হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (441)


441 - أخبرنا أبو محمد عبد الله بن محمد بن إسحاق الفاكِهي بمكة، حدثنا أبو يحيى بن أبي مَسَرّة، حدثنا أبو عبد الرحمن المقرئ، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، عن بكر بن عَمْرو، عن مسلم بن يَسَار، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مَن أَفتى الناسَ بغير عِلْم، كان إثمُه على من أَفتاه" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، ولا أعرفُ له عِلَّة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জ্ঞান ছাড়া মানুষকে ফতোয়া দেয়, তার পাপ ফতোয়াদাতার উপরই বর্তায়।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده محتمل للتحسين كما سلف عند الحديث رقم (354)، وهذا الطريق قد اختلف فيه على أبي عبد الرحمن المقرئ - وهو عبد الله بن يزيد - فمن الرواة عنه من أسقط الواسطة في هذا الإسناد بين بكر بن عمرو ومسلم بن يسار، وهو عمرو بن أبي نعيمة، ومنهم من أثبتها، والصواب - والله أعلم - في حديث المقرئ إثباتها، فهو كذلك في كتابه كما رواه عنه أحمد في "مسنده" 14/ (8266)، فلعله كان إذا روى من حفظه أسقطه، حفظه أسقطه، والكتاب أيقن وأثبت من الحفظ، وقد تابعه غيره على إثبات هذه الواسطة كما سلف.وأخرجه كرواية المصنف هنا: أبو داود (3657) عن الحسن بن علي الحلواني، عن أبي عبد الرحمن المقرئ، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (442)


442 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا العباس بن الفضل الأَسْفاطي، حدثنا أبو الوليد، حدثنا همَّام، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يَسَار، عن أبي سعيد الخُدْري، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا تَكتُبوا عني شيئًا سِوَى القرآن، ومَن كَتَبَ عني شيئًا سوى القرآن فليَمْحُه" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد تقدّم [2] أخبار عبد الله بن عمرو في إجازة الكتابة.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কুরআন ছাড়া আমার পক্ষ থেকে আর কিছুই লিখো না। আর যে ব্যক্তি কুরআন ছাড়া আমার পক্ষ থেকে অন্য কিছু লিখেছে, সে যেন তা মুছে ফেলে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل عباس الأسفاطي. أبو الوليد: هو هشام بن عبد الملك الطيالسي، وهمام: هو ابن يحيى العَوْدي.وأخرجه أحمد 17/ (11085) و (11087) و (11158) و (11344) و 18/ (11536)، ومسلم (3004)، والنسائي (7954)، وابن حبان (64) من طرق عن همام بن يحيى، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه رحمه الله.وأخرج الترمذي (2665) عن سفيان بن وكيع عن سفيان بن عيينة، عن زيد بن أسلم، عن عطاء، عن أبي سعيد قال: استأذنا النبيَّ صلى الله عليه وسلم في الكتابة فلم يأذن لنا. وسفيان بن وكيع فيه ضعف.وأخرج أبو داود (3648) من طريق خالد الحذاء، عن أبي المتوكل الناجي، عن أبي سعيد قال: ما كنا نكتب غيرَ التشهد والقرآن وإسناده صحيح.



[2] تقدمت برقم (362 - 364).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (443)


443 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بشر بن موسى، حدثنا محمد بن سالم المفلوج [1]، حدثنا إبراهيم بن يوسف بن أبي إسحاق، عن أبيه، عن أبي إسحاق [2]، عن البَرَاء قال: ليس كلُّنا سمع حديثَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، كانت لنا ضَيْعَةٌ وأشغالٌ، ولكنَّ الناس كانوا لا يَكذِبون يومئذٍ، فيحدِّثُ الشاهدُ الغائبَ [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، ومحمد بن سالم وابنه عبد الله محتَجٌّ بهما! فأما صحيفة إبراهيم بن يوسف بن أبي إسحاق فقد أخرجها البخاريُّ في "الجامع الصحيح".




বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের সকলের পক্ষে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাদীস শোনা সম্ভব হয়নি। কারণ আমাদের ক্ষেত-খামার ও অন্যান্য কাজ থাকত। কিন্তু সেই সময় লোকেরা মিথ্যা বলত না, তাই উপস্থিত ব্যক্তি অনুপস্থিতকে তা বর্ণনা করত।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] هكذا في نسخنا الخطية، وفي "إتحاف المهرة" (2153): عبد الله بن محمد بن سالم المفلوج"، وعبد الله هذا - وينسب أيضًا إلى جده سالم - هو المعروف برواية بشر بن موسى عنه، وهو ثقة، وأما أبوه فلم نقف على رواية له.



[2] قوله: "عن أبيه عن أبي إسحاق" سقط من (ص) و (ع) والمطبوع.



443 [3] - إسناده حسن من أجل إبراهيم بن يوسف. وقد سلف بنحوه برقم (330) من طريق سفيان عن أبي إسحاق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (444)


444 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ، حدثنا محمد بن عيسى بن السَّكَن الواسطي، حدثنا عَمْرو بن عَوْن، حدثنا سفيان، عن عبيد الله بن أبي يزيد قال: كان ابن عباس إذا سُئِلَ عن شيءٍ فكان في كتاب الله، قال به، فإن لم يكن في كتاب الله وكان من رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه شيءٌ، قال به فإن لم يكن عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه شيءٌ، قال بما قال به أبو بكر وعمر، فإن لم يكن لأبي بكر وعمر فيه شيء، قال برأْيةِ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين وفيه توقيف، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে যখন কোনো বিষয়ে জিজ্ঞাসা করা হতো, আর তা যদি আল্লাহর কিতাবে (কুরআনে) পাওয়া যেত, তিনি সেই অনুযায়ী বলতেন। যদি তা আল্লাহর কিতাবে না থাকত, কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে তাতে কিছু থাকত, তবে তিনি তাই বলতেন। যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে তাতে কিছু না থাকত, তবে তিনি আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা বলেছেন, সেই অনুযায়ী বলতেন। আর যদি আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এরও তাতে কিছু না থাকত, তবে তিনি তাঁর নিজস্ব মতামত দিতেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عيينة.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (73) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 7/ 242، والدارمي (168)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 10/ 115، والخطيب البغدادي في "الفقيه والمتفقه" (542) و (543)، وابن عبد البر في "بيان العلم وفضله" (1601) و (1602) من طرق عن سفيان بن عيينة، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (445)


445 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثنا عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا جَرِير، عن إدريس الأَوْدي، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوَص، عن عبد الله رَفَع الحديثَ إلى النبي صلى الله عليه وسلم: "إنَّ الكذبَ لا يَصلُحُ منه جِدٌّ ولا هَزْل، ولا أن يَعِدَ الرجلُ ابنه ثم لا يُنجِزَ له.إنَّ الصدق يهدي إلى البِرَّ، وإنَّ البِرَّ يهدي إلى الجنة، وإنَّ الكذبَ يهدي إلى الفُجور، وإنَّ الفجورَ يهدي إلى النار، إنه يقال للصادق: صَدَقَ وبَرَّ، ويقال للكاذب: كَذَبَ وفَجَرَ، وإِنَّ الرجل لَيَصدُقُ حتى يُكتبَ عند الله صِدَّيقًا، ويَكذِبُ حتى يُكتَبَ عند الله كذَّابًا" [1].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، وإنما تواترت الرواياتُ بتوقيف أكثر هذه الكلمات، فإنْ صحَّ سندُه فإنه صحيح على شرطهما.




আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পর্যন্ত হাদীসটিকে উন্নীত করেছেন (তিনি বলেছেন): নিশ্চয়ই মিথ্যা এমন জিনিস যা গুরুত্বের সাথে বা কৌতুকচ্ছলে কোনো অবস্থাতেই ঠিক নয়। আর এটিও নয় যে, কোনো ব্যক্তি তার সন্তানকে ওয়াদা করবে কিন্তু পরে তা পূরণ করবে না। নিশ্চয়ই সত্যবাদিতা পুণ্যের দিকে পরিচালিত করে, আর পুণ্য জান্নাতের দিকে পরিচালিত করে। আর নিশ্চয়ই মিথ্যা অশ্লীলতা ও পাপের দিকে পরিচালিত করে, আর অশ্লীলতা ও পাপ জাহান্নামের দিকে পরিচালিত করে। নিশ্চয়ই সত্যবাদীকে বলা হয়: সে সত্য বলেছে ও পুণ্যবান হয়েছে, আর মিথ্যাবাদীকে বলা হয়: সে মিথ্যা বলেছে ও পাপাচার করেছে। আর নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি সততা অবলম্বন করতে থাকে, শেষ পর্যন্ত সে আল্লাহর কাছে সিদ্দীক হিসেবে লিপিবদ্ধ হয়। আর (অনুরূপভাবে) সে মিথ্যা বলতে থাকে, শেষ পর্যন্ত সে আল্লাহর কাছে কায্‌যাব হিসেবে লিপিবদ্ধ হয়।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده صحيح إلّا أنَّ الشطر الأول منه الصواب فيه أنه موقوف على عبد الله - وهو ابن مسعود - من قوله، هكذا رواه جمهور أصحاب أبي إسحاق السَّبيعي عنه كما هو مبيَّن في رواية شعبة عنه في "مسند أحمد" 7/ (3896) وفي التعليق عليه. جرير: هو ابن عبد الحميد، وأبو الأحوص: هو عوف بن مالك الأشجعي.وقد تابع إدريسَ الأودي على رفعه جميعه موسى بنُ عقبة عند ابن ماجه (46).وأخرج الشطر الثاني منه بنحوه أحمد 7/ (4022) و (4095) و (4160)، ومسلم (2606) من طريقين عن أبي إسحاق، به.وأخرجه أيضًا أحمد 6/ (3638) و (3727) و 7/ (4108) و (4187)، والبخاري (6094)، ومسلم (2607)، وأبو داود (1971)، وابن حبان (272 - 274) من طرق عن أبي وائل شقيق بن سلمة، عن عبد الله بن مسعود.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (446)


446 - أخبرنا أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا عمرو بن عَوْن ووهب بن بَقِيَّة الواسطيان قالا: حدثنا خالد بن عبد الله، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "افتَرَقَت اليهودُ على إحدى أو اثنتين وسبعين فِرقةً، وافتَرقَت النصارى على إحدى أو اثنتين وسبعين فِرقةً، وتَفترِقُ أُمَّتي على ثلاث وسبعين فِرقةً" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.وله شواهد، فمنها:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইয়াহুদীরা একাত্তর বা বাহাত্তর ফিরকায় বিভক্ত হয়েছিল, আর নাসারারাও একাত্তর বা বাহাত্তর ফিরকায় বিভক্ত হয়েছিল, আর আমার উম্মত তিয়াত্তর ফিরকায় বিভক্ত হবে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن.وأخرجه أبو داود (4596) عن وهب بن بقية وحده، بهذا الإسناد. وقد سلف برقم (10).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (447)


447 - ما أخبرَناه أبو العباس قاسم بن قاسم السَّيّاري بمرو، حدثنا أبو الموجِّه محمد بن عمرو الفَزَاري، حدثنا يوسف بن عيسى، حدثنا الفضل بن موسى، عن محمد بن عمرو، حدثني أبو سَلَمة، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تَفرَّقَت اليهودُ على إحدى وسبعين، والنصارى مثلَ ذلك، وتَفترِقُ أُمَّتي على ثلاثٍ وسبعين فِرقةً" [1].ومنها:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইয়াহূদীরা একাত্তর দলে বিভক্ত হয়েছিল এবং নাসারারাও অনুরূপ। আর আমার উম্মত তিয়াত্তর দলে বিভক্ত হবে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] انظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (448)


448 - ما حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا أبو اليَمَان الحَكَم بن نافع البَهْراني، حدثنا صفوان بن عمرو، عن الأزهَر بن عبد الله، عن أبي عامر عبد الله بن لُحَيّ قال: حَجَجْنا مع معاوية بن أبي سفيان، فلمّا قَدِمْنا مكة أُخبِرَ بقاصٍّ يَقُصُّ على أهل مكة مولًى لبني فَرُّوخ، فأرسل إليه معاويةُ فقال: أُمِرتَ بهذا القَصَص؟ قال: لا، قال: فما حَمَلَك على أن تَقُصَّ بغير إذن؟ قال: نُنشئُ علمًا عَلَّمَناه اللهُ عز وجل، فقال معاوية: لو كنتُ تقدَّمتُ إليك لقَطَعتُ منك طائفة، ثم قام حين صلى الظهر بمكة فقال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: "إنَّ أهل الكتاب تَفرَّقوا في دينهم على ثنتين وسبعين ملّةً، وتفترقُ هذه الأُمَّة على ثلاث وسبعين، كلُّها في النار إلّا واحدةً؛ وهي الجماعة، ويخرج في أُمَّني أقوامٌ تَنجَارَى بهم تلك الأهواء كما يَتَجارَى الكلبُ بصاحبه، فلا يبقى منه عِرقٌ ولا مَفْصِلٌ إِلَّا دخله".والله يا معشرَ العرب لئن لم تقوموا بما جاءَ به محمد صلى الله عليه وسلم، لغَيرُ ذلك أحْرى أن لا تقوموا به [1].هذه أسانيد تقوم بها الحُجَّة في تصحيح هذا الحديث.وقد رُوِيَ هذا الحديث عن عبد الله بن عمرو بن العاص وعمرو بن عوف المُزَني بإسنادين، تفرَّد بأحدهما عبدُ الرحمن بن زياد الإفريقي، والآخر كثيرُ بن عبد الله المُزَني، ولا تقوم بهما الحُجَّة.أما حديث عبد الله بن عمرو:




আবু আমের আব্দুল্লাহ ইবনে লুহাই থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মুয়াবিয়া ইবনে আবি সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে হজ্জ করলাম। যখন আমরা মক্কায় পৌঁছলাম, তখন তাকে বনু ফাররুখ গোত্রের এক মাওলা সম্পর্কে জানানো হলো যে মক্কাবাসীদের কাছে ওয়াজ বা কাসাস (উপদেশমূলক আলোচনা) করছে। মুয়াবিয়া তার কাছে লোক পাঠালেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: তোমাকে কি এই কাসাস করার অনুমতি দেওয়া হয়েছিল? সে বলল: না। তিনি বললেন: অনুমতি ছাড়া ওয়াজ করার জন্য তোমাকে কিসে প্ররোচিত করেছে? সে বলল: আমরা সেই জ্ঞান প্রচার করি যা আল্লাহ তা‘আলা আমাদেরকে শিক্ষা দিয়েছেন। মুয়াবিয়া বললেন: আমি যদি এর আগে তোমাকে সতর্ক করতাম, তবে আমি তোমার কিছু অংশ কেটে নিতাম (অর্থাৎ কঠোর শাস্তি দিতাম)।

এরপর তিনি মক্কায় যুহরের সালাত আদায় করার পর দাঁড়ালেন এবং বললেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় কিতাবধারীরা তাদের দ্বীনের ব্যাপারে বাহাত্তর দলে বিভক্ত হয়েছিল। আর এই উম্মত তেহাত্তর দলে বিভক্ত হবে। তারা সকলেই জাহান্নামী হবে, কেবল একটি দল ছাড়া; আর সেটি হলো জামা'আত (মূল বৃহৎ দল)। আর আমার উম্মতের মধ্যে এমন কিছু লোক বের হবে, যাদের মধ্যে সেই প্রবৃত্তিসমূহ (বিদ‘আতী ইচ্ছা) এমনভাবে ছড়িয়ে পড়বে যেমন জলাতঙ্ক রোগ কুকুরের কামড়ের শিকার ব্যক্তির মধ্যে ছড়িয়ে পড়ে, ফলে তার কোনো শিরা বা গাঁট বাকি থাকবে না যেখানে তা প্রবেশ করবে না।"

আল্লাহর শপথ, হে আরবের জনগণ! মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা নিয়ে এসেছেন তোমরা যদি তা প্রতিষ্ঠিত না করো, তবে অন্য কারও পক্ষে তা প্রতিষ্ঠা না করা আরও স্বাভাবিক।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده حسن من أجل الأزهر بن عبد الله: وهو الحرازي الحمصي.وأخرجه أحمد 28/ (16937)، وأبو داود (4597) من طريقين عن صفوان بن عمرو، بهذا الإسناد. ويشهد له ما بعده.ويشهد للشطر الأول منه حديث أبي هريرة السالف برقم (106)، وحديث ابن عباس الآتي برقم (8610)، وغيرهما.ويشهد للشطر الثاني منه الأحاديث السابقة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (449)


449 - فأخبرَناه علي بن عبد الله الحَكِيمي ببغداد، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا ثابت بن محمد العابدُ، حدثنا سفيان، عن عبد الرحمن بن زياد، عن عبد الله بن يزيد، عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ليأتيَنَّ على أُمَّتِي ما أَتى على بني إسرائيل مِثلًا بمِثْل، حَذْوَ النعلِ بالنعل، حتى لو كان فيهم مَن نَكَحَ أمَّه علانيةً، كان في أمَّتي مثلُه.إنَّ بني إسرائيل افتَرَقوا على إحدى وسبعين مِلَّةً، وتفترقُ أمَّتي على ثلاث وسبعين مِلَّةً، كلُّها في النار إلّا مِلَّةً واحدة" فقيل له: ما الواحدة؟ قال: "ما أنا عليه اليومَ وأصحابي" [1]. وأما حديث عمرو بن عوف المُزَنيّ:




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার উম্মতের ওপরও ঠিক তেমনটি আপতিত হবে যেমনটি বনী ইসরাঈলের ওপর আপতিত হয়েছিল, হুবহু জুতার সঙ্গে জুতার মিলের মতো। এমনকি যদি তাদের (বনী ইসরাঈলের) মধ্যে এমন কেউ থাকত যে প্রকাশ্যে নিজ মাতাকে বিবাহ করেছিল (বা তার সাথে ব্যভিচার করেছিল), তবে আমার উম্মতের মধ্যেও তেমনই কেউ থাকবে। নিশ্চয়ই বনী ইসরাঈল একাত্তরটি দলে বিভক্ত হয়েছিল এবং আমার উম্মত তিয়াত্তরটি দলে বিভক্ত হবে। তাদের মধ্যে একটি দল ছাড়া বাকি সবাই জাহান্নামে যাবে। তাঁকে (নবীকে) জিজ্ঞাসা করা হলো: সেই একটি দল কোনটি? তিনি বললেন: "যা আজ আমি ও আমার সাহাবীগণ যার ওপর প্রতিষ্ঠিত আছি।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الرحمن بن زياد: وهو ابن أنعُم الإفريقي.سفيان: هو الثوري، وعبد الله بن يزيد: هو أبو عبد الرحمن الحُبُلي.وأخرجه الترمذي (2641) من طريق أبي داود الحَفَري، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. ويشهد له ما بعده.ويشهد للشطر الأول منه حديث أبي هريرة السالف برقم (106)، وحديث ابن عباس الآتي برقم (8610)، وغيرهما.ويشهد للشطر الثاني منه الأحاديث السابقة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (450)


450 - فأخبرَناه علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي والعباس بن الفضل الأسفاطي قالا: حدثنا إسماعيل بن أبي أُوَيس، حدثني كَثِير بن عبد الله بن عمرو بن عوف بن زيد عن أبيه، عن جدِّه قال: كنا قعودًا حولَ رسول الله صلى الله عليه وسلم في مسجده فقال: "لتَسلُكُنَّ سَنَنَ مَن قبلَكم، حَذْوَ النعلِ بالنعل، ولَتَاخُذُنَّ مثلَ أخذِهم إنْ شِبرًا فشِبرٌ، وإنْ ذراعًا فذراعٌ، وإنْ باعًا فباعٌ، حتى لو دخلوا جُحْر ضبٍّ لدخلتم فيه.ألا إنَّ بني إسرائيل افتَرَقَت علي موسى علي سبعين [1] فِرقةً، كلُّها ضالَّةٌ إِلَّا فرقةً واحدة: الإسلامُ، وجماعتُهم، وإنها افتَرقَت على عيسى ابن مريم على إحدى وسبعين فرقةً، كلُّها ضالَّة إلّا فرقةً واحدة: الإسلامُ وجماعتُهم، ثم إنكم تكونون [2] على اثنتين وسبعين فِرقةً، كلُّها ضالَّة إلّا فرقةً واحدة: الإسلامُ وجماعتُهم" [3].آخر كتاب العلم ‌‌كتاب الطهارةحدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظُ إملاء في ذي الحِجَّة سنة ثلاث وتسعين وثلاث مئة:




আমর ইবনু আওফ ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদে তাঁর আশেপাশে বসেছিলাম। অতঃপর তিনি বললেন: তোমরা অবশ্যই তোমাদের পূর্ববর্তীদের পথ অনুসরণ করবে, জুতোয় জুতোয় যেমন মিলে যায়, তদ্রূপ। এবং তোমরা তাদের রীতিনীতি গ্রহণ করবে—যদি তারা এক বিঘত পরিমাণ নেয়, তোমরাও এক বিঘত পরিমাণ নেবে; যদি তারা এক হাত পরিমাণ নেয়, তোমরাও এক হাত পরিমাণ নেবে; যদি তারা এক বাহু পরিমাণ নেয়, তোমরাও এক বাহু পরিমাণ নেবে। এমনকি যদি তারা কোনো গুই সাপের গর্তে প্রবেশ করে, তোমরাও তাতে প্রবেশ করবে। সাবধান! বনী ইসরাঈল মূসা (আঃ)-এর ব্যাপারে সত্তরটি দলে বিভক্ত হয়েছিল। এর মধ্যে একটি দল ছাড়া বাকি সবাই ছিল পথভ্রষ্ট। সেই দলটি হলো: ইসলাম ও তাদের জামাআত। আর তারা ঈসা ইবনু মারইয়াম (আঃ)-এর ব্যাপারে একাত্তরটি দলে বিভক্ত হয়েছিল। একটি দল ছাড়া বাকি সবাই ছিল পথভ্রষ্ট। সেই দলটি হলো: ইসলাম ও তাদের জামাআত। অতঃপর তোমরা বাহাত্তরটি দলে বিভক্ত হবে। একটি দল ছাড়া বাকি সবাই হবে পথভ্রষ্ট। সেই দলটি হলো: ইসলাম ও তাদের জামাআত।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] في (ب): على إحدى وسبعين.



[2] في (ب): ثم إنهم يكونون.



450 [3] - إسناده ضعيف بمرّة من أجل كثير بن عبد الله ابن عمرو المزني، فإنه متفق على ضعفه.وأخرجه ابن أبي عاصم في "السنة" (45)، والطبراني في "الكبير" 17/ (3)، والآجريّ في "الشريعة" (33) من طريقين عن كثير بن عبد الله، بهذا الإسناد. وهو عند الآجري مختصر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (451)


451 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْرِ الخَوْلاني قال: قُرئَ على عبد الله بن وهب: أخبرك مالكُ بن أنس.وأخبرنا أبو بكر بن أبي نصر العَدْل بمَرُو، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا القَعنَبي فيما قَرأَ على مالك: عن زيد بن أسلمَ، عن عطاء بن يَسَار، عن عبد الله الصُّنَابِحي، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "إذا توضأ العبدُ فمضمضَ خرجت الخطايا من فيهِ، فإذا استَنشَر خرجت الخطايا من أنفهِ، فإذا غَسَلَ وجهَه خرجت الخطايا من وجهِه، حتى تخرُجَ من أشفارِ عينَيهِ، فإذا غَسَلَ يديهِ خرجت الخطايا من يديهِ، حتى تخرُجَ الخطايا من تحت أظفارِ يديه، فإذا مَسَحَ برأسِه خرجت الخطايا من رأسه حتى تخرُجَ من أُذُنيه، فإذا غَسَلَ رِجليه خرجت الخطايا من رجلَيه، حتى تخرُجَ من تحت أظفار رِجليه، ثم كان مشيُه إلى المسجد وصلاتُه نافلةً" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه وليس له عِلَّة! وإنما خرَّجا بعضَ هذا المتن من حديث حُمْران عن عثمان، وأبي صالح عن أبي هريرة، غير تَمَامٍ [2]، وعبد الله الصُّنابحي صحابي مشهور، ومالكٌ الإمام الحَكَمُ في حديث المدنيِّين.451 م - سمعت أبا العباس محمد بن يعقوب يقول: سمعت العباس بن محمد الدُّوري يقول: سمعت يحيى بن مَعِين يقول: يروي عطاءُ بن يسار عن عبد الله الصُّنابحي صحابيٍّ، ويقال: أبو عبد الله، والصُّنابحيُّ صاحب أبي بكر الصِّدِّيق رضي الله عنه عبدُ الرحمن بن عُسَيلة، والصُّنابحيُّ صاحب قيس بن أبي حازم يقال له: الصُّنابِحُ بن الأعسَر.




আব্দুল্লাহ আস-সুনাবিহী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো বান্দা ওযু করে এবং কুলি করে, তখন তার মুখ থেকে গুনাহসমূহ বের হয়ে যায়। যখন সে নাকে পানি দেয়, তখন তার নাক থেকে গুনাহসমূহ বের হয়ে যায়। যখন সে তার মুখ ধৌত করে, তখন তার মুখ থেকে গুনাহসমূহ বের হয়ে যায়, এমনকি তার চোখের পাতার নিচ থেকেও বের হয়ে যায়। যখন সে তার দু’হাত ধৌত করে, তখন তার দু’হাত থেকে গুনাহসমূহ বের হয়ে যায়, এমনকি তার হাতের নখের নিচ থেকেও গুনাহসমূহ বের হয়ে যায়। যখন সে তার মাথা মাসাহ করে, তখন তার মাথা থেকে গুনাহসমূহ বের হয়ে যায়, এমনকি তার কান দু’টি থেকেও বের হয়ে যায়। যখন সে তার দু’পা ধৌত করে, তখন তার দু’পা থেকে গুনাহসমূহ বের হয়ে যায়, এমনকি তার পায়ের নখের নিচ থেকেও বের হয়ে যায়। এরপর মসজিদে তার পথচলা এবং তার সালাত (নামায) তার জন্য অতিরিক্ত (নফল) প্রতিদান হয়ে যায়।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد مرسل قوي، والصواب فيه أنه من رواية أبي عبد الله الصُّنابحي، وهو تابعي لاصحابي، وانظر الكلام في تحرير ذلك في التعليق على "مسند أحمد" 21/ 409 - 412.وأخرجه أحمد 31/ (19068)، والنسائي (107) من طرق عن مالك، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 31/ (19064) و (19065)، وابن ماجه (282) من طريقين عن زيد بن أسلم، به. ابن عبسة، وهو عند مسلم كذلك برقم (832).



[2] خرجهما مسلم دون البخاري، أما حديث حمران عن عثمان فهو عنده برقم (245)، وأما حديث أبي صالح عن أبي هريرة فهو عنده برقم (244). ويشهد للحديث أيضًا حديث عمرو ابن عبسة، وهو عند مسلم كذلك برقم (832).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (452)


452 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا رَوْح بن عُبَادة، حدثنا شُعْبة.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا أبو الوليد وأبو عمر ومحمد بن كَثير قالوا: حدثنا شُعبة.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شُعبة، عن الأعمش، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن ثَوْبانَ، أَنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "استقيموا، ولن تُحصُوا، واعلموا أَنَّ خيرَ دينِكم الصلاةُ، ولا يحافظُ على الوُضوء إلّا مؤمن" [1].




ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা দৃঢ়পদ হও (অর্থাৎ সোজা পথে দৃঢ় থাকো), কিন্তু তোমরা এর পূর্ণ হক আদায় করে শেষ করতে পারবে না। আর তোমরা জেনে রাখো যে, তোমাদের দ্বীনের শ্রেষ্ঠ আমল হলো সালাত (নামায)। মুমিন ব্যক্তি ছাড়া অন্য কেউ ওযূর (পবিত্রতা) ওপর যত্নশীল হয় না।”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات إلّا أنه منقطع بين سالم بن أبي الجعد وثوبان، فإنَّ سالمًا لم يسمع منه، لكنه متابع تابعه عبد الرحمن بن ميسرة عند أحمد 37/ (22414)، وأبو كبشة السَّلولي عند أحمد أيضًا (22433)، وابن حبان (1037).وأخرجه أحمد 37/ (22378) و (22436) من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد.قوله: "لن تُحصُوا" أي: لن تطيقوا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (453)


453 - [حدثنا أبو الحسن علي بن محمد بن عُقْبة] [1] الشيباني بالكوفة، حدثنا إبراهيم بن إسحاق القاضي الزُّهْري، حدثنا محمد بن عُبيد، حدثنا الأعمش. وأخبرنا أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن أحمد بن النَّضْر، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا زائدة، عن الأعمش، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن ثَوْبان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "استقيموا، ولن تُحصُوا، واعلموا أن خيرَ أعمالِكم الصلاةُ، ولن يحافظَ على الوُضوءِ إلّا مؤمنٌ".وقد تابع منصورُ بن المعتمر الأعمشَ في هذه الرواية عن سالم:




থাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা (সৎপথে) অবিচল থাকো, তবে তোমরা সব কিছুর পূর্ণতা অর্জন করতে পারবে না। আর জেনে রাখো, তোমাদের সর্বোত্তম আমল হলো সালাত (নামায)। আর মুমিন ব্যতীত অন্য কেউ ওযুর প্রতি যত্নবান হতে পারে না।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] ما بين المعقوفين مكانه في النسخ بياض، واستدركناه من "شعب الإيمان" للبيهقي (2457) حيث رواه عن المصنف بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (454)


454 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أَسِيد بن عاصم، حدثنا الحسين بن حفص عن سفيان.وأخبرنا الحسين بن الحسن بن أيوب، حدثنا أبو يحيى بن أبي مَسَرَّة، حدثنا خلاد بن يحيى، حدثنا سفيان.وأخبرنا أبو الفضل بن إبراهيم، حدثنا جعفر بن محمد بن الحسين، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا وَكِيع، عن سفيان، عن منصور، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن ثَوْبان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "استقيموا، ولن تُحصُوا، واعلموا أَنَّ خير أعمالِكم الصلاةُ، ولا يحافظُ على الوُضوءِ إلّا مؤمنٌ" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.ولست أعرفُ له عِلَّةً يُعلَّل بمثلها مثلُ هذا الحديث إلّا وهمٌ من أبي بلال الأشعري وَهِمَ فيه على أبي معاوية:




ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সরল ও দৃঢ় থাকো, আর তোমরা তা সম্পূর্ণরূপে গণনা করতে সক্ষম হবে না (বা সব নেক আমল করতে পারবে না)। আর তোমরা জেনে রাখো যে তোমাদের শ্রেষ্ঠ আমল হলো সালাত (নামায)। আর মুমিন ছাড়া কেউ ওযুর প্রতি যত্নবান থাকে না।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح كسابقه. سفيان: هو الثوري.وأخرجه ابن ماجه (277) عن علي بن محمد، عن وكيع، بإسناده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (455)


455 - حدَّثَنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه، أخبرنا الحسين بن بشّار الخَيَّاط [1] ببغداد، حدثنا أبو بلال الأشعري، حدثنا محمد بن خازِم، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "استقيموا، ولن تُحصُوا، واعلموا أنَّ خيرَ أعمالكم الصلاةُ، ولن يُواظِبَ على الوُضوءِ إلّا مؤمن" [2].




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা সরল ও দৃঢ় (সঠিক পথে) থাকো, আর (জেনে রেখো) তোমরা কখনো (সকল আমলের) পূর্ণ হিসাব রাখতে পারবে না। আর তোমরা এও জেনে রাখো যে তোমাদের সর্বোত্তম আমল হলো সালাত (নামাজ)। আর মুমিন ব্যতীত অন্য কেউ অজুর উপর সর্বদা যতœবান হয় না।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] تصحف في بعض نسخ "المستدرك" إلى: الحسين بن يسار الحناط، والصواب ما أثبتنا، وهكذا سماه الخطيب البغدادي في "تلخيص المتشابه في الرسم" ص 688، كما أنَّ السمعاني ذكره في ر رسم الخياط من كتابه "الأنساب".



[2] إسناده ضعيف، أبو بلال الأشعري ضعفه الدارقطني في "السنن" (857)، ثم إنه قد وهمَ فيه كما ذكر المصنف، والمحفوظ حديث ثوبان السابق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (456)


456 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الفضل بن محمد بن المسيَّب، حدثنا أبو ثابت محمد بن عُبيد الله، حدثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلمَ، عن عطاء بن يَسَار، عن زيد بن خالد الجُهَني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من توضَّأ فأحسنَ وُضوءَه، ثم صلَّى ركعتين لا يَسهُو فيهما، غُفِرَ له ما تقدَّم من ذنبِه" [1].




যায়দ ইবনে খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি উত্তমরূপে ওযু করে, অতঃপর দু'রাকাত সালাত (নামাজ) এমনভাবে আদায় করে যে, তাতে কোনো ভুল (অন্যমনস্কতা) করে না, তার পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل هشام بن سعد.وأخرجه أحمد 28/ (17054)، وعنه أبو داود (905) عن أبي عامر عبد الملك بن عمرو، عن هشام بن سعد، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 36/ (21691) من طريق عبد العزيز الدراوردي، عن زيد بن أسلم، عن زيد بن خالد الجهني. وهذا إسناد فيه انقطاع بين زيد بن أسلم وزيد بن خالد، بينهما فيه عطاء بن يسار كما في رواية هشام بن سعد.وله شاهد من حديث عثمان بن عفان عند البخاري (1934)، ومسلم (226).



457 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (457)


457 - حدَّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا العباس بن الفضل الأسفاطي، حدثنا أبو ثابت، حدثنا عبد العزيز، عن هشام بن سعد، فذكره نحوه.هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولا أحفظُ له علة تُوهِنُه، ولم يُخرجاه.وقد وَهِمَ محمدُ بن أَبَان على زيد بن أسلمَ في إسناد هذا الحديث:




৪৫৭ - এটি আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আবূ বকর ইবনু ইসহাক। তিনি বলেন, আমাদের জানিয়েছেন আল-আববাস ইবনুল ফাদল আল-আসফাতী। তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আবূ সাবিত। তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আব্দুল আযীয, তিনি বর্ণনা করেন হিশাম ইবনু সা'দ থেকে। অতঃপর তিনি অনুরূপ উল্লেখ করেছেন। এই হাদীসটি ইমাম মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ। আমি এর কোনো দুর্বলকারী ত্রুটি বা ইল্লাহ্ জানি না। তবে তারা দুজন (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি। আর মুহাম্মাদ ইবনু আবান এই হাদীসের ইসনাদে যায়দ ইবনু আসলামের সূত্রে ভুল করেছেন।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (458)


458 - … [1] بن صالح، حدثنا محمد بن أَبَان، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يَسَار، عن عُقْبة بن عامرٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من توضَّأَ فأحسنَ الوُضوءَ، ثم صلَّى ركعتين لا يَسهُو فيهما، غُفِرَ له ما تقدَّم من ذنبِه" [2].هذا وهمٌ من محمد بن أبان، وهو واهي الحديث غيرُ محتَجٍّ به، وقد احتَجَّ مسلمٌ بهشام بن سعد.




উকবাহ ইবনে আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি উত্তমরূপে ওযু করে, অতঃপর এমন দু’রাকাআত সালাত আদায় করে যাতে তার কোনো ভুল হয় না, তার পূর্বের গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] هنا بياض في الأصول لم نتبيّنه، ولم يذكر الحافظ ابن حجر هذا الحديث في "إتحاف المهرة".



[2] إسناده ضعيف من هذا الوجه من أجل محمد بن أبان وهو ابن صالح القرشي الكوفي، وله ترجمة في "ميزان الاعتدال" للذهبي.لكن هذا الحديث قد صحَّ من غير طريق عطاء بن يسار عن عقبة بن عامر، فقد أخرج نحوه أحمد 28/ (17314) و (17393) و (17449)، ومسلم (234)، وأبو داود (169) و (170) و (906)، والنسائي (177) من طرق عن عقبة رفعه قال: "ما من مسلم يتوضأ فيحسن وضوءَه ثم يقوم فيصلِّي ركعتين، مقبلٌ عليهما بقلبه، ووجهه، إلّا وَجَبَت له الجنة"، واللفظ لمسلم، وبعضهم يذكر فيه لعقبة قصةً مع عمر. وانظر ما سيأتي عند المصنف برقم (3550).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (459)


459 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا محمد بن عبيد الله المَدِيني، حدثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن الضحاك بن عثمان، عن أيوب بن موسى، عن أبي عُبيد مولى سليمان بن عبد الملك، عن عمرو بن عَبَسَة: أنَّ أبا عُبيدٍ قال له: حدِّثنا حديثًا سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم غيرَ مرَّةٍ ولا مرتين ولا ثلاثٍ يقول: "إذا توضَّأ العبدُ المؤمنُ فمَضمَضَ واستَنثَرَ، خرجت الخطايا من أطرافِ فمِه، فإذا غَسَلَ يديه تَناثَرت الخطايا من أظفارِه، فإذا مَسَحَ برأسه تَناثَرَت الخطايا من أطرافِ رأسه، فإن قام فصلَّى ركعتين، يُقبِلُ فيهما بقلبِه وطَرْفِه إلى الله عز وجل، خرج من ذُنوبه كما ولدته أمُّه [1]. هذا حديث صحيح الإسناد على شرطهما، ولم يُخرجاه، وأبو عُبيد تابعيٌّ قديم لا يُنكَر سماعُه من عمرو بن عَبَسة، وفي الحديث صِحَّةُ سماعه به.وله شاهد على شرط مسلم عن عمرو بن عَبَسة:




আমর ইবনে আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একবার নয়, দু'বার নয়, তিনবারও নয়, বরং একাধিকবার বলতে শুনেছি: "যখন কোনো মু'মিন বান্দা ওযু করে এবং কুলি করে ও নাকে পানি দিয়ে ঝেড়ে ফেলে, তখন তার মুখের কোণা থেকে গুনাহসমূহ বের হয়ে যায়। যখন সে তার দু'হাত ধৌত করে, তখন তার নখ থেকে গুনাহসমূহ ঝরে পড়ে। যখন সে তার মাথা মাসাহ করে, তখন তার মাথার প্রান্ত (চুলের ডগা) থেকে গুনাহসমূহ ঝরে পড়ে। অতঃপর যদি সে দাঁড়িয়ে দু'রাকআত সালাত আদায় করে—যেখানে সে তার অন্তর ও দৃষ্টি উভয়টি আল্লাহ আযযা ওয়াজাল্ল-এর দিকে নিবদ্ধ রাখে—তাহলে সে তার গুনাহ থেকে এমনভাবে বেরিয়ে আসে যেন তার মা তাকে এই মাত্র জন্ম দিয়েছে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] إسناده قوي. وهو قطعة من حديث عمرو بن عبسة الطويل في قصة إسلامه، وسيأتي عند المصنف برقم (593) من طريق أبي أمامة الباهلي عنه.وأخرجه الطبراني في "مسند الشاميين" (1320) عن العباس بن الفضل الأسفاطي، عن محمد بن عبيد الله المدني، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 6/ 138 من طريق محمد بن عجلان، عن أبي عبيد، به.وأخرجه بنحوه أحمد 28/ (17026)، وابن ماجه (283) من طريق عبد الرحمن بن البيلماني، عن عمرو بن عبسة. ورواية أحمد مطولة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (460)


460 - أخبرَناه أبو محمد جعفر بن محمد بن نُصَير الخوَّاص، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا حجَّاج بن مِنْهال، حدثنا حمَّاد بن سَلَمة.وأخبرني أبو بكر بن عبد الله - واللفظ له - أخبرنا الحسن بن سفيان، حدثنا هُدْبة بن خالد، حدثنا حمَّاد بن سَلَمة، عن أيوب، عن أبي قِلَابة قال: قال شُرَحبيل بن حَسَنةَ: مَن رجلٌ يحدِّثنا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال عمرو بن عَبَسة: أنا، سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم لا مرَّةً ولا مرَّتين - حتى عدَّ خمس مرَّات - يقول: "إذا قرَّبَ المسلمُ وَضُوءَه فغَسَلَ كفَّيهِ، خرجت ذنوبُه من بين أصابِعه وأطرافِ أناملِه، فإذا غسل وجهَه، خرجت ذنوبُه من أطرافِ لحيتهِ، فإذا مَسَحَ برأسِه، خرجت ذنوبُه من أطرافِ شعرِه، فإذا غسل رجلَيه، خرجت ذنوبُه من بُطُونِ قَدَميهِ" [1].




আমর ইবনে আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শুরহাবিল ইবনে হাসানা জিজ্ঞেস করলেন: এমন কেউ কি আছেন, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে আমাদের কোনো হাদীস বর্ণনা করবেন? তখন আমর ইবনে আবাসা বললেন: আমি। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একবার নয়, দু’বার নয়—এমনকি পাঁচবার গণনা করে—বলতে শুনেছি:

"যখন কোনো মুসলিম ওযুর পানি নিকটে আনে এবং তার দু’হাতের কব্জি ধৌত করে, তখন তার গুনাহসমূহ তার আঙ্গুলসমূহের ফাঁক দিয়ে এবং তার নখের অগ্রভাগ দিয়ে বের হয়ে যায়। এরপর যখন সে তার মুখমণ্ডল ধৌত করে, তখন তার গুনাহসমূহ তার দাঁড়ির প্রান্তভাগ দিয়ে বের হয়ে যায়। এরপর যখন সে তার মাথা মাসাহ করে, তখন তার গুনাহসমূহ তার চুলের আগা দিয়ে বের হয়ে যায়। এরপর যখন সে তার দু’পা ধৌত করে, তখন তার গুনাহসমূহ তার পদতলের নিম্নভাগ দিয়ে বের হয়ে যায়।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:

[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات إلّا أنه منقطع، أبو قلابة - وهو عبد الله بن زيد الجرمي - لم يدرك شرحبيل بن حَسَنة، وانظر ما قبله. وأخرجه أبو عبيد في "الطهور" (14)، وعبد بن حميد (91)، والبزار (528)، وأبو يعلى (488)، وابن شاهين في "الترغيب في فضائل الأعمال" (36)، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 1/ 432 - 433، والضياء المقدسي في "المختارة" (477) من طرق عن صفوان بن عيسى، به.وأخرجه البزار (529) من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، والبَرْقاني في زياداته على "العلل" للدارقطني 3/ 223 (374) من طريق عبد العزيز الدراوردي، والبيهقي في "الشعب" (2485) من طريق أبي ضمرة أنس بن عياض، ثلاثتهم عن الحارث بن عبد الرحمن بن أبي ذباب، عن أبي العيّاس، عن سعيد بن المسيب، به.ويشهد له حديث أبي هريرة عند مسلم (251).وحديث أبي سعيد الخدري عند أحمد 17/ (10994)، وابن ماجه (427)، وابن حبان (402).