আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4061 - أخبرنا أبو زكريا يحيى بن محمد العنبري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا جرير، عن عُمارة بن القعقاع، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "فيقولون: يا إبراهيم، أنتَ خَليل الرحمن، قد سمع بخُلّتِكما أهل السماوات وأهل الأرض" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه [2].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তারা বলবে, হে ইব্রাহীম! আপনি তো রহমানের (আল্লাহর) বন্ধু (খলীল)। আসমানবাসী ও যমীনবাসী উভয়ই আপনার বন্ধুত্ব (খুল্লাত) সম্পর্কে শুনেছে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. محمد بن عبد السلام: هو النيسابوري، وإسحاق بن إبراهيم: هو ابن راهويه، وجرير: هو ابن عبد الحميد، وأبو زرعة: هو ابن عمرو بن جرير البجلي.وأخرجه مسلم (194)، وابن حبان (6465) من طريق أبي خيثمة زهير بن حرب، عن جرير بن عبد الحميد بهذا الإسناد ضمن حديث الشفاعة الطويل.وأخرجه أحمد 15/ (9623)، والبخاري (4712)، ومسلم (194)، والترمذي (2434)، والنسائي (11222) من طريق أبي حيان يحيى بن سعيد بن حيان، عن أبي زرعة، به ضمن حديث الشفاعة لكن بلفظ: "يا إبراهيم أنت نبي الله وخليله من أهل الأرض" ليس فيه "قد سمع بخُلّتكما أهل السماوات وأهل الأرض". والخُلَّة، بالضم وتشديد اللام: هي الصداقة والمحبة التي تخللت القلب فصارت خلاله، أي: في باطنه.
[2] الظاهر أن المصنف أراد بذلك رواية جرير بن عبد الحميد التي فيها زيادة: "وقد سمع بخُلّتكما أهل السماوات والأرض" وذلك أنه كان يعلم بوجود حديث أبي هريرة في الشفاعة عندها، إذ نبه عليه بإثر الحديث (4049)، ولكن مع ذلك لا يُسَلّم له قوله هنا، لأنَّ مسلمًا قد أخرجه أيضًا من رواية جرير بن عبد الحميد، إلا أنه لم يسق لفظه بتمامه، لكن أفصح عنه جميع من أخرج الحديث من طريق جرير، كإسحاق بن راهويه في "مسنده" (184)، وابن أبي الدنيا في "الأهوال" (154)، وابن حبان (6465)، وغيرهم.
4062 - حدثنا أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، حدثنا هلال بن العلاء الرقي، حدثنا عبد الله بن جعفر، حدثنا عبيد الله بن عمرو، عن زيد بن أبي أُنيسة، عن عمرو بن مرة، عن عبد الله بن الحارث، قال: حدثنا جُندب، أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول قبل أن يُتوفّى: "إِنَّ الله قد اتَّخَذني خليلًا [كما اتَّخَذَ إبراهيم خليلًا] [1] " [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে তাঁর ওফাতের পূর্বে বলতে শুনেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ আমাকে খলীল (ঘনিষ্ঠ বন্ধু) হিসেবে গ্রহণ করেছেন, যেমন তিনি ইব্রাহীমকে খলীল হিসেবে গ্রহণ করেছিলেন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين المعقوفين ليس في النسخ الخطية وثبت في "تلخيص الذهبي"، وهو ثابت في رواية هلال بن العلاء عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 252، كما أنه ثابت في رواية غيره عن عبد الله بن جعفر الرقي، وكذلك هو ثابت في رواية زكريا بن عدي عن عُبيد الله بن عمرو، وإيراده هنا في باب ذكر إبراهيم يقتضي ثبوته أيضًا.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل هلال بن العلاء، لكنه متابع. جندب: هو ابن عبد الله البجلي.وأخرجه مسلم (532)، والنسائي (11058) من طريق زكريا بن عدي، عن عبيد الله بن عمرو، بهذا الإسناد. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه ابن حبان (6425) من طريق أبي عبد الرحيم خالد بن أبي يزيد، عن زيد بن أبي أُنيسة، عن عمرو بن مُرّة، عن عبد الله بن الحارث، عن جميل النجراني، عن جندب. فزاد في الإسناد جميلًا النجراني، مع أنَّ عبد الله بن الحارث قد صرّح بتحديث جندب له في رواية عبيد الله بن عمرو، فرواية أبي عبد الرحيم من المزيد في متصل الأسانيد.
4063 - حدثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالويه، حدثنا أحمد بن بشر المَرثَدِي، يحيى بن معين، حدثنا هشام بن يوسف، عن معمر، عن أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس: أن النبي صلى الله عليه وسلم لما رأى الصور في البيت لم يدخُل حتى أُمر بها فنُحِّيَت، ورأى إبراهيم وإسماعيل بأيديهما الأزلام، فقال: "قاتلهم الله، واللهِ إِنِ اسْتَقسَما بالأزلام قط" [1].هذا حديث صحيح على شرط البخاري.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (কাবা) ঘরের মধ্যে মূর্তিগুলো দেখলেন, তখন তিনি তাতে প্রবেশ করলেন না যতক্ষণ না সেগুলোকে সরিয়ে ফেলার নির্দেশ দেওয়া হলো এবং সেগুলোকে সরিয়ে ফেলা হলো। আর তিনি ইবরাহীম ও ইসমাঈল (আঃ)-কে দেখলেন যে, তাঁদের হাতে ভাগ্য-নির্ণায়ক তীর (আযলাম) রয়েছে। তখন তিনি বললেন: "আল্লাহ তাদের ধ্বংস করুন! আল্লাহর শপথ, তারা কখনও আযলাম (তীর) দ্বারা ভাগ্য নির্ণয়ের চেষ্টা করেননি।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. معمر: هو ابن راشد، وأيوب هو ابن أبي تميمة السختياني.وأخرجه البخاري (3352) عن إبراهيم بن موسى، عن هشام بن يوسف، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 5/ (3455)، وابن حبان (5861) من طريق عبد الرزاق عن معمر، به.وأخرجه أحمد (3093)، والبخاري (1601) و (4288)، وأبو داود (2027) من طريق عبد الوارث بن سعيد، عن أيوب، به.قوله: "إن استقسَما" "إن" نافية بمعنى "ما".
4064 - فحدّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بكير، عن محمد بن إسحاق، قال: وإبراهيم خليل الرحمن وصفيه ونبيه صلى الله عليه ابن آزَرَ بن ناحور بن شاروخ بن راغو بن فالخ بن عابر بن شالخ ابن أرفَخْشَذ بن سام بن نوح صلوات الله عليه [1].
মুহাম্মদ ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, ইবরাহীম খলীলুর রহমান (দয়াময় আল্লাহর বন্ধু), তাঁর মনোনীত এবং তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), তিনি হলেন আযর ইবনু নাহূর ইবনু শারূখ ইবনু রাগূ ইবনু ফালিগ ইবনু আ'বির ইবনু শালিখ ইবনু আরফাখশায ইবনু সাম ইবনু নূহ (আলাইহিমুস সালাম)-এর পুত্র।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "سيرة ابن هشام" 1/ 2.
4065 - أخبرنا الحسن بن محمد الإسفراييني، أخبرنا محمد بن أحمد بن البراء، حدثنا المعافى بن سليمان الحَرّاني، حدثنا محمد بن سلمة، عن أبي عبد الرحيم، عن أبي عبد الملك، عن القاسم، عن أبي أمامة، قال: طَلَعَتْ كفُّ من السماء بين إصبَعَين من أصابعها شعرة بيضاء، فجعلت تدنو من رأس إبراهيم ثم تدنُو، فألقتها في رأسه، وقالت: اشْعَل وقارًا، ثم أوحى الله إليه أن يتطهر، فتوضَّأ، ثم أوحى الله إليه أن تطهر، فاغتسل، ثم أوحى الله إليه أن تطهر، وكان أول من شاب واختَتَن، وأنزلَ اللهُ على إبراهيم ممّا أنزل على محمد في القرآن، فكان فيما أنزل الله عليه: {التَّائِبُونَ الْعَابِدُونَ الْحَامِدُونَ السَّائِحُونَ الرَّاكِعُونَ السَّاجِدُونَ الْآمِرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَالنَّاهُونَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَالْحَافِظُونَ لِحُدُودِ اللَّهِ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِينَ} [التوبة: 112]، {قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ} إلى قوله: {الَّذِينَ يَرِثُونَ الْفِرْدَوْسَ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ} [المؤمنون: 1 - 11]، والتي في الأحزاب: {إِنَّ الْمُسْلِمِينَ وَالْمُسْلِمَاتِ} إلى آخر الآية [الأحزاب: 35]، والتي في سأل سائل: {الَّذِينَ هُمْ عَلَى صَلَاتِهِمْ دَائِمُونَ} إِلى قوله: {وَالَّذِينَ هُمْ بِشَهَادَاتِهِمْ [1] قَائِمُونَ} [المعارج: 23 - 33]، فلم يف بهذه السهام إلّا إبراهيم خليل الله ومحمد صلى الله عليهما [2].
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আকাশ থেকে একটি হাতের তালু বের হলো, যার দুই আঙ্গুলের মাঝে একটি সাদা চুল ছিল। এটি ইবরাহীম (আঃ)-এর মাথার নিকটবর্তী হতে লাগলো, এরপর আরও নিকটবর্তী হলো এবং তা তাঁর মাথার উপর ফেলে দিল। অতঃপর বলল: 'সম্মান (বা গাম্ভীর্য) ধারণ করুন।' এরপর আল্লাহ তাঁর নিকট ওহী পাঠালেন যে, তিনি যেন পবিত্রতা অর্জন করেন, তখন তিনি ওযু করলেন। অতঃপর আল্লাহ তাঁর নিকট ওহী পাঠালেন যে, তিনি যেন পবিত্রতা অর্জন করেন, তখন তিনি গোসল করলেন। এরপরও আল্লাহ তাঁর নিকট ওহী পাঠালেন যে, তিনি যেন পবিত্রতা অর্জন করেন। তিনিই (ইবরাহীম) ছিলেন প্রথম ব্যক্তি যিনি পক্ককেশ ধারণ করেন এবং খতনা করেন। আর আল্লাহ ইবরাহীম (আঃ)-এর উপর কুরআনে নাযিলকৃত মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর নাযিলকৃত কিছু অংশ নাযিল করেন। তাঁর উপর যা নাযিল হয়েছিল তার মধ্যে ছিল: {তারা হলো তওবাকারী, ইবাদতকারী, আল্লাহর প্রশংসাকারী, সিয়াম পালনকারী (বা দেশভ্রমণকারী), রুকুকারী, সিজদাকারী, ভালো কাজের আদেশকারী, মন্দ কাজ থেকে নিষেধকারী এবং আল্লাহর সীমাসমূহ সংরক্ষণকারী। আর মুমিনদের সুসংবাদ দিন} [সূরাহ আত-তাওবাহ: ১১২], এবং {নিশ্চয়ই মুমিনগণ সফলকাম হয়েছে} থেকে শুরু করে এই পর্যন্ত: {তারাই ফিরদাউসের উত্তরাধিকারী হবে এবং সেখানে তারা চিরকাল থাকবে} [সূরাহ আল-মুমিনূন: ১-১১], এবং সূরাহ আল-আহযাবের এই অংশটুকু: {নিশ্চয়ই মুসলিম পুরুষ ও মুসলিম নারীগণ...} সম্পূর্ণ আয়াত পর্যন্ত [সূরাহ আল-আহযাব: ৩৫], এবং সূরাহ সাআলা সাইলের এই অংশটুকু: {যারা তাদের সালাতে সর্বদা প্রতিষ্ঠিত} থেকে শুরু করে এই পর্যন্ত: {এবং যারা তাদের সাক্ষ্যসমূহে অবিচল থাকে} [সূরাহ আল-মাআরিজ: ২৩-৩৩]। আল্লাহ্র খলীল ইবরাহীম (আঃ) এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ব্যতীত আর কেউই এই অংশের (বা গুণাবলীর) দাবি পূরণ করতে পারেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هكذا في نسخنا الخطية، وهي قراءة الأكثرين، بالإفراد وقرأ حفص عن عاصم بالجمع، وهي قراءة يعقوب. انظر "النشر" لابن الجزري 2/ 391. وخالفهم جماعة آخرون، فرووه عن يحيى بن سعيد الأنصاري مرفوعًا، ذكر الدارقطني منهم الأوزاعي ومحمد بن إسحاق وابن جريج في رواية أبي قرة موسى بن طارق عنه، ومالكًا والليث في روايةٍ عن ابن وهب عنهما جميعًا. ثم ذكرَ أنَّ غير موسى بن طارق رواه عن ابن جريج فذكر بينه وبين يحيى بن سعيد رجلًا هو إبراهيم بن محمد الأسلمي، قلنا: وهو متروك الحديث.وفيه اختلافٌ آخر عن يحيى بن سعيد الأنصاري، وهو أن بعضهم يرويه عنه عن سعيد بن المسيب مقطوعًا من قوله، رُوي ذلك عن مالك وعيسى بن يونس وابن عيينة ومعمر بن راشد.وممَّن رواه مرفوعًا أيضًا الليث بن سعد، عن محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة.لكن خالف الليث في لفظه يحيى القطان، وهو وهم ممَّن دون الليث كما سيأتي بيانه، فالأشبه أنه باللفظ المذكور موقوف من رواية سعيد بن المسيب عن أبي هريرة.وقد خالف سعيد بن المسيب غيره من أصحاب أبي هريرة، كالأعرج وأبي سلمة، فروياه عن أبي هريرة مرفوعًا بلفظ: "اختتن إبراهيم وهو ابن ثمانين"، وكذلك رواه عجلان مولى فاطمة عن أبي هريرة في رواية يحيى القطان، عن محمد بن عجلان، عن أبيه، فهذا هو المحفوظ في لفظ المرفوع، والمحفوظ في لفظ الموقوف على ما رواه سعيد بن المسيب عن أبي هريرة كما أشار إليه ابن عبد البر في "التمهيد" 23/ 140، قلنا: وإذا تعارضا قُدِّم ما في المرفوع، ولهذا اقتصر عليه صاحبا الصحيح، ولعلّ أبا هريرة إنما أتى بالموقوف عمن كان يجالسه من علماء أهل الكتاب، كعبد الله بن سلام وكعب الأحبار، والله أعلم.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 4/ 194، ومن طريقه البيهقي في "شعب الإيمان" (8272) من طريق أبي قتادة عبد الله بن واقد الحَرَّاني، عن حمّاد بن سلمة، بهذا الإسناد مرفوعًا. وابن واقد ليس بعمدة، ولا يوازي يزيد بن هارون، ولا يقاربه.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 1/ 30 عن معن بن عيس القزاز، عن مالك بن أنس، وابن أبي شَيْبة 9/ 58 و 13/ 61 عن عبدة بن سليمان، والبخاري في "الأدب المفرد" (1250) من طريق حماد بن زيد، والحسن بن علي بن عفّان في "الأمالي والقراءة" ص 24، وأبو عَرُوبة الحرّاني في "الأوائل" (24)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (8271)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 6/ 199 من طريق جعفر بن عون، ومحمد بن نصر المروزي كما في "التمهيد" لابن عبد البر 23/ 139 - ولعله في كتابه الكبير في اختلاف العلماء - من طريق يحيى بن سعيد القطان، وابن أبي الدنيا في "العيال" (580)، ومحمد بن نصر المروزي كما في "التمهيد" من طريق علي بن مسهر، كلهم عن يحيى بن سعيد الأنصاري، به.وسيأتي بعده كذلك عن أبي معاوية محمد بن خازم الضرير عن يحيى بن سعيد موقوفًا.وأخرجه محمد بن نصر المَروزي كما في "التمهيد" 23/ 138، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 6/ 198، وفي "تبيين الامتنان بالأمر بالختان" (17)، وابن الجوزي في "المنتظم" 1/ 276 - 277، وأبو القاسم الرافعي في "تاريخ قزوين" 2/ 43 من طريق أبي عمرو الأوزاعي، وابن حبان (6204) من طريق أبي قُرَّة موسى بن طارق، عن ابن جريج، كلاهما عن يحيى بن سعيد الأنصاري، مرفوعًا.وأخرجه معمر بن راشد في "الجامع" (20245)، ومالك في "الموطأ" برواية أبي مصعب الزهري (1929) عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن سعيد بن المسيب من قوله، دون ذكر أبي هريرة.وأخرجه ابن حبان (6205) من طريق قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، عن محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، مرفوعًا.وقد خالف الليث بن سعد في لفظه يحيى القطان عند أحمد 15/ (9622) إذ رواه عن محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، مرفوعًا، بلفظ: "اختتن إبراهيم وهو ابن ثمانين". ورواية القطان أرجح لموافقتها لرواية غير سعيد بن المسيب عن أبي هريرة، كما سيأتي ذكره.وأخرجه أحمد 14 / (8281) و 15/ (9408)، والبخاري (3356) و (6298)، ومسلم (2370) من طريق أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، مرفوعًا، بلفظ: "اختتن إبراهيم وهو ابن ثمانين سنة". فوافقت رواية يحيى القطان، عن ابن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة.وأخرجه البزار (7839)، وأبو يعلى (5981)، وابن عساكر 6/ 201 من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، مرفوعًا، كلفظ رواية الأعرج وعجلان عن أبي هريرة.
[2] إسناده ضعيف لضعف أبي عبد الملك: وهو علي بن يزيد الألهاني. أبو عبد الرحيم: هو خالد بن أبي يزيد الحَرَّاني. وخالفهم جماعة آخرون، فرووه عن يحيى بن سعيد الأنصاري مرفوعًا، ذكر الدارقطني منهم الأوزاعي ومحمد بن إسحاق وابن جريج في رواية أبي قرة موسى بن طارق عنه، ومالكًا والليث في روايةٍ عن ابن وهب عنهما جميعًا. ثم ذكرَ أنَّ غير موسى بن طارق رواه عن ابن جريج فذكر بينه وبين يحيى بن سعيد رجلًا هو إبراهيم بن محمد الأسلمي، قلنا: وهو متروك الحديث.وفيه اختلافٌ آخر عن يحيى بن سعيد الأنصاري، وهو أن بعضهم يرويه عنه عن سعيد بن المسيب مقطوعًا من قوله، رُوي ذلك عن مالك وعيسى بن يونس وابن عيينة ومعمر بن راشد.وممَّن رواه مرفوعًا أيضًا الليث بن سعد، عن محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة.لكن خالف الليث في لفظه يحيى القطان، وهو وهم ممَّن دون الليث كما سيأتي بيانه، فالأشبه أنه باللفظ المذكور موقوف من رواية سعيد بن المسيب عن أبي هريرة.وقد خالف سعيد بن المسيب غيره من أصحاب أبي هريرة، كالأعرج وأبي سلمة، فروياه عن أبي هريرة مرفوعًا بلفظ: "اختتن إبراهيم وهو ابن ثمانين"، وكذلك رواه عجلان مولى فاطمة عن أبي هريرة في رواية يحيى القطان، عن محمد بن عجلان، عن أبيه، فهذا هو المحفوظ في لفظ المرفوع، والمحفوظ في لفظ الموقوف على ما رواه سعيد بن المسيب عن أبي هريرة كما أشار إليه ابن عبد البر في "التمهيد" 23/ 140، قلنا: وإذا تعارضا قُدِّم ما في المرفوع، ولهذا اقتصر عليه صاحبا الصحيح، ولعلّ أبا هريرة إنما أتى بالموقوف عمن كان يجالسه من علماء أهل الكتاب، كعبد الله بن سلام وكعب الأحبار، والله أعلم.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 4/ 194، ومن طريقه البيهقي في "شعب الإيمان" (8272) من طريق أبي قتادة عبد الله بن واقد الحَرَّاني، عن حمّاد بن سلمة، بهذا الإسناد مرفوعًا. وابن واقد ليس بعمدة، ولا يوازي يزيد بن هارون، ولا يقاربه.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 1/ 30 عن معن بن عيس القزاز، عن مالك بن أنس، وابن أبي شَيْبة 9/ 58 و 13/ 61 عن عبدة بن سليمان، والبخاري في "الأدب المفرد" (1250) من طريق حماد بن زيد، والحسن بن علي بن عفّان في "الأمالي والقراءة" ص 24، وأبو عَرُوبة الحرّاني في "الأوائل" (24)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (8271)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 6/ 199 من طريق جعفر بن عون، ومحمد بن نصر المروزي كما في "التمهيد" لابن عبد البر 23/ 139 - ولعله في كتابه الكبير في اختلاف العلماء - من طريق يحيى بن سعيد القطان، وابن أبي الدنيا في "العيال" (580)، ومحمد بن نصر المروزي كما في "التمهيد" من طريق علي بن مسهر، كلهم عن يحيى بن سعيد الأنصاري، به.وسيأتي بعده كذلك عن أبي معاوية محمد بن خازم الضرير عن يحيى بن سعيد موقوفًا.وأخرجه محمد بن نصر المَروزي كما في "التمهيد" 23/ 138، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 6/ 198، وفي "تبيين الامتنان بالأمر بالختان" (17)، وابن الجوزي في "المنتظم" 1/ 276 - 277، وأبو القاسم الرافعي في "تاريخ قزوين" 2/ 43 من طريق أبي عمرو الأوزاعي، وابن حبان (6204) من طريق أبي قُرَّة موسى بن طارق، عن ابن جريج، كلاهما عن يحيى بن سعيد الأنصاري، مرفوعًا.وأخرجه معمر بن راشد في "الجامع" (20245)، ومالك في "الموطأ" برواية أبي مصعب الزهري (1929) عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن سعيد بن المسيب من قوله، دون ذكر أبي هريرة.وأخرجه ابن حبان (6205) من طريق قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، عن محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، مرفوعًا.وقد خالف الليث بن سعد في لفظه يحيى القطان عند أحمد 15/ (9622) إذ رواه عن محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، مرفوعًا، بلفظ: "اختتن إبراهيم وهو ابن ثمانين". ورواية القطان أرجح لموافقتها لرواية غير سعيد بن المسيب عن أبي هريرة، كما سيأتي ذكره.وأخرجه أحمد 14 / (8281) و 15/ (9408)، والبخاري (3356) و (6298)، ومسلم (2370) من طريق أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، مرفوعًا، بلفظ: "اختتن إبراهيم وهو ابن ثمانين سنة". فوافقت رواية يحيى القطان، عن ابن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة.وأخرجه البزار (7839)، وأبو يعلى (5981)، وابن عساكر 6/ 201 من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، مرفوعًا، كلفظ رواية الأعرج وعجلان عن أبي هريرة.
4066 - حدثنا عبد الله بن إسحاق البغوي ببغداد، حدثنا الحسن بن مُكْرَم البَزّاز، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن سَلَمة، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن سعيد بن المسيب، أن أبا هريرة قال: اختَتَن إبراهيم بعد عشرين ومئة سنة بالقدوم، ومات صلى الله عليه وسلم وهو ابن مئتي سنة [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবরাহীম (আঃ) একশত বিশ বছর বয়সের পর আল-কুদূম (কুঠার) দ্বারা খতনা করান। তিনি (আঃ) দু'শো বছর বয়সে ইনতিকাল করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح موقوفًا على أبي هريرة بهذا اللفظ، وقد خالف فيه يزيد بن هارون رجل آخر دونه في الثقة والجلالة بكثير، بل ترك حديثه قوم، وهو أبو قتادة عبد الله بن قتادة الحراني، فرواه عن حماد بن سلمة، فرفع الحديث، فلا يعتد بمخالفته.ووافق حمّاد بن سلمة على وقفه جماعة ذكرهم الدارقطني في "العلل" (1352)، منهم أبو معاوية الضرير كما في الرواية التالية، ومالك وحماد بن زيد ومعاوية بن صالح وابن عيينة وعيسى بن يونس ويحيى القطان وعبدة بن سليمان وجرير بن عبد الحميد وجعفر بن عون وعكرمة بن إبراهيم وعلي بن مُسهر في رواية عنه، فرووه عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن سعيد بن المسيب، موقوفًا. وخالفهم جماعة آخرون، فرووه عن يحيى بن سعيد الأنصاري مرفوعًا، ذكر الدارقطني منهم الأوزاعي ومحمد بن إسحاق وابن جريج في رواية أبي قرة موسى بن طارق عنه، ومالكًا والليث في روايةٍ عن ابن وهب عنهما جميعًا. ثم ذكرَ أنَّ غير موسى بن طارق رواه عن ابن جريج فذكر بينه وبين يحيى بن سعيد رجلًا هو إبراهيم بن محمد الأسلمي، قلنا: وهو متروك الحديث.وفيه اختلافٌ آخر عن يحيى بن سعيد الأنصاري، وهو أن بعضهم يرويه عنه عن سعيد بن المسيب مقطوعًا من قوله، رُوي ذلك عن مالك وعيسى بن يونس وابن عيينة ومعمر بن راشد.وممَّن رواه مرفوعًا أيضًا الليث بن سعد، عن محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة.لكن خالف الليث في لفظه يحيى القطان، وهو وهم ممَّن دون الليث كما سيأتي بيانه، فالأشبه أنه باللفظ المذكور موقوف من رواية سعيد بن المسيب عن أبي هريرة.وقد خالف سعيد بن المسيب غيره من أصحاب أبي هريرة، كالأعرج وأبي سلمة، فروياه عن أبي هريرة مرفوعًا بلفظ: "اختتن إبراهيم وهو ابن ثمانين"، وكذلك رواه عجلان مولى فاطمة عن أبي هريرة في رواية يحيى القطان، عن محمد بن عجلان، عن أبيه، فهذا هو المحفوظ في لفظ المرفوع، والمحفوظ في لفظ الموقوف على ما رواه سعيد بن المسيب عن أبي هريرة كما أشار إليه ابن عبد البر في "التمهيد" 23/ 140، قلنا: وإذا تعارضا قُدِّم ما في المرفوع، ولهذا اقتصر عليه صاحبا الصحيح، ولعلّ أبا هريرة إنما أتى بالموقوف عمن كان يجالسه من علماء أهل الكتاب، كعبد الله بن سلام وكعب الأحبار، والله أعلم.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 4/ 194، ومن طريقه البيهقي في "شعب الإيمان" (8272) من طريق أبي قتادة عبد الله بن واقد الحَرَّاني، عن حمّاد بن سلمة، بهذا الإسناد مرفوعًا. وابن واقد ليس بعمدة، ولا يوازي يزيد بن هارون، ولا يقاربه.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 1/ 30 عن معن بن عيس القزاز، عن مالك بن أنس، وابن أبي شَيْبة 9/ 58 و 13/ 61 عن عبدة بن سليمان، والبخاري في "الأدب المفرد" (1250) من طريق حماد بن زيد، والحسن بن علي بن عفّان في "الأمالي والقراءة" ص 24، وأبو عَرُوبة الحرّاني في "الأوائل" (24)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (8271)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 6/ 199 من طريق جعفر بن عون، ومحمد بن نصر المروزي كما في "التمهيد" لابن عبد البر 23/ 139 - ولعله في كتابه الكبير في اختلاف العلماء - من طريق يحيى بن سعيد القطان، وابن أبي الدنيا في "العيال" (580)، ومحمد بن نصر المروزي كما في "التمهيد" من طريق علي بن مسهر، كلهم عن يحيى بن سعيد الأنصاري، به.وسيأتي بعده كذلك عن أبي معاوية محمد بن خازم الضرير عن يحيى بن سعيد موقوفًا.وأخرجه محمد بن نصر المَروزي كما في "التمهيد" 23/ 138، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 6/ 198، وفي "تبيين الامتنان بالأمر بالختان" (17)، وابن الجوزي في "المنتظم" 1/ 276 - 277، وأبو القاسم الرافعي في "تاريخ قزوين" 2/ 43 من طريق أبي عمرو الأوزاعي، وابن حبان (6204) من طريق أبي قُرَّة موسى بن طارق، عن ابن جريج، كلاهما عن يحيى بن سعيد الأنصاري، مرفوعًا.وأخرجه معمر بن راشد في "الجامع" (20245)، ومالك في "الموطأ" برواية أبي مصعب الزهري (1929) عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن سعيد بن المسيب من قوله، دون ذكر أبي هريرة.وأخرجه ابن حبان (6205) من طريق قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، عن محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، مرفوعًا.وقد خالف الليث بن سعد في لفظه يحيى القطان عند أحمد 15/ (9622) إذ رواه عن محمد بن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة، مرفوعًا، بلفظ: "اختتن إبراهيم وهو ابن ثمانين". ورواية القطان أرجح لموافقتها لرواية غير سعيد بن المسيب عن أبي هريرة، كما سيأتي ذكره.وأخرجه أحمد 14 / (8281) و 15/ (9408)، والبخاري (3356) و (6298)، ومسلم (2370) من طريق أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، مرفوعًا، بلفظ: "اختتن إبراهيم وهو ابن ثمانين سنة". فوافقت رواية يحيى القطان، عن ابن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة.وأخرجه البزار (7839)، وأبو يعلى (5981)، وابن عساكر 6/ 201 من طريق محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، مرفوعًا، كلفظ رواية الأعرج وعجلان عن أبي هريرة.
4067 - فحدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا تميم بن محمد.وأخبرني أبو سعيد الأحمسي، حدثنا الحسين بن حميد بن الربيع؛ قالا: حدثنا عثمان بن أبي شيبة، حدثنا أبو معاوية، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، قال: اختَتَن إبراهيم بعد عشرين ومئة سنة بالقدوم، ثم عاش بعد ذلك ثمانين سنة [1].
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইবরাহীম (আঃ) একশত বিশ বছর বয়সে 'কাদূম' (নামক যন্ত্র) দ্বারা খাৎনা করেছিলেন। এরপর তিনি আরও আশি বছর জীবিত ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح موقوفًا على أبي هريرة بهذا اللفظ كسابقه. أبو معاوية: هو محمد بن خازم الضرير.
4068 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا حميد بن عيّاش الرَّمْلي، حدثنا مؤمَّل بن إسماعيل، حدثنا سفيان الثَّوْري، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مُضَرِّب، عن علي قال: لما أُمر إبراهيم ببناء البيتِ خرج معه إسماعيل وهاجَرُ، فلما قدم مكة رأى على رأسه في موضع البيتِ مثل الغَمامة فيه مثل الرأس، فكلَّمه، فقال: يا إبراهيم، ابنِ علي ظِلِّي - أو على قَدْري - ولا تَزِد ولا تنقص، فلما بنى خرج وخَلَّف إسماعيل وهاجَرَ، وذلك حين يقول الله عز وجل: {وَإِذْ بَوَّأْنَا لإِبْرَاهِيمَ مَكَانَ الْبَيْتِ أَنْ لَا تُشْرِكْ بِي شَيْئًا وَطَهِّرْ بَيْتِيَ لِلطَّائِفِينَ وَالْقَائِمِينَ وَالرُّكَّعِ السُّجُودِ} [الحج: 26] [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন ইবরাহীম (আঃ)-কে বাইতুল্লাহ নির্মাণের নির্দেশ দেওয়া হলো, তখন তাঁর সাথে ইসমাঈল (আঃ) এবং হাজেরা (আঃ) বের হলেন। যখন তিনি মক্কায় আসলেন, তখন তিনি বাইতুল্লাহর স্থানে তাঁর মাথার উপর মেঘের মতো কিছু দেখলেন, যার মধ্যে মাথার আকৃতি ছিল। সেটি তাঁর সাথে কথা বলল এবং বলল: হে ইবরাহীম, তুমি আমার ছায়ার উপর – অথবা বলল আমার পরিমাপের উপর ভিত্তি করে – নির্মাণ করো। এতে বাড়াবেও না, কমাবেও না। যখন তিনি নির্মাণ কাজ শেষ করলেন, তখন তিনি ইসমাঈল (আঃ) ও হাজেরা (আঃ)-কে রেখে চলে গেলেন। আর এটাই সেই সময়, যখন আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "স্মরণ করো, যখন আমি ইবরাহীমকে ঘরের স্থান ঠিক করে দিয়েছিলাম এই মর্মে যে, তুমি আমার সাথে কোনো কিছুকে শরীক করবে না এবং আমার গৃহকে তাওয়াফকারী, সালাতে দণ্ডায়মান, রুকুকারী ও সিজদাকারীদের জন্য পবিত্র রাখবে।" (সূরাহ আল-হাজ্জ: ২৬)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، مؤمل بن إسماعيل، سيئ الحفظ، وقد انفرد بإدراج قصة بناء البيت على هذا الترتيب الذي هنا، وخالفه غيره ممن روى قصة إبراهيم وهاجر عن حارثة بن مضرب عن علي بن أبي طالب، كإسرائيل في روايته عن جده أبي إسحاق عند ابن عبد الحكم في "فتوح مصر" ص 65، ويونس بن أبي إسحاق في روايته عن حارثة بن مضرب مباشرة عند الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (1375) وغيرهما، فلم يذكروا فيها قصة بناء البيت أول ذهاب إبراهيم بإسماعيل وهاجر إلى موضع البيت كما في رواية مؤمّل هنا، بل إنّ في سياق القصة برواية ابن عباس عند البخاري (3365) ما يدل على بناء البيت جاء متراخيًا عن قصة ترك إبراهيم ولده إسماعيل وأمه هاجر في موضع البيت، وأنَّ بناء البيت كان بعد أن كبر إسماعيل وتزوّج، وأنهما اشتركا معًا في بنائه، وهذا هو الموافق لنص القرآن.على أنه قد روي عن علي بن أبي طالب فيما تقدم برقم (1702) و (3192) من رواية خالد بن عرعرة عنه ما يدلُّ على أن إبراهيم وإسماعيل اشتركا في بناء البيت، وهذا يوافق رواية ابن عبّاس ويُنافي رواية مؤمَّل هذه.
4069 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سِنان القَزّاز، حدثنا أبو علي عُبيد الله بن عبد المجيد الحنفي، حدثنا إبراهيم بن نافع قال: سمعت كثير بن كَثير يُحدّث عن سعيد بن جبير، عن ابن عبّاس قال: جاء إبراهيم عليه السلام فوجد إسماعيل يُصلح له بيتًا من وراء زمزم، فقال له إبراهيم: يا إسماعيل، إن ربك قد أمرني [ببناء البيت] [1]، فقال له إسماعيل: فأطِعْ ربَّك فيما أمرك، قال: فأعِنِّي عليه، قال: فقام معه، فجعل إبراهيم يبنيه وإسماعيل يُناوله الحجارة، ويقولان: {رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا إِنَّكَ أَنْتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ} [البقرة: 127] [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইব্রাহীম (আঃ) এলেন এবং ইসমাঈলকে দেখতে পেলেন যে, তিনি যমযমের পেছনে তার (থাকবার) জন্য একটি ঘর তৈরি করছেন। তখন ইব্রাহীম তাকে বললেন: হে ইসমাঈল! আপনার প্রতিপালক আমাকে (বাইতুল্লাহ) ঘর নির্মাণের নির্দেশ দিয়েছেন। তখন ইসমাঈল তাকে বললেন: আপনার প্রতিপালক আপনাকে যা আদেশ করেছেন, তা আপনি পালন করুন। তিনি (ইব্রাহীম) বললেন: তাহলে আমাকে তাতে সাহায্য করুন। তিনি (ইসমাঈল) তার সাথে দাঁড়ালেন। অতঃপর ইব্রাহীম তা নির্মাণ করতে লাগলেন এবং ইসমাঈল পাথর এনে তাকে দিতে লাগলেন। আর তারা উভয়ে বলছিলেন: "হে আমাদের প্রতিপালক! আমাদের পক্ষ থেকে কবুল করুন। নিশ্চয় আপনিই সর্বশ্রোতা, সর্বজ্ঞ।" (সূরা আল-বাক্বারাহ, আয়াত: ১২৭)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] قوله: ببناء البيت، لم يرد في النسخ الخطية، وأثبتناه من المطبوع، ولا بد من ذكره، فقد ثبت في رواية محمد بن سنان القزاز عند الطبري في "تفسيره" 1/ 550 - 551، بلفظ: أمرني أن أبني له بيتًا. وهو ثابت لجميع من روى هذا الحديث من رواية غير محمد بن سنان أيضًا. وأخرجه يحيى بن سلّام في "تفسيره" 1/ 364 عن حمّاد بن سلمة، والطبري في "تفسيره" 17/ 144، وفي "تاريخه" 1/ 260 من طريق محمد بن فضيل، كلاهما عن عطاء بن السائب، به.وأخرج أحمد 4 / (2707) من طريق أبي الطفيل عامر بن واثلة، عن ابن عباس، ضمن حديث قال فيه ابن عباس: إنَّ إبراهيم لما أُمر أن يؤذن في الناس بالحج خَفَضَت له الجبال رؤوسها ورفعت له القرى، فأذن في الناس بالحج.وانظر ما سلف برقم (3505).
[2] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل محمد بن سنان القزاز، وهو متابع.وأخرجه البخاري (3365)، والنسائي (8321) من طريق أبي عامر عبد الملك بن عمرو العقدي، والنسائي (8321) من طريق عثمان بن عمر العبدي، كلاهما عن إبراهيم بن نافع، بهذا الإسناد. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه البخاري (3364)، والنسائي (8320) من طريق معمر، عن أيوب السختياني وكثير بن كثير، به. وأخرجه يحيى بن سلّام في "تفسيره" 1/ 364 عن حمّاد بن سلمة، والطبري في "تفسيره" 17/ 144، وفي "تاريخه" 1/ 260 من طريق محمد بن فضيل، كلاهما عن عطاء بن السائب، به.وأخرج أحمد 4 / (2707) من طريق أبي الطفيل عامر بن واثلة، عن ابن عباس، ضمن حديث قال فيه ابن عباس: إنَّ إبراهيم لما أُمر أن يؤذن في الناس بالحج خَفَضَت له الجبال رؤوسها ورفعت له القرى، فأذن في الناس بالحج.وانظر ما سلف برقم (3505).
4070 - أخبرنا أبو زكريا العَنْبري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا إسحاق، أخبرنا جرير، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عباس، قال: لما بنى إبراهيم البيت أوحى الله إليه أن أذِّنْ في الناس بالحج. قال: فقال إبراهيم: ألا إنَّ ربَّكم قد اتَّخذ بيتًا، وأمركم أن تحُجُّوه، فاستجاب له ما سمعه من حَجَرٍ أو شَجَرِ أو أَكَمَةٍ أو تُراب: لبيك اللهم لبيك [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন ইব্রাহিম (আঃ) কাবা ঘর নির্মাণ করলেন, আল্লাহ তাঁর প্রতি ওহী নাযিল করলেন যে, আপনি মানুষের মাঝে হজ্জের ঘোষণা দিন। তিনি (ইব্রাহিম আঃ) বললেন, জেনে রেখো! তোমাদের রব একটি ঘর তৈরি করেছেন এবং তোমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন যেন তোমরা এর হজ্জ করো। তখন পাথর, গাছপালা, টিলা অথবা মাটি—যা কিছু তাঁর এই ঘোষণা শুনতে পেয়েছিল, সব কিছুই সাড়া দিয়েছিল: লাব্বাইকা আল্লাহুম্মা লাব্বাইক (আমরা আপনার দরবারে হাজির, হে আল্লাহ! আমরা আপনার দরবারে হাজির)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. إسحاق: هو ابن راهويه، وجَرير: هو ابن عبد الحميد.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (3710) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه يحيى بن سلّام في "تفسيره" 1/ 364 عن حمّاد بن سلمة، والطبري في "تفسيره" 17/ 144، وفي "تاريخه" 1/ 260 من طريق محمد بن فضيل، كلاهما عن عطاء بن السائب، به.وأخرج أحمد 4 / (2707) من طريق أبي الطفيل عامر بن واثلة، عن ابن عباس، ضمن حديث قال فيه ابن عباس: إنَّ إبراهيم لما أُمر أن يؤذن في الناس بالحج خَفَضَت له الجبال رؤوسها ورفعت له القرى، فأذن في الناس بالحج.وانظر ما سلف برقم (3505).
4071 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العدل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا داود بن أبي هند، عن عكرمة، عن ابن عباس، قال: الإسلام ثلاثون سهمًا، وما ابتلي بهذا الدِّين أحدٌ فأقامه إلا إبراهيم عليه السلام، قال الله: {وَإِبْرَاهِيمَ الَّذِي وَفَّى} [النجم: 37]، فكتب الله له براءةً من النار [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইসলাম হলো ত্রিশটি অংশ (বা স্তর)। ইবরাহীম (আঃ) ছাড়া এই দ্বীন (ধর্ম) দ্বারা কেউই পরীক্ষিত হয়নি এবং তা পূর্ণভাবে প্রতিষ্ঠিতও করেনি। আল্লাহ বলেছেন: "আর ইবরাহীম, যিনি কর্তব্য পালন করেছিলেন।" [নাজম: ৩৭], তাই আল্লাহ তাকে জাহান্নাম থেকে মুক্তি লিখে দিয়েছেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل يحيى بن أبي طالب وعبد الوهاب بن عطاء - وهو الخَفَّاف - فهما صدوقان لا بأس بهما، وقد توبعا، فقد تقدم الخبر برقم (3795) من طريق وهيب بن خالد عن داود بن أبي هند. وقد ورد في سبب نزول الآية غير ذلك كما مضى برقم (3329 - 3331)، ولا يمتنع تعدد الأسباب للآية الواحدة كما قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 14/ 172.
4072 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجهم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عُمر، قال: فحدثني الثَّوْري، عن أبي إسحاق الهَمْداني، عن عبد الله بن الخَليل، قال: سمعت عَلِيًّا يقول: استغفر رجلٌ لأبويه وهما مُشركان، فقلتُ: أتستغفِرُ لهما وهما مُشركان؟ فقال: استغفرَ إبراهيم لأبيه، فذكرت ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فأنزل الله: {وَمَا كَانَ اسْتِغْفَارُ إِبْرَاهِيمَ لِأَبِيهِ إِلَّا عَنْ مَوْعِدَةٍ وَعَدَهَا إِيَّاهُ} [التوبة: 114] [1]. ذكرُ إسماعيل بن إبراهيم صلوات الله عليهما
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি তার মুশরিক পিতা-মাতার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করল। আমি তাকে বললাম: আপনি তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করছেন, অথচ তারা মুশরিক? তখন সে বলল: ইব্রাহিম (আঃ) তো তার পিতার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেছিলেন। অতঃপর আমি এই বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলাম। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "আর ইব্রাহীমের তার পিতার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা ছিল শুধু সেই প্রতিশ্রুতির কারণে, যা তিনি তাকে দিয়েছিলেন।" [সূরা তাওবা: ১১৪]
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وإسناده إلى الواقدي تقدم الكلام عليه برقم (4060)، ومحمد بن عمر الواقدي متابع، ومَن فوقه لا بأس بهم. الثوري: هو سفيان، وأبو إسحاق الهَمْداني: هو عمرو بن عبد الله السبيعي.وقد تقدم برقم (3328) من طرق عن سفيان الثوري. وقد ورد في سبب نزول الآية غير ذلك كما مضى برقم (3329 - 3331)، ولا يمتنع تعدد الأسباب للآية الواحدة كما قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 14/ 172.
4073 - أخبرنا الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا أبو يحيى بن أبي مَسَرّة، حدثنا إبراهيم بن المنذر الحِزَامي، حدثني عبد العزيز بن عمران، حدثني إسماعيل بن إبراهيم [1] بن أبي حبيبة، عن داود بن الحصين، عن عكرمة، عن ابن عباس، قال: أولُ مَن نَطق بالعربية، ووَضَعَ الكتاب على لفظه ومَنْطِقه، ثم جَعَله كتابًا واحدًا مثل: بسم الله الرحمن الرحيم الموصول، حتى فَرَّقَ بينه ولده: إسماعيل بن إبراهيم صلوات الله عليهما [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সর্বপ্রথম যিনি আরবী ভাষায় কথা বলেছিলেন এবং যার উচ্চারণ ও ভাষার ভিত্তিতে কিতাব (লিপি) স্থাপন করেছিলেন, অতঃপর তিনি তাকে একটি একক কিতাবে পরিণত করেছিলেন— যেমন সংযুক্ত 'বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম', যতক্ষণ না তাঁর পুত্র ইসমাঈল ইবনু ইবরাহীম (আলাইহিমাস সালাম) তা বিভক্ত করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا جاء اسمه في أصولنا، وهو خطأ بالتقديم والتأخير، وإنما هو إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، وهو خطأ قديم، إذ وقع أيضًا في أصل "شعب الإيمان" للبيهقي (1503) في روايته لهذا الخبر عن أبي عبد الله الحاكم.
[2] إسناده تالف، بمرة، عبد العزيز بن عمران واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وشيخه إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة ضعيف، ويخالف هذا الخبر صريحًا أثر ابن عباس الآخر الذي أخرجه البخاري (3364) أنَّ إسماعيل تعلَّم العربية من جرهم، كما نبه عليه الحافظ ابن حجر في "الفتح" 10/ 83.والصحيح أنَّ إسماعيل عليه السلام أول مَن فُتِقَ لسانه بالعربية المبينة وهو ابن أربع عشرة سنة، كما رواه علي بن أبي طالب بسندٍ حسَّنَه الحافظ في "الفتح" 10/ 83. وقال: الأولية في ذلك بحسب الزيادة في البيان، لا الأولية المطلقة، فيكون بعد تعلمه أصل العربية من جُرهم ألهمه الله العربية الفصيحة المبينة، فنطق بها.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (1503) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي خيثمة في "تاريخه" كما في "جامع الآثار" لابن ناصر الدين الدمشقي 2/ 28 عن الزبير بن بكار، عن إبراهيم بن المنذر، به.
4074 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو نعيم، حدثنا سفيان، عن أبيه، عن أبي الضُّحى، أظنُّه عن مسروق، عن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "إنَّ لكلِّ نبي ولاة من النبيين، وإن وليي وخليلي أبي إبراهيم"، ثم قرأ: {إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْرَاهِيمَ لَلَّذِينَ اتَّبَعُوهُ} [آل عمران: 68] [1].
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় প্রত্যেক নবীর জন্যই নবীদের মধ্যে থেকে বন্ধু ও সাহায্যকারী (ولاية) রয়েছে। আর নিশ্চয় আমার বন্ধু ও আমার খলীল (ঘনিষ্ঠ বন্ধু) হলেন আমার পিতা ইব্রাহিম।" অতঃপর তিনি তিলাওয়াত করলেন: "নিশ্চয় ইব্রাহিমের সাথে সম্পর্কের ক্ষেত্রে মানুষের মধ্যে তারাই সবচেয়ে ঘনিষ্ঠ যারা তাঁকে অনুসরণ করেছে।" (সূরা আল ইমরান: ৬৮)
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. كما قدمنا بيانه برقم (3189). أبو نعيم: هو الفضل بن دكين، وسفيان: هو ابن سعيد بن مسروق الثوري، وأبو الضُّحى: هو مسلم بن صُبيح، ومسروق: هو ابن عن الأجدع.وأخرجه الترمذي بإثر (2995) عن محمود بن غيلان، عن أبي نعيم، عن سفيان، عن أبيه، أبي الضحى، عن ابن مسعود. فلم يذكر في إسناده مسروقًا، لكن قدمنا برقم (3189) أن ذكر مسروق ثابت في الإسناد برواية جماعة من الحفاظ عن سفيان، وبرواية أبي الأحوص عن سعيد بن مسروق والد سفيان، والله أعلم.وسيأتي بعده من طريق محمد بن عمر الواقدي عن سفيان الثوري، بذكر مسروق في إسناده. (2366)، والطبراني 19/ (111)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 322 من طريق إسحاق بن راشد، والطبراني 19/ (112) من طريق الوليد بن مسلم، عن مالك بن أنس، ثلاثتهم (الأوزاعي وإسحاق بن راشد ومالك في رواية الوليد بن مسلم عنه) عن الزُّهْري به.وخالفهم آخرون فرووه مرسلًا:فقد أخرجه ابن سعد في "طبقاته" 10/ 203 عن محمد بن عمر الواقدي عن معمر بن راشد ومحمد بن عبد الله، وابن عبد الحَكَم في "فتوح مصر" ص 49 - 50 عن أشهب بن عبد العزيز وعبد الملك بن مسلمة عن مالك بن أنس، والبلاذري في "فتوح البلدان" ص 216، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 322 من طريق عبد الله بن وهب عن بن وهب عن مالك بن أنس والليث بن سعد، وابن عبد الحكم في "فتوح مصر" ص 50 عن عبد الله بن صالح ومحمد بن رمح عن الليث بن سعد، وص 50 من طريق سفيان بن عيينة، ومحمد بن إسحاق في "السيرة النبوية" كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 7، ومن طريق ابن إسحاق أخرجه ابن عبد الحَكَم ص 50، والطبري في "تاريخه" 1/ 247، وابن البخاري في "مشيخته" (836)، كلهم (معمر ومحمد بن عبد الله ومالك من رواية المذكورين عنه، والليث بن سعد وابن عيينة وابن إسحاق) عن الزهري، عن ابن كعب بن مالك مرسلًا. إلا أنَّ محمد بن إسحاق سمّى في روايته ابن كعب: عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك.ويشهد له حديث أبي ذر الغفاري عند مسلم (2543) رفعه: "إنكم ستفتحون أرضًا يُذكر فيها القيراط، فاستوصوا بأهلها خيرًا، فإنَّ لهم ذمة ورحمًا".
4075 - فحدَّثَناه أبو عبد الله بن بطة، حدثنا الحسن بن الجهم، حدثنا الحسين بن الفرج، حدثنا محمد بن عمر، حدثني الثَّوْري، عن أبيه، عن أبي الضُّحى، عن مسروق، عن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "إن لكل نبي ولاة من النبيين، وإن وليي منهم أبي وخليلي"، ثم قرأ النبي صلى الله عليه وسلم: {إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْرَاهِيمَ} إلى آخر الآية [1].حديث أبي نُعيم إذا جُمع بينه وبين حديث الواقدي صح، فإنه لا بُدَّ من مسروق.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই প্রত্যেক নবীর অন্যান্য নবীদের মধ্য থেকে অভিভাবক (বা উত্তরাধিকারী) রয়েছে। আর তাদের মধ্যে আমার অভিভাবক হলেন আমার পিতা ও আমার অন্তরঙ্গ বন্ধু (খলীল)।" এরপর নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পাঠ করলেন: "নিশ্চয় ইবরাহীমের সাথে সম্পর্কযুক্ত হওয়ার সবচেয়ে বেশি দাবিদার তারাই..." [সূরা আল ইমরান, ৩:৬৮] আয়াতের শেষ পর্যন্ত।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وإسناده إلى محمد بن عمر - وهو الواقدي - قدّمنا الكلام عليه برقم (4060)، ومحمد بن عمر الواقدي متابع، ومن فوقه ثقات. وانظر ما قبله. (2366)، والطبراني 19/ (111)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 322 من طريق إسحاق بن راشد، والطبراني 19/ (112) من طريق الوليد بن مسلم، عن مالك بن أنس، ثلاثتهم (الأوزاعي وإسحاق بن راشد ومالك في رواية الوليد بن مسلم عنه) عن الزُّهْري به.وخالفهم آخرون فرووه مرسلًا:فقد أخرجه ابن سعد في "طبقاته" 10/ 203 عن محمد بن عمر الواقدي عن معمر بن راشد ومحمد بن عبد الله، وابن عبد الحَكَم في "فتوح مصر" ص 49 - 50 عن أشهب بن عبد العزيز وعبد الملك بن مسلمة عن مالك بن أنس، والبلاذري في "فتوح البلدان" ص 216، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 322 من طريق عبد الله بن وهب عن بن وهب عن مالك بن أنس والليث بن سعد، وابن عبد الحكم في "فتوح مصر" ص 50 عن عبد الله بن صالح ومحمد بن رمح عن الليث بن سعد، وص 50 من طريق سفيان بن عيينة، ومحمد بن إسحاق في "السيرة النبوية" كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 7، ومن طريق ابن إسحاق أخرجه ابن عبد الحَكَم ص 50، والطبري في "تاريخه" 1/ 247، وابن البخاري في "مشيخته" (836)، كلهم (معمر ومحمد بن عبد الله ومالك من رواية المذكورين عنه، والليث بن سعد وابن عيينة وابن إسحاق) عن الزهري، عن ابن كعب بن مالك مرسلًا. إلا أنَّ محمد بن إسحاق سمّى في روايته ابن كعب: عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك.ويشهد له حديث أبي ذر الغفاري عند مسلم (2543) رفعه: "إنكم ستفتحون أرضًا يُذكر فيها القيراط، فاستوصوا بأهلها خيرًا، فإنَّ لهم ذمة ورحمًا".
4076 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا الحسن بن علي بن زياد، حدثنا إبراهيم بن موسى، حدثنا هشام بن يوسف، عن معمر، عن الزُّهْرِي، عن ابن كعب بن مالك، عن أبيه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إذا افتتحتُم مِصرَ، فاستوصوا بالقِبْط خيرًا، فإنَّ لهم ذمّةً ورَحِمًا" [1]. قال الزُّهْري: فالرَّحِمُ أنَّ أم إسماعيل منهم.هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
কা'ব ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমরা মিসর জয় করবে, তখন তোমরা কিবতী (Copts)দের সাথে উত্তম আচরণের উপদেশ গ্রহণ করবে। কারণ তাদের জন্য (আমাদের কাছে) রয়েছে চুক্তির বন্ধন এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক।" যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আত্মীয়তার সম্পর্ক হলো এই যে, ইসমাঈল (আঃ)-এর মাতা তাদের (মিশরীয়দের) থেকে ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وقد اختلف فيه على الزهري في وصله وإرساله. فأخرجه موصولًا الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (2364) و (2365)، والطبراني في "الكبير" 19/ (113)، وابن شاهين في "حديثه" برواية المحلّي (15) من طريق الأوزاعي، والطحاوي (2366)، والطبراني 19/ (111)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 322 من طريق إسحاق بن راشد، والطبراني 19/ (112) من طريق الوليد بن مسلم، عن مالك بن أنس، ثلاثتهم (الأوزاعي وإسحاق بن راشد ومالك في رواية الوليد بن مسلم عنه) عن الزُّهْري به.وخالفهم آخرون فرووه مرسلًا:فقد أخرجه ابن سعد في "طبقاته" 10/ 203 عن محمد بن عمر الواقدي عن معمر بن راشد ومحمد بن عبد الله، وابن عبد الحَكَم في "فتوح مصر" ص 49 - 50 عن أشهب بن عبد العزيز وعبد الملك بن مسلمة عن مالك بن أنس، والبلاذري في "فتوح البلدان" ص 216، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 322 من طريق عبد الله بن وهب عن بن وهب عن مالك بن أنس والليث بن سعد، وابن عبد الحكم في "فتوح مصر" ص 50 عن عبد الله بن صالح ومحمد بن رمح عن الليث بن سعد، وص 50 من طريق سفيان بن عيينة، ومحمد بن إسحاق في "السيرة النبوية" كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 7، ومن طريق ابن إسحاق أخرجه ابن عبد الحَكَم ص 50، والطبري في "تاريخه" 1/ 247، وابن البخاري في "مشيخته" (836)، كلهم (معمر ومحمد بن عبد الله ومالك من رواية المذكورين عنه، والليث بن سعد وابن عيينة وابن إسحاق) عن الزهري، عن ابن كعب بن مالك مرسلًا. إلا أنَّ محمد بن إسحاق سمّى في روايته ابن كعب: عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك.ويشهد له حديث أبي ذر الغفاري عند مسلم (2543) رفعه: "إنكم ستفتحون أرضًا يُذكر فيها القيراط، فاستوصوا بأهلها خيرًا، فإنَّ لهم ذمة ورحمًا".
4077 - أخبرنا أبو سعيد أحمد بن محمد الأحمسي بالكوفة، حدثنا الحسين بن حميد، حدثنا مروان بن جعفر السَّمُري، حدثنا حميد بن معاذ، حدثني مُدرِك بن عبد الرحمن، حدثنا الحسن بن ذَكْوان، عن الحسن، عن سمرة، عن كعب، قال: كان إسماعيل بن إبراهيم نبي الله الذي سمّاه صادق الوعد، وكان رجلًا فيه حِدة، يُجاهد أعداء الله ويُعطيه الله النصر عليهم والظَّفَرَ، وكان شديد الحرب على الكفار، لا يخافُ في الله لومة لائم، صغير الرأس، غليظ العُنق، طويل اليدين والرجلين، يَضرب بيديه ركبتيه وهو قائمٌ، صغير العينين، طويل الأنف، عريض الكتف، طويل الأصابع، بارِزَ الخَلْق، قوي شديدٌ عَنِيفٌ على الكفار، وكان يأمر أهله بالصلاة والزكاة، وكان عند ربه مرضيًّا، وكانت زكاته القُرْبانَ إلى الله من أموالهم، وكان لا يَعِدُ أحدًا شيئًا إلّا أنجزه، فسمّاه الله صادق الوعد، وكان رسولًا نبيًا [1].
সمرة (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর নবী ইসমাঈল ইবনে ইব্রাহীম (আঃ), যাঁকে আল্লাহ 'সাদিকুল ওয়াদ' (প্রতিশ্রুতি রক্ষাকারী) নামে অভিহিত করেছেন। তিনি ছিলেন একজন তেজস্বী পুরুষ। তিনি আল্লাহর শত্রুদের বিরুদ্ধে জিহাদ করতেন এবং আল্লাহ তাকে তাদের উপর বিজয় ও সফলতা দান করতেন। তিনি কাফেরদের বিরুদ্ধে প্রচণ্ড যুদ্ধ করতেন এবং আল্লাহর (পথে) কোনো নিন্দুকের নিন্দার ভয় করতেন না। তিনি ছিলেন ছোট মাথা, মোটা ঘাড়, লম্বা হাত ও পা বিশিষ্ট। যখন তিনি দাঁড়াতেন, তখন তার দুই হাত তার হাঁটু স্পর্শ করত। তিনি ছিলেন ছোট চোখ, লম্বা নাক, চওড়া কাঁধ, লম্বা আঙ্গুল এবং সুগঠিত দেহাকৃতির অধিকারী। তিনি ছিলেন শক্তিশালী, কঠোর এবং কাফেরদের উপর রূঢ়। তিনি তাঁর পরিবারকে সালাত ও যাকাতের নির্দেশ দিতেন এবং তিনি তাঁর রবের নিকট সন্তুষ্ট ছিলেন। আর তাদের ধন-সম্পদ থেকে আল্লাহর উদ্দেশ্যে কুরবানিই ছিল তাঁর যাকাত। তিনি কাউকে কোনো কিছুর প্রতিশ্রুতি দিলে তা অবশ্যই পূর্ণ করতেন। এজন্য আল্লাহ তাঁকে ‘সাদিকুল ওয়াদ’ (প্রতিশ্রুতি রক্ষাকারী) নামে অভিহিত করেছেন। তিনি ছিলেন একজন রাসূল ও নবী।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وهو كإسناد الرواية المتقدمة برقم (4059).
4078 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا يحيى بن معين، حدثنا يحيى بن اليمان، حدثنا سفيان، عن بَيَان، عن الشَّعْبي، عن ابن عباس، قال: الذَّبِيحُ إسماعيل [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, (কুরবানীর জন্য নির্দিষ্ট) যবীহ হলেন ইসমাঈল (আঃ)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل يحيى بن اليمان، لكنه متابع، وقد روي عن ابن عباس من طرق. سفيان: هو الثوري، وبيان: هو ابن بشر الأحمسي.وأخرجه ابن أبي خيثمة في "تاريخه" كما في "جامع الآثار" لابن ناصر الدين 2/ 21 عن يحيى بن معين، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 23/ 83، وفي "تاريخه" 1/ 267 من طريق يحيى بن سعيد القطان، عن سفيان الثوري، به.وأخرجه الطبري أيضًا في "التفسير" 23/ 83، وفي "التاريخ" 1/ 268 من طريق داود بن أبي هند، عن الشعبي، به.وسيأتي برقم (4082) من طريق شعبة عن بيان، وبرقم (4081) من طريق عطاء عن ابن عباس، وتقدَّم برقم (3654) من طريق مجاهد عن ابن عباس.وسيأتي خلافُ ذلك عن ابن عبّاس بأنَّ الذَّبيح هو إسحاق، كما في الروايات (4090) و (4090 م) و (4092)، لكن قال ابن كثير في "تفسيره" 7/ 24: الأظهر عن ابن عباس أنه إسماعيل، وكذلك قال ابن حجر في "الفتح" 22/ 420: أشهر الروايتين عن ابن عباس أنَّ الذَّبيح إسماعيل.وانظر تمام الكلام على هذا الخلاف عن ابن عباس فيما سيأتي برقم (4090 م).وانظر تحرير المسألة في أيهما الذبيح بإثر الرواية (4092 م).
4079 - حدثنا أبو محمد المُزَني، حدثنا محمد بن عبد الله الحضرمي، حدثنا الحسن بن حماد، حدثنا عبد الرحمن بن سليمان، عن إسرائيل، عن ثُوَير بن أبي فاختة، عن مجاهد، عن ابن عمر: {وَفَدَيْنَاهُ بِذِبْحٍ عَظِيمٍ} [الصافات: 107] قال: إسماعيل، عنه ذَبَحَ إبراهيم الكبش [1].
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহ তা‘আলার বাণী: “আর আমি তার পরিবর্তে দিলাম এক মহান যবেহ (কুরবানী)।” (সূরা আস-সাফফাত: ১০৭) এর ব্যাখ্যায় বলেন, (যাকে কুরবানী করার জন্য মনস্থ করা হয়েছিল তিনি ছিলেন) ইসমাঈল (আঃ)। তাঁর পরিবর্তে ইবরাহীম (আঃ) দুম্বা যবেহ (কুরবানী) করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، ثُوير بن أبي فاختة واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه". وقد روي من وجه آخر صحيح عن مجاهد من قوله لم يُجاوزه، وروي من وجه ثالث حسن عن مجاهد عن ابن عبّاس كما تقدم برقم (3654).وأخرجه ابن قتيبة في "المعارف" ص 37، والطبري في "تفسيره" 23/ 83، وفي "تاريخه" 1/ 267 من طريق يحيى بن يمان، عن إسرائيل، بهذا الإسناد.وأخرجه عبد الله بن وهب في التفسير من "جامعه" (306)، ويحيى بن سلام من "تفسيره" 2/ 839، وعبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 153، والطبري في "تفسيره" 23/ 84 و 85، وفي "تاريخه" 1/ 269، وابن المقرئ في "معجمه" (600) من طريقين عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد قوله.
4080 - حدثنا أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي، حدثنا عبيد بن حاتم الحافظ العِجْلي، حدثنا إسماعيل بن عُبيد بن أبي كَريمة الحَرّاني، حدثنا عمر بن عبد الرحيم الخطابي، حدثنا عبيد الله بن محمد العتبي - من ولد عتبة بن أبي سفيان -[عن أبيه] [1] قال: حدثنا عبد الله بن سعْد [عن] الصُّنابحي [2]، قال: حَضَرْنا مجلس معاوية بن أبي سفيان، فتذاكر القومُ إسماعيل وإسحاق بن إبراهيم، فقال بعضهم: الذبيح إسماعيل، وقال بعضهم: بل إسحاق الذبيح، فقال معاوية: سقطتُم على الخبير، كنا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فأتاه أعرابي، فقال: يا رسول الله، خلفتُ البلاد يابسةً والماء يابسًا، هَلَكَ المال، وضاعَ العِيالُ، فعُدْ عليّ بما أفاء الله عليك يا ابن الذبيحين، قال: فتبسّم رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يُنكر عليه، فقلنا: يا أمير المؤمنين، وما الذبيحان؟ قال: إنَّ عبد المطلب لما أمر بحفر زمزم، نَذَرَ الله إن سَهُل له أمرها أن يَنحَر بعض ولده، فأخرجهم فأسْهَم بينهم، فخرج السهم لعبد الله، فأراد ذَبحه، فَمَنَعَه أخواله من بني مخزوم، وقالوا: أرْضِ ربَّك وافْدِ ابنك، قال: ففَدَاه بمئة ناقة، قال: فهو الذَّبيح، وإسماعيل الثاني [3].
মুআবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা তাঁর মজলিসে উপস্থিত ছিলাম। সেখানে লোকেরা ইসমাঈল (আঃ) এবং ইসহাক ইবনু ইবরাহীম (আঃ) সম্পর্কে আলোচনা করছিল। কিছু লোক বলল: কুরবানি হওয়ার জন্য মনোনীত ছিলেন ইসমাঈল (আঃ)। অন্যরা বলল: বরং ইসহাক (আঃ) ছিলেন মনোনীত। মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা সঠিক তথ্যের সন্ধান পেয়েছো (অর্থাৎ আমার কাছে সঠিক তথ্য আছে)। আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম, তখন তাঁর কাছে একজন বেদুইন এসে বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি এমন এলাকা ছেড়ে এসেছি, যেখানে ভূমি শুষ্ক, পানিও শুষ্ক। সম্পদ বিনষ্ট হয়েছে এবং পরিবার পরিজন অভাবগ্রস্ত হয়েছে। হে দুই যবিহর (কুরবানি হতে যাওয়া ব্যক্তির) পুত্র! আল্লাহ আপনার প্রতি যা অনুগ্রহ করেছেন, তা থেকে আমাকে কিছু দিন।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুচকি হাসলেন এবং তার কথায় কোনো আপত্তি করলেন না। আমরা জিজ্ঞেস করলাম: হে আমীরুল মুমিনীন! দুই যবিহ কারা? তিনি বললেন: আব্দুল মুত্তালিব যখন যমযমের কূপ খননের নির্দেশ পেলেন, তখন তিনি আল্লাহর কাছে মানত করেন যে, যদি তিনি কাজটি সহজভাবে সম্পন্ন করতে পারেন, তবে তিনি তার কিছু সন্তানকে কুরবানি করবেন। তিনি সন্তানদের মধ্যে লটারী করলেন। আব্দুল্লাহর (রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিতা) নামে লটারী উঠল। তিনি তাকে যবেহ করতে চাইলেন। কিন্তু বনু মাখযূম গোত্রের তার মামারা তাকে বাধা দিলেন এবং বললেন: 'আপনি আপনার রবের সন্তুষ্টি বিধান করুন এবং আপনার সন্তানকে মুক্তিপণ দিন।' তিনি বললেন: তখন তিনি একশত উট দ্বারা তাকে মুক্তিপণ দিলেন। সুতরাং তিনি (আব্দুল্লাহ) হলেন প্রথম যবিহ (কুরবানি হতে যাওয়া ব্যক্তি), এবং ইসমাঈল (আঃ) হলেন দ্বিতীয় যবিহ।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] قوله: "عن أبيه" سقط من النسخ الخطية، وهو ثابت لجميع من خرَّج هذا الخبر، وأورد ابن عساكر في "تاريخ دمشق" الخبر في ترجمته، وسماه محمد بن الوليد بن عتبة بن أبي سفيان.
[2] تحرّف في النسخ الخطية إلى: عبد الله بن سعيد الضبابي، والتصويب من "إتحاف المهرة" (16852)، وعبد الله بن سعد: هو البجلي، والصنابحي: هو عبد الرحمن بن عُسيلة.
4080 [3] - إسناده ضعيف كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وذلك لجهالة من بين ابن أبي كريمة والصنابحي.وأخرجه أبو بكر بن أبي خيثمة في "تاريخه" كما في "جامع الآثار" لابن ناصر الدين 2/ 19، وقاسم بن ثابت في "الدلائل" كما في "جامع الآثار" أيضًا، والطبري في "تفسيره" 23/ 85، وفي "تاريخه" 1/ 263 - 264، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (6067)، وأبو الحسن الخِلَعي في "الخِلَعيات" (778)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 56/ 200 من طرق عن إسماعيل بن عبيد بن أبي كريمة، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبري في "تفسيره" 23/ 83، وفي "تاريخه" 1/ 268 عن محمد بن المثنى، بهذا الإسناد.وتقدَّم برقم (4078) من طريق سفيان الثوري عن بيان.