হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4939)


4939 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، قال: فحدثني رجلٌ من أسلَمَ - وكان واعيةً -: أنَّ أبا جهل اعترضَ لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم عند الصفا، فآذاهُ وشَتَمه، وقال فيه ما يَكرهُ من العَيب لِدينِه، والتضعيفِ له، فلم يُكلمه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ومولاةٌ لعبد الله بن جُدْعان التَّيمي في مَسكنٍ لها فوق الصفا تسمع ذلك، ثم انصرفَ عنه، فعَمَد إلى نادي قُريشٍ عند الكعبة، فجلس معهم، ولم يلبث حمزةُ بن عبد المطلب أن أقبل مُتوشّحًا قوسَه راجعًا من قَنْصٍ له، وكان إذا فعل [1] ذلك لم يَمرَّ على نادي قريش إلَّا وقف وسلّم، وتحدّث معهم، وكان أعزَّ قريش، وأشدَّها شَكِيمةً، وكان يومئذٍ مشركًا على دين قومه، فجاءته المولاةُ وقد قامَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ليرجعَ إلى بيته، فقالت له: يا أبا عُمارة، لو رأيتَ ما لقي ابن أخيك محمدٌ من أبي الحكم آنفًا، وجدَه هاهُنا فآذاهُ وشَتَمه وبلَغ ما يَكرَهُ، ثم انصرف عنه، ولم يُكلّمْه محمدٌ، فاحتملَ حمزةَ الغضبُ لما أراد الله من كرامتِه، فخرج سريعًا لا يقف على أحدٍ كما كان يصنعُ يريد الطواف بالبيتِ متعمِّدًا لأبي جهل أن يقع به، فلما دخل المسجدَ نَظَر إليه جالسًا في القوم فأقبل نحوه، حتى إذا قامَ على رأسِه رفعَ القوسَ فضرَبه على رأسِه ضربةً مملوءةً، وقامت رجالٌ من قريش من بني مَخْزوم إلى حمزة لِينصُروا أبا جهل، فقالوا: ما نراك يا حمزةُ إِلَّا صَبَأتَ؟ فقال: حمزةُ وما يَمنعُني وقد استبانَ لي ذلك منه، أنا أشهدُ أنه رسولُ الله وأنَّ الذي يقول حقٌّ، فوالله لا أنزِعُ فامنَعُوني إن كنتُم صادِقين، فقال أبو جهل: دَعُوا أبا عُمارة، لقد سبَبتُ ابنَ أخيه سبًّا قبيحًا، ومَرَّ حمزةُ على إسلامِه وتابع [2] رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فلما أسلم حمزةُ علمت قريشٌ أنَّ رسولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قد عَزَّ وَامتَنَعَ، وأَنَّ حمزةَ سيَمنعُه، فكَفُّوا عن بعض ما كانوا يتناولونه ويَنالُون منه، فقال في ذلك شِعرًا [3] حين ضَرَب أبا جهل، فذكر رَجَزًا غيرَ مُستقِرٍّ، أولُه:ذُق [يا] أبا جَهلٍ بما غَشِيتْ [4]قال: ثم رجع حمزةُ إلى بيتِه فأتاهُ الشيطانُ، فقال: أنت سيدُ قريشٍ اتبعتَ هذا الصابئ وتركتَ دِينَ آبائك، لَلْموتُ خيرٌ لك مما صنعتَ، فأقبلَ على حمزةَ بَثُّه [5]، فقال: ما صنعتُ؟! اللهم إن كان رَشَدًا فاجعل تصديقَه في قلبي، وإلَّا فاجعل لي ممّا وقعتُ فيه مخرجًا، فبات بليلةٍ [لم يَبِتْ] [6] بمثلها من وسوسة الشيطان، حتى أصبح فغدا على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: ابنَ أخي، إني وقعتُ في أمرٍ لا أعرفُ المَخرجَ منه، وإقامةُ مثلي على ما لا أدري ما هو أرَشَدٌ هو أم غَيٌّ، شديدٌ، فحدِّثْني حديثًا فقد اشتَهيتُ يا ابن أخي أن تحدِّثَني، فأقبلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فذكَّره ووعَظَه، وخَوَّفه وبَشَّره، فألقى اللهُ في نفسه الإيمانَ كما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: أشهدُ إنك لَصادِقٌ شهادَة الصِّدق [-4] والعارف، فأظهِرْ يا ابن أخي دِينَك، فوالله ما أُحبُّ أنَّ لي ما أظلَّتِ السماء [-4] وإنِّي على دينيَ الأوّلِ. قال: فكان حمزةُ ممَّن أعزّ الله به الدِّينَ [-4].




আসলাম গোত্রের এক ব্যক্তি থেকে বর্ণিত—তিনি ছিলেন একজন সচেতন ব্যক্তি—তিনি বলেন: আবু জাহল সাফা পাহাড়ের কাছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পথরোধ করে তাঁকে কষ্ট দেয় এবং গালাগালি করে। সে তাঁর দ্বীনের সমালোচনা করে এবং তাঁকে দুর্বল প্রতিপন্ন করে এমন সব কথা বলে যা তিনি অপছন্দ করতেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সাথে কোনো কথা বললেন না। আব্দুল্লাহ ইবনু জুদআন আত-তাইমীর জনৈক দাসী তার সাফা পাহাড়ের উপরে অবস্থিত বাসস্থান থেকে এসব শুনছিল। এরপর সে (আবু জাহল) কা‘বার নিকট কুরাইশদের মজলিসের দিকে গেল এবং তাদের সাথে বসল।

এর কিছুক্ষণ পরেই হামযা ইবনু আব্দুল মুত্তালিব তাঁর ধনুক কাঁধে ঝুলিয়ে শিকার থেকে ফিরছিলেন। যখনই তিনি (শিকার থেকে) ফিরতেন, কুরাইশদের মজলিস অতিক্রম করার সময় তিনি না থেমে পারতেন না; তিনি সালাম করতেন এবং তাদের সাথে কথা বলতেন। তিনি ছিলেন কুরাইশদের মধ্যে সর্বাধিক সম্মানিত এবং অত্যন্ত দৃঢ়চেতা। সেই সময় তিনি মুশরিক ছিলেন এবং নিজের কওমের দ্বীনের অনুসারী ছিলেন।

তখন সেই দাসী তাঁর কাছে এলো—এ সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ঘরের দিকে ফিরে যাওয়ার জন্য উঠে দাঁড়িয়েছিলেন—সে তাঁকে বলল, হে আবূ উমারা! একটু আগে আপনার ভাতিজা মুহাম্মাদ আবূল হাকামের কাছ থেকে কী না পেলেন, যদি আপনি দেখতেন! সে তাকে এখানে খুঁজে পেয়েছিল, তারপর তাকে কষ্ট দিয়েছে, গালাগালি করেছে এবং তাকে অপছন্দীয় কথা বলেছে। এরপর সে (আবু জাহল) ফিরে গেল, আর মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সাথে কোনো কথা বললেন না।

আল্লাহ্‌র পক্ষ থেকে তাঁকে সম্মানিত করার উদ্দেশ্যে হামযার মনে ক্রোধ সৃষ্টি হলো। তিনি দ্রুত বের হলেন, পথে কারো কাছে থামলেন না, যেমনটা তিনি করতেন। তিনি কা‘বার তাওয়াফের ইচ্ছা করলেন এবং আবু জাহলকে ধরার জন্য তার দিকে লক্ষ্য স্থির করলেন। যখন তিনি মসজিদে প্রবেশ করলেন, দেখলেন আবু জাহল লোকজনের মাঝে বসে আছে। তিনি তার দিকে এগিয়ে গেলেন এবং যখন তার মাথার কাছে দাঁড়ালেন, তখন ধনুক তুলে নিয়ে পূর্ণ শক্তিতে তার মাথায় আঘাত করলেন।

বনু মাখযূমের কুরাইশের লোকেরা আবু জাহলকে সাহায্য করার জন্য হামযার দিকে এগিয়ে এলো। তারা বলল, হে হামযা! আমরা তো দেখছি তুমি ধর্মত্যাগ করেছ? হামযা বললেন, আমার এতে বাধা কী? যেহেতু তাঁর (মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর সত্যতা আমার নিকট সুস্পষ্ট হয়ে গেছে! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, তিনি আল্লাহ্‌র রাসূল, আর তিনি যা বলেন তা সত্য। আল্লাহ্‌র কসম! আমি তা থেকে (আমার দ্বীন থেকে) ফিরব না। তোমরা যদি সত্যবাদী হও তবে আমাকে বাধা দাও!

তখন আবু জাহল বলল, তোমরা আবূ উমারাকে ছেড়ে দাও। আমি তার ভাতিজাকে অত্যন্ত কদর্য গালি দিয়েছি। এরপর হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ইসলামের উপর সুপ্রতিষ্ঠিত রইলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অনুসরণ করলেন।

যখন হামযা ইসলাম গ্রহণ করলেন, তখন কুরাইশরা বুঝতে পারল যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এখন শক্তি ও সুরক্ষার অধিকারী হয়েছেন এবং হামযা তাঁকে রক্ষা করবেন। ফলে তারা তাঁর প্রতি যে আক্রমণ করত তা থেকে কিছুটা বিরত হলো।

(রাবী বলেন,) আবু জাহলকে আঘাত করার পর হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ বিষয়ে কিছু কবিতা আবৃত্তি করেছিলেন। এরপর হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর বাড়িতে ফিরে গেলেন। শয়তান তাঁর কাছে এলো এবং বলল, তুমি কুরাইশের নেতা, তুমি কিনা এই ধর্মত্যাগীকে অনুসরণ করেছো এবং তোমার পূর্বপুরুষদের দ্বীন ত্যাগ করেছো? তুমি যা করেছো তার চেয়ে তোমার জন্য মৃত্যু ভালো ছিল! ফলে হামযার মনে বিষণ্ণতা গ্রাস করল। তিনি বললেন, আমি কী করলাম?! হে আল্লাহ! যদি এটি সঠিক পথ হয়, তবে আমার হৃদয়ে এর সত্যতা স্থাপন করে দাও। আর যদি তা না হয়, তবে তুমি আমাকে এই অবস্থা থেকে বেরিয়ে আসার পথ দাও।

শয়তানের কুমন্ত্রণার কারণে তিনি এমন এক রাত কাটালেন যেমন রাত তিনি আগে কখনো কাটাননি। সকালে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন এবং বললেন, হে ভাতিজা! আমি এমন এক পরিস্থিতির সম্মুখীন হয়েছি, যা থেকে বেরিয়ে আসার পথ আমি জানি না। আমার মতো ব্যক্তির জন্য যা সত্য বা ভ্রান্তি সে সম্পর্কে নিশ্চিত না হয়ে অবস্থান করা কঠিন। তাই আপনি আমাকে কিছু বলুন। হে ভাতিজা! আমি চাই যে আপনি আমাকে কিছু শোনান।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর প্রতি মনোযোগী হলেন, তাঁকে স্মরণ করিয়ে দিলেন, উপদেশ দিলেন, ভয় দেখালেন এবং সুসংবাদ দিলেন। আল্লাহ্‌ তাঁর অন্তরে ঈমান ঢেলে দিলেন, যেমনটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন। তিনি বললেন, আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি অবশ্যই সত্যবাদী এবং প্রকৃত সত্যের সাক্ষী। হে ভাতিজা! আপনি আপনার দ্বীন প্রকাশ করুন। আল্লাহ্‌র কসম! আসমানের নিচে যা কিছু আছে, তা আমার হোক আর আমি আমার আগের দ্বীনের উপর থাকি, এটা আমি পছন্দ করি না। রাবী বলেন, হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন এমন ব্যক্তিদের একজন যার মাধ্যমে আল্লাহ্‌ দ্বীনকে শক্তিশালী করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في نسخنا الخطية: جعل، بالجيم بدل الفاء، والمثبت من المطبوع وهو الموافق لما في المطبوع من "السيرة النبوية" برواية يونس بن بُكَير عن ابن إسحاق (212)، وهو الموافق كذلك لسائر الروايات عن ابن إسحاق.



[2] زاد في (ز) و (ب) لفظة: يخفف، ولم نتبين معناها، ولم ترد في (ص) و (م)، ولم ترد في شيء من الروايات عن ابن إسحاق، فرأينا أنَّ الأولى حذفُها.



4939 [3] - تحرَّف في النسخ إلى: سعد، ولا ذكر لسعد في هذا الخبر، إنما الذي قال ذلك حمزة نفسه، كما في "السيرة النبوية" برواية يونس بن بُكَير، والبيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 213 عن أبي عبد الله الحاكم.



4939 [4] - في (ص) و (م) والمطبوع من "السيرة النبوية" برواية يونس بن بُكَير: عسيت، بإهمال العين والسين.



4939 [5] - البَثُّ: أشدُّ الحزن، وسمي بذلك لأنَّ صاحبه لا يصبر حتى يُظِهره.



4939 [6] - سقط من نسخنا الخطية، وأثبتناها من "السيرة النبوية" ومن رواية البيهقي في "دلائل النبوة" 12/ 213 - 21 عن أبي عبد الله الحاكم بإسناده هذا.



4939 [-4] - تحرَّفت العبارة في نسخنا الخطية إلى: وشهادة المصدق. المصنف نفسه في "سؤالاته" للدارقطني.ولم نقف عليه عند غير المصنف.



4939 [-4] - في (ز): ألمعت الشمس، والمثبت على الصواب من رواية البيهقي في "الدلائل 2/ 214.وفي "السيرة " برواية يونس بن بُكَير عن إسحاق (213): أظلته السماء. المصنف نفسه في "سؤالاته" للدارقطني.ولم نقف عليه عند غير المصنف.



4939 [-4] - إسناده ضعيف لإبهام الرجل الأسلمي، وهو مع ذلك مُعضَل.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 213 - 214 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وهو في "السيرة النبوية برواية يونس بن بكير (212) و (213).وهو أيضًا في "السيرة النبوية" لابن هشام 1/ 291 - 292 عن زياد بن عبد الله البكائي، عن محمد بن إسحاق، به.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 2/ 333 - 334 من طريق سلمة بن الفضل، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1808) من طريق إبراهيم بن سعد، كلاهما عن محمد بن إسحاق، به. ولم يذكرا قصة مجيء الشيطان لحمزة ومحاولته ثَنْيه عن الإسلام إلى آخر القصة.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (2926) من طريق جرير بن حازم، عن محمد بن إسحاق، عن يعقوب بن عتبة بن المغيرة بن الأخنس بن شَرِيق الثقفي، معضلًا، دون قصة مجيء الشيطان لحمزة.وأخرجه مختصرًا كذلك ابن سعد في "طبقاته" 3/ 8 من طريق عُبيد الله بن عبد الرحمن بن عبد الله بن مَوهَب والطبراني في "الكبير" (2925) من طريق أسامة بن زيد الليثي، كلاهما عن محمد بن كعب القُرظي، مرسلًا أيضًا، دون قصة مجيء الشيطان إلى حمزة. المصنف نفسه في "سؤالاته" للدارقطني.ولم نقف عليه عند غير المصنف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4940)


4940 - حدثنا أبو العبّاس، حدثنا سعيد بن محمد أبو عمر الحَجْواني، حدثنا وكيع بن الجرَّاح، حدثنا قُدامة بن موسى الجُمَحي، عن عبد الله بن علي بن الحسين، عن أبيه، عن جدِّه، قال: جاء عليٌّ وحمزةُ إلى النبي صلى الله عليه وسلم وقد اغتَسلا، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "كيف صَنَعتُما؟ " قال أحدُهما: يا رسولَ الله، سترتُه بالثَّوب، وقال الآخرُ: فَعَلتُ مثلَ ذلك، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "لو فَعلتُما غيرَ ذلك لسَتَرتُكُما" [1]. صحيح الإسناد ولم يُخرجاه.




হুসাইন ইবন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী ও হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন, অথচ তারা তখন গোসল করে ফেলেছিলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "তোমরা কেমন করে (গোসল) করলে?" তাঁদের একজন বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কাপড় দ্বারা তা ঢেকে রেখেছিলাম।" অন্যজনও বললেন: "আমিও অনুরূপ করেছি।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তোমরা অন্যরকমও করতে, তবুও আমি তোমাদের ঢেকে রাখতাম (তোমাদের দিকে দৃষ্টি দিতাম না)।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف سعيد بن محمد الحَجْواني، فقد ضعَّفه الدارقطني فيما نقله عنه المصنف نفسه في "سؤالاته" للدارقطني.ولم نقف عليه عند غير المصنف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4941)


4941 - حدثني أبو بكر محمد أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن شاذان الجَوهَري، حدثنا معاوية بن عمرو، عن أبي إسحاق الفَزَاري، عن ابن عَوْن، عن عُمير بن إسحاق، عن سعد بن أبي وَقّاص، قال: كان حمزةُ بن عبد المطّلب يُقاتِل يومَ أُحُدٍ بين يَدَي رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، ويقول: أنا أسدُ الله [1].صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হামযা ইবনু আব্দুল মুত্তালিব উহুদের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সম্মুখে যুদ্ধ করছিলেন এবং বলছিলেন: আমি আল্লাহর সিংহ।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن اختُلف في وصله وإرساله، وقد انفرد بإرساله محمد بن شاذان الجوهري أو مَن دونه، وقد رواه أحمد بن حنبل كما في مسائل ابنه صالح (866) عن معاوية بن عمرو - وهو ابن المهلّب الأزدي عن أبي إسحاق الفَزَاري - وهو إبراهيم بن محمد بن الحارث - عن ابن عَون - وهو عبد الله بن عون بن أَرْطَبان - عن عمير بن إسحاق، مرسلًا.وكذلك رواه جماعةٌ عن عبد الله بن عون مرسلًا كما تقدَّم بيانه برقم (4936)، فالأشبه إذًا إرسالُه، والله تعالى أعلم.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 2430 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وانظر ما بعده وما سيأتي برقم (4959). وذكره ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 96 بغير إسنادٍ.وسيأتي عند المصنف برقم (4959) من طريق يحيى بن عبد الرحمن بن أبي لبيبة عن جده.وإسناده ضعيف جدًّا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4942)


4942 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، عن شُيوخه، قالوا: لما أُصيبَ حمزةُ جَعَلَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يقولُ: "لن أُصابَ بمثلِك أبدًا"، ثم قال لفاطمة ولِعمَّتِه صفيّة: "أبشرا، أتاني جِبريلُ عليه السلام، فأخبَرَني أنَّ حمزةَ مَكتوبٌ في أهلِ السماوات: حمزةُ بنُ عبد المُطَّلب أَسَدُ اللهِ وأَسَدُ رسولِه" [1].




মুহাম্মদ ইবনে উমার থেকে বর্ণিত... তাঁর উস্তাদগণ বলেন, যখন হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাহাদাত বরণ করলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তখন বলছিলেন, "তোমার মতো কারো দ্বারা আমি আর কখনও (শোকগ্রস্ত) হব না।" অতঃপর তিনি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর ফুফু সাফিয়্যাকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "তোমরা সুসংবাদ গ্রহণ করো। আমার নিকট জিবরাঈল আলাইহিস সালাম এসে আমাকে খবর দিয়েছেন যে, হামযা জান্নাতবাসীদের মধ্যে লিখিত হয়েছেন: হামযা ইবনে আব্দুল মুত্তালিব, আল্লাহর সিংহ এবং তাঁর রাসূলের সিংহ।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل محمد بن عمر - وهو ابن واقد الواقدي - ففيه مقالٌ معروف، ولا يُعرف عن أيّ شيوخه حمل هذا الخبر، على أنه وإن عُرف عمن حمله يبقى فيه علَّة الإرسال أو الإعضال، ولم يُرو هذا الخبر من وجه آخر يُعتدُّ به.وهو في "مغازي الواقدي" 1/ 290. وذكره ابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 96 بغير إسنادٍ.وسيأتي عند المصنف برقم (4959) من طريق يحيى بن عبد الرحمن بن أبي لبيبة عن جده.وإسناده ضعيف جدًّا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4943)


4943 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الصفّار، حدثنا أحمد بن مِهْران حدثنا عُبيد الله بن موسى، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مُضَرِّبٍ، عن عليٍّ، قال: قال لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "نادِ حمزةَ فكان أقربَهم إلى المشركين -: مَن صاحبُ الجملِ الأحمَر، وماذا يقول لهم" ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إن يكن في القوم أحدٌ يأمرُ بخيرٍ، فعسى يكونُ صاحبَ الجملِ الأحمرِ"، فقال لي حمزةُ: هو عُتبة بن ربيعة، وهو يَنْهى عن القتالِ، وهو يقولُ: يا قومِ، إني أرى قَومًا لا تَصِلُون إليهم وفيكم خيرٌ، يا قومِ اعِصبُوها اليومَ بي، وقولوا: جَبُنَ عُتبةٌ بن رَبيعة، ولقد علمتُم أني لستُ بأجبَنِكم، فسمعَ بذلك أبو جَهْل، فقال: أنت تقولُ هذا؟! لو غيرُك قال قد مُلِئتَ رُعبًا، فقال: إيايَ تعني يا مُصفِّرَ استِه؟! قال: فَبَرَزَ عُتبةُ وأخوه شَيْبَةُ وابنه الوليدُ، فقالوا: من يُبارِزُ؟ فخرج فِتيةٌ من الأنصار شَبَةٌ، فقال عتبةُ: لا نريدُ هؤلاءِ، ولكن يُبارِزُنا من أعمام بني عبد المطّلب؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قُمْ يا حمزةُ، قُمْ يا عُبيدةُ، قم يا عليٌّ"، فبَرَزَ حمزةُ لِعُتبة، وعُبيدةُ لشَيْبة، وعليٌّ للوليد، فقَتَل حمزةُ عُتبةَ، وقَتَل عليٌّ الوليد، وقَتَل عُبيدةُ شَيْبَةَ، وَضَرَبَ شَيْبَةٌ رِجلَ عُبيدةَ فقطَعها، فاستنقذَه حمزةُ وعليٌّ، حتى تُوفِّي بالصَّفْراء [1]. صحيح علي شرط الشيخين ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "হামযাকে ডাকো—তিনি মুশরিকদের (শত্রুদের) সবচেয়ে কাছে ছিলেন—কে এই লাল উটের মালিক, আর সে তাদের কী বলছে?" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি এই দলের মধ্যে কেউ কল্যাণের নির্দেশ দিয়ে থাকে, তবে সে সম্ভবত লাল উটের মালিকই হবে।"

হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: সে হলো উতবা ইবনু রাবি'আহ। সে যুদ্ধ করতে নিষেধ করছে এবং বলছে: হে আমার সম্প্রদায়! আমি এমন কিছু লোককে দেখছি, যাদের কাছে তোমরা (সহজে) পৌঁছাতে পারবে না, আর তোমাদের মধ্যে (এখনও) কল্যাণ অবশিষ্ট আছে। হে আমার সম্প্রদায়! আজ এর দায়ভার আমার উপর চাপাও এবং বলো: উতবা ইবনু রাবি'আহ কাপুরুষতা দেখিয়েছে। অথচ তোমরা জানো যে, আমি তোমাদের মধ্যে সবচেয়ে ভীরু নই।

আবু জাহল তা শুনতে পেল এবং বলল: তুমি এই কথা বলছ?! যদি অন্য কেউ এই কথা বলত, তবে বলা যেত যে সে ভয়ে পূর্ণ (কাপুরুষ) হয়ে গেছে। (উতবা) তখন বলল: ওহে গুহ্যদ্বার হলুদকারী! তুমি কি আমাকে উদ্দেশ্য করছো?!

বর্ণনাকারী বলেন: এরপর উতবা, তার ভাই শাইবাহ এবং তার পুত্র ওয়ালীদ যুদ্ধের জন্য বেরিয়ে এলো। তারা বলল: কে দ্বন্দ্বযুদ্ধ করবে? তখন আনসারদের মধ্য থেকে কয়েকজন যুবক তাদের মুকাবিলায় বের হলেন। উতবা বলল: আমরা এদের চাই না। বরং আবদুল মুত্তালিবের বংশের চাচাদের মধ্য থেকে কেউ আমাদের সাথে দ্বন্দ্বযুদ্ধ করুক।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওঠো, হে হামযা! ওঠো, হে উবাইদাহ! ওঠো, হে আলী!"

এরপর হামযা উতবার মুকাবিলায়, উবাইদাহ শাইবার মুকাবিলায় এবং আলী ওয়ালীদের মুকাবিলায় বের হলেন। হামযা উতবাকে হত্যা করলেন, আলী ওয়ালীদকে হত্যা করলেন এবং উবাইদাহ শাইবাকে হত্যা করলেন। (তবে দ্বন্দ্বযুদ্ধের সময়) শাইবাহ উবাইদাহর পায়ে আঘাত করে তা কেটে দিল। তখন হামযা ও আলী তাকে উদ্ধার করলেন। শেষ পর্যন্ত তিনি আস-সাফরাতে ইন্তিকাল করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح، لكن اختُلف في ذكر الخصوم كما تقدَّم بيانه برقم (4923)، فبعضهم يذكر عُتبة بن ربيعة في مقابل عُبيدة بن الحارث وشيبة بن ربيعة في مقابل حمزة بن عبد المطّلب. ولكن ما جاء في هذه الرواية هو الأكثر والأشهر إسرائيل: هو ابن يونس بن أبي إسحاق عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وأبو إسحاق في الإسناد هو جدُّه.وأخرجه مختصرًا أبو داود (2665) من طريق عثمان بن عمر العَبْدي، عن إسرائيل، بهذا الإسناد. غير أنه ذكر عليًّا في مقابل شيبة، وعُبَيدة في مقابل الوليد بن عُتبة. وما عند المُصنِّف أولى وأثبتُ كما نبهنا عليه برقم (4923). وأخرجه أحمد 2 / (948) عن حجاج بن محمد المصّيصي الأعور، عن إسرائيل، به. لكنه قال في روايته: فقتل الله تعالى عُتبة وشيبة ابني ربيعة، والوليد بن عُتبة، وجُرح عُبيدة. كذا لم يذكر مَن قتل كُلًا من المذكورين.وقوله: مُصفِّر استه، كلمة تقال للمتنعِّم الذي لم تُحنِّكه التجارب والشدائد، وهي من الصفير، وهو الصوت بالفم والشفتين وكأنه قال: يا ضرّاط نسبة إلى الجُبن والخور، أو أنه رماه بالأُبنة، وأنه كان يُزعفِر استَه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4944)


4944 - أخبرنا أبو العباس المحبُوبي بمَرُو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عُبيد الله بن موسى أخبرنا أسامة بن زيد عن نافع عن ابن عمر، قال: رجعَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يوم أُحُد، فسمع نساءَ بني عبد الأشْهَل يَبكِين على هَلْكاهُنَّ، فقال: "لكنَّ حمزةَ لا بَواكيَ له"، فجئن نِساءُ الأنصار فبَكَين على حمزة عنده، ورَقَد فاستيقَظ وهنَّ يَبكِين، فقال: "يا وَيلَهنَّ، إنهن لَهاهُنا حتى الآن؟! مُروهُنَّ فليرجِعْن، ولا يَبكِين على هالكٍ بعدَ اليوم [1].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উহুদের দিনের রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে আসলেন, তখন তিনি বনু আব্দুল আশহালের মহিলাদেরকে তাদের নিহতদের জন্য কাঁদতে শুনলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিন্তু হামযার জন্য কেউ ক্রন্দনকারিণী নেই।" অতঃপর আনসারী মহিলারা আসলেন এবং তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সামনে হামযার জন্য কাঁদতে লাগলেন। তিনি ঘুমালেন, এরপর জেগে উঠলেন, তখনও তারা কাঁদছিলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হায় তাদের দুর্ভোগ! তারা কি এখনও এখানে রয়েছে?! তাদেরকে আদেশ দাও, তারা যেন ফিরে যায়। আর আজকের পর থেকে যেন কেউ আর কোনো মৃতের জন্য ক্রন্দন না করে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل أسامة بن زيد: وهو اللَّيثي.وأخرجه أحمد 9 / (4984) و (5563) و (5666)، وابن ماجه (1591) من طرق عن أسامة بن زيد الليثي، به.وسيأتي برقم (4952) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة عن أسامة بن زيد الليثي.ولأسامة بن زيد الليثي فيه إسنادٌ آخر تقدَّم عند المصنف برقم (1423)، يروي الحديثَ ثمة عن الزهري عن أنس بن مالك. وجمع البزار (6345) و (6346) وأبو يعلى (3576) وغيرهما بين إسناديه هذين، فالظاهر أنَّ أسامة حفظهما، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4945)


4945 - حدثني أبو علي الحافظ، أخبرنا أحمد بن محمد بن عمر بن بسطامَ المَروَزي، حدثنا أحمد بن سَيَّار ومحمد بن الليث قالا: حدثنا رافع بن أشْرَسَ المروَزي، حدثنا حُفَيد الصفَّار، عن إبراهيم الصائغ، عن عطاء، عن جابر عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "سيِّدُ الشهداءِ حمزةُ بن عبد المطّلب، ورجلٌ قام إلى إمامٍ جائرٍ، فأمره ونهاه فقَتَلَه" [1].صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শহীদদের সর্দার হলেন হামযা ইবনু আব্দুল মুত্তালিব, আর সেই ব্যক্তি যে কোনো অত্যাচারী শাসকের সামনে দাঁড়িয়ে তাকে ভালো কাজের আদেশ ও মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করেছে, অতঃপর (শাসক) তাকে হত্যা করেছে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لجهالة حُفيد الصفَّار، فإنه لا يُدرى من هو، كما قال الذهبي في "تلخيصه"، لكن تابَعَه حكيم بن زيد المروزي، وهو حسن الحديث إن شاء الله، فقد روي عنه جمع من الثقات، وقال عنه أبو حاتم صالح شيخ، وكان قاضي مرو، ولا يُعرف وجهُ قول الأزدي فيه: فيه نَظَر، وقوله مرةً: متروك الحديث!! على أنَّ لحديث جابر هذا طريقًا أخرى تقدَّمت برقم (2589) بذكر حمزة دون الذي يقتلُه الإمامُ الجائر، لكن تلك الطريق ضعيفة، وأمثل طرقه عن جابر طريق حكيم بن زيد.إبراهيم الصائغ: هو ابن ميمون، وعطاء: هو ابن أبي رباح.وأخرجه محمد بن مخلد العطار في "منتقى حديثه" (37)، والطبراني في "الأوسط" (918)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 6/ 557 و 7/ 406 من طريقين عن حكيم بن زيد المروزي، عن إبراهيم بن ميمون الصائغ، به. إلّا أنَّ الطبراني ذكر في روايته عكرمة بدل عطاء وهو خطأ.ويشهد له حديثُ ابن عباس عند الطبراني في "الأوسط" (4079)، وأبي نعيم في "مسند أبي حنيفة" ص 187، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 35/ 416 من طريق الحسن بن رُشيد، عن أبي حنيفة، عن عكرمة عن ابن عبّاس.وهو كذلك عند ابن عبد البر في "التمهيد" 13/ 54 - 55، وعبد الخالق بن أسد في "معجمه" (2)، وأبي طاهر السِّلفي في "معجم السفر" (573)، والرافعي في "أخبار قزوين" 4/ 11، لكنهم زادوا الحسن بن رُشيد وبين أبي حنيفة رجلًا هو أبو مقاتل حفص بن سَلْم السمرقندي، وهو ضعيف، إلّا أنَّ الحسن بن رُشيد صرَّح عند ابن عساكر بسماعه من أبي حنيفة وهو معدود في أصحابه، والإسناد إليه قويٌّ، ولكن الحسن بن رشيد هذا ليَّنه الذهبي في "الميزان". وأخرج الطبراني في "الكبير" (12094)، والبيهقي في "معرفة السنن والآثار" (7460) من طريق شريك النخعي، عن الحجاج بن أرطاة، والبيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 15 من طريق أبي شيبة إبراهيم بن عثمان الواسطي، كلاهما عن الحكم بن عُتيبة، عن مِقسم، عن ابن عباس: أن حمزة بن عبد المطلب وحنظلة بن الراهب أصيبا يوم أحد وهما جنب، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رأيت الملائكة تغسّلهما". وكلا الإسنادين ضعيف، شريك سيئ الحفظ والحجاج مدلّس وقد عنعن، وأبو شيبة في الإسناد الثاني متروك لا يُفرح به. وقال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 4/ 714: غريب في ذكر حمزة.وفي الباب عن الحسن البصري مرسلًا عند ابن سعد في "طبقاته" 3/ 14 قال: قال رسول الله: صلى الله عليه وسلم: "لقد رأيت الملائكة تُغسّل حمزة". ورجاله ثقات إلى الحسن البصري، لكن مراسيل الحسن لم يعتدَّ بها أهل الصنعة.والمحفوظ أنَّ غسيل الملائكة هو حنظلة بن أبي عامر الراهب كما سيأتي برقم (4979).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4946)


4946 - أخبرنا أحمد بن عثمان بن يحيى المُقرئ ببغداد، حدثنا إبراهيم بن عبد الرحيم بن دَنُوقا، حدثنا مُعلَّى بن عبد الرحمن الواسطي، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، حدثنا محمد بن كعب القُرَظي، عن ابن عبّاس، قال: قُتل حمزةُ بن عبد المطلب عَمُّ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم جُنُبًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "غَسَّلَتْه المَلائكةُ" [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চাচা হামযা ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জুনুবী (গোসল ফরয) অবস্থায় শহীদ হন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "ফেরেশতাগণ তাঁকে গোসল করিয়েছেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده تالف من أجل مُعلّى بن عبد الرحمن الواسطي، فهو هالكٌ كما قال الذهبي في "تلخيصه"، بل قد اتهمه بعضهم بوضع الحديث. وأخرج الطبراني في "الكبير" (12094)، والبيهقي في "معرفة السنن والآثار" (7460) من طريق شريك النخعي، عن الحجاج بن أرطاة، والبيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 15 من طريق أبي شيبة إبراهيم بن عثمان الواسطي، كلاهما عن الحكم بن عُتيبة، عن مِقسم، عن ابن عباس: أن حمزة بن عبد المطلب وحنظلة بن الراهب أصيبا يوم أحد وهما جنب، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "رأيت الملائكة تغسّلهما". وكلا الإسنادين ضعيف، شريك سيئ الحفظ والحجاج مدلّس وقد عنعن، وأبو شيبة في الإسناد الثاني متروك لا يُفرح به. وقال الحافظ ابن حجر في "فتح الباري" 4/ 714: غريب في ذكر حمزة.وفي الباب عن الحسن البصري مرسلًا عند ابن سعد في "طبقاته" 3/ 14 قال: قال رسول الله: صلى الله عليه وسلم: "لقد رأيت الملائكة تُغسّل حمزة". ورجاله ثقات إلى الحسن البصري، لكن مراسيل الحسن لم يعتدَّ بها أهل الصنعة.والمحفوظ أنَّ غسيل الملائكة هو حنظلة بن أبي عامر الراهب كما سيأتي برقم (4979).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4947)


4947 - أخبرنا أبو عمرو عثمان بن أحمد السَّمّاك، حدثنا بن حدثنا عبد الملك بن محمد الرَّقَاشي، حدثنا أحمد بن عبد الله اللَّهَبي [1]، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن حَرَام بن عثمان، عن عبد الرحمن الأغرّ، عن أبي سلمةَ، عن أسامة بن زيد قال خرجَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يريد بيتَ حمزةَ، فتبعتُه حتى وقف على الباب، فقال: "السلامُ عليكُم، أتَمَّ أبو عُمارة؟، قال: فقالت: لا والله، بأبي أنت وأمي، خرج عامدًا نحوك، فأظنُّه أخطأك في بعض أزِقّة بني النجّار، أفلا تدخلُ بأبي أنت وأمي يا رسولَ الله؟ قال: "فهل عندكِ شيءٌ؟ " قالت: نعم، فدخل فقرَّبتْ إليه قَعْبًا [2] فيه حَيْسٌ [3]، فقالت: كُلْ بأبي أنتَ وأمي يا رسول الله، هنيئًا لك ومَريئًا، فقد جئتَ وأنا أريدُ أن آتيَكَ وأُهنِّئَك وأُمْرِئَك: أخبرَني أبو عمارة أنك أُعطِيتَ نهرًا في الجنة يُدعَى الكَوثرَ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "وآنيتُه أكثر من عددِ نُجوم السماءِ، وأحبُّ وارِدِه عليَّ قَومُك" [4]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হামযার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাড়ির দিকে যাচ্ছিলেন। আমি তাঁর অনুসরণ করলাম। তিনি দরজার কাছে এসে দাঁড়ালেন এবং বললেন: "আসসালামু আলাইকুম, আবু উমারা কি ভেতরে আছে?" তিনি (হামযার স্ত্রী) বললেন: আল্লাহর কসম, আপনার জন্য আমার পিতা-মাতা উৎসর্গ হোক! তিনি আপনার দিকেই রওনা হয়েছেন, আমার ধারণা তিনি বনু নাজ্জারের গলিপথগুলোর মধ্যে কোথাও আপনাকে অতিক্রম করে চলে গেছেন। হে আল্লাহর রাসূল! আপনার জন্য আমার পিতা-মাতা উৎসর্গ হোক, আপনি কি ভেতরে আসবেন না? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার কাছে কি কিছু আছে?" তিনি (হামযার স্ত্রী) বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি ভেতরে প্রবেশ করলেন। তখন তিনি (হামযার স্ত্রী) একটি বাটিতে 'হায়স' (খেজুর, পনির ও ঘি মিশ্রিত খাবার) পরিবেশন করলেন। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনার জন্য আমার পিতা-মাতা উৎসর্গ হোক, আপনি খান—আপনার জন্য তা উপভোগ্য ও স্বাস্থ্যকর হোক। আপনি এসেছেন যখন আমি আপনার কাছে গিয়ে আপনাকে অভিনন্দন জানাতে এবং আপনার জন্য আনন্দ প্রকাশ করতে চাইছিলাম। আবু উমারা আমাকে জানিয়েছেন যে, আপনাকে জান্নাতে একটি নহর (নদী) দান করা হয়েছে, যার নাম 'কাউসার'। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আর এর (কাউসার নহরের) পানপাত্রসমূহ আকাশের নক্ষত্ররাজির চেয়েও অধিক। আর আমার নিকট সবচেয়ে প্রিয় ব্যক্তি, যে তার পানি পান করবে, তারা হলো তোমার গোত্রের লোক।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ص) و (م) و (ع) إلى: الليثي، والتصويب من (ز) و (ب) و "تلخيص الذهبي"، وكذلك هو في "مسند الحسن بن سفيان" كما في "إتحاف السادة المتقين" للزَّبيدي 10/ 505 إلَّا أنه سمّى أباه حُسينًا، فقال: حدثنا أحمد بن حُسين اللّهبي المديني، وساق الحديث. فلعلَّ عبد الله اسم أحد أجداده، أو هو خطأٌ من عبد الملك الرَّقاشي، فقد وقعت له لما سكن بغداد أوهامٌ، وابن السمّاك راويه عنه هنا بغداديٌّ، والله أعلم. فإن كان ما وقع عند الحسن بن سفيان محفوظًا، فاللهبي نسبة إلى أبي لَهَب بن عبد المطلب، كما في "مغاني الأخيار" للعيني 1/ 28، ونقل عن الحافظ أبي بكر الجارودي النيسابوري أنه وثقه.



[2] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: صعبا، وكتب فوقها في (ص): قعبًا، كالمصحّح لها، ولم ترد اللفظة في المطبوع، فجاء بدلًا منها فقربت إليه حيسًا. والقَعْبُ: قدحٌ من خشب مقعّر مُدوّر يُشرب فيه. عن عبد الرحمن الأعرج، عن أسامة بن زيد فأسقط من إسناده الواسطة بين الأعرج وأسامة. وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (258) عن ابن ناجية، عن كعب أبي عبد الله الذَّرّاع، عن يحيى بن عبد الحميد الحماني، عن عبد العزيز بن محمد، عن حرام بن عثمان، عن عبد الرحمن الأعرج، عن المسور بن مَخرمَة عن أسامة بن زيد عن امرأة حمزة بن عبد المطلب، عن النبي صلى الله عليه وسلم. فجعله من مسند امرأة حمزة بن عبد المطّلب.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (24/ 588) من طريق زيد بن الحُباب، عن عيسى بن النعمان من ولد رافع بن خَديج عن معاذ بن رفاعة بن رافع بن خديج عن خولة بنت قيس، وكانت تحت حمزة بن عبد المطلب، قالت: دخل عليَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فجعلتُ له خزيرة، فقدمتها إليه، فوضع يده فيها، فوجد حَرّها، فقبضها، فقال: "يا خولة، لا نصبر على حرٍّ ولا بَرْدٍ، يا خولة، إِنَّ الله أعطاني الكوثر، وهو نهر في الجنة، وما خلقٌ أحبَّ إليَّ ممّن يَرِدُه من قومك"، وإسناده محتمل للتحسين.ويشهد له بنحو لفظه في صفة الحوض بتمامه كما عند بقي بن مخلد والطبراني حديثُ عبد الله بن عمرو بن العاص عند الطبراني في "مسند الشاميين" (95)، غير أنه قال فيه: "عرضه بين أيلة وعدن"، وإسناده حسن وانظر حديث ابن عمر الآتي عند المصنف برقم (6441).قال ابن كثير في "تفسيره" بعد أن ساق الحديث بإسناد الطبري: حرام بن عثمان ضعيف، ولكن هذا سياق حسنٌ، قد صحَّ أصل هذا بل قد تواتر من طرق تفيد القطع عند كثير من أئمة الحديث.



4947 [3] - تحرَّفت في (ز) إلى: د س، وسقطت الكلمة من (ص) و (م) مع وجود إحالة فيهما للهوامش، دون إثبات أي شيء فيه، فكأنَّ ناسخ الأصل المنقول عنه أراد أن يكتبها ملحقة بالهامش فذهل، أو كانت غير واضحة في ذلك الأصل، فاكتفى في (ص) و (م) بالإحالة إشارة إلى وجود كلمة زائدة في ذلك الأصل. عن عبد الرحمن الأعرج، عن أسامة بن زيد فأسقط من إسناده الواسطة بين الأعرج وأسامة. وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (258) عن ابن ناجية، عن كعب أبي عبد الله الذَّرّاع، عن يحيى بن عبد الحميد الحماني، عن عبد العزيز بن محمد، عن حرام بن عثمان، عن عبد الرحمن الأعرج، عن المسور بن مَخرمَة عن أسامة بن زيد عن امرأة حمزة بن عبد المطلب، عن النبي صلى الله عليه وسلم. فجعله من مسند امرأة حمزة بن عبد المطّلب.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (24/ 588) من طريق زيد بن الحُباب، عن عيسى بن النعمان من ولد رافع بن خَديج عن معاذ بن رفاعة بن رافع بن خديج عن خولة بنت قيس، وكانت تحت حمزة بن عبد المطلب، قالت: دخل عليَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فجعلتُ له خزيرة، فقدمتها إليه، فوضع يده فيها، فوجد حَرّها، فقبضها، فقال: "يا خولة، لا نصبر على حرٍّ ولا بَرْدٍ، يا خولة، إِنَّ الله أعطاني الكوثر، وهو نهر في الجنة، وما خلقٌ أحبَّ إليَّ ممّن يَرِدُه من قومك"، وإسناده محتمل للتحسين.ويشهد له بنحو لفظه في صفة الحوض بتمامه كما عند بقي بن مخلد والطبراني حديثُ عبد الله بن عمرو بن العاص عند الطبراني في "مسند الشاميين" (95)، غير أنه قال فيه: "عرضه بين أيلة وعدن"، وإسناده حسن وانظر حديث ابن عمر الآتي عند المصنف برقم (6441).قال ابن كثير في "تفسيره" بعد أن ساق الحديث بإسناد الطبري: حرام بن عثمان ضعيف، ولكن هذا سياق حسنٌ، قد صحَّ أصل هذا بل قد تواتر من طرق تفيد القطع عند كثير من أئمة الحديث.



4947 [4] - إسناده ضعيف جدًّا من أجل حرام بن عثمان، فهو متروك الحديث، ولهذا عقَّب الذهبي في "تلخيصه" على تصحيح المصنف للحديث، فقال: أين الصحة وحرام فيه؟!قلنا: وقد وقع في هذا الإسناد من الأخطاء وصف عبد الرحمن بالأغر، وإنما هو الأعرج، وتسمية شيخه أبا سلمة، وإنما هو المسور بن مَخرمَة، ولعلّ هذه الأخطاء من أوهام عبد الملك الرَّقاشي كما سبق.فقد أخرج هذا الحديث الحافظ المتقن الحسن بن سفيان في "مسنده" كما في "إتحاف السادة المتقين" 10/ 505 عن أحمد بن الحسين اللَّهَبي المديني، عن عبد العزيز بن محمد، عن حرام بن عثمان، عن عبد الرحمن الأعرج، عن المسور بن مَخرمَة، عن أسامة بن زيد. وزاد فيه قوله صلى الله عليه وسلم في صفة الكوثر: "وعَرْصتُه ياقوتُ ومَرجانٌ وزَبَرْجَدٌ ولؤلؤٌ".وكذلك أخرجه بقيٌّ بن مخلد في "الحوض والكوثر" (42) عن يحيى بن عبد الحميد الحِمّاني، والبزار في "مسنده" (1289) عن شيخ من شيوخ البصرة، كلاهما عن عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن حرام بن عثمان عن عبد الرحمن الأعرج، عن المسور بن مَخرمَة، عن أسامة بن زيد. وزاد بقيٌّ في روايته في وصف الكوثر مثل ما وقع في رواية الحسن بن سفيان، وزاد أيضًا: "وهو ما بين أيلة وصنعاء".وأخرجه الطبري في "تفسيره" 3/ 325، والطبراني في "المعجم الكبير" (2960)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (1831) من طريق محمد بن جعفر بن أبي كثير، عن حرام بن عثمان، عن عبد الرحمن الأعرج، عن أسامة بن زيد فأسقط من إسناده الواسطة بين الأعرج وأسامة. وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (258) عن ابن ناجية، عن كعب أبي عبد الله الذَّرّاع، عن يحيى بن عبد الحميد الحماني، عن عبد العزيز بن محمد، عن حرام بن عثمان، عن عبد الرحمن الأعرج، عن المسور بن مَخرمَة عن أسامة بن زيد عن امرأة حمزة بن عبد المطلب، عن النبي صلى الله عليه وسلم. فجعله من مسند امرأة حمزة بن عبد المطّلب.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (24/ 588) من طريق زيد بن الحُباب، عن عيسى بن النعمان من ولد رافع بن خَديج عن معاذ بن رفاعة بن رافع بن خديج عن خولة بنت قيس، وكانت تحت حمزة بن عبد المطلب، قالت: دخل عليَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فجعلتُ له خزيرة، فقدمتها إليه، فوضع يده فيها، فوجد حَرّها، فقبضها، فقال: "يا خولة، لا نصبر على حرٍّ ولا بَرْدٍ، يا خولة، إِنَّ الله أعطاني الكوثر، وهو نهر في الجنة، وما خلقٌ أحبَّ إليَّ ممّن يَرِدُه من قومك"، وإسناده محتمل للتحسين.ويشهد له بنحو لفظه في صفة الحوض بتمامه كما عند بقي بن مخلد والطبراني حديثُ عبد الله بن عمرو بن العاص عند الطبراني في "مسند الشاميين" (95)، غير أنه قال فيه: "عرضه بين أيلة وعدن"، وإسناده حسن وانظر حديث ابن عمر الآتي عند المصنف برقم (6441).قال ابن كثير في "تفسيره" بعد أن ساق الحديث بإسناد الطبري: حرام بن عثمان ضعيف، ولكن هذا سياق حسنٌ، قد صحَّ أصل هذا بل قد تواتر من طرق تفيد القطع عند كثير من أئمة الحديث.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4948)


4948 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا أسامة بن زيد عن الزُّهْري، عن أنس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مَرّ بحمزةَ يوم أُحُدٍ وقد جُدِعَ ومُثِّل به، وقال: "لولا أن صفية تَجِدُ لَتَركْتُه حتى يَحشُرَه اللهُ من بُطون الطَّير والسِّباع"، فكفَّنه في نَمِرةٍ [1]. صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদ যুদ্ধের দিন হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, অথচ তাঁর কান ও নাক কাটা হয়েছিল এবং তাঁর অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ বিকৃত করা হয়েছিল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সাফিয়্যার (দুঃখিত বা শোকাহত হওয়ার) আশঙ্কা না থাকত, তবে আমি তাঁকে এ অবস্থাতেই রেখে দিতাম, যাতে আল্লাহ তাঁকে পাখি ও হিংস্র পশুদের পেট থেকে (হাশরের দিন) একত্রিত করেন।" অতঃপর তিনি তাঁকে একটি নুমরাহ (পশমী চাদর বা কম্বল) দ্বারা কাফন দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكن غلط فيه أسامة بن زيد - وهو الليثي - إذ جعله عن الزُّهْري عن أنس، وإنما هو عن الزهري عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك عن جابر بن عبد الله، كما تقدّم بيانه برقم (1367) و (2590)، حيث تقدَّم هناك من طرق عن أسامة بن زيد الليثي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4949)


4949 - حدثنا أبو علي الحسين بن علي الحافظ، أخبرنا عبد الله بن صالح البخاري، حدثنا يعقوب بن حُميد بن كاسب، حدثنا سفيان بن عُيينة، عن عمرو بن دينار، عن جابر بن عبد الله قال: وُلِدَ لرجلٍ منا غُلامٌ، فقالوا: ما نُسمّيه؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "بأحب الأسماءِ إليَّ: حمزةَ بن عبد المُطّلب" [1]. صحيح الإسناد ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের এক ব্যক্তির একটি পুত্র সন্তান জন্মালো। তারা জিজ্ঞেস করল, আমরা তার কী নাম রাখব? তখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় নাম হলো: হামযা ইবনু ‘আব্দুল মুত্তালিব।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف موصولًا، قد تفرَّد يعقوب بن حُميد بن كاسب بوصله بذكر جابر بن عبد الله، فيما نبَّه عليه الدارقطني في "الغرائب والأفراد" كما في "أطرافه" لأبي الفضل بن طاهر المقدسي (1592)، ونبَّه عليه الدارقطني في "العلل" (3250). ويعقوب بن حميد بن كاسب يحسَّن حديثه إلّا عند التفرد أو المخالفة، وقد تفرَّد هنا بوصل الحديث، وخالفه من هو أوثق منه وأجلُّ، فرووا هذا الحديث عن سفيان بن عُيينة، عن عمرو بن دينار، عن رجل من الأنصار قال: جاء جدّي بأبي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكره مرسلًا، وهو الأشبه بالصواب، ووصله بعضُ مَن لا يُعتمد عليه، فجعله من رواية هذا الرجل الأنصاري عن أبيه، قال: ولد لي غلام.وأخرجه الآجريّ في "الشريعة" (1723) عن أبي محمد عبد الله بن صالح البخاري، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1827) من طريق عبد الله بن إسحاق المدائني، عن يعقوب بن حميد بن كاسب به.وأخرجه عبد الله بن وهب في "جامعه" (81 - أبو الخير) عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار (وتحرَّف في المطبوع اسم دينار إلى كثير)، قال: سمعت رجلًا بالمدينة يقول: جاء جدي بأبي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره مرسلًا.وكذلك رواه مرسلًا يوسف بن سلْمان المازني عن سفيان بن عُيينة كما سيأتي عند المصنف في الرواية التالية.وأخرجه أبو الشيخ الأصبهاني في "طبقات المحدثين بأصبهان" (291)، وأبو نُعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (1826)، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 2/ 514، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 52/ 4 - 5 من طريق قيس بن الربيع عن شعبة، عن عمرو بن دينار، عن رجل من الأنصار، عن أبيه، قال: ولد لي، غلام فذكره موصولًا، ولكن قيس بن الربيع ليس بالقوي وانفرد به عن شعبة. قال الخطيب غريب من حديث شعبة، تفرَّد بروايته عبد العزيز ابن الخطّاب عن قيس بن الربيع عنه.وقد رُوي خبرٌ آخر عن جابر بن عبد الله في تسمية النبي صلى الله عليه وسلم لابن رجلٍ من الأنصار بعبد الرحمن، أخرجه أحمد 22/ (14296، والبخاري (6186) و (6189)، ومسلم (2133) من طريق سفيان بن عُيينة، ومسلم (2133) من طريق روح بن القاسم، كلاهما عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله، قال: ولد لرجل منا، غلام فسماهُ القاسم، فقلنا: لا نكنِّيك بأبي القاسم ولا نُنعِمُك عَينًا، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم، فذكَر له ذلك له، فقال: "أَسْمِ ابنَك عبدَ الرحمن". قلنا: هذا هو الصحيح عن جابر بن عبد الله.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4950)


4950 - حدّثَناه عبد الله بن إسحاق ابن الخُراساني العَدْل ببغداد، حدثنا محمد بن إسماعيل السُّلَمي، حدثنا يوسف بن سَلْمان المازني، حدثنا سفيان بن عُيينة، عن عمرو بن دينار، سمع رجلًا بالمدينة يقول: جاء جَدّي بأبي إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: هذا ولدي، فما أُسمِّيه؟ قال: "سَمِّه بأحبِّ الناسِ إليَّ حمزةَ بن عبد المُطَّلب" [1].قد قَصّر هذا الراوي المَجهُول برواية الحديث عن ابن عُيينة، والقولُ فيه قول يعقوبَ بن حُميد، وقد كان أبو أحمد الحافظ يُناظِرُني أنَّ البخاريَّ قد روى عنه في "الجامع الصحيح"، وكنت آبَى عليه [2].




আমর ইবনে দীনার থেকে বর্ণিত, তিনি মদীনার এক ব্যক্তিকে বলতে শুনেছেন, লোকটি বলল: আমার দাদা আমার পিতাকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন এবং বললেন: "এ আমার সন্তান, আমি এর কী নাম রাখব?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার নিকট সবচেয়ে প্রিয় ব্যক্তি হামযা ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের নামে এর নামকরণ করো।" ইবনে উয়াইনা থেকে হাদীস বর্ণনার ক্ষেত্রে এই অজ্ঞাত বর্ণনাকারী ত্রুটি করেছেন। এই বিষয়ে ইয়াকুব ইবনে হুমাইদের কথাই বিবেচ্য। হাফিয আবূ আহমদ আমার সাথে বিতর্ক করতেন যে, বুখারী তাঁর 'আল-জামি আস-সহীহ'-এ তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন, কিন্তু আমি তা প্রত্যাখ্যান করতাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسلٌ، وأخطأ المصنِّف إذ جهَّل يوسفَ بن سلْمان المازني، فهوجيّد الحديث، روى عنه جمع من كبار الحفاظ، وقال عنه النسائي: لا بأس به، ووثّقه مسلمة بن قاسم، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد وصله بعضهم، ولكن ذلك لا يصح كما سبق بيانه فيالذي قبله.



[2] كان المصنِّف يرى أنَّ يعقوب الذي روى عنه البخاري وأهمله في موضعين فلم يقيّده هو يعقوب بن محمد الزهري كما تقدَّم بإثر الحديث (3143). وأبو أحمد الحافظ: هو المعروف بالحاكم الكبير، صاحب كتاب "الكنى والأسماء"، وانظر ترجمته في "سير أعلام النبلاء" 16/ 370.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4951)


4951 - أخبرني أحمد بن كامل القاضي، حدثنا الهيثم بن خَلَفَ الدُّورِي، حدثنا محمد بن المثنَّى، حدثني عُبيد الله بن عبد المجيد الحَنَفي، حدثنا ربيعة بن كُلْثوم، عن سَلَمة بن وَهْرام، عن عِكْرمة عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "دخلتُ الجنةَ البارحةَ، فنظرتُ فيها، فإذا جعفرٌ يَطيرُ مع الملائكةِ، وإذا حمزةُ مُتّكئ على سَريرٍ" [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وحسبُنا الله ونعم الوكيل، وصلَّى الله على محمد وآله وسلَّم. ‌‌هذه أحاديثُ تركتُها [2] في الإملاء




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "গত রাতে আমি জান্নাতে প্রবেশ করেছিলাম এবং তার দিকে তাকালাম। দেখলাম, জাফর ফেরেশতাদের সাথে উড়ছেন, আর দেখলাম হামযা একটি পালঙ্কের উপর হেলান দিয়ে আছেন।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، وقد وقع في إسناد المصنف هنا خطأ في تسمية الراوي عن سلمة بن وهرام بأنه ربيعة بن كلثوم، فلم تقع تسميته بذلك في غير هذه الطريق، وجميع من خرَّج هذا الخبر رواه من طريق عُبيد الله بن عبد المجيد الحنفي، عن زمعة بن صالح عن سلمة بن وهرام، وكذلك رواه المصنف نفسُه فيما سيأتي برقم (4997) عن أبي محمد المُزني عن الهيثم بن خلف الدُّوري. فالصحيح إذًا أنه زمعة بن صالح لا ربيعة بن كلثوم.وزمعة بن صالح هذا ليِّن الحديث.وسلمة بن وهرام لا بأس به يُعتدُّ بحديثه من غير رواية زمعة بن صالح عنه كما جزم به ابن حبان وابن عدي، وإنما وقعت المناكير في أحاديثه من جهة زمعة.وقد روي مثلُ هذا الخبر في حقِّ جعفر بن أبي طالب دون حمزة بن عبد المطلب من وجوهٍ أخرى عن ابن عباس، قوَّى بعضها المنذريُّ في "ترغيبه"، وابن حجر في "الفتح" 11/ 149.وصح مثلُ ذلك في حقِّ جعفر عن غير ابن عباس.وأخرجه أبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (255)، وابن عدي في "الكامل" 3/ 230، وابن عبد البر في "الاستيعاب" (ص 110)، والمزي في "تهذيب الكمال": 5/ 61 - 62 في ترجمة جعفر من طرق عن أبي موسى محمد بن المثنَّى، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (1466)، وابن عدي 3/ 339، وضياء الدين المقدسي في "المختارة" 11 / (4316)، وفي "مناقب جعفر بن أبي طالب" (3) من طريقين عن عُبيد الله بن عبد المجيد الحنفي، به.وسيأتي عند المصنف برقم (4997) عن أبي محمد المُزني عن الهيثم بن خلف الدُّوري.وأخرجه بذكر جعفر وحده الطبراني (12020)، والآجري في "الشريعة" (1717)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (652) و (1434)، والضياء في "مناقب جعفر" (14) من طريق أبي حفص عمر بن هارون البلخي، عن عبد الملك بن عيسى الثقفي، عن عكرمة، عن ابن عباس. وعمر بن هارون متروك متهم.وكذلك أخرجه الطبراني (1467) و (12112)، وابن عدي في "الكامل" 1/ 240، والضياء في "مناقب جعفر" (4) من طريق أبي شيبة إبراهيم بن عثمان عن الحكم، عن مقسم عن: ابن عباس وأبو شيبة متروك.وسيأتي بنحوه عند المصنف برقم (5001) و (50011) من طريق سعدان بن الوليد عن عطاء بن أبي رباح عن ابن عبّاس. وسعدان هذا مجهول.وقد تقدَّم في شأن جعفر حديثُ البراء بن عازب برقم (4369) وإسناده ضعيف جدًّا.وسيأتي عن أبي هريرة برقم (4999)، ونحوه برقم (5008) وهو حسنٌ.وتقدَّم برقم (4400) عن عامر الشعبي: أنَّ ابن عمر كان إذا حيّا عبد الله بن جعفر قال: السلام عليك يا ابن ذي الجناحين وإسناده صحيح.



[2] في (ز) و (م) و (ب): تركها، والمثبت من (ص).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4952)


4952 - حدثنا أبو العبّاس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان، حدثنا أبو أسامة، حدثنا أسامة بن زيد، عن نافع عن ابن عمر، قال: رجعَ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم أُحدٍ، فسمع نساءَ بني عبد الأشْهَلِ يَبكينَ على هَلْكاهُنَّ، فقال: "لكنَّ حمزةَ لا بواكيَ له" [1].




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উহুদ যুদ্ধের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মদিনায়) ফিরে আসছিলেন, তখন তিনি বানু আবদ আল-আশহাল গোত্রের মহিলাদের তাদের নিহত স্বজনদের জন্য কাঁদতে শুনলেন। তখন তিনি বললেন, "কিন্তু হামযার জন্য কোনো ক্রন্দনকারিনী নেই।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل أسامة بن زيد: وهو الليثي. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة.وقد تقدَّم برقم (4944) من طريق عثمان بن عمر عن أسامة بن زيد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4953)


4953 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة، حدثني أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسود، عن عُزوة، في تسمية من شهد بدرًا: رسول الله صلى الله عليه وسلم، حمزةُ بن عبد المطلب، وقُتِلَ يومَ أُحُدٍ وهو ابن أربعٍ وخَمسين [1].




উরওয়া থেকে বর্ণিত, বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের নাম উল্লেখ প্রসঙ্গে: আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), হামযা ইবনে আব্দুল মুত্তালিব। আর তিনি উহুদের দিন শহীদ হন যখন তাঁর বয়স ছিল চুয়ান্ন বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، وقد تقدَّم برقم (4935)، دون ذكر سنِّ حمزة لما استشهد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4954)


4954 - حدثنا أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا محمد بن عبد الوهاب الحضرمي، حدثنا هارون بن إسحاق الهَمْداني، حدثنا عبد الله بن نُمير، عن أبي حمّاد الحَنَفي، عن عبد الله بن محمد بن عَقِيل عن جابر، قال: لما جَرَّدَ رسول الله صلى الله عليه وسلم حمزةَ بكي، فلما رأى مِثالَه شَهَقَ [1].




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হামযার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শরীর থেকে পোশাক খুলে নিলেন, তখন তিনি কাঁদলেন। আর যখন তিনি তাঁর দেহাবয়ব দেখলেন, তখন তিনি ডুকরে কেঁদে উঠলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف أبي حماد والحَنَفي - واسمه المغفَّل بن صدقة - وعبد الله بن محمد بن عقيل، وتسمية شيخ أحمد بن يعقوب الثقفي هنا بمحمد بن عبد الوهاب الحضرمي وهمٌ، والصحيح أنه محمد بن عبد الله الحضرمي، وهو المعروف بمطيَّن، وقد روى الطبراني هذا الخبر في "معجمه الكبير" (2932) عنه بهذا الإسناد. وقد تقدَّم ضمن حديث مطول برقم (2589) وسيأتي برقم (4961) من طريق أبي إسحاق الفزاري عن أبي حماد.وسيأتي ذكر التمثيل بحمزة بعده من حديث أبي هريرة.وتقدَّم بالأرقام (1367) و (2595) و (4948) من حديث أنس بن مالك، وبرقم (3408) من حديث أبي بن كعب.وسيأتي برقم (4956) من حديث ابن عباس.مثاله، أي: صفة التمثيل به. 4/ 63، وأبو طاهر الذهبي في "المخلِّصيات" (1967)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1830)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (9253)، وأبو نعيم في "دلائل النبوة" 3/ 288 و 289، وأبو الحسن الواحدي في "أسباب النزول" (571)، وأبو القاسم الأصبهاني في "سير السلف الصالحين" ص 354 - 355، وابن الجوزي في "المنتظم" 3/ 182، وابن سيد الناس في "عيون الأثر" 2/ 29 من طرق عن صالح بن بشير المري، به.ولذكر تمثيل المشركين بحمزة شواهد تقدَّم ذكرها عند الحديث السابق.ولقوله صلى الله عليه وسلم: "لولا حزنُ مَن بعدك .... " شاهدٌ من حديث أنس بن مالك الذي تقدَّم عند المصنف بالأرقام (1367) و (2595) و (4948)، وإسناده حسن.وآخر من حديث ابن عباس الآتي بعده.ولقَسَمه صلى الله عليه وسلم أن يمثّل في عدد من المشركين كما مثَّلوا بحمزة ونزول الآية، شاهد من حديث ابن عباس عند أبي جعفر النحاس في "الناسخ والمنسوخ" ص 541، والطبراني في "الكبير" (11051) بإسنادين حسنين، لكن لفظه: "لأمثّلن بثلاثين".وانظر حديث أبيّ بن كعب المتقدم برقم (3408) و (3708)









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4955)


4955 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا محمد بن أحمد بن النضر، حدثنا خالد بن خِدَاش، حدثنا صالح المُرِّي، عن سليمان التَّيمي، عن أبي عثمان النَّهدي عن أبي هريرة: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يومَ أحد نظر إلى حمزةَ وقد قُتل ومُثَّل به، فرأى منظرًا لم يَرَ منظرًا قطُّ أوجعَ لقِلبْه منه ولا أوجَلَ، فقال: "رحمةُ الله عليك، قد كنتَ وَصُولًا للرَّحِم، فَعولًا للخيرات، ولولا حُزنُ مَن بَعدَك عليك لَسَرَّني أن أدَعَك حتى تُحْيا من أفواجٍ شتّى"، ثم حَلَف وهو واقفٌ مكانَه: "والله لأُمثِّلنَّ بسبعينَ منهم مكانك" فنزلَ القرآنُ وهو واقفٌ في مكانِه لم يَبْرَح: {وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُمْ بِهِ وَلَئِنْ صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌ لِلصَّابِرِينَ} [النحل: 126]، حتى ختمَ السورةَ، وكَفَّر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأمسكَ عما أرادَ [1].




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদের দিন হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে তাকালেন, যখন তাঁকে হত্যা করা হয়েছিল এবং তাঁর অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ বিকৃত করা হয়েছিল। তিনি এমন দৃশ্য দেখলেন, যা তাঁর হৃদয়ের জন্য এর চেয়ে বেশি বেদনাদায়ক বা ভীতিকর আর কিছু ছিল না। অতঃপর তিনি বললেন, "আপনার উপর আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক। আপনি আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষাকারী এবং সৎ কাজ সম্পাদনকারী ছিলেন। আপনার পরে যারা থাকবে, তাদের শোকের ভয় না থাকলে, আমি খুবই আনন্দিত হতাম যদি আমি আপনাকে এভাবেই ছেড়ে দিতাম, যাতে আপনি বিভিন্ন দলের মধ্য থেকে পুনরুত্থিত হন।" অতঃপর তিনি নিজ স্থানে দাঁড়িয়ে শপথ করলেন, "আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই তোমার পরিবর্তে তাদের সত্তর জনের অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ বিকৃত করব।" অতঃপর তিনি নিজ স্থান থেকে না সরতেই এই আয়াত নাযিল হল: "আর যদি তোমরা শাস্তি দাও, তবে তোমাদেরকে যে পরিমাণ শাস্তি দেওয়া হয়েছে, তোমরাও সেই পরিমাণ শাস্তি দাও। আর যদি তোমরা ধৈর্য ধারণ করো, তবে ধৈর্যশীলদের জন্য সেটাই উত্তম।" [সূরা আন-নাহল: ১২৬]— এমনকি সূরাটি শেষ হয়ে গেল। আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (তাঁর শপথের জন্য) কাফ্ফারা দিলেন এবং যা ইচ্ছা করেছিলেন, তা থেকে বিরত থাকলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف صالح المُرِّي - وهو ابن بشير - ولبعض حروفه شواهد صحيحة. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (2937) عن محمد بن أحمد بن النضر الأزدي، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن سعد 3/ 12، والبزار (9530)، وابن المنذر في "تفسيره" (1065)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 3/ 183، وأبو بكر الشافعي في الغيلانيات" (169 - 171) و (254)، وأبو بكر الآجري في "الشريعة" (1725)، والطبراني في "الكبير" (2937)، وابن عدي في "الكامل" 4/ 63، وأبو طاهر الذهبي في "المخلِّصيات" (1967)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1830)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (9253)، وأبو نعيم في "دلائل النبوة" 3/ 288 و 289، وأبو الحسن الواحدي في "أسباب النزول" (571)، وأبو القاسم الأصبهاني في "سير السلف الصالحين" ص 354 - 355، وابن الجوزي في "المنتظم" 3/ 182، وابن سيد الناس في "عيون الأثر" 2/ 29 من طرق عن صالح بن بشير المري، به.ولذكر تمثيل المشركين بحمزة شواهد تقدَّم ذكرها عند الحديث السابق.ولقوله صلى الله عليه وسلم: "لولا حزنُ مَن بعدك .... " شاهدٌ من حديث أنس بن مالك الذي تقدَّم عند المصنف بالأرقام (1367) و (2595) و (4948)، وإسناده حسن.وآخر من حديث ابن عباس الآتي بعده.ولقَسَمه صلى الله عليه وسلم أن يمثّل في عدد من المشركين كما مثَّلوا بحمزة ونزول الآية، شاهد من حديث ابن عباس عند أبي جعفر النحاس في "الناسخ والمنسوخ" ص 541، والطبراني في "الكبير" (11051) بإسنادين حسنين، لكن لفظه: "لأمثّلن بثلاثين".وانظر حديث أبيّ بن كعب المتقدم برقم (3408) و (3708)









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4956)


4956 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ حدثنا يحيى بن محمد بن يحيى الشهيد، حدثنا أحمد بن يونس، حدثنا بكر بن عيّاش، حدثنا يزيد بن أبي زياد عن مِقسَم، عن ابن عباس قال: لما قُتل حمزةُ أقبلتْ صفيةُ تَطلُبُه لا تدري ما صَنَعَ، فلقيَتْ عليًّا والزبيرَ، فقال عليٌّ للزبير: اذكُر لأُمّكَ، وقال الزُّبَير لعليٍّ: لا، اذكُر أنتَ لعمّتِك، قالت ما فعلَ حمزةُ؟ فأرَيَاها أنهما لا يَدرِيان، فجاءتِ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: "إني أخافُ على عقلِها" فوضعَ يدَه على صدرِها ودعا، فاسترجَعتْ وبَكَت، ثم جاء فقام عليه وقد مُثِّلَ به، فقال: "لولا جَزَعُ النساءِ لتَركتُه حتى يُحشَر مِن حَواصِل الطَّير وبُطُونِ السِّباع". ثم أمر بالقَتْلى فجعل يُصلِّي عليهم، فيَضعُ تسعةً وحمزةَ، فيكبِّر عليهم سبعَ تكبيراتٍ، ثم يُرفَعُون ويُترَك حمزةُ، ثم يُؤتَى [1] بتسعةٍ، فيُكبِّر عليهم سبعَ تكبيراتٍ، حتى فرَغَ منهم [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন হামযাকে শহীদ করা হলো, সাফিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে খুঁজতে এলেন, তিনি জানতেন না তাঁর কী হয়েছে। তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যুবাইরকে বললেন: তোমার মাকে (অর্থাৎ তাঁর ফুফুকে) তুমিই বলো। যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলীকে বললেন: না, বরং আপনার ফুফুকে আপনিই বলুন। তিনি (সাফিয়্যা) বললেন: হামযার কী হয়েছে? তারা দু'জনই তাঁকে দেখালেন যে তারা জানেন না। এরপর তিনি নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তার (সাফিয়্যার) বুদ্ধির (মানসিক অবস্থার) উপর ভয় পাচ্ছি।" অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (সাফিয়্যার) বুকে হাত রাখলেন এবং দু'আ করলেন। তখন তিনি 'ইন্না লিল্লাহ' পাঠ করলেন এবং কাঁদলেন। এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন এবং (হামযার লাশের) কাছে দাঁড়ালেন, তাঁকে বিকৃত করা হয়েছিল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি মহিলাদের অস্থিরতা ও কান্নার ভয় না থাকত, তবে আমি তাঁকে এমন অবস্থায় ফেলে রাখতাম যেন তাঁকে পাখি ও হিংস্র প্রাণীদের পেট থেকে হাশরের ময়দানে উঠানো হয়।" এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শহীদদের সম্পর্কে নির্দেশ দিলেন এবং তাদের জন্য সালাত (জানাযা) আদায় করতে লাগলেন। তিনি নয়জন শহীদকে হামযার (লাশের) সাথে রাখতেন এবং তাদের উপর সাত তাকবীর দিতেন। এরপর সেই নয়জনকে তুলে নেওয়া হতো এবং হামযাকে রেখে দেওয়া হতো। এরপর আরও নয়জনকে আনা হতো এবং তিনি তাদের উপর সাত তাকবীর দিতেন, এভাবে তিনি (সকল শহীদদের জানাযা) শেষ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في النسخ الخطية: يؤتوا، والمثبت موافق لما في مصادر التخريج. ابن أبي زياد - وهو الهاشمي مولاهم - الجمهور على تضعيفه، وقد كان ساء حفظه لما كبر فصار يُلقَّن فيَتَلقَّن، وقد انفرد فيه بألفاظ وخُولف في أخرى.وأخرجه ابن سعد 3/ 12، وابن أبي شيبة 14/ 404، والبزار في "مسنده" (1796 - كشف الأستار)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (4910)، و "شرح معاني الآثار" 1/ 503، والطبراني في "الكبير" (2935)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 12، وفي "دلائل النبوة" 3/ 287، وابن الجوزي في "المنتظم" 3/ 181 - 182 من طرق عن أحمد بن عبد الله بن يونس - ونُسب عند المصنف لجده - بهذا الإسناد. واقتصر الطحاوي على ذكر الصلاة على شهداء أُحد.وأخرجه مختصرًا بقصة الصلاة على الشهداء ابن ماجه (1513)، والطحاوي في "شرح المشكل" (4909)، و "شرح المعاني" 1/ 503 من طريق محمد بن عبد الله بن نُمير، والطبراني في "الكبير" (2936) من طريق يزيد بن مِهْران كلاهما عن أبي بكر بن عياش، به. وليس فيه عدد التكبيرات.وأخرجه مختصرًا بهذا القدر أيضًا ابن سعد 3/ 14، وابن أبي شيبة 3/ 403 و 12/ 291، والبيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 13 من طريق محمد بن فُضيل، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث الهاشمي مرسلًا، بلفظ: صلَّى رسول الله على حمزة فكبَّر عليه تسعًا، ثم جيء بأُخرى فكبَّر عليها سبعًا، ثم جيء بأخرى فكبَّر عليها خمسًا، حتى فرغ من جميعهم، غير أنه وترٌ. وهذه الرواية تدل على اضطراب يزيد في إسناده ومتنه.وأخرجه دون ذكر قصة صفية بنت عبد المطلب: الطبراني في "الكبير" (11051) من طريق أحمد بن أيوب بن راشد البصري، عن عبد الأعلى بن عبد الأعلى، عن محمد بن إسحاق، حدثني محمد بن كعب القُرظي والحكم بن عتيبة، عن مَقسَم ومجاهد، عن ابن عبّاس. وذكر في هذه الرواية الصلاة على الشهداء واحدًا واحدًا ومع كل واحدٍ منهم حمزة، حتى صُلِّي عليه وعلى الشهداء اثنتين وسبعين صلاة، ووقع في هذه الرواية التكبير في الصلاة تسعًا، ومهما يكن من أمرٍ فإن أحمد بن أيوب هذا ذكره ابن حبان في "ثقاته" وقال: ربما أغرب، وضعَّفه الهيثمي في "مجمع الزوائد " 6/ 120.وقد روى قصة الصلاة منه فقط عن ابن إسحاق زيادُ بن عبد الله البكائي كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 97، ويونسُ بن بُكَير عند البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 13، كلاهما عن محمد بن إسحاق؛ قال البكائي في روايته: حدثني من لا أتَّهم، وقال يونس في روايته: حدثني رجلٌ من أصحابي، عن مِقسم، عن ابن عبّاس. فذكر الصلاة على الشهداء واحدًا واحدًا ومع كل واحدٍ حمزة، وأنَّ التكبير عليهم في الصلاة كان سبعًا. قال البيهقي: وهذا ضعيف، ومحمد بن إسحاق بن يسار إذا لم يذكر اسم من حدَّث عنه لم يُفرَح به.وأخرجه كذلك دون قصة صفية: عبد الله بن أحمد بن حنبل في "العلل" (5773)، والعقيلي في "الضعفاء" (322)، والدارقطني في "سننه" (4209)، وأبو طاهر الذهبي في "المخلِّصيات" (1965)، والواحدي في "أسباب النزول" (570) من طريق إسماعيل بن عياش، عن عبد الملك بن حميد بن أبي غنية، والآجرّي في "الشريعة" (1724) من طريق الحسن بن عمارة، كلاهما عن الحكم بن عتيبة، عن مجاهد، عن ابن عبّاس. غير أنهما ذكرا أنَّ التكبير كان عشرًا، لكن إسماعيل بن عيّاش مضطرب الحديث عن غير الشاميين كما قال الدارقطني، وابن أبي غنية كوفي، ووقع في روايته عند بعضهم تردُّدٌ فقال: عن ابن أبي غنية أو غيره، فسأل عبد الله أباه الإمام أحمد، فقال له: هذا من حديث الحسن بن عمارة، ليس هذا من حديث ابن أبي غنية. قلنا: فعاد الحديث إلى الحسن بن عُمارة، وهو متروك الحديث.وأخرج منه ذكر التمثيل بحمزةَ أبو جعفر النحاسُ في "الناسخ والمنسوخ" ص 541 من طريق أبي عمرو بن العلاء، عن مجاهد، عن ابن عبّاس. وزاد فيه قَسَمَ النبي صلى الله عليه وسلم والأنصار بالتمثيل بالمشركين كما مثَّلوا بحمزة وغيره من الشهداء يوم أُحُد. وإسناده حسن.ويشهد لقوله صلى الله عليه وسلم: "لولا جزع النساء .... " حديث أنس بن مالك السالف برقم (1367).وحديث أبي هريرة السابق.ويشهد لذكر الصلاة على حمزة وعلى شهداء أُحدٍ حديث عبد الله بن الزُّبير عند الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 503، وابن شاهين في "ناسخ الحديث ومنسوخه" (292)، لكن جعله ابن شاهين من حديث عبد الله بن الزبير عن أبيه. وإسناده حسن.ومرسل أبي مالك الغفاري عند أبي داود في "المراسيل" (427) و (435)، والطحاوي 1/ 503 وغيرهم، ورجاله ثقات.ومرسل عامر الشعبي عند أبي داود في "المراسيل" (428)، لكن أحمد أسنده في "المسند" 7/ (4414) فجعله عن الشعبي عن ابن مسعود، والشعبي لم يسمع من ابن مسعود، فيبقى الخبر على إرساله، ورجاله لا بأس بهم.وروي عن جابر بن عبد الله مثلُ ذلك كما تقدَّم عند المصنف برقم (2589)، ولكن إسناده ضعيف، وهو خلاف ما صح عنه في "الصحيحين" وغيرهما: أنه صلى الله عليه وسلم لم يُصلِّ على شهداء أحد، كما مضى بيانه وتخريجه وانظر التعليق عليه هناك.وأما قصة صفية بنت عبد المطلب، فقد روى نحوها ابن إسحاق في رواية يونس بن بُكَير عنه عند ابن الأثير في "أسد الغابة" 6/ 173 عن الزهري عن جماعة من التابعين مرسلًا، لكن ليس فيه ذكر علي، إنما فيه ذكر الزبير بن العوام وحده: أن النبي صلى الله عليه وسلم قال له: "القَها فارجِعها، لا ترى ما بأخيها" فلقيها الزبير وقال: أيْ أمَّهْ، إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمركم أن ترجعي، قالت: ولمَ، فقد بلغني أنه مُثِّل بأخي، وذاك في الله، فما أرضانا بما كان من ذلك، لأصبرن ولأحتسبن إن شاء الله، فلما جاء الزبير إليه فأخبره قول صفية قال: "خلِّ سبيلها" فأتته فنظرت إليه واسترجعت واستغفرت له. وروي كذلك عن عروة عن أبيه الزبير موصولًا عند أحمد 3 / (1418) وغيره بإسناد حسن، لكن جاء فيه: أنَّ الزبير لما أخبرها بعَزم رسول الله صلى الله عليه وسلم وقفتْ؛ فلعله أذن لها بعد ذلك، والله أعلم.



[2] إسناده ضعيف بمرّة، أبو بكر بن عيّاش - وإن كان صدوقًا - في حفظه سوءٌ، وشيخه يزيد ابن أبي زياد - وهو الهاشمي مولاهم - الجمهور على تضعيفه، وقد كان ساء حفظه لما كبر فصار يُلقَّن فيَتَلقَّن، وقد انفرد فيه بألفاظ وخُولف في أخرى.وأخرجه ابن سعد 3/ 12، وابن أبي شيبة 14/ 404، والبزار في "مسنده" (1796 - كشف الأستار)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (4910)، و "شرح معاني الآثار" 1/ 503، والطبراني في "الكبير" (2935)، والبيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 12، وفي "دلائل النبوة" 3/ 287، وابن الجوزي في "المنتظم" 3/ 181 - 182 من طرق عن أحمد بن عبد الله بن يونس - ونُسب عند المصنف لجده - بهذا الإسناد. واقتصر الطحاوي على ذكر الصلاة على شهداء أُحد.وأخرجه مختصرًا بقصة الصلاة على الشهداء ابن ماجه (1513)، والطحاوي في "شرح المشكل" (4909)، و "شرح المعاني" 1/ 503 من طريق محمد بن عبد الله بن نُمير، والطبراني في "الكبير" (2936) من طريق يزيد بن مِهْران كلاهما عن أبي بكر بن عياش، به. وليس فيه عدد التكبيرات.وأخرجه مختصرًا بهذا القدر أيضًا ابن سعد 3/ 14، وابن أبي شيبة 3/ 403 و 12/ 291، والبيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 13 من طريق محمد بن فُضيل، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث الهاشمي مرسلًا، بلفظ: صلَّى رسول الله على حمزة فكبَّر عليه تسعًا، ثم جيء بأُخرى فكبَّر عليها سبعًا، ثم جيء بأخرى فكبَّر عليها خمسًا، حتى فرغ من جميعهم، غير أنه وترٌ. وهذه الرواية تدل على اضطراب يزيد في إسناده ومتنه.وأخرجه دون ذكر قصة صفية بنت عبد المطلب: الطبراني في "الكبير" (11051) من طريق أحمد بن أيوب بن راشد البصري، عن عبد الأعلى بن عبد الأعلى، عن محمد بن إسحاق، حدثني محمد بن كعب القُرظي والحكم بن عتيبة، عن مَقسَم ومجاهد، عن ابن عبّاس. وذكر في هذه الرواية الصلاة على الشهداء واحدًا واحدًا ومع كل واحدٍ منهم حمزة، حتى صُلِّي عليه وعلى الشهداء اثنتين وسبعين صلاة، ووقع في هذه الرواية التكبير في الصلاة تسعًا، ومهما يكن من أمرٍ فإن أحمد بن أيوب هذا ذكره ابن حبان في "ثقاته" وقال: ربما أغرب، وضعَّفه الهيثمي في "مجمع الزوائد " 6/ 120.وقد روى قصة الصلاة منه فقط عن ابن إسحاق زيادُ بن عبد الله البكائي كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 97، ويونسُ بن بُكَير عند البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 13، كلاهما عن محمد بن إسحاق؛ قال البكائي في روايته: حدثني من لا أتَّهم، وقال يونس في روايته: حدثني رجلٌ من أصحابي، عن مِقسم، عن ابن عبّاس. فذكر الصلاة على الشهداء واحدًا واحدًا ومع كل واحدٍ حمزة، وأنَّ التكبير عليهم في الصلاة كان سبعًا. قال البيهقي: وهذا ضعيف، ومحمد بن إسحاق بن يسار إذا لم يذكر اسم من حدَّث عنه لم يُفرَح به.وأخرجه كذلك دون قصة صفية: عبد الله بن أحمد بن حنبل في "العلل" (5773)، والعقيلي في "الضعفاء" (322)، والدارقطني في "سننه" (4209)، وأبو طاهر الذهبي في "المخلِّصيات" (1965)، والواحدي في "أسباب النزول" (570) من طريق إسماعيل بن عياش، عن عبد الملك بن حميد بن أبي غنية، والآجرّي في "الشريعة" (1724) من طريق الحسن بن عمارة، كلاهما عن الحكم بن عتيبة، عن مجاهد، عن ابن عبّاس. غير أنهما ذكرا أنَّ التكبير كان عشرًا، لكن إسماعيل بن عيّاش مضطرب الحديث عن غير الشاميين كما قال الدارقطني، وابن أبي غنية كوفي، ووقع في روايته عند بعضهم تردُّدٌ فقال: عن ابن أبي غنية أو غيره، فسأل عبد الله أباه الإمام أحمد، فقال له: هذا من حديث الحسن بن عمارة، ليس هذا من حديث ابن أبي غنية. قلنا: فعاد الحديث إلى الحسن بن عُمارة، وهو متروك الحديث.وأخرج منه ذكر التمثيل بحمزةَ أبو جعفر النحاسُ في "الناسخ والمنسوخ" ص 541 من طريق أبي عمرو بن العلاء، عن مجاهد، عن ابن عبّاس. وزاد فيه قَسَمَ النبي صلى الله عليه وسلم والأنصار بالتمثيل بالمشركين كما مثَّلوا بحمزة وغيره من الشهداء يوم أُحُد. وإسناده حسن.ويشهد لقوله صلى الله عليه وسلم: "لولا جزع النساء .... " حديث أنس بن مالك السالف برقم (1367).وحديث أبي هريرة السابق.ويشهد لذكر الصلاة على حمزة وعلى شهداء أُحدٍ حديث عبد الله بن الزُّبير عند الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 1/ 503، وابن شاهين في "ناسخ الحديث ومنسوخه" (292)، لكن جعله ابن شاهين من حديث عبد الله بن الزبير عن أبيه. وإسناده حسن.ومرسل أبي مالك الغفاري عند أبي داود في "المراسيل" (427) و (435)، والطحاوي 1/ 503 وغيرهم، ورجاله ثقات.ومرسل عامر الشعبي عند أبي داود في "المراسيل" (428)، لكن أحمد أسنده في "المسند" 7/ (4414) فجعله عن الشعبي عن ابن مسعود، والشعبي لم يسمع من ابن مسعود، فيبقى الخبر على إرساله، ورجاله لا بأس بهم.وروي عن جابر بن عبد الله مثلُ ذلك كما تقدَّم عند المصنف برقم (2589)، ولكن إسناده ضعيف، وهو خلاف ما صح عنه في "الصحيحين" وغيرهما: أنه صلى الله عليه وسلم لم يُصلِّ على شهداء أحد، كما مضى بيانه وتخريجه وانظر التعليق عليه هناك.وأما قصة صفية بنت عبد المطلب، فقد روى نحوها ابن إسحاق في رواية يونس بن بُكَير عنه عند ابن الأثير في "أسد الغابة" 6/ 173 عن الزهري عن جماعة من التابعين مرسلًا، لكن ليس فيه ذكر علي، إنما فيه ذكر الزبير بن العوام وحده: أن النبي صلى الله عليه وسلم قال له: "القَها فارجِعها، لا ترى ما بأخيها" فلقيها الزبير وقال: أيْ أمَّهْ، إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمركم أن ترجعي، قالت: ولمَ، فقد بلغني أنه مُثِّل بأخي، وذاك في الله، فما أرضانا بما كان من ذلك، لأصبرن ولأحتسبن إن شاء الله، فلما جاء الزبير إليه فأخبره قول صفية قال: "خلِّ سبيلها" فأتته فنظرت إليه واسترجعت واستغفرت له. وروي كذلك عن عروة عن أبيه الزبير موصولًا عند أحمد 3 / (1418) وغيره بإسناد حسن، لكن جاء فيه: أنَّ الزبير لما أخبرها بعَزم رسول الله صلى الله عليه وسلم وقفتْ؛ فلعله أذن لها بعد ذلك، والله أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4957)


4957 - حدثنا علي بن حَمَشاذَ، حدثنا أبو المثنَّى، حدثنا عبد الواحد بن غِياث، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن علي بن زيد، عن أنس بن مالك: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى فيما يرى النائمُ، قال: "رأيتُ كأني مُردِفٌ كبشًا، وكأنَّ ظُبَةَ سيفي انكسرتْ فأوَّلتُ أن أَقتُل كبشَ القَومِ، وأوَّلتُ أنَّ ظُبَة سيفي رجلٌ من عِتْرَتي". فقُتل حمزةُ، وقَتل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم طلحةَ، وكان صاحبَ اللِّواء [1] [2].




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুমের ঘোরে যা দেখেন (অর্থাৎ স্বপ্নে), তা দেখলেন। তিনি বলেন: “আমি দেখলাম, যেন আমি একটি মেষকে সাওয়ারিতে আমার পিছনে বসিয়েছি, আর দেখলাম যেন আমার তরবারির ধারালো অগ্রভাগ ভেঙে গেছে। আমি সেটির ব্যাখ্যা করলাম যে, আমি শত্রুদলের প্রধান ব্যক্তিকে হত্যা করব এবং আমার তরবারির অগ্রভাগের (ভাঙ্গা অংশের) ব্যাখ্যা করলাম যে, সে হচ্ছে আমার আহলে বাইতের (নিকটাত্মীয়দের) একজন পুরুষ।” অতঃপর (ওহুদের দিন) হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তালহাকে হত্যা করলেন, যে ছিল (মুশরিকদের) পতাকাবাহী।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] المثبت من "تلخيص المستدرك" للذهبي ومصادر التخريج وفي نسخنا الخطية: صاحب القول.



[2] إسناده ضعيف لضعف علي بن زيد - وهو ابن جُدعان - لكن روي مثلُ هذه الرؤيا عن ابن عبّاس كما تقدَّم عند المصنّف برقم (2620) بإسناد حسن غير أنه لم يُسمِّ فيها حمزة ولا طلحة، وإنما قال: "ورأيت أن سيفي ذا الفقار فُلَّ فأوَّلتُه فَلًّا فيكم" فجعلها عامّةً وليس بخصوص حمزة.وأخرجه أحمد 21 / (13825) عن عفان، عن حماد بن حماد بن سلمة به.وطلحة صاحب اللواء: هو طلحة بن أبي طلحة العَبْدري.والظُّبة: حدُّ السيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4958)


4958 - حدثنا أبو العبّاس، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا يعقوب بن محمد الزُّهْري، حدثنا عبد العزيز بن عمران، عن عبد الله بن جعفر المَخْرَمي [1]، عن أبي عَون مولى المِسوَر، عن المِسور بن مَخرمَة، عن عبد الله بن عبّاس، عن أبيه، قال: تزوّجَ عبد المطّلب هالةَ بنتَ أُهَيب بن عبد مَناف بن زُهْرة، فولَدت حمزةَ وصفيّةَ [2].




আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল মুত্তালিব হালা বিনত উহাইব ইবনে আব্দ মানাফ ইবনে যুহরাকে বিবাহ করেন এবং তিনি হামযা ও সাফিয়্যাকে জন্ম দেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ص) و (م) إلى المخزومي، وإنما هو المَخْرَمي نسبة لمخرمة والد المسور جدِّ جدِّه.



[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل عبد العزيز بن عمران، فهو متروك الحديث، وقد تقدَّم خبره هذا بأطول مما هاهنا برقم (4221) من طريق هاشم بن مَرثَد الطبراني عن يعقوب بن محمد.لكن هذا الخبر مشهور عند أهل السير كما تقدم بيانه ثمة. المصري، عن أحمد بن صالح، به.وأخرج الطبراني في "الكبير" (2925) قصة إسلام حمزة عن إسماعيل بن الحسن الخفاف المصري، عن أحمد بن صالح به، فذكر كنية حمزة في سياق القصة غير مرةٍ.