسخ الخطية غير (ز) ففيها: السُّور، على الجمع. وقد سلف ذكر فضائل سورة الإخلاص في فضائل القرآن برقم (2103) و (2105) و (2109) والموضع الأخير فيه فضيلة المعوذتين أيضًا، وفضيلتهما أيضًا في الحديث رقم (2110).
4031 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ وأبو جعفر محمد بن صالح [1] قالا: حدَّثنا الحسين بن الفضل، حدَّثنا محمد بن سابق، حدَّثنا أبو جعفر الرَّازي، عن الرَّبيع بن أنس، عن أبي العاليَة، عن أُبيِّ بن كعب: أنَّ المشركين قالوا: يا محمدُ، انسُبْ لنا ربَّك، فأنزل الله: {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ (1) اللَّهُ الصَّمَدُ (2) لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ (3) وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ}، لأنه ليس شيءٌ يُولَدُ إِلَّا سيموتُ، وليس شيءٌ يموت إلا سيُورَثُ، وإنَّ الله لا يموتُ ولا يُورَثُ، {وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ}: لم يكن له شبيهٌ ولا عِدْلٌ، وليس كمثلِه شيءٌ [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. بسم الله الرحمن الرحيم 113 - تفسير سورة الفلق
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুশরিকরা বলল, ‘হে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনি আমাদের জন্য আপনার রবের বংশপরিচয় দিন।’ তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {ক্বুল হুওয়াল্লাহু আহাদ। আল্লাহুছ্ ছামাদ। লাম ইয়ালিদ ওয়া লাম ইউলাদ। ওয়া লাম ইয়াকুল্লাহু কুফুওয়ান আহাদ।} (বলুন, তিনিই আল্লাহ, একক। আল্লাহ কারো মুখাপেক্ষী নন। তিনি কাউকে জন্ম দেননি এবং তাঁকেও জন্ম দেওয়া হয়নি। আর তাঁর সমকক্ষ কেউ নেই।) কারণ যা কিছুই জন্ম নেয়, তা অবশ্যই মৃত্যুবরণ করে। আর যা কিছুই মারা যায়, তা অবশ্যই উত্তরাধিকারসূত্রে প্রাপ্ত হয়। কিন্তু আল্লাহ মরেনও না এবং তাঁর উত্তরাধিকারীও হয় না। "আর তাঁর সমকক্ষ কেউ নেই" - এর অর্থ হলো, তাঁর কোনো সাদৃশ্য বা সমতুল্য নেই। তাঁর মতো কিছুই নেই।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: محمد بن علي، وهو سبق قلمٍ من المصنف أو من بعض النساخ بعده، وقد خرَّج البيهقي هذا الحديث في "الشعب" (100) و "الأسماء والصفات" (50) عن المصنف فذكره على الصواب: أبو جعفر محمد بن صالح، زاد في "الأسماء والصفات": بن هانئ. واحد شيوخ المصنف هو أبو جعفر محمد بن علي بن دحيم الشيباني، إلا أنه لا تعرف له رواية عن الحسين بن الفضل البجلي، والمصنف قد روى عشرات الأحاديث في كتابه هذا عن الحسين من طريق أبي جعفر محمد بن صالح بن هانئ.
[2] المحفوظ في هذا الخبر أنه من تفسير أبي العالية - وهو رفيع الرِّياحي - ليس فيه أبي بن كعب كما سيأتي، والإسناد إليه حسن إن شاء الله من أجل أبي جعفر الرازي: وهو عيسى بن أبي عيسى. الحسين بن الفضل: هو أبو علي البجلي الكوفي ثم النيسابوري، ومحمد بن سابق: هو محمد بن سعيد بن سابق.وأخرجه أحمد 35/ (21219)، والترمذي (3364) من طريق أبي سعد محمد بن ميسر الصغاني، عن أبي جعفر الرازي، بهذا الإسناد. ومحمد بن ميسّر ضعيف، لكنه متابع.ورواه عبيد الله بن موسى عند الترمذي (3365)، ومهران بن أبي عمر العطار عند الطبري في "تفسيره" 1/ 343، وهاشم بن القاسم عند العقيلي في "الضعفاء" بإثر (1654)، ثلاثتهم عن أبي جعفر الرازي، عن الربيع، عن أبي العالية نحوه، ولم يذكر فيه أُبيَّ بن كعب. وصوَّبه الترمذي والعقيلي، فهولاء الثلاثة من الثقات، ومهران أدناهم درجة في الثقة.
4032 - حدَّثنا أبو العبَّاس محمد بن يعقوب، حدَّثنا العبَّاس بن محمد الدُّوري، حدَّثنا وهب بن جَرير، حدَّثنا أبي، سمعتُ يحيى بن أيوب يحدِّث عن يزيد بن أبي حَبيب، عن أسلمَ أبي عِمْران التُّجِيبي، عن عُقْبة بن عامر قال: قلتُ: يا رسول الله، أقرأ من سورة يوسفَ وسورة هودٍ، قال: "يا عقبهُ، اقرأ بـ {أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ}، فإنك لن تقرأ بسورةٍ أحبَّ إلى الله، وأبلغَ عندَه منها، فإنِ استطعتَ أن لا تَفُوتَك فافعَلْ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উকবাহ ইবনে আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি কি সূরা ইউসুফ ও সূরা হুদ থেকে (কুরআন) পড়ব? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উকবাহ! তুমি 'আউযু বিরাব্বিল ফালাক্ব' (অর্থাৎ সূরা ফালাক) পাঠ করো। কেননা তুমি এমন কোনো সূরা পাঠ করবে না, যা আল্লাহর নিকট এর (সূরা ফালাকের) চেয়ে অধিক প্রিয় ও অধিক ফলদায়ক। সুতরাং তুমি যদি এটিকে কখনও বাদ না দিতে পারো, তবে তাই করো।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل يحيى بن أيوب - وهو الغافقي المصري - وقد توبع. جرير: هو ابن حازم.وأخرجه النسائي (7791) عن أحمد بن سعيد، عن وهب بن جرير، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 28/ (17341) و (17418) و (17455)، والنسائي (1027) و (7790)، وابن حبان (795) و (1842) من طرق عن يزيد بن أبي حبيب، به.وقد روي عن عقبة في فضل المعوذتين بغير هذا اللفظ، انظر ما سلف عند المصنف برقم (795) و (796). وانظر أيضًا "صحيح مسلم" (814). بخاله في بعض الروايات عند أحمد والنسائي: المنذر بن أبي المنذر، وهو يصلح للاعتبار. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.الغاسق: المظلم.وقوله: "إذا وقب" قال السندي في حاشيته على "المسند": أي: غابَ، وإنما سُمِّي غاسقًا لأنه إذا أخذ في الطلوع والغروب يُظلِم لونه لِما تَعرض دونه من الأبخرة المتصاعدة من الأرض عند الأفق، وهو إذا غاب انتشر الفَسَقة للسرقة وللفجور.وانظر "شرح مشكل الآثار" للطحاوي 5/ 29 وما بعدها.
4033 - حدَّثنا أبو جعفر أحمد بن عُبيد بن إبراهيم الحافظ بهَمَذان، حدَّثنا إبراهيم بن الحسين، حدَّثنا آدم بن أبي إياس، حدَّثنا ابن أبي ذِئْب، عن خاله الحارث بن عبد الرحمن، عن أبي سَلَمة، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أَخَذَ بيدِها فأشار بها إلى القمر، فقال: "استَعيذِي بالله من شرِّ هذا، فإنه الغاسقُ إِذا وَقَبَ" [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত ধরলেন এবং চাঁদটির দিকে ইঙ্গিত করে বললেন: "এর অনিষ্ট থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাও। কারণ এটিই হলো ‘গাসিকুন ইযা ওয়াকাব’ (অন্ধকার যখন ছেয়ে যায়)।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد جيد من أجل الحارث بن عبد الرحمن، فهو صدوق لا بأس به، وقد توبع. ابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن، وأبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف.وأخرجه أحمد 40/ (24323) و 42/ (25711) و 43/ (25802) و (26000)، والترمذي (3366)، والنسائي (10064) و (10065) من طرق عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد. وقرن بخاله في بعض الروايات عند أحمد والنسائي: المنذر بن أبي المنذر، وهو يصلح للاعتبار. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.الغاسق: المظلم.وقوله: "إذا وقب" قال السندي في حاشيته على "المسند": أي: غابَ، وإنما سُمِّي غاسقًا لأنه إذا أخذ في الطلوع والغروب يُظلِم لونه لِما تَعرض دونه من الأبخرة المتصاعدة من الأرض عند الأفق، وهو إذا غاب انتشر الفَسَقة للسرقة وللفجور.وانظر "شرح مشكل الآثار" للطحاوي 5/ 29 وما بعدها.
4034 - حدَّثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدَّثنا محمد بن المغيرة السُّكَّري، حدَّثنا القاسم بن الحَكَم، حدَّثنا سفيان، عن عاصم، عن زياد بن ثُوَيب [1]، عن أبي هريرة قال: جاء النبي صلى الله عليه وسلم يَعودُني فقال: "ألا أرقيكَ برُقْيةٍ رَقَاني بها جبريلُ عليه السلام؟ " فقلت: بَلَى، بأبي وأمي، قال: "باسم الله أرقيك، والله يَشْفيك من كل داءٍ فيك، من شرِّ النَّفاثاتِ في العُقَد، ومن شرِّ حاسدٍ إذا حَسَد"، فرَقَى بها ثلاثَ مرات [2].بسم الله الرحمن الرحيم 114 - تفسير سورة الناس
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখতে (যখন আমি অসুস্থ ছিলাম) এলেন এবং বললেন: "আমি কি তোমাকে সেই রুকিয়া দ্বারা ঝেড়ে দেব না, যা দিয়ে জিবরীল (আঃ) আমাকে ঝেড়েছিলেন?" আমি বললাম: হ্যাঁ, আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য কুরবান হোন! তিনি বললেন: "আল্লাহর নামে আমি তোমাকে ঝাড়ছি, আল্লাহ তোমাকে আরোগ্য দান করুন তোমার ভেতরের সকল রোগ থেকে; গ্রন্থিতে ফুঁৎকারকারী নারীদের অনিষ্ট থেকে এবং হিংসুক যখন হিংসা করে তার অনিষ্ট থেকে।" অতঃপর তিনি এটি দ্বারা তিনবার ঝাড়লেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: ثوب، والمثبت من المطبوع وهو الصواب الموافق لمصادر ترجمته.
[2] المرفوع منه - دون قصة أبي هريرة - صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عاصم - وهو ابن عبيد الله العُمري - وجهالة شيخه، إذ لم يرو عنه غيره. سفيان: هو الثوري.وأخرجه أحمد 15/ (9757)، وابن ماجه (3524)، والنسائي (10775) من طريقين عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث عائشة عند مسلم (2185)، وحديث أبي سعيد عنده أيضًا (2186).وحديث عمار بن ياسر، وسيأتي عند المصنف برقم (5786).
4035 - أخبرنا محمد بن علي الصَّنعاني بمكة، حدَّثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبَّاد، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا سفيان الثَّوري، عن حَكيم بن جُبير، عن سعيد ابن جُبير، عن ابن عبَّاس قال: ما مولودٌ إِلَّا على قلبه الوَسْواسُ، فَإِنْ ذَكَرَ الله خَنَس، وإن غَفَلَ وَسوَس، وهو قوله عز وجل: {الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ} [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.آخر كتاب التفسيروالحمد لله رب العالمين، وصلَّى الله على سيدنا محمد وآله
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এমন কোনো নবজাতক নেই যার হৃদয়ে ওয়াসওয়াসা (কুমন্ত্রণা) থাকে না। যদি সে আল্লাহকে স্মরণ করে, তবে তা গুটিয়ে যায় (সরে যায়)। আর যদি সে উদাসীন থাকে, তবে তা ওয়াসওয়াসা দিতে থাকে। আর এটিই হলো আল্লাহ তা‘আলার বাণী: {আল-ওয়াসওয়াসিল খান্নাস}। (কুমন্ত্রণাদাতা, যিনি সরে যায়)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف حكيم بن جبير، وقد توبع.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (666) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وهو في "تفسير عبد الرزاق" 2/ 410، ومن طريق عبد الرزاق أخرجه الطبري في "تفسيره" 30/ 355.وأخرجه بنحوه آدم بن أبي إياس في "تفسيره" 2/ 797، ومن طريقه الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 10/ (172) من طريق الأعمش، وابن أبي شيبة 13/ 369، والطبري 30/ 355، والضياء 10/ (393) من طريق منصور بن المعتمر، كلاهما عن سعيد بن جبير، به.
4036 - حدَّثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي وموسى بن الحسن بن عَبّاد، قالا: حدَّثنا عفان بن مُسلِم، حدَّثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت، عن أنس، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لما صَوَّرَ الله آدمَ تركَه، فجَعَل إبليسُ يُطِيفُ به، يَنظُر إليه، فلما رآه أجوفَ قال: ظَفِرتُ به، خَلْقٌ لا يَتمالَك" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ আদমকে (আঃ) সৃষ্টি করলেন এবং তাকে রেখে দিলেন, তখন ইবলিস তার চারদিকে ঘুরতে লাগলো এবং তাকে দেখতে লাগলো। যখন সে দেখলো যে সে (আদম) অভ্যন্তরে ফাঁপা (অসার), তখন সে বললো: আমি একে ধরে ফেলেছি। এ এমন সৃষ্টি, যে আত্মনিয়ন্ত্রণ করতে পারবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ثابت: هو ابن أسلم البُناني.وأخرجه أحمد 21/ (13516) و (13661) عن عفان بن مسلم، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم برقم (105) من طريق بهز بن أسد عن حماد بن سلمة.
4037 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدَّثنا محمد بن أحمد بن النضر الأزدي، حدَّثنا معاوية بن عمرو، حدَّثنا زائدة، حدَّثنا عمار بن أبي معاوية البَجَلي، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس قال: ما أُسكِنَ آدمُ الجنةَ إِلَّا ما بين صلاةِ العصر إلى غُروب الشمسِ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আদম (আঃ)-কে জান্নাতে রাখা হয়েছিল শুধু আসরের সালাত হতে সূর্য ডোবার মধ্যবর্তী সময়টুকু।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وسماع عمار بن أبي معاوية - ويقال: ابن معاوية - من سعيد بن جُبَير صحيح ثابت، فقد صرَّح بسؤاله له في "مصنف عبد الرزاق" (14160)، وأثبته البخاري في "تاريخه الكبير".وأخرجه أبو علي بن الصَّوّاف في الجزء الثاني من "فوائده" (14) من طريق حسين بن علي ومعاوية بن عمرو، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق (5580)، وابن مَنْدَهُ في "التوحيد" (76) من طريق الحسن بن مسلم، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عباس.وأخرجه جعفر بن محمد الفريابي في "القدر" (5) من طريق سفيان بن عيينة، عن إبراهيم بن نافع، عن قيس بن سعد، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عباس.وخالف إبراهيم بنَ نافع هشامُ بنُ حسان - وكلاهما ثقة - فرواه عن قيس بن سعد، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس، فجعله من رواية عطاء عن ابن عباس! أخرجه ابن مَنْدَهْ (75)، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (817)، وأبو القاسم الأصبهاني في "الحُجة في بيان المَحجة" (213)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 375. والمحفوظ فيه سعيد بن جبير عن ابن عباس، وقد يكون كلٌّ من عطاء بن أبي رباح وسعيد بن جبير قد روياه عن ابن عباس، والله أعلم.وقد تقدّم بنحوه عند المصنف برقم (3622) من طريق أبي بشر، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عباس.وأخرجه بنحوه عبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 43 عن معمر، قال: أخبرني شيخ أنَّ ابن عباس قال … عمران بن عيينة من عطاء بن السائب، هل كان قبل اختلاطه أو بعده؟ وقد تابعه جَرير بن عبد الحميد على إسناده، لكنه خالفه في متنه كما سيأتي، وجرير ممَّن سمع من عطاء في الاختلاط، وقد روي خبر ابن عبّاس هذا من وجه آخر يوافق رواية عمران بن عيينة، فالقول قوله، والله أعلم.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 9/ 111، وفي "تاريخه" 1/ 121 عن عمرو بن علي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 1/ 88 من طريق محمد بن أبي بكر المقدَّمي، عن عمران بن عيينة، به.وأخرج ابن أبي حاتم أيضًا 1/ 89 من طريق جَرير بن عبد الحميد، عن عطاء بن السائب، به.بلفظ: أُهبط آدم إلى أرض يقال لها: دجنا بين مكة والطائف. كذا قال جرير: بين مكة والطائف، وهو خطأ.فقد أخرجه الطبري في "تاريخه" 1/ 122 و 125 و 133، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 422 من طريق أبي يحيى القتات، عن مجاهدٍ، عن ابن عباس: أنَّ آدم نزل حين نزل بالهند. وأبو يحيى القتات فيه ضعف لكنه يُعتَبر به في المتابعات والشواهد.ويشهد له ما رواه أبو الزبير عن جابر، قال: إنَّ آدم عليه السلام لما أُهبط إلى الأرض أُهبط بالهند. أخرجه ابن منده في "التوحيد" (85)، وأبو يعلى الفرّاء في "إبطال التأويلات" (71)، وابنُ عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 438. وصحَّح إسناده ابن منده.وصحَّ عن علي بن أبي طالب أيضًا، كما سيأتي بعده.وقال الطبري في "تاريخه" 1/ 122: هبوط آدم بأرض الهند ممّا لا يدفعُ صحتَه علماءُ الإسلام وأهلُ التوراة والإنجيل.
4038 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثقفي، حدَّثنا موسى بن هارون، حدَّثنا عمرٌو بن علي، حدَّثنا عِمران بن عُيَينة، أخبرنا عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس، قال: إِنَّ أول ما أهبَطَ الله آدمَ إلى أرض الهند [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা আদমকে (আঃ) সর্বপ্রথম যে স্থানে অবতরণ করিয়েছিলেন, তা হলো ভারতের ভূমি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهو موقوف، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم لكن لم يتحرر لنا وقت سماع عمران بن عيينة من عطاء بن السائب، هل كان قبل اختلاطه أو بعده؟ وقد تابعه جَرير بن عبد الحميد على إسناده، لكنه خالفه في متنه كما سيأتي، وجرير ممَّن سمع من عطاء في الاختلاط، وقد روي خبر ابن عبّاس هذا من وجه آخر يوافق رواية عمران بن عيينة، فالقول قوله، والله أعلم.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 9/ 111، وفي "تاريخه" 1/ 121 عن عمرو بن علي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 1/ 88 من طريق محمد بن أبي بكر المقدَّمي، عن عمران بن عيينة، به.وأخرج ابن أبي حاتم أيضًا 1/ 89 من طريق جَرير بن عبد الحميد، عن عطاء بن السائب، به.بلفظ: أُهبط آدم إلى أرض يقال لها: دجنا بين مكة والطائف. كذا قال جرير: بين مكة والطائف، وهو خطأ.فقد أخرجه الطبري في "تاريخه" 1/ 122 و 125 و 133، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 422 من طريق أبي يحيى القتات، عن مجاهدٍ، عن ابن عباس: أنَّ آدم نزل حين نزل بالهند. وأبو يحيى القتات فيه ضعف لكنه يُعتَبر به في المتابعات والشواهد.ويشهد له ما رواه أبو الزبير عن جابر، قال: إنَّ آدم عليه السلام لما أُهبط إلى الأرض أُهبط بالهند. أخرجه ابن منده في "التوحيد" (85)، وأبو يعلى الفرّاء في "إبطال التأويلات" (71)، وابنُ عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 438. وصحَّح إسناده ابن منده.وصحَّ عن علي بن أبي طالب أيضًا، كما سيأتي بعده.وقال الطبري في "تاريخه" 1/ 122: هبوط آدم بأرض الهند ممّا لا يدفعُ صحتَه علماءُ الإسلام وأهلُ التوراة والإنجيل.
4039 - حدَّثنا محمد بن الحسن الكارِزِيّ، حدَّثنا علي بن عبد العزيز، حدَّثنا حجاج بن مِنْهال، حدَّثنا حماد بن سَلَمة، عن حُميد، عن يوسف بن مِهْران، عن ابن عباس، قال: قال علي بن أبي طالب: أطيبُ ريحٍ في الأرض الهندُ، أُهبط بها آدمُ صلى الله عليه وسلم، فعَلِقَ شجرَها مِن ريح الجنة [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: পৃথিবীর মধ্যে সবচেয়ে উত্তম সুবাস হলো হিন্দের (ভারতের)। সেখানেই আদম (আলাইহিস সালাম)-কে পৃথিবীতে অবতরণ করানো হয়েছিল। ফলে সেখানকার বৃক্ষরাজিতে জান্নাতের সুবাস লেগে আছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، فذكر حميد - وهو الطويل - فيه وهمٌ من علي بن عبد العزيز أو ممَّن دونه، والمحفوظ أنَّ حمادًا يرويه عن علي بن زيد بن جدعان، وهو ضعيف، وقد روي معنى هذا الخبر عن علي بن أبي طالب من وجه آخر صحيح، كما سيأتي.وأخرجه البيهقي في "البعث والنشور" (179) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 1/ 121 عن محمد بن سنان القزاز، عن حجاج بن منهال، عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن يوسف بن مهران، به.وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (1111) من طريق عمرو بن عاصم، عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن يوسف بن مهران، به.وأخرجه عبد الرزاق (9118)، والأزرقي في "أخبار مكة" 2/ 50، والفاكهي (1110) من طريق أبي الطفيل عامر بن واثلة، عن علي قال: خير واد في الناس وادي مكة، وواد بالهند الذي أهبط فيه آدم عليه السلام، ومنه يؤتى بهذا الطيب الذي تطيبون به … وإسناده قوي.
4040 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن الفضل، حدثنا هَوْذة بن خليفة، حدثنا عوف، عن قَسَامة بن زهير، عن أبي موسى [1] الأشعري، قال: إنَّ الله لما أخرج آدمَ من الجنة زوّده من ثمار الجنة، وعلمه صنعة كل شيء، فثمارُكم هذه من ثمار الجنة، غير أنَّ هذه تَغَيَرُ، وتلك لا تَغَيّرُ [2]. صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আবু মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহ যখন আদমকে জান্নাত থেকে বের করলেন, তখন তাঁকে জান্নাতের ফলমূল দিয়ে রসদ যোগালেন এবং তাঁকে সবকিছুর শিল্প ও কারিগরি শিক্ষা দিলেন। সুতরাং তোমাদের এই ফলমূল জান্নাতের ফলমূল থেকেই এসেছে, তবে এইগুলি পরিবর্তন হয় (নষ্ট হয়), আর সেইগুলি পরিবর্তন হয় না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في النسخ الخطية و "تلخيص المستدرك" للذهبي: عن أبي بكر بن أبي موسى، بدل: عن أبي موسى، وهو خطأ صوّبناه من رواية البيهقي في "البعث والنشور" (170) عن أبي عبد الله الحاكم، وكذلك هو في سائر المصادر التي خرجت هذا الخبر. وقسامة لا تعرف له رواية عن أبي بكر بن أبي موسى، وهو أكبر من أبي بكر. الصنعاني، وأبو علي الصوّاف في الجزء الثاني من أجزائه (22) من طريق محمد بن ميمون الزعفراني، سنتهم عن عوف الأعرابي، به موقوفًا.وأخرجه البزار (3029)، وابن فيل في "جزئه" (79) من طريق ربعي بن عليّة، عن عوف الأعرابي، به مرفوعًا. وقال البزار: لا نعلم أحدًا رفعه إلا ربعي. وأقرَّه عليه الحافظ ابن حجر في "مختصر زوائد البزار" (1837).
[2] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل هَوذة بن خليفة، وقد توبع، وقد روي مرفوعًا، ولكن الصحيح وقفه. عوف هو ابن أبي جميلة الأعرابي.وأخرجه البيهقي في "البعث والنشور" (180)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 438 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 44، ومن طريقه ابن أبي حاتم في "التفسير" 1/ 92 عن معمر بن راشد، والبزار (3030)، والطبري في "تاريخه" 1/ 127، وفي "تفسيره" 1/ 175 من طريق محمد بن أبي عدي، والطبري في "تاريخه" 1/ 127، وفي "تفسيره" 1/ 175 من طريق عبد الوهاب الثقفي ومحمد بن جعفر، وأبو بكر الدينوري في "المجالسة" (2808) من طريق محمد بن ثور الصنعاني، وأبو علي الصوّاف في الجزء الثاني من أجزائه (22) من طريق محمد بن ميمون الزعفراني، سنتهم عن عوف الأعرابي، به موقوفًا.وأخرجه البزار (3029)، وابن فيل في "جزئه" (79) من طريق ربعي بن عليّة، عن عوف الأعرابي، به مرفوعًا. وقال البزار: لا نعلم أحدًا رفعه إلا ربعي. وأقرَّه عليه الحافظ ابن حجر في "مختصر زوائد البزار" (1837).