হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4281)


4281 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن علي الشيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازِم الغِفاري، حدثنا عُبيد الله بن موسى، أخبرنا أسامة بن زيد، عن محمد بن المُنكَدِر، عن سَفِينة، قال: ركبتُ البَحْرَ في سفينةٍ، فانكسَرَتْ، فركبتُ لَوحًا منها فطَرَحَني في أجَمَةٍ فيها أسدٌ، فلم يَرُعْني إلّا به، فقلت: يا أبا الحارث، أنا مَولَى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فطأَطأَ رأسَه وغَمَزَ بِمَنْكِبِه شِقِّي، فما زال يَعْمِرُني ويَهديني إلى الطّريقِ، حتى وَضَعَني على الطّريقِ، فلما وَضَعَني هَمْهَمَ، فظننتُ أنه يُودِّعُني [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




সফীনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি একটি জাহাজে চড়ে সমুদ্রে যাত্রা করলাম, অতঃপর সেটি ভেঙে গেল। আমি সেটির একটি কাঠের তক্তার ওপর চড়ে বসলাম, যা আমাকে একটি ঝোপঝাড়ের মধ্যে নিক্ষেপ করল, সেখানে একটি সিংহ ছিল। আমি তাকে ছাড়া আর কাউকে দেখে আতঙ্কিত হলাম না। আমি বললাম, “হে আবুল হারিস! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম।” তখন সে মাথা নিচু করল এবং তার কাঁধ দ্বারা আমার পাশে ইশারা করল। এরপর সে আমাকে পাহারা দিতে ও পথের দিকে পথ দেখাতে থাকল। অবশেষে সে আমাকে রাস্তার উপরে নিয়ে এলো। যখন সে আমাকে রেখে দিল, তখন সে মৃদু গর্জন করল। আমি বুঝলাম যে সে আমাকে বিদায় জানাচ্ছে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح إن صح سماع محمد بن المنكدر له من سفينة، وهو الراجح، وهذا إسناد لا بأس برجاله، واختُلف فيه على أسامة بن زيد - وهو الليثي - فرواه عُبيد الله بن موسى - كما في رواية المصنف هنا - وعثمان بن عمر بن فارس وخلف بن موسى البلخي عنه عن محمد بن المنكدر، ليس بينهما أحد، وخالفهم عبدُ الله بن وهب عند المصنف في الرواية الآتية (6695) وجعفرُ بن عون، فروياه عن أسامة بن زيد، عن محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان، عن محمد بن المنكدر، فزادا في الإسناد محمد بن عبد الله العثماني، وهو صدوق لا بأس به، وسماع أسامة بن زيد من ابن المنكدر صحيح أيضًا، وأسامة بن زيد متابع عن ابن المنكدر.وأما سماع محمد بن المنكدر من سفينةَ فممكنٌ جدًّا، فقد كان سفينة حيًا زمن ولاية الحجاج الثقفي على الحجاز من قِبَل عبد الملك بن مروان، وذلك فيما قاله سعيد بن جُمهان: لقيتُه ببطن نخلة في زمن الحجاج، وبطنُ نخلة موضع بين مكة والطائف، وإنما ولي الحجاج الحجاز بعد قتله عبد الله بن الزبير سنة 73، فكان سفينة حيًّا إذ ذاك، وجزم الذهبي في "السير" بأن ابن المنكدر ولد سنة بضع وثلاثين، وعليه يكون سنُّ محمد بن المنكدر وقتها أربعة وثلاثين عامًا، وجزم الحافظ ابن حجر في "التهذيب" بغير ما جزم به الذهبي، اعتمادًا على ما قاله ابن عيينة بأنَّ ابن المنكدر بلغ نيفًا وسبعين سنة مع القول بأنه مات سنة ثلاثين أو إحدى وثلاثين ومئة، فجزم بأنَّ مولد ابن المنكدر يكون على ذلك قبل سنة ستين بيسير، وبنى على ذلك بأنَّ روايته عن سفينة مرسلة. لكن الحافظ رحمه الله ذهل عن أن سفينة كان حيًّا زمن ولاية الحجاج، أي: سنة ثلاث وسبعين على أقل تقدير، فيكون عمر محمد بن المنكدر إذ ذاك أربعة عشر عامًا على أقلّ تقدير أيضًا، ومثله لا يُنكر سماعُه البتة. وهو ما جاء نصًا في رواية خلف بن موسى البلخي عند البخاري في "تاريخه الكبير" 3/ 195 عن أسامة بن زيد عن ابن المنكدر قال: سمعتُ سفينةَ قال: ركبتُ البحرَ، فذكره.وقد صحح البخاري فيما نقله عنه الترمذي في "العلل الكبير" (219) سماع ابن المنكدر من عائشة رضي الله عنها التي توفيت سنة سبع وخمسين على الصحيح، وصحَّ أيضًا سماعه من عبد الله بن الزبير كما قال البخاريُّ في "تاريخه الكبير" 1/ 219، وعبد الله بن الزبير إنما قتله الحجاجُ سنة ثلاث وسبعين، وقد حضر ابن المنكدر ضربَ الحجاج لابن الزبير بالمنجنيق وقتَ حصاره له، وذلك فيما رواه أبو داود في "الزهد" (389) عن هشام بن عروة عن محمد بن المنكدر قال: لو رأيتَ ابنَ الزبير يصلي تحت ظل شجرة كأنه غصن من أغصانها، ويجيئه المنجنيق من هاهنا فلا يلتفتُ إليه. وبذلك يترجَّح قول الذهبي في ذكر سنِّ ولادته، والله تعالى أعلم.وعلى تسليم القول بإرساله، فمرسلُ ابن المنكدر من أجود المراسيل، فقد قال ابن عيينة: ما رأيت أحدًا أجدَرَ أن يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولا يُسأل عمن هو من ابن المنكدر؛ يعني لتحرِّيه كما قال الحافظ ابن حجر في "التهذيب".وقد رويت هذه القصة أيضًا من طريق آخر ضعيف عن سفينة كما سيأتي.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 5/ 101، والروياني في "مسنده" (662) وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1196)، والطبراني في "الكبير" (6433)، وأبو نُعيم في "حلية الأولياء" 1/ 369، وفي "دلائل النبوة" (535)، وفي "معرفة الصحابة" (3510)، وأبو العباس المستَغْفرِي في "دلائل النبوة" (455)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 270، وابن الجوزي في "المنتظم" 5/ 140، والمزي في ترجمة سفينة من "تهذيب الكمال" 11/ 206 من طرق عن عبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار (3838)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (4060/ 1)، وأبو بكر النجاد في "ذكر من له الآيات ومن تكلم بعد الموت" (47)، والحاكم في "معرفة علوم الحديث" ص 198، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 269 من طريق عثمان بن عمر بن فارس، والبخاري في "تاريخه الكبير" 3/ 195 عن قُتَيبة بن سعيد قال: حدثنا خلف بن موسى وكان رجلًا صالحًا، كلاهما (عثمان بن عمر وخلف بن موسى) عن أسامة بن زيد الليثي به.وسيأتي برقم (6695) من طريق عبد الله بن وهب، عن أسامة بن زيد، عن محمد بن عبد الله العثماني، عن محمد بن المنكدر، به. بزيادة محمد العثماني، وتابع عبدَ الله بنَ وهب على ذكرها جعفرُ بن عون كما سيأتي تخريجه ثمة. وأخرجه معمر بن راشد في "جامعه" (20544)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 46، وأبو محمد البغوي في "شرح السنة" (3732) من طريق سعيد بن عبد الرحمن الجَحْشي، والروياني في "مسنده" (663)، وابن عدي في "الكامل" 2/ 52 من طريق بحر بن كنيز السقّاء، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1196)، وابن عساكر 4/ 270 من طريق عبد العزيز بن عبد الله بن أبي سلمة، ثلاثتهم عن محمد بن المنكدر، عن سفينة إلّا أنَّ سعيدًا الجحشي جعله من رواية ابن المنكدر مرسلًا.وأخرجه مختصرًا أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1195)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 269 من طريق علي بن عاصم الواسطي، عن أبي ريحانة عبد الله بن مطر، عن سفينة، قال: لقيتُ الأسد، قلت: أنا سفينة مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فضرب بذنبه الأرض وقعَدَ. وعلي بن عاصم ضعيف الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4282)


4282 - حدثني أبو محمد الحسن بن إبراهيم الأسْلَمي الفارِسي من أصل كتابه، حدثنا جعفر بن دَرستَوَيهِ، حدثنا اليَمَان بن سعيد المِصِّيصي، حدثنا يحيى بن عبد الله المصري، حدثنا عبد الرزاق، عن مَعمَر، عن الزُّهْري، عن سالم، عن عبد الله بن عمر قال: كنا جُلوسًا حول رسولِ الله صلى الله عليه وسلم إذ دخَلَ أعرابيٌّ جَهْوَرِيٌّ بَدَوِيٌّ يَمَانِيٌّ، على ناقةٍ حمراءَ، فأناخَ ببابِ المسجدِ، فدخل فسلَّم على النبي صلى الله عليه وسلم ثم قَعَدَ، فلما قضى نَحْبَه [1]، قالوا: يا رسول الله، إنَّ الناقةَ التي تحت الأعرابيِّ سرقةٌ، قال: "أَتَمَّ بَيِّنَةٌ؟ " قالوا: نعم يا رسول الله، قال: "يا علي، خُذْ حقَّ الله من الأعرابيِّ إن قامتْ عليه البيِّنةُ، وإن لم تَقُمْ فرُدَّه إليَّ" قال: فأطرقَ الأعرابيُّ ساعةً، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "قُمْ يا أعرابيُّ لأمرِ الله، وإلّا فأَدْلِ بحُجَّتِكَ" فقالت الناقةُ من خلفِ الباب: والذي بعثَكَ بالكَرامة يا رسول الله، إنَّ هذا ما سَرَقَني ولا ملَكَني أحدٌ سواهُ، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "يا أعرابيُّ، بالذي أنطقَها بعُذْرِك، ما الذي قلتَ؟ " قال: قلتُ: اللهمَّ إنك لستَ برَبٍّ استَحْدثناكَ، ولا معكَ إِلهٌ أعانَكَ على خَلْقنا، ولا مَعَكَ ربٌّ فَنَشُكَّ في رُبُوبيَّتِك، أنت ربُّنا كما نقولُ وفوقَ ما يقولُ القائلونَ، أسألُك أن تُصلِّيَ على محمدٍ وأن تُبرِّئَني ببَراءتي، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "والذي بَعَثَني بالكَرامةِ يا أعرابيُّ، لقد رأيتُ الملائكةَ يَبتَدِرُون أفواهَ الأَزِقَّة يَكتُبون مَقالتَك، فأكثِرِ الصلاةَ عليَّ" [2].رواةُ هذا الحديث عن آخِرِهم ثقاتٌ، ويحيى بن عبد الله المِصري هذا لستُ أعرِفُه بعَدَالةٍ ولا جَرْحٍ.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আশেপাশে বসা ছিলাম। এমন সময় এক উচ্চকণ্ঠী, বেদুঈন, ইয়েমেনী বেদুঈন একটি লাল উটনীর পিঠে আরোহণ করে প্রবেশ করল। সে সেটিকে মসজিদের দরজার সামনে বসাল। অতঃপর সে প্রবেশ করে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম দিল এবং বসে পড়ল। যখন সে তার প্রয়োজন শেষ করল, লোকেরা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এই বেদুঈনটির নিচে যে উটনীটি রয়েছে, সেটি চুরি করা। তিনি বললেন: "তোমাদের কাছে কি পূর্ণ প্রমাণ আছে?" তারা বলল: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি বললেন: "হে আলী! যদি তার বিরুদ্ধে প্রমাণ প্রতিষ্ঠিত হয়, তবে এই বেদুঈনের কাছ থেকে আল্লাহর হক (শাস্তি) গ্রহণ করো। আর যদি প্রমাণ প্রতিষ্ঠিত না হয়, তবে তাকে আমার কাছে ফিরিয়ে দাও।" তিনি বলেন, তখন বেদুঈনটি কিছুক্ষণ মাথা নিচু করে থাকল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "ওঠো, হে বেদুঈন! আল্লাহর নির্দেশের জন্য, নতুবা তোমার যুক্তি পেশ করো।" তখন দরজার পিছন থেকে উটনীটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! যিনি আপনাকে মর্যাদা দিয়ে প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! এই ব্যক্তি আমাকে চুরি করেনি এবং সে ছাড়া অন্য কেউ আমার মালিক হয়নি। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "হে বেদুঈন! তাঁর কসম, যিনি তোমার ওজর দিয়ে এই উটনীকে কথা বলিয়েছেন, তুমি কী বলেছিলে?" সে বলল: আমি বলেছিলাম: হে আল্লাহ! আপনি এমন প্রভু নন যাকে আমরা নতুন করে পেয়েছি; আর আমাদের সৃষ্টিতে সাহায্য করার জন্য আপনার সাথে অন্য কোনো ইলাহ নেই; আর আপনার সাথে এমন কোনো প্রভু নেই যে আমরা আপনার প্রভুত্বে সন্দেহ করতে পারি। আপনি আমাদের প্রতিপালক, যেমন আমরা বলি এবং যারা বলে তাদের বলার ঊর্ধ্বে। আমি আপনার কাছে প্রার্থনা করি যে আপনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর সালাত বর্ষণ করুন এবং আমার নির্দোষিতার দ্বারা আমাকে মুক্ত করুন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "হে বেদুঈন! যাঁর হাতে আমাকে মর্যাদা দিয়ে প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমি দেখেছি ফেরেশতারা গলিপথসমূহের মুখে দ্রুত আসছিল এবং তোমার কথাগুলো লিখছিল। অতএব, তুমি আমার উপর অধিক পরিমাণে সালাত পাঠ করো।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أي: قضى حاجته.



[2] إسناده واهٍ، تفرَّد به يحيى بن عبد الله المصري عن عبد الرزاق، وهو مجهول لا يُعرف، وقال الذهبي في "تلخيصه": هو الذي اختَلَقَه، وكذلك قال الحافظ ابن حجر في "لسان الميزان" 8/ 456: هو ظاهر النكارة، وهو موضوع على هذا الإسناد المذكور. ثم قال الحافظ: وقد أخرجه الطبراني في "الدعاء" (1055)، من طريق سعيد بن موسى الأزدي الحمصي، عن الثوري، عن عمرو بن دينار، عن نافع، عن ابن عمر، فذكر نحوه بطوله واليمان ضعيف كما سيأتي في ترجمته، وهو بسعيدٍ أشبه، ولعلَّ سنده انقلب على اليمان، وسعيد تقدم أنه متهم بالوضع، انتهى كلام الحافظ. وفي رواية عند ابن منده في "الإيمان" (133)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 16 من طريق محمد بن أبي عبيدة المسعودي، عن أبيه، عن الأعمش، عن أبي ظبيان به بلفظ: فقال العامري: يا آل عامر بن صعصعة لا ألومك على شيء قلته أبدًا.وخالف أصحابَ الأعمش فيه عبدُ الواحد بنُ زياد عند ابن حبان (6523) وغيره، فرواه عن الأعمش، عن سالم بن أبي الجعد، عن ابن عبّاس بنحو رواية أبي عبيدة المسعودي، لكنه ذكر سالم بن أبي الجعد بدل أبي ظبيان قال ابن مَنْدَه: حديث أبي ظبيان أولى. وقال الأعرابي في آخره: يا آل عامر بن صعصعة، والله لا أكذبه بشيء.قال البيهقي: يُحتمل أنه توهّمه سِحْرًا، ثم علم أنه ليس بساحرٍ فآمن وصدَّق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4283)


4283 - حدثنا أبو بكر إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدثنا محمد بن سعيد بن الأصبهاني، حدثنا شَريك، عن سِماك، عن أبي ظَبْيانَ، عن ابن عبّاس، قال: جاء أعرابيٌّ إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: بِمَ أعْرِفُ أنك رسولُ الله؟ فقال: "أرأيتَ إن دعوتُ هذا العِذْقَ من هذه النخلةِ، أتشهدُ أني رسولُ الله؟ " قال: نعم، قال: فدعا العِذْقَ، فجعل العِذْقُ يَنزِلُ من النخلة حتى سَقَطَ في الأرض، فجعل يَنْقُرُ حتى أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، قال: ثم قال له: "ارجِعْ" فرجَعَ حتى عادَ إِلى مَكانِه [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক বেদুঈন (আরব) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এসে বলল, আমি কীসের মাধ্যমে জানতে পারব যে আপনি আল্লাহর রাসূল? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তুমি কি মনে করো, যদি আমি এই খেজুর গাছের একটি কাঁদি ডেকে আনি, তাহলে তুমি সাক্ষ্য দেবে যে আমি আল্লাহর রাসূল? সে বলল: হ্যাঁ। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন কাঁদিটিকে ডাকলেন। ফলে খেজুর কাঁদিটি গাছ থেকে নিচে নামতে শুরু করল, যতক্ষণ না সেটি মাটিতে পড়ে গেল। এরপর তা নড়তে নড়তে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে চলে এল। তিনি বলেন, অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটিকে বললেন: "ফিরে যাও।" ফলে তা ফিরে গেল এবং তার স্থানে পুনরায় ফিরে আসল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل شريكٍ - وهو ابن عبد الله النخعي - وسماكٍ - وهو ابن حرب - وقد توبعا. أبو ظَبْيان: هو حُصين بن جندب الكوفي.وأخرجه الترمذي (3628) عن محمد بن إسماعيل البخاري، عن محمد بن سعيد بن الأصبهاني، بهذا الإسناد. وقال هذا حديث حسن صحيح.والحديث عند البخاري في "تاريخه الكبير" 3/ 3 بهذا الإسناد بزيادة: فأسلم الأعرابي.وأخرجه بنحوه أحمد 3/ (1954) عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي ظبيان، به. لكنه جاء فيه أنَّ هذا الأعرابي رجل من بني عامر، وأنه قال بعد معاينته تلك الآية: يا آل بني عامر، ما رأيتُ كاليوم رجلًا أسحرَ. وفي رواية عند ابن منده في "الإيمان" (133)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 16 من طريق محمد بن أبي عبيدة المسعودي، عن أبيه، عن الأعمش، عن أبي ظبيان به بلفظ: فقال العامري: يا آل عامر بن صعصعة لا ألومك على شيء قلته أبدًا.وخالف أصحابَ الأعمش فيه عبدُ الواحد بنُ زياد عند ابن حبان (6523) وغيره، فرواه عن الأعمش، عن سالم بن أبي الجعد، عن ابن عبّاس بنحو رواية أبي عبيدة المسعودي، لكنه ذكر سالم بن أبي الجعد بدل أبي ظبيان قال ابن مَنْدَه: حديث أبي ظبيان أولى. وقال الأعرابي في آخره: يا آل عامر بن صعصعة، والله لا أكذبه بشيء.قال البيهقي: يُحتمل أنه توهّمه سِحْرًا، ثم علم أنه ليس بساحرٍ فآمن وصدَّق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4284)


4284 - حدثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدثنا يوسف بن موسى المَرُّوذِي، حدثنا عبّاد بن يعقوب، حدثنا الوليد بن أبي ثَور، عن السُّدِّي، عن عَبّاد بن عبد الله، عن علي، قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بمكة، فخرج في بعض نَواحِيها، فما استقبلَه شَجَرٌ، ولا جَبَلٌ إلّا قال: السلامُ عليك يا رسُولَ الله [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা মক্কায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। তিনি মক্কার কোনো এক দিকে বের হলেন। এমন কোনো গাছ বা পাহাড় তাঁকে অভ্যর্থনা জানায়নি, যা বলেনি: আসসালামু আলাইকা ইয়া রাসূলাল্লাহ (আপনার উপর শান্তি বর্ষিত হোক, হে আল্লাহর রাসূল)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا لضعف الوليد بن أبي ثور - وهو الوليد بن عبد الله بن أبي ثور - وجهالة عبّاد بن عبد الله، وسُمِّي في سائر روايات الحديث عند غير الحاكم: عباد بن أبي يزيد. السُّدِّي: هو إسماعيل بن عبد الرحمن.وأخرجه الترمذي (3626) عن عباد بن يعقوب الكوفي، بهذا الإسناد. وقال: حديث غريب.وقد صحَّ من حديث جابر بن سَمُرة عند مسلم (2277) وغيره قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إني لأعرف حجرًا بمكة كان يُسلّم عليَّ قبل أن أُبعَثَ، إني لأعرفُه الآن".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4285)


4285 - حدثنا أبو بكر أحمد بن كامل القاضي، حدثنا عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا شُعْبة، عن عمرو بن مُرّة، عن عبد الله بن سَلِمة، عن علي، قال: مَرِضتُ فأتى عليَّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم وأنا أقولُ: اللهم إن كان أجَلِي قد حَضَرَ فأرِحْني، وإن كان مُتأخِّرًا فارفَعْني، وإن كان البلاءُ فصَبِّرني، فقال: "ما قلتَ؟ " فأعَدْتُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اللهم اشفِهِ اللهم عافِهِ" ثم قال: "قُمْ"، فقمتُ، فما عادَ لي ذلك الوجَعُ بعدُ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি অসুস্থ হয়ে পড়লাম। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমার কাছে আসলেন, আর আমি তখন বলছিলাম: হে আল্লাহ! যদি আমার মৃত্যু সময় উপস্থিত হয়ে থাকে, তবে আমাকে শান্তি দাও, আর যদি তা বিলম্বে হয়, তবে আমাকে সুস্থতা দান করো, আর যদি তা পরীক্ষা হয়, তবে আমাকে ধৈর্য্য দাও। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কী বললে? আমি তা পুনরায় বললাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "হে আল্লাহ! তাকে আরোগ্য দাও, হে আল্লাহ! তাকে সুস্থতা দান করো।" অতঃপর তিনি বললেন: "দাঁড়াও।" আমি দাঁড়ালাম। এরপর আর কখনো সেই ব্যথা আমার কাছে ফিরে আসেনি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن إن شاء الله من أجل عبد الله بن سَلِمة - وهو المُرادي - وصحَّحه الترمذي وابن حبان وابن حجر في "نتائج الأفكار" 4/ 191.وأخرجه أحمد 2/ (637) و (638) و (841) و (1057)، والترمذي (3564)، والنسائي (10830)، وابن حبان (6940) من طرق عن شعبة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن صحيح. وأخرجه أحمد 14/ (8259)، ومسلم (2491)، وابن حبان (7154) من طرق عن عكرمة بن عمار، به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4286)


4286 - أخبرنا أبو عمرو عثمان أحمد بن عبد الله الدَّقَّاق ببغداد، حدثنا عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي، حدثنا يعقوب بن إسحاق الحَضْرمي، أخبرنا عِكْرمة بن عمار، حدثنا أبو كثير الغُبَري، قال: قال أبو هُريرة: ما على وَجْه الأرض مؤمنٌ ولا مؤمنةٌ إلا وهو يُحبُّني، قال: قلتُ: وما عِلمُك بذلك يا أبا هريرة؟ قال: إني كنتُ أدعُو أمي إلى الإسلام، فتأبّى، وإني دعوتُها ذات يومٍ فأسمعَتْني في رسول الله صلى الله عليه وسلم ما أكْرَهُ، فجئتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلتُ: يا رسول الله، إني كنتُ أدعُو أمّي إلى الإسلام، فتأبَى عليَّ، وإني دعوتُها يومًا، فأسمَعَتْني فيكَ ما أَكرَهُ، فَادْعُ الله يا رسول الله أن يهديَ أمَّ أبي هريرة إلى الإسلام، فدعا لها رسول الله صلى الله عليه وسلم، فرجعتُ إلى أمّي أُبشِّرها بدعوةِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما كنتُ على الباب إذا البابُ مغلقٌ فدققتُ البابَ، فسمعتْ حِسِّي فَلَبِسَتْ ثيابَها وجَعَلتْ على رأسِها خِمارَها، وقالت: ارفُقْ يا أبا هريرة، ففتحتْ لي، فلما دخلتُ قالت: أشهدُ أن لا إلهَ إلّا اللهُ وأنَّ محمدًا رسولُ الله، فرجعتُ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وأنا أبكي من الفَرَح كما كنتُ أبكي من الحُزن، وجعلتُ أقول: أبشِرْ يا رسولَ الله، قد استجابَ اللهُ دعوتَك وهَدَى الله أمَّ أبي هريرة إلى الإسلام، فقلت: ادعُ الله أن يُحبِّبَني وأمي إلى عباده المؤمنين ويُحبِّبَهم إلينا، قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اللهم حَبَّب عُبيدَكَ هذا وأمه إلى عبادك المؤمنين، وحَبَّبهم إليهما"، فما على الأرضِ مؤمنٌ ولا مؤمنةٌ إلا وهو يُحبُّني وأُحِبُّه [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: পৃথিবীর বুকে এমন কোনো মুমিন পুরুষ বা মুমিন নারী নেই যে আমাকে ভালোবাসে না। (বর্ণনাকারী) বলেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম: হে আবূ হুরায়রা! আপনি এ কথা কীভাবে জানলেন? তিনি বললেন: আমি আমার মাকে ইসলামের দিকে আহ্বান করতাম, কিন্তু তিনি তা প্রত্যাখ্যান করতেন। একদিন আমি তাঁকে (ইসলামের দাওয়াত দিলাম), তখন তিনি আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ব্যাপারে এমন কিছু শোনালেন যা আমি অপছন্দ করলাম। তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি আমার মাকে ইসলামের দিকে আহ্বান করতাম, কিন্তু তিনি তা প্রত্যাখ্যান করতেন। একদিন আমি তাঁকে দাওয়াত দিলাম, তখন তিনি আপনার ব্যাপারে আমাকে এমন কিছু শোনালেন যা আমি অপছন্দ করি। হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আল্লাহর কাছে দু'আ করুন, যেন তিনি আবূ হুরায়রাহর মাকে ইসলাম গ্রহণের জন্য হেদায়েত দান করেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জন্য দু'আ করলেন। আমি আমার মাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দু'আর সুসংবাদ দেওয়ার জন্য তাঁর নিকট ফিরে গেলাম। যখন আমি দরজার কাছে পৌঁছলাম, দেখলাম দরজা বন্ধ। আমি দরজায় করাঘাত করলাম। তিনি আমার সাড়া পেয়ে পোশাক পরিধান করলেন এবং মাথায় ওড়না দিলেন। তিনি বললেন: হে আবূ হুরায়রা! নরম হও (ধৈর্য ধরো)। এরপর তিনি দরজা খুলে দিলেন। আমি ভেতরে প্রবেশ করলে তিনি বললেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ (উপাস্য) নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল। আমি (এবার) আনন্দের কান্না কাঁদতে কাঁদতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ফিরে আসলাম, যেমনটা আমি দুঃখের কারণে কেঁদেছিলাম। আমি বলতে লাগলাম: হে আল্লাহর রাসূল! সুসংবাদ গ্রহণ করুন! আল্লাহ আপনার দু'আ কবুল করেছেন এবং আবূ হুরায়রাহর মাকে ইসলামের হেদায়েত দিয়েছেন। অতঃপর আমি বললাম: আপনি আল্লাহর কাছে দু'আ করুন, যেন তিনি আমাকে এবং আমার মাকে তাঁর মুমিন বান্দাদের কাছে প্রিয় করে দেন এবং মুমিনদেরকেও আমাদের কাছে প্রিয় করে দেন। তিনি বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'আ করলেন: "হে আল্লাহ! আপনার এই ক্ষুদ্র বান্দাকে এবং তার মাকে আপনার মুমিন বান্দাদের কাছে প্রিয় করে দিন এবং মুমিনদেরকেও তাদের কাছে প্রিয় করে দিন।" তখন থেকে পৃথিবীর বুকে এমন কোনো মুমিন পুরুষ বা মুমিন নারী নেই যে আমাকে ভালোবাসে না এবং আমিও তাকে ভালোবাসি না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي، وقد توبع. وأخرجه أحمد 14/ (8259)، ومسلم (2491)، وابن حبان (7154) من طرق عن عكرمة بن عمار، به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4287)


4287 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا إبراهيم بن سليمان البُرُلُّسيّ، حدثنا ضِرار بن صُرَدٍ، حدثنا عائذُ بن حَبيب، حدثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن عبد الله المُزَني، عن عبد الرحمن بن أبي بكر الصِّدِّيق، قال: كان فلانٌ يَجلِسُ إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فإذا تَكلَّم النبيُّ صلى الله عليه وسلم بشيءٍ اختَلَجَ بِوَجْهِه، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "كُنْ كَذلِكَ"، فلم يَزَلْ يَختَلِجُ حتى مات [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুর রহমান ইবনু আবী বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসতেন। যখনই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু বলতেন, তখন তার চেহারায় পরিবর্তন আসতো (বা কুঁচকে যেতো)। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন, "তুমি এমনই থাকো।" এরপর তার মৃত্যু পর্যন্ত তা (সেই পরিবর্তন) হতে থাকলো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًا، ضرار بن صُرَد واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وعائذ بن حبيب لا بأس به، لكنه كان يتشيع، وجاء في بعض روايات الحديث أن هذا الرجل الذي أُبهم في الرواية هو الحكم بن أبي العاص والد مروان، وعبد الله المزني لم نَتبيَّن من هو، وقد روي نحو هذه القصة في الحكم بن أبي العاص من غير وجه أمثلها رواية هند بن هند بن أبي هالة لكنها مرسلة.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 239 عن جماعة من شيوخه منهم أبو عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (3167) عن محمد بن عبد الله الحضرمي، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 57/ 270 من طريق أبي حاتم الرازي، كلاهما عن ضرار بن صرد به. وصرّحا بذكر الحكم بن أبي العاص.وأخرج الخطابي في "غريب الحديث" 1/ 542 - 543، وابن قانع في "معجم الصحابة" 3/ 196، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (6555)، وفي "الطب النبوي" (580)، والبيهقي في "الدلائل" 6/ 240، وابن عبد البر في "الاستيعاب" في ترجمة هند بن أبي هالة (2661)، من طريق مالك بن دينار، عن هند ابن خديجة - وهو هند بن هند بن أبي هالة - قال: مَرَّ النبي صلى الله عليه وسلم بالحكم بن أبي العاص، فجعل يغمز بالنبي صلى الله عليه وسلم ويُشير بإصبعه، فالتفت النبي صلى الله عليه وسلم فقال: اللهم اجعل به وَزَغًا، فرجفَ مكانَه. والوَزَع: الارتعاش. ورجاله لا بأس بهم لكنه مرسل، لأنَّ هذا المذكور تابعي، وإنما الصحبة لأبيه.وأخرج نحو رواية هند هذه البيهقي في "الدلائل" 6/ 239 من حديث عبد الله بن عمر بن الخطاب، وإسناده ضعيف جدًّا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4288)


4288 - حدثني أبو بكر محمد بن داود بن سليمان الزاهد، حدثنا أبو علي محمد بن محمد بن الأشْعَث الكوفي بمصر، حدثني أبو الحسن موسى بن إسماعيلَ بن موسى بن جعفر بن محمد بن علي، حدثني أبي إسماعيلُ، عن أبيه موسى بن جعفر، عن أبيه جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جده علي بن الحُسين، عن أبيه الحسين ابن علي، عن أبيه علي بن أبي طالب: أنَّ يَهوديًا كان يقال له: جُرَيجِرة، كان له على رسول الله صلى الله عليه وسلم دنانيرُ، فتَقاضى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال له: "يا يَهودِيُّ، ما عندي ما أُعطِيك" قال: فإني لا أُفارِقُك يا محمدُ حتى تُعطِيَني، فقال صلى الله عليه وسلم: "إذًا أَجلِسَ معكَ" فجلسَ معه، فصلى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في ذلك الموضِع الظهرَ والعصرَ والمغربَ والعشاءَ الآخِرةَ والغَداةَ، وكان أصحابُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يَتَهدَّدونه ويتَوعَّدونه، ففَطِن رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "ما الذي تَصنَعون به؟ " فقالوا يا رسول الله، يَهوديٌّ يَحبِسُك؟!، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "مَنَعَني ربِّي أن أَظْلِمَ معاهَدًا ولا غيره" فلما تَرجَّل النهارُ [1] قال اليهوديُّ: أشهد أن لا إله إلّا الله وأشهدُ أن محمدًا عبدُه ورسولُه، وشَطْرُ مالي في سبيل الله، أما والله ما فعلتُ الذي فعلتُ بك إلّا لأنظُرَ إلى نَعتِكَ في التوراة: محمدُ بن عبد الله مَولدُه بمكة، ومُهاجَرُه بطَيْبة، ومُلكُه بالشام، ليس بفَظٍّ ولا غَليظٍ ولا سَخّابٍ في الأسواق، ولا مُتَزيِّنٍ بالفُحْشِ ولا قولِ الخَنَا، أشهدُ أن لا إله إلّا الله وأنك رسول الله، هذا مالي فاحكُم فيه بما أراكَ اللهُ؛ وكان اليهوديُّ كثيرَ المالِ [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ‌‌ومن كتاب الهجرة الأولى إلى الحبشةتواترت الأخبارُ أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم لما مات عمُّه أبو طالبٍ لقيَ هو والمُسلِمون أذًى من المشركين بعد موتِه، فقال لهمُ النبيُّ صلى الله عليه وسلم حين ابتُلُوا وشَطَّتْ بهم عشائرهم: "تَفَرَّقُوا" وأشارَ قِبَل أرضِ الحبشة، وكانت أرضًا دَفِيئَة تَرحَلُ إليها قريش رحلةَ الشتاء، فكانت أولَ هجرةٍ في الإسلام، وإنما أمرَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أصحابَه بالخُروج إلى النجاشيِّ لِعَدْلِه.




আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক ইয়াহুদী ছিল, যার নাম ছিল জুরাইজিরাহ। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তার কিছু স্বর্ণমুদ্রা (দিনার) পাওনা ছিল। সে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পাওনা পরিশোধের দাবি জানাল। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "হে ইয়াহুদী, আমার কাছে এমন কিছু নেই যা আমি তোমাকে দিতে পারি।" সে বলল: "হে মুহাম্মাদ, আপনি আমাকে পরিশোধ না করা পর্যন্ত আমি আপনাকে ছাড়ব না।" রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে আমি তোমার সাথে বসে থাকব।" অতঃপর তিনি তার সাথে বসে গেলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই স্থানেই যোহর, আসর, মাগরিব, এশার সালাত এবং পরের দিনের ফজরের সালাতও আদায় করলেন।

আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ তাকে ধমকাচ্ছিলেন ও ভয় দেখাচ্ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা লক্ষ্য করলেন এবং বললেন: "তোমরা তার সাথে কী করছো?" তারা বলল: "হে আল্লাহর রাসূল, একজন ইয়াহুদী আপনাকে আটক করে রাখবে?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার প্রতিপালক আমাকে বাধা দিয়েছেন যেন আমি চুক্তিবদ্ধ কোনো অমুসলিম কিংবা অন্য কারো প্রতিও জুলুম না করি।"

এরপর যখন দিনের আলো সম্পূর্ণভাবে ফুরিয়ে গেল, তখন সেই ইয়াহুদী বলল: "আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল। আর আমার সম্পদের অর্ধেক আল্লাহর রাস্তায় দান করে দিলাম। আল্লাহর শপথ! আমি আপনার সাথে যা করেছি, তা শুধুমাত্র তাওরাতে আপনার বৈশিষ্ট্যগুলো পরীক্ষা করার জন্যেই করেছিলাম: [তাওরাতে লেখা আছে] মুহাম্মাদ ইবনু আবদুল্লাহ, তাঁর জন্ম মাক্কায়, হিজরতের স্থান ত্বায়বাহ (মাদীনা) এবং তাঁর শাসন হবে শাম (সিরিয়া) পর্যন্ত। তিনি রুক্ষভাষী নন, কঠোর প্রকৃতির নন, বাজারে উচ্চস্বরে চিৎকারকারী নন, অশ্লীলতা বা কুরুচিপূর্ণ কথা দিয়ে নিজেকে সজ্জিত করেন না। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আপনি আল্লাহর রাসূল। এই আমার সম্পদ, আল্লাহ আপনাকে যা দেখিয়েছেন, সে অনুযায়ী আপনি এর ফয়সালা করুন।" ইয়াহুদীটি ছিল প্রচুর সম্পদের অধিকারী।

... এবং প্রথম হাবশা (আবিসিনিয়া) হিজরতের কিতাব থেকে [জানা যায়]: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চাচা আবু তালিবের মৃত্যুর পর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং মুসলিমগণ মুশরিকদের পক্ষ থেকে ব্যাপক নির্যাতন ও কষ্ট ভোগ করেন। যখন মুসলিমগণ এভাবে নিগৃহীত হলেন এবং তাদের গোত্রগুলো তাদের থেকে দূরে সরে গেল, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের বললেন: "তোমরা বিচ্ছিন্ন হয়ে যাও।" আর তিনি হাবশার ভূমির দিকে ইঙ্গিত করলেন। সেটি ছিল উষ্ণ আবহাওয়ার একটি ভূমি, যেখানে কুরাইশরা শীতকালে বাণিজ্য ভ্রমণে যেত। এটি ছিল ইসলামের প্রথম হিজরত। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবীগণকে নজাশীর (হাবশার বাদশাহ) নিকট যাওয়ার আদেশ দিয়েছিলেন, কারণ তিনি ছিলেন ন্যায়পরায়ণ।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أي: ارتفع. الرواية، لا عن أبيه، ولا عن غيره لا يفهم منه أنَّ موسى هذا هو الذي وضع هذه النسخة كما قال سبط ابن العجمي في "الكشف الحثيث" (791)، قاله ردًّا على الذهبي، وقال: فلا ينبغي أن يكتب مع هؤلاء. يعني: مع من اتُّهم بوضع الحديث.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 280، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 1/ 184 أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه أبو سعْد النيسابوري في "شرف المصطفى" كما في "الإصابة" للحافظ 2/ 148 من طريق أبي علي محمد بن محمد بن الأشعث، به.وقد روي نحو هذه القصة لليهودي الحبر زيد بن سَعْنة، كما سيأتي برقم (6692)، وتقدم بعض قصته برقم (2268)، وانظر كلامنا عليها هناك.وروي عن النبي صلى الله عليه وسلم في المنع من ظلم المعاهد حديث صفوان بن سليم، عن عدة من أبناء في أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، عن آبائهم دِنْيةً عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ألا من ظلم معاهدًا، أو انتقصه، أو كلَّفَه فوق طاقته، أو أخذ منه شيئًا بغير طيب نفس، فأنا حَجِيجُه يوم القيامة". أخرجه أبو داود (3052)، وإسناده حسن.وروي أيضًا وصفُ النبي صلى الله عليه وسلم في التوراة كما جاء هنا في عدة أخبار كما تقدم بيانه برقم (4270)، لكن دون ذكر مولده ومهاجَره ومُلكه.



[2] خبر موضوع، آفته أبو علي محمد بن محمد بن الأشعث، فقد اتهمه ابن عدي والدارقطني بوضع هذه النسخة العَلَوية، وليس آفته موسى بن إسماعيل كما قال الذهبي في "تلخيصه"، ولا يُفهم من قول ابن عدي: فذكرنا روايته هذه الأحاديث عن موسى هذا لأبي عبد الله الحسين بن علي بن الحسن بن علي بن عمر بن علي بن الحسن بن علي بن أبي طالب، وكان شيخًا من أهل البيت بمصر، فقال لنا كان موسى هذا جاري بالمدينة أربعين سنةً ما ذكر قطُّ أن عنده شيئًا من الرواية، لا عن أبيه، ولا عن غيره لا يفهم منه أنَّ موسى هذا هو الذي وضع هذه النسخة كما قال سبط ابن العجمي في "الكشف الحثيث" (791)، قاله ردًّا على الذهبي، وقال: فلا ينبغي أن يكتب مع هؤلاء. يعني: مع من اتُّهم بوضع الحديث.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 280، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 1/ 184 أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه أبو سعْد النيسابوري في "شرف المصطفى" كما في "الإصابة" للحافظ 2/ 148 من طريق أبي علي محمد بن محمد بن الأشعث، به.وقد روي نحو هذه القصة لليهودي الحبر زيد بن سَعْنة، كما سيأتي برقم (6692)، وتقدم بعض قصته برقم (2268)، وانظر كلامنا عليها هناك.وروي عن النبي صلى الله عليه وسلم في المنع من ظلم المعاهد حديث صفوان بن سليم، عن عدة من أبناء في أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، عن آبائهم دِنْيةً عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ألا من ظلم معاهدًا، أو انتقصه، أو كلَّفَه فوق طاقته، أو أخذ منه شيئًا بغير طيب نفس، فأنا حَجِيجُه يوم القيامة". أخرجه أبو داود (3052)، وإسناده حسن.وروي أيضًا وصفُ النبي صلى الله عليه وسلم في التوراة كما جاء هنا في عدة أخبار كما تقدم بيانه برقم (4270)، لكن دون ذكر مولده ومهاجَره ومُلكه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4289)


4289 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوْرِيّ، حدثنا يحيى بن معين، حدثنا عُقْبة المُجدَّر [1]، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "ما زالتْ قُريشٌ كاعّةً حتى تُوفِّي أبو طالِبٍ" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আবু তালিবের মৃত্যু না হওয়া পর্যন্ত কুরাইশরা সংযত ছিল।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في النسخ الخطية: عقبة بن المجدَّر. بزيادة لفظة "بن"، والظاهر أنها خطأ، لأنَّ عقبة هذا هو ابن خالد السَّكوني، وذكر الحافظان ابن ناصر الدين وابن حجر بأنَّ المجدَّر لقب عُقبة. في "تاريخ دمشق" 66/ 339 عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. لكن قيسًا والراوي عنه فيهما لين.ووصله أيضًا محمد بن إسحاق في رواية عبد الله بن إدريس عنه عند البيهقي في "الدلائل" عمن حدَّثه عن عروة بن الزبير، عن عبد الله بن جعفر بن أبي طالب .. فذكر عبد الله بن جعفر بدل عائشة، وهي رواية شاذَّة، وفيها راو مبهم.وأخرج رواية المصنف البيهقيُّ في "الدلائل" 2/ 349 عنه، بهذا الإسناد.وقوله: "كاعَّة" أي: جبناء، وهو جمع كائع.



[2] رجاله ثقات، لكن المحفوظ فيه أنه مرسل ليس فيه ذكر، عائشة، كما قال ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 339. وذلك أنَّ الخبر في "تاريخ ابن مَعِين" برواية العباس الدُّوري (174) مرسلٌ، وقد رواه عن عبّاس الدُّوري جماعة مرسلًا، منهم ابن الأعرابي عند الخطّابي في "غريب الحديث" 1/ 129 - وهو راوية "تاريخه" المذكور عن ابن مَعِين - وأبو الحسين بن السقّاء وأبو محمد بن بالَوَيهِ عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 339.وكذلك رواه يونسُ بنُ بكير في زوائده على "السيرة النبوية" لابن إسحاق (331)، ومحمدُ بنُ إسحاق في "السيرة النبوية" برواية زياد بن عبد الله البكائي كما في "السيرة النبوية" لابن هشام 1/ 416، وفي رواية سلمة بن الفضل كما في "تاريخ الطبري" 2/ 344، وسليمان بن بلال عند ابن سعد في "الطبقات" 1/ 103، ثلاثتهم (يونس بن بكير ومحمد بن إسحاق وسليمان بن بلال) عن هشام بن عروة، عن أبيه مرسلًا.وكذلك رواه الزُّهْري عند ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 32 عن عروة بن الزبير مرسلًا.وقد رواه موصولًا بذكر عائشة قيسُ بنُ الربيع عند الطبراني في "الأوسط" (594)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 66/ 339 عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. لكن قيسًا والراوي عنه فيهما لين.ووصله أيضًا محمد بن إسحاق في رواية عبد الله بن إدريس عنه عند البيهقي في "الدلائل" عمن حدَّثه عن عروة بن الزبير، عن عبد الله بن جعفر بن أبي طالب .. فذكر عبد الله بن جعفر بدل عائشة، وهي رواية شاذَّة، وفيها راو مبهم.وأخرج رواية المصنف البيهقيُّ في "الدلائل" 2/ 349 عنه، بهذا الإسناد.وقوله: "كاعَّة" أي: جبناء، وهو جمع كائع.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4290)


4290 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، عن ابن إسحاق، قال: كان اسمُ النَّجَاشِيّ: مصحمة [1]، وهو بالعربية: عَطِيَّة، وإنما النجاشيُّ اسمُ الملِكِ، كقولك: كِسْرى وهِرَقْل.قال ابن إسحاق: هذا كتابٌ من النبيِّ مُحمدٍ صلى الله عليه وسلم إلى النَّجَاشِيِّ: "بسم الله الرحمن الرحيم، هذا كتابُ محمدٍ رسولِ الله إلى النجاشيِّ الأصْحَمِ عظيمِ الحَبَشِ، سلامٌ على مَن اتَّبَعَ الهُدى، وآمَنَ باللهِ ورسولِه وشَهِدَ أن لا إله إلّا الله وحدَه لا شَرِيكَ له، لم يَتَّخِذ صاحِبَةً ولا ولدًا، وأنَّ محمدا عبده ورسولُه، أدعُوك بدُعاء الله، فإني أنا رسولُ الله، فأسْلِمْ تَسْلَمْ: {يَاأَهْلَ الْكِتَابِ تَعَالَوْا إِلَى كَلِمَةٍ سَوَاءٍ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ أَلَّا نَعْبُدَ إِلَّا اللَّهَ وَلَا نُشْرِكَ بِهِ شَيْئًا وَلَا يَتَّخِذَ بَعْضُنَا بَعْضًا أَرْبَابًا مِنْ دُونِ اللَّهِ} الآية [آل عِمران: 64]، فإن أبَيتَ فعَلَيكَ إثمُ النَّصارى" [2]. لم يتابَع محمد بن إسحاق القُرَشيّ على اسم النَّجَاشِي أَنه مَصْحَمة، فإِنَّ الأخبارَ الصحيحة المُخرَّجة في الكتابَين الصحيحَين بالألف، والكتاب إليه في كتابِ رسول الله.




ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নাজ্জাশীর নাম ছিল মুসাহমাহ (مصحمة), যার আরবি অর্থ হলো আতিয়্যাহ (দান)। আর ‘নাজ্জাশী’ হলো রাজার উপাধি, যেমন তোমরা ‘কিসরা’ এবং ‘হিরাক্লিয়াস’ বলে থাকো। ইবনু ইসহাক বলেন: এটি আল্লাহর নবী মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে নাজ্জাশীর প্রতি লেখা একটি চিঠি: "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম (পরম করুণাময় দয়ালু আল্লাহর নামে), এই চিঠি আল্লাহর রাসূল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে আবিসিনিয়ার প্রধান নাজ্জাশী আসহাম-এর প্রতি। শান্তি বর্ষিত হোক তার উপর যে হিদায়াতের অনুসরণ করে এবং আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের প্রতি ঈমান আনে। আর সাক্ষ্য দেয় যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই; তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। তিনি স্ত্রী বা সন্তান গ্রহণ করেননি। আর মুহাম্মাদ হলেন তাঁর বান্দা ও রাসূল। আমি আপনাকে আল্লাহর দিকে আহ্বান জানাই। নিশ্চয়ই আমি আল্লাহর রাসূল। আপনি ইসলাম গ্রহণ করুন, আপনি নিরাপদ থাকবেন। {হে আহলে কিতাবগণ! একটি বিষয়ের দিকে এসো— যা আমাদের ও তোমাদের মধ্যে সমান। তা হলো: আমরা আল্লাহ ছাড়া অন্য কারো ইবাদত করব না, তাঁর সাথে কাউকে শরীক করব না এবং আমাদের কেউ আল্লাহ ব্যতীত অন্য কাউকে প্রভু বানাব না।} [সূরা আলে ইমরান: ৬৪]। যদি আপনি অস্বীকার করেন, তবে আপনার উপর খ্রিস্টানদের পাপ বর্তাবে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ص) و (ع): مسحمة، بالسين بدل الصاد، وكثيرًا ما يتعاقبان لقرب مخرجيهما كما قال الأزهري وغيره، وأثبتنا ما في (ب)، وهو الموافق لمصادر تخريج الخبر، وهو كذلك في "السيرة النبوية" لابن إسحاق برواية يونس بن بكير (293)، وهو الذي سيذكره المصنف بإثر الخبر، فإنه لا خلاف بين أصول "المستدرك" هناك بذكره بالصاد. سلمة بن الفضل عنه، عند البيهقي في "الدلائل" 2/ 309، وفي هذه الرواية ردُّ النجاشي بكتاب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يُعلن فيه إسلامه وتصديقه.وقال ابن كثير في "البداية والنهاية" 4/ 205 عن لفظ رواية يونس بن بكير هذه الظاهر أنَّ هذا الكتاب إنما هو إلى النجاشي الذي كان بعد المسلم صاحب جعفر وأصحابه، وذلك حين كتب إلى ملوك الأرض يدعوهم إلى الله عز وجل قبيل الفتح، وقوله في هذا الكتاب: إلى النجاشي الأصحم، لعلَّ الأصحم مقحم من الراوي بحسب ما فهم، والله أعلم.قال: والأنسب من هذا هاهنا ما ذكره البيهقي أيضًا … فذكر الرواية الأخرى التي لمحمد بن حميد الرازي، عن سلمة بن الفضل، عن ابن إسحاق.



[2] هو في "السيرة النبوية" لابن إسحاق برواية يونس بن بكير (293) و (306).وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 308 و 310 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.ولكتاب النبي صلى الله عليه وسلم للنجاشي لفظ آخر عند ابن إسحاق من رواية محمد بن حميد الرازي عن سلمة بن الفضل عنه، عند البيهقي في "الدلائل" 2/ 309، وفي هذه الرواية ردُّ النجاشي بكتاب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يُعلن فيه إسلامه وتصديقه.وقال ابن كثير في "البداية والنهاية" 4/ 205 عن لفظ رواية يونس بن بكير هذه الظاهر أنَّ هذا الكتاب إنما هو إلى النجاشي الذي كان بعد المسلم صاحب جعفر وأصحابه، وذلك حين كتب إلى ملوك الأرض يدعوهم إلى الله عز وجل قبيل الفتح، وقوله في هذا الكتاب: إلى النجاشي الأصحم، لعلَّ الأصحم مقحم من الراوي بحسب ما فهم، والله أعلم.قال: والأنسب من هذا هاهنا ما ذكره البيهقي أيضًا … فذكر الرواية الأخرى التي لمحمد بن حميد الرازي، عن سلمة بن الفضل، عن ابن إسحاق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4291)


4291 - حدثنا أبو الحسين محمد بن أحمد بن تَمِيم القَنْطري ببغداد، حدثنا جعفر بن محمد بن شاكِر، حدثنا خالد بن يزيد القَرْني، حدثنا حُدَيج بن مُعاوية، حدثنا أبو إسحاق، عن عبد الله بن عُتْبة، عن عبد الله بن مسعود، قال: بَعَثَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى النَّجَاشيّ ونحن نحوٌ من ثَمانين رجلًا، فذكر الحديثَ بطُوله [1]، كما أخرجتُه في "التفسير" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وليعلم طالبُ العلم أنَّ النجاشي كان مشركًا قبل وُرُودِ أصحابِ رسول الله صلى الله عليه وسلم بكِتابِه عليه الدليلُ على ذلك إخراجُهما في "الصحيحين" عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، عن عائشة: أنَّ أم سَلمَة وأم حَبيبةَ ذَكَرتا كَنِيسةً، وأنها بأرضِ الحَبَشِةِ، فيها تَصاويرُ، الحديث [3].




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে নাজ্জাশীর (বাদশাহ) কাছে পাঠালেন, আমরা প্রায় আশিজন লোক ছিলাম। অতঃপর তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি পুরোপুরি বর্ণনা করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف حُديج بن معاوية، لكن قد رُوي ما يشهد لروايته من حديث جعفر بن أبي طالب عند أحمد 3/ (1740) وغيره بسند حسن، مع مغايرة يسيرة في بعض حروفه، كما هو ظاهر في رواية حُديج التي ساقها بتمامها أحمد 7/ (4400) وغيره، وفي بعض حروف رواية حُديج نكارة واضحة كذكر أبي موسى الأشعري، ففيه مخالفة صريحة لحديثِ أبي موسى الذي عند البخاري (3876) ومسلم (2502) أنه قال: بلغنا مخرجُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم ونحن باليمن، فخرجنا مهاجرين إليه … فركبنا سفينةً، فألقتنا سفينتنا إلى النجاشي بالحبشة، ووافقْنا جعفرَ بنَ أبي طالب وأصحابَه عنده، فقال جعفر: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثنا هاهنا، وأمرنا بالإقامة فأقيموا معنا، فأقمنا معه، حتى قدمنا جميعًا، فوافقنا النبي صلى الله عليه وسلم حين افتتح خيبر. على أنه قد رَوى إسرائيلُ بن يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي عن جده أبي إسحاق عن أبي بردة بن أبي موسى الأشعري عن أبيه، كما تقدم برقم (3247): أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أمره أن ينطلق إلى أرض الحبشة، وذكر القصة، وهذا يوهم صحة ما ورد في حديث حُديج هذا بحضور أبي موسى الأشعري مع جعفر إلى أرض الحبشة، لكن قال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 582: يظهر لي إنَّ إسرائيل وهم فيه، ودخل عليه حديث في حديث، وإلَّا أين كان أبو موسى الأشعري ذلك الوقت.قلنا: ويؤيد كلام الذهبي أن بُريد بن عبد الله بن أبي بردة قد روى قصة هجرة أبي موسى، عن أبي بردة عن أبي موسى، عن أبيه، وروايته في "الصحيحين"، فقال فيها: بلغنا مخرج النبي صلى الله عليه وسلم ونحن باليمن، فذكر ما تقدم، وليس فيه خروج أبي موسى مع جعفر بأمر النبي صلى الله عليه وسلم إلى الحبشة.وأخرج حديثَ حُديجٍ أحمد 7/ (4400) عن حسن بن موسى، عن حُديج بن معاوية، بهذا الإسناد.



[2] انظر الكلام على كتابه "التفسير" في مبحث كتب الحاكم من مقدمتنا لهذا التحقيق. برقم (3927) معلقًا عن بشر بن شعيب بن أبي حمزة عن أبيه، وموصولًا برقم (3696) من طريق يونس بن يزيد، وبرقم (3872) و (3927) من طريق معمر، ثلاثتهم عن الزُّهْري.



4291 [3] - أخرجه البخاري (427) و (3873)، ومسلم (528). برقم (3927) معلقًا عن بشر بن شعيب بن أبي حمزة عن أبيه، وموصولًا برقم (3696) من طريق يونس بن يزيد، وبرقم (3872) و (3927) من طريق معمر، ثلاثتهم عن الزُّهْري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4292)


4292 - أخبرني إسماعيلُ بن محمد الشَّعْراني، حدثنا جَدِّي، حدثنا إبراهيم بن المُنذِر الحِزامي، حدثنا محمد بن فُلَيح، عن موسى بن عُقبة، عن ابن شِهَابٍ: أَنَّ عُثمانَ بن عفّان وامرأتَه رُقَيّة بنتَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم خَرَجا مُهاجِرَين من مكة إلى الحبشة الهجرةَ الأولى، ثم قَدِما على رسول الله صلى الله عليه وسلم مَكةَ، ثم هاجَرا إلى المدينة [1].قد اتفقَ الشيخانِ على إخراج حديث شعيب بن أبي حمزة [2] وغيره، عن الزُّهْري، عن عُرْوة، عن عبيد الله بن عَدِيّ، عن المسور بن مَخْرَمة، في خروج عثمان بن عفّان إلى أرض الحبشة، وساقا الحديثَ بطُولِه، فلذلك اقتصرتُ على روايةِ موسى بن عُقبة عن ابن شِهَاب.وذكر ابن إسحاق في المَغَازي: أنَّ رُقيّة بنت رسولِ الله صلى الله عليه وسلم فيما ذَكَرُوا، لم يُرَ في العَرَبِ ولا في الحَبَشِ أحسنُ منها.




উসমান ইবনু আফ্‌ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এবং তাঁর স্ত্রী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা রুকাইয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রথম হিজরতের সময় মক্কা থেকে আবিসিনিয়ার (হাবশা) দিকে হিজরত করে বেরিয়ে গেলেন। এরপর তাঁরা মক্কায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে আসেন এবং (পরে) মদীনায় হিজরত করেন।

(টিকা ও মন্তব্য): শু'আইব ইবনু আবি হামযাহ এবং অন্যান্য রাবীগণ কর্তৃক যুহ্‌রী, উরওয়াহ, উবাইদুল্লাহ ইবনু আদী, এবং মিসওয়ার ইবনু মাখরামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণিত উসমান ইবনু আফ্‌ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আবিসিনিয়া (হাবশা) গমনের হাদীসটি শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) উভয়ই বর্ণনা করেছেন এবং তারা হাদীসটি বিস্তারিতভাবে উল্লেখ করেছেন। এই কারণে আমি ইবনু শিহাব থেকে মূসা ইবনু উকবাহ এর বর্ণিত বর্ণনাটির উপরই সীমাবদ্ধ থাকলাম। ইবনু ইসহাক তার মাগাযী (জীবনী) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন যে, তারা (ঐতিহাসিকগণ) যা আলোচনা করেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা রুকাইয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে সুন্দুরী নারী আরব কিংবা আবিসিনিয়ার (হাবশার) কোথাও দেখা যায়নি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، وابن شهاب - وهو الزُّهْري - إنما أخذه عن جماعة وهم أبو بكر بن عبد الرحمن بن الحارث وسعيد بن المسيب وعروة كما في "التاريخ الأوسط" للبخاري (3)، و "أحكام القرآن" للطحاوي (410) وقال الطحاوي بإثره: منقطعُ ابن المسيّب يقوم مقام المتصل. برقم (3927) معلقًا عن بشر بن شعيب بن أبي حمزة عن أبيه، وموصولًا برقم (3696) من طريق يونس بن يزيد، وبرقم (3872) و (3927) من طريق معمر، ثلاثتهم عن الزُّهْري.



[2] هذا وهمٌ منه، لأنَّ البخاري وحده أخرج هذا الحديث دون مسلم، وهو عند البخاري برقم (3927) معلقًا عن بشر بن شعيب بن أبي حمزة عن أبيه، وموصولًا برقم (3696) من طريق يونس بن يزيد، وبرقم (3872) و (3927) من طريق معمر، ثلاثتهم عن الزُّهْري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4293)


4293 - فحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبّار، حدثنا يونس بن بُكير، عن ابن إسحاق، قال: قال أبو طالبٍ أبياتًا للنجاشيِّ يَحضُّهم على حُسْن جوارهم والدَّفْع عنهم:تَعَلَّمُ خِيارَ الناسِ أن مُحمدًا … وزيرٌ لِمُوسى والمسيحِ ابن مَريمِأتى بهُدًى مثلَ الذي أتَيَا به … فكلٌّ بأمرِ اللهِ يَهدي ويَعصِمُوإنكمُ تتلونَه في كتابِكُمْ … بصِدقِ حديثٍ لا حديثِ المُتَرجِّمِوإنّك ما تَأتيكَ منها عصابةٌ … بفضلِكَ إِلّا أُرجِعُوا بالتَّكرُّمِ [1]




ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, তিনি (ইবনু ইসহাক) বলেন, আবূ তালিব নাজ্জাশীর উদ্দেশ্যে কয়েকটি কবিতা বলেছিলেন। তিনি সেগুলোতে মুসলমানদের উত্তম প্রতিবেশীত্ব বজায় রাখতে এবং তাদের পক্ষ থেকে প্রতিরোধ করতে উৎসাহিত করেন। (কবিতাগুলো হলো:)

তোমাদের মধ্যে যারা শ্রেষ্ঠ তারা জানে যে মুহাম্মদ... মূসা ও মারইয়াম-পুত্র মসীহর জন্য একজন সাহায্যকারী।
তিনি এমন হিদায়াত নিয়ে এসেছেন যা তাঁরা (মূসা ও ঈসা) নিয়ে এসেছিলেন... সুতরাং প্রত্যেকেই আল্লাহর নির্দেশে পথ দেখান এবং রক্ষা করেন।
আর তোমরা তোমাদের কিতাবে তা (এই সত্যকে) আবৃত্তি কর... যা সত্য ভাষণ, কোনো অনুবাদকের কথা নয়।
আর নিশ্চয়ই যখনই তাদের (কাফিরদের) কোনো দল তোমার কাছে আসে... তোমার অনুগ্রহে, তারা যেন সম্মানের সাথে প্রত্যাবর্তিত হয়।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هو في "السيرة النبوية" لابن إسحاق برواية يونس بن بُكير (298). وقد تقدم برقم (2398) من طريق أبي الوليد الطيالسي عن إسحاق بن سعيد.وسيأتي برقم (5167) من طريق عبد الله بن عمر بن أبان عن خالد بن سعيد السعيدي، عن أبيه، عن عمه خالد بن سعيد الأكبر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4294)


4294 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا بشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، حدثنا إسحاق بن سعيد السَّعيدي، عن أبيه، عن أمِّ خالد بنت خالد، قالت: قَدِمتُ من أرض الحبشة وأنا جُويرِيَةٌ فكَسَان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم خَمِيصةً لها أعْلامٌ، فجعل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَمْسَحُ الأعلامَ بيدِه، ويقولُ: "سَنَاهُ سَنَاهُ"؛ يعني: حَسَنٌ حَسَنٌ [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!




উম্মে খালিদ বিনতে খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি আবিসিনিয়ার (হাবশা) ভূমি থেকে এলাম, তখন আমি ছোট বালিকা ছিলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে একটি খামীসাহ (পশমী চাদর বা পোশাক) পরিধান করালেন, যাতে নকশা (বা রেখা) ছিল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাত দিয়ে সেই নকশাগুলো মুছতে লাগলেন এবং বলছিলেন: "সানাহু, সানাহু"; অর্থাৎ, সুন্দর, সুন্দর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. سفيان: هو ابن عُيينة.وأخرجه البخاري (3847) عن الحُميدي، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه. وقد تقدم برقم (2398) من طريق أبي الوليد الطيالسي عن إسحاق بن سعيد.وسيأتي برقم (5167) من طريق عبد الله بن عمر بن أبان عن خالد بن سعيد السعيدي، عن أبيه، عن عمه خالد بن سعيد الأكبر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4295)


4295 - أخبرنا أبو الحسن علي بن محمد بن عُقبة الشَّيباني، حدثنا الهيثَم بن خالد، حدثنا أبو غسان النَّهْدي، حدثنا الأجلح بن عبد الله، عن الشَّعْبي، عن جابر بن عبد الله، قال: لما قَدِمَ جعفرُ بن أبي طالب مِن أرضِ الحَبَشة، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما أدري بأيِّهما أنا أفرَحُ: بفتحِ خَيْبر، أم بقُدُومِ جعفر" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন জা‘ফর ইবনু আবী তালিব আবিসিনিয়ার (হাবশা) ভূমি থেকে আসলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "আমি জানি না এই দু'টির কোনটিতে আমি অধিক আনন্দিত: খায়বার বিজয়ে, নাকি জা‘ফরের আগমনে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكن الصحيح أنه عن الشَّعْبي - وهو عامر بن شَراحِيل - مرسلٌ كما سيأتي برقم (5006)، لكن روي ما يشهد له. الهيثم بن خالد: هو ابن يزيد ورّاق أبي نعيم، وأبو غسان النَّهْدي: هو مالك بن إسماعيل.وسيأتي موصولًا كذلك برقم (5005) من طريق الحسن بن الحسين العُرَني عن الأجلح.ويشهد له حديث أبي جحيفة عند الطبراني في "الكبير" (1470) و 22/ (244) وفي "الأوسط" (2003) وفي "الصغير" (30)، وإسناده حسن. بهذا الإسناد. وزاد فيه نصَّ البيعة، فقال على أن لا نشرك بالله شيئًا، ولا نسرق، ولا نزنيَ، ولا نقتلَ أولادنا، ولا نأتي ببهتان نفتريه بين أيدينا وأرجُلنا، ولا نعصيَه في معروف، فإن وفيتم فلكم الجنة، وإن غشيتم من ذلك شيئًا فأمركم إلى الله، إن شاء عذَّبكم وإن شاء غفر لكم.وهو عند البخاري (3893) و (6873)، ومسلم (1709) من طريق الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، به لكن بذكر نصّ البيعة وحدَه، دون ذكر العدد وموضع البيعة ووقتها.وقد تابع ابنَ إسحاق على ذكر ذلك كلِّه الواقديُّ عن يزيد بن أبي حبيب، كما في "طبقات ابن سعد" 1/ 187.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4296)


4296 - حدثني أبو الفضل محمد بن إبراهيم المُزكِّي، حدثنا الحسين بن محمد بن زياد، حدثنا سعيد بن يحيى بن سعيد الأُمَوي، حدثنا أبي، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا يزيد بن أبي حَبيب، عن مَرثَد بن عبد الله اليَزَني، عن عبد الرحمن بن عُسَيلة الصُّنابِحي، عن عُبادة بن الصامت، قال: كنا أحدَ عشرَ في العَقَبةِ الأُولى من العام المُقبِل، فبايَعْنا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بَيْعةَ النساءِ قبل أن تُفرَض علينا الحربُ [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা ছিলাম এগারো জন, যারা পরবর্তী বছরের প্রথম আকাবার বাই'আতের সময় উপস্থিত ছিলাম। আমরা তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট 'বাই'আতুন নিসা' (নারীদের বাই'আত) এর মতো করে বাই'আত গ্রহণ করেছিলাম, আমাদের উপর যুদ্ধ ফরয হওয়ার আগেই।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من محمد بن إسحاق - وهو المطّلبي مولاهم، صاحب السيرة - وقد صرَّح بسماعه فانتفت شبهة تدليسه. لكن قوله في الخبر هنا: كنا أحد عشر، وهمٌ، صوابُه: اثني عشر، كما جاء في سائر روايات الحديث.وأخرجه أحمد 37/ (22754) عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد عن أبيه، عن ابن إسحاق، بهذا الإسناد. وزاد فيه نصَّ البيعة، فقال على أن لا نشرك بالله شيئًا، ولا نسرق، ولا نزنيَ، ولا نقتلَ أولادنا، ولا نأتي ببهتان نفتريه بين أيدينا وأرجُلنا، ولا نعصيَه في معروف، فإن وفيتم فلكم الجنة، وإن غشيتم من ذلك شيئًا فأمركم إلى الله، إن شاء عذَّبكم وإن شاء غفر لكم.وهو عند البخاري (3893) و (6873)، ومسلم (1709) من طريق الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، به لكن بذكر نصّ البيعة وحدَه، دون ذكر العدد وموضع البيعة ووقتها.وقد تابع ابنَ إسحاق على ذكر ذلك كلِّه الواقديُّ عن يزيد بن أبي حبيب، كما في "طبقات ابن سعد" 1/ 187.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4297)


4297 - حدثني محمد بن إسماعيل المُقرئ، حدثنا محمد بن إسحاق بن إبراهيم، حدثنا محمد بن يحيى بن أبي عُمر العَدَني، حدثنا يحيى بن سُلَيم، عن ابن خُثَيم، عن أبي الزُّبَير، عن جابر بن عبد الله الأنصاري: أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم لَبِثَ عشرَ سنين يَتْبع الناسَ في مَنازِلهم في المَوسِم ومَجَنَّةَ وعُكاظ، ومنازِلهم من منًى: "مَن يُؤويني؟ من يَنصُرُني حتى أبلِّغَ رسالاتِ ربي؟ فلَهُ الجنةُ" فلا يجِدُ أحدًا يَنصُرُه ولا يُؤويه، حتى إِنَّ الرجلَ لَيَرحَلُ من مصر أو من اليمن إلى ذي رَحِمِه، فيأتيه قومُه فيقولون له: احذَرْ غلامَ قُريشٍ، لا يَفتِنُك، ويمشي بين رحالِهم يدعُوهم إلى الله عز وجل يُشيرون إليه بالأصابع، حتى بَعَثَنا اللهُ من يَثربَ، فيأتيه الرجلُ منا فيؤمِنُ به ويُقرئُه القرآنَ، فَيَنقَلِبُ إلى أهلِه فيُسلِمُون بإسلامه، حتى لم تبقَ دارٌ من دُورِنا إلّا فيها رَهْطٌ من المسلمين يُظهِرون الإسلامَ، وبَعَثَنا اللهُ إليه فائتمَرْنا واجتمَعْنا، وقلنا: حتى متى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُطْرَدُ في جبال مَكةَ ويُخافُ؟! فرحَلْنا حتى قَدِمْنا عليه في المَوسِم، فواعَدَنا بيعةَ العقبةِ.فقال له عمُّه العباسُ: يا ابن أخي، لا أدري ما هؤلاء القومُ الذين جاؤوك، إني ذو مَعرفةٍ بأهل يَثرِبَ، فاجتَمعْنا عندَه مِن رجُلٍ ورجُلَين، فلما نظر العباسُ في وجُوهِنا، قال: هؤلاء قومٌ لا نَعرِفُهم هؤلاء أحداثٌ، فقلنا: يا رسول الله، على ما نُبايُعك؟ قال: "تُبايِعُوني على السمْع والطاعة، في النشاطِ والكَسَلِ، وعلى النفقة في العُسر واليُسر، وعلى الأمرِ بالمعروف والنهْي عن المُنكَر، وعلى أن تقُولُوا في الله لا تأخذُكم لومةُ لائِمٍ، وعلى أن تنصُروني إذا قَدِمتُ عليكم، وتَمنَعُوني مما تَمنَعُون منه أنفُسَكم وأزواجَكم وأبناءَكم، ولكُمُ الجنة"، فقُمْنا نَبايِعُه، فأخذ بيده أسعدُ بن زُرارةَ وهو أصغر السبعين، إلّا أنه قال: رُوَيدًا يا أهلَ يَثرِبَ، إنا لم نَضْرِب إليه أكباد المَطيِّ إِلَّا ونحن نَعلَمُ أنه رسولُ الله، وإن إخراجَه اليومَ مُفارقَةُ العربِ كَافَّةً، وقتلُ خِيارِكُم، وأن يَعضَكُمُ السيفُ، فإما أنتم قومٌ تَصبِرون عليها إذا مَسَّتْكُم وعلى قتل خِيارِكُم ومُفارقَةِ العَرَبِ كافَّةَ، فَخُذُوه وأجرُكم على الله، وإما أنتم تَخافُون من أنفُسِكم خِيفَةً فذَرُوه، فهو أعذَرُ عند الله عز وجل، فقالوا: يا أسعدُ، أمِطْ عنا يَدَك، فوالله لا نَذَرُ هذه البيعةَ ولا نَستَقِيلُها، قال: فقُمنا إليه رجلًا رجلًا، فأَخَذَ علينا ليُعطينا بذلك الجنة [1].هذا حديث صحيح الإسناد، جامعٌ لِبَيعة العقبةِ، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দশ বছর ধরে মুসম (হজ্জ), মাজান্না ও উকাজের বাজারে এবং মিনার তাঁবুতে (আবাসস্থলে) লোকদের অনুসরণ করতেন (তাদের কাছে যেতেন) এবং বলতেন: "কে আমাকে আশ্রয় দেবে? কে আমাকে সাহায্য করবে, যাতে আমি আমার রবের রিসালাত পৌঁছাতে পারি? তার জন্য জান্নাত রয়েছে।" কিন্তু তিনি এমন কাউকে পেতেন না যে তাঁকে সাহায্য করে বা আশ্রয় দেয়। এমনকি কোনো লোক মিশর বা ইয়ামান থেকে তার আত্মীয়ের কাছে (মক্কায়) সফর করে আসলে, তার গোত্রের লোকেরা এসে তাকে বলত: "কুরাইশের এই যুবকের ব্যাপারে সতর্ক হও, সে যেন তোমাকে ফিতনায় না ফেলে।" তিনি তাদের তাঁবুর মাঝখান দিয়ে হেঁটে হেঁটে তাদের মহান আল্লাহর দিকে ডাকতেন আর লোকেরা আঙ্গুল দিয়ে তাঁর দিকে ইশারা করত। অবশেষে আল্লাহ আমাদেরকে ইয়াসরিব (মদীনা) থেকে পাঠালেন।

আমাদের মধ্যে থেকে কোনো লোক তাঁর কাছে আসত, ঈমান আনত এবং তিনি তাকে কুরআন শোনাতেন। সে তার পরিবারের কাছে ফিরে যেত আর তার ইসলাম গ্রহণের কারণে তারাও ইসলাম গ্রহণ করত। শেষ পর্যন্ত আমাদের কোনো বাড়িই বাকি থাকল না যেখানে মুসলিমদের একটি দল প্রকাশ্যে ইসলাম প্রকাশ করত না। এরপর আল্লাহ আমাদের তাঁর কাছে পাঠালেন। আমরা পরামর্শ করলাম এবং একত্রিত হলাম এবং বললাম: "আর কতকাল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কার পাহাড়গুলোতে বিতাড়িত হবেন এবং ভীত হয়ে থাকবেন?" অতঃপর আমরা সফর করে মুসমের (হজ্জের) সময় তাঁর কাছে এলাম। তিনি আমাদের আকাবার বাই‘আতের ওয়াদা দিলেন।

তখন তাঁর চাচা আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: "হে ভাতিজা! তোমার কাছে যারা এসেছে তারা কারা, আমি জানি না। আমি ইয়াসরিবের লোকদের সাথে পরিচিত।" আমরা একজন বা দু’জন করে তাঁর কাছে একত্রিত হলাম। আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন আমাদের চেহারার দিকে তাকালেন, তখন বললেন: "এরা এমন লোক যাদের আমরা চিনি না। এরা তো নবীন (অপরিচিত)।"

আমরা বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কোন কিছুর উপর আপনার কাছে বাই‘আত করব?" তিনি বললেন: "তোমরা আমার কাছে বাই‘আত করবে এই মর্মে যে, তোমরা উদ্যম ও অলসতা সর্বাবস্থায় (আমার নির্দেশ) শুনবে ও মানবে; অভাব-অনটন ও স্বচ্ছলতা সর্বাবস্থায় (আল্লাহর পথে) ব্যয় করবে; সৎ কাজের আদেশ দেবে ও অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করবে; আল্লাহর ব্যাপারে কথা বলবে এবং কোনো নিন্দুকের নিন্দাকে ভয় করবে না; আর আমি যখন তোমাদের কাছে আসব, তখন তোমরা আমাকে সাহায্য করবে এবং আমাকে এভাবে রক্ষা করবে, যেভাবে তোমরা তোমাদের নিজেদের, তোমাদের স্ত্রী ও সন্তানদের রক্ষা করো। আর এর বিনিময়ে তোমাদের জন্য রয়েছে জান্নাত।"

তখন আমরা তাঁর কাছে বাই‘আত করার জন্য দাঁড়ালাম। তখন আস‘আদ ইবনু যুরারাহ (যিনি সত্তর জনের মধ্যে সবচেয়ে কম বয়স্ক ছিলেন) তাঁর হাত ধরলেন এবং বললেন: "হে ইয়াসরিবের লোকেরা! একটু থামো। আমরা তাঁর কাছে সফরের কষ্ট স্বীকার করে এসেছি, যখন আমরা নিশ্চিতভাবে জানি যে তিনি আল্লাহর রাসূল। আর আজ তাঁকে মক্কা থেকে বের করে আনার অর্থ হলো—সমগ্র আরব জাতির থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যাওয়া, তোমাদের মধ্যকার শ্রেষ্ঠদের নিহত হওয়া এবং তোমাদেরকে তলোয়ারের আঘাতে জর্জরিত করা হবে। সুতরাং হয় তোমরা এমন এক জাতি, যারা এসব বিপদ স্পর্শ করলে, তোমাদের শ্রেষ্ঠদের নিহত হওয়ার ওপর এবং সমস্ত আরব থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যাওয়ার ওপর ধৈর্য ধারণ করতে পারবে; তাহলে তাঁকে গ্রহণ করো, আর তোমাদের প্রতিদান আল্লাহর ওপর। অথবা যদি তোমরা নিজেদের পক্ষ থেকে কোনো ভয় পাও, তবে তাঁকে ছেড়ে দাও। তাহলে তা মহান আল্লাহর কাছে তোমাদের জন্য অধিক গ্রহণযোগ্য হবে।" তারা বলল: "হে আস‘আদ! আমাদের থেকে তোমার হাত সরাও। আল্লাহর কসম! আমরা এই বাই‘আত ত্যাগ করব না এবং তা প্রত্যাহারও করব না।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর আমরা তাঁর কাছে একজন একজন করে দাঁড়ালাম। তিনি আমাদের থেকে (এই অঙ্গীকার) গ্রহণ করলেন যেন তিনি এর বিনিময়ে আমাদের জান্নাত দেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد حسن من أجل يحيى بن سُلَيم - هو الطائفي - وقد تُوبع. ابن خُثيم: هو عبد الله بن عثمان، وأبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي.وأخرجه ابن حبان (7012) عن محمد بن إسحاق بن إبراهيم مولى ثقيف، عن ابن أبي عمر العَدَني، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 23/ (14653) عن إسحاق بن عيسى بن الطباع، عن يحيى بن سُلَيم، به.وأخرجه أحمد 22/ (14456)، وابن حبان (6274) من طريق معمر بن راشد عن ابن خُثيم به.وانظر ما تقدَّم برقم (4266)، وما سيأتي برقم (4299) و (5492). الزمنُ أو الوقتُ. وجاء في سائر مصادر تخريج الخبر مرفوعًا على أنه اسمٌ لـ "كان" مؤخَّرًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4298)


4298 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عبيد بن شَريك، حدثنا يحيى بن بكير، حدثني الليثُ، عن عُقَيل، عن ابن شِهَاب، قال: كان بين ليلة العَقَبة وبين مُهاجَرِ رسول الله صلى الله عليه وسلم [ثلاثة] [1] أشهرٍ، أو قريبًا [2] منها، وكانت بَيعةُ الأنصارِ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ليلةَ العَقَبة في ذي الحِجّة، وقَدِمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم المدينةَ في شهر ربيعٍ الأولِ [3].




ইবনু শিহাব থেকে বর্ণিত, 'আকাবার রাতের এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হিজরতের মাঝে তিন মাস অথবা এর কাছাকাছি সময় ছিল। আর আনসারগণ যিলহজ্জ মাসের 'আকাবার রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বায়'আত করেছিলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রবিউল আওয়াল মাসে মদীনায় আগমন করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظة "ثلاثة" سقطت من (ز) و (ب)، ومحلُّها في (ص) و (ع) بياض، وهي ثابتة في النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان، وكذا هي ثابتة في خبر الزُّهْري عند سائر من خرَّجه عنه. الزمنُ أو الوقتُ. وجاء في سائر مصادر تخريج الخبر مرفوعًا على أنه اسمٌ لـ "كان" مؤخَّرًا.



[2] كذا جاء في النسخ الخطية بالنصب، ويجوز ذلك على أن يكون اسم "كان" محذوفًا، تقديره: الزمنُ أو الوقتُ. وجاء في سائر مصادر تخريج الخبر مرفوعًا على أنه اسمٌ لـ "كان" مؤخَّرًا.



4298 [3] - رجاله ثقات. الليث: هو ابن سعْد، وعُقيل: هو ابن خالد الأيلي، وابن شهاب: هو الزُّهْري.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 511، وابن عبد البر في "التمهيد" 23/ 275 من طريق حجاج بن محمد، عن الليث بن سعد، به. وأحمد 28/ (17078)، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 451، والأشبه أنه عند الشَّعْبي مرسلًا.وقد صحَّ عن جابر موصولًا من غير طريق الشَّعْبي كما تقدم برقم (4297).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4299)


4299 - حدثنا حمزة بن العباس العَقَبي، حدثنا العباس بن محمد الدُّوْري، حدثنا قَبيصة بن عُقبة، حدثنا سفيان، عن داود بن أبي هِنْد وغيره، عن الشَّعْبي، عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم للنُّقباء من الأنصار: "تُؤْووني وتَمْنَعوني؟ " قالوا: نعم، فما لنا؟ قال: "الجنةُ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের (নেতৃস্থানীয়) নুকাবাগণকে বললেন: "তোমরা কি আমাকে আশ্রয় দেবে এবং নিরাপত্তা প্রদান করবে?" তারা বললেন: হ্যাঁ। তাহলে বিনিময়ে আমরা কী পাব? তিনি বললেন: "জান্নাত।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكنه اختُلف فيه عن الشَّعْبي - وهو عامر بن شَراحيل - في وصله وإرساله، فقد وصله عنه داود بن أبي هند كما وقع في رواية المصنف هنا، وتابعه على ذلك جابر الجُعفي الذي جاءت الإشارة إليه هنا بالإبهام، وقد صُرِّح باسمه في رواية البزار كما في "كشف الأستار" (1755)، وابن المقرئ في "معجمه" (134).ووصله عنه أيضًا إبراهيم بن طهمان عند أبي القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (79) لكن بذكر النعمان بن بشير بدل جابر بن عبد الله.ووصله عنه مجالد بن سعيد عند أحمد 28/ (17079) وغيره، لكن بذكر أبي مسعود عقبة بن عمرو الأنصاري. ومجالد ضعيف.وأخرج رواية داود بن أبي هند الموصولة عند المصنف: البزار كما في "كشف الأستار" (1755)، وابن المقرئ في "معجمه" (134) من طريقين عن قَبيصة بن عُقبة، بهذا الإسناد.وأخرجها أيضًا ابن أبي شَيْبة في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (4241)، وأبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب" أيضًا، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 5/ 44 و 9/ 456 من طريق معاوية بن هشام، عن سفيان الثوري، به.ورواه عن الشَّعْبي إسماعيلُ بنُ أبي خالد عند ابن أبي شَيْبة 14/ 599، والفاكهي في "أخبار مكة" (2540)، والدولابي في "الكنى والأسماء" (90) بأطول ممّا هاهنا.وتابع إسماعيلَ بن أبي خالد على إرساله زكريا بن أبي زائدة عند ابن سعد في "الطبقات" 4/ 8، وأحمد 28/ (17078)، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 451، والأشبه أنه عند الشَّعْبي مرسلًا.وقد صحَّ عن جابر موصولًا من غير طريق الشَّعْبي كما تقدم برقم (4297).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4300)


4300 - حدثنا أبو الطيب محمد بن محمد الشَّعِيري، حدثنا مَحمِش [1] بن عِصام، حدثنا حفص بن عبد الله، حدثني إبراهيم بن طَهْمان، عن شُعْبة بن الحجّاج، عن أبي إسحاق، عن البراء بن عازب، أنه قال: أولُ مَن قَدِمَ علينا المدينةَ من المهاجرين مصعبُ بن عُمير وابنُ أمّ مَكتُوم، فكانوا يُقرؤوننا، فَقَدِمَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وقد قرأتُ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} وسُوَرًا من المُفصَّل، ثم قدم سعدُ بن مالك وعمارُ بن ياسر، ثم قدم عمرُ بن الخطاب في عشرين، ثم قدم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فما فَرِحْنا بشيءٍ فَرَحَنا برسول الله صلى الله عليه وسلم، فجعلَ النساءُ والصِّبيان يَسْعَون يقولون: هذا رسولُ الله؛ صلى الله عليه وسلم [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة.




আল-বারা' ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মুহাজিরদের মধ্যে যারা সর্বপ্রথম আমাদের কাছে মদীনায় এসেছিলেন, তারা হলেন মুসআব ইবনু উমায়র এবং ইবনু উম্মে মাকতূম। তারা আমাদের কুরআন শেখাতেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগমন করলেন। তখন আমি {তোমার রবের নামে তাসবীহ পাঠ করো, যিনি সুউচ্চ (আল-আ'লা)} এবং মুফাসসাল অংশের আরও কয়েকটি সূরা পড়ে ফেলেছিলাম। অতঃপর সা'দ ইবনু মালিক ও আম্মার ইবনু ইয়াসির আগমন করলেন। এরপর উমার ইবনুল খাত্তাব বিশজনের একটি দলের সাথে আগমন করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগমন করলেন। আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আগমনে যে পরিমাণ আনন্দিত হয়েছিলাম, এমন আনন্দ অন্য কোনো কিছুতে পাইনি। অতঃপর নারী ও শিশুরা দৌড়াতে শুরু করল এবং বলতে লাগল: ইনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: محمد بالدال المهملة، وإنما هو بالشين المعجمة، وقد ذكره المصنف في "تاريخ نيسابور" على الصواب كما في "تلخيصه" المطبوع، وانظر ترجمته في "تاريخ الإسلام" للذهبي 6/ 628.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمش بن عصام، فقد روى عنه جمع ووصفه الحاكم بالمُعدَّل، وهو متابع.وأخرجه أحمد 30/ (18512) و (18568)، والبخاري (3924) و (3925) و (4941)، والنسائي (11602) من طرق عن شُعْبة، به. وزادوا فيه ذكر بلال بن رباح مع عمار بن ياسر وسعد بن مالك.وقصة مقدم مصعب بن عمير ستأتي من طريق إسرائيل عن أبي إسحاق برقمي (6784) و (6814). وسيأتي منه ذكر استقبال أهل المدينة رسولَ الله صلى الله عليه وسلم برقم (4328) لكن من حديث البراء عن أبي بكر الصِّدّيق.