হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4401)


4401 - حدَّثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدَّثنا محمد بن عبد الله الحَضْرمي، حدَّثنا سعيد بن عمرو الأَشعَثِي، حدَّثنا عَبْثَر، عن حُصَين، عن الشَّعْبي، عن النُّعمان بن بَشير قال: أُغمي على عبد الله بن رَوَاحة فجعلتْ أختُه عَمْرةُ تَبكي: وا أُخيّاهُ، وا كذا وا كذا، تَعُدُّ عليه، فقال حينَ أفاقَ: ما قُلتِ شيئًا إِلَّا قيل لي: آنتَ كذلكَ؟ [1] صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!




নু'মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মূর্ছা হয়েছিল। তখন তাঁর বোন আমরাহ কাঁদতে শুরু করলেন এবং বললেন: 'হায়রে আমার ভাই! হায়রে এমন, হায়রে তেমন!'— এভাবেই তিনি তার গুণাবলী বর্ণনা করছিলেন। যখন তিনি জ্ঞান ফিরে পেলেন, তখন বললেন: তুমি এমন কোনো কথা বলোনি, যা আমাকে বলা হয়নি: 'তুমি কি সত্যিই এমন?'




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. عَبثَر: هو ابن القاسم، وحُصين: هو ابن عبد الرحمن السُّلَمي، والشَّعبي: هو عامر بن شَراحيل.وأخرجه البخاريّ (4268) عن قتيبة بن سعيد عن عَبثَر بن القاسم، بهذا الإسناد. وزاد: فلما مات لم تَبكِ عليه. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه البخاريّ أيضًا (4267) من طريق محمد بن فضيل، عن حُصين، به. دون ذكر الزيادة المشار إليها. وقد خالفَ عَبْثرًا وابنَ فُضيل في إسناده سفيانُ بنُ عيينة عند عبد الرزاق (6697) فرواه عن حُصين، عن الشَّعبي، مرسلًا!!وأخرج ابن سعد نحوه في "طبقاته" 3/ 490 من مرسل أبي عمران الجَوْنِي، إلّا أنه ذكر فيه أنَّ النائحة كانت أمّه لا أخته. ورجاله ثقات، لكن خطَّأ الحافظُ في "الفتح" 12/ 485 ذِكرَ أمّه، وقال: فلو كانت أمُّه تُسمَّى عمرة لَجوّزتُ وقوعَ ذلك لهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4402)


4402 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أحمد بن عبد الجبّار، حدَّثنا يونس بن بُكَير، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، قال: سمعتُ خالد بن الوليد يقول: لقد اندقَّ في يَدِي يومَ مؤتة تسعةُ [1] أسيافٍ، ما بقيَ في يَدِي إلَّا صَفِيحةٌ يَمانِيَةٌ [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد اتّفق الشيخانِ [3] على حديث حُميد بن هِلال عن أنس بن مالك عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة مُؤتَة: "أخَذَ الرايةَ زيدُ بن حارثة أخَذَها فأُصِيبَ، ثم أَخَذَها جعفرٌ فأُصِيبَ، ثم أخَذَها عبدُ الله بن رَواحة فأُصِيبَ"، ثم إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثَ خالد بن الوليد إلى مؤتة.




খালিদ ইবনুল ওয়ালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মুতার যুদ্ধের দিন আমার হাতে নয়টি তরবারি ভেঙে গিয়েছিল; আমার হাতে শুধু একটি ইয়ামানি পাতলা তলোয়ার অবশিষ্ট ছিল।

শাইখাইন (ইমাম বুখারী ও ইমাম মুসলিম) আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণিত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই হাদীসটির বিষয়ে একমত পোষণ করেছেন: "যায়দ ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পতাকা গ্রহণ করলেন, তিনি তা গ্রহণ করলেন এবং শহীদ হলেন। তারপর জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা গ্রহণ করলেন এবং শহীদ হলেন। তারপর আব্দুল্লাহ ইবনু রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা গ্রহণ করলেন এবং শহীদ হলেন।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খালিদ ইবনুল ওয়ালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মুতার দিকে প্রেরণ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: سبعة، وجاء على الصواب في رواية البيهقيّ في "دلائل النبوة" 4/ 373 عن أبي عبد الله الحاكم، ورجل آخر مقرون معه، وهو الموافق لما جاء في سائر مصادر تخريج هذا الخبر.



[2] خبر صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن عبد الجبار - وهو العُطاردي - وقد توبع.وأخرجه البخاريّ (4265) من طريق سفيان الثوري، و (4266) من طريق يحيى بن سعيد القطان، وابن حبان (7089) من طريق سفيان بن عيينة، ثلاثتهم عن إسماعيل بن أبي خالد، به.والصَّفيحة: السيف العَريض.



4402 [3] - لم يتفق الشيخان على إخراج حديث أنس هذا، بل انفرد بإخراجه البخاريّ (1246).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4403)


4403 - فحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أحمد بن عبد الجبار، حدَّثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق قال: حدّثني عبد الله بن أبي بكر بن عمرو بن حَزْم، عن عامر بن عبد الله بن الزُّبير، عن أم سلمة: أنها قالت لامرأةِ سلمة بن هِشام بن المُغيرة: ما لي لا أرى سلمةَ يَحضُر الصلاةَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ومع المسلمين؟ قالت: والله ما يستطيعُ أن يَخرُجَ، كلّما خَرَجَ صاحَ به الناسُ يا فُرّارُ، أفَرَرتُم في سبيل الله؟! حتى قعدَ في بيتِه فما يَخرُج، وكان في غزوة مُؤتةَ مع خالدِ بن الوليد [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি সালামাহ ইবনু হিশাম ইবনুল মুগীরাহ-এর স্ত্রীকে বললেন: কী ব্যাপার, আমি সালামাহকে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং মুসলিমদের সাথে সালাতে উপস্থিত থাকতে দেখছি না কেন? তিনি (সালামাহর স্ত্রী) বললেন: আল্লাহর কসম! সে তো বের হতে পারে না। যখনই সে বের হয়, মানুষজন তাকে ডেকে বলে: 'ওহে পলাতকগণ! তোমরা কি আল্লাহর রাস্তায় পালিয়েছিলে?!' ফলে সে তার ঘরে বসে আছে এবং আর বের হয় না। অথচ সে খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মু'তার যুদ্ধে ছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن عامر بن عبد الله بن الزبير لم يسمعه من أم سلمة كما تُوهمه رواية الحاكم هنا، وقد ساق الحاكم إسنادَ هذا الخبر في رواية البيهقيّ عنه في "الدلائل" 4/ 374 بسياقةٍ أضبط مما ساقه هنا، حيث قال: عن عامر بن عبد الله بن الزبير أنَّ أمَّ سلمة قالت لامرأة سلمة بن هشام. وكذلك جاء في رواية ابن الأعرابي وضوان بن أحمد عن أحمد بن عبد الجبار، وهذا أوفَقُ لرواية سائر من روى هذا الخبر عن ابن إسحاق، فقد ذكروا جميعًا في رواياتهم أنَّ عامرًا يرويه عن بعض آل الحارث بن هشام: أنَّ أمَّ سلمة قالت لامرأة سلمة بن هشام. وهذا أيضًا ليس فيه تصريح بسماع ذلك الرجل المبهم للخبر من أم سلمة، ففيه إبهام وإرسال، وقد روى الواقدي هذا الخبر في "مغازيه" 2/ 765 عن مصعب بن ثابت، عن عامر بن عبد الله بن الزبير، عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام قال: كان في ذلك البعث سلمة بن هشام بن المغيرة، فدخلت امرأته على أم سلمة … فإن ثبت كون ذلك الرجل المبهم أبا بكر بن عبد الرحمن فهو ثقة مشهور، ثم هو معروف بالرواية عن أم سلمة، لكن لم يقع في شيء من طرق هذا الخبر تصريح بتحديث أم سلمة لأبي بكر أو غيره، بل جميع طرقه مُشعِرة بإرساله، فالله أعلم بالصواب.وأخرجه البيهقيّ في "دلائل النبوة" 4/ 374 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن مَنْدَهْ في "معرفة الصحابة" 1/ 700 عن أبي العباس محمد بن يعقوب، به.وأخرجه ابن مَنْدَهْ 1/ 700 أحمد بن محمد بن زياد بن الأعرابي، وابن الأثير في "أسد الغابة" 6/ 427 من طريق أبي الحسين رضوان بن أحمد الصيدلاني، كلاهما عن أحمد بن عبد الجبار، به.وأخرجه ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 382 عن زياد بن عبد الله البكّائي، والطبري في "تاريخه" 3/ 42 من طريق سلمة بن الفضل الأبرشي، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (3417) من طريق إبراهيم بن سعد الزُّهْري، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر، عن عامر بن عبد الله بن الزبير، عن بعض آل الحارث بن هشام - وهم أخواله - عن أم سلمة قال: قالت أم سلمة لامرأة سلمة بن هشام …وأخرجه الواقدي في "المغازي" 2/ 765 عن مصعب بن ثابت، عن عامر بن عبد الله بن الزبير، عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، قال: كان في ذلك البعث سلمة بن هشام بن المغيرة، فدخلت امرأته على أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت أم سلمة ..









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4404)


4404 - أخبرنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدَّثنا الحسن بن الجَهم، حدَّثنا الحسين بن الفَرَج، حدَّثنا الواقِديّ، حدَّثنا خالد بن إلياسَ عن الأعرج، عن أبي هريرة قال: لقد كان بيني وبين ابن عَمٍّ لي كلامٌ فقال: ألا فِرارَك يومَ مُؤتةَ، فما دَريتُ أيَّ شيءٍ أقولُ له [1].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমার এবং আমার এক চাচার ছেলের (চাচাতো ভাইয়ের) মধ্যে কিছু কথা কাটাকাটি হয়েছিল। তখন সে বলল: মুতার যুদ্ধের দিন তোমার পলায়নের কথা মনে নেই? (সে এ কথা বলার পর) আমি তাকে কী জবাব দেব তা বুঝতে পারিনি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل الواقدي - وهو محمد بن عمر وشيخه خالد بن إلياس.وهو في مغازي "الواقدي" 2/ 765. فأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 145 - 146 من طريق أبي بكر البيهقيّ، عن أبي عبد الله الحاكم، عن أبي العباس محمد بن يعقوب، ومن طريق أبي طاهر المُخلِّص، عن رضوان بن أحمد الصيدلاني، كلاهما أحمد عن بن عبد الجبار، عن يونس بن بُكَير، عن المنذر بن ثعلبة، عن عبد الله بن بريدة مرسلًا.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 5/ 55، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 12/ 531، وإسحاق بن راهويه كما في "المطالب العالية" للحافظ ابن حجر (2148) عن وكيع بن الجراح، عن المنذر بن ثعلبة، عن عبد الله بن بريدة مرسلًا.ويشهد له مرسل قيس بن أبي حازم عند ابن سعد في "الطبقات" 5/ 54، وابن أبي شيبة 12/ 531 و 14/ 343، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 144 و 145، ووصله ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (84)، وابن حبان (4540)، وابن عساكر 2/ 27 و 46/ 144 بذكر عمرو بن العاص في إسناده، والأشبه إرساله، وإن كان قيس له رواية معروفة عن عمرو بن العاص، فإن ثبت سماعه لهذا الخبر منه فالإسناد صحيح، والله تعالى أعلم، وليس في حديث قيس بن أبي حازم ذكر لعمر بن الخطاب رضي الله عنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4405)


4405 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أحمد بن عبد الجبار، حدَّثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، عن المُنذر بن ثَعلبة، عن عبد الله بن بُريدة، عن أبيه قال: بعثَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عمرو بن العاص في غزوة ذات السَّلاسل، وفيهم أبو بكر وعمر، فلما انتهَوا إلى مكانِ الحربِ أمَرَهم عَمرو أن لا يُنوِّروا نارًا، فغضبَ عمرُ وهَمَّ أن ينالَ منه، فنهاهُ أبو بكر وأخبره أنه لم يستعملْه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عليكَ إِلَّا لِعِلْمِه بالحَرْب، فهَدَأَ عنه عمرُ [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জাতুস সালাসিল অভিযানে প্রেরণ করেন। তাঁদের মধ্যে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। যখন তাঁরা যুদ্ধের স্থানে পৌঁছলেন, তখন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদেরকে আগুন জ্বালাতে নিষেধ করলেন। এতে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগান্বিত হলেন এবং তাঁকে (আমরকে) তিরস্কার করতে চাইলেন। কিন্তু আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বারণ করলেন এবং জানালেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (আমরকে) যুদ্ধ সম্পর্কে তাঁর জ্ঞান থাকার কারণেই আপনার ওপর (নেতা হিসেবে) নিযুক্ত করেছেন। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শান্ত হলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم لكنه مرسلٌ، وقد وهم الحاكم رحمه الله هنا في كتابه هذا في إسناد الخبر في موضعين، فذكر فيه ابنَ إسحاق، ووصلَه بذكر بريدة الأسلمي، وإنما يرويه يونس بن بكير عن المنذر بن ثعلبة مباشرة عن عبد الله بن بريدة مرسلًا، وقد رواه البيهقيّ في "سننه الكبرى" 9/ 41، وفي "دلائل النبوة" 4/ 400 عن أبي عبد الله الحاكم، فأتى بالإسناد على الصواب، فلم يذكر ابنَ إسحاق فيه ولا بُريدة، فوافق في ذلك رواية رضوان بن أحمد الصيدلاني عن أحمد بن عبد الجبار. وكذلك رواه وكيع بن الجراح، عن المنذر بن ثعلبة، عن عبد الله بن بريدة مرسلًا. فأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 145 - 146 من طريق أبي بكر البيهقيّ، عن أبي عبد الله الحاكم، عن أبي العباس محمد بن يعقوب، ومن طريق أبي طاهر المُخلِّص، عن رضوان بن أحمد الصيدلاني، كلاهما أحمد عن بن عبد الجبار، عن يونس بن بُكَير، عن المنذر بن ثعلبة، عن عبد الله بن بريدة مرسلًا.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 5/ 55، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 12/ 531، وإسحاق بن راهويه كما في "المطالب العالية" للحافظ ابن حجر (2148) عن وكيع بن الجراح، عن المنذر بن ثعلبة، عن عبد الله بن بريدة مرسلًا.ويشهد له مرسل قيس بن أبي حازم عند ابن سعد في "الطبقات" 5/ 54، وابن أبي شيبة 12/ 531 و 14/ 343، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 144 و 145، ووصله ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (84)، وابن حبان (4540)، وابن عساكر 2/ 27 و 46/ 144 بذكر عمرو بن العاص في إسناده، والأشبه إرساله، وإن كان قيس له رواية معروفة عن عمرو بن العاص، فإن ثبت سماعه لهذا الخبر منه فالإسناد صحيح، والله تعالى أعلم، وليس في حديث قيس بن أبي حازم ذكر لعمر بن الخطاب رضي الله عنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4406)


4406 - حدّثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدَّثنا محمد بن أحمد بن النَّضْر الأزدي، حدَّثنا معاوية بن عمرو، حدَّثنا أبو إسحاق الفَزَاري، عن محمد بن أبي حَفْصة، عن الزُّهْري، عن عُبيد الله بن عبد الله، عن ابن عبّاس، قال: كان الفتحُ لثلاثَ عشرةَ خَلَتْ من شهرِ رمضانَ [1].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রমজান মাসের তেরো দিন অতিবাহিত হওয়ার পর (মক্কা) বিজয় সংঘটিত হয়েছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن وهم محمد بن أبي حفصة في جعله هذا من قول ابن عبّاس، إنما هو من قول الزُّهْري، فيما جزم به البيهقيُّ في "دلائله" 5/ 23، بدليل رواية معمر عن الزُّهْري عند عبد الرزاق (9738)، ومن طريقه أخرجه مسلم (1113) حيث روى قصة خروج النبي صلى الله عليه وسلم لفتح مكة، ففصَل فيه رواية ابن عبّاس في خروج النبي صلى الله عليه وسلم لفتح مكة عن قول الزُّهْري في بيان وقت الفتح، فأدرج ابن أبي حفص قول الزُّهْري ضمن خبر ابن عبّاس، واقتصر المصنِّف هنا على القسم المُدرج، فلم يُحسِن.على أنه اختُلف فيه على الزُّهْري أيضًا، فخالف معمرًا فيه يونسُ بن يزيد الأيلي عند البيهقيّ في "الدلائل" 5/ 23 - 24 فروى عن الزُّهْري: أنَّ الفتح كان لثلاث عشرة بقيت من رمضان. وهذا فرق بيِّن بين الروايتين. وقد روى محمد بن إسحاق عن الزُّهْري عن عُبيد الله عن ابن عبّاس قصة خروج النبي صلى الله عليه وسلم لفتح مكة، وأرَّخ الخروج من المدينة للفتح بأنه كان لعشر خلون من رمضان، وهو مدرج أيضًا في الرواية عن ابن عبّاس؛ أعني تاريخ الخروج، كما جزم به البيهقيّ أيضًا في "الدلائل" 5/ 20، مستدلًّا برواية صدقة بن سابِق عن ابن إسحاق التي اقتصر فيها ابن إسحاق على ذكر خروج النبي صلى الله عليه وسلم للفتح من قوله هو دون ذكر القصة. وهو كما قال البيهقيّ، لأنَّ جماعة أصحاب الزُّهْري كمعمر وعُقيل بن خالد والليث وابن جريج وغيرهم ممَّن روى عنه قصة خروج النبي صلى الله عليه وسلم لفتح مكة لم يذكروا فيها تاريخ الخروج ولا تاريخ الفتح، فبانَ بذلك أنَّ ما ذكره ابن أبي حفصة وابن إسحاق ليس في خبر ابن عبّاس، إنما هو مدرج فيه، والله أعلم.وأخرجه أحمد 4/ (2500) عن معاوية بن عمرو، بهذا الإسناد.وانظر ما بعده.وانظر لزامًا كلام الحافظ في "فتح الباري" 12/ 496 - 497.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4407)


4407 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أحمد بن عبد الجبار، حدَّثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، قال: حدّثني الزُّهري، عن عُبيد الله بن عبد الله بن عُتبة، عن ابن عبّاس، قال: مضى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه عامَ الفتح حتى نَزَلَ مَرَّ الظَّهْران في عشرة آلاف من المسلمين، فَسَبَّعتْ سُليمٌ وألَّفتْ مُزَينةُ، وفي كلِّ القبائل عددٌ وإسلامٌ، وأوعَبَ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم المهاجِرُون والأنصارُ، فلم يَتَخَلّف عنه منهم أحدٌ، وقد عُمِّيتَ الأخبارُ على قُريش، فلا يأتيهم خَبرُ رسولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم، ولا يَدْرُون ما هو صانعٌ.وكان أبو سفيان بن الحارث وعبدُ الله بن أبى أُميّة بن المغُيرة قد لَقِيا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بثَنِيّةِ [1] العُقاب فيما بين مكة والمدينة، فالْتَمَسا الدخولَ عليه، فكلّمَتْه أمُّ سلمة، فقالت: يا رسول الله، ابن عَمِّك وابن عَمَّتِك وصِهْرُك، فقال: "لا حاجةُ لي فيهم، أما ابن عَمِّي فهَتَكَ عِرْضِي، وأما ابن عمّتي وصِهْري فهو الذي قال لي بمكة ما قالَ"؛ فلما خرج الخبرُ إليهما بذلك، ومع أبي سفيان بن الحارث ابنٌ له فقال: والله لَيأْذَنَنَّ رسولُ صلى الله عليه وسلم أو لأخُذَنّ بيَدِ ابني هذا، ثم لَنَذْهَبنّ في الأرض حتى نموتَ عَطَشًا أو جُوعًا، فلما بلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم رقَّ لهما، فدخَلا عليه.فأنشدَه أبو سفيان قولَه في إسلامِه واعتذارِه ممّا كان مَضى منه، فقال:لَعَمرُكَ إني يومَ أحملُ رايةً … لتَغلِبَ خَيلُ اللَّاتِ خَيلَ محمدِلَكالمُدْلِجِ الحَيرانِ أظْلَمَ لَيلُهُ … فهذا أَوانُ الحقِّ أُهدَى وأَهتَدِيفقُل لثَقِيفٍ: لا أريدُ قِتالَكم … وقُل لثَقِيفٍ: تلك عندي فأوعِدِهدانيَ هادٍ غيرُ نفسِي ودَلَّني … إلى الله مَن طَرَّدتُ كلَّ مُطَرَّدِأَفِرُّ سريعًا جاهدًا عن محمدٍ … وأُدعى ولو لم أَنتَسِبْ لمحمّدِهمُ عُصبةٌ مَن لم يَقُلْ بِهَواهُمُ … وإن كان ذا رأي يُلَمْ ويُفنَّدِأريدُ لِأُرضِيهِمْ ولستُ بِلائطٍ [2] … معَ القومِ ما لم أُهدَ في كلِّ مَقعَدِفما كنتُ في الجيش الذي نالَ عامرًا … ولا كَلَّ عن خَيرٍ لِساني ولا يَديقَبائلُ جاءتْ من بلادٍ بعيدةٍ … تَوابِعُ جاءت من سِهامٍ وسُرْدَدِ [3]وإنَّ الذي أخرجتُمُ وشَتمتُمُ … سيَسْعى لكُم سَعْيَ امرئٍ غيرِ قُعْدُدِقال [4]: فلما أَنشَدَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم: إلى الله مَن طَرّدتُ كلَّ مُطرَّدِ، ضربَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في صَدْرِه، فقال: "أنت طَرَّدتني كلَّ مُطرَّدٍ". قال ابن إسحاق: ماتت أم رسول الله صلى الله عليه وسلم بالأبْواء، وهي تَزُور أخوالَها من بني النَّجّار [5]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.وأبو سفيان بن الحارث أخو رسول الله صلى الله عليه وسلم من الرَّضاعة أرضَعَتْهما حليمةُ، وابنُ عمِّه، ثم عامَلَ النبيَّ صلى الله عليه وسلم بمعامَلاتٍ قَبيحةٍ وهَجَاه غيرَ مرةٍ، حتى أجابه حسّان بن ثابت بقصيدته التي يقول فيها:هَجَوتَ محمدًا وأجَبتُ عنهُ … وعندَ اللهِ في ذاكَ الجزاءُالحديث والقصيدة بطولهما مخرّج في الصحيح لمسلم رحمه الله تعالى [6]، وقد كان حسانُ بن ثابت يستأذنُ رسول الله صلى الله عليه وسلم أَن يَهجُوَه، فلا يأذنُ له [-4].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে নিয়ে মক্কা বিজয়ের বছর যাত্রা শুরু করলেন। অবশেষে তিনি মার্রুয যাহরান নামক স্থানে দশ হাজার মুসলিমের সাথে অবতরণ করলেন। সুলাইম গোত্র সাত ভাগে এবং মুযাইনাহ গোত্র এক হাজার সৈন্যের দল গঠন করেছিল। সকল গোত্রেরই উল্লেখযোগ্য সংখ্যক মুসলিম উপস্থিত হয়েছিল। মুহাজির ও আনসারগণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে পূর্ণরূপে অংশ নিয়েছিলেন, তাদের কেউ পিছিয়ে থাকেনি।

কুরাইশদের কাছে সংবাদ গোপন রাখা হয়েছিল। তাই তাদের কাছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো খবর পৌঁছাচ্ছিল না এবং তিনি কী করতে চলেছেন, তা তারা জানতে পারছিল না।

আবূ সুফিয়ান ইবনু হারিস এবং আব্দুল্লাহ ইবনু আবী উমাইয়্যাহ ইবনু মুগীরাহ মক্কা ও মদীনার মধ্যবর্তী স্থানে সানিয়্যাতুল উক্বাব নামক গিরিপথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলেন এবং তাঁর কাছে প্রবেশ করার অনুমতি চাইলেন।

তখন উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সাথে কথা বললেন এবং বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! এ হলো আপনার চাচাতো ভাই, খালাতো ভাই এবং আপনার আত্মীয়।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাদের প্রতি আমার কোনো আগ্রহ নেই। আমার চাচাতো ভাই (আবূ সুফিয়ান), সে আমার সম্মান ক্ষুণ্ণ করেছে। আর আমার খালাতো ভাই ও আত্মীয় (আব্দুল্লাহ ইবনু আবী উমাইয়্যাহ), সে মক্কায় আমাকে এমন কথা বলেছিল যা সে বলেছিল।"

যখন তাদের কাছে এ সংবাদ পৌঁছাল, তখন আবূ সুফিয়ান ইবনু হারিসের সাথে তার এক পুত্র ছিল। তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হয় আমাকে অবশ্যই অনুমতি দেবেন, অথবা আমি আমার এই ছেলের হাত ধরে দেশ ছেড়ে চলে যাব, যতক্ষণ না আমরা তৃষ্ণা বা ক্ষুধায় মারা যাই।

যখন এ সংবাদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছাল, তিনি তাদের প্রতি সদয় হলেন এবং তারা তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন। আবূ সুফিয়ান তখন ইসলাম গ্রহণের পর নিজের অতীতের কর্মকাণ্ডের জন্য ক্ষমা চেয়ে কবিতা আবৃত্তি করলেন:

"তোমার জীবনের কসম! আমি যখন সেই ঝান্ডা বহন করতাম, যাতে লাতের অশ্বারোহী বাহিনী মুহাম্মাদের অশ্বারোহী বাহিনীকে পরাজিত করে—
তখন আমি ছিলাম সেই দিশেহারা রাতের পথিকের মতো, যার রাত্রি অন্ধকারাচ্ছন্ন।
কিন্তু এইতো সত্যের সময়, আমি হিদায়াতপ্রাপ্ত হয়েছি এবং হিদায়াত করছি।
সুতরাং সাকীফকে বলে দিন, আমি তোমাদের সাথে লড়াই করতে চাই না।
এবং সাকীফকে বলে দিন, আমার কাছে সে অঙ্গীকার রয়েছে, তাই তাদের সতর্ক করে দিন।
আমার নিজের আত্মা ছাড়া অন্য এক পথপ্রদর্শক আমাকে পথ দেখিয়েছে,
আল্লাহর দিকে পরিচালিত করেছেন তিনি, যাঁর উপর আমি সর্বদা নির্যাতন করতাম।
আমি দ্রুত বেগে কষ্ট করে মুহাম্মাদ থেকে পালাতাম,
কিন্তু আমি আহূত হয়েছি, যদিও আমি মুহাম্মাদের সাথে নিজেকে যুক্ত করতাম না।
তারা এমন এক দল, যারা তাদের পছন্দের কথা না বললে,
যদি সে যুক্তিবাদীও হয়, তবে তাকে তিরস্কার করা হয় ও মিথ্যাবাদী বলা হয়।
আমি তাদের সন্তুষ্ট করতে চাই, কিন্তু আমি জাতির সাথে যুক্ত থাকতে পারি না
যদি না আমি প্রতিটি বৈঠকেই হিদায়াতপ্রাপ্ত হই।
আমি সেই বাহিনীর অন্তর্ভুক্ত ছিলাম না যারা 'আমির'কে কষ্ট দিয়েছিল,
আমার জিহ্বা ও হাত কখনো কোনো কল্যাণের কথা বলতে ক্লান্ত হয়নি।
বিভিন্ন জনপদ থেকে গোত্রগুলো এসেছিল,
যারা ছিল সিহাম ও সুরুদাদের অনুগামী।
আর তোমরা যাকে বহিষ্কার করেছ ও গালি দিয়েছ,
সে অকর্মণ্য ব্যক্তির মতো নয়, বরং সে তোমাদের জন্য চেষ্টা করবে।"

(ইবনু ইসহাক) বলেন: যখন আবূ সুফিয়ান রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে এই চরণটি আবৃত্তি করলেন: ‘...এবং আমাকে আল্লাহর দিকে পরিচালিত করেছেন তিনি, যাঁর উপর আমি সর্বদা নির্যাতন করতাম,’ তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বুকে মৃদু আঘাত করলেন এবং বললেন: "তুমিই তো আমার উপর সর্বদা নির্যাতন করতে।"

ইবনু ইসহাক বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মা আবওয়া নামক স্থানে মারা যান, যখন তিনি বানী নাজ্জার গোত্রের তার মামাদের দেখতে যাচ্ছিলেন।

এই হাদীসটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ, কিন্তু তারা (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি।

আবূ সুফিয়ান ইবনু হারিস ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুধ ভাই—তাঁদের দু'জনকেই হালীমাহ দুধ পান করিয়েছিলেন—এবং তিনি তাঁর চাচাতো ভাইও ছিলেন। পরবর্তীতে তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বহু খারাপ আচরণ করেন এবং বেশ কয়েকবার তাঁকে ব্যঙ্গ করে কবিতা বলেন, যার জবাব দিয়েছিলেন হাসসান ইবনু সাবিত তাঁর সেই কাসীদার মাধ্যমে, যেখানে তিনি বলেন:

"তুমি মুহাম্মাদকে ব্যঙ্গ করেছ, আর আমি তার জবাব দিয়েছি,
আর এর পুরস্কার আল্লাহর কাছেই রয়েছে।"

সম্পূর্ণ হাদীস ও কাসীদাটি সহীহ মুসলিমে উদ্ধৃত হয়েছে। হাসসান ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুমতি চাইতেন যেন তিনি আবূ সুফিয়ানকে ব্যঙ্গ করতে পারেন, কিন্তু তিনি তাঁকে অনুমতি দেননি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا جاء في رواية يونس بن بُكير هنا وفي أسد الغابة" 3/ 73 كما نبَّه على ذلك مُحقِّقه، وفي رواية غيره عن ابن إسحاق: بنيق العقاب، وهو الصحيح كما بينه محقق "أسد الغابة".



[2] تحرَّف في (ص) و (ع) إلى: بلافظ. واللائط: المُلصَق.



4407 [3] - تحرَّف في (ز) و (م) و (ب) إلى: سودد، بالواو، والمثبت على الصواب من (ص) و (ع)، وداله الأولى تُضم وتُفتح كما في "معجم البلدان"، وقال السُّهيلي في "الروض الأُنف" 4/ 98: سهام وسُرْدَد موضعان من أرض عَكّ. يعني في اليمن.



4407 [4] - القائل هو ابن إسحاق كما تشير إليه رواية البيهقيّ في "دلائل النبوة" 5/ 28 عن أبي عبد الله الحاكم، وتوضحه الروايات الأخرى عن ابن إسحاق التي صدّرها ابن إسحاق بقوله: فزعموا أنه حين أنْشَدَ رسولَ الله … أو فذكروا أنه حين …



4407 [5] - إسناده حسن من أجل ابن إسحاق: وهو محمد بن إسحاق بن يسار. وقد صحَّحه الحافظُ ابن حجر في "المطالب العالية" (4301).وأخرجه البيهقيّ في دلائل النبوة 5/ 27 عن أبي عبد الله الحاكم وأبي بكر الحيري، كلاهما عن أبي العباس محمد بن يعقوب، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن الأثير في أسد الغابة 3/ 73 و 5/ 145 من طريق رضوان بن أحمد الصيدلاني، عن أحمد بن عبد الجبار، به.وأخرجه ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 400 عن زياد بن عبد الله البَكّائي، والطبراني في "المعجم الكبير" 8/ (7264) من طريق محمد بن سلمة الحَرَّاني، كلاهما عن محمد بن إسحاق، به، مع زيادات ليست في رواية المصنف.وأخرجه أحمد 4/ (2394)، وأبو نُعيم في معرفة الصحابة" (6231) من طريق إبراهيم بن سعد الزُّهْري، عن محمد بن إسحاق به. أما أحمد فاقتصر في روايته على ذكر نزوله صلى الله عليه وسلم بمرِّ الظهران ومعه عشرة آلاف من المسلمين، وأما أبو نعيم فاقتصر على ذكر قصة أبي سفيان بن الحارث وعبد الله بن أبي أمية، وذكر لأبي سفيان في اعتذاره أبياتًا غير الأبيات المذكورة هنا. وعندهما زيادات ليست في رواية المصنف هنا أيضًا.وأخرجه الطبري 3/ 49 - 50 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، ومحمد بن يحيى الذُّهلي في "الزُّهْريات" كما في "إتحاف الخيرة" للبوصيري (4603)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 319، والضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 11/ (145) من طريق عبد الله بن إدريس، وإسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" (4603) من طريق جَرير بن حازم، ثلاثتهم عن محمد بن إسحاق، به دون قصة إسلام أبي سفيان بن الحارث وابن أبي أمية وشِعر أبي سفيان في اعتذاره. ولهم زيادات أيضًا في قصة الفتح ليست في رواية المصنف هنا.وأخرجه مختصرًا أحمد 5/ (3089)، والبخاري (4276) من طريق معمر بن راشد، عن الزُّهْري، به. بذكر خروجه صلى الله عليه وسلم من المدينة في رمضان للفتح ومعه عشرة آلاف على رأس ثمان سنين ونصف من مَقدمِه المدينة.وأخرج الطبري في "تاريخه" 3/ 50 قصة إسلام أبي سفيان وابن أبي أمية، من طريق سلمة بن الفضل، عن محمد بن إسحاق، عن العباس بن عبد الله بن معبد بن العباس بن عبد المطلب، عن ابن عباس. ويغلب على الظن أنه سقط من هذا الإسناد الواسطة بين ابن عباس والراوي عنه، فقد أخرج أبو داود (3022) بعض قصة الفتح عن محمد بن عمرو الرازي، عن سلمة بن الفضل، عن ابن إسحاق، عن العباس بن عبد الله، عن بعض أهله، عن ابن عبّاس. وقد اجتمع عند ابن إسحاق لهذه القصة إسنادان كل منهما ينتهي إلى ابن عبّاس.ومَرُّ الظَّهْران: وادٍ من أودية الحجاز، يأخذ مياه النخلتين فيمر شمال مكة على بعد 22 كم، ويصب في البحر جنوب جدة بقرابة 20 كم.وسبَّعت سُليم وألَّفت مُزينة: كَمَلَت سُليم سبع مئة رجل وكَمَلَت مُزينة ألف رجل.وعُمِّيت الأخبارُ: أُخفيت.وهتك عرضي: يعني أنه هجا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم.والمُدلِجُ: الذي يسير بالليل.ويُفنَّد: يُلام ويكذّب.وأوعِد، أي: هَدِّد.والقُعْدد، بضم الدال الأولى وفتحها: اللئيم في حَسَبه، القاعد عن الحرب والمكارم.وطَرَّدتُ كلَّ مُطَرَّد: أي: أبْعَدتُه وبالغتُ في إبعاده وطرده.



4407 [6] - هو عند مسلم برقم (2490) من حديث عائشة أم المؤمنين رضي الله عنها.



4407 [-4] - أخرجه مسلم أيضًا (2489) من حديث عائشة كذلك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4408)


4408 - حدَّثنا أبو بكر أحمد بن سَلْمان الفقيه ببغداد، حدَّثنا أبو داود سليمان بن الأَشْعث، حدَّثنا عثمان بن أبي شَيْبة، حدّثني أحمد بن المفضّل، حدَّثنا أسباطُ ابن نَصْر، قال: زَعَمَ السُّدِّيُّ، عن مُصعب بن سَعْد، عن سعدٍ قال: لما كان يومُ فتح مَكةَ اختَبأ عبدُ الله بن سَعْد بن أبي سَرْحٍ عند عثمان بن عفان، فجاءَ به حتى أوقَفَه على النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسولَ الله، بايعْ عبدَ الله، فرفع رأسَه فنَظَر إليه ثلاثًا، ثم أقبَلَ على أصحابِه، فقال: "أما كان فيكُم رجلٌ رَشِيدٌ يقومُ إلى هذا حين رآني كَفَفْتُ يدي عن بَيعَتِه فيَقْتُلَه؟ " فقالوا: ما نَدري يا رسول الله ما في نفسك، ألَا أَومأْتَ إلينا بعَينِك؟ فقال: "إنه لا يَنبَغي لِنبي أن تكون له خائنةُ الأَعيُنِ" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন মক্কা বিজয়ের দিন হলো, তখন আবদুল্লাহ ইবনু সা'দ ইবনু আবী সারহ উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লুকিয়ে গেলেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে নিয়ে আসলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে দাঁড় করালেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আবদুল্লাহর বায়আত (শপথ) গ্রহণ করুন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথা উঁচু করে তিনবার তার দিকে তাকালেন। এরপর তিনি সাহাবীদের দিকে ফিরে বললেন: "তোমাদের মধ্যে কি এমন কোনো বিচক্ষণ ব্যক্তি ছিল না, যে আমার হাত তার বায়আত গ্রহণ থেকে বিরত থাকতে দেখে তার দিকে এগিয়ে গিয়ে তাকে হত্যা করত?" তাঁরা বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনার অন্তরে কী ছিল, তা আমরা জানতাম না। আপনি যদি চোখ দিয়ে ইশারা করতেন! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নবীর জন্য চোখে প্রতারণার ইশারা করা উচিত নয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل أسباط بن نَصْر والسُّدِّي: واسمه إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كَريمة. وهو في "سنن أبي داود" (2683) و (4359).وأخرجه النسائي (3516) عن القاسم بن زكريا بن دينار، عن أحمد بن المفضَّل، بهذا الإسناد.وخائنة الأعيُن: أن يُضمر في قلبه غير ما يُظهره للناس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4409)


4409 - حدثناه بكر بن محمد الصيرفي بمَرْو، حدَّثنا إبراهيم بن هلال، حدَّثنا علي بن الحسن بن شَقِيق، حدَّثنا الحُسين بن واقِد، عن يزيد النَّحوي، عن عِكْرمة، عن ابن عبّاس، قال: كان عبدُ الله بن أبي سَرْح يكتب لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فأزلَّه الشيطان فلَحِقَ بالكُفّار، فأمر به رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يُقتل، فاستجارَ له عثمانُ فأجارَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم [1].صحيح على شرط البخاريّ، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনে আবি সারহ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য লেখক হিসেবে কাজ করতেন। অতঃপর শয়তান তাকে পদস্খলিত করল এবং সে কাফিরদের সাথে যোগ দিল। ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে হত্যার নির্দেশ দিলেন। তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার জন্য নিরাপত্তা প্রার্থনা করলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে নিরাপত্তা প্রদান করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث قوي، وهذا إسناد حسن من أجل إبراهيم بن هلال - وهو ابن عمر البُوزَنْجِرْدي - وقد توبع فيما تقدم برقم (3401). والحسين بن واقد قوي الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4410)


4410 - فحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أحمد بن عبد الجبّار، حدَّثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، قال: حدّثني شُرَحْبيل بن سَعْد، قال: نزلتْ في عبد الله بن أبي سَرْحٍ: {وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ قَالَ أُوحِيَ إِلَيَّ وَلَمْ يُوحَ إِلَيْهِ شَيْءٌ وَمَنْ قَالَ سَأُنْزِلُ مِثْلَ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ} [الأنعام: 93]، فلما دخَلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مكةَ فَرَّ إلى عثمان بن عفان، وكان أخاه من الرَّضاعة، فَغَيَّبه عنده حتى اطمأن أهل مكة، ثم أتى به رسول الله صلى الله عليه وسلم فاستأمَنَ [1].قال الحاكم: قد صحّتِ الرواية في الكتابَين [2] أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرَ قبلَ دخولِه مكةَ بقتلِ عبد الله بن سَعْد وعبد الله بن خَطَل، فمن نَظَر في مَقتَل أمير المؤمنين عثمان بن عفّان وجِنايات عبد الله بن سَعْد عليه بمصر إلى أن كان من أمرِه ما كان، عَلِمَ أَنَّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان أعرفَ به.




শুরুহবীল ইবনে সা'দ থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আব্দুল্লাহ ইবনে আবি সারহ সম্পর্কে (এই আয়াতটি) নাযিল হয়েছিল: "আর যে ব্যক্তি আল্লাহ্‌র উপর মিথ্যা আরোপ করে, অথবা যে বলে: 'আমার উপর ওহী নাযিল করা হয়েছে' অথচ তার উপর কোনো কিছুই ওহী করা হয়নি, এবং যে ব্যক্তি বলে: 'আমিও আল্লাহ্‌ যা নাযিল করেছেন, তার মতো নাযিল করব' তার চেয়ে বড়ো জালেম আর কে হতে পারে?" (সূরা আল-আন’আম: ৯৩)

এরপর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় প্রবেশ করলেন, তখন সে (আব্দুল্লাহ ইবনে আবি সারহ) পালিয়ে গিয়ে উসমান ইবনে আফ্‌ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আশ্রয় নিল। সে ছিল তাঁর দুধভাই। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে তাঁর কাছে লুকিয়ে রাখলেন যতক্ষণ না মক্কার লোকেরা শান্ত হলো। এরপর তিনি তাকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলেন এবং তার জন্য নিরাপত্তা চাইলেন।

ইমাম হাকেম বলেন: উভয় কিতাবে (সহীহ বুখারী ও সহীহ মুসলিমের প্রতি ইঙ্গিত) বর্ণনাটি সহীহ হিসেবে সাব্যস্ত হয়েছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় প্রবেশের পূর্বেই আব্দুল্লাহ ইবনে সা'দ এবং আব্দুল্লাহ ইবনে খাতালকে হত্যার নির্দেশ দিয়েছিলেন। সুতরাং যে ব্যক্তি আমীরুল মুমিনীন উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হত্যাকাণ্ড এবং মিসরে আব্দুল্লাহ ইবনে সা'দের অপরাধসমূহ লক্ষ্য করবে, যা শেষ পর্যন্ত তাঁর (উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) মর্মান্তিক পরিণতির কারণ হয়েছিল, সে অবশ্যই জানতে পারবে যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (আব্দুল্লাহ ইবনে সা'দকে) অন্যদের চেয়ে ভালো জানতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف شُرَحْبيل بن سَعْد، وهو تابعي فخبره هذا مُرسَل، على أنَّ قصة ابن أبي سرح قد صحَّت من غير هذا الطريق كما في الحديثين المتقدمين قبله.وأخرجه الواحدي في أسباب النزول (4421) عن أبي القاسم عبد الرحمن بن أحمد بن عبدان الكحال، عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وقد رُوي نحو ما جاء هنا من أنَّ الآية نزلت في عبد الله بن أبي سَرْح عن السُّدِّي مرسلًا عند الطبري في "تفسيره" 7/ 273، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 4/ 1346، ورجاله لا بأس بهم.وروي عن عكرمة مرسلًا أيضًا بإسناد لا بأس به عند الطبري 7/ 273: أنَّ الذي نزل في عبد الله بن أبي سَرْح من الآية قوله سبحانه: {وَمَنْ قَالَ سَأُنْزِلُ مِثْلَ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ}، وأنَّ بقيتها نزل في مُسيلمة اليَماميّ الكذاب. عن أبي العباس، وهو الموافق لرواية رضوان من أحمد الصيدلاني عن أحمد بن عبد الجبار عند ابن الأثير في أسد الغابة 3/ 478، وفي أصول "المستدرك": يَسْري، وما أثبتناه أوجَهُ.



[2] يريد بالكتابين صحيحي البخاريّ ومسلم والخبر على هذا الوجه ليس عندهما، وهو مخرَّج في "السنن"، وقد سلف عند المصنف برقم (2360) من حديث سعد بن أبي وقاص، والذي عند البخاريّ (1846) ومسلم (1357) من حديث أنس بن مالك: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم لما دخل مكة عام الفتح جاءه رجل فقال: إنَّ ابن خطل متعلق بأستار الكعبة، فقال: "اقتلوه". عن أبي العباس، وهو الموافق لرواية رضوان من أحمد الصيدلاني عن أحمد بن عبد الجبار عند ابن الأثير في أسد الغابة 3/ 478، وفي أصول "المستدرك": يَسْري، وما أثبتناه أوجَهُ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4411)


4411 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أحمد بن عبد الجبّار، حدَّثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، قال: حدَّثنا يحيى بن عَبّاد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه عَبّاد بن عبد الله، عن أسماء بنت أبي بكر الصِّدِّيق، قالت: لما كان عامُ الفَتحِ ونزلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ذا طُوى، قال أبو قُحافةَ لابنةٍ له - وكانت أصغرَ ولدِه -: أي بُنيّةُ، أَشْرفي بي على أبي قُبَيس - وقد كُفَّ بصرُه - فأشرفَتْ به عليه، فقال: أي بُنيّةُ، ماذا تَرَين؟ قالت: أرى سَوادًا مجتمِعًا، وأَرى رجلًا يشتدُّ [1] بين ذلك السَّواد مُقبِلًا [ومُدبِرًا] [2]، فقال: تلك الخَيلُ يا بُنيّة، ثم قال: ماذا تَرَين؟ فقالت: أرى السَّواد قد انتشَرَ، فقال: إذًا واللهِ دُفِعَتِ الخَيلُ، فأسرِعى بي يا بُنيّةُ إلى بيتي، فَخَرجَتْ سريعًا حتى إذا هَبَطَتْ به إلى الأبْطَحِ؛ وكان في عنقها طَوقٌ لها من وَرِق، فاقتطعه إنسانٌ من عُنُقِها، فلما دخل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم المسجدَ خرجَ أبو بكر حتى جاءَ بأبيهِ يَقُودُه، فلما رآه صلى الله عليه وسلم قال: "هَلَا تَركْتَ الشيخَ في بَيتِه حتى أَجِيئَه" فقال: يَمْشي هو إليكَ يا رسول الله أحقُّ مِن أن تمشيَ إليه، فأجلَسَه بين يَدَيه، ثم مَسَحَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم صَدْرَه، وقال: "أسلِمْ تَسلَمْ" فأسلَمَ، ثم قامَ أبو بكر فأخذَ بيدِ أُختِه، فقال: أَنشُدُ باللهِ والإسلامِ طَوقَ أُختي، فواللهِ ما جاء به أحدٌ، ثم قال الثانيةَ: أنشُدُ باللهِ والإسلامِ طَوقَ أُختي، فما جاء به أحدٌ، فقال: يا أُخيّةُ، احتَسِبي طَوقَكِ، فواللهِ إِنَّ الأمانةَ في الناس لَقليلٌ [3].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আসমা বিনতে আবী বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন বিজয়ের বছর এলো এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যু-তুওয়ায় অবস্থান গ্রহণ করলেন, তখন আবূ কুহাফা তার এক মেয়েকে—যে তার ছোট সন্তান ছিল—বললেন, ‘হে আমার প্রিয় কন্যা, আমাকে নিয়ে আবূ কুবায়স (পাহাড়ের) উপর ওঠো।’ তার দৃষ্টিশক্তি ক্ষীণ হয়ে গিয়েছিল। তখন সে তাকে নিয়ে সেখানে উঠল। তিনি বললেন, ‘হে আমার প্রিয় কন্যা, তুমি কী দেখছ?’ সে বলল, ‘আমি একটি জমায়েত কালো স্তূপ দেখছি এবং ওই কালো স্তূপের মধ্যে একজনকে দ্রুত আসা-যাওয়া করতে দেখছি।’ তিনি বললেন, ‘ওগুলো ঘোড়সওয়ার, হে আমার প্রিয় কন্যা।’ এরপর তিনি বললেন, ‘আর কী দেখছ?’ সে বলল, ‘আমি দেখছি কালো স্তূপটি ছড়িয়ে পড়েছে।’ তিনি বললেন, ‘তাহলে আল্লাহর কসম, ঘোড়সওয়ার বাহিনী অগ্রসর হয়েছে! হে আমার প্রিয় কন্যা, তুমি আমাকে নিয়ে দ্রুত আমার ঘরে চলো।’

সে দ্রুত বের হলো এবং তাকে নিয়ে আবতাহ উপত্যকায় নামল। তার গলায় রূপার একটি হার ছিল, একজন লোক তা তার গলা থেকে ছিনিয়ে নিল।

যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাসজিদে প্রবেশ করলেন, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হয়ে আসলেন এবং তার পিতাকে পথ দেখিয়ে নিয়ে আসলেন। যখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে দেখলেন, তখন বললেন, ‘বৃদ্ধকে তার ঘরে রেখে এলে না কেন? আমিই না হয় তার কাছে যেতাম!’ তিনি বললেন, ‘তিনিই আপনার কাছে হেঁটে আসবেন, হে আল্লাহর রাসূল, আপনার তার কাছে যাওয়া অপেক্ষা এটা অধিক উপযোগী।’

অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তাঁর সামনে বসালেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার বুক মুছে দিলেন এবং বললেন, ‘আপনি ইসলাম গ্রহণ করুন, আপনি নিরাপত্তা পাবেন (সফল হবেন)।’ ফলে তিনি ইসলাম গ্রহণ করলেন।

এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন এবং তার বোনের হাত ধরে বললেন, ‘আল্লাহর এবং ইসলামের নামে তোমাদের কাছে আমার বোনের হারটির সন্ধান চাই!’ আল্লাহর কসম! কেউ তা নিয়ে এলো না। এরপর তিনি দ্বিতীয়বার বললেন, ‘আল্লাহর এবং ইসলামের নামে তোমাদের কাছে আমার বোনের হারটির সন্ধান চাই!’ তখনও কেউ তা নিয়ে এলো না। অতঃপর তিনি বললেন, ‘হে আমার বোন, তুমি তোমার হারটির সাওয়াব আল্লাহর কাছে আশা করো। আল্লাহর কসম! মানুষের মধ্যে আমানতদারী নিশ্চয়ই কম।’




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك جاء في رواية البيهقيّ في "دلائل النبوة" 5/ 95 عن أبي عبد الله الحاكم ورجل آخر عن أبي العباس، وهو الموافق لرواية رضوان من أحمد الصيدلاني عن أحمد بن عبد الجبار عند ابن الأثير في أسد الغابة 3/ 478، وفي أصول "المستدرك": يَسْري، وما أثبتناه أوجَهُ.



[2] قوله "ومدبرًا" أثبتناه من رواية البيهقيّ عن الحاكم، وهو ثابت في رواية رضوان بن أحمد عن أحمد بن عبد الجبار.



4411 [3] - إسناده حسن من أجل ابن إسحاق.وأخرجه أحمد 44/ (26956)، وابن حبان (7208) من طريق إبراهيم بن سعد الزُّهْري، عن محمد بن إسحاق، بهذا الإسناد.ذو طُوى: موضع بمكة، وهو وادٍ من أوديتها، يسيل في سفوح جبل أذاخر والحَجْون من الغرب.وأبو قُبيس: جبل من جبال مكة يُشرف على المسجد الحرام من مطلع الشمس.والأبطح: مكان كان ينزل فيه الحاجُّ إذا رجع من منى، وهو جِزْعٌ من وادي مكة بين المُنحنى إلى الحَجُون، ثم تليه البطحاء إلى المسجد الحرام.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4412)


4412 - حدَّثنا أبو عبد الله الحسين بن الحسن بن أيوب الطُّوسي، حدَّثنا أبو حاتم محمد بن إدريس، حدَّثنا سليمان بن حَرْب، حدَّثنا حماد بن زيد، حدَّثنا أيوب، حدَّثنا أبو قِلابة، عن عَمرو بن سَلِمةَ، ثم قال: هو حيٌّ، ألا تَلْقاهُ فتسمعَ منه، فلقيتُ عَمرًا، فحدّثني بالحديث، قال: كنا بممرِّ الناسِ فتُحدِّثُنا الرُّكبانُ، فنسألُهم ما هذا الأمرُ، وما لِلناس؟ فيقولون: نبيٌّ زَعَمَ أَنَّ الله تعالى أرسلَه، وأنَّ الله أوحَى إليه كذا وكذا، وكانت العربُ تَلَوَّمُ بإسلامها الفتحَ، ويقولون: انظُروه، فإن ظهرَ فهو نبيٌّ فصَدِّقُوه، فلما كانَ وقعةُ الفتحِ بادَرَ كلُّ قومٍ بإسلامهم، فانطَلقَ أبي بإسلامهم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقَدِم فأقامَ عنده كذا وكذا، ثم جاء مِن عنده فتلقَّيناهُ، فقال: جئتُكم من عند رسول الله حَقًّا، وإنه يأمرُكم بكذا وكذا، فإذا حَضَرتِ الصلاةُ فليُؤذِّنْ أحدُكم وليَؤمَّكُم أكثرُكم قرآنًا، فنَظَروا فلم يَجِدُوا أكثرَ قُرآنًا مني، فقدَّموني، وأنا ابن سبعِ سنين أو ستِّ سنين، فكنتُ أصلِّي فإذا سجدتُ تَقلّصتْ بُردةٌ عليَّ، قال: تقولُ امرأَةٌ من الحيّ: غَطُّوا عنّا اسْتَ قارِئِكم، قال: فكُسِيتُ مُعَقَّدَةً من مُعَقَّد البَحرَينِ [1] بستةِ دراهمِ أو سبعةٍ، فما فَرِحتُ بشيءٍ كَفَرَحي بذلك [2]. قد روى البخاريّ هذا الحديث عن سليمان بن حَرْبٍ مختصرًا فأخرجتُه بطوله!




আমর ইবনু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মানুষের চলাচলের পথে থাকতাম। আরোহীরা আমাদের সাথে কথা বলত। আমরা তাদের জিজ্ঞাসা করতাম, এই বিষয়টি কী, আর লোকজনের কী হয়েছে? তারা বলত: একজন নবী আছেন, যিনি দাবি করেন যে আল্লাহ তাআলা তাকে পাঠিয়েছেন, এবং আল্লাহ তাঁর কাছে এই এই বিষয়ে অহী করেছেন। আর আরবরা তাদের ইসলাম গ্রহণের জন্য বিজয়ের অপেক্ষায় ছিল। তারা বলত: তোমরা তাঁর জন্য অপেক্ষা করো, যদি তিনি বিজয়ী হন, তবে তিনি নবী, তখন তোমরা তাঁকে বিশ্বাস করো। অতঃপর যখন বিজয় (মক্কা বিজয়) সংঘটিত হলো, তখন প্রত্যেক গোত্র তাদের ইসলাম গ্রহণে দ্রুততা অবলম্বন করল। আমার পিতা তাদের ইসলাম নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট গেলেন। তিনি ফিরে এসে তাঁর (রাসূলের) নিকট এত দিন এত দিন অবস্থান করলেন। তারপর সেখান থেকে ফিরে আসলেন। আমরা তার সাথে সাক্ষাৎ করলাম। তিনি বললেন: আমি তোমাদের নিকট আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে সত্যের সাথে এসেছি। আর তিনি তোমাদেরকে এই এই বিষয়ে নির্দেশ দিয়েছেন: যখন সালাতের সময় হবে, তখন তোমাদের মধ্যে কেউ যেন আযান দেয়, আর তোমাদের মধ্যে যে কুরআনের জ্ঞানে অধিক, সে যেন তোমাদের ইমামতি করে। এরপর তারা দেখল যে আমার চেয়ে বেশি কুরআন জানে এমন কেউ নেই। তাই তারা আমাকে সামনে বাড়িয়ে দিল, অথচ আমার বয়স তখন সাত বছর অথবা ছয় বছর। আমি সালাত আদায় করতাম। যখন আমি সিজদা করতাম, তখন আমার গায়ের চাদরটি গুটিয়ে যেত (যার ফলে লজ্জাস্থানের কিছু অংশ প্রকাশিত হতো)। বর্ণনাকারী বলেন: গোত্রের একজন মহিলা বলত: তোমাদের এই ক্বারীর নিতম্বের দিকটা আমাদের থেকে ঢেকে দাও। তিনি বলেন: অতঃপর আমাকে বাহরাইনের তৈরি একটি নকশা করা চাদর পরিধান করানো হলো, যার মূল্য ছিল ছয় বা সাত দিরহাম। আমি আর কোনো কিছুতে এত আনন্দ পাইনি, যত আনন্দ তাতে পেয়েছিলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك جاء في رواية البيهقيّ في "دلائل النبوة" 5/ 111، وفي "معرفة السنن والآثار" 4/ (5777) عن أبي عبد الله الحاكم، وهو الموافق لما في مصادر تخريج الحديث التي ذكرت هذا الحرف، وهو المعروف في كتب اللغة حيث جاء فيها أنَّ المُعقَّد بُرد من بُرود هَجَر. قلنا: وهجرُ اسم كان يطلق قديمًا على بلاد البحرين، وهي المنطقة الشرقية من الجزيرة العربية. وجاء في أصول "المستدرك": اليمن بدل البحرين، ويغلب على ظننا أنها تحريف عن البحرين، والله أعلم. وأخرجه مختصرًا أيضًا النسائي (845) من طريق عاصم بن سليمان الأحول، عن عمرو بن سَلِمة.



[2] إسناده صحيح. أيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني، وأبو قِلابة: هو عبد الله بن زيد الجَرْمي.وأخرجه بطوله البخاريّ (4302)، والنسائي (1612) من طريق عن سليمان بن حرب، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 33/ (20333) عن إسماعيل ابن عُليّة، و 34/ (20685) من طريق شعبة بن الحجاج، وأبو داود (585) من طريق حماد بن سلمة، والنسائي (866) من طريق سفيان الثوري، أربعتهم عن أيوب السَّختياني، عن عمرو بن سلمة، دون ذكر أبي قلابة.وأخرجه مختصرًا جدًّا أحمد 25/ (15902) و 23/ (20334) و 34/ (20687) من طريق خالد الحذاء، عن أبي قلابة به. وأخرجه مختصرًا أيضًا النسائي (845) من طريق عاصم بن سليمان الأحول، عن عمرو بن سَلِمة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4413)


4413 - أخبرني دَعلَج بن أحمد السِّجْزي، حدَّثنا أحمد بن علي الأبّار، حدَّثنا عبد الله بن أبي بكر المُقدَّمي، حدَّثنا جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أنس، قال: دخلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مكةَ يومَ الفتحِ وذَقَنُه على رَحْلِه مُتخشِّعًا [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন মক্কায় প্রবেশ করেছিলেন এমন বিনম্র অবস্থায় যে, তাঁর থুতনি ছিল তাঁর হাওদার (বা বাহনের কাঠামোর) উপর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله بن أبي بكر المُقدَّمي، وقد تفرد به عن جعفر بن سليمان ذلك صححه الذهبي في "تاريخ الإسلام" 1/ 370 مع أنه أورده في "الميزان" في منكرات عبد الله بن أبي بكر المقدّمي، وقد قال ابن عدي في "الكامل" بعد أن أورده في ترجمة المقدَّمي أيضًا: قد رأيتُ من رواه عن جعفر غير المُقدَّمي! قلنا: لم نقف عليه من غير رواية المُقدَّمي أيضًا، ووقفنا عليه من مرسل عدة من التابعين بسند لا بأس به، فيتحسّن الخبر إن شاء الله.وأخرجه البيهقيّ في "دلائل النبوة" 5/ 68 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو يعلى في "مسنده" (3393)، وعنه ابن عدي في "الكامل" 4/ 259، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 80 عن عبد الله بن أبي بكر المقدَّمي، به. وسيتكرر برقم (8086).ويشهد له مرسلُ عبد الله بن أبي بكر بن عمرو بن حزم وابن أبي نجيح ويحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير عند ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 405، وابن المبارك في "الزهد" برواية نعيم بن حماد (194)، ورجاله لا بأس بهم.وهو عند الواقدي في "المغازي 2/ 24 من مسند أبي هريرة أيضًا، لكنه لم يتابَع عليه. وأحمد بن محمد بن صاعد متابَع.وأخرجه ابن ماجه (3312) عن إسماعيل بن أبي الحارث بهذا الإسنادوأخرجه الخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 7/ 264 من طريق محمد بن إسماعيل ابن عُلَيّة، عن جعفر بن عون، به. ومحمد بن إسماعيل ابن عُلَيّة ثقة.وأخرجه ابن عدي 6/ 286 من طريق محمد بن الوليد بن أبان القلانسي، عن جعفر بن عون، به. لكن محمد بن الوليد هذا متهم بوضع الحديث وسرقته كما قال ابن عدي، ولهذا يقول ابن عدي: هذا الحديث سرقه ابن أبان من إسماعيل بن أبي خالد، وسرقه منه أيضًا عُبيد بن الهيثم الحلبيّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4414)


4414 - حدَّثنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدَّثنا أبو العباس أحمد بن محمد بن صاعِد، حدَّثنا إسماعيل بن أبي الحارث، حدَّثنا جعفر بن عَوْن، حدَّثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس، عن أبي مسعودٍ: أَنَّ رجلًا كَلَّم النبيّ صلى الله عليه وسلم يومَ الفتح، فأخذَتْه الرِّعْدةُ، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: هَوِّنْ عليكَ، فإنما أنا ابن امرأةٍ من قُريش كانت تأكُلُ القَدِيدَ" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবূ মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মক্কা বিজয়ের দিন একজন ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বলছিলেন। তখন তাকে থরথর করে কাঁপুনি পেয়ে বসলো। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: নিজেকে শান্ত করো, আমি তো কুরাইশ গোত্রের এমন এক মহিলার সন্তান, যে শুকনো মাংস খেত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد اختُلف في وصله وإرساله كما قدَّمنا بيانه برقم (3775)، وأحمد بن محمد بن صاعد متابَع.وأخرجه ابن ماجه (3312) عن إسماعيل بن أبي الحارث بهذا الإسنادوأخرجه الخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 7/ 264 من طريق محمد بن إسماعيل ابن عُلَيّة، عن جعفر بن عون، به. ومحمد بن إسماعيل ابن عُلَيّة ثقة.وأخرجه ابن عدي 6/ 286 من طريق محمد بن الوليد بن أبان القلانسي، عن جعفر بن عون، به. لكن محمد بن الوليد هذا متهم بوضع الحديث وسرقته كما قال ابن عدي، ولهذا يقول ابن عدي: هذا الحديث سرقه ابن أبان من إسماعيل بن أبي خالد، وسرقه منه أيضًا عُبيد بن الهيثم الحلبيّ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4415)


4415 - حدَّثنا أحمد بن سَلْمان الفقيه ببغداد، حدَّثنا الحسن بن مُكْرَم، حدَّثنا عثمان بن عمر، حدَّثنا عبد الله بن عامر الأَسلَمي، عن محمد بن المُنكَدِر، عن جابر، قال: نَدَبَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يوم حُنين الأنصارَ، فقال: "يا معشرَ الأنصار" فأجابُوه: لبَّيك بأبينا أنت وأُمّنا يا رسول الله، قال: "أقبِلُوا بوجُوهِكم إلى الله وإلى رسوله يُدخلْكم جناتٍ تجري من تحتِها الأنهارُ" فأقبَلُوا ولهم حَنِينٌ حتى أحدَقُوا به كَبْكبةً تَحَاكُّ مَناكِبُهم، يُقاتِلون حتى هزمَ اللهُ المشركين [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. وشاهده حديث المباركَ بن فَضَالة الذي:




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হুনাইনের যুদ্ধের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদেরকে আহ্বান জানালেন এবং বললেন: "হে আনসারগণ!" তখন তারা উত্তর দিলেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের পিতা-মাতা আপনার জন্য কুরবান হোক, আমরা আপনার সেবায় হাজির!" তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের মনোযোগ আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের দিকে দাও, (তাহলে) তিনি তোমাদেরকে এমন জান্নাতে প্রবেশ করাবেন যার পাদদেশে নহরসমূহ প্রবাহিত।" তখন তারা আবেগভরে এগিয়ে এলেন এবং ভীড় করে এমনভাবে তাঁকে ঘিরে ধরলেন যে তাদের কাঁধগুলো একে অপরের সাথে ঘষা খাচ্ছিল। তারা যুদ্ধ চালিয়ে গেলেন যতক্ষণ না আল্লাহ মুশরিকদেরকে পরাজিত করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح دون قوله: "أقبِلُوا بوجوهكم إلى الله وإلى رسوله يدخلكم جنات تجري من تحتها الأنهار"، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الله بن عامر الأسلمي، وقد جاء عند جابر من وجه آخر بإسناد حسن دون الحرف المشار إليه، وله ما يشهد له.وأخرجه بنحوه البيهقيّ في "دلائل النبوة" 5/ 129، وابن الأثير في "أسد الغابة" 4/ 266 من طريق يونس بن بكير، عن محمد بن إسحاق، قال: حدّثني عاصم بن عمر بن قَتَادة، عن عبد الرحمن بن جابر بن عبد الله، عن أبيه جابر، زاد ابن إسحاق في روايته عند ابن الأثير: وعمرو بن شعيب والزُّهْري وعبد الله بن أبي بكر بن عمرو بن حزم وعبد الله بن المكرم بن عبد الرحمن الثقفي عن حديث حنين. وإسناد حديث جابر بن عبد الله حسن، وروايات ابن إسحاق الأخرى كلها مرسلة.ويشهد له حديث أنس الذي بعده.وحديث العباس بن عبد المطلب الآتي برقم (5505).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4416)


4416 - حدثناه أبو بكر أحمد بن إسحاق، حدَّثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي، حدَّثنا سليمان بن حَرْب، حدَّثنا مُبارك بن فَضَالة، حدَّثنا الحسن، عن أنس بن مالك، قال: الْتَقى يومَ حُنين أهلُ مكة وأهلُ المدينة، واشتدَّ القتالُ، فولَّوا مُدبِرين، فندَبَ رسول الله صلى الله عليه وسلم الأنصارَ، فقال: "يا معشرَ المسلمين، أنا رسولُ الله" فقالوا: إليك والله جئنا، فنكَّسُوا رُؤوسهم، ثم قاتَلوا حتى فتحَ الله عليهم [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হুনাইনের দিন মক্কার অধিবাসী ও মদীনার অধিবাসীরা (যুদ্ধের জন্য) একত্রিত হলো। যখন যুদ্ধ তীব্র আকার ধারণ করলো, তখন তারা পিছু হটে গেল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদেরকে আহ্বান জানালেন এবং বললেন: "হে মুসলিম সম্প্রদায়! আমি আল্লাহর রাসূল।" তারা বললো: "আল্লাহর কসম, আমরা আপনার জন্যই এসেছি।" এরপর তারা তাদের মাথা ঝুঁকালো (দৃঢ় সংকল্পের সাথে) এবং যুদ্ধ করতে লাগলো, অবশেষে আল্লাহ তাদের ওপর বিজয় দান করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل مبارك بن فَضالة - وهو البصري وقد صرَّح بسماعه فانتفت شُبهة تدليسه، وتقدَّم هذا الخبر من وجه آخر صحيح عن أنس بأطول ممّا هاهنا برقم (2623). البيهقيّ في "الدلائل" عن أبي عبد الله الحاكم، وبسقوطه ينقطع سياق الخبر كما هو ظاهر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4417)


4417 - حدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدَّثنا أحمد بن عبد الجبار، حدَّثنا يونس بن بُكير، عن ابن إسحاق، قال: حدّثني عاصم بن عُمر بن قَتَادة، عن عبد الرحمن بن جابر، عن أبيه جابر بن عبد الله: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سارَ إلى حُنين لما فرَغ من فتح مكة، جمعَ مالك بن عوف النَّصْري من بني نَصْرٍ وجُشَم، ومن سعْد بن بكر وأوزاعًا من بني هِلال، وناسًا من بني عمرو بن عاصم بن عوف بن عامر، وأوعبَتْ [1] معَهم ثقيفٌ الأحلافُ، وبنو مالك، ثم سار بهم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وسار مع الأموال والنساءِ والأبناءِ، فلما سمع بهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بعث عبد الرحمن بن أبي حَدْرَد الأسلَمي، فقال: "اذهب فادخُل بالقومِ حتى تعلَمَ لنا من عِلْمِهِم"، فدخل، فمَكَثَ فيهم يومًا أو يومَين، [ثم أقبلَ فأخبرَه الخبرَ] [2] ثم قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لعمر بن الخطّاب: "ألا تسمع ما يقول ابن أبي حَدْرَدٍ؟ فقال عمرُ: كذبَ ابن أَبي حَدْرَد، فقال ابن أبي حَدْرد: إن كذَّبتني فربما كذَّبْتَ من هو خيرٌ مني، فقال عمرُ: يا رسول الله، ألا تسمعُ ما يقولُ ابن أبي حَدْرد؟ فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "قد كنتَ يا عمرُ ضالًّا فهَداك اللهُ عز وجل" [3]، ثم بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى صفوان ابن أُمية، فسأله أدراعًا مئةَ دِرْعٍ وما يُصلِحُها مِن عُدّتِها، فقال: أغصْبًا يا محمدُ؟ قال: بل عارِيَّةً مضمونةً، حتى نُؤدِّيَها لك"، ثم خرجَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم سائرًا [4].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা বিজয়ের কাজ শেষ করে হুনাইনের দিকে যাত্রা করলেন। (শত্রুপক্ষ থেকে) মালিক ইবনে আওফ আন-নাসরি বনু নাসর, জুশাম, সাদ ইবনে বকর এবং বনু হিলালের বিভিন্ন শাখা ও বনু আমর ইবনে আসিম ইবনে আওফ ইবনে আমের-এর লোকজনকে একত্রিত করল। তাদের সাথে থাকীফ গোত্রের আহলাফ এবং বনু মালিকও যোগ দিয়েছিল। এরপর সে তাদের নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের দিকে অগ্রসর হলো। সে (যুদ্ধের প্রস্তুতি হিসেবে) সম্পদ, নারী ও সন্তানদের সাথে নিয়ে যাত্রা করেছিল। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের আগমনের খবর পেলেন, তখন তিনি আব্দুর রহমান ইবনে আবি হাদরাদ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন এবং বললেন: "যাও, গোত্রের মধ্যে প্রবেশ করো এবং তাদের সম্পর্কে তথ্য সংগ্রহ করে আমাদের জানাও।" অতঃপর সে (আব্দুর রহমান) প্রবেশ করল এবং সেখানে এক বা দুই দিন অবস্থান করে (ফিরে এলো এবং) সংবাদ জানাল। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উমার ইবনে আল-খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "ইবনে আবি হাদরাদ যা বলছে তা কি তুমি শুনছো না?" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "ইবনে আবি হাদরাদ মিথ্যা বলেছে।" তখন ইবনে আবি হাদরাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "যদি আপনি আমাকে মিথ্যুক বলেন, তবে সম্ভবত আপনি আমার চেয়েও উত্তম কাউকে অতীতে মিথ্যুক বলেছিলেন।" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! ইবনে আবি হাদরাদ কী বলছে, আপনি কি শুনছেন না?" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "হে উমার! তুমি তো এক সময় পথভ্রষ্ট ছিলে, অতঃপর আল্লাহ তাআলা তোমাকে হিদায়াত দান করেছেন।" এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সাফওয়ান ইবনে উমাইয়ার কাছে লোক পাঠালেন এবং তার কাছে একশত বর্ম এবং সেগুলোর জন্য প্রয়োজনীয় অস্ত্রশস্ত্র চাইলেন। সে বলল: "হে মুহাম্মাদ, এগুলো কি জবরদস্তি করে নেওয়া হবে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, বরং এটি এমন ধার, যা নিশ্চিতভাবে তোমাকে ফেরত দেওয়া হবে, যতক্ষণ না আমরা তা তোমাকে ফিরিয়ে দেই।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (যুদ্ধের উদ্দেশ্যে) যাত্রা করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك جاء في (ع) وفي رواية البيهقيّ في "دلائل النبوة" 5/ 121 عن أبي عبد الله الحاكم ورجل آخر معه، وهو الموافق لرواية رضوان بن أحمد الصيدلاني عن أحمد بن عبد الجبار عند ابن الأثير في "أسد الغابة" 4/ 266، وتحرَّف في (ز) و (م) و (ب) إلى: وأودعت، وفي (ص) إلى: وادعت، وضُبِّب فوقها في (ز) إشارةً إلى استغرابها. البيهقيّ في "الدلائل" عن أبي عبد الله الحاكم، وبسقوطه ينقطع سياق الخبر كما هو ظاهر.



[2] ما بين المعقوفين سقط من أصولنا الخطية، وأثبتناه من المطبوع، وهو ثابت في رواية البيهقيّ في "الدلائل" عن أبي عبد الله الحاكم، وبسقوطه ينقطع سياق الخبر كما هو ظاهر.



4417 [3] - من قوله: "فقال عمر: كذب ابن حَدْرد" إلى هنا جاء مكانَه في أُصولنا الخطية ما نصّه: فقال عمر: ألا تسمعُ يا ابنَ أبي حَدْرد ما يقولُ رسولُ الله؟ فقال ابن أبي حَدْرد: قد كنتَ يا عمرُ ضالًّا فهداك الله. وفي هذا مخالفةٌ بيّنةٌ لما أثبتناه من المطبوع، وإنما أثبتناه لموافقته لرواية البيهقيّ عن الحاكم، وهو ما ساقه الذهبي في "تاريخ الإسلام " 1/ 385 في رواية يونس بن بكير، وهو الموافق أيضًا لما في "سيرة ابن هشام" 2/ 440، وكذلك جاء في "مغازي الواقدي" 3/ 893 عن شيوخه. وعليه فيكون قوله: "قد كنت يا عمر ضالًّا … " من قول النبي صلى الله عليه وسلم لعمر، وليس من قول ابن أبي حدرد.



4417 [4] - إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.وأخرجه البيهقيّ في "دلائل النبوة" 5/ 119 - 121، وفي "السنن الكبرى" 6/ 89 عن أبي عبد الله الحاكم وأبي بكر بن الحسن القاضي، عن أبي العباس محمد بن يعقوب، بهذا الإسناد. ولم يسق البيهقيّ في "السنن الكبرى" لفظه بتمامه.وأخرجه ابن الأثير في "أسد الغابة" 4/ 266 من طريق رضوان بن أحمد الصيدلاني، عن أحمد بن عبد الجبار، به.وقد تقدَّم من هذا الخبر قصةُ عاريّة صفوان بن أمية من حديث صفوان نفسه، ومن حديث ابن عبّاس برقم (2331) و (2332).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4418)


4418 - حدَّثنا دَعْلَج بن أحمد السِّجْزِي، حدَّثنا عبد العزيز بن معاوية، حدَّثنا محمد بن جَهْضَم، حدَّثنا إسماعيل بن جعفر، حدّثني عبد الرحمن بن الحارث، عن سُليمان بن موسى الأشْدَق، عن مكحُول، عن أبي سَلّام، عن أبي أمامة الباهلي صاحبِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، عن عُبادة بن الصامِت قال: أخذَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومَ حُنين وَبَرَة من جَنْبِ بَعير، ثم قال: "يا أيُّها الناسُ، إنه لا يَحِلُّ لي مما أفاءَ اللهُ عليكم قَدرُ هذه إِلَّا الخُمسَ، والخُمْسُ مَردُودٌ عليكم، فأدُّوا الخَيطُ والمِخْيَطَ، وإياكُم والغُلولَ، فإنه عارٌ على أهلِه يومَ القيامة، وعليكُم بالجهاد في سبيل الله فإنه بابٌ من أبواب الجنة، يُذهِبُ اللهُ به الهَمَّ والغَمَّ". قال: وكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يكرهُ الأنفالَ، ويقول: "لِيرُدَّ قويُّ المؤمنين على ضَعِيفهم" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুনাইনের দিন একটি উটের পাশ থেকে সামান্য পশম তুলে নিলেন। এরপর তিনি বললেন: "হে মানবজাতি! আল্লাহ তোমাদের কাছ থেকে যে সম্পদ গনীমত হিসেবে দিয়েছেন, তার মধ্যে এই সামান্য পরিমাণ জিনিসও আমার জন্য হালাল নয়, শুধুমাত্র এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) ছাড়া। আর সেই এক-পঞ্চমাংশও তোমাদের দিকেই ফিরিয়ে দেওয়া হয়। সুতরাং তোমরা সুতা ও সূচ পর্যন্ত (সবকিছু) জমা দাও। তোমরা খেয়ানত (গনীমতের সম্পদে আত্মসাৎ) থেকে বেঁচে থাকো, কারণ এটি কিয়ামতের দিন এর অধিকারীদের জন্য লজ্জার কারণ হবে। আর আল্লাহর পথে জিহাদ করা তোমাদের জন্য অপরিহার্য, কারণ এটি জান্নাতের দরজাগুলোর মধ্যে একটি দরজা, যার দ্বারা আল্লাহ দুশ্চিন্তা ও বিষণ্ণতা দূর করে দেন।" তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (গনীমতের) অতিরিক্ত পুরস্কার অপছন্দ করতেন এবং বলতেন: "শক্তিশালী মুমিনরা যেন তাদের দুর্বলদের দিকে ফিরিয়ে দেয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره دون ذكر كراهة النبي صلى الله عليه وسلم الأنفال، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الرحمن بن الحارث. وهو ابن عبد الله بن عيّاش المخزومي - وقد اختُلف في إسناد هذا الخبر عن أبي سلام وهو ممطور الحبشي - فبعضهم يرويه عنه عن أبي أمامة عن عبادة كما في رواية المُصنِّف هنا، وبعضهم يرويه عنه عن المقدام الرَّهاوي وبعضهم يسميه خطأً المقدام بن معدي كرب - عن عبادة، وبعضهم يرويه عنه عن عمرو بن عَبَسة كما سيأتي عند المصنف برقم (6728)، وبعضهم يرويه عنه عن أبي إدريس الخولاني مرسلًا، ورجح البخاريّ هذه الرواية الأخيرة المرسلة في "تاريخه الكبير" بأنَّ راويها عن أبي سلّام أحفظ من عبد الرحمن بن الحارث. قلنا لكن أبا سلّام يروي عن أبي أمامة عن عبادة حديثًا طويلًا في قصة غنائم بدر وغنائم حنين كما تقدم بيانه برقم (2435)، وهذه القطعة هي جزء منه، واقتصر عليها أبو سلّام في روايته عن غير أبي أمامة، فدلَّ ذلك على أنَّ في حديثه عن أبي أمامة ما ليس في حديثه عن غيره، فلا يبعد صحة ذلك عن أبي سلّام، خصوصًا وأنَّ هذه الحادثة قد رآها كثير من الصحابة، فلا يُستنكر أن يكون أبو سلّام سمعها من جماعة منهم أو بواسطةٍ عن جماعة منهم لشهرتها، والله تعالى أعلم.وأخرجه ضمن حديث مطول في ذكر غنائم يوم بدر ويوم حُنين ابن حبان (4855) من طريق محمد بن المثنَّى، عن محمد بن جهضم بهذا الإسناد.وأخرجه سعيد بن منصور في قسم التفسير من "سننه" (983)، ومن طريقه البيهقيّ في "معرفة السنن" (13082) عن عبد الله بن جعفر، وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني" (1865)، وفي "الجهاد" (7)، والضياء في "المختارة" 8/ (362) من طريق المغيرة بن عبد الرحمن بن الحارث، والهيثم بن كليب الشاشي في "مسنده" (1176)، والطبراني في "مسند الشاميين" (3583)، والضياء المقدسي 8/ (361) من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، وأبو طاهر المُخلِّص في "المخلصيات" (1528) و (1529) من طريق محمد بن فُليح بن سليمان، أربعتهم عن عبد الرحمن بن الحارث به ضمن الحديث المطوّل كذلك.وأخرجه أحمد 37 (22718) والنسائي (4424)، والبيهقي في "الكبرى" 6/ 303، وابن المنذر في "الأوسط" (6073)، وابن عبد البر في التمهيد 20/ 50 من طريق أبي إسحاق الفزاري، عن سفيان الثوري، وابن زنجويه في "الأموال" (1187) من طريق عبد العزيز بن محمد، وابن المنذر (6138)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 241 من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، أربعتهم عن عبد الرحمن بن الحارث، به مختصرًا بذكر الخُمس، وذكر الطحاوي وحده كراهة النبي صلى الله عليه وسلم للأنفال وقوله: "ليردّ قوي المؤمنين على ضعيفهم".وقد اختُلف في رواية أبي إسحاق الفزاري عن عبد الرحمن بن الحارث كما هو ظاهر، فبعض من روى هذا الخبر عنه ذكر بينه وبين عبد الرحمن رجلًا هو سفيان الثوري، وحصل نظير ذلك في قطعة أخرى من الحديث المطول تقدمت عند المصنف برقم (2435) فراجع الكلام عليها ثمة.وأخرجه أحمد 37/ (22699) من طريق أبي بكر بن عبد الله بن أبي مريم، عن أبي سلّام، عن المقدام بن معدي كرب: أنه جلس مع عبادة بن الصامت وأبي الدرداء والحارث بن معاوية فتذاكروا حديث رسول الله صلى الله عليه وسلم. وأبو بكر ضعيف، وتقييد المقدام بابن معدي كرب خطأ لما سيأتي بيانه، وانظر تمام تخريجه من طريق ابن أبي مريم في "المسند".وأخرجه عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" لأبيه 37/ (22777) من طريق سعيد بن يوسف، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلّام عن المقدام، عن عبادة وسعيد بن يوسف ضعيف، وقُيِّد المقدام هنا أيضًا بأنه ابن معدي كرب، وهو خطأ لما سيأتي بيانه.وأخرجه كذلك يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 359، والدولابي في "الكنى" (2061)، والشاشي (1263)، والبيهقي في "الكبرى" 9/ 103، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 176 من طريق منصور الخولاني، عن أبي يزيد غيلان بن أنس، عن أبي سلّام، عن المقدام بن معدي كرب، عن الحارث بن معاوية الكندي، عن عبادة. ومنصور الخولاني لم نتبينه وتقييد المقدام هنا كذلك بابن معدي كرب، وكذا ذكر الحارث بن معاوية خطأ، كما سيأتي بيانه.فقد أخرجه ابن أبي شيبة في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" للبوصيري (1128)، والبزار (2713) و (4149)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 385، والشاشي (1261) و (1262)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (4107)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 176 من طريق زياد المصفّر، عن الحسن البصري، عن مقدام الرُّهاوي، قال: جلس عبادة وأبو الدرداء والحارث ابن معاوية، فقال أبو الدرداء: أيكم يذكر يوم صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى بعير من المغنم؟ فقال عبادة: أنا، قال: فحدث، قال … فذكره. ورجاله إلى المقدام الرُّهاوي ثقات عن آخرهم، فهذا أوثق الطرق التي ذكر فيها المقدام، وبه وبطريق ابن أبي مريم الذي تقدم تخريجه يتبيَّن أنَّ الحارث بن معاوية كان أحد الحاضرين في المجلس مع أبي الدرداء وعُبادة لا أنه حدَّث المقدام عن عبادة كما في رواية أبي يزيد غيلان والظاهر أنَّ أبا سلام هو مَن كان يُخطئ في اسم المقدام لتعدد الطرق إليه بذلك، والله أعلم. والمقدام الرُّهاوي يكون بذلك روى عنه أبو سلَّام والحسن البصري، وحضر مجلس أولئك الصحابة الثلاثة المذكورين، فهو تابعي كبير، فيحسَّن حديثُه إن شاء الله.وأخرجه مسدَّد في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" (1127)، وعنه البخاريّ في "تاريخه" 8/ 57 عن هشيم، قال: حدَّثنا داود بن عمرو، قال: حدَّثنا أبو سلّام عن أبي إدريس الخُولاني مرسلًا مختصرًا بذكر الخُمس. ورجَّح البخاريّ هذه الرواية على رواية عبد الرحمن بن الحارث.وسيأتي عند المصنف برقم (6728) من طريق عبد الله بن العلاء بن زَبْر، عن أبي سلّام، عن عمرو بن عَبَسَة.وقد تقدَّم فضل الجهاد منه برقم (2435) من طريق أبي إسحاق الفزاري، عن عبد الرحمن بن عيّاش - وهو عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عيّاش - عن سليمان بن موسى، عن مكحول، عن أبي أمامة، عن عبادة بإسقاط ذكر أبي سلّام، والصحيح ذكره.وأخرجه ابن ماجه (2850) من طريق أبي سنان عيسى بن سنان، عن يعلى بن شداد، عن عبادة بن الصامت مختصرًا بذكر الخمس والغلول وإسناده حسن في المتابعات والشواهد.وفي باب ذكر الخمس والغلول عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عند أحمد 11/ (6729)، والنسائي (6482). وإسناده حسن. وهو عند أبي داود (2694) بذكر الخمس وحده.وعن أم حبيبة بنت العرباض بن سارية عن أبيها عند أحمد 28/ (17154) وغيره.وفي باب ذكر الخمس وحده عن جُبَير بن مطعم عند أبي عُبيد في "الأموال" (767)، وابن زنجويه في "الأموال" (1140)، والبزار (3418) و (3419)، وابن المنذر في "الأوسط" (6072)، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 5/ 1703، وإسناده صحيح.وفي باب فضل الجهاد وأنه من أبواب الجنة عن أبي موسى الأشعري عند مسلم (1902) وغيره، بلفظ: "أبواب الجنة تحت ظلال السيوف". وقد سلف عند المصنف برقم (2419).وعن عبد الله بن أبي أوفى عند البخاريّ (2818) ومسلم (1742) وغيرهما، بلفظ: "الجنة تحت ظلال السيوف". وقد سلف أيضًا برقم (2444). وعن أبي هريرة عند أحمد 13/ (7633)، والبخاري (1897)، بلفظ: "من كان من أهل الجهاد دعي من باب الجهاد".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4419)


4419 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد بن عبد الله الزاهد ببغداد، حدَّثنا عبد الرحمن بن محمد بن منصور، حدَّثنا معاذ بن هشام، حدّثني أبي، عن قتادة، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن معدان بن أبي طلحة، عن أبي نجيح السُّلَمي، قال: حاصَرْنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم قَصْرَ الطائف، فسمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من بَلَغَ بسهمٍ، فلَه درجةٌ في الجنّة"، فبلَّغتُ يومئذٍ ستةَ عشرَ سهمًا.وسمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن رَمَى بسهمٍ في سبيل الله فهو عَدْلُ مُحرَّرٍ، ومن شابَ شَيْبةً في الإسلام كانت له نُورًا يومَ القيامة، وأيُّما رجلٍ أعتقَ رجلًا مُسلمًا، فإنَّ الله [جاعلٌ كلَّ عَظمٍ من عِظامِه] [1] وقاءً كلَّ عَظمٍ بعَظمٍ، وأيُّما امرأةٍ مسلمةٍ أعتقتْ امرأةً مسلمةً، فإنَّ الله جاعِلٌ كلَّ عظمٍ من عِظامِها وِقاءَ كلِّ عظمٍ من عظامِ مُحرَّرِها مِن النار" [2].صحيحُ عالٍ، ولم يُخرجاه.




আবূ নাজীহ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তায়েফের দুর্গে অবরোধ করেছিলাম। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি তীর নিক্ষেপ করে লক্ষ্যবস্তুতে পৌঁছাতে পারবে, তার জন্য জান্নাতে একটি মর্যাদা রয়েছে।” সেদিন আমি ষোলটি তীর নিক্ষেপ করে লক্ষ্যবস্তুতে পৌঁছাতে পেরেছিলাম।

আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আরো বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় একটি তীর নিক্ষেপ করবে, তা একটি গোলাম আযাদ করার সমতুল্য। আর যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে (আল্লাহর পথে) বার্ধক্যজনিত কারণে চুল পাকা করবে, কিয়ামতের দিন তা তার জন্য নূর (আলো) হবে। আর যে কোনো পুরুষ যদি একজন মুসলিম পুরুষকে মুক্ত (আযাদ) করে, তবে আল্লাহ তা‘আলা মুক্ত করা ওই মুসলিম পুরুষের প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে মুক্তিদাতার প্রতিটি অঙ্গকে জাহান্নামের আগুন থেকে ঢাল করে দেবেন। আর যে কোনো মুসলিম নারী যদি একজন মুসলিম নারীকে মুক্ত করে, তবে আল্লাহ তা‘আলা মুক্ত করা ওই মুসলিম নারীর প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে মুক্তিদাত্রী ওই নারীর প্রতিটি অঙ্গকে জাহান্নামের আগুন থেকে ঢাল করে দেবেন।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقطت من أصولنا الخطية، وثبتت في المطبوع، وفي رواية البيهقيّ في "دلائل النبوة" 5/ 159 عن أبي عبد الله الحاكم، وهي ثابتة لسائر من روى هذا الحديث.



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الرحمن بن محمد بن منصور - وهو الحارثي - وقد توبع. هشام هو ابن أبي عبد الله سَنْبَر الدَّسْتُوائي.وقد تقدَّم منه ذكر الرمي بالسهم والبلوغ به بالرقمين (2500) و (2592) من طريقين عن معاذ بن هشام.وأما فضل العِتق فأخرجه أبو داود (3965) عن محمد بن المثنَّى، عن معاذ بن هشام، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 32/ (19428) عن يحيى بن سعيد، والنسائي (4859) من طريق خالد بن الحارث، كلاهما عن هشام الدَّستُوائي، به.وأخرجه أحمد (19429) من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قَتَادة، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4420)


4420 - حدَّثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا علي بن عبد العزيز، حدَّثنا مُسلم ابن إبراهيم، حدَّثنا داود بن عبد الرحمن قال: سمعت عَمرو بن دِينار يحدّث عن عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم اعتَمَر أربعَ عُمَرٍ: عُمرَةَ الحُدَيبِيَّة، وعُمرةَ القَضاء من قابِلٍ، والثالثةَ من الجِعْرانة، والرابعةَ التي مع حَجّتِه [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চারটি উমরাহ (ওমরা) পালন করেছিলেন: হুদাইবিয়ার উমরাহ, পরবর্তী বছর ক্বাযার উমরাহ, তৃতীয়টি ছিল জি'ইররানা থেকে এবং চতুর্থটি ছিল তাঁর হজ্জের সাথে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه اختُلف في وصله وإرساله، فوصله داود بن عبد الرحمن - وهو العطار - وخالفه سفيان بن عُيينة فأرسله فلم يذكر فيه ابن عبّاس، وقد صحَّ من حديث أنس بن مالك، فهو صحيح بلا ريب.وأخرجه أحمد 4/ (2211) و 5 / (2954)، وأبو داود (1993)، وابن ماجه (3003) والترمذي (816)، وابن حبان (3946) من طرق عن داود بن عبد الرحمن، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن غريب.وأخرجه الترمذي بإثر (816) من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن عكرمة، مرسلًا.وأخرج البخاريّ ذكر عمرة القضاء وحدها (1809) من طريق يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ابن عبّاس.وأخرجها أيضًا أبو داود (1997)، وابن حبان (4133) من طريق مجاهد، عن ابن عبّاس، بسند حسن.وأخرجها كذلك أحمد 5/ (2868)، وأبو داود (1885)، وابن ماجه (2953)، وابن حبان (3814) من طريق أبي الطفيل، عن ابن عبّاس، بسند قوي.وتقدمت عند المصنف برقم (1806) من طريق ميمون بن مهران عن ابن عبّاس.وأخرج ذكر عمرة الجعرانة وحدها أحمد 4 / (2688)، وأبو داود (1890) من طريق أبي الطفيل، عن ابن عبّاس، بسند قوي.وأخرجها كذلك أحمد 5/ (2792)، وأبو داود (1884) من طريق سعيد بن جُبَير، عن ابن عبّاس، بسند قوي أيضًا.وأخرج ذكر عمرته صلى الله عليه وسلم مع حجته أحمد 4 / (2141)، ومسلم (1239)، وأبو داود (1804) من طريق مسلم القُرّي، عن ابن عبّاس.وأخرجه أيضًا أحمد 1 (161)، والبخاري (1534)، وأبو داود (1800)، وابن ماجه (2976)، وابن حبان (3790) من طريق يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ابن عباس، عن عمر بن الخطاب. وفي باب ذكر عُمَرِه الأربع صلى الله عليه وسلم عن أنس بن مالك عند أحمد 19 (12372)، والبخاري (1778 - 1780)، ومسلم (1253) وغيرهم.والحُديبية موضع على بعد 22 كم غربَ مكة على طريق جدّة القديم.والجِعرانة: موضع شمال شرقيِّ مكة على نحو 29 كم منها.