আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4261 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، عن عمر بن ذرٍّ [عن أبيه] [1] عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لجبريلَ: "ما يَمنعُك أن تَزُورَنا أكثر مما تَزُورُنا" فأنزل الله عز وجل: {وَمَا نَتَنَزَّلُ إِلَّا بِأَمْرِ رَبِّكَ} إلى قوله: {وَمَا كَانَ رَبُّكَ نَسِيًّا} [مريم: 64] [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিবরীলকে বললেন: "আপনি আমাদের কাছে যতটুকু আসেন, তার চেয়ে বেশি আসতে আপনাকে কিসে বাধা দেয়?" অতঃপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "আর আমরা আপনার রবের আদেশ ব্যতীত অবতরণ করি না..." তাঁর বাণী: "...আর আপনার রব বিস্মৃত হন না।" (সূরা মারইয়াম: ৬৪) পর্যন্ত।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط اسم أبي عمر - وهو ذرّ بن عبد الله المُرهِبي - من نسخنا الخطية، وأثبتناه من المطبوع، وهو ثابت في إسناد الرواية عند يونس بن بكير في زياداته على "السيرة النبوية" لابن إسحاق (168)، وكذلك عند غيره. وقد تقدَّم برقم (2937) من طريق إبراهيم بن عبد الله السعدي عن وهب بن جَرير.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن عبد الجبار - وهو العُطاردي - وقد توبع.وأخرجه أحمد بن حنبل 3/ (2013) و (2078) و 5/ (3365)، والبخاري (3218) و (7455)، والترمذي (3158)، والنسائي (11257) من طرق عن عمر بن ذر، بهذا الإسناد. وقد تقدَّم برقم (2937) من طريق إبراهيم بن عبد الله السعدي عن وهب بن جَرير.
4262 - أخبرنا أبو بكر الشافعي، حدثنا إسحاق بن الحسن بن ميمون، حدثنا أبو حُذيفة، حدثنا سفيان، عن الأعمش، عن حسان، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس قال: فُصِلَ القرآنُ من الذِّكر، فوُضِعَ في بيت العِزَّةِ في السماء الدُّنيا، فجعلَ جبريلُ عليه السلام يُنزِّلُه على النبي صلى الله عليه وسلم، يُرَتِّلُه ترتيلًا [1].قال سفيانُ: خمسَ آياتٍ ونحوَها.هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরআনকে ‘আয-যিকর’ (লাওহে মাহফুয) থেকে আলাদা করা হয়েছিল, অতঃপর এটিকে পৃথিবীর নিকটবর্তী আকাশে ‘বাইতুল ইজ্জাহ’ (সম্মানের ঘর)-এ রাখা হয়েছিল। এরপর জিবরীল (আলাইহিস সালাম) ধীরে ধীরে (তারতীল সহকারে) তা নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট নাযিল করতে শুরু করেন। (রাবী) সুফিয়ান বলেছেন: (প্রতিবারে) পাঁচ আয়াত বা তার কাছাকাছি নাযিল হতো।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] موقوف صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أبي حذيفة - وهو موسى بن مسعود النَّهْدي - وقد توبع كما تقدم بيانه برقم (2917).وله طرق أخرى عند المصنف تقدمت الإشارة إليها برقم (2913). وقد تقدَّم برقم (2937) من طريق إبراهيم بن عبد الله السعدي عن وهب بن جَرير.
4263 - حدثنا أبو سهل أحمد بن محمد بن زياد النَّحْوي، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا وهب بن جَرير بن حازم، حدثنا أبي، قال: سمعت يحيى بن أيوب يُحدِّث عن يزيدَ بن أبي حَبيب، عن عبد الرحمن بن شُمَاسة، عن زيد بن ثابت، قال: كنا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم تُؤلِّف القرآنَ من الرِّقَاع [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه. وفيه الدليل الواضح أنَّ القرآن إنما جُمع في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.
যায়দ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম এবং চামড়ার টুকরাসমূহ থেকে কুরআন সংকলন করছিলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل يحيى بن أيوب: وهو الغافقي. وقد تقدَّم برقم (2937) من طريق إبراهيم بن عبد الله السعدي عن وهب بن جَرير.
4264 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن علي الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري، حدثنا علي بن حَكيم، حدثنا مُعتمِر بن سليمان، عن مُثنَّى بن الصَّبَّاح، عن عمرو بن دينار، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا نزل جبريلُ عليه السلام فقال: بسم الله الرحمن الرحيم، عَلِمَ أنها سورةٌ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, যখন জিবরীল (আঃ) অবতরণ করতেন এবং 'বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম' বলতেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জানতে পারতেন যে এটি একটি (নতুন) সূরা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف المثنَّى بن الصَّباح، لكنه متابع فيما تقدم برقم (763) و (764).وهذا الطريق هو مكرر الطريق المتقدم برقم (762).
4265 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، حدثنا يزيد بن زياد بن أبي الجَعْد، عن جامِع بن شدّاد، عن طارق بن عبد الله المُحارِبي، قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم مَرَّ بسُوق ذي المَجازِ وأنا في بيَاعةٍ لي، فمرَّ وعليه حُلّةٌ حمراءُ، فسمعتُه يقول: "يا أيها الناس، قولُوا: لا إله إلَّا الله، تُفْلِحُوا"، ورجلٌ يتبعُه يَرميه بالحجارةِ قد أدمى كَعْبَيه وهو يقول: يا أيها الناس، لا تُطيعُوا هذا، فإنه كَذَّاب، فقلتُ: مَن هذا؟ فقيل: هذا غلامٌ من بني عبد المطّلِب.فلما أظهرَ اللهُ الإسلامَ خرجْنا من الرَّبَذَة ومعنا ظَعِينةٌ لنا، حتى نزلْنا قريبًا من المدينة، فبَيْنا نحن قُعودٌ إذ أتانا رجلٌ عليه ثَوبانِ، فسلَّم علينا، فقال: "مِن أين القومُ؟ " فقلنا: من الرَّبَذة، ومعنا جملٌ أحمرُ، فقال: "تَبِيعُونني الجَمَلَ؟ " فقلنا: نعم، فقال: "بكم؟ " فقلنا: بكذا وكذا صاعًا من تمر، قال: "أخذتُه"، وما استَقْصَى، فأخذَ بخُطام الجَمَل، فذهبَ به حتى تَوارَى في حِيطان المدينة، فقال بعضُنا لبعضٍ: تَعرفُون الرجلَ، فلم يكن منا أحدٌ يعرفُه، فلامَ القومُ بعضَهم بعضًا، فقالوا: تُعطُون جملَكُم مَن لا تَعرِفون، فقالت الظَّعِينةُ: فلا تَلاوَمُوا، فلقد رأينا وجهَ رجلٍ لا يَغدِرُ بكم، ما رأيتُ شيئًا أشبَهَ بالقمر ليلةَ البدرِ من وجْهِه، فلما كان العشيُّ أتانا رجلٌ فقال: السلامُ عليكم ورحمة الله وبركاتُه، أأنتُمُ الذين جئتُم من الرَّبَذة؟ قلنا: نعم، قال: أنا رسولُ رسولِ الله إليكم، وهو يأمرُكم أن تأكُلُوا من هذا التمر حتى تَشْبَعوا وتكتالُوا حتى تَستَوفُوا، فأكلْنا من التمر حتى شَبِعْنا، واكْتَلْنا حتى استَوفَينا، ثم قَدِمْنا المدينةَ من الغدِ، فإذا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قائمٌ يخطُب الناسَ على المِنبَر، فسمعتُه يقول: "يدُ المُعطي العُلْيا، وابدَأْ بمن تَعُولُ: أمَّك وأباك، وأختَك وأخاك، وأَدْناك أَدْناك" وثَمَّ رجلٌ من الأنصار، فقال: يا رسول الله، هؤلاء بنو ثعلبة بن يَرْبُوع الذين قَتَلُوا فلانًا في الجاهلية، فخُذْ لنا بثأرِنا، فرفع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَدَيه حتى رأيتُ بَياضَ إبطَيه، فقال: "لا تَجْني أمٌّ على وَلَدٍ، لا تَجْني أمٌّ على وَلَدٍ" [1].هذا حديث كبير صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
তারিক ইবনে আবদুল্লাহ আল-মুহারিবি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যুল-মাজায বাজারে অতিক্রম করতে দেখলাম। তখন আমি আমার একটি কেনাবেচার স্থানে ছিলাম। তিনি লাল ডোরাকাটা চাদর পরিহিত অবস্থায় অতিক্রম করলেন। আমি তাকে বলতে শুনলাম: "হে লোক সকল! তোমরা বলো, 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই), তাহলে তোমরা সফলকাম হবে।" আর এক ব্যক্তি তাঁর পিছু পিছু আসছিল এবং তাঁকে পাথর নিক্ষেপ করছিল। লোকটি তাঁর পায়ের গোড়ালি রক্তাক্ত করে ফেলেছিল এবং সে বলছিল: হে লোক সকল! তোমরা এর আনুগত্য করো না, কারণ সে একজন মিথ্যাবাদী। আমি জিজ্ঞেস করলাম: ইনি কে? তখন বলা হলো: ইনি বনু আব্দুল মুত্তালিবের এক যুবক।
অতঃপর যখন আল্লাহ তাআলা ইসলামের প্রকাশ ঘটালেন, তখন আমরা আর-রাবাযাহ নামক স্থান থেকে বের হলাম। আমাদের সাথে আমাদের একজন নারীও (হাউদায়) ছিলেন। আমরা মদীনার কাছাকাছি এক স্থানে অবতরণ করলাম। আমরা যখন বসেছিলাম, তখন একজন লোক দুটি (সাধারণ) কাপড় পরিহিত অবস্থায় আমাদের কাছে এলেন, তিনি আমাদের সালাম দিলেন এবং বললেন: "আপনারা কোন্ এলাকার লোক?" আমরা বললাম: আর-রাবাযাহ-এর লোক। আমাদের সাথে একটি লাল উট ছিল। তিনি বললেন: "তোমরা কি উটটি আমার কাছে বিক্রি করবে?" আমরা বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "কত মূল্য?" আমরা বললাম: এত এত সা' পরিমাণ খেজুর। তিনি বললেন: "আমি নিলাম।" তিনি দর কষাকষি করলেন না। অতঃপর তিনি উটের লাগাম ধরে মদীনার দেয়ালগুলোর আড়ালে অদৃশ্য না হওয়া পর্যন্ত তা নিয়ে চলে গেলেন। তখন আমরা একে অপরের কাছে বললাম: তোমরা কি লোকটিকে চেনো? আমাদের মধ্যে কেউ তাকে চিনতো না। ফলে লোকেরা পরস্পর একে অপরের ওপর দোষারোপ করতে লাগল এবং বলল: তোমরা এমন লোককে তোমাদের উট দিয়ে দিলে, যাকে তোমরা চেনো না? তখন সেই মহিলা বললেন: তোমরা একে অপরের ওপর দোষারোপ করো না। আমরা এমন একজন ব্যক্তির চেহারা দেখেছি, যিনি তোমাদের সাথে প্রতারণা করবেন না। পূর্ণিমার রাতে চাঁদের চেয়ে বেশি সুন্দর কোনো কিছু আমি তাঁর চেহারার মতো দেখিনি।
সন্ধ্যাবেলা আমাদের কাছে একজন লোক এসে বললেন: আসসালামু আলাইকুম ওয়া রাহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকাতুহু। আপনারাই কি সেই লোক, যারা আর-রাবাযাহ থেকে এসেছেন? আমরা বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে তোমাদের কাছে প্রেরিত দূত। তিনি তোমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন যে, তোমরা এই খেজুর থেকে পেট ভরে খাও এবং পরিমাপ করে তা পূর্ণরূপে নিয়ে নাও। ফলে আমরা খেজুর খেলাম, পেট ভরে গেল এবং পরিমাপ করে তা পূর্ণরূপে গ্রহণ করলাম। এরপর পরের দিন আমরা মদীনায় পৌঁছলাম। সেখানে আমরা দেখলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে দাঁড়িয়ে জনগণের উদ্দেশ্যে খুতবা দিচ্ছেন। আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: "দানকারীর হাত (গ্রহীতার হাত অপেক্ষা) শ্রেষ্ঠ। আর তুমি যাদের ভরণ-পোষণের দায়িত্বে আছো, তাদের দিয়েই শুরু করো: তোমার মা, তোমার বাবা, তোমার বোন, তোমার ভাই এবং এরপর তোমার নিকটবর্তী, তারপর নিকটবর্তী।"
সেখানে আনসার সম্প্রদায়ের এক ব্যক্তি ছিলেন, তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! এরাই হলো বানু সা'লাবাহ ইবনে ইয়ারবূ'-এর লোক, যারা জাহিলিয়াতের যুগে অমুককে হত্যা করেছিল। আপনি আমাদের পক্ষ থেকে তাদের কাছে এর প্রতিশোধ নিন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উভয় হাত এত উঁচু করলেন যে, আমি তাঁর বগলের শুভ্রতা দেখতে পেলাম। তিনি বললেন: "কোনো মা তার সন্তানের অপরাধের জন্য অপরাধী হবে না। কোনো মা তার সন্তানের অপরাধের জন্য অপরাধী হবে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن عبد الجبار - وهو العُطاردي راوية مغازي يونس بن بكير عن ابن إسحاق - وقد توبع.وأخرجه بطوله ابن حبان (6562) من طريق الفضل بن موسى، عن يزيد بن زياد، به.وأخرج منه مقالة النبي صلى الله عليه وسلم على المنبر: النسائيُّ (2323)، وابن حبان (3341) من طريق الفضل بن موسى، عن يزيد بن زياد، به.وأخرج منه آخره المرفوع ابن ماجه (2670) من طريق عبد الله بن نمير، والنسائي (7014): من طريق الفضل بن موسى، كلاهما عن يزيد بن زياد، به.والبِياعة، بكسر الباء وتخفيف الياء آخر الحروف: هي السِّلْعة، والظاهر أن المعنى: كنت في صدد بيع سلعةٍ.والظعينة: المرأة، وهو في الأصل اسم للراحلة يُظعَنُ عليها، أي: يُسار، ثم أطلق على المرأة التي تركبها.وقوله: "بمن تَعُول" أي: بمن تَمُون وتلزمك نفقته.
4266 - أخبرني محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا محمد بن إسحاق الثَّقَفي، حدثنا أبو كُريب، حدثنا مُصعَب بن المِقْدام، حدثنا إسرائيل، عن عُثمان بن المُغِيرة، عن سالم، عن جابر، قال: كانَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَعرِضُ نفسَه على الناسِ بالمَوقِف، فيقول: "هَل مِن رجلٍ يَحمِلُني إلى قومِه، فإنَّ قريشًا قد مَنعُونِي أَن أُبَلِّغَ كلامَ رَبِّي؟ " قال: فأتاهُ رجلٌ من بني هَمْدَان، فقال: أنا، فقال: "وهل عند قومِك مَنَعَةٌ؟ " وسأله: "مِن أينَ هُو؟ " فقال: من هَمْدَان، ثم إِنَّ الرجل الهَمْدَانيَّ خشيَ أن يُخفِرَه قومُه، فأتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقال: آتِيْهم فأخبِرُهم، ثم ألْقاكَ من عامٍ قابِلٍ، قال: "نعم"، وانطلق، فجاء وَفْدُ الأنصارِ في رَجَب [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.آخر كتاب المبعث [كتاب المَسرى]حدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في شوال سنة إحدى وأربع مئة:كتاب المَسْرى، وفيه أخبار بزيادات صحيحة الأسانيد، فلم أُخرجها؛ إذ الأصلُ في المِعراجِ قد خَرَّجاه بأسانيدَ كثيرة. [كتاب دلائل النبوة]ومن كتاب آياتِ رسول الله صلى الله عليه وسلم التي هي دلائل النبوّة
জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম অবস্থানস্থলে (মওকিফে) মানুষদের সামনে নিজেকে পেশ করতেন এবং বলতেন: "এমন কোনো লোক আছে কি যে আমাকে তার কওমের কাছে পৌঁছে দেবে? কেননা কুরাইশরা আমাকে আমার রবের বাণী পৌঁছানো থেকে বিরত রেখেছে।" তিনি বলেন, তখন বনী হামদান গোত্রের একজন লোক তাঁর কাছে এসে বলল: আমি (আপনাকে পৌঁছে দেব)। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার গোত্রের কি আমাকে রক্ষা করার ক্ষমতা আছে?" তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কোত্থেকে এসেছ?" সে বলল: হামদান থেকে। এরপর সেই হামদানী লোকটি ভয় পেল যে, তার গোত্রের লোকেরা হয়তো তার দেওয়া অঙ্গীকার ভঙ্গ করবে। তাই সে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এসে বলল: আমি তাদের কাছে যাব এবং তাদেরকে সংবাদ দেব, অতঃপর আগামী বছর আপনার সাথে সাক্ষাৎ করব। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" এরপর সে চলে গেল। অতঃপর রজব মাসে আনসারদের প্রতিনিধিদল আসল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل مصعب بن المقدام، فهو لا بأس به، وقد توبع. أبو كُريب: هو محمد بن العلاء الهَمْداني، وإسرائيل: هو ابن يونس السَّبيعي، وسالم: هو ابن أبي الجَعْد.وأخرجه أحمد 23/ (15192) عن أسود بن عامر، وأبو داود (4734)، والترمذي (2925) من طريق محمد بن كثير العبدي، وابن ماجه (201)، والنسائي (7680) من طريق عبد الله بن رجاء، ثلاثتهم عن إسرائيل، بهذا الإسناد. لكن لفظ روايتي محمد بن كثير وعبد الله بن رجاء مختصر إلى قوله: "كلام ربي".وسيأتي نحوه برقم (4297) من طريق أبي الزُّبَير عن جابر.
4267 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا جَدِّي، حدثنا إبراهيم بن المُنذِر الحِزَاميّ، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن ابن عَجْلان، عن القَعْقاع بن حَكيم، عن أبي صالحٍ، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "بُعِثتُ لأتمَّمَ صالحَ الأخلاقِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি উত্তম চরিত্রকে পূর্ণতা দানের জন্যই প্রেরিত হয়েছি।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل عبد العزيز بن محمد - وهو الدَّرَاوردي - وابنِ عَجْلان - وهو محمد - فهما صدوقان لا بأس بهما، وصحَّحه ابن عبد البر في "التمهيد" 24/ 334، لكن قد رواه عن ابن عجلان أيضًا يحيى بنُ أيوب الغافقي المصري، فجعله عن ابن عجلان مرسلًا، كما توضحه رواية عثمان بن سعيد الدارمي عند البيهقي في "شعب الإيمان" (7608)، ورواية إسحاق بن إبراهيم بن جابر القطان عند البيهقي في "الآداب" (153)، وكما تشير إليه رواية يعقوب بن سفيان عند الخطيب في "الفقيه والمتفقه" (884)، ثلاثتهم عن سعيد بن الحكم بن أبي مريم، عن يحيى بن أيوب الغافقي، وعلى أي حالٍ فله شواهد، ومعناه صحيح كما قال السخاوي في "المقاصد الحسنة".وأخرج رواية عبد العزيز الدراورديِّ أحمدُ 14/ (8952) عن سعيد بن منصور، عن عبد العزيز، بهذا الإسناد. وانظر تمام تخريجه وشواهده فيه.وممّا فاتنا هناك من الشواهد مرسلُ إبراهيم النخعي عند أحمد بن حنبل فيما نقله عنه ابن عبد البر في "التمهيد" 16/ 254، ورجاله ثقات.
4268 - أخبرني أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يحيى بن سعيد، عن سعيد بن أبي عَرُوبة، عن قَتَادة، عن زُرَارة بن أوفَى، عن سعدِ بن هِشام: أنه دخل مع حكيم بن أفْلَحَ على عائشةَ، فسألَها فقال: يا أم المؤمنين، أنبِئيني عن خُلُقِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، قالت: أليس تَقرأُ القرآنَ؟ قال: بلى، قالت: فإِنَّ خُلُقَ نبيِّ الله صلى الله عليه وسلم القُرآن [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাদ ইবনে হিশাম হাকীম ইবনে আফলাহ-এর সাথে তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন: হে উম্মুল মু’মিনীন, আপনি আমাকে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চরিত্র সম্পর্কে অবগত করুন। তিনি (আয়েশা) বললেন, তুমি কি কুরআন পড়ো না? তিনি বললেন, হ্যাঁ। তিনি বললেন, নিশ্চয়ই আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চরিত্র ছিল আল-কুরআন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. يحيى بن سعيد: هو القطان. وهو في "مسند أحمد" 40/ (24269).وأخرجه أبو داود (1343) عن محمد بن بشّار، عن يحيى بن سعيد القطان، بهذا الإسناد. لكنه لم يسُق لفظه بتمامه.وأخرجه مسلم (746)، والنسائي (424) طرق عن سعيد بن أبي عَروبة به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وقد تقدَّم برقم (3884) من طريق معمر عن قَتَادة. وذكرا هذه الزيادة، وقد رواه عن معمر بن راشد رجلان آخران، فلم يذكراها، فبقي أنها من زيادة النعمان بن راشد، وعنده مناكير وأغلاط كثيرة، وقد وعنده مناكير وأغلاط كثيرة، وقد نبَّه على خطأ هذه الزيادة النسائي في "المجتبى" (2096).وأخرجه أحمد 41/ (24985) عن عفان بن مسلم، عن حماد بن زيد عن معمر والنعمان - أو أحدهما - بهذا الإسناد. ولم يذكر أيوب.وأخرجه النسائي في "الكبرى" (2417) من طريق حفص بن عمر الحوضي، عن حماد بن زيد، عن معمر والنعمان بن راشد، به - دون ذكر أيوب أيضًا، واقتصر في روايته على عدم لعنه صلى الله عليه وسلم أحدًا وعلى جوده وسخائه صلى الله عليه وسلم.وأخرجه أحمد 43/ (25956) عن عبد الرزاق، وأبو داود (4786)، وابن حبان (6444) من طريق يزيد بن زُريع، كلاهما عن معمر وحده به بلفظ: ما ضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده خادمًا له قطُّ ولا امرأةً، ولا ضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده شيئًا قطُّ إلا أن يجاهد في سبيل الله. ثم ذكر عبد الرزاق وحده عدم انتقامه صلى الله عليه وسلم لنفسه قطُّ، واختياره أيسرَ الأمرين عند التخيير.وأخرجه النسائي (9118) من طريق محمد بن أبي عتيق وموسى بن عقبة، عن الزُّهري، به.كلفظ رواية عبد الرزاق عن معمر.وأخرجه أحمد 41/ (24549) و (24830) و (24846) و 42/ (25485) و (25557) و 43/ (25871) و (26262)، والبخاري (3560) و (6126) و (6786) و (6853)، ومسلم (2327)، وأبو داود (4785) من طرق عن الزُّهري، به مختصرًا بذكر اختياره صلى الله عليه وسلم أيسر الأمرين عند التخيير، وعدم انتقامه لنفسه صلى الله عليه وسلم. وبذلك يتبين أن لا وجود لتلك الزيادة المشار إليها قبل في رواية الزُّهري عن عروة.وأما قوله: ما سئل عن شيء قطُّ فمنعه، فهو ثابت في حديث الزُّهري عن عروة عن عائشة، فقد أخرجه أبو الشيخ في "أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم " (93) و (95) من طريق وهيب بن خالد، عن معمر، عن أخرجه الزهري، به.وأخرجه أحمد 40/ (240342) و 42/ (25288) و (25579) و (25715) و (25756) (25288) و 43/ (259232) و (26404)، ومسلم (2327) و (2328)، وابن ماجه (1984)، والنسائي (9120)، وابن حبان (488) من طُرُق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. بذكر عدم ضربه صلى الله عليه وسلم أحدًا، وعدم انتقامه لنفسه واختياره أيسر من الأمرين، وبعضهم يختصره ببعض ذلك.وأخرجه أحمد 42/ (25289) من طريق عثمان بن عروة، عن عروة، عن عائشة. بذكر اختياره صلى الله عليه وسلم أيسر الأمرين، وقال عثمان بن عروة هشام يخبر به عني. وأخرج أحمد 3/ (2042) و 4/ (2616) و 5/ (3425)، والبخاري (6) و (1902) و (3220)، ومسلم (2308)، والنسائي (2416) و (7939)، وابن حبان (3440) و (6370) من طرق عن الزُّهري، عن عُبيد الله بن عبد الله بن عُتبة، عن ابن عبّاس، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أجود الناس بالخير، وكان أجود ما يكون في رمضان إنَّ جبريل كان يلقاه في كل سنةٍ مرة في رمضان حتى ينسلخ فيعرض عليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم القرآنَ، فإذا لقيه جبريل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أجود بالخير من الريح المرسَلَة.
4269 - حدثنا أبو عَمرو عثمان بن أحمد بن السَّمّاك ببغداد، حدثنا حامد بن سهل الثَّغْري، حدثنا عارِمُ بن الفضل، حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب ومعمر والنُّعمان بن راشد، عن الزُّهْري، عن عُرْوة، عن عائشة قالت: ما لَعَنَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مسلمًا من لعنةٍ بذكْرٍ [1]، ولا ضَرَبَ بيده شيئًا قَطُّ إلَّا أن يضربَ بها في سبيل الله، ولا سُئل عن شيء قَطُّ فمنعَه إلَّا أن يُسأل مَأثَمًا، فإن كان مأثمًا كان أبعدَ الناس منه، ولا انتَقَم لِنفسِه من شيء قَطُّ يُؤتى إليه، إلَّا أن تُنتَهَكَ حُرماتُ الله، فيكونُ لله يَنتَقِمُ، ولا خُيِّر بين أمرَين قطُّ إلا اختارَ أيسرَهُما، وكان إذا أحدَث العهد بجبريلَ يُدارِسُه كان أجودَ الناسِ بالخَير مِن الرِّيحِ المُرسَلةِ [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.ومن حديث أيوب السَّختِياني غريبٌ جدًّا، فقد رواه سليمان بن حَرْب وغيرُه عن حماد، ولم يذكروا أيوب، وعارِمٌ ثقة مأمون.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কোনো মুসলমানকে কখনো কোনো গালি বা অভিশাপ দেননি এবং তিনি তাঁর হাত দ্বারা কখনো কোনো কিছুকে আঘাত করেননি, তবে আল্লাহর পথে (জিহাদের ক্ষেত্রে) আঘাত করা ব্যতীত। আর তাঁর কাছে কখনো কোনো কিছু চাওয়া হলে তিনি তা ফিরিয়ে দেননি, তবে যদি পাপের বিষয়ে চাওয়া হতো, ভিন্ন কথা। যদি তা পাপের বিষয়ে হতো, তবে তিনি ছিলেন সেই জিনিস থেকে সবার চেয়ে অধিক দূরে। তাঁর প্রতি করা কোনো অন্যায়ের জন্য তিনি কখনো নিজের জন্য প্রতিশোধ গ্রহণ করেননি, তবে যদি আল্লাহর সীমারেখা লঙ্ঘন করা হতো, তখন তিনি আল্লাহর জন্য প্রতিশোধ গ্রহণ করতেন। আর তাঁকে যখনই দুটি কাজের মধ্যে কোনো একটি বেছে নিতে বলা হয়েছে, তখনই তিনি এর মধ্যে সহজতমটি বেছে নিয়েছেন। আর যখন তিনি জিবরীল (আঃ)-এর সাথে দেখা করে তাঁর সাথে (কুরআন) মুদারাসা করতেন, তখন তিনি কল্যাণ বিতরণে প্রেরিত বাতাসের (মুক্ত বায়ুর) চেয়েও অধিক উদার ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا جاءت معجمة في (ص) بموحدة، وفسَّرها الحافظ ابن حجر في "الفتح" 10/ 428 بقوله: أي: بصريح اسمه. وذكرا هذه الزيادة، وقد رواه عن معمر بن راشد رجلان آخران، فلم يذكراها، فبقي أنها من زيادة النعمان بن راشد، وعنده مناكير وأغلاط كثيرة، وقد وعنده مناكير وأغلاط كثيرة، وقد نبَّه على خطأ هذه الزيادة النسائي في "المجتبى" (2096).وأخرجه أحمد 41/ (24985) عن عفان بن مسلم، عن حماد بن زيد عن معمر والنعمان - أو أحدهما - بهذا الإسناد. ولم يذكر أيوب.وأخرجه النسائي في "الكبرى" (2417) من طريق حفص بن عمر الحوضي، عن حماد بن زيد، عن معمر والنعمان بن راشد، به - دون ذكر أيوب أيضًا، واقتصر في روايته على عدم لعنه صلى الله عليه وسلم أحدًا وعلى جوده وسخائه صلى الله عليه وسلم.وأخرجه أحمد 43/ (25956) عن عبد الرزاق، وأبو داود (4786)، وابن حبان (6444) من طريق يزيد بن زُريع، كلاهما عن معمر وحده به بلفظ: ما ضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده خادمًا له قطُّ ولا امرأةً، ولا ضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده شيئًا قطُّ إلا أن يجاهد في سبيل الله. ثم ذكر عبد الرزاق وحده عدم انتقامه صلى الله عليه وسلم لنفسه قطُّ، واختياره أيسرَ الأمرين عند التخيير.وأخرجه النسائي (9118) من طريق محمد بن أبي عتيق وموسى بن عقبة، عن الزُّهري، به.كلفظ رواية عبد الرزاق عن معمر.وأخرجه أحمد 41/ (24549) و (24830) و (24846) و 42/ (25485) و (25557) و 43/ (25871) و (26262)، والبخاري (3560) و (6126) و (6786) و (6853)، ومسلم (2327)، وأبو داود (4785) من طرق عن الزُّهري، به مختصرًا بذكر اختياره صلى الله عليه وسلم أيسر الأمرين عند التخيير، وعدم انتقامه لنفسه صلى الله عليه وسلم. وبذلك يتبين أن لا وجود لتلك الزيادة المشار إليها قبل في رواية الزُّهري عن عروة.وأما قوله: ما سئل عن شيء قطُّ فمنعه، فهو ثابت في حديث الزُّهري عن عروة عن عائشة، فقد أخرجه أبو الشيخ في "أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم " (93) و (95) من طريق وهيب بن خالد، عن معمر، عن أخرجه الزهري، به.وأخرجه أحمد 40/ (240342) و 42/ (25288) و (25579) و (25715) و (25756) (25288) و 43/ (259232) و (26404)، ومسلم (2327) و (2328)، وابن ماجه (1984)، والنسائي (9120)، وابن حبان (488) من طُرُق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. بذكر عدم ضربه صلى الله عليه وسلم أحدًا، وعدم انتقامه لنفسه واختياره أيسر من الأمرين، وبعضهم يختصره ببعض ذلك.وأخرجه أحمد 42/ (25289) من طريق عثمان بن عروة، عن عروة، عن عائشة. بذكر اختياره صلى الله عليه وسلم أيسر الأمرين، وقال عثمان بن عروة هشام يخبر به عني. وأخرج أحمد 3/ (2042) و 4/ (2616) و 5/ (3425)، والبخاري (6) و (1902) و (3220)، ومسلم (2308)، والنسائي (2416) و (7939)، وابن حبان (3440) و (6370) من طرق عن الزُّهري، عن عُبيد الله بن عبد الله بن عُتبة، عن ابن عبّاس، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أجود الناس بالخير، وكان أجود ما يكون في رمضان إنَّ جبريل كان يلقاه في كل سنةٍ مرة في رمضان حتى ينسلخ فيعرض عليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم القرآنَ، فإذا لقيه جبريل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أجود بالخير من الريح المرسَلَة.
[2] حديث صحيح إلَّا أنَّ آخره في ذكر جوده وسخائه صلى الله عليه وسلم لدى مجيء جبريل، الصحيح أنه عن ابن عبّاس كما سيأتي وليس عن عائشة، وأيوب - وهو ابن أبي تميمة السَّختياني - لم يذكر في إسناده عروة - وهو ابن الزبير - كما توضحه رواية ابن عساكر في "تاريخه" 4/ 25، ونصَّ عليه الدارقطني في "العلل" (3487)، وذكر الدارقطني أن أيوب زاد في آخره زيادة في ذكر جودة صلى الله عليه وسلم وسخائه، وأنه وهم في زيادتها، لأنها من حديث الزُّهري عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة عن ابن عبّاس. قلنا: لكن الظن بأن يكون الذي زادها النعمان بن راشد هو الأقرب، وممّا يؤكد ذلك رواية عفان بن مسلم وحفص بن عمر الحوضي وغيرهما عن حماد بن زيد، حيث إنهما لم يذكرا أيوب، وذكرا هذه الزيادة، وقد رواه عن معمر بن راشد رجلان آخران، فلم يذكراها، فبقي أنها من زيادة النعمان بن راشد، وعنده مناكير وأغلاط كثيرة، وقد وعنده مناكير وأغلاط كثيرة، وقد نبَّه على خطأ هذه الزيادة النسائي في "المجتبى" (2096).وأخرجه أحمد 41/ (24985) عن عفان بن مسلم، عن حماد بن زيد عن معمر والنعمان - أو أحدهما - بهذا الإسناد. ولم يذكر أيوب.وأخرجه النسائي في "الكبرى" (2417) من طريق حفص بن عمر الحوضي، عن حماد بن زيد، عن معمر والنعمان بن راشد، به - دون ذكر أيوب أيضًا، واقتصر في روايته على عدم لعنه صلى الله عليه وسلم أحدًا وعلى جوده وسخائه صلى الله عليه وسلم.وأخرجه أحمد 43/ (25956) عن عبد الرزاق، وأبو داود (4786)، وابن حبان (6444) من طريق يزيد بن زُريع، كلاهما عن معمر وحده به بلفظ: ما ضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده خادمًا له قطُّ ولا امرأةً، ولا ضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده شيئًا قطُّ إلا أن يجاهد في سبيل الله. ثم ذكر عبد الرزاق وحده عدم انتقامه صلى الله عليه وسلم لنفسه قطُّ، واختياره أيسرَ الأمرين عند التخيير.وأخرجه النسائي (9118) من طريق محمد بن أبي عتيق وموسى بن عقبة، عن الزُّهري، به.كلفظ رواية عبد الرزاق عن معمر.وأخرجه أحمد 41/ (24549) و (24830) و (24846) و 42/ (25485) و (25557) و 43/ (25871) و (26262)، والبخاري (3560) و (6126) و (6786) و (6853)، ومسلم (2327)، وأبو داود (4785) من طرق عن الزُّهري، به مختصرًا بذكر اختياره صلى الله عليه وسلم أيسر الأمرين عند التخيير، وعدم انتقامه لنفسه صلى الله عليه وسلم. وبذلك يتبين أن لا وجود لتلك الزيادة المشار إليها قبل في رواية الزُّهري عن عروة.وأما قوله: ما سئل عن شيء قطُّ فمنعه، فهو ثابت في حديث الزُّهري عن عروة عن عائشة، فقد أخرجه أبو الشيخ في "أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم " (93) و (95) من طريق وهيب بن خالد، عن معمر، عن أخرجه الزهري، به.وأخرجه أحمد 40/ (240342) و 42/ (25288) و (25579) و (25715) و (25756) (25288) و 43/ (259232) و (26404)، ومسلم (2327) و (2328)، وابن ماجه (1984)، والنسائي (9120)، وابن حبان (488) من طُرُق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. بذكر عدم ضربه صلى الله عليه وسلم أحدًا، وعدم انتقامه لنفسه واختياره أيسر من الأمرين، وبعضهم يختصره ببعض ذلك.وأخرجه أحمد 42/ (25289) من طريق عثمان بن عروة، عن عروة، عن عائشة. بذكر اختياره صلى الله عليه وسلم أيسر الأمرين، وقال عثمان بن عروة هشام يخبر به عني. وأخرج أحمد 3/ (2042) و 4/ (2616) و 5/ (3425)، والبخاري (6) و (1902) و (3220)، ومسلم (2308)، والنسائي (2416) و (7939)، وابن حبان (3440) و (6370) من طرق عن الزُّهري، عن عُبيد الله بن عبد الله بن عُتبة، عن ابن عبّاس، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أجود الناس بالخير، وكان أجود ما يكون في رمضان إنَّ جبريل كان يلقاه في كل سنةٍ مرة في رمضان حتى ينسلخ فيعرض عليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم القرآنَ، فإذا لقيه جبريل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أجود بالخير من الريح المرسَلَة.
4270 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، عن يونس بن عمرو، عن العَيزار بن حُرَيث، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مكتوبٌ في الإنجيل: لا فَظٌّ ولا غليظٌ، ولا سَخَّابٌ بالأسواق، ولا يَجزي بالسيئة مثلَها، بل يَعفُو ويَصفَحُ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর গুণাবলী ইঞ্জিলে (বাইবেলে) লেখা রয়েছে: তিনি রূঢ়ভাষী নন, কঠোর প্রকৃতিরও নন, তিনি বাজারে শোরগোলকারীও নন, তিনি মন্দের দ্বারা তার প্রতিউত্তর দেন না, বরং তিনি ক্ষমা করেন এবং এড়িয়ে যান।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل يونس بن عمرو - وهو ابن عبد الله السَّبيعي - وأحمد بن عبد الجبار - وهو العُطاردي - وقد رُوي من وجه آخر عن عائشة دون ذكر الإنجيل.وهو في زيادات يونس بن بكير على "السيرة النبوية" لابن إسحاق (184).وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 377 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 3/ 388 من طريق رضوان بن أحمد، عن أحمد بن عبد الجبار، به.وأخرجه ابن سعد 1/ 312، والخرائطي في "مكارم الأخلاق" (387) من طريق أبي نُعيم الفضل بن دكين، عن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، به.وأخرجه أحمد 42/ (25417) و 43/ (26091)، والترمذي (2016) من طريق أبي عبد الله الجَدَلي، عن عائشة، أنها قالت: لم يكن رسول الله صلى الله عليه وسلم فاحشًا ولا متفحشًا، ولا صخّابًا بالأسواق، ولا يجزي بالسيئة مثلها، ولكن يعفو ويصفح. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وفي الباب عن عبد الله بن عمرو بن العاص عند أحمد 11/ (6622)، والبخاري (2125) و (4838)، كلفظ رواية العيزار عن عائشة، لكن بذكر التوراة بدل الإنجيل. وعن عبد الله بن سلَام وكعب الأحبار عند الدارمي (6)، والطبراني في "الكبير" (14980)، والآجري في "الشريعة" (980)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 376، وغيرهم.وقد استوفى طرقَه الحافظُ ابن ناصر الدين الدمشقي في "جامع الآثار" 1/ 101 - 122، وأتى بما لا مزيد عليه.والسَّخَب والصخب: بمعنى الصِّياح.
4271 - حدثنا أبو بكر محمد بن جعفر الأدَمِي القارئ ببغداد، حدثنا عبد الله بن أحمد بن إبراهيم الدَّوْرَقي، حدثنا أحمد بن نصر بن مالك الخُزاعي، حدثنا علي بن الحسين بن واقِد، عن أبيه، قال: سمعتُ يحيى بن عُقَيل يقول: سمعتُ عبد الله بن أبي أوفى يقول: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُكثِرُ الذِّكْرَ، ويُقلُّ اللغوَ، ويُطيلُ الصلاةَ، ويَقصُر الخُطبةَ، ولا يَستنكِفُ أن يمشيَ مع العبدِ والأرملةِ حتى يَفرُغَ لهم من حاجتِهم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনু আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অধিক পরিমাণে আল্লাহকে স্মরণ করতেন (যিকির করতেন), অপ্রয়োজনীয় কথা কম বলতেন, সালাতকে দীর্ঘ করতেন এবং খুতবাকে সংক্ষিপ্ত করতেন। আর তিনি কোনো দাস ও বিধবার সাথে হেঁটে যেতে (তাদের কাজ করে দিতে) কুণ্ঠাবোধ করতেন না, যতক্ষণ না তিনি তাদের প্রয়োজন পূরণ করতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد حسن من أجل علي بن الحسين بن واقد، وقد توبع، وحسَّنه البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (670)، وقال: وهو حديث الحسين بن واقد تفرّد به.وأخرجه النسائي (1728)، وابن حبان (6423) و (6424) من طريق الفضل بن موسى، عن الحسين بن واقد، به. الرواية التي قبل هذه، فذكر هذا الإسناد لذلك المتن، وإنما الذي أخرجه البيهقي في كتبه: "السنن الكبرى" 10/ 192، و "الدلائل" 1/ 316، و "الآداب" (149) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد نفسه حديث أبي سعيد الخُدري، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أشدَّ حياءً من العذراء في خدرها، وكان إذا كره شيئًا عرفناه في وجهه. وهذا موضعه هنا في باب شمائله صلى الله عليه وسلم، وهو حديث أخرجه أحمد 18/ (11683) و (11833) و (11862) و (11874)، والبخاري (3562) و (6102) و (6119)، ومسلم (2320)، وابن ماجه (4180)، وابن حبان (6306 - 6308) من طرق عن شعبة بإسناده هذا.
4272 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا هارون بن سليمان الأصبهاني، حدثنا عبد الرحمن بن مَهْدي، حدثنا شُعْبة، عن قَتَادة، قال: سمعت عبد الله بن أبي عُتبة يقول: سمعت أبا سعيد الخُدْري يقول: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُكثر الذِّكر، ويُقِلُّ اللغوَ، ويُطيل، الصلاة، ويَقصُر الخُطبَة، ولا يستنكِفُ أن يمشيَ مع العبدِ والأرملةِ، حتى يَفرُغَ لهم من حاجتهم [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.قال الحاكم: وقد قدَّمتُ هذه الأحاديثَ الصحيحةَ في دلائل النبوة من أخلاق سيدنا المصطفى لقول الله عز وجل: {وَلَقَدِ اخْتَرْنَاهُمْ عَلَى عِلْمٍ عَلَى الْعَالَمِينَ} [الدخان: 32] وقوله عز وجل: {اللَّهُ أَعْلَمُ حَيْثُ يَجْعَلُ رِسَالَتَهُ [2]} [الأنعام: 124] وقوله: {ن وَالْقَلَمِ وَمَا يَسْطُرُونَ (1) مَا أَنْتَ بِنِعْمَةِ رَبِّكَ بِمَجْنُونٍ (2) وَإِنَّ لَكَ لأَجْرًا غَيْرَ مَمْنُونٍ (3) وَإِنَّكَ لَعَلَى خُلُقٍ عَظِيمٍ}.فاسمع الآن الآياتِ الصحيحةَ بعدها:
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বেশি বেশি আল্লাহর যিকির করতেন, অনর্থক কথা কম বলতেন, সালাত দীর্ঘ করতেন এবং খুতবা সংক্ষিপ্ত করতেন। তিনি কোনো দাস (গোলাম) ও বিধবার সাথে পথ চলতে বা তাদের প্রয়োজন পূরণ না হওয়া পর্যন্ত কাজ করে দিতে সংকোচ বোধ করতেন না। এই হাদীসটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তাঁরা এটি বর্ণনা করেননি।
হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: নিশ্চয়ই আমি আমাদের সরদার মুস্তফার (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চারিত্রিক গুণাবলীর মাধ্যমে নবুওয়তের প্রমাণাদির ক্ষেত্রে এই সহীহ হাদীসগুলো পেশ করেছি। এর কারণ হলো আল্লাহ আযযা ওয়া জাল-এর বাণী: {এবং নিশ্চয়ই আমি তাদের জেনেশুনেই সৃষ্টিকুলের উপর মনোনীত করেছিলাম।} [সূরা দুখান: ৩২] এবং তাঁর বাণী: {আল্লাহ্ ভালো জানেন, কোথায় তিনি তাঁর রিসালাত স্থাপন করবেন।} [সূরা আনআম: ১২৪] আর তাঁর (আল্লাহর) বাণী: {নূন, শপথ কলমের এবং যা কিছু তারা লিপিবদ্ধ করে তার, আপনি আপনার রবের অনুগ্রহে উন্মাদ নন। এবং আপনার জন্য রয়েছে অফুরন্ত প্রতিদান। এবং নিশ্চয়ই আপনি মহান চরিত্রের উপর প্রতিষ্ঠিত।} এখন আপনি এরপরের সহীহ আয়াতগুলো শুনুন:
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذا إسناد صحيح، لكن أحدًا في الدنيا لم يُخرّج هذا المتن بهذا الإسناد، سوى ما وجدناه في أصول "المستدرك" هنا، ويغلب على ظننا أنَّ هذا خطأ قديم، حصل فيه انتقال بصرٍ إلى متن الرواية التي قبل هذه، فذكر هذا الإسناد لذلك المتن، وإنما الذي أخرجه البيهقي في كتبه: "السنن الكبرى" 10/ 192، و "الدلائل" 1/ 316، و "الآداب" (149) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد نفسه حديث أبي سعيد الخُدري، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أشدَّ حياءً من العذراء في خدرها، وكان إذا كره شيئًا عرفناه في وجهه. وهذا موضعه هنا في باب شمائله صلى الله عليه وسلم، وهو حديث أخرجه أحمد 18/ (11683) و (11833) و (11862) و (11874)، والبخاري (3562) و (6102) و (6119)، ومسلم (2320)، وابن ماجه (4180)، وابن حبان (6306 - 6308) من طرق عن شعبة بإسناده هذا.
[2] هكذا في نسخنا الخطية، وهذه قراءة الجماعة غير ابن كثير وحفص عن عاصم، فقرآ بالإفراد. انظر "زاد المسير" لابن الجوزي 2/ 75. وقد انفرد به بهذا الإسناد، فقال الذهبي في "تلخيصه": أظنه موضوعًا على سعيد. قلنا: يعني سعيد بن أبي عَروبة. وقال في "الميزان" في ترجمة عمرو بن أوس هذا يُجهَلُ حاله، وأتى بخبر منكر.وقد روى هذا الخبر محمد بن حمدون بن خالد الحافظ عند الثعلبي في "تفسيره" 7/ 61 عن هارون بن العباس الهاشمي، قال: حدثنا محمد بن بشر بن شريك، قال: حدثنا جندل، وكذلك رواه أبو بكر الخلال في "السنة" (316) عن محمد بن بشر بن شريك، عن جندل، فإن كان الصحيح ذكر محمد بن بشر بن شريك في هذا الإسناد فهذه علة أخرى في الخبر، وهي ضعف محمد بن بشر هذا، فقد قال عنه الذهبي في "الميزان": ما هو بعُمدة. قلنا: لكن تابعه محمد بن عصمة الخراساني عند الخلال (316) إلّا أنَّ الراوي عنه مجهول لا يُعرف.وقد روي نحو هذا الخبر عن ابن عبّاس من وجه آخر لا يُفرح به، فقد أخرجه ابن الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" منه للحافظ ابن حجر (253)، وابن الفاخر في "موجبات الجنة" (423) من طريق الفضل بن جعفر بن سليمان بن علي بن عبد الله بن عبّاس، عن عبد الصمد بن علي بن عبد الله بن عبّاس، عن أبيه، عن جده، قال الذهبي في "الميزان": ما عبد الصمد بحجة. قلنا: والفضل بن جعفر الراوي عنه مجهول لا يُدرَى حالُه.وفي الباب عن عمر بن الخطاب بعده، لكنه لا يُعتدُّ به كذلك لما سيأتي بيانه.وفي الكتابة على العرش: لا إله إلّا الله محمد رسول الله، أخبار ذكرها ابن الجوزي في "الموضوعات" (609) و (630)، واستوفاها السيوطي في "اللآلئ المصنوعة" 1/ 274 و 282 و 292، وابن عراق في "تنزيه الشريعة" 1/ 350 - 351 و 401 - 402 و 405، وكلها لا تقوم بها الحجة، وغالبها يشتمل على وضّاعين.
4273 - حدثنا عَلي بن حَمْشَاذَ العَدْل إملاءً، حدثنا هارون بن العباس الهاشمي، حدثنا جَنْدَلُ بن والقٍ، حدثنا عمرو بن أوس الأنصاري، حدثنا سعيد بن أبي عَروبة، عن قَتَادة، عن سعيد بن المسيّب، عن ابن عبّاس، قال: أوحَى اللهُ إلى عيسى عليه السلام: يا عيسى، آمن بمحمدٍ، وأُمُر من أدركَه من أمتك أن يُؤمنوا به، فلولا محمدٌ ما خلقتُ آدمَ، ولولا محمدٌ ما خلقتُ الجنةَ والنارَ، ولقد خلقتُ العرشَ على الماء، فاضطربَ فكتبتُ عليه: لا إله إلّا الله [محمد رسول الله] [1] فسَكَنَ [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলা ঈসা (আলাইহিস সালাম)-এর প্রতি ওহী (প্রত্যাদেশ) প্রেরণ করলেন: হে ঈসা, তুমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি ঈমান আনো এবং তোমার উম্মতের মধ্যে যারা তাঁকে পাবে, তাদেরকেও তাঁর প্রতি ঈমান আনার নির্দেশ দাও। যদি মুহাম্মাদ না হতেন, তবে আমি আদমকে সৃষ্টি করতাম না। আর যদি মুহাম্মাদ না হতেন, তবে আমি জান্নাত ও জাহান্নাম সৃষ্টি করতাম না। আমি আরশকে পানির ওপর সৃষ্টি করেছিলাম, তখন তা নড়ে উঠেছিল (বা অস্থির হয়ে পড়েছিল)। অতঃপর আমি তাতে লিখলাম: ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু মুহাম্মাদুর রাসূলুল্লাহ’—তখন তা স্থির হয়ে গেল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، وهو ثابت لجميع من خرَّجه، وهو مرادٌ هنا بلا شك. وقد انفرد به بهذا الإسناد، فقال الذهبي في "تلخيصه": أظنه موضوعًا على سعيد. قلنا: يعني سعيد بن أبي عَروبة. وقال في "الميزان" في ترجمة عمرو بن أوس هذا يُجهَلُ حاله، وأتى بخبر منكر.وقد روى هذا الخبر محمد بن حمدون بن خالد الحافظ عند الثعلبي في "تفسيره" 7/ 61 عن هارون بن العباس الهاشمي، قال: حدثنا محمد بن بشر بن شريك، قال: حدثنا جندل، وكذلك رواه أبو بكر الخلال في "السنة" (316) عن محمد بن بشر بن شريك، عن جندل، فإن كان الصحيح ذكر محمد بن بشر بن شريك في هذا الإسناد فهذه علة أخرى في الخبر، وهي ضعف محمد بن بشر هذا، فقد قال عنه الذهبي في "الميزان": ما هو بعُمدة. قلنا: لكن تابعه محمد بن عصمة الخراساني عند الخلال (316) إلّا أنَّ الراوي عنه مجهول لا يُعرف.وقد روي نحو هذا الخبر عن ابن عبّاس من وجه آخر لا يُفرح به، فقد أخرجه ابن الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" منه للحافظ ابن حجر (253)، وابن الفاخر في "موجبات الجنة" (423) من طريق الفضل بن جعفر بن سليمان بن علي بن عبد الله بن عبّاس، عن عبد الصمد بن علي بن عبد الله بن عبّاس، عن أبيه، عن جده، قال الذهبي في "الميزان": ما عبد الصمد بحجة. قلنا: والفضل بن جعفر الراوي عنه مجهول لا يُدرَى حالُه.وفي الباب عن عمر بن الخطاب بعده، لكنه لا يُعتدُّ به كذلك لما سيأتي بيانه.وفي الكتابة على العرش: لا إله إلّا الله محمد رسول الله، أخبار ذكرها ابن الجوزي في "الموضوعات" (609) و (630)، واستوفاها السيوطي في "اللآلئ المصنوعة" 1/ 274 و 282 و 292، وابن عراق في "تنزيه الشريعة" 1/ 350 - 351 و 401 - 402 و 405، وكلها لا تقوم بها الحجة، وغالبها يشتمل على وضّاعين.
[2] ضعيف منكر، عمرو بن أوس الأنصاري مجهول لا يُعرَف، ولم يَرِد ذكره إلّا في هذا الخبر، وقد انفرد به بهذا الإسناد، فقال الذهبي في "تلخيصه": أظنه موضوعًا على سعيد. قلنا: يعني سعيد بن أبي عَروبة. وقال في "الميزان" في ترجمة عمرو بن أوس هذا يُجهَلُ حاله، وأتى بخبر منكر.وقد روى هذا الخبر محمد بن حمدون بن خالد الحافظ عند الثعلبي في "تفسيره" 7/ 61 عن هارون بن العباس الهاشمي، قال: حدثنا محمد بن بشر بن شريك، قال: حدثنا جندل، وكذلك رواه أبو بكر الخلال في "السنة" (316) عن محمد بن بشر بن شريك، عن جندل، فإن كان الصحيح ذكر محمد بن بشر بن شريك في هذا الإسناد فهذه علة أخرى في الخبر، وهي ضعف محمد بن بشر هذا، فقد قال عنه الذهبي في "الميزان": ما هو بعُمدة. قلنا: لكن تابعه محمد بن عصمة الخراساني عند الخلال (316) إلّا أنَّ الراوي عنه مجهول لا يُعرف.وقد روي نحو هذا الخبر عن ابن عبّاس من وجه آخر لا يُفرح به، فقد أخرجه ابن الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" منه للحافظ ابن حجر (253)، وابن الفاخر في "موجبات الجنة" (423) من طريق الفضل بن جعفر بن سليمان بن علي بن عبد الله بن عبّاس، عن عبد الصمد بن علي بن عبد الله بن عبّاس، عن أبيه، عن جده، قال الذهبي في "الميزان": ما عبد الصمد بحجة. قلنا: والفضل بن جعفر الراوي عنه مجهول لا يُدرَى حالُه.وفي الباب عن عمر بن الخطاب بعده، لكنه لا يُعتدُّ به كذلك لما سيأتي بيانه.وفي الكتابة على العرش: لا إله إلّا الله محمد رسول الله، أخبار ذكرها ابن الجوزي في "الموضوعات" (609) و (630)، واستوفاها السيوطي في "اللآلئ المصنوعة" 1/ 274 و 282 و 292، وابن عراق في "تنزيه الشريعة" 1/ 350 - 351 و 401 - 402 و 405، وكلها لا تقوم بها الحجة، وغالبها يشتمل على وضّاعين.
4274 - حدثنا أبو سعيد عمرو بن محمد بن منصور العَدْل، حدثنا أبو الحسن محمد بن إسحاق بن إبراهيم الحَنْظَلي، حدثنا أبو الحارث عبد الله بن مسلم الفِهْري، حدثنا إسماعيل بن مَسلَمة، أخبرنا عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن جده، عن عُمر بن الخطاب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لمّا اقترفَ آدمُ الخطيئةَ قال: يا ربِّ، أسألُك بحقّ محمدٍ لَمَا غَفَرْتَ لي، فقال الله: يا آدمُ، وكيف عرفتَ محمدًا ولم أخلُقْه؟ قال: يا ربِّ، لأنك لما خلقَتني بيدِك ونفخْتَ فيَّ من رُوحِك، رفعتُ رأسي فرأيتُ على قوائم العرشِ مكتوبًا: لا إله إلَّا الله محمد رسول الله، فعلمتُ أنك لم تُضِفْ إلى اسمِك إلَّا أحبَّ الخلقِ إليك، فقال الله: صدقتَ يا آدم، إنه لأحبُّ الخلق إليَّ، وإذ سألْتَني [1] بحقه [2] فقد غَفَرتُ لك، ولولا محمدٌ ما خَلَقتُك" [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، وهو أولُ حديث ذكرتُه لعبد الرحمن بن زيد بن أسلَمَ في هذا الكتاب [4].
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আদম (আঃ) পাপ করেছিলেন, তখন তিনি বললেন: 'হে আমার রব, আমি আপনার কাছে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সম্মানের (অধিকারের) মাধ্যমে প্রার্থনা করছি, আপনি আমাকে ক্ষমা করে দিন!' আল্লাহ বললেন: 'হে আদম, তুমি মুহাম্মাদকে কীভাবে চিনলে, অথচ আমি তাকে এখনো সৃষ্টি করিনি?' তিনি বললেন: 'হে আমার রব, কারণ আপনি যখন আমাকে আপনার হাত দ্বারা সৃষ্টি করলেন এবং আমার মধ্যে আপনার রূহ ফুঁকে দিলেন, তখন আমি মাথা তুলে দেখলাম যে আরশের খুঁটিগুলোতে লেখা রয়েছে: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু মুহাম্মাদুর রাসূলুল্লাহ' (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল)। তখন আমি বুঝলাম যে, আপনি আপনার নামের সাথে এমন কাউকেই যুক্ত করেননি, যিনি আপনার কাছে সৃষ্টির মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়।' তখন আল্লাহ বললেন: 'হে আদম, তুমি সত্য বলেছ। নিশ্চয়ই সে আমার কাছে সৃষ্টির মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়। আর যেহেতু তুমি তার অধিকারের মাধ্যমে আমার কাছে চেয়েছ, তাই আমি তোমাকে ক্ষমা করে দিলাম। যদি মুহাম্মাদ না থাকত, তবে আমি তোমাকে সৃষ্টি করতাম না।'"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: إذ ما إلي، وجاء محله في (ص) و (ع) بياض، وأثبتناه على الصواب من رواية البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 489 عن أبي عبد الله الحاكم، ونقله عنه الحافظ ابن كثير في "مسند الفاروق" (969)، وفي "البداية والنهاية" 1/ 190. ابن أبي مريم، عن عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، به. إلّا أنَّ رواية الآجريّ موقوفة.وأخرجه مختصرًا الآجري في "الشريعة" (950) من طريق أبي مروان العثماني محمد بن عثمان بن خالد، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، فذكره مقطوعًا، وجعله عن ابن أبي الزناد، وهو وهم من عثمان بن خالد العثماني والد بن أبي مروان فإنه متروك الحديث.
[2] في النسخ الخطية: حقه، والمثبت على الصواب من رواية البيهقي. ابن أبي مريم، عن عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، به. إلّا أنَّ رواية الآجريّ موقوفة.وأخرجه مختصرًا الآجري في "الشريعة" (950) من طريق أبي مروان العثماني محمد بن عثمان بن خالد، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، فذكره مقطوعًا، وجعله عن ابن أبي الزناد، وهو وهم من عثمان بن خالد العثماني والد بن أبي مروان فإنه متروك الحديث.
4274 [3] - إسناده ضعيف جدًّا لتفرد عبد الرحمن بن زيد بن أسلم به، وهو ضعيف باتفاق خاصة فيما ينفرد به عن أبيه، وما وقع في إسناد الحاكم من تسمية أبي الحارث الفِهْري بعبد الله بن مسلم وتسمية شيخه بإسماعيل بن مسلمة، فيغلب على الظن أنه حصل فيه تحريف في كلا الاسمين، وذلك أن جماعة غير محمد بن إسحاق الحنظلي قد رووا هذا الخبر، فقالوا: عن أبي الحارث أحمد بن سعيد - وهو ابن عمرو - عن عبد الله بن إسماعيل، عن عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، فهذا هو الصحيح، وأحمد بن سعيد بن عمرو المذكور روى عنه جماعة ووثقه مسلمة بن قاسم، وأما شيخه عبد الله بن إسماعيل - وقُيّد في بعض الروايات بأبي عبد الرحمن بن أبي مريم - فلم نتبينه، والظاهر أنه مجهول لا يُعرف، فهذه علة أخرى في الخبر، والله تعالى أعلم.وقد حكم بوضعه الحافظُ الذهبي كما في "تلخيص المستدرك" وشيخ الإسلام ابن تيمية فيما نقله عنه ابن القيم في جزء له فيه فوائد حديثية ص 78، ووافقهما، وحملوا فيه جميعًا على عبد الرحمن بن زيد بن أسلم وقال ابن تيمية في "مجموع الفتاوى" 1/ 254: ورواية الحاكم لهذا الحديث مما أُنكر عليه، فإنه نفسه قد قال في كتاب "المدخل إلى معرفة الصحيح من السقيم": عبد الرحمن بن زيد بن أسلم روى عن أبيه أحاديث موضوعة لا تخفى على من تأَمَّلها من أهل الصنعة أن الحملَ فيها عليه.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 488 - 489 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الصغير" (992)، و "الأوسط" (6502) عن محمد بن داود بن أسلم الصدفي المصري، وأبو بكر الآجُرّي في "الشريعة" (956) عن أبي بكر بن أبي داود، وأبو الحسين بن المظفَّر كما في "جامع الآثار" لابن ناصر الدين الدمشقي 1/ 471 عن محمد بن عبد الله بن زَحْر، ثلاثتهم عن أبي الحارث أحمد بن سعيد الفهري، عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن إسماعيل ابن أبي مريم، عن عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، به. إلّا أنَّ رواية الآجريّ موقوفة.وأخرجه مختصرًا الآجري في "الشريعة" (950) من طريق أبي مروان العثماني محمد بن عثمان بن خالد، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، فذكره مقطوعًا، وجعله عن ابن أبي الزناد، وهو وهم من عثمان بن خالد العثماني والد بن أبي مروان فإنه متروك الحديث.
4274 [4] - بل سبق له أن أخرج له خبرًا برقم (4176) لكن من روايته عن أبيه موقوفًا عليه من قوله.
4275 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّورِي، حدثنا قُرادٌ أبو نُوح، أخبرنا يونس بن أبي إسحاق، عن أبي بكر بن أبي موسى، عن أبي موسى، قال: خرج أبو طالبٍ إلى الشام، وخرج معه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في أشياخٍ من قريش، فلما أشرفُوا على الراهِبِ هبَطُوا، فحوَّلُوا رحالَهم، فخرج إليهم الراهبُ، وكانوا قبلَ ذلك يَمرُّون به فلا يخرج إليهم ولا يَلتفِتُ، قال: وهم يَحُلُّون رحالَهم، فجعل يتخلَّلُهم حتى جاء فأخذَ بيدِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، قال: هذا سيّدُ العالَمين، هذا رسولُ ربِّ العالَمين، هذا يبعثُه اللهُ رحمةً للعالَمين، فقال له أشياخٌ من قريش: وما عِلْمُك بذلك؟ قال: إنكم حين أشرفتُم من العَقبةِ لم يَبْقَ شجرٌ ولا حجرٌ إِلَّا خَرَّ ساجدًا، ولا تَسجدُ إِلَّا لِنبيٍّ، وإني أعرفُه خاتَمُ النبوة أسفل من غُضروف كتفِه مثلُ التفّاحة، ثم رجع فَصَنَع لهم طعامًا ثم أتاهم، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم في رِعْية الإبل، قال: أرسِلُوا إليه، فأقبلَ وعليه غَمامةٌ تُظِلُّه، قال: انظُروا إليه، غَمامةٌ تُظلُّه، فلما دنا من القوم وَجَدَهُم قد سَبَقُوه إلى فَيْء الشجرة، فلما جلسَ مال فيءُ الشجرة عليه، قال: انظُروا إلى فيء الشجرة مالَ عليه، فبينما هو قائم عليه وهو يُناشِدُهم أَن لا تَذْهَبُوا به إلى الروم، فإنَّ الرومَ إن رأوه عرفُوه بالصِّفة فقتلوه.فالتفتَ فإذا هو بسبعةٍ نفرٍ قد أقبَلُوا من الروم فاستقبَلَهم، فقال: ما جاء بكم؟ قالوا: جئنا، فإنَّ هذا النبيَّ خارجٌ في هذا الشهر فلم يَبْقَ طريقٌ إِلَّا قد بُعث ناسٌ، وإنا بُعِثْنا إلى طريقِه هذا، فقال لهم الراهبُ: هل خَلَّفتُم خَلْفَكم أحدًا هو خيرٌ منكم؟ قالوا: لا، قالوا: إنما أُخبرنا خَبَرَه، بُعِثنا لطريقك هذا، قال: أفرأيتُم أمرًا أراده اللهُ أن يَقضِيَه، هل يستطيعُ أحدٌ من الناس ردَّه؟ قالوا: لا، قال: فبايِعُوه، فبايَعُوه وأقامُوا معه، قال: فأتاهم الراهبُ، فقال: أنشُدُكُمُ الله أَيكُم وَليُّه، قالوا: أبو طالب، فلم يَزَلْ يُناشِدُه حتى ردَّه وبعثَ معه أبو بكر بلالًا، وزَوّدَه الراهبُ من الكَعْك والزيتِ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ তালিব সিরিয়ার (শাম) উদ্দেশ্যে রওয়ানা হলেন। কুরাইশের কয়েকজন প্রবীণ লোকের সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও তাঁর সাথে বের হলেন। যখন তারা এক পাদ্রীর কাছাকাছি পৌঁছলেন, তখন তারা অবতরণ করলেন এবং তাদের সওয়ারীর সরঞ্জাম রাখলেন। তখন সেই পাদ্রী তাদের কাছে বেরিয়ে এলেন। এর আগে তারা যখনই তাকে অতিক্রম করতেন, তিনি তাদের কাছে বের হতেন না বা মনোযোগ দিতেন না। তিনি (আবূ মূসা) বলেন: যখন তারা তাদের সরঞ্জাম খুলছিলেন, তখন পাদ্রী তাদের মাঝখান দিয়ে যেতে লাগলেন এবং এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাত ধরলেন। তিনি (পাদ্রী) বললেন: ইনি বিশ্বজগতের নেতা! ইনি বিশ্বজগতের প্রতিপালকের রাসূল! আল্লাহ্ একে বিশ্বজগতের জন্য রহমত হিসেবে প্রেরণ করবেন। কুরাইশের প্রবীণ লোকেরা তাকে জিজ্ঞেস করল: এ সম্পর্কে আপনার জ্ঞান কী? তিনি বললেন: যখন তোমরা এই গিরিপথ থেকে উপরে এলে, তখন কোনো বৃক্ষ বা প্রস্তর এমন ছিল না, যা সেজদায় নত হয়নি। আর তারা শুধু নবীর জন্যই সেজদা করে। আর আমি তাকে চিনতে পারি, তার কাঁধের সংযোগস্থলের নিচে একটি আপেলের মতো নবুওয়তের মোহর রয়েছে।
অতঃপর তিনি ফিরে গেলেন এবং তাদের জন্য খাবার তৈরি করলেন। তারপর তাদের কাছে আসলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন উট চরাতে ব্যস্ত ছিলেন। পাদ্রী বললেন: তার কাছে লোক পাঠাও। তিনি আসলেন, আর একটি মেঘ তাকে ছায়া দিচ্ছিল। পাদ্রী বললেন: তাকে দেখ! একটি মেঘ তাকে ছায়া দিচ্ছে। যখন তিনি লোকজনের কাছাকাছি এলেন, তখন দেখলেন তারা গাছের ছায়া দখল করে ফেলেছে। যখন তিনি বসলেন, তখন গাছের ছায়া তার দিকে ঝুঁকে পড়ল। তিনি বললেন: গাছের ছায়াটিকে দেখ! এটি তার দিকে ঝুঁকে পড়েছে।
যখন তিনি তাদের কাছে দাঁড়িয়ে ছিলেন, তখন তিনি তাদের কসম দিয়ে বললেন যে, তোমরা তাকে রোমের দিকে নিয়ে যেও না। কারণ, রোমবাসী যদি তাকে দেখে, তবে তারা তার বর্ণনা দ্বারা তাকে চিনে ফেলবে এবং তাকে হত্যা করে ফেলবে। অতঃপর পাদ্রী মুখ ফিরালেন এবং দেখতে পেলেন রোমের দিক থেকে সাতজন লোক আসছে। তিনি তাদের সাথে দেখা করলেন এবং বললেন: তোমরা কেন এসেছ? তারা বলল: আমরা এসেছি। কারণ এই মাসেই এই নবীর আবির্ভাব হবে। কোনো পথ বাকি নেই যেখানে লোক পাঠানো হয়নি, আর আমাদের এই পথটিতে পাঠানো হয়েছে। পাদ্রী তাদের বললেন: তোমরা কি তোমাদের পেছনে এমন কাউকে রেখে এসেছ, যে তোমাদের চেয়ে উত্তম? তারা বলল: না। তারা আরও বলল: আমরা শুধু তার খবর জেনেছি, তাই আমাদের এই পথে পাঠানো হয়েছে। পাদ্রী বললেন: তোমরা কি মনে করো যে, আল্লাহ্ যা ঘটাতে চান, মানুষের মধ্যে কেউ কি তা প্রতিহত করতে সক্ষম? তারা বলল: না। পাদ্রী বললেন: তাহলে তোমরা তার হাতে বাইয়াত হও। অতঃপর তারা বাইয়াত হলো এবং তার সাথে অবস্থান করল।
বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর পাদ্রী তাদের কাছে এলেন এবং বললেন: আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, তোমাদের মধ্যে তার অভিভাবক কে? তারা বলল: আবূ তালিব। পাদ্রী আবূ তালিবকে অনুরোধ করতে থাকলেন যতক্ষণ না তিনি তাকে (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) ফেরত পাঠাতে রাজি হলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তার সাথে পাঠালেন। আর পাদ্রী তাকে কিছু বিস্কুট (কা’ক) ও জলপাই তেল সাথে দিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر منكر جدًّا، قال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 503: حديث منكر جدًّا، وأين كان أبو بكر؟! كان ابنَ عشر سنين، فإنه أصغر من رسول الله صلى الله عليه وسلم بسنتين ونصف، وأين كان بلال في هذا الوقت؟! فإنَّ أبا بكر لم يشتره إلا بعد المبعث ولم يكُن وُلد بعدُ، وأيضًا فإذا كان عليه غمامة تُظِلُّه كيف يُتصوَّر أن يميل فيءُ الشجرة؟! لأنَّ ظل الغمامة يُعدِم فيء الشجرة التي نزل تحتها، ولم نر النبيّ صلى الله عليه وسلم ذكَّر أبا طالب قطُّ بقول الراهب، ولا تذاكرته قريش ولا حكَتْه أولئك الشيوخ، مع توفّر هممهم ودواعيهم على حكاية مثل ذلك، فلو وقع لاشتَهَرَ بينهم أيَّما اشتهارٍ، ولبقي عنده صلى الله عليه وسلم حِسٌّ من النبوة، ولما أَنكر مجيء الوحي إليه، أوّلًا بغار حراء وأتى خديجة خائفًا على عقله، ولما ذهب إلى شواهق الجبال ليرمي نفسه صلى الله عليه وسلم، وأيضًا فلو أثَّر هذا الخوف في أبي طالب وردَّه كيف كانت تطيب نفسه أن يُمكِّنه من السفر إلى الشام تاجرًا لخديجة؟قال: وفي الحديث ألفاظ منكرة تشبه ألفاظ الطُّرقية، مع أنَّ ابن عائذ روى معناه في "مغازيه" دون قوله: وبعث معه أبو بكر بلالًا .. إلى آخره، فقال: حدثنا الوليد بن يسلم، قال: أخبرني أبو داود سليمان بن موسى، فذكره بمعناه.ثم أورده الذهبي عن جماعة من أهل المغازي والسير بألفاظ مغايرة لهذا اللفظ الذي هنا.وذكر أنَّ الذي تفرد به بهذا اللفظ هو قُرادٌ أبو نوح - واسمه عبد الرحمن بن غزوان - وذكر في ترجمته في "السير" 9/ 518 أنَّ له ما ينكر، ومن ذلك حديث لا يُحتمل في قصة النبي صلى الله عليه وسلم وبَحيرا بالشام. يعني هذا الحديث.وممن أنكر هذا الحديثَ على فُرادٍ أيضًا ابن سيد الناس في "عيون الأثر" 1/ 55، وابنُ كثير في "البداية والنهاية" 3/ 440، وابن حجر في "الإصابة" 1/ 353، وأعلُّوه ببعض ما أعله به الذهبي من وجوه النكارة في بعض ألفاظه.وورى ابن عساكر في "تاريخه" 3/ 5 عن العباس بن محمد الدُّوري أنه سمعه من قرادٍ أحمدُ بن حنبل ويحيى بن مَعِين، وأنهما قالا: سمعناه من قُرادٍ لأنه من الغرائب والأفراد. قلنا: يعني أنهما رَوياه مُستغربَين لا مُحتَجَّين به.وأخرجه الترمذي (3620) عن الفضل بن سهل أبي العباس الأعرج، عن عبد الرحمن بن غزوان قراد، بهذا الإسناد. وقال: حسن غريب!
4276 - حدثنا أبو الحسن أحمد بن محمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا حَيْوة بن شُرَيح الحَضْرمي، حدثنا بقيَّة بن الوليد، حدثني بَحِير بن سَعْد، عن خالد [بن مَعْدان، عن] [1] ابن عَمرو السُّلمي، عن عُتْبة بن عَبْدٍ: أَنَّ رجلًا سألَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كيفَ - أو ما - كان أول شأنِك يا رسولَ الله؟ قال: "كانت حاضِنَتي من بني سَعْد بن بكر، فانطلقتُ أنا وابنٌ لها في بَهْمٍ لنا، ولم نأخُذْ معنا زادًا، فقلت: يا أخي، اذهَبْ فأتِنا بِزادٍ من عند أُمَّنا، فانطلَقَ أخي وكنتُ عند البَهْمِ، فأقبل طَيْرانِ أبيضانِ كأنهما نَسْران، فقال أحدُهما لصاحِبِه، أهُو هُو؟ قال: نعم، فأقبَلا يَبتَدِراني، فأخذاني فبَطَحَاني للقَفَا فشَقّا بَطْني، ثم استَخْرجا قلبي فشَقّاه، فأخرجا منه عَلَقَتين سَودَاوَين، فقال أحدهما لصاحبِه: حُصْهُ - يعني خِطْهُ - واختِمْ عليه بخاتَم النبوّة، فقال أحدُهما لصاحبِه: اجعلْه في كِفّةٍ واجعل ألفًا من أمتِه في كِفّة، فإذا أنا أنظُرُ إلى الألْف فَوقي أُشفِقُ أن يَخِرُّوا عليَّ، فقالا: لو أنَّ أمَّتَه وُزِنَتْ به لمالَ بهم، ثم انطَلَقا وتَرَكاني، وفَرِقْتُ فَرَقًا شديدًا، ثم انطلقتُ إلى أمي فأخبرتُها بالذي رأيتُ، فأشفَقَت أن يكون قد التُبِسَ بي، فقالت: أعِيدُك بالله، فرَحَلَتْ بعيرًا لها فجعلَتْني على الرَّحْل ورَكِبَتْ خَلْفي، حتى بَلَغْنا أمّي، فقالت: أدَّيتُ أمانَتي وذِمَّتي، وحَدَّثَتْها بالذي لَقِيتُ، فلم يَرُعْها ذلك، قالت إني رأيتُ خرج مني نُورٌ أضاءتْ منه قُصورُ الشام [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
উতবা ইবনু আবদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার প্রথম অবস্থা বা ব্যাপারটি কেমন ছিল? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমার ধাত্রী ছিলেন বনু সা'দ ইবনু বাকর গোত্রের। আমি এবং তাঁর এক পুত্র আমাদের ভেড়ার পাল নিয়ে গেলাম। আমরা সাথে কোনো খাবার নেইনি। আমি বললাম: হে ভাই, তুমি যাও এবং আমাদের মায়ের কাছ থেকে কিছু খাবার নিয়ে আসো। আমার ভাই চলে গেল এবং আমি ভেড়ার পালের কাছে থাকলাম। তখন দুটি সাদা পাখি এলো, যেন তারা দুটি ঈগল। তাদের একজন তার সাথীকে বলল: সে কি এই? সে বলল: হ্যাঁ। অতঃপর তারা দু'জন দ্রুত আমার দিকে এগিয়ে এলো। তারা আমাকে ধরে চিৎ করে শুইয়ে দিল এবং আমার পেট চিরে ফেলল। এরপর আমার কলব (হৃদয়) বের করে তা চিড়ল। তা থেকে দুটি কালো জমাট রক্তপিণ্ড বের করল। তখন তাদের একজন তার সঙ্গীকে বলল: এটিকে সেলাই কর—অর্থাৎ, এটি সেলাই কর—এবং নবুওয়তের মোহর দ্বারা সীলমোহর লাগিয়ে দাও। তখন তাদের একজন তার সঙ্গীকে বলল: এটিকে (কলবকে) একটি পাল্লায় রাখো এবং তার উম্মতের মধ্য থেকে এক হাজার জনকে অন্য পাল্লায় রাখো। তখন আমি দেখলাম যে, সেই এক হাজারজন আমার উপরে উঠে আসছে, আমি আশঙ্কা করছিলাম যে তারা আমার উপরে পড়ে যাবে। তখন তারা দু'জন বলল: যদি তাঁর সমস্ত উম্মতকেও তাঁর সাথে ওজন করা হয়, তবে তাঁর দিকেই পাল্লা ঝুঁকে পড়বে। এরপর তারা চলে গেল এবং আমাকে ছেড়ে দিল। আমি ভীষণ ভয় পেয়ে গেলাম। এরপর আমি আমার মায়ের (ধাত্রী মা হালিমার) কাছে গেলাম এবং যা দেখেছি তা তাকে জানালাম। তিনি আশঙ্কা করলেন যে, আমার মধ্যে হয়তো খারাপ কিছু প্রবেশ করেছে। তিনি বললেন: আমি আল্লাহর কাছে তোমার আশ্রয় চাই। অতঃপর তিনি তাঁর উটনী প্রস্তুত করলেন, আমাকে হাওদার উপর বসালেন এবং নিজে আমার পেছনে বসলেন। শেষ পর্যন্ত আমরা আমার (আসল) মায়ের কাছে পৌঁছলাম। তিনি (ধাত্রী মা হালিমা) বললেন: আমি আমার আমানত এবং দায়িত্ব বুঝিয়ে দিলাম। তিনি (আমেনাকে) আমার সাথে যা ঘটেছে তা জানালেন। কিন্তু এতে তিনি (আমেনা) ভীত হলেন না। তিনি বললেন: আমি (যখন সন্তানসম্ভবা ছিলাম) দেখেছি যে, আমার থেকে এমন একটি নূর বের হয়েছিল, যার আলোয় সিরিয়ার প্রাসাদগুলো আলোকিত হয়ে গিয়েছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من رواية البيهقي في "دلائل النبوة" عن أبي عبد الله الحاكم. من شيخه، وصرَّح عند الدارمي (13) بسماع خالد من ابن عمرو السُّلَمي - واسمه عبد الرحمن - وسماع ابن عمرو من عُتبة بن عبدٍ، فانتفت شبهة تدليسه للتسوية، ولعله لأجل ذلك صحّحه الذهبي من هذه الطريق في "تاريخ الإسلام" 1/ 498.وقد رواه ثور بن يزيد عن خالد بن مَعْدان مرسلًا بنحوه كما تقدم بيانه برقم (4219)، لكنه قال فيه: أنَّ أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قالوا … فذكره.وأخرجه أحمد 29/ (17648) عن حيوة بن شريح، ويزيد بن عبد ربّه، كلاهما عن بقيّة، بهذا الإسناد. وفيه تصريح ابن عمرو بسماعه من عُتبة.ويشهد له دون ذكر رؤيا آمنة بنت وهب حديث أنس بن مالك عند مسلم (162) (261).وحديث أبي ذر الغفاري عند الدارمي (14)، وابن أبي الدنيا في "الهواتف" (3)، والبزار (4048)، وغيرهم من طريق عروة بن الزبير عن أبي ذر. ورجاله ثقات، إلّا أنَّ عروة بنَ الزبير لا يُعلَم له سماعٌ من أبي ذر فيما قاله البزار.ويشهد له بتمامه حديث حليمة السعدية عند ابن إسحاق في "السيرة" كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 162 لكن فيه جهالة وانقطاع.ومرسل الزُّهري عند عبد الرزاق في "مصنفه" (9718)، ورجاله ثقات.ومرسل يحيى بن جعدة عند يونس بن بكير في زياداته على "السيرة النبوية" لابن إسحاق (34)، ورجاله لا بأس بهم.ويشهد لرؤيا أمه صلى الله عليه وسلم حديث العرباض بن سارية المتقدم برقم (3608)، وهو حديث حسن.وقد ثبت أن جبريل شق صدر النبي صلى الله عليه وسلم مرة أخرى ليلة الإسراء والمعراج كما في حديث أنس عند البخاري (349)، ومسلم (162) (260)، ونبّه على ذلك السُّهيلي في "الروض الأُنف"، وذكر الحافظ في "فتح الباري" 2/ 207 و 278/ 24 أنه وقع شق الصدر ثلاث مرات، مرة عند الطفولة لما كان في بني سعد، ومرة عند البعثة، ومرة ليلة الإسراء، واستدل للمرة الثانية بما أخرجه الطيالسي (1643) وغيره من حديث عائشة: أنَّ جبريل شقَّ صدر النبي صلى الله عليه وسلم لما كان بغار حراء، وغسله في طَسْت من ذهب. لكن إسناده ضعيف.قوله: "التُبِسَ بي" أي: خُولطْتُ في عقلي.
[2] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل بقية بن الوليد ففيه لين، وقد صرَّح بالسماع هنا من شيخه، وصرَّح عند الدارمي (13) بسماع خالد من ابن عمرو السُّلَمي - واسمه عبد الرحمن - وسماع ابن عمرو من عُتبة بن عبدٍ، فانتفت شبهة تدليسه للتسوية، ولعله لأجل ذلك صحّحه الذهبي من هذه الطريق في "تاريخ الإسلام" 1/ 498.وقد رواه ثور بن يزيد عن خالد بن مَعْدان مرسلًا بنحوه كما تقدم بيانه برقم (4219)، لكنه قال فيه: أنَّ أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قالوا … فذكره.وأخرجه أحمد 29/ (17648) عن حيوة بن شريح، ويزيد بن عبد ربّه، كلاهما عن بقيّة، بهذا الإسناد. وفيه تصريح ابن عمرو بسماعه من عُتبة.ويشهد له دون ذكر رؤيا آمنة بنت وهب حديث أنس بن مالك عند مسلم (162) (261).وحديث أبي ذر الغفاري عند الدارمي (14)، وابن أبي الدنيا في "الهواتف" (3)، والبزار (4048)، وغيرهم من طريق عروة بن الزبير عن أبي ذر. ورجاله ثقات، إلّا أنَّ عروة بنَ الزبير لا يُعلَم له سماعٌ من أبي ذر فيما قاله البزار.ويشهد له بتمامه حديث حليمة السعدية عند ابن إسحاق في "السيرة" كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 162 لكن فيه جهالة وانقطاع.ومرسل الزُّهري عند عبد الرزاق في "مصنفه" (9718)، ورجاله ثقات.ومرسل يحيى بن جعدة عند يونس بن بكير في زياداته على "السيرة النبوية" لابن إسحاق (34)، ورجاله لا بأس بهم.ويشهد لرؤيا أمه صلى الله عليه وسلم حديث العرباض بن سارية المتقدم برقم (3608)، وهو حديث حسن.وقد ثبت أن جبريل شق صدر النبي صلى الله عليه وسلم مرة أخرى ليلة الإسراء والمعراج كما في حديث أنس عند البخاري (349)، ومسلم (162) (260)، ونبّه على ذلك السُّهيلي في "الروض الأُنف"، وذكر الحافظ في "فتح الباري" 2/ 207 و 278/ 24 أنه وقع شق الصدر ثلاث مرات، مرة عند الطفولة لما كان في بني سعد، ومرة عند البعثة، ومرة ليلة الإسراء، واستدل للمرة الثانية بما أخرجه الطيالسي (1643) وغيره من حديث عائشة: أنَّ جبريل شقَّ صدر النبي صلى الله عليه وسلم لما كان بغار حراء، وغسله في طَسْت من ذهب. لكن إسناده ضعيف.قوله: "التُبِسَ بي" أي: خُولطْتُ في عقلي.
4277 - حدثنا أبو العباس أحمد بن سعيد المَعْدانِيّ ببُخارَى، حدثنا عبد الله بن محمود، حدثنا عَبْدان بن سَيّار، حدثنا أحمد بن عبد الله البَرْقِي، حدثنا يزيد بن يزيد البَلَويّ، حدثنا أبو إسحاق الفَزَاري، عن الأوزاعي، عن مَكحُول، عن أنس بن مالك، قال: كُنّا مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم في سفر فنزلنا مَنزِلًا، فإذا رجلٌ في الوادي يقولُ: اللهمَّ اجعَلْني من أمةِ محمدٍ المَرحُومةِ المَغفُورةِ المُثابِ لها، قال: فأشرفْتُ على الوادِي، فإذا رجلٌ طولُه أكثرُ من ثلاثِ مئةِ ذِراعٍ، فقال لي: مَن أنتَ؟ قال: قلتُ: أنس بن مالك خادمُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، قال: أين هُو؟ قلت: هو ذا يسمعُ كلامَكَ، قال: فائتِه وأقرئْه مني السلام، وقل له: أخوك إلياسُ يُقرئُك السلامَ، فأتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فأخبرتُه، فجاء حتى لقيه فعانَقَه وسلَّم عليه، ثم قعدا يَتحدّثان، فقال له: يا رسول الله، إني إنما آكُلُ في كل سنةٍ يومًا، وهذا يومُ فِطْري، فآكُلُ أنا وأنتَ، فنزلتْ عليهما مائدةٌ من السماء عليها خُبزٌ وحُوتٌ وكَرَفْسٌ، فأكلا وأطعَمَاني، وصَلَّيا العصرَ، ثم وَدَّعَه، ثم رأيتُه مرَّ على السحابِ نحوَ السماءِ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে এক সফরে ছিলাম। আমরা এক স্থানে বিশ্রাম নিতে নামলাম। হঠাৎ দেখি, উপত্যকায় এক লোক বলছেন: “হে আল্লাহ! আমাকে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই অনুগ্রহপ্রাপ্ত, ক্ষমাশীল এবং প্রতিদানপ্রাপ্ত উম্মতের অন্তর্ভুক্ত করুন।” তিনি (আনাস) বলেন, আমি উপত্যকার দিকে উঁকি দিলাম, সেখানে এমন একজন লোককে দেখলাম যার উচ্চতা তিনশ হাতেরও বেশি। তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কে? আমি বললাম: আমি আনাস ইবনে মালিক, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের খাদেম। তিনি বললেন: তিনি কোথায়? আমি বললাম: তিনি এই যে, আপনার কথা শুনতে পাচ্ছেন। তিনি বললেন: তাহলে তাঁর কাছে যান এবং আমার পক্ষ থেকে তাঁকে সালাম দিন। আর তাঁকে বলুন: আপনার ভাই ইলিয়াস আপনাকে সালাম দিচ্ছেন। আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে তাঁকে জানালাম। তিনি এসে তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করলেন, তাঁকে আলিঙ্গন করলেন এবং তাঁকে সালাম দিলেন। এরপর তাঁরা উভয়ে বসলেন এবং কথা বলতে শুরু করলেন। তিনি (ইলিয়াস) তাঁকে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি বছরে মাত্র একদিন আহার করি এবং আজই আমার আহারের দিন। তাই আমি ও আপনি একসাথে আহার করব। তখন আকাশ থেকে তাঁদের সামনে একটি খাবার টেবিল (দস্তরখান) নেমে এলো, যাতে রুটি, মাছ এবং সেলারি (এক ধরনের শাক) ছিল। তাঁরা দুজনই আহার করলেন এবং আমাকেও আহার করালেন। এরপর তাঁরা আসরের সালাত আদায় করলেন, তারপর তিনি তাঁকে বিদায় জানালেন। এরপর আমি তাঁকে মেঘের ওপর দিয়ে আকাশের দিকে চলে যেতে দেখলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر موضوع، وهذا إسناد ضعيفٌ بمرَّةٍ كما قال البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 422، وذلك أنَّ يزيد بن يزيد البلوي الموصلي وشيخَه أبا إسحاق - وهو الجُرَشي، لا الفَزَارِي الثقة - لا يُعرفان كما قال ابن الجوزي في "الموضوعات" (408)، وقد حصل هنا خطأ في نسبة أبي إسحاق بأنه الفَزَاري، والفزاري ثقة حافظ، وإنما الصحيح أنه الجُرَشي كما جاء منسوبًا في رواية ابن أبي الدنيا في "الهواتف" (102)، ومن طريقه أخرجه ابن الجوزي في "الموضوعات".وقال الذهبي في "تلخيصه" متعقِّبًا على تصحيح الحاكم له: بل موضوعٌ قبَّح اللهُ مَن وضعه، قال: فإما يزيد البَلَوي افتراهُ وإما ابن سيار.قلنا: لم ينفرد به ابن سيار - وقد ذكره الذهبي في "الميزان" وعنه ابن حجر في "اللسان" فسمّاه: عبدان بن يسار - فقد رواه إبراهيم بن سعيد الجوهري عن يزيد البلوي، فمداره على البَلَوي وشيخه أبي إسحاق، فيكون إما من وضع البَلَوي أو شيخه، والله تعالى أعلم.وكذلك حكم بوضعه ابن كثير في "البداية والنهاية" 2/ 275، فقال: حديث موضوع، مخالف للأحاديث الصحاح من وجوه، ومعناه لا يصح أيضًا؛ ثم ذكر بعضَ وجوهِ مخالفتِه ونكارتِه.وقد رواهُ ابن شاهين كما قال الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 2/ 307 من طريق خير بن عرفة، عن هانئ بن المتوكّل، عن بقية بن الوليد، عن الأوزاعي، عن مكحول، سمعتُ واثلة بن الأسقع، فذكره نحو حديث أنس الذي هنا بأطول منه وأبسط وأنَّ ذلك كان في غزوة تبوك. ونقل الحافظ 2/ 309 عن ابن الجوزي قوله: لعلَّ بقية سمع هذا من كذّاب فدلَّسه عن الأوزاعي. قلنا: وهانئ بن المتوكل قال عنه ابن حبان في "المجروحين": كانت تُدخَل عليه المناكير، فكثرت، فلا يجوز الاحتجاج به بحالٍ.
4278 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن الأعمش، عن المِنْهال بن عمرو، عن يعلى بن مُرّة، عن أبيه، قال: سافرتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فرأيتُ منه شيئًا عجبًا؛ نزلْنا منزلًا فقال: "انطلِقْ إلى هاتَين الشجرتَين، فقل: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقولُ لكما أن تَجتَمِعا" فانطلقتُ فقلتُ لهما ذلك، فانتَزَعَتْ كلُّ واحدةٍ منهما من أصلِها، فمَرَّت كلُّ واحدةٍ إلى صاحبتِها فالْتقتا جميعًا، فقضى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حاجتَه من ورائهما، ثم قال: "انطلِقْ، فقُل لهما لِتعُودَ كلُّ واحدةٍ إلى مكانها" فأتيتُهما فقلتُ ذلك لهما، فعادَتْ كلُّ واحدةٍ إلى مكانها.وأتتْه امرأةٌ فقالت: إنَّ ابني هذا به لَمَمٌ منذ سبع سنين يأخذُه كلَّ يومٍ مرتَين، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أذْنِيهِ" فأدنَتْه منه، فتَفَلَ في فِيْهِ، وقال: "اخرُجْ عدوَّ الله أنا رسولُ الله" ثم قال لها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "إذا رَجَعْنا فأعلِمِينا ما صنَعَ"، فلما رجعَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم استقبَلَتْه ومعها كَبْشانِ وأَقِطٌ وسَمْنٌ، فقال لى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "خُذْ هذا الكبشَ فاتَّخِذْ منه ما أردتَ"، فقالت: والذي أكرمك ما رأينا به شيئًا منذُ فارقَتَنا.ثم أتاهُ بَعيرٌ فقام بين يَدَيه فرأى عينَيه تدمعان، فبعثَ إلى أصحابه، فقال: "ما لِبَعيرِكُم هذا يَشكُوكم؟ " فقالوا: كنا نعملُ عليه، فلما كَبِرَ وذهَبَ عَمَلُه، تواعَدْنا عليه لِنَنحَرَه غدًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا تَنحَرُوه واجعَلُوه في الإبلِ يكونُ معها" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقةِ.
মুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে সফর করছিলাম এবং আমি তাঁর থেকে আশ্চর্যজনক কিছু দেখলাম। আমরা এক স্থানে অবতরণ করলাম। অতঃপর তিনি বললেন: "তুমি এই দুটি গাছের কাছে যাও এবং বলো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তোমাদের দুজনকেই বলছেন যে তোমরা যেন একত্রিত হও।" অতঃপর আমি গেলাম এবং তাদের উভয়কে তাই বললাম। ফলে উভয় গাছই নিজ নিজ মূল থেকে উপড়ে গেল। অতঃপর উভয় গাছ একে অপরের দিকে অগ্রসর হলো এবং এক সাথে মিলিত হলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের আড়ালে তাঁর প্রয়োজন সম্পন্ন করলেন। এরপর তিনি বললেন: "তুমি যাও এবং তাদের উভয়কে বলো, তারা যেন নিজ নিজ স্থানে ফিরে যায়।" অতঃপর আমি তাদের কাছে এসে তা বললাম। ফলে উভয় গাছই নিজ নিজ স্থানে ফিরে গেল।
এরপর তাঁর নিকট একজন মহিলা এলো এবং বলল: "আমার এই ছেলেটির উপর গত সাত বছর যাবৎ জিনের আছর রয়েছে। প্রতিদিন দুইবার এটি তাকে আক্রমণ করে।" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তাকে আমার কাছে নিয়ে আসো।" মহিলাটি তাকে তাঁর নিকটবর্তী করলো। তিনি তার মুখে থুতু দিলেন এবং বললেন: "বেরিয়ে যাও, আল্লাহর শত্রু! আমি আল্লাহর রাসূল।" এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মহিলাটিকে বললেন: "যখন আমরা ফিরে যাব, তখন সে কী করেছে, তা আমাদের জানাবে।" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন ফিরে আসলেন, তখন মহিলাটি দুটি দুম্বা, পনির এবং ঘি নিয়ে তাঁকে স্বাগত জানাল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "এই দুম্বাটি নাও এবং তা থেকে তোমার যা প্রয়োজন তা করো।" মহিলাটি বলল: "যাঁর সম্মান আল্লাহ বাড়িয়েছেন, তাঁর কসম! আপনি আমাদের থেকে বিদায় নেওয়ার পর থেকে আমরা তার মধ্যে আর কোনো সমস্যা দেখিনি।"
এরপর তাঁর নিকট একটি উট এলো এবং তাঁর সামনে এসে দাঁড়ালো। তিনি দেখলেন, উটটির দু'চোখ দিয়ে অশ্রু ঝরছে। অতঃপর তিনি তার মালিকদের কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: "তোমাদের এই উটটির কী হয়েছে যে, সে তোমাদের বিরুদ্ধে অভিযোগ করছে?" তারা বলল: "আমরা এটির উপর কাজ করতাম। যখন এটি বৃদ্ধ হয়ে গেছে এবং কাজের অযোগ্য হয়েছে, তখন আমরা এটিকে আগামীকাল জবাই করার জন্য মনস্থির করেছি।" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমরা এটিকে জবাই করো না, বরং এটিকে উটপালের সাথে রেখে দাও, যেন এটি তাদের সাথে থাকতে পারে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ضعيف من حديث يعلى بن مرة لاضطرابه، وهذا إسناد منقطع، فقد جزم المزي في "تهذيب الكمال" 28/ 569 و 32/ 399، والذهبي في "تاريخ الإسلام" 2/ 552 بأنَّ المنهال بن عمرو روايته عن يعلى بن مُرة مرسَلَة، وأقرَّ الحافظ ابن حجر في "تهذيب التهذيب" المزيِّ فيما قاله. والحجة في ذلك - والله أعلم - ما وقع في بعض طرق الحديث من بيان للواسطة بينهما، حيث جاء فيها: عن ابن يعلى بن مرة، عن أبيه، وهذا أصح ممّا جاء في بعض طرق الحديث كما وقع في رواية المصنِّف هنا: عن يعلى بن مرة عن أبيه، يعني بإسقاط لفظة "ابن" بما يُوهم أن الحديث لمُرَّة، والد يَعلى، وقال البخاري فيما نقله عنه الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 690: إنما هو عن يعلى نفسه. وبذلك جزم أبو نُعيم في "معرفة الصحابة" في ترجمة مرة الثقفي والد يعلى بأنَّ المحفوظ فيه عن ابن يعلى عن أبيه. والظاهر أنَّ الوهم فيه من الأعمش كما احتمله البيهقي في "الدلائل" 6/ 22، فعليه مدار ذلك الاختلاف كما سيأتي بيانه.وهو في زيادات يونس بن بكير على "السيرة النبوية" لابن إسحاق (427).وأخرجه مطولًا ومختصرًا ببعض القصص الثلاث المذكورة: أحمد 29/ (17549) و (7564)، وابن ماجه (339)، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1613) و (1614)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (2170)، وأبو نُعيم في "دلائل النبوة" (292)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 21 - 22، وابن عبد البر في "التمهيد" 1/ 227، وابن عساكر 4/ 366 من طريق وكيع، وابن أبي عاصم (1611) عن محمد بن مصفّى، عن يحيى بن عيسى الرملي، والبغوي (2171) عن هارون بن عبد الله الحمّال، عن محاضِر بن المُورِّع، ثلاثتهم (وكيع ويحيى بن عيسى ومحاضر) عن الأعمش، به. وروي عن هؤلاء الثلاثة غير ذلك في إسناده.فهو في "الزهد" لوكيع (508) ومن طريقه أخرجه أحمد (17549) و (17563)، وابنُ سعد في "الطبقات" 1/ 144، وهناد في "الزهد" (1338)، وابن أبي عاصم (1612) و (1614)، وأبو نُعيم في "الدلائل" (292)، والبيهقي في "الدلائل" 6/ 22، وابن عساكر 4/ 366 - 367.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 22/ (680) من طريق محمد بن عبد الله بن نمير، عن محاضر بن المؤرِّع، كلاهما (وكيع ومحاضر) عن الأعمش.وأخرجه أيضًا أحمد (17567) من طريق أبي بكر بن عيّاش، عن حبيب بن أبي عمرة.كلاهما (الأعمش وحبيب) عن المنهال، عن يعلى بن مرة. ولم يذكر أباه، وحبيب هذا ثقة لكن الراوي عنه أبو بكر بن عيّاش كان يهمُ في الحديث، وله سماع من الأعمش أيضًا، فلعله ذكر حبيبًا بدل الأعمش، فإن هذا الحديث لا يُعرف بذكر المنهال إلّا عن الأعمش، والله تعالى أعلم.وأخرجه إبراهيم الحربي في "غريب الحديث" 1/ 315 عن محمد بن عبد الله بن نمير، وأبو القاسم الأصبهاني في "دلائل النبوة" (304) من طريق أبي سعيد الأشجّ، كلاهما عن وكيع، والطبراني في "الكبير" 22/ (679) من طريق أسد بن موسى، عن يحيى بن عيسى الرملي، كلاهما (وكيع ويحيى بن عيسى) عن الأعمش، عن المنهال، عن ابن يعلى بن مرة، عن أبيه. ولم يسم ابن يعلى.وأخرجه الطبراني في "الأحاديث الطوال" (54)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 22 من طريق عمر بن عبد الله بن يعلى بن مرة، والعُقيلي في "الضعفاء" (870) من طريق عبد الرحمن بن إسحاق الكوفي، وأبو القاسم الأصبهاني في "الدلائل" (240) من طريق يونس بن خباب، ثلاثتهم عن عبد الله بن يعلى بن مرة، عن أبيه. لكن قال يونس ذلك: عن ابن يعلى، لم يصرّح باسمه. وهؤلاء الثلاثة عمر بن عبد الله وعبد الرحمن بن إسحاق ويونس كلهم ضعفاء منكرو الحديث، وأشدهم ضعفًا عمر، وأبوه عبد الله قال الذهبي في "الميزان": ضعّفه غير واحد.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" معلقًا 6/ 357 من طريق خلف بن مهران العدوي، عن عمرو بن عثمان بن يعلى بن مرة، عن أبيه، عن جده. وعمرو وأبوه مجهولان.وأخرجه بنحوه أحمد (17548) من طريق عثمان بن حكيم، عن عبد الرحمن بن عبد العزيز، و (17559) من طريق عاصم بن أبي النجود، عن حبيب بن أبي جُبَيرة، و (17565) من طريق عطاء بن السائب، عن عبد الله بن حفص بن أبي عقيل، ثلاثتهم - وثلاثتهم مجهولون - عن يعلى ابن مرة. ولم يذكروا أباه، وسماه حبيب يعلى بن سِيابة، وهو نفسه يعلى بن مرة، واسم أبيه سيابة، كما جزم به ابن مَعِين وأبو زرعة فيما نقله عنه ابن أبي حاتم في "العلل" (2695)، وبه جزم أيضًا أبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (6639)، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 1/ 282. وزادوا فيه في قصة البعير أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم استوهَبَه من صاحبه فلم يعطِه إياه، فأوصاه النبي صلى الله عليه وسلم به خيرًا، إلّا عند عبد الرحمن بن عبد العزيز ففي روايته أنَّه وهبه للنبي صلى الله عليه وسلم، فوسمه صلى الله عليه وسلم بِسمة الصدقة. وذكر حبيبٌ في روايته بدلَ قصة المرأة وابنها قصةَ رجل يُعذَّب في قبره.وفي سياق رواية عبد الله بن حفص في قصة المرأة وقصة الشجرة مغايرة واضحة لسياق القصتين هنا، وعبد الله هذا اضطرب عطاء بن السائب في اسمه ولم يرو عنه غيره، فهو مجهول.وأما عبد الرحمن بن عبد العزيز فقد قال ابن حجر في "التعجيل" (636): يغلب على ظنِّي أنه الأُمَامي. قلنا: إن كان هو الأُماميُّ فهو صدوق لكنه لم يدرك يعلى بن مرة، وإن كان غيره فليس بالمشهور كما قال الحُسيني، بل جزم ابن مَعِين بأنه مجهول. وكذا حبيب بن أبي جُبَيرة مجهول أيضًا. قلنا: وتعدد هذه الطرق في حديث يعلى يفيد غلبةَ الظن أو القطع عند المتبحّر أن يعلى بن مرة حدَّث بهذه القصة في الجملة كما قال ابن كثير في "البداية والنهاية" 9/ 14 - 15.وقد رُوي نحو هذا الحديث بقصصه الثلاث من حديث جابر بن عبد الله من طريق إسماعيل بن عبد الملك بن أبي الصفيراء، عن أبي الزُّبَير، عن جابر. أخرجه من طريقه يونس بن بكير في زياداته على "السيرة النبوية" لابن إسحاق (429)، وابن أبي شَيبْة 11/ 490 - 492، وعبد بن حميد (1053)، والدارمي (17)، وابن المنذر في "الأوسط" (253)، والبيهقي في "الاعتقاد" ص 289 - 291، وفي "السنن الكبرى" 1/ 93، وفي "دلائل النبوة" 6/ 18، وأبو القاسم الأصبهاني في "دلائل النبوة" (254)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 373. ونقل البوصيري في "إتحاف الخيرة" بإثر (6466) عن الدارقطني أنَّ إسماعيل بن عبد الملك قد تفرَّد به بطوله. قلنا: وإسماعيل فيه ضعف لسوء حفظه.وقد رواه زمعة بن صالح، عن زياد بن سعد، عن أبي الزُّبَير، فقال: حدثني يونس بن خباب، قال: سمعتُ أبا عُبيدة بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه عبد الله بن مسعود. أخرجه من هذه الطريق الطبراني في "الأوسط" (9189)، والبيهقي في "الدلائل" 6/ 20، وأبو القاسم الأصبهاني في "الدلائل" (135). وعند الطبراني والبيهقي قصة الشجرتين والبعير فقط، وعند الأصبهاني القصص الثلاث. وإسناده ضعيف، أبو عبيدة لم يسمع من أبيه، وزمعة بن صالح ضعيف الحديث، ويظهر في إسناده مخالفة زمعةَ بن صالح لإسماعيلَ بن عبد الملك في رواية أبي الزُّبَير، قال البيهقي في "الدلائل": حديث جابر أصح، وهذه الرواية ينفرد بها زمعة بن صالح.ورُويت قصةُ الجمل بسياق آخر عن جابر من طريق الذيَّال بن حرملة عنه عند أحمد 42/ (14333) وغيره بسند حسنوقصة الشجرتين بنحوها من حديثه أيضًا عند مسلم (3012)، وابن حبان (6524).ورويت قصة الغلام الذي به لممٌ من حديث ابن عباس أيضًا عند أحمد 4/ (2133)، وإسناده ضعيف.
4279 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا أبو النعمان، حدثنا المُعتمِر بن سليمان، قال: سمعت أبي يُحدِّث عن أبي العلاء يزيد بن عبد الله بن الشِّخِّير، عن سَمُرة بن جُندُب، أنه حدَّثَه: أنَّ قَصْعةً كانت عند رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فجعلَ الناسُ يأكُلُون منها، فكلما شبعَ قومٌ جلسَ مكانَهم أُناسٌ آخَرون، قال: كذلك إلى صلاة الأُولى، فقال رجلٌ: إنها تُمَدُّ بشيءٍ، فقال سمرةُ: ما كانت تُمَدُّ إِلَّا مِن السماءِ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি বড় পাত্র (কাসআহ) ছিল। লোকেরা তা থেকে খেতে শুরু করল। যখনই একদল লোক পরিতৃপ্ত হচ্ছিল, তখনই অন্য লোকেরা তাদের স্থানে বসে যাচ্ছিল। তিনি বলেন: এভাবেই যুহরের (প্রথম) সালাতের সময় পর্যন্ত চলতে থাকল। তখন এক লোক জিজ্ঞেস করল: নিশ্চয়ই এটি (খাবার) কোনো জিনিস দ্বারা বৃদ্ধি পাচ্ছিল? সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তা আসমান ছাড়া অন্য কোনো কিছু দ্বারা বৃদ্ধি পাচ্ছিল না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح أبو النعمان: هو محمد بن الفضل السَّدُوسي، وسليمان: هو ابن طَرْخان التيمي.وأخرجه النسائي (6876) عن محمد بن عبد الأعلى، عن المعتمر بن سليمان بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 33/ (20196)، والترمذي (3625)، والنسائي (6707)، وابن حبان (6529) من طريق يزيد بن هارون، وأحمد (20135) عن علي بن عاصم، كلاهما عن سليمان التيمي، به. وقال الترمذي حديث حسن صحيح.
4280 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عيسى اللَّخْمي، حدثنا عمرو بن أبي سَلَمة، الأوزاعي، قال: حدثني المُطَّلب بن عبد الله بن حَنْطب المَخْزُومي، قال: حدثني عبد الرحمن بن أبي عَمْرة الأنصاري، حدثني أبي، قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غَزوةٍ، فأصاب الناسَ مَخْمَصَةٌ، فاستأذنَ الناسُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في نَحْرِ بعض ظُهورِهم، وقالوا: يُبْلِغُنا اللهُ بهم، فلما رأى عمرُ بن الخطاب رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قد هَمَّ بأن يأذَنَ لهم في نَحْرِ بعض ظُهورِهم [1]، قال: يا رسول الله، كيف بنا إذا نحنُ لَقِينا العَدُوَّ غدًا جياعًا رجالًا، ولكن إن رأيتَ يا رسولَ الله أن تدعُوَ الناسَ ببقايا أزْوادِهم، فجعلَ الناسُ يَجِيئون بالحَفْنة من الطعام وفوقَ ذلك، فكان أعلاهُم مَن جاء بصاعِ تمر، فجمَعَها، ثم قام فدعا بما شاء اللهُ أن يَدعُوَ، ثم دعا الجيشَ بأوعيتِهِم، ثم أمَرَهُم أن يَحتَثُوا [2] ما بَقِي من الجيش، فما تركُوا وعاءً إلّا ملؤوهُ وبقي مثلُه، فَضَحِكَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتى بَدَتْ نَواحِدُه، فقال: "أشهدُ أن لا إله إلّا الله، وأشهدُ أني رسولُ اللهِ، لا يَلْقَى الله عبدٌ مؤمنٌ بها إِلَّا حُجِبَ عن النار" [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ আমর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একটি যুদ্ধে ছিলাম। লোকেরা তীব্র ক্ষুধার (অনটনে) আক্রান্ত হলো। তখন লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তাদের কিছু বাহনের উট যবেহ করার অনুমতি চাইল এবং বললো: আল্লাহ এর মাধ্যমে আমাদের গন্তব্যে পৌঁছাবেন। উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন দেখলেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কিছু বাহন যবেহ করার অনুমতি দিতে মনস্থ করেছেন, তখন তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা যখন আগামীকাল শত্রুর মুখোমুখি হবো, তখন কি আমরা ক্ষুধার্ত পুরুষদের মতো থাকব? (অর্থাৎ দুর্বল হয়ে পড়ব)। বরং ইয়া রাসূলাল্লাহ! যদি আপনি মনে করেন, তবে লোকদেরকে তাদের অবশিষ্ট পাথেয় (খাবার) নিয়ে আসার জন্য ডাকুন। ফলে লোকেরা তাদের এক আঁজলা খাদ্য বা তার চেয়ে বেশি নিয়ে আসতে শুরু করলো। তাদের মধ্যে সর্বোচ্চ যা এসেছিল তা হলো এক সা‘ পরিমাণ খেজুর। এরপর তিনি তা একত্রিত করলেন। এরপর তিনি দাঁড়ালেন এবং আল্লাহ যতটুকু চাইলেন ততটুকু দু‘আ করলেন। এরপর তিনি সৈন্যদেরকে তাদের পাত্রগুলো আনতে বললেন। এরপর তিনি তাদেরকে আদেশ দিলেন যে, তারা যেন বাকি সৈন্যদের জন্য যথেষ্ট পরিমাণে (খাবার) ভরে নেয়। সুতরাং তারা এমন কোনো পাত্র রাখল না যা তারা পূর্ণ করেনি। এরপরও সমপরিমাণ খাবার অবশিষ্ট রইল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেসে উঠলেন, এমনকি তাঁর মাড়ির দাঁত দেখা গেল। অতঃপর তিনি বললেন: “আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল। যে বান্দা এই সাক্ষ্যসহ আল্লাহর সাথে মিলিত হবে, তাকে জাহান্নাম থেকে আড়াল করা হবে।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز): ظهرهم. ويشهد له حديث أبي سعيد الخُدْري أو أبي هريرة - على الشك - عند أحمد 17/ (11080) ومسلم (27)، وابن حبان (6530) بالقصة نفسها.
[2] تحرف في النسخ الخطية إلى: يحتشوا، أو يحتسوا. ويشهد له حديث أبي سعيد الخُدْري أو أبي هريرة - على الشك - عند أحمد 17/ (11080) ومسلم (27)، وابن حبان (6530) بالقصة نفسها.
4280 [3] - إسناده ضعيف جدًّا، أحمد بن عيسى اللَّخمي - وهو الخشاب التِّنِّيسي - ضعيف جدًّا وكذّبه بعضهم، لكن صحَّ الحديثُ من غير طريقه عن الأوزاعي.فقد أخرجه أحمد 24/ (15449)، والنسائي (8742) و (10912) من طريق عبد الله بن المبارك، وابن حبان (221) من طريق الوليد بن مسلم ومحمد بن شعيب، ثلاثتهم عن الأوزاعي، بهذا الإسناد. ويشهد له حديث أبي سعيد الخُدْري أو أبي هريرة - على الشك - عند أحمد 17/ (11080) ومسلم (27)، وابن حبان (6530) بالقصة نفسها.