হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4241)


4241 - أخبرني أبو سعيد الأحمَسي، حدثنا الحُسين بن حُميد، حدثنا أحمد بن مَنِيع، حدثنا عبّاد بن العَوّام، حدثنا حجّاج، عن سِماك بن حَرْب، عن جابر بن سَمُرة، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يضحكُ إلَّا تَبسُّمًا، وكان في ساقِه حُمُوشةٌ، وكنتَ إِذا نَظَرْتَ إليه قُلتَ: أَكْحلُ العَينَين، وليس بأكْحَلَ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মুচকি হাসি ছাড়া হাসতেন না। আর তাঁর দুই পায়ে (গোড়ালির অংশে) সুঠাম গড়ন (কিছুটা ক্ষীণতা) ছিল। যখন আপনি তাঁর দিকে তাকাতেন, তখন বলতেন: তাঁর চোখ সুরমা মাখা, অথচ তিনি সুরমা মাখতেন না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، حجاج - وهو ابن أرطاة - فيه لين، وهو مدلِّس وقد عنعنه.وأخرجه الترمذي (3645) عن أحمد بن منيع بهذا الإسناد. وقال: حسن غريب.وأخرجه أحمد 34/ (21004) عن سريج بن النعمان، عن عباد بن العوّام، به.والمعروف في حديث جابر بن سمرة ذكر قلة لحم العَقِبَ فقط دون ذكر الساق، كما في بعض روايات الحديث الذي قبل هذا، حيث قال جابر: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم منهُوس العَقِب، وفَسَّره سِماكٌ راويه بأنه قليل لحم العَقِب.ويشهد لقوله: لا يضحك إلّا تبسُّمًا، حديث عائشة عند البخاري (4824)، ومسلم (899) أنها قالت: ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم مستجمعًا ضاحكًا حتى أرى منه لهواتهِ، إنما كان يتبسَّم.وحديث عبد الله بن الحارث عند الترمذي (3642) وصحَّحه.وقوله: "أكحل العينين وليس بأكحل" فهو إنما يكون بسبب كثرة الشعر النابت على حرفي الجَفْن، ويشهد له حديث أبي هريرة في وصفته صلى الله عليه وسلم عند أحمد 14 (8352) وغيره: أنه صلى الله عليه وسلم كان أهدب أشفار العينين. وإسناده حسن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4242)


4242 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن مرزوق، حدثنا حُميد بن إبراهيم الصائغ، حدثنا شُعْبة، عن سِماك بن حرب، عن جابر بن سَمُرة، قال: رأيتُ خاتَمَ النُّبوَّة على ظهر رسول الله صلى الله عليه وسلم مثلَ بَيضةِ الحَمامِ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!




জাবির ইবনু সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিঠে নবুওয়তের মোহর দেখেছি, যা ছিল কবুতরের ডিমের মতো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل حميد بن إبراهيم الصائغ - وهو حميد بن أبي زياد الكوفي - فقد روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات"، ومن أجل سماك بن حرب أيضًا، فكلاهما حسن الحديث.وأخرجه أحمد 34/ (20835)، ومسلم (2344)، وابن حبان (6298) و (6301) من طرق عن شُعْبة، بهذا الإسناد. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد (20998)، و (20999)، ومسلم (2344)، والترمذي (3644)، وابن حبان (6297) من طرق عن سماك بن حرب، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4243)


4243 - أخبرني أبو جعفر محمد بن حاتم الكَشِّيّ، حدثنا عبد بن حُميد، أخبرنا أبو عاصم، عن عَزْرَةَ بن ثابت، حدثني عِلْباءُ بن أحمرَ اليَشكُري، عن أبي زيد قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا أبا زيد ادْنُ فامْسَحُ ظَهْري" قال: فدنَوتُ منه ومسحتُ ظهرَه، ووضعتُ أصابعي على الخاتَم فغَمَزْتُها، فقيل له: ما الخاتَمُ؟ قال: شَعرٌ مُجتمِعٌ عند كتفِه [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: “হে আবূ যায়েদ, কাছে এসো এবং আমার পিঠে হাত বুলাও।” তিনি (আবূ যায়েদ) বললেন: অতঃপর আমি তাঁর কাছে গেলাম এবং তাঁর পিঠে হাত বুলালাম। আমি আমার আঙ্গুলগুলো মোহরের (খাতাম) ওপর রাখলাম এবং তা টিপে দিলাম। তাঁকে (ইলবা ইবনে আহমারকে) জিজ্ঞাসা করা হলো: মোহরটি (খাতাম) কী? তিনি বললেন: সেটি ছিল তাঁর কাঁধের কাছে একত্রিত হওয়া কিছু চুল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وأبو جعفر محمد بن حاتم الكَشِّيّ تَكلَّم أبو عبد الله الحاكم نفسُه في سماعه من عبد بن حميد، لكن روي الحديث من وجوه أخرى عن أبي عاصم - وهو الضحّاك بن مخلد - ورواه غير أبي عاصم عن علباء بن أحمر، ورواه أبو نهيك عثمان بن نهيك الأزدي بنحوه عن أبي زيد: واسمه عمرو بن أخْطَب.وأخرجه أحمد 37/ (22889) عن أبي عاصم الضحاك بن مخلد، وابن حبان (6300) من طريق ابن أبي عاصم، عن أبيه، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 34/ (20732) عن حَرَمي بن عُمارة، عن عَزْرة بن ثابت، به.وأخرجه بنحوه أحمد 37/ (22882) من طريق أبي نَهيك الأزدي، عن أبي زيد عمرو بن أخْطَب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4244)


4244 - حدثنا أبو بكر الشافعي وأبو بكر القطيعي في آخَرِين، قالوا: حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا حماد بن خالد، حدثنا مالك بن أنس، عن زياد بن سعد، عن الزُّهْري، عن أنس بن مالك، قال: سَدَلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم نَاصِيتَه ما شاء الله، ثم فَرَقَ بعدُ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কপালের চুলকে (মাথার সামনের অংশকে) আল্লাহ যতক্ষণ চেয়েছেন, ততক্ষণ ঝুলিয়ে রাখতেন। এরপর তিনি তা সিঁথি করতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لكن من حديث الزُّهْري عن عُبيد الله بن عبد الله بن عُتبة عن ابن عبّاسٍ، كما قال الإمام أحمد فيما نقله عنه ابن عبد البر في "التمهيد" 6/ 71، وقال محمد بن يحيى الذُّهْلي فيما نقله عنه ابن عبد البر 6/ 73 - 74: هو الصحيح المحفوظ.فقد خالف حمادَ بن خالد - وهو الخيّاط - جميع أصحاب مالك الذين رووه عنه عن زياد بن سعد عن الزُّهْري مرسلًا، فالمحفوظ إذًا في حديث مالك الإرسالُ، كما قال ابن عبد البر في "التمهيد" 6/ 69، وفي غير حديث مالك المحفوظ هو الوصل كما قال أحمد والذُّهلي، لكن عن الزُّهْري عن عبيد الله بن عبد الله عن ابن عبّاس.وهو في "مسند أحمد" 20/ (13254).وأخرجه النسائي (9283) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، عن مالك، عن زياد بن سعد، عن الزُّهْري، مرسلًا. وكذلك هو في "الموطأ" برواية يحيى الليثي 2/ 948، وفي رواية أبي مصعب الزُّهْري (1992)، وفي رواية سويد بن سعيد بإثر (660).وأخرجه أحمد 4/ (2605) و 5/ (2942)، والبخاري (3558) و (3944)، ومسلم (2336)، والنسائي (9282)، وابن حبان (5485) من طريق يونس بن يزيد الأيلي، وأحمد 4/ (2209) و (2364)، والبخاري (5917)، ومسلم (2336)، وأبو داود (4188)، وابن ماجه (3632) من طريق إبراهيم بن سعد، كلاهما عن الزُّهْري، عن عُبيد الله بن عبد الله، عن ابن عبّاس. من طرق عن حريز بن عثمان، به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4245)


4245 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو زُرْعة عبد الرحمن بن عمرو الدمشقي، حدثنا علي بن عيّاش، حدثنا حَرِيز بن عُثمان: قلت لعبد الله بن بُسْر السُّلَمي: رأيتَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، أكانَ شيخًا؟ قال: كان في عَنْفَقَتِهِ شَعَراتٌ بِيضٌ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!




আব্দুল্লাহ ইবনু বুস্র আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। হারীয ইবনু উসমান (রাহঃ) তাকে জিজ্ঞেস করলেন, আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছেন? তিনি কি বৃদ্ধ ছিলেন? তিনি বললেন, তাঁর চিবুকের নিচের অংশে (আনফাক্বা) কয়েকটি সাদা চুল ছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 29/ (17672) و (17681) و (17682) و (17699)، والبخاري (3546) من طرق عن حريز بن عثمان، به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4246)


4246 - حدثنا أبو بكر أحمد بن سَلْمان الفقيه ببغداد، حدثنا هلال بن العلاء الرَّقِّي، حدثنا حسين بن عيّاش الرَّقّي، حدثنا جعفر بن بُرْقان، حدثنا عبد الله محمد بن محمد بن عَقِيل، قال: قَدِمَ أنسُ بن مالك المدينةَ وعمرُ بن عبد العزيز والٍ، فبعث إليه، عمرُ، وقال للرسول: سَلْهُ هل خَضَبَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم؟ فإني رأيتُ شعرًا من شعره قد لُوِّن! فقال أنس: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان قد مُتِّع بالسواد، ولو عَدَدتُ ما أقبَلَ عَلَيَّ من شَيبِهِ في رأسِه ولحيتِه ما كنتُ أزِيدُهُنّ على إحدى عشرةَ شَيْبة، وإنما هذا الذي لُوِّن من الطِّيبِ الذي كان يُطيِّبُ شعرَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মদীনায় আগমন করলেন যখন উমার ইবনু আব্দুল আযীয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (সেখানকার) শাসক ছিলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে একজন দূত পাঠালেন এবং দূতকে বললেন: তাঁকে জিজ্ঞেস করুন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি (চুলে) খেযাব (রঙ) ব্যবহার করেছিলেন? কেননা আমি তাঁর কিছু চুল রঙিন দেখেছি! আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কালো চুলের (অর্থাৎ বার্ধক্যবিহীন তারুণ্যের) সাথে ধন্য ছিলেন। যদি আমি তাঁর মাথা ও দাড়িতে আমার দিকে আসা বার্ধক্যের চুলগুলো গণনা করতাম, তবে তা এগারটির বেশি হতো না। আর এই যে চুলগুলো রঙিন দেখা যায়, তা হলো সেই সুগন্ধি থেকে, যা দিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর চুল সুবাসিত করতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن إن شاء الله من أجل عبد الله بن محمد بن عَقيل، فحديثه حسن في الاعتبار، ويشهد له حديث جابر بن سمُرة الذي بعده، وروي عن أنس من غير وجهٍ نَفْيُه أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يخضب، ورُوي عن عائشة ما يُفهَم منه عدمُ اختصابه صلى الله عليه وسلم، وعند البخاري (3547) عن ربيعة ابن أبي عبد الرحمن قال: رأيتُ شعرًا من شعره صلى الله عليه وسلم، فإذا هو أحمر، فسألتُ، فقيل: احمرَّ من الطِّيب.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 239 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تهذيب الآثار" في قسم مسند بقية العشرة (967) عن هلال بن العلاء به.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (6477) من طريق محمد بن حمزة الرقّي، عن جعفر بن بُرقان، به.وأخرج البخاري (5895)، ومسلم (2341)، وأبو داود (4209) من طريق ثابت البناني، قال: سئل أنس بن مالك عن خضاب النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: لو شئت أن أعُدَّ شَمَطَاتٍ كُنَّ في رأسه فعلْتُ، وقال: لم يختضب، وقد اختضب أبو بكر بالحناء والكَتَم. هذا لفظ مسلم وفي رواية عند أحمد 19/ (12474) زيادة ما كان في رأسه ولحيته يوم مات ثلاثون شعرة بيضاء، وفي رواية أخرى ستأتي برقم (4250): إلّا تسع عشرة أو ثمان عشرة. وفي رواية عند ابن حبان (6293): إلّا أربع عشرة شعرة بيضاء.وأخرج أحمد 20/ (13263) و 21/ (13809)، والبخاري (3550)، ومسلم (2341)، والنسائي (9308)، وابن حبان (6296) من طريق قَتَادة عن أنس، قال: لم يختضب رسول الله صلى الله عليه وسلم إنما كان البياض في عَنْفَقَتِه وفي الصُّدغين وفي الرأس، نَبْذٌ، واللفظ لمسلم. وأخرج أحمد 20/ (12635)، والبخاري (5894)، ومسلم (2341) من طريق محمد بن سِيرِين، قال: سألت أنس بن مالك: أخضب رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: إنه لم يَرَ من الشيب إلّا قليلًا. هذا لفظ مسلم زاد أحمد في روايته ومسلم في رواية عنده: وقد خضب أبو بكر وعمر بالحِنّاء والكَتَم.وأخرج أحمد 19/ (11965) و (12054)، وابن ماجه (3629) من طريق حميد الطويل، عن أنس بنحو لفظ ابن سِيرين المذكور، لكنه قال: إلّا نحوًا من سبع عشرة أو عشرين شعرة في مقدّم لحيته.وكذلك قال ربيعة بن أبي عبد الرحمن عن أنس عند أحمد 19/ (12326)، والبخاري (3547)، ومسلم (2347)، والترمذي (3623)، وابن حبان (6387) بأنه ليس في رأسه ولحيته صلى الله عليه وسلم عشرون شعرة بيضاء. لكن ليس في روايته ذكر خضابه صلى الله عليه وسلم.وأخرج مسلم (2341) من طريق أبي إياس، عن أنس: أنه سئل عن شيب النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: ما شانه الله ببيضاءَ.وقد جاء عن غير أنس أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يخضب: فقد أخرج أحمد 9/ (5338)، والبخاري (1660)، ومسلم (1187)، عن عبد الله بن عمر، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصبغ بالصُّفْرة.وأخرج أحمد 44/ (26535) و (26539)، والبخاري (5896) و (5897) عن عثمان بن عبد الله بن موهب: أنَّ أم سلمة أخرجت شعرًا من شعر النبي صلى الله عليه وسلم مخضُوب أحمر بالحناء والكَتَم. هذا لفظ أحمد في الموضع الأول وفي رواية البخاري الأولى: قال عثمان: فاطّلعتُ في الجلجل، فرأيت شعرات حُمرًا. وأفاد الحافظ في "الفتح" 18/ 201 أنَّ هذا ظاهره يفيد أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يخضب.وسيأتي عند المصنف من حديث أبي رِمثة برقم (4248) بلفظ: له شعر قد عَلاهُ الشيب وشيبُه أحمر مخضوبٌ بالحِنَّاء.وجاء عن عائشة ما يؤيد قول أنس بن مالك من نفي كون النبي صلى الله عليه وسلم كان يخضب، وذلك فيما سيأتي برقم (4249) قالت: ما شَانَهُ الله ببيضاء. وفيما أخرجه مالك في "الموطأ" 2/ 949 - 950 عن أبي سلمة بن عبد الرحمن: أنَّ عبد الرحمن بن الأسود بن عبد يغوث قال: وكان جليسًا لهم، وكان أبيض اللحية والرأس، قال: فغدا عليهم ذات يوم وقد حمَّرهما، قال: فقال له بعض القوم: هذا أحسن، فقال: إنَّ أمي عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أرسلت إليَّ البارحة جاريتها نُخيلة، فأقسمت عليَّ لأصبغنَّ، وأخبرتني أنَّ أبا بكر الصديق كان يصبغ. قال مالك: في هذا الحديث بيان أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يصبغ، ولو صبغ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لأرسلت بذلك عائشة إلى عبد الرحمن بن الأسود. قلنا: كيف وقد صرَّحت رضي الله عنها في رواية المصنف بأنه لم يَشِنْهُ الله ببيضاء صلى الله عليه وسلم.وقال الإسماعيلي فيما نقله عنه الحافظ ابن حجر في "الفتح" 18/ 201 معلقًا على حديث ابن موهب عن أم سلمة: ليس فيه بيان أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم هو الذي خضب، بل يحتمل أن يكون احمرّ بعده لما خالطه من طيب فيه صفرة، فغلبت به الصفرة. قال: فإن كان كذلك وإلّا فحديث أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم لم يخضب أصحُّ.ثم قال الحافظ: الذي أبداه احتمالًا تقدم معناه موصولًا إلى أنس وأنه جزم بأنه إنما احمرَّ من الطِّيب. قلنا: يريد الحافظ رواية ربيعة بن أبي عبد الرحمن التي تقدم ذكرها، فإنَّ فيها أنَّ ربيعة سأل عن ذلك، ومال الحافظ إلى أنه إنما سأل أنسًا مستندًا إلى رواية ابن عقيل هذه التي عند المصنف. قلنا: ويؤيده رواية جابر بن سمرة التي بعده.وجمع الطبري بين الأخبار في النفي والإثبات بما حاصله: أنَّ من جزم أنه صلى الله عليه وسلم خضب أنه حكى ما شاهده، وكان ذلك في بعض الأحيان، ومن نفى ذلك كأنس فهو محمول على الأكثر الأغلب من حاله.ورجَّح الطحاوي في "شرح المشكل" 9/ 35، وابن كثير في "البداية والنهاية" 8/ 417 خلاف ما قاله أنس، فقال ابن كثير: نفي أنس للخطاب معارض بما تقدم عن غيره من إثباته، والقاعدة المقررة أنَّ الإثبات مقدّم على النفي، لأنَّ المثبت معه زيادة علم ليست عند النافي، وهكذا إثبات غيره لأزيد مما ذَكَر من الشيب مقدَّم، لا سيما عن ابن عمر المظنون أنه تلقى ذلك عن أخته حفصة، فإنَّ اطّلاعها أتم من اطلاع أنس، لأنها ربما فَلَتْ رأسه الكريم صلى الله عليه وسلم. قلنا: وسبقهم أحمد بن حنبل فيما نقله عنه الحافظ في "الفتح" 10/ 416، فأنكر إنكار أنس أنه خضب، وذكر حديث ابن عمر الذي ذكرناهُ.لكن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم لو علمته صبغ، لنبَّهت عليه في خطابها لعبد الرحمن بن الأسود، كما بيَّنه مالك بن أنس كم تقدم، فقول مالك أوجَهُ وأقعدُ من قول غيره، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4247)


4247 - أخبرني أبو سعيد الأحمَسي، حدثنا الحسين بن حُميد، حدثنا إبراهيم بن الحجّاج، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن سماك بن حَرْب، عن جابر بن سَمُرة قال: ما كان في رأس رسول الله صلى الله عليه وسلم إِلَّا شَعَرَاتٌ [1] في مَفْرِقِ رأسه، إذا ادَّهَن واراهُنَّ الدُّهْنُ [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه!




জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর মাথায় তাঁর চুলের সিঁথির মধ্যে সামান্য কয়েকটি চুল ছাড়া আর কিছু ছিল না। যখন তিনি তেল ব্যবহার করতেন, তখন সেই তেল সেগুলোকে আবৃত করে দিত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] زاد في المطبوع: بِيض. وأخرجه أحمد 34/ (20840) و (2988) و (20992) من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (20807)، ومسلم (2344)، والنسائي (9345) من طريق شُعْبة بن الحجاج، وأحمد 34/ (20998) و (20999)، ومسلم (2344)، وابن حبان (6297) من طريق إسرائيل بن يونس السَّبيعي، كلاهما عن سماك، به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.والدُّهْن: هو الطِّيْب.



[2] إسناده حسن من أجل سماك بن حرب، فهو حسن الحديث، والحسين بن حميد - وهو ابن الربيع - متابع. وأخرجه أحمد 34/ (20840) و (2988) و (20992) من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (20807)، ومسلم (2344)، والنسائي (9345) من طريق شُعْبة بن الحجاج، وأحمد 34/ (20998) و (20999)، ومسلم (2344)، وابن حبان (6297) من طريق إسرائيل بن يونس السَّبيعي، كلاهما عن سماك، به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.والدُّهْن: هو الطِّيْب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4248)


4248 - أخبرنا أبو العباس السَّيّاري، حدثنا محمد بن موسى بن حاتم، حدثنا علي بن الحسن بن شَقيق، أخبرنا أبو حمزة، عن عبد الملك بن عُمَير، عن إياد بن لَقِيطٍ، عن أبي رِمْثة، قال: أتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم وعليه بُزْدان أخضَران، وله شَعرٌ قد عَلاهُ الشَّيبُ، وشَيبُه أحمرُ مَخضوبٌ بالحِنّاء [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ রিমাছা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম, তখন তাঁর পরিধানে ছিল দু'টি সবুজ পোশাক। আর তাঁর চুলে পাকা চুল ছিল, এবং সেই পাকা চুলগুলো ছিল লালচে, যা মেহেদি দিয়ে খেজাব করা হয়েছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن موسى بن حاتم - وهو الباشاني أو الفاشاني المَروَزي - وقد توبع. أبو حمزة هو محمد بن ميمون السُّكّري.وأخرجه أحمد 29/ (17491) عن هُشيم بن بشير، عن عبد الملك بن عمير، به. مقتصرًا على قوله: رأيت الشيب أحمر.وأخرجه مقتصرًا على ذكر الثوبين الأخضرين النسائي (9578) من طريق جَرير بن حازم، عن عبد الملك، به.وأخرجه أحمد 11/ (7104) و (7109) و (7115)، وأبو داود (4206) و (4208)، والنسائي (9303) و (9304)، وابن حبان (5995) من طرق عن إياد بن لَقيط، به. لكن بعضهم يقول: لطخ لحيته بالحناء، وبعضهم يقول: ذو وَفْرة بها رَدْعُ حِنّاء، وبعضهم يقول: برأسه رَدْع حِنّاء. ولم يذكر بعضهم الثوبين الأخضرين.وأخرجه مقتصرًا على ذكر الثوبين الأخضرين الترمذيُّ (2812) من طريق عبيد الله بن إياد بن لقيط، عن أبيه، به.وانظر الكلام على خضابه صلى الله عليه وسلم عند الحديث المتقدم برقم (4246).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4249)


4249 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن الفضل، حدثنا محمد ابن كُنَاسة، حدثنا هشام بن عُرْوة، عن أبيه قال: سألتُ عائشةَ: هل شابَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم؟ فقالت: ما شانَهُ اللهُ ببَيضاءَ [1].هذا حديث صحيح الإسناد محفوظٌ عن هشام، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর) বলেন, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কি চুল পেকেছিল? তিনি বললেন: আল্লাহ তাঁকে কোনো সাদা চুল দ্বারা কলঙ্কিত করেননি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، ومحمد بن كُناسة: هو محمد بن عبد الله بن عبد الأعلى.وقد ذكرنا عند الحديث (4246) رواية أخرى عن عائشة تؤيّد بمفهومها روايتها التي هنا، فأغنى ذلك عن إعادتها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4250)


4250 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، أخبرنا أبو مُسلِم، أَنَّ حجَّاج بن مِنْهَالٍ، حدَّثَهم، قال: حدثنا حمّاد بن سَلَمة، حدثنا ثابت، قال: قيل لأنس: ما كان شيبُ النبيِّ صلى الله عليه وسلم؟ قال: ما شانَهُ اللهُ بالشَّيبِ، ما كان في رأسِهِ إِلَّا تسعَ عشرةَ أو ثمانَ عشرةَ [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه، وهذه اللفظة إنما اشتَهَرتْ بعائشةَ رضي الله عنها، وهي من قولِ أنسٍ غريبةٌ جِدًّا [2].




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শুভ্র কেশ (পাক্ক চুল) কেমন ছিল? তিনি বললেন: আল্লাহ তাঁকে বার্ধক্যের শুভ্রতা দ্বারা মানহীন করেননি। তাঁর মাথায় মাত্র আঠারোটি অথবা ঊনিশটি (সাদা) চুল ছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو مسلم: هو إبراهيم بن عبد الله بن مسلم الكَجِّي، وثابت: هو ابن أسلم البُناني.وأخرجه أحمد 21/ (13662)، وابن حبان (6292) من طريقين عن حماد بن سلمة، به.وأخرج أحمد 19/ (12474) من طريق أبي يعقوب إسحاق بن عثمان الكلابي، عن ثابت، قال: سألتُ أنسًا: هل شَمِطَ رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: لقد قبض الله عز وجل رسوله صلى الله عليه وسلم وما فضحه بالشيبِ، ما كان في رأسه ولحيته يوم مات ثلاثون شعرة بيضاء. وهذه رواية شاذّة.وانظر تمام تخريجه وطرقه التي اشتملت على معناه برقم (4260).



[2] كذا جزم المصنِّفُ بغرابة هذه اللفظة من قول أنس، واشتهارها بعائشة، والأمر بخلاف ما ذَكَرَ، فقد ورد ذكرُ معناها من طريق حميد الطويل عن أنس عند أحمد 20/ (12054) بلفظ: لم يُشَنْ بالشيب. ومن طريق أبي إياس عن أنس عند مسلم (2341) بلفظ عائشة المتقدم قبله تمامًا، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4251)


4251 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا يحيى بن محمد، حدثنا مُسدَّد، حدثنا إسماعيل بن إبراهيم، حدثنا أيوب، حدثنا حُميد بن هِلال، عن أبي بُردة، قال: أخرجتْ إلينا عائشةُ كِساءً مُلبَّدًا وإزارًا غَلِيظًا، فقالت: قُبِضَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في هذَين [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু বুরদাহ (রহ.) বলেন: তিনি আমাদের সামনে একটি তালিযুক্ত চাদর এবং একটি মোটা ইযার (লুঙ্গি বা তহবন্দ) বের করে আনলেন। এরপর তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই দু’টি পরিহিত অবস্থায় ইন্তেকাল করানো হয়েছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح مسدَّد: هو ابن مُسَرْهَد، وإسماعيل بن إبراهيم: هو ابن مِقْسَم، المعروف بابن عُلَيَّة، وأيوب: هو ابن أبي تميمة السَّختياني، وأبو بُرْدة: هو ابن أبي موسى الأشعري.وأخرجه البخاري (5818) عن مسدّد، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 40/ (24037)، ومسلم (2080)، والترمذي (1733)، وابن حبان (6624) من طرق عن إسماعيل ابن عُلَيَّة، به.وأخرجه البخاري (3108) من طريق عبد الوهاب بن عبد المجيد، عن أيوب، به.وأخرجه أحمد 41/ (24997)، ومسلم (2080)، وأبو داود (4036)، وابن ماجه (3551)، وابن حبان (6623) من طريقين عن حميد بن هلال به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.مُلبَّدًا، أي: مُرقَّعًا. وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 227 من طريق أبي عبيدة معمر بن المثنَّى، كلاهما (الهيثم وأبو عُبيدة) عن إدريس الأودي، به. لكن الهيثم متروك، وبعضهم اتهمه، وفيمن دون أبي عُبيدة معمر بن المثنّى رجلٌ مجهولٌ. والأقرب فيه عن إدريس الأودي روايته له عن الحكم عن يحيى بن الجزار عن علي كما في الطريق التالية.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 1/ 422، ومن طريقه حماد بن إسحاق في "تركة النبي صلى الله عليه وسلم " ص 96 - 97، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 509، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 228 عن محمد بن عمر الواقدي، عن الحسن بن عمارة، وحرب بن إسماعيل الكرماني في "مسائله" 2/ 910 من طريق محمد بن عبيد الله العَرْزمي، كلاهما عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عبّاس. وهذا إسناد واهٍ بمرَّةٍ، فالحسن بن عمارة والعرزمي متروكان والواقدي منهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4252)


4252 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا الحسين بن الحسن السُّكّري، حدثنا سليمان بن داود المِنْقَري، حدثنا عبد الله بن إدريس، قال: سمعت أبي يُحدِّث عن عَدِيِّ بن ثابت، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس، قال: كان للنبيِّ صلى الله عليه وسلم فَرَسٌ يُدعَى المُرتَجِزَ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি ঘোড়া ছিল, যার নাম ছিল আল-মুরতাজিজ।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، سليمان بن داود المِنْقري - وهو الشاذكوني - متروك الحديث، وقال أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "العلل" (919): روى هذا الحديث الهيثم بن عدي عن إدريس، فأخذه الشاذكوني، فأقلبه على ابن إدريس. ونحوه قال أبي زرعة كما في سؤالات البَرْذَعي له (481). قلنا: وقد توبع بمتابعة فيها جهالة، وروي عن ابن عبّاس من وجه آخر لا يُفرح به البتة. وسيأتي بعده من طريق أمثَلُ من هذه عن إدريس - وهو ابن يزيد الأودي - لكن عن الحكم بن عُتيبة، عن يحيى بن الجزّار، عن علي بن أبي طالب.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (7515)، وأبو الشيخ في "أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم " (448)، وفي "طبقات المحدثين بأصبهان" 2/ 125 و 3/ 463، وأبو نُعيم في "أخبار أصبهان" 1/ 334 من طريق محمد بن عبد الله بن رُسْتَه، عن أبي أيوب سليمان بن داود المِنْقري، بهذا الإسناد.وأخرجه الهيثم بن عدي كما قال أبو زرعة الرازي فيما نقله عنه البَرْذَعِيُّ في "سؤالاته" له (481)، وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 227 من طريق أبي عبيدة معمر بن المثنَّى، كلاهما (الهيثم وأبو عُبيدة) عن إدريس الأودي، به. لكن الهيثم متروك، وبعضهم اتهمه، وفيمن دون أبي عُبيدة معمر بن المثنّى رجلٌ مجهولٌ. والأقرب فيه عن إدريس الأودي روايته له عن الحكم عن يحيى بن الجزار عن علي كما في الطريق التالية.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 1/ 422، ومن طريقه حماد بن إسحاق في "تركة النبي صلى الله عليه وسلم " ص 96 - 97، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 509، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 228 عن محمد بن عمر الواقدي، عن الحسن بن عمارة، وحرب بن إسماعيل الكرماني في "مسائله" 2/ 910 من طريق محمد بن عبيد الله العَرْزمي، كلاهما عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عبّاس. وهذا إسناد واهٍ بمرَّةٍ، فالحسن بن عمارة والعرزمي متروكان والواقدي منهم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4253)


4253 - حدثَناه أحمد بن يحيى المُقرئ بالكوفة، حدثنا عبد الله بن غَنَّام، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الجُعفي، حدثنا حِبّان بن علي، عن إدريس الأوْدِي، عن الحَكَم، عن يحيى بن الجَزّار، عن علي، قال: كان لرسول الله صلى الله عليه وسلم فرسٌ يقال له: المُرتَجِزُ، وناقتُه الفَصْوى، وبَغلتُه دُلْدُل، وحمارُه عُفَير، ودِرْعُه الفُضُول، وسيفُه ذو الفَقَارِ [1].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি ঘোড়া ছিল, যার নাম ছিল 'আল-মুরতাজিজ', তাঁর উষ্ট্রী ছিল 'আল-ফাসওয়া', তাঁর খচ্চর ছিল 'দুলদুল', তাঁর গাধা ছিল 'উফাইর', তাঁর বর্ম ছিল 'আল-ফুদূল' এবং তাঁর তলোয়ার ছিল 'যু আল-ফাকার'।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن بطريقيه إن شاء الله، وإبراهيم بن إسحاق الجُعفي - وهو المعروف بالصِّيني - مختلَفٌ فيه، لكنه قد توبع، وحِبّان بن علي - وهو العنَزي - مُختَلَفٌ فيه أيضًا، ويصلُح حديثه في الاعتبار، وقد روي هذا الخبر من وجه آخر عن علي بن أبي طالب.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 220 من طريقين عن إبراهيم بن إسحاق الجُعفي، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (1063)، وأبو الشيخ في "أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم " (413)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 10/ 26، وفي "دلائل النبوة" 7/ 278، والبغوي في "الأنوار في شمائل النبي المختار" (885)، وابن عساكر 4/ 219 - 220 من طريق عبد الحميد بن صالح البُرجُمي، عن حبان بن علي، به. وعبد الحميد هذا ثقة.وأخرجه أبو الشيخ (450)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 278، والبغوي في "الأنوار" (910)، وابن عساكر 4/ 220 - 221 من طريق محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد بن عبد الله اليزني، عن عبد الله بن زُرَير الغافقي، عن علي بن أبي طالب. وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد، لعنعنة ابن إسحاق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4254)


4254 - حدثنا أبو النضر الفقيه وأحمد بن محمد بن سلَمة العَنَزي، قالا: حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي ومحمد بن سِنان العَوَقي، حدثنا إبراهيم بن طَهْمان، عن بُدَيل بن مَيسَرة، عن عبد الله بن شَقِيق، عن مَيسَرةِ الفَجْرِ، قال: قلت: يا رسول الله صلى الله عليه وسلم، متى كنتَ نبيًا؟ قال: "وآدمُ بين الرُّوحِ والجَسَدِ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وشاهدهُ حديث الأوزاعيّ الذي:




মাইসারা আল-ফাজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কখন নবী ছিলেন?" তিনি বললেন, "যখন আদম (আঃ) রূহ ও দেহের মধ্যখানে (সৃষ্টির প্রক্রিয়াধীন) ছিলেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 34/ (20596) من طريق منصور بن سعد، عن بديل بن ميسرة، به.وأخرجه أيضًا 27/ (16623) من طريق خالد الحذاء، عن عبد الله بن شقيق، عن رجل، قال: قلتُ: يا رسول الله، فذكره، فأبهم ذكر الصحابي، وبينه غيره.وقد رواه بعضهم فذكر فيه عبد الله بن أبي الجدعاء، بدل: ميسرة الفجر، وقد قيل: هو نفسه، وميسرة الفجر لقب له، وجزم بذلك أبو الوليد ابن الفرضي في "الألقاب".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4255)


4255 - حدّثَناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا سليمان بن محمد بن الفضل، حدثنا محمد بن هاشم البَعْلَبكِّي، حدثنا الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلَمة، عن أبي هريرة، قال: قيل للنبي صلى الله عليه وسلم: متى وَجَبَتْ لك النبوّةُ؟ قال: "بين خَلْقِ آدمَ ونَفْخِ الرُّوح فيه" [1].




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হলো: কখন আপনার জন্য নবুওয়াত নির্ধারিত হয়েছিল? তিনি বললেন: "আদম (আঃ)-কে সৃষ্টি করা এবং তাঁর দেহে রূহ ফুঁকে দেওয়ার মধ্যবর্তী সময়ে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وقد صرَّح الوليد بن مسلم بسماعه وسماع الأوزاعي عند جعفر الفريابي في "القدر" (14) وعند غيره، فانتفت شبهة تدليسه.وأخرجه الترمذي (3609) عن الوليد بن شجاع، عن الوليد بن مسلم، بهذا الإسناد. واختلفت نسخ الترمذي في ذكر حكمه، ففي بعضها: حسن صحيح غريب، وفي بعضها الآخر: حسن غريب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4256)


4256 - أخبرني عبد الله بن محمد بن علي بن زياد العَدْل، حدثنا الإمام أبو بكر محمد بن إسحاق، حدثنا أبو سعيد الأشَجُّ، حدثنا أبو معاوية، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا تَسُبُّوا وَرَقةَ، فإني رأيتُ له جَنّةً أو جَنّتَين" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.والغَرَض في إخراجه:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ওয়ারাকাকে গালি দিও না, কারণ আমি তার জন্য একটি বা দুটি জান্নাত দেখেছি।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ضعيف لاضطراب إسناده، فقد اختُلف في وصله وإرساله، فرواه أبو سعيد الأشَجِّ - وهو عبد الله بن سعيد الكِنْدي - كما في رواية المصنف هنا عن أبي معاوية موصولًا، وانفرد الأشج بذلك، وغيره يرويه عن أبي معاوية مرسلًا، دون ذكر عائشة فيه. وكذلك رواه جماعة عن هشام بن عُرْوة عن أبيه مرسلًا، فهو المحفوظ كما قال الدارقطني في "العلل" (3495)، وذكر ابن كثير في "البداية والنهاية" 4/ 23 أنه الأشبه.ورواه عبد الرحمن بن أبي الزِّناد عن هشام بن عُرْوة مرسلًا، دون ذكر أبيه أيضًا. ومع ذلك فقد صحَّح البوصيريُّ إسنادَه في "إتحاف الخيرة" (68/ 2)!وهو في "جزء أبي سعيد الأشج" (120)، ومن طريقه أخرجه البزار في "مسنده" كما في "كشفِ الأستار" للهيثمي (2750)، والدارقطنيُّ في "العلل" (3495)، وابنُ عساكر في "تاريخ دمشق" 63/ 23 - 24.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 63 - 24 من طريق أحمد بن أبي الحواري، عن أبي معاوية، عن هشام، عن أبيه، مرسلًا.وأخرجه يونس بن بكير في زياداته على "سيرة ابن إسحاق" (158)، وأخرجه البزار كما في "كشف الأستار" (2751) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، كلاهما (يونس وحماد) عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، مرسلًا.وأخرجه الزبير بن بكّار في "جمهرة نسب قريش" ص 414 - 415 من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن هشام بن عُرْوة مرسلًا، دون ذكر عُرْوة ولا عائشة. وانظر ما سيأتي برقم (8387).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4257)


4257 - ما حدَّثَنِيه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، عن ابن إسحاق، قال: حدثني عبدُ الملِك بن عبد الله بن أبي سُفيان بن العلاء بن جارِيةَ الثقفي - وكان واعيةً - قال: قال ورقةُ بن نَوفَلٍ بن أسد بن عبد العُزّى - فيما كانت خديجةُ ذَكَرَتْ له من أمور رسولِ الله صلى الله عليه وسلم: يا لَلرِّجالِ وصَرْفِ الدَّهرِ والقَدَرِ … وما لِشيءٍ قَضاهُ اللهُ من غِيَرِحتى خديجةُ تَدْعُوني لأُخبِرَها … وما لها بخَفيِّ الغَيبِ من خَبَرِجاءتْ لِتسألَني عنه لأُخبِرَها … أمرًا أَراهُ سيأتي الناسَ مِن أُخَرِفخَبَّرتني بأمرٍ قد سمعتُ به … فيما مضى من قَديم الدهرِ والعُصُرِبأن أحمدَ يأتيه فيُخبِرُه … جِبريلُ أنّكَ مَبْعُوثٌ إلى البَشَرِفقلتُ: عَلَّ الذي تَرْجِينَ يُنْجِزُه … لكِ الإلهُ فرَجِّي الخيرَ وانتظِرِيوأرسلِيه إلينا كي نُسائِلَه … عن أمرِه ما يَرى في النومِ والسَّهَرِفقال حين أتانا مَنْطِقًا عجبًا … تَقِفُّ منه أعالي الجِلدِ والشَّعَرِإني رأيتُ أمينَ اللهِ واجَهَني … في صورةٍ أُكمِلَتْ من أَهْيَبِ الصُّوَرِثم استمرَّ فكادَ الخوفُ يَذْعَرُني … مما يُسلِّمُ مِن حَولي مِن الشَّجَرِفقلتُ: ظنِّي وما يُدرَى أَيَصدُقُني … أن سوفَ تُبعَثُ تتلُو مُنزَلَ السُّوَروسوف أُبْلِيكَ إن أعلنْتُ دعوتَهم … من الجهادِ بلا مَنٍّ ولا كَدَرِ [1]




আব্দুল মালিক ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে আবি সুফিয়ান ইবনে আল-আলা ইবনে জারিয়া আস-সাকাফী থেকে বর্ণিত, তিনি—যিনি ছিলেন অত্যন্ত স্মৃতিধর—বলেন, ওয়ারাকাহ ইবনু নাওফাল ইবনু আসাদ ইবনু আব্দুল ‘উযযা—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘটনা সম্পর্কে খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে যা বলেছিলেন সে প্রসঙ্গে—বলেন:

হায় পুরুষেরা, হায় কালের আবর্তন ও তাকদীর! আল্লাহ যা নির্ধারণ করেছেন, তা পরিবর্তনশীল নয়।
এমনকি খাদীজাও আমাকে ডাকছেন যেন আমি তাঁকে খবর দেই, অথচ গায়বী বিষয় সম্পর্কে তাঁর কোনো খবর নেই।
তিনি এসেছেন আমাকে জিজ্ঞেস করতে, যেন আমি তাঁকে এমন এক বিষয় সম্পর্কে বলি যা আমি দেখছি যে ভবিষ্যতে মানুষের কাছে আসবে।
অতঃপর তিনি আমাকে এমন এক বিষয় সম্পর্কে অবহিত করলেন যা আমি অতীত যুগ ও কালের শুরু থেকে শুনে আসছি।
তা হলো, আহমাদ (মুহাম্মাদ) এর কাছে জিবরীল (আঃ) আসেন এবং তাঁকে জানান যে আপনি মানবজাতির কাছে প্রেরিত (রাসূল)।
আমি বললাম, তুমি যা প্রত্যাশা করছো, আল্লাহ সম্ভবত তা তোমার জন্য সম্পন্ন করবেন। অতএব, কল্যাণের আশা করো এবং অপেক্ষা করো। আর তাঁকে আমার কাছে পাঠিয়ে দাও যেন আমরা তাঁকে তাঁর ব্যাপারে প্রশ্ন করতে পারি—ঘুম ও জাগ্রত অবস্থায় তিনি কী দেখেন।
অতঃপর যখন তিনি আমাদের কাছে এলেন, তিনি এমন বিস্ময়কর কথা বললেন, যা শুনে শরীর ও মাথার পশম দাঁড়িয়ে যায়।
(তিনি বললেন,) আমি আল্লাহর আমীনকে (জিবরীলকে) আমার সামনে দেখেছি, যিনি অত্যন্ত ভীতিকর ও পূর্ণাঙ্গ এক রূপে এসেছেন।
এরপর তিনি চলে গেলেন। আর আমার চারপাশের গাছপালা আমাকে সালাম করছে—এই ভয়ে আমি আতঙ্কিত হয়ে পড়েছিলাম।
(ওয়ারাকাহ বলেন,) আমি বললাম, আমার ধারণা (যদিও নিশ্চিত নই, এটি সত্য হবে কিনা)—অচিরেই আপনি প্রেরিত হবেন এবং আল্লাহ কর্তৃক অবতীর্ণ সূরাসমূহ পাঠ করবেন। আর যখন আপনি প্রকাশ্যে আপনার দাওয়াত ঘোষণা করবেন, তখন আমি অবশ্যই আপনার পক্ষে তাদের বিরুদ্ধে নিঃশর্তভাবে এবং কষ্টহীনভাবে জিহাদ করে যাবো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ضعيف لإرساله، والصحيح أنه من مرسل ابن إسحاق - وهو محمد بن إسحاق بن يسار المطَّلبي - فقد رواه البيهقي في "الدلائل" 2/ 149 - 150 عن أبي عبد الله الحاكم، بسنده الذي هنا، فلم يذكر فيه عبد الملك الثقفي، وكذلك هو في "سيرة ابن إسحاق" برواية يونس بن بكير (142) دون ذكر عبد الملك فيه. والظاهر أنَّ المصنِّف صار يُلحقه مُؤخَّرًا لما صنَّف هذا الكتاب، اغتِرارًا بورود قصة تسليم الشجر هنا في شِعر ورقة، وهي قصة رواها ابن إسحاق في "سيرته" كما في رواية ابن هشام عن البكائي عنه 1/ 234 - 235، وكما في رواية يونس بن بكير (140) عن عبد الملك الثقفي المذكور، وهو تابعي يروي عن عثمان بن عفان، فالظاهر أنَّ المصنِّف ظن أنَّ ابن إسحاق إنما أخذه عن عبد الملك فذكره، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4258)


4258 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفَضْل، حدثنا جَدِّي، حدثنا إبراهيم بن المُنذِر، حدثنا عبد العزيز بن أبي ثابت الزُّهْري، حدثنا الزّبير بن موسى، عن أبي الحُوَيرث، عن قَبَاثِ بن أُشْيَمَ الكِنَاني ثم اللَّيثيّ، قال: تَنبّأَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على رأسِ أربعينَ من الفِيل [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه، إنما أخرج البخاري حديث عِكْرمة عن ابن عبّاس: بُعِث وهو ابن أربعين [2].والدليل على صحة حديث قَباثٍ بن أشْيَمَ اختيارُ سيِّد التابعين هذا القول [3]:




ক্বাছ ইবনে উশয়াম আল-কিনানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফীল (হাতি) বর্ষের চল্লিশ বছর পূর্ণ হওয়ার পর নবুওয়াত লাভ করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده واهٍ بمرّةٍ من أجل عبد العزيز بن أبي ثابت الزُّهْري، فهو واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وسيأتي برقم (6769) من طريق إسماعيل بن أبي أويس عن الزبير بن موسى، فسقط منه عبد العزيز بن أبي ثابت، ويأتي الكلام عليه هناك. أبو الحويرث: هو عبد الرحمن بن معاوية المدني.وأخرجه خليفة بن خياط المعروف بشباب العصفري - كما في "تاريخ الإسلام" للذهبي 1/ 483 - وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" بإثر (1986)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (5970)، والطبراني في "الكبير" 19/ (75)، وأبو نُعيم في "دلائل النبوة" (84)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 78 و 2/ 131، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 49/ 231 - 232 من طرق عن إبراهيم بن المنذر الحِزامي، بهذا الإسناد.



[2] أخرجه البخاري (3902).



4258 [3] - إذا كان رسول الله صلى الله عليه وسلم قد ولد عام الفيل كما أورد المصنِّف الدليل على ذلك فيما تقدم برقم (4225) و (4228)، فيكون مبعثه صلى الله عليه وسلم على رأس الأربعين كما قال ابن عبّاس وقباث بن أشيم، وعندئذ لا يتفق قولُهما مع قول سعيد بن المسيّب، لأنَّ الفرق يكون ثلاث سنوات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4259)


4259 - كما أخبرني محمد بن المؤمَّل بن الحسن، حدثنا الفضل بن محمد، حدثنا أحمد بن حنبل، حدثنا يحيى بن سعيد القطّان، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن سعيد بن المسيّب، قال: أُنزل على النبي صلى الله عليه وسلم وهو ابن ثلاثٍ وأربعين [1].




সাঈদ ইবনুল মুসাইয়াব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর ওহী নাযিল হয়েছিল যখন তাঁর বয়স ছিল তেতাল্লিশ বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات لكن قال الحافظ في "الفتح" 10/ 411: هذا من الشاذّ.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 1/ 190، وابن أبي شَيْبة 13/ 45، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 114، والطبري في "تاريخه" 2/ 292 و 384 و 3/ 215، والبيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 132، وابن عبد البر في "التمهيد" 3/ 15 من طُرق عن يحيى بن سعيد الأنصاري، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4260)


4260 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن خَديجة، أنها قالت: لما أبطأَ عن رسولِ الله صلى الله عليه وسلم الوحيُ، جَزِعَ من ذلك جَزَعًا شديدًا، فقلت ممّا رأيتُ من جَزَعِه: لقد فَلَاكَ ربُّك لما يرى من جَزَعِكَ، فأنزل الله: {مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَى} [الضحى:3] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه لإرسالٍ فيه.




খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ওহী আসা বিলম্বিত হলো, তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ কারণে অত্যন্ত চিন্তিত ও বিচলিত হলেন। আমি তাঁর উদ্বেগ দেখে বললাম: আপনি এত চিন্তিত হওয়ায় আপনার রব হয়তো আপনাকে ত্যাগ করেছেন। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "আপনার রব আপনাকে ত্যাগ করেননি এবং আপনার প্রতি বিরূপও হননি।" (সূরা আদ-দুহা, আয়াত: ৩)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن رواية عُرْوة - وهو ابن الزبير بن العوام - عن عمّة أبيه خديجة بنت خويلد رضي الله عنها مرسلة.وهو في "السيرة النبوية" لابن إسحاق، برواية يونس بن بكير (167). وقد وصله أبو داود في "أعلام النبوة" كما في "الفتح" 4/ 311 بذكر عائشة، ولا يصح.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 60 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الدولابي في "الذرية الطاهرة" (29) عن أحمد بن عبد الجبار، به.وأخرجه سنيد بن داود في في "تفسيره" كما في "فتح الباري" 4/ 311، وابن أبي شَيْبة 11/ 497، والطبري في "تفسيره" 30/ 232 من طريق وكيع بن الجراح، وابن أبي حاتم في "تفسيره" كما في "فتح الباري" 4/ 311، والواحدي في "أسباب النزول" (859) من طريق أبي معاوية محمد بن خازم الضرير، كلاهما عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه قال: أبطأ جبريل، فذكره. وهذا أوضح في إرساله. لكن أخطأ سُنيد في روايته عائشة بدل خديجة.وأخرجه إسماعيل القاضي في "أحكام القرآن" كما في "الفتح" 4/ 311، والطبري 30/ 231، وأبو داود في "أعلام النبوة" كما في "الفتح" من طريق عبد الله بن شداد: أن خديجة، فذكره. وهذا مرسل أيضًا.والصحيح في هذه القصة أنه من قول امرأةٍ من قريش من المشركين كما جاء في حديث جندب بن عبد الله البجلي عند البخاري (1125)، ومسلم (1797).وسلف في رواية عند المصنف (3989) تعيين المرأة القائلة لذلك بأنها امرأة أبي لهب.وهذا هو الصحيح اللائق، فليس مثلُ خديجة رضي الله عنها من يقول مثل هذا لرسول الله صلى الله عليه وسلم، وما كانت رضي الله عنها لتقوله، وهي الزوجة المؤمنة الكاملة المواسية لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فهذا أولى من توجيه البيهقي في "الدلائل" 7/ 60 بأنه إن صح تكون خديجة قالته على طريق السؤال أو الاهتمام به. وأولى مما وجهه ابن كثير أيضًا في "تفسيره" 8/ 446 بأنه إن صح تكون خديجة قالته على وجه التأسُّف والتحزُّن. وأنكر أن يكون هذا قول خديجة جماعة منهم ابن المنيِّر كما في "فتح الباري" 4/ 311.