আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4121 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سليمان، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني داود بن قيس، عن زيد بن أسلم، في قول الله عز وجل: {أَصَلَاتُكَ تَأْمُرُكَ أَنْ نَتْرُكَ مَا يَعْبُدُ آبَاؤُنَا أَوْ أَنْ نَفْعَلَ فِي أَمْوَالِنَا مَا نَشَاء} [هود: 87]، قال: كان مما ينهاهم عنه حَذْفُ الدراهم - أو قال: قَطْعُ الدراهم - {فَأَخَذَهُمْ عَذَابُ يَوْمِ الظُّلَّةِ إِنَّهُ كَانَ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ} [الشعراء: 189]، قال: بعث إليهم ظُلَّةٌ من سَحابٍ، وبعث الله إلى الشمس فأحرقَتْ على الأرض، فخرجوا كلُّهم إلى تلك الظُّلَّة، حتى إذا اجتمعوا كلُّهم كشف الله عنهم الظُّلَّة، وأحمى عليهم الشمس، فاحترقُوا كما يحترِقُ الجَرادُ في المِقْلَى [1].
যায়দ ইবনু আসলাম থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহ তাআলার বাণী— {أَصَلَاتُكَ تَأْمُرُكَ أَنْ نَتْرُكَ مَا يَعْبُدُ آبَاؤُنَا أَوْ أَنْ نَفْعَلَ فِي أَمْوَالِنَا مَا نَشَاء} [হূদ: ৮৭]-এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন, যেসব কাজ থেকে তিনি (শুআইব আঃ) তাদের বারণ করতেন, সেগুলোর মধ্যে ছিল দিরহামের অংশ কেটে নেওয়া— অথবা তিনি (বর্ণনাকারী) বলেছেন: দিরহামকে টুকরা করা। {فَأَخَذَهُمْ عَذَابُ يَوْمِ الظُّلَّةِ إِنَّهُ كَانَ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ} [শুআরা: ১৮৯]-এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন: তাদের প্রতি মেঘের একটি আচ্ছাদন (ছায়া) পাঠানো হলো। আর আল্লাহ সূর্যকে আদেশ করলেন, ফলে তা ভূপৃষ্ঠে দহন সৃষ্টি করল। তখন তারা সকলে সেই আচ্ছাদনের (ছায়ার) দিকে বের হয়ে গেল। যখন তারা সবাই সেখানে একত্রিত হলো, আল্লাহ তাদের উপর থেকে সেই আচ্ছাদন সরিয়ে নিলেন এবং তাদের উপর সূর্যকে উত্তপ্ত করে দিলেন। ফলে তারা এমনভাবে জ্বলে-পুড়ে গেল, যেমন পাত্রের মধ্যে পঙ্গপাল জ্বলে-পুড়ে যায় [১]।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات.وأخرجه دون تفسير عذاب يوم الظُّلة: الطبري في "تفسيره" 12/ 102 عن يونس بن عبد الأعلى، عن عبد الله بن وهب، به.وأخرجه كذلك: الطبري في "تفسيره" 12/ 101 - 102، وفي "تاريخه" 1/ 329، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 6/ 2073، والحسين المحاملي في "أماليه" برواية ابن يحيى البيع (290) من طريق حماد بن خالد الخياط عن داود بن قيس، به. عامر: هو الشعبي، وأبو حمزة: هو محمد بن ميمون المروزي، وعَبْدان: هو عبد الله بن عثمان بن جَبَلة، وأبو الموجّه: هو محمد بن عمرو الفزاري.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 19/ 110، وفي "تاريخه" 1/ 329 من طريق أبي تُميلة يحيى بن واضح، عن أبي حمزة، به.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 9/ 2815 من طريق شيبان بن عبد الرحمن، عن جابر الجعفي، به.
4122 - أخبرنا أبو الحسن محمد بن عبد الله السُّنِّي بمَرْو، حدثنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا أبو حمزة، عن جابر، عن عامر، عن ابن عباس، قال: مَن حَدَّثك من العلماء ما عذاب يومِ الظُّلَّة، فكَذِّبْه [1]. ذكر يعقوب بن إسحاق بن إبراهيم الخليل صلوات الله عليهم
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আযাব ইয়াওমুল যুল্ল (ছায়াযুক্ত দিনের আযাব) কী ছিল, যদি কোনো আলেম তোমাকে সে সম্পর্কে জানায়, তবে তুমি তাকে মিথ্যাবাদী সাব্যস্ত করো। ইয়াকুব ইবনু ইসহাক ইবনু ইবরাহীম আল-খলীল (আলাইহিমুস সলওয়াতুল্লাহি আলাইহিম)-এর উল্লেখ করা হয়েছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف جابر - وهو ابن يزيد الجُعفي - والصحيح عن ابن عباس تفسيره لعذاب يوم الظُّلَّة، كما تقدم برقم (4118)، وشيخ المصنف هنا أبو الحسن السني متكلم في عدالته، لكنه لم ينفرد به، قد روي من غير طريقه. عامر: هو الشعبي، وأبو حمزة: هو محمد بن ميمون المروزي، وعَبْدان: هو عبد الله بن عثمان بن جَبَلة، وأبو الموجّه: هو محمد بن عمرو الفزاري.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 19/ 110، وفي "تاريخه" 1/ 329 من طريق أبي تُميلة يحيى بن واضح، عن أبي حمزة، به.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 9/ 2815 من طريق شيبان بن عبد الرحمن، عن جابر الجعفي، به.
4123 - أخبرنا بكر بن محمد الصَّيْرفي بمَرُو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل، حدثنا خلف بن الوليد، حدثنا إسرائيل، عن سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عبّاس، قال: يعقوب بن إسحاق بن إبراهيم هو إسرائيل [1]
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: ইয়াকুব ইবনু ইসহাক ইবনু ইবরাহীমই হলেন ইসরাঈল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل سماك بن حرب، وقد روي من غير وجه عن ابن عباس. إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السبيعي.وقد تقدم برقم (3455) من طريق عمرو بن العنقزي عن إسرائيل.وأخرجه ابن المنذر في "تفسيره" (698) من طريق سعيد بن جُبَير، عن ابن عباس. وإسناده جيد. أبي زرعة الرازي، ثلاثتهم عن عمرو بن حماد بن طلحة القَنَّاد، عن أسباط بن نصر، عن السَّدِّي لم يُجاوزوه. لكن الظاهر أن رواية موسى بن هارون مسندةٌ كرواية المُصنِّف هنا، وذلك أننا وجدنا باستقراء ما عند الطبري من رواية موسى بن هارون لنسخة تفسير السُّدِّي أن الطبري نَشِط في أول "التفسير" لذكر شيوخ السُّدِّي الذين تلقى عنهم حروف التفسير وأخبار الأنبياء، ومنهم: أبو مالك غزوان الغفاري وأبو صالح باذام مولى أم هانئ، وكلاهما أخذ عن ابن عباس، ومنهم مرة بن شراحيل الهَمْداني، وروايته عن ابن مسعود، وكذلك أخذ السُّدِّي عن جماعة من الصحابة أبهم ذكرهم، مباشرةً بلا واسطة، ثم صار الطبري يحذفهم بعد ذلك اختصارًا في رواية موسى بن هارون، ويقتصر على قوله: قال السُّدِّي. ومما يدل على ذلك ثبوت بعض الحروف عند الطبري في "تفسيره" لا يجاوز فيها السُّدِّيّ، مع أنه يأتي بها في "التاريخ" مسندةً بذكر شيوخ السدي.
4124 - أخبرني محمد بن إسحاق الصَّفّار، جدثنا أحمد بن نصر، حدثنا عمرو بن طلحة، حدثنا أسباط بن نضر، عن السُّدِّي، عن مُرَّة، عن عبد الله، قال: وأما الأسباطُ فهم بنو يعقوب: يوسف، وبن يامين، ورُوبيل، ويهوذا، وشَمعون، ولاوِي، ودان، وقَهَاث، كانوا اثني عشر رجلًا، نشَرَ الله منهم اثني عشر سِبْطًا لا يَعلَمُ أَنسابهم إلَّا اللهُ عز وجل، قال الله: {وَقَطَّعْنَاهُمُ اثْنَتَيْ عَشْرَةَ أَسْبَاطًا أُمَمًا} [الأعراف: 160] [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আসবাত (বংশসমূহ) হলো ইয়াকুবের সন্তানগণ: ইউসুফ, বিন ইয়ামিন, রুবীল, ইয়াহুজা, শিম'ঊন, লাবী, দান এবং ক্বাহাত। তারা ছিল বারোজন পুরুষ। আল্লাহ তাদের থেকে বারোটি গোত্রকে বিস্তৃত করেছেন, যাদের বংশধারা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা ছাড়া আর কেউ জানে না। আল্লাহ বলেছেন: "আর আমরা তাদেরকে বারোটি গোত্রে, বিভিন্ন জাতিতে বিভক্ত করেছিলাম।" (সূরা আল-আ'রাফ: ১৬০)
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن، وقد رواه جماعة عن عمرو بن طلحة - وهو عمرو بن حماد بن طلحة القناد - عن أسباط، عن السُّدِّي، فلم يجاوزوه، والسُّدِّي تلقى التفسير وأخبار الأنبياء عن جماعة، منهم مُرَّة - وهو ابن شراحيل الهَمْداني - ومُرَّة أخذ عن عبد الله: وهو ابن مسعود.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 1/ 568 عن موسى بن هارون، وابن المنذر في "تفسيره" (669) من طريق إسحاق بن راهويه، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 1/ 243 و 2/ 698 و 4/ 1118 عن أبي زرعة الرازي، ثلاثتهم عن عمرو بن حماد بن طلحة القَنَّاد، عن أسباط بن نصر، عن السَّدِّي لم يُجاوزوه. لكن الظاهر أن رواية موسى بن هارون مسندةٌ كرواية المُصنِّف هنا، وذلك أننا وجدنا باستقراء ما عند الطبري من رواية موسى بن هارون لنسخة تفسير السُّدِّي أن الطبري نَشِط في أول "التفسير" لذكر شيوخ السُّدِّي الذين تلقى عنهم حروف التفسير وأخبار الأنبياء، ومنهم: أبو مالك غزوان الغفاري وأبو صالح باذام مولى أم هانئ، وكلاهما أخذ عن ابن عباس، ومنهم مرة بن شراحيل الهَمْداني، وروايته عن ابن مسعود، وكذلك أخذ السُّدِّي عن جماعة من الصحابة أبهم ذكرهم، مباشرةً بلا واسطة، ثم صار الطبري يحذفهم بعد ذلك اختصارًا في رواية موسى بن هارون، ويقتصر على قوله: قال السُّدِّي. ومما يدل على ذلك ثبوت بعض الحروف عند الطبري في "تفسيره" لا يجاوز فيها السُّدِّيّ، مع أنه يأتي بها في "التاريخ" مسندةً بذكر شيوخ السدي.
4125 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الغَسِيلي، حدثنا الحسين بن عمرو بن محمد العَنْقَزِي، حدثنا أبي، حدثنا أسباط، عن السُّدِّي قال: تزوج إسحاق بن إبراهيم الخليل امرأةً، فحملت بغلامين في بطن، فلما أرادت أن تَضَعَ اقتَتَل الغلامان في بطنها، فأراد يعقوب أن يَخرُج قبل عيصا، فقال عيصا: والله إن خرجت قبلي لأعترضَنَّ في بطن أمي فلأقتُلَنّها، فتأخر يعقوب وخرج عيصا قبله، وأخذ يعقوبُ بعَقِبِ عيصا فخرج، فسُمِّي عيصا لأنه عَصَى فخرج قبل يعقوب، وسُمّي يعقوبَ لأنه خرج آخِذًا بعقِبِ عيصا، وكان أكبرهما في البطن، ولكنه عصى وخرج قبله، وكَبِرَ الغلامان، وكان عيصا أحبّهما إلى أبيه، وكان يعقوب أحبَّهما إلى أُمِّه، وكان عيصا صاحبَ صَيدٍ، فلما كَبِرَ إسحاقُ عَمِي؛ وذكر حديثًا طويلًا [1]. ذكر يوسف بن يعقوب صلوات الله عليهما
সুদ্দী থেকে বর্ণিত, ইসহাক ইবনু ইবরাহীম আল-খালীল (আঃ) এক মহিলাকে বিবাহ করলেন। তিনি পেটে দুটি পুত্রসন্তান ধারণ করলেন। যখন তার প্রসবের সময় হলো, তখন গর্ভের মধ্যে পুত্রদ্বয় মারামারি শুরু করে দিল। তখন ইয়াকূব (আঃ) চাইলেন যে তিনি ‘ঈসের আগে বের হবেন। কিন্তু ‘ঈস বলল: আল্লাহর কসম, যদি তুমি আমার আগে বের হও, তবে আমি আমার মায়ের গর্ভের মধ্যে বাঁকা হয়ে থাকব এবং তাকে (আমার মাকে) হত্যা করে ফেলব। এরপর ইয়াকূব (আঃ) পিছিয়ে গেলেন এবং ‘ঈস তার আগে বেরিয়ে আসলেন। আর ইয়াকূব (আঃ) ‘ঈসের গোড়ালি ধরে বেরিয়ে আসলেন। তাই তার নাম ‘ঈস রাখা হলো, কারণ সে অবাধ্যতা করেছিল (আসা) এবং ইয়াকূবের আগে বেরিয়েছিল। আর ইয়াকূবের নাম ইয়াকূব রাখা হলো, কারণ তিনি ‘ঈসের গোড়ালি ধরে বেরিয়ে এসেছিলেন। যদিও সে (ঈস) গর্ভের মধ্যে বড় ছিল, কিন্তু সে অবাধ্যতা করে আগে বের হলো। পুত্রদ্বয় বড় হলো। তাদের দুজনের মধ্যে ‘ঈস তার পিতার কাছে বেশি প্রিয় ছিল, আর ইয়াকূব তার মাতার কাছে বেশি প্রিয় ছিল। ‘ঈস শিকারী ছিল। ইসহাক (আঃ) যখন বৃদ্ধ হলেন, তখন তিনি অন্ধ হয়ে গেলেন। [এরপর বর্ণনাকারী একটি দীর্ঘ ঘটনা উল্লেখ করলেন।] ইউসুফ ইবনু ইয়াকূব (আঃ) এর আলোচনা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده واه كما قال الذهبي في "تلخيصه" وذلك من أجل إبراهيم بن إسحاق الغسيلي، فقد قال عنه ابن حبان: يقلب الأخبار ويسرق الحديث، وقال الخطيب البغدادي: غير ثقة، والحسين بن عمرو العَنْقَزي قال عنه أبو زرعة: كان لا يصدق، وقال أبو حاتم: لين يتكلمون فيه، وقال أبو كريب: حدّث عن إبراهيم بن يوسف السبيعي، وقد مات إبراهيم قبل أن يُولد، وقال أبو داود: كتبتُ عنه ولا أُحدِّث عنه، وقال ابن الجوزي في "المنتظم" 1/ 307: مثل هذا قبيحٌ أن يُذكر، لأنَّ يعقوب اسم أعجمي ليس بمشتقّ من العقب، ولا عيصا من المعصية، وإثبات خُصومةٍ بين حملين من أبعد الأشياء.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 1/ 319 عن الحسين بن عمرو العنقزي، بهذا الإسناد.
4126 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني.وحدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن غالب بن حَرْب وإسحاق بن الحسن بن ميمون؛ قالوا: حدثنا عفّان بن مُسلِم، حدثنا حماد بن سلمة، أخبرنا ثابت، عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "أُعطيَ يوسفُ وأمُّه شَطْرَ الحُسْنِ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "ইউসুফ ও তাঁর মাতাকে সৌন্দর্যের অর্ধাংশ প্রদান করা হয়েছিল।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، إلا أنه قد اختلف على عفان في ذكر أم يوسف، وأثبات أصحابه لا يذكرونها، وقد رواه جماعة غير عفان عن حماد فلم يذكروها، وهو المحفوظ.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 12/ 207، وفي "تاريخه" 1/ 330 عن أحمد بن ثابت وعبد الله بن محمد الرازيين، وابن عدي في "الكامل" 5/ 385 - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 69/ 185 - من طريق إبراهيم بن سعيد الجوهري، ثلاثتهم عن عفان بن مسلم، بهذا الإسناد.وأحمد بن ثابت غير ثقة، وعبد الله بن محمد الرازي لم نتبينه، والراوي عن إبراهيم بن سعيد عند ابن عدي مجهول الحال.وأخرجه أحمد 21 / (14050)، وابن أبي شَيْبة 4/ 396 و 11/ 565 كلاهما عن عفان بن مسلم، به - دون ذكر أم يوسف.وأخرجه الواحدي في "التفسير الوسيط" 2/ 611، والذهبي في "سير أعلام النبلاء" 10/ 364 من طريق موسى بن إسماعيل، والذهبي أيضًا 10/ 364 من طريق أبي عمر حفص بن عمر المهرقاني، كلاهما عن حماد بن سلمة، به. دون ذكرها أيضًا.وأخرجه ضمن حديث الإسراء والمعراج أحمد 19/ (12505) عن حسن بن موسى، ومسلم (162) عن شيبان بن فرُّوخ، كلاهما عن حماد بن سلمة، به، بلفظ: "فإذا أنا بيوسف، فإذا هو قد أُعطي شطر الحُسن".وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 7/ 2136 من طريق سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس موقوفًا عليه، بذكر يوسف وحده أيضًا. وفي الباب عن عبد الله بن مسعود موقوفًا عليه قال: أُعطي يوسف وأمه ثُلثَ الحُسن. أخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 6/ 295، وابن أبي شَيْبة 4/ 396، وإسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ ابن حجر (3451)، والطبري 12/ 27، والطبراني في "الكبير" (8555 - 8557). وصحح إسناده ابن حجر. لكن لفظ الطبراني في المواضع الثلاثة: ثلثي الحسن.وانظر حديث ربيعة الجُرَشي الآتي برقم (4130) موقوفًا عليه.
4127 - حدثنا مُكرَم بن أحمد القاضي ببغداد، حدثنا أحمد بن حيان بن مُلاعِب، حدثنا سعيد بن عامر، حدثنا محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الكريم ابن الكريم ابن الكريم [1] يوسف بن يعقوب بن إسحاق بن إبراهيم، نبي الله ابن نبي الله ابن نبي الله ابن خَليل الله" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই সম্মানিত, সম্মানিতের পুত্র, সম্মানিতের পুত্র হলেন ইউসুফ ইবনু ইয়াকুব ইবনু ইসহাক ইবনু ইবরাহীম, যিনি আল্লাহর নবী, আল্লাহর নবীর পুত্র, আল্লাহর নবীর পুত্র এবং আল্লাহর খলিলের (ঘনিষ্ঠ বন্ধুর) পুত্র।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] زاد في المطبوع: ابن الكريم، مرة رابعة، وليست في النسخ الخطية.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن، وقد تقدم برقم (3365) من طريق يزيد بن هارون عن محمد بن عمرو.
4128 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا شعبة، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، قال: جاء أسماء بن خارجة باب عبد الله بن مسعود، فقال: أنا ابن الأشياخ الكِرام، فقال عبد الله بن مسعود: ذاك يوسف بن يعقوب بن إسحاق بن إبراهيم [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসমা ইবনে খারিজা তাঁর (আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদের) দরজায় এসে বললেন: আমি সম্মানিত প্রবীণদের সন্তান। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনি (প্রকৃত সম্মানিত সন্তান) তো হলেন ইউসুফ ইবনে ইয়া‘কূব ইবনে ইসহাক ইবনে ইবরাহীম (আঃ)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي، وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك الأشجعي.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" 2/ 55، والطبري في "تفسيره" 23/ 81، وفي "تاريخه" 1/ 264، وابن أبي حاتم في ""تفسيره" 7/ 2145، والطبراني في "الكبير" (8916)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 9/ 52 من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد.
4129 - حدثنا أبو عبد الله الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى، حدثنا هُدبة، حدثنا حماد بن سلمة، عن يونس بن عُبيد، عن الحسن: أنَّ يوسف عليه السلام أُلقي في الجُبِّ وهو ابن ثنتي عشرة سنةً، ولقي أباه بعد الثمانين [1].
আল-হাসান থেকে বর্ণিত, ইউসুফ (আঃ)-কে যখন কূপে নিক্ষেপ করা হয়েছিল, তখন তাঁর বয়স ছিল বারো বছর। আর তিনি আশি বছর পর তাঁর পিতার সাথে মিলিত হন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن رواه غير حمّاد بن سلمة عن يونس - وهو ابن عبيد - فقالوا: أُلقي في الجُبّ وهو ابن سبع عشرة سنة، وكذلك رواه المبارك بن فضالة عن الحسن البصري. أبو عبد الله الحافظ: هو محمد بن يعقوب الأخرم.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 564 و 13/ 61، وأحمد في "الزهد" (421)، وفي "العلل" (3798)، والطبري في "تفسيره" 13/ 71، وابن أبي حاتم في "التفسير" 7/ 2202، وأبو بكر الدينوري في "المجالسة" (2802) من طريق إسماعيل ابن عُليّة، وابن عبد الحَكَم في فتوح مصر (ص) والطبري في تفسيره 13/ 71، وفي "تاريخه" 1/ 363 من طريق عبد الواحد بن زياد، والطبري في "تفسيره" 13/ 71 من طريق هُشيم بن بشير، ثلاثتهم عن يونس، عن الحسن: أنَّ يوسف أُلقي في الجُب وهو ابن سبع عشرة …وأخرجه كذلك آدم بن أبي إياس في "تفسيره" - المطبوع باسم "تفسير مجاهد"، وإنما هو له وليس لمجاهد - 1/ 321، والطبري في "تفسيره" 13/ 71، وفي "تاريخه" 1/ 363 من طريق المبارك بن فَضَالة، عن الحسن.
4130 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مِهران، حدثنا أبو نعيم، حدثنا سفيان، عن منصور، عن مجاهد، عن ربيعة الجُرَشي، قال: قسم الحُسنُ، فجعل ليوسف وسارة النصفُ، ولسائر الناس النصف [1].
রাবি'আ আল-জুরাশি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সৌন্দর্য ভাগ করা হয়েছিল। তখন ইউসুফ (আঃ) এবং সারাকে তার অর্ধেক দেওয়া হয়েছিল এবং বাকি অর্ধেক সমস্ত মানুষকে দেওয়া হয়েছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات. أبو نعيم: هو الفضل بن دُكين، وسفيان: هو الثوري، ومنصور: هو ابن المُعتمر، ومجاهد: هو ابن جَبر المكي.وأخرجه ابن أبي شَيبة 11/ 564، والطبري في "تفسيره" 12/ 207، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 7/ 2136، والخرائطي في "اعتلال القلوب" (339)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 69/ 185 من طريقين عن منصور، به.
4131 - أخبرني محمد بن يوسف العدل، حدثنا محمد بن عمران النَّسَوي، حدثنا أحمد بن زهير، حدثنا الفضل بن غانم، حدثنا سلمة بن الفضل، حدثني محمد بن إسحاق، عن روح بن القاسم، عن أبي هارون، عن أبي سعيد الخُدْري، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقولُ، وهو يَصِفُ يوسف حين رآه في السماء الثالثة، قال: "رأيتُ رجلًا صورته كصورة القمر ليلة البدر، فقلت: يا جبريلُ، مَن هذا؟ قال: هذا أخوك يوسف" [1]. قال ابن إسحاق: وكان الله قد أعطى يوسفَ من الحُسن والهَيئة ما لم يُعطِه أحدًا من الناس قبلَه ولا بعدَه، حتى كان يقال - والله أعلم -: إنه أُعطي نِصفَ الحُسن، وقُسمَ النصفُ الآخرُ بين الناس.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি— যখন তিনি ইউসুফ (আঃ)-কে তৃতীয় আসমানে দেখেছিলেন— তখন তিনি তাঁর বর্ণনা দিচ্ছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি এমন একজন পুরুষকে দেখলাম, যাঁর চেহারা পূর্ণিমার রাতের চাঁদের মতো। আমি বললাম, হে জিবরীল! ইনি কে? তিনি বললেন, ইনি আপনার ভাই ইউসুফ।" ইবনু ইসহাক বলেন, আল্লাহ তাআলা ইউসুফকে এমন সৌন্দর্য ও অবয়ব দান করেছিলেন, যা তাঁর আগে বা পরে আর কোনো মানুষকে দেননি। এমনকি বলা হতো—আল্লাহই ভালো জানেন— যে তাঁকে (ইউসুফকে) সৌন্দর্যের অর্ধেক প্রদান করা হয়েছিল এবং বাকি অর্ধেক সমস্ত মানুষের মধ্যে ভাগ করে দেওয়া হয়েছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل أبي هارون - وهو عُمارة بن جُوين العَبْدي - فهو متروك الحديث، والفضل بن غانم ضعيف أيضًا. وقد خولف سلمة بن الفضل في إسناده كما سيأتي.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 6/ 110 و 111 عن محمد بن جعفر بن حفص الرَّبَعي، عن الفضل بن غانم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 15/ 14، وفي "تهذيب الآثار" في مسند ابن عباس 1/ 132 عن محمد بن حميد الرازي، وأبو عثمان سعيد بن محمد البحيري في السابع من "فوائده" (169) من طريق عمار بن الحسن، كلاهما عن سلمة بن الفضل، به.وخالف سلمة بن الفضل في إسناده غيره من أصحاب محمد بن إسحاق:فأخرجه ابن هشام في "السيرة النبوية" 1/ 403 - 408 من طريق زياد بن عبد الله البكائي، وابن عدي في "الكامل" 6/ 111 من طريق إبراهيم بن سعد، كلاهما عن محمد بن إسحاق، عمن لا يَتّهم، عن أبي سعيد الخُدْري. كذا قال إبراهيم بن سعد، وقال البكائي في روايته: حدثني من لا أَتَّهِم عن أبي سعيد. فصرَّح بسماعه من ذلك الرجل المبهم والظاهر أنه روح بن القاسم، ولم يذكر أبا هارون العبدي، مع أنه هو راوي حديث الإسراء والمعراج عن أبي سعيد الخُدْري بلا شك، كما في رواية سلمة بن الفضل، وكذلك رواه جماعة غير روح بن القاسم عن أبي هارون العبدي.فقد أخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 365 - 368، والطبري في "تفسيره" 15/ 11 - 14، وفي "تهذيب الآثار" في مسند ابن عبّاس 1/ 427، والآجري في "الشريعة" (1027) من طريق معمر بن راشد، والبيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 396 من طريق نوح بن قيس الحُدّاني، والطبراني في "السنة" كما في "جامع الآثار" 3/ 1658 من طريق مبارك بن فضالة، ومن طريق سليمان بن كثير العبدي، وابن أبي حاتم في "تفسيره" كما في "تفسير ابن كثير" 5/ 23 من طريق عبد العزيز بن عبد الصمد العمّي، والحسن بن عرفة كما في "جامع الآثار" 3/ 1657 من طريق عمار بن محمد الثوري، والبيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 396 من طريق هُشيم بن بشير، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 390 - 396، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 3/ 509 من طريق أبي محمد راشد بن نجيح الحِمّاني، ثمانيتهم عن أبي هارون العَبْدي، به.
4132 - حدثنا أحمد بن سهل الفقيه ببُخاري، حدثنا صالح بن محمد بن حبيب الحافظ، حدثنا أحمد بن عِمران الأخنسي، حدثنا محمد بن فُضَيل، حدثنا يونس بن أبي إسحاق، عن أبي بُردة، عن أبي موسى: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نَزَل بأعرابيٍّ فأكرمَه، فقال له: "يا أعرابيُّ، سَلْ حاجتَك"، قال: يا رسول الله، ناقةٌ برَحْلِها، وأعنُزٌ يَحلُبها أهلي، قالها مرتين، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أعجَزْتَ أن تكون مثلَ عجُوزِ بني إسرائيل؟ "، فقال له أصحابه: يا رسول الله، وما عَجوزُ بني إسرائيل؟ قال: "إنَّ موسى أراد أن يَسيرَ ببني إسرائيل، فأضَلَّ عن الطريق، فقال له عُلماءُ بني إسرائيل: نحن نُحدِّثك: إنَّ يوسف أخذ علينا مَواثيقَ اللهِ أن لا نَخرُج من مصرَ حتى نَنقُلَ عِظامَه معنا، قال: وأيكم يدري أين قبرُ يوسف؟ قالوا: ما ندري أين قبرُ يوسفَ إلّا عجوزُ بني إسرائيل، فأرسل إليها، فقال لها: دُلِّيني على قبر يوسف، قالت: لا والله لا أفعَلُ حتى أكونَ معك في الجنة، قال: وكَرِه رسولُ الله ما قالت، فقيل له: أعطِها حُكمَها، فأعطاها حُكمَها، فأتت بُحَيرةً، فقالت: أَنضِبُوا هذا الماءَ، فلما نَضَّبُوه، قالت: احفِرُوا هاهنا، فلما حَفَروا إذا عظامُ يُوسفَ، فلما أقلُّوها من الأرض فإذا الطريقُ مثلُ ضَوْء النهارِ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জনৈক বেদুঈনের কাছে অবস্থান করলেন। সে তাঁকে যথেষ্ট আপ্যায়ন করল। অতঃপর তিনি তাকে বললেন, "হে বেদুঈন, তোমার প্রয়োজন চাও।" সে বলল, "ইয়া রাসূলুল্লাহ, একটি হাওদাসহ উট এবং কয়েকটি ছাগল, যা থেকে আমার পরিবার দুধ দোহন করতে পারে।" সে এই কথাটি দুইবার বলল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন, "তুমি কি বনী ইসরাইলের সেই বৃদ্ধার মতো হতে অক্ষম হলে?" তাঁর সাহাবীগণ তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন, "ইয়া রাসূলুল্লাহ, বনী ইসরাইলের সেই বৃদ্ধা কে?" তিনি বললেন, "মূসা (আঃ) যখন বনী ইসরাইলকে নিয়ে যাত্রা করতে চাইলেন, তখন তিনি পথ হারিয়ে ফেললেন। বনী ইসরাইলের পণ্ডিতগণ তাঁকে বললেন, 'আমরা আপনাকে বলছি, ইউসুফ (আঃ) আমাদের কাছ থেকে আল্লাহর নামে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে আমরা তার অস্থি সাথে নিয়ে মিসর ত্যাগ না করা পর্যন্ত যেন বের না হই।' মূসা বললেন, 'তোমাদের মধ্যে কে জানে ইউসুফের কবর কোথায়?' তারা বলল, 'বনী ইসরাইলের এক বৃদ্ধা ছাড়া ইউসুফের কবর কোথায় তা আমরা কেউ জানি না।' তিনি তার কাছে লোক পাঠালেন এবং তাকে বললেন, 'ইউসুফের কবর আমাকে দেখিয়ে দাও।' সে বলল, 'আল্লাহর শপথ, আমি এটা করব না, যতক্ষণ না আমি জান্নাতে আপনার সাথে থাকার নিশ্চয়তা পাই।' রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার এই কথা অপছন্দ করলেন। তখন তাঁকে বলা হলো, 'তাকে তার চাওয়া পূর্ণ করে দিন।' অতঃপর তিনি তার চাওয়া পূর্ণ করলেন। তখন সে একটি জলাশয়ের কাছে এলো এবং বলল, 'এই পানি শুকিয়ে ফেলো।' যখন তারা পানি শুকিয়ে ফেলল, তখন সে বলল, 'এখানে খনন করো।' যখন তারা খনন করল, তখন তারা ইউসুফের অস্থি দেখতে পেল। যখন তারা মাটি থেকে সেগুলো তুলল, তখন পথ দিনের আলোর মতো উজ্জ্বল হয়ে গেল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وأحمد بن عمران الأخنسي متابع كما تقدم برقم (3565).وأخرجه ابن حبان (723) عن أبي يعلى، عن أبي هشام محمد بن يزيد الرفاعي، عن محمد بن فُضيل، بهذا الإسناد.
4133 - أخبرني أبو سعيد أحمد بن محمد الأحمسي بالكوفة، حدثنا الحسين بن حُميد بن الربيع، حدثني الحسين بن علي السُّلَمي، حدثني محمد بن حسان، عن محمد بن جعفر بن محمد، عن أبيه، قال: كان عِلمُ الله وحِكمتُه في وَرَثة إبراهيم، فعند ذلك أتى اللهُ يوسفَ بنَ يعقوب مُلكَ الأرض المقدّسة، فمَلَكَ اثنتين وسبعين سنة، وذلك قوله فيما أنزل من كتابه: {رَبِّ قَدْ آتَيْتَنِي مِنَ الْمُلْكِ وَعَلَّمْتَنِي مِنْ تَأْوِيلِ الْأَحَادِيثِ} الآية [يوسف: 101] [1].
মুহাম্মাদ ইবনু জা'ফার ইবনু মুহাম্মাদ থেকে বর্ণিত, আল্লাহর জ্ঞান ও প্রজ্ঞা ইব্রাহীমের (আঃ) ওয়ারিশদের মধ্যে ছিল। অতঃপর আল্লাহ তা'আলা ইউসুফ ইবনু ইয়াকূবকে পবিত্র ভূমির রাজত্ব দান করেন। ফলে তিনি বাহাত্তর বছর রাজত্ব করেন। আর এটাই হলো তাঁর কিতাবে অবতীর্ণ আল্লাহর বাণী: {হে আমার প্রতিপালক, আপনি আমাকে রাজত্ব দান করেছেন এবং আমাকে স্বপ্নের ব্যাখ্যা শিক্ষা দিয়েছেন...} এই আয়াত (ইউসুফ: ১০১)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف بمرّةٍ، وقد تقدم الكلام على رجاله برقم (4055)، ولهذا قال الذهبي عن هذا الخبر في "تلخيصه": لم يصح.وسيتكرر بأطول مما هنا برقم (4151). في "المعجم الكبير" (9068) من طريق معاوية بن عمرو، كلاهما عن زهير بن معاوية، بهذا الإسناد.وأخرج منه ذكر ما بيع به يوسفُ: الطبريُّ في "تفسيره" 12/ 172 من طريق حميد بن عبد الرحمن، عن زهير بن معاوية، به.وأخرجه مقتصرًا عليه أيضًا الطبريُّ 12/ 172 من طريق شريك النخعي، عن أبي إسحاق السَّبيعي، به.وأخرج منه عِدّة الذين خرجوا مع موسى: الطبريُّ في "تفسيره" 19/ 75 من طريق إسرائيل، عن جده أبي إسحاق، به.وأخرجه أيضًا الطبري 19/ 75 من طريق سفيان الثوري، عن أبي إسحاق، عن أبي عُبيدة. لم يجاوزه.وأما قوله في الخبر: رجالهم أنبياء ونساؤهم صِدِّيقات، فلا دليل عليه. قال ابن كثير في "تفسيره" 4/ 300: اعلم أنه لم يَقُم دليل على نبوة إخوة يوسف، وظاهر هذا السياق يدل على خلاف ذلك (قلنا: يعني سياق الآيات الواردة في سورة يوسف في تآمرهم على قتله أو طرحه أرضًا ثم اتفاقهم على إلقائه في الجب) ومن الناس من يزعُم أنهم أوحي إليهم بعد ذلك، وفي هذا نظر، ويحتاج مُدّعي ذلك إلى دليل، ولم يذكروا سوى قوله تعالى: {قُولُوا آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنْزِلَ إِلَى إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطِ}، وهذا فيه احتمال، لأنَّ بطون بني إسرائيل يقال لهم: الأسباط، كما يقال للعرب: قبائل، وللعجم: شعوب، يذكر تعالى أنه أوحى إلى الأنبياء من أسباط بني إسرائيل، فذكرهم إجمالًا لأنهم كثيرون، ولكن كل سبط من نسل رجل من إخوة يوسف، ولم يَقُم دليل على أعيان هؤلاء أنهم أُوحي إليهم، والله أعلم.
4134 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان العامِري، حدثنا الحسين بن علي الجُعْفي، حدثنا الفُضَيل بن عِيَاض، قال: كان بين فِراقِ يوسف حِجْرَ يعقوبَ إلى أن التَقَيا ثمانون سنةً [1].
ফুযাইল ইবনু আয়াদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইউসুফ (আঃ) যখন ইয়াকুব (আঃ)-এর কোল ছেড়ে যান এবং পুনরায় যখন তাঁদের সাক্ষাৎ হয়, এর মধ্যবর্তী সময় ছিল আশি বছর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات. والصحيح أن المدة كانت أربعين سنة كما قاله سلمان الفارسي فيما سيأتي برقم (8398)، وقاله أيضًا عبد الله بن شداد بن الهاد فيما أخرجه عنه ابن أبي شَيْبة 11/ 82، وابن جَرير الطبري في "تفسيره" 13/ 69، لأنَّ هذا أوفق لما عند أهل الكتاب فيما نقله ابن إسحاق عند الطبري في "التفسير" 13/ 71، وفي "التاريخ" 1/ 364.وأخرج روايةَ الفضيلِ بن عياض ابن جَرير الطبري في "تفسيره" 13/ 70 عن سفيان بن وكيع، عن حسين بن علي، به. في "المعجم الكبير" (9068) من طريق معاوية بن عمرو، كلاهما عن زهير بن معاوية، بهذا الإسناد.وأخرج منه ذكر ما بيع به يوسفُ: الطبريُّ في "تفسيره" 12/ 172 من طريق حميد بن عبد الرحمن، عن زهير بن معاوية، به.وأخرجه مقتصرًا عليه أيضًا الطبريُّ 12/ 172 من طريق شريك النخعي، عن أبي إسحاق السَّبيعي، به.وأخرج منه عِدّة الذين خرجوا مع موسى: الطبريُّ في "تفسيره" 19/ 75 من طريق إسرائيل، عن جده أبي إسحاق، به.وأخرجه أيضًا الطبري 19/ 75 من طريق سفيان الثوري، عن أبي إسحاق، عن أبي عُبيدة. لم يجاوزه.وأما قوله في الخبر: رجالهم أنبياء ونساؤهم صِدِّيقات، فلا دليل عليه. قال ابن كثير في "تفسيره" 4/ 300: اعلم أنه لم يَقُم دليل على نبوة إخوة يوسف، وظاهر هذا السياق يدل على خلاف ذلك (قلنا: يعني سياق الآيات الواردة في سورة يوسف في تآمرهم على قتله أو طرحه أرضًا ثم اتفاقهم على إلقائه في الجب) ومن الناس من يزعُم أنهم أوحي إليهم بعد ذلك، وفي هذا نظر، ويحتاج مُدّعي ذلك إلى دليل، ولم يذكروا سوى قوله تعالى: {قُولُوا آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنْزِلَ إِلَى إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطِ}، وهذا فيه احتمال، لأنَّ بطون بني إسرائيل يقال لهم: الأسباط، كما يقال للعرب: قبائل، وللعجم: شعوب، يذكر تعالى أنه أوحى إلى الأنبياء من أسباط بني إسرائيل، فذكرهم إجمالًا لأنهم كثيرون، ولكن كل سبط من نسل رجل من إخوة يوسف، ولم يَقُم دليل على أعيان هؤلاء أنهم أُوحي إليهم، والله أعلم.
4135 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله بن دينار العدل، حدثنا أحمد بن نَضْر، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا زهير، عن أبي إسحاق، عن أبي عُبيدة، عن عبد الله، قال: إنما اشتُريَ يوسفُ بعشرين درهمًا، وكان أهلُه حين أَرسَلَ إليهم وهم بمصرَ ثلاثَ مئة وتسعين إنسانًا، رجالُهم أنبياءُ ونساؤهم صِدِّيقاتٌ، والله ما خرجُوا مع موسى حتى بلغوا ستَّ مئة ألف وسبعين ألفًا [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইউসুফকে (আঃ) মাত্র বিশ দিরহামের বিনিময়ে ক্রয় করা হয়েছিল। তিনি যখন (মিসরে আসার জন্য) তাদের কাছে লোক পাঠালেন, তখন মিশরে তারা তিনশো নব্বই জন মানুষ ছিল। তাদের পুরুষরা ছিল নবী এবং নারীরা ছিল সিদ্দীকা (পরম সত্যবাদী)। আল্লাহর শপথ! তারা মূসা (আঃ)-এর সাথে (মিশর থেকে) বের হয়নি, যতক্ষণ না তাদের সংখ্যা ছয় লক্ষ সত্তর হাজারে পৌঁছেছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، أبو عُبيدة - وهو ابن عبد الله بن مسعود - لم يسمع من أبيه، وزهير - وهو ابن معاوية - ممن سمع من أبي إسحاق. وهو السَّبيعي - بعد تغيُّره، لكن توبع زهير على ذكر ما بِيع به يوسفُ، وعلى عِدَّة الذين خرجوا مع موسى، دون ما سواه من الخبر.وأخرجه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 7/ 2196 من طريق عبد الله بن محمد النُّفَيلي، والطبراني في "المعجم الكبير" (9068) من طريق معاوية بن عمرو، كلاهما عن زهير بن معاوية، بهذا الإسناد.وأخرج منه ذكر ما بيع به يوسفُ: الطبريُّ في "تفسيره" 12/ 172 من طريق حميد بن عبد الرحمن، عن زهير بن معاوية، به.وأخرجه مقتصرًا عليه أيضًا الطبريُّ 12/ 172 من طريق شريك النخعي، عن أبي إسحاق السَّبيعي، به.وأخرج منه عِدّة الذين خرجوا مع موسى: الطبريُّ في "تفسيره" 19/ 75 من طريق إسرائيل، عن جده أبي إسحاق، به.وأخرجه أيضًا الطبري 19/ 75 من طريق سفيان الثوري، عن أبي إسحاق، عن أبي عُبيدة. لم يجاوزه.وأما قوله في الخبر: رجالهم أنبياء ونساؤهم صِدِّيقات، فلا دليل عليه. قال ابن كثير في "تفسيره" 4/ 300: اعلم أنه لم يَقُم دليل على نبوة إخوة يوسف، وظاهر هذا السياق يدل على خلاف ذلك (قلنا: يعني سياق الآيات الواردة في سورة يوسف في تآمرهم على قتله أو طرحه أرضًا ثم اتفاقهم على إلقائه في الجب) ومن الناس من يزعُم أنهم أوحي إليهم بعد ذلك، وفي هذا نظر، ويحتاج مُدّعي ذلك إلى دليل، ولم يذكروا سوى قوله تعالى: {قُولُوا آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنْزِلَ إِلَى إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطِ}، وهذا فيه احتمال، لأنَّ بطون بني إسرائيل يقال لهم: الأسباط، كما يقال للعرب: قبائل، وللعجم: شعوب، يذكر تعالى أنه أوحى إلى الأنبياء من أسباط بني إسرائيل، فذكرهم إجمالًا لأنهم كثيرون، ولكن كل سبط من نسل رجل من إخوة يوسف، ولم يَقُم دليل على أعيان هؤلاء أنهم أُوحي إليهم، والله أعلم.
4136 - أخبرني أبو سعيد الأحمَسي، حدثنا الحسين بن حُميد، حدثنا مروان بن جعفر السَّمُري، حدثني حُميد بن معاذ، حدثني مُدرِك بن عبد الرحمن، حدثنا الحسن بن ذَكْوان، عن الحسن، عن سَمُرة، عن كعب، قال: ثم وُلِد ليعقوبَ يوسفُ الصِّدِّيق الذي اصطفاهُ الله واختارَه وأكرمَه، وقَسَمَ له من الجَمَالِ الثُّلثَين، وقَسَمَ بين عباده الثُّلث، وكان يُشبِه آدمَ يومَ خَلَقَهُ اللهُ وصَوَّره ونفخَ فيه من رُوحه قبل أن يُصيب المعصيةَ، فلما عصى آدمُ نُزِع منه النورُ والبهاءُ والحُسنُ، وكان الله أعطى آدمَ الحُسنَ والجَمالَ والنورَ والبهاءَ يوم خَلَقه، فلما فَعَل ما فعل وأصاب الذنبَ، نُزع ذلك منه، ثم وَهَبَ اللهُ لآدم الثُّلُث من الجمال مع التوبة الذي تاب عليه، ثم إنَّ الله أعطى يوسفَ الحُسنَ والجَمالَ والنورَ والبَهاءَ الذي كان نزعَه مِن آدم حين أصابَ الذّنْبَ، وذلك أنَّ الله أحبَّ أن يُريَ العبادَ أنه قادرٌ على ما يشاء، وأعطى يوسفَ من الحُسن والجَمال ما لم يُعطِه أحدًا من الناس، ثم أعطاهُ اللهُ العِلمَ بتأويل الرؤيا، وكان يُخبِرُ بالأمر الذي رآه في منامه أنه سيكون قبل أن يكون، عَلَّمه الله كما عَلَّم آدمَ الأسماءَ كلَّها، وكان إذا تبسَّم رأيتَ النورَ في ضَواحِكِه، وكان إذا تكلَّم رأيتَ شُعاعَ النورِ في كلامِه ويَلتهِبُ التهابًا بين ثَناياه [1].قد اختصرتُ من أخبار يوسفَ عليه السلام ما صَحَّ إليه الطريقُ، ولو أخذتُ في عجائبِ وهب بن مُنبِّه وأبي عبد الله الواقِدي لطالتِ الترجمةُ بها. ذكر النبيِّ الكَلِيم موسى بن عِمران وأخيه هارون بن عِمران
সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অতঃপর ইয়াকুবের জন্য ইউসুফ আস-সিদ্দিক জন্মগ্রহণ করলেন, যাঁকে আল্লাহ মনোনীত করেছেন, নির্বাচন করেছেন এবং সম্মানিত করেছেন। আর তিনি তাঁকে সৌন্দর্যের দুই-তৃতীয়াংশ প্রদান করেন এবং তাঁর অন্যান্য বান্দাদের মাঝে এক-তৃতীয়াংশ ভাগ করে দেন। তিনি সেই আদম (আঃ)-এর মতো দেখতে ছিলেন, যখন আল্লাহ তাঁকে সৃষ্টি করেছিলেন, তাঁর আকৃতি দান করেছিলেন এবং তাঁর মাঝে রূহ ফুঁকে দিয়েছিলেন— যখন তিনি কোনো পাপ করেন নি। অতঃপর যখন আদম (আঃ) অবাধ্য হলেন, তখন তাঁর কাছ থেকে নূর, জৌলুস ও সৌন্দর্য তুলে নেওয়া হলো। আল্লাহ যখন আদমকে সৃষ্টি করেছিলেন, তখন তাঁকে সৌন্দর্য, কমনীয়তা, নূর ও জৌলুস দান করেছিলেন। কিন্তু যখন তিনি (নিষিদ্ধ কাজটি) করলেন এবং পাপ করলেন, তখন তা তাঁর থেকে তুলে নেওয়া হলো। অতঃপর আল্লাহ যখন আদমের তওবা কবুল করলেন, তখন তাঁকে সৌন্দর্যের এক-তৃতীয়াংশ দান করলেন। এরপর আল্লাহ ইউসুফকে সেই সৌন্দর্য, কমনীয়তা, নূর ও জৌলুস দান করলেন যা তিনি আদম (আঃ) পাপ করার সময় তাঁর কাছ থেকে তুলে নিয়েছিলেন। আর এটা এই কারণে যে, আল্লাহ বান্দাদেরকে দেখাতে পছন্দ করলেন যে তিনি যা ইচ্ছা, তাই করতে সক্ষম। আর ইউসুফকে এমন সৌন্দর্য ও কমনীয়তা দান করলেন যা তিনি অন্য কোনো মানুষকে দেননি। অতঃপর আল্লাহ তাঁকে স্বপ্নের ব্যাখ্যা (তা'বীল) করার জ্ঞান দান করলেন। তিনি স্বপ্নে যা দেখতেন, তা বাস্তবে সংঘটিত হওয়ার আগেই বলে দিতেন যে তা ঘটবে। আল্লাহ তাঁকে তা শিক্ষা দিয়েছেন, যেমন তিনি আদমকে সমস্ত নাম শিখিয়েছিলেন। তিনি যখন মুচকি হাসতেন, তখন তাঁর দাঁতের উজ্জ্বলতায় নূর দেখতে পেতে। আর তিনি যখন কথা বলতেন, তখন তাঁর কথা থেকে নূরের আভা বের হতে দেখতে পেতে, যা তাঁর সামনের দাঁতের মধ্য দিয়ে ঝলসে উঠত।
[আমি ইউসুফ (আঃ)-এর সেই সকল সংবাদ সংক্ষেপে বর্ণনা করেছি যার সূত্র সহীহ। যদি আমি ওয়াহব ইবনু মুনাব্বিহ ও আবূ আব্দুল্লাহ আল-ওয়াকিদীর বর্ণিত আশ্চর্যজনক বিষয়গুলো ধরতাম, তবে অনুবাদ দীর্ঘ হয়ে যেত। কালিমুল্লাহ মূসা ইবনু ইমরান ও তাঁর ভাই হারুন ইবনু ইমরানের আলোচনা।]
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، وقد تقدم الكلام على رجاله برقم (4059). الحسن: هو البصري، وسمرة: هو ابن جندب، وكعب: هو ابن ماتِع الحِمْيَري المعروف بكعب الأحبار. 1/ 366: رسول الله صلى الله عليه وسلم كان أعلم خَلْق الله بالكائن من الأمور الماضية، والكائن منها الذي لم يكن بعدُ.
4137 - حدثنا أبو الحسن محمد بن أحمد بن شَبَّوَيهِ الرئيس بمَرْو، حدثنا جعفر بن محمد النَّيسابُوري، حدثنا علي بن مِهْران، حدثنا سلمة بن الفضل، حدثني محمد بن إسحاق، قال: وُلِد موسى بن مِيْشا بن يوسف بن يعقوب، فتنبّأ في بني إسرائيل قبل موسى بن عِمران فيما يَزعُمون، ويزعمُ أهل التيقُّن بها أنه هو الذي طلب العالِمَ ليتعلَّمَ منه حتى أدركَ العالِمَ الذي خَرَق السفينةَ، وقَتلَ الغُلامَ، وبنى الجِدار، وموسى بن مِيْشا معه، ثم انصرف عنه حتى بَلَغَ مَا بَلَغَ [1]. قال الحاكم: هكذا يَذكُر محمد بن إسحاق، ويُستَدَلُّ بالحديث الثابت الصحيح [2] عن عمرو بن دينار عن سعيد بن جُبَير، قال: قلت لابن عبّاس: إنَّ نَوفًا [3] البِكَاليّ يزعُم أنَّ موسى صاحِبَ الخَضِر ليس موسى بنَ عِمران صاحبَ بني إسرائيل، إنما هو موسى آخر، فقال ابن عبّاس: كَذَبَ عدوُّ الله، حدثنا أُبيُّ بن كعبٍ أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "قام موسى بنُ عِمران خَطيبًا في بني إسرائيل" الحديثَ بطولِه.هذا حديث مُخرَّج في "الصحيحين"، وإنما حَمَلَني على ذِكْره [4]، لأني تركتُ ذِكْرَه من الوَسَطِ.فأما موسى بن عِمران الكَلِيمُ:
আবু আল-হাসান মুহাম্মাদ ইবনু আহামাদ ইবনু শাবওয়াইহ আর-রঈস মার্ভ থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি জা'ফর ইবনু মুহাম্মাদ আন-নাইসাপুরী থেকে, তিনি আলী ইবনু মিহরান থেকে, তিনি সালামাহ ইবনু আল-ফাদল থেকে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক থেকে, যিনি বলেন: মূসা ইবনু মীশা ইবনু ইউসুফ ইবনু ইয়া'কূব জন্মগ্রহণ করেন। তাদের ধারণা মতে, তিনি মূসা ইবনু 'ইমরান (আঃ)-এর পূর্বেই বনী ইসরাঈলের মধ্যে নবুওয়াত লাভ করেন। আর যারা এই বিষয়ে নিশ্চিত, তারা মনে করেন যে, এই মূসা-ই সেই ব্যক্তি, যিনি (খিদির নামক) আলিমের কাছ থেকে জ্ঞান অর্জনের জন্য তাঁর সন্ধান করেন। তিনি সেই আলিমকে খুঁজে পান, যিনি নৌকা ছিদ্র করেছিলেন, বালকটিকে হত্যা করেছিলেন এবং প্রাচীর নির্মাণ করেছিলেন। মূসা ইবনু মীশা তাঁর সাথে ছিলেন। অতঃপর তিনি (খিদির) সেখান থেকে ফিরে যান এবং যা পৌঁছানোর তা পৌঁছান।
আল-হাকিম বলেন: মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক এভাবেই উল্লেখ করেছেন। তবে আমর ইবনু দীনার, তিনি সাঈদ ইবনু জুবাইর থেকে বর্ণিত সহীহ ও প্রমাণিত হাদীস দ্বারা এর বিরুদ্ধে প্রমাণ পেশ করা হয়। সাঈদ ইবনু জুবাইর বলেন: আমি ইবনু আব্বাসকে বললাম: নাওফ আল-বিকালী দাবি করে যে, যিনি খিদির (আঃ)-এর সঙ্গী ছিলেন, তিনি বনী ইসরাঈলের নবী মূসা ইবনু 'ইমরান ছিলেন না, বরং তিনি ছিলেন অন্য এক মূসা।
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আল্লাহর দুশমন মিথ্যা বলেছে! উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "মূসা ইবনু 'ইমরান বনী ইসরাঈলের মাঝে দাঁড়িয়ে ভাষণ দিচ্ছিলেন।" অতঃপর তিনি পুরো হাদীসটি বর্ণনা করেন।
এই হাদীসটি 'সহীহাইন'-এ (বুখারী ও মুসলিমে) সংকলিত হয়েছে। আমি এটি উল্লেখ করেছি, কারণ আমি এর অংশ বিশেষকে (আগে) ছেড়ে গিয়েছিলাম। আর মূসা ইবনু 'ইমরান আল-কালীম (আল্লাহর সাথে কথোপকথনকারী) সম্পর্কে... (বাক্য অসমাপ্ত)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذا الذي قاله ابن إسحاق هو قول أهل التوراة، كما قال ابن قُتَيبة في "المعارف" 1/ 41، وكما تدلُّ عليه الرواية التي سيشير إليها المصنّف عن نَوف البِكالي، وهو نَوف بن فَضالة ابن امرأة كعب الأحبار، والظنُّ أنَّ نَوفًا أخذه عن كعب الأحبار، وكذّب حبرُ الأمة ابن عبّاس خبرَ أهل التوراة هذا مستدلًا بما سمعه من أبيّ بن كعب عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال الطبري في "تاريخه" 1/ 366: رسول الله صلى الله عليه وسلم كان أعلم خَلْق الله بالكائن من الأمور الماضية، والكائن منها الذي لم يكن بعدُ.
[2] أخرجه البخاري (122)، ومسلم (2380).
4137 [3] - جاء اسم "نوف" في النسخ الخطية بحذف ألف النصب، مع أن حقه النصب لكونه اسم "إن"، وكذلك جاء هذا الاسم في رواية البخاري في فرع الغُزُولي من "الصحيح"، وهو من أجود فروع اليونينية، كما نبّه عليه القسطلّاني في "الإرشاد" 7/ 227، وذلك جائز على لغة رَبيعة، بأن يكون "نوف" منصوبًا في اللفظ إلا أنه يكتب بلا ألف، وما أثبتناه هو اللغة العالية الفصيحة.
4137 [4] - يعني على ذكر موسى بن ميشا.
4138 - فحدَّثَنا أبو محمد عبد الرحمن بن حَمْدان الجَلّاب بِهَمَذَان، حدثنا أبو حاتم محمد بن إدريس الحَنْظَلي، حدثنا عبد الله بن داهِر بن يحيى الرازي، حدثنا أبي، عن الأعمش، عن عَبَاية الأسدي، قال: سمعتُ عبد الله بن عبّاس يقول: إنَّ الله يقول في كتابه لموسى بن عِمران: {إِنِّي اصْطَفَيْتُكَ عَلَى النَّاسِ بِرِسَالَاتِي وَبِكَلَامِي فَخُذْ مَا آتَيْتُكَ وَكُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ}، قال: {وَكَتَبْنَا لَهُ فِي الْأَلْوَاحِ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ مَوْعِظَةً وَتَفْصِيلًا} [الأعراف: 144 - 145]، فكان موسى يَرى أنَّ جميع الأشياء قد أُثبتت له، كما ترون أنتم أن علماءكم قد أثبتُوا لكم كلَّ شيءٍ، وكما يُثبِتُوه، فلما انتهى موسى إلى ساحِلِ البحر لقي العالِمَ فاستَنْطَقه فأقرَّ له بفَضْل علمه ولم يَحسُده، فقال له موسى ورَغِبَ إليه: {هَلْ أَتَّبِعُكَ عَلَى أَنْ تُعَلِّمَنِ مِمَّا عُلِّمْتَ رُشْدًا} فعَلِمَ العالِمُ أنَّ موسى لا يُطيق صحبتَه، ولا يصبر على عِلْمِه، فقال له العالِمُ: إنك لا تَستطيعُ معي صَبْرًا، {وَكَيْفَ تَصْبِرُ عَلَى مَا لَمْ تُحِطْ بِهِ خُبْرًا} [الكهف: 68]؟! فقال له موسى وهو يعتذر: {سَتَجِدُنِي إِنْ شَاءَ اللَّهُ صَابِرًا وَلَا أَعْصِي لَكَ أَمْرًا}، فعَلِم أنَّ موسى لا يَصبِرُ على عِلْمِه، فقال له: {فَإِنِ اتَّبَعْتَنِي فَلَا تَسْأَلْنِي عَنْ شَيْءٍ حَتَّى أُحْدِثَ لَكَ مِنْهُ ذِكْرًا} فرَكِبا في السفينة فخَرَقَها العالِمُ، وكان خَرْقُها لله رِضًا ولموسى سُخْطًا، ولَقِيَ الغلامَ فقتَلَه، وكان قتلُه لله رِضًا؛ ثم ذَكَر بعضَ القصةِ والكلام، ولم يُجاوِزِ ابنَ عبّاس [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় আল্লাহ তাঁর কিতাবে মূসা ইবনে ইমরানকে বলেছিলেন: "নিশ্চয়ই আমি তোমাকে আমার রিসালাত (বার্তা) এবং আমার কালামের (কথাবার্তার) মাধ্যমে মানবজাতির উপর মনোনীত করেছি। অতএব, আমি তোমাকে যা দিয়েছি তা গ্রহণ কর এবং কৃতজ্ঞদের অন্তর্ভুক্ত হও।" তিনি (আল্লাহ) বলেন: "আর আমি ফলকে তার জন্য সব বিষয়ে উপদেশ ও বিস্তারিত ব্যাখ্যা লিখে দিয়েছি।" [সূরা আরাফ: ১৪৪-১৪৫]। মূসা (আঃ) মনে করতেন যে, সমস্ত কিছু তার জন্য নির্ধারিত হয়ে গেছে, যেমন তোমরা মনে করো যে তোমাদের আলেমরা তোমাদের জন্য সবকিছু লিখে রেখেছেন এবং যেভাবে তারা তা প্রমাণিত করেন। অতঃপর মূসা (আঃ) যখন সমুদ্রের তীরে পৌঁছলেন, তখন তিনি সেই জ্ঞানী (আল-আলিম) ব্যক্তির সাথে দেখা করলেন এবং তাকে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি তার জ্ঞানের শ্রেষ্ঠত্ব স্বীকার করলেন, কিন্তু তাকে হিংসা করলেন না। মূসা (আঃ) তার কাছে আগ্রহ প্রকাশ করে বললেন: "আমি কি আপনাকে অনুসরণ করতে পারি এই শর্তে যে, আপনাকে যে সৎ জ্ঞান শেখানো হয়েছে, তা থেকে আপনি আমাকে শিক্ষা দেবেন?" তখন সেই জ্ঞানী ব্যক্তি বুঝতে পারলেন যে মূসা (আঃ) তার সঙ্গ সহ্য করতে পারবেন না এবং তার জ্ঞানের ওপর ধৈর্য ধরতে পারবেন না। তাই তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আপনি আমার সাথে ধৈর্য ধারণ করতে পারবেন না। যে বিষয়ে আপনার ধারণা নেই, সে বিষয়ে আপনি কিভাবে ধৈর্য ধারণ করবেন?" [সূরা কাহাফ: ৬৮]। তখন মূসা (আঃ) ওজর পেশ করে বললেন: "ইন শা আল্লাহ (আল্লাহ চাহেন তো), আপনি আমাকে ধৈর্যশীল পাবেন এবং আমি আপনার কোনো আদেশ অমান্য করব না।" জ্ঞানী ব্যক্তি বুঝতে পারলেন যে মূসা (আঃ) তার জ্ঞানে ধৈর্য ধারণ করতে পারবেন না। তাই তিনি বললেন: "যদি আপনি আমাকে অনুসরণ করেন, তাহলে আপনি আমাকে কোনো কিছু সম্পর্কেই জিজ্ঞাসা করবেন না, যতক্ষণ না আমি সে সম্পর্কে আপনার কাছে কোনো উল্লেখ করি।" এরপর তারা দুজন নৌকায় চড়লেন, তখন সেই জ্ঞানী ব্যক্তি তা ছিদ্র করে দিলেন। ছিদ্র করাটি আল্লাহর জন্য সন্তোষজনক ছিল, কিন্তু মূসার জন্য ছিল অসন্তোষজনক। এরপর তারা একটি বালকের সাক্ষাৎ পেলেন এবং জ্ঞানী ব্যক্তি তাকে হত্যা করলেন। তার এই হত্যাও আল্লাহর জন্য সন্তোষজনক ছিল। এরপর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গল্পের কিছু অংশ ও বক্তব্য উল্লেখ করলেন, তবে তিনি [কুরআনের বর্ণনার] সীমা অতিক্রম করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده واهٍ من أجل عبد الله بن داهر وأبيه فهما ليسا بشيء، ولهما ترجمة في "الميزان" و"اللسان"، وتَعقَّب الذهبيُّ في "تلخيصه" المصنف في تصحيحه هذا الخبر.
4139 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا العبّاس بن محمد الدُّوري، حدثنا يحيى بن مَعِين، حدثنا يحيى بن آدم، حدثنا حمزة الزَّيَّات، عن أبي إسحاق، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس، عن أبيّ بن كَعْبٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رحمةُ الله علينا وعلى موسى - فبدأ بنفسه - لو كان صَبَرَ لَقُصَّ علينا مِن خَبَرِه، ولكن قال: {إِنْ سَأَلْتُكَ عَنْ شَيْءٍ بَعْدَهَا فَلَا تُصَاحِبْنِي قَدْ بَلَغْتَ مِنْ لَدُنِّي عُذْرًا} [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর রহমত আমাদের ও মূসার উপর বর্ষিত হোক"— (তিনি প্রথমে নিজের নাম উল্লেখ করলেন)— "যদি তিনি ধৈর্য ধারণ করতেন, তবে তাঁর আরও ঘটনা আমাদের কাছে বর্ণনা করা হতো। কিন্তু তিনি বলেছিলেন: {এরপর যদি আমি আপনাকে কোনো বিষয়ে জিজ্ঞাসা করি, তাহলে আপনি আমার সাথে থাকবেন না। আপনি আমার পক্ষ থেকে যথেষ্ট কারণ পেয়ে গেছেন।}"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبِيعي، وحمزة الزيّات: هو ابن حبيب أحد القراء السبعة المشهورين.وأخرجه أحمد 35/ (21126) و (21127)، وأبو داود (3984)، والترمذي (3385)، والنسائي (11248)، وابن حبان (988) من طرق عن حمزة الزيات، بهذا الإسناد.وأخرجه مسلم (2380)، والنسائي (11244) من طريق رقبة بن مصقلة، والنسائي (5813) من طريق إسرائيل، كلاهما عن أبي إسحاق، به.وسلف نحوه برقم (3476) من طريق أبي بشر عن سعيد بن جُبَير.
4140 - أخبرنا الحسن بن محمد الإسفراييني، حدثنا محمد بن أحمد بن البَرَاء، حدثنا عبد المُنعِم بن إدريس بن سِنان اليَمَاني، عن أبيه، عن وَهْب بن مُنبِّه، قال: ذِكْرُ مولد موسى بن عِمران بن قاهَث بن لاوِي بن يعقوب بن إسحاق بن إبراهيم، وحديثُ عدوِّ الله فِرعونَ حين كان يَستعبِدُ بني إسرائيلَ في أعمالِه بمصر، وأمرِ موسى والخَضِر، قال وهبٌ: ولما حَمَلتْ أمُّ موسى بموسى كتَمَتْ أمرَها جميعَ الناسِ، فلم يَطَّلِع على حَمْلِها أحدٌ من خلق الله، وذلك شيءٌ سَتَرها [1] الله به لما أراد أن يَمُنَّ به على بني إسرائيل، فلما كانت السنةُ التي يُولَد فيها موسى بن عِمران بعثَ فرعونُ القَوابِلَ وتقدَّم إليهنّ، وفَتَّش النساء تَفتِيشًا لم يُفتِّشْهُنَّ قبلَ ذلك، وحَمَلت أمُّ موسى بموسى، فلم يَنِتَّ بطنُها [2]، ولم يَتغيَّر لونُها، ولم يفسُد لبنُها، وكُنَّ القوابلُ لا يَعرِضْنَ لها، فلما كانتِ الليلةُ التي وُلِد فيها موسى وَلَدَتْه أمُّه ولا رَقِيبَ عليها ولا قابِلَ، ولم يَطَّلع عليها أحدٌ إلّا أخته مريم، وأوحى الله إليها: {أَنْ أَرْضِعِيهِ فَإِذَا خِفْتِ عَلَيْهِ فَأَلْقِيهِ فِي الْيَمِّ وَلَا تَخَافِي وَلَا تَحْزَنِي إِنَّا رَادُّوهُ إِلَيْكِ وَجَاعِلُوهُ مِنَ الْمُرْسَلِينَ} [القصص: 7]، قال: فكتَمَتْه أمُّه ثلاثةَ أشهر تُرضِعُه في حِجْرها لا يبكي ولا يتَحرّك، فلما خافتْ عليه وعليها عَمِلتْ له تابُوتًا مُطبَقًا ومَهَّدَتْ له فيه، ثم ألقتْه في البحر ليلًا كما أمرها اللهُ، وعُمِلَ التابوتُ على عَمَلِ سُفنِ البحرِ خمسةَ أشبارٍ في خمسةِ أشبارٍ، ولم يُقيَّر، فأقبل التابوتُ يَطفُو على الماء، فألقى البحرُ التابوتَ بالساحِل في جَوف الليل.فلما أصبح فرعونُ جَلَس في مجلسِه على شاطئ النيل، فبَصُرَ بالتابُوت، فقال لمن حولَه من خَدَمِه: ائتُوني بهذا التابوت، فأَتَوه به، فلما وُضِعَ بين يديه فتحُوه، فوَجَدَ فيه موسى، قال: فلما نظر إليه فرعون قال: عِبْرانيٌّ من الأعداء، فأعْظَمَه ذلك وغاظَه، وقال: كيف أخْطى هذا الغلامُ الذَّبحَ وقد أمرتُ القَوابِلَ أن لا يَكتُمْنَ مولودًا يُولَد، قال: وكان فرعون قد استَنْكَح امرأةً من بني إسرائيل يُقال لها: آسيةُ بنتُ مُزاحِم، وكانت من خِيار النساء المعدُودات ومن بنات الأنبياء، وكانت أمًّا للمسلمين تَرحَمُهم وتتصدّق عليهم وتُعطِيهم ويدخُلُون عليها، فقالت لفرعون وهي قاعدة إلى جنبه: هذا الوليد أكبرُ من ابن سَنَةٍ، وإنما أَمرْتَ أن يُذبَحَ الوِلْدانُ لهذه السنةِ، فدَعْه يكن قُرّةَ عَين لي ولك، {لَا تَقْتُلُوهُ عَسَى أَنْ يَنْفَعَنَا أَوْ نَتَّخِذَهُ وَلَدًا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ}، أَنَّ هلاكهم على يديه، وكان فِرعونُ لا يُولَد له إلَّا البنات، فاستحياهُ فرعون ورَمَقَه [3]، وألقى الله عليه محبتَه ورأفتَه ورحمتَه، وقال لامرأته: عسى أن ينفعَك أنتِ، فأما أنا فلا أُريد نَفْعَه.قال وهب: قال ابن عبّاس: لو أنَّ عدوَّ الله قال في موسى كما قالتِ امرأتُه آسية: {عَسَى أَنْ يَنْفَعَنَا} لَنفعَهُ اللهُ به، ولكنه أبى للشَّقاء الذي كتبَه اللهُ عليه.وحَرَّم اللهُ على موسى المَراضِعَ ثمانيةَ أيامٍ ولياليَهنَّ، كلما أُتِي بِمُرضِعةٍ لم يَقبَلْ ثَدْيَها، فرَقَّ له فرعونُ ورحِمَه، وطُلِبتْ له المَراضِعُ.وذَكَر وهبٌ حُزنَ أمِّ موسى وبُكاءَها عليه، حتى كادتْ أن تُبْدِيَ به، ثم تَدارَكَها الله برحمتِه، فرَبَطَ على قلبِها إلى أن بلغها خَبَرُه، فقالت لأُختِه: تَنكَّري واذهبي مع الناس وانظُري ماذا يفعلون به، فدخلت أختُه مع القوابل على آسية بنت مُزاحِم، فلما رأت وَجْدَهم بموسى وحبَّهم له ورِقَّتَهم عليه، قالت: هل أدلُّكم على أهل بيتٍ يَكفُلُونه لكم وهم له ناصحون؟ إلى أن رُدَّ إلى أمِّه، فمَكَث موسى عند أمِّه حتى فَطَمَتْه، ثم ردَّتْه إليه، فنشأ موسى في حِجْر فرعون وامرأتِه يَربِّيانه بأيديهما، واتخَذَاه ولدًا، فبَيْنا هو يلعب يومًا بين يدَي فرعون وبيده قَضِيبٌ له خفيفٌ صغيرٌ يلعب به، إذ رفع القَضِيبَ فضرب به رأسَ فرعون، فغَضِب فِرعون وتَطَيَّر مِن ضَرْبِه حتى همَّ بقتله، فقالت آسيةُ بنت مُزاحِم: أيها الملِك، لا تغضب ولا يَشُقَّنَّ عليك، فإنه صبيٌّ صغير لا يَعقِل جَرِّبه إن شئتَ اجعلْ في هذا الطَّسْتِ جَمْرةً وذَهبًا، فانظُرْ على أيِّهما يَقبِض، فأمَر فِرعون بذلك، فلما مَدّ موسى يدَه ليقبِضَ على الذَّهَب قبض المَلَكُ المُوكَّل به على يدِه فردَّها إلى الجَمْرة، فقبض عليها موسى فألقاها في فيه، ثم قَذَفَها حين وَجَدَ حرارتَها، فقالت آسيةُ لفرعون: ألم أقل لك: إنه لا يَعقِل شيئًا ولا يَعلَمُه، وكَفَّ عنه فرعونُ وصَدَّقها، وكان أَمر بقَتْله، ويقال: إنَّ العُقدة التي كانت في لسان تلك أثرُ تلك الجَمْرةِ التي الْتَقَمَها.قال وهب بن مُنبِّه: ولما بلغ موسى أشُدَّه وبلغ أربعين سنةً آتاهُ الله عِلْمًا وحُكْمًا وفَهْمًا، فَلَبِثَ بذلك اثنتي عشرة سنة، فلما تمَّت له ثلاثون سنة، دعا إلى دِين إبراهيم وشرائعِه وإلى دِين إسحاقَ ويعقوبَ، فآمنت به طائفة من بني إسرائيل، ثم ذَكَرَ القصة بطولها [4].
ওহব ইবনু মুনাব্বিহ থেকে বর্ণিত:
মূসা ইবনু ইমরান ইবনু ক্বাহাস ইবনু লাবী ইবনু ইয়াকূব ইবনু ইসহাক ইবনু ইবরাহীমের জন্ম সংক্রান্ত আলোচনা। আর আল্লাহর শত্রু ফিরাউনের সেই আলোচনা, যখন সে মিসরে তার কাজকর্মে বনী ইসরাঈলকে গোলাম বানিয়ে রেখেছিল এবং মূসা ও খিদর (আঃ)-এর ঘটনা। ওহব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: যখন মূসার মা তাঁকে গর্ভে ধারণ করলেন, তখন তিনি সমস্ত মানুষের কাছ থেকে বিষয়টি গোপন রাখলেন। আল্লাহর কোনো সৃষ্টিই তাঁর গর্ভধারণের খবর জানতে পারেনি। এটি এমন একটি বিষয় ছিল যা আল্লাহ তাঁর মাধ্যমে বনী ইসরাঈলের প্রতি অনুগ্রহ করার ইচ্ছা পোষণ করে গোপন রেখেছিলেন। যখন সেই বছর আসল যে বছর মূসা ইবনু ইমরান জন্মগ্রহণ করবেন, তখন ফিরাউন ধাত্রীদের পাঠালো এবং তাদের নির্দেশ দিলো। সে নারীদের এমনভাবে তল্লাশি করতে শুরু করল যা এর আগে সে করেনি। মূসার মা তাঁকে গর্ভে ধারণ করলেন, কিন্তু তাঁর পেট স্ফীত হলো না, তাঁর চেহারা বিবর্ণ হলো না এবং তাঁর দুধ নষ্ট হলো না। আর ধাত্রীরা তাঁর কাছে যেত না। যে রাতে মূসা জন্মগ্রহণ করলেন, তাঁর মা তাঁকে এমনভাবে প্রসব করলেন যে সেখানে কোনো প্রহরী বা ধাত্রী ছিল না। তাঁর বোন মারইয়াম ছাড়া আর কেউ এ বিষয়ে জানতে পারেনি। আল্লাহ তাঁর প্রতি অহী (প্রত্যাদেশ) করলেন: “তুমি তাকে দুধ পান করাও, অতঃপর যখন তার বিষয়ে তোমার আশঙ্কা হবে, তখন তাকে নদীতে নিক্ষেপ করো এবং ভয় করো না ও দুঃখ করো না; আমি অবশ্যই তাকে তোমার কাছে ফিরিয়ে দেব এবং তাকে রাসূলদের (বার্তাবাহকদের) অন্তর্ভুক্ত করব।” [সূরা কাসাস: ৭]
তিনি (ওহব) বলেন: তাঁর মা তিন মাস ধরে তাঁকে কোলে দুধ পান করালেন, অথচ তিনি কাঁদতেন না বা নড়াচড়া করতেন না। যখন তাঁর (শিশু) এবং নিজের (মা) ব্যাপারে ভয় হলো, তখন তিনি তাঁর জন্য একটি ঢাকনাযুক্ত সিন্দুক তৈরি করলেন এবং ভিতরে নরম কিছু বিছিয়ে দিলেন। অতঃপর আল্লাহর নির্দেশ অনুসারে রাতে সেটি নদীতে নিক্ষেপ করলেন। সিন্দুকটি সমুদ্রের জাহাজের কাজের মতো করে পাঁচ হাত বাই পাঁচ হাত মাপে তৈরি করা হয়েছিল এবং এতে আলকাতরা মাখানো হয়নি। এরপর সিন্দুকটি পানির উপর ভেসে চলল। গভীর রাতে নদী সিন্দুকটিকে তীরে এনে ফেলে দিল।
যখন সকাল হলো, ফিরাউন নীল নদের তীরে তার মজলিসে বসলেন। সে সিন্দুকটি দেখতে পেল এবং তার আশেপাশে থাকা সেবকদের বলল: এই সিন্দুকটি আমার কাছে আনো। তারা সেটি আনল। যখন সেটি তার সামনে রাখা হলো, তারা সেটি খুলল এবং তার ভেতরে মূসাকে পেল। তিনি বলেন: যখন ফিরাউন তাঁর দিকে তাকাল, তখন বলল: এ তো শত্রুদের ইবরানী (বনী ইসরাঈলী) শিশু! এটি তাকে বিচলিত ও ক্রুদ্ধ করল। সে বলল: ধাত্রীদের নির্দেশ দেওয়া সত্ত্বেও যে, কোনো নবজাতকের কথা যেন গোপন না রাখে, কীভাবে এই শিশুটি হত্যা হওয়া থেকে বেঁচে গেল? তিনি বলেন: ফিরাউন বনী ইসরাঈলের এক নারীকে বিবাহ করেছিল, যার নাম ছিল আসিয়া বিনতে মুযাহিম। তিনি ছিলেন গণ্যমান্য নেককার নারীদের একজন এবং নবীদের বংশধর ছিলেন। তিনি ছিলেন মুসলিমদের জন্য জননীস্বরূপ; তিনি তাদের প্রতি দয়া করতেন, সাদাকা দিতেন, দান করতেন এবং তারা তাঁর কাছে যাতায়াত করত। তিনি ফিরাউনের পাশে বসে বললেন: এই শিশুটির বয়স এক বছরের বেশি, অথচ আপনি এই বছরের নবজাতকদের হত্যার নির্দেশ দিয়েছিলেন। তাকে ছেড়ে দিন, সে আমার ও আপনার চক্ষুশীতলকারী হোক। "তাকে হত্যা করো না, সম্ভবত সে আমাদের উপকারে আসবে অথবা আমরা তাকে পুত্ররূপে গ্রহণ করব।” [সূরা কাসাস: ৯]— অথচ তারা জানত না যে তাদের বিনাশ তার হাতেই হবে। ফিরাউনের কেবল মেয়েরা জন্মাত। এরপর ফিরাউন তাকে জীবিত রাখল এবং তার প্রতি লক্ষ্য রাখল। আল্লাহ তার অন্তরে মূসার প্রতি ভালোবাসা, মমতা ও রহমত ঢেলে দিলেন। সে তার স্ত্রীকে বলল: সম্ভবত এ তোমার উপকারে আসবে, তবে আমি এর উপকার চাই না।
ওহব বলেন: ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আল্লাহর শত্রু ফিরাউনও যদি মূসার ব্যাপারে তার স্ত্রী আসিয়ার মতো বলত যে, "সম্ভবত সে আমাদের উপকারে আসবে," তাহলে আল্লাহ তাকে এর দ্বারা উপকার দিতেন। কিন্তু তার কপালে আল্লাহ যে দুর্ভাগ্য লিখে রেখেছিলেন, তার দরুন সে অস্বীকার করল। আল্লাহ মূসার জন্য আট দিন ও রাত সব স্তন্যদাত্রী নারীকে হারাম করে দিলেন। যখনই কোনো স্তন্যদাত্রী আনা হতো, তিনি তার স্তন গ্রহণ করতেন না। এতে ফিরাউন তার প্রতি দয়া ও মমতা দেখাল এবং তার জন্য স্তন্যদাত্রী খোঁজা হলো।
ওহব (রাহিমাহুল্লাহ) মূসার মায়ের শোক ও কান্নার কথা উল্লেখ করেছেন, এমনকি তিনি প্রায় প্রকাশ করেই ফেলতে যাচ্ছিলেন। এরপর আল্লাহ তাঁকে রহমত দ্বারা সামলে নিলেন এবং খবর পৌঁছানো পর্যন্ত তাঁর হৃদয়কে স্থির করে রাখলেন। তিনি তাঁর বোনকে বললেন: ছদ্মবেশ ধারণ করে মানুষের সাথে যাও এবং দেখো তারা তার (মূসা) সাথে কী করে। তার বোন ধাত্রীদের সাথে আসিয়া বিনতে মুযাহিমের কাছে প্রবেশ করলেন। যখন তিনি দেখলেন যে মূসার প্রতি তাদের কত মমতা, ভালোবাসা এবং সহানুভূতি, তখন তিনি বললেন: আমি কি তোমাদেরকে এমন একটি পরিবারের সন্ধান দেব, যারা তোমাদের জন্য তাকে প্রতিপালন করবে এবং যারা তার হিতাকাঙ্ক্ষী? অবশেষে তাঁকে তাঁর মায়ের কাছে ফিরিয়ে দেওয়া হলো। মূসা তাঁর মায়ের কাছেই থাকলেন যতক্ষণ না তাঁর দুধ ছাড়ানো হলো। এরপর তিনি তাঁকে ফিরাউনের কাছে ফিরিয়ে দিলেন। এভাবে মূসা ফিরাউন ও তার স্ত্রীর কোলে লালিত-পালিত হতে লাগলেন, তারা নিজেদের হাতে তাঁকে প্রতিপালন করতে লাগলেন এবং তাঁকে নিজেদের পুত্ররূপে গ্রহণ করলেন।
একদিন তিনি (মূসা) ফিরাউনের সামনে খেলা করছিলেন। তাঁর হাতে একটি হালকা ছোট লাঠি ছিল, যা দিয়ে তিনি খেলছিলেন। হঠাৎ তিনি সেই লাঠি তুলে ফিরাউনের মাথায় আঘাত করলেন। এতে ফিরাউন ক্রুদ্ধ হলো এবং এই আঘাতে অশুভ লক্ষণ দেখল। এমনকি সে তাঁকে হত্যা করার ইচ্ছা করল। তখন আসিয়া বিনতে মুযাহিম বললেন: হে বাদশাহ! রাগ করবেন না এবং মন খারাপ করবেন না। সে তো ছোট শিশু, তার জ্ঞান হয়নি। আপনি চাইলে তাকে পরীক্ষা করে দেখতে পারেন। এই থালায় একটি জ্বলন্ত কয়লা এবং সোনা রাখুন এবং দেখুন সে কোনটি ধরে। ফিরাউন এর নির্দেশ দিলেন। যখন মূসা সোনা ধরার জন্য হাত বাড়ালেন, তখন নিয়োজিত ফেরেশতা তাঁর হাত ধরে জ্বলন্ত কয়লার দিকে ঘুরিয়ে দিলেন। মূসা সেটি ধরে মুখে দিলেন, কিন্তু গরম অনুভব করে তা ফেলে দিলেন। আসিয়া ফিরাউনকে বললেন: আমি কি বলিনি যে সে কিছু বোঝে না বা জানে না? ফিরাউন তার (হত্যা) থেকে বিরত হলো এবং তাকে বিশ্বাস করল। উল্লেখ্য যে, ফিরাউন তাকে হত্যার নির্দেশ দিয়েছিল। বলা হয়, মূসার জিহ্বার সেই জড়তা ছিল ঐ কয়লার কারণে, যা তিনি মুখে তুলেছিলেন।
ওহব ইবনু মুনাব্বিহ বলেন: যখন মূসা পূর্ণ যৌবনে পৌঁছলেন এবং তাঁর বয়স চল্লিশ বছর হলো, তখন আল্লাহ তাঁকে জ্ঞান, প্রজ্ঞা ও বুঝ দান করলেন। তিনি এর সাথে বারো বছর অবস্থান করলেন। যখন তাঁর বয়স ত্রিশ বছর পূর্ণ হলো, তিনি ইবরাহীম, ইসহাক ও ইয়াকূবের শরীয়ত এবং ধর্মের প্রতি আহ্বান জানালেন। ফলে বনী ইসরাঈলের একটি দল তাঁর প্রতি ঈমান আনল। এরপর তিনি (ওহব) সম্পূর্ণ ঘটনাটি বিস্তারিতভাবে বর্ণনা করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب): سرّها، وهو تحريف.
[2] أي: لم ينتفخ.
4140 [3] - أي: أتبعه بصرَه يتعهّده وينظر إليه ويرقُبه.
4140 [4] - إسناده واهٍ كما قال الذهبي في غير موضع من "تلخيصه"، وذلك من أجل عبد المنعم بن إدريس، فهو متروك الحديث، وكذَّبه الإمام أحمد.وأخرجه الواحدي في "التفسير الوسيط" 3/ 390، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 61/ 18 عن أبي الحسن بن أبي نصر السوادي، عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.والصحيح في خبر موسى وفرعون إسنادًا ما أخرجه النسائي (11263) وغيره ضمن حديث طويل جدًّا يُدعى حديثَ الفُتون، وهو من رواية سعيد بن جُبَير عن ابن عبّاس موقوفًا عليه، وقد تخلَّله إشارة إلى رفع بعض ألفاظه إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وفي كثير من ألفاظه مغايرة للفظ رواية وهب بن منبّه التي هنا، إلّا أنه مع جَودة إسناده قال الحافظ المزي فيما نقله عنه ابن كثير في "البداية والنهاية" 2/ 196: الأشبه أنه موقوف وكونه مرفوعًا فيه نظر، وغالبه متلقًّى من الإسرائيليات، وفيه شيء يسير مصرَّح برفعه في أثناء الكلام، وفي بعض ما فيه نظر ونكارة، والأغلب أنه من كلام كعب الأحبار.قلنا: وقد جاءت قصة موسى بطولها أيضًا من رواية السُّدِّي، عن أبي مالك الغفاري وأبي صالح بادام، عن ابن عبّاس. وعن مُرَّة الهَمْداني، عن ابن مسعود. وعن ناس من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم أخرجها الطبري في "تاريخه" 1/ 388 - 431 وخلَّله كثيرًا من الروايات الأخرى ثم يتمم بقوله: رجع الحديث إلى حديث السُّدِّي. وهو موقوف حسن الإسناد أيضًا، فارجع إليهما.