হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4859)


4859 - أخبرنا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالويه، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جُريج، أخبرني جعفر بن محمد، عن أبيه: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم سمَّى الحَسن بن علي يوم سابعِه، وأنه اشتَقَّ من اسمِ حَسَنٍ اسم حسين، وذكر أنه لم يكن بينهما إلَّا الحَبَلُ [1].




মুহাম্মদ ইবনে আলী থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাসান ইবনে আলীকে তাঁর জন্মের সপ্তম দিনে নামকরণ করেছিলেন। আর তিনি (নবী) ‘হাসান’ নামটি থেকে ‘হুসাইন’ নামটি উদ্ভূত (derive) করেছিলেন, এবং তিনি উল্লেখ করেছেন যে, এই দু’জনের (জন্মের) মধ্যে গর্ভধারণের সময়কাল ব্যতীত আর কোনো ব্যবধান ছিল না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] مرسلٌ رجاله ثقات. جعفر بن محمد: هو ابن علي بن الحسين بن علي بن أبي طالب، وابن جُريج: هو عبد الملك بن عبد العزيز المكي.وهو في "مصنف عبد الرزاق" (7979)، ومن طريقه أخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 9/ 304، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 14/ 119 - 120.وهذا في مدة ما بين ولادة الحسن والحسين أصح مما قاله قتادة بن دعامة فيما سيأتي برقم (4879) أنَّ بين الحسن والحسين سنة وعشرة أشهر، لأنَّ محمد بن علي الباقر أدرى بأهل بيته من غيره، فقوله مقدَّمٌ. وأخرجه ابن سعد 6/ 356، والدولابي في "الذرية الطاهرة" (146)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" بين يدي (395) من طريق أبي ضمرة أنس بن عياض، وابن سعد 6/ 356 من طريق سليمان بن بلال ومن طريق مالك بن أبي الرجال، ثلاثتهم عن جعفر بن محمد، عن أبيه: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سمَّى حَسنًا وحُسينًا يوم سابعهما، واشتقَّ اسم حسين من حسن. ولم يذكروا ما بين ولادتهما.وانظر ما تقدم برقم (4829).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4860)


4860 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجهم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، حدثني عبد الله بن جعفر، عن أم بكر بنت المِسور، قالت: كان الحَسنُ بن علي سُمَّ مِرارًا، كلَّ ذلك يُفلِتُ حتى كانت المرة الأخيرةُ التي مات فيها، فإنه كان يُجتَلَفُ [1] كَبِدُه، فلما مات أقام نساء بني هاشمٍ النَّوحَ عليه شهرًا [2].




উম্মে বাকর বিনতে মিসওয়ার থেকে বর্ণিত, হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বহুবার বিষ প্রয়োগ করা হয়েছিল, কিন্তু প্রতিবারই তিনি বেঁচে যেতেন। অবশেষে, তিনি যেবার মৃত্যুবরণ করলেন, তখন তাঁর কলিজা টুকরো টুকরো হয়ে গিয়েছিল। যখন তিনি মারা গেলেন, তখন বনু হাশিমের মহিলারা তাঁর জন্য এক মাস ধরে শোক পালন (নওহা) করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب): يختلف، بالخاء بدل الجيم، وأُهملت في بقية النسخ، والاجتلاف، بالجيم: الاستئصال، والمراد أنه استُؤصِلَت كبدُه، ويؤيده ما جاءَ في روايةٍ أخرى للخبر: لفظتُ طائفةٌ من كبدي.



[2] خبر صحيح، دون قصة النَّوح على الحسن بن علي، وهذا إسناد فيه محمد بن عمر - وهو الواقدي - وهو ضعيف لكن يُعتبر به فيكتب حديثه في المغازي وأيام الناس وأخبارهم، كما انتهى إليه الإمام الذهبي في ترجمته في "سير أعلام النبلاء" كما تقدم بيانه برقم (4060)، ومن دونه هم بعض رواة كتب الواقدي كما تقدم هناك.ولم ينفرد الواقدي بقصة موت الحسن بن عليّ بالسم، إنما انفرد بقصة نوح نساء بني هاشم عليه. وأخرجه ابن سعد 6/ 387 عن محمد بن عمر الواقدي، به.وأخرج قصة موته بالسمّ ابن سعد 6/ 386، وابن أبي شيبة 15/ 94، وغيرهما من طريق عبد الله بن عون، عن عُمير بن إسحاق، قال: دخلتُ أنا وصاحبٌ لي على الحسن بن علي نعودُه، فذكر نحوه، وإسناده قويٌّ، وسيأتي برقم (4876) مختصرًا.وأخرج ابن سعد 6/ 387 عن أبي حرب بن أبي الأسود الدِّيلي وأبي الطفيل، قالا: قال الحسن بن علي: سُقِيتُ السُّمَّ مرتين.وانظر خبر قتادة الآتي برقم (4875).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4861)


4861 - قال ابن عُمر: وحدثنا حفص بن عمر، عن أبي جعفر قال: مَكَثَ الناسُ يبكون على الحسن بن علي، وما تقوم الأسواق [1].




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, হাফস ইবনে উমর আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি আবু জা’ফার থেকে (বর্ণনা করেন), যিনি বলেন, লোকেরা আল-হাসান ইবনে আলীর জন্য কাঁদতে থাকল এবং বাজারগুলো অচল হয়ে গেল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف. وحفص بن عمر - وهو ابن رزين الرقاشي - غير معروف، وقد تفرد به محمد بن عمر الواقدي.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 6/ 392 عن محمد بن عمر الواقدي، به. وزاد: يبكون سبعًا. إلى العوالي صائحًا يصيح في كل قرية من قُرى الأنصار بموت الحسن، فنزل أهل العوالي ولم يتخلّف أحدٌ عنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4862)


4862 - قال ابن عمر: وحدثتنا عُبيدة بنت نابل [1]، عن عائشة بنت سعد، قالت: حد نساء الحسن بن علي سنة [2].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: এবং আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন উবাইদা বিনতে নাবিল [১], তিনি আয়িশা বিনতে সা‘দ থেকে বর্ণনা করেন। তিনি বললেন: আল-হাসান ইবনু আলীর স্ত্রীদের সময়কাল ছিল এক বছর [২]।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تصحف في بعض النسخ الخطية إلى: نائل. وقد ضبطه الدارقطني وعبد الغني بن سعيد بالموحدة، فهو المعتمد، وإن تكرر الاسم في كثير من المصادر الحديثية مصحفًا بالياء التحتانية أو الهمزة. إلى العوالي صائحًا يصيح في كل قرية من قُرى الأنصار بموت الحسن، فنزل أهل العوالي ولم يتخلّف أحدٌ عنه.



[2] إسناده ضعيف تفرد به ابن عمر - وهو محمد بن عمر الواقدي - ولا يُعتدُّ بما يتفرد به.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 393، ومن طريقه ابن عساكر 13/ 295 عن محمد بن عمر الواقدي، به. غير أنه قال: حَدَّ نساء بني هاشم على حسن بن علي سنة. وكذلك نقله عنه الطبري في "ذيل المذيّل" كما في "منتخبه" لعُريب القرطبي المطبوع بإثر "تاريخ الطبري" 11/ 514. إلى العوالي صائحًا يصيح في كل قرية من قُرى الأنصار بموت الحسن، فنزل أهل العوالي ولم يتخلّف أحدٌ عنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4863)


4863 - قال ابن عُمر: وحدثنا داود بن سنان، سمعت ثعلبة بن أبي مالك، قال: شَهِدْنا الحسن بن علي يومَ مات ودفناه بالبقيع، ولو طُرِحتْ إبرةٌ ما وقعتْ إِلَّا على رأس إنسانٍ [1].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সা’লাবা ইবনু আবী মালিক বলেছেন: আমরা হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যেদিন ইন্তিকাল হয় সেদিন উপস্থিত ছিলাম এবং তাঁকে বাকী‘ (কবরস্থান)-এ দাফন করেছিলাম। সেদিন (মানুষের এত ভিড় হয়েছিল যে) যদি একটি সূঁচও নিক্ষেপ করা হতো, তবে তা কোনো মানুষের মাথা ছাড়া অন্য কোথাও পড়তো না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر حسن، ومن فوق محمد بن عمر الواقدي لا بأس بهم، وقد جاء دفنُ الحسن بن عليٍّ بالبقيع من وجوهٍ، وأنَّ أهل المدينة والعوالي قد حضروا جنازته.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 6/ 392، ومن طريقه ابن عساكر 13/ 297 عن محمد بن عمر الواقدي، به.وأخرج قصة دفنه في البقيع ابنُ سعد 6/ 387 من طريق أبي حازم سلمان الأشجعي، وكان قد حَضَر دَفْنِ الحَسَن كما تقدم برقم (4855)، وإسناده صحيح.وأخرج ابن سعد 6/ 392، ومن طريقه ابن عساكر 13/ 297 عن محمد بن عمر الواقدي، عن هاشم بن عاصم الأسلمي، عن جهم بن أبي جهم، قال: لما مات الحسن بن علي بعثت بنو هاشم إلى العوالي صائحًا يصيح في كل قرية من قُرى الأنصار بموت الحسن، فنزل أهل العوالي ولم يتخلّف أحدٌ عنه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4864)


4864 - قال ابن عُمر: وحدثني علي بن محمد [1]، حدثني مسلمةُ بن مُحارِب، قال: مات الحسن بن علي سنة خمسين لخمسٍ خَلَونَ من ربيع الأول، وهو ابن ستٍّ وأربعين سنة، وصلى عليه سعيدُ بن العاص وكان يبكي، وكان مرضُه أربعين يومًا [2].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আলী ইবনু মুহাম্মাদ আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি মাসলামাহ ইবনু মুহারিব থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেন: আল-হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পঞ্চাশ হিজরী সনে, রবিউল আউয়াল মাসের পাঁচ দিন অতিবাহিত হওয়ার পর মৃত্যুবরণ করেন। তখন তাঁর বয়স ছিল ছেচল্লিশ বছর। সাঈদ ইবনুল আস তাঁর জানাযার সালাত আদায় করান এবং তিনি কাঁদছিলেন। তাঁর অসুস্থতা চল্লিশ দিন স্থায়ী হয়েছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط اسم "علي بن محمد" من المطبوع، وهو المعروف بأبي الحسن المدائني. وأخرج ابن سعد أيضًا 6/ 379 من طريق ميمون بن مهران الجزري، قال: إنَّ الحسن بن علي بن أبي طالب بايع أهل العراق بعد عليٍّ على بيعتين: بايعهم على الإمرة، وبايعهم على أن يدخلوا فيما دخل فيه، ويرضوا بما رضي به.



[2] ورواه أيضًا ابن سعد في "طبقاته" 6/ 393، ومن طريقه ابن عساكر 13/ 302 عن علي بن محمد المدائني، عن مسلمة بن محارب، عن حرب بن خالد - وهو ابن يزيد بن معاوية بن أبي سفيان - قال: مات الحسن بن علي لخمس خلون من شهر ربيع الأول، سنة خمسين.ويخالفه ما تقدَّم برقم (4846) أنه مات سنة تسع وأربعين. وفيه أقوال أخرى ذكرناها هناك.وصلاة سعيد بن العاص على الحسن بن علي تقدَّم ذكرها قريبًا برقم (4855) بإسناد حسن عن أبي حازم سلمان الأشجعي، وكان حَضَر وفاته. ولا خلاف في ذلك. وانظر "تاريخ دمشق" 13/ 300 - 303 و 303. وأخرج ابن سعد أيضًا 6/ 379 من طريق ميمون بن مهران الجزري، قال: إنَّ الحسن بن علي بن أبي طالب بايع أهل العراق بعد عليٍّ على بيعتين: بايعهم على الإمرة، وبايعهم على أن يدخلوا فيما دخل فيه، ويرضوا بما رضي به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4865)


4865 - أخبرنا حمزة بن العباس بن الفضل العقَبي ببغداد، حدثنا الحسن بن سلّام السَّوّاق، حدثنا عبيد الله بن موسى، حدثنا شَيْبان، عن أبي إسحاق قال: بُويعَ لأبي محمد الحسن بن علي بن أبي طالب بالكوفة عَقِيبَ قتل أمير المؤمنين، وأَخَذَ البيعةَ على أصحابه. فحدَّثني حارثة بن مُضرِّب، قال: سمعتُ الحسن بن عليٍّ يقول: والله لا أُبايعُكم إلا على ما أقول لكم، قالوا: ما هي؟ قال: تُسالمون من سالَمْتُ، وتُحاربون من حارَبْتُ. ولما تمَّتِ البيعةُ خَطَبَهم [1]




আবূ ইসহাক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আমীরুল মু'মিনীন (আলী) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে হত্যার পর পরই কূফায় আবূ মুহাম্মাদ আল-হাসান ইবন আলী ইবন আবী তালিবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাতে বায়'আত (আনুগত্যের শপথ) গ্রহণ করা হয়। এবং তিনি তাঁর সাথীদের থেকে এই বায়'আত গ্রহণ করেন। হারিছাহ ইবন মুদাররিব আমাকে হাদীস বর্ণনা করে বলেছেন: আমি আল-হাসান ইবন আলীকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতে শুনেছি: আল্লাহর কসম, আমি তোমাদের বায়'আত গ্রহণ করব না, যতক্ষণ না তোমরা আমার বলা শর্ত মেনে নাও। তারা বলল: শর্তটি কী? তিনি বললেন: তোমরা তার সাথে সন্ধি স্থাপন করবে যার সাথে আমি সন্ধি স্থাপন করি এবং তোমরা তার সাথে যুদ্ধ করবে যার সাথে আমি যুদ্ধ করি। আর যখন বায়'আত সম্পন্ন হলো, তখন তিনি তাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السبيعي، وشيبان: هو ابن عبد الرحمن النحوي.وأخرج منه قول الحسن بن عليّ: ابن سعد 6/ 370 عن عُبيد الله بن موسى، عن شيبان، عن أبي إسحاق، عن خالد بن مضرب قال: سمعت الحسن بن علي، فذكره. فذكر خالد بن مُضرِّب بدل حارثة بن مضرِّب، وهما أخوان، وهما تابعيان كبيران وأخرج ابن سعد أيضًا 6/ 379 من طريق ميمون بن مهران الجزري، قال: إنَّ الحسن بن علي بن أبي طالب بايع أهل العراق بعد عليٍّ على بيعتين: بايعهم على الإمرة، وبايعهم على أن يدخلوا فيما دخل فيه، ويرضوا بما رضي به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4866)


4866 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الحسين بن الفضل البجلي، حدثنا عفان بن مسلم، حدثنا شعبة، عن عمرو بن مُرّة، سمعت عبد الله بن الحارث يُحدِّث عن زهير بن الأَقْمَر، رجل من بني بكر بن وائل، قال: لما قتل عليٌّ قامَ الحسنُ يَخطب الناسَ، فقام رجلٌ من أَزْدِ شَنُوءةً فقال: أشهَدُ لقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم واضعه في جبوته وهو يقول: "من أحبني فليُحِبَّه"، وليبلِّغ الشاهد الغائب، ولولا كرامة سول الله صلى الله عليه وسلم ما حدثت به أبدًا [1].




যুহাইর ইবনুল আকমার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে শহীদ করা হলো, তখন হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মানুষের উদ্দেশ্যে খুতবা দিতে দাঁড়ালেন। তখন আযদ শানুআহ গোত্রের এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে বলল: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁকে (হাসানকে) নিজের কোলে রাখতে দেখেছি এবং তিনি বলছিলেন: "যে আমাকে ভালোবাসে, সে যেন তাকেও ভালোবাসে।" আর উপস্থিত ব্যক্তি যেন অনুপস্থিত ব্যক্তিকে এই বার্তা পৌঁছে দেয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সম্মানের কারণেই আমি এই কথা বলছি, অন্যথায় আমি কখনোই তা বলতাম না।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 38/ (23106) عن محمد بن جعفر عن شعبة، بهذا الإسناد.والحِبْوة، بكسر الحاء المهملة وضمها: اسمٌ من الاحتباء، وهو أن يَضمُّ الإنسان رجليه إلى بطنه بثوب ويجمعهما به مع ظهره، ويشدُّ عليها، وقد يكون باليدين بدل الثوب.وانظر حديث أبي هريرة المتقدم برقم (4847).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4867)


4867 - حدثني علي بن الحسن القاضي، حدثنا محمد بن موسى، عن محمد بن أبي السَّرِي، عن هشام بن محمد بن الكلبي، عن أبي مِخْنَفٍ، قال: لما وقعتِ البيعةُ للحسن بن علي جَدَّ في مُكاشفِة معاوية والتوجُّه نحوه، فجعل على مُقدِّمتِه عبد الله بنَ جعفر الطيار في عشرة آلاف، ثم أتبعه بقَيس بن سعد في جيش عظيم، فراسل معاويةُ عبد الله بن جعفر، وضَمِنَ له ألف ألفِ دِرهم على أن يَدفَعَ إليه خمس مئة ألف درهم عند مصيره إليه، وخمس مئة ألف درهم إذا صار إلى الحجاز، فأجابه إلى ذلك وخَلَّى مَسِيرَه، وتوجّه إلى معاوية فوفّى له، وتفرَّق العَسكَرُ، وأقام قيسُ بن سعد على جِدِّه، وانضم إليه كثيرٌ ممَّن كان مع عبد الله بن جعفر، وراسله معاوية وأرغَبَه، فلم يَفْتَّه [1] ذلك إلى أن صالح الحسنُ معاوية وسلَّم إليه الأمر، وتوجه الحسنُ وأصحابه للقاء معاوية، وقد جُرح الحسنُ غِيلةً في مُظلِم [2] ساباطَ، جَرَحَه سَنانُ بن الجَرَّاحِ الأَسَدي أحدُ بني نصر بن قُعَين، طعنه في فَخِذه بمِعْول طعنةٌ مُنكَرةٌ، وكان يرى رأي الخوارج، فاعتنقه الحسنُ في يده وصار معه في الأرض، ووَثَبَ إليه عبد الله بن الأخطل القاري، فنزع المِعوَلَ من يد الجرّاح فطعَنَه به، ووَثَبَ عبد الله بن ظبيان بن عُمارة التميمي، فعضَّ وجهه حتى قطع أنفَه، وشَدَخَ رأسه بحَجَر، فمات من وقته، فسُحقًا لأصحاب الشَّقاء، وحُمِلَ الحَسنُ على سريرٍ إلى المدائن، فنزل على سعد بن مسعود الثقفي عمِّ المختار، وكان عامل عليٍّ على المدائن، فجاءه بطبيبٍ فعالَجَه حتى صَلَحَ [3].




আবূ মিখনাফ থেকে বর্ণিত, যখন হাসান ইবনে আলীর হাতে বাইয়াত (আনুগত্যের শপথ) সম্পন্ন হলো, তখন তিনি মুয়াবিয়ার সাথে মোকাবিলা করতে এবং তাঁর দিকে যাত্রা করতে মনস্থির করলেন। তিনি তাঁর অগ্রবর্তী বাহিনীর প্রধান করলেন আবদুল্লাহ ইবনে জাফর আত-তাইয়ারকে, যার অধীনে ছিল দশ হাজার সৈন্য। এরপর তার পেছনে প্রেরণ করলেন কায়স ইবনে সা'দকে এক বিশাল বাহিনী সহ। তখন মুয়াবিয়া আবদুল্লাহ ইবনে জাফরের কাছে বার্তা পাঠালেন এবং তাঁকে এক মিলিয়ন (দশ লক্ষ) দিরহাম দেওয়ার অঙ্গীকার করলেন এই শর্তে যে, যখন তিনি (আবদুল্লাহ ইবনে জাফর) তাঁর কাছে পৌঁছবেন, তখন তাকে পাঁচ লক্ষ দিরহাম দেওয়া হবে এবং যখন তিনি হেজাজে ফিরে যাবেন, তখন বাকি পাঁচ লক্ষ দিরহাম দেওয়া হবে। আবদুল্লাহ ইবনে জাফর এতে রাজি হলেন এবং তাঁর পথ ছেড়ে দিলেন এবং মুয়াবিয়ার দিকে চলে গেলেন। মুয়াবিয়া তাঁর অঙ্গীকার পূরণ করলেন এবং সেই সৈন্যদলটি ছত্রভঙ্গ হয়ে গেল। কিন্তু কায়স ইবনে সা'দ দৃঢ়তার সাথে তার অবস্থানে অটল রইলেন। আবদুল্লাহ ইবনে জাফরের সাথে থাকা বহু লোক তাঁর সাথে যোগ দিল। মুয়াবিয়া তাঁকেও বার্তা পাঠালেন এবং প্রলুব্ধ করলেন, কিন্তু তিনি তাতে কর্ণপাত করলেন না, যতক্ষণ না হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুয়াবিয়ার সাথে সন্ধি করলেন এবং তাঁর হাতে শাসনভার অর্পণ করলেন।

এরপর হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর সাথীরা মুয়াবিয়ার সাথে সাক্ষাতের জন্য রওয়ানা হলেন। এর পূর্বে সাবাতের অন্ধকার স্থানে হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অতর্কিত হামলায় আহত হয়েছিলেন। বনু নাসর ইবনে কুআইন গোত্রের সীনান ইবনে আল-জাররাহ আল-আসাদী তাঁকে আঘাত করেছিল। সে একটি কুঠার দিয়ে তাঁর উরুতে মারাত্মকভাবে আঘাত করে। সে ছিল খাওয়ারিজদের মতাদর্শের অনুসারী। হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আঘাতকারীকে হাত দিয়ে জাপটে ধরে তার সাথে মাটিতে পড়ে গেলেন। তখন আবদুল্লাহ ইবনে আল-আখতাল আল-কারী লাফিয়ে এসে জাররাহের হাত থেকে কুঠারটি ছিনিয়ে নিলেন এবং তা দিয়ে তাকে আঘাত করলেন। এরপর আবদুল্লাহ ইবনে যিবইয়ান ইবনে উমারা আত-তামিমি লাফিয়ে এসে তার মুখমণ্ডল এমনভাবে কামড়ে ধরলেন যে, তার নাক বিচ্ছিন্ন হয়ে গেল। এরপর পাথর দিয়ে তার মাথা পিষে দিলেন। ফলে সে তৎক্ষণাৎ মারা গেল। হতভাগ্যদের জন্য অভিশাপ!

এরপর হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে একটি খাটের উপর করে মাদায়েন-এ বহন করে নিয়ে যাওয়া হলো। তিনি মুখতারের চাচা সা'দ ইবনে মাসউদ আস-সাকাফীর বাড়িতে আতিথ্য গ্রহণ করলেন, যিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে মাদায়েনের গভর্নর ছিলেন। তিনি তাঁর জন্য একজন চিকিৎসক আনলেন এবং চিকিৎসা করালেন, যতক্ষণ না তিনি সুস্থ হয়ে উঠলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ص) و (م) و (ع): يفه، والمثبت من (ز) و (ب) هو الجادَّة، والمعنى: لم يكسِرْه ولم يُضعفه معاوية بتلك العِدَة والأمنيّة. وهو من قولهم: فَتَّ في ساعده أو في عَضُده، إذا أضعفه وأوهَنَه.



[2] تحرّف في النسخ الخطية إلى: مطلع. والصواب ما أثبتنا كما في المصادر التي ذكرت الخبر، ومنها "أنساب الأشراف" للبلاذُري 3/ 282، و "مقاتل الطالبيين" لأبي الفرج الأصبهاني ص 64. وقال ياقوت: مظلم ساباط: مضاف إلى ساباط: مضاف إلى ساباط التي قرب المدائن، موضع هناك.



4867 [3] - إسناده تالف وهو معضل أيضًا، وقد روى هذا الخبر أيضًا البلاذري في "أنساب الأشراف" 3/ 280 - 283، وأبو الفرج الأصبهاني في "مقاتل الطالبيين" 62 - 65، غير أنهما خالفا رواية المصنف هنا في أمور، فسمّيا الذي كان على مقدّمة جيش الحسن بن علي عبيد الله بن العباس بن عبد المطلب، وسمَّيا الذي طعن الحسن بن علي الجراح بن سِنان، وسمَّيا الذي قَطَع أنفَ الجرّاح ظبيان بن عُمارة.والمكاشفة: إظهار العداوة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4868)


4868 - حدثنا أبو بكر محمد بن إسحاق وعلي بن حَمْشاد، قالا: حدثنا بشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، حدثنا أبو موسى، سمعتُ الحسن يقول: استقبلَ الحَسنُ بن علي معاوية بكتائب أمثال الجبال، فقال عمرو بن العاص: والله إني لأرى كتائب لا تُولِّي أو تقتل أقرانها، فقال معاوية - وكان خير الرجُلين -: أرأيت إن قَتلَ هؤلاء هؤلاء، مَن لي بدمائهم؟ من لي بأمورهم؟ من لي بنسائهم؟ قال: فبعث معاوية عبد الرحمن بن سَمُرة بن حبيب بن عبد شمس - قال سفيان: وكانت له صحبةٌ - فصالح الحسنُ معاوية وسلَّم الأمر له، وبايعه بالخلافة على شروطٍ ووثائق، وحَمَلَ معاوية إلى الحسن مالًا عظيمًا يقال: خمس مئة ألف ألف درهم، وذلك في جمادى الأولى سنة إحدى وأربعين، وإنما كان وَلِيَ إلى أن سَلَّمَ الأمرَ [1] لمعاوية سبعة أشهرٍ وأحد عشر يومًا [2].




আল-হাসান থেকে বর্ণিত: আল-হাসান ইবন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পাহাড়ের মতো বিশাল সেনাদল নিয়ে মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মুখোমুখি হলেন। তখন আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমি এমন বাহিনী দেখছি যারা হয় পিছু হটবে না, নয়তো তাদের সমকক্ষ সকলকে হত্যা করবে। তখন মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন—আর তিনি ছিলেন (সেখানে উপস্থিত) দু'জন ব্যক্তির মধ্যে শ্রেষ্ঠ—: তোমরা কি দেখছো না, যদি এরা এদের হত্যা করে, তবে তাদের রক্তপাতের দায়ভার কে নেবে? তাদের কাজগুলোর ভার কে নেবে? তাদের স্ত্রীদের ভার কে নেবে? (বর্ণনাকারী) বলেন: অতঃপর মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আব্দুর রহমান ইবনু সামুরাহ ইবনু হাবীব ইবনু আবদি শামস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে প্রেরণ করলেন। (সুফিয়ান বলেন: তিনি একজন সাহাবী ছিলেন)। তখন আল-হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সন্ধি করলেন এবং তাঁর হাতে শাসনভার তুলে দিলেন। কিছু শর্ত ও দলিলের ভিত্তিতে তিনি তাঁর হাতে খিলাফতের বায়'আত গ্রহণ করলেন। মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল-হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য বিপুল পরিমাণ অর্থ বহন করে আনলেন, বলা হয়ে থাকে তা পাঁচ শত হাজার হাজার দিরহাম ছিল। এটি একচল্লিশ (৪১) হিজরীর জুমাদাল উলা মাসে ঘটেছিল। মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে শাসনভার তুলে দেওয়া পর্যন্ত তিনি মাত্র সাত মাস এগারো দিন দায়িত্ব পালন করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت من (م) و (ع)، وجاءت العبارة في بقية النسخ مُشوّشة. فقد رواه عن خالد بن الحارث غيرُ واحد هكذا بذكر أنس بدل أبي بكرة، والحديث محفوظٌ لأبي بكرة، كما رواه محمد بن عبد الله الأنصاري عن الأشعث بن عبد الملك، وكما رواه غير الأشعث عن الحسن أيضًا، على أنَّ مثل هذا الاختلاف لا يضر، لأنَّ الحديث حيث دار كان عن صحابي، وكلهم عدول.وأخرجه أحمد 34 / (20392)، والبخاري (2704) و (3629) و (3746) و (7109)، والنسائي (1730) و (8110) و (10010) من طريق أبي موسى إسرائيل بن موسى، وأحمد (20448) و (20516)، وابن حبان (6964) من طريق المبارك بن فضالة، كلاهما عن الحسن البصري، عن أبي بكرة.وقد تابعهم على رواية هذا الخبر عن الحسن البصري موصولًا بذكر أبي بكرة جماعةٌ ذكر رواياتهم ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 13/ 2310 - 238، منهم منصور بن زاذان ويونس بن عُبيد.وأخرجه النسائي (10012) من طريق عوف الأعرابي، و (13) من طريق داود بن أبي هند، و (10014) من طريق هشام بن حسان، ثلاثتهم عن الحسن البصري مرسلًا. ومثل هذا لا يضرُّ ما دام ثبت الوصل من طرق عن الحسن البصري.وسيأتي موصولًا بذكر أبي بكرة كذلك من طريق علي بن زيد بن جُدعان عن الحسن البصري.



[2] إسناده صحيح. الحميدي: هو عبد الله بن الزبير بن عيسى الأسدي، وسفيان: هو ابن عُيينة وأبو موسى: هو إسرائيل بن موسى، والحسن: هو ابن أبي الحسن البصري.وأخرجه البخاري (2704) عن عبد الله بن محمد المُسنَدي، و (7109) عن علي بن عبد الله المديني، كلاهما عن سفيان بن عيينة، به. وزادا: أن معاوية أرسل مع عبد الرحمن بن سمُرة رجلًا آخر هو عبد الله بن عامر بن كُريز، ولم يذكرا فيه ما أعطاه معاوية للحسن من مالٍ عظيم، ولا مدة خلافة الحسن بن علي.وقوله: يقال: خمس مئة ألف ألف درهم، كذلك جاء في نسخ "المستدرك"، وضُبِّب في (ز) على الألف الثانية، والظاهر أنَّ ذكر الألف الثانية وهمٌ، فقد روى عبد الله بن بُريدة بسند قوي عند ابن أبي شيبة 11/ 94، وأبي عروبة الحراني في "الأوائل" (168) وغيرهما: أن معاوية قال للحسن بن علي: لأُجيزنّك بجائزة لم أُجِزْ بها أحدًا قبلك، ولا أُجيزُ بها أحدًا بعدك من العرب، فأجازه بأربع مئة ألف درهم، فقبلها. وهذا يؤيد الوهم في زيادة الألف الثانية. فقد رواه عن خالد بن الحارث غيرُ واحد هكذا بذكر أنس بدل أبي بكرة، والحديث محفوظٌ لأبي بكرة، كما رواه محمد بن عبد الله الأنصاري عن الأشعث بن عبد الملك، وكما رواه غير الأشعث عن الحسن أيضًا، على أنَّ مثل هذا الاختلاف لا يضر، لأنَّ الحديث حيث دار كان عن صحابي، وكلهم عدول.وأخرجه أحمد 34 / (20392)، والبخاري (2704) و (3629) و (3746) و (7109)، والنسائي (1730) و (8110) و (10010) من طريق أبي موسى إسرائيل بن موسى، وأحمد (20448) و (20516)، وابن حبان (6964) من طريق المبارك بن فضالة، كلاهما عن الحسن البصري، عن أبي بكرة.وقد تابعهم على رواية هذا الخبر عن الحسن البصري موصولًا بذكر أبي بكرة جماعةٌ ذكر رواياتهم ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 13/ 2310 - 238، منهم منصور بن زاذان ويونس بن عُبيد.وأخرجه النسائي (10012) من طريق عوف الأعرابي، و (13) من طريق داود بن أبي هند، و (10014) من طريق هشام بن حسان، ثلاثتهم عن الحسن البصري مرسلًا. ومثل هذا لا يضرُّ ما دام ثبت الوصل من طرق عن الحسن البصري.وسيأتي موصولًا بذكر أبي بكرة كذلك من طريق علي بن زيد بن جُدعان عن الحسن البصري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4869)


4869 - فأخبرنا عبد الرحمن بن حَمْدان والحُسين بن الحسن، قالا: حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، حدثنا أشعث بن عبد الملك، عن الحسن عن أبي بَكْرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم الحسن بن علي: "إِنَّ ابني هذا سيِّدٌ، لعل الله أن يُصلِحَ به بين فئتين من المسلمين عظيمتين" [1].




আবু বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসান ইবন আলী সম্পর্কে বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমার এই সন্তান একজন সাইয়িদ (নেতা)। সম্ভবত আল্লাহ তার মাধ্যমে মুসলমানদের দুটি বিশাল দলের মধ্যে সন্ধি স্থাপন করাবেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. وقد اختلف فيه على الحسن - وهو البصري - في وصله وإرساله، وفي تسمية صحابيِّه اختلافًا لا يضر مثله كما سيأتي بيانه.وأخرجه أبو داود (4662) عن محمد بن المثنى، والترمذي (3773) عن محمد بن بشار، كلاهما عن محمد بن عبد الله الأنصاري، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن صحيح.وأخرجه النسائي (10011) من طريق خالد بن الحارث، عن أشعث بن عبد الملك، عن الحسن، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم؛ يعني أنسًا، فذكر مثله. وهذا خطأ من خالد بن الحارث فيما نظنُّ، فقد رواه عن خالد بن الحارث غيرُ واحد هكذا بذكر أنس بدل أبي بكرة، والحديث محفوظٌ لأبي بكرة، كما رواه محمد بن عبد الله الأنصاري عن الأشعث بن عبد الملك، وكما رواه غير الأشعث عن الحسن أيضًا، على أنَّ مثل هذا الاختلاف لا يضر، لأنَّ الحديث حيث دار كان عن صحابي، وكلهم عدول.وأخرجه أحمد 34 / (20392)، والبخاري (2704) و (3629) و (3746) و (7109)، والنسائي (1730) و (8110) و (10010) من طريق أبي موسى إسرائيل بن موسى، وأحمد (20448) و (20516)، وابن حبان (6964) من طريق المبارك بن فضالة، كلاهما عن الحسن البصري، عن أبي بكرة.وقد تابعهم على رواية هذا الخبر عن الحسن البصري موصولًا بذكر أبي بكرة جماعةٌ ذكر رواياتهم ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 13/ 2310 - 238، منهم منصور بن زاذان ويونس بن عُبيد.وأخرجه النسائي (10012) من طريق عوف الأعرابي، و (13) من طريق داود بن أبي هند، و (10014) من طريق هشام بن حسان، ثلاثتهم عن الحسن البصري مرسلًا. ومثل هذا لا يضرُّ ما دام ثبت الوصل من طرق عن الحسن البصري.وسيأتي موصولًا بذكر أبي بكرة كذلك من طريق علي بن زيد بن جُدعان عن الحسن البصري.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4870)


4870 - وحدثنا محمد بن هانئ، حدثنا الحسين بن الفضل، حدثنا عفان وسليمان بن حرب، قالا حدثنا حماد بن زيد، حدثنا علي بن زيد، عن الحسن، عن أبي بكرة قال: بَيْنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطُب الناس إذ جاء الحَسنُ بن علي فصَعِد إليه فضمه رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال: "ألا إن ابني هذا سيّدٌ، وإنَّ الله عز وجل عَلَّه أن يُصلح به بين فئتين من المسلمين عظيمتين" [1].




আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিচ্ছিলেন, তখন আল-হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে তাঁর (মিম্বরের) উপর আরোহণ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে জড়িয়ে ধরলেন এবং বললেন: "সাবধান! নিশ্চয় আমার এই ছেলেটি হল 'সাইয়্যিদ' (সর্দার), আর আল্লাহ তাআলা আশা করেন যে, সে তার দ্বারা মুসলমানদের দুটি বিরাট দলের মধ্যে মীমাংসা করিয়ে দেবেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف علي بن زيد - وهو ابن جدعان - غير أنه روى هذا الحديث عن الحسن - وهو البصري - جماعةٌ كما تقدَّم تخريجه عند الطريق التي قبل هذه.وأخرجه أحمد 34 / (20499)، وأبو داود (4662) من طرق عن حماد بن زيد بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4871)


4871 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوْرِي، حدثنا قُرَادٌ أبو نُوح، أخبرنا القاسم بن الفضل، عن يوسف بن مازن، قال: عَرَض رجلٌ للحسن بن علي حين بايع معاوية، فأنبَّه وقال: سَوَّدت وجوه المؤمنين، وفعلتَ وفعلت، فقال: لا تُؤنِّبني، فإنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى بني أميَّة يتواثَبُون على مِنبَره رجلًا رجلًا، فشق ذلك عليه واهتمَّ، فأنزل الله عز وجل: {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ (1)} [الكوثر: 1] نهرٌ في الجنة، {إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ (1) وَمَا أَدْرَاكَ مَا لَيْلَةُ الْقَدْرِ (2) لَيْلَةُ الْقَدْرِ خَيْرٌ مِنْ أَلْفِ شَهْرٍ}، يقولُ [1]: بَعدَك [2].




হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে বাইআত করলেন, তখন একজন লোক তাঁকে বাধা দিয়ে তিরস্কার করে বলল: আপনি মু’মিনদের মুখ কালো করে দিয়েছেন, আপনি এই করেছেন, সেই করেছেন। তখন তিনি (হাসান) বললেন: আমাকে তিরস্কার করো না। নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দেখেছিলেন যে বনু উমাইয়্যার লোকেরা তাঁর মিম্বরে একে একে ঝাঁপিয়ে পড়ছে, এতে তিনি দুঃখিত ও চিন্তিত হলেন। অতঃপর মহান আল্লাহ তা'আলা নাযিল করলেন: {নিশ্চয়ই আমি আপনাকে কাওছার দান করেছি। (১)} [সূরা কাওছার: ১]। (কাওছার হলো) জান্নাতের একটি নহর। (এবং নাযিল করলেন) {নিশ্চয়ই আমি তা (কুরআন) নাযিল করেছি কদরের রাতে। (১) আর কদরের রাত সম্পর্কে আপনি কি জানেন? (২) কদরের রাত হাজার মাস অপেক্ষা শ্রেষ্ঠ।} তিনি বলেন: (এই হাজার মাস হলো) আপনার (রাসূলের) পরে।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت من (ص) و (م)، وهو أسلوب شائع في الروايات يُستعمل فصلًا بين الكلام يُراد به التفسير، والتقدير: خير من ألف شهر يريدُ ألف شهر بعدك يملكون فيها، كما دلت عليه روايات أخرى للخبر، كالرواية المتقدمة برقم (4852). وفي (ز) و (ب) كأنها: يقفون. العباس بن عبد العظيم، كلاهما (ابن أبي شيبة والعباس) عن أسود بن عامر، به.وانظر ما تقدم برقم (4853).والحِدّة: الغضب. والحَرَد: الغضب أيضًا.



[2] خبر منكر كما تقدم بيانه برقم (4852) حيث تقدم هناك من طريقين عن القاسم بن الفضل.قُراد أبو نوح: هو عبد الرحمن بن غزوان، وقُراد لقبٌ، له. العباس بن عبد العظيم، كلاهما (ابن أبي شيبة والعباس) عن أسود بن عامر، به.وانظر ما تقدم برقم (4853).والحِدّة: الغضب. والحَرَد: الغضب أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4872)


4872 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا الأسود بن عامر شاذانُ، حدثنا زهير بن معاوية، حدثنا أبو رَوْق الهَمْداني، حدثنا أبو الغريف، قال: كنا في مُقدّمة الحسن بن علي اثني عشر ألفًا تقطُر أسيافُنا من الحدّة على قتال أهل الشام، وعلينا أبو العمرطة، فلما أتانا صُلحُ الحسن بن علي ومعاوية كأنما كُسِرت ظُهورنا من الحَرَد والغيظ، فلما قدم الحسن بن علي الكوفة قام إليه رجلٌ منا يُكنى أبا عامر سفيان بن لَيْل فقال: السلام عليك يا مُذلَّ المؤمنين، فقال الحسن: لا تقل ذاك يا أبا عامر، لم أُذِلَّ المؤمنين، ولكن كرهت أن أقتُلَهم في طَلَبِ المُلك [1].




আবূল গুরাইফ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অগ্রবর্তী সেনাদলে বারো হাজার ছিলাম। আমাদের তলোয়ারগুলো তীব্রতার কারণে সিরিয়াবাসীর বিরুদ্ধে যুদ্ধের জন্য টলমল করছিল। আমাদের সেনাপতি ছিলেন আবূল উমারতাহ। যখন হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং মু‘আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে সন্ধির খবর আমাদের কাছে পৌঁছাল, তখন ক্রোধ ও আক্রোশে যেন আমাদের পিঠ ভেঙে গেল। এরপর যখন হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কুফায় এলেন, তখন আমাদের মধ্য থেকে আবূ আমির সুফিয়ান ইবনে লায়ল নামক এক ব্যক্তি তাঁর কাছে উঠে দাঁড়িয়ে বলল: আসসালামু আলাইকুম, হে মুমিনদের লাঞ্ছিতকারী! তখন হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আবূ আমির! তুমি এমন কথা বলো না। আমি মুমিনদের লাঞ্ছিত করিনি, বরং আমি কেবল রাজত্ব লাভের জন্য তাদের হত্যা করা অপছন্দ করেছি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده قوي من أجل أبي رَوْق الهَمْداني: واسمه عطية بن الحارث. أبو الغَرِيف: هو عُبيد الله بن خليفة الهَمْداني، وهذا وثّقه العجلي ويعقوب بن سفيان والدارقطني وذكره ابن حبان في "الثقات".وأخرجه الخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 12/ 6، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 13/ 279، وابن الجوزي في "المنتظم" 5/ 184، والمزِّي في "تهذيب الكمال" في ترجمة الحسن بن علي 6/ 250 من طريق محمد بن أحمد بن إبراهيم الحكيمي، عن العباس بن محمد، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 93، وأخرجه الخطيب 12/ 6، وابن عساكر 13/ 279 من طريق العباس بن عبد العظيم، كلاهما (ابن أبي شيبة والعباس) عن أسود بن عامر، به.وانظر ما تقدم برقم (4853).والحِدّة: الغضب. والحَرَد: الغضب أيضًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4873)


4873 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق وعلي بن حَمْشاذ، قالا: حدثنا بِشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، حدثنا مُجالِد بن سعيد، عن الشَّعْبي، قال: خطبنا الحَسنُ بن عليٍّ بالنُّخَيلة [1] حين صالَحَ معاوية، فقام فحَمِدَ الله وأثنى عليه، ثم قال: إِنَّ أكْيَسَ الكَيْس التُّقَى، وإن أعْجَزَ العَجْزِ الفُجور، وإنَّ هذا الأمر الذي اختلفتُ فيه أنا ومعاوية حقٌّ لامرئٍ كان أحق بحقِّه مني، أو حقٌّ لي تركتُه لمعاوية إرادة استصلاح المسلمين وحقن دمائهم، {وَإِنْ أَدْرِي لَعَلَّهُ فِتْنَةٌ لَكُمْ وَمَتَاعٌ إِلَى حِينٍ}، أقول قولي هذا، وأستغفر الله لي ولكم [2].




শা‘বী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মু‘আবিয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে সন্ধি করলেন, তখন তিনি নুখাইলা নামক স্থানে আমাদের মাঝে ভাষণ দেন। তিনি দাঁড়ালেন এবং আল্লাহ তা‘আলার প্রশংসা ও গুণগান করলেন, অতঃপর বললেন: নিশ্চয়ই বুদ্ধিমানদের মধ্যে সবচেয়ে বুদ্ধিমান হলো তাকওয়া (আল্লাহভীতি)। আর অপারগদের মধ্যে সবচেয়ে অপারগ হলো ফুজুর (পাপাচারে লিপ্ত হওয়া)। আর আমি ও মু‘আবিয়া যে বিষয়ে মতভেদ করেছি, তা এমন একজন ব্যক্তির প্রাপ্য ছিল, যিনি আমার চেয়েও এর অধিকারের বেশি হকদার ছিলেন। অথবা এটি আমার প্রাপ্য ছিল, যা আমি মু‘আবিয়ার জন্য ছেড়ে দিয়েছি, মুসলিমদের মধ্যে শান্তি স্থাপন এবং তাদের রক্তপাত বন্ধ করার উদ্দেশ্যে। আল্লাহ্‌র বাণী: “আমি জানি না, সম্ভবত এটা তোমাদের জন্য পরীক্ষা এবং নির্দিষ্ট সময় পর্যন্ত ভোগ-উপকরণ মাত্র।” (২১:১১১) আমি আমার এই কথা বললাম, আর আমি আল্লাহ্‌র কাছে আমার ও তোমাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করছি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في (ب) إلى: النخلة، وفي (ص) و (م) و (ع) إلى: المخيلة، بالميم بدل النون. والنُّخيلة تصغير نخلة، وهو موضعٌ قرب الكوفة. وأخرج نحوه أيضًا ابن سعد 6/ 383، ومن طريقه ابن عساكر 13/ 275 من طريق عوف الأعرابي، ومعمر في "جامعه" (20980)، ومن طريقه الآجري في "الشريعة" (1661)، والطبراني في "الكبير" (2748)، والبيهقي في "الكبرى" 8/ 173، وفي "الدلائل" 6/ 444 عن أيوب السَّختياني، كلاهما (عوف وأيوب) عن محمد بن سيرين، فذكر الخطبة مختصرة.وأخرج نحوه كذلك أحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (1355)، ومن طريقه ابن عساكر 13/ 272 من طريق عبد الله بن عون عن أنس بن سِيرِين - وهو أخو محمد - فذكر الخطبة مختصرة أيضًا.والكيس: العقل. والعَجز: عكسُه.



[2] خبر قوي، وهذا إسناد ضعيف لضعف مجالد بن سعيد، لكن مع ضعفه يُعتبر به، وقد رويت خطبة الحسن بن علي لدى مصالحته مع معاوية من وجوهٍ. سفيان: هو ابن عُيينة، والشَّعْبي: هو عامر بن شراحيل.وأخرجه ابن أبي شيبة 11/ 142 و 15/ 100، والطبراني في "الكبير" (2559)، وأبو نعيم الأصبهاني في "الحلية" 2/ 37، وفي "معرفة الصحابة" (1759)، والبيهقي في "الكبرى" 8/ 173، وفي "دلائل النبوة" 6/ 444، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 13/ 274 من طرق عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد 6/ 384، والبيهقي في "الكبرى" 8/ 173، وفي "الدلائل" 6/ 444، وابن عساكر 13/ 273 و 274 من طريق هُشيم بن بشير، عن مجالد بن سعيد، به.وأخرج نحوه اللالكائي في "شرح أصول الاعتقاد" (2799)، وابن عساكر 13/ 275 من طريق عمرو بن دينار المكي، فذكر القصة بزيادة ليست في رواية الشَّعْبي في مشورة الحسن بن علي في المصالحة ابن عمه عبد الله بن جعفر بن أبي طالب، وموافقته على المصالحة هو وأخوه الحسين بن علي بعد منازعة جرت بينهما أولًا ثم نزول الحُسين عند رأي أخيه الحسن. ورجاله ثقات عن آخرهم. وأخرج نحوه أيضًا ابن سعد 6/ 383، ومن طريقه ابن عساكر 13/ 275 من طريق عوف الأعرابي، ومعمر في "جامعه" (20980)، ومن طريقه الآجري في "الشريعة" (1661)، والطبراني في "الكبير" (2748)، والبيهقي في "الكبرى" 8/ 173، وفي "الدلائل" 6/ 444 عن أيوب السَّختياني، كلاهما (عوف وأيوب) عن محمد بن سيرين، فذكر الخطبة مختصرة.وأخرج نحوه كذلك أحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (1355)، ومن طريقه ابن عساكر 13/ 272 من طريق عبد الله بن عون عن أنس بن سِيرِين - وهو أخو محمد - فذكر الخطبة مختصرة أيضًا.والكيس: العقل. والعَجز: عكسُه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4874)


4874 - حدثنا إسحاق بن محمد بن خالد الهاشمي بالكوفة، حدثنا عيسى بن مِهران القَيسي، حدثنا عبيد الله بن موسى العَبسي، حدثنا حماد بن واصل، حدثتني فاطمة بنت الحارث، عن أبيها: أنَّ عليًا كان يقول للحسن: خالِعُ سِرْبالِه [1].




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতেন: (সে হলো) পোশাক পরিহারকারী (বা খুলে ফেলাকারী)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] موضوعٌ، فإنَّ عيسى بن مِهْران هذا هو المستعطف، وقد كذبه أبو حاتم الرازي، وقال ابن عدي: حدّث بأحاديث موضوعة مناكير، وهو مُحترق في الرفض، وقال الدارقطني: هو رجل سوء وله مذهب سوء، وقال الخطيب: وقع إليَّ كتاب من تصنيفه في الطعن علي الصحابة وتضليلهم وإكفارهم وتفسيقهم. قلنا: وحماد بن واصل لم نَرَ له ذكرًا في غير هذا الخبر، وقد ذكره الطوسي في رجال الشيعة في أصحاب جعفر بن محمد الصادق.والسِّربال: القميص. أبيه معاوية بطريق الأولى والأحرى.وخبر قتادة أخرجه أبو العرب القيرواني في "المِحَن" ص 141 عن عبد العزيز بن شيبة الأزدي، عن أحمد بن المقدام، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد 6/ 387، ومن طريقه ابن عساكر 13/ 284 من طريق المغيرة بن مِقسم، عن أم وأم موسى هذه تابعية تقدم الكلام عليها برقم (4722)، وحديثُها محتمل للتحسين. وزادت في روايتها: فاشتكى منه - أي: السَّم - شكاةٌ، فكان يوضع تحته طَسْتٌ وتُرفع أخرى نحوًا من أربعين يومًا. ولم تذكر أم موسى الرشوة بالمال.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4875)


4875 - أخبرني محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا أحمد بن المِقدام، حدثنا زهير بن العلاء، حدثنا سعيد بن أبي عَروبة، عن قتادة بن دِعامة السَّدُوسي، قال: سَمَّتِ ابنةُ الأشعث بن قيس الحسن بن علي وكانت تحته، ورُشِيَت على ذلك مالًا [1].




কাতাদাহ ইবনু দি'আমাহ আস-সাদূসী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আশআছ ইবনু কাইসের কন্যা, যিনি হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহে ছিলেন, তাঁকে বিষ প্রয়োগ করেছিল। আর এই কাজের জন্য তাকে অর্থ (উৎকোচ) দেওয়া হয়েছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف زهير بن العلاء، ولإرساله فإنَّ قتادة لم يُدرك زمن الحسن بن عليّ، لكن رُوي الخبرُ من وجه آخر كما سيأتي.وقد جاء في بعض الروايات غير المسندة أنَّ الذي دفَعَ ابنة الأشعث - واسمها جَعْدة - لأن تَسُمَّ الحسن بن علي هو معاوية بن أبي سفيان، وفي رواية غير مسندة أنه يزيد بن معاوية بن أبي سفيان، قال ابن كثير في "البداية والنهاية" 11/ 209: عندي أنَّ هذا ليس بصحيح، وعدم صحته عن أبيه معاوية بطريق الأولى والأحرى.وخبر قتادة أخرجه أبو العرب القيرواني في "المِحَن" ص 141 عن عبد العزيز بن شيبة الأزدي، عن أحمد بن المقدام، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد 6/ 387، ومن طريقه ابن عساكر 13/ 284 من طريق المغيرة بن مِقسم، عن أم وأم موسى هذه تابعية تقدم الكلام عليها برقم (4722)، وحديثُها محتمل للتحسين. وزادت في روايتها: فاشتكى منه - أي: السَّم - شكاةٌ، فكان يوضع تحته طَسْتٌ وتُرفع أخرى نحوًا من أربعين يومًا. ولم تذكر أم موسى الرشوة بالمال.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4876)


4876 - حدثنا علي بن عيسى، حدثنا الحسين بن محمد بن زياد، حدثنا الفضل بن غسان الأنصاري، حدثنا معاذ بن معاذ وأشهَل بن حاتم، عن ابن عَوْن، عن عُمير بن إسحاق: أنَّ الحسن بن عليٍّ قال: لقد بُلْتُ [1] طائفةً من كبدي قبيلُ بعُودٍ [2] كان معي، ولقد سُقِيتُ السمَّ مرارًا، فما سُقِيتُ مثل هذا [3].




হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার কলিজার একটি অংশ আমার সাথে থাকা একটি কাঠি দ্বারা নিঃসরণ করেছিলাম। আমাকে বহুবার বিষ পান করানো হয়েছিল, কিন্তু এর মতো (মারাত্মক) বিষ আর কখনো পান করানো হয়নি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك أُعجمت وضُبطت هذه اللفظة في (ز) و (ب)، و "تلخيص المستدرك" للذهبي، وأُهمل في (ص) و (م) الحرفُ الأول منها، وكتب بهامشهما ما نصه: صوابه: قلبت طائفةً من كبدي بعود كان معي. قلنا: لعلّ ما وقع في (ز) وغيرها فعلٌ مشتقٌّ من البالَة، وهي عصا فيها زُجٌّ، ويكون المعنى: غرزتُ البالة في قطعة الكبد هذه ورفعتها لأتفحصها.



[2] تحرَّف في أصل النسخ إلى: بعد.



4876 [3] - رجاله لا بأس بهم غير الفضل بن غسان الأنصاري، فلم نقف له على ذكر في غير هذا الإسناد، ولكنه متابع. ابن عون: هو عبد الله.وأخرجه ابن سعد 6/ 386، وابن أبي شيبة 15/ 94، وابن أبي الدنيا في "المحتضرين" (132)، وأبو نُعيم الأصبهاني في "حلية الأولياء" 2/ 38، وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 182 - 183، وابن عساكر 13/ 282 من طرق عن عبد الله بن عون، به.وانظر ما تقدَّم برقم (4860).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4877)


4877 - حدثنا أبو علي الحافظ، حدثنا عبد الله بن قَحْطَبة، حدثنا الحسين بن أبي كبشة، حدثنا عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثنا سلام بن مسكين، عن عِمران بن عبد الله، قال: رأى الحسنُ بن علي فيما يرى النائمُ بين عينيه مكتوبًا {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}، فقصَّها على سعيد بن المسيب فقال: إن صَدَقَت رُؤياكَ فقد حَضَرَ أجلُك، قال: فسُمَّ في تلك السنة ومات، رحمة الله عليه [1] ‌‌أول فضائل أبي عبد الله الحسين بن علي الشهيد ابن فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم وعلى آله




ইমরান ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আল-হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) স্বপ্নে দেখলেন যে, ঘুমন্ত ব্যক্তি যা দেখে, তাঁর দুই চোখের মাঝে তাতে "{قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}" (ক্বুল হুওয়াল্লাহু আহাদ) লেখা। তিনি এ স্বপ্ন সাঈদ ইবনু মুসাইয়্যাব (রাহিমাহুল্লাহ)-এর কাছে বর্ণনা করলেন। তখন তিনি বললেন: যদি তোমার স্বপ্ন সত্য হয়, তবে তোমার মৃত্যুর সময় নিকটবর্তী হয়েছে। তিনি বললেন: অতঃপর সেই বছরই তাঁকে বিষ প্রয়োগ করা হলো এবং তিনি ইন্তেকাল করলেন, আল্লাহ তাঁর উপর রহমত বর্ষণ করুন। এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমার পুত্র আবূ আব্দুল্লাহ আল-হুসাইন ইবনু আলী আশ-শাহীদ ও তাঁর পরিবারের প্রথম ফযীলতসমূহের সূচনা।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسنادُه حسن من أجل عمران بن عبد الله: وهو ابن طلحة الخُزاعي، وله رواية عن ابن المسيب، إلّا أنه لم يدرك الحسن بن علي، فروايته هذه مرسلة.وأخرجه ابن سعد 6/ 386، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (399)، وابن عساكر 13/ 281 من طرق عن سلام بن مسكين، به. أما الشطر الثاني، فقد انفرد محمد بن مصعب بذكر أم الفضل في قصة مقتل الحسين هذه، وخالفه غيره كما سيأتي فلم يذكروا هذه القصة أصلًا في حديث أم الفضل، ورويت هذه القصة من غير هذا الوجه بذكر أم سلمة، وهو الأشبه بالصواب، كما سيأتي لاحقًا، والله تعالى أعلم.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 468 - 469، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 14/ 196 - 197 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الشجري في "أماليه" 1/ 188 من طريق أخي كروجة، وابن عساكر 14/ 196 من طريق محمد بن إسماعيل بن أبي سمينة كلاهما عن محمد بن مصعب به وسيأتي عند المصنف برقم (4884) من طريق ابن أبي سمينة، لكن مختصر بالشطر الأول فقط.وأخرج القصة الأولى منه في رؤيا أم الفضل: الطبراني في "الكبير" 25 / (42) عن أبي زيد أحمد بن يزيد الحوطي، وفي "الدعاء" (1975) عن محمد بن سهل بن المهاجر الرقي، كلاهما عن محمد بن مصعب به.وأخرج هذه القصة أيضًا أحمد 44/ (26878)، ومن طريقه ابن الجوزي في "التحقيق في مسائل الخلاف" (88) من طريق عبد الله بن الحارث بن نوفل، عن أم الفضل بنت الحارث. وإسناده صحيح. وفيه أنَّ أم الفضل أرضعت الحُسين بلبن ولدها قُثَم بن العباس. وقد وقع في أكثر نُسخ "مسند أحمد" ذكر الحَسن بدل الحُسين، وإنما هو الحُسين جزمًا كما وقع في نسخة خطية من نسخه المتقنة، وكذلك جاء في التنقيح لابن الجوزي من طريق "المسند" نفسه، وهو ما جاء في أكثر طرق هذا الحديث، وأورد أكثر أهل التراجم والتاريخ هذه القصة في ترجمة الحُسين، كابن سعد في "طبقاته" 6/ 400، ومصعب الزبيري في "نسب قريش" ص 24، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 14/ 114، وابن العديم في "تاريخ حلب" 6/ 2566، والمزي في "تهذيب الكمال" 6/ 398، وأشار الذهبي في سير أعلام النبلاء" في ترجمة قُثَم بن العباس 3/ 440 إلى أنَّ قُثم كان أخا الحُسين بن علي في الرّضاعة، وأورد ابن كثير القصة في "البداية والنهاية" 9/ 238 في باب إخباره عليه الصلاة والسلام بمقتل الحُسين بن علي.على أنَّ بعض من ترجم للحَسن بن علي أورد هذه القصة في ترجمته، استنادًا إلى ما وقع لهم في بعض الروايات خطأً، وممن أورد القصة في ترجمة الحَسَن: الطبراني 3/ (2541)، وأبو نُعيم في "تاريخ أصبهان"، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 488، والنووي في "تهذيب الأسماء واللغات"، ومُغَلْطاي في "إكمال تهذيب الكمال"، والصالحي في سبل الهدى والرشاد المعروف بالسيرة الشامية 11/ 64.وأخرج القصة الأولى كذلك أحمد 44 / (26875) من طريق إسرائيل بن يونس السبيعي، وابن ماجه (3923) من طريق علي بن صالح بن صالح بن حي، كلاهما عن سماك بن حرب، عن قابوس بن أبي المخارق قال إسرائيل: عن أم الفضل، وقال علي بن صالح عن قابوس قال: قالت أم الفضل" يا رسول الله، فذكره مرسلًا. وبعضهم يرويه عن قابوس عن أبيه عن أم الفضل، وبعضهم يرويه عن سماك: أنَّ أم الفضل مرسلًا، وصوّب الدارقطني في "العلل" (4100) رواية من رواه عن قابوس عن أم الفضل. فإذا صحَّ ذلك فالإسناد حسنٌ. وقد جاء في أكثر نسخ "المسند" أيضًا: الحَسن بدل الحُسين، وهو خطأ، فقد جاء في بعض نسخه على الصواب، وهو الذي تؤيده سائر روايات الحديث.وأما القصة الثانية في إخبار الملَك للنبي صلى الله عليه وسلم بمقتل الحُسين وإراءته تربة حمراء من تربته، فقد رويت لأم سلمة وليس لأم الفضل كما سيأتي عند المصنف برقم (8402) بإسناد ضعيف، لكن للخبر طرق بمجموعها يمكن أن يحسن بها.ويشهد لها بذكر أم سلمة حديثُ أنس بن مالك عند أحمد 21/ (13539) و (13794)، وابن حبان (6742). وفي إسناده لِينٌ.وحديثُ أبي أمامة عند الطبراني في "الكبير" (8096)، ومن طريقه ابن عساكر 14/ 190 - 191، وفي إسناده من هو مضعَّف ومن لم نقف له على ترجمة، ومع ذلك فقد حسَّنه الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 3/ 289.وحديثُ أبي الطفيل بن وائلة عند الطبراني كما في "مجمع الزوائد" للهيثمي 9/ 190، وحسَّن إسنادَه. ولم نقف على إسناده، فالعُهدة فيه عليه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4878)


4878 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن علي الجوهَري ببغداد، حدثنا أبو الأحوص محمد بن الهيثم القاضي، حدثنا محمد بن مصعب، حدثنا الأوزاعي، عن أبي عمار شداد بن عبد الله، عن أم الفضل بنت الحارث: أنها دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله، إني رأيت حُلْمًا منكرًا الليلةَ، قال: "وما هو؟ " قالت: إنه شديد، قال: "وما هو؟ " قالت: رأيتُ كأنَّ قِطعةً من جسدك قطعتْ ووُضِعتْ في حَجْري، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رأيت خيرًا، تلد فاطمة إن شاء الله غلامًا، فيكون في حَجْرِك"، فولدت فاطمةُ الحُسين فكان في حَجْري، كما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم.فدخلتُ يومًا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فوضعته في حَجْره، ثم حانت مني التفاتةٌ فإذا عينا رسول الله صلى الله عليه وسلم تُهريقانِ الدُّموع، قالت: فقلت: يا نبي الله، بأبي أنت وأمي، ما لك؟ قال: "أتاني جبريل عليه السلام، فأخبرني أنَّ أمتي ستقتُل ابني هذا" فقلتُ: هذا؟ قال: "نعم، وأتاني بتُربةٍ من تُربتِه حمراء" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




উম্মুল ফাদল বিনতে আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশ করে বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি গত রাতে একটি খারাপ স্বপ্ন দেখেছি।" তিনি বললেন, "সেটা কী?" তিনি বললেন, "এটি খুবই গুরুতর।" তিনি বললেন, "সেটা কী?" তিনি বললেন, "আমি স্বপ্নে দেখলাম যে, আপনার দেহ থেকে একটি টুকরা বিচ্ছিন্ন করা হয়েছে এবং সেটি আমার কোলে রাখা হয়েছে।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি কল্যাণের স্বপ্ন দেখেছো। ইন শা আল্লাহ, ফাতিমা একটি পুত্র সন্তান প্রসব করবে এবং সে তোমার কোলেই থাকবে।" অতঃপর ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হুসাইনকে জন্ম দিলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেমন বলেছিলেন, তেমনি সে আমার কোলেই ছিল।

একদিন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলাম এবং তাকে (হুসাইনকে) তাঁর কোলে রাখলাম। এরপর আমি যখন অন্যদিকে তাকালাম, দেখলাম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দু'চোখ বেয়ে অশ্রু ঝরছে। তিনি (উম্মুল ফাদল) বললেন, তখন আমি বললাম, "ইয়া নাবিআল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার উপর কোরবান হোক, আপনার কী হয়েছে?" তিনি বললেন, "আমার নিকট জিবরীল (আঃ) এসেছিলেন। তিনি আমাকে জানিয়েছেন যে, আমার উম্মত আমার এই সন্তানটিকে হত্যা করবে।" আমি জিজ্ঞাসা করলাম, "এই সন্তানটিকে?" তিনি বললেন, "হ্যাঁ। এবং তিনি (জিবরীল) এর লাল মাটির কিছু অংশও আমার কাছে নিয়ে এসেছিলেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف في محمد بن مصعب - وهو القَرقساني - ولانقطاعه، فإنَّ أبا عمار شداد بن عبد الله لم يدرك أم الفضل بنت الحارث كما قال الذهبي في "تلخيصه"، وأم الفضل هي لُبابة زوج العباس بن عبد المطلب وأم أولاده، وقد ماتت أم الفضل في خلافة عثمان وصلَّى هو عليها، وشداد إنما سمع ممَّن تأخر موته من الصحابة، لكن رويت قصة رؤيا أم الفضل في الشطر الأول من هذا الحديث من وجوه أخرى عنها بعضها صحيح الإسناد. فهذا الشطر صحيح من حديث أم الفضل أما الشطر الثاني، فقد انفرد محمد بن مصعب بذكر أم الفضل في قصة مقتل الحسين هذه، وخالفه غيره كما سيأتي فلم يذكروا هذه القصة أصلًا في حديث أم الفضل، ورويت هذه القصة من غير هذا الوجه بذكر أم سلمة، وهو الأشبه بالصواب، كما سيأتي لاحقًا، والله تعالى أعلم.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 468 - 469، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 14/ 196 - 197 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الشجري في "أماليه" 1/ 188 من طريق أخي كروجة، وابن عساكر 14/ 196 من طريق محمد بن إسماعيل بن أبي سمينة كلاهما عن محمد بن مصعب به وسيأتي عند المصنف برقم (4884) من طريق ابن أبي سمينة، لكن مختصر بالشطر الأول فقط.وأخرج القصة الأولى منه في رؤيا أم الفضل: الطبراني في "الكبير" 25 / (42) عن أبي زيد أحمد بن يزيد الحوطي، وفي "الدعاء" (1975) عن محمد بن سهل بن المهاجر الرقي، كلاهما عن محمد بن مصعب به.وأخرج هذه القصة أيضًا أحمد 44/ (26878)، ومن طريقه ابن الجوزي في "التحقيق في مسائل الخلاف" (88) من طريق عبد الله بن الحارث بن نوفل، عن أم الفضل بنت الحارث. وإسناده صحيح. وفيه أنَّ أم الفضل أرضعت الحُسين بلبن ولدها قُثَم بن العباس. وقد وقع في أكثر نُسخ "مسند أحمد" ذكر الحَسن بدل الحُسين، وإنما هو الحُسين جزمًا كما وقع في نسخة خطية من نسخه المتقنة، وكذلك جاء في التنقيح لابن الجوزي من طريق "المسند" نفسه، وهو ما جاء في أكثر طرق هذا الحديث، وأورد أكثر أهل التراجم والتاريخ هذه القصة في ترجمة الحُسين، كابن سعد في "طبقاته" 6/ 400، ومصعب الزبيري في "نسب قريش" ص 24، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 14/ 114، وابن العديم في "تاريخ حلب" 6/ 2566، والمزي في "تهذيب الكمال" 6/ 398، وأشار الذهبي في سير أعلام النبلاء" في ترجمة قُثَم بن العباس 3/ 440 إلى أنَّ قُثم كان أخا الحُسين بن علي في الرّضاعة، وأورد ابن كثير القصة في "البداية والنهاية" 9/ 238 في باب إخباره عليه الصلاة والسلام بمقتل الحُسين بن علي.على أنَّ بعض من ترجم للحَسن بن علي أورد هذه القصة في ترجمته، استنادًا إلى ما وقع لهم في بعض الروايات خطأً، وممن أورد القصة في ترجمة الحَسَن: الطبراني 3/ (2541)، وأبو نُعيم في "تاريخ أصبهان"، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 488، والنووي في "تهذيب الأسماء واللغات"، ومُغَلْطاي في "إكمال تهذيب الكمال"، والصالحي في سبل الهدى والرشاد المعروف بالسيرة الشامية 11/ 64.وأخرج القصة الأولى كذلك أحمد 44 / (26875) من طريق إسرائيل بن يونس السبيعي، وابن ماجه (3923) من طريق علي بن صالح بن صالح بن حي، كلاهما عن سماك بن حرب، عن قابوس بن أبي المخارق قال إسرائيل: عن أم الفضل، وقال علي بن صالح عن قابوس قال: قالت أم الفضل" يا رسول الله، فذكره مرسلًا. وبعضهم يرويه عن قابوس عن أبيه عن أم الفضل، وبعضهم يرويه عن سماك: أنَّ أم الفضل مرسلًا، وصوّب الدارقطني في "العلل" (4100) رواية من رواه عن قابوس عن أم الفضل. فإذا صحَّ ذلك فالإسناد حسنٌ. وقد جاء في أكثر نسخ "المسند" أيضًا: الحَسن بدل الحُسين، وهو خطأ، فقد جاء في بعض نسخه على الصواب، وهو الذي تؤيده سائر روايات الحديث.وأما القصة الثانية في إخبار الملَك للنبي صلى الله عليه وسلم بمقتل الحُسين وإراءته تربة حمراء من تربته، فقد رويت لأم سلمة وليس لأم الفضل كما سيأتي عند المصنف برقم (8402) بإسناد ضعيف، لكن للخبر طرق بمجموعها يمكن أن يحسن بها.ويشهد لها بذكر أم سلمة حديثُ أنس بن مالك عند أحمد 21/ (13539) و (13794)، وابن حبان (6742). وفي إسناده لِينٌ.وحديثُ أبي أمامة عند الطبراني في "الكبير" (8096)، ومن طريقه ابن عساكر 14/ 190 - 191، وفي إسناده من هو مضعَّف ومن لم نقف له على ترجمة، ومع ذلك فقد حسَّنه الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 3/ 289.وحديثُ أبي الطفيل بن وائلة عند الطبراني كما في "مجمع الزوائد" للهيثمي 9/ 190، وحسَّن إسنادَه. ولم نقف على إسناده، فالعُهدة فيه عليه.