হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4639)


4639 - حدثني أبو بكر بن أبي دارِم الحافظ، حدثنا محمد بن موسى بن [1] حماد البَرْبري، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن صالح صاحبُ المُصلّى، حدثنا علي بن صالح، حدثنا القاسم بن مَعْن [2]، عن الأعمش، عن عمرو بن مُرّة، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، قال: قُتل عليٌّ يومَ الجُمعة لسبعَ عشرة ليلةً خَلَتْ من شهر رمضان سنة أربعين، وكانت خلافتُه خمسَ سنين إلَّا ثلاثةَ أشهرٍ، قتله عبدُ الرحمن بن مُلْجَم المُرادي، وهو يومَ قُتل ابن ثلاثٍ وستين سنةً، أو أربعٍ وستين [3].




আব্দুল রহমান ইবনে আবি লায়লা থেকে বর্ণিত, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রমজান মাসের সতেরো রাত অতিবাহিত হওয়ার পর, চল্লিশ হিজরি সনে জুমুআর দিনে শহীদ হন। তাঁর খিলাফতকাল ছিল পাঁচ বছর থেকে তিন মাস কম। তাঁকে হত্যা করে আব্দুল রহমান ইবনে মুলজাম আল-মুরাদী। যেদিন তিনি শহীদ হন, সেদিন তাঁর বয়স ছিল তেষট্টি অথবা চৌষট্টি বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ص) و (م) إلى: حدثنا.



[2] تحرَّف في (ص) و (م) إلى: معين.



4639 [3] - إسناده ضعيف، مَن دون القاسم بن معن ما بين ضعيف ومجهول.وجاء ذكر سِنّه يوم قُتل بأنه كان ابن ثلاث وستين أو أربع وستين من قول محمد بن عمر بن علي بن أبي طالب عند البخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 563، وابن أبي الدنيا في "مقتل عليّ" (63)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (315)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 573.وفي سنِّه يوم قتل أنه كان ابن ثلاث وستين مرويٌّ أيضًا عن محمد بن علي بن أبي طالب المعروف بابن الحنفية كما سيأتي برقم (4747)، وهو كذلك في إحدى الروايات عن أبي جعفر محمد بن علي الباقر كما في "المعجم الكبير" للطبراني (165)، و "تاريخ دمشق" 42/ 19 و 572.وهو قول أبي إسحاق السَّبيعيّ كما أخرجه عنه ابن سعد 3/ 36 وغيره.وهو الذي رجّحه أبو زيد عمر بن شبّة فيما نقله عنه الطبري في "تاريخه" 5/ 151، واعتمده كذلك الواقدي فيما نقله عنه ابن سعد في "الطبقات" 3/ 36، واعتمده ابن سعد أيضًا في "طبقاته" 8/ 134، ومحمد بن حبيب البغدادي صاحب "المُحبَّر" ص 17.وقيل في سِنّه يومَ قُتل قولان آخران، انظر ما سيأتي برقم (4746)، وانظر "تاريخ دمشق".وأما سنة وفاته يعني سنة أربعين فمتّفَقٌ عليه.وأما اليوم الذي قُتل فيه عليٌّ فالظاهر أن معنى "قُتل" في هذه الرواية: ضُرِب، فإن صح ذلك اتفقت هذه الرواية مع رواية الواقديّ فيما نقله عنه الطبري 5/ 151 - 152، حيث قال: ضُرب عليٌّ ليلة الجمعة، فمكث يوم الجمعة وليلة السبت، وتوفي ليلة الأحد لإحدى عشرة ليلة بقيت من شهر رمضان سنة أربعين، وهو ابن ثلاث وستين سنة. ووافقه عليه الطبري إذ جزم به في "ذيل المذيَّل" كما في "منتخبه" لعُرَيب القرطُبي المطبوع بذيل "تاريخه"11/ 512. وكذلك قال أبو نُعيم الفضل بن دُكين فيما رواه عنه ابن عساكر 42/ 585، وقال البلاذُري في "أنساب الأشراف" 253/ 3: هذا الثَّبَتُ.ونحوه قول إسماعيل بن راشد السُّلميّ عند الطبري في "تاريخه" 5/ 143، والطبراني في "الكبير" (168) وغيرهما: أنَّ عليًا قتل لسبع عشرة ليلة تخلو من رمضان. ويُحمَل أيضًا على أن "قُتل" بمعنى: ضُرب.وسيأتي ما يخالف ما هنا برقم (4739) عن حُريث بن مُخَشِّي: أنه قُتل ليلة إحدى وعشرين.وحكى ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 538 عن أبي الطُّفيل وزيد بن وهب والشَّعبي: أنه قتل لثمان عشرة ليلة مضت من رمضان. والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4640)


4640 - سمعت أبا إسحاق إبراهيم بن إسماعيل القارئ يقول: سمعت عثمان بن سعيد الدارمي يقول: سمعت أبا بكر بن أبي شَيْبة يقول: وَلِيَ عليُّ بن أبي طالب خمسَ سنين، وقُتل سنةَ أربعين من مُهاجَر رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وهو ابن ثلاثٍ وستين سنة، قُتل يوم الجمعة الحادي والعشرين من شهر رمضان، ومات يومَ الأحد ودُفن بالكوفة [1].




আবু বকর ইবনে আবী শাইবাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পাঁচ বছর শাসন করেছেন। তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হিজরতের চল্লিশতম বছরে হত্যা করা হয়, যখন তাঁর বয়স ছিল তেষট্টি বছর। তাঁকে রমযান মাসের একুশ তারিখ শুক্রবার দিন হত্যা করা হয় এবং তিনি রবিবার দিন মারা যান ও তাঁকে কুফায় দাফন করা হয়।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] انظر "تاريخ دمشق" 42/ 587. وانظر ماسيأتي برقم (4739). كلاهما عن زيد بن أسلم، به. وإسناده حسنٌ من رواية ابن أبي الزناد، وعبد الله بن جعفر المديني ضعيف.وروى نحوه فضالة بن أبي فضالة عن علي عند أحمد 2/ (802).وانظر ما سيأتي عند المصنف مرفوعًا برقم (4736) من طريق أبي الهيّاج حيان بن منصور الأسدي، وبرقم (4738) من طريق زيد بن وهب، كلاهما عن علي بن أبي طالب.وانظر حديث عمار بن ياسر الآتي برقم (4730).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4641)


4641 - أخبرنا إبراهيم بن إسماعيل القارئ، حدثنا عثمان بن سعيد الدارمي، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني الليث بن سعد، أخبرني خالد، أخبرني خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هِلال، عن زيد بن أسلم، أنَّ أبا سِنان الدُّؤَلي حدثه: أنه عاد عليًّا في شَكوى له اشتكاها، قال: فقلتُ له: لقد تَخوّفْنا عليك يا أمير المؤمنين في شكواك هذا، فقال: لكني والله ما تَخوّفتُ على نفسي منه، لأني سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم الصادقَ المصدُوقَ يقول: "إنك ستُضرَبُ ضربةً هاهنا، وضربةً هاهنا - وأشار إلى صُدغَيه - فيَسيلُ دمُهما [1] حتى تختضِبَ لحيتُك، ويكون صاحبُها أشقاها، كما كان عاقرُ الناقةِ أشقى ثَمودَ" [2]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু সিনান আদ-দু'আলী তাঁকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অসুস্থতার সময় তাঁকে দেখতে গিয়েছিলেন। তিনি বলেন, আমি তাঁকে বললাম: হে আমীরুল মু'মিনীন, আপনার এই অসুস্থতার কারণে আমরা আপনার জন্য খুব চিন্তিত। তিনি বললেন: কিন্তু আল্লাহর কসম, আমি এ কারণে আমার নিজের উপর মোটেও ভীত নই। কারণ আমি সত্যবাদী ও সত্য প্রতিপন্নকারী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই তোমাকে এখানে একটি আঘাত এবং এখানে একটি আঘাত করা হবে" - এই বলে তিনি তাঁর দুই কানের পার্শ্বদেশের (রগের) দিকে ইঙ্গিত করলেন - "অতঃপর সেই আঘাত থেকে রক্ত প্রবাহিত হবে, এমনকি তোমার দাড়ি রক্তে রঞ্জিত হয়ে যাবে। আর যে এই আঘাত করবে, সে হবে তাদের মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট ব্যক্তি, যেমন সামুদ জাতির উট হন্তাকারী ছিল তাদের মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (م) و (ب) دمها، بالإفراد والمثبت من (ص) بالثنية هو المناسب لذكر الصُّدغَين. كلاهما عن زيد بن أسلم، به. وإسناده حسنٌ من رواية ابن أبي الزناد، وعبد الله بن جعفر المديني ضعيف.وروى نحوه فضالة بن أبي فضالة عن علي عند أحمد 2/ (802).وانظر ما سيأتي عند المصنف مرفوعًا برقم (4736) من طريق أبي الهيّاج حيان بن منصور الأسدي، وبرقم (4738) من طريق زيد بن وهب، كلاهما عن علي بن أبي طالب.وانظر حديث عمار بن ياسر الآتي برقم (4730).



[2] إسناده حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن صالح، وقد روي هذا الخبر من وجه آخر عن زيد بن أسلم. وقد صحَّح البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 439 رواية المصنف هذه.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 58، ومن طريقه ابن عساكر في 42/ 543 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (174)، والآجري في "الشريعة" (1595)، والطبراني في "الكبير" (173) من طرق عن أبي صالح عبد الله بن صالح، به.وأخرجه عبد بن حميد (92)، ومن طريقه ابن عساكر 42/ 544 من طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد، وأبو يعلى (569)، ومن طريقه ابن عساكر 42/ 542 من طريق عبد الله بن جعفر المديني، كلاهما عن زيد بن أسلم، به. وإسناده حسنٌ من رواية ابن أبي الزناد، وعبد الله بن جعفر المديني ضعيف.وروى نحوه فضالة بن أبي فضالة عن علي عند أحمد 2/ (802).وانظر ما سيأتي عند المصنف مرفوعًا برقم (4736) من طريق أبي الهيّاج حيان بن منصور الأسدي، وبرقم (4738) من طريق زيد بن وهب، كلاهما عن علي بن أبي طالب.وانظر حديث عمار بن ياسر الآتي برقم (4730).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4642)


4642 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن عبد الله البغدادي، حدثنا يحيى بن عثمان بن صالح السَّهْمي، حدثنا سعيد بن عُفَير، حدثني حفص بن عِمران بن أبي الوسام، عن السَّرِيّ بن يحيى، عن ابن شِهَاب، قال: قدمتُ دمشقَ وأنا أُريد الغزوَ، فأتيتُ عبد الملك لأُسلِّمَ عليه، فوجدتُه في قُبّةٍ على فُرُشٍ بقرب القائم [1] وتحته سِماطانِ، فسلَّمتُ، ثم جلستُ، فقال لي: يا ابن شِهَاب، أتعلم ما كان في بيت المقدس صباحَ قُتل عليُّ بن أبي طالب؟ فقلتُ: نعم، فقال: هلُمَّ، فقمتُ من وراء الناس حتى أتيتُ خلفَ القُبّة، فحَوَّل إليَّ وجهَه فأحنَى عليَّ، فقال: ما كان؟ فقلت: لم يُرفَعْ حَجَرٌ من بيت المقدس إلَّا وُجد تحتَه دمٌ، فقال: لم يبقَ أحدٌ يعلمُ هذا غيري وغيرَك، لا يَسمعنَّ منك أحدٌ، فما حَدّثتُ به حتى تُوفّي [2].




ইবনু শিহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি গাযওয়া (ধর্মযুদ্ধ)-এর উদ্দেশ্যে দামেস্কে পৌঁছলাম। আমি আব্দুল মালিকের (খলিফা) নিকট গেলাম তাঁকে সালাম দেওয়ার জন্য। আমি তাঁকে একটি তাঁবুর (বা গম্বুজের) মধ্যে দেখলাম, তিনি একজন রক্ষকের [বা স্তম্ভের] পাশে বিছানার উপর উপবিষ্ট এবং তাঁর নিচে দুই সারি লোক বসে আছে। আমি সালাম দিলাম, তারপর বসলাম। তিনি আমাকে বললেন: হে ইবনু শিহাব, আপনি কি জানেন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যেদিন হত্যা করা হয়েছিল, সেদিন বাইতুল মুকাদ্দাসে কী ঘটেছিল? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: এদিকে আসুন। আমি লোকদের পেছন দিক দিয়ে উঠে গেলাম এবং তাঁবুর (বা গম্বুজের) পিছনে পৌঁছলাম। তিনি আমার দিকে মুখ ফিরালেন এবং আমার দিকে ঝুঁকে এলেন। তিনি বললেন: কী ঘটেছিল? আমি বললাম: বাইতুল মুকাদ্দাসের কোনো পাথরই সরানো হয়নি, যার নিচে রক্ত পাওয়া যায়নি। তিনি বললেন: আমি এবং আপনি ছাড়া আর কেউ এখন এই বিষয়টি জানে না। কেউ যেন আপনার থেকে এটি শুনতে না পায়। এরপর আমি তাঁর (আব্দুল মালিকের) মৃত্যুর আগ পর্যন্ত কাউকে এটি বলিনি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك جاء في النسخ الخطية، وفي بعض المصادر التي أوردت هذا الخبر تفوت القائم، والظاهر أنَّ تلك الفُرش لكونها كانت مشرفةً مرتفعةً تكاد من إشرافها وارتفاعها تكون أعلى من القائم على رجليه، فقد جاء في عدة أخبار عن بعض خلفاء بني أمية أنه كانت لهم فُرش مُشرِفة. وعليه يكون معنى قوله: بقرب القائم، أي: بقرب ارتفاع القائم على رجليه، وقوله: تفوت القائم، أي: أعلى منه، والله تعالى أعلم. في "الآحاد والمثاني" (189)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 440 - 441، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 55/ 305 عن سعيد بن عُفَير، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (4745) من طريق نوح بن دراج، عن محمد بن إسحاق، عن الزُّهْري، عن أسماء الأنصارية قالت: ما رُفع حجر بإيلياء ليلة قتل عليّ إلّا ووُجد تحته دم عَبيط.ونوح هذا متروك وكذّبه ابن مَعِين، وقال الحاكم نفسه: حدث عن الثقات بالموضوعات.وأخرج ابن سعد في "طبقاته" 7/ 432، والبيهقي 6/ 471، وابن عساكر 14/ 229 من طريق معمر بن راشد، قال: أول ما عُرف الزُّهري أنه كان في مجلس عبد الملك بن مروان، فسألهم عبد الملك، فقال: من منكم يعلم ما صنعت أحجار بيت المقدس يوم قتل الحُسين؟ قال: فلم يكن عند أحد منهم في ذلك علم، فقال الزُّهْري: بلغني أنه لم يُقلب منها يومئذٍ حجرٌ إِلّا وُجد تحته دمٌ عَبِيط. قال: فعُرف من يومئذ. ورجاله إلى الزُّهْري ثقات، إلَّا أنَّ بلاغات الزُّهْري ومراسيله ليست بشيء بمنزلة الريح كما قال ابن مَعِين ويحيى القطان.وأخرج نحوه مختصرًا الطبراني في "الكبير" (2835)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (1789)، والمستغفري في دلائل النبوة" (663) من طريق ابن جريج عن الزُّهْري.والسِّماط: الجماعة من الناس.



[2] ضعيف منكر، حفص بن عمران مجهول لا يُعرف كما نبَّه عليه الذهبي في "تلخيصه"، وشيخه السَّريّ بن يحيى إن كان هو الشيباني فثقة، وإلّا فلا يُعرف أيضًا، فقد ذكره مُغَلْطاي في "الإكمال" 5/ 222 تمييزًا عن السَّريّ بن يحيى الشيباني، وعَزَاهُ للصريفيني.وأخرجه يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ"1/ 629 - 630، ومن طريقه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (189)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 440 - 441، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 55/ 305 عن سعيد بن عُفَير، بهذا الإسناد.وسيأتي عند المصنف برقم (4745) من طريق نوح بن دراج، عن محمد بن إسحاق، عن الزُّهْري، عن أسماء الأنصارية قالت: ما رُفع حجر بإيلياء ليلة قتل عليّ إلّا ووُجد تحته دم عَبيط.ونوح هذا متروك وكذّبه ابن مَعِين، وقال الحاكم نفسه: حدث عن الثقات بالموضوعات.وأخرج ابن سعد في "طبقاته" 7/ 432، والبيهقي 6/ 471، وابن عساكر 14/ 229 من طريق معمر بن راشد، قال: أول ما عُرف الزُّهري أنه كان في مجلس عبد الملك بن مروان، فسألهم عبد الملك، فقال: من منكم يعلم ما صنعت أحجار بيت المقدس يوم قتل الحُسين؟ قال: فلم يكن عند أحد منهم في ذلك علم، فقال الزُّهْري: بلغني أنه لم يُقلب منها يومئذٍ حجرٌ إِلّا وُجد تحته دمٌ عَبِيط. قال: فعُرف من يومئذ. ورجاله إلى الزُّهْري ثقات، إلَّا أنَّ بلاغات الزُّهْري ومراسيله ليست بشيء بمنزلة الريح كما قال ابن مَعِين ويحيى القطان.وأخرج نحوه مختصرًا الطبراني في "الكبير" (2835)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (1789)، والمستغفري في دلائل النبوة" (663) من طريق ابن جريج عن الزُّهْري.والسِّماط: الجماعة من الناس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4643)


4643 - أخبرني أبو سعيد أحمد بن محمد الأحمسي، حدثنا الحسين بن حُميد بن الربيع، حدثنا الحسين بن علي السُّلمي، حدثني عمي محمد بن حسان، حدثنا الحسن بن زياد، عن أبي مَعشَر، عن شُرحْبيل بن سعد القرشي، قال: استُخلِفَ عليُّ بن أبي طالب سنة خمسٍ وثلاثين، وهو ابن ثمان وخمسين سنة وأشهُر، فلما حضر المَوسِم سنة خمس وثلاثين بعث عبدَ الله بنَ عبّاس على الموسم سنة خمس وثلاثين، وسنةَ ستٍّ وثلاثين، وسنة سبع وثلاثين، وسنة ثمان وثلاثين، وسنة تسع وثلاثين، وحَضَرَ الموسمُ وتشاغلَ عليٌّ بالقتال، فاصطَلح الناسُ على شَيْبة بن عثمان الحَجَبي، فشهد بالناس، فلما كان سنةَ أربعين قُتل عليٌّ يومَ الجمعة لسبعَ عشرةَ مَضَتْ من شهر رمضان من سنة أربعين، وهو ابن ثلاثٍ وستين سنة [1]. قال الحاكم: فنظرنا فوجدنا لهذه التواريخ برهانًا ظاهرًا بإسناد صحيح:




শুরহবীল ইবনে সা'দ আল-কুরাশী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: পঁয়ত্রিশ (৩৫) হিজরীতে আলী ইবনু আবী তালিবকে খলীফা নিযুক্ত করা হয়। তখন তাঁর বয়স ছিল আটান্ন (৫৮) বছর ও কয়েক মাস। পঁয়ত্রিশ (৩৫) হিজরীতে যখন হজের মৌসুম এলো, তখন তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাসকে পঁয়ত্রিশ, ছত্রিশ, সাঁইত্রিশ, আটত্রিশ ও উনচল্লিশ (৩৫, ৩৬, ৩৭, ৩৮ ও ৩৯) হিজরীর হজের আমির (নেতৃত্ব) হিসাবে প্রেরণ করেন। (৪০ হিজরীর) হজের মৌসুম উপস্থিত হলো এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন যুদ্ধ নিয়ে ব্যস্ত ছিলেন। ফলে লোকজন শায়বা ইবনু উসমান আল-হাজাবীর উপর ঐকমত্য পোষণ করলো এবং তিনি লোকদের সাথে হজে নেতৃত্ব দেন। এরপর যখন চল্লিশ (৪০) হিজরী এলো, তখন এই বছরের রমজান মাসের সতেরো (১৭) তারিখ শুক্রবারের দিনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হন। তখন তাঁর বয়স ছিল তেষট্টি (৬৩) বছর। আল-হাকিম বলেন: আমরা যাচাই করে দেখেছি এবং এই তারিখগুলোর জন্য সহীহ সনদসহ সুস্পষ্ট প্রমাণ পেয়েছি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف بمرَّة لضعف أبي مَعشَر - وهو نَجيح بن عبد الرحمن السِّندي - والحسنِ بن زياد - وهو اللؤلؤي - ولجهالة الحسين بن علي السُّلمي وعمِّه محمد بن حسان، والحسينُ بن حميد بن الربيع فيه لِين.والصحيح الذي عليه أهل السير أنَّ الذي بعث عبدَ الله بن عبّاس على الموسم. سنة خمس وثلاثين هو عثمانُ بن عفان لا عليُّ بن أبي طالب، وقد روي ذلك عن عبد الله بن عبّاس نفسه عند ابن سعد في "طبقاته" 3/ 60، وروي عن عبد الله بن عمر عند الدارقطني (2510)، وفي إسنادهما مقال، لكن ثبت عن عمرو بن دينار عند ابن سعد 6/ 337، وعمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 4/ 1269، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 6/ 217، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 438 قال: كلّم الناسُ ابن عبّاس أن يحجَّ بهم وعثمان محصور، فدخل عليه، فاستأذن أن يحج بهم، فحجَّ بهم، فرجع وقد قتل عثمان رضي الله عنه. وإسناده صحيح.وثبت مثله كذلك عن أبي وائل شقيق بن سلمة عند ابن أبي شيبة في "مسنده" كما في "الإصابة" للحافظ 4/ 149 أنَّ عثمان بن عفان أمَّر عبد الله بن عبّاس على الحج سنة قُتِل.وهذا هو المناسب لتاريخ قتل عثمان بن عفان رضي الله عنه، فقد قُتل في الثامن عشر من ذي الحجة سنة خمس وثلاثين على قول الأكثرين، فكيف يؤمره عليّ بن أبي طالب ولم يكن ولي الخلافة بعدُ.ثم إنه اختُلف فيمن حجَّ بالناس سنة ست وثلاثين وسبع وثلاثين وثمان وثلاثين، فجزم الواقدي فيما نقله عنه البلاذري في "أنساب الأشراف" 4/ 79، وابن عساكر 37/ 477 بأنَّ الذي حجَّ في هذه السنين هو عُبيد الله بن عبّاس أخو عَبد الله، وأنَّ عليًّا أرسله سنة تسع وثلاثين، ثم اصطلح الناس أن يكون الأمير شيبة بن عثمان الحجبي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4644)


4644 - حدّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا السَّري بن يحيى التَّميمي، حدثنا قَبيصة بن عُقبة، حدثنا سفيان، عن منصور، عن رِبْعيّ بن حِراش، عن البراء بن ناجِيَة، عن عبد الله بن مسعود، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تَدُورُ رَحَى الإسلامِ على خمسٍ وثلاثين أو ستٍّ وثلاثين، فإن يَهْلِكُوا فَسَبيلُ من هَلَك، وإن تَبَقّى لهم دينُهم فسبعين عامًا"، قال عمر: يا رسول الله، ممّا بقيَ أو ممّا مضى؟ قال: "ممّا بقيَ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكر بيعة أمير المؤمنين علي بن أبي طالب رضوان الله عليهحدثنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ إملاءً في شعبان سنة اثنتين وأربع مئة، قال: اختلفتِ الرواياتُ في وقته، فقيل: أنه بُويع بعد أربعة أيام من قتل عثمان، وقيل: بعد خمس، وقيل: بعد ثلاث وقيل: بُويع يوم الجمعة لخمسٍ بَقِين من ذي الحِجّة، وقيل: بُويع عَقِيبَ قتل عثمان في دار عمرو بن مِحْصَن الأنصاري أحد بني عمرو بن مَبذُول، وأصحُّ الروايات أنه امتنع عن البيعة إلى أن دُفن عثمان، ثم بُويع على منبر رسول الله صلى الله عليه وسلم، ظاهرًا، وكان أولَ من بايعه طلحةُ، فقال: هذه بيعة تُنكَثُ [2].




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ইসলামের যাঁতা পঁয়ত্রিশ অথবা ছত্রিশের ওপর ঘুরবে (অর্থাৎ এই সময়ের মধ্যে তার শক্তি স্থির থাকবে)। যদি তারা ধ্বংস হয়, তবে তা হবে তাদের পথ, যারা ধ্বংস হয়েছে; আর যদি তাদের দ্বীন বাকি থাকে, তবে তা সত্তর বছর পর্যন্ত।" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! তা কি অবশিষ্ট সময় থেকে, নাকি যা অতীত হয়েছে তা থেকে? তিনি বললেন: "যা অবশিষ্ট রয়েছে তা থেকে।"

এটি সহীহ ইসনাদবিশিষ্ট হাদীস, কিন্তু শায়খাইন (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি।

আমীরুল মু'মিনীন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিওয়াল্লাহু আলাইহি)-এর বায়আত প্রসঙ্গ।
আল-হাকিম আবু আবদুল্লাহ মুহাম্মাদ ইবনু আবদুল্লাহ আল-হাফিয ৪৩২ হিজরীর শা'বান মাসে ইমলা (শ্রুতিলিখনের মাধ্যমে) আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেছেন: তাঁর (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) বায়আতের সময় নিয়ে বর্ণনাগুলো ভিন্ন ভিন্ন। কেউ কেউ বলেছেন: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হত্যার চার দিন পর তাঁকে বায়আত করা হয়েছিল। কেউ কেউ বলেছেন: পাঁচ দিন পর। আবার কেউ কেউ বলেছেন: তিন দিন পর। আবার বলা হয়েছে: যুল-হাজ্জাহ মাসের পাঁচ দিন বাকি থাকতে জুমু'আর দিন তাঁকে বায়আত করা হয়েছিল। আবার বলা হয়েছে: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হত্যার পরপরই আমর ইবনু মিহসান আল-আনসারী (বানু আমর ইবনু মাবযূল গোত্রের একজন)-এর বাড়িতে তাঁকে বায়আত করা হয়। আর সবচেয়ে সহীহ বর্ণনা হলো, তিনি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দাফন করা না হওয়া পর্যন্ত বায়আত নিতে অস্বীকৃতি জানান। এরপর প্রকাশ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মিম্বরের ওপর তাঁকে বায়আত করা হয়। তাঁকে প্রথম যিনি বায়আত করেন, তিনি ছিলেন তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি তখন বলেছিলেন: "এই বায়আত ভঙ্গ করা হবে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد محتمل للتحسين كما تقدم بيانه برقم (4599). سفيان: هو ابن سعيد الثوري.



[2] جاء عند ابن أبي شيبة في "المصنف" 14/ 136، وابن الجوزي في "المنتظم" 5/ 63 أنَّ قائل ذلك أعرابيٌّ، قاله تشاؤمًا، بسبب يد طلحة، لكونها كانت شَلَّاء. وجاء في بعض الروايات عند البلاذري في "أنساب الأشراف" 3/ 8 وغيره: أنَّ قائل ذلك قَبيصة بن ذؤيب، وعند الطبري في "تاريخه" 4/ 428: أنه حبيب بن ذؤيب. وأطَبُّ قريش: يعني أعلمُها، وهي أفعل تفضيل من الطبيب، وهو الحاذق بالأمور العارف بها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4645)


4645 - فحدَّثنا أبو بكر بن أبي دارِم، الحافظ، حدثنا أحمد بن موسى بن إسحاق التَّميمي، حدثنا وضّاح بن يحيى النَّهْشَلي، حدثنا أبو بكر بن عيّاش، عن أبي إسحاق، عن الأسود بن يزيد النَّخَعي، قال: لما بُويع عليُّ بن أبي طالب على مِنبَر رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال خُزَيمة بن ثابت وهو واقفٌ بين يدي المنبر:إذا نحنُ بايَعْنا عليًّا فحَسْبُنا … أبو حَسَنٍ مما نخافُ من الفِتَنْوجدناه أَولَى الناسِ بالناسِ إِنَّه … أطَبُّ قُريشٍ بالكتاب وبالسُّننْوإن قريشًا ما تَشُقُّ غُبارَه … إِذا ما جَرَى يومًا على الضُّمَّرِ البَدَنْوفيه الذي فيهم من الخَيرِ كلِّهِ … وما فيهمُ كلُّ الذي فيه من حَسَنِ [1]




আসওয়াদ ইবনু ইয়াযিদ আন-নাখা'ঈ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মিম্বরে আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে বাইয়াত গ্রহণ করা হলো, তখন খুযাইমা ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিম্বরের সামনে দাঁড়িয়ে বললেন:

আমরা যখন আলীর হাতে বাইয়াত গ্রহণ করি, তখন ফেতনা থেকে যা আমরা ভয় করি, তার জন্য আবূ হাসানই (আলী) আমাদের জন্য যথেষ্ট।
আমরা তাকে মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি অগ্রাধিকারযোগ্য পেয়েছি। নিশ্চয়ই তিনি কিতাব (কুরআন) এবং সুন্নাহর জ্ঞানে কুরাইশদের মধ্যে সবচেয়ে সেরা।
আর কুরাইশরা কখনোই তার ধূলিকণা ভেদ করতে পারবে না (অর্থাৎ তার ধারেকাছে পৌঁছতে পারবে না), যদি তিনি কোনো একদিন ক্ষীণাঙ্গ বা মোটা দেহের ঘোড়াদের নিয়ে দৌড়ান (অর্থাৎ সব ক্ষেত্রেই তিনি অগ্রগামী)।
তাদের (কুরাইশদের) মধ্যে যত কল্যাণ আছে, সব তাঁর মধ্যে রয়েছে; কিন্তু তাঁর মধ্যে যত উত্তম গুণাবলী আছে, তার সবটুকু তাদের মধ্যে নেই।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف أبو بكر بن أبي دارم، قال عنه الحاكم نفسُه: رافضي غير ثقة، ووضّاح بن يحيى النَّهْشَلي مُختلف فيه، ويعتبر بحديثه عند المتابعة، ولم يتابع.والضُّمَّر: جمع ضامر، وهو الفرس أو البعير الذي خفَّ لحمُه ودَقّ من السير لا من علّةٍ. وأطَبُّ قريش: يعني أعلمُها، وهي أفعل تفضيل من الطبيب، وهو الحاذق بالأمور العارف بها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4646)


4646 - حدثنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا أبو أحمد الزُّبيري، حدثنا العلاء بن صالح، عن عَدِي بن ثابت، عن أبي راشد، قال: لما جاءت بيعة عليٍّ إلى حذيفة قال: لا أبايع بعده إلَّا أصغَرَ أو أبتَرَ [1].قال الحاكم: هذه الأخبارُ الواردة في بيعة أمير المؤمنين كلُّها صحيحةٌ مُجمَع عليها، فأما قول من زعم أنَّ عبد الله بن عُمر وأبا مسعود الأنصاري وسعد بن أبي وقّاص وأبا موسى الأشعري ومحمدَ بن مَسلَمة الأنصاري وأسامةَ بن زيد قَعدُوا عن بيعته، فإنَّ هذا قولُ من يَجحَد حقيقةَ تلك الأحوالِ، فاسمع الآنَ حقيقتَها:




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে বাইআত (আনুগত্যের শপথ) করার আহ্বান তাঁর কাছে পৌঁছাল, তখন তিনি বললেন: আমি তাঁর পরে আর কারো হাতে বাইআত করব না, কেবল ‘আসগার’ (নগণ্য) বা ‘আবতার’ (নিকৃষ্ট)-এর হাতে ছাড়া।

ইমাম হাকিম বলেছেন: আমীরুল মু'মিনীন (আলী রাঃ)-এর বাইআত সম্পর্কিত এই বর্ণিত খবরগুলো সবই সহীহ ও সর্বসম্মত। কিন্তু যারা ধারণা করে যে, আব্দুল্লাহ ইবন উমর, আবু মাসঊদ আল-আনসারী, সা’দ ইবন আবী ওয়াক্কাস, আবু মূসা আল-আশ’আরী, মুহাম্মাদ ইবন মাসলামাহ আল-আনসারী এবং উসামা ইবন যায়দ তাঁর বাইআত করা থেকে বিরত ছিলেন—এটি তাদের কথা, যারা সেই ঘটনার বাস্তবতা অস্বীকার করে। এখন তোমরা এর বাস্তবতা শোনো:




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة أبي راشد، والصحيح أن حذيفة إنما قال ذلك لما بلغه قتلُ عثمان، فقصد بقوله ذلك عثمان كما سيأتي بيانه. أبو أحمد الزُّبيري: هو محمد بن عبد الله بن الزبير.وأخرجه يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 3/ 132، والبلاذري في "أنساب الأشراف" 3/ 17 من طريقين عن العلاء بن صالح، بهذا الإسناد.وأخرج عمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 4/ 1249، وأبو نُعيم الأصبهاني في "تثبيت الإمامة" (131) من طريق طارق بن شهاب، قال: لما قتل عثمان قال حذيفة: لن تستخلفوا بعده إلّا أصعر أو أبتر، الآخِر فالآخِر شرٌّ. وإسناده صحيح.وأخرج نحوه معمر بن راشد في "جامعه" (20965)، وعمر بن شبة 4/ 1249 عن قتادة مرسلًا، قال: لما قُتل عثمان قال حذيفة: والله لا يأتيكم بعده إلّا أصغر أبتر، الآخِر شرٌّ. وهذه الرواية على إرسالها تؤيد رواية طارق بن شهاب، لكن قال أبو نعيم في "تثبيت الإمامة" بإثر (131): قول حذيفة لا يوجب حُجَّة إلّا أن يسنده عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأما إذا قال من ذاته فهو رأي يخطئ فيه ويُصيب.الأصغر أو الأصعر: بالغين المعجمة: الأذلُّ، وبالمهملة: المُعرِض عن الحق.والأبتر: هو الناقص القليل الخير.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4647)


4647 - حدثنا أبو القاسم الحسن بن محمد السَّكُوني بالكوفة، حدثنا محمد بن عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا يحيى بن عبد الحميد، حدثنا شَريك، عن أُمَيٍّ الصَّيرَفي، عن أبي قَبيصة عمر بن قَبيصة، عن طارق بن شِهَاب قال: رأيتُ عَليًّا عَلَى رَحْلٍ رَثٍّ بالرَّبَذة، وهو يقول للحسن والحسين: ما لكما تَخِنّان خَنِينَ [1] الجاريةِ، والله لقد ضربتُ هذا الأمرَ ظهرًا لِبَطنٍ، فما وجدتُ بُدًّا من قِتال القوم، أو الكُفرِ بما أُنزل على محمد صلى الله عليه وسلم [2]. فأما عبد الله بن عمر:




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (তারিক ইবনু শিহাব বলেন,) আমি রাবাযাহ নামক স্থানে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে একটি জীর্ণ সওয়ারির উপর দেখতে পেলাম। তিনি হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলছিলেন: তোমরা দাসী-কন্যাদের কান্নার মতো কেন কান্নাকাটি করছো? আল্লাহর কসম! আমি এই বিষয়টি গভীরভাবে পর্যালোচনা করেছি (একেবারে আগাগোড়া ভেবেছি), অতঃপর এই সম্প্রদায়ের সাথে যুদ্ধ করা ছাড়া আমার জন্য কোনো পথ পাইনি—নতুবা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর যা নাযিল হয়েছে, তার সাথে কুফরি করা অপরিহার্য হতো। আর আব্দুল্লাহ ইবনু উমর সম্পর্কে কথা হলো:




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في المطبوع: تَحِنان حَنين، بالمهملة بدل الخاء المعجمة، وكأنها كذلك في (ص) و (م)، لكنها أُعجمت في (ز) و (ب) بالخاء المعجمة، وهو ضربٌ من البكاء دون الانتحاب، وأصله خروج الصوت من الأنف، وبعضهم يجعل الحنين والخنين واحدًا. (36) من طريق إسماعيل بن موسى الفزاري، عن شريك النخعي، به. مختصرًا بمقالة عليٍّ آخر الخبر هنا.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 274، والبخاري في "تاريخه الكبير" 4/ 309، وعمر بن شبّة في "تاريخ المدينة" 4/ 1257 من طريق جعفر بن زياد، عن أُمَيٍّ الصَّيرفي، به. وذكر قصةً مطولةً، وجعفر صدوق.وأخرجه يعقوب بن سفيان في المعرفة 2/ 678 - 688، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه الكبير" (3777) من طريق سفيان بن عيينة، عن أُمَيٍّ الصيرفي، عن رجل من بجيلة كان رضيعًا للقسري، عن طارق بن شهاب، به. فأُبهم في هذه الرواية ذكر صفوان بن قَبيصة.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 99، وابنُ شَبّة 4/ 1256، وابن أبي خَيثمة (3775) و (3776)، وابنُ عساكر 42/ 456 من طريق قيس بن مسلم الجَدَلي، عن طارق بن شهاب، به فذكر القصة بنحو رواية جعفر بن زياد عن أُمَيٍّ، لم يذكر مقالة عليٍّ التي في آخر الخبر هنا أنه لم يجد بدًّا من قتال القوم أو الكفر بما أنزل على محمد صلى الله عليه وسلم، لكن يشهد لمقالة عليٍّ هذه ما أخرجه أبو نُعيم في "تثبيت الإمامة" (189)، وابنُ عساكر 42/ 439 من طريق يحيى بن هانئ بن عروة المرادي، والبخاري في "تاريخه الكبير" 1/ 36، وابن عساكر 42/ 473 من طريق مازن بن عبد الله العائدي، وفي إسنادهما مقالٌ لكنها يصلحان للمتابعة، فيعضدان رواية أبي قبيصة صفوان بن قبيصة، ويعتضدان بها، وجاء في رواية جعفر بن زياد المتقدمة وكذلك في رواية يحيى بن هانئ المرادي بيان لحجّة عليٍّ رضي الله عنه في قوله: أو الكفر بما أُنزل على محمد صلى الله عليه وسلم، أنه بسبب نكث الناكثين لبيعته بعد أن بايعوه طائعين غير مُكرهين، قلنا: وكأنه يشير إلى قوله تعالى: {فَقَاتِلُوا الَّتِي تَبْغِي حَتَّى تَفِيءَ إِلَى أَمْرِ الله}، وهذا أولى في الحمل عليه من قول ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 535 حيث قال: يعني عليٌّ - والله أعلم - قوله تعالى: {وَجَاهِدُوا فِي اللَّهِ حَقَّ جِهَادِهِ} وما كان مثله.قوله: ضربتُ هذا الأمر ظهرًا لبطن، أي: اختبرتُه ونظرت في تدبيره.



[2] خبر حسن لكن بذكر الحَسن بن علي دون أخيه الحُسين، كما جاء في رواية غير المصنّف، وأبو قبيصة عمر بن قَبيصة هكذا وقع مسمَّى في هذه الرواية عمر، وإنما هو صفوان بن قَبيصة، كما في رواية جعفر بن زياد الأحمر عن أُمَيٍّ الصَّيرفي لهذا الخبر، وكذلك سمّاه كل من ترجم له كالبخاري وابن أبي حاتم وابن حبان في "الثقات"، وكذلك سمّاه أبو الخطاب الهجري وكثير أبو إسماعيل النواء إذ رويا عنه بعض الأخبار، وأغلب الظن أنَّ الوهم هنا في تسميته من جهة شريك - وهو عبد الله النخعي - فقد روى هذا الخبر عن شريك عبدُ الله بن صالح العِجْلي الكوفي عند البلاذُري في "أنساب الأشراف" 3/ 33، فسماه عَمرو بن قبيصة، بزيادة الواو، فدلَّ على أن شريكًا لم يضبط اسمه، وصفوان بن قبيصة هذا روى عنه أيضًا غير الذين تقدم ذكرهم ضِرارُ بن مرة، فبرواية هؤلاء مع ذكر ابن حبان له في "الثقات" يحتمل حديثه التحسين.وقد روى هذا الخبر عن أُمَيٍّ الصيرفي أيضًا سفيان بن عيينة غير أنه لم يُسمِّ صفوان بن قبيصة، بل أبهمه، ووصفه بأنه رجل من بَجيلة وأنه كان رضيعًا للقَسْري، وهذا هو نفسه صفوان، لأنَّ كثيرًا النواء وأبا الخطاب الهجري نسباه أحمسيًا وأحمسُ من بَجِيلة.وما علَّقه ابن حبان في "الثقات" من قوله: إن كان سمع من طارق فهو مدفوع برواية ابن عيينة المذكورة، فقد جاء فيها أنه سمع طارق بن شهاب.هذا ولم ينفرد صفوان بن قبيصة بهذا الخبر، بل تابعه على روايته قيس بن مسلم الجَدَلي، وهو ثقة، ولكنه لم يذكر فيه قول علي بن أبي طالب: والله لقد ضربتُ هذا الأمر ظهرًا لبطن .... إلخ، وإنما جاء في روايته بدلًا من ذلك مقالة أخرى لعليٍّ.لكن يشهد لرواية صفوان بن قبيصة في مقالة عليٍّ التي هنا شواهد كما سيأتي.وأخرجه البلاذُري في أنساب الأشراف" 3/ 33 من طريق يحيى بن عبد الحميد، بهذا الإسناد.ويحيى - وهو الحِمّاني - وإن كان فيه ضعف، يُعتبر به في المتابعات والشواهد.وأخرجه أبو الحسن الحمامي في "جزء الاعتكاف" ضمن مجموع فيه مصنفاته وأجزاء أخرى (36) من طريق إسماعيل بن موسى الفزاري، عن شريك النخعي، به. مختصرًا بمقالة عليٍّ آخر الخبر هنا.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 274، والبخاري في "تاريخه الكبير" 4/ 309، وعمر بن شبّة في "تاريخ المدينة" 4/ 1257 من طريق جعفر بن زياد، عن أُمَيٍّ الصَّيرفي، به. وذكر قصةً مطولةً، وجعفر صدوق.وأخرجه يعقوب بن سفيان في المعرفة 2/ 678 - 688، وابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه الكبير" (3777) من طريق سفيان بن عيينة، عن أُمَيٍّ الصيرفي، عن رجل من بجيلة كان رضيعًا للقسري، عن طارق بن شهاب، به. فأُبهم في هذه الرواية ذكر صفوان بن قَبيصة.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 99، وابنُ شَبّة 4/ 1256، وابن أبي خَيثمة (3775) و (3776)، وابنُ عساكر 42/ 456 من طريق قيس بن مسلم الجَدَلي، عن طارق بن شهاب، به فذكر القصة بنحو رواية جعفر بن زياد عن أُمَيٍّ، لم يذكر مقالة عليٍّ التي في آخر الخبر هنا أنه لم يجد بدًّا من قتال القوم أو الكفر بما أنزل على محمد صلى الله عليه وسلم، لكن يشهد لمقالة عليٍّ هذه ما أخرجه أبو نُعيم في "تثبيت الإمامة" (189)، وابنُ عساكر 42/ 439 من طريق يحيى بن هانئ بن عروة المرادي، والبخاري في "تاريخه الكبير" 1/ 36، وابن عساكر 42/ 473 من طريق مازن بن عبد الله العائدي، وفي إسنادهما مقالٌ لكنها يصلحان للمتابعة، فيعضدان رواية أبي قبيصة صفوان بن قبيصة، ويعتضدان بها، وجاء في رواية جعفر بن زياد المتقدمة وكذلك في رواية يحيى بن هانئ المرادي بيان لحجّة عليٍّ رضي الله عنه في قوله: أو الكفر بما أُنزل على محمد صلى الله عليه وسلم، أنه بسبب نكث الناكثين لبيعته بعد أن بايعوه طائعين غير مُكرهين، قلنا: وكأنه يشير إلى قوله تعالى: {فَقَاتِلُوا الَّتِي تَبْغِي حَتَّى تَفِيءَ إِلَى أَمْرِ الله}، وهذا أولى في الحمل عليه من قول ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 535 حيث قال: يعني عليٌّ - والله أعلم - قوله تعالى: {وَجَاهِدُوا فِي اللَّهِ حَقَّ جِهَادِهِ} وما كان مثله.قوله: ضربتُ هذا الأمر ظهرًا لبطن، أي: اختبرتُه ونظرت في تدبيره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4648)


4648 - فحدَّثنا بصحَّة حاله فيه أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن مَهدي بن رُستُم، حدثنا بِشْر بن شعيب بن أبي حمزة القرشي، حدثني أبي، عن الزُّهْري، أخبرني حمزة بن عبد الله بن عمر: أنه بينما هو جالس مع عبد الله بن عمر، إذ جاءه رجلٌ من أهل العراق، فقال: يا أبا عبد الرحمن، إني والله لقد حَرَصتُ أن اتَّسَمتُ بسَمْتِك، وأقتدي بك في أمر فُرقةِ الناس، وأعتزلُ الشرَّ ما استطعتُ، وإني أقرأ آيةً من كتاب الله مُحكَمةً قد أخَذَت بقلبي، فأخبرني عنها، أرأيتَ قولَ الله عز وجل: {وَإِنْ طَائِفَتَانِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ اقْتَتَلُوا فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا فَإِنْ بَغَتْ إِحْدَاهُمَا عَلَى الْأُخْرَى فَقَاتِلُوا الَّتِي تَبْغِي حَتَّى تَفِيءَ إِلَى أَمْرِ اللَّهِ فَإِنْ فَاءَتْ فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا بِالْعَدْلِ وَأَقْسِطُوا إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ} [الحجرات: 9]، أخبِرْني عن هذه الآية؟ فقال عبد الله: ما لكَ ولذلك؟ انصرِفْ عني، فانطَلَقَ حتى تَوارَى عنا سَوادُه، أقبلَ علينا عبدُ الله بن عمر، فقال: ما وجدتُ في نفسي في شيء من أمر هذه الآية، ما وجدتُ في نفسي أني لم أُقاتِل هذه الفئةَ الباغيةَ كما أمرني الله عز وجل [1].هذا باب كبيرٌ قد رواه عن عبد الله بن عمر جماعةٌ من كبار التابعين، وإنما قدّمتُ حديثَ شُعيب بن أبي حمزة عن الزُّهْري، واقتصرتُ عليه، لأنه صحيح على شرط الشيخين.وأما ما ذُكر من إمساك أسامة بن زيد عن القتال:




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হামযা ইবন আব্দুল্লাহ ইবন উমর বলেন: তিনি (আব্দুল্লাহ ইবন উমর) যখন উপবিষ্ট ছিলেন, তখন তাঁর কাছে ইরাকের একজন লোক এলো এবং বললো: হে আবু আবদুর রহমান, আল্লাহর কসম! আমি মানুষের বিভেদের (ফিতনার) সময় আপনার বেশভূষা ও চালচলন অনুসরণ করতে এবং সাধ্যমতো খারাপ কাজ থেকে দূরে থাকতে আপ্রাণ চেষ্টা করেছি। কিন্তু আমি আল্লাহর কিতাবের একটি সুস্পষ্ট আয়াত পাঠ করেছি যা আমার হৃদয়ে গেঁথে আছে। আপনি আমাকে সেই সম্পর্কে বলুন। আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে আপনি কী মনে করেন: “যদি মুমিনদের দুই দল যুদ্ধে লিপ্ত হয়, তবে তোমরা তাদের মধ্যে সন্ধি স্থাপন করো। অতঃপর যদি তাদের একদল অন্য দলের বিরুদ্ধে বাড়াবাড়ি করে, তাহলে যে দলটি বাড়াবাড়ি করছে, তার বিরুদ্ধে তোমরা যুদ্ধ করো, যতক্ষণ না তারা আল্লাহর নির্দেশের দিকে ফিরে আসে। যদি তারা ফিরে আসে, তবে তাদের মধ্যে ন্যায্যভাবে সন্ধি স্থাপন করো এবং ইনসাফ করো। নিশ্চয় আল্লাহ ইনসাফকারীদের ভালোবাসেন।” (সূরা হুজরাত: ৯)। আপনি আমাকে এই আয়াত সম্পর্কে বলুন। তখন আব্দুল্লাহ (ইবন উমর) বললেন: এর সাথে তোমার কী সম্পর্ক? আমার কাছ থেকে চলে যাও। লোকটি চলে গেল এবং আমাদের দৃষ্টি থেকে তার কালো অবয়ব অদৃশ্য হয়ে গেল। এরপর আব্দুল্লাহ ইবন উমর আমাদের দিকে ফিরলেন এবং বললেন: আল্লাহর এই আয়াতের বিষয় নিয়ে আমি আমার মনে অন্য কোনো বিষয়ে এমন দুঃখ বা আফসোস অনুভব করিনি, যতটা আফসোস অনুভব করেছি যে আমি আল্লাহ তাআলা যেভাবে আমাকে নির্দেশ দিয়েছেন, সেভাবে এই বিদ্রোহী দলের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করিনি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، وهو مكرر ما تقدم برقم (3764).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4649)


4649 - فحدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيباني، حدثنا حامد بن أبي حامد المقرئ، حدثنا عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد الدَّشْتَكي، حدثنا عمرو بن أبي قيس الرازي، عن إبراهيم بن مُهاجِر، عن أبي الشَّعثاء، عن عمِّه، عن أسامة بن زيد، قال: بعثني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في سَرِيّة في أُناس من أصحابه، فاستَبَقْنا أنا ورجلٌ من الأنصار إلى العدوّ، فحملتُ عليه، فلما دنوتُ منه كَبّر، فطعنتُه فقتلتُه، ورأيتُ أنه إنما فَعَل ذلك ليُحرِزَ دمَه، فلما رجعْنا سبقَني إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، لا فارسَ خيرٌ من فارسِكم، إنّا استَلحَقْنا رجلًا فسبقَني إليه، فكبّر فلم يمنعه ذلك أن قَتَلَه، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "يا أسامةُ، ما صنعتَ اليوم؟ " فقلت: حملتُ على رجلٍ فكبّر، فرأيتُ أنه إنما فعل ليُحرِزَ دمَه فقتلتُه، فقال: "كيف بعدَ اللهُ أكبرُ، فهلّا شَقَقَتَ عن قلبِه فعَلِمت [1] ما قال؟! فلم يزَلْ يقول لي يومئذٍ، فلا أقاتلُ رجلًا يقول: اللهُ أكبرُ مما نهاني عنه، حتى ألقاُه [2].




উসামা ইবনে যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তাঁর কতিপয় সাহাবীর সাথে একটি ছোট বাহিনীতে (সারিয়্যাহ) প্রেরণ করলেন। আমি এবং একজন আনসারী ব্যক্তি দ্রুত শত্রুর দিকে ছুটলাম। আমি তার উপর আক্রমণ করলাম। যখন আমি তার কাছাকাছি গেলাম, সে ‘আল্লাহু আকবার’ বলল। কিন্তু আমি তাকে বর্শা মেরে হত্যা করলাম। আমি মনে করেছিলাম যে সে কেবল নিজের রক্ত বাঁচানোর জন্যই এটা করেছে।

যখন আমরা ফিরে এলাম, সে (আনসারী লোকটি) আমার আগে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেল। সে বলল: ‘ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার আরোহীর (উসামার) চেয়ে উত্তম আর কোনো আরোহী নেই। আমরা এক ব্যক্তিকে ধাওয়া করলাম, কিন্তু সে (উসামা) আমার আগে পৌঁছে গেল। লোকটি ‘আল্লাহু আকবার’ বলল, কিন্তু উসামা তাকে হত্যা করা থেকে বিরত হলো না।’

নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উসামা, আজ তুমি কী করলে?" আমি বললাম: আমি এক ব্যক্তির ওপর আক্রমণ করলাম, সে ‘আল্লাহু আকবার’ বলল। কিন্তু আমি দেখলাম যে সে কেবল নিজের রক্ত বাঁচানোর জন্যই এটা করেছে, তাই আমি তাকে হত্যা করে ফেললাম।

তিনি বললেন: "আল্লাহু আকবার বলার পর কেমন করে (তাকে হত্যা করলে)? তুমি কি তার হৃদয় চিঁড়ে দেখেছিলে যে সে যা বলেছে, তা আসলেই (বিশ্বাস থেকে) বলেছে কিনা?!" তিনি সেদিন আমাকে ক্রমাগত এই কথা বলতেই থাকলেন। (উসামা বলেন:) এরপর থেকে তিনি আমাকে যা নিষেধ করেছেন তার কারণে আমি এমন কোনো ব্যক্তির সাথে যুদ্ধ করব না যে ‘আল্লাহু আকবার’ বলে, যতক্ষণ না আমি তাঁর সাথে (আল্লাহর সাথে) মিলিত হই।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في النسخ الخطية: فقلت، وهو تحريف إذ لا يُفهَم الكلام بها، والصواب ما أثبتنا، وهو موافق لبعض روايات هذا الخبر.



[2] حديث صحيح لكن بذكر "لا إله إلّا الله" بدل "الله أكبر"، وهذا إسناد ضعيف لجهالة عم أبي الشعثاء - واسم أبي الشعثاء سُليم بن أسود المُحاربي - وإبراهيم بن مُهاجر ضعيف يعتبر به في المتابعات والشواهد ولكنه اختلف عليه في إسناده فروي عنه مرة بزيادة ذكر إبراهيم النخعي بينه وبين أبي الشعثاء، كما في الطريق التالية.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الديات" ص 35 عن أبي عمرو عثمان بن سعيد بن عمرو، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد الدشتكي الرازي، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أحمد 36/ (21745) و (21802)، والبخاري (4269) و (6872)، ومسلم (96)، وأبو داود (2643)، والنسائي (8540) و (8541)، وابن حبان (4751) من طريق أبي ظَبيان حُصين بن جُندب، عن أسامة بن زيد. غير أنه جاء في هذه الرواية أنَّ الرجل الذي قتله أسامة قال: لا إله إلّا الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4650)


4650 - حدَّثَناهُ أبو أحمد محمد بن محمد الحافظ القاضي، حدثنا أحمد بن جعفر بن نصر، حدثنا محمد بن حُميد، حدثنا هارون بن المغيرة، حدثنا عمرو بن أبي قيس، عن إبراهيم بن مُهاجر، عن إبراهيم النَّخَعي، عن أبي الشَّعْثاء، عن عَمِّه، عن أسامة بن زيد. فذكر الحديثَ بنحوه [1].وأما ما ذُكِر من اعتزال سعد بن أبي وقّاص عن القتال:




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ আহমাদ মুহাম্মাদ ইবন মুহাম্মাদ হাফিয আল-কাদী আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আহমাদ ইবন জাফর ইবন নসর আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, মুহাম্মাদ ইবন হুমাইদ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, হারূন ইবনুল মুগীরাহ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, আমর ইবন আবী ক্বাইস আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি ইবরাহীম ইবন মুহা-জির থেকে, তিনি ইবরাহীম নাখঈ থেকে, তিনি আবূশ শা'ছা থেকে, তিনি তাঁর চাচা থেকে, তিনি উসামা ইবন যায়েদ থেকে (বর্ণনা করেন)। অতঃপর তিনি অনুরূপভাবে হাদীসটি উল্লেখ করেন [১]। আর সাদ ইবনে আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুদ্ধ থেকে বিরত থাকার বিষয়ে যা উল্লেখ করা হয়েছে...




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف كسابقه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4651)


4651 - فحدَّثَناه أبو زكريا يحيى بن محمد العَنْبري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا علي بن المُنذر، حدثنا ابن فُضيل، حدثنا مُسلم المُلائي، عن خَيثمة بن عبد الرحمن، قال: سمعت سعدَ بن مالك وقال له رجلٌ: إِنَّ عليًّا يقعُ فيك أنك تخلّفتَ عنه، فقال سعدٌ: واللهِ إنه لرأيٌ رأيتُه، وأخطأَ رأبي، إنَّ عليّ بن أبي طالب أُعطيَ ثلاثًا، لأن أكونَ أُعطيتُ إحداهُنّ أحبُّ إليَّ من الدنيا وما فيها، لقد قال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومَ غَدير خُمٍّ بعدَ حمدِ الله والثناءِ عليه: "هل تعلمون أني أَولى بالمؤمنين من أنفُسِهم؟ " قلنا: نعم، قال: "اللهم مَن كنتُ مولاهُ فعليٌّ مولاه، اللهم والِ من والاهُ، وعادِ من عاداهُ".وجيءَ به يومَ خَيبَر وهو أرمَدُ ما يُبصِرُ، فقال: يا رسول الله، إني أرمَدُ، فَتَفَلَ في عينَيه ودعا له، فلم يَرمَدْ حتى قُتِل، وفُتِحَ عليه خيبرُ.وأخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم عمَّه العباسَ وغيرَه من المسجد، فقال له العباسُ: تُخرِجُنا ونحن عُصْبتُك وعُمومتُك وتُسكِنُ عليًا؟ فقال: "ما أنا أخرَجَكُم وأسَكَنَه، ولكنّ الله أخرجَكُم وأسكَنَه" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . وأما ما ذُكر من اعتزال أبي مسعود الأنصاري وأبي موسى الأشعري، فإنَّ أمير المؤمنين رضي الله عنه وَجَّهَ إلى الكوفة لأَخْذ البيعةِ له محمدًا ابنَه ومحمدَ بن أبي بكر، وكان على الكوفة أبو موسى الأشعري وأبو مسعود، فامتنع أبو موسى أن يُبايع، فرجعا إلى أمير المؤمنين، فبعث الحسنَ ابنَه ومالكَ الأشْتَر.




সা'দ ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে একজন লোক বলল: নিশ্চয়ই আলী আপনার দোষ ধরেন যে, আপনি তাঁর থেকে দূরে ছিলেন (তাঁর পক্ষে ছিলেন না)। সা'দ বললেন: আল্লাহর শপথ! এটি আমার নিজস্ব সিদ্ধান্ত ছিল, এবং আমার সিদ্ধান্ত ভুল ছিল। নিশ্চয়ই আলী ইবনু আবী তালিবকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তিনটি জিনিস দান করা হয়েছে। যদি এর মধ্যে একটিও আমাকে দান করা হতো, তাহলে তা আমার কাছে দুনিয়া ও এর মধ্যে যা কিছু আছে তার চেয়েও বেশি প্রিয় হতো। আল্লাহ তাআলার প্রশংসা ও গুণগান করার পর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম গাদীরে খুমের দিন তাঁকে (আলীকে) বলেছিলেন: “তোমরা কি জানো যে, আমি মুমিনদের কাছে তাদের নিজেদের জীবনের চেয়েও বেশি প্রিয়?” আমরা বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: “হে আল্লাহ! আমি যার মাওলা (অভিভাবক), আলীও তার মাওলা। হে আল্লাহ! তুমি তাকে ভালোবাসো যে আলীকে ভালোবাসে, আর তার সাথে শত্রুতা করো যে আলীর সাথে শত্রুতা করে।” আর খায়বারের দিন তাঁকে (আলীকে) আনা হলো যখন তিনি চক্ষু রোগে আক্রান্ত ছিলেন এবং দেখতে পাচ্ছিলেন না। তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি চোখ ওঠায় ভুগছি। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দুই চোখে থুথু দিলেন এবং তাঁর জন্য দুআ করলেন। ফলে তিনি শহীদ হওয়ার আগ পর্যন্ত আর কখনও চক্ষু রোগে আক্রান্ত হননি এবং তাঁর হাতেই খাইবারের বিজয় সম্পন্ন হয়। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর চাচা আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং অন্য অন্যদেরকেও মসজিদ থেকে বের করে দিয়েছিলেন। তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: আপনি কি আমাদের বের করে দিচ্ছেন, অথচ আমরা আপনার আত্মীয় ও চাচা, আর আলীকে থাকতে দিচ্ছেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমি তোমাদের বের করিনি এবং তাকে থাকতে দিইনি, বরং আল্লাহই তোমাদের বের করেছেন এবং তাকে থাকতে দিয়েছেন।”

আর আবূ মাসঊদ আনসারী ও আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিচ্ছিন্ন থাকার যে কথা উল্লেখ করা হয়েছে, তার কারণ হলো, আমীরুল মুমিনীন (আলী) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জন্য বাইআত (আনুগত্যের শপথ) গ্রহণ করার উদ্দেশ্যে তাঁর পুত্র মুহাম্মাদ এবং মুহাম্মাদ ইবনু আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কূফায় পাঠান। তখন কূফার দায়িত্বে ছিলেন আবূ মূসা আল-আশআরী এবং আবূ মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আবূ মূসা বাইআত করতে অস্বীকার করেন। তখন তাঁরা দু'জন আমীরুল মুমিনীনের কাছে ফিরে যান। এরপর তিনি তাঁর পুত্র হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং মালিক আল-আশতার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে প্রেরণ করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل مسلم الملائي، فإنه متروك، لكنه متابع على القصتين الأولى والثانية في هذا الخبر.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 118 - 119 من طريق يحيى بن سلمة بن كُهيل، عن مسلم المُلائي، به. دون القصة الأخيرة.وأخرج القصة الأُولى منه يوم غدير خُمٍّ: النسائي (8340) و (8425) و (8426) من طريق موسى بن يعقوب الزَّمْعي، و (8427) من طريق يعقوب بن جعفر بن أبي كثير، كلاهما عن مهاجر بن مسمار، عن عائشة بنت سعد بن أبي وقاص، عن أبيها. وقُرن بعائشة في رواية موسى ابن يعقوب الثانية أخوها عامر بن سعد. وإسناده حسن.وأخرج المرفوع من القصة فقط النسائي (8414) من طريق أيمن الحبشي، أن سعدًا قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من كنت مولاه فعليٌّ مولاه". وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، وأغلب الظن أنَّ أيمن لم يدرك سعدًا، وأنَّ روايته عنه مرسلة.وأخرج المرفوعَ من قصة غدير خُمّ كذلك: ابن ماجه (121)، والنسائي (8343) من طريق عبد الرحمن بن سابِطٍ، عن سعد بن أبي وقاص ورجاله ثقات، لكن جزم ابن مَعِين بأنَّ ابن سابِطٍ لم يسمع من سعد بن أبي وقاص.وقد تقدمت قصة خيبر عند المصنف برقم (4626) بإسناد جيد عن عامر بن سعد بن أبي وقاص عن أبيه، وانظر تمام تخريجها هناك. ويشهد لقصة غدير خُمٍّ حديثُ زيد بن أرقم المتقدم برقم (4627) و (4628)، وانظر تمام شواهده هناك.وأخرج القصة الأخيرة في إخراج رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس من المسجد غير عليٍّ: النسائي (8371) من طريق إسرائيل، عن عبد الله بن شريك، عن الحارث بن مالك، عن سعد بن أبي وقاص. وإسناده ضعيف لجهالة الحارث بن مالك، وللاختلاف فيه سندًا ومتنًا.فقد أخرج النسائي (8372) من طريق فطر بن خليفة، عن عبد الله بن شريك، عن عبد الله بن الرقيم، عن سعد: أن العباس أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: سددتَ أبوابنا إلّا باب عليٍّ؟ فقال: "ما أنا فتحتُها ولا سددتُها". فخالف فطرٌ إسرائيلَ في تسمية التابعي، وفي متن الخبر كما ترى، وعبد الله بن الرقيم لا يُعرف كذلك.وله طريق أخرى عن سعد بن أبي وقاص عند الطبراني في "الأوسط" (3930) بسند فيه لِينٌ، بلفظ رواية فطر بن خليفة، أي: بذكر سدِّ الأبواب، فهو المحفوظ في حديث سعد بن أبي وقاص، وانظر حديثَ ابن عبّاس الآتي عند المصنف برقم (4702).وأما قول النبي صلى الله عليه وسلم في آخر الخبر هنا في ذكر الإخراج والإسكان، فقد جاء عن سعد بن أبي وقاص أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قاله في قصة أخرى، وهي ما أخرجه النسائي (8096) و (8370) وغيره من طريق محمد بن سليمان المعروف بلُوَين، عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار المكي، عن أبي جعفر محمد بن علي الباقر، عن إبراهيم بن سعد بن أبي وقاص، عن أبيه - ولم يقل مرةً عن أبيه - قال: كنا عند النبي صلى الله عليه وسلم وعنده قوم جلوس، فدخل عليٌّ، فلما دخل خرجوا، فلما خرجوا تَلاوموا، فقالوا: والله ما أخرجَنا وأدخلَه، فرجعوا فدخلوا، فقال: "والله ما أنا أدخلتُه وأخرجتُكم، بل الله أدخله وأخرجكم".وقد نقل الخطيب في "تاريخه" 3/ 218 أنَّ أحمد بن حنبل أنكر هذا الحديث، ورجَّح الخطيب أنه إنما أنكره متصلًا بذكر سعد بن أبي وقاص، لأنَّ المحفوظ روايته عن إبراهيم بن سعد بن أبي وقاص مرسلًا، ثم أسنده الخطيبُ من طريق عبد الله بن وهب ومن طريق الحُميدي، كلاهما عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن أبي جعفر محمد بن علي، عن إبراهيم بن سعد مرسلًا.وقد جاء عند أبي الشيخ في "طبقات المحدثين بأصبهان" 2/ 144 من طريق محمد بن سليمان لُوَينٍ موصولًا، وقال بإثره: قال لُوينٌ: حدثنا به ابن عيينة مرةً أخرى عن إبراهيم بن سعد بن أبي وقاص لم يجاوز به. فإذا صحَّ ما عند أبي الشيخ يكون هذا الاختلاف من جهة ابن عُيينة لا من جهة لُوين، وإليه تشير رواية النسائي التي تقدمت، وعلى أيِّ حالٍ فرجاله ثقات، وهو أصحُّ من طريق المصنف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4652)


4652 - فحدثنا أبو الفضل محمد بن إبراهيم المُزكِّي، حدثنا الحسين بن محمد بن زياد، حدثنا داود بن رُشَيد، حدثنا الهيثم بن عَديّ، عن مجالدٍ وابن [1] عيّاش وإسماعيل بن أبي خالد، عن الشَّعْبي قال: لما قُتل عثمان وبُويع عليٌّ خَطَبَ أبو موسى وهو على الكوفة، فنهى الناسَ عن القتالِ والدخولِ في الفتنة، فعزلَه عليٌّ عن الكوفة من ذي قار، وبَعَثَ إليه عمارَ بن ياسر والحسنَ بن عليٍّ فعزَلاه، واستعمل قَرَظة بنَ كعب، فلم يزل عاملًا حتى قدم عليٌّ من البصرة بعد أشهُر، فعزلَه حيثُ قدم، فلما سار إلى صِفِّين استخلف عُقبة بن عمرو أبا مسعود الأنصاري حين قدم من صِفِّين [2].




শা'বী থেকে বর্ণিত, তিনি (শা'বী) বলেন, যখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে হত্যা করা হলো এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে বাইআত (আনুগত্যের শপথ) গ্রহণ করা হলো, তখন আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি কুফার গভর্নর ছিলেন, খুৎবা দিলেন। তিনি জনগণকে যুদ্ধ করা ও ফিতনার মধ্যে প্রবেশ করা থেকে বারণ করলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে যী-কার নামক স্থান থেকে কুফা থেকে বরখাস্ত করলেন। তিনি তাঁর (আবূ মূসার) কাছে আম্মার ইবনু ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন, তাঁরা তাঁকে বরখাস্ত করলেন এবং (আলী) ক্বারযা ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে (গভর্নর) নিযুক্ত করলেন। তিনি কয়েক মাস পর্যন্ত গভর্নর হিসেবে বহাল ছিলেন, যতক্ষণ না আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসরা থেকে ফিরে আসলেন। ফিরে আসার পর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বরখাস্ত করলেন। অতঃপর যখন তিনি (আলী) সিফফীনের দিকে যাত্রা করলেন, তখন তিনি উক্ববা ইবনু আমর আবূ মাসঊদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে (কুফার) স্থলাভিষিক্ত করলেন, যখন তিনি সিফফীন থেকে ফিরে আসলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: أبي، والمثبت من "تلخيص الذهبي" وهو الصواب، وهو عبد الله بن عيّاش المعروف بالمنتُوف، ويُكنى بأبي الجرّاح.



[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل الهيثم بن عدي، فقد جزم غير واحدٍ من أهل المعرفة بأنه كان يكذب، لكن روي نحو هذا الخبر بأسانيد أصلح من هذا من أحسنها ما أخرجه عمر بن شبّة كما في "فتح الباري" 23/ 114، وعنه الطبريُّ في "تاريخه" 4/ 499 عن أبي الحسن علي بن محمد المدائني، عن بشير بن عاصم، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبيه. وذكر الطبري في "تاريخه" قصة أبي موسى مع أهل الكوفة ودعوتهم لاعتزال القتال من وجوهٍ 4/ 477 و 481 - 482 و 482 - 483 و 485 - 486.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4653)


4653 - أخبرنا عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا شُعْبة، عن عمرو بن مُرّة، عن أبي وائل قال: دخل أبو موسى الأشعَري وأبو مسعود البَدْري على عمّار، وهو يَستنفِرُ الناسَ، فقالا له: ما رأَينا منك أمرًا منذ أسلمتَ أكرَهَ عندنا من إسراعِك في هذا الأمر، فقال عمارٌ: ما رأيتُ منكما منذ أسلمتُما أمرًا أكرَهَ عندي من إبطائكُما عن هذا الأمر، قال: فكَساهُما عمارٌ حُلَّة حلّةً، وخرج إلى الصلاة يومَ الجُمعة [1].وأما قصة اعتزال محمد بن مَسلَمة الأنصاري عن البَيعة:




আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ ওয়াইল বলেন: আবূ মূসা আল-আশআরী এবং আবূ মাসঊদ আল-বদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন, যখন তিনি লোকজনকে (জিহাদের জন্য) উৎসাহিত করছিলেন। তখন তাঁরা (আবু মূসা ও আবু মাসঊদ) তাঁকে বললেন: আপনি ইসলাম গ্রহণ করার পর থেকে আপনার কোনো কাজই আমাদের কাছে এত অপছন্দ হয়নি, যতটা এই বিষয়ে আপনার দ্রুততা। উত্তরে আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনারা ইসলাম গ্রহণ করার পর থেকে আমার কাছে আপনাদের কোনো কাজই এত অপছন্দ হয়নি, যতটা এই বিষয়ে আপনাদের বিলম্ব করা। অতঃপর আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদের উভয়কে একটি করে পোশাক পরিয়ে দিলেন, আর তিনি জুমুআর দিনে সালাতের জন্য বের হয়ে গেলেন।

আর মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামা আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাইআত থেকে বিচ্ছিন্ন থাকার ঘটনা এই যে:




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لكن ما وقع هنا من التصريح بأنَّ عمارًا هو الذي كسا الحُلّتين فهو وهم، فقد روى هذا الخبر عن شعبة بدلُ بنُ المحبّر عند البخاري (7102)، وحجاج بن محمد الأعور عند ابن عساكر 43/ 457، فلم يُقيِّداه بذكر عمار، وإن كانت روايتهما تُوهم أنه هو، فقد قالا في روايتهما بعد ذكر مقالة عمار لأبي موسى وأبي مسعود: وكساهما حلةً، وكذلك رواه محمد بن جعفر عن شعبة في رواية ابن أبي شيبة عنه في "المصنف" 15/ 73 و 287، فروايتهم تقتضي عود الضمير إلى أقرب مذكور، وهو عمار.لكن ذكر الحافظ في "فتح الباري" 23/ 118 أنَّ أحمد بن حنبل قد روى هذا الخبرَ عن محمد بن جعفر، عن شعبة، بلفظ: فقام أبو مسعود فبعث إلى كل واحدٍ منهما حُلةً، وتؤيده رواية الأعمش، عن شقيق بن سلمة - وهو أبو وائل نفسه - عند البخاري (7105) حيث قال: فقال أبو مسعود - وكان مُوسِرًا -: يا غلام، هاتِ حُلَّتين، فأعطى إحداهما أبا موسى والأخرى عمارًا، وقال: روحا فيها إلى الجمعة. فصرَّح بأمر الذي أهدى الحُلّيتين إنما هو أبو مسعود، فهذا هو الصحيح، والله أعلم.وسيأتي من طريق بدل بن المحبّر عن شعبة برقم (6078). ابن عبد الحميد بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي 8/ 191، ومن طريق ابن عساكر 55/ 283 من طريق يعقوب بن محمد الزُهْري، عن إبراهيم بن سعد، به.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (1289)، وفي "الصغير" (404) من طريق زيد بن أسلم، عن أبيه، عن محمد بن مسلمة، وإسناده في "الأوسط" صحيح.وأخرجه أحمد 29 / (17979) من طريق الحسن البصري يقول: إنَّ عليًا بعث إلى محمد بن مسلمة، فجيء به، فقال: ما خلّفك عن هذا الأمر؟ قال: دفع إليَّ ابن عمك - يعني النبي صلى الله عليه وسلم سيفًا، فقال: "قاتِل به ما قُوتل العدوُّ … " ثم ذكر نحوه. ورجاله ثقات لكنه مرسل.وأخرجه بنحوه أيضًا أحمد 25 / (16029) و (16030)، وابن ماجه (3962) من طريق حماد بن سلمة، عن علي بن زيد بن جُدعان، عن أبي بُردة، قالك مررتُ بالربذة فإذا فسطاطٌ، فقلت: لمن هذا؟ فقيل: لمحمد بن مسلمة، فاستأذنت عليه … وإسناده ضعيف لضعف علي بن زيد.وأخرج الطبراني في "الكبير" 12/ (12968) من طريق ثواب بن عتبة، عن أبي جَمْرة الضُّبَعي، عن ابن عبّاس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أعطى محمد بن مسلمة سيفًا، فقال: "قاتل المشركين ما قوتلوا … " ثم ذكر نحوه، وإسناده جيد.وانظر "مسند أحمد" 29 / (17982)، و"البداية والنهاية" لابن كثير 9/ 183 - 184 في دلائل النبوة في باب إخباره صلى الله عليه وسلم عن الفتن.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4654)


4654 - فحدَّثَناه عليُّ بن عيسى الحِيري، حدثنا أحمد بن نَجْدة القرشي، حدثنا يحيى بن عبد الحميد، حدثنا إبراهيم بن سعد، عن سالم بن صالح بن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبيه، عن محمود بن لَبيد، عن محمد بن مَسلَمة، قال: قلتُ: يا رسول الله، كيف أصنعُ إذا اختلفَ المُصلُّون؟ قال: "تَخْرُجُ بسيِفك إلى الحَرّة فتضربُها به، ثم تَدخُل بيتَك حتى تأتيَك مَنِيّةٌ - أو قال: مِيتةٌ - قاضِيةٌ، أو يدٌ خاطئةٌ" [1].




মুহাম্মদ বিন মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ, যখন মুসল্লিগণ মতভেদ করবে, তখন আমি কী করব?" তিনি বললেন: "তুমি তোমার তলোয়ার নিয়ে হাররা নামক স্থানে বেরিয়ে যাবে এবং তা দ্বারা আঘাত করবে। তারপর তুমি তোমার ঘরে প্রবেশ করবে, যতক্ষণ না একটি অনিবার্য (বা চূড়ান্ত) মৃত্যু—অথবা তিনি বলেছেন: একটি চূড়ান্ত মওত—কিংবা একটি ভুলকারী হাত তোমার কাছে এসে পৌঁছায়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لجهالة سالم بن صالح، فهو لا يُعرف كما قال أبو حاتم الرازي، ويحيى بن عبد الحميد - وهو الحِمّاني - فيه ضعف، لكنه متابع، وقد رُوي هذا الخبرُ من طُرق أحدها صحيح.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 19 / (513)، وابن بَطّة في "الإبانة" 2/ 579، وأبو القاسم بن بشران في الجزء الأول من "أماليه" (530)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 55/ 283 من طُرق عن يحيى ابن عبد الحميد بهذا الإسناد.وأخرجه البيهقي 8/ 191، ومن طريق ابن عساكر 55/ 283 من طريق يعقوب بن محمد الزُهْري، عن إبراهيم بن سعد، به.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (1289)، وفي "الصغير" (404) من طريق زيد بن أسلم، عن أبيه، عن محمد بن مسلمة، وإسناده في "الأوسط" صحيح.وأخرجه أحمد 29 / (17979) من طريق الحسن البصري يقول: إنَّ عليًا بعث إلى محمد بن مسلمة، فجيء به، فقال: ما خلّفك عن هذا الأمر؟ قال: دفع إليَّ ابن عمك - يعني النبي صلى الله عليه وسلم سيفًا، فقال: "قاتِل به ما قُوتل العدوُّ … " ثم ذكر نحوه. ورجاله ثقات لكنه مرسل.وأخرجه بنحوه أيضًا أحمد 25 / (16029) و (16030)، وابن ماجه (3962) من طريق حماد بن سلمة، عن علي بن زيد بن جُدعان، عن أبي بُردة، قالك مررتُ بالربذة فإذا فسطاطٌ، فقلت: لمن هذا؟ فقيل: لمحمد بن مسلمة، فاستأذنت عليه … وإسناده ضعيف لضعف علي بن زيد.وأخرج الطبراني في "الكبير" 12/ (12968) من طريق ثواب بن عتبة، عن أبي جَمْرة الضُّبَعي، عن ابن عبّاس: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أعطى محمد بن مسلمة سيفًا، فقال: "قاتل المشركين ما قوتلوا … " ثم ذكر نحوه، وإسناده جيد.وانظر "مسند أحمد" 29 / (17982)، و"البداية والنهاية" لابن كثير 9/ 183 - 184 في دلائل النبوة في باب إخباره صلى الله عليه وسلم عن الفتن.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4655)


4655 - وحدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أبو مسلم إبراهيم بن عبد الله، حدثنا عبد الله بن عبد الوهاب الحَجَبي، حدثني إبراهيم بن جعفر الأنصاري، حدثني سليمان بن محمود، من ولد محمد بن مَسلَمة الأنصاري، عن سعد بن زيد بن سعد الأشهلي: أنه أَهدَى إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم سيفًا من نَجْران، فلما قَدِم عليه أعطاهُ محمدَ بنَ مسلمة، وقال: "جاهِدْ بهذا في سبيل الله، فإذا اختلَفتْ أعناقُ الناس فاضرِبْ به الحَجَرَ، ثم ادخُل بيتَك، وكن حِلْسًا مُلقًى، حتى تَقتُلَك يدٌ خاطئةٌ أو تأتيَك مَنيَّةٌ قاضيةٌ" [1]. قال الحاكم: فبهذِه الأسبابِ وما جانسها كان اعتزالُ من اعتزل عن القتال مع عليّ رضي الله عنه، وبضدّها كان قتالُ مَن قاتَلَ [2].




সা'দ ইবনু যায়দ ইবনু সা'দ আল-আশহালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নাজরাণ থেকে একটি তলোয়ার উপহার দিলেন। যখন তা তাঁর কাছে পৌঁছাল, তিনি সেটি মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামাহকে দিলেন এবং বললেন: "এর দ্বারা আল্লাহর পথে জিহাদ করো। অতঃপর যখন মানুষের মাঝে মতপার্থক্য দেখা দেবে (বা গৃহযুদ্ধ শুরু হবে), তখন এটি দিয়ে পাথরের উপর আঘাত করো (অর্থাৎ এর ব্যবহার বন্ধ করে দাও)। এরপর তুমি তোমার ঘরে প্রবেশ করো এবং একটি বিছানো মাদুরের মতো হয়ে থেকো, যতক্ষণ না কোনো ভুলকারী হাত তোমাকে হত্যা করে অথবা তোমার নির্ধারিত মৃত্যু উপস্থিত হয়।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن إن شاء الله من أجل سليمان بن محمود - وهو سليمان بن محمد بن محمود بن محمد بن مسلمة - فقد روى عنه اثنان وذكره ابن حبان في "الثقات"، وبهذا الإسناد أثبت غيرُ واحدٍ من أهل النقد صحبةَ سعد بن زيد بن سعد الأشهلي، منهم أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنُه في "الجرح والتعديل" 4/ 83.وأخرجه البخاري في "التاريخ الكبير" 4/ 48، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 282 وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (949)، والطبراني في "الكبير" (5424)، وفي "الأوسط" (2375)، وأبو نعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (3161)، وابن عساكر 55/ 282 من طرق عن عبد الله بن عبد الوهاب الحَجَبي بهذا الإسناد.وانظر ما قبله.قوله: "كن حِلْسًا مُلقًى" أي: الزَم بيتك لُزوم البِسَاط، لأنَّ الحلس هو بساط يُبسط في البيت.



[2] في (ز) و (ب): قاتله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4656)


4656 - فحدثنا أبو بكر بن إسحاق الفقيه وعلي بن حَمْشاذَ، قالا: حدثنا بِشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سُفيان، حدثنا أبو موسى - يعني إسرائيل بن موسى - قال: سمعتُ الحسن يقول: جاء طلحةُ والزُّبير إلى البصرة، فقال لهم الناسُ: ما جاء بكم؟ قالوا: نَطلُب دمَ عثمان قال الحسنُ: أيا سُبحانَ الله! أفَما كان للقوم عُقولٌ فيقولون: والله ما قتلَ عثمانَ غيرُكم؟! قال: فلما جاء عليٌّ إلى الكوفة، وما كان للقوم عُقولٌ فيقولون: أيُّها الرجلُ، إنا واللهِ ما ضُمِّنّاك؟ [1].




হাসান থেকে বর্ণিত, তিনি (আবু মুসা) বলেন, আমি হাসানকে বলতে শুনেছি: তালহা ও যুবায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসরায় আসলেন। তখন লোকজন তাঁদেরকে জিজ্ঞেস করল: আপনারা কী কারণে এসেছেন? তাঁরা বললেন: আমরা উসমানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রক্তের প্রতিশোধ নিতে এসেছি। হাসান বললেন: সুবহানাল্লাহ! ঐ লোকগুলোর কি এতটুকুও জ্ঞান ছিল না যে তারা বলবে: আল্লাহর কসম, উসমানকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তো আপনারা ছাড়া আর কেউ হত্যা করেনি?! তিনি (হাসান) বললেন: অতঃপর যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কুফায় আসলেন, তখন কি ঐ লোকগুলোর জ্ঞান ছিল না যে তারা বলবে: হে লোকটি, আল্লাহর কসম, আমরা আপনাকে দায়ী করিনি (বা, আপনার বিরুদ্ধে কোনো অঙ্গীকার করিনি)?




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده جيد. الحُميدي: هو عبد الله بن الزبير الأسدي المكي، وسفيان: هو ابن عيينة، والحسن: هو البصري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4657)


4657 - فحدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيه، حدثنا محمد بن عثمان بن أبي شَيْبة، حدثنا يحيى بن مَعِين، عن هشام بن يوسف، عن عبد الله بن مصعب، قال: أخبرني موسى بن عُقْبة، قال: قال علقمة بن وقّاص اللَّيثي: لما خرج طلحةُ والزبيرُ وعائشةُ لطلب دم عثمان رضي الله عنهم أجمعين - كانت عائشةُ خطيبةَ القوم بها، وهم لها تَبَعٌ، فعَرضُوا من معهم بذاتِ عِرقٍ، فاستصغَروا عُرْوة بنَ الزبير وأبا بكر ابن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، فردُّوهُما.قال: ورأيتُ طلحةَ وأَحبُّ المجالسِ إليه أخلاها، وهو ضارِبٌ بلِحْيتِه على زَوْرِه، قال: فقلتُ له: يا أبا محمد إني أراك وأحبُّ المجالسِ إليك أخلاها، وأنت ضاربٌ بلحيتِك على زَوْرِك، إن كنتَ تكرهُ هذا الأمرَ فدَعْهُ، فليس يُكرِهُك عليه أحدٌ، قال: يا علقمةَ بنَ وقْاص، لا تَلُمني، كنا أمسِ يدًا واحدةً على مَن سِوانا، فأصبحنا اليومَ جَبَلَين من حديدٍ يَزْحَفُ أحدُنا إلى صاحبِه [1].




আলক্বামা ইবন ওয়াক্কাস আল-লাইসী থেকে বর্ণিত, তিনি (আলক্বামা) বলেন, যখন তালহা, যুবাইর এবং আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর রক্তের প্রতিশোধের দাবিতে বের হলেন—আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন সেই কাফেলার নেত্রী এবং তারা তাঁর অনুগামী ছিলেন—তারা 'জাতু ইরক্ব' নামক স্থানে তাঁদের সাথীদের গণনা করলেন। তখন তারা উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর এবং আবূ বকর ইবনু আবদুর রহমান ইবনুল হারিস ইবনু হিশামকে অপ্রাপ্তবয়স্ক মনে করে ফিরিয়ে দিলেন। তিনি (আলক্বামা) বলেন, আমি তালহাকে দেখলাম, তাঁর কাছে প্রিয় বৈঠক হলো সেই স্থান যা জনশূন্য। তিনি তাঁর দাড়ি তাঁর বুকের উপর রেখে (চিন্তামগ্ন অবস্থায়) বসে ছিলেন। আমি তাঁকে বললাম, হে আবূ মুহাম্মাদ! আমি দেখছি আপনার কাছে প্রিয় বৈঠক জনশূন্য স্থান এবং আপনি আপনার দাড়ি আপনার বুকের উপর রেখে বসে আছেন। আপনি যদি এই ব্যাপারটি (অভিযান) অপছন্দ করেন, তবে তা ছেড়ে দিন। কেউ আপনাকে এতে বাধ্য করছে না। তিনি (তালহা) বললেন, হে আলক্বামা ইবন ওয়াক্কাস! আমাকে দোষারোপ করো না। গতকাল পর্যন্ত আমরা অন্যদের বিরুদ্ধে এক হাত ছিলাম। আর আজ আমরা লোহার দুটি পাহাড়ে পরিণত হয়েছি, যার একটি আরেকটির দিকে এগিয়ে যাচ্ছে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن، وجوّده الذهبي في "تلخيصه" عند طريقه الآتية عند المصنف برقم (5694)، وذلك من أجل عبد الله بن مصعب - وهو ابن ثابت الزبيري - فقد كان أميرًا جميل السيرة جليل القدر عظيم الشرف محمودًا في ولايته، وإنما تكلّم فيه ابن مَعِين لأنه لم يكن صاحب كتاب، فقال عنه: ضعيف الحديث. قلنا: بناه على أنه لم يكن صاحب كتاب وأنه إنما كان يحفظ، وليس مجرد ذلك مما تُضعَّف به رواية الراوي إلّا إن ثبت أنه أخطأ في أحاديثه، أو خُولف فيها، فمثله حسن الحديث إلّا أن يُخطئ أو يُخالف، ويكون من بابة عبد الرحمن بن أبي الزناد كما قال أبو حاتم الرازي.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 4/ 453 و 476 عن أحمد بن منصور، عن يحيى بن مَعِين، بهذا الإسناد.وأخرجه مختصرًا ابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه الكبير" (2270)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 40/ 247 عن يحيى بن مَعِين، به - دون قصة علقمة بن وقاص وطلحة بن عُبيد الله.وأما قصة استصغار أصحاب الجمل لعروة وأبي بكر بن عبد الرحمن فأخرجها ابن سعد في "الطبقات" 7/ 177، وابنُ أبي خيثمة (2271)، وابن عساكر 40/ 247 من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه.وكذا رواه حفص بن غياث عن هشام بن عروة عند ابن أبي خيثمة (2103)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على "العلل" لأبيه (3629) بذكر عروة وحده.والزَّوْر: أعلى الصدر، أو وسط الصدر.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4658)


4658 - فحدَّثني أبو علي الحافظ، حدثنا الهيثم بن خلَف الدُّوْري، حدثنا محمد بن المثنَّى، حدثني خالد بن الحارث، حدثنا حُميد الطويل، عن الحسن، عن أبي بَكْرة قال: عَصَمَني الله بشيءٍ سمعتُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم ولما هلَك كِسْرى، قال: "مَن استخلَفُوا؟ " قالوا: ابنتَه، قال: فقال: "لن يُفلَحَ قومٌ وَلَّوا أمرَهم امرأةٌ". قال: فلما قَدِمَت عائشةُ، ذكرتُ قولَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم فَعَصَمَني اللهُ به [1].




আবু বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহ আমাকে এমন একটি বিষয়ের মাধ্যমে রক্ষা করেছেন যা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছ থেকে শুনেছি। যখন কিসরা (পারস্য সম্রাট) মারা গেলেন, তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "তারা কাকে স্থলাভিষিক্ত করেছে?" তারা বলল: "তার মেয়েকে।" তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সেই জাতি কখনোই সফল হবে না যারা তাদের নেতৃত্ব কোনো নারীর হাতে অর্পণ করে।" তিনি (আবু বাকরা) বলেন: অতঃপর যখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) [যুদ্ধের উদ্দেশ্যে] আগমন করলেন, তখন আমার রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের এই উক্তিটি মনে পড়লো, আর আল্লাহ এর মাধ্যমে আমাকে রক্ষা করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. حميد الطويل هو ابن أبي حميد، والحسن: هو البصري.وأخرجه الترمذي (2262)، والنسائي (5904) عن محمد بن المثنى، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث صحيح.وأخرجه أحمد 34 / (20438) من طريق حماد بن سلمة، عن حميد الطويل، به.وأخرج المرفوعَ منه فقط أحمدُ (20178) و (20517)، وابن حبان (4516) من طريق مُبارك بن فَضالة، عن الحسن البصري، عن أبي بكرة.وأخرج المرفوع منه أيضًا أحمد (20402) و (20474) و (20477) من طريق عبد الرحمن بن جوشن الغطفاني، عن أبي بكرة. وإسناده صحيح.وأخرجه بنحوه أحمد (20508) من طريق علي بن زيد بن جُدعان، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبيه. وابن جُدعان ضعيف.وسيأتي عند المصنف برقم (7984) من طريق مُسدَّد عن خالد بن الحارث.وبرقم (8812) من طريق عوف بن أبي جميلة الأعرابي عن الحسن البصري.وبرقم (7983) بلفظ مختلف من طريق بكار بن عبد العزيز بن أبي بكرة، عن أبيه، عن جده. أنَّ بعضهم جزم بعدم سماع سالم من أم سلمة.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 411 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.