আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4041 - أخبرنا أبو سعيد أحمد بن محمد بن عمرو الأحمَسي بالكوفة، حدثنا الحسين بن حميد بن الربيع، حدثنا هناد بن السَّرِي، حدثنا أبو بكر بن عياش، عن أبي سعد [1]، عن عكرمة، عن ابن عباس: أنَّ اليهود أتت النبي صلى الله عليه وسلم، فسألته عن خَلْقٍ السماوات والأرض، فقال: "خلَقَ اللهُ الأرضَ يوم الأحد والاثنين، وخلق الله الجبال يوم الثلاثاء وما فيهنَّ من منافع، وخلَقَ يومَ الأربعاء الشجر والماء والمدائن والعُمران والخراب، فهذه أربعة، فقال عز وجل: {قُلْ أَئِنَّكُمْ لَتَكْفُرُونَ بِالَّذِي خَلَقَ الْأَرْضَ فِي يَوْمَيْنِ وَتَجْعَلُونَ لَهُ أَنْدَادًا ذَلِكَ رَبُّ الْعَالَمِينَ (9) وَجَعَلَ فِيهَا رَوَاسِيَ مِنْ فَوْقِهَا} إلى آخر الآية قال الله عز وجل: {فِي أَرْبَعَةِ أَيَّامٍ سَوَاءً لِلسَّائِلِينَ} [فصلت:9 - 10] وخلق يوم الخميس السماء، وخلَقَ يومَ الجمعة النجوم والشمس والقمر والملائكة، إلى ثلاث ساعات بقين منه، فخلَقَ في أول ساعة من هذه الثلاث ساعات الآجال حين يموتُ مَن مات، وفي الثانية ألقى الآفة على كل شيء مما ينتفع به الناسُ، وفي الثالثة آدم وأسكنه الجنة وأمر إبليس بالسجود له، وأخرجه منها في آخر ساعة" ثم قالت اليهود: ثم ماذا يا محمد؟ قال: "ثم استوى على العرش" قالوا: قد أصبت لو أتممت، قالوا: ثم استراح، قال: فغضب النبي صلى الله عليه وسلم غضبًا شديدًا، فنزلت: {وَلَقَدْ خَلَقْنَا السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ وَمَا مَسَّنَا مِنْ لُغُوبٍ (38) فَاصْبِرْ عَلَى مَا يَقُولُونَ} [ق: 38 - 39] [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: ইয়াহূদীরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে তাঁকে আসমান ও যমীনের সৃষ্টি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ তাআলা যমীন সৃষ্টি করেছেন রবিবার ও সোমবার। আর আল্লাহ তাআলা মঙ্গলবার সৃষ্টি করেছেন পাহাড়সমূহ এবং সেগুলোর মধ্যে যেসব কল্যাণ (বা উপকারিতা) রয়েছে। আর বুধবার সৃষ্টি করেছেন গাছপালা, পানি, শহর, জনপদ ও জনশূন্য এলাকা। এই হল চারটি (দিন)। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা বলেন: {আপনি বলুন, তোমরা কি তাঁকে অস্বীকার করো, যিনি দু’দিনে যমীন সৃষ্টি করেছেন এবং তোমরা তাঁর জন্য সমকক্ষ দাঁড় করাও? তিনিই তো জগতসমূহের প্রতিপালক। (৯) আর তিনি তাতে সুদৃঢ় পর্বত স্থাপন করেছেন তাদের উপর থেকে...} আয়াতের শেষ পর্যন্ত। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা বলেছেন: {আর তাতে জীবনোপকরণ রেখেছেন চার দিনে—যা অনুসন্ধানকারীদের জন্য পূর্ণ পরিমাপ।} [সূরা ফুসসিলাত: ৯-১০] আর বৃহস্পতিবার তিনি আসমান সৃষ্টি করেছেন। আর শুক্রবার সৃষ্টি করেছেন নক্ষত্ররাজি, সূর্য, চাঁদ ও ফেরেশতাদের, ঐ দিনের বাকি তিন ঘণ্টা সময়ে। এই তিন ঘণ্টার প্রথম ঘণ্টায় তিনি সৃষ্টি করেন মানুষের মৃত্যু-সময় (আয়ুষ্কাল) যখন যে মারা যায়। দ্বিতীয় ঘণ্টায় মানুষের ব্যবহার্য প্রতিটি জিনিসের ওপর তিনি ত্রুটি (বা ক্ষতি) চাপিয়ে দেন। আর তৃতীয় ঘণ্টায় তিনি আদমকে সৃষ্টি করেন, তাঁকে জান্নাতে থাকতে দেন, ইবলীসকে তাঁকে সিজদা করার নির্দেশ দেন এবং দিনের শেষ ঘণ্টায় তাঁকে জান্নাত থেকে বের করে দেন।
এরপর ইয়াহূদীরা বলল: তারপর কী, হে মুহাম্মাদ? তিনি বললেন: "এরপর তিনি আরশের ওপর সমাসীন হলেন।" তারা বলল: আপনি সঠিক বলেছেন, যদি না আপনি পূর্ণ করতেন (অর্থাৎ কথা শেষ করতেন)। তারা বলল: এরপর তিনি বিশ্রাম নিলেন।
বর্ণনাকারী বলেন: তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম অত্যন্ত রাগান্বিত হলেন। অতঃপর নাযিল হলো: {আর আমি তো আসমান ও যমীন এবং এ দুয়ের মধ্যবর্তী সব কিছু ছয় দিনে সৃষ্টি করেছি এবং আমাকে কোনোরূপ ক্লান্তি স্পর্শ করেনি। (৩৮) অতএব তারা যা বলে, সে ব্যাপারে আপনি ধৈর্য ধারণ করুন...} [সূরা ক্বাফ: ৩৮-৩৯]।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ص) و (ع) و (ب): أبي سعيد، والمثبت من (ز)، وهو سعيد بن المرزبان البقال. وهو أشبه من الموصول، ونقل ابن رجب في "فتح الباري" 3/ 407 عن أبي مجلز لاحق بن حميد أنَّ الآية المذكورة نزلت بسبب قول اليهود، ثم قال: وقد ذكر غير واحد من التابعين أنَّ هذه الآية نزلت بسبب قول اليهود: إن الله خلق السماوات والأرض في ستة أيام، ثم استراح في اليوم السابع، منهم عكرمة وقتادة، فهذا كلام أئمة السلف في إنكار ذلك ونسبته إلى اليهود، وهذا يدلُّ على أنَّ الحديث المرفوع المروي في ذلك لا أصل لرفعه، وإنما هو متلقى عن اليهود، ومن قال: إنه على شرط الشيخين، فقد أخطأ. قلنا: يُعرض في ذلك بالحاكم، غير أن الحاكم لم يذكر هنا بأنه على شرط الشيخين واكتفى بتصحيح الإسناد، وقد رُوي موقوفًا على ابن عباس، وهذا مما يؤيد كونه مأخوذًا عن اليهود كما قال ابن رجب.وأخرجه البيهقي في "الأسماء والصفات" (765) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 24/ 94، وفي "تاريخه" 1/ 23، وأبو جعفر النحاس في "الناسخ والمنسوخ" ص 680، وأبو الفرج الثقفي في "فوائده" (21)، وأبو الشيخ في "العظمة" (878)، والواحدي في "أسباب النزول" (769) من طريق هناد بن السَّرِي، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 184 و 210 عن معمر، عن سفيان بن عيينة، عن أبي سعد البقال، عن عكرمة، مرسلًا.وسلف بنحوه عند المصنف برقم (3724) من رواية الحسن بن إسماعيل بن صبيح، عن أبيه، عن ابن عيينة موصولًا. والحسن هذا لم نقف له على ترجمة.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 1/ 23 - 24، وأبو الشيخ في "العظمة" (887) من طريق حماد بن سلمة، عن عطاء بن السائب، عن عكرمة مرسلًا أيضًا. وحماد ممّن سمع من عطاء قبل اختلاطه.وأخرجه بنحوه الطبري في "تاريخه" 1/ 47 و 53 - 54، وفي "تفسيره" 1/ 194، وابن خزيمة في "التوحيد" 2/ 886، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (807) من طريق أبي صالح مولى أم هانئ، والطبري في "تفسيره" 24/ 94، وفي "تاريخه" 1/ 47، وأبو عَروبة الحَرَّاني في "الأوائل" (7)، وأبو الشيخ في "العظمة" (881)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 1/ 50 من طريق عطاء بن أبي رباح، كلاهما عن ابن عبّاس موقوفًا عليه.
[2] إسناده ضعيف لضعف أبي سعد - وهو سعيد بن المرزُبان البقَّال - كما نبه عليه الذهبي في "تلخيصه"، وبه، وبه ضعفه أيضًا ابن حجر في "الفتح" 14/ 228. وقد روي عن عكرمة مرسلًا. وهو أشبه من الموصول، ونقل ابن رجب في "فتح الباري" 3/ 407 عن أبي مجلز لاحق بن حميد أنَّ الآية المذكورة نزلت بسبب قول اليهود، ثم قال: وقد ذكر غير واحد من التابعين أنَّ هذه الآية نزلت بسبب قول اليهود: إن الله خلق السماوات والأرض في ستة أيام، ثم استراح في اليوم السابع، منهم عكرمة وقتادة، فهذا كلام أئمة السلف في إنكار ذلك ونسبته إلى اليهود، وهذا يدلُّ على أنَّ الحديث المرفوع المروي في ذلك لا أصل لرفعه، وإنما هو متلقى عن اليهود، ومن قال: إنه على شرط الشيخين، فقد أخطأ. قلنا: يُعرض في ذلك بالحاكم، غير أن الحاكم لم يذكر هنا بأنه على شرط الشيخين واكتفى بتصحيح الإسناد، وقد رُوي موقوفًا على ابن عباس، وهذا مما يؤيد كونه مأخوذًا عن اليهود كما قال ابن رجب.وأخرجه البيهقي في "الأسماء والصفات" (765) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 24/ 94، وفي "تاريخه" 1/ 23، وأبو جعفر النحاس في "الناسخ والمنسوخ" ص 680، وأبو الفرج الثقفي في "فوائده" (21)، وأبو الشيخ في "العظمة" (878)، والواحدي في "أسباب النزول" (769) من طريق هناد بن السَّرِي، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 184 و 210 عن معمر، عن سفيان بن عيينة، عن أبي سعد البقال، عن عكرمة، مرسلًا.وسلف بنحوه عند المصنف برقم (3724) من رواية الحسن بن إسماعيل بن صبيح، عن أبيه، عن ابن عيينة موصولًا. والحسن هذا لم نقف له على ترجمة.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 1/ 23 - 24، وأبو الشيخ في "العظمة" (887) من طريق حماد بن سلمة، عن عطاء بن السائب، عن عكرمة مرسلًا أيضًا. وحماد ممّن سمع من عطاء قبل اختلاطه.وأخرجه بنحوه الطبري في "تاريخه" 1/ 47 و 53 - 54، وفي "تفسيره" 1/ 194، وابن خزيمة في "التوحيد" 2/ 886، والبيهقي في "الأسماء والصفات" (807) من طريق أبي صالح مولى أم هانئ، والطبري في "تفسيره" 24/ 94، وفي "تاريخه" 1/ 47، وأبو عَروبة الحَرَّاني في "الأوائل" (7)، وأبو الشيخ في "العظمة" (881)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 1/ 50 من طريق عطاء بن أبي رباح، كلاهما عن ابن عبّاس موقوفًا عليه.
4042 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن الفضل، حدثنا سعيد بن سليمان الواسطي، حدثنا عباد بن العوام، عن سعيد، عن قتادة، عن الحسن، عن عُتَيّ السَّعدي، عن أبي بن كعب، قال: كان آدم رجلًا طوالًا، كثير شعر الرأس، كأنه نخلةٌ جَوفاء [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আদম (আঃ) ছিলেন একজন দীর্ঘদেহী পুরুষ, তাঁর মাথার চুল ছিল অনেক। তাঁকে দেখে মনে হতো যেন একটি শূন্য খেজুর গাছ।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن اختلف في رفعه ووقفه، كما أشار إليه البخاري في "التاريخ الكبير" 1/ 79. الحسن: هو ابن أبي الحسن البصري، وسعيد: هو ابن أبي عروبة.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 1/ 15 عن سعيد بن سليمان، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم برقم (3075) من طريق عبد الوهاب بن عطاء الخفاف عن سعيد بن أبي عروبة مرفوعًا.وبرقم (1292) من طريق يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن الحسن، عن أبي بن كعب مرفوعًا، وبإسقاط ذكر عُتي بن ضمرة، والصحيح ذكره كما في رواية قتادة ويونس بن عبيد وثابت عن الحسن. وانظر ما تقدم برقم (1291).ويشهد لذكر طول آدم حديث أبي هريرة مرفوعًا: "خلق الله آدم وطوله ستون ذراعًا" أخرجه البخاري (3326) وغيره، وبنحوه عن أبي هريرة أيضًا عند البخاري (3327)، ومسلم (2834) في ذكر أول زمرة تدخل الجنة: "على صورة أبيهم ستون ذراعًا في السماء".
4043 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان، حدثنا محمد بن بشر العَبْدي، حدثنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خير يوم طلعت الشمسُ فيه يوم الجمعة، فيه خُلِقَ آدم، وفيه أهبط إلى الأرض" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، وقد أخرجاه [2] من حديث الزهري بغير هذا اللفظ.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে দিনগুলোতে সূর্য উদিত হয়, তার মধ্যে সর্বোত্তম দিন হলো জুমুআর দিন। এই দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছিল, এবং এই দিনেই তাঁকে পৃথিবীতে অবতরণ করানো হয়েছিল।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمرو - وهو ابن علقمة - وقد توبع.وأخرجه أحمد 16 / (10545) عن يزيد بن هارون، عن محمد بن عمرو، به وزاد: "فيه خُلق آدم، وفيه أُدخل الجنة، وفيه أهبط منها، وفيه تقوم الساعة، وفيه ساعة لا يوافقها مؤمن يصلي يسأل الله عز وجل خيرًا إلا أعطاه إياه".وقد تقدم برقم (1043) من طريق محمد بن إبراهيم التيمي عن أبي سلمة.
[2] بل أخرجه مسلم وحده برقم (854).
4044 - أخبرنا عبد الصمد بن علي بن مُكْرَم ببغداد، حدثنا جعفر بن محمد الصائغ، حدثنا الحسين بن محمد المَرْوَرُّوذي، حدثنا جرير بن حازم، عن كُلثوم بن جبر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "أخذ الله الميثاق من ظَهْر آدم عليه السلام بنَعْمان - يعني: بعَرَفة - فأَخرَجَ مِن صُلْبِهِ كلَّ ذُريَّةٍ ذَرَأها، فنثرهم بين يديه كالذَّرُ، ثم كلمهم قبلًا، وقال: {أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوا بَلَى شَهِدْنَا أَنْ تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ} إلى قوله: {بِمَا فَعَلَ الْمُبْطِلُونَ} [الأعراف: 172 - 173] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: আল্লাহ তা'আলা আদম (আলাইহিস সালাম)-এর পৃষ্ঠদেশ থেকে না'মান নামক স্থানে (অর্থাৎ আরাফাতে) অঙ্গীকার গ্রহণ করেন। অতঃপর তিনি তাঁর পৃষ্ঠদেশ থেকে সেই সমস্ত সন্তানদের বের করে আনেন যাদের তিনি সৃষ্টি করবেন। তিনি তাদের নিজ সামনে পিঁপড়ার মতো ছড়িয়ে দেন। এরপর তিনি সরাসরি তাদের সাথে কথা বলেন এবং বলেন: "আমি কি তোমাদের রব নই? তারা বলল, হ্যাঁ, আমরা সাক্ষ্য দিলাম, যাতে তোমরা কিয়ামতের দিন বলতে না পারো" তাঁর বাণী, "...যারা বাতিল কাজ করে তাদের কাজের জন্য।" (সূরা আল-আ'রাফ: ১৭২-১৭৩)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده جيد وإن كان أكثر من رواه عن كلثوم بن جبر وقفوه على ابن عباس، وكذلك رواه غير واحد عن سعيد بن جُبَير فوقفوه، فإنَّ مثله لا يُقال بمحض الرأي، ويؤيد ذلك وروده مرفوعًا في أحاديث أخرى عن غير ابن عباس.وأخرجه أحمد 4/ (2455)، وأخرجه النسائي (11127) عن محمد بن عبد الرحيم، كلاهما (أحمد وابن عبد الرحيم) عن الحسين بن محمد، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم برقم (75) من طريق وهب بن جرير عن أبيه.والذَّر: النمل الأحمر الصغير.وقوله: قبلًا، ضبط بوجوه، بفتح القاف والباء، وبضمهما، وبضم الأول وفتح الثاني، وبكسر الأول وفتح الثاني، كله بمعنى العيان والمقابلة.
4045 - أخبرنا أبو النضر الفقيه وأبو الحسن العَنَزي، قالا: حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا القعنبي ويحيى بن بكير، عن مالك، عن زيد بن أبي أنيسة، عن عبد الحميد بن عبد الرحمن بن زيد بن الخطاب، عن مسلم بن يسار الجهني: أن عمر بن الخطاب سُئل عن هذه الآية: {وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي آدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ [1]} [الأعراف: 172]، فقال عمر بن الخطاب: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنّ الله خَلَقَ آدمَ، ثم مسح ظهره، بيمينه، فاستخرج منه ذُرِّيَّةً، فقال: خلقتُ هؤلاء للجنة، وبعمل أهل الجنة يعملون، ثم مسح ظهره، فاستخرج منه ذُرِّيةً، فقال: خلقت هؤلاء للنار، وبعمل أهل النار يعملون"، فقال رجلٌ: يا رسول الله، ففيم العمل؟ قال: "إنَّ الله إذا خلَقَ العبد للجنة، استعمله بعمل أهل الجنة [حتى يموت على عمل من أعمال أهل الجنة] [2] فيدخل الجنةَ، وإذا خَلَقَ العبد للنارِ، استعمله بعمل أهل النار حتى يموتَ على عمل أهل النار، فيدخل النار" [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে এই আয়াতটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: "আর যখন আপনার রব আদম সন্তানের পিঠ থেকে তাদের সন্তানদেরকে বের করে নেন..." (সূরা আল-আ'রাফ: ১৭২)।
তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয় আল্লাহ আদমকে সৃষ্টি করলেন। এরপর তিনি তাঁর ডান হাত দিয়ে আদমের পিঠ মাসাহ করলেন এবং তা থেকে কিছু সন্তান-সন্ততি বের করলেন। তিনি বললেন: এদেরকে আমি জান্নাতের জন্য সৃষ্টি করেছি, আর তারা জান্নাতবাসীদের আমল করবে। এরপর তিনি তাঁর পিঠ মাসাহ করলেন এবং তা থেকে কিছু সন্তান-সন্ততি বের করলেন। তিনি বললেন: এদেরকে আমি জাহান্নামের জন্য সৃষ্টি করেছি, আর তারা জাহান্নামবাসীদের আমল করবে।”
তখন এক ব্যক্তি বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তাহলে আমলের উদ্দেশ্য কী? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আল্লাহ যখন কোনো বান্দাকে জান্নাতের জন্য সৃষ্টি করেন, তখন তিনি তাকে জান্নাতবাসীদের আমল দ্বারা নিয়োজিত রাখেন, [এমনকি সে জান্নাতবাসীদের কোনো একটি আমলের উপর মৃত্যুবরণ করে] আর সে জান্নাতে প্রবেশ করে। আর আল্লাহ যখন কোনো বান্দাকে জাহান্নামের জন্য সৃষ্টি করেন, তখন তিনি তাকে জাহান্নামবাসীদের আমল দ্বারা নিয়োজিত রাখেন, এমনকি সে জাহান্নামবাসীদের আমলের উপর মৃত্যুবরণ করে এবং জাহান্নামে প্রবেশ করে।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذه قراءة نافع وأبي عمرو وابن عامر ويعقوب، وقرأ الباقون بالإفراد. انظر "النشر" لابن الجزري 2/ 273.
[2] ما بين المعقوفين سقط من نسخنا الخطية، واستدركناه من كتاب "القضاء والقدر" للبيهقي (61) حيث رواه عن المصنف بإسناده ومتنه، وهو ثابت لجميع من روى هذا الحديث من طريق مالك. المنهال، وهذا أشبه، لأنَّ يحيى بن آدم ومحمد بن يوسف الفريابي قد رويا هذا الخبر عن قيس بن الربيع عن ابن أبي ليلى عن المنهال، وابن أبي ليلى سيئ الحفظ، وقيس ضعيف، على أنه جاء عن ابن عباس من وجوه أخرى، فيها جميعًا مقال، وقد روي من وجه آخر عن سعيد بن جبير لم يجاوزه.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 1/ 243 عن أبي كُريب، عن الحسن بن عطية، عن قيس بن الربيع، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن المنهال بن عمرو، به.وأخرجه الآجري في "الشريعة" (755) و (910) من طريق محمد بن يوسف الفريابي، وأبو القاسم بن بشران في الجزء الثاني من "أماليه" (1353) من طريق يحيى بن آدم، كلاهما عن قيس ابن الربيع، عن ابن أبي ليلى، عن المنهال، به.وأخرجه الطبري 1/ 243 من طريق عطية العوفي ومن طريق سعيد بن معبد، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 1/ 90 - 91 من طريق السُّدِّي، عمن حدثه، ثلاثتهم عن ابن عباس. وهذه الطرق الثلاث كلها ضعاف.وأخرج ابن أبي حاتم 1/ 91 من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق السبيعي، عن رجل من بني تميم قال: أتيت ابن عبّاس، فسألته: ما الكلمات التي تلقى آدم من ربه؟ قال: عُلّم شأن الحج. وهو ضعيف أيضًا لإبهام السائل.وأخرج ابن وهب في التفسير من "الجامع" 1/ (255)، وابن أبي حاتم 1/ 91 و 5/ 1454 من طريق خصيف بن عبد الرحمن الجزري، عن مجاهد وسعيد بن جبير في قول الله: {فَتَلَقَّى آدَمُ مِنْ رَبِّهِ كَلِمَاتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ}: {قَالَا رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنْفُسَنَا وَإِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ} [الأعراف: 23].وأخرج نحوه أبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (785)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 434 من طريق أبي رجاء الخراساني، عن سعيد بن جُبَير، {فَتَلَقَّى آدَمُ مِنْ رَبِّهِ كَلِمَاتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ}، قال: لا إله إلّا أنت سبحانك وبحمدك، ربِّ عملتُ سُوءًا وظلمت نفسي فاغفر لي وأنت خير الغافرين، لا إله إلا أنت سبحانك، عملتُ سُوءًا وظلمت نفسي فارحمني وأنت خير الراحمين، لا إله إلا أنت سبحانك، ربّ عملتُ سُوءًا وظلمت نفسي فتُب عليَّ إنك أنت التواب الرحيم.
4045 [3] - صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة مسلم بن يسار الجهني، ولإرساله، لأنَّ مسلمًا هذا روايته عن عمر، مرسلة، كما جزم به أبو زرعة، وقد زاد فيه غير الإمام مالك بينه وبين عمر رجلًا هو نُعيم بن ربيعة، ونعيم هذا لا يُعرف أيضًا.وقد تقدَّم برقم (74) من طريق روح بن عبادة ومن طريق القعنبي، وبرقم (3295) من طريق إسحاق بن سليمان ومن طريق القعنبي، ثلاثتهم عن مالك. المنهال، وهذا أشبه، لأنَّ يحيى بن آدم ومحمد بن يوسف الفريابي قد رويا هذا الخبر عن قيس بن الربيع عن ابن أبي ليلى عن المنهال، وابن أبي ليلى سيئ الحفظ، وقيس ضعيف، على أنه جاء عن ابن عباس من وجوه أخرى، فيها جميعًا مقال، وقد روي من وجه آخر عن سعيد بن جبير لم يجاوزه.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 1/ 243 عن أبي كُريب، عن الحسن بن عطية، عن قيس بن الربيع، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن المنهال بن عمرو، به.وأخرجه الآجري في "الشريعة" (755) و (910) من طريق محمد بن يوسف الفريابي، وأبو القاسم بن بشران في الجزء الثاني من "أماليه" (1353) من طريق يحيى بن آدم، كلاهما عن قيس ابن الربيع، عن ابن أبي ليلى، عن المنهال، به.وأخرجه الطبري 1/ 243 من طريق عطية العوفي ومن طريق سعيد بن معبد، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 1/ 90 - 91 من طريق السُّدِّي، عمن حدثه، ثلاثتهم عن ابن عباس. وهذه الطرق الثلاث كلها ضعاف.وأخرج ابن أبي حاتم 1/ 91 من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق السبيعي، عن رجل من بني تميم قال: أتيت ابن عبّاس، فسألته: ما الكلمات التي تلقى آدم من ربه؟ قال: عُلّم شأن الحج. وهو ضعيف أيضًا لإبهام السائل.وأخرج ابن وهب في التفسير من "الجامع" 1/ (255)، وابن أبي حاتم 1/ 91 و 5/ 1454 من طريق خصيف بن عبد الرحمن الجزري، عن مجاهد وسعيد بن جبير في قول الله: {فَتَلَقَّى آدَمُ مِنْ رَبِّهِ كَلِمَاتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ}: {قَالَا رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنْفُسَنَا وَإِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ} [الأعراف: 23].وأخرج نحوه أبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (785)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 434 من طريق أبي رجاء الخراساني، عن سعيد بن جُبَير، {فَتَلَقَّى آدَمُ مِنْ رَبِّهِ كَلِمَاتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ}، قال: لا إله إلّا أنت سبحانك وبحمدك، ربِّ عملتُ سُوءًا وظلمت نفسي فاغفر لي وأنت خير الغافرين، لا إله إلا أنت سبحانك، عملتُ سُوءًا وظلمت نفسي فارحمني وأنت خير الراحمين، لا إله إلا أنت سبحانك، ربّ عملتُ سُوءًا وظلمت نفسي فتُب عليَّ إنك أنت التواب الرحيم.
4046 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفان، حدثنا الحسن بن عطية، حدثنا الحسن بن صالح، عن المنهال بن عمرو، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس: {فَتَلَقَّى آدَمُ مِنْ رَبِّهِ كَلِمَاتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ} [البقرة: 37]، قال: أي ربِّ، ألم تخلقني بيدك؟ قال: بلى، قال: أي ربِّ، ألم تَنفُخُ فِي مِن رُوحك؟ قال: بلى، قال: أي ربِّ، ألم تُسكِنَّي جَنتك؟ قال: بلى، قال: أي ربِّ، ألم تسبق رحمتك غضبك؟ قال: بلى، قال: أرأيتَ إن تبتُ وأصلحتُ، أَراجعي أنتَ إلى الجنة؟ قال: بلى، قال: فهو قوله: {فَتَلَقَّى آدَمُ مِنْ رَبِّهِ كَلِمَاتٍ} [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আল্লাহর বাণী:) "এরপর আদম তার রবের কাছ থেকে কয়েকটি বাণী (শব্দ) শিখে নিলেন এবং আল্লাহ তার তাওবা কবুল করলেন।" [সূরাহ আল-বাক্বারাহ: ৩৭] সম্পর্কে তিনি বলেন: তিনি (আদম) বললেন, হে আমার রব, আপনি কি আমাকে আপনার হাত দ্বারা সৃষ্টি করেননি? আল্লাহ বললেন, হ্যাঁ। তিনি বললেন, হে আমার রব, আপনি কি আমার মধ্যে আপনার রূহ থেকে ফুঁকে দেননি? আল্লাহ বললেন, হ্যাঁ। তিনি বললেন, হে আমার রব, আপনি কি আমাকে আপনার জান্নাতে বসবাস করাননি? আল্লাহ বললেন, হ্যাঁ। তিনি বললেন, হে আমার রব, আপনার রহমত কি আপনার ক্রোধকে অতিক্রম করে না? আল্লাহ বললেন, হ্যাঁ। তিনি বললেন, আপনার কী মত, যদি আমি তাওবা করি এবং নিজেকে শুধরে নিই, তবে কি আপনি আমাকে জান্নাতে ফিরিয়ে নেবেন? আল্লাহ বললেন, হ্যাঁ। তিনি বললেন, আর এটাই হলো আল্লাহর বাণী: "এরপর আদম তার রবের কাছ থেকে কয়েকটি বাণী (শব্দ) শিখে নিলেন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن اختلف فيه على الحسن بن عطية - وهو ابن نجيح القرشي - فرواه الحسن بن علي بن عفان عنه كما وقع عند المصنف هنا، وخالفه أبو كُريب محمد العلاء فرواه عن الحسن بن عطية، عن قيس بن الربيع، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن المنهال، وهذا أشبه، لأنَّ يحيى بن آدم ومحمد بن يوسف الفريابي قد رويا هذا الخبر عن قيس بن الربيع عن ابن أبي ليلى عن المنهال، وابن أبي ليلى سيئ الحفظ، وقيس ضعيف، على أنه جاء عن ابن عباس من وجوه أخرى، فيها جميعًا مقال، وقد روي من وجه آخر عن سعيد بن جبير لم يجاوزه.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 1/ 243 عن أبي كُريب، عن الحسن بن عطية، عن قيس بن الربيع، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن المنهال بن عمرو، به.وأخرجه الآجري في "الشريعة" (755) و (910) من طريق محمد بن يوسف الفريابي، وأبو القاسم بن بشران في الجزء الثاني من "أماليه" (1353) من طريق يحيى بن آدم، كلاهما عن قيس ابن الربيع، عن ابن أبي ليلى، عن المنهال، به.وأخرجه الطبري 1/ 243 من طريق عطية العوفي ومن طريق سعيد بن معبد، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 1/ 90 - 91 من طريق السُّدِّي، عمن حدثه، ثلاثتهم عن ابن عباس. وهذه الطرق الثلاث كلها ضعاف.وأخرج ابن أبي حاتم 1/ 91 من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق السبيعي، عن رجل من بني تميم قال: أتيت ابن عبّاس، فسألته: ما الكلمات التي تلقى آدم من ربه؟ قال: عُلّم شأن الحج. وهو ضعيف أيضًا لإبهام السائل.وأخرج ابن وهب في التفسير من "الجامع" 1/ (255)، وابن أبي حاتم 1/ 91 و 5/ 1454 من طريق خصيف بن عبد الرحمن الجزري، عن مجاهد وسعيد بن جبير في قول الله: {فَتَلَقَّى آدَمُ مِنْ رَبِّهِ كَلِمَاتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ}: {قَالَا رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنْفُسَنَا وَإِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ} [الأعراف: 23].وأخرج نحوه أبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (785)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 7/ 434 من طريق أبي رجاء الخراساني، عن سعيد بن جُبَير، {فَتَلَقَّى آدَمُ مِنْ رَبِّهِ كَلِمَاتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ}، قال: لا إله إلّا أنت سبحانك وبحمدك، ربِّ عملتُ سُوءًا وظلمت نفسي فاغفر لي وأنت خير الغافرين، لا إله إلا أنت سبحانك، عملتُ سُوءًا وظلمت نفسي فارحمني وأنت خير الراحمين، لا إله إلا أنت سبحانك، ربّ عملتُ سُوءًا وظلمت نفسي فتُب عليَّ إنك أنت التواب الرحيم.
4047 - حدثنا أحمد بن عثمان بن يحيى الأَدَمي المقرئ ببغداد، حدثنا أبو قلابة، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثنا عمر بن إبراهيم، عن قتادة، عن الحسن، عن سَمُرة بن جُندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "كانت حواء لا يَعيشُ لها ولدٌ، فَنَذَرَت: لئن عاشَ لها ولدٌ لتُسَمِّيهِ عبد الحارث، فعاش لها ولدٌ فسمته عبد الحارث، وإنما كان ذلك عن وحي الشيطان" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
সামুরা বিন জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হাওয়ার কোনো সন্তান জীবিত থাকত না। অতঃপর তিনি মানত করলেন যে, যদি তার কোনো সন্তান জীবিত থাকে, তবে তিনি তার নাম রাখবেন আব্দুল হারিস। তার একটি সন্তান জীবিত রইল এবং তিনি তার নাম রাখলেন আব্দুল হারিস। আর এটি শয়তানের প্ররোচনায় হয়েছিল।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، عمر بن إبراهيم - وهو العبدي - في روايته عن قتادة خاصةً ضعف، ومع ذلك حسنه الترمذي وصححه المصنف! لكن قال الذهبي في "الميزان" عن هذا الحديث: هو حديث منكر.وقال ابن كثير في "البداية والنهاية" 1/ 225 - 226 بعد أن نقل قول الترمذي: ورواه بعضُهم عن عبد الصمد، ولم يرفعه، فقال ابن كثير: فهذه علّة قادحة في الحديث أنه روي موقوفًا على الصحابي، وهذا أشبه، والظاهر أنه تلقاه من الإسرائيليات، وهكذا روي موقوفًا على ابن عباس، والظاهر أنَّ هذا متلقى عن كعب الأحبار ومن دونه، والله أعلم. وقال ابن ناصر الدين الدمشقي في "جامع الآثار في السير ومولد المختار" 2/ 276: أنَّى له الصحة.أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد الرقاشي.وأخرجه أحمد 33/ (20117)، والترمذي (3077) من طريق عبد الصمد بهذا الإسناد. وبرقم (1292) من طريق ابن الهاد عن الحسن عن أبي بن كعب، بإسقاط عُتي، والصحيح ذكره كما في رواية قتادة ويونس بن عبيد وثابت البناني عن الحسن.
4048 - حدثنا الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت البناني، عن الحسن، عن عُتَي بن ضَمْرة، عن أبي بن كعب، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "لما تُوفّي آدم غسلته الملائكة بالماء وترًا وألْحَدُوا له، وقالوا: هذه سنة آدم في ولده" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه. ذكر نوح النبي صلى الله عليه وسلمواختلفوا في نوح وإدريس، فقيل: إن إدريس قبله، وأكثر الصحابة على أن نوحًا قبل إدريس، صلى الله عليهما.
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আদম (আঃ) মারা গেলেন, তখন ফেরেশতাগণ বেজোড় সংখ্যায় পানি দ্বারা তাঁকে গোসল করালেন, এবং তাঁর জন্য লহদ (বিশেষ ধরণের কবর) তৈরি করলেন। আর বললেন: 'এটা আদম (আঃ)-এর জন্য তাঁর সন্তানদের মধ্যে অনুসরণের সুন্নাত।' এই হাদীসের সনদ সহীহ হলেও বুখারী ও মুসলিম তা সংকলন করেননি। নবী নূহ (আঃ)-এর উল্লেখ। নূহ (আঃ) ও ইদ্রীস (আঃ) সম্পর্কে মতভেদ রয়েছে। কেউ কেউ বলেছেন, ইদ্রীস (আঃ) তাঁর পূর্বে ছিলেন। তবে অধিকাংশ সাহাবী মনে করেন, নূহ (আঃ) ইদ্রীস (আঃ)-এর পূর্বে ছিলেন। তাঁদের উভয়ের উপর শান্তি বর্ষিত হোক।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكنه اختلف في رفعه ووقفه، كما نبه عليه البخاري في "تاريخه الكبير" 1/ 79. الحسن: هو البصري.وأخرجه الحسين المحاملي في "أماليه" برواية ابن يحيى البَيِّع (403)، والطبراني في "الأوسط" (8261)، وابن عدي 3/ 143، وابن عساكر 7/ 455، والضياء المقدسي في "المختارة" 4/ (1252) من طريق روح بن أسلم، عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وقد تقدم برقم (1291) من طريق يونس بن عُبيد عن الحسن البصري. وبرقم (1292) من طريق ابن الهاد عن الحسن عن أبي بن كعب، بإسقاط عُتي، والصحيح ذكره كما في رواية قتادة ويونس بن عبيد وثابت البناني عن الحسن.
4049 - حدثنا أبو سعيد أحمد بن محمد الأحمسي، حدثنا الحسين بن حميد بن الربيع، حدثنا موسى بن إسماعيل وهدبة بن خالد، قالا: حدثنا حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن يوسف بن مهران، عن ابن عبّاس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "بَعَث الله نوحًا لأربعين سنة، ولَبِثَ في قومه ألف سنة إلا خمسين عامًا يدعُوهم، وعاشَ بعد الطوفان ستين سنة، حتى كثر الناسُ وفَشَوْا" [1].قد اتفق الشيخان على حديث أبي هريرة [2] وأنس [3] عن النبي صلى الله عليه وسلم في حديث الشَّفاعة، فيأتون نوحًا فيقولون: أنت أول رسولٍ أُرسل إلى الأرض.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ নূহ (আঃ)-কে চল্লিশ বছর বয়সে প্রেরণ করেন। তিনি তাঁর সম্প্রদায়ের মধ্যে এক হাজার বছর থেকে পঞ্চাশ বছর কম সময় (নয়শত পঞ্চাশ বছর) ধরে তাদের দাওয়াত দিতে থাকেন। আর প্লাবনের পর তিনি ষাট বছর বেঁচে ছিলেন, যতক্ষণ না মানুষ সংখ্যায় বৃদ্ধি পেল এবং বিস্তার লাভ করল।
[এই হাদীসের সমর্থনে] শিফা‘আত (সুপারিশ) সংক্রান্ত হাদীসে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত হয়েছে, (কিয়ামতের দিন) মানুষ নূহ (আঃ)-এর কাছে এসে বলবে: আপনিই প্রথম রাসূল যাকে পৃথিবীতে প্রেরণ করা হয়েছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف علي بن زيد - وهو ابن جدعان - ولا يُعرف مرفوعًا إلّا في رواية المصنف هنا، وقد رواه عن هدبة وموسى بن إسماعيل غيرُ الحُسين بن حميد ممن هم أجلُّ وأوثق منه، فوقفوه على ابن عباس، وهو أشبه.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 9/ 3041 عن أبيه أبي حاتم الرازي، عن موسى بن إسماعيل وحده، بهذا الإسناد موقوفًا.وأخرجه الواحدي في "التفسير الوسيط" 3/ 415 ومن طريقه ابن عساكر 62/ 279 من طريق محمد بن أيوب بن الضُّريس، عن هدبة بن خالد وحده، بهذا الإسناد موقوفًا كذلك.وأخرجه ابن أبي شيبة 13/ 60، وأبو بكر الدِّينَوري في "المجالسة" (3389)، وابن عساكر 62/ 279 من طريق الحسن بن موسى الأشيب، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 8/ 2787 من طريق إسحاق بن عيسى بن الطباع، وابن عساكر 62/ 279 - 280 من طريق الأسود بن عامر شاذان، ثلاثتهم عن حماد بن سلمة، به موقوفًا أيضًا.
[2] أخرجه البخاري (4476)، ومسلم (193).
4049 [3] - أخرجه البخاري (3340)، ومسلم (194).
4050 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله بن عتّاب العبدي، حدثنا جعفر بن أبي عثمان الطيالسي، حدثنا عيّاش بن الوليد الرَّقام، حدثنا عبد الأعلى، حدثنا سعيد، عن قتادة، عن الحسن، عن عمران بن حصين، وعن [1] سمرة بن جندب، أَنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ولَدُ نوحٍ ثلاثة: سام، وحام، ويافتُ أبو الرُّوم" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নূহ (আঃ)-এর সন্তান তিনজন: সাম, হাম এবং ইয়াফিছ, সে হলো রোমবাসীর পিতা।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في (ز) و (ص) والمطبوع: عن سمرة، بإسقاط الواو، وهو خطأ صريح، لأن الحسن - وهو البصري - يرويه عن عمران بن حصين وعن سَمرة بن جندب كليهما، لا أنَّ عمران سمعه من سمرة، ومما يؤكد خطأ سقوط الواو هنا أنَّ أبا بكر بن أبي خيثمة قد روى هذا الخبر في "تاريخه" كما في "جامع الآثار" لابن ناصر الدين 2/ 153 - 154 عن عيّاش بن الوليد الرقام، وكذلك رواه الطبراني في "الكبير" 18/ (309) من طريق إسماعيل بن نُميل الخلال، عن عيّاش بن الوليد الرقام، وكلاهما يقول فيه: عن عمران بن حصين وعن سمرة. وكذلك روى هذا الخبر غير واحد عن سعيد - وهو ابن أبي عروبة - من طريق الحسن، عن سمرة وحده، وكذلك رواه شيبان النحوي عن قتادة بذكر سمرة وحده، فدل على أنَّ إسقاط الواو هنا وهم لا محالة.
[2] إسناده صحيح، وسماع الحسن - وهو البصري - من سَمُرة صحيح كما قدمنا بيانه برقم (151)، وأما من عمران فالجمهور على أنه لم يسمع، أما المصنف فقد جزم في غير موضع من كتابه هذا بسماعه منه. وقد حسّنه الترمذي والعراقي في "محجة القرب" (8).وأخرجه أحمد 33/ (20099) عن عبد الوهاب بن عطاء، و (20114) عن روح بن عُبادة، والترمذي (3231) و (3931) من طريق يزيد بن زُريع، ثلاثتهم عن سعيد بن أبي عروبة، بهذا الإسناد. بذكر سمرة وحده.وأخرجه أحمد (20100) من طريق شيبان النحوي، عن قتادة، به. بذكر سمرة وحده كذلك.
4051 - أخبرني محمد بن يوسف الدقيقي، حدثنا محمد بن عمران النسوي، حدثنا أحمد بن زهير، حدثنا وكيع بن الجرّاح، عن حمزة الزيات، عن عدي بن ثابت، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، قال: سيد الأنبياء خمسةٌ، ومحمد صلى الله عليه وسلم سيدُ الخمسة: نوحٌ، وإبراهيم، وموسى، وعيسى، ومحمدٌ، صلوات الله عليهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، وإن كان موقوفًا على أبي هريرة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবীদের নেতা হলেন পাঁচজন। আর মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হলেন সেই পাঁচজনের নেতা: নূহ, ইবরাহীম, মূসা, ঈসা, এবং মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), তাঁদের সকলের প্রতি আল্লাহর দরূদ ও শান্তি বর্ষিত হোক।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو حازم: هو سلمان الأشجعي مولاهم.وأخرجه البزار (9737)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 485، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 62/ 271 من طريق أبي أحمد الزبيري، وأبو بكر الخلال في "السنة" (324) من طريق يحيى بن آدم، وأبو سعيد بن الأعرابي في "معجمه" (87)، وأبو عمرو الداني في "علوم الحديث" (11)، وابن عساكر 62/ 271 من طريق إسماعيل بن عمر الواسطي، ثلاثتهم عن حمزة الزيات، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي حاتم في "التفسير" 8/ 2696 من طريق عبد الله بن عمران الأصبهاني، عن أبي داود الطيالسي، به.وقد تقدَّم برقم (3695) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث عن همام.وعبد الله المذكور: هو ابن مسعود، وقراءته هذه لم يقرأ بها أحد من أصحاب القراءات الصحيحة.
4052 - حدثني علي بن عيسى الحيري، حدثنا مُسدَّد بن قَطَن، حدثنا عثمان بن أبي شيبة، حدثنا وكيع، عن ابن أبي لبيبة - وهو محمد بن عبد الرحمن عن جده، عن ابن مسعود: أنه ذَكَرَ قول الله عز وجل: {إِنَّا أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَى قَوْمِهِ} [نوح: 1]، فذكر أنَّ نوحًا اغتسل، فرأى ابنه ينظر إليه، فقال: تنظر إليَّ وأنا أغتسل، حارَّ [1] الله لونك، فاسود، فهو أبو السُّودان [2].هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه.
ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার এই বাণীটি উল্লেখ করেছেন: "নিশ্চয়ই আমরা নূহকে তাঁর কওমের নিকট প্রেরণ করেছি।" (সূরা নূহ: ১) অতঃপর তিনি উল্লেখ করেন যে, নূহ (আঃ) গোসল করছিলেন। তিনি দেখলেন যে তাঁর ছেলে তাঁর দিকে তাকিয়ে আছে। নূহ (আঃ) বললেন: তুমি আমার দিকে তাকিয়ে আছো যখন আমি গোসল করছি? আল্লাহ তোমার বর্ণ পরিবর্তন করে দিন! ফলে সে কালো হয়ে গেল। আর সে-ই হলো কৃষ্ণবর্ণের লোকদের আদি পিতা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لعلها بمعنى: سَوَّد لونك، ومنه يقال للأرض ذات الحجارة السود: حَرَّة. وأخرجه ابن أبي حاتم في "التفسير" 8/ 2696 من طريق عبد الله بن عمران الأصبهاني، عن أبي داود الطيالسي، به.وقد تقدَّم برقم (3695) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث عن همام.وعبد الله المذكور: هو ابن مسعود، وقراءته هذه لم يقرأ بها أحد من أصحاب القراءات الصحيحة.
[2] إسناده ضعيف لضعف ابن أبي لبيبة، وبه أعله الذهبي في "تلخيصه"، وقال ابن معين: ليس حديثه بشيء. قلنا: وهو معروف بالإرسال، ولا يُظَنُّ أنه أدرك جده. وأخرجه ابن أبي حاتم في "التفسير" 8/ 2696 من طريق عبد الله بن عمران الأصبهاني، عن أبي داود الطيالسي، به.وقد تقدَّم برقم (3695) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث عن همام.وعبد الله المذكور: هو ابن مسعود، وقراءته هذه لم يقرأ بها أحد من أصحاب القراءات الصحيحة.
4053 - أخبرني أبو نصر محمد بن أحمد بن عمر الخَفَّاف، حدثنا أحمد بن سلمة، حدثنا محمد بن بشار، حدثنا أبو داود، حدثنا همام، عن قتادة، عن عكرمة، عن ابن عبّاس، قال: كان بين نُوح وآدمَ عشرة قرون، كلهم على شريعة من الحَقِّ، فاختلَفُوا، فبعث الله النبيين مُبشِّرين ومُنذِرين. قال: وكذلك في قراءة عبد الله: (كان الناسُ أُمّةً واحِدةً فاختَلَفُوا) [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يخرجاه.
ইব্ন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আদম (আঃ) ও নূহ (আঃ)-এর মাঝে দশটি প্রজন্ম (যুগ) ছিল, তারা সকলেই সত্যের উপর প্রতিষ্ঠিত শরীয়তের অনুসারী ছিল। এরপর তারা মতভেদ করলো (বা বিভক্ত হলো)। ফলে আল্লাহ তাআলা নবীগণকে সুসংবাদদাতা ও সতর্ককারী হিসাবে প্রেরণ করলেন। তিনি বলেন: আব্দুল্লাহ (ইব্ন মাসউদ)-এর কিরাআতও অনুরূপ ছিল: "মানুষ ছিল এক উম্মত, অতঃপর তারা মতভেদ করলো।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. همام: هو ابن يحيى العَوْذي، وأبو داود: هو سليمان بن داود الطيالسي.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 2/ 334، وفي "تاريخه" 1/ 178 عن محمد بن بشار، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي حاتم في "التفسير" 8/ 2696 من طريق عبد الله بن عمران الأصبهاني، عن أبي داود الطيالسي، به.وقد تقدَّم برقم (3695) من طريق عبد الصمد بن عبد الوارث عن همام.وعبد الله المذكور: هو ابن مسعود، وقراءته هذه لم يقرأ بها أحد من أصحاب القراءات الصحيحة.
4054 - أخبرنا على بن عبد الرحمن بن ماتى، حدثنا أحمد بن حازم بن أبي غَرَزَة، حدثنا موسى بن يعقوب الزَّمعي، حدثنا فائدٌ مولى عبيد الله بن علي، أن إبراهيم بن عبد الرحمن بن أبي ربيعة أخبره، أن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أخبرته، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لو رَحِمَ اللهُ أحدًا من قوم نُوحٍ لَرَحِمَ أم الصبي"، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "كانَ نُوحٌ مَكَثَ في قومه ألفَ سنةٍ إلا خمسين عامًا يدعوهم إلى الله، حتى كان آخر زمانه غرَسَ شجرةً فعظمت وذهبتْ كلَّ مَذهَبٍ، ثم قطعها، ثم جعل يعمل سفينةٌ، فيَسخَرُون منه ويقولون: يعمل سفينةً في البرّ، فكيف تجري؟! فيقول: سوف تعلمون، فلما فرغ منها وفارَ التنور، وكَثُرَ الماءُ في السكك، خَشِيَت أم الصبي عليه، وكانت تُحبه حبًّا شديدًا، فخرجت إلى الجبل حتى بلغت ثلثه، فلما بلغها الماء خرجت حتى بلغت ثلثي الجبل، فلما بلغها خرجت حتى استوَتْ على الجبل، فلما بلغ الماء رقبتها رفعته بيدها حتى ذَهَب به الماءُ، فلو رَحِمَ اللهُ منهم أحدًا، لرَحِمَ أم الصبي" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যদি আল্লাহ নূহের কওমের কারো প্রতি দয়া করতেন, তবে তিনি সেই শিশুটির মায়ের প্রতি দয়া করতেন।”
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরও বললেন: নূহ (আঃ) তাঁর কওমের মধ্যে পঞ্চাশ কম এক হাজার বছর অবস্থান করেছিলেন। তিনি তাদের আল্লাহর দিকে আহ্বান করতেন। এমনকি তাঁর শেষ সময়ে তিনি একটি বৃক্ষ রোপণ করলেন, যা বিশাল আকার ধারণ করল এবং বহু শাখা-প্রশাখা বিস্তার করল। অতঃপর তিনি সেটি কাটলেন এবং তা দিয়ে নৌকা তৈরি করতে লাগলেন।
তখন তারা তাঁকে দেখে উপহাস করত এবং বলত: তিনি স্থলভাগের উপর নৌকা বানাচ্ছেন, এটা কীভাবে চলবে?! তিনি বলতেন: তোমরা শীঘ্রই জানতে পারবে।
যখন তিনি নৌকা তৈরি শেষ করলেন, চুল্লি উত্তপ্ত হলো এবং রাস্তা-ঘাটে পানি বেড়ে গেল, তখন সেই শিশুটির মা তার (শিশুর) জন্য ভয় পেলেন। তিনি তাকে প্রচণ্ড ভালোবাসতেন। অতঃপর সে পাহাড়ের দিকে বেরিয়ে গেল যতক্ষণ না তার এক-তৃতীয়াংশ অতিক্রম করল। যখন তার কাছে পানি পৌঁছল, তখন সে বেরিয়ে গেল যতক্ষণ না পাহাড়ের দুই-তৃতীয়াংশ অতিক্রম করল। যখন (আবার) তার কাছে পানি পৌঁছল, তখন সে বেরিয়ে গেল যতক্ষণ না পাহাড়ের চূড়ায় পৌঁছে গেল। যখন পানি তার গলা পর্যন্ত পৌঁছল, তখন সে শিশুটিকে তার হাত দিয়ে উপরে তুলে ধরল, কিন্তু পানি তাকে নিয়ে গেল।
আল্লাহ যদি তাদের (নূহের কওমের) কারো প্রতি দয়া করতেন, তবে সেই শিশুটির মায়ের প্রতি অবশ্যই দয়া করতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لتفرّد موسى بن يعقوب الزَّمْعي به.وقد سلف برقم (3349) من طريق سعيد بن الحكم بن أبي مريم عن موسى بن يعقوب.
4055 - أخبرني أبو سعيد الأحمسي بالكوفة، حدثنا الحسين بن حميد بن الربيع، حدثنا الحسين بن علي السُّلَمي، حدثنا محمد بن حسان، حدثنا محمد بن جعفر، عن أبيه، عن جده، عن علي، قال: جَمَع ربُّنا عز وجل لِنوح علم الماضين كلِّهم، وأيّده بروح منه، فدعا قومه سرًا وعلانية تسع مئة [1] وخمسين سنة، كلَّما مضى قَرْنٌ أَتبَعَه قرنٌ، فزادهم كُفرًا وطغيانًا [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমাদের রব, যিনি পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত, তিনি নূহের (আঃ)-এর জন্য পূর্ববর্তীদের সকল জ্ঞান একত্র করলেন এবং তাঁকে তাঁর পক্ষ থেকে একটি রূহ (শক্তি) দ্বারা সাহায্য করলেন। অতঃপর তিনি তাঁর কওমকে গোপনে ও প্রকাশ্যে নয় শত পঞ্চাশ বছর ধরে দাওয়াত দিলেন। যখনই এক প্রজন্ম শেষ হলো, তার পেছনে আরেক প্রজন্ম এলো, আর তা তাদের শুধু কুফর (অবিশ্বাস) ও সীমালঙ্ঘনই বাড়িয়ে দিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ص) و (ع): مئة، بدل: تسع مئة. وهذا خطأ صريح، مخالف لنص الآية، والتصويب من (ب).
[2] إسناده ضعيف بمرَّةٍ لجهالة الحسين بن علي السلمي ومحمد بن حسان: وهو السُّلمي، لأنَّ الحسين صرّح في بعض طرقه بأنه عمه، ومحمد بن جعفر - وهو ابن محمد بن علي بن الحسين بن علي بن أبي طالب - تُكلِّم فيه كما قال الذهبي في "الميزان"، ومحمد بن علي روايته عن جده علي بن أبي طالب مرسلة كما قال أبو زرعة الرازي وغيره، والحسين بن حميد ليس بالمتين.
4056 - أخبرنا الحَسَن بن محمد بن إسحاق، حدثنا محمد بن أحمد بن البراء، حدثنا عبد المنعم بن إدريس، عن أبيه، عن وَهْب بن مُنَبِّه، قال: وذَكَرَ الحسن بن أبي الحسن عن سبعة رهطٍ شهدوا بدرًا، قال وهب: وقد حدثني عبد الله بن عبّاس، كلُّهم رفعوا الحديث إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الله يدعو نوحًا وقومه يوم القيامة أول الناسِ، فيقول: ماذا أجبتُم نوحًا؟ فيقولون: ما دعانا وما بَلغَنا ولا نَصَحَنا، ولا أمرنا ولا نَهانا، فيقول نوحٌ: دعوتُهم يا رب دعاءً فاشيًا في الأولين والآخرين، أمّةً بعد أمةٍ، حتى انتهى إلى خاتم النبيين أحمد، فانتسَخَه وقرأه وآمَنَ به وصدقه، فيقولُ الله للملائكة: ادعوا أحمدَ وأُمته، فيأتي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأمتُه يَسعى نُورُهم بين أيديهم، فيقول نوح لمحمدٍ وأمته: هل تعلمون أني بلغتُ قومي الرسالة، واجتهدتُ لهم بالنصيحة، وجَهَدتُ أن أستنقذهم من النار سِرًا وجهارًا، فلم يَزِدْهُم دُعائي إلا فرارًا؟ فيقول رسول الله وأمته: فإنا نشهد بما نَشَدْتَنا به أنك في جميع ما قلت من الصادقين، فيقول قوم نوح: وأنَّى علمت هذا يا أحمد أنتَ وأمتك، ونحنُ أول الأمم وأنتَ وأمتك آخرُ الأمم؟! فيقول رسول الله صلى الله عليه وسلم: بسم الله الرحمن الرحيم: {إِنَّا أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَى قَوْمِهِ أَنْ أَنذِرَ قَوْمَكَ مِن قَبْلِ أَن يَأْتِيَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ} [نوح:1] قرأ السورة حتى ختمها، فإذا ختمها قالت أمتُه: نشهدُ {إِنَّ هَذَا لَهُوَ الْقَصَصُ الْحَقُّ وَمَا مِنْ إِلَهٍ إِلَّا اللَّهُ وَإِنَّ اللَّهَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ} [آل عمران: 62]، فيقول الله عز وجل عند ذلك: امتازوا اليوم أيها المُجرمون، فهم أولُ مَن يَمتاز في النار" [1]. ذكر إدريس النبي صلى الله عليه وسلم
আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা সকলেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট হাদিসটি বর্ণনা করেছেন:
নিশ্চয় আল্লাহ কিয়ামতের দিন প্রথম মানুষ হিসেবে নূহ (আঃ)-কে এবং তাঁর কওমকে ডাকবেন। অতঃপর তিনি বলবেন: তোমরা নূহকে কী উত্তর দিয়েছিলে? তারা বলবে: তিনি আমাদের ডাকেননি, আমাদের কাছে পৌঁছাননি (প্রচার করেননি), আমাদের নসীহত করেননি, কোনো আদেশও দেননি এবং কোনো নিষেধও করেননি। তখন নূহ (আঃ) বলবেন: হে আমার রব! আমি প্রথম ও পরের সকলের মাঝে, একের পর এক উম্মতের কাছে, ব্যাপকভাবে তাদের কাছে দাওয়াত পৌঁছে দিয়েছিলাম, এমনকি তা সর্বশেষ নবী আহমাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছাল। তিনি তা লিপিবদ্ধ করলেন, পাঠ করলেন, এর প্রতি ঈমান আনলেন এবং সত্যায়ন করলেন। তখন আল্লাহ ফেরেশতাদের বলবেন: আহমাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর উম্মতকে ডাকো। অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর উম্মত আসবেন, তাদের নূর তাদের সামনে দ্রুত চলতে থাকবে।
তখন নূহ (আঃ) মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর উম্মতকে বলবেন: তোমরা কি জানো যে, আমি আমার কওমের কাছে রিসালাত পৌঁছিয়ে দিয়েছি, নসীহতের মাধ্যমে তাদের জন্য চেষ্টা করেছি, প্রকাশ্যে ও গোপনে তাদেরকে আগুন থেকে রক্ষা করার জন্য কঠোর পরিশ্রম করেছি, কিন্তু আমার দাওয়াত কেবল তাদের পলায়নই বৃদ্ধি করেছে? তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর উম্মত বলবেন: আপনি আমাদের কাছে যা জানতে চাইলেন, আমরা সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনি আপনার বলা সমস্ত বিষয়েই সত্যবাদী।
তখন নূহের কওম বলবে: হে আহমাদ! আপনি এবং আপনার উম্মত এটি কীভাবে জানলেন? আমরা তো প্রথম উম্মত আর আপনি এবং আপনার উম্মত শেষ উম্মত! তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলবেন: বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম (পরম করুণাময় দয়ালু আল্লাহর নামে শুরু করছি): "নিশ্চয়ই আমি নূহকে তাঁর কওমের নিকট প্রেরণ করেছিলাম এই মর্মে যে, তুমি তোমার কওমকে সতর্ক করো তাদের নিকট কঠিন আযাব আসার পূর্বে।" [সূরা নূহ: ১] (তিনি সম্পূর্ণ সূরাটি পাঠ করলেন, এমনকি যখন তিনি তা শেষ করলেন) তখন তাঁর উম্মত বলবে: আমরা সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, "নিশ্চয়ই এটিই সত্য কাহিনী; আর আল্লাহ ছাড়া অন্য কোনো ইলাহ নেই এবং নিশ্চয়ই আল্লাহই পরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময়।" [সূরা আলে ইমরান: ৬২] তখন পরাক্রমশালী আল্লাহ বলবেন: হে অপরাধীরা! আজ তোমরা পৃথক হয়ে যাও। আর তারাই হবে প্রথম যারা জাহান্নামে পৃথক হবে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وذلك من أجل عبد المنعم بن إدريس، فهو متروك الحديث، بل صرّح الإمام أحمد بأنه كان يكذب على وهب بن منبه، وأنه لم يسمع من أبيه شيئًا، لأنَّ أباه مات وهو ابن خمس أو ست سنين.ويُغني عنه حديث أبي سعيد الخُدْري الذي أخرجه أحمد 17/ (11283)، والبخاري (3339)، والترمذي (2961)، والنسائي (10940) مختصرًا. وأخرجه الطبري في "تفسيره" 22/ 4، وفي "تاريخه" 1/ 166 - 167 عن أحمد بن زهير، عن موسى بن إسماعيل، به.والصباح: جمع صبيح أو صبيحة، وهو الجميل الوضيء الوجه.
4057 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا هشام بن علي السدوسي، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا داود بن أبي الفُرات، حدثنا عِلْباء بن أحمر، عن عكرمة، عن ابن عباس: أنه تلا هذه الآية: {وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْأُولَى} [الأحزاب: 33]، قال: كانت فيما بين نوح وإدريس ألف سنة، وإِنَّ بَطنَين من ولدِ آدم كان أحدهما يَسكُن السهل، والآخرُ يسكن الجبل، وكان رجال الجبل صباحًا وفي النساء دَمامةٌ، وكانت نِساء السهل صباحًا وفي الرجال دمامةٌ، وإنَّ إبليس أتى رجلًا من أهل السهْل في صورة غُلام الرُّعاة، فجاء فيه بصوتٍ لم يسمع الناس مثله، فاتخذوا عيدًا يجتمعون إليه في السَّنَة، وإنَّ رجلًا من أهل الجبل هَجَمَ عليهم وهم في عيدهم ذلك، فرأى النساءَ وصَباحَتَهن، فأتى أصحابه فأخبرهم بذلك، فتحوّلوا إليهنّ ونَزَلُوا معهنّ، فظهرت الفاحشة فيهنّ، فذلك قول الله عز وجل: {وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْأُولَى} [الأحزاب: 33] [1].
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: {তোমরা প্রথম জাহিলিয়াতের নারীদের মতো প্রদর্শন করে বেড়িও না} [সূরা আহযাব: ৩৩]। তিনি বললেন: (প্রথম জাহিলিয়াত) হলো নূহ (আঃ) এবং ইদ্রীস (আঃ)-এর মধ্যকার সময়ের মধ্যে, যা ছিল এক হাজার বছরের। আদম (আঃ)-এর সন্তানদের মধ্যে দুটি গোত্র ছিল। তাদের মধ্যে একটি সমতল ভূমিতে বাস করত এবং অন্যটি পাহাড়ে বাস করত। পাহাড়ের পুরুষরা ছিল সুদর্শন কিন্তু মহিলারা ছিল কুশ্রী। আর সমতল ভূমির মহিলারা ছিল সুন্দরী কিন্তু পুরুষরা ছিল কুশ্রী। নিশ্চয়ই ইবলীস রাখাল বালকের বেশ ধারণ করে সমতল ভূমির একজন লোকের কাছে আসল। সে এমন সুরে গান গেয়ে শোনাল যা মানুষ আগে কখনো শোনেনি। সুতরাং, তারা বছরে একবার একত্রিত হওয়ার জন্য একটি উৎসব তৈরি করল। নিশ্চয়ই পাহাড়ের এক লোক তাদের সেই উৎসবের সময় সেখানে হানা দিল এবং সে নারীদের দেখল ও তাদের সৌন্দর্য প্রত্যক্ষ করল। সে তার সাথীদের কাছে গেল এবং তাদের এই বিষয়ে খবর দিল। তারপর তারা তাদের (নারীদের) দিকে চলে আসল এবং তাদের সাথে বসবাস করতে শুরু করল। ফলে তাদের মধ্যে অশ্লীলতা প্রকাশ পেল। আর এটাই আল্লাহ তাআলার বাণী: {তোমরা প্রথম জাহিলিয়াতের নারীদের মতো প্রদর্শন করে বেড়িও না} [সূরা আহযাব: ৩৩] এর অর্থ।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي كما قال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 14/ 151.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (5068)، ومن طريقه ابن عساكر 62/ 279 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبري في "تفسيره" 22/ 4، وفي "تاريخه" 1/ 166 - 167 عن أحمد بن زهير، عن موسى بن إسماعيل، به.والصباح: جمع صبيح أو صبيحة، وهو الجميل الوضيء الوجه.
4058 - أخبرنا الحسن بن محمد الإسفراييني، حدثنا محمد بن أحمد بن البَرَاء، أخبرنا عبد المنعم بن إدريس، عن أبيه، عن وهب بن منبِّه: أنه سُئل عن إدريس: مَن هو، وفي أيِّ زمان هو؟ قال: هو جد نُوح الذي يُقال له: خَنُوخُ، وهو في الجنة حيٌّ [1].وقال محمد بن إسحاق بن يَسار: كان إدريس أولَ بَني آدمَ أُعطي النُّبوة، وهو أُخنُوخُ بن يَريد بن أهلاليل بن قينان بن ناشر [2] بن شيث بن آدم [3].
ওয়াহাব ইবনে মুনাব্বিহ থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তাকে ইদরীস (আঃ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল যে, তিনি কে এবং কোন সময়ের মানুষ? তিনি বললেন: তিনি হলেন নূহ (আঃ)-এর দাদা, যাকে খানুখ বলা হয়, এবং তিনি জান্নাতে জীবিত আছেন। আর মুহাম্মাদ ইবনে ইসহাক ইবনে ইয়াসার বলেন: ইদরীস (আঃ) ছিলেন আদম (আঃ)-এর সন্তানদের মধ্যে প্রথম ব্যক্তি, যাকে নবুওয়াত প্রদান করা হয়েছিল। তিনি হলেন আখুনুখ ইবনে ইয়ারিদ ইবনে আহলালিল ইবনে কায়নান ইবনে নাশূর ইবনে শীস ইবনে আদম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده واه، وعبد المنعم كذَّبه أحمد، كما قال الذهبي في "تلخيصه". ووهاه الصالحي في "سبل الهدي" 1/ 317.وقد ثبت ذلك عن وهب بن منبه من وجه آخر، فقد أخرجه أبو الشيخ الأصبهاني في "العظمة" (1058) من طريق عبد الصمد بن معقل، عن عمه وهب بن منبه.
[2] كذا وقع في نسخنا الخطية، والذي في "سبل الهدى والرشاد" للصالحي 1/ 319: أخنوخ بن يرد بن مهلاليل بن قينان - ويقال: قَينَن - بن يانش - ويقال أَنُوش - بن شيث.
4058 [3] - هو في "سيرة ابن هشام" 1/ 3، ومن طريقه أخرجه الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 14/ 385 عن زياد بن عبد الله البكائي، وأخرجه الطبري في "تاريخه" 1/ 169 - 170 من طريق سلمة بن الفضل، كلاهما عن ابن إسحاق. وفيه عندهما في نسبه: بن يَرْد، بدل بن يريد، ويانش، بدل ناشر.
4059 - أخبرني أبو سعيد أحمد بن محمد الأحمسي بالكوفة، حدثنا الحسين بن حميد بن الربيع، حدثنا مروان بن جعفر السمري، حدثنا حميد بن معاذ اليَشكُري، حدثنا مُدرِك بن عبد الرحمن العنبري [حدثنا الحسن بن ذكوان] [1] عن الحسن البصري، عن سمرة بن جندب، قال: ثم كان نبي الله إدريس رجلًا أبيض طويلًا، ضخم البطن، عريض الصدر، قليل شعر الجسد، كثير شعر الرأس، وكانت إحدى عينيه أعظم من الأخرى، وكانت في صدره نكتة بياض من غير بَرص، فلما رأى اللهُ مِن أهل الأرض ما رأى من جورِهم واعتدائهم في أمر الله، رفعه الله إلى السماء السادسة، فهو حيثُ يقول: {وَرَفَعْنَاهُ مَكَانًا عَلِيًّا} [مريم:57] [2]. ذكر إبراهيم [3] النبي صلى الله عليه وسلم خليل الله عز وجل وبينه وبين نوحٍ هودٌ وصالحٌ صلوات الله عليهما
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর নবী ইদরীস (আঃ) ছিলেন একজন শ্বেতাঙ্গ, দীর্ঘদেহী পুরুষ। তার পেট ছিল স্থূল, বুক ছিল চওড়া, শরীরে লোম ছিল কম, কিন্তু মাথায় ছিল প্রচুর চুল। তার দুই চোখের মধ্যে একটি ছিল অন্যটির চেয়ে বড়। তার বুকে শ্বেতীরোগ (কুষ্ঠ) ব্যতীত এক ফোঁটা সাদা চিহ্ন ছিল। অতঃপর যখন আল্লাহ পৃথিবীর অধিবাসীদের পক্ষ থেকে তাদের সীমালঙ্ঘন ও আল্লাহর বিষয়ে তাদের বাড়াবাড়ি দেখলেন, তখন আল্লাহ তাঁকে ষষ্ঠ আসমানে তুলে নিলেন। তাই (আল্লাহ) যেখানে বলেন: "আর আমি তাকে সুউচ্চ স্থানে উন্নীত করেছিলাম।" (সূরা মারইয়াম: ৫৭) (এরপর) আল্লাহ তাআলার বন্ধু নবী ইবরাহীম (আঃ)-এর আলোচনা (শুরু হলো)। তাঁর (ইবরাহীমের) এবং নূহ (আঃ)-এর মাঝে হূদ ও সালিহ (আঃ) ছিলেন—তাঁদের উভয়ের উপর আল্লাহর শান্তি বর্ষিত হোক।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط اسم الحسن بن ذكوان من (ز) و (ب)، وبيّض مكانه في (ص) و (ع)، وثبت في المطبوع، ولا بد من ذكره، فقد روى المصنف بهذا الإسناد عدة أخبار ثبت اسمه فيها جميعًا، وهو الحسن بن ذكوان أبو سلمة البصري.
[2] إسناده ضعيف جدًّا لضعف الحسن بن ذكوان وجهالة حميد بن معاذ ومدرك بن عبد الرحمن، والحسين بن حميد ليس بالمتين. وقد نقل ابن قتيبة في "المعارف" نحو هذا الوصف عن وهب ابن منبه دون ذكر الرفع، والأشبه أن يكون من قول وهب. وقال الحافظ في "الفتح" 10/ 32: وكون إدريس رفع وهو حي لم يثبت من طريق مرفوعة قوية.قلنا: وقد جاء عن كعب الأحبار من قوله خلاف ما جاء هنا من علة رفع إدريس، وهو ما أخرجه الطبري في "تفسيره" 16/ 96 بسند قوي عن هلال بن يساف: أن ابن عبّاس سأل كعبًا فقال له: ما قول الله لإدريس {وَرَفَعْنَاهُ مَكَانًا عَلِيًّا}، فقال كعب: أما إدريس فإنَّ الله أوحى إليه: إني أرفع لك في كل يوم مثل جميع عمل بني آدم، فأحب أن يزداد عملًا، فأتاه خليل له الملائكة، فقال: إنَّ الله أوحى إليَّ كذا وكذا، فكلّم لي ملك الموت فليؤخّرني حتى أزداد عملًا، فحمله بين جناحيه، ثم صعد به إلى السماء، فلما كان في السماء الرابعة تلقاهم ملك الموت منحدرًا، فكلم ملك الموت في الذي كلمه فيه إدريس، فقال: وأين إدريس؟ قال: هو ذا هو على ظهري، قال ملك الموت: فالعجب بُعثتُ، وقيل لي: اقبض روح إدريس في السماء الرابعة، فجعلت أقول: كيف أقبض روحه في السماء الرابعة وهو في الأرض؟! فقبض روحه هناك، فذلك قول الله جل وعزّ {وَرَفَعْنَاهُ مَكَانًا عَلِيًّا}. انتهى، فهذا فيه أنَّ رَفْعَه إلى السماء لأجل قبض روحه هناك. 3/ 390، و "تاريخ الإسلام" 6/ 735.
4059 [3] - جاء هذا العنوان في النسخ الخطية مؤخرًا إلى ما بعد حديث عبد الله بن بسر، ومكانه هنا حسب ما في "تلخيص الذهبي" و المطبوع هو الأليق، لاشتمال كلام الواقدي بإثر حديث ابن بسر على ذكر إبراهيم خليل الرحمن. 3/ 390، و "تاريخ الإسلام" 6/ 735.
4060 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن بُطّة الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم التّيْمي [1]، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر الواقدي، حدثني شُرَيح بن يزيد، عن إبراهيم بن محمد بن زياد، عن أبيه، عن عبد الله بن بُسْر، قال: وَضَعَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يده على رأسي، فقال: "هذا الغلامُ يعيشُ قَرْنًا". قال: فعاش مئة سنة [2]. قال الواقدي: لقول الله عز وجل: {وَقُرُونًا بَيْنَ ذَلِكَ كَثِيرًا} [الفرقان:38]، فكان بين نُوحٍ وآدمَ عشرة قرون، وبينه وبين إبراهيم عشرة قُرون، فوُلِد إبراهيم خليل الرحمن على رأس ألفي سنة من خَلْق آدم [3].
আবদুল্লাহ ইবনু বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার মাথায় তাঁর হাত রাখলেন এবং বললেন: "এই বালকটি এক 'কার্ন' (শতাব্দী) জীবন লাভ করবে।" তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: অতঃপর তিনি (আবদুল্লাহ ইবনু বুসর) একশ বছর জীবন লাভ করেন। ওয়াকিদী বলেন: আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল-এর বাণী: {এবং এর মধ্যবর্তী বহু প্রজন্মকেও (ধ্বংস করেছেন)} (সূরা ফুরকান: ৩৮) অনুযায়ী। নূহ (আঃ) ও আদম (আঃ)-এর মাঝে দশটি প্রজন্ম (কার্ন) ছিল। এবং তাঁর (নূহ আঃ)-এর ও ইব্রাহীম (আঃ)-এর মাঝে দশটি প্রজন্ম (কার্ন) ছিল। অতএব, ইব্রাহীম খালীলুর রহমান (আঃ)-এর জন্ম হয় আদম (আঃ)-এর সৃষ্টির দুই হাজার বছর পর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: التميمي. وانظر ترجمته في "طبقات المحدثين بأصبهان" 3/ 390، و "تاريخ الإسلام" 6/ 735.
[2] حديث صحيح، ومحمد بن عمر الواقدي متابع.ومحمد بن عمر الواقدي هو صاحب "المبتدأ والمغازي"، وقد تُكُلِّم فيه، وأعدل الأقوال فيه ما قاله الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 9/ 469 أنه يُحتاج إليه في الغزوات والتاريخ، قال: ووزنه عندي أنه مع ضعفه يُكتب حديثه ويُروى، لأني لا أتهمه بالوضع، وقول من أهدره فيه مجازفة من بعض الوجوه، وقال أيضًا 9/ 454 - 455: جَمَعَ فأوعى، وخلط الغَثَّ بالسمين، والخرز بالثمين، فاطَّرحوه لذلك، ومع هذا فلا يُستغنى عنه في المغازي وأيام الصحابة وأخبارهم.وقد صرّح الحاكم في أول كتاب معرفة الصحابة بأن هذه خطته فيما يرويه عن الواقدي، فقال: أما الشيخان فلم يزيدا على المناقب، وقد بدأنا في أول ذكر الصحابي بمعرفة نسبه ووفاته، ثم بما يصح على شرطهما من مناقبه مما لم يُخرجاه، فلم أستغن عن ذكر محمد بن عمر الواقدي وأقرانه في المعرفة.ولا يُنكر الحاكم أن يكون في كتب الواقدي بعض العجائب، ولذلك قال بإثر الخبر (4136): قد اختصرت من أخبار يوسف عليه الصلاة والسلام ما صح الطريق إليه، ولو أخذتُ في عجائب وهب بن منبِّه وأبي عبد الله الواقدي لطالت الترجمة بها.قلنا: والحسين بن الفَرَج - وهو المعروف بابن الخياط - متكلّم فيه أيضًا، وأعدل الأقوال فيه أنه ليس بالقوي كما وصفه بذلك أبو الشيخ الأصبهاني، وقد حمل عن الواقدي "المبتدأ والمغازي"، وأخذ ذلك عنه الحسن بن الجهم التيمي، وعن الحسن التيمي أخذه أهل أصبهان، وقد ذكر الذهبي بأنه مشاه غيرُ ابن مَعِين. قلنا: ذلك باعتبار أنه راوية الواقدي الذي أخذ عنه بعض كتبه، وممن مشّاه ابن مَنْدَه حيث نقل عنه في "فتح الباب في الكُنى والألقاب"، وكذا مشاه أبو نعيم إذ أكثر النقل عنه في "دلائل النبوة" وغيره، ومشاه المصنف أيضًا إذ روى كثيرًا مما ينقله عن الواقدي من روايته عنه، بل لم يرو في الأخبار والصحابة شيئًا عن الواقدي إلّا من طريقه.وأما الحسن بن الجهم التيمي فقد روى عنه جمع من الأصبهانيين، ولم يُطعن فيه بشيء، بل قال أبو الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" 3/ 390: أدركته وعزمت غير مرة أن أذهب إليه فلم يَتَّفق. وسينقل المصنّف بهذا الإسناد عن الواقدي ما يزيد على مئة وأربعين رواية، ونقتصر في كل ذلك إن شاء الله على الحكم على من فوق الواقدي لشهرة كتاب الواقدي بهذه الطريق إليه، مع التنبيه على انفراده إذا انفرد، والله تعالى نسأله التوفيق والسداد.وباقي رجال الإسناد لا بأس بهم، لأنَّ إبراهيم بن محمد بن زياد وهو الألهاني - روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات"، ورُوي هذا الخبر من وجهين آخرين حسنين عن عبد الله بن بسر.وسيأتي برقم (8735) من طريق داود بن رشيد عن شريح بن يزيد.وأخرجه أحمد 29/ (17689) عن عصام بن خالد، عن الحسن بن أيوب الحضرمي، عن عبد الله بن بسر. وإسناده حسن.وسيأتي برقم (8734) من طريق محمد بن القاسم الحمصي عن عبد الله بن بسر.
4060 [3] - يشهد لقول الواقدي حديث أبي أمامة المتقدم برقم (3076)، وأثر ابن عباس المتقدم برقم (4053)، وإسناداهما صحيحان. والخُلَّة، بالضم وتشديد اللام: هي الصداقة والمحبة التي تخللت القلب فصارت خلاله، أي: في باطنه.