হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4799)


4799 - حدثني أبو بكر بن أبي دارم، حدثنا إبراهيم بن عبد الله العَبسي، حدثنا مالك بن إسماعيل النهدي، حدثنا عبد السلام بن حَرْب، عن أبي الجَحاف، عن جميع بن عُمير، قال: دخلتُ مع عمتي على عائشة، فسُئلت: أيُّ الناسِ كان أحبَّ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قالت: فاطمه، قيل: فمن الرجال؟ قالت: زوجُها، إن كان ما عَلِمتُه صَوّامًا قوامًا [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




জামী’ ইবনু উমায়র থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার ফুফুর সাথে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট সকল মানুষের মধ্যে কে সবচেয়ে প্রিয় ছিলেন? তিনি বললেন: ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। জিজ্ঞাসা করা হলো: তবে পুরুষদের মধ্যে? তিনি বললেন: তাঁর স্বামী (আলী)। আমি যতটুকু জানি, তিনি ছিলেন অধিক রোযা পালনকারী এবং অধিক রাত্রি জেগে নামায আদায়কারী।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف جُميع بن عمير، وانظر تمام الكلام عليه برقم (4784) إذ تقدم الحديث هناك من طريق أبي إسحاق الشيباني عن جميع بن عُمير.إبراهيم بن عبد الله العبسي: هو ابن أبي الخيبري القصار، وأبو الجحاف: هو داود بن أبي عوف.وأخرجه الترمذي (3874) عن حسين بن يزيد الكوفي، عن عبد السلام بن حرب، بهذا الإسناد.وقال: حديث حسن غريب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4800)


4800 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الصَّنْعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عباد، أخبرنا عبد الرزاق.وأخبرني أحمد بن جعفر القطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق.وحدثنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا أحمد بن سَلَمة وعبد الله بن محمد، قالا: حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أنا مَعمَر، عن قَتَادة عن أنس، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "حَسْبُكَ من نِساء العالمين أربعٌ: مريمُ بنتُ عمران، وآسيةُ امرأةُ فِرعَونَ، وخَديجة بنتُ خُوَيلد، وفاطمة بنتُ محمّد" [1]. هذا الحديث في "المسند" لأبي عبد الله أحمد بن حنبل هكذا.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিশ্বের মহিলাদের মধ্যে তোমার জন্য চারজনই যথেষ্ট: মারইয়াম বিনতে ইমরান, ফিরাউনের স্ত্রী আসিয়া, খাদীজা বিনতে খুওয়াইলিদ এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن معمرًا - وهو ابن راشد - كان قد حَمَل عن قتادة وهو صغير فلم يضبط عنه الأسانيد، ومع ذلك صحح حديثه هذا الترمذي وكذا الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 10/ 216، لكن قال أبو نُعيم في "الحلية" 2/ 344: حديث غريب من حديث قتادة، تفرد به عنه معمر، حدَّث به الأئمة عن عبد الرزاق: أحمد وإسحاق وأبو مسعود. قلنا: وقد رواه سعيد بن أبي عروبة عند الطبري في "تفسيره" 3/ 263 عن قتادة أنه قال: ذُكر لنا أنَّ نبي الله صلى الله عليه وسلم كان يقول .. فذكره. هكذا رواه سعيد بن أبي عروبة عن قتادة مرسلًا، والظاهر أنَّ هذا أشبه لأنَّ ابن أبي عَروبة أثبت الناس في قتادة، والله تعالى أعلم، لكن للحديث شواهد يصح بها.وهو في "مسند أحمد" 19/ (12391).وأخرجه الترمذي (3878) عن أبي بكر بن زنجويه، وابن حبان (7003) من طريق أحمد بن سفيان أبي سفيان، وعبيد الله بن فضالة أبي قديد، ثلاثتهم عن عبد الرزاق، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث صحيح.وأخرجه ابن حبان (6951) من طريق ابن أبي السَّري، عن عبد الرزاق، به. بلفظ: "خير نساء العالمين".وأخرجه بهذا اللفظ أيضًا ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2961)، والطبري في "التفسير" 3/ 263، والطبراني في "الكبير" 42 / (1004)، وابن عدي في "الكامل" 4/ 216، وابن عساكر 70/ 111، وابن الأثير في "أسد الغابة" 6/ 83 من طريق أبي جعفر الرازي، عن ثابت البناني، عن أنس بن مالك، وهذا إسناد ظاهره أنه حسنٌ في المتابعات والشواهد من أجل أبي جعفر الرازي، لكن أبا جعفر الرازي لم يسمعه من ثابت، إنما سمعه من محمد بن سعيد الأزدي أبي عبد الرحمن، وهو رجل متروك الحديث، أخرجه بذكر محمد بن سعيد هذا: المصنف في "فضائل فاطمة" (31)، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 11/ 53، وابن عساكر 70/ 111.وأخرجه بهذا اللفظ كذلك الخطيب في "تاريخه" 8/ 76، ومن طريقه ابن عساكر 70/ 112 من طريق محمد بن حميد الرازي، عن علي بن مجاهد الرازي، عن حميد الطويل، عن أنس. ومحمد بن حميد وشيخه متروكان.وسيأتي بعده بمثل لفظه هنا من طريق القطيعي أيضًا عن عبد الله بن أحمد بن حنبل، عن أبيه، به. غير أنه ذكر فيه الزُّهري بدل قتادة!وفي الباب بمثل لفظه عن الحسن البصري مرسلًا عند ابن أبي شيبة /12/ 134، وأحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (1575)، ورجاله ثقات.وعن جابر بن عبد الله مرفوعًا عند الآجري في "الشريعة" (1606) و (1685)، وابن مَنده في "مجالس من أماليه" (116)، والمصنف في "فضائل فاطمة" (30)، وأبي نعيم في "تاريخ أصبهان" 2/ 117، وقاضي المارستان في "مشيخته" (411)، وابن عساكر 70/ 112، وإسناده ضعيف.وقد صح بلفظ: "أفضل نساء أهل الجنة" من حديث عكرمة عن ابن عباس، كما تقدم عند المصنف برقم (3878)، وفي رواية له تقدمت برقم (4205) بلفظ: "أفضل نساء العالمين".وصح أيضًا عن كريب عن ابن عبّاس عند الطبراني في "الكبير" (12179)، وفي "الأوسط" (1107)، بلفظ: "سيدات نساء أهل الجنة". وفي رواية له عند ابن عساكر 52/ 6 و 70/ 107، بلفظ: "خير نساء العالمين".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4801)


4801 - وأخبرناه أبو بكر القَطِيعي في "فضائل أهل البيت" تصنيف أبي عبد الله أحمد بن حنبل، حدثنا عبد الله بن أحمد، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن الزُّهْري، عن أنس بن مالك، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم قال: "حَسْبُكَ من نساء العالمين: مريم بنت عمران [1]، وخَديجة بنتُ خُوَيلد، وفاطمة بنت محمد" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ، فإن قوله صلى الله عليه وسلم: "حسبُكَ من نساء العالمين" يُسوِّي بين نساء الدنيا.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "বিশ্বের নারীদের মধ্যে তোমার জন্য যথেষ্ট (সেরা) হলেন: মারইয়াম বিনতে ইমরান, খাদীজা বিনতে খুওয়াইলিদ, এবং ফাতিমা বিনতে মুহাম্মাদ।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] زاد الذهبي بعدها في "تلخيصه": "وآسية امرأة فرعون"، وليست في أصولنا الخطية.



[2] صحيح لغيره كسابقه، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن ذكر الزُّهْري فيه غريب، والغالب أنَّ ذكره وهمٌ، فقد رواه جمع من الأئمة ومنهم أحمد بن حنبل كما في الطريق التي قبل هذه، عن عبد الرزاق عن معمر عن قتادة عن أنس، فالمحفوظ فيه ذكر قتادة وليس الزُّهْري، على أنَّ معمرًا لم يضبط إسناده إذ وصله بذكر أنسٍ، وخالفه من هو أوثق منه في قتادة فأرسله عنه كما تقدم بيانه.وهو عند أحمد في "فضائل الصحابة" (1332) و (1338).وهو عنده أيضًا في "مسنده" كما في "أطرافه" للحافظ ابن حجر (981)، و "إتحاف المهرة" له أيضًا (1800). وذكر الحافظ أنه جاء في النسخة في مسند ابن مسعود، وليس هو محله! وهذا ليس في شيء من نسخنا الخطية من "المسند".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4802)


4802 - أخبرني أحمد بن جعفر القطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا أبو سعيد مولى بني هاشم، حدثنا عبد الله بن جعفر، حدثتنا أم بكر بنت المسور بن مخرمة، عن عُبيد الله بن أبي رافع، عن المسور: أنه بعثَ إِليه حَسَنُ بن حَسنٍ يَخطب ابنته، فقال له: قل له فيلقاني [1] في العتمة، قال: فلقيه فحَمِدَ الله المسورُ وأثنى عليه، ثم قال: أما بعدُ، أم والله ما من نَسَبٍ ولا سَبَبٍ ولا صِهْر أحبُّ إلي من نَسَبكم وصِهْركم، ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "فاطمةُ بَضْعَةٌ مني، يَقبِضُني ما يقبضُها، ويَبسُطني ما يَبسُطُها، وإنَّ الأنساب يوم القيامة تنقطِعُ غيرَ نَسَبي وسَبَبي وصِهْري"، وعندك ابنتها، ولو زوّجتك لقبضَها ذلك؛ فانطلق عاذِرًا له [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




আল-মিসওয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হাসান ইবনু হাসান তাঁর (মিসওয়ারের) কাছে তাঁর কন্যাকে বিবাহের প্রস্তাব দিয়ে পাঠালেন। তিনি (মিসওয়ার) তাকে বললেন: তাকে বলো, সে যেন রাতের প্রথম প্রহরে আমার সাথে সাক্ষাৎ করে। রাবী বলেন: অতঃপর সে তার সাথে সাক্ষাৎ করলো। মিসওয়ার আল্লাহর প্রশংসা করলেন এবং তাঁর স্তুতি গাইলেন। এরপর বললেন: আম্মা বা'দু। আল্লাহর কসম! তোমাদের বংশ, বন্ধন এবং বৈবাহিক সম্পর্ক অপেক্ষা প্রিয় আমার কাছে আর কোনো বংশ, বন্ধন বা বৈবাহিক সম্পর্ক নেই। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ফাতিমা আমার দেহের অংশ। যা কিছু তাকে কষ্ট দেয়, তা আমাকেও কষ্ট দেয় এবং যা কিছু তাকে আনন্দিত করে, তা আমাকেও আনন্দিত করে। আর কিয়ামতের দিন আমার বংশ, আমার বন্ধন এবং আমার বৈবাহিক সম্পর্ক ব্যতীত সকল বংশীয় সম্পর্ক ছিন্ন হয়ে যাবে।" আর তোমার কাছে তার (ফাতিমার) কন্যা আছে। যদি আমি তোমাকে (আমার কন্যা) বিবাহ দিই, তবে তা ফাতিমাকে কষ্ট দেবে। সুতরাং সে (হাসান) তাকে ওজর পেশকারী হিসেবে বিবেচনা করে ফিরে গেলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت من (ز) و (ب)، وفي (ص) و (م): فليلقاني، وفي "التلخيص": يلقاني، وفي "المسند": فليلقني. المديني في "اللطائف من دقائق المعارف" (927)، حيث روى هذا الخبر من طريق أبي سعيد مولى بني هاشم ومن طريق عبد العزيز بن عبد الله الأويسي، فمايز بين رواية أبي سعيد مولى بني هاشم وبين رواية الأُويسي، وأنَّ أبا سعيد مولى بني هاشم قال في روايته: عن عبد الله بن جعفر، عن أم بكر بنت المسور وجعفر بن محمد، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن المسور، وأنَّ عبد العزيز الأويسي قال في روايته: عن عبد الله بن جعفر، عن أم بكر، عن أبيها، وعن جعفر بن محمد، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن المسور.والحديث في "مسند أحمد" 31 / (18907).وأخرجه عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" (18930) عن محمد بن عباد المكي، عن أبي سعيد مولى بني هاشم، عن عبد الله بن جعفر، عن أم بكر وجعفر، عن عُبيد الله بن أبي رافع، عن المسور.وممَّن رواه عن عبد الله بن جعفر فلم يذكر في روايته عن أم بكر أحدًا بينها وبين أبيها المسور غير عبد العزيز الأويسي الذي تقدم ذكره، إسحاق بنُ محمد الفروي عند أبي بكر الخلال في "السنة" (655)، والبيهقي 7/ 64، ومحمد بن عمر بن أبي الوزير عند أبي يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (3951)، ومروان بن محمد الطاطري عند الآجُرّي في "الشريعة" (1711)، وإبراهيم بن زكريا العبدي عند الطبراني في "الكبير" 20/ (33).وقد صح الشطر الأول من المرفوع عن المسور بن مخرمة من غير هذه الطريق كما تقدم بيانه عند الطريق السالفة برقم (4787).وأما الشطر الثاني من المرفوع فقد روي أيضًا عن غير المسور كما تقدم بيانه عند حديث عمر بن الخطاب السالف برقم (4735).



[2] إسناده محتمل للتحسين من أجل أم بكر بنت المسور بن مخرمة، فهي تابعية، روى عنها ابن ابن أخيها عبد الله بن جعفر - وهو ابن عبد الرحمن بن المسور بن مخرمة - ومخرمة بن بكير بن الأشج، وروت عن أبيها كثيرًا، وروى لها البخاري في "الأدب المفرد". لكن ذكر عبيد الله بن أبي رافع في إسناده وهمٌ من أبي سعيد مولى بني هاشم، وقال البيهقي في "سننه الكبرى" 7/ 64: رواه جماعة عن عبد الله بن جعفر دون ابن أبي رافع في إسناده. قلنا: وقد أوضح ذلك أبو موسى المديني في "اللطائف من دقائق المعارف" (927)، حيث روى هذا الخبر من طريق أبي سعيد مولى بني هاشم ومن طريق عبد العزيز بن عبد الله الأويسي، فمايز بين رواية أبي سعيد مولى بني هاشم وبين رواية الأُويسي، وأنَّ أبا سعيد مولى بني هاشم قال في روايته: عن عبد الله بن جعفر، عن أم بكر بنت المسور وجعفر بن محمد، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن المسور، وأنَّ عبد العزيز الأويسي قال في روايته: عن عبد الله بن جعفر، عن أم بكر، عن أبيها، وعن جعفر بن محمد، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن المسور.والحديث في "مسند أحمد" 31 / (18907).وأخرجه عبد الله بن أحمد في زياداته على "المسند" (18930) عن محمد بن عباد المكي، عن أبي سعيد مولى بني هاشم، عن عبد الله بن جعفر، عن أم بكر وجعفر، عن عُبيد الله بن أبي رافع، عن المسور.وممَّن رواه عن عبد الله بن جعفر فلم يذكر في روايته عن أم بكر أحدًا بينها وبين أبيها المسور غير عبد العزيز الأويسي الذي تقدم ذكره، إسحاق بنُ محمد الفروي عند أبي بكر الخلال في "السنة" (655)، والبيهقي 7/ 64، ومحمد بن عمر بن أبي الوزير عند أبي يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (3951)، ومروان بن محمد الطاطري عند الآجُرّي في "الشريعة" (1711)، وإبراهيم بن زكريا العبدي عند الطبراني في "الكبير" 20/ (33).وقد صح الشطر الأول من المرفوع عن المسور بن مخرمة من غير هذه الطريق كما تقدم بيانه عند الطريق السالفة برقم (4787).وأما الشطر الثاني من المرفوع فقد روي أيضًا عن غير المسور كما تقدم بيانه عند حديث عمر بن الخطاب السالف برقم (4735).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4803)


4803 - حدثنا أبو بكر محمد بن عبد الله الحفيد، حدثنا الحسين بن الفضل البَجَلي، حدثنا عفان بن مسلم، حدثنا حماد بن سَلَمة، أخبرني حُميد وعلي بن زيد، عن أنس بن مالك: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يَمُرُّ بباب فاطمة ستة أشهرٍ إذا خرج الصلاة الفجر، يقولُ: "الصلاة يا أهل البيت {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا} [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের নামাযের জন্য বের হওয়ার সময় ছয় মাস পর্যন্ত ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দরজার পাশ দিয়ে যেতেন এবং বলতেন: "নামায (পড়ুন), হে আহলে বাইত! আল্লাহ্ তোমাদের থেকে অপবিত্রতা দূর করতে চান, হে আহলে বাইত! এবং তোমাদেরকে পূর্ণরূপে পবিত্র করতে চান।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف من أجل علي بن زيد - وهو ابن جُدعان - وعليه مدار هذا الحديث، وذكر حميدٍ - وهو ابن أبي حميد الطويل - في إسناده هنا مقرونًا بابن جدعان غير محفوظٍ البتة:فقد أخرج هذا الحديث أحمد بن حنبل 21/ (14040) عن عفان بن مسلم، وكذلك أخرجه الترمذي (3206) عن عبد بن حميد عن عفان بن مسلم، بإسناده، فلم يذكرا فيه حُميدًا. ومع ذلك قال الترمذي: حديث حسن غريب!وأخرجه أيضًا أحمد (13728) عن أسود بن عامر، عن حماد بن سلمة، به. فلم يذكر حميدًا.وكذلك رواه جماعةٌ آخرون عن حماد بن سلمة فلم يذكروا فيه حميدًا الطويل، منهم: أبو داود الطيالسي كما في "مسنده" (2171)، وحجاج بن المنهال عند الطبراني في "الكبير" (2671)، وهُدبة بن خالد عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (2953)، وروح بن عبادة عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (774)، وعبيد الله بن أبي عائشة عند ابن شاهين في "فضائل فاطمة" (15)، وإبراهيم بن الحجاج السامي عند أبي يعلى (3978) فظهر بذلك وهم من زاد حميدًا في إسناد المصنف، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4804)


4804 - أخبرنا أحمد بن جعفر القطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، أخبرني أبي، عن الشعبي، عن سُوَيد بن غَفَلة، قال: خطب عليٌّ ابنة أبي جهل إلى عمها الحارث بن هشام، فاستشار النبي صلى الله عليه وسلم فقال: "أعَن حَسَبِها تسألني؟ " قال عليٌّ: قد أعلمُ ما حَسَبُها، ولكن أتأمرني بها؟ فقال: "لا، فاطمةٌ مُضْغةٌ مني ولا أحسَبُ إلَّا وأنها تحزَنْ، أو تَجزَعُ"، فقال عليٌّ: لا آتي شيئًا تَكرَهُه [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه بهذه السِّياقة.




সুওয়াইদ ইবনু গাফালাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ জাহলের মেয়ের কাছে তার চাচা আল-হারিথ ইবনু হিশামের মাধ্যমে বিয়ের প্রস্তাব দিলেন। অতঃপর তিনি (আলী) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরামর্শ চাইলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি তার বংশমর্যাদা সম্পর্কে আমাকে জিজ্ঞেস করছো?" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তার বংশমর্যাদা সম্পর্কে অবগত আছি। কিন্তু আপনি কি আমাকে তাকে বিবাহ করার আদেশ দিচ্ছেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না। ফাতিমা আমারই একটি অংশ (মুদ্গাহ), আর আমি মনে করি না যে এতে সে দুঃখিত বা অস্থির হবে না।" তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি যা অপছন্দ করেন, আমি এমন কিছুই করব না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات لكن ذكر سويد غَفَلة فيه غير محفوظ، إنما هو من مرسل الشَّعبي - واسمه عامر بن شراحيل - لم يذكر فيه سويد بن غَفَلة، وكذلك هو في "فضائل الصحابة" لأحمد بن حنبل (1323)، فالظاهر أنَّ ذكر سويد بن غَفَلة فيه وهمٌ من جهة المصنف، والله تعالى أعلم.وكذلك أخرجه عبد الرزاق (13268) عن سفيان بن عُيينة، وابن أبي شيبة 12/ 128 عن محمد بن بشر، ويونس بن بكير في زياداته على "السيرة النبوية" لابن إسحاق (358) ومن طريقه الدولابي في "الذرية الطاهرة" (56)، ثلاثتهم عن زكريا بن أبي زائدة، عن الشَّعْبي مرسلًا لم يجاوزوه. وانظر حديث المسور بن مخرمة فيما تقدَّم برقم (4787)، وحديث عبد الله بن الزبير الآتي برقم (40806).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4805)


4805 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون.وأخبرنا أحمد بن جعفر، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا إسماعيل بن أبي خالد، عن أبي حنظلة رجلٍ من أهل مكة: أنَّ عليًّا خَطَبَ ابنة أبي جهل، فقال له أهلُها: لا نُزوِّجُك على ابنة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "إنما فاطمةُ مُضغةٌ منّي، فمن آذاها فقد آذاني" [1].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তিনি আবূ জাহলের কন্যাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তখন তার (আবূ জাহলের কন্যার) পরিবারবর্গ তাঁকে (আলীকে) বলল: আমরা আপনাকে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যার উপর (তাঁকে রেখে) বিবাহ দেব না। এ কথা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছাল। অতঃপর তিনি বললেন: "ফাতেমা আমারই একটি টুকরা (মাংসপিণ্ড)। সুতরাং যে তাকে কষ্ট দিল, সে আমাকেই কষ্ট দিল।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لجهالة أبي حنظلة، فإنه لا يكاد يعرف، وانظر ترجمته في "تعجيل المنفعة" لابن حجر (1260).وهو في "فضائل الصحابة" لأحمد بن حنبل (1324).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4806)


4806 - حدثنا بكر بن محمد الصيرفي، حدثنا موسى بن سَهْل بن كثير، حدثنا إسماعيل ابن عُليّة، حدثنا أيوب السختياني، عن ابن أبي مُليكة، عن عبد الله بن الزُّبير: أنَّ عليًّا ذَكَر ابنة أبي جهل، فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "إنما فاطمة بضعةٌ مني، يُؤذيني ما آذاها، ويُنصِبُني ما أَنصَبَها" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ জাহেলের মেয়ের কথা উল্লেখ (বিয়ের প্রস্তাব) করলেন। এই সংবাদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছালে তিনি বললেন: "নিশ্চয় ফাতিমা আমার দেহের একটি অংশ। যা তাকে কষ্ট দেয়, তা আমাকে কষ্ট দেয় এবং যা তাকে ব্যথিত করে, তা আমাকেও ব্যথিত করে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل موسى بن سهل بن كثير، فقد قال عنه الذهبي في "السير" 13/ 149: أحد الضعفاء الذين يُحتمل حالهم. قلنا: يعني في المتابعات والشواهد، وقد توبع.وأخرجه أحمد بن حنبل 26 / (16123)، وأخرجه الترمذي (3869) عن أحمد بن منيع، كلاهما (ابن حنبل وابن منيع) عن إسماعيل ابن عُليّة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح. هكذا قال أيوب: عن ابن أبي مليكة عن ابن الزبير، وقال غير واحد: عن ابن أبي مليكة عن المسور بن مخرمة (يشير الترمذي إلى حديث المسور الذي تقدم تخريجه برقم (4787) ويحتمل أن يكون ابن أبي مليكة روى عنهما جميعًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4807)


4807 - أخبرني أحمد بن جعفر بن حمدان البزار، حدثنا إبراهيم بن عبد الله بن مسلم، حدثنا صالح بن حاتم بن وَرْدان، حدثني أبي حدثني أيوب، عن أبي يزيد المديني، عن أسماء بنت عُميس، قالت: كنتُ في زفاف فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما أصبحنا جاء النبي صلى الله عليه وسلم إلى الباب، فقال: "يا أم أيمن، ادعي لي أخي"، فقالت: هو أخوك وتُنكِحُه؟! قال: "نعم يا أم أيمن "فجاء عليٌّ، فنَضَحَ النبي صلى الله عليه وسلم عليه من الماء ودعا له، ثم قال: "ادعي لي فاطمة" قالت: فجاءت تَعَثَّرُ من الحياء، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اسكُني، فقد أنكحتكِ أحب أهل بيتي إلي" قالت: ونضح النبي صلى الله عليه وسلم عليها من الماء، ثم رجع رسول الله صلى الله عليه وسلم فرأى سوادًا بين يديه، فقال: "من هذا؟ " فقلت: أنا أسماء، قال: "أسماء بنتُ عُميس؟ " قلت: نعم، قال: "جئتِ في زفاف ابنة رسول الله" قلت: نعم، فدعا لي [1].




আসমা বিনত উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহ অনুষ্ঠানে ছিলাম। যখন সকাল হলো, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দরজার কাছে আসলেন এবং বললেন: "হে উম্মে আইমান, আমার ভাইকে ডেকে আনো।" তখন (উম্মে আইমান) বললেন: তিনি আপনার ভাই আর আপনি তাঁকে বিবাহ দিচ্ছেন?! তিনি বললেন: "হ্যাঁ, হে উম্মে আইমান।" অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ওপর পানি ছিটিয়ে দিলেন এবং তাঁর জন্য দু'আ করলেন। এরপর তিনি বললেন: "আমার জন্য ফাতিমাকে ডেকে আনো।" তিনি (আসমা) বলেন: তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লজ্জায় পা টলতে টলতে আসলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "শান্ত হও। আমি তোমাকে আমার আহলে বাইতের মধ্যে আমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় ব্যক্তির সাথে বিবাহ দিয়েছি।" আসমা বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (ফাতিমার) ওপরও পানি ছিটিয়ে দিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে গেলেন এবং তাঁর সামনে একটি আবছায়া (মানুষের অবয়ব) দেখতে পেলেন। তিনি বললেন: "এ কে?" আমি বললাম: আমি আসমা। তিনি বললেন: "আসমা বিনত উমাইস?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যার বিবাহ অনুষ্ঠানে এসেছো?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তখন তিনি আমার জন্য দু'আ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ضعيف لاضطرابه كما سبق بيانه عند الحديث (4798)، ولنكارة متنه، فإنَّ أسماء بنت عميس كانت وقت زفاف فاطمة مع زوجها جعفر بن أبي طالب بالحبشة، وقد أشار إلى هذا الغلط الذهبي في "تلخيصه"، وكذا ابن حجر في "المطالب العالية" (1629) فقال: أسماء بنت عميس كانت في هذا الوقت بأرض الحبشة مع زوجها جعفر لا خلاف في ذلك، فلعل ذلك كان لأختها سلمى بنت عُميس وهي امرأة حمزة بن عبد المطلب.قلنا: هذا الخبر مداره على أبي يزيد المديني، وأبو يزيد هذا لا يعرف له اسمٌ ولا نسب، وقد روى عنه غير واحد من أهل البصرة، ووثقه ابن معين ومشاه أحمد بن حنبل، وروى له البخاري حديثًا واحدًا موقوفًا، لكن لما سئل عنه مالك. وهو إمام أهل المدينة. قال: لا أعرفه!وأخرجه النسائي (8455) عن إسماعيل بن مسعود، عن حاتم بن وردان، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أخي ميمي في "فوائده" (429) من طريق أبي الربيع الزهراني، عن حماد بن زيد، عن أيوب، عن أبي يزيد المدني، قال: قالت أسماء بنت عُميس.وأخرجه ابن أخي ميمي أيضًا (429) من طريق إسحاق بن إبراهيم بن كامجرا، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 42/ 133 من طريق يحيى بن بحر الكرماني، كلاهما عن حماد بن زيد، عن أيوب، عن أبي يزيد: أن أسماء حدثت قالت … وخالف أحمد بن إبراهيم الموصلي فرواه عند ابن أخي ميمي أيضًا (429) عن حماد بن زيد، عن أيوب، عن أبي يزيد: أنَّ عائشة قالت … فجعله من حديث عائشة بدل أسماء بنت عُميس!وأخرجه عبد الرزاق في "مصنفه" (9781) برواية إسحاق الدَّبَري، وعنه الطبراني في "الكبير" 24/ (365) عن معمر بن راشد، عن أيوب، عن عكرمة وأبي يزيد المديني أو أحدهما - شكّ عبد الرزاق - أنَّ أسماء بنت عميس قالت …وتابع الدَّبَريَّ على ذلك ابنُ أبي عمر العدني في روايته عن عبد الرزاق عند الآجري في "الشريعة" (1618).ورواه إسحاق بن راهويه في "مسنده" (2142)، وأحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (958) كلاهما عن عبد الرزاق، عن معمر، عن أيوب، عن عكرمة وعن أبي يزيد المدني، قالا … كذا رواه ابن راهويه وأحمد عن عبد الرزاق باقتران عكرمة بأبي يزيد دون شك.وأخرج معمر في "جامعه" (20369) عن أيوب السختياني، عن عكرمة، قال: لما زوّج النبي صلى الله عليه وسلم فاطمة قال: "ما ألوتُ أن أُنكحكِ أحبّ أهلي إليَّ".ويشهد لقصة نَضْحِ النبي صلى الله عليه وسلم الماء على فاطمة وعليٍّ في ليلة الزفاف حديثُ بريدة الأسلمي عند النسائي (10016) والبزار (4471) وغيرهما، لكن فيه: أنه نضح الماء على عليّ وحده، وزاد فيه دعاءه صلى الله عليه وسلم لهما بقوله: "اللهم بارك فيهما وبارك عليهما وبارك لهما في شبلهما". وحسَّن إسناده الحافظ ابن حجر في "مختصر زوائد البزار" (1993).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4808)


4808 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوْرِي، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا إسرائيل، عن ميسرة بن حبيب، عن المنهال بن عمرو، عن عائشة بنت طلحة، عن أم المؤمنين عائشة أم المؤمنين أنها قالت: ما رأيتُ أحدًا كان أشبة كلامًا وحديثًا برسول الله صلى الله عليه وسلم من فاطمة، وكانت إذا دخلت عليه قام إليها فقبَّلها ورحّب بها، وأخذ بيدها فأجلسها في مَجلسِه، وكانت هي إذا دخل عليها رسول الله صلى الله عليه وسلم قامتْ إليه مستقبلةً وقبلت يده [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.




উম্মুল মু'মিনীন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ফাতিমার চেয়ে কাউকে কথা ও আলোচনায় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ দেখিনি। তিনি (ফাতিমা) যখন তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) কাছে আসতেন, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জন্য দাঁড়াতেন, তাঁকে চুম্বন করতেন, তাঁকে স্বাগত জানাতেন এবং তাঁর হাত ধরে নিজের আসনে বসাতেন। আর যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (ফাতিমার) কাছে আসতেন, তখন তিনিও তাঁর দিকে এগিয়ে গিয়ে অভ্যর্থনা জানাতেন এবং তাঁর হাতে চুম্বন করতেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق السبيعي.وقد تقدَّم برقم (4785) من طريق محمد بن إسحاق الصغاني عن عثمان بن عمر.وفي هذه الرواية ورواية الطبراني في "الأوسط" (4089) بيان لمحل تقبيل فاطمة لأبيها صلى الله عليه وسلم حيث جاء ذلك مطلقًا في الروايات الأخرى، فتبين هنا وعند الطبراني أن المراد تقبيل يده صلى الله عليه وسلم، والله تعالى أعلم. وفي رواية أبي داود (5217) ما يشير إليه، حيث جاء في روايته: فأخذت بيده فقبلته.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4809)


4809 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن جعفر القطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا يونس بن محمد، حدثنا داود بن أبي الفُرات، عن عِلْباء بن أَحمر، عن عِكرمة، عن ابن عبّاس، قال: خَطَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم في الأرض أربعة خُطوطٍ، ثم قال: "أتدرُونَ ما هذا؟ " فقالوا: الله ورسوله أعلمُ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أفضلُ نِساءِ أهل الجنة: خَديجة بنتُ خُوَيلد، وفاطمة بنتُ محمّدٍ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাটিতে চারটি রেখা টানলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "তোমরা কি জানো, এটা কী?" তারা বললেন, আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "জান্নাতের নারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হলেন: খাদীজা বিনত খুওয়ায়লিদ এবং ফাতিমা বিনত মুহাম্মাদ।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح يونس بن محمد هو ابن مسلم البغدادي المؤدِّب.وهو في "مسند أحمد" 4/ (2668). وزاد فيه ذكر آسية بنت مزاحم ومريم ابنة عمران.وسيأتي برقم (4912) من طريق العباس بن محمد الدُّوري عن يونس بن محمد.وقد تقدم برقم (3878) من طريق أبي الوليد الطيالسي، وبرقم (4205) من طريق موسى بن إسماعيل، كلاهما عن داود بن أبي الفرات. وفي حكمه على الحديث بإثره، ومن ذلك أنَّ ذكر جد عبد الرزاق مما يُستغرب إذ لا ذكر له ولا رواية، وأنَّ ابن عدي لم يذكره في إسناده، وردّ على المصنِّف في دعواه بإدراك ميناء للنبي صلى الله عليه وسلم بما قاله ميناء نفسُه أنه احتلم حين بُويع لعثمان، فيكون مولده في آخر العصر النبوي. وقد جزم ابن الجوزي في "الموضوعات" بوضعه.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 336 و 6/ 459، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 14/ 168، وابن الجوزي في "الموضوعات" (790) عن أبي عبد الغني الحسن بن علي بن عيسى الأزدي، عن عبد الرزاق، عن أبيه، عن ميناء بن أبي ميناء، عن عبد الرحمن بن عوف.وأخرج مثله ابن عساكر 14/ 168، وابن الجوزي (789) من طريق تالفةٍ بمرةٍ عن ليث بن سعد، عن ابن جريج، عن مجاهد، عن ابن عباس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4810)


4810 - حدثنا أبو بكر محمد بن حَيَّوِيهِ بن المؤمل الهمذاني، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عباد، أخبرنا عبد الرزاق بن همام، حدثني أبي، حدثني أبي، عن ميناء بن أبي ميناء مولى عبد الرحمن بن عوف، قال: خُذُوا عني قبل أن تُشَابَ الأحاديثُ بالأباطيل، سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "أنا الشجرة وفاطمةُ فَرعُها، وعليٌّ لقاحها، والحسنُ والحسينُ ثَمَرتُها، وشيعَتُنا ورقُها، وأصلُ الشجرة في جنة عَدْنٍ، وسائرُ ذلك في سائر الجنة" [1]. هذا مَتْنٌ شاذٌ، وإن كان كذلك فإنَّ إسحاق الدَّبَري صدوقٌ، وعبد الرزاق أبوه وجدُّه ثِقات، وميناء مولى عبد الرحمن بن عوف قد أدرك النبي صلى الله عليه وسلم وسمع منه، والله أعلم.




মিনা ইবনে আবী মিনা (আব্দুর রহমান ইবনে আউফের আযাদকৃত গোলাম) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: তোমরা আমার কাছ থেকে (এগুলো) গ্রহণ করে নাও, এর পূর্বে যে হাদীসসমূহ বাতিল বিষয় দ্বারা মিশ্রিত হয়ে যাবে। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমি হলাম বৃক্ষ, আর ফাতিমা হলো তার শাখা, এবং আলী হলো তার পরাগ, আর হাসান ও হুসাইন হলো তার ফল, এবং আমাদের অনুসারীরা হলো তার পাতা। আর বৃক্ষটির মূল হলো জান্নাতুল আদনে, এবং তার অবশিষ্ট অংশসমূহ অন্যান্য জান্নাতে (রয়েছে)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالف من أجل ميناء بن أبي ميناء، فهو متروك الحديث، وكذبه أبو حاتم، وليس هو بصحابيٍّ كما وقع للمصنِّف هنا، فإنه سقط من رواية المصنِّف ذِكرُ عبد الرحمن بن عوف، إذ إنَّ ميناء يرويه عنه كما وقع عند ابن عدي في "الكامل" 2/ 336 و 6/ 459، وقد بين ذلك الحافظُ ابن حجر في "الإصابة" 6/ 390، ونَبَّه الحافظ كذلك إلى عدة أوهام وقعت للحاكم هنا في روايته وفي حكمه على الحديث بإثره، ومن ذلك أنَّ ذكر جد عبد الرزاق مما يُستغرب إذ لا ذكر له ولا رواية، وأنَّ ابن عدي لم يذكره في إسناده، وردّ على المصنِّف في دعواه بإدراك ميناء للنبي صلى الله عليه وسلم بما قاله ميناء نفسُه أنه احتلم حين بُويع لعثمان، فيكون مولده في آخر العصر النبوي. وقد جزم ابن الجوزي في "الموضوعات" بوضعه.وأخرجه ابن عدي في "الكامل" 2/ 336 و 6/ 459، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 14/ 168، وابن الجوزي في "الموضوعات" (790) عن أبي عبد الغني الحسن بن علي بن عيسى الأزدي، عن عبد الرزاق، عن أبيه، عن ميناء بن أبي ميناء، عن عبد الرحمن بن عوف.وأخرج مثله ابن عساكر 14/ 168، وابن الجوزي (789) من طريق تالفةٍ بمرةٍ عن ليث بن سعد، عن ابن جريج، عن مجاهد، عن ابن عباس.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4811)


4811 - حدثني أبو الحسن محمد بن أحمد بن شَبَّوَيه الرئيسُ الفقيه بمرو، حدثنا جعفر بن محمد بن الحارث النيسابوري بمَرُو، حدثنا علي بن مهران الرازي، حدثنا سلمة بن الفضل الأبْرَش، حدثنا محمد بن إسحاق، عن يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه، عن عائشة: أنها كانت إذا ذكرت فاطمة بنت النبي صلى الله عليه وسلم قالت: ما رأيتُ أحدًا كان أصدق لهجةً منها، إلا أن يكون الذي وَلَدَها [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ফাতিমা বিনত নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা উল্লেখ করলে বলতেন: আমি তাঁর চেয়ে বেশি সত্যবাদী কাউকে দেখিনি, তবে যিনি তাঁকে জন্ম দিয়েছেন তিনি ছাড়া।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن إسحاقَ - وهو ابن يسار صاحب السير والمغازي - فهو صدوق حسن الحديث، ومن دونه من الرواة متابعون، وقد عنعنه ابن إسحاق في سائر الروايات التي وقفنا عليها، ولكن عنعنته تُغتفر هنا لتعدد روايات ابن إسحاق، فقد رواه أيضًا عن محمد بن جعفر بن الزبير، وعن محمد بن عباد بن عبد الله بن الزبير أخي يحيى بن عباد، كلاهما يرويه عن عبد الله بن الزبير عن عائشة، وله طريق أخرى عن عائشة غير ابن إسحاق رجالها ثقات، ويؤيده حديث عائشة الآخر الذي تقدم برقم (4785) و (4808) أنَّ فاطمة كانت أشبة الناس كلامًا وحديثًا برسول الله صلى الله عليه وسلم.وأخرجه المصنف في "فضائل فاطمة الزهراء" (48) من طريق محمد بن حميد الرازي، عن سلمة بن الفضل بهذا الإسناد. وأخرجه أيضًا (46) من طريق عباد بن عباد المهلبي، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن جعفر بن الزبير ويحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، كلاهما عن أبيهما عبد الله بن الزبير قال: كانت عائشة تقول … وفي هذه الطريق تقييد الأب بأنه عبد الله بن الزبير، وإنما هو الجد، وهي نسبة صحيحة عند العرب، يُسمَّى الجدُّ أبًا. وفيها أيضًا تسمية العم أبًا، وهي تسمية صحيحة كذلك عند العرب، كما في قوله تعالى على لسان بني يعقوب: {نَعْبُدُ إِلَهَكَ وَإِلَهَ آبَائِكَ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ}، وإسماعيل عمّ يعقوب وإبراهيم جدّه. فالظاهر أنَّ قوله في رواية سلمة بن الفضل الأبرش: عن أبيه، يعني عن جده عبد الله بن الزبير، على أنَّ يحيى بن عباد يروي عن أبيه وعن جده، وجده وأبوه كلاهما عائشة.وأخرجه المصنف في "فضائل فاطمة" كذلك (47) من طريق يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، عن محمد بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه، عن عائشة. فذكر محمد بن عباد، بدل أخيه يحيى، وكلٌّ ثقةٌ.وأخرجه أيضًا (151) من طريق عباد بن العوام، عن ابن إسحاق، عن محمد بن جعفر بن الزبير، عن أبيه، عن عائشة. فذكر محمد بن جعفر بن الزبير.والظاهر من هذه الطرق أنَّ محمد بن إسحاق سمع هذا الخبر من ثلاثة: وهم محمد بن جعفر بن الزبير ومحمد ويحيى ابنا عباد بن عبد الله بن الزبير، والثلاثة سمعوه من عبد الله بن الزبير، والله تعالى أعلم.وأخرجه أبو يعلى (4700)، وأخرجه المصنف (49) من طريق محمد بن إبراهيم العبدي، والطبراني في "الأوسط" (2721)، وأبو نُعيم في "الحلية" 3/ 137 من طريق إبراهيم بن هاشم البغوي، ثلاثتهم (أبو يعلى ومحمد بن إبراهيم العبدي وإبراهيم بن هاشم) عن أمية بن بسطام، عن يزيد بن زُريع، عن روح بن القاسم، عن عمرو بن دينار، قال: قالت عائشة، فذكره. ورجاله ثقات، لكن عمرو بن دينار لا يدرك السماع من عائشة.وقد أخرجه المصنِّف مرة أخرى (152) من طريق محمد بن إبراهيم العبدي، عن أمية بن بسطام، عن يزيد بن زُريع، عن روح بن القاسم، عن عمرو بن دينار، عن عُبيد بن عمير، أنَّ عائشة قالت … فذكر بين عمرو بن دينار وبين عائشة واسطةً هو عُبيد بن عُمير، وهو تابعي كبير سمع عائشة، فإن صح هذا اتصل هذا الإسناد وكان صحيحًا، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4812)


4812 - حدثنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب العَدْل، وأبو بكر محمد بن عبد الله ابن عَتّاب وأبو بكر بن أبي دارِم، الحافظ، قالوا: حدثنا إبراهيم بن عبد الله العبسي، حدثنا العباس بن الوليد بن بكار الضَّبِّي، حدثنا خالد الواسطي.وأخبرني أبو بكر أحمد بن جعفر بن حمدان، حدثنا إبراهيم بن عبد الله بن مسلم البصري، حدثنا عبد الحميد بن بحر، حدثنا خالد بن عبد الله، عن بَيَان، عن الشَّعْبي، عن أبي جُحَيفة، عن علي، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال: "إذا كان يوم القيامةِ قيل: يا أهل الجَمْع، غُضُّوا أبصارَكم حتى تمرَّ فاطمةُ بنتُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فتَمُرُّ وعليها رَيْطَتانِ خضراوان". قال أبو مُسلمٍ: قال لي أبو قِلابة - وكان معنا عند عبد الحميد -: إنه قال: "حَمْراوان" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه. ‌‌ذكر ما ثَبَتَ عندنا من أعقاب فاطمة ووفاتها رضي الله عنها




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কিয়ামতের দিন হবে, তখন বলা হবে: হে সমাবেশের লোকেরা! তোমরা তোমাদের দৃষ্টি অবনত করো, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা অতিক্রম করেন।" অতঃপর তিনি অতিক্রম করবেন এমতাবস্থায় যে, তার পরিধানে থাকবে সবুজ রঙের দুটি চাদর (বস্ত্র)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده واهٍ بمرّة من أجل عبد الحميد بن بحر، فقد قال ابن حبان وابن عدي: يسرق الحديث، وضعفه الدارقطني كما في "لسان الميزان".وأخرجه ابن الجوزي في "العلل المتناهية" (422) من طريق أبي بكر أحمد بن سلمان، عن إبراهيم بن عبد الله البصري، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا (423) من طريق أبي قلابة عبد الملك بن محمد الرقاشي، عن عبد الحميد بن بحر، به. لكنه قال في روايته: "ريطتان بيضاوان". والرَّيطة: كل مُلاءة من نسجٍ واحدٍ وقطعة واحدةٍ.وانظر ما سلف برقم (4781). طريق محمد بن يونس الكُديمي، عن أبي زيد سعيد بن أوس، عن شعبة، عن الحكم. لكن الكُديمي ضعيف جدًّا أيضًا، فلا يعتد بهذه المتابعة، وقد رُوي عن ابن عباس من وجه آخر لكنه ضعيف جدًّا، فلا يُفرح به.غير أنَّ هذا الخبر - وإن كان هذا حالَ أسانيده عن ابن عبّاس - مشهورٌ معروف، طلب الإسناد لمثله تكلُّف، فأما ذكر بناته صلى الله عليه وسلم فمتفق عليه لا يختلف فيه اثنان، وأما الذكور من أولاده صلى الله عليه وسلم من خديجة فقد روي مثلُه عن مصعب بن عبد الله الزبيري وابن أخيه الزبير بن بكار، وروي أيضًا عن الزُّهري، قال ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 889: هو قول أكثر أهل النسب، ونقل ابن عبد البر عن علي بن عبد العزيز الجُرجاني النسّابة قوله: هذا هو الصحيح، وغيره تخليط.ونقله ابن ناصر الدين الدمشقي في "جامع الآثار" 3/ 468 و 469 عن أبي الحسن علي بن الجنيد الرازي وأبي بكر البرقي وأبي الفرج بن الجوزي.وهو في "فضائل فاطمة الزهراء" للمصنف (76).وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 70، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 3/ 140 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وهو في زيادات يونس بن بكير على "السيرة النبوية" لابن إسحاق (337)، ومن طريقه أخرجه الدُّولابي في "الذرية الطاهرة" (47)، وابن عساكر 3/ 124 و 12/ 124.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (12115)، وفي "الأوسط" (1463) من طريق عبد السلام بن راشد أبي الحسن الرفاء، عن إبراهيم بن عثمان، به.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 1/ 110 و 3/ 6، ومن طريقه ابن عساكر 3/ 125، وابن الجوزي في "المنتظم" 2/ 316 عن هشام بن محمد بن السائب الكلبي، عن أبيه، عن أبي صالح، عن ابن عباس، وقال فيه: ولد له في الإسلام عبد الله، فسُمِّي الطيب والطاهر. ولكن هشامًا وأباه متروكان وأبا صالح وهو باذام مولى أم هانئ ضعيف.وروي عن ابن عبّاس من وجه ضعيف جدًّا غير ذلك كما أخرجه ابن عساكر 3/ 128 و 12/ 128 من طريق محمد بن زكريا الغلابي، عن العباس بن بكار الضَّبِّي، عن محمد بن زياد والفرات بن السائب، عن ميمون بن مهران، عن ابن عباس: أن خديجة ولدت عبد الله وزينب ورقية والقاسم والطاهر والمطهر والطيب والمطيب وأم كلثوم وفاطمة. ومحمد بن زكريا متروك والعباس ضعيف جدًّا.وأما رواية مصعب بن عبد الله الزبيري فأخرجها البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 70، وابن عساكر 3/ 130.وأما رواية الزبير بن بكار فأخرجها ابن عساكر 3/ 131.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4813)


4813 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكير، عن إبراهيم بن عثمان، عن الحَكَم، عن مِقسَم، عن ابن عباس، قال: وَلَدت خديجة لرسول الله صلى الله عليه وسلم غُلامين وأربعَ نِسوةٍ: القاسم وعبد الله، وفاطمة وأم كُلثوم ورُقيّة وزينب [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, খাদীজা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য দুজন ছেলে ও চারজন কন্যার জন্ম দিয়েছিলেন: কাসিম ও আব্দুল্লাহ এবং ফাতিমা, উম্মু কুলসুম, রুকাইয়া ও যাইনাব।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل إبراهيم بن عثمان - وهو العبسي مولاهم أبو شيبة الكوفي - فهو متروك الحديث، ولكنه لم ينفرد به، فسيأتي هذا الخبر عند المصنف برقم (4899) من طريق محمد بن يونس الكُديمي، عن أبي زيد سعيد بن أوس، عن شعبة، عن الحكم. لكن الكُديمي ضعيف جدًّا أيضًا، فلا يعتد بهذه المتابعة، وقد رُوي عن ابن عباس من وجه آخر لكنه ضعيف جدًّا، فلا يُفرح به.غير أنَّ هذا الخبر - وإن كان هذا حالَ أسانيده عن ابن عبّاس - مشهورٌ معروف، طلب الإسناد لمثله تكلُّف، فأما ذكر بناته صلى الله عليه وسلم فمتفق عليه لا يختلف فيه اثنان، وأما الذكور من أولاده صلى الله عليه وسلم من خديجة فقد روي مثلُه عن مصعب بن عبد الله الزبيري وابن أخيه الزبير بن بكار، وروي أيضًا عن الزُّهري، قال ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 889: هو قول أكثر أهل النسب، ونقل ابن عبد البر عن علي بن عبد العزيز الجُرجاني النسّابة قوله: هذا هو الصحيح، وغيره تخليط.ونقله ابن ناصر الدين الدمشقي في "جامع الآثار" 3/ 468 و 469 عن أبي الحسن علي بن الجنيد الرازي وأبي بكر البرقي وأبي الفرج بن الجوزي.وهو في "فضائل فاطمة الزهراء" للمصنف (76).وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 70، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 3/ 140 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وهو في زيادات يونس بن بكير على "السيرة النبوية" لابن إسحاق (337)، ومن طريقه أخرجه الدُّولابي في "الذرية الطاهرة" (47)، وابن عساكر 3/ 124 و 12/ 124.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (12115)، وفي "الأوسط" (1463) من طريق عبد السلام بن راشد أبي الحسن الرفاء، عن إبراهيم بن عثمان، به.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 1/ 110 و 3/ 6، ومن طريقه ابن عساكر 3/ 125، وابن الجوزي في "المنتظم" 2/ 316 عن هشام بن محمد بن السائب الكلبي، عن أبيه، عن أبي صالح، عن ابن عباس، وقال فيه: ولد له في الإسلام عبد الله، فسُمِّي الطيب والطاهر. ولكن هشامًا وأباه متروكان وأبا صالح وهو باذام مولى أم هانئ ضعيف.وروي عن ابن عبّاس من وجه ضعيف جدًّا غير ذلك كما أخرجه ابن عساكر 3/ 128 و 12/ 128 من طريق محمد بن زكريا الغلابي، عن العباس بن بكار الضَّبِّي، عن محمد بن زياد والفرات بن السائب، عن ميمون بن مهران، عن ابن عباس: أن خديجة ولدت عبد الله وزينب ورقية والقاسم والطاهر والمطهر والطيب والمطيب وأم كلثوم وفاطمة. ومحمد بن زكريا متروك والعباس ضعيف جدًّا.وأما رواية مصعب بن عبد الله الزبيري فأخرجها البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 70، وابن عساكر 3/ 130.وأما رواية الزبير بن بكار فأخرجها ابن عساكر 3/ 131.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4814)


4814 - أخبرنا الحسن بن محمد بن إسحاق المهرجاني، حدثنا محمد بن زكريا بن دينار البصري [حدثنا العباس بن بَكّار] [1] حدثنا عبد الله بن المثنى، عن ثُمَامة بن عبد الله بن أنس، عن أنس بن مالك، قال: سألتُ أمي عن فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: كانت كالقمرِ ليلةَ البدرِ، أو كشمسٍ كَفَرَ غَمامًا إذا خرج من السَّحاب، بيضاءَ مُشرَبةً حُمرةً، لها شعرٌ أسود، من أشد الناس برسول الله صلى الله عليه وسلم شَبَهًا والله، كما قال الشاعر:بيضاءَ تَسحَبُ من قيامٍ شعرَها … وتغيبُ فيه وهو جَثْلٌ [2] أسحَمُفكأنها فيهِ نَهارٌ مُشرِقٌ … وكأنه ليلٌ عليها مُظلم [3]




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার মাকে আল্লাহর রাসূলের কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: তিনি পূর্ণিমার রাতের চাঁদের মতো ছিলেন, অথবা মেঘমুক্ত সূর্যের মতো ছিলেন, যখন তা মেঘের আড়াল থেকে বেরিয়ে আসে। তিনি ছিলেন ফর্সা, যাতে লালিমার ছোঁয়া ছিল, তাঁর চুল ছিল কালো। আল্লাহর কসম, তিনি ছিলেন লোকেদের মধ্যে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সবচেয়ে বেশি সাদৃশ্যপূর্ণ। যেমন কবি বলেছেন: তিনি এমন ফর্সা ছিলেন যে দাঁড়িয়ে থাকা অবস্থায়ও তাঁর চুল টেনে নিয়ে যেত... আর তিনি ঘন কালো চুলে ঢেকে যেতেন। যেন তিনি ছিলেন তাতে এক উজ্জ্বল দিন... আর তা (চুল) ছিল তাঁর উপর এক অন্ধকার রাত।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط اسم العباس بن بكار من أصولنا الخطية، ومن "تلخيص الذهبي"، وأثبتناه من "فضائل فاطمة الزهراء" للمصنف (77) حيث رواه بإسناده الذي هنا نفسه، ويؤيده أنَّ حمزة بن يوسف السَّهمي قد أخرجه في "تاريخ جرجان" ص 170 - 171 من طريق محمد بن زكريا الغلابي عن العباس بن بكار عن عبد الله بن المثنى، هذا وقد روى محمد بن زكريا عدة روايات لعبد الله بن المثنى كلها بواسطة العباس بن بكار، فتأكد ثبوته في هذا الإسناد.



[2] تصحف في (ز) و (ب) إلى: حبل، بالحاء المهملة والباء الموحدة، وأُهملت الكلمة في (ص) و (م)، وجاءت على الصواب معجمة في (ع) و "تلخيص الذهبي".والأسحم: الأسود.والجَثْل من الشَّعر: أشدُّه سوادًا وغلظًا.



4814 [3] - إسناده تالف بالمرة من أجل محمد بن زكريا بن دينار البصري - وهو الغلابي - والعباس بن بكار - وهو العباس بن الوليد بن بكار الضبي - فهما متروكان، واتهمهما الدارقطني.وهو في "فضائل فاطمة الزهراء" للمصنف (77).وأخرجه حمزة بن يوسف السَّهْمي في "تاريخ جرجان" 1/ 170 - 171 من طريق بندار بن إبراهيم بن عيسى الإستراباذي، عن محمد بن زكريا بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4815)


4815 - أخبرنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى المُزكّي وأبو الحسين بن يعقوب الحافظ، قال: احدثنا محمد بن إسحاق بن إبراهيم، قال: سمعت عبد الله بن محمد بن سليمان بن جعفر الهاشمي يذكُر، عن أبيه، عن جده، قال: وُلِدَت فاطمة سنةَ إحدى وأربعين من مولد رسول الله صلى الله عليه وسلم [1]. ‌‌ذكر وفاة فاطمة رضي الله عنها والاختلاف في وقته




তাঁর দাদা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্মের একচল্লিশতম বছরে জন্মগ্রহণ করেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ওফাত এবং এর সময়কাল নিয়ে মতপার্থক্য আলোচনা।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو عند المصنف في "فضائل فاطمة" (78)، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 3/ 157، وسيأتي مثله عن جعفر بن محمد الصادق برقم (4821). وانظر ما بعده. وقريبٌ منه قول محمد بن إسحاق عند الطبراني في "الكبير" 22 / (998)، وعنه أخرجه أبو نُعيم في "المعرفة" (7339) حيث قال: توفيت وهي بنت ثمان وعشرين.وقاله كذلك ابن شهاب الزُّهري كما رواه عنه المصنف في "فضائل فاطمة" (79)، ومن طريقه ابن عساكر 3/ 161.وخالفهم عبد الله بن حسن بن حسن بن علي بن أبي طالب عند الطحاوي في "شرح المشكل" بإثر الحديث (142)، فقال: كان سنُّها الذي ماتت عليه خمسًا وعشرين سنة. وهذا أقوى مما نقله عنه الزبير بن بكار بسند آخر فيما رواه عنه ابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (1608) أنها بلغت ثلاثين.وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 2/ 32: الصحيح أن عمرها أربع وعشرون سنة. وهذا قريب من قول عبد الله بن حسن المتقدم.وسيأتي عن جعفر بن محمد الصادق برقم (4821) أنَّ فاطمة ماتت وهي ابنة إحدى وعشرين.وأخرج قول عائشة في وقت وفاة فاطمة ضمن قصة مجيئها إلى أبي بكر تسأله ميراثها: أحمد 1 / (25)، والبخاري (3039)، ومسلم (1759) من طريق صالح بن كيسان، والبخاري (4240) ومسلم (1759)، وابن حبان (6607) من طريق عُقيل بن خالد الأيلي، وابن حبان (4823) من طريق شعيب بن أبي حمزة، ثلاثتهم عن الزهري به. وفصل صالح بن كيسان في رواية أحمد ومسلم هذا القول من حديث عائشة بلفظة: "قال" كأنه يشير إلى أنه ليس من قول عائشة. وقد جاء في رواية للبيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 300 من رواية أحمد بن منصور، عن عبد الرزاق، عن معمر، عن الزهري، به. فذكر حديث عائشة وقال في أثنائه: قال معمر: قلت للزهري: كم مكثت فاطمة بعد النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: ستة أشهر. وجاء مفردًا من قول الزهري في روايتين عند ابن عساكر 3/ 161، إحداهما من رواية أبي زرعة الرازي عن أبي اليمان الحكم بن نافع عن شعيب بن أبي حمزة، وهي في "تاريخ أبي زرعة" 1/ 290.وعند البخاري في "تاريخه الأوسط" (93) عن أبي اليمان، عن شعيب، عن الزهري، قال: أخبرني عروة بن الزبير عن عائشة، وذكر الحديث قال: وعاشت فاطمة بعد النبي صلى الله عليه وسلم ستة أشهر. ففصل البخاري القول المذكور بلفظة "قال" موافقًا رواية أبي زرعة الدمشقي عن أبي اليمان، وموافقًا كذلك الرواية صالح بن كيسان عند أحمد ومسلم كما سبق، فالله تعالى أعلم.وسيأتي بعده من رواية عبد الرزاق عن معمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة من قولها مفردًا، فالظاهر أنه من قول عائشة ووافقها عليه الزهري.



4816 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4816)


4816 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن بُطة، حدثنا الحسن بن الجهم الأصبهاني، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، قال: تُوفّيت فاطمة بنت محمد صلى الله عليه وسلم لثلاث ليال خَلَون من شهر رمضان، وهي ابنةُ تسع وعشرين سنة أو نحوها.وقد اختُلِف في وقت وفاتِها، فرُوي عن أبي جعفر محمد بن علي، أنه قال: توفيت فاطمة بعد النبي صلى الله عليه وسلم بثلاثة أشهر.وأما عائشة فإنها قالت فيما روي عنها: إنها تُوفّيت بعد النبي صلى الله عليه وسلم بستة أشهر. وأما عبد الله بن الحارث فإنه قال فيما روى يزيد بن أبي زياد عنه قال: تُوفّيتْ فاطمة بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم بثمانية أشهر.




মুহাম্মদ বিন উমর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রমজান মাসের তিনটি রাত অতিবাহিত হওয়ার পর ইন্তেকাল করেন। তখন তাঁর বয়স ছিল উনত্রিশ বছর বা এর কাছাকাছি।

তবে তাঁর (ফাতিমা’র) মৃত্যুর সময় নিয়ে মতভেদ রয়েছে। আবূ জাফর মুহাম্মদ বিন আলী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইন্তেকালের তিন মাস পর ইন্তেকাল করেন।

আর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেছেন: তিনি (ফাতিমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইন্তেকালের ছয় মাস পর ইন্তেকাল করেন।

আর আবদুল্লাহ ইবনুল হারিস (রাহিমাহুল্লাহ) সম্পর্কে ইয়াযিদ বিন আবী যিয়াদ বর্ণনা করেছেন যে, তিনি (আবদুল্লাহ ইবনুল হারিস) বলেছেন: ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইন্তেকালের আট মাস পর ইন্তেকাল করেন।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4817)


4817 - قال محمد بن عمر: وقد حدثنا معمرٌ، عن الزُّهْري، عن عُرُوة، عن عائشة.وحدثنا ابن جُريج، عن الزُّهري، عن عُروة [1]: أنَّ فاطمة توفيت بعد النبي صلى الله عليه وسلم بستة أشهر. قال محمد بن عمر: وهذا الثبَتُ عندنا [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর ওফাতের ছয় মাস পরে ইন্তেকাল করেন। মুহাম্মদ ইবনে উমর বলেন: এটাই আমাদের কাছে সুপ্রতিষ্ঠিত (তথ্য)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] زاد في المطبوع: عن عائشة. ولم يرد ذكر عائشة في الأصول الخطية في رواية ابن جريج عن الزُّهْري، وهو الصحيح، فقد نقله الطبري في "تاريخه" 3/ 240 عن الواقدي، فلم يذكر عائشة في روايته عن ابن جريج، وكذلك نقله ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 928. وقريبٌ منه قول محمد بن إسحاق عند الطبراني في "الكبير" 22 / (998)، وعنه أخرجه أبو نُعيم في "المعرفة" (7339) حيث قال: توفيت وهي بنت ثمان وعشرين.وقاله كذلك ابن شهاب الزُّهري كما رواه عنه المصنف في "فضائل فاطمة" (79)، ومن طريقه ابن عساكر 3/ 161.وخالفهم عبد الله بن حسن بن حسن بن علي بن أبي طالب عند الطحاوي في "شرح المشكل" بإثر الحديث (142)، فقال: كان سنُّها الذي ماتت عليه خمسًا وعشرين سنة. وهذا أقوى مما نقله عنه الزبير بن بكار بسند آخر فيما رواه عنه ابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (1608) أنها بلغت ثلاثين.وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 2/ 32: الصحيح أن عمرها أربع وعشرون سنة. وهذا قريب من قول عبد الله بن حسن المتقدم.وسيأتي عن جعفر بن محمد الصادق برقم (4821) أنَّ فاطمة ماتت وهي ابنة إحدى وعشرين.وأخرج قول عائشة في وقت وفاة فاطمة ضمن قصة مجيئها إلى أبي بكر تسأله ميراثها: أحمد 1 / (25)، والبخاري (3039)، ومسلم (1759) من طريق صالح بن كيسان، والبخاري (4240) ومسلم (1759)، وابن حبان (6607) من طريق عُقيل بن خالد الأيلي، وابن حبان (4823) من طريق شعيب بن أبي حمزة، ثلاثتهم عن الزهري به. وفصل صالح بن كيسان في رواية أحمد ومسلم هذا القول من حديث عائشة بلفظة: "قال" كأنه يشير إلى أنه ليس من قول عائشة. وقد جاء في رواية للبيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 300 من رواية أحمد بن منصور، عن عبد الرزاق، عن معمر، عن الزهري، به. فذكر حديث عائشة وقال في أثنائه: قال معمر: قلت للزهري: كم مكثت فاطمة بعد النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: ستة أشهر. وجاء مفردًا من قول الزهري في روايتين عند ابن عساكر 3/ 161، إحداهما من رواية أبي زرعة الرازي عن أبي اليمان الحكم بن نافع عن شعيب بن أبي حمزة، وهي في "تاريخ أبي زرعة" 1/ 290.وعند البخاري في "تاريخه الأوسط" (93) عن أبي اليمان، عن شعيب، عن الزهري، قال: أخبرني عروة بن الزبير عن عائشة، وذكر الحديث قال: وعاشت فاطمة بعد النبي صلى الله عليه وسلم ستة أشهر. ففصل البخاري القول المذكور بلفظة "قال" موافقًا رواية أبي زرعة الدمشقي عن أبي اليمان، وموافقًا كذلك الرواية صالح بن كيسان عند أحمد ومسلم كما سبق، فالله تعالى أعلم.وسيأتي بعده من رواية عبد الرزاق عن معمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة من قولها مفردًا، فالظاهر أنه من قول عائشة ووافقها عليه الزهري.



[2] قول عائشة في وقت وفاة فاطمة صحيح عنها، فقد توبع عليه محمد بن عمر الواقدي.وأما قول الواقدي في سنّ فاطمة لما توفيت فوافقه عليه أبو الحسن المدائني كما في "تاريخ دمشق" 3/ 159 - 160، ووافقه كذلك ابن أبي شيبة كما في "دلائل النبوة" لابن شاهين فيما نقله عنه ابن ناصر الدين الدمشقي في "جامع الآثار" 3/ 504. وقريبٌ منه قول محمد بن إسحاق عند الطبراني في "الكبير" 22 / (998)، وعنه أخرجه أبو نُعيم في "المعرفة" (7339) حيث قال: توفيت وهي بنت ثمان وعشرين.وقاله كذلك ابن شهاب الزُّهري كما رواه عنه المصنف في "فضائل فاطمة" (79)، ومن طريقه ابن عساكر 3/ 161.وخالفهم عبد الله بن حسن بن حسن بن علي بن أبي طالب عند الطحاوي في "شرح المشكل" بإثر الحديث (142)، فقال: كان سنُّها الذي ماتت عليه خمسًا وعشرين سنة. وهذا أقوى مما نقله عنه الزبير بن بكار بسند آخر فيما رواه عنه ابن أبي خيثمة في السفر الثالث من "تاريخه" (1608) أنها بلغت ثلاثين.وقال الذهبي في "تاريخ الإسلام" 2/ 32: الصحيح أن عمرها أربع وعشرون سنة. وهذا قريب من قول عبد الله بن حسن المتقدم.وسيأتي عن جعفر بن محمد الصادق برقم (4821) أنَّ فاطمة ماتت وهي ابنة إحدى وعشرين.وأخرج قول عائشة في وقت وفاة فاطمة ضمن قصة مجيئها إلى أبي بكر تسأله ميراثها: أحمد 1 / (25)، والبخاري (3039)، ومسلم (1759) من طريق صالح بن كيسان، والبخاري (4240) ومسلم (1759)، وابن حبان (6607) من طريق عُقيل بن خالد الأيلي، وابن حبان (4823) من طريق شعيب بن أبي حمزة، ثلاثتهم عن الزهري به. وفصل صالح بن كيسان في رواية أحمد ومسلم هذا القول من حديث عائشة بلفظة: "قال" كأنه يشير إلى أنه ليس من قول عائشة. وقد جاء في رواية للبيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 300 من رواية أحمد بن منصور، عن عبد الرزاق، عن معمر، عن الزهري، به. فذكر حديث عائشة وقال في أثنائه: قال معمر: قلت للزهري: كم مكثت فاطمة بعد النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: ستة أشهر. وجاء مفردًا من قول الزهري في روايتين عند ابن عساكر 3/ 161، إحداهما من رواية أبي زرعة الرازي عن أبي اليمان الحكم بن نافع عن شعيب بن أبي حمزة، وهي في "تاريخ أبي زرعة" 1/ 290.وعند البخاري في "تاريخه الأوسط" (93) عن أبي اليمان، عن شعيب، عن الزهري، قال: أخبرني عروة بن الزبير عن عائشة، وذكر الحديث قال: وعاشت فاطمة بعد النبي صلى الله عليه وسلم ستة أشهر. ففصل البخاري القول المذكور بلفظة "قال" موافقًا رواية أبي زرعة الدمشقي عن أبي اليمان، وموافقًا كذلك الرواية صالح بن كيسان عند أحمد ومسلم كما سبق، فالله تعالى أعلم.وسيأتي بعده من رواية عبد الرزاق عن معمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة من قولها مفردًا، فالظاهر أنه من قول عائشة ووافقها عليه الزهري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4818)


4818 - أخبرنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى المزكي، حدثنا محمد بن إسحاق الثّقفي، حدثنا إسحاق بن إبراهيم الحَنْظَلي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمر، عن الزُّهْري، عن عُروة، عن عائشة قالت: مَكثَت فاطمة بعد وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم ستة أشهر [1].تابعه صالح بن كَيْسان وعُقَيلُ وابنُ عُيَينة والمُوَقَّرِيُّ [2] ومحمد بن عبد الله ابن أخي الزُّهْري [3] وابنُ جُريج، كلُّهم نحوه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর ওফাতের পর ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছয় মাস জীবিত ছিলেন। সালেহ ইবনু কাইসান, উকাইল, ইবনু উয়ায়না, মুওয়াক্কারীর, মুহাম্মাদ ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু আখিয্ যুহরী এবং ইবনু জুরাইজ—তাঁদের প্রত্যেকেই প্রায় অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. غير أنه اختلف فيه هل هو من قول عائشة أو الزهري كما سبق في الطريق التي قبله. وقد أخرجه الطبراني في "معجمه الكبير" 22 / (993) عن إسحاق الدَّبَري عن عبد الرزاق، عن معمر، عن الزُّهْري من قوله. كذا ذكره عن الدَّبَري وهو راوية "مصنف عبد الرزاق"، مع أنَّ الذي جاء في "المصنف" (9774) يُشعر أنه من قول عائشة إذ دُمج في روايتها للحديث الطويل في مجيء فاطمة والعباس إلى أبي بكر يسألانه ميراثهما. وكذلك جاء في "مستخرج أبي عوانة" (6679) عن الدبري وعن محمد بن يحيى الذهلي وعن محمد بن علي الصنعاني، ثلاثتهم عن عبد الرزاق، به. بما يُشعر أنه من قول عائشة.وهذا يخالف رواية أحمد بن منصور الرمادي عن عبد الرزاق التي عند البيهقي في "سننه الكبرى" 6/ 300 التي فُصل فيها هذا القولُ من حديث عائشة وجعل من قول الزُّهْري صراحةً، فالله تعالى أعلم. ولا يبعد أن يكون هو قول عائشة ووافقها عليه الزهري.وقد روي عن عائشة بإسناد آخر من قولها كما رواه عنها الطبراني في "الكبير" 22/ (994) و (1036)، ولكن في الإسناد إليها رجل متروك.وفيه رواية أخرى عن عائشة: أنَّ فاطمة بقيت بعد صلى الله عليه وسلم، شهرين، وستأتي عند المصنف برقم (4822) وإسناده ضعيف.



[2] تحرّف في المطبوع إلى: الواقدي، وقد أخرجه من طريق الموقري - واسمه الوليد بن محمد - عمرُ بن شبة في "تاريخ المدينة" 1/ 196.



4818 [3] - أخرجه من طريقه المصنف في "فضائل فاطمة" (171) و (172).