হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4819)


4819 - أخبرنا أبو محمد الحسن بن محمد بن يحيى ابن أخي طاهر العقيقي العلوي ببغداد، حدثنا جدّي يحيى بن الحسن، حدثنا بكر بن عبد الوهاب، حدثنا محمد ابن عمر الواقدي، حدثنا عمر [1] بن محمد بن عمر بن علي، عن أبيه، عن علي بن الحسين، عن ابن عباس قال: كانت فاطمة قد مَرِضت مرضًا شديدًا، فقالت لأسماء بنت عُميس: ألا ترين إلى ما بلغت، أُحمَلُ على السرير ظاهرًا؟! فقالت أسماء: ألا لَعَمْري، ولكن أصنعُ لكِ نَعْشًا كما رأيتُه يُصنَع بأرض الحبشة، قالت: فأرينيه، قال: فأرسلت أسماء إلى جَرائدَ رَطْبةٍ فقُطعت من الأسواف، وجعلت على السرير نعشًا، وهو أول ما كان النعشُ، فتبسمت فاطمةُ، وما رأيتُها مُتبسمةً بعد أبيها إلا يومئذ، ثم حَمَلْناها فدفناها ليلًا [2].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একবার কঠিনভাবে অসুস্থ হয়ে পড়লেন। তিনি আসমা বিনতে উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তুমি কি দেখছো না আমি কোন অবস্থায় পৌঁছেছি? আমাকে তো খোলা খাটের (জানাজার খাট) উপর বহন করা হবে! তখন আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম, তা হবে না। বরং আমি আপনার জন্য এমন একটি নে'শ (ঢাকনাযুক্ত খাট বা কফিন) তৈরি করে দেব, যেমনটি আমি হাবশার (আবিসিনিয়া) ভূমিতে তৈরি হতে দেখেছি। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাহলে আমাকে দেখাও। বর্ণনাকারী বলেন: আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন সজীব খেজুরের ডালপালা আনালেন, সেগুলোকে কেটে (কাঠের) তক্তার উপর নে'শ তৈরি করে দিলেন। আর এটিই ছিল প্রথম নে'শ (যা তৈরি করা হয়েছিল)। এতে ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুচকি হাসলেন। তাঁর পিতার (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকালের পর আমি তাঁকে কেবল সেদিনই মুচকি হাসতে দেখেছিলাম। অতঃপর আমরা তাঁকে বহন করে নিয়ে গেলাম এবং রাতেই দাফন করলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: محمد وسقط من (ص) و (م)، فصار: محمد بن عمر بن علي، والتصويب من "طبقات ابن سعد" 10/ 29، و "الذرية الطاهرة" للدولابي (212).وقد تكرر اسم عُمر بن محمد بن عُمر بن علي في عدة روايات للواقدي عند ابن سعد 1/ 75 و 10/ 30 وغيره. وقد ذكر مصعب الزبيري في "نسب قريش" ص 80 أبناء محمد بن عمر بن علي، فلم يذكر فيهم من اسمه محمد.



[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل الحسن بن محمد بن يحيى العلوي العقيقي فقد اتهمه الذهبي في "الميزان" 1/ 521، بالكذب، لكن رُوي خبر صنع أسماء النعش لفاطمة من غير طريقه، فقد رواه ابن سعد في "طبقاته" 10/ 29 عن محمد بن عمر الواقدي، والواقدي متكلم فيه، وقد روي هذا الخبر أيضًا من وجه آخر محتمل للتحسين عن أسماء بنت عُميس نفسها.فقد أخرجه بنحوه الدُّولابي في "الذرية الطاهرة" (214)، وابن شاهين في "ناسخ الحديث ومنسوخه" (647)، والمصنف في "فضائل فاطمة" (85)، والخطيب البغدادي في "موضح الجمع والتفريق" 2/ 403، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 927 - 928، والجُورقاني في "الأباطيل" (449) من طرق عن محمد بن موسى بن أبي عبد الله الفطري، عن عون بن محمد ابن الحنفية، عن أمه أم جعفر بنت محمد بن جعفر بن أبي طالب، عن أسماء بنت عُميس. لكن وقع عند ابن شاهين ومن طريقه الخطيب البغدادي بدل محمد بن موسى: موسى بن أبي عبد الله، فجزم الخطيب بناء على ذلك أن موسى هذا هو ابن جعفر بن محمد بن علي بن الحسين بن علي أبي طالب، وهو بن خطأ صوابه ما جاء في رواية غير ابن شاهين. وقال الجُورقاني: حديث مشهور حسن.والأسواف: موضع بالمدينة بناحية البقيع، وهو من حرم المدينة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4820)


4820 - أخبرنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى وأبو الحسين بن يعقوب الحافظ قالا: حدثنا أبو العباس محمد بن إسحاق، حدثنا قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن عُقَيل، عن الزُّهْري، عن عُروة قال [1]: دُفنت فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلًا، دَفَنَها عليٌّ ولم يَشعُر بها أبو بكر حتى دُفنت، وصلى عليها علي بن أبي طالب [2].




উরওয়া থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাতে দাফন করা হয়েছিল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে দাফন করেন এবং আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাফন সম্পন্ন হওয়া পর্যন্ত এ বিষয়ে জানতে পারেননি। আর তাঁর (জানাজার) সালাত আদায় করেন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك جاء هذا الخبر في أصولنا الخطية من قول عروة مرسلًا، وزاد في المطبوع اسم عائشة، وكذلك جاء في "صحيح البخاري" (4240) ومسلم (1759) ضمن حديث عائشة الطويل في سؤال فاطمة ميراثها من أبي بكر، موصولًا بذكر عائشة!



[2] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، وقد صح موصولًا بذكر عائشة من طرق عن الليث بن سعد. عقيل: هو ابن خالد الأيلي.وأخرجه البخاري (4240) عن يحيى بن عبد الله بن بُكير، ومسلم (1759) من طريق حُجين بن المثنى، وابن حبان (6607) من طريق يزيد بن خالد، ثلاثتهم عن الليث بن سعد، بهذا الإسناد موصولًا بذكر عائشة.وأخرجه ابن حبان (4823) من طريق شعيب بن أبي حمزة، عن الزهري، به. بذكر عائشة كذلك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4821)


4821 - أخبرنا أبو الحسين بن يعقوب الحافظ، أخبرنا أبو العباس الثقفي، حدثني علي بن عَقيل بن عبد الله بن محمد بن عقيل، حدثني عيسى بن عبد الله العَلَوي، عن أبيه، عن أم الحسن بنت أبي جعفر محمد بن علي، عن أخيها جعفر بن محمد، قال: ماتت فاطمة وهي ابنة إحدى وعشرين، ووُلِدت على رأس سنة إحدى وأربعين من مولد النبي صلى الله عليه وسلم [1].




জাফর ইবনে মুহাম্মাদ থেকে বর্ণিত, ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন ইন্তেকাল করেন, তখন তাঁর বয়স ছিল একুশ বছর। আর তাঁর জন্ম হয়েছিল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্মের একচল্লিশ বছর পূর্ণ হওয়ার পর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] عيسى بن عبد الله العلوي: هو ابن محمد بن عمر بن علي بن أبي طالب، قال الدارقطني: متروك الحديث، وكذَّبه مرةً، وقال ابن حبان: يروي عن آبائه أشياء موضوعة.وانظر ما تقدَّم برقم (4815).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4822)


4822 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن عليّ حمدانُ الوَرّاق، حدثنا موسى بن داود الضَّبي، حدثنا عبد الله بن المؤمل، عن ابن أبي مُليكة، عائشة قالت: كان بين النبي صلى الله عليه وسلم وبين فاطمة شهران [1].




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে দুই মাস সময় ছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف عبد الله بن المؤمل، وللاختلاف عليه كذلك، فقد رُوي عنه على وجوه فمرةً يرويه عن ابن أبي مليكة عن عائشة كما في إسناد المصنّف هنا، ومرة يرويه عن أبي الزُّبَير عن جابر كما في الرواية التالية عند المصنَّف، ومرةً يزيد فيه بينه وبين ابن أبي مليكة رجلًا سماه أبا أيوب، ومرة يرويه عن أبي الزبير مرسلًا لا يذكر فيه جابرًا. ابن أبي مليكة: هو عبد الله بن عُبيد الله.وهو عند المصنف في "فضائل فاطمة" (8) و (88).وأخرجه أيضًا (89) من طريق الفضل بن الشَّعراني، عن أحمد بن حنبل، عن موسى بن داود، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر 3/ 158 من طريق حنبل بن إسحاق، عن أحمد بن حنبل، عن موسى بن داود، عن عبد الله بن المؤمل، عن أبي أيوب، عن ابن أبي مليكة، عن عائشة.وفي الرواة عن ابن أبي مليكة رجل اسمه سليمان بن داود القرشي ويكنى بأبي أيوب وكان ثقة جليلًا، فلعله يكون هو.وسيأتي بعده من طرق عن عبد الله بن المؤمل عن أبي الزبير عن جابر.وما روي عن عائشة برقم (4817) و (4818) من أن مدة ما بين وفاة النبي صلى الله عليه وسلم ووفاة ابنته فاطمة كانت ستة أشهر هو الصحيح عن عائشة. وأخرجه ابن عساكر 3/ 158 من طريق حنبل بن إسحاق، عن أحمد بن حنبل، عن موسى بن داود، عن عبد الله بن المؤمل، عن أبي الزُّبَير مرسلًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4823)


4823 - حدثناه أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن سليمان الواسطي، حدثنا أبو نُعيم وأبو غسان، قالا: حدثنا عبد الله بن المؤمل المَخْزُومي المكي.وأخبرني محمد بن المؤمَّل بن الحسن، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعراني، حدثنا أحمد بن حنبل، حدثنا موسى بن داود، حدثنا عبد الله بن المؤمَّل، عن أبي الزُّبير، عن جابر: أنَّ فاطمة لم تمكُث بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم إِلَّا شهرين [1].




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইন্তিকালের পর মাত্র দুই মাস জীবিত ছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف عبد الله بن المؤمل المخزومي، وللاختلاف عنه كذلك كما سبق.أبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تدرُس المكي.وهو عند المصنف في "فضائل فاطمة" (9) و (90).وأخرجه أيضًا (90) من طريق محمد بن علي حمدان الوراق، و (180) من طريق إبراهيم بن الحسين بن ديزيل، كلاهما عن موسى بن داود الضبي، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن عساكر 3/ 158 من طريق حنبل بن إسحاق، عن أحمد بن حنبل، عن موسى بن داود، عن عبد الله بن المؤمل، عن أبي الزُّبَير مرسلًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4824)


4824 - حدثني أبو جعفر أحمد بن عُبيد الأسدي الحافظ بهمذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا إسماعيل بن أبي أُويس، حدثنا موسى بن جعفر بن محمد بن علي، عن أبيه، عن جده أبي جعفر محمد بن علي بن الحسين، عن أبيه، عن عليّ: أنَّ فاطمة لما توفِّي رسول الله صلى الله عليه وسلم كانت تقول: وابَتَاه [1]، مِن رَبِّهِ ما أَدْناه، وابتاه، جنانُ الخُلْدِ مَأواه، وابتاه، ربُّه يُكرمه إذا أتاه، وابتاه، الربُّ ورسله يُسلِّم عليه حين يلقاه. فلما ماتت فاطمة قال علي بن أبي طالب:لكل اجتماع من خَليلَينِ فُرقةٌ ..... وكلُّ الذي دون الفراق قليلوإنَّ افتقادي واحدًا بعد واحدٍ ..... دليل على أن لا يَدُومَ خليل [2]




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন ইন্তেকাল করলেন, তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতে লাগলেন: ‘হায় আমার পিতা! তাঁর রবের কাছে তাঁর নৈকট্য কতই না বেশি! হায় আমার পিতা! চিরস্থায়ী জান্নাতই তাঁর নিবাস! হায় আমার পিতা! যখন তিনি তাঁর রবের কাছে যাবেন, তখন তিনি তাঁকে সম্মান জানাবেন! হায় আমার পিতা! তাঁর রব এবং তাঁর রাসূলগণ (ফিরিশতাগণ) তাঁর সাথে সাক্ষাতের সময় তাঁকে সালাম জানাবেন!’

এরপর যখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন, তখন আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন:
‘দুই বন্ধুর প্রত্যেক মিলনেরই পরিণতি হলো বিচ্ছেদ,
আর বিচ্ছেদ ছাড়া যা কিছু (কষ্ট) আছে, তা সামান্য।
আর আমি একে একে সকলকে হারাচ্ছি,
এটিই প্রমাণ যে কোনো বন্ধুই চিরস্থায়ী নয়।’




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك جاء هذا الحرف في أصولنا الخطية في المواضع الأربعة بحذف همزة "أبتاه"، وهو لغة معروفة، حيث تحذف الهمزة تخفيفًا في مثل هذا الكلام الذي كثر استعماله وجرى مجرى المثل، ومنه قوله صلى الله عليه وسلم: "ويلمه مِسعَرَ حَربٍ" فأصلها: ويلٌ لأمِّه، فحذفت اللام والهمزة من "لأمه" تخفيفًا. انظر "شواهد التوضيح والتصحيح" لابن مالك ص 157. وقد عدَّه السيوطي والخَفَاجي وغيرهما شذوذًا، ولكن عدُّه لغةً أحسن.



[2] رجاله لا بأس بهم إلا أنه مرسل، فإنّ علي بن الحسين - وهو ابن علي بن أبي طالب - لم يدرك جده عليًّا، وقد اختلف فيه على إسماعيل بن أبي أُويس.وهو عند المصنف في "فضائل فاطمة" (74)، غير أنه ذكر أبا أويس بدل موسى بن جعفر!! وأبو أويس والد إسماعيل ضعيف.وأخرجه أيضًا (119) من طريق الفضل بن محمد الشَّعراني عن إسماعيل بن أبي أويس، عن محمد بن جعفر بن محمد بن علي، عن أبيه، عن جده، عن علي. فذكر قول فاطمة دون شعر عليٍّ. وذكر محمد بن جعفر بن محمد بن علي بدل أخيه موسى ولم يذكر علي بن الحسين!!









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4825)


4825 - أخبرني محمد بن المؤمل، حدثنا الفضل بن محمد الشعراني، حدثنا النُّفَيلي، حدثنا عبد العزيز بن محمد، حدثني محمد بن موسى، عن عون بن محمد ابن علي، عن [1] عُمارة بن المُهاجر، عن أم جعفر بن محمد [2] بن علي، قالت: حدثتني أسماء بنت عُميس، قالت: غسلتُ أنا وعليٌّ فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم [3]. ‌‌ومن مناقب الحسن والحسين ابني رسول الله صلى الله عليه وسلم




আসমা বিনত উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে গোসল দিয়েছিলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك وقع في أصولنا الخطية: عن، من غير واو العطف، وهذا يفيد أنَّ عون بن محمد بن علي إنما سمعه بواسطة عُمارة بن مهاجر، وهو ما جاء في "السنن الكبرى" للبيهقي 3/ 397، وفي "معرفة السنن والآثار" له أيضًا (7359) عن أبي عبد الله الحاكم، فكذلك هي إذًا رواية الحاكم، لكن هذا غير صحيح في الرواية، والصحيح أن يقال في هذا الإسناد: وعن بواو العطف، لأنَّ كلا من عون بن محمد بن علي وعمارة بن مهاجر قد سمع أم جعفر هذه التي هي أم عون بن محمد بن علي، والدليل على صدق ذلك رواية عمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 1/ 109 حيث روى هذا الخبر عن هارون بن معروف، عن عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن محمد بن موسى، عن عون بن محمد وعن عمارة بن مهاجر، به. فعطف بالواو، وقد روى هذا الخبر جماعةٌ من الثقات عن محمد بن موسى عن عون بن محمد عن أمه أم جعفر، فتأكد صحة ما ذلك، والله الموفق. وجاء في المطبوع: وعمارة بن المهاجر، بواو العطف دون لفظة "عن" وهذا أوضح. والمصنف في "فضائل فاطمة" (85)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 3/ 396، والخطيب البغدادي في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 2/ 403، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 927 - 928، والجُورقاني في "الأباطيل والصحاح" (449)، وابن الجوزي في "التحقيق" (860) من طرق عن محمد بن موسى الفطري، عن عون بن محمد وحده، به. وقد وقع في إسناد ابن شاهين ومن طريقه الخطيب وهمٌ كما تقدم بيانه برقم (4819). ورواية بعضهم مرسلة.وأخرجه الشافعي في "الأم" 2/ 622 - 623 ومن طريقه البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (7357)، والبغوي في "شرح السنة" (1475) عن إبراهيم بن محمد الأسلمي، وعبد الرزاق (6122)، كلاهما (إبراهيم بن محمد وعبد الرزاق) عن عُمارة بن المهاجر وحده، به.ونقل الدولابي في "الذرية الطاهرة" (211) عن محمد بن عمر الواقدي أنه يرويه عن محمد بن موسى الفِطري، عن عُمارة بن المهاجر، عن أم جعفر مرسلًا.



[2] وقع في (ز) و (م) و (ب): أم جعفر أمّ محمد بن علي، وفي المطبوع: زوجة محمد بن علي، والمثبت من (ص) هو الذي يغلب على الظن صحتُه، ولا يُدفع ما جاء في المطبوع، فإنَّ أم جعفر هذه زوجة محمد بن علي بن أبي طالب المعروف بابن الحنفية، وفي ولد محمد بن علي بن أبي طالب من اسمه جعفر كما جاء في نسب بعض الرواة، ولا يمتنع أن يكون جعفر الذي تكنى أم جعفر به هو جعفر بن محمد بن علي المذكور، وقد اشتهرت أم جعفر بكنيتها هذه وكانت تكني أيضًا بولدها عون بن محمد بن علي. والمصنف في "فضائل فاطمة" (85)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 3/ 396، والخطيب البغدادي في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 2/ 403، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 927 - 928، والجُورقاني في "الأباطيل والصحاح" (449)، وابن الجوزي في "التحقيق" (860) من طرق عن محمد بن موسى الفطري، عن عون بن محمد وحده، به. وقد وقع في إسناد ابن شاهين ومن طريقه الخطيب وهمٌ كما تقدم بيانه برقم (4819). ورواية بعضهم مرسلة.وأخرجه الشافعي في "الأم" 2/ 622 - 623 ومن طريقه البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (7357)، والبغوي في "شرح السنة" (1475) عن إبراهيم بن محمد الأسلمي، وعبد الرزاق (6122)، كلاهما (إبراهيم بن محمد وعبد الرزاق) عن عُمارة بن المهاجر وحده، به.ونقل الدولابي في "الذرية الطاهرة" (211) عن محمد بن عمر الواقدي أنه يرويه عن محمد بن موسى الفِطري، عن عُمارة بن المهاجر، عن أم جعفر مرسلًا.



4825 [3] - إسناده حسن كما قال الحافظ ابن حجر في "التلخيص الحبير" 2/ 143، وقال ابن عبد البر في "التمهيد" 1/ 381: خبر مشهور عند أهل السير. محمد بن موسى: هو ابن أبي عبد الله الفطري.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 3/ 397، وفي "معرفة السنن والآثار" (7359) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه عمر بن شبة في "تاريخ المدينة" 1/ 109 عن هارون بن معروف، عن عبد العزيز بن محمد بن الدراوردي به.وأخرجه الدُّولابي في "الذرية الطاهرة" (214)، وابن زبر الرَّبَعي في "وصايا العلماء عند حضور الميت" ص 43، وابن شاهين في "ناسخ الحديث و منسوخه" (647)، والدارقطني (1851)، والمصنف في "فضائل فاطمة" (85)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 3/ 396، والخطيب البغدادي في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 2/ 403، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 927 - 928، والجُورقاني في "الأباطيل والصحاح" (449)، وابن الجوزي في "التحقيق" (860) من طرق عن محمد بن موسى الفطري، عن عون بن محمد وحده، به. وقد وقع في إسناد ابن شاهين ومن طريقه الخطيب وهمٌ كما تقدم بيانه برقم (4819). ورواية بعضهم مرسلة.وأخرجه الشافعي في "الأم" 2/ 622 - 623 ومن طريقه البيهقي في "معرفة السنن والآثار" (7357)، والبغوي في "شرح السنة" (1475) عن إبراهيم بن محمد الأسلمي، وعبد الرزاق (6122)، كلاهما (إبراهيم بن محمد وعبد الرزاق) عن عُمارة بن المهاجر وحده، به.ونقل الدولابي في "الذرية الطاهرة" (211) عن محمد بن عمر الواقدي أنه يرويه عن محمد بن موسى الفِطري، عن عُمارة بن المهاجر، عن أم جعفر مرسلًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4826)


4826 - حدثنا أبو بكر بن أبي دارِم الحافظ بالكوفة، حدثنا محمد بن عثمان بن أبي شَيْبة، حدثني عمي القاسم بن أبي شيبة، حدثنا يحيى بن العلاء، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لكلِّ بَنِي أُمٍّ عَصَبَةٌ يَنتَمُون إليهم، إلَّا ابني فاطمة، فأنا وَلِيُّهُما وعَصَبَتُهما" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক মায়ের সন্তানদের এমন আসাবাহ (পিতা বা পিতৃপুরুষের দিকের নিকটাত্মীয়) থাকে, যাদের সাথে তারা নিজেদের সম্পর্কিত করে। কিন্তু ফাতেমার দুই পুত্র এর ব্যতিক্রম। আমিই তাদের অভিভাবক এবং আমিই তাদের আসাবাহ।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالفٌ من أجل يحيى بن العلاء، فهو متروك الحديث واتهمه أحمد بالكذب ووضع الحديث، وكذلك القاسم بن أبي شيبة متروك وكذبه الدارقطني، وقد رواه عن يحيى بن العلاء رجلٌ غير القاسم هو عبادة بن زياد الأسدي - ويقال له: عباد - وهو لا بأس به، لكنه خالفه في لفظه، فيبقى الشأن في يحيى بن العلاء. وله طريق أخرى عن جابر كلفظ القاسم، لكن فيها أيضًا رجلًا متروكًا متهمًا.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (2630)، وابن الشجري في "أماليه" 1/ 152 من طريق عبادة بن زياد الأسدي، عن يحيى بن العلاء به، بلفظ: "إنَّ الله جعل ذرية كل بني في صلبه، وإنَّ الله جعل ذرّيتي في صُلب علي بن أبي طالب".وأخرجه المصنف في "فضائل فاطمة" (56)، ومن طريقه ابن عساكر 36/ 313 من طريق سليمان بن أحمد بن يحيى، عن محمود بن الربيع العامري، عن حماد بن عيسى غريق الجحفة، عن طاهرة بنت عمرو بن دينار، عن أبيها، عن جابر بن عبد الله. وحماد بن عيسى هذا قال عنه المصنف نفسُه: دجّال يروي أحاديث موضوعة. قلنا وسليمان بن أحمد بن يحيى متهم أيضًا، وشيخه محمود بن الربيع مجهول.وقد روي هذا الخبر عن غير واحدٍ من الصحابة بأسانيد لا يُفرح بشيء منها البتة.ففي الباب عن عمر بن الخطاب عند أبي بكر القطيعي في زياداته على "فضائل الصحابة" لأحمد بن حنبل (1070)، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (215) عن محمد بن يونس الكُديمي، والطبراني في "الكبير" (2631) عن محمد بن زكريا الغلابي، كلاهما عن بشر - ويقال: بشير - بن مهران، عن شريك النخعي، عن شبيب بن غرقدة، عن المستظل بن حصين، عن عمر بن الخطاب. وبشر بن مهران هذا هو الخصاف، وهو ضعيف، والراويان عنه متروكان.وفي الباب كذلك عن فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم عند أبي يعلى (6741)، والعُقيلي في "الضعفاء" (1185)، والطبراني في "الكبير" (2632) و 22 / (1042)، والمصنف في "فضائل فاطمة" (218)، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 13/ 163 و 164، وابن عساكر 70/ 14، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (418) من طريق شيبة نعامة، عن فاطمة بنت الحسين بن علي، عن جدتها فاطمة الزهراء. وشيبة بن نعامة هذا ضعيف، وقال ابن حبان في "المجروحين" 1/ 362: لا يجوز الاحتجاج به. وفاطمة بنت الحسين لم تدرك جدتها فاطمة الزهراء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4827)


4827 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن علي بن بطحاء، حدثنا عفان.وأخبرنا أحمد بن جعفر القطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عفان، حدثنا وُهَيب، حدثنا عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن سعيد بن أبي راشد، عن يعلى بن مُنْية [1] الثَّقَفي، قال: جاء الحسن والحسين يستبقانِ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فضمَّهُما إليه، ثم قال: "إنَّ الولد مَبْخَلَةٌ مَجْبَنَةٌ مَحْزَنَةٌ" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.




ইয়া'লা ইবনু মুনইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: (একদিন) হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দৌড়ে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে আসছিলেন। তিনি তাঁদের দু’জনকে কাছে টেনে নিলেন। অতঃপর বললেন: "নিশ্চয়ই সন্তান হলো কৃপণতা সৃষ্টিকারী, কাপুরুষতা সৃষ্টিকারী এবং দুশ্চিন্তা সৃষ্টিকারী।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا في رواية الحاكم، وهو خطأ، لأنَّ صحابي الحديث هنا هو يعلى بن مرة كما قيَّده بعضُ من روى هذا الحديث عن عبد الله عثمان بن خُثيم، وهذا هو الذي يُنسب ثقفيًا، وفي الصحابة بن من اسمه يعلى بن مُنْية - ويقال: أمية، ومنية ألله - لكنه تميمي لا ثقفي، وليس هو بصاحب هذا الحديث، والحاكم ساق الحديث هنا بلفظ محمد بن علي بن بطحاء، كما تدل عليه رواية البيهقي في "السنن الكبرى" 10/ 202، إذ اقتصر فيها على رواية الحاكم عن علي بن حمشاذ عن محمد بن علي بن بطحاء، ولأنَّ أحمد بن حنبل روى هذا الحديث في "المسند" 29/ (17562)، فسمَّى الصحابي يعلى العامري.



[2] حسن لغيره، وهذا إسناد محتمل للتحسين من أجل سعيد بن أبي راشد - ويقال: بن راشد - فهو وإن لم يرو عنه غير عبد الله بن عثمان بن خُثيم، قد روى عن يعلى بن مرة وعن رسول قيصر إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فهو تابعي كبير، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال عنه الذهبي في "الكاشف": صدوق. قلنا: وحسَّن له الترمذي حديثًا في فضل الحسين بن علي.عفان: هو ابن مسلم الصَّفّار، ووُهَيب: هو ابن خالد بن عجلان. وهو في "مسند أحمد" 29 / (17562). لكنه سمَّى الصحابي يعلى العامري، فلعلَّ يعلى بن مرة الثقفي كان مولى لبني عامر. وليس فيه لفظ "محزنة".وأخرجه ابن ماجه (3666) عن أبي بكر بن أبي شيبة، عن عفان بن مسلم، بهذا الإسناد. وسمى الصحابي أيضًا يعلى العامري.وفي الباب عن الأسود بن خَلَف سيأتي عند المصنف برقم (5368)، وإسناده محتمل للتحسين.وعن الأشعث بن قيس سيأتي أيضًا برقم (7788)، ورجاله ثقات لكنه معلٌ بالإرسال.وعن أبي سعيد الخُدْري عند البزار (1892 - كشف الأستار)، وأبي يعلى (1032)، وإسناده ضعيف.وعن عائشة عند البغوي في "شرح السنة" (3448)، وإسناده ضعيف.وعن خولة بنت حكيم عند أحمد 45 / (27314)، وإسناده ضعيف.قوله: "مَبْخَلَة": مَفْعَلة من البخل ومَظنَّةٌ له، أي: يحمل أبويه على البخل ويدعوهما إليه، فيبخلان بالمال لأجله.و "مَجبنة" كذلك، لأنه يجعل أباه يجبن عن العدو مخافة القتل.وكذلك "مَحزنة" لأنه يحمل أبويه على الحزن لأجله إذا اعتلّ وساءت حاله، أو إذا ثَكِلاه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4828)


4828 - حدثنا أبو سهل أحمد بن محمد بن عبد الله بن زياد النَّحْوي ببغداد، حدثنا جعفر بن محمد بن شاكر، حدثنا بشر بن مهران، حدثنا شريك، عن عبد الملك بن عُمير، قال: دخل يحيى بن يَعْمَر على الحَجَّاج. وحدثنا إسحاق بن محمد بن علي بن خالد الهاشمي بالكوفة، حدثنا أحمد بن موسى بن إسحاق التميمي، حدثنا محمد بن عُبيد النحاس، حدثنا صالح بن موسى الطَّلحي، حدثنا عاصم بن بَهْدَلة، قال: اجْتَمَعُوا عند الحجاج، فذكر الحسين بن عليّ، فقال الحجاج: لم يكن من ذرية النبي صلى الله عليه وسلم، وعنده يحيى بن يَعْمَر، فقال له: كذبت أيها الأميرُ، فقال: لتأتيَنِّي على ما قلت ببيِّنةٍ ومصداقٍ من كتاب الله عز وجل، أو لأقتُلنَّكَ، قال: {وَمِنْ ذُرِّيَّتِهِ دَاوُودَ وَسُلَيْمَانَ وَأَيُّوبَ وَيُوسُفَ وَمُوسَى} إلى قوله عز وجل: {وَزَكَرِيَّا وَيَحْيَى وَعِيسَى} [الأنعام: 84 - 85]، فأخبر الله عز وجل أنَّ عيسى من ذُرِّية آدمَ بأُمّه، والحسين بن علي من ذرية محمد صلى الله عليه وسلم بأُمه، قال: صدقت، فما حَمَلَك على تكذيبي في مجلسي؟ قال: ما أَخَذَ الله على الأنبياء لَيُبيّننَّه للناس ولا يَكتُمونه، قال الله عز وجل: {فَنَبَذُوهُ وَرَاءَ ظُهُورِهِمْ وَاشْتَرَوْا بِهِ ثَمَنًا قَلِيلًا} [آل عمران: 187]، قال: فنَفاه إلى خُراسان [1].




আসেম ইবনে বাহদালা থেকে বর্ণিত, তারা হাজ্জাজের কাছে একত্রিত হলেন। সেখানে হুসাইন ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা হলো। তখন হাজ্জাজ বলল: তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বংশধর ছিলেন না। ইয়াযিদ ইবনে ইয়া'মার তার কাছেই ছিলেন। তিনি হাজ্জাজকে বললেন: হে আমীর, আপনি মিথ্যা বলেছেন। হাজ্জাজ বলল: তুমি যা বলেছ, সে বিষয়ে আল্লাহর কিতাব থেকে অবশ্যই প্রমাণ ও সত্যায়ন পেশ করবে, অন্যথায় আমি তোমাকে হত্যা করব। তিনি (ইয়াহইয়া ইবনে ইয়া'মার) বললেন: "এবং তাঁর (ইবরাহীমের) বংশধরদের মধ্যে রয়েছেন দাঊদ, সুলাইমান, আইয়ুব, ইউসুফ ও মূসা..." আল্লাহ তা'আলার এই বাণী পর্যন্ত: "...আর যাকারিয়া, ইয়াহইয়া ও ঈসা।" [সূরা আন'আম: ৮৪-৮৫]। আল্লাহ তা'আলা খবর দিয়েছেন যে, ঈসা (আঃ) তাঁর মায়ের মাধ্যমে আদম (আঃ)-এর বংশধর ছিলেন। আর হুসাইন ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর মায়ের মাধ্যমে মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বংশধর। (হাজ্জাজ) বলল: তুমি সত্য বলেছ। কিন্তু আমার এই মজলিসে আমাকে মিথ্যাবাদী বলার সাহস কীভাবে হলো? তিনি (ইয়াহইয়া) বললেন: আল্লাহ নবীদের থেকে যে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন—অবশ্যই তারা তা মানুষের সামনে স্পষ্টভাবে বর্ণনা করবেন এবং গোপন করবেন না। আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "তারপরও তারা সেই কিতাবকে তাদের পিছনের দিকে ফেলে দিল এবং এর বিনিময়ে স্বল্পমূল্য গ্রহণ করল।" [সূরা আলে ইমরান: ১৮৭]। বর্ণনাকারী বলেন: তখন হাজ্জাজ তাকে খোরাসানে নির্বাসিত করল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر محتمل للتحسين، وهذان الإسنادان ضعيفان من أجل بشر، ويقال: بشير بن مهران - وهو الخصاف - وصالح بن موسى الطلحي، فهما ضعيفان، وقد رُوي نحو هذه القصة عن أبي حرب بن أبي الأسود الدؤلي أيضًا، لكن في الإسناد إليه رجلٌ ضعيف كذلك، غير أنَّ هذه الطرق باجتماعها يمكن تحسين الخبر بها، والله أعلم. شريك: هو ابن عبد الله النخعي.وأخرجه البيهقي 6/ 166، ومن طريقه ابن عساكر 12/ 151 - 152 عن أبي عبد الله الحاكم بإسناديه هذين.وأخرجه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 13/ 265، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 4/ 1335 من طريق علي بن عابس، عن عبد الله بن عطاء المكي، عن أبي حرب بن أبي الأسود، فذكر القصة. وعلي بن عابس ضعيف يُعتبر به ويكتب حديثه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4829)


4829 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي بمرو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عبيد الله بن موسى، أخبرنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن هانئ بن هانئ، عن علي بن أبي طالب، قال: لما ولدت فاطمة الحسن جاء رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "أرُوني ابني، ما سميتموه؟ " قال: قلتُ: سميتُه حَرْبًا، قال: "بل هو حَسَنٌ"، فلما وَلَدَت الحسين جاء رسول الله، فقال: "أَرُوني ما سميتموه؟ " قال: قلت: سميتُه حَرْبًا، فقال: "بل هو حُسين"، ثم لما وَلَدَت الثالث جاء رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: "أَرُوني ابني، ما سميتموه؟ " قلت: سمّيته حَرْبًا، قال: "بل هو محسِّن"، ثم قال: "إنما سميتهم باسم ولد هارون: شَبَّرٍ وشَبِيرٍ ومُشَبِّرٍ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




আলী ইবন আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাসানের জন্ম দিলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন এবং বললেন: "আমার ছেলেকে আমাকে দেখাও, তোমরা তার কী নাম রেখেছো?" তিনি (আলী) বলেন, আমি বললাম, আমি তার নাম রেখেছি হারব। তিনি বললেন: "বরং সে হলো হাসান।" এরপর যখন তিনি হুসাইনের জন্ম দিলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন এবং বললেন: "আমাকে দেখাও, তোমরা তার কী নাম রেখেছো?" তিনি (আলী) বলেন, আমি বললাম, আমি তার নাম রেখেছি হারব। তিনি বললেন: "বরং সে হলো হুসাইন।" এরপর যখন তিনি তৃতীয় সন্তানের জন্ম দিলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন এবং বললেন: "আমার ছেলেকে আমাকে দেখাও, তোমরা তার কী নাম রেখেছো?" আমি বললাম, আমি তার নাম রেখেছি হারব। তিনি বললেন: "বরং সে হলো মুহসিন।" এরপর তিনি বললেন: "আমি তাদের নাম কেবল হারূনের সন্তানদের নামানুসারে রেখেছি: শাব্বার, শাব্বীর ও মুশাব্বির।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث منكر، هانئ بن هانئ تفرَّد بالرواية عنه أبو إسحاق السبيعي، وقال الشافعي وابن المديني: مجهول، وقال ابن سعد: منكر الحديث، ومع ذلك قال النسائي: ليس به بأس، قلنا: وهذا عند عدم المخالفة، وأما في هذا الحديث فقد خالف حديث عبد الله بن محمد بن عقيل عن أبيه عن عليّ الآتي عند المصنف برقم (7927): أنه سمّى الحسن بحمزة، والحسين بجعفر، فغيرهما النبي صلى الله عليه وسلم، وهذا أقرب إلى القبول لأنه من رواية أهل بيته، وهم أعلم بحديثهم، والله تعالى أعلم.وأخرجه ابن حبان (6958) من طريق أبي بكر بن أبي شيبة، عن عبيد الله بن موسى، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 2/ (769) و (953) من طريقين عن إسرائيل، به.وسيأتي برقم (4890) من طريق عبد العزيز بن أبان عن إسرائيل، وبرقم (4839) من طريق يونس بن أبي إسحاق السبيعي عن أبيه. المعروف بابن الحنفية، فقد روى هذا الحديث جماعة من أصحاب محمد بن إسماعيل بن أبي فُديك فلم يذكروه، وروي بهذا الإسناد أيضًا غير ما حديث ليس فيها ذكر محمد بن علي بن أبي طالب، إنما يروي ذلك كله عونٌ عن أمه أم جعفر مباشرة، فثبت بذلك أنَّ ذكر محمد ابن الحنفية فيه مُقحم.وقد أخطأ المصنف رحمه الله في بيان رجال هذا الإسناد خطأً بيِّنًا من لدن محمد بن موسى إلى أسماء، فأما محمد بن موسى فهو ابن أبي عبد الله الفطري، وأما أمه أم جعفر فهي ابنة محمد بن جعفر بن أبي طالب، ويقال لها أيضًا: أم عون، وأما جدّتها أسماء فهي بنت عُميس زوج جعفر بن أبي طالب. ولم يتنبه لذلك الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه الدُّولابي في "الذّرّية الطاهرة" (193) من طريق ضرار بن صُرَد، والطبراني في "الكبير" 22 / (1040) من طريق أحمد بن صالح المصري، والمصنف في "فضائل فاطمة" (220) من طريق جعفر بن مُسافر، ثلاثتهم عن محمد بن إسماعيل بن أبي فُديك، بهذا الإسناد.وقد وقع في رواية الطبراني تسمية شيخ ابن أبي فُديك: موسى بن يعقوب، وهو خطأ ممن دون أحمد بن صالح المصري الحافظ، فقد روى أحمد بن صالح بهذا الإسناد غير حديث سمى فيه هذا الرجل على الصواب.والشَّرَبة: الحوض الذي يكون في أصل النخلة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4830)


4830 - حدثني عبد الأعلى بن عبد الله بن سليمان بن الأشعث السِّجستاني ببغداد، حدثني أبي، حدثنا أحمد بن الوليد بن بُرد الأنطاكي، حدثنا محمد بن إسماعيل بن أبي فُدَيك، حدثنا محمد بن موسى المخزومي، حدثنا عَوْن بن محمد، عن أبيه، عن أم جعفر أمِّه، عن جدَّتها أسماء، عن فاطمة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أتاها يومًا فقال: "أين ابناي؟ " فقالت: ذهب بهما عليٌّ، فتوجّه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فوجدهما يلعبان في شَرَبةٍ وبين أيديهما فَضْلٌ من تمرٍ، فقال: "يا علي، ألا تَقلِبُ ابنَيَّ قبلَ الحَرِّ"، وذكر باقي الحديث [1]. محمد بن موسى: هذا هو ابن مَشمُول مَديني ثقة وعون هذا: هو ابن محمد بن عبيد الله بن أبي رافع، هو وأبوه ثقتان، وأم جعفر: هي ابنة القاسم بن محمد بن أبي بكر الصديق، وجدَّتُها أسماء بنت أبي بكر الصديق رضي الله عنهم [2]، وكلُّهم أشراف ثقات.




ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একদিন তাঁর কাছে এসে বললেন: "আমার দুই ছেলে কোথায়?" তিনি বললেন: আলী তাদের নিয়ে গেছেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই দিকে গেলেন এবং তিনি তাদের দু'জনকে একটি নালার ধারে (বা খেলার স্থানে) খেলা করতে দেখলেন, আর তাদের সামনে কিছু অবশিষ্ট খেজুর ছিল। তিনি বললেন: "হে আলী, গরম আসার আগেই তুমি কি আমার ছেলে দু'জনকে ফিরিয়ে আনবে না?" এরপর হাদীসের বাকি অংশ উল্লেখ করা হলো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن كما قال المنذري في "الترغيب والترهيب" 4/ 105، لكن وقع في إسناد المصنف هنا زيادة مقحمة، وهي ذكر والد عون بن محمد، وهو محمد بن علي بن أبي طالب: المعروف بابن الحنفية، فقد روى هذا الحديث جماعة من أصحاب محمد بن إسماعيل بن أبي فُديك فلم يذكروه، وروي بهذا الإسناد أيضًا غير ما حديث ليس فيها ذكر محمد بن علي بن أبي طالب، إنما يروي ذلك كله عونٌ عن أمه أم جعفر مباشرة، فثبت بذلك أنَّ ذكر محمد ابن الحنفية فيه مُقحم.وقد أخطأ المصنف رحمه الله في بيان رجال هذا الإسناد خطأً بيِّنًا من لدن محمد بن موسى إلى أسماء، فأما محمد بن موسى فهو ابن أبي عبد الله الفطري، وأما أمه أم جعفر فهي ابنة محمد بن جعفر بن أبي طالب، ويقال لها أيضًا: أم عون، وأما جدّتها أسماء فهي بنت عُميس زوج جعفر بن أبي طالب. ولم يتنبه لذلك الذهبي في "تلخيصه".وأخرجه الدُّولابي في "الذّرّية الطاهرة" (193) من طريق ضرار بن صُرَد، والطبراني في "الكبير" 22 / (1040) من طريق أحمد بن صالح المصري، والمصنف في "فضائل فاطمة" (220) من طريق جعفر بن مُسافر، ثلاثتهم عن محمد بن إسماعيل بن أبي فُديك، بهذا الإسناد.وقد وقع في رواية الطبراني تسمية شيخ ابن أبي فُديك: موسى بن يعقوب، وهو خطأ ممن دون أحمد بن صالح المصري الحافظ، فقد روى أحمد بن صالح بهذا الإسناد غير حديث سمى فيه هذا الرجل على الصواب.والشَّرَبة: الحوض الذي يكون في أصل النخلة.



[2] لم يُصِب المصنِّفُ رحمه الله في بيان أحد من هؤلاء الذين ذكرهم كما سبق بيانه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4831)


4831 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو جعفر محمد بن عبيد الله بن المُنادِي، حدثنا وهب بن جرير بن حازم، حدثنا أبي، حدثنا محمد بن عبد الله بن أبي يعقوب، عن عبد الله بن شداد بن الهادِ، عن أبيه، قال: خرج علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو حاملٌ أحد ابنيه، الحَسَنَ أو الحُسينَ، فتقدَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم فَوَضَعَه عند قدمه اليُمنى، فسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم سجدةً أطالها، قال أبي: فرفعتُ رأسي من بين الناس، فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم ساجدٌ، وإذا الغُلامُ راكبٌ على ظهره، فعُدْتُ فسجدتُ، فلما انصرف رسول الله صلى الله عليه وسلم قال الناسُ: يا رسول الله، لقد سجدت في صلاتك هذه سجدةً ما كنتَ تَسجُدُها، أفَشَيءٌ أُمرتَ به، أو كان يُوحَى إليك؟ قال: "كلُّ ذلك لم يكن، إن ابني ارتَحَلَني، فكرهتُ أن أُعجِلَه حتى يَقضي حاجته" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.




শাদ্দাদ ইবনুল হাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দুই নাতি—হাসান অথবা হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একজনকে বহন করে আমাদের সামনে এলেন। অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগিয়ে গেলেন এবং তাকে তাঁর ডান পায়ের কাছে নামিয়ে রাখলেন। এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি দীর্ঘ সিজদা করলেন।

(শাদ্দাদ ইবনুল হাদ) বলেন: আমি লোকদের মাঝখান থেকে মাথা উঠালাম, দেখলাম আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সিজদায় আছেন আর ছেলেটি তাঁর পিঠের উপর সওয়ার হয়ে আছে। তখন আমি আবার সিজদায় ফিরে গেলাম।

যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন, তখন লোকেরা বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আপনার এই সালাতে এমন একটি দীর্ঘ সিজদা করলেন যা আপনি সাধারণত করেন না। এটা কি এমন কোনো বিষয় ছিল যার জন্য আপনাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে, নাকি আপনার প্রতি ওহী নাযিল হয়েছিল?

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এর কোনোটাই হয়নি। আসলে আমার এই ছেলে আমাকে সওয়ারী হিসেবে ব্যবহার করছিল। তাই আমি অপছন্দ করলাম যে, তার প্রয়োজন পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত তাকে তাড়াহুড়ো করে উঠিয়ে দেই।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وسيأتي عند المصنف برقم (6776) من طريق يزيد بن هارون عن جرير بن حازم. وصح عن أبي هريرة قوله صلى الله عليه وسلم في الحسن بن عليّ: "اللهم إني أُحبُّه فأحِبَّه، وأحِبَّ من يُحِبُّه"، وسيأتي عند المصنف كذلك برقم (4847).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4832)


4832 - أخبرني حدثنا أبو جعفر محمد بن علي الشيباني بالكوفة، حدثني أبو الحسن محمد بن الحسن السَّبيعي، حدثنا أبو نُعيم الفضل بن دُكَين، حدثنا الأعمش، عن إبراهيم، عن أبي ظَبْيان، عن سلمان، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "الحَسنُ والحُسينُ ابناي من أحبهما أحبني، ومن أحبني أحبه الله، ومن أحبه الله أدخله الجنة، ومن أبغضَهُما أبغضني، ومن أبغضني أبغضه الله، ومن أبغضه الله أدخلَه النار" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه.




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “হাসান ও হুসাইন আমার দুই সন্তান। যে তাদের দুজনকে ভালোবাসবে, সে আমাকে ভালোবাসলো; আর যে আমাকে ভালোবাসলো, আল্লাহ তাকে ভালোবাসেন। আল্লাহ যাকে ভালোবাসেন, তিনি তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন। আর যে তাদের দুজনকে ঘৃণা করবে, সে আমাকে ঘৃণা করলো; আর যে আমাকে ঘৃণা করলো, আল্লাহ তাকে ঘৃণা করেন। আর আল্লাহ যাকে ঘৃণা করেন, তিনি তাকে জাহান্নামে প্রবেশ করাবেন।”




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ليس بالقوي من أجل أبي الحسن محمد بن الحسن السبيعي، فيغلب على الظن أنه ابن سماعة الحضرمي الكوفي المترجم في "تاريخ بغداد" 2/ 584، وهذا قد روى عنه غير واحد من الحفاظ، لكن قال الدارقطني فيه: ليس بالقوي. قلنا: وقد تفرد بهذا الحديث بهذا الإسناد.ورواه يحيى بن عبد الحميد الحِمّاني، عن قيس بن الربيع، عن محمد بن رستم، عن زاذان، عن سلمان الفارسي. وهذا كأنه أشبه، والله أعلم، فإن صح ذلك فإنَّ يحيى الحماني وقيس بن الربيع ليسا بالقويين، ومحمد بن رُستم - وهو أبو الصامت الضبي - غير معروف بعدالة أو جرح، وقد تفرد به أيضًا.أخرج حديث سلمان هذا أبو بكر النصيبي في "فوائده" (116)، والطبراني في "الكبير" (2655)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1797)، وفي "أخبار أصبهان" 1/ 56، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 14/ 155 - 156 من طرق عن يحيى بن عبد الحميد الحماني.وانظر حديث أبي هريرة التالي عند المصنف والآتي برقم (4855). وصح عن أبي هريرة قوله صلى الله عليه وسلم في الحسن بن عليّ: "اللهم إني أُحبُّه فأحِبَّه، وأحِبَّ من يُحِبُّه"، وسيأتي عند المصنف كذلك برقم (4847).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4833)


4833 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا ابن نُمير، حدثنا الحجاج بن دينار الواسطي، عن جعفر بن إياس، عن عبد الرحمن بن مسعود، عن أبي هريرة، قال: خرج علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعه الحسنُ والحسينُ، هذا على عاتقِه، وهذا على عاتقه، وهو يَلثَمُ هذا مرةً وهذا مرةً، حتى انتهى إلينا، فقال له رجلٌ: يا رسول الله، إنك تُحبهما؟! فقال: "مَن أحبّهما فقد أحبني، ومن أبغضهما فقد أبغضني" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট এলেন, তাঁর সাথে হাসান এবং হুসাইন ছিলেন। একজন তাঁর এক কাঁধে এবং আরেকজন তাঁর অন্য কাঁধে ছিলেন। তিনি একবার একে চুম্বন করছিলেন, আবার একবার ওকে চুম্বন করছিলেন, এভাবে তিনি আমাদের নিকট এসে পৌঁছালেন। তখন এক ব্যক্তি তাঁকে বললেন, হে আল্লাহর রাসূল, আপনি কি তাঁদের ভালোবাসেন?! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে তাঁদের ভালোবাসল, সে অবশ্যই আমাকে ভালোবাসল; আর যে তাঁদের ঘৃণা করল, সে অবশ্যই আমাকে ঘৃণা করল।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده محتمل للتحسين من أجل عبد الرحمن بن مسعود: وهو اليَشكُري كما نسبه أبو حاتم الرازي فيما نقله عنه ابنه في "الجرح والتعديل" 5/ 285، وكما قال ابن حبان أيضًا في "الثقات" 5/ 106، وذكرا أنه روى عنه أبو بشر جعفر بن إياس، واقتصرا عليه، وأنه يروى عن أبي هريرة وأبي سعيد الخدري، فهو تابعيٌّ لم يُؤثر فيه جرحٌ، وقد جاء ما يشهد لروايته، فهو محتمل للتحسين.وحديثه هذا في "مسند أحمد" 15/ (9673):وأخرج المرفوع منه أحمد (13 (7876) و (15 (9759)، والنسائي (8112) من طريق أبي الجحاف داود بن أبي عوف، عن أبي حازم سلمان الأشجعي، عن أبي هريرة. وإسناده قوي من أجل أبي الجحاف، وقد تابعه سالم بن أبي حفصة كما سيأتي عند المصنف برقم (4855)، وسالم لا بأس به كما قال أحمد وابن عدي وسيأتي عند المصنف برقم (4881) من طريق أبي الجحاف عن أبي حازم عن أبي هريرة، في الحسين بن علي وحده.قوله: يَلْثَم، أي: يُقبّل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4834)


4834 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان، حدثنا عبد الحميد بن عبد الرحمن الحِمّاني، حدثنا الحكم بن عبد الرحمن بن أبي نُعْم، عن أبيه، عن أبي سعيد الخدري، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "الحَسنُ والحُسينُ سيِّدا شبابِ أهل الجنة إِلَّا ابنَي الخالة" [1]هذا حديث قد صح من أوجهٍ كثيرةٍ، وأنا أتعجّب أنهما لم يخرجاه.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হাসান ও হুসাইন হলো জান্নাতবাসী যুবকদের সরদার, তবে খালাতো ভাইদের ব্যতীত।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح دون ذكر ابني الخالة يعني عيسى ابن مريم ويحيى بن زكريا كما سُمِّيا عند بعض من خرجه، وهذا إسناد حسنٌ من أجل الحكم بن عبد الرحمن بن أبي نعم، فهو مختلف فيه حسن الحديث. وقد تُوبع عليه دون الاستثناء المذكور.وأخرجه النسائي (8113) و (8475) من طريق مروان بن معاوية الفزاري، وابن حبان (6959) من طريق أبي نعيم الفضل بن دكين، كلاهما عن الحكم بن عبد الرحمن، به.وأخرجه أحمد 17 / (10999)، والنسائي (8472) من طريق يزيد بن مَرْدانبة، وأحمد 18 / (11594) و (11618) و (11777)، والترمذي (3768)، والنسائي (8461) و (8473) و (8474) من طريق يزيد بن أبي زياد الهاشمي مولاهم، كلاهما عن عبد الرحمن بن أبي نُعْم، عن أبي سعيد الخدري. وإسناد رواية ابن مَرْدانبة صحيح. لكن في إسناده عبد الرحمن بن زياد بن أنعُم، وهو ضعيف، واختلف عنه في إسناده، فمرةً رُوي عنه عن مسلم بن يسار مرسلًا، كما أخرجه ابن سعد 6/ 363.ورُوي كذلك من حديث ابن عمر كما سيأتي بعده، ولكن إسناده تالفٌ.ورُوي كذلك من حديث مالك بن الحويرث عند الطبراني في "الكبير" 19/ (650) وابن عدي 6/ 381، وفي إسناده حفيده مالك بن الحسن بن مالك بن الحويرث ذكره ابن حبان في "الثقات" واحتج به في "صحيحه"، لكنه غير مشهور كما قال البغوي في "معجم الصحابة" في ترجمة عتبة الفزاري، وقال العقيلي: فيه نظر، وقال ابن عدي: أظن البلاء فيه من مالك بن الحسن، فإنَّ هذا الإسناد بهذا الحديث لا يتابعه عليه أحد.وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4835)


4835 - حدثنا أبو سعيد عمرو بن محمد بن منصور العدل، حدثنا السَّرِي بن خُزَيمة، حدثنا عثمان بن سعيد المُرّي، حدثنا علي بن صالح، عن عاصم، عن زِرٍّ، عن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الحَسنُ والحُسينُ سيدا شباب أهل الجنة، وأبوهما خيرٌ منهما" [1]. هذا حديث صحيح بهذه الزيادة، ولم يخرجاه.وشاهدُه:




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল-হাসান এবং আল-হুসাইন হলো জান্নাতের যুবকদের সর্দার, আর তাদের পিতা তাদের উভয়ের চেয়ে উত্তম।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره دون قوله: "وأبوهما خير منهما"، وهذا إسنادٌ حسن من أجل عاصم: وهو ابن أبي النَّجُود، وقد اختلف عليه في تسمية صحابي الحديث، فسماه هنا عبد الله: وهو ابن مسعود، ورواه عنه أبو الأسود عبد الرحمن بن عامر عند الطبراني في "الكبير" (2608)، وابن شاهين في الخامس من "الأفراد" (89)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 11/ 498، وفي "المتشابه في الرسم" 2/ 752، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 34/ 447، فقال: عن عاصم، عن زِرِّ بن حبيش، عن حذيفة، فذكر حذيفة بن اليمان بدل عبد الله بن مسعود، وكذلك رواه المنهال بن عمرو فيما سيأتي عند المصنف برقم (5730) عن زرِّ بن حُبيش عن حذيفة، غير أنه لم يذكر في آخره عبارة: "وأبوهما خير منهما"، ومثل الاختلاف لا يضر، لأنَّ الحديث حيثما دار كان عن صحابي، وكلهم عدولٌ، وإن كان ذكرُ حذيفة فيه أشبه، فقد روى الشَّعْبي هذا الحديث عن حذيفة عند أحمد 38/ (23330) وغيره، دون الزيادة المشار إليها.وقد رُوي الحديث بهذه الزيادة من حديث قرة بن إياس المزني عند الطبراني في "الكبير" (2617) لكن في إسناده عبد الرحمن بن زياد بن أنعُم، وهو ضعيف، واختلف عنه في إسناده، فمرةً رُوي عنه عن مسلم بن يسار مرسلًا، كما أخرجه ابن سعد 6/ 363.ورُوي كذلك من حديث ابن عمر كما سيأتي بعده، ولكن إسناده تالفٌ.ورُوي كذلك من حديث مالك بن الحويرث عند الطبراني في "الكبير" 19/ (650) وابن عدي 6/ 381، وفي إسناده حفيده مالك بن الحسن بن مالك بن الحويرث ذكره ابن حبان في "الثقات" واحتج به في "صحيحه"، لكنه غير مشهور كما قال البغوي في "معجم الصحابة" في ترجمة عتبة الفزاري، وقال العقيلي: فيه نظر، وقال ابن عدي: أظن البلاء فيه من مالك بن الحسن، فإنَّ هذا الإسناد بهذا الحديث لا يتابعه عليه أحد.وانظر ما قبله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4836)


4836 - ما حدَّثَناه أبو الحسن محمد بن عبد الله بن محمد بن صُبيح العُمري، حدثنا محمد بن إسحاق بن خُزَيمة الإمام، حدثنا محمد بن موسى القطّان، حدثنا مُعلَّى بن عبد الرحمن، حدثنا ابن أبي ذئب، عن نافع، عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الحَسنُ والحُسينُ سيدا شباب أهل الجنة، وأبوهما خيرٌ منهما" [1].




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হাসান ও হুসাইন হলো জান্নাতের যুবকদের সর্দার, আর তাদের পিতা তাদের উভয়ের চেয়েও উত্তম।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالف بمرة من أجل معلى بن عبد الرحمن، فهو متروك كما قال الذهبي في "تلخيصه"، بل قد اتهمه بعضهم بوضع الحديث، ولا يعرف هذا من حديث ابن عمر إلا بروايته هذه ابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن.وأخرجه ابن ماجه (118) عن محمد بن موسى القطان الواسطي، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد 4 / (2112) و (2434)، وابن ماجه (3525)، والترمذي (2060)، والنسائي (7679) و (10778) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه البخاري (3371)، وأبو داود (4737)، والنسائي (10779)، وابن حبان (1013) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن منصور بن المعتمر، به.وأخرجه ابن حبان (1012) من طريق زيد بن أبي أُيسة، عن المنهال بن عمرو، به.الهامة: كل ذات سُمٍّ يَقتُل، وقد يقع على ما يَدِبُّ من الحيوان وإن لم يَقتُل.واللامة: العين التي تُصيب بسُوءٍ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4837)


4837 - حدثنا أحمد بن قانع بن مرزوق القاضي ببغداد، حدثنا أبو شعيب عبد الله بن الحسن الحَرّاني، حدثني أبي، حدثنا موسى بن أعين، حدثنا سفيان الثوري، عن منصور، عن المِنهال بن عمرو، عن سعيد بن جُبَير، عن ابن عباس، قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُعوِّذ الحَسنَ والحُسينَ: "أُعِيذُكُما بكلماتِ الله التامه من كل شيطانٍ وهامة، وكلِّ عَين لامَّة" ثم يقول: "هكذا كان يُعوِّذ إبراهيم ابنيه إسماعيل وإسحاق" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আল্লাহর আশ্রয় দিতেন (ঝাড়ফুঁক করতেন)। তিনি বলতেন: "আমি তোমাদের দু'জনকে আল্লাহর পরিপূর্ণ কালেমাসমূহের মাধ্যমে সকল শয়তান, বিষাক্ত কীট এবং সকল ক্ষতিকারক চোখের অনিষ্ট থেকে আশ্রয় দিচ্ছি।" অতঃপর তিনি বলতেন: "এভাবেই ইবরাহীম (আঃ) তাঁর দুই পুত্র ইসমাঈল ও ইসহাক (আঃ)-কে আল্লাহর আশ্রয় দিতেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. منصور: هو ابن المعتمر. وأخرجه أحمد 4 / (2112) و (2434)، وابن ماجه (3525)، والترمذي (2060)، والنسائي (7679) و (10778) من طرق عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه البخاري (3371)، وأبو داود (4737)، والنسائي (10779)، وابن حبان (1013) من طريق جرير بن عبد الحميد، عن منصور بن المعتمر، به.وأخرجه ابن حبان (1012) من طريق زيد بن أبي أُيسة، عن المنهال بن عمرو، به.الهامة: كل ذات سُمٍّ يَقتُل، وقد يقع على ما يَدِبُّ من الحيوان وإن لم يَقتُل.واللامة: العين التي تُصيب بسُوءٍ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4838)


4838 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني، حدثنا أحمد بن مهران، حدثنا عبيد الله بن موسى، أخبرنا كامل بن العلاء، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال: كنا نصلي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم العشاء، فكان يُصلِّي فإذا سجد وَثَبَ الحَسَنُ والحسينُ على ظهره، وإذا رفع رأسه أخذهما فوضعهما وَضعًا رفيقًا، فإذا عاد عادَ عادا، فلما صلّى جعل واحدًا هاهنا وواحدًا هاهنا، فجئته، فقلتُ: يا رسول الله، ألا أذهبُ بهما إلى أُمّهما؟ قال: "لا" فَبَرَقَتْ بَرْقةٌ، فقال: "الْحَقا بأُمِّكُما"، فما زالا يَمْشِيان في ضَوْئها حتى دَخَلا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ইশার সালাত আদায় করছিলাম। তিনি যখন সালাত আদায় করতেন, সিজদা করলে হাসান ও হুসাইন তাঁর পিঠের উপর উঠে যেতেন। যখন তিনি তাঁর মাথা তুলতেন, তখন তিনি তাদের উভয়কে ধরে নিতেন এবং অত্যন্ত নম্রতার সাথে (জমিনে) রাখতেন। যখন তিনি আবার সিজদায় যেতেন, তখন তারা পুনরায় (পিঠে) উঠে যেতেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন একজনকে এদিক এবং অন্যজনকে ওদিকে রাখলেন। আমি তাঁর কাছে এসে বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি কি তাদের দু’জনকে তাদের মায়ের কাছে পৌঁছে দেব না? তিনি বললেন, “না।” তখন একটি বিদ্যুৎ চমকালো। তিনি বললেন, “তোমরা তোমাদের মায়ের কাছে চলে যাও।” অতঃপর তারা উভয়ে সেই আলোর মধ্যে দিয়ে হাঁটতে থাকল যতক্ষণ না তারা (বাড়িতে) প্রবেশ করল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل كامل بن العلاء وأحمد بن مهران: وهو ابن خالد الأصبهاني. أبو صالح: هو ذكوان السمّان.وأخرجه أحمد 16 / (106589) عن أسود بن عامر وأبي المنذر إسماعيل بن عمر، و (10660) عن أبي أحمد محمد بن عبد الله الزُّبَيري، ثلاثتهم عن كامل بن العلاء، به.