আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4301 - أخبرنا أبو الصّقر أحمد بن الفَضْل الكاتب بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحُسين بن دِيْزِيل، حدثنا إبراهيم بن المُنذِر الخزاميّ، حدثنا سفيان بن عُيَينة، عن عمرو بن دينار، قال: قلتُ لِعُرُوة بن الزُّبير: كم لبثَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم بمكّة؟ قال: عشرَ سنين، قلت: فإنَّ ابن عبّاس يقول: لبثَ بِضْعَ عشرةَ حِجَّةً، قال: إنما أخذَه من قول الشاعر؛ قال سفيانُ: حدثنا يحيى بن سعيد قال: سمعت عجوزًا من الأنصار تقول: رأيتُ ابن عبّاس يَختلِف إلى صِرْمةَ بن قَيس يتعلَّم منه هذه الأبيات:ثَوَى في قريش بِضْعَ عشرةَ حِجَّةً … يُذكَّر لو أَلْفَى [1] صديقًا مُواتِياويَعرِضُ في أهلِ المَواسِمِ نفسَه … فلم يَرَ مَن يُؤوي ولم يَرَ داعِيافلما أتانا واستقرّت به النَّوى … وأصبحَ مسرورًا بطَيْبةَ راضِياوأصبحَ ما يَخشى ظُلَامةَ ظالمٍ … بعيدٍ وما يَخشى من الناس باغِيابَذلْنا له الأموالَ مِن جُلِّ مالِنا … وأنفسَنا عند الوَغَى والتأسِّيانُعادِي الذي عادَى مِن الناسِ كُلِّهم … بحقٍّ وإن كان الحبيبَ المُواتِياونعلمُ أن الله لا شيءَ غيرُه … وأنَّ كتاب الله أصبحَ هادِيا [2] هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه، وهو أَولى ما تقومُ به الحُجّة على مُقامِ سيدنا المصطفى صلى الله عليه وسلم بمكةَ بضْعَ عشرةَ سنةً.وله شاهدٌ صحيح على شرط مسلم:
আমর ইবনু দীনার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উরওয়াহ ইবনুয যুবাইরকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় কতদিন অবস্থান করেছিলেন?
তিনি বললেন: দশ বছর।
আমি বললাম: কিন্তু ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তো বলেন: তিনি দশকের কিছু বেশি সংখ্যক বছর (বিদ্’আ আশারা) অবস্থান করেছিলেন।
তিনি (উরওয়াহ) বললেন: তিনি (ইবনু আব্বাস) তা কেবল কবির বক্তব্য থেকে নিয়েছেন।
সুফিয়ান (ইবনু উয়ায়নাহ) বলেন: আমাদের কাছে ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমি আনসারদের একজন বৃদ্ধাকে বলতে শুনেছি: আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সিরমাহ ইবনু কায়সের কাছে আসা-যাওয়া করতে দেখেছি, তিনি তার কাছ থেকে এই কবিতাগুলো শিখতেন:
"তিনি কুরাইশদের মধ্যে দশকের কিছু বেশি সংখ্যক বছর অবস্থান করলেন... তিনি (লোকদের) স্মরণ করিয়ে দিতেন, যদি তিনি কোনো অনুগত বন্ধু পেতেন।
তিনি বিভিন্ন মৌসুমের (হজ্জের) লোকজনের কাছে নিজেকে (তাঁর দাওয়াত) পেশ করতেন... কিন্তু তিনি কোনো আশ্রয়দাতা অথবা কোনো আহ্বানকারী দেখতে পাননি।
এরপর যখন তিনি আমাদের কাছে এলেন এবং তাঁর আবাস সুপ্রতিষ্ঠিত হলো... আর তিনি মাদীনাতে (তাইয়্যেবাহ) সন্তুষ্ট ও আনন্দিত হলেন।
আর এখন তিনি এমন কোনো জালিমের জুলুমকে ভয় করেন না, যে দূরে অবস্থান করে; এবং মানুষের মধ্য থেকে কোনো বিদ্রোহী (বা আক্রমণকারী) থেকেও ভয় করেন না।
আমরা আমাদের সমস্ত সম্পদ এবং যুদ্ধ ও দুঃখের সময় আমাদের জীবন তাঁর জন্য উৎসর্গ করলাম।
আমরা ন্যায়ের ভিত্তিতে সেই সব মানুষের সাথে শত্রুতা পোষণ করি যাদের সাথে তিনি শত্রুতা পোষণ করেন... যদিও সে আমাদের প্রিয় বা অনুগত বন্ধু হয়।
আমরা জানি যে আল্লাহ ছাড়া আর কিছুই (ইবাদতের যোগ্য) নেই... এবং আল্লাহর কিতাব পথপ্রদর্শক হয়েছে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تصحف في (ز) إلى: ألقى. وألفى: وَجَدَ ولقي. ومسلم (2351) من طريق أبي جَمْرة، وأحمد 5/ (3516)، والبخاري (3903)، ومسلم (2351)، والترمذي (3652) من طريق عمرو بن دينار، وابن حبان (6390) من طريق محمد بن سِيرين، أربعتهم عن ابن عبّاس.وروي عن ابن عبّاس فيه قولٌ ثالث: أنه صلى الله عليه وسلم مكث بمكة عشرًا، كما أخرجه أحمد 4/ (2696)، والبخاري (4464) و (4978)، والنسائي (7922) من طريق أبي سلمة، عن ابن عبّاس. وانظر ما تقدم برقم (2993).والرواية عنه بذكر ثلاث عشرة سنة أصح، كما قال ابن عبد البر في "التمهيد" 3/ 24، والبيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 241، وابن كثير في "البداية والنهاية" 8/ 117، وابن حجر في "الفتح" 11/ 311 و 438، وغيرهم.
[2] هذان الخبران رجالهما ثقات، إلّا أنَّ في خبر يحيى بن سعيد - وهو الأنصاري - إبهامَ العجوز الأنصارية، وأنه سمعه منها. ويغلب على ظننا أنَّ هذه العجوز الأنصارية لها صحبة، بدليل رؤيتها صرمة بن قيس الذي مات في آخر عهد النبي صلى الله عليه وسلم، إذ ليس له ذكر في شيء من الروايات وأخبار الفُتوح بعد النبي صلى الله عليه وسلم، فإذا ثبت ذلك فإسناد خبر يحيى بن سعيد الأنصاري صحيح، والله تعالى أعلم.وأخرج خبر عروة بن الزبير مسلمٌ (2350)، النسائي (4197) من طرق عن سفيان بن عيينة، به. وأخرج خبر يحيى بن سعيد الأنصاري أبو الوليد الأزرقي في "أخبار مكة" 2/ 147، وأبو بكر الدِّيْنَوري في "المجالسة" (779)، والخطابي في "غريب الحديث" 2/ 33، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 513 - 514، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 29 - 30، وابن الشجري في "أماليه" 1/ 74 من طرق عن سفيان بن عيينة، به.وسيأتي بعده عن ابن عبّاس: أن النبي صلى الله عليه وسلم أقام بمكة خمس عشرة سنة، وهو شاذٌّ.والصحيح عن ابن عبّاس: أنه مكث بمكة ثلاث عشرة سنة كما أخرجه أحمد 4/ (610)، والبخاري (3851) و (3902)، والترمذي (3621) من طريق عكرمة، وأحمد 5/ (3429)، ومسلم (2351) من طريق أبي جَمْرة، وأحمد 5/ (3516)، والبخاري (3903)، ومسلم (2351)، والترمذي (3652) من طريق عمرو بن دينار، وابن حبان (6390) من طريق محمد بن سِيرين، أربعتهم عن ابن عبّاس.وروي عن ابن عبّاس فيه قولٌ ثالث: أنه صلى الله عليه وسلم مكث بمكة عشرًا، كما أخرجه أحمد 4/ (2696)، والبخاري (4464) و (4978)، والنسائي (7922) من طريق أبي سلمة، عن ابن عبّاس. وانظر ما تقدم برقم (2993).والرواية عنه بذكر ثلاث عشرة سنة أصح، كما قال ابن عبد البر في "التمهيد" 3/ 24، والبيهقي في "دلائل النبوة" 7/ 241، وابن كثير في "البداية والنهاية" 8/ 117، وابن حجر في "الفتح" 11/ 311 و 438، وغيرهم.
4302 - حدَّثَناه أحمد بن سَلْمان الفقيه ببغداد، حدثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدثنا حجّاج بن مِنْهال، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، عن عمار بن أبي عمار، عن ابن عبّاس قال: أقام النبيُّ صلى الله عليه وسلم بمكة خمس عشرة سنة، سبعًا وثمانيًا يرى الضَّوءَ ويسمعُ الصوتَ، وأقام بالمدينة عشرًا [1]. بسم الله الرحمن الرحيموصلَّى الله على سيدنا محمد وآله وصحبه وسلم تسليمًا كثيرًا كتاب الهجرةوقد صحَّ أكثرُ أخبارها عند الشيخين، وأخرجا جميعًا اختلاف الصحابة رضي الله عنهم في مُقام رسول الله صلى الله عليه وسلم بمكة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাক্কায় পনেরো বছর অবস্থান করেন। তন্মধ্যে সাত অথবা আট বছর এমন ছিল যখন তিনি আলো দেখতেন এবং শব্দ শুনতেন। আর তিনি মদীনায় দশ বছর অবস্থান করেন।
বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম (পরম করুণাময়, অসীম দয়ালু আল্লাহর নামে)। এবং সালাত ও সালাম বর্ষিত হোক আমাদের নেতা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), তাঁর পরিবারবর্গ ও সাহাবীগণের উপর, অনেক অনেক সালাম।
হিজরত অধ্যায়: এর (হিজরতের) অধিকাংশ খবরই শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর নিকট সহীহ বলে প্রমাণিত। আর তাঁরা উভয়েই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাক্কায় অবস্থানের বিষয়ে সাহাবীগণের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মতপার্থক্য সম্মিলিতভাবে উল্লেখ করেছেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه شاذُّ كما تقدم، وقال البخاري في "تاريخه الأوسط" 1/ 339: لا يُتابع عليه عمارُ بن أبي عمار، وكان شُعْبة يتكلم في عمار.وأخرجه أحمد 4/ (2399) و (2523) و 5/ (2846)، ومسلم (2353) من طرق عن حماد بن سلمة به.وأخرجه أحمد 4/ (2640)، ومسلم (2353) من طريق يونس بن عبيد، عن عمار، به.وأخرج أحمد 3/ (2035) من طريق العلاء بن صالح، عن المنهال، عن عمرو، عن سعيد بن جبير، عن ابن عبّاس نحوه. وقال البخاري أيضًا في "تاريخه الأوسط" 1/ 340: لم يُوافَق عليه العلاء.
4303 - حدثنا إسماعيل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا جَدّي، حدثنا إبراهيم بن المُنذر الحزامي، حدثنا حُسين بن زيد، عن شِهاب بن عبد ربّه، عن عمر بن علي، قال: مَشَيتُ مع محمد بن علي، فقال: أشهدُ أنَّ أبي حدثني، عن أبيه، عن علي: أنَّ الله عز وجل عَمَّر نَبيَّه صلى الله عليه وسلم بمكةَ ثلاثَ عشرةَ سنة [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وقد اتفقت الروايات على هذه مع الروايات التي أخرجاها عن عبد الله بن عبّاس رضي الله عنهما [2]، فأما خبرُ أنسٍ ومعاوية [3]، وإن صحَّت أسانيدُها في عشر سنين، فليس عليها القولُ والعمل.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মক্কায় তেরো বছর (নবুওয়াতের দায়িত্বসহ) জীবিত রেখেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لجهالة شهاب بن عبد ربه، وحسين بن زيد - وهو ابن علي - الحسين بن علي بن أبي طالب - فيه ضعف.وأخرجه ابن أبي خيثمة في "تاريخه" كما في "البداية والنهاية" لابن كثير 13/ 156 - 157 عن إبراهيم بن المنذر الحزامي، بهذا الإسناد. سني مكثه في المدينة وكانت عشر سنين، فيصير المجموع الكلي لذلك ثلاثًا وستين، ولكن ذلك موقوف على ثبوت هذه التفاصيل عن معاوية، ولم يثبت عنه سوى بيان عمره صلى الله عليه وسلم لما قُبض، فاستنباط المصنف غير صائب، والله تعالى أعلم.
[2] انظر تخريجها برقم (4301). سني مكثه في المدينة وكانت عشر سنين، فيصير المجموع الكلي لذلك ثلاثًا وستين، ولكن ذلك موقوف على ثبوت هذه التفاصيل عن معاوية، ولم يثبت عنه سوى بيان عمره صلى الله عليه وسلم لما قُبض، فاستنباط المصنف غير صائب، والله تعالى أعلم.
4303 [3] - أما حديث أنس فأخرجه أحمد 20/ (12529) و 21/ (13519)، والبخاري (3547) و (3548) و (5900)، ومسلم (2347)، وغيرهم.وأما حديث معاوية بن أبي سفيان فليس فيه النصُّ على مكثه صلى الله عليه وسلم بمكة عشرًا، إنما فيه أنه صلى الله عليه وسلم مات وهو ابن ثلاث وستين كما أخرجه أحمد 28/ (16873) و (21882)، ومسلم (2352) وغيرهما، فلعلَّ المصنف استنبط منه أنَّ معاوية بناهُ على مجموع سِني عمره صلى الله عليه وسلم لما بعث وكانت ثلاثًا وأربعين مع مجموع سِني مكثه في مكة قبل الهجرة وكانت عشر سنين، ومجموع سني مكثه في المدينة وكانت عشر سنين، فيصير المجموع الكلي لذلك ثلاثًا وستين، ولكن ذلك موقوف على ثبوت هذه التفاصيل عن معاوية، ولم يثبت عنه سوى بيان عمره صلى الله عليه وسلم لما قُبض، فاستنباط المصنف غير صائب، والله تعالى أعلم.
4304 - أخبرنا القاسم بن القاسم السَّيّاري بمَرْو، حدثنا إبراهيم بن هلال، حدثنا علي بن الحسن بن شَقيق، حدثنا عيسى بن عُبيد الكِنْدي، عن غَيلان بن عبد الله العامِري، عن أبي زُرْعة بن عمرو، عن جَرير [1]، أنَّ النبي قال: "إِنَّ الله عز وجل أوحَى إليَّ: أيَّ هؤلاءِ البلادِ الثلاثِ نزلْتَ، فهي دار هِجْرتِك: المدينةِ، أو البحرَينِ، أو قِنَّسْرِينَ" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা আমার প্রতি ওহী করেছেন যে, এই তিনটি শহরের মধ্যে তুমি যেটিতেই অবস্থান করবে, সেটিই হবে তোমার হিজরতের স্থান: মদীনা, অথবা বাহরাইন, অথবা কিন্নাসরীন।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: عن أبي زرعة بن عمرو بن جَرير، وفي (ص) و (ع) إلى: عن أبي زرعة عن عمرو بن جَرير، وفي (م) إلى: عن أبي زرعة عن عمرو بن حريث، وجاء على الصواب في المطبوع موافقًا لرواية البيهقي في "الدلائل" 2/ 458 عن أبي عبد الله الحاكم. وجَرير: هو ابن عبد الله البجلي.
[2] إسناده ضعيف لجهالة غيلان بن عبد الله العامري ومتنه منكر، واستنكره ابن حبان في "الثقات"، والذهبيُّ في "ميزان الاعتدال" لما ترجما له.وأخرجه الترمذي (3923) من طريق الفضل بن موسى، عن عيسى بن عُبيد، بهذا الإسناد.وقال: حديث غريب.والصحيح في هذا الباب حديثُ أبي موسى الأشعري عند البخاري (3622)، ومسلم (2272) عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "رأيتُ في المنام أني أهاجر من مكة إلى أرض بها نخل، فذهب وَهَلي إلى أنها اليمامة أو هَجَر، فإذا هي المدينة يثرب". قلنا: وهَجَرُ هي قاعدة البحرين.وانظر ما سيأتي برقم (4321) و (5774).
4305 - أخبرنا عبد الله بن محمد بن موسى، حدثنا إسماعيل بن قُتَيبة، حدثنا عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا جَرير، عن قابُوس بن أبي ظَبْيان، عن أبيه، عن ابن عبّاس، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بمكةَ، فأُمِر بالهجرة، وأُنزل عليه: {وَقُلْ رَبِّ أَدْخِلْنِي مُدْخَلَ صِدْقٍ وَأَخْرِجْنِي مُخْرَجَ صِدْقٍ وَاجْعَلْ لِي مِنْ لَدُنْكَ سُلْطَانًا نَصِيرًا} [الإسراء: 80] [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় ছিলেন। অতঃপর তাঁকে হিজরতের নির্দেশ দেওয়া হয় এবং তাঁর উপর এই আয়াতটি নাযিল করা হয়: "আর আপনি বলুন: হে আমার প্রতিপালক! আমাকে প্রবেশ করান সত্যের সাথে প্রবেশ করানো এবং আমাকে বের করুন সত্যের সাথে বের করানো। আর আপনার পক্ষ থেকে আমার জন্য সাহায্যকারী ক্ষমতা (বা শক্তি) নির্ধারণ করুন।" (সূরা আল-ইসরা: ৮০)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده فيه لين من أجل قابوس بن أبي ظَبْيان: جَرير: هو ابن عبد الحميد.وأخرجه أحمد 3/ (1948)، والترمذي (3139) من طريق جَرير بن عبد الحميد بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وتقدَّم برقم (2993) من طريق سفيان الثوري عن قابوس بن أبي ظبيان.وجاء في رواية أبي عمارة حمزة بن القاسم الكوفي عن جَرير عند أبي عمر حفص بن عمر الدُّوري في "جزء قراءات النبي صلى الله عليه وسلم " (74) أنَّ الميم في كلمتي "مدخل" و "مخرج" بالرفع، أي: بالضم، وهذا على وفق قراءة العشرة، خلافًا لرواية الثوري عن قابوس المتقدمة برقم (2993) حيث ضبطت فيهما الميم بالفتح. وهي قراءة شاذّة.
4306 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله الشافعي، حدثنا إسحاق بن الحسن، حدثنا حسين بن محمد المَرْوَرُّوذي، حدثنا شيبان بن عبد الرحمن، عن قَتَادة: قوله: {وَقُلْ رَبِّ أَدْخِلْنِي مُدْخَلَ صِدْقٍ وَأَخْرِجْنِي مُخْرَجَ صِدْقٍ} فأخرجه الله من مكة إلى الهجرة بالمدينة مُخرَجَ صِدْقٍ، وأدخله المدينة مُدخَلَ صِدْقٍ، قال: ونبيُّ الله صلى الله عليه وسلم قد عَلِم أنه لا طاقةَ له بهذا الأمر إلا بُسلطان، فسأل {سُلْطَانًا نَصِيرًا} لكتابِ الله وحُدودِ الله ولفرائض الله، ولإقامة كتاب الله، وإنَّ السُّلطان عِزةٌ من الله جعلها بين أظهُر عِبادِه، لولا ذلك لأغارَ بعضُهم على بعضٍ، وأكلَ شديدُهم ضعيفَهم [1].
কাতাদাহ থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী: "বলো, হে আমার প্রতিপালক! আমাকে প্রবেশ করাও সত্যতার সাথে প্রবেশ করানো, আর আমাকে বের করো সত্যতার সাথে বের করানো।" অতঃপর আল্লাহ তাঁকে (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) মক্কা থেকে হিজরতের মাধ্যমে মদীনায় সত্যতার সাথে বের করলেন এবং তাঁকে মদীনায় সত্যতার সাথে প্রবেশ করালেন। তিনি (কাতাদাহ) বলেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জানতেন যে, এই কাজটি (দ্বীনের প্রতিষ্ঠা) ক্ষমতা (শাসন) ব্যতীত সম্পন্ন করা সম্ভব নয়। তাই তিনি (পরের আয়াতে, অর্থাৎ ১৭:৮০ এর শেষে) আল্লাহর কিতাব, আল্লাহর সীমারেখা, আল্লাহর ফরযসমূহ এবং আল্লাহর কিতাবকে প্রতিষ্ঠা করার জন্য "সাহায্যকারী ক্ষমতা" চাইলেন। নিশ্চয়ই ক্ষমতা (শাসন ব্যবস্থা) আল্লাহর পক্ষ থেকে এক মর্যাদা, যা তিনি তাঁর বান্দাদের মাঝে স্থাপন করেছেন। যদি তা না থাকত, তবে তাদের কেউ কেউ অপরের উপর আক্রমণ করত, আর তাদের শক্তিশালীরা দুর্বলদের গ্রাস করে নিত।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات. قتادة: هو ابن دِعامةَ السَّدُوسي.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 517 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه يحيى بن سلام في "تفسيره" 1/ 158، والطبري في "تفسيره" 15/ 149 و 150 - 151 من طريق سعيد بن أبي عروبة، وعبد الرزاق في "تفسيره" 1/ 389، والطبري 15/ 149 من طريق معمر بن راشد، كلاهما عن قتادة. غير أن سعيدًا قال في روايته: {مُدْخَلَ صِدْقٍ} الجنة.
4307 - أخبرنا الأستاذ أبو الوليد وأبو بكر بن عبد الله، قالا: أخبرنا الحسن بن سفيان، حدثنا أبو موسى الأنصاري، حدثنا سعد بن سعيد، حدثني أخي، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "اللهمّ إنك أخرجْتَني من أحبِّ البلاد إليَّ، فأسكِنّي أحبَّ البلادِ إليك"، فأسكنه اللهُ المدينةَ [1].هذا حديث رواته مَدنيُّون من بيت أبي سعيد المَقْبُري.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "হে আল্লাহ! নিশ্চয়ই আপনি আমাকে এমন ভূমি থেকে বের করে দিয়েছেন, যা আমার কাছে সবচেয়ে প্রিয়, তাই আপনি আমাকে আপনার কাছে সবচেয়ে প্রিয় ভূমিতে বসবাসের ব্যবস্থা করে দিন।" ফলে আল্লাহ তাঁকে মদীনায় বসবাসের ব্যবস্থা করে দিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده واهٍ بمرةٍ من أجل عبد الله بن سعيد أخي سَعْد - وهو المقبُري - فهو متروك الحديث، وأخوه سعد ليِّن الحديث، ثم هو منقطع، لأنَّ عبد الله بن سعيد المقبري لم يدرك أبا هريرة. وقد حكم الذهبي في "تلخيصه" بوضعه، وكذلك قال ابن تيمية في "مجموع الفتاوى" 18/ 125: حديث باطل كذب، وسبقهما إلى الحكم بوضعه ابن عبد البر في "الاستذكار" (10272) فقال: حديث لا يصح عند أهل العلم بالحديث، ولا يختلفون في نكارته ووضعه.قلنا: وحجتهم في الحكم بوضعه مع شدة وهاء سنده مخالفتُه للصحيح الثابت عنه صلى الله عليه وسلم أن مكة هي أحب البلاد إلى الله، كما في حديث عبد الله بن عدي بن حمراء الآتي برقم (4316)، وإسناده صحيح.وأما حديث أبي هريرة، فقد أخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 519 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وقد روي عن الحارث بن هشام مثل هذا الحديث كما سيأتي عند المصنف برقم (5292/ 1)، إلّا أنه من رواية محمد بن عمر الواقدي، ولم يتابع عليه، بل ثبتت نكارة متنه ومخالفته للحديث الصحيح كما سبق. قال: وهذه الرؤيا غير الرؤيا السابقة (يعني التي تقدم ذكرها عند الحديث 4304) من حديث أبي موسى التي تردّد فيها النبي صلى الله عليه وسلم كما سبق، قال ابن التين: كأنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أُري دار الهجرة بصفة تجمع المدينة وغيرها، ثم أُري الصفة المختصة بالمدينة فتعيّنتْ.
4308 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الربيع بن سُليمان، حدثنا أَسَد بن موسى، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني يونس، عن الزُّهْري، عن عُرْوة، عن عائشة، قالت: قال النبي صلى الله عليه وسلم للمسلمين: "قد أُرِيتُ دارَ هِجْرتكم، أُريتُ سَبْخَةً ذاتَ نَخْلٍ بين لابَتَينِ"، وهما الحَرّتان [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه!
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মুসলমানদেরকে বললেন: "আমাকে তোমাদের হিজরতের স্থান দেখানো হয়েছে। আমি এমন এক পঙ্কিল ভূমি দেখেছি যেখানে খেজুর গাছ আছে এবং যা দুই 'লাবার' (কালো পাথরযুক্ত স্থান) মধ্যবর্তী স্থানে অবস্থিত।" আর সেই দুটি হলো 'আল-হাররাতান' (মদিনার দুই প্রস্তরময় ভূমি)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. يونس: هو ابن يزيد الأيلي.وأخرجه البخاري (2297) تعليقًا من طريق ابن المبارك، عن يونس بن يزيد بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 42/ (25626)، وابن حبان (6277) و (6868) من طريق معمر بن راشد، والبخاري (2297) و (3905) من طريق عُقيل بن خالد الأيلي، كلاهما عن الزُّهري، به. واستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وقوله: "وهما حَرّتان"، هو من قول الزُّهري، كما جزم به الحافظ ابن حجر في "الفتح" 11/ 446، وقال: الحَرّة: أرض حجارتها سُودٌ. قال: وهذه الرؤيا غير الرؤيا السابقة (يعني التي تقدم ذكرها عند الحديث 4304) من حديث أبي موسى التي تردّد فيها النبي صلى الله عليه وسلم كما سبق، قال ابن التين: كأنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أُري دار الهجرة بصفة تجمع المدينة وغيرها، ثم أُري الصفة المختصة بالمدينة فتعيّنتْ.
4309 - حدثنا أبو بكر أحمد بن إسحاق، حدثنا زياد بن الخليل التُّستَري، حدثنا كَثير بن يحيى، حدثنا أبو عَوانة، عن أبي بَلْجٍ، عن عمرو بن مَيمون، عن ابن عبّاس قال: شَرَى عليٌّ نفسَه ولبس ثوبَ النبي صلى الله عليه وسلم، ثم نام مكانَه، وكان المشركون يَرمُون رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، وقد كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ألبَسَه بُرْدَه، وكانت قريش تريدُ أن تقتلَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فجعلوا يَرمُون عليًا، ويُرَونه النبيَّ صلى الله عليه وسلم وقد لبِسَ بُرْدَه، وجعلَ عليّ يَتَصَوَّرُ، فإذا هو عليٌّ، فقالوا: إنك لَلَئيمٌ، إنك لَتتضوَّر وكان صاحبُك لا يَتضوَّر، ولقد استَنْكرناه منكَ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، وقد رواه أبو داود الطَّيَالسيُّ وغيرُه عن أبي عَوانة، بزيادةِ ألفاظٍ.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজ জীবনকে (আল্লাহর কাছে) বিক্রি করে দিলেন এবং নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পোশাক পরিধান করলেন, অতঃপর তিনি তাঁর (নবীর) বিছানায় ঘুমিয়ে গেলেন। মুশরিকরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে (পাথর বা কঙ্কর) নিক্ষেপ করছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে তাঁর চাদর পরিয়ে দিয়েছিলেন। কুরাইশরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হত্যা করতে চেয়েছিল। তারা আলীর দিকে নিক্ষেপ করতে লাগল, আর তারা তাঁকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মনে করছিল, কারণ তিনি তাঁর চাদর পরিহিত ছিলেন। আলী (আঘাতের কারণে) যন্ত্রণায় কাতর হয়ে কাতরাতে শুরু করলেন। যখন তারা দেখল যে ইনি আলী, তখন তারা বলল: তুমি তো হীন (কাপুরুষ)! তুমি যন্ত্রণায় কাতরাচ্ছ, অথচ তোমার সাথী (নবী) তো এমন কাতরাতেন না। আমরা তোমার থেকে (এই কাতড়ানো) দেখে সন্দেহ করেছিলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده فيه مقال من أجل أبي بَلْج - واسمه يحيى بن سُليم، ويقال: ابن أبي سُليم - كما سيأتي بيانه برقم (4702) حيث رواه من طريق يحيى بن حماد عن أبي عوانة - وهو الوضّاح بن عبد الله اليَشْكري - ضمن حديث طويل. عمرو بن ميمون: هو الأَوْدي.وقد روي نحو هذه القصة من وجه آخر عن ابن عبّاس عند ابن إسحاق في "السيرة النبوية" كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 480 من طريق زياد بن عبد الله البكائي، وكما في "دلائل النبوة" لأبي نعيم (154) من طريق إبراهيم بن سعد، كلاهما عن محمد بن إسحاق، عمن لا يُتَّهم، عن عبد الله بن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عبّاس. وإسناده ضعيف لجهالة شيخ ابن إسحاق، وابن أبي نجيح كان يدلس عن مجاهد.ورواه بعضهم عن ابن إسحاق عن ابن أبي نجيح مباشرة، منهم سلمة بن الفضل الأبرش عند الطبري في "تاريخه" 2/ 370، وأبي نعيم في "الدلائل" (154)، ويحيى بن سعيد الأُموي عند الطبري في "تفسيره" 9/ 227، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1686 - 1687، وذكر سلمة في روايته سماع ابن إسحاق من ابن أبي نجيح!وروي نحو هذه القصة أيضًا من وجه ثالث عن ابن عبّاس عند عبد الرزاق في "مصنفه" (9743)، وعنه أحمد 5/ (3251) وغيره، عن معمر، عن عثمان الجَزَري، عن مِقْسَم عن ابن عبّاس. وإسناده ضعيف. ويشهد لبعض هذه القصة أيضًا مرسل محمد بن كعب القُرَظي عند ابن إسحاق في "السيرة" كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 483، ومن طريقه الطبري في "التاريخ" 2/ 372. وفي إسناده يزيد بن زياد - وهو القرظي مولى بني هاشم - وهو مجهول الحال.قوله: يرمُون، أي: بالحجارة، كما نُصَّ عليه في الرواية الآتية برقم (4702).وقوله: يتضوَّر، أي: يتلوَّى ويتقلَّب ظهرًا لبطن.
4310 - وقد حدّثَنا بَكْر بن محمد الصَّيرَفي بمَرُو، حدثنا عُبيد بن قُنفُذ البَزّار، حدثنا يحيى بن عبد الحميد الحِمّاني، حدثنا قيس بن الربيع، حدثنا حَكيم بن جُبَير، عن علي بن الحسين، قال: إِنَّ أَوّل من شَرَى نفسَه ابتغاءَ رضوان الله عليُّ بنُ أبي طالب، وقال عليٌّ عند مَبِيتِه على فِراش رسول الله صلى الله عليه وسلم:وَقَيتُ بنفسي خيرَ مَن وَطِئ الحَصا … ومَن طافَ بالبيتِ العَتيقِ وبالحِجْرِرسولَ إلهٍ خافَ أن يمكُروا به … فنجَّاه ذو الطَّول الإلهُ من المكْرِوباتَ رسولُ اللهِ في الغارِ آمِنًا … مُوَقًّى وفي حفظِ الإلهِ وفي سَتْرِوبِتُّ أُراعِيهم وما يتمنَّونني … وقد وَطَّنْتُ نفسي على القَتْلِ والأَسْرِ [1]
আলী ইবনুল হুসাইন থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আল্লাহর সন্তুষ্টি লাভের উদ্দেশ্যে সর্বপ্রথম যিনি তাঁর জীবনকে বিক্রি করে দিয়েছিলেন, তিনি হলেন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর বিছানায় রাত্রি যাপনের সময় আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন:
আমি আমার জীবন দিয়ে রক্ষা করেছিলাম সেই শ্রেষ্ঠ ব্যক্তিকে,
যিনি নুড়িপাথরের উপর হেঁটেছিলেন,
এবং যিনি প্রাচীন ঘর (কা'বা) ও হাতিমের চারপাশে তাওয়াফ করেছিলেন।
আল্লাহর সেই রাসূলকে, যাঁর বিরুদ্ধে তারা ষড়যন্ত্রের আশঙ্কা করেছিল;
অতঃপর সেই শক্তিমান ইলাহ (আল্লাহ) তাঁকে ষড়যন্ত্র থেকে মুক্তি দিয়েছিলেন।
আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গুহায় রাত কাটালেন নিরাপদে,
সুরক্ষিত অবস্থায়, আল্লাহর হেফাযত ও আবরণের মধ্যে।
আর আমি রাত কাটালাম তাদের (শত্রুদের) উপর নজর রেখে, যদিও তারা আমাকে কামনা করছিল না;
আর আমি আমার মনকে হত্যা বা বন্দী হওয়ার জন্য প্রস্তুত করে রেখেছিলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف مَن بَين عُبيد بن قُنفذ وعلي بن الحسين، وجهالة عبيد، وهو مرسل أيضًا.
4311 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن موسى القُرشي، حدثنا عبد الله بن داود، حدثنا نُعيم بن حَكيم، حدثنا أبو مريم الأَسَدِي، عن عليٍّ، قال: لما كان الليلةُ التي أمرني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن أَبِيتَ على فراشِه، وخَرَج من مكة مهاجرًا، انطَلَقَ بي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى الأصنام، فقال: "اجلِسْ" فجلسْتُ إلى جنبِ الكعبة، ثم صَعِدَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على مَنكِبِي، ثم قال: "انهَضْ" فنَهَضْتُ به، فلما رأى ضعفي تحته، قال: "اجلس"، فجلستُ، فأنزلته عني، وجلس لي رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم قال لي: "يا علي، اصعد على منكبي" فصَعِدتُ على منكبه، ثم نهض بي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، خُيل إليَّ أني لو شئتُ نِلْتُ السماء، وصَعِدتُ إلى الكعبة وتَنحَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فألقيتُ صنمهم الأكبر، وكان من نُحاس مُولَّدًا بأوتادٍ من حديد إلى الأرض، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "عالجه" فعالجت، فما زلت أعالجه ورسول الله صلى الله عليه وسلم يقولُ: "إيه إيه" فلم أَزَلْ أُعالجه حتى استَمْكَنْتُ منه، فقال: "دُقَّهُ" فدقَقْتُه فكسَرتُه، ونَزلتُ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন সেই রাত এলো যেদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তাঁর বিছানায় শুয়ে থাকতে বললেন এবং তিনি মক্কা থেকে হিজরত করে বের হলেন, (এর আগে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে নিয়ে প্রতিমাগুলোর কাছে গেলেন এবং বললেন, "বস।" আমি কাবার পাশে বসলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাঁধে আরোহণ করলেন এবং বললেন, "ওঠো।" আমি তাঁকে নিয়ে উঠলাম। যখন তিনি আমার নিচে আমার দুর্বলতা দেখতে পেলেন, তখন বললেন, "বসে যাও।" আমি বসে পড়লাম এবং তাঁকে আমার থেকে নামিয়ে দিলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার জন্য বসলেন এবং আমাকে বললেন, "হে আলী! আমার কাঁধে আরোহণ করো।" আমি তাঁর কাঁধে আরোহণ করলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে নিয়ে উঠে দাঁড়ালেন। আমার মনে হলো আমি যদি চাই তবে যেন আকাশ স্পর্শ করতে পারি। আমি কাবাঘরের উপরে উঠলাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সরে গেলেন। অতঃপর আমি তাদের সবচেয়ে বড় প্রতিমাটি ফেলে দিলাম। সেটি ছিল পিতলের তৈরি এবং লোহার পেরেক দিয়ে মাটির সাথে যুক্ত করা ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এটি নিয়ে কাজ করো।" আমি এটি নিয়ে কাজ করতে লাগলাম। আমি তা নিয়ে কাজ করতে থাকলাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতে থাকলেন, "এগিয়ে যাও, এগিয়ে যাও (ই-য়িহ, ই-য়িহ)।" আমি তা নিয়ে কাজ করতে করতে যখন এটিকে ধরে ফেলতে সক্ষম হলাম, তখন তিনি বললেন, "ভেঙে দাও।" আমি তখন তা পিষে টুকরো টুকরো করে দিলাম এবং নেমে এলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذا الإسناد فيه محمد بن موسى القُرشي - وهو محمد بن يونس بن موسى الكديمي وهو ضعيف جدًّا، لكن تقدم الحديث برقم (3427) من غير طريقه عن نعيم بن حكيم، وأبو مريم الأسدي، كذا نُسب هنا أسديًا، والمعروف في نسبته أنه ثقفي أو حنفي، كما جاء منسوبًا في بعض الروايات، وبنو حنيفة يرجعون في نسبهم إلى أسد بن ربيعة، فالظاهر أن بعض الرواة نسب أبا مريم لجد بني حنيفة الأعلى، واسم أبي مريم هذا قيس، فيما قاله غير واحد من أهل العلم. وشعبة، عن قتادة، عن أنس أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 73، وهذا دليل على عدم ضبطه للرواية واضطرابه فيها.وأخرجه ابن عساكر 38/ 168 من طريق عبيد بن أحمد الحمصي، عن سليمان بن عبد الحميد البهراني، عن محمد بن عبد الله، عن المقرئ، عن مسعر وحده، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري الطائي، قال: سمعت عليًا، فذكره. وقال ابن عساكر: غريب جدًّا لم أكتبه إلّا من هذا الوجه. قلنا: وعبيد بن أحمد مجهول الحال، وشيخه سليمان رُمي بالنصب، وهو مختلف فيه، وأفحش النسائي القول فيه ونسبه إلى الكذب، فهو آفته، وذكر فيه تصريح أبي البختري بسماعه من عليّ، وقد نفى غير واحدٍ من أهل العلم إدراكه لعلي، بَلْهَ سماعه منه.
4312 - حدثنا علي بن محمد الحمادي بمَرُو، حدثنا أبو يعقوب إسحاق بن إبراهيم السَّرْخَسي، حدثنا عبد الرحمن بن علقمة المروزي، حدثنا عبد الله بن المبارك، عن شُعبة ومسعر، عن عمرو بن مُرّة، عن أبي البختري، عن علي: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال لجبريل عليه السلام: "مَن يُهاجِرُ معي؟ " قال: أبو بكر الصديق [1]. هذا حديث صحيح غريب الإسناد والمتن، ولم يخرجاه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জিবরাঈল (আঃ)-কে বললেন, "কে আমার সাথে হিজরত করবে?" তিনি (জিবরাঈল) বললেন: আবু বকর সিদ্দীক।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، علي بن محمد الحمادي - وهو علي بن محمد بن عبد الله بن محمد بن حبيب أبو أحمد الحبيبي - قال الدارقطني: يحدث بنسخ وأحاديث مناكير، ونعته الحاكم نفسُه مرةً بالكذب ومرةً قال فيه: هو أشهر في اللِّين من أن يُسأل عنه. انظر "تاريخ الإسلام" 7/ 909 و 8/ 35.وقد روي من طريقين أخريين لا يُفرح بهما بتاتًا. وأبو البختري: هو سعيد بن فيروز.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 6/ 289، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 73، من طريق محمد بن عبد العزيز بن حبيب الدينوري، عن معاذ أسد بن عن ابن المبارك، بهذا الإسناد.ومحمد بن عبد العزيز الدينوري منكر الحديث ضعيف بمرّة، وقد روى هذا الخبر بعينه مرة أخرى فأتى به على وجه آخر فرواه عن علي بن إبراهيم المروزي، عن ابن المبارك، عن مسعر وشعبة، عن قتادة، عن أنس أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 30/ 73، وهذا دليل على عدم ضبطه للرواية واضطرابه فيها.وأخرجه ابن عساكر 38/ 168 من طريق عبيد بن أحمد الحمصي، عن سليمان بن عبد الحميد البهراني، عن محمد بن عبد الله، عن المقرئ، عن مسعر وحده، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري الطائي، قال: سمعت عليًا، فذكره. وقال ابن عساكر: غريب جدًّا لم أكتبه إلّا من هذا الوجه. قلنا: وعبيد بن أحمد مجهول الحال، وشيخه سليمان رُمي بالنصب، وهو مختلف فيه، وأفحش النسائي القول فيه ونسبه إلى الكذب، فهو آفته، وذكر فيه تصريح أبي البختري بسماعه من عليّ، وقد نفى غير واحدٍ من أهل العلم إدراكه لعلي، بَلْهَ سماعه منه.
4313 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، عن يحيى بن عبّاد بن عبد الله بن الزبير [عن أبيه] [1] عن أسماء بنت أبي بكر، قالت: لما توجه رسول الله صلى الله عليه وسلم من مكة إلى المدينة ومعه أبو بكر، حَمَل أبو بكر معه جميع ماله خمسة آلافٍ أو ستة آلاف درهم، فأتاني جَدّي أبو قحافة وقد ذهب بصره، فقال: إنَّ هذا والله قد فَجَعَكم بماله مع نفسه، فقلتُ: كلا يا أبتِ، قد تَرَكَ لنا خيرًا كثيرًا، فَعَمَدتُ إلى أحجارٍ فَجَعَلتُهن في كُوّة البيت، وكان أبو بكر يَجعَلُ أمواله فيها، وغَطّيت على الأحجار بثوب، ثم جئتُ فأخذت بيده فوضعتها على الثَّوب، فقال: أما إذا ترك هذا فنَعَمْ، قالت: ووالله ما ترك لنا قليلًا ولا كثيرًا [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.
আসমা বিনত আবী বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আসমা) বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা থেকে মদীনার দিকে রওয়ানা হলেন এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সাথে ছিলেন, তখন আবূ বকর তাঁর সমস্ত সম্পদ—পাঁচ হাজার কিংবা ছয় হাজার দিরহাম—নিয়ে গিয়েছিলেন। তখন আমার দাদা আবূ কুহাফা আমার কাছে এলেন। তিনি অন্ধ হয়ে গিয়েছিলেন। তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! সে (আবূ বকর) তার নিজের সাথে তোমাদের সম্পদ দিয়েও তোমাদের শোকাহত করেছে (অর্থাৎ নিঃস্ব করে ফেলেছে)। আমি বললাম: কখনই না, হে পিতা! তিনি আমাদের জন্য অনেক কল্যাণ (সম্পদ) রেখে গেছেন। এরপর আমি কিছু পাথর নিয়ে ঘরের একটি কুলুঙ্গিতে রাখলাম—যেখানে আবূ বকর তাঁর সম্পদ রাখতেন—এবং পাথরগুলোর ওপর একটি কাপড় দিয়ে ঢেকে দিলাম। তারপর আমি তাঁর (আবূ কুহাফার) কাছে এসে তাঁর হাত ধরলাম এবং কাপড়ের ওপর রাখলাম। তিনি বললেন: যদি সে এটা রেখে যায়, তবে হ্যাঁ (এটা যথেষ্ট)। আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর শপথ, সে (আবূ বকর) আমাদের জন্য সামান্য বা বেশি কিছুই রেখে যাননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من رواية أبي طاهر المخلّص عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 69/ 13 حيث رواه من طريق أحمد بن عبد الجبار، وهو ثابت أيضًا في سائر الروايات عن ابن إسحاق، على أنه لا يُعرف ليحيى رواية عن جدة أبيه أسماء.
[2] إسناده حسن من أجل ابن إسحاق - وهو محمد بن إسحاق بن يسار صاحب "السيرة". وقد صرّح بسماعه عند أحمد.وأخرجه أحمد 44 / (26957) عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد عن أبيه، عن ابن إسحاق، بهذا الإسناد.
4314 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا موسى بن الحسن بن عبّاد، حدثنا عفان بن مسلم، حدثنا السَّرِيُّ بن يحيى، حدثنا محمد بن سيرين، قال: ذُكِرَ رجالٌ على عهد عمر، فكأنهم فَضَّلُوا عمر على أبي بكر، قال: فبلغ ذلك عمر، فقال: والله ليلةٌ من أبي بكر خيرٌ من آلِ عُمر، وليوم من أبي بكر خير من آل عمر، لقد خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم لينطلق إلى الغار ومعه أبو بكر، فجعل يمشي ساعة بين يديه، وساعة خلْفَه، حتى فَطِن له رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "يا أبا بكر، ما لك تمشي ساعة بين يدي، وساعةً خَلْفي؟ " فقال: يا رسول الله، أذكر الطلب فأمشي خلفك، ثم أذكر الرَّصد، فأمشي بين يديك، فقال: "يا أبا بكر، لو كان شيء، أحببت أن يكون بك دوني؟ " قال: نعم والذي بعثك بالحقِّ، ما كانت لتكونَ من مُلِمَّةٍ إِلّا أن تكون بي دونَك [1]، فلما انتهيا إلى الغارِ قال أبو بكر: مكانك يا رسول الله، حتى أستبرئ لك الغار، فدخل واستبرأه، حتى إذا كان في أعلاه ذكر أنه لم يستبرئ الجِحَرةَ، فقال: مكانك يا رسول الله، حتى أستبرئ الجِحَرةَ، فدخل واستبرأ، ثمّ قال: انزِلْ يا رسول الله، فنزل، فقال عمر: والذي نفسي بيده لتلك الليلةُ خيرٌ من آل عُمر [2]. هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين لولا إرسال فيه، ولم يخرجاه.
মুহাম্মদ ইবনু সীরীন থেকে বর্ণিত, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যমানায় কিছু লোকের আলোচনা করা হলো। তারা যেন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর প্রাধান্য দিচ্ছিল। বর্ণনাকারী বলেন: এ বিষয়টি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি রাত উমরের পরিবারের (সমস্ত আমল) চেয়ে উত্তম। আর আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি দিন উমরের পরিবারের (সমস্ত আমল) চেয়ে উত্তম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গার (গুহা)-এর দিকে রওনা হওয়ার জন্য বের হলেন এবং তাঁর সাথে আবূ বাকরও ছিলেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন কিছু সময় তাঁর সামনে হাঁটতেন এবং কিছু সময় তাঁর পিছনে হাঁটতেন। এভাবে চলতে দেখে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিষয়টি লক্ষ্য করলেন এবং বললেন: "হে আবূ বাকর! কী হলো তোমার? তুমি একবার আমার সামনে হাঁটছো, আবার একবার আমার পিছনে হাঁটছো?" তিনি বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি যখন শত্রুদের খোঁজাখুঁজির কথা মনে করি, তখন আপনার পিছনে হাঁটি। আবার যখন অতর্কিত আক্রমণের কথা মনে করি, তখন আপনার সামনে হাঁটি।" তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আবূ বাকর! যদি কোনো বিপদ আসে, তুমি কি চাও তা তোমার উপর আসুক, আমার উপর নয়?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, সেই সত্তার কসম, যিনি আপনাকে সত্য দিয়ে প্রেরণ করেছেন! এমন কোনো গুরুতর বিষয় হতে পারে না, যা আপনার পরিবর্তে আমার উপর না আসুক।" যখন তাঁরা গুহার কাছে পৌঁছলেন, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আপনি এখানেই অপেক্ষা করুন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি আপনার জন্য গুহাটি পরিষ্কার করে পরীক্ষা করে দেখি।" অতঃপর তিনি ভেতরে প্রবেশ করলেন এবং পরিষ্কার করলেন। যখন তিনি গুহার উপরিভাগে পৌঁছলেন, তখন তাঁর মনে পড়ল যে তিনি গর্তগুলো ভালোভাবে পরীক্ষা করেননি। তখন তিনি বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি অপেক্ষা করুন, আমি আপনার জন্য গর্তগুলোও পরীক্ষা করে দেখি।" অতঃপর তিনি প্রবেশ করে গর্তগুলো পরীক্ষা করলেন। এরপর বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি নেমে আসুন।" অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নামলেন। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "যার হাতে আমার জীবন, তাঁর কসম! সেই রাত উমরের পরিবারের (সমস্ত আমল) চেয়েও উত্তম।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في النسخ الخطية: بك دوني، وهو خطأ، وجاء على الصواب في رواية البيهقي في "الدلائل" 2/ 476 عن أبي عبد الله الحاكم. ورُوي نحو هذه القصة أيضًا من حديث عمر بن الخطاب موصولًا عند أبي بكر الدينوري في "المجالسة" (2238)، وأبي الليث السمرقندي في "تفسيره" 2/ 58 - 59، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (2426)، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 476 - 477، وابن عساكر 30/ 79 - 80. وأورده الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 672، وقال: هو منكر، وآفته من عبد الرحمن بن إبراهيم الراسبي، فإنه ليس بثقة مع كونه مجهولًا. قلنا: وفيه أيضًا فُرات بن السائب، وهو متروك الحديث.ورويت قصة تفتيش أبي بكر الصديق الغاز قبل دخول رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه من وجوه متعددة فيها مقال كلها، انظرها في "الشريعة" للآجري (1275 - 1277)، وأقوى منها مرسلا ابن سيرين وابن أبي مليكة.والمُلمّة: النازلة الشديدة من نوازل الدهر.والجِحَرَة: جمع جُحر، وهو كل شيء يحتفره الهوام والسِّباع لأنفسها.
[2] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه مرسل، لأنَّ محمد بن سيرين لم يُدرك عمر بن الخطاب. وقد رُوي هذا الخبر من وجوه أخرى.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 476 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن بطة في "الإبانة" 9/ 531 و 834 من طريق أحمد بن عبد الله بن يونس، عن السري بن يحيى، به.ويشهد له مرسل عبد الله بن أبي مُلَيكة عند أحمد في "فضائل الصحابة" (22)، والأزرقي في "أخبار مكة" 2/ 25، والفاكهي في "أخبار مكة" (2410)، واللالكائي في "شرح أصول الاعتقاد" (2425)، وابن عساكر في تاريخ دمشق 30/ 81. ورجاله ثقات. ورُوي نحو هذه القصة أيضًا من حديث عمر بن الخطاب موصولًا عند أبي بكر الدينوري في "المجالسة" (2238)، وأبي الليث السمرقندي في "تفسيره" 2/ 58 - 59، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (2426)، والبيهقي في "الدلائل" 2/ 476 - 477، وابن عساكر 30/ 79 - 80. وأورده الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 672، وقال: هو منكر، وآفته من عبد الرحمن بن إبراهيم الراسبي، فإنه ليس بثقة مع كونه مجهولًا. قلنا: وفيه أيضًا فُرات بن السائب، وهو متروك الحديث.ورويت قصة تفتيش أبي بكر الصديق الغاز قبل دخول رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه من وجوه متعددة فيها مقال كلها، انظرها في "الشريعة" للآجري (1275 - 1277)، وأقوى منها مرسلا ابن سيرين وابن أبي مليكة.والمُلمّة: النازلة الشديدة من نوازل الدهر.والجِحَرَة: جمع جُحر، وهو كل شيء يحتفره الهوام والسِّباع لأنفسها.
4315 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن أحمد بن إسحاق الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجَهم بن جَبَلة التّيمي [1]، حدثنا موسى بن المساوِر، حدثنا عبد الله بن معاذ الصَّنْعاني، عن معمر بن راشد، عن الزهري، قال: أخبرني عبد الرحمن بن مالك المُدْلِجي - وهو ابن أخي سُراقة بن جُعْشُم - أنَّ أباه أخبره، أنه سمع سراقة بن جُعْشُم يقول: جاءتنا رسُلُ كفار قريش يَجعَلُون في رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر ديةً لكلِّ واحدٍ منهما لمن قتلهما أو أسرَهُما، فبينا أنا جالس في مجلس من مجالس قومي من بني مدلج، أقبل منهم رجل حتى قام علينا، فقال: يا سراقة، إني رأيتُ آنفًا أسودةً بالساحل، أُراها محمدًا وأصحابه، قال سُراقة: فعرفتُ أنهم هم، فقلت لهم: إنهم ليسوا بهم، ولكني رأيتُ فلانًا وفلانًا انطلقُوا بُغاةً.قال: ثم ما لبثت في المجلس إلا ساعة حتى قمتُ فدخلت بيتي، فأمرتُ جاريتي أن تُخرج إلي فرسي، وهي وراءَ، أكَمَةٍ، فَحَبَسَتْها علي، وأخذتُ رُمحِي، فخرجتُ من ظهر البيت فخَطَطتُ بزُجِّهِ إلى الأرضِ وخَفَضْتُ عاليةَ الرُّمح، حتى أتيتُ فرسي فركبتها فدفعتها [2] تُقرِّبُ بي، حتى رأيتُ أسودَتهما، فلما دنوت منهم حيث أُسمِعهم الصوتَ عَثَر فرسي، فخَرَرتُ عنها، فقمتُ فأهوَيتُ بيدي إلى كنانتي فاستخرجت الأزلام، فاستقسمتُ بها، فخرج الذي أكره أن لا أضُرَّهم، فعصيتُ الأزلام فركبتُ فرسي فدفعتها تُقرّب بي، حتى إذا دنوت منهم سمعت قراءة النبي صلى الله عليه وسلم، وهو لا يلتفتُ وأبو بكر يُكثر الالتفات، فساخَتْ يدا فرسي في الأرض حتى بلغتا الرُّكبتين، فخَرَرْتُ عنها، ثم زَجَرتُها فنهضَتْ، فلم تَكَدْ تَخرج يداها، فلما استوت قائمةً إذا ليديها عُثَانُ [3] ساطِعٌ في السماء - قال عبد الله: يعني الدخان الذي يكون من غير نار - ثم أخرجتُ الأزلام، فاستقسَمْتُ بها، فخرج الذي أكره أن لا أضُرَّهما، فناديتهما بالأمان فوقفا، فركبتُ فرسي حتى جئتُهما، فوقع في نفسي حين لقيتُ ما لقِيتُ من الحبس عليهم أن سيظهرُ أمرُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت: إنَّ قومَك قد جعلوا فيك الدِّيَةَ، وأخبرتُهم من أخبار سَفَرِهم وما يريدُ الناس بهم، وعرضتُ عليهم الزاد والمتاع، فلم يَرْزَؤُوني شيئًا، ولم يسألوني إلا أن قالوا: اخْفِ عنا، فسألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يكتب لي كتابَ مُوادَعَةِ آمَنُ به، فأمر عامر بن فهيرة مولى أبي بكر فكتب لي في رقعة من أدم، ثم مَضَيا [4]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه [5].
সুরাকাহ ইবনু জু'শুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরাইশ কাফেরদের দূতরা আমাদের কাছে এলো এই মর্মে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এবং আবূ বকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মধ্যে যিনিই তাদের দু’জনের একজনকে হত্যা বা বন্দী করতে পারবে, তাকে একজনের জন্য রক্তমূল্য (পুরস্কার) দেওয়া হবে।
আমি যখন বানী মুদলিজ গোত্রের এক মজলিসে বসেছিলাম, তখন তাদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি আমাদের কাছে এলো এবং দাঁড়ালো। সে বলল: হে সুরাকাহ! আমি এইমাত্র উপকূলের দিকে কিছু কালো ছায়া দেখেছি। আমার ধারণা, তারা হলেন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথীগণ। সুরাকাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বুঝতে পারলাম যে তারাই, কিন্তু আমি তাদের (উপস্থিত লোকদের) বললাম: তারা তারা নন, বরং আমি দেখেছি যে অমুক অমুক লোক শিকারের সন্ধানে রওনা হয়েছে।
তিনি বলেন: এরপর আমি মজলিসে মাত্র এক মুহূর্ত অপেক্ষা করে উঠে পড়লাম এবং বাড়িতে প্রবেশ করলাম। আমি আমার দাসীকে আদেশ করলাম, টিলার আড়ালে থাকা আমার ঘোড়াটিকে বের করে আনতে। সে সেটিকে আমার জন্য প্রস্তুত করে রাখল। আমি আমার বর্শাটি নিলাম, তারপর বাড়ির পেছন দিক দিয়ে বেরিয়ে পড়লাম এবং বর্শার ফলা মাটির সাথে ঘষে নিচু করে রাখলাম। এরপর আমি ঘোড়ার কাছে এসে তাতে আরোহণ করলাম এবং দ্রুত গতিতে চলতে লাগলাম, যতক্ষণ না তাদের দু’জনের কালো ছায়া দেখতে পেলাম।
যখন আমি তাদের কাছাকাছি পৌঁছলাম, যেখান থেকে আমার আওয়াজ তারা শুনতে পাবে, তখন আমার ঘোড়াটি হোঁচট খেলো, ফলে আমি তা থেকে পড়ে গেলাম। আমি উঠে আমার তূণের দিকে হাত বাড়িয়ে ভাগ্য-নির্ণায়ক তীরগুলো বের করলাম এবং সেগুলোর মাধ্যমে লটারি করলাম। কিন্তু এমন ফলাফল এলো যা আমার অপছন্দ ছিল (অর্থাৎ তাদের ক্ষতি না করার নির্দেশ)। আমি সেই তীরগুলোর নির্দেশ অমান্য করলাম এবং আমার ঘোড়ায় আরোহণ করে দ্রুত গতিতে ছুটতে লাগলাম। যখন আমি তাদের আরও কাছে গেলাম, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তিলাওয়াত শুনতে পেলাম। তিনি কোনো দিকে ফিরে তাকাচ্ছিলেন না, কিন্তু আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘন ঘন ফিরে তাকাচ্ছিলেন।
তখন আমার ঘোড়ার সামনের দু'পা হাঁটু পর্যন্ত মাটিতে দেবে গেল। ফলে আমি আবার পড়ে গেলাম। এরপর আমি সেটিকে ধমক দিলাম, ফলে সে উঠে দাঁড়ালো। কিন্তু সে তার পা দু’টি সহজে বের করতে পারছিল না। যখন সে সোজা হয়ে দাঁড়ালো, তখন তার পা দু’টির দিক থেকে আকাশ পর্যন্ত বিস্তৃত ধোঁয়ার মতো একটি জিনিস দেখা গেল— (আব্দুল্লাহ রাবী বলেন: এখানে এমন ধোঁয়াকে বোঝানো হয়েছে যা আগুন ছাড়া হয়)।
এরপর আমি আবার ভাগ্য-নির্ণায়ক তীরগুলো বের করলাম এবং লটারি করলাম। এবারও সেই ফল এলো যা আমি অপছন্দ করতাম (অর্থাৎ তাদের ক্ষতি না করার নির্দেশ)। তখন আমি তাদের উভয়কে নিরাপত্তার জন্য ডাক দিলাম। তারা দু'জন থামলেন। আমি আমার ঘোড়ায় আরোহণ করে তাদের কাছে গেলাম।
তাদের উপর বাধা দেওয়ার কারণে আমি যে অবস্থার সম্মুখীন হলাম, তাতে আমার মনে এই ধারণা জন্মাল যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিষয়টি অবশ্যই প্রকাশ পাবে (অর্থাৎ ইসলামের বিজয় হবে)। তখন আমি বললাম: আপনাদের কওম আপনাদের জন্য রক্তমূল্য (পুরস্কার) ঘোষণা করেছে। এরপর আমি তাদের সফরের খবর এবং লোকেরা তাদের সাথে কী করতে চায়, সে বিষয়ে জানালাম। আমি তাদের খাবার ও আসবাবপত্র দেওয়ার প্রস্তাব দিলাম, কিন্তু তারা আমার কাছ থেকে কিছুই নিলেন না এবং শুধু এটুকুই চাইলেন যে, আপনি আমাদের খবর গোপন রাখুন।
আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুরোধ করলাম যেন তিনি আমাকে একটি নিরাপত্তা চুক্তিপত্র লিখে দেন, যা দ্বারা আমি নিরাপদ থাকব। তিনি আবূ বকরের মুক্ত করা দাস আমের ইবনু ফুহায়রাহকে আদেশ করলেন, আর তিনি আমাকে চামড়ার টুকরায় তা লিখে দিলেন। এরপর তারা দু’জন চলে গেলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: اليمني، وانظر ترجمته في "طبقات المحدثين بأصبهان" لأبي الشيخ 3/ 390 الترجمة (423).
[2] جاء في نسخة على هامش (ب) في الموضعين: فرفعتها، بالراء من الرفع، وهو كذلك في رواية البخاري، وفسّرها ابن الأثير بقوله: أي: كلّفتها المرفوع من السير، وهو فوق الموضوع، ودون العَدْو. قال العيني: ويُروى بالدال. وسيأتي برقم (4474) من طريق عُقيل بن خالد عن الزُّهْري، مختصرًا بذكر جعالة المشركين لمن قتل النبي صلى الله عليه وسلم أو أبا بكر أو أسرهما.أسْوِدَة: هو جمع سواد، وهو الشخص.والأكمة: الرابية المرتفعة عن الأرض من جميع جوانبها.وخططت بزُجّه، أي: أمكنتُ أسفله، والزُّجُ: الحديدة التي في أسفل الرمح.وخفضتُ عاليه، أي: أعلى الرمح، لئلا يظهر بَرِيقُه لمن بَعُد منه، لأنه كره أن يتبعه أحد فيَشْرَكَه في الجعالة.وقوله: "تُقرِّب بي": من التقريب، وهو السير دون العدو وفوق العادة.وقوله: "فخررتُ عنها"، أي: سقطت.والأزلام: السهام التي لا ريش لها ولا نَصل، وكان لهم في الجاهلية هذه الأزلام مكتوب عليها "لا" و "نعم" فإذا اتفق لهم أمر من غير قصد كانوا يخرجونها، فإذا خرج ما عليه "نعم" مضى على عزمه، وإن خرج "لا" انصرف عنه.وقوله: "لم يرزؤوني": من رَزَأَهُ، أي: أصاب من ماله. يعني أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم وصاحبه الصديق لم يأخذا من ماله شيئًا ولم يَنقُصاهُ.
4315 [3] - في النسخ الخطية: غبار، وفي (ب): عثان غبار، وكتبت "عثان" في (ز) فوق كلمة "غبار"، كأنها إشارة إلى تصحيح اللفظة إلى: عثان، وتفسير عبد الله بن معاذ الآتي بعد سطرٍ يدلُّ على صحة كونها "عثان" لأنَّ العثان هو الدخان، وزنًا ومعنًى. وسيأتي برقم (4474) من طريق عُقيل بن خالد عن الزُّهْري، مختصرًا بذكر جعالة المشركين لمن قتل النبي صلى الله عليه وسلم أو أبا بكر أو أسرهما.أسْوِدَة: هو جمع سواد، وهو الشخص.والأكمة: الرابية المرتفعة عن الأرض من جميع جوانبها.وخططت بزُجّه، أي: أمكنتُ أسفله، والزُّجُ: الحديدة التي في أسفل الرمح.وخفضتُ عاليه، أي: أعلى الرمح، لئلا يظهر بَرِيقُه لمن بَعُد منه، لأنه كره أن يتبعه أحد فيَشْرَكَه في الجعالة.وقوله: "تُقرِّب بي": من التقريب، وهو السير دون العدو وفوق العادة.وقوله: "فخررتُ عنها"، أي: سقطت.والأزلام: السهام التي لا ريش لها ولا نَصل، وكان لهم في الجاهلية هذه الأزلام مكتوب عليها "لا" و "نعم" فإذا اتفق لهم أمر من غير قصد كانوا يخرجونها، فإذا خرج ما عليه "نعم" مضى على عزمه، وإن خرج "لا" انصرف عنه.وقوله: "لم يرزؤوني": من رَزَأَهُ، أي: أصاب من ماله. يعني أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم وصاحبه الصديق لم يأخذا من ماله شيئًا ولم يَنقُصاهُ.
4315 [4] - حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل الحسن بن الجهم وموسى بن المُساوِر، وقد توبعا.وأخرجه أحمد 29/ (17591)، وابن حبان (6280) من طريق عبد الرزاق عن معمر، بهذا (29) (17591) (6280) الإسناد. وسيأتي برقم (4474) من طريق عُقيل بن خالد عن الزُّهْري، مختصرًا بذكر جعالة المشركين لمن قتل النبي صلى الله عليه وسلم أو أبا بكر أو أسرهما.أسْوِدَة: هو جمع سواد، وهو الشخص.والأكمة: الرابية المرتفعة عن الأرض من جميع جوانبها.وخططت بزُجّه، أي: أمكنتُ أسفله، والزُّجُ: الحديدة التي في أسفل الرمح.وخفضتُ عاليه، أي: أعلى الرمح، لئلا يظهر بَرِيقُه لمن بَعُد منه، لأنه كره أن يتبعه أحد فيَشْرَكَه في الجعالة.وقوله: "تُقرِّب بي": من التقريب، وهو السير دون العدو وفوق العادة.وقوله: "فخررتُ عنها"، أي: سقطت.والأزلام: السهام التي لا ريش لها ولا نَصل، وكان لهم في الجاهلية هذه الأزلام مكتوب عليها "لا" و "نعم" فإذا اتفق لهم أمر من غير قصد كانوا يخرجونها، فإذا خرج ما عليه "نعم" مضى على عزمه، وإن خرج "لا" انصرف عنه.وقوله: "لم يرزؤوني": من رَزَأَهُ، أي: أصاب من ماله. يعني أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم وصاحبه الصديق لم يأخذا من ماله شيئًا ولم يَنقُصاهُ.
4315 [5] - بل قد أخرجه البخاري كما سيأتي برقم (4474)، فلا يُستدرك عليه. هو ابن سعد، وعقيل: هو ابن خالد الأيلي.وأخرجه ابن ماجه (3108)، وابن حبان (3708) من طريق عيسى بن حماد المصري، والترمذي (3925)، والنسائي (4238) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد 31/ (18716)، والنسائي (4239) من طريق صالح بن كيسان، عن الزهري، به.وسيأتي برقم (5939) من طريق شعيب بن أبي حمزة. عن الزهري.وخالف ابن أخي ابن شهاب فيما سيأتي برقم (5303) فرواه عن عمه، عن محمد بن جبير بن مطعم، عن عبد الله بن عدي فذكر محمد بن جبير بدل أبي سلمة، وهو خطأ.وخالف معمرٌ أيضًا عند أحمد (18717) والنسائي (4240) فرواه عن الزهري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة. فجعله من حديث أبي هريرة، وهو وهم من معمر.وانظر حديث ابن عبّاس السالف برقم (1807).
4316 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أحمد بن إبراهيم بن مِلحان، حدثنا يحيى بن بكير، حدثنا الليث، عن عقيل، عن الزُّهْري، عن أبي سَلَمة، عن عبد الله بن عَدِيّ بن الحَمْراء الزُّهْري، قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على راحلته بالحَزْوَرَةِ [1] يقولُ: "والله إنكِ لَخيرُ أَرضِ اللهِ وأحبُّ أرض الله إلى الله، ولولا أني أُخرجتُ منكِ ما خَرجت [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه.
আবদুল্লাহ ইবনু আদী ইবনুল হামরা আয-যুহরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে তাঁর সওয়ারীর উপর উপবিষ্ট অবস্থায় হাযওয়ারা নামক স্থানে বলতে দেখেছি: "আল্লাহর কসম! নিঃসন্দেহে তুমি আল্লাহর সর্বোত্তম ভূমি এবং আল্লাহর কাছে সবচেয়ে প্রিয় ভূমি। আমাকে যদি তোমার থেকে বের করে দেওয়া না হতো, তবে আমি বের হতাম না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ضُبطت في بعض أصول الحاكم بتشديد الواو، وقال أبو أحمد العسكري في "تصحيفات المحدثين" 1/ 252: أكثرهم يغلطون فيه، فيقولون: بالحَزَورَة، فيفتحون الزاي ويشددون الواو، وهو خطأ. قلنا: وكذلك قال الدارقطني فيما نقله البكري في "معجم ما استعجم" 2/ 444. والحَزْوَرة: سوق مكة ودخلت في المسجد لما زيد فيه. هو ابن سعد، وعقيل: هو ابن خالد الأيلي.وأخرجه ابن ماجه (3108)، وابن حبان (3708) من طريق عيسى بن حماد المصري، والترمذي (3925)، والنسائي (4238) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد 31/ (18716)، والنسائي (4239) من طريق صالح بن كيسان، عن الزهري، به.وسيأتي برقم (5939) من طريق شعيب بن أبي حمزة. عن الزهري.وخالف ابن أخي ابن شهاب فيما سيأتي برقم (5303) فرواه عن عمه، عن محمد بن جبير بن مطعم، عن عبد الله بن عدي فذكر محمد بن جبير بدل أبي سلمة، وهو خطأ.وخالف معمرٌ أيضًا عند أحمد (18717) والنسائي (4240) فرواه عن الزهري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة. فجعله من حديث أبي هريرة، وهو وهم من معمر.وانظر حديث ابن عبّاس السالف برقم (1807).
[2] إسناده صحيح. يحيى بن بكير: هو ابن عبد الله بن بكير، ينسب لجده كثيرًا، والليث: هو ابن سعد، وعقيل: هو ابن خالد الأيلي.وأخرجه ابن ماجه (3108)، وابن حبان (3708) من طريق عيسى بن حماد المصري، والترمذي (3925)، والنسائي (4238) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد.وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد 31/ (18716)، والنسائي (4239) من طريق صالح بن كيسان، عن الزهري، به.وسيأتي برقم (5939) من طريق شعيب بن أبي حمزة. عن الزهري.وخالف ابن أخي ابن شهاب فيما سيأتي برقم (5303) فرواه عن عمه، عن محمد بن جبير بن مطعم، عن عبد الله بن عدي فذكر محمد بن جبير بدل أبي سلمة، وهو خطأ.وخالف معمرٌ أيضًا عند أحمد (18717) والنسائي (4240) فرواه عن الزهري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة. فجعله من حديث أبي هريرة، وهو وهم من معمر.وانظر حديث ابن عبّاس السالف برقم (1807).
4317 - أخبرني أبو أحمد الحسين بن علي، حدثنا علي بن سعيد، حدثنا يونس بن حبيب، حدثنا أبو داود، حدثنا شعبة، عن الأعمش، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال: لما خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم من مكة، قال أبو بكر: إنَّا لله وإنا إليه راجِعُون، أُخرجَ رسول الله صلى الله عليه وسلم لَيَهلِكُن. قال: فنزلت هذه الآية: {أُذِنَ لِلَّذِينَ يُقَاتَلُونَ بِأَنَّهُمْ ظُلِمُوا وَإِنَّ اللَّهَ عَلَى نَصْرِهِمْ لَقَدِيرٌ (39) الَّذِينَ أُخْرِجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ بِغَيْرِ حَقٍّ} [الحج: 39 - 40]، عَرَفَ أبو بكر أنه سيكون قتال [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা থেকে বের হলেন, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন (আমরা তো আল্লাহরই এবং আমরা তাঁর দিকেই প্রত্যাবর্তনকারী)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বের করে দেওয়া হয়েছে, (ফলে) তারা অবশ্যই ধ্বংস হবে।' তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন, তখন এই আয়াত নাযিল হয়: "যাদেরকে (শত্রুরা) আক্রমণ করছে, তাদেরকে (যুদ্ধের) অনুমতি দেওয়া হলো, কারণ তারা অত্যাচারিত; আর নিশ্চয়ই আল্লাহ তাদেরকে সাহায্য করতে সম্পূর্ণরূপে সক্ষম। তারাই যাদেরকে তাদের বাড়িঘর থেকে অন্যায়ভাবে বের করে দেওয়া হয়েছে..." [সূরা আল-হাজ্জ, ৩৯-৪০]। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বুঝতে পারলেন যে, শীঘ্রই যুদ্ধ সংঘটিত হবে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو داود: هو سليمان بن داود الطيالسي، وشُعْبة: هو ابن الحجاج، والأعمش: هو سليمان بن مهران، ومسلم البطين: هو ابن عمران.وقد سلف برقم (2407) من طريق سفيان الثوري عن الأعمش. وتقدم هناك الكلام على القراءة.
4318 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن كامل بن خَلَف القاضي، حدثنا موسى بن إسحاق القاضي، حدثنا مسروق بن المرزبان، حدثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، قال: قال ابن إسحاق: حدثني محمد بن جعفر بن الزبير ومحمد بن عبد الرحمن بن عبد الله بن حصين [1]، عن عُروة بن الزبير، عن عائشة، قالت: لما خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم من الغار إلى الله تعالى مهاجرًا، ومعه أبو بكر وعامر بن فهيرة مُردِفه أبو بكر خَلْفَه، وعبد الله بن أُريقِط الليثي، فَسَلَك بهما أسفل من مكة، ثم مضى بهما حتى هَبَط بهما على الساحل أسفل من عُسفان، ثم استجاز بهما على أسفل أمج، ثم عارض الطريق بعد أن أجاز قديدًا، ثم سَلَكَ بهما الخرّار [2]، ثم أجازَهُما ثَنِيَّةَ المَرَة [3]، ثم سَلَكَ لَفْتا [4]، ثم أجاز بهما مَدْلَجةَ لِقْفٍ، ثم استبطَنَ بهما مَدْلَجة مَجَاحٍ [5]، ثم سَلك بهما مَرْجِح [6]، ثم ببطن مَرْجِح من ذي الغَضَوَين [-4]، ثم ببطن ذي كِشد، ثم أخذ الجداجد [-4]، ثم سلك ذي سَلَمٍ من بطن أعداء [-4] مَدْلَجة، ثم أحدَرَ القاحَةَ، ثم هَبَط العَرْجَ، ثم سلك ثَنيّة الغائر عن يمين رَكُوبة، ثم هبط بطن رِئمٍ، فَقَدِمَ قُباءً على بني عمرو بن عوف [-4].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর উদ্দেশ্যে হিজরতকারী হিসেবে গুহা থেকে বের হলেন, তাঁর সাথে ছিলেন আবূ বকর, এবং আমির ইবনু ফুহায়রাহ, যাকে আবূ বকর তাঁর পিছনে সওয়ারীর উপর বসিয়েছিলেন, এবং আব্দুল্লাহ ইবনু উরাইকিত আল-লাইসী। অতঃপর সে (পথপ্রদর্শক) তাঁদেরকে নিয়ে মক্কার নিম্নভাগ দিয়ে পথ চললেন। তারপর তাঁদেরকে নিয়ে অগ্রসর হলেন, অবশেষে উসফান-এর নিম্নভাগে অবস্থিত সমুদ্র উপকূলে পৌঁছালেন। এরপর তাঁদেরকে নিয়ে আমাজ-এর নিম্নভাগ অতিক্রম করলেন। কাদীদ পার হওয়ার পর রাস্তা পারাপার করলেন। এরপর তাঁদেরকে নিয়ে আল-খার্রার পথে চললেন। অতঃপর তাঁদেরকে আছ-ছানিইয়্যাতুল মাররাহ অতিক্রম করালেন, এরপর লাফত-এর পথে চললেন, এরপর তাঁদেরকে মাদ্লাজাতু লিকফ অতিক্রম করালেন। এরপর মাদ্লাজাতু মাজাহ-এর তলদেশ দিয়ে চললেন, তারপর মারজিহ-এর পথে চললেন। এরপর যুল-গাদাওয়াইন-এর মারজিহ উপত্যকার অভ্যন্তর দিয়ে, তারপর যি কিশ্দ উপত্যকার অভ্যন্তর দিয়ে, তারপর আল-জাদাজিদ ধরলেন, তারপর আদ্আ'-এর মধ্যবর্তী মাদ্লাজাহ-এর যী সালাম পথ ধরলেন, তারপর আল-কাহাতায় নেমে গেলেন, তারপর আল-আ'রজে নামলেন, তারপর রিকূবাহ-এর ডানদিকের ছানিইয়্যাতুল গাইর পথ ধরলেন। এরপর রি’ম উপত্যকায় নামলেন। অতঃপর বনু আমর ইবনু আওফ-এর কাছে কুবায় পৌঁছালেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: حسين.
[2] هكذا في "سيرة ابن هشام" 1/ 491 وغيره من كتب السيرة، وتحرف في نسخنا الخطية إلى: الحجاز. والخرّار: وادٍ، وهو وادي الجحفة، وهو من الحجاز.
4318 [3] - تحرف في النسخ الخطية إلى: المرار. وثنية المُرار عند الحديبية، اما ثنية المرة فموضع ما زال معروفًا بين غدير خم والفُرع، وهو الذي على طريق الهجرة.
4318 [4] - في النسخ الخطية: الحفياء، وهو تحريف، فإن الحفياء موضع قرب المدينة، ولم يكن على طريق الهجرة، والمثبت من "سيرة ابن هشام" وغيره.
4318 [5] - تحرّف في أصول الحاكم: إلى ضحاج، ووقعت مضبوطة في "سيرة ابن إسحاق" كما في "سيرة ابن هشام" محاج، بالميم وبتقديم الحاء المهملة على الجيم، وقال ابن هشام: ويقال: مجاج - يعني بجيمين وكسر الميم - وقال ياقوت في "معجم البلدان" 5/ 55: الصحيح عندنا فيه غير ما روياه، جاء في شعر ذكره ابن الزبير بن بكار، وهو مجاح، بفتح الميم ثم جيم وآخره حاء مهملة.
4318 [6] - رُسمت في (ز) في الموضعين: مدحج، وفي (ص) و (م) في الموضع الأول كذلك، وفي الموضع الثاني رسمت فيهما: يوحح، وكل ذلك تحريف، وقد ضبطه ياقوت في "معجم البلدان" 5/ 102.
4318 [-4] - تحرّف في النسخ إلى: الغصون، وفي المطبوع إلى: الغصن. وضبطه ياقوت بالغين والضاد المعجمتين المفتوحتين، وقال: بلفظ تثنية الغضا.
4318 [-4] - تحرف في النسخ الخطية إلى: الحباحب. هو هشام بن عبد الملك الطيالسي.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 497 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار كما في "كشف الأستار" (1743)، و "مختصر زوائد البزار" (1342) عن محمد بن معمر، والطبراني في "الكبير" 18/ (874) عن محمد بن محمد التمّار البصري، كلاهما عن أبي الوليد الطيالسي، به.وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (4243) عن جعفر بن حميد، والطبراني في "الكبير" 18 (874)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5691) من طريق عاصم بن علي، وأبو نعيم في "الحلية" 9/ 41 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، ثلاثتهم عن عبيد الله ابن إياد بن لقيط، به.أخْدَجَتْ، أي: ألقت حملها قبل تمام نتاجه.
4318 [-4] - تحرف في النسخ الخطية إلى: أعلا، وأعداء الوادي: جوانبه ونواحيه. هو هشام بن عبد الملك الطيالسي.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 497 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار كما في "كشف الأستار" (1743)، و "مختصر زوائد البزار" (1342) عن محمد بن معمر، والطبراني في "الكبير" 18/ (874) عن محمد بن محمد التمّار البصري، كلاهما عن أبي الوليد الطيالسي، به.وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (4243) عن جعفر بن حميد، والطبراني في "الكبير" 18 (874)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5691) من طريق عاصم بن علي، وأبو نعيم في "الحلية" 9/ 41 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، ثلاثتهم عن عبيد الله ابن إياد بن لقيط، به.أخْدَجَتْ، أي: ألقت حملها قبل تمام نتاجه.
4318 [-4] - إسناده حسن إن شاء الله من أجل مسروق بن المَرزُبان وابن إسحاق: وهو محمد بن إسحاق بن يسار صاحب "السيرة".وأخرجه ابن بَطَّة العُكبَري في "الإبانة" 9/ 634 من طريق أبي جعفر محمد بن صالح بن ذَرِيح، عن مسروق بن المرزبان، بهذا الإسناد. ولم يسق بطوله. هو هشام بن عبد الملك الطيالسي.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 497 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار كما في "كشف الأستار" (1743)، و "مختصر زوائد البزار" (1342) عن محمد بن معمر، والطبراني في "الكبير" 18/ (874) عن محمد بن محمد التمّار البصري، كلاهما عن أبي الوليد الطيالسي، به.وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (4243) عن جعفر بن حميد، والطبراني في "الكبير" 18 (874)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5691) من طريق عاصم بن علي، وأبو نعيم في "الحلية" 9/ 41 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، ثلاثتهم عن عبيد الله ابن إياد بن لقيط، به.أخْدَجَتْ، أي: ألقت حملها قبل تمام نتاجه.
4319 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق [أخبرنا محمد بن غالب] [1] حدثنا أبو الوليد، حدثنا عبيد الله بن إياد بن لَقِيط، حدثنا إياد بن لَقِيط، عن قيس بن النعمان قال: لما انطلق النبي صلى الله عليه وسلم وأبو بكر مُستَخْفِيين، مرُّوا بعبد يرعى غنمًا، فاستسقياه من اللبن فقال: ما عندي شاةٌ تُحلَبُ غيرَ أنَّ هاهنا عَناقًا حَمَلتْ أول الشتاء، وقد أَخدَجَتْ، وما بقي لها لَبنٌ، فقال: "ادْعُ بها"، فدعا بها، فاعتقلها النبيُّ صلى الله عليه وسلم وَمَسَحَ ضَرْعَها، ودعا حتى أنزلَتْ، قال: وجاء أبو بكر بمَجَنٍّ، فحلب فسقى أبا بكر، ثم حَلَبَ فسقى الراعي: ثم حَلَبَ فشرب، فقال الراعي: بالله مَن أنتَ، فوالله ما رأيتُ مِثلَك قَطُّ؟ قال: "أوَتَراك تكتُم عَليَّ حتى أُخبرك؟ " قال: نعم، قال: "فإني محمد رسول الله" فقال: أنت الذي تزعم قريش أنه صابئ؟، قال: إنهم ليقولون ذلك" قال: فأشهد أنك نبي، وأشهد أنَّ ما جئتَ به حقٌّ، وأنه لا يفعل ما فعلت إلا نبي، وأنا مُتبعك، قال: "إنك لن تستطيع ذلك يومك، فإذا بَلَغَك أني قد ظهرت فأتِنا" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
কাইস ইবনুন নু'মান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আত্মগোপন অবস্থায় বের হলেন, তখন তারা বকরী চরানো একজন দাসের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তারা তার কাছে কিছু দুধ চাইলেন। সে বলল: আমার কাছে এমন কোনো বকরী নেই যা থেকে দুধ দোহন করা যায়। তবে এখানে একটি ছোট ছাগল আছে যা শীতের শুরুতে গর্ভধারণ করেছিল। কিন্তু সেটি অসম্পূর্ণ প্রসব করেছে (বা গর্ভচ্যুত হয়েছে), এবং এখন তার কোনো দুধ অবশিষ্ট নেই। তিনি (নবী) বললেন: "ওটিকে ডাকো।" সে সেটিকে ডাকল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটিকে ধরলেন এবং তার স্তন (ওলান) মুবারক করলেন এবং দু'আ করলেন, ফলে সেটি দুধ দিল। বর্ণনাকারী বলেন: আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি বাটি নিয়ে আসলেন। তিনি (নবী) দোহন করে আবূ বকরকে পান করালেন। অতঃপর আবার দোহন করে রাখালকে পান করালেন। এরপর তিনি নিজে দোহন করে পান করলেন। তখন রাখাল বলল: আল্লাহর কসম, আপনি কে? আল্লাহর শপথ, আমি আপনার মতো কাউকে কখনও দেখিনি! তিনি বললেন: "তুমি কি আমার বিষয়টি গোপন রাখবে, তাহলে আমি তোমাকে বলব?" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "আমি মুহাম্মাদ, আল্লাহর রাসূল।" সে বলল: আপনিই সেই ব্যক্তি, যাকে কুরাইশরা ‘নব-ধর্ম গ্রহণকারী’ বলে ধারণা করে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তারা তো তাই বলে।" সে বলল: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনি নবী, এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনি যা নিয়ে এসেছেন তা সত্য, আর আপনি যা করলেন তা নবী ছাড়া অন্য কেউ করতে পারে না। আমি আপনার অনুসরণ করতে প্রস্তুত। তিনি (নবী) বললেন: "এই দিন তুমি তা পারবে না। যখন তুমি জানতে পারবে যে আমি বিজয়ী হয়েছি (প্রকাশ্যভাবে আত্মপ্রকাশ করেছি), তখন আমাদের কাছে চলে এসো।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط من أصولنا الخطية، واستدركناه من رواية البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 497 عن أبي عبد الله الحاكم. هو هشام بن عبد الملك الطيالسي.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 497 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار كما في "كشف الأستار" (1743)، و "مختصر زوائد البزار" (1342) عن محمد بن معمر، والطبراني في "الكبير" 18/ (874) عن محمد بن محمد التمّار البصري، كلاهما عن أبي الوليد الطيالسي، به.وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (4243) عن جعفر بن حميد، والطبراني في "الكبير" 18 (874)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5691) من طريق عاصم بن علي، وأبو نعيم في "الحلية" 9/ 41 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، ثلاثتهم عن عبيد الله ابن إياد بن لقيط، به.أخْدَجَتْ، أي: ألقت حملها قبل تمام نتاجه.
[2] إسناده صحيح كما قال الحافظ ابن حجر في "مختصر زوائد البزار" (1342). أبو الوليد: هو هشام بن عبد الملك الطيالسي.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 497 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه البزار كما في "كشف الأستار" (1743)، و "مختصر زوائد البزار" (1342) عن محمد بن معمر، والطبراني في "الكبير" 18/ (874) عن محمد بن محمد التمّار البصري، كلاهما عن أبي الوليد الطيالسي، به.وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" (4243) عن جعفر بن حميد، والطبراني في "الكبير" 18 (874)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5691) من طريق عاصم بن علي، وأبو نعيم في "الحلية" 9/ 41 من طريق عبد الرحمن بن مهدي، ثلاثتهم عن عبيد الله ابن إياد بن لقيط، به.أخْدَجَتْ، أي: ألقت حملها قبل تمام نتاجه.
4320 - حدثنا أبو سعيد أحمد بن محمد بن عمرو الأحمسي بالكوفة، حدثنا الحسين بن حميد بن الربيع الخزاز، حدثنا سليمان بن الحكم بن أيوب بن سليمان بن ثابت بن يسار الخُزاعي، حدثنا أخي أيوب بن الحكم وسالم بن محمد الخُزاعي، جميعًا عن حزام بن هشام، عن أبيه هشام بن حُبَيش بن خويلد صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج من مكة مُهاجرًا إلى المدينة وأبو بكر ومولى أبي بكر عامر بن فهيرة ودليلهما الليثي عبد الله بن أُريقط، مَرُّوا على خَيمتَي أمَّ مَعْبَدٍ الخُزاعية، وكانت امرأةٌ بَرْزَةٌ جَلْدَةٌ، تحتبي بفناء الخيمة، ثم تسقي وتطعم، فسألوها لحمًا وتمرًا ليشتروا منها، فلم يُصِيبوا عندها شيئًا من ذلك، وكان القوم مُرْمِلِين مُسنِتِين، فنَظَر رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى شاةٍ في كِسْرِ الخَيمة، فقال: "ما هذه الشاةُ يا أم مَعْبدٍ؟ " قالت: شاةٌ خَلَّفها الجَهْدُ عن الغنم، قال: "هل بها مِن لَبَنٍ؟ " قالت: هي أجهَدُ من ذلك، قال: "أتأذنين لي أن أحلبها؟ " قالت: بأبي وأمي، إن رأيت بها حَلَبًا فاحلبها، فدعا بها رسول الله صلى الله عليه وسلم، فَمَسَحَ بيدِه ضَرْعَها وسَمَّى الله تعالى، ودعا لها في شاتها، فتَفاجَتْ عليه ودَرَّتْ فاجترَّتْ، فدعا بإناءٍ يُرِيضُ الرَّهْطَ [1]، فَحَلَب فيه ثَجًّا حتى علاه البهاء، ثم سقاها حتى رَوِيَتْ، وسقى أصحابه حتى رَوُوا حتى أراضوا وشرِبَ آخِرَهُم، ثم حَلَب فيه الثانية على بَدْءٍ، حتى ملأ الإناء، ثم غادَرَهُ عندها، ثم بايعها وارتَحَلُوا عنها.فقلَّ ما لبثت حتى جاءها زوجها أبو معبد يسوق أعنُزًا عِجافًا تَسَاوَكُن [2] هُزلًا، مُحهن قليل، فلمّا رأى أبو معبدٍ اللبن أعجبَهُ، قال: من أين لك هذا يا أم معبد والشاءُ عازِبٌ حائل ولا حَلُوبَ في البيت؟ قالت: لا والله، إلَّا أنه مَرَّ بنا رجلٌ مبارك، من حاله كذا وكذا، قال: صفيه لي يا أم معبد، قالت: رأيتُ رجلًا ظاهِرَ الوَضاءة، أبْلَجَ الوجه، حسنَ الخُلُقِ، لم تَعِبْهُ ثُجْلَةٌ، ولم تُزْرِ به صَعْلةٌ، وسيمٌ قَسِيم، في عينيه دَعَجٌ، وفي أشفارِه وَطَفٌ، وفي صوته صَهَلٌ، وفي عنقه سَطَعٌ، وفي لحيته كَثَاثَةٌ، أَزْجُ أقْرَنُ، إن صَمَتَ فعليه الوَقارُ، وإن تكلَّم سماه وعلاه البهاء، أجمل الناس وأبهاه من بعيد، وأحسنُه وأجملُه مِن قريب، حُلو المَنطِق فَصْلٌ لا نَزْرٌ ولا هَذَرٌ، كأن مَنطِقَه خَرزاتُ نَظم يتحدَّرن، رَبْعةٌ لا تَشْنَؤُهُ من طُولٍ، ولا تَقتَحِمُه عِينٌ مِن قِصَر، غُصنٌ بين غُصنَين، فهو أنضرُ الثلاثةِ مَنظَرًا وأحسنهم قدرًا، له رُفقاءُ يَحُفُّون به، إن قال استمعوا لقوله، وإن أمر تبادَرُوا إلى أمره، مَحفُود محشُود، لا عابس ولا مُفنَّد. قال أبو مَعبَد: هذا والله صاحب قريش الذي ذُكر لنا من أمرِه ما ذُكر، ولقد هممتُ أن أصحَبَه، ولأفعلَنَّ إن وَجدْتُ إلى ذلك سبيلًا.وأصبحَ صوتٌ بمكة عاليًا يسمعون الصوت ولا يَدرُون مَن صاحبه، وهو يقول:جزى الله ربُّ الناس خير جزائه … رفيقينِ حَلَا خَيمتي أَمِّ مَعبَدِ هما نزلا بالهَدْيِ وارتحلا به … فقد فاز مَن أمسى رفيق محمدفيا لقُصَيٍّ ما زَوَى الله عنكم … به من فَعَال لا تُجارَى وسُؤدَدِليَهْنِ أبا بكر سعادة جده … بصحبته، من يسعد الله يسعدويهن بني كعب [3] مقامُ فَتاتِهِمْ … ومَقعدها للمؤمنين بمرصدسَلُوا أختَكُم عن شاتها وإنائها … فإنكم إن تسألُوا الشاةَ تَشْهَدِدعاها بشاةٍ حائل فتَحلَّبَتْ … عليه صريحًا ضَرّةُ الشاةِ مُزبِدِفغادَرَه رَهْنًا لَدَيها لِحَالِبِ … يُردِّدُها في مصدَرٍ بعد موردفلما سمع حسان بذلك، شَبَّب يُجاوِبُ الهاتف، فقال:لقد خاب قومٌ زال عنهم نبيهم … وقُدِّس مَن يَسْرِي إليهم ويَغْتَدِيترحَّل عن قومٍ فزالت عقولهم … وحَلَّ على قوم بنور مُجدَّدِهداهُم به بعد الضلالة ربُّهم … فأرشدهم مَن يَتْبَع الحقَّ يَرشُدِوهل يستوي ضُلّال قومٍ تَسفّهوا … عمى وهداةٌ يَهتدون بمُهتديوقد نزلت منه على أهل يثربٍ … ركاب هُدًى حَلّت عليهم بأَسعُدِنبيٌّ يرى ما لا يرى الناس حوله … ويتلو كتاب الله في كلِّ مَشْهَدِوإن قال في يومٍ مقالة غائب … فتصديقها في اليوم في ضُحَى الغَدِ [4] . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.ويُستدَلُّ على صحته وصدق رواته بدلائل: فمنها: نزول المصطفى صلى الله عليه وسلم بالخيمتين متواتر في أخبار صحيحةٍ ذوات عدد، ومنها: أنَّ الذين ساقُوا الحديث على وجهه أهلُ الخَيمتين من الأعارب الذين لا يتهمون بوضع الحديث والزيادة والنقصان، وقد أخذوه لفظًا بعد لفظٍ عن أبي مَعبَدٍ وأم معبدٍ، ومنها: أنَّ له أسانيد كالأخذ باليد أخَذَهُ الولد عن أبيه، والأبُ عن جَدِّه، لا إرسال ولا وَهَن في الرواة، ومنها: أنَّ الحُر بن الصَّيَّاح النَّخَعي أخذه عن أبي مَعبَدٍ كما أخذه ولده عنه، فأما الإسنادُ الذي رُوِّيناه لسياقة الحديث عن الكعبيِّين فإنه إسنادٌ صحيح عال للعرب الأعاربة، وقد عَلَونا في حديث الحُرِّ بن الصَّيَّاح.
হিশাম ইবনে হুবাইশ ইবনে খুয়াইলিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা থেকে মদিনার উদ্দেশ্যে হিজরত করে বের হলেন। তাঁর সাথে ছিলেন আবূ বকর, আবূ বকরের আযাদকৃত গোলাম আমির ইবনে ফুহাইরা এবং তাদের পথপ্রদর্শক লায়ছী গোত্রের আব্দুল্লাহ ইবনে উরাইকিত। তারা উম্মে মা'বাদ আল-খুযা'ঈয়্যার দুটি তাঁবুর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। উম্মে মা'বাদ ছিলেন একজন সাহসী, দৃঢ়চেতা মহিলা। তিনি তাঁবুর উঠানে বসে থাকতেন এবং পানীয় ও খাবার পরিবেশন করতেন।
তারা উম্মে মা'বাদ-এর কাছে গোশত ও খেজুর চাইলেন, যেন তারা তার কাছ থেকে কিনে নিতে পারে। কিন্তু তিনি তাদের কাছে কেনার মতো কিছুই পেলেন না। তখন সেই কাফেলাটি ছিল শুষ্ক ভূমি ও দুর্ভিক্ষের কারণে খুবই দুর্দশাগ্রস্ত।
তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁবুর এক কোণে একটি বকরী দেখতে পেলেন। তিনি বললেন, "হে উম্মে মা'বাদ, এই বকরীটি কেমন?" তিনি বললেন, "এটি এমন একটি বকরী, দুর্বলতার কারণে যা পাল থেকে পিছনে পড়ে গেছে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, "এর কি দুধ আছে?" তিনি বললেন, "এটি তার চেয়েও বেশি দুর্বল।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আপনি কি আমাকে এটি দোহন করার অনুমতি দেবেন?" তিনি বললেন, "আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য কুরবান হোক! যদি আপনি এর মধ্যে দুধ দেখতে পান, তবে দোহন করুন।"
তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটিকে ডাকলেন। তিনি নিজের হাত দিয়ে সেটির স্তন স্পর্শ করলেন এবং মহান আল্লাহ তাআলার নাম নিলেন। তিনি বকরীটির জন্য বরকতের দু'আ করলেন। তখন সেটি তার পায়ের উপর দাঁড়িয়ে গেল, দুধ এসে গেল এবং প্রচুর ফেনা উঠে তা উপচে পড়তে লাগল। তিনি এমন একটি পাত্র চাইলেন যা দ্বারা কাফেলার লোকজনকে পরিতৃপ্ত করা যায়। তিনি তাতে এমনভাবে দুধ দোহন করলেন যে তা ভরে গেল এবং ফেনা উঁচিয়ে উঠলো। এরপর তিনি উম্মে মা'বাদকে পান করালেন যতক্ষণ না তিনি পরিতৃপ্ত হলেন। এরপর তার সঙ্গীদের পান করালেন যতক্ষণ না তারাও পরিতৃপ্ত হলেন এবং পুরোপুরি তৃপ্ত হলেন। সবশেষে, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজে পান করলেন। এরপর তিনি দ্বিতীয়বার দোহন করলেন—এবারও শুরু থেকেই—যতক্ষণ না পাত্রটি পূর্ণ হলো। তারপর তিনি সেটি উম্মে মা'বাদ-এর কাছে রেখে দিলেন। তারপর তিনি তাকে বাইয়াত করলেন এবং তারা সেখান থেকে যাত্রা করলেন।
এর অল্প কিছুক্ষণ পরই তার স্বামী আবূ মা'বাদ ফিরলেন। তিনি দুর্বল, ক্ষীণ দেহের কিছু ছাগল তাড়িয়ে আনছিলেন, যা দুর্বলতার কারণে একে অপরের সাথে সংঘর্ষ লাগছিল। তাদের দুধও ছিল সামান্য। যখন আবূ মা'বাদ দুধ দেখতে পেলেন, তিনি বিস্মিত হলেন। তিনি বললেন, "হে উম্মে মা'বাদ, এই দুধ তুমি কোথায় পেলে? ছাগলগুলো তো চারণভূমিতে ছিল এবং বাড়িতে কোনো দোহনযোগ্য পশুও নেই?" তিনি বললেন, "আল্লাহর কসম, এমন কিছু ঘটেনি। তবে আমাদের পাশ দিয়ে একজন বরকতময় ব্যক্তি অতিক্রম করেছেন, যার অবস্থা ছিল এমন এমন।" আবূ মা'বাদ বললেন, "হে উম্মে মা'বাদ, তুমি আমাকে তাঁর বর্ণনা দাও।"
তিনি বললেন: আমি এমন একজন লোককে দেখলাম, যার বাহ্যিক ঔজ্জ্বল্য সুস্পষ্ট, মুখমণ্ডল ছিল উজ্জ্বল, চরিত্র ছিল সুন্দর। কোনো মোটা পেট তাকে ত্রুটিযুক্ত করেনি এবং কোনো ছোট মাথা তাকে তুচ্ছ করেনি। তিনি ছিলেন সুদর্শন ও সুঠাম দেহী। তার চোখে ছিল গভীর কালো মণি (দা'জ) এবং চোখের পাতায় ছিল দীর্ঘ লোম (ওয়াতাফ)। তার কণ্ঠস্বরে ছিল মিষ্টতা, তার গ্রীবায় ছিল উচ্চতা। তার দাড়িতে ছিল ঘনতা। তার ভ্রু ছিল সংযুক্ত ও বাঁকা। তিনি যখন চুপ থাকতেন, তখন তার ওপর গাম্ভীর্য বিরাজ করত। আর যখন কথা বলতেন, তখন তার মর্যাদা বেড়ে যেত এবং তার ওপর দীপ্তি ছড়িয়ে পড়ত। দূর থেকে দেখলে তিনিই ছিলেন মানুষের মধ্যে সবচেয়ে সুন্দর ও সবচেয়ে উজ্জ্বল। কাছ থেকে দেখলে তিনিই ছিলেন সবচেয়ে ভালো এবং সবচেয়ে সুদর্শন। তার কথা ছিল মিষ্টি ও সুস্পষ্ট, না অতিরিক্ত কম, না অতিরিক্ত বেশি। মনে হচ্ছিল যেন তাঁর কথাগুলো একটি সুতোয় গাঁথা মুক্তোমালা যা ঝরে পড়ছে। তিনি ছিলেন মধ্যম গড়নের, যার কারণে উচ্চতা তাকে অপ্রীতিকর দেখাত না, আবার খর্বতার কারণে চোখ তাকে ছোট মনে করত না। তিনি ছিলেন দুটি ডালের মাঝের একটি শাখা; তাদের তিনজনের মধ্যে তিনিই ছিলেন সবচেয়ে সবুজ ও সতেজ এবং মর্যাদায় শ্রেষ্ঠ। তাঁর এমন সহচররা ছিল যারা তাকে ঘিরে রাখত। তিনি যখন কিছু বলতেন, তারা মনোযোগ দিয়ে শুনত। তিনি যখন আদেশ করতেন, তারা দ্রুত তা পালনের জন্য ছুটত। তিনি ছিলেন সম্মানিত ও সমবেত। তিনি রুক্ষভাষী বা ভ্রুকুটি কুঞ্চনকারী ছিলেন না।
আবূ মা'বাদ বললেন, "আল্লাহর কসম, এ তো সেই কুরাইশী ব্যক্তি, যার বিষয়ে আমাদেরকে খবর দেওয়া হয়েছে। আমি অবশ্যই তার সহচর হতে আগ্রহী ছিলাম এবং যদি কোনো পথ খুঁজে পাই তবে আমি তা অবশ্যই করব।"
এরপর মক্কায় একটি উচ্চকণ্ঠ শোনা গেল। তারা কণ্ঠ শুনতে পাচ্ছিল, কিন্তু কে বলছেন তা জানত না। সেই ব্যক্তি বলছিলেন:
মানুষের রব আল্লাহ্ যেন উত্তম প্রতিদান দেন,
উম্মে মা'বাদ-এর তাঁবুতে যারা অবস্থান নিলেন সেই দুই সঙ্গীকে।
তারা হেদায়েত নিয়ে অবতরণ করলেন এবং তা নিয়েই চলে গেলেন,
সুতরাং যে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গী হলো, সে অবশ্যই সফলকাম হলো।
হে কুসাই গোত্র, আল্লাহ্ তোমাদের থেকে যা লুকিয়ে রেখেছেন,
তা হলো এমন কীর্তি ও মর্যাদা যা অপ্রতিদ্বন্দ্বী।
আবু বকরের জন্য তার সৌভাগ্যের জন্য খুশি হও,
তার সাহচর্যে; যাকে আল্লাহ্ সুখী করেন, সে সুখী হয়।
বনু কা'ব খুশি হোক তাদের মেয়ের অবস্থানের কারণে,
ঈমানদারদের জন্য তার বসার স্থান হয়েছে তীক্ষ্ণ দৃষ্টিতে।
তোমরা তোমাদের বোনকে তার বকরী ও পাত্র সম্পর্কে জিজ্ঞেস করো,
কারণ তোমরা যদি বকরীকে জিজ্ঞেস করো, তবে সে সাক্ষ্য দেবে।
তিনি একটি দুধহীনা বকরীকে আহ্বান করলেন, আর তার স্তন থেকে
বিশুদ্ধ ফেনা মিশ্রিত দুধ গড়িয়ে পড়ল।
তিনি এটিকে রেখে গেলেন তার কাছে জামানত হিসাবে দোহনকারীর জন্য,
যা সে আনা-নেওয়ার পর বারবার ব্যবহার করবে।
যখন হাসসান (ইবনে সাবিত) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই বিষয়টি শুনলেন, তিনি আহ্বানকারীর জবাবে কবিতা আবৃত্তি করলেন, বললেন:
সেই কওম অবশ্যই ব্যর্থ হয়েছে যাদের কাছ থেকে তাদের নবী চলে গেছেন,
আর পবিত্র সে ব্যক্তি, যে তাদের দিকে রাতের সফর করে এবং সকালে যায়।
তিনি এক কওম থেকে প্রস্থান করলেন, ফলে তাদের বুদ্ধি লোপ পেল,
আর নতুন আলো নিয়ে অন্য এক কওমের কাছে অবতরণ করলেন।
গোমরাহীর পর তাদের রব এর মাধ্যমে তাদের হেদায়েত দিলেন,
তাই তিনি তাদের পথ দেখালেন; যে সত্যকে অনুসরণ করে সে পথপ্রাপ্ত হয়।
যারা মূর্খতাবশত পথভ্রষ্ট হয়েছে, সেই অন্ধরা কি
সেই হেদায়েতপ্রাপ্তদের সমান হতে পারে, যারা হেদায়েতপ্রাপ্ত দ্বারা হেদায়েত পায়?
নিশ্চয়ই তাঁর থেকে ইয়াছরিবের (মদিনার) অধিবাসীদের উপর
কল্যাণময় সওয়ারী অবতরণ করেছে।
তিনি এমন একজন নবী, যিনি তার চারপাশের মানুষের অদেখা বিষয় দেখেন,
এবং তিনি প্রত্যেক মজলিসে আল্লাহর কিতাব তিলাওয়াত করেন।
আর যদি কোনো দিন তিনি অনুপস্থিত কোনো বিষয়ে কথা বলেন,
তবে তার সত্যায়ন পরের দিন দুপুরের মধ্যেই হয়ে যায়।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أي: يرويهم بعض الرّيّ، كما في "النهاية" لابن الأثير، قال: والرواية المشهورة فيه بالباء، يعني: يربض كما أُعجم في (ز).
[2] تحرّف في أصولنا الخطية إلى: تساوكهن. بزيادة الهاء، ولا معنى للكلمة بزيادتها، وإنما هي تَسَاوَكُنَ بمعنى: يمشين مشيًا ضعيفًا، والتساوُك: التمايُل من الضعف.
4320 [3] - في أصولنا الخطية: أبا بكر، بدل: بني كعب، وهو خطأ نشأ عن انتقال النظر إلى البيت الذي قبله، وبنو كعب هم أحد خُزاعة، وهو كعب بن عمرو بن ربيعة قبيل أم معبد. واسم جده خالد وليس خويلدًا كما سُمِّي هنا في رواية المصنف، فقد سمَّى جده خالدًا كل من ترجم لحبيش في الصحابة، وكذلك وقع مسمى في رواية غير المصنف، والصحبة لحبيش بن خالد، وقد نَصَّ على ذكره في إسناد هذا الخبر غير واحد ممّن رواه عن حزام بن هشام، ولهذا ذكر البغوي والطبراني وابن منده وأبو نُعيم وغيرهم ممن ألف في الصحابة هذا الخبر في ترجمة حبيش.وقد سمع هشام بن حبيش من عمته أم معبد أيضًا بعض قصتها مما لم يحدثه به أبوه حبيش كما نبه عليه أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "الجرح والتعديل" في ترجمة حبيش بن خالد 3/ 299 - 300، فقال: روى حبيش بن خالد الخزاعي عن النبي صلى الله عليه وسلم أول حديث الصفة حين أخرج النبي صلى الله عليه وسلم من مكة، وباقي حديث الصفة عن أم معبد.والحسين بن حميد بن الربيع فيه لين، لكنه لم ينفرد به، فقد توبع فيه.وسليمان بن الحكم بن أيوب روى عنه غير واحدٍ منهم أبو حاتم الرازي، ولا يعرفُ بجرح، ثم هو متابع أيضًا، وأخوه أيوب بن الحكم روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، ولم ينفرد به، بل توبع، وسالم بن محمد الخزاعي لم نتبينه.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 11/ 281 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (505) عن سليمان بن الحكم، به.وأخرجه أبو القاسم اللالكائي في "أصول الاعتقاد" (1435) من طريق محمد بن هارون الروياني، والبيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 277 من طريق عبد الواحد بن يوسف بن أيوب بن الحكم الخزاعي، كلاهما عن سليمان بن الحكم، به. لكن عبد الواحد قال في روايته: عن حزام بن هشام، عن أبيه هشام، عن جده حبيش بن خالد فنصَّ على ذكر جده في الإسناد.وأخرجه الطبري في "ذيل المذيل" كما في "منتخبه" لعُريب بن سعد القرطبي، 11/ 577، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (1140)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (1436) و (1437)، والبيهقي في "الدلائل" 1/ 277، وابن عبد البر في "الاستيعاب" (3573)، وأبو القاسم الأصبهاني في "دلائل النبوة" (42)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 3/ 323، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 451 من طريق محمد بن سليمان بن الحكم بن أيوب الخزاعي، عن عمه أيوب بن الحكم، به. وذكر في روايته حبيشًا كذلك.وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" مختصرًا (253)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2265) من طريق يحيى بن سليمان بن نضلة الخزاعي، عن حزام بن هشام، به. بذكر حبيش بن خالد، ويحيى بن سليمان هذا قال عنه ابن عدي: روى عن مالك وأهل المدينة أحاديث عامتها مستقيمة. وسيأتي عند المصنف برقم (4322) من طريق مكرم بن محرز بن مهدي الخزاعي، عن أبيه، عن حزام بن هشام بذكر حبيش أيضًا.وأخرج ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 10/ 273 عن محمد بن عمر الواقدي، والبخاري في "تاريخه الكبير" 3/ 116، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (8041) من طريق أبي النضر هاشم بن القاسم، والطبراني في "الكبير" 24 / (863)، وأبو نعيم في "المعرفة" (7771)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 12/ 358 من طريق عبد الله بن إدريس، ثلاثتهم عن حزام بن هشام، عن أبيه، عن أم معبد، قالت: طلع علينا أربعة على راحلتين، فنزلوا بي، فجئت رسول الله صلى الله عليه وسلم بشاة أريد أن أذبحها، فإذا هي ذاتُ دَرٍّ، فأدنيتها منه، فلمس ضرعها، فقال: "لا تذبحيها" فأرسلتها، قالت: وجئتُ بأخرى فذبحتها، فطحنتُ لهم فأكل هو وأصحابه، قلت: ومن معه؟ قالت: ابن أبي قحافة ومولى ابن أبي قحافة وابن أُريقط وهو على شركه، قالت: فتغدى رسول الله منها وأصحابه وسُفرتهم منها ما وسعت سُفْرتهم، وبقي عندنا لحمها أو أكثره، فبقيت الشاة التي لمس رسول الله صلى الله عليه وسلم ضَرعها عندنا حتى كان زمان الرمادة زمان عمر بن الخطاب - وهي سنة ثماني عشرة من الهجرة - قالت: وكنا نحلبها صبوحًا وغبوقًا وما في الأرض قليل ولا كثير. هذا لفظ الواقدي، وهو أتم من رواية الآخرين.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3485) و (3486)، ومن طريقه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7769) من طريق عبد الرحمن بن محمد بن شُعبة، عن حزام بن هشام، عن أبيه، عن جده، عن أم معبد. وجمع بين روايتي حبيش بن خالد وأخته أم معبد في سياق واحد، وجعله من رواية حبيش عن أم معبد، وقد أورد ابن عبد البر في "الاستيعاب" (3405) هذا الخبر من هذا الطريق نقلًا عن أبي جعفر العقيلي، لكنه سمَّى الراوي عن حزام عبد الرحمن بن محمد بن سعيد اليمامي الحنفي، ولا يُعرف عبد الرحمن هذا، وقد وهم في جمعه بين سياق رواية حبيش مع سياق أخته أم معبد وجعله كله عن أم معبد، وانفرد بذلك.وسيأتي بعده من طريق الحُر بن الصيَّاح النخعي عن أبي معبد، لكن الراوي عنه عبد الملك بن وهب المذحجي لا يُعرف إلا في هذا الخبر، على أنَّ أبا حاتم الرازي احتمل أن يكون هو سليمان بن عمرو بن عبد الله بن وهب النخعي المتهم بوضع الحديث، يعني أنَّ الراوي دلس في اسمه وهو ما يُعرف بتدليس الشيوخ. على أنَّ فيه إرسالًا كما سيأتي بيانه.وأخرج البيهقي في د "لائل النبوة" 2/ 492، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 40/ 378 - 379 قصة بنحو قصة أم معبد، من طريق يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلي - وهو سيئ الحفظ - عن عبد الرحمن بن الأصبهاني، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبي بكر الصديق، فذكر بعض ما ورد في حديث حبيش وحديث أم معبد، وقال البيهقي: هذه القصة وإن كانت تنقص عما رُوِّينا في قصة أم معبد ويزيد في بعضها، فهي قريبة منها، ويشبه أن يكونا واحدة، وقد ذكر محمد بن إسحاق بن يسار من قصة أم معبد شيئًا يدل على أنها وهذه واحدة، والله أعلم.قوله: بَرْزة، أي: عفيفة رزينة يتحدث إليها الرجال فتبرز لهم وهي كهلة قد خلا بها السنُّ، فخرجت عن حد المحجوبات.وقوله: جَلْدة، أي: قوية صُلْبة.والمُرمِلُ: الذي نَفِدَ زاده فرقت حاله.والمُسنِتُ: الداخل في السنة، وهي الجَدْبُ.والحَلَبُ: مصدر حلبته.وتفاجَّت، أي: وسَّعت ما بين رجليها، وتفعله الشاة عند الحلب والبول.واجترت، أي: أخرجت الجِرّة - وهو العلف - من جوفها إلى فيها لتمضغها.والثجُّ: السيلان الكثير.والبهاء: وبيصُ رغوة اللبن وبريقها.والعازب: البعيد.والحائل: التي لم تحمل.والحلوب: التي تُحلب.والأبلج الوجه: الحسن المشرق المضيء.والثُجْلة: عظم البطن مع استرخاء أسفله.والإزراء: التهاون بالشيء والاحتقار له.والصَّعْلة: صغر الرأس.والوسيم: المشهور بالحُسن.والقسيم: الحسن الوجه.والدَّعَج: شدة سواد العين مع سعتها.والأشفار: حروف الأجفان التي ينبت عليها الشعر.والوَطَف: كثرة شعر العين والاسترخاء، وإنما يكون ذلك مع الطول.والصَّهَل: صوت فيه.والسَّطَع: طول العنق. والأزجُّ: المتقوّس الحاجبين.والأقرن: المتصل رأسًا حاجَبيه.والنزر: القليل.والهذر: الكثير غير المفيد.لا تشنؤه من طُول: لا يُبغَضُ لفرط طوله.والرَّبْعة: ما بين الطويل والقصير.ولا تقتحمه عينٌ من قصر، أي: لا تحتقره العيون لقصره فتتركه وتتجاوزه إلى غيره.والمحفُود: المخدوم.والمحشود: الذي يجتمع الناس حوله.والعابس: الكالح الوجه المقطّب.والمُفَنَّد: المنسوب إلى الجهل وقلة العقل.والرفيقان: النبي صلى الله عليه وسلم وأبو بكر.وزَوَى: قبض ومنع.والسُّؤدد: السيادة.والمرصد: موضع الرَّصد، وهم القوم الذين يحفظون الطرق، وهو انتظار الشيء وارتقابه.والصريح: اللبن الخالص.والضَّرَّة: أصل الضَّرْع الذي لا يخلو من اللبن.والمزيد: الذي عَلاهُ الزَّبَد.وغادرها رهنًا لديها، أي: تركها محبوسة لديها لمن يحلبها، كالرهن عند المرتهن.وشبَّبَ، أي: ابتدأ في جواب الهاتف. وهو من تشبيب الكتب، أي: ابتداؤها والأخذ في جوابها.والسُّرى: سير الليلوالاغتداء: سير الغُدْوة.
4320 [4] - أصل حديث أم معبد هذا حسن إن شاء الله بتعدد طرقه، وقد حسنه الحافظ العلائي في "إثارة الفوائد" 2/ 717، ومن قبله قال ابن عبد البر في "الدرر في اختصار المغازي والسير" ص 83: مشهور عن الثقات، وقال ابن كثير في "البداية والنهاية" 4/ 472: قصة أم معبد مشهورة مروية من طرق يشُدُّ بعضها بعضًا.قلنا: حزام بن هشام وأبوه لا بأس بهما، وقد اختلف في صحبة هشام، والصحيح أنه تابعي، واسم جده خالد وليس خويلدًا كما سُمِّي هنا في رواية المصنف، فقد سمَّى جده خالدًا كل من ترجم لحبيش في الصحابة، وكذلك وقع مسمى في رواية غير المصنف، والصحبة لحبيش بن خالد، وقد نَصَّ على ذكره في إسناد هذا الخبر غير واحد ممّن رواه عن حزام بن هشام، ولهذا ذكر البغوي والطبراني وابن منده وأبو نُعيم وغيرهم ممن ألف في الصحابة هذا الخبر في ترجمة حبيش.وقد سمع هشام بن حبيش من عمته أم معبد أيضًا بعض قصتها مما لم يحدثه به أبوه حبيش كما نبه عليه أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "الجرح والتعديل" في ترجمة حبيش بن خالد 3/ 299 - 300، فقال: روى حبيش بن خالد الخزاعي عن النبي صلى الله عليه وسلم أول حديث الصفة حين أخرج النبي صلى الله عليه وسلم من مكة، وباقي حديث الصفة عن أم معبد.والحسين بن حميد بن الربيع فيه لين، لكنه لم ينفرد به، فقد توبع فيه.وسليمان بن الحكم بن أيوب روى عنه غير واحدٍ منهم أبو حاتم الرازي، ولا يعرفُ بجرح، ثم هو متابع أيضًا، وأخوه أيوب بن الحكم روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، ولم ينفرد به، بل توبع، وسالم بن محمد الخزاعي لم نتبينه.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 11/ 281 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (505) عن سليمان بن الحكم، به.وأخرجه أبو القاسم اللالكائي في "أصول الاعتقاد" (1435) من طريق محمد بن هارون الروياني، والبيهقي في "دلائل النبوة" 1/ 277 من طريق عبد الواحد بن يوسف بن أيوب بن الحكم الخزاعي، كلاهما عن سليمان بن الحكم، به. لكن عبد الواحد قال في روايته: عن حزام بن هشام، عن أبيه هشام، عن جده حبيش بن خالد فنصَّ على ذكر جده في الإسناد.وأخرجه الطبري في "ذيل المذيل" كما في "منتخبه" لعُريب بن سعد القرطبي، 11/ 577، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (1140)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (1436) و (1437)، والبيهقي في "الدلائل" 1/ 277، وابن عبد البر في "الاستيعاب" (3573)، وأبو القاسم الأصبهاني في "دلائل النبوة" (42)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 3/ 323، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 451 من طريق محمد بن سليمان بن الحكم بن أيوب الخزاعي، عن عمه أيوب بن الحكم، به. وذكر في روايته حبيشًا كذلك.وأخرجه الحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" مختصرًا (253)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2265) من طريق يحيى بن سليمان بن نضلة الخزاعي، عن حزام بن هشام، به. بذكر حبيش بن خالد، ويحيى بن سليمان هذا قال عنه ابن عدي: روى عن مالك وأهل المدينة أحاديث عامتها مستقيمة. وسيأتي عند المصنف برقم (4322) من طريق مكرم بن محرز بن مهدي الخزاعي، عن أبيه، عن حزام بن هشام بذكر حبيش أيضًا.وأخرج ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 10/ 273 عن محمد بن عمر الواقدي، والبخاري في "تاريخه الكبير" 3/ 116، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (8041) من طريق أبي النضر هاشم بن القاسم، والطبراني في "الكبير" 24 / (863)، وأبو نعيم في "المعرفة" (7771)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 12/ 358 من طريق عبد الله بن إدريس، ثلاثتهم عن حزام بن هشام، عن أبيه، عن أم معبد، قالت: طلع علينا أربعة على راحلتين، فنزلوا بي، فجئت رسول الله صلى الله عليه وسلم بشاة أريد أن أذبحها، فإذا هي ذاتُ دَرٍّ، فأدنيتها منه، فلمس ضرعها، فقال: "لا تذبحيها" فأرسلتها، قالت: وجئتُ بأخرى فذبحتها، فطحنتُ لهم فأكل هو وأصحابه، قلت: ومن معه؟ قالت: ابن أبي قحافة ومولى ابن أبي قحافة وابن أُريقط وهو على شركه، قالت: فتغدى رسول الله منها وأصحابه وسُفرتهم منها ما وسعت سُفْرتهم، وبقي عندنا لحمها أو أكثره، فبقيت الشاة التي لمس رسول الله صلى الله عليه وسلم ضَرعها عندنا حتى كان زمان الرمادة زمان عمر بن الخطاب - وهي سنة ثماني عشرة من الهجرة - قالت: وكنا نحلبها صبوحًا وغبوقًا وما في الأرض قليل ولا كثير. هذا لفظ الواقدي، وهو أتم من رواية الآخرين.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3485) و (3486)، ومن طريقه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (7769) من طريق عبد الرحمن بن محمد بن شُعبة، عن حزام بن هشام، عن أبيه، عن جده، عن أم معبد. وجمع بين روايتي حبيش بن خالد وأخته أم معبد في سياق واحد، وجعله من رواية حبيش عن أم معبد، وقد أورد ابن عبد البر في "الاستيعاب" (3405) هذا الخبر من هذا الطريق نقلًا عن أبي جعفر العقيلي، لكنه سمَّى الراوي عن حزام عبد الرحمن بن محمد بن سعيد اليمامي الحنفي، ولا يُعرف عبد الرحمن هذا، وقد وهم في جمعه بين سياق رواية حبيش مع سياق أخته أم معبد وجعله كله عن أم معبد، وانفرد بذلك.وسيأتي بعده من طريق الحُر بن الصيَّاح النخعي عن أبي معبد، لكن الراوي عنه عبد الملك بن وهب المذحجي لا يُعرف إلا في هذا الخبر، على أنَّ أبا حاتم الرازي احتمل أن يكون هو سليمان بن عمرو بن عبد الله بن وهب النخعي المتهم بوضع الحديث، يعني أنَّ الراوي دلس في اسمه وهو ما يُعرف بتدليس الشيوخ. على أنَّ فيه إرسالًا كما سيأتي بيانه.وأخرج البيهقي في د "لائل النبوة" 2/ 492، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 40/ 378 - 379 قصة بنحو قصة أم معبد، من طريق يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلي - وهو سيئ الحفظ - عن عبد الرحمن بن الأصبهاني، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبي بكر الصديق، فذكر بعض ما ورد في حديث حبيش وحديث أم معبد، وقال البيهقي: هذه القصة وإن كانت تنقص عما رُوِّينا في قصة أم معبد ويزيد في بعضها، فهي قريبة منها، ويشبه أن يكونا واحدة، وقد ذكر محمد بن إسحاق بن يسار من قصة أم معبد شيئًا يدل على أنها وهذه واحدة، والله أعلم.قوله: بَرْزة، أي: عفيفة رزينة يتحدث إليها الرجال فتبرز لهم وهي كهلة قد خلا بها السنُّ، فخرجت عن حد المحجوبات.وقوله: جَلْدة، أي: قوية صُلْبة.والمُرمِلُ: الذي نَفِدَ زاده فرقت حاله.والمُسنِتُ: الداخل في السنة، وهي الجَدْبُ.والحَلَبُ: مصدر حلبته.وتفاجَّت، أي: وسَّعت ما بين رجليها، وتفعله الشاة عند الحلب والبول.واجترت، أي: أخرجت الجِرّة - وهو العلف - من جوفها إلى فيها لتمضغها.والثجُّ: السيلان الكثير.والبهاء: وبيصُ رغوة اللبن وبريقها.والعازب: البعيد.والحائل: التي لم تحمل.والحلوب: التي تُحلب.والأبلج الوجه: الحسن المشرق المضيء.والثُجْلة: عظم البطن مع استرخاء أسفله.والإزراء: التهاون بالشيء والاحتقار له.والصَّعْلة: صغر الرأس.والوسيم: المشهور بالحُسن.والقسيم: الحسن الوجه.والدَّعَج: شدة سواد العين مع سعتها.والأشفار: حروف الأجفان التي ينبت عليها الشعر.والوَطَف: كثرة شعر العين والاسترخاء، وإنما يكون ذلك مع الطول.والصَّهَل: صوت فيه.والسَّطَع: طول العنق. والأزجُّ: المتقوّس الحاجبين.والأقرن: المتصل رأسًا حاجَبيه.والنزر: القليل.والهذر: الكثير غير المفيد.لا تشنؤه من طُول: لا يُبغَضُ لفرط طوله.والرَّبْعة: ما بين الطويل والقصير.ولا تقتحمه عينٌ من قصر، أي: لا تحتقره العيون لقصره فتتركه وتتجاوزه إلى غيره.والمحفُود: المخدوم.والمحشود: الذي يجتمع الناس حوله.والعابس: الكالح الوجه المقطّب.والمُفَنَّد: المنسوب إلى الجهل وقلة العقل.والرفيقان: النبي صلى الله عليه وسلم وأبو بكر.وزَوَى: قبض ومنع.والسُّؤدد: السيادة.والمرصد: موضع الرَّصد، وهم القوم الذين يحفظون الطرق، وهو انتظار الشيء وارتقابه.والصريح: اللبن الخالص.والضَّرَّة: أصل الضَّرْع الذي لا يخلو من اللبن.والمزيد: الذي عَلاهُ الزَّبَد.وغادرها رهنًا لديها، أي: تركها محبوسة لديها لمن يحلبها، كالرهن عند المرتهن.وشبَّبَ، أي: ابتدأ في جواب الهاتف. وهو من تشبيب الكتب، أي: ابتداؤها والأخذ في جوابها.والسُّرى: سير الليلوالاغتداء: سير الغُدْوة.