আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
4839 - حدثنا أبو الحسن علي بن محمد الشَّيباني بالكوفة، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الزُّهري، حدثنا جعفر بن عَوْن، حدثنا يونس بن أبي إسحاق، عن أبيه، عن هانئ بن هانئ، عن عليّ، قال: لما أن وُلِدَ الحسنُ سمّيتُه حَرْبًا، فقال لي النبي صلى الله عليه وسلم: "ما سمَّيتَ ابني؟ " قلت: حَرْبًا، قال: "هو الحَسن"، فلما وُلِد الحُسين سمّيتُه حَرْبًا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "ما سميت ابني؟ " قلت: حَرْبًا، قال: "هو الحُسين"، فلما أن وُلِد مُحسِّن قال: "ما سمَّيتَ ابني؟ " قلت: حَرْبًا، قال: "هو مُحسن"، ثم قال النبي صلى الله عليه وسلم: "إني سميتُ بَني هؤلاء بتسمية هارون بنيهِ شَبَّرًا وشَبِيرًا ومُشَبِّرًا" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه. ومن فضائل الحسن بن علي بن أبي طالب رضي الله عنه وذكر مولده ومقتله
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জন্মগ্রহণ করলেন, আমি তার নাম রাখলাম ‘হারব’। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে বললেন, “আমার পুত্রের কী নাম রেখেছো?” আমি বললাম, ‘হারব’। তিনি বললেন, “সে হলো হাসান।” অতঃপর যখন হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জন্মগ্রহণ করলেন, আমি তার নাম রাখলাম ‘হারব’। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, “আমার পুত্রের কী নাম রেখেছো?” আমি বললাম, ‘হারব’। তিনি বললেন, “সে হলো হুসাইন।” অতঃপর যখন মুহসিন জন্মগ্রহণ করলেন, তিনি বললেন, “আমার পুত্রের কী নাম রেখেছো?” আমি বললাম, ‘হারব’। তিনি বললেন, “সে হলো মুহসিন।” এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, “আমি আমার এই সন্তানদের নাম হারূন (আঃ)-এর সন্তানদের নামানুসারে রেখেছি: শাব্বার, শাবীর ও মু শাব্বির।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث منكر كما تقدم بيانه برقم (4829).
4840 - أخبرنا أبو الحُسين محمد بن أحمد القَنْطَري ببغداد، حدثنا أبو قلابة، حدثنا أبو عاصم، حدثني عُمر بن سعيد بن أبي حسين، عن ابن أبي مُليكة، عن عُقبة بن الحارث: أنَّ أبا بكر الصِّدِّيق لَقِيَ الحسن بن علي فضمه إليه، وقال:بأبي شبيهٌ بالنبي ...... ليسَ شَبيهٌ [1] بعَلِيوعليٌّ يضحك [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين [3].
উকবাহ ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করলেন এবং তাঁকে নিজের কাছে টেনে নিলেন (আলিঙ্গন করলেন)। তিনি বললেন: আমার পিতা কুরবান হোন, ইনি তো নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ... আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ নন।
আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাসছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا وقع برفع "شبيه" على أنَّ "ليس" حرف عطف، وهو مذهبٌ كوفي. وفي بعض الروايات: ليس شبيهًا، على أنها خبر ليس.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد قوي من أجل أبي قلابة - وهو عبد الملك بن محمد الرقاشي - فهو صدوق لا بأس به، وقد توبع. أبو عاصم: هو الضحّاك بن مَخْلَد.وأخرجه البخاري (3542) عن أبي عاصم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (40) عن محمد بن عبد الله بن الزبير، والبخاري (3750) من طريق عبد الله بن المبارك، كلاهما عن عمر بن سعيد بن أبي حسين، به …
4840 [3] - زاد في (ص) و (ع): ولم يُخرجاه، وأُلحِق في (م) بخطٍّ مغاير مصححًا عليه.
4841 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الخضر بن أبان الهاشمي، حدثنا أزهرُ بن سعد السَّمّان، حدثنا ابن عَون، عن محمد، عن أبي هريرة، قال [1]: لقي الحسن بن عليّ، فقال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قَبل بطنك، فاكشِف الموضعَ الذي قبل رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى أُقبله، قال: فكشف له الحَسنُ فقبَّلَه [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি তোমার পেটে চুম্বন করেছেন। সুতরাং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেখানে চুম্বন করেছিলেন, তুমি সেই স্থানটি উন্মুক্ত করো, যাতে আমি সেখানে চুম্বন করতে পারি। তিনি বললেন, তখন হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জন্য সেই স্থান উন্মুক্ত করলেন এবং তিনি তাতে চুম্বন করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] الضمير في "قال" يعود إلى محمد، وهو ابن سيرين والضمير في "لقي" يعود إلى أبي هريرة.
[2] خبر محتمل للتحسين إن شاء الله، وهذا إسناد ضعيف لضعف الخضر بن أبان الهاشمي، لكن تابعه سعيد بن محمد بن ثواب البصري، وهذا روى عنه جمع ولم يؤثر فيه جرح أو تعديل، وقد خالفهما من هو أوثقُ منهما وأجلُّ وهو الإمام الحافظ يحيى بن يحيى النيسابوري، فرواه عن أزهر بن سعد السمّان عن ابن عون - وهو عبد الله بن عون بن أرطبان - عن عُمير بن إسحاق عن أبي هريرة، فذكر عُمير بن إسحاق بدل محمدٍ - وظاهره أنه ابن سيرين - وكذلك رواه عن ابن عون جماعةٌ من الحفّاظ كلهم يذكر فيه عمير بن إسحاق بدل محمد، ولهذا قال الدارقطني في "العلل" (1852): هو أشبه بالصواب.قلنا: وقد رواه عن ابن عون أيضًا حماد بن سلمة، واختُلف عليه، فرواه عنه أبو سلمة موسى بن إسماعيل التبوذكي ورَوح بن أسلم وإبراهيم بن الحجاج فذكروا فيه محمدًا، ورواه عنه آدم بن أبي إياس وحجاج بن منهال، فذكرا فيه أبا محمد، وهي كنية عُمير بن إسحاق كما قال البيهقي 2/ 232، فهذا هو الصواب قطعًا لموافقته رواية الحُفّاظ عن ابن عون. وإذا ثبت ذلك فعُمير بن إسحاق حديثه من باب الحسن إن شاء الله.وأخرجه ابن شاهين في الخامس من "الأفراد" (38)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 10/ 135 من طريق سعيد بن محمد بن ثواب، عن أزهر بن سعد، به.وأخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 2/ 232 من طريق يحيى بن يحيى النيسابوري، عن أزهر السمّان، عن ابن عون عن عمير بن إسحاق، عن أبي هريرة.وأخرجه أحمد 12 / (7462) و 16 / (10398) عن محمد بن أبي عدي، و 15/ (9510) و 16 / (10326) عن إسماعيل ابن عُليّة، وابن حبان (5593) و (6965) من طريق شريك بن عبد الله النَّخَعي، ثلاثتهم عن عبد الله بن عون، عن عُمير بن إسحاق، عن أبي هريرة.وكذلك رواه عن ابن عون جماعةٌ آخرون من الحفاظ ذكرهم الدارقطني في "العلل"، منهم ابن المبارك وأبو عاصم النبيل.
4842 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا وكيع، عن إسماعيل بن أبي خالد، قال: سمعت وَهْبًا أبا جُحيفة يقول: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وكان الحَسنُ بن عليٍّ يُشبهه [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه!وله شاهدٌ صحيحٌ:
ওহাব আবূ জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি এবং হাসান ইবনু আলী তাঁর সদৃশ ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وكيع: هو ابن الجرّاح الرؤاسي.وأخرجه أحمد 31/ (18745) و (18748)، والبخاري (3543) و (3544)، ومسلم (2343)، والترمذي (2826) و (2827) و (3777)، والنسائي (8106) من طرق عن إسماعيل بن أبي خالد، عن أبي جحيفة. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه. عدد الحجات التي حجّها كما سيأتي بيانه، والله أعلم.وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (839) عن محمد بن إسحاق الصيني، عن يعلى بن عُبيد، به.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 410، وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (407) عن أحمد بن محمد القطان، كلاهما (ابن سعد والقطان) عن يعلى بن عبيد، به بذكر الحسين بن علي، بدل أخيه الحسن. وقد أورداه في ترجمة الحسين.وأخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 4/ 331، وابن عساكر 13/ 242 من طريق زهير بن معاوية، عن عُبيد الله بن الوليد الوصافي، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن ابن عباس، وذكر الحسن بن عليّ، وجعله من قول ابن عباس.وأخرج ابن عساكر 14/ 180 عن مصعب بن عبد الله الزبيري، قال: حجّ الحُسين خمسًا وعشرين حجّة ماشيًا. فذكر الحسين بدل أخيه الحسن.وأخرج ابن سعد 6/ 410، وابن حبان في "روضة العقلاء" ص 62، وابن عساكر 14/ 180 من طريق محمد بن علي الباقر، قال: حجّ الحُسين بن علي عشر حجج ماشيًا ونُجُبُه تقاد إلى جنبه. ولم يذكر ابن سعد ومن طريقه ابن عساكر في روايته عدد الحجج. ومحمد بن علي الباقر أعلم الناس بشأن أهل بيته إذا الحُسين جدُّه، فقوله في هذا هو العمدة.
4843 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا يزيد بن عبد الصمد الدمشقي، حدثنا نُعيم بن حمّاد، حدثنا عبد الله بن المبارك، أخبرنا معمر، عن الزُّهْري، عن أنس بن مالك، قال: لم يكن في ولدِ عليٍّ أشبه برسول الله صلى الله عليه وسلم من الحَسن [1].
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সন্তানদের মধ্যে হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ আর কেউ ছিলেন না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل نُعيم بن حماد، وقد توبع. معمر: هو ابن راشد، والزُّهري: هو محمد بن مسلم بن عبيد الله.وأخرجه أحمد 20 / (12674)، والترمذي (3776)، وابن حبان (6973) من طريق عبد الرزاق، وأحمد (13054) عن عبد الأعلى بن عبد الأعلى، والبخاري (3752) من طريق هشام بن يوسف الصنعاني ثلاثتهم عن معمر بن راشد، به. عدد الحجات التي حجّها كما سيأتي بيانه، والله أعلم.وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (839) عن محمد بن إسحاق الصيني، عن يعلى بن عُبيد، به.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 410، وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (407) عن أحمد بن محمد القطان، كلاهما (ابن سعد والقطان) عن يعلى بن عبيد، به بذكر الحسين بن علي، بدل أخيه الحسن. وقد أورداه في ترجمة الحسين.وأخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 4/ 331، وابن عساكر 13/ 242 من طريق زهير بن معاوية، عن عُبيد الله بن الوليد الوصافي، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن ابن عباس، وذكر الحسن بن عليّ، وجعله من قول ابن عباس.وأخرج ابن عساكر 14/ 180 عن مصعب بن عبد الله الزبيري، قال: حجّ الحُسين خمسًا وعشرين حجّة ماشيًا. فذكر الحسين بدل أخيه الحسن.وأخرج ابن سعد 6/ 410، وابن حبان في "روضة العقلاء" ص 62، وابن عساكر 14/ 180 من طريق محمد بن علي الباقر، قال: حجّ الحُسين بن علي عشر حجج ماشيًا ونُجُبُه تقاد إلى جنبه. ولم يذكر ابن سعد ومن طريقه ابن عساكر في روايته عدد الحجج. ومحمد بن علي الباقر أعلم الناس بشأن أهل بيته إذا الحُسين جدُّه، فقوله في هذا هو العمدة.
4844 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا محمد بن عبد الوهاب، أخبرنا يعلى بن عُبيد، حدثنا عبيد الله بن الوليد، عن عبد الله بن عُبيد بن عمير قال: لقد حَجَّ الحسن بن علي خمسًا وعشرين حَجّةً ماشيًا، وإنَّ النَّجائب لَتُقادُ معه [1].
আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইদ ইবনে উমায়র থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পঁচিশটি হজ্ব পায়ে হেঁটে সম্পন্ন করেছিলেন, অথচ তাঁর সাথে উন্নতমানের বাহনসমূহ টেনে নিয়ে যাওয়া হতো।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لكن من رواية عبد الله بن أبي نجيح، وأما رواية عبيد الله بن الوليد - وهو الوصافي - عن عبد الله بن عُبيد بن عُمير فاختلف فيها في تسمية الذي حج ماشيًا خمسًا وعشرين حجة، فبعض من خرَّج هذا الخبر ذكر الحسين بن علي، بدل أخيه الحسن، وبعضهم رواه عن الوصافي، عن ابن عُمير عن ابن عبّاس، فجعله من قول ابن عبّاس. ومردُّ هذا الاختلاف كلّه إلى عبيد الله الوصافي فهو ضعيف باتفاق، والظاهر أنَّ ذكر الحسين هو الأشبه، مع الاختلاف في عدد الحجات التي حجّها كما سيأتي بيانه، والله أعلم.وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (839) عن محمد بن إسحاق الصيني، عن يعلى بن عُبيد، به.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 410، وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (407) عن أحمد بن محمد القطان، كلاهما (ابن سعد والقطان) عن يعلى بن عبيد، به بذكر الحسين بن علي، بدل أخيه الحسن. وقد أورداه في ترجمة الحسين.وأخرجه البيهقي في "سننه الكبرى" 4/ 331، وابن عساكر 13/ 242 من طريق زهير بن معاوية، عن عُبيد الله بن الوليد الوصافي، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن ابن عباس، وذكر الحسن بن عليّ، وجعله من قول ابن عباس.وأخرج ابن عساكر 14/ 180 عن مصعب بن عبد الله الزبيري، قال: حجّ الحُسين خمسًا وعشرين حجّة ماشيًا. فذكر الحسين بدل أخيه الحسن.وأخرج ابن سعد 6/ 410، وابن حبان في "روضة العقلاء" ص 62، وابن عساكر 14/ 180 من طريق محمد بن علي الباقر، قال: حجّ الحُسين بن علي عشر حجج ماشيًا ونُجُبُه تقاد إلى جنبه. ولم يذكر ابن سعد ومن طريقه ابن عساكر في روايته عدد الحجج. ومحمد بن علي الباقر أعلم الناس بشأن أهل بيته إذا الحُسين جدُّه، فقوله في هذا هو العمدة.
4845 - أخبرنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى المُزكِّي، أخبرنا محمد بن إسحاق الثقفي، حدثنا أبو الأشعث، حدثنا زهير بن العلاء، حدثنا سعيد بن أبي عَروبة، عن قتادة، قال: وَلَدَتْ فاطمة حسنًا بعد أُحُدٍ بسنتين، وكان بين وَقْعة أُحد وبين قُدوم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة سنتان وستة أشهرٍ ونصفٌ، فولدت الحَسنَ لأربع سنين وستة أشهرٍ ونصفٍ من التاريخ [1].
কাতাদাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ওহুদের যুদ্ধের দুই বছর পর হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জন্ম দেন। আর উহুদ যুদ্ধ এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মদীনায় আগমনের (হিজরতের) মাঝে ব্যবধান ছিল দুই বছর, ছয় মাস এবং অর্ধ মাস। সুতরাং, ইতিহাসের (বা হিজরতের) চার বছর, ছয় মাস এবং অর্ধ মাস পর তিনি হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জন্ম দেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذه الرواية فيها لين من أجل زهير بن العلاء، وأخرجها أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1755)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 13/ 168 و 14/ 116 عن أبي حامد أحمد بن محمد بن جبلة النيسابوري، عن محمد بن إسحاق الثقفي - وهو السراج - به.وهذا خلاف قول أكثر أهل السير الذين جزموا بولادة الحسن في السنة الثالثة من الهجرة، ومنهم محمد بن عمر الواقدي وخليفة بن خيّاط وأحمد بن عبد الله بن عبد الرحيم البرقي، انظر أقوالهم في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 13/ 167 و 168.
4846 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل الشَّعراني، حدثنا جدِّي، حدثنا إبراهيم بن المُنذر، حدثني ابن واقد، قال: توفي أبو محمد الحسن بن علي بن أبي طالب في ربيع الأول سنة تسع وأربعين، وصلى عليه سعيد بن العاص [1].
ইবনু ওয়াকিদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ মুহাম্মাদ আল-হাসান ইবনু আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উনপঞ্চাশ সনে রবীউল আউয়াল মাসে ইন্তিকাল করেন এবং সাঈদ ইবনুল আস তাঁর জানাযার সালাত পড়ান।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذا أسنده ابن واقد - وهو محمد بن عمر الواقدي - عن عبد الرحمن بن أبي الزِّناد عن أبيه، كما أخرجه عنه ابن سعد في "طبقاته" 6/ 398، ووافقه على ذلك يحيى بن بُكير عند الطبراني في "الكبير" (2556) ومحمد بن عبد الله بن نمير عند الطبراني أيضًا (2695)، وعمرو بن علي الفلّاس عند أبي نعيم في "المعرفة" (1758) وابن عساكر 13/ 300، وخليفة بن خياط في "طبقاته" ص 230، والزبير بن بكار عند ابن عساكر 13/ 31، وغيرهم. كلهم قالوا: توفي سنة تسع وأربعين.وخالفهم غيرهم، فقال بعضهم: سنة خمسين، كما سيأتي برقم (4864)، وبعضهم قال: سنة إحدى وخمسين، وقيل: سنة أربع وأربعين، وقيل: سنة ثمان وخمسين. انظر أقاويلهم في ذلك في "تاريخ بغداد" للخطيب 1/ 470، و "تاريخ دمشق" لابن عساكر 13/ 173 و 300 - 302. وانظر ما تقدم برقم (4832) و (4833)، وما سيأتي برقم (4883).
4847 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفان، حدثنا أبو يحيى الحِمّاني، حدثنا سفيان، عن نُعيم بن أبي هند، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، قال: لا أزال أحِبُّ هذا الرجل بعدما رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يصنع ما يصنعُ، رأيتُ الحَسنَ في حَجْر النبي صلى الله عليه وسلم وهو يُدخل أصابعه في لحية النبي صلى الله عليه وسلم، والنبي صلى الله عليه وسلم يُدخِل لسانَه في فمِه، ثم قال: "اللهم إني أُحِبُّه فأَحِبَّه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তার প্রতি যেরূপ আচরণ করতে দেখেছি, এরপর থেকে আমি এই লোকটিকে (হাসানকে) সর্বদা ভালোবাসি। আমি হাসানকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোলে দেখেছিলাম এবং তিনি তাঁর আঙুলগুলো নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দাড়িতে প্রবেশ করাচ্ছিলেন। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জিহ্বা তার (হাসানের) মুখে প্রবেশ করাচ্ছিলেন। অতঃপর তিনি (নবী) বললেন: "হে আল্লাহ! আমি তাকে ভালোবাসি, সুতরাং তুমিও তাকে ভালোবাসো।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل أبي يحيى الحماني: وهو عبد الحميد بن عبد الرحمن. سفيان: هو الثوري.وأخرجه ابن الأعرابي في "معجمه" (1365)، والإسماعيلي في "معجمه" (82)، وابن المقرئ في "معجمه" (658)، وابن عساكر 13/ 194 من طرق عن الحسن بن علي بن عفان، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 16 / (10891) وغيره من طريق هشام بن سعد، عن نُعيم بن عبد الله المُجمر، عن أبي هريرة. وهشام حسن الحديث في المتابعات والشواهد.وأخرجه بنحوه أحمد 12 / (7398) و 14 / (8380)، والبخاري (5884)، ومسلم (2421)، وابن ماجه (142)، والنسائي (8108)، وابن حبان (6963) من طريق نافع بن جُبير بن مُطعم، عن أبي هريرة. وبعضهم اقتصر على آخره المرفوع. وانظر ما تقدم برقم (4832) و (4833)، وما سيأتي برقم (4883).
4848 - أخبرنا الحسن بن يعقوب العَدْل، حدثنا يحيى بن أبي طالب، حدثنا محمد بن صالح المديني، حدثنا مُسلم بن أبي مريم، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، قال: كنا مع أبي هريرة فجاء الحسنُ بن علي بن أبي طالب فسلَّم، فرَدَدْنا عليه السلام، ولم يَعلَّم به أبو هريرة، فقلنا له: يا أبا هريرة، هذا الحسن بن عليٍّ قد سلَّم علينا، فلَحِقه، وقال: وعليك السلامُ يا سيدي، ثم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنه سيدٌ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনু আবি সাঈদ মাকবুরী বলেন: আমরা আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। তখন হাসান ইবনু আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে সালাম দিলেন। আমরা তাঁর সালামের উত্তর দিলাম, কিন্তু আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা জানতে পারেননি। আমরা তাঁকে বললাম: হে আবু হুরায়রা! ইনি হাসান ইবনু আলী, তিনি আমাদের প্রতি সালাম দিয়েছেন। তখন তিনি (আবু হুরায়রা) তাঁর (হাসান রাঃ-এর) কাছে গেলেন এবং বললেন: ওয়া আলাইকাস সালাম, হে আমার সাইয়িদ (সর্দার)। অতঃপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই সে একজন সাইয়িদ (নেতা/সর্দার)।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف من أجل محمد بن صالح المديني - وهو ابن قيس الأزرق، وليس بابن دينار التمار، وإن كان كلاهما وصف بالتمار فقد قال عنه أبو حاتم الرازي: شيخ، وقال الدارقطني: متروك، واختلف فيه قول ابن حبان، فأورده في "الثقات"، وكذلك أورده في "المجروحين" وقال فيه: شيخ يروي المناكير عن المشاهير لا يجوز الاحتجاج بخبره إذا انفرد.وأخرجه النسائي (10008) عن أحمد بن حرب الموصلي، عن زيد بن الحباب، عن محمد بن صالح الأزرق، بهذا الإسناد.وقد قد صحَّ قول النبي صلى الله عليه وسلم للحسن بن عليّ بأنه سيّد في حديث أبي بكرة الثقفي الذي سيأتي عند المصنف برقم (4869)، وهو عند البخاري في "صحيحه" (2704). وأخرجه أحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (1356) عن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد.وفي الباب حديث عائشة الذي أخرجه أحمد 40 / (24291)، والبخاري (5998)، ومسلم (2317) وغيرهم، إلّا أنه جاء في حديثها: أنَّ الرجل كان أعرابيًا، وهذا أليقُ من أن يكون من الأنصار كما وقع في حديث الزبير بن العوام هنا.ويشهد له حديث أبي هريرة الذي أخرجه أحمد 12 / (7121)، والبخاري (5997)، ومسلم (2318)، وسمّى الأعرابي الأقرع بن قيس التميمي.
4849 - أخبرنا بكر بن محمد الصيرفي بمَرُو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل، حدثنا عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا حَيوة بن شُرَيح، أخبرني أبو صخر، أنَّ يزيد بن عبد الله بن قُسَيط أخبره، أنَّ عُروة بن الزبير أخبره عن أبيه: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قَبَّل حَسنًا وضمَّه إليه، وجعل يَشَمُّه، وعنده رجلٌ من الأنصار، فقال الأنصاريُّ: إِنَّ لي ابنًا قد بَلَغَ، ما قبلته قطُّ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أرأيت إن كان الله نَزَعَ الرحمةَ مِن قلبك فما ذنبي" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাসানকে চুম্বন করলেন, তাঁকে নিজের সাথে জড়িয়ে ধরলেন এবং তাঁর সুবাস নিতে লাগলেন। তখন তাঁর কাছে আনসারদের এক ব্যক্তি উপস্থিত ছিলেন। ঐ আনসারী ব্যক্তি বললেন: আমার একটি পুত্র আছে, সে বড় হয়েছে, আমি কখনও তাকে চুম্বন করিনি। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যদি আল্লাহ তোমার অন্তর থেকে দয়া (রহমত) ছিনিয়ে নিয়ে থাকেন, তবে এতে আমার কী দোষ?"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل أبي صخر: وهو حُميد بن زياد. وأخرجه أحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (1356) عن عبد الله بن يزيد المقرئ، بهذا الإسناد.وفي الباب حديث عائشة الذي أخرجه أحمد 40 / (24291)، والبخاري (5998)، ومسلم (2317) وغيرهم، إلّا أنه جاء في حديثها: أنَّ الرجل كان أعرابيًا، وهذا أليقُ من أن يكون من الأنصار كما وقع في حديث الزبير بن العوام هنا.ويشهد له حديث أبي هريرة الذي أخرجه أحمد 12 / (7121)، والبخاري (5997)، ومسلم (2318)، وسمّى الأعرابي الأقرع بن قيس التميمي.
4850 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفان العامِري، حدثنا أبو سعيد عمرو بن محمد العَنْقَزي، حدثنا زَمْعة بن صالح، عن سَلَمة بن وَهْرام، عن طاووس، عن ابن عباس، قال: أقبل النبي صلى الله عليه وسلم وهو يحمل الحسن بن عليٍّ على رقبته، قال: فلقيَه رجلٌ فقال: نِعمَ المَركَبُ رَكِبتَ يا غلام، قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ونعم الراكب هو" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসছিলেন, তখন তিনি হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর কাঁধের ওপর বহন করছিলেন। তিনি বলেন, তখন এক ব্যক্তি তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করে বললেন: "হে বালক, তুমি কতই না উত্তম সওয়ারীতে আরোহণ করেছ!" তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আর সে (হাসান) নিজেও কতই না উত্তম আরোহী!"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسنٌ لغيره، وهذا إسنادٌ لين من أجل زَمْعة بن صالح، فإنه ضعيف، وقد انفرد به من هذا الوجه كما أشار إليه الترمذي واختُلف عنه في تسمية التابعي، فسماه هنا في رواية أبي سعيد عمرو بن محمد العَنْقَزي عنه طاووسًا. - وهو ابن كيسان اليماني - ورواه عنه أبو عامر العقدي فسماه عكرمة. وهذا يدلُّ على عدم ضبط زمعة لإسناده.وأخرجه الترمذي (3784) من طريق أبي عامر العقدي، عن زَمعة بن صالح، عن سلمة بن وهرام، عن عكرمة، عن ابن عبّاس. وقال الترمذي: هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه، وزمعة بن صالح قد ضعفه بعضُ أهل الحديث من قبل حفظه.ويشهد له حديث البراء بن عازب عند الطبراني في "الأوسط" (3987) بإسناد حَسَنٍ كما قال الهيثمي في "مجمع الزوائد" 9/ 182.ويشهد له أيضًا حديث عمر بن الخطاب عند البزار (293)، وابن عدي في "الكامل" 2/ 362، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 14/ 162. وإسناده ضعيف لضعف أحد رواته، وهو محمد بن عبيد الله بن أبي رافع.وله شاهد كذلك مرسلٌ عن أبي جعفر محمد بن علي الباقر عند ابن أبي شيبة 12/ 102. غير أن راويه عنه جابر بن يزيد الجُعفي وهو ضعيف أيضًا.
4851 - أخبرني أبو الحسن محمد بن عبد الله العُمري، حدثنا محمد بن إسحاق الإمام، حدثنا أبو موسى، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، قال: سمعت يزيد بن خُمَير يحدِّث أنه سمع عبد الرحمن بن جُبير بن نُفير يحدّث عن أبيه، قال: قلتُ للحسن بن عليّ: إنَّ الناس يقولون: إنك تريد الخلافة، فقال: قد كان جَماجِمُ العرب في يدي يُحاربون من حاربتُ، ويُسالمون من سالمتُ، تركتها ابتغاء وجه الله تعالى وحَقْنِ دماء أمةٍ محمدٍ صلى الله عليه وسلم، ثم أبتَزُّها بأتياس أهل الحجاز؟! [1]هذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (একদা তাঁকে) বলা হলো: লোকেরা বলছে আপনি খিলাফত চান। তিনি বললেন: আরবের সমস্ত নেতৃবৃন্দ আমার হাতেই ছিল। আমি যার সাথে যুদ্ধ করতাম, তারা তার সাথে যুদ্ধ করত; আর আমি যার সাথে শান্তি স্থাপন করতাম, তারা তার সাথে শান্তি স্থাপন করত। আমি মহান আল্লাহর সন্তুষ্টি লাভের উদ্দেশ্যে এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতের রক্তপাত বন্ধ করার জন্য তা (খিলাফত) ছেড়ে দিয়েছি। এরপরও কি আমি হিজাজবাসীদের নগণ্য বা অযোগ্য লোকদের দ্বারা তা (পুনরায়) ছিনিয়ে নেব?!
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي. أبو موسى هو محمد بن المثنى العنزي.وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء" 2/ 36 من طريق أحمد بن حنبل، عن محمد بن جعفر، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 380، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 3/ 291 - 292، وبحشل في "تاريخ واسط" ص 112، وابن أبي حاتم في "العلل" (2575)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (2797)، وابن عساكر 13/ 280 و 281 من طرق عن أبي داود الطيالسي، والدولابي في "الذرية الطاهرة" (110) من طريق عثمان بن جَبَلة، كلاهما عن شعبة، به.
4852 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله بن عَمْرَويهِ الصَّفّار ببغداد، حدثنا أحمد بن زُهير بن حَرْب، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا القاسم بن الفضل الحُداني.وأخبرني أبو الحسن العُمري [1]، حدثنا محمد بن إسحاق الإمام، حدثنا أبو طالب زيد بن أخْزم الطائي، حدثنا أبو داود، حدثنا القاسم بن الفضل، حدثنا يوسف بن مازن الراسبي، قال: قام رجلٌ إلى الحسن بن علي فقال: يا مُسوِّدَ وجوه المؤمنين، فقال الحسنُ: لا تُؤنِّبْني رحمك الله، فإنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قد رأى بني أُميّة يَخطبون على مِنبَرِه رجلًا رجلًا، فساءه ذلك، فنزلت: {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ (1)} [الكوثر: 1]، نهرٌ في الجنة، ونزلت: {إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ (1) وَمَا أَدْرَاكَ مَا لَيْلَةُ الْقَدْرِ (2) لَيْلَةُ الْقَدْرِ خَيْرٌ مِنْ أَلْفِ شَهْرٍ}، يَملِكُه [2] بنو أُميّة، فحَسَبْنا ذلك، فإذا هو لا يزيد ولا يَنقُصُ [3]. هذا إسناد صحيح، وهذا القائل للحسن بن علي هذا القول هو سفيان بن الليل صاحبُ أبيه.
হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বলল: হে মু'মিনদের মুখমণ্ডল কালিমামুক্তকারী! তখন হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ্ তোমার প্রতি দয়া করুন, আমাকে ভর্ৎসনা করো না। কারণ, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনী উমাইয়াকে তাঁর মিম্বরের ওপর একজন একজন করে ভাষণ দিতে দেখেছেন, আর তা তাঁকে ব্যথিত করেছে। তখন নাযিল হলো: {নিঃসন্দেহে আমি আপনাকে কাওসার দান করেছি।} [সূরা কাউসার: ১], (যা) জান্নাতের একটি নহর। এবং নাযিল হলো: {নিশ্চয় আমি এ কুরআনকে লাইলাতুল কদরে অবতীর্ণ করেছি। আপনি কি জানেন, লাইলাতুল কদর কী? লাইলাতুল কদর এক হাজার মাস অপেক্ষা উত্তম।} বনী উমাইয়ারা এই (হাজার মাসের) সময়কাল রাজত্ব করবে। আমরা তা গণনা করে দেখলাম যে তা এক চুলও কম বা বেশি নয়।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: أبو الحسين اليعمري، وإنما هو أبو الحسن العمري الذي تقدم في الحديث السابق على الصواب، وهو محمد بن عبد الله بن محمد بن صُبيح العُمري، نُسب بذلك لأنه من ولد عمر بن الخطاب، كما بيَّنه الحاكم في "تاريخ نيسابور" - كما في "تلخيصه" للخليفة النيسابوري ص 66 - في ترجمة عبد الله بن محمد والد المذكور. وجاء على الصواب في رواية البيهقي في "شعب الإيمان" (3396) وفي "دلائل النبوة" 6/ 509 - 510 عن أبي عبد الله الحاكم.
[2] تحرَّف في المطبوع إلى: تملكها. والضمير مذكر يعود على المنبر. وأخرجه الترمذي (3350) عن محمود بن غيلان، عن أبي داود الطيالسي، بهذا الإسناد. وقال: هذا حديث غريب لا نعرفه إلّا من هذا الوجه.وسيأتي برقم (4871) من طريق قراد أبو نوح عن القاسم بن الفضل عن يوسف بن مازن.
4852 [3] - خبر منكر، وقد اختلف في هذا الإسناد على القاسم بن الفضل في تعيين شيخه، فوقع هنا عند المصنف وعند أكثر من خرَّج هذا الخبر أنه يوسف بن مازن الراسبي، وعند الترمذي (3350) أنه يوسف بن سعد الجُمحي مولاهم، وهذا ثقة، لكن الظاهر أن شيخ القاسم في خبر رؤيا بني أمية إنما هو يوسف بن مازن، وبعضهم عدَّ يوسف بن سعد هو نفسه يوسف بن مازن كما يدل عليه صنيع المزيّ، وفرّق بينهما البخاري في "تاريخه الكبير" 8/ 373 و 374 إذ ترجم للرجلين، وتبعه ابن أبي حاتم، وقال ابن حجر في "التهذيب": لا يلزم من اشتراكهما في رواية القاسم بن الفضل عن كل منهما وفي كونهما بصريين أن يكونا واحدًا.ويوسف بن مازن هذا في إدراكه قصة الحسن بن علي ومعاوية نظر، وإن وقع في رواية الطبري في "تفسيره" 30/ 210 أنه هو الذي اعترض على الحسن بن علي، وهذا يخالف سائر الروايات، وقد جزم ابن أبي حاتم نقلًا عن أبيه بأن روايته عن علي بن أبي طالب مرسلة، وهذا يعني عدم إدراكه للقصة التي جرت بين الحسن بن علي وبين معاوية من الصلح، لأنَّ ذلك وقع إبان وفاة عليٍّ، ولهذا جزم الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 3/ 272 بأنَّ فيه انقطاعًا، وقال ابن كثير في "البداية والنهاية" 9/ 272: في شهود يوسف بن مازن قضية الحسن ومعاوية نظر، وقد يكون أرسلها عمّن لا يُعتمد عليه، والله أعلم، وقد سألت شيخنا أبا الحجاج المزي رحمه الله عن هذا الحديث، فقال: هو حديث منكر.وذكر ابن كثير في "تفسيره" 8/ 463 ما يدل على نكارة ترتيب نزول سورة القدر على قصة الرؤيا التي أُريها رسول الله صلى الله عليه وسلم ولاية بني أمية من حيث مخالفة ما جاء هنا في الرواية من ذكر الألف شهر مع الواقع التاريخي للمدّة التي مكثها بنو أمية في الحكم بأنَّ بني أمية مكثوا في الحكم زيادة على الألف شهر. وأخرجه الترمذي (3350) عن محمود بن غيلان، عن أبي داود الطيالسي، بهذا الإسناد. وقال: هذا حديث غريب لا نعرفه إلّا من هذا الوجه.وسيأتي برقم (4871) من طريق قراد أبو نوح عن القاسم بن الفضل عن يوسف بن مازن.
4853 - حدَّثَناه أبو أحمد بكر بن محمد الصيرفي بمَرُو، حدثنا عبد الصمد بن الفضل، حدثنا مَكِّي بن إبراهيم، حدثنا السَّرِيّ بن إسماعيل البجلي، عن الشَّعْبي، عن سفيان بن الليل الهَمْداني، قال: أتيتُ الحسن بن علي حين بايع معاوية، فقلت: يا مُسوِّدَ وجوه المؤمنين، ثم ذكره بنحوه [1].
সুফইয়ান ইবনুল লাইল আল-হামদানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি হাসান ইবন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আসলাম যখন তিনি মু'আবিয়ার হাতে বাইআত করলেন, তখন আমি বললাম: হে মুমিনদের চেহারা কালোকারী! এরপর তিনি অনুরূপ বর্ণনা করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالفٌ بمرَّةٍ من أجل السَّري بن إسماعيل، فهو واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه". وسيأتي بعده من وجه آخر تالفٍ أيضًا، لكنه سيأتي برقم (4872) من وجه ثالث خير من هذين الوجهين.وتمام رواية السري: قال الحسن: لا تقُل ذلك، فإني سمعت أبي يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا تذهب الليالي والأيام حتى يجتمع أمر هذه الأمة على رجل واسع السُّرم، ضخم البُلعُم، يأكل ولا يشبع" وهو معاوية، فعلمتُ أنَّ أمر الله واقع، وخِفْتُ أن تجري بيني وبينه الدماء، والله ما يسرُّني بعد إذ سمعت هذا الحديث أنَّ لي الدنيا وما طلعت عليه الشمس والقمر، وأني لقيتُ الله تعالى بمحجمة دم امرئ مسلم ظلمًا. هكذا ذكره بطوله نعيم بن حماد.وأخرجه أبو الفرج الأصبهاني في "مقاتل الطالبيين" ص 67 من طريق محمد بن عمرويه، عن مكي بن إبراهيم، به.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (422)، ومن طريقه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" بإثر (2197)، والعُقيلي في "الضعفاء" (645)، وأبو منصور الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" للحافظ ابن حجر (2925)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 59/ 151 عن محمد بن فضيل، عن السري بن إسماعيل، به.
4854 - وحدثني نصر بن محمد العَدْل، حدثنا أحمد بن محمد بن سعيد الحافظ، حدثنا أحمد بن يحيى البَجَلي، حدثنا محمد بن إسحاق البَلْخي، حدثنا نُوح بن دَرّاج، عن الأَجلَح، عن البهيّ، عن سفيان بن الليل، قال: لما كان من أمرِ الحسن بن عليٍّ ومعاوية ما كان، قدمت عليه المدينة وهو جالسٌ في أصحابه، فذكر الحديث بطوله.قال: فتذاكرْنا عنده الأذانَ، فقال بعضُنا: إنما كان بَدءُ الأذان رؤيا عبد الله بن زيد بن عاصم، فقال له الحسن بن علي: إنَّ شأن الأذان أعظم من ذاك، أَذَّن جبريل عليه السلام في السماء مثنى مثنى، وعلمه رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأقام مرةً مرةً، فعلمه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأذن الحسن حين وَلِيَ [1].
সুফিয়ান ইবনুল লাইল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে যা ঘটার তা ঘটে গেল, আমি মদিনায় তাঁর (হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে আসলাম। তিনি তখন তাঁর সঙ্গীদের সাথে বসা ছিলেন। (রাবী) সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করলেন। তিনি বলেন: অতঃপর আমরা তাঁর কাছে আযান সম্পর্কে আলোচনা করছিলাম। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ বলল: আযানের সূচনা হয়েছিল কেবল আব্দুল্লাহ ইবনু যায়িদ ইবনু 'আসিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্বপ্নের মাধ্যমে। তখন হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: আযানের গুরুত্ব তার চেয়েও অনেক বেশি। (কারণ) জিবরীল (আঃ) আসমানে আযান দিয়েছিলেন দু'বার করে, আর তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে শিক্ষা দিয়েছিলেন। এবং (তিনি) ইকামত দিয়েছিলেন একবার করে, আর তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে শিক্ষা দিয়েছিলেন। যখন হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাসক হলেন, তখন তিনি (এভাবেই) আযান দিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالف من أجل نوح بن دراج، وقد سبق القول فيه عند الحديث (4745).وقد جاء في شأن بدء الأذان عدة أخبار نحو قول الحسن بن علي أوردها الحافظ ابن حجر في "الفتح" 3/ 8، وضعفها جميعًا، وقال: الحقُّ أنه لا يصح شيء من هذه الأحاديث.ثم صحح الحافظ أن بدء الأذان هو رؤيا عبد الله بن زيد الذي أخرجه أحمد 26/ (16477) و (16478)، وأبو داود (499)، وابن ماجه (706)، والترمذي (189)، وابن حبان (1679)، وغيرهم من حديث عبد الله بن زيد نفسه وإسناده حسن.
4855 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عبيد الله بن موسى، أنا سفيان، عن سالم بن أبي حفصة، قال: سمعت أبا حازم يقول: إني لشاهدٌ يوم مات الحسن بن علي، فرأيت الحُسين بن علي يقول لسعيد بن العاص، ويطعنُ في عُنقه ويقول: تَقدَّم، فلولا أنها سُنّةٌ ما قُدِّمت، وكان بينهم شيءٌ، فقال أبو هريرة: أتنفسُون على ابن نبيكم صلى الله عليه وسلم بتربة تَدفِنُونه فيها، وقد سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن أحبَّهُما فقد أحبَّني، ومَن أبغضَهُما فقد أبغضني" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ হাযিম বলেন: আমি হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইন্তিকালের দিন সেখানে উপস্থিত ছিলাম। আমি দেখলাম হুসাইন ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাঈদ ইবনু আসকে বলছেন— আর তিনি তার ঘাড়ে খোঁচা দিয়ে বলছিলেন— ‘সামনে এগিয়ে যাও! যদি এটি (জানাযার ইমামতি) একটি সুন্নাত (প্রচলিত রীতি) না হতো, তবে আমি তোমাকে এগিয়ে দিতাম না।’ তাদের মধ্যে কিছুটা মনোমালিন্য চলছিল। তখন আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ‘তোমরা কি তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পুত্রের জন্য সেই মাটির কারণেও ঈর্ষান্বিত হচ্ছো, যেখানে তোমরা তাঁকে দাফন করছো? অথচ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি এই দুজনকে ভালোবাসলো, সে যেন আমাকেই ভালোবাসলো, আর যে ব্যক্তি এই দুজনকে ঘৃণা করলো, সে যেন আমাকেই ঘৃণা করলো।”’
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل سالم بن أبي حفصة، فهو صدوق حسن الحديث، وقد تابعه على المرفوع أبو الجَحاف داود بن أبي عوف كما تقدم تخريجه عند الحديث (4833). سفيان: هو ابن سعيد الثوري، وأبو حازم: هو سلمان الأشجعي.وأخرجه أحمد 16 / (10872) عن عبد الله بن الوليد العَدَني، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.
4856 - حدثنا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ وأبو سعيد عمرو بن محمد ابن منصور قالا: حدثنا الفضل بن محمد بن المُسيَّب الشعراني، حدثنا أبو بكر عبد الرحمن بن عبد الملك بن شَيْبة الحزامي، حدثنا ابن أبي فديك، عن إسماعيل بن إبراهيم بن عُقبة، عن عمه موسى بن عُقبة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، عن الحسن بن علي، قال: علمني رسول الله صلى الله عليه وسلم في وتري إذا رفعتُ رأسي ولم يَبْقَ إِلَّا السجود: "اللهم اهدني فيمن هَدَيتَ، وعافني فيمن عافيت، وتَوَلَّني فيمن تولَّيتَ، وبارك لي فيما آتيتَ، وقِني شرَّ ما قضيت، إنك تقضي ولا يُقضى عليك، إنه لا يَذِلُّ مَن واليت، تباركت وتعاليت" [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، إلَّا أنَّ محمد بن جعفر بن أبي كثير قد خالف إسماعيل بن إبراهيم بن عُقبة في إسنادِه:
হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বিতর সালাতের সময় কুনুতের জন্য এই দুআ শিক্ষা দিয়েছেন— যখন আমি রুকু থেকে মাথা উঠাতাম এবং সিজদা ব্যতীত আর কিছু বাকি থাকতো না (তখন পড়তাম):
"হে আল্লাহ! যাদেরকে তুমি হেদায়াত করেছো, আমাকে তাদের মধ্যে শামিল করে হেদায়াত করো। যাদেরকে তুমি ক্ষমা ও নিরাপত্তা দিয়েছো, আমাকে তাদের মধ্যে ক্ষমা ও নিরাপত্তা দাও। যাদের তুমি অভিভাবকত্ব গ্রহণ করেছো, আমাকে তাদের মধ্যে শামিল করে আমার অভিভাবক হও। আমাকে তুমি যা কিছু দিয়েছো, তাতে বরকত দাও। আর তুমি যে অকল্যাণ নির্ধারণ করেছো তা থেকে আমাকে রক্ষা করো। নিশ্চয় তুমিই ফায়সালাকারী; তোমার উপর কেউ ফায়সালা করতে পারে না। তুমি যার সাথে মিত্রতা করো, সে কখনো অপমানিত হয় না। তুমি বরকতময় এবং তুমি সুমহান।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكنه اختُلف فيه على موسى بن عقبة على ثلاثة وجوه، فرواه ابن أخيه إسماعيل هنا عنه هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، عن الحسن بن عليّ. وخالفه يحيى بن عبد الله بن سالم، فرواه عن موسى بن عقبة، عن عبد الله بن علي، عن الحسن بن علي، وخالفهما محمد بن جعفر بن أبي كثير كما سيأتي عند المصنف بعده، فرواه عن موسى بن عقبة، عن أبي إسحاق السبيعي، عن بريد بن أبي مريم، عن أبي الحوراء، عن الحسن بن علي، وهذا أصح الوجوه عن موسى بن عُقبة، فقد رواه كذلك جماعة أصحاب أبي إسحاق عنه، وكذلك رواه جماعةٌ عن بريد بن أبي مريم. قال الحافظ ابن حجر في "الدراية في تخريج أحاديث الهداية" (245): وهو الصواب.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 3/ 38 عن أبي عبد الله الحاكم، عن أبي جعفر محمد بن صالح بن هانئ وأبي منصور محمد بن القاسم العتكي، عن الفضل بن محمد الشعراني، بهذا الإسناد. فذكر أبا منصور محمد بن القاسم العتكي بدل أبي سعيد عمرو بن محمد بن منصور. فالظاهر أنَّ الحاكم سمعه من شيوخه الثلاثة.وتجدر الإشارة إلى أنَّ قوله في الحديث هنا: إذا رفعت رأسي ولم يَبْقَ إِلَّا السجود، شاذٌّ في رواية ابن أبي فديك - وهو محمد بن إسماعيل - فقد أخرجه ابن مَنْدَه في "التوحيد" (338) عن أبي عثمان عمرو بن عبد الله البصري، وأبو بكر أحمد بن الحسين بن مهران الأصبهاني في "فوائده" بتخريج الحاكم له كما في "التلخيص الحبير" للحافظ ابن حجر 1/ 248 عن محمد بن يونس المقرئ، كلاهما عن الفضل بن محمد بن المسيب الشَّعراني، به. أنَّ هذا الدعاء بعد القراءة وقبل الركوع.وكذلك أخرجه ابن النجار في "ذيل تاريخ بغداد" 4/ 162 من طريق محمد بن يزيد الأسفاطي عن أبي بكر بن شيبة الحزامي، عن ابن أبي فُديك، عن موسى بن يعقوب الزَّمعي، عن إسماعيل بن إبراهيم بن عُقبة، به. أنَّ هذا الدعاء بعد القراءة وقبل الركوع. غير أنه زاد هنا بين ابن أبي فُديك وبين إسماعيل بن إبراهيم بن عُقبة رجلًا هو موسى بن يعقوب الزَّمْعي، ولا يُعرف ذكره إلا في هذه الطريق!وقد أخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (415)، وفي "السنة" (375) من طريق إسماعيل بن أبي أويس، عن ابن أبي فديك، عن إسماعيل بن إبراهيم بن عقبة، به. أنَّ الدعاء المذكور بعد الفراغ من القراءة وقبل الركوع. ولم يذكر أحدًا بين ابن أبي فديك وبين إسماعيل بن إبراهيم بن عقبة.وأخرجه النسائي (1447) وغيره من طريق محمد بن عبد الله بن سالم، عن موسى بن عقبة، عن عبد الله بن علي، عن الحسن بن علي. ولم يذكر وقت الدعاء، وزاد في الدعاء في آخره: "وصلَّى الله على محمد النبي"، وقال الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 2/ 154: هذه الزيادة في هذا السند غريبة لا تثبت، لأنَّ عبد الله بن علي لا يُعرف، وقد جوَّز الحافظ عبد الغني أن يكون هو عبد الله بن علي بن الحسين بن علي، وجزم المزي بذلك، فإن يكن كما قال فالسند منقطع، فقد ذكر ابن سعد والزبير بن بكار وابن حبان أنَّ أمّه أم عبد الله بنت الحسن بن علي، ولم يسمع من جده الحسن بن علي، بل الظاهر أنَّ جده مات قبل أن يولد لأنَّ أباه زين العابدين أدرك من حياة عمه الحسن نحو عشر سنين فقط، فتبيَّن أنَّ هذا السند ليس من شرط الحسن لانقطاعه أو جهالة راويه، ولم ينجبر بمجيئه من وجه آخر.
4857 - حدَّثَناهُ أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الصَّفّار، حدثنا محمد بن إسماعيل السلمي.وحدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدْل، حدثنا عُبيد بن عبد الواحد البزار والفضل بن محمد البيهقي؛ قالوا: حدثنا ابن أبي مريم، حدثنا محمد بن جعفر بن أبي كثير، حدثني موسى بن عُقبة، حدثنا أبو إسحاق، عن بريد بن أبي مريم، عن أبي الحَوْراء، عن الحَسَن بن علي قال: عَلَّمني رسول الله صلى الله عليه وسلم هؤلاء الكلمات في الوِتر: "اللهمَّ اهدِني فيمن هَديتَ، وبارك لي فيما آتَيْتَ، وقِنِي شَرَّ ما قضيتَ، فإِنَّكَ تَقضي ولا يُقضى عليك، وإنه لا يَذِلُّ من واليت تباركتَ ربَّنا وتعاليت" [1].
হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বিতর নামাযে এই বাক্যগুলো শিখিয়েছেন: “হে আল্লাহ! তুমি যাদেরকে হেদায়েত দিয়েছ, আমাকেও তাদের অন্তর্ভুক্ত করে হেদায়েত দাও। আর তুমি আমাকে যা কিছু দান করেছ, তাতে বরকত দাও। তুমি যে অমঙ্গল স্থির করেছ, তা থেকে আমাকে রক্ষা করো। কেননা তুমিই ফায়সালাকারী, তোমার ওপর কারো ফায়সালা চলে না। আর তুমি যার অভিভাবকত্ব গ্রহণ করো, সে কখনো অপমানিত হয় না। হে আমাদের রব! তুমি বরকতময় এবং তুমি সুমহান।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو الحوراء: هو ربيعة بن شيبان السَّعدي، وابن أبي مريم: هو سعيد بن الحكم بن محمد بن سالم وأبو إسحاق هو عمرو بن عبد الله السبيعي.وأخرجه أحمد 3 / (1721)، وأبو داود (1425) و (1426) وابن ماجه (1178)، والترمذي (464)، والنسائي (1446) من طرق عن أبي إسحاق السبيعي بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن لا نعرفه إلّا من هذا الوجه … ولا نعرف عن النبي صلى الله عليه وسلم في القنوت في الوتر شيئًا أحسن من هذا.وأخرجه أحمد (1718) من طريق يونس بن أبي إسحاق السبيعي، وأحمد (1723) و (1727)، وابن حبان (722) و (945) من طريق شعبة بن الحجاج كلاهما عن بريد بن أبي مريم، به. ولم يذكر شعبة في روايته القنوت ولا الوتر، وإنما ذكره بلفظ: قال الحسن: وكان يعلِّمنا هذا الدعاء؛ يعني النبيَّ صلى الله عليه وسلم. وقد جاء ذكر الوتر في بعض الروايات عن شعبة عند الطبراني في "الكبير" (2707) و "الدعاء" (744).
4858 - حدثنا أبو محمد الحسن بن محمد بن يحيى ابنُ أخي طاهر العَقِيقي الحَسَني، حدثنا إسماعيل بن محمد بن إسحاق بن جعفر بن محمد بن علي بن الحُسين، حدثني عمي علي بن جعفر بن محمد، حدثني الحسين بن زيد، عن عُمر بن علي، عن أبيه علي بن الحسين، قال: خطب الحَسنُ بن علي الناس حين قُتل عليٌّ فحمد الله وأثنى عليه، ثم قال: لقد قبض في هذه الليلة رجلٌ لا يَسبِقُه الأولون بعملٍ ولا يُدركه الآخرون، وقد كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعطيه رايته فيقاتِلُ وجبريل عن يَمينِه وميكائيلُ عن يساره، فما يَرجِعُ حتى يفتحَ اللهُ عليه، وما ترك على ظهر الأرض صفراء ولا بَيضاءَ إِلَّا سبع مئة درهمٍ فَضَلَتْ من عطاياه أراد أن يبتاع بها خادِمًا لأهله.ثم قال: أيها الناسُ، مَن عَرَفني فقد عرفني، ومن لم يَعرِفْني فأنا الحسن بن علي، أنا ابن النبي، وأنا ابن الوصي، وأنا ابن البشير، وأنا ابن النذير، وأنا ابن الداعي إلى الله بإذنِه، وأنا ابن السراج المنير، وأنا من أهل البيت الذي كان جبريل يَنزِل إلينا ويصعد من عندنا، وأنا من أهل البيت الذي أذهب الله عنهم الرِّجسَ وطهرهم تطهيرًا، وأنا من أهل البيت الذين افترض الله مودَّتَهم على كل مسلم، فقال تبارك وتعالى لنبيه صلى الله عليه وسلم: {قُلْ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَى وَمَنْ يَقْتَرِفْ حَسَنَةً نَزِدْ لَهُ فِيهَا حُسْنًا} [الشورى: 23]، فاقترافُ الحسنة مَودْتُنا أهل البيت [1].
আলি ইবনুল হুসাইন থেকে বর্ণিত, তিনি (আলী ইবনু হুসাইন) বলেন, যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে হত্যা করা হলো, তখন হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মানুষের উদ্দেশ্যে ভাষণ দেন। তিনি আল্লাহ্র প্রশংসা ও গুণগান করেন, অতঃপর বলেন: এই রাতেই এমন এক ব্যক্তিকে তুলে নেওয়া হয়েছে, যার কর্মে পূর্ববর্তী কেউ তাকে অতিক্রম করতে পারেনি এবং পরবর্তী কেউ তাকে ধরতে পারবে না। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে তাঁর ঝান্ডা দিতেন, আর তিনি যুদ্ধ করতেন। জিবরীল তাঁর ডান দিকে এবং মীকাঈল তাঁর বাম দিকে থাকতেন। আল্লাহ্ বিজয় না দেওয়া পর্যন্ত তিনি ফিরে আসতেন না। তিনি তাঁর দান-খয়রাত থেকে বেঁচে যাওয়া সাতশত দিরহাম ছাড়া যমিনের উপর কোনো সোনা বা রূপা রেখে যাননি, যা দিয়ে তিনি তাঁর পরিবারের জন্য একজন খাদেম কিনতে চেয়েছিলেন। অতঃপর তিনি বলেন, হে লোকসকল! যারা আমাকে চেনো, তারা তো চেনোই; আর যারা চেনো না, আমি হাসান ইবনু আলী। আমি নবীর সন্তান। আমি ওয়াসীর (যার প্রতি অসিয়ত করা হয়েছে) সন্তান। আমি সুসংবাদদাতার সন্তান। আমি সতর্ককারীর সন্তান। আমি আল্লাহ্র অনুমতিক্রমে আল্লাহ্র দিকে আহবানকারীর সন্তান। আমি উজ্জ্বল প্রদীপের সন্তান। আমি সেই আহলুল বাইতের (নবী পরিবারের) অন্তর্ভুক্ত, যাঁদের নিকট জিবরীল (আঃ) অবতরণ করতেন এবং আমাদের নিকট থেকে আরোহণ করতেন। আমি সেই আহলুল বাইতের অন্তর্ভুক্ত, যাঁদের থেকে আল্লাহ্ অপবিত্রতাকে দূর করে দিয়েছেন এবং তাঁদেরকে সম্পূর্ণরূপে পবিত্র করেছেন। আমি সেই আহলুল বাইতের অন্তর্ভুক্ত, যাঁদের প্রতি ভালোবাসা (مودَّت) পোষণ করা আল্লাহ্ প্রত্যেক মুসলিমের উপর ফরয করেছেন। তিনি (আল্লাহ্) তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে লক্ষ্য করে বলেছেন: “বলো, আমি তোমাদের নিকট এর (নবুওয়াতের) জন্য কোনো প্রতিদান চাই না, কেবল আত্মীয়তার বন্ধন অনুসারে প্রীতি চাই। আর যে ব্যক্তি কোনো ভালো কাজ করবে, আমি তার জন্য তাতে আরও পুণ্য বাড়িয়ে দেবো।” (সূরা আশ-শূরা, ২৩)। আর এই ভালো কাজ (اقترافُ الحسنة) হলো আমাদের আহলুল বাইতের প্রতি ভালোবাসা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل شيخ المصنف أبي محمد الحسن بن محمد العقيقي، فقد اتهمه الذهبي في "الميزان" بالكذب، وقد خالفه غيره من الثقات، فرووا هذا الخبر عن إسماعيل بن محمد بن إسحاق عن عمه علي بن جعفر بن محمد عن الحُسين بن زيد - وهو ابن علي بن الحسين بن علي بن أبي طالب - عن الحسن بن زيد بن الحسن بن علي بن أبي طالب عن أبيه؛ والحُسين بن زيد هذا ضعيف يقع في أحاديث مناكير، وهو من رجال "التهذيب"، وكذا الحسن بن زيد بن الحسن وهو مختلف فيه، وقال ابن عدي: أحاديثه عن أبيه أنكر مما روى عن عكرمة، والشطر الثاني من خطبة الحسن بن علي، وهو قوله: أيها الناس من عرفني فقد عرفني … إلى آخره، مما تفرد به أحد هذين الرجُلين بهذا الإسناد. وروي مثله من وجه آخر لا يُفرح به البتة، وهو منكر من القول خاصة في حمل الآية المذكورة على ذلك المعنى، مع أنَّ السورة مكيّة باتفاق، ولم يكن ثُمَّ لأهل البيت وجودٌ إذ لم يتزوج علي بن أبي طالب من فاطمة إلا بعد الهجرة إلى المدينة بسنتين، والصحيح حمل الآية على ما فسره به ابن عباس عند البخاري (3497) و (4818) وغيره، حيث قال: إنَّ النبي صلى الله عليه وسلم لم يكن بطنٌ من قريش إلا كان له فيهم قرابة، فقال: إلّا أن تصلوا ما بيني وبينكم من القرابة؛ قال ذلك ابن عباس ردًا على سعيد بن جبير حين قال: هم قُربى محمد صلى الله عليه وسلم.وأما الشطر الأول من خطبة الحسن بن علي بن أبي طالب، فقد روي من غير هذه الطريق عند أحمد وغيره، فهو ثابت، إلّا قوله هنا: لا يسبقه الأولون بعمل، وإنما هو: لا يسبقه الأولون بعلم، كما وقع عند أحمد.وأخرجه بشطريه الدولابي في "الذرية الطاهرة" (121) عن أبي القاسم كهمس بن معمر، وأبو الفرج الأصبهاني في "مقاتل الطالبيين" ص 51 عن محمد بن محمد الباغندي ومحمد بن حمدان الصيدلاني، ثلاثتهم عن إسماعيل بن محمد بن إسحاق، عن عمه علي بن جعفر بن محمد، عن الحسين بن زيد عن الحسن بن زيد بن الحسن، عن أبيه، به.وأخرجه الدولابي أيضًا (122) عن أبي عبد الله الحسين بن علي بن الحسن بن علي بن عمر بن الحسين بن علي بن أبي طالب، عن أبيه، عن حسين بن زيد، عن الحسن بن زيد بن الحسن به. ليس فيه عن أبيه. وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (2155) من طريق سلام بن أبي عمرة، عن معروف بن خَرَّبوذ، عن أبي الطُّفيل، عن الحسن بن علي. ولكن سلام بن أبي عمرة هذا واهي الحديث.وأخرج الشطر الأول من خطبة الحسن بن علي: أحمد 3 / (1719) من طريق شريك بن عبد الله النخعي، والنسائي (8354) من طريق يونس بن أبي إسحاق السَّبيعي، وابن حبان (6936) من طريق إسماعيل بن أبي خالد، ثلاثتهم عن أبي إسحاق السبيعي، عن هُبيرة بن يَريم، عن الحسن ابن عليّ. ورواه عن أبي إسحاق كذلك جماعة ذكرهم الدارقطني في "العلل" (3157) منهم سفيان الثوري.وأخرج هذا الشطر أيضًا أحمد 3 / (1720) من طريق إسرائيل بن يونس بن أبي إسحاق السبيعي، عن جده أبي إسحاق، عن عمرو بن حُبشي، عن الحسن بن عليّ. فذكر هنا أبو إسحاق رجلًا آخر هو عمرو بن حبشي، وقال الدارقطني في "العلل": المحفوظ حديث أبي إسحاق عن هبيرة، ويشبه أن يكون قول إسرائيل محفوظًا أيضًا، لأنه من الحفاظ عن أبي إسحاق، ويكون أبو إسحاق أخذه عن هُبيرة وعن عمرو بن حبشي جميعًا. قلنا: فهذا الشطر بمجموع الطريقين حسن ثابتٌ إن شاء الله.وتقدم من حديث علي بن أبي طالب برقم (4479) و (4704) قال: قال لي النبي صلى الله عليه وسلم ولأبي بكر يوم بدر: "مع أحدكما جبريل، ومع الآخر ميكائيل، وإسرافيل ملك عظيم يشهد القتال، ويكون في الصف". وإسناده صحيح.والصفراء: الذهب، والبيضاء: الفضة.