হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4959)


4959 - أخبرني إسماعيل بن الفضل، حدثنا جدي، حدثنا إبراهيم بن المُنذر الحِزَامي، حدثنا حاتم بن إسماعيل، عن يحيى بن عبد الرحمن بن أبي لَبيبة [1]، عن جده، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "والذي نفسي بيدِه، إنه لَمَكتوب عندَه في السماءِ السابعة: حمزةُ بن عبد المطلب أسدُ الله وأسدُ رسوله" [2].




ইয়াহইয়া ইবনু আবদির রহমান ইবনু আবী লাবিবার দাদা থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম, নিশ্চয়ই তাঁর নিকট সপ্তম আসমানে লেখা আছে: হামযা ইবনু আবদুল মুত্তালিব হলেন আল্লাহর সিংহ এবং তাঁর রাসূলের সিংহ।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في نسخنا الخطية بن لبيب، وضبب فوقها في (ز)، والمثبت من "تلخيص المستدرك" للذهبي، وقد يكون ما في نسخنا الخطية تحريف عن لبيبة، فقد قيل للدارقطني: في بعض الحديث: ابن لبيبة، وفي بعضها: ابن أبي لبيبة، فأي ذلك أصح؟ قال: هذا وهذا. المصري، عن أحمد بن صالح، به.وأخرج الطبراني في "الكبير" (2925) قصة إسلام حمزة عن إسماعيل بن الحسن الخفاف المصري، عن أحمد بن صالح به، فذكر كنية حمزة في سياق القصة غير مرةٍ.



[2] إسناده ضعيف جدًّا، يحيى بن عبد الرحمن بن أبي لبيبة - وهو يحيى بن محمد بن عبد الرحمن بن أبي لبيبة ويقال: ابن لبيبة - فقد قال عنه ابن معين: ليس حديثُه بشيءٍ، وقال الذهبي في "تلخيصه": يحيى واهٍ. قلنا: وجدُّه لا يُعرف.وأخرجه الزبير بن بكار في "النسب" كما في "معجم الصحابة" للبغوي قبل الخبر (390) و"الإصابة" للحافظ، 7/ 351، وأبو بكر الدِّينَوَري في "المجالسة" (1246)، والطبراني في "الكبير" (2952)، وأبو منصور الديلمي في "مسند الفردوس" كما في "الغرائب الملتقطة" للحافظ ابن حجر (2753) من طرق عن حاتم بن إسماعيل، به.وانظر ما تقدَّم برقم (4936). المصري، عن أحمد بن صالح، به.وأخرج الطبراني في "الكبير" (2925) قصة إسلام حمزة عن إسماعيل بن الحسن الخفاف المصري، عن أحمد بن صالح به، فذكر كنية حمزة في سياق القصة غير مرةٍ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4960)


4960 - حدثنا جعفر بن الحارث حدثنا جعفر بن محمد الفِرْيابي، حدثنا أحمد بن صالح، حدثنا ابن وهب، أخبرني أسامة بن زيد اللَّيثي، سمعت محمد بن كعب القُرَظي، قال: كان حمزةُ بن عبد المطلب يُكنى أبا عُمارة [1]. حدثنا الحاكمُ أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظُ إملاءً في المُحرّم سنة ثلاث وأربع مئةٍ:




৪৬৯০ - জা'ফার ইবনুল হারিস আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি জা'ফার বিন মুহাম্মাদ আল-ফিরিয়াবী থেকে, তিনি আহমাদ বিন সালিহ থেকে, তিনি ইবনু ওয়াহাব থেকে, তিনি বলেন, উসামা বিন যায়েদ আল-লাইসী আমাকে অবহিত করেছেন, আমি মুহাম্মদ বিন কা'ব আল-কুরাযীকে বলতে শুনেছি, তিনি বললেন: হামযা ইবনু আবদুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কুনিয়াত ছিল আবূ উমারা [১]।
আল-হাকিম আবূ আবদুল্লাহ মুহাম্মাদ ইবনু আবদুল্লাহ আল-হাফিজ ৪৪৩ হিজরির মুহাররম মাসে মুখে মুখে লিখিয়ে দেওয়া (ইমলা) হিসেবে আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন:




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم.وأخرجه أبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (1807) من طريق إسماعيل بن الحسن الخفاف المصري، عن أحمد بن صالح، به.وأخرج الطبراني في "الكبير" (2925) قصة إسلام حمزة عن إسماعيل بن الحسن الخفاف المصري، عن أحمد بن صالح به، فذكر كنية حمزة في سياق القصة غير مرةٍ.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4961)


4961 - أخبرني أبو الحسين محمد بن أحمد بن تَميم القَنْطَري ببغداد، حدثنا عُبيد بن شَريك، حدثنا أبو صالح الفرّاء، حدثنا أبو إسحاق الفَزَاري، عن أبي حماد الحَنَفي، عن عبد الله بن محمد بن عَقيل قال: سمعت جابرَ بن عبد الله يقول: فَقَدَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومَ أُحد حمزةَ حين فاءَ الناسُ من القتال، قال: فقال رجلٌ: رأيتُه عند تلكَ الشجرة وهو يقول: أنا أسدُ اللهِ وأسدُ رسولِه، اللهم إني أبرأُ إليك مما جاءَ به هؤلاءِ - لأبي سفيانَ وأصحابِه - وأعتذِرُ إليك مما صنعَ هؤلاءِ ومِن انهزامِهم، فسارَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم نحوَه، فلما رأى جبْهتَه بكي، ولما رأى ما مُثِّل به شَهَقَ، ثم قال: "ألا كُفِّنَ؟ " فقام رجلٌ من الأنصار فرمَى بثوبٍ، قال جابرٌ: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "سيدُ الشهداء عندَ الله تعالى يومَ القيامةِ حمزةُ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উহুদ যুদ্ধের দিন যখন লোকেরা যুদ্ধ থেকে ফিরে এসেছিল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হামযাকে খুঁজে পাচ্ছিলেন না। তিনি বলেন, তখন এক ব্যক্তি বলল: আমি তাঁকে ওই গাছের কাছে দেখেছি। তিনি বলছিলেন: আমি আল্লাহর সিংহ এবং তাঁর রাসূলের সিংহ। হে আল্লাহ! আবূ সুফিয়ান ও তার সঙ্গীরা যা নিয়ে এসেছে, তার থেকে আমি তোমার কাছে মুক্তি চাই। আর এই লোকেরা (মুসলমানরা) যা করেছে এবং তাদের এই পলায়নের জন্য আমি তোমার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করি। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দিকে গেলেন। যখন তিনি তাঁর (হামযার) চেহারা দেখলেন, তখন কেঁদে ফেললেন। আর যখন দেখলেন যে তাঁকে বিকৃত করা হয়েছে, তখন উচ্চস্বরে চিৎকার করে কেঁদে উঠলেন। এরপর তিনি বললেন: "তাকে কি কাফন দেওয়া হবে না?" তখন আনসারদের মধ্য থেকে একজন লোক উঠে এসে একটি কাপড় ছুঁড়ে দিলেন। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বললেন: "কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাআলার কাছে শহিদগণের সরদার হলেন হামযা।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لضعف أبي حماد الحنفي - واسمه المغفّل بن صدقة - وعبد الله بن محمد بن عقيل على أنهما قد توبعا على بعض ألفاظ الحديث كما مضى بيانه برقم (2589)، إذ تقدَّم الحديث هناك من طريق عثمان بن سعيد الدارمي عن محبوب بن موسى وهو أبو صالح الفرّاء نفسُه.وانظر ما تقدَّم برقم (4936).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4962)


4962 - أخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا إبراهيم بن عبد الله البصري [1]، حدثنا إبراهيم بن بشار الرَّمادي، حدثنا سفيان بن عُيينة، حدثنا كثيرٌ النَّوَاء، عن المُسيَّب بن نَجَبة، عن علي بن أبي طالب، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "كلُّ نبيٍّ أُعطيَ سبعةَ رُفَقاءَ، وأُعطيتُ بضعةً عَشَرَ". فقيل لعليٍّ: مَن هم؟ قال: أنا وحمزةُ وابناي، ثم ذكرهم [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكرُ مناقب عبد الله بن جَحْش بن رِئَاب بن يَعْمَر حليفِ حَرْبٍ بن أُميّةقتله أبو الحكم بن الأخْنَس بن شَرِيق الثَّقفي، وهو ابن نيّفٍ وأربعين سنةً يومَ أُحُدٍ.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক নবীকে সাতজন সঙ্গী প্রদান করা হয়েছিল, আর আমাকে দশের অধিক প্রদান করা হয়েছে।" অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করা হলো: তারা কারা? তিনি বললেন: আমি, হামযা এবং আমার দুই পুত্র, অতঃপর তিনি বাকিদের নাম উল্লেখ করলেন। এটি সহীহ ইসনাদযুক্ত হাদীস, কিন্তু শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি। আব্দুল্লাহ ইবনু জাহাশ ইবনু রিআব ইবনু ই'মার, যিনি হারব ইবনু উমাইয়ার মিত্র ছিলেন, তার ফযীলতসমূহের আলোচনা। আবূল হাকাম ইবনু আল-আখনাস ইবনু শারীক আস-সাকাফী উহুদের দিনে তাকে হত্যা করে। তখন তার বয়স ছিল চল্লিশের কিছু বেশি।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: المصري، وإنما هو البصري، وهو أبو مسلم الكجِّي.



[2] إسناده واهٍ من أجل كثير النوَّاء، فهو واهٍ كما قال الذهبي في "تلخيصه". وقد اختُلف عنه في إسناد هذا الخبر كما بيّنه الدارقطني في "العلل" (395)، وسيأتي بيان ذلك.وأخرجه الترمذي (3785) عن محمد بن يحيى بن أبي عمر العدني، عن سفيان بن عيينة، عن كثير النَّوّاء، عن أبي إدريس، عن المسيّب بن نَجَبة، عن علي. فزاد في إسناده بين كثير وبين المسيّب رجلًا هو أبو إدريس: وهو الهَمْداني المُرهِبي.وقال الترمذي: هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه، وقد روي هذا الحديث عن عليٍّ موقوفًا.قلنا: رواه الطبراني في "الكبير" 6/ (6047) من طريق ابن أبي عمر العدني ومن طريق كثير بن يحيى صاحب البصري، كلاهما عن سفيان بن عُيينة، به موقوفًا.وأخرجه أحمد 2/ (665) من طريق إسماعيل بن زكريا الخُلْقاني، و (1263) من طريق فطر بن خليفة، كلاهما عن كثير النَّواء، عن عبد الله بن مُليل، عن عليٍّ مرفوعًا. فذكر عبد الله بن مُليل بدل المسيّب بن نجبة.ورواه بعضهم عن كثير النوّاء، عن عبد الله بن مُليل عن عليٍّ موقوفًا عليه، كما أخرجه عبد الله أحمد بن بن حنبل في "فضائل الصحابة" (274)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (4492)، وابن الجوزي في "العلل المتناهية" (455) من طريق علي بن هاشم بن البريد، والخطيب في "تاريخ بغداد" 14/ 511، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 10/ 452 و 43/ 384 - 385 من طريق جعفر بن زياد الأحمر، كلاهما عن كثير النوّاء، عن عبد الله بن مُليل، عن علي موقوفًا عليه.وأخرجه أحمد 2 / (1206) عن عبد الرزاق، و (1274) عن معاوية بن هشام، كلاهما عن سفيان الثوري، عن سالم بن أبي حفصة، قال عبد الرزاق في روايته: عن عبد الله بن مُليل، وقال معاوية بن هشام في روايته: بلغني عن عبد الله بن مُليل، فهذه متابعة لكثير النوّاء، لكن اختُلف فيها على سالم بن أبي حفصة كما ترى، والأصح رواية معاوية بن هشام، وقد وافق معاوية بن هشام عليها محمد بن يوسف الفريابي عند الطحاوي في "شرح مشكل الآثار" 7/ 198، فبان بذلك أنَّ سالمًا لم يسمعه من عبد الله بن مُليل، إنما سمعه من رجلٍ أبهمه عنه، واحتمل الطحاوي أن يكون هذا المبهم هو كثيرًا النَّوّاء، فإذا صحَّ ذلك رجع الحديث إلى كثير، وإلّا بقي هذا الرجل على إبهامه، على أنَّ سالمًا فيه لين، فلا اعتداد بهذه المتابعة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4963)


4963 - حدثني أبو بكر محمد بن داود الزاهد، حدثنا علي بن الحُسين بن الجُنيد حدثنا أحمد بن صالح، حدثنا سفيان بن عُيينة، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيّب، قال: قال عبد الله بن جَحْش: اللهم إنِّي أُقسِمُ عليكَ أن ألقى العدوَّ غدًا، فيقتُلوني، ثم يَبْقُروا بطني ويَجدَعُوا أنفي وأُذُن، ثم تسألني: بِمَ ذاك؟ فأقول: فيك، قال سعيد بن المسيّب: إني لأرجو أن يُبِرَّ اللهُ آخِرَ قَسَمِه كما أبَرَّ أولَه [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين لولا إرسالٌ فيه.




আব্দুল্লাহ ইবনু জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: হে আল্লাহ! আমি আপনার নামে কসম করছি যে, আগামীকাল আমি যেন শত্রুর মুখোমুখি হই। এরপর তারা যেন আমাকে হত্যা করে, আমার পেট চিরে ফেলে এবং আমার নাক ও কান কেটে দেয়। অতঃপর আপনি আমাকে জিজ্ঞাসা করবেন: কেন এমন হলো? তখন আমি বলব: আপনার (সন্তুষ্টির) জন্য। সাঈদ ইবনুল মুসায়্যিব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি আশা করি, আল্লাহ তাঁর প্রথম শপথ পূর্ণ করার মতোই তাঁর শেষ শপথটিও পূর্ণ করবেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد لا يُحفظ فيه ذكر يحيى بن سعيد - وهو ابن قيس الأنصاري - إنما المحفوظ فيه أنه من رواية علي بن زيد بن جُدعان عن سعيد بن المسيب، كما سيأتي بيانه، وعلي بن زيد هذا ضعيف الحديث، ثم هو مُرسلٌ، وقد جاء في بعض طرقه عن علي بن زيد عن ابن المسيّب: أنَّ رجلًا سمع عبد الله بن جحش وجعل المقالة التي في آخره هنا من قول ذلك الرجل لا من قول سعيد بن المسيب. فالظاهر أنَّ هذا الرجل هو من حدَّث ابن المسيّب، فقد اضطرب فيه علي بن زيد.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 249 - 250 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه عبد الله بن المبارك في "الجهاد" (85)، وأخرجه من طريق ابن المبارك أبو موسى المديني في "اللطائف من دقائق المعارف" (272)، وابن الأثير في "أسد الغابة" 3/ 91، وأخرجه أيضًا عبد الرزاق في "مصنفه" (85)، وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء" 1/ 109 من طريق الحسن بن الصبّاح البزار، ثلاثتهم (ابن المبارك وعبد الرزاق والحسن بن الصبّاح) عن سفيان بن عُيينة، عن علي بن زيد بن جُدعان، عن سعد بن المسيب، به.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 85، ومن طريقه البلاذري في "أنساب الأشراف" 11/ 191، وابن الجوزي في "الثبات عند الممات" ص 104 - 105 من طريق حماد بن سلمة، عن علي بن زيد بن جُدعان، عن سعيد بن المسيّب: أنَّ رجلًا سمع عبد الله بن جحش يقول … وجعل القول الذي في آخره من قول ذلك الرجل بنحو لفظه الذي هنا. ويشهد له حديث سعد بن أبي وقاص السالف عند المصنف برقم (2440)، وإسناده صحيح. (1) في النسخ الخطية: عقد، ومثله في "السنن" للبيهقي 6/ 363 عن المصنف، والمثبت من النسخة المحمودية كما في طبعة الميمان.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4964)


4964 - حدثنا أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا محمد بن عبد الله الحَضْرَمي، حدثنا هَنَّاد بن السَّرِيّ، حدثنا أبو بكر بن عيّاش عن عاصمٍ، عن زِرٍّ، عن عبد الله، قال: أولُ رايةٍ عُقِدَت (1) في الإسلامِ لعبدِ الله بن جَحْشٍ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكر مناقب مصعب الخير، وهو ابن عُمير بن هاشم قُتل يومَ أُحُد




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইসলামে সর্বপ্রথম যে পতাকা বাঁধা (গঠন করা) হয়েছিল, তা ছিল আব্দুল্লাহ ইবনে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكن لا يُحفظ فيه ذكر عبد الله - وهو ابن مسعود - إنما المحفوظ أنه من قول زِرٍّ بن حبيش كما سيأتي بيانه. وقد اختُلف في أول راية عُقدت كما تقدَّم بيانه برقم (4922).عاصم: هو ابن أبي النَّجُود.وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (4048) عن هناد بن السَّرِي، عن أبي بكر بن عياش، عن عاصم بن أبي النجَّود، عن زِرّ بن حُبيش، قال. فذكره ليس فيه ابن مسعود.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 60/ 167 من طريق أحمد بن أسد بن عاصم البجلي، عن أبي بكر بن عيّاش عن عاصم، عن زِرّ بن حبيش، قال فذكره، وقد سقط اسم زِرّ من مطبوع ابن عساكر، وهو ثابت فيه كما في "مختصر تاريخ دمشق" لابن منظور 25/ 213.ونسبه الهيثمي في "مجمع الزوائد" 6/ 67 للطبراني، وجعله من قول زِرّ بن حُبيش، وحسَّن. إسناده.وقد روي ما يؤيده من قول عامر الشعبي عند معمر بن راشد في "جامعه" (19880)، وخليفة بن خياط في "تاريخه" ص 62، وأحمد بن حنبل في "فضائل الصحابة" (1506)، وأبي نعيم في "الحلية" 1/ 108 و 4/ 315، وابن عساكر 10/ 42، ورجاله عند بعضهم ثقات.ورُوي مثله كذلك عن سعد بن أبي وقاص عند أحمد 3 / (1539) وغيره بلفظ: كان عبد الله بن جحش أول أمير أُمِّر في الإسلام. لكن إسناده ضعيف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4965)


4965 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحسن بن جَهْم، حدثنا الحسين ابن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر، حدثني إبراهيم بن محمد العَبْدَري [1]، عن أبيه، قال: كان مصعُب بن عُمير فتى مكةَ شبابًا وجمالًا، وكان أبَواه يُحِبّانِه، وكانت أمُّه تكسُوه أحسنَ ما يكون من الثياب وأرَقَّه، وكان أعطرَ أهلِ مكة، وكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يذكُره يقول: "ما رأيتُ بمكة أحسنَ لِمَّةٌ، ولا أرقَّ حُلَّةً، ولا أنعمَ نِعمةً، من مصعب بن عُمير" [2].




ইব্রাহিম ইবন মুহাম্মাদ আল-আবদারী তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করে বলেন: মুসআব ইবন উমায়ের ছিলেন মক্কার সবচেয়ে সুদর্শন ও জমাকালো যুবক তরুণ। তার পিতামাতা তাকে ভালোবাসতেন। তার মা তাকে সবচেয়ে সুন্দর ও মসৃণ পোশাক পরাতেন। তিনি ছিলেন মক্কার সবচেয়ে সুগন্ধি ব্যবহারকারী। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে স্মরণ করে বলতেন: "আমি মক্কায় মুসআব ইবন উমাইরের চেয়ে সুন্দর কেশবিন্যাস, বা এর চেয়ে মসৃণ পোশাক, বা এর চেয়ে স্বাচ্ছন্দ্যপূর্ণ জীবনযাপনকারী অন্য কাউকে দেখিনি।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: العبدي، وأثبتناه على الصواب من "تلخيص المستدرك" للذهبي ومن "طبقات ابن سعد" 3/ 108 حيث رواه عن الواقدي. والعَبْدري نسبة لعبد الدار بن قُصي. وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء" 1/ 107، من طريق قتيبة بن سعيد، عن حاتم بن إسماعيل، عن عبد الأعلى، عن قَطَن بن وهب، عن عُبيد بن عُمير، مرسلًا.



[2] حسن لغيره، وهذا إسناد ضعيف بمرّة من أجل محمد بن عمر الواقدي ولإرساله. والخبر عند ابن سعد في "طبقاته" 3/ 108 عن محمد بن عمر الواقدي، ومحمد والد إبراهيم - وهو محمد بن ثابت بن شُرْحبيل العَبْدري الحَجَبي - تابعيّ، فالخبر مرسل، لكن رُويَ بنحوه من وجه آخر ضعيف سيأتي عند المصنّف برقم (6785).واللِّمّة من شعر الرأس دون الجُمّة، سميت بذلك لأنّها ألمّت بالمنكبين، فإذا زادت فهي الجُمّة. وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء" 1/ 107، من طريق قتيبة بن سعيد، عن حاتم بن إسماعيل، عن عبد الأعلى، عن قَطَن بن وهب، عن عُبيد بن عُمير، مرسلًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4966)


4966 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ حَدَّثَنَا يحيى بن محمد بن يحيى الشهيد، حَدَّثَنَا بن عبد الوهاب الحَجَبي، حَدَّثَنَا حاتم بن إسماعيل، عن عبد الأعلى بن عبد الله بن أبي فَرْوة، عن قَطَن بن وَهْب، عن عُبيد بن عُمير، عن أبي ذَرّ، قال: لما فرغَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يومَ أُحدٍ مَرّ على مُصعب بن عُمير [1] مقتولًا على طريقه، فقرأ: {مَنَ الْمُؤْمِنِينَ رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا الله عَلَيْهِ} الآية [الأحزاب: 23] [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكرُ مناقب سعد بن الرَّبيع بن عمرو الخَزْرجي العَقَبيّأحدُ النقباء الاثني عشر، وكان كاتبًا شهد بدرًا، وقُتل يومَ أُحُد.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: উহুদ যুদ্ধের দিন যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবসর হলেন, তখন তিনি মুসআব ইবনু উমাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন, যিনি পথে নিহত অবস্থায় পড়েছিলেন। অতঃপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: **{মুমিনদের মধ্যে এমন কিছু লোক আছে, যারা আল্লাহ্‌র সাথে কৃত ওয়াদা সত্যে পরিণত করেছে...}** [সূরা আহযাব: ২৩]।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في (ز) والمطبوع: مصعب الأنصاري، وهو خطأ، إنما هو مهاجريّ لا أنصاريّ، والتصويب من (ص) و (م)، وهو الموافق لما في رواية البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 284 - 285. وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء" 1/ 107، من طريق قتيبة بن سعيد، عن حاتم بن إسماعيل، عن عبد الأعلى، عن قَطَن بن وهب، عن عُبيد بن عُمير، مرسلًا.



[2] رجاله لا بأس بهم، لكن الصحيح أنه من رواية عُبيد بن عُمير مرسلًا كما تقدَّم بيانه برقم (3014).وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 284 - 285 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه أبو نعيم في "حلية الأولياء" 1/ 107، من طريق قتيبة بن سعيد، عن حاتم بن إسماعيل، عن عبد الأعلى، عن قَطَن بن وهب، عن عُبيد بن عُمير، مرسلًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4967)


4967 - حَدَّثَنَا أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا محمد بن موسى البصري، حَدَّثَنَا أبو صالح عبد الرحمن بن عبد الله الطَّويل، حَدَّثَنَا مَعْن بن عيسى، عن مَخْرمة بن بُكَير، عن أبيه، عن أبي حازم [1]، عن خارجة بن زيد بن ثابت، عن أبيه، قال: بَعثَني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يوم أُحد لِطَلب سعدِ بن الرَّبيع، وقال لي: "إن رأيتَه فأقْرِهِ مني السلامَ، وقُل له: يقولُ لكَ رسولُ الله: كيف تَجِدُك؟ " قال: فجعلتُ أطُوف بين القَتْلى، فأصبتُه وهو في آخر رَمَقٍ، وبه سبعون ضربةً ما بين طعْنةٍ برُمح، وضَربةٍ بسَيفٍ، ورميةٍ بسَهمٍ، فقلت له: يا سعدُ، إنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقرأ عليك السلامَ، ويقول لك: خَبِّرني كيف تَجِدُك؟ قال: على رسولِ الله السلامُ وعليك السلامُ، قل له: يا رسولَ الله، أجِدُني أجدُ ريحَ الجنة، وقُل لِقومي الأنصار: لا عُذرَ لكُم عندَ الله إن يُخلَصْ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم وفيكم شُفْرٌ يَطْرِفُ، قال: وفاضتْ نفسُه [2]، رحمه الله [3]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




যায়েদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে উহুদের দিন সা'দ ইবনুর রাবি‘-কে খুঁজে আনার জন্য পাঠালেন এবং আমাকে বললেন: "যদি তুমি তাকে দেখতে পাও, তবে আমার পক্ষ থেকে তাকে সালাম বলো এবং বলো: রাসূলুল্লাহ তোমাকে জিজ্ঞাসা করছেন, তোমার অবস্থা কেমন?" তিনি (যায়েদ) বলেন, অতঃপর আমি নিহতদের মাঝে খুঁজতে লাগলাম এবং তাকে এমন অবস্থায় পেলাম যখন তার শেষ নিশ্বাসটুকু বাকি ছিল। তার দেহে বর্শার আঘাত, তলোয়ারের আঘাত ও তীরের আঘাতসহ সত্তরটিরও বেশি আঘাত ছিল। আমি তাকে বললাম: হে সা'দ! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আপনাকে সালাম জানিয়েছেন এবং আপনাকে জিজ্ঞাসা করতে বলেছেন, আপনার অবস্থা কেমন? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহর উপর এবং তোমার উপরও সালাম। তাঁকে বলো: হে আল্লাহর রাসূল! আমি জান্নাতের সুঘ্রাণ অনুভব করছি। আর আমার কওম আনসারকে বলো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে (শত্রু) পৌঁছে যাবে আর তোমাদের মধ্যে একটি চোখও নড়াচড়া করবে (অর্থাৎ জীবিত থাকবে), এমন অবস্থায় আল্লাহর কাছে তোমাদের কোনো ওজর গ্রহণযোগ্য হবে না। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তার রূহ বের হয়ে গেল, আল্লাহ তাঁর উপর রহম করুন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) إلى أبي حاتم، وأبو حازم هو سلمة بن دينار. (962) وغيرهما، ورجاله ثقات، فهذا هو المحفوظ في رواية الخبر، ووهم فيه الكُديمي أو شيخه، والله أعلم. وله شواهد يتحسَّن بها إن شاء الله، ولهذا قال ابن عبد البر في "التمهيد" 24/ 94: هذا الحديث عند أهل السير مشهور معروف.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 248 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر الأنباري في "الزاهر في معاني كلمات الناس" 2/ 359 - 360 عن محمد بن يونس الكديمي، عن عبد الرحمن بن عبد الله أبي صالح التمار الطويل البصري جليس سليمان بن حرب، عن إسماعيل بن قيس، عن مخرمة بن بُكَير، عن أبي حازم، به.وذكر له ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 280 شاهدًا من رواية رُبيح بن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري عن أبيه عن جده، لكنه ذكر فيه أنَّ الرجلَ الذي ذهب يطلب سعد بن الربيع هو أبيّ بن كعب. غير أنَّ ابن عبد البر قد طوى إسناده إلى رُبيح، فإن صحَّ إسناده إلى رُبيح فإسناد هذه الرواية حسنٌ، ويكون أصحَّ أسانيد هذا الخبر، والله تعالى أعلم.ويشهد له كذلك رواية ابن أبي صعصعة الآتية بعده، ورجالها لا بأس بهم، لكنها منقطعة.ورواه الواقديُّ في "مغازيه" 1/ 293 عن شيوخه. ولكنه ذكر في روايته أنَّ الرجل الذي طلب سعدًا هو محمد بن مسلمة، قال: ويقال: أبيُّ بن كعب.والشُّفْر: حرفُ جَفْن العَين.



[2] تحرَّفت في نسخنا الخطية و"تلخيص المستدرك" إلى: عينه، والمثبت من "دلائل النبوة" للبيهقي 3/ 248 إذ روى هذا الخبر عن أبي عبد الله الحاكم. (962) وغيرهما، ورجاله ثقات، فهذا هو المحفوظ في رواية الخبر، ووهم فيه الكُديمي أو شيخه، والله أعلم. وله شواهد يتحسَّن بها إن شاء الله، ولهذا قال ابن عبد البر في "التمهيد" 24/ 94: هذا الحديث عند أهل السير مشهور معروف.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 248 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر الأنباري في "الزاهر في معاني كلمات الناس" 2/ 359 - 360 عن محمد بن يونس الكديمي، عن عبد الرحمن بن عبد الله أبي صالح التمار الطويل البصري جليس سليمان بن حرب، عن إسماعيل بن قيس، عن مخرمة بن بُكَير، عن أبي حازم، به.وذكر له ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 280 شاهدًا من رواية رُبيح بن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري عن أبيه عن جده، لكنه ذكر فيه أنَّ الرجلَ الذي ذهب يطلب سعد بن الربيع هو أبيّ بن كعب. غير أنَّ ابن عبد البر قد طوى إسناده إلى رُبيح، فإن صحَّ إسناده إلى رُبيح فإسناد هذه الرواية حسنٌ، ويكون أصحَّ أسانيد هذا الخبر، والله تعالى أعلم.ويشهد له كذلك رواية ابن أبي صعصعة الآتية بعده، ورجالها لا بأس بهم، لكنها منقطعة.ورواه الواقديُّ في "مغازيه" 1/ 293 عن شيوخه. ولكنه ذكر في روايته أنَّ الرجل الذي طلب سعدًا هو محمد بن مسلمة، قال: ويقال: أبيُّ بن كعب.والشُّفْر: حرفُ جَفْن العَين.



4967 [3] - إسناده ضعيف جدًّا من أجل محمد بن موسى البصري - وهو محمد بن يونس بن موسى الكُديمي، وقد نُسب في غير موضع عند المصنّف لجده موسى - فهو ضعيف جدًّا، وشيخه أبو صالح عبد الرحمن بن عبد الله الطويل لم نقف له على ترجمة، وقد خالفه ابن سعد في "طبقاته" 3/ 485، فروى هذا الخبر بعينه عن معن بن عيسى عن مالك بن أنس عن يحيى بن سعيد الأنصاري مرسلًا، وهو في "موطأ مالك" برواية يحيى الليثي 2/ 465، ورواية أبي مصعب (962) وغيرهما، ورجاله ثقات، فهذا هو المحفوظ في رواية الخبر، ووهم فيه الكُديمي أو شيخه، والله أعلم. وله شواهد يتحسَّن بها إن شاء الله، ولهذا قال ابن عبد البر في "التمهيد" 24/ 94: هذا الحديث عند أهل السير مشهور معروف.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 248 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه أبو بكر الأنباري في "الزاهر في معاني كلمات الناس" 2/ 359 - 360 عن محمد بن يونس الكديمي، عن عبد الرحمن بن عبد الله أبي صالح التمار الطويل البصري جليس سليمان بن حرب، عن إسماعيل بن قيس، عن مخرمة بن بُكَير، عن أبي حازم، به.وذكر له ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 280 شاهدًا من رواية رُبيح بن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري عن أبيه عن جده، لكنه ذكر فيه أنَّ الرجلَ الذي ذهب يطلب سعد بن الربيع هو أبيّ بن كعب. غير أنَّ ابن عبد البر قد طوى إسناده إلى رُبيح، فإن صحَّ إسناده إلى رُبيح فإسناد هذه الرواية حسنٌ، ويكون أصحَّ أسانيد هذا الخبر، والله تعالى أعلم.ويشهد له كذلك رواية ابن أبي صعصعة الآتية بعده، ورجالها لا بأس بهم، لكنها منقطعة.ورواه الواقديُّ في "مغازيه" 1/ 293 عن شيوخه. ولكنه ذكر في روايته أنَّ الرجل الذي طلب سعدًا هو محمد بن مسلمة، قال: ويقال: أبيُّ بن كعب.والشُّفْر: حرفُ جَفْن العَين.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4968)


4968 - أخبرَناه الحسن بن حَليم [1] المروَزي، أنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا محمد بن إسحاق، أنَّ عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة حدَّثه عن أبيه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "من يَنظُرُ لي ما فَعَل سعدُ بن الرَّبيع؟ " فذكَر الحديثَ بنحوٍ منه، وقال: فقال سعدٌ: أخبِر رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أني في الأمواتِ وأقرِهِ السلامَ، وقُل له: يقولُ سعدٌ: جزاكَ الله عنا وعن جميع الأمةِ خيرًا [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ‌‌ذكر مناقب اليمان بن حِسْل أبِ [3] حُذيفة بن اليمان وهو ممَّن شهد أحدًا




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্দুর রহমান ইবনে আবী সা'সা'আ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "কে আমাকে দেখে জানাবে যে সা'দ ইবনে রাবী'র কী অবস্থা হয়েছে?" এরপর তিনি [রাবী] হাদীসটির প্রায় একই রকম বর্ণনা করলেন এবং বললেন: অতঃপর সা'দ [ইবনে রাবী'] বললেন: "রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জানিয়ে দাও যে আমি মৃতদের অন্তর্ভুক্ত হয়ে গেছি, আর তাঁকে আমার সালাম পৌঁছে দিও। আর তাঁকে বলো যে সা'দ বলছেন: 'আল্লাহ তাআলা আমাদের পক্ষ থেকে এবং সমস্ত উম্মতের পক্ষ থেকে আপনাকে সর্বোত্তম প্রতিদান দান করুন।'"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: حكيم، بالكاف، وإنما هو باللام، كما في نسبة الحليمي في "أنساب السمعاني". كما وقع في رواية المصنّف هنا، وخالفه غيره من أصحاب ابن المبارك، فرووه عن ابن المبارك، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن سعد، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة ليس فيه ذكر عبد الرحمن بن أبي صعصعة، إلّا أنهم زادوا في روايتهم عن ابن المبارك بين محمد بن إسحاق وبين عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة رجلًا هو محمد بن سعد، وقد أفرده بالترجمة البخاريُّ في "تاريخه الكبير" 1/ 88، وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 7/ 261 وجَهّله أبو حاتم الرازي، واكتفى البخاري بقوله: مرسلٌ.وخالف ابنَ المبارك فيه سائر أصحاب محمد بن إسحاق من رواة السيرة عنه، فرووه عن ابن إسحاق، عن محمد بن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، منقطعًا، والله تعالى أعلم بالصواب.وأخرجه ابن المبارك في "الجهاد" (94) - وهو من رواية سعيد بن رحمة أبي عثمان المِصِّيصي عنه - عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن سعْد، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، قال … فذكره.وكذلك أخرجه أبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (3133) من طريق الحسن بن عيسى بن ماسَرْجِس مولى عبد الله بن المبارك، عن ابن المبارك، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن سعْد، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، فذكره.وأخرجه ابن إسحاق في "السيرة النبوية" برواية محمد بن سَلَمة الحَرّاني بإثر القطعة المطبوعة من "سيرة ابن إسحاق برواية يونس بن بُكَير" (517)، وبرواية ابن هشام، عن زياد بن عبد الله البكائي 2/ 94 - 95، وأخرجه الطبري في "تاريخه" 2/ 528 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، وابن المنذر في "تفسيره" بإثر (1187) من طريق إبراهيم بن سعد الزهري، والبيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 285 من طريق يونس بن بُكَير، كلهم (محمد بن سَلَمة والبكائي وسلمة بن الفضل وإبراهيم بن سعد ويونس) عن محمد بن إسحاق، قال: أخبرني محمد بن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة المازني، فذكره منقطعًا.وأخرجه سعيد بن منصور في "سننه" (2842) من طريق سعيد بن أبي هلال، عن رجل من بني مازن أنه بلغه أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قام يوم أُحُدٍ، فذكره بنحوه.وأخرج نحوه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ (4261) عن حمزة بن الحارث بن عمير البصري، عن أبيه، عن عمرو بن يحيى بن عُمارة المازني، معضلًا أيضًا، لأنَّ عمرو بن يحيى من أتباع التابعين.



[2] خبر حَسَن إن شاء الله كما تقدم بيانه، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم لكنه اختُلف فيه على عبد الله - وهو ابن المبارك - فرواه عنه عَبْدان - واسمه عبد الله بن عثمان بن جَبَلة، وعَبْدان لقبه كما وقع في رواية المصنّف هنا، وخالفه غيره من أصحاب ابن المبارك، فرووه عن ابن المبارك، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن سعد، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة ليس فيه ذكر عبد الرحمن بن أبي صعصعة، إلّا أنهم زادوا في روايتهم عن ابن المبارك بين محمد بن إسحاق وبين عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة رجلًا هو محمد بن سعد، وقد أفرده بالترجمة البخاريُّ في "تاريخه الكبير" 1/ 88، وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 7/ 261 وجَهّله أبو حاتم الرازي، واكتفى البخاري بقوله: مرسلٌ.وخالف ابنَ المبارك فيه سائر أصحاب محمد بن إسحاق من رواة السيرة عنه، فرووه عن ابن إسحاق، عن محمد بن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، منقطعًا، والله تعالى أعلم بالصواب.وأخرجه ابن المبارك في "الجهاد" (94) - وهو من رواية سعيد بن رحمة أبي عثمان المِصِّيصي عنه - عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن سعْد، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، قال … فذكره.وكذلك أخرجه أبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (3133) من طريق الحسن بن عيسى بن ماسَرْجِس مولى عبد الله بن المبارك، عن ابن المبارك، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن سعْد، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، فذكره.وأخرجه ابن إسحاق في "السيرة النبوية" برواية محمد بن سَلَمة الحَرّاني بإثر القطعة المطبوعة من "سيرة ابن إسحاق برواية يونس بن بُكَير" (517)، وبرواية ابن هشام، عن زياد بن عبد الله البكائي 2/ 94 - 95، وأخرجه الطبري في "تاريخه" 2/ 528 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، وابن المنذر في "تفسيره" بإثر (1187) من طريق إبراهيم بن سعد الزهري، والبيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 285 من طريق يونس بن بُكَير، كلهم (محمد بن سَلَمة والبكائي وسلمة بن الفضل وإبراهيم بن سعد ويونس) عن محمد بن إسحاق، قال: أخبرني محمد بن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة المازني، فذكره منقطعًا.وأخرجه سعيد بن منصور في "سننه" (2842) من طريق سعيد بن أبي هلال، عن رجل من بني مازن أنه بلغه أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قام يوم أُحُدٍ، فذكره بنحوه.وأخرج نحوه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" للحافظ (4261) عن حمزة بن الحارث بن عمير البصري، عن أبيه، عن عمرو بن يحيى بن عُمارة المازني، معضلًا أيضًا، لأنَّ عمرو بن يحيى من أتباع التابعين.



4968 [3] - كذلك جاء في نسخنا الخطية بحذف الياء، والاكتفاء بالكسرة، وهو جائز في لغة العرب بنُدرة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4969)


4969 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله بن أحمد الصفّار، حَدَّثَنَا أحمد بن مِهْران الأصبهاني، حَدَّثَنَا عُبيد الله بن موسى، حَدَّثَنَا الوليد بن عبد الله بن جُمَيع، عن عامر بن واثلة، عن حُذيفة قال: ما مَنَعَنا أن نشهدَ بدرًا إلَّا أتي وأبي أقبلْنا نُرِيدُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فأخذتْنا كفارُ قُريش، فقالوا: إنكم تُريدون محمدًا، فقلنا: ما نُريدُ، إنما نُريدُ المدينة، فأخذوا علينا عهدَ اللهِ ومِيثَاقَهُ لَتَصيرونَ إِلى المدينة، ولا تُقاتِلوا مع محمدٍ، فلما جاوَزْناهم أتَينا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فَذَكَرْنا له ما قالوا وما قُلنا لهم، فما تَرَى؟ قال: "نَستعينُ الله عليهم، ونَفِي بعَهْدِهم"، فانطلقنا إلى المدينة، فذاك الذي مَنَعَنا أن نشهدَ بدرًا [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদেরকে বদরের যুদ্ধে উপস্থিত হওয়া থেকে বিরত করেছিল শুধু এই ঘটনা— আমি ও আমার পিতা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাওয়ার উদ্দেশ্যে যাচ্ছিলাম, তখন কুরাইশ কাফিররা আমাদের ধরে ফেলল। তারা বলল: তোমরা মুহাম্মাদের কাছে যেতে চাও। আমরা বললাম: আমরা তা চাই না; আমরা কেবল মদীনা যেতে চাই। তখন তারা আমাদের থেকে আল্লাহর নামে অঙ্গীকার ও কসম নিল যে আমরা অবশ্যই মদীনায় চলে যাব এবং মুহাম্মাদের সাথে (আমাদের বিরুদ্ধে) যুদ্ধ করব না। যখন আমরা তাদের পার হয়ে গেলাম, তখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে পৌঁছলাম এবং তারা যা বলেছিল ও আমরা তাদেরকে যা বলেছিলাম—তা তাঁর কাছে উল্লেখ করলাম এবং জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কী মনে করেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমরা তাদের বিরুদ্ধে আল্লাহর সাহায্য চাইব এবং তাদের সাথে কৃত অঙ্গীকার পূরণ করব।" অতঃপর আমরা মদীনার দিকে চলে গেলাম। এটাই ছিল সেই কারণ, যা আমাদেরকে বদরের যুদ্ধে উপস্থিত হওয়া থেকে বিরত করেছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن من أجل أحمد بن مِهْران الأصبهاني، وقد توبع.وأخرجه أحمد 38/ (23354)، ومسلم (1787) من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، عن الوليد بن عبد الله بن جُميع به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وسيأتي عند المصنّف برقم (5721) من طريق أبي إسحاق السَّبيعي، عن مصعب بن سعد، قال: أخذ حذيفة وأباه المشركون قبل بدر … ثم ذكره بنحوه. ورجاله ثقات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4970)


4970 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أحمد بن عبد الجبار، حَدَّثَنَا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، قال: حدثني عاصم بن عمر بن قَتَادة، عن محمود بن لَبيد، قال: لما خَرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى أُحُدٍ وقع اليمانُ بن حِسْل بن جابر أبُ حُذيفة وثابتُ بن وَقْشِ بن زَعُوراء [1] في الآطَامِ مع النساء والصِّبيان، فقال أحدُهما لِصاحبِه وهما شَيخانِ كبيرانِ: لا أبا لكَ، ما نَنتظِرُ؟! فوالله ما بقي لواحدٍ منا مِن عُمُره إِلَّا ظِمْءُ [حِمارٍ] [2]، إنما نحن هامَةُ اليومِ [3]، ألَا نأخذُ أسيافَنا ثم نلحقُ برسولِ الله صلى الله عليه وسلم.فدخلا في المسلمين ولا يعلمون بهما، فأما ثابتُ بن وَقْش، فقتله المشركون، وأما أبو حذيفةَ، فاختلَفَتْ عليه أسيافُ المسلمين فقتلوه ولا يَعرِفونه، فقال حذيفةُ: أَبي أَبي، فقالوا: واللهِ إِنْ عَرَفْناه، وصَدَقوا، فقال حذيفةُ: يغفرُ الله لكم وهو أرحمُ الراحمين، فأراد رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن يَدِيَه، فتصدَّق به حذيفةُ على المسلمين، فزادَه ذلك عندَ رسول الله صلى الله عليه وسلم [4].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكرُ مناقب عبد الله بن عمرو بن حَرَام بن ثَعْلبة بن حَرَام بن كعب بن غَنْم بن كعب بن سَلِمةيُكنى أبا جابرٍ، وهو أبُ [5] جابر بن عبد الله السَّلَمي الأنصاري، وأحدُ النُّقباء ممّن بايعَ ليلةَ العَقَبة، وأول قَتيل قُتل من المسلمين يومَ أُحُد، قتله سفيان بن عبد شمس أبو الأعوَر السُّلَمي، وصلَّى عليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قبلَ الهزيمة.




মাহমুদ ইবনে লাবীদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদের দিকে বের হলেন, তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিতা ইয়ামান ইবনে হিসল ইবনে জাবির এবং সাবেত ইবনে ওয়াকশ ইবনে যা'ঊরা নারী ও শিশুদের সাথে টিলার আড়ালে (বা দুর্গে) থেকে গেলেন। তারা উভয়েই ছিলেন বয়স্ক বৃদ্ধ। তাদের একজন অন্যজনকে বললেন: "আল্লাহ তোমার মঙ্গল করুন, আমরা কিসের অপেক্ষা করছি?! আল্লাহর কসম, আমাদের একজনেরও জীবনে [আর] গাধার একবারে পানি পান করার সময়ের চেয়ে বেশি বাকি নেই (অর্থাৎ খুব কম সময় বাকি)। আমরা তো আজকের দিনে মারা যাবই। আমরা কি আমাদের তরবারিগুলো নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে গিয়ে মিলিত হবো না?"

অতঃপর তারা মুসলিমদের দলে প্রবেশ করলেন, আর মুসলিমরা তাদের উপস্থিতি সম্পর্কে জানতেন না। সাবেত ইবনে ওয়াকশকে মুশরিকরা শহীদ করে দিল। আর আবু হুযাইফা (ইয়ামান)-এর উপর মুসলিমদের তরবারি ভুলক্রমে আঘাত হানতে শুরু করলো, ফলে তারা তাকে না চিনেই হত্যা করে ফেলল। (এ দেখে) হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চিৎকার করে বললেন: "আমার আব্বা! আমার আব্বা!" মুসলিমরা বললেন: "আল্লাহর কসম, আমরা তাকে চিনতে পারিনি।" তারা সত্যই বলেছিলেন। তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আল্লাহ তোমাদের ক্ষমা করুন, তিনিই পরম দয়ালু।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার রক্তমূল্য (দিয়াত) দিতে চাইলেন, কিন্তু হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা মুসলিমদের জন্য সাদকা (দান) করে দিলেন। এই ঘটনা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তার মর্যাদা আরও বাড়িয়ে দিল।

[এই প্রসঙ্গে] আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে হারাম ইবনে সা'লাবা ইবনে হারাম ইবনে কা'ব ইবনে গানম ইবনে কা'ব ইবনে সালামার ফযিলত আলোচনা করা হলো। তার উপনাম ছিল আবু জাবির। তিনি জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ আস-সালামী আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিতা। তিনি আকাবার রাতে বাই'আত গ্রহণকারী নুকাবা (নেতা)-দের একজন ছিলেন। উহুদের দিন মুসলিমদের মধ্যে তিনিই প্রথম শহীদ হন। সুফইয়ান ইবনে আব্দে শামস আবুল আও'আর আস-সুলামী তাকে হত্যা করেন। বিপর্যয় শুরু হওয়ার আগেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: عوراء، وجاء على الصواب النسخة المحمودية.



[2] زيادة من "تلخيص المستدرك" للذهبي، وقد ثبتت هذه اللفظة في رواية يونس بن بكير عن ابن إسحاق عند ابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 493، وكذا هي في رواية زياد البكّائي عنه كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 87، ورواية سلمة بن الفضل عنه عند الطبري في "تاريخه" 2/ 530، ورواية محمد بن سلمة عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (2298).والظَّمْءُ: ما بين الشَّرْبتَين والوِرْدَين، وهو كناية عن الشيء اليسير، وإنما خصَّ الحمار لأنَّهُ أقلُّ الدوابّ صبرًا عن الماء.



4970 [3] - في نسخنا الخطية: هامة القوم، والمثبت من "تلخيص المستدرك" هو الموافق لسائر الروايات عن ابن إسحاق، وهو المناسب في المعنى في هذا السياق، ومعنى هامة اليوم: أنه مُشْفٍ على الموت، وأصله من قول الجاهلية: إنَّ الميت إذا مات خرج من رأسه طائرٌ يسمّى الهامة. ولا معنى لقوله هنا: هامة القوم، لأنَّ هامة القوم رئيسهم.



4970 [4] - إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.وأخرجه أحمد 39/ (23639) عن يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن محمد بن إسحاق، به.مختصرًا بقصة قتل المسلمين لليمان إلى آخرها.وسيأتي عند المصنّف برقم (5722) عن عروة مرسلًا: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أمر باليمان فُودِيَ. ولم يذكر تصدُّقَ حذيفة بدِيَته. وانظر بيان هذا الإشكال هناك.



4970 [5] - هذا جائز في لغة العرب بنُدرةٍ كما تقدم قريبًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4971)


4971 - حدثني بجميع ما ذكرتُه أبو عبد الله الأصبَهاني، حَدَّثَنَا الحسن بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر، عن شُيوخه [1].




৪৯৭১ - আবু আব্দুল্লাহ আল-আসাবাহানি আমাকে বর্ণনা করেছেন যা কিছু আমি উল্লেখ করেছি, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আল-হাসান ইবনুল জাহম, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আল-হুসাইন ইবনুল ফারাজ, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু উমার, তাঁর শিক্ষকবৃন্দ (শাইখগণ) থেকে। [১]




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "المغازي" لمحمد بن عمر - وهو الواقدي - 1/ 266، وصدَّره بقوله: قال جابرٌ: كان أبي أول قتيل، فذكره. وقد انفرد الواقدي بهذا القدر، وانظر ما سيأتي برقم (4975).وروى كعب بن مالك قصة إسلام عبد الله بن عمرو بن حرام وشهوده العقبة وكونه أحد النقباء، كما أخرجه ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 440 - 441، ومن طريقه أخرجه أحمد 25/ (15798) وغيره بإسناد حسن.وروى جابرٌ أيضًا شهودَه وشهود أبيه وخالَيه العقبة، كما عند البخاري (3890) و (3891).وروى جابر أيضًا استشهاد أبيه يوم أُحُدٍ كما سيأتي بعده وبرقم (4974) و (4975)، ورُوي ذلك عن غيره أيضًا.واختُلف فيمن قَتَلَ والدَ جابرٍ يومَ أُحدٍ، فقيل: قتله أبو الأعور سفيان بن عبد شمس، وقيل: بل قتله أسامة الأعور بن عبيد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4972)


4972 - حَدَّثَنَا أبو العباس محمد بن يعقوب، حَدَّثَنَا أحمد بن عبد الجبار، حَدَّثَنَا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، حدثني وَهْب بن كَيسان، عن جابر بن عبد الله، قال: اصطَبَحَ - واللهِ - أبي يومَ أُحُدٍ الخمرَ، ثم غَدا فقاتل حتَّى قُتِل مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم بأُحدٍ شهيدًا [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.




জাবের ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আল্লাহর কসম, উহুদের দিনে আমার পিতা সকালে মদ পান করেছিলেন, অতঃপর তিনি যুদ্ধ করতে গেলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উহুদে শহীদ হিসেবে মৃত্যুবরণ করলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد حسنٌ من أجل ابن إسحاق - وهو محمد بن إسحاق بن يسار صاحب السيرة - وقد روي هذا من وجه آخر عن جابر عند البخاري (2815) و (4044) من رواية عمرو بن دينار عنه، قال: اصطبح ناسٌ الخمرَ يوم أحدٍ، ثم قُتِلوا شهداء.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4973)


4973 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حَدَّثَنَا أحمد بن علي الخَزّاز، حَدَّثَنَا فَيض بن وَثِيق، حَدَّثَنَا أبو عُبادة [1] الأنصاري، أخبرني ابن شهاب، عن عُروة، عن عائشة، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لجابرٍ: "يا جابرُ، ألا أُبشّرُك؟ " قال: بلى، بَشِّرني، بشّرك اللهُ بالخير، قال: "شعرْتَ أنَّ الله عز وجل أحيا أباك، فأقعدَه بين يديه؟ فقال: تمنَّ عليَّ عَبْدي ما شئتَ أُعطِيكَه، فقال: يا ربِّ، ما عبدتُك حَقَّ عبادتِك، أتمنّى أن تَرُدَّني إلى الدنيا، فأُقتَلَ مع النَّبِيّ مرةً أخرى، فقال: سَبَقَ مني أنك إليها لا تَرجِع" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জাবেরকে বললেন: "হে জাবের, আমি কি তোমাকে একটি সুসংবাদ দেব না?" তিনি (জাবের) বললেন: "অবশ্যই, আমাকে সুসংবাদ দিন, আল্লাহ আপনাকে কল্যাণের সুসংবাদ দিন।" তিনি বললেন: "তুমি কি জানো যে আল্লাহ তাআলা তোমার পিতাকে জীবিত করেছেন এবং তাঁকে তাঁর (আল্লাহর) সম্মুখে বসিয়েছেন? অতঃপর (আল্লাহ) বললেন: 'হে আমার বান্দা, তুমি যা চাও আমার কাছে প্রার্থনা করো, আমি তোমাকে তা দান করব।' তখন তিনি (জাবেরের পিতা) বললেন: 'হে আমার রব, আমি আপনার যথার্থ ইবাদত করতে পারিনি। আমি আকাঙ্ক্ষা করি যে আপনি আমাকে দুনিয়ায় ফিরিয়ে দিন, যাতে আমি নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে আরও একবার শহীদ হতে পারি।' (আল্লাহ) বললেন: 'এটা আমার সিদ্ধান্ত হয়ে গেছে যে তুমি সেখানে আর ফিরে যাবে না।'"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: أبو عمارة، والتصويب من مصادر تخريج الخبر. "إتحاف المهرة" (25323)، وهو أبو مَسْلمة سعيد بن يزيد بن مسلمة البصري القصير.



[2] إسناده واهٍ بمرة من أجل أبي عبادة الأنصاري - واسمه عيسى بن عبد الرحمن بن فروة الزُّرقي - فهو متروك الحديث. وإعلال الذهبي له في "تلخيصه" بفيض أنه كذاب فغير مسلّم له ذلك، لأنَّ فيضًا هذا انفرد بتكذيبه ابن معين، وروى عنه أبو حاتم وأبو زرعة الرَّازيان، وأبو زرعة لا يروي إلّا عن ثقة عنده، فقول الذهبي في "الميزان" بأنه مقارب الحال، وقوله في "تاريخ الإسلام" 5/ 654 بأنه صالح في الحديث، أولى من قوله هذا الذي قاله في "تلخيص المستدرك"، فكان الأُولى إعلاله بأبي عُبادة الزُّرقي الأنصاري، لكنه لما تحرَّف اسمه إلى أبي عُمارة الأنصاري لم يظهر للذهبي، وعلى أيِّ حالٍ فقد روي نحو هذا الخبر من غير هذا الوجه، كما سيأتي عند المصنّف برقم (4976).وأخرجه ابن أبي الدنيا في "المتمنِّين" (4)، والبزار كما في "كشف الأستار" للهيثمي (2706)، وابن بطّة العُكبَري في "الإبانة" 7/ 38، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (4344)، والبيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 298 من طرق عن الفيض بن وثيق، بهذا الإسناد. "إتحاف المهرة" (25323)، وهو أبو مَسْلمة سعيد بن يزيد بن مسلمة البصري القصير.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4974)


4974 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن عَمْرَويه الصفّار، حَدَّثَنَا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حَدَّثَنَا حسن بن موسى الأشْيَب، حَدَّثَنَا أبو هِلال، حَدَّثَنَا سعيدٌ يُكنى أبا مَسلَمة [1]، عن أبي نَضْرة، عن جابر، قال: قال لي أبي: يا بُنيَّ، لا أدري لَعلِّي أن أكونَ في أول من يُصابُ غدًا - وذاك يوم أُحدٍ - فأُوصيكَ ببُنيّاتِ عبد الله خيرًا، فالتقَوا فأُصِيبَ ذلك اليومَ [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার বাবা আমাকে বললেন, ‘হে বৎস! আমি জানি না, সম্ভবত আগামীকাল (উহুদের দিনের) সর্বপ্রথম যারা শহীদ হবে, আমি তাদের মধ্যে থাকব। তাই আমি তোমাকে আব্দুল্লাহর মেয়েদের ভালো যত্ন নেওয়ার জন্য অসিয়ত করছি।’ এরপর উভয় দল পরস্পরের সম্মুখীন হলো এবং সেদিন তিনি শহীদ হলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: أبا سلمة، وجاء على الصواب في "تلخيص المستدرك" وفي "إتحاف المهرة" (25323)، وهو أبو مَسْلمة سعيد بن يزيد بن مسلمة البصري القصير.



[2] خبر صحيح، وهذ إسناد حسن من أجل أبي هلال - وهو محمد بن سُليم الراسبي - فهو صالح الحديث، وقد تُوبع كما في الطريق الثالثة. أبو نَضْرة: هو المنذر بن مالك بن قِطْعة العَبْدي.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 3/ 522 عن موسى بن إسماعيل، عن أبي هلال الراسبي، بهذا الإسناد. وأخرجه البخاري (1351) عن مسدَّد، عن بشر بن المفضّل، عن حسين المعلم، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر بن عبد الله. مثل لفظ رواية أبي نضرة عن جابر.قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 4/ 720 بعد أن ذكر رواية أبي الأشعث العجلي مع رواية المصنّف التي هنا: فغلب على الظن حينئذٍ أنَّ في هذه الطريق (يعني طريق البخاري) وهمًا، لكن لم يتبين لي ممن هو، ولم أرَ من نبَّه على ذلك، وكأنَّ البخاري استشعر بشيء من ذلك فعقَّب هذه الطريق بما أخرجه (1352) من طريق ابن أبي نَجِيح عن عطاء عن جابر مختصرًا (يعني مُختصرًا باستخراج جابر لأبيه بعد ستة أشهر وأنه لم يتغيّر) ليوضح أنَّ له أصلًا من طريق عطاء عن جابر.كذلك قال الحافظُ مع عدم إشارته إلى رواية شعبة وغسّان بن مضر وأبي هلال الراسبي، مع أنه وقف على هذه الروايات، إذ نبَّه عليها أثناء شرحه للحديث بعد ذلك 4/ 722 و 723، فمقتضى هذه الروايات جميعًا ترجيحُ رواية بشر بن المفضل عن أبي مسلمة جزمًا، والله تعالى أعلم.وأخرج أبو داود (3232) منه قصة دفن جابر الأبيه مع رجل ثم استخراجه له بعد ستة أشهر، من طريق حماد بن زيد، عن أبي مسلمة سعيد بن يزيد، عن أبي نضرة، عن جابر. غير أنه قال في آخره: فما أنكرت منه شيئًا إلا شُعيرات كنّ في لحيته ممّا يلي الأرض.وأخرجه مختصرًا بهذا القدر أيضًا البخاري (1352)، والنسائي (2159) من طريق سعيد بن عامر، عن شعبة، عن ابن أبي نجيح، عن عطاء، عن جابر. غير أنه لم يذكر في روايته ما تغيَّر منه.فهذا من رواية شعبة بن الحجاج أيضًا كرواية البخاري المطولة من طريق بشر بن المفضّل عن حُسين المعلّم عن عطاء عن جابر. فإذا كان شعبة روى الخبر بكلا الطريقين احتمل أن يكون لبشر بن المفضل في الخبر إسنادان إلى جابر، ويكون كلاهما محفوظًا كما احتمله الحافظُ ابتداءً في شرحه قبل مصيره بعد ذلك إلى تغليب الظن بوهم رواية البخاري، فهذا أولى من توهيم رواية البخاري، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4975)


4975 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن إسحاق، حَدَّثَنَا أبو المُثنَّى، حَدَّثَنَا مُسدَّد، حَدَّثَنَا بشر بن المُفضَّل، حَدَّثَنَا أبو مَسْلمة، حَدَّثَنَا أبو نَضْرة، عن جابر بن عبد الله، قال: لما حَضَرَ قتالُ أُحُدٍ دعاني أبي من اللَّيل، فقال: إني لا أُراني إِلَّا مقتولًا في أول مَن يُقتَل من أصحابِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإني والله ما أدَعُ أحدًا - يعني - أعزَّ عليَّ منكَ بعد نَفْسٍ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وإنَّ عليَّ دَينًا فاقضِ عني دَيني، واستَوصِ بأخَواتك خيرًا، قال: فأصبحنا، فكان أولَ قَتيلٍ، فدفنتُه مع آخَرَ في قبرٍ، ثم لم تَطِبْ نفسي أن أترُكَه مع آخرَ في قبرٍ، فاستخرجتُه بعد ستةِ أشهرٍ، فإذا هو كيومَ وَضَعتُه غيرَ أُذُنِه [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم.وبيانُه:




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উহুদের যুদ্ধ আসন্ন হলো, আমার পিতা রাতে আমাকে ডাকলেন এবং বললেন: আমার মনে হয়, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবীদের মধ্যে যারা প্রথম নিহত হবে, আমি তাদেরই অন্তর্ভুক্ত হব। আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সত্তার (ব্যক্তিসত্তা) পরে, তোমার চেয়ে প্রিয় আর কাউকে আমি রেখে যাচ্ছি না। আমার কিছু ঋণ আছে, তুমি আমার পক্ষ থেকে তা পরিশোধ করে দেবে। আর তোমার বোনদের সাথে ভালো ব্যবহার করার জন্য আমি তোমাকে বিশেষভাবে অসিয়ত করছি। তিনি (জাবির) বলেন: আমরা সকালে উপনীত হলাম, আর তিনিই ছিলেন প্রথম শহীদ। আমি তাকে অন্য একজনের সাথে এক কবরে দাফন করলাম। কিন্তু অন্য একজনের সাথে তাকে এক কবরে রেখে আসতে আমার মন শান্তি পেল না। তাই ছয় মাস পর আমি তাকে কবর থেকে তুলে আনলাম। দেখলাম তার কানে সামান্য অংশ ছাড়া বাকি শরীর হুবহু তেমনই আছে, যেমন আমি তাকে দাফন করেছিলাম।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. أبو المثنّى: هو معاذ بن المُثنَّى العَنْبَري، ومسدّد: هو ابن مُسَرْهَد.وقد تابع مسدَّدًا على روايته التي عند المصنِّف أبو الأشعث أحمد بن المقدام العجلي عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (4340)، وفي "مستخرجه على البخاري" كما في "فتح الباري" 4/ 719، فرواه عن بشر بن المفضّل، عن أبي مسلمة، عن أبي نضرة، عن جابر.وكذلك رواه شعبةُ بنُ الحجاج عند أبي علي بن السكن كما في "فتح الباري" 4/ 723، وأبي بكر الإسماعيلي في "معجم شيوخه" (399)، وابن عبد البر في "التمهيد" 13/ 142، وغسانُ بن مضر عند أبي خيثمة في السِّفْر الثاني من "تاريخه الكبير" (2668)، وأبي نعيم في "معرفة الصحابة" (4346)، والبيهقي في "الكبرى" 6/ 286، وابن عبد البر 13/ 141، كلاهما عن أبي مسلمة سعيد بن يزيد، عن أبي نضرة، عن جابر. وتابعهم أبو هلال الراسبي كما تقدَّم عند المصنّف قبله. وأخرجه البخاري (1351) عن مسدَّد، عن بشر بن المفضّل، عن حسين المعلم، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر بن عبد الله. مثل لفظ رواية أبي نضرة عن جابر.قال الحافظ ابن حجر في "الفتح" 4/ 720 بعد أن ذكر رواية أبي الأشعث العجلي مع رواية المصنّف التي هنا: فغلب على الظن حينئذٍ أنَّ في هذه الطريق (يعني طريق البخاري) وهمًا، لكن لم يتبين لي ممن هو، ولم أرَ من نبَّه على ذلك، وكأنَّ البخاري استشعر بشيء من ذلك فعقَّب هذه الطريق بما أخرجه (1352) من طريق ابن أبي نَجِيح عن عطاء عن جابر مختصرًا (يعني مُختصرًا باستخراج جابر لأبيه بعد ستة أشهر وأنه لم يتغيّر) ليوضح أنَّ له أصلًا من طريق عطاء عن جابر.كذلك قال الحافظُ مع عدم إشارته إلى رواية شعبة وغسّان بن مضر وأبي هلال الراسبي، مع أنه وقف على هذه الروايات، إذ نبَّه عليها أثناء شرحه للحديث بعد ذلك 4/ 722 و 723، فمقتضى هذه الروايات جميعًا ترجيحُ رواية بشر بن المفضل عن أبي مسلمة جزمًا، والله تعالى أعلم.وأخرج أبو داود (3232) منه قصة دفن جابر الأبيه مع رجل ثم استخراجه له بعد ستة أشهر، من طريق حماد بن زيد، عن أبي مسلمة سعيد بن يزيد، عن أبي نضرة، عن جابر. غير أنه قال في آخره: فما أنكرت منه شيئًا إلا شُعيرات كنّ في لحيته ممّا يلي الأرض.وأخرجه مختصرًا بهذا القدر أيضًا البخاري (1352)، والنسائي (2159) من طريق سعيد بن عامر، عن شعبة، عن ابن أبي نجيح، عن عطاء، عن جابر. غير أنه لم يذكر في روايته ما تغيَّر منه.فهذا من رواية شعبة بن الحجاج أيضًا كرواية البخاري المطولة من طريق بشر بن المفضّل عن حُسين المعلّم عن عطاء عن جابر. فإذا كان شعبة روى الخبر بكلا الطريقين احتمل أن يكون لبشر بن المفضل في الخبر إسنادان إلى جابر، ويكون كلاهما محفوظًا كما احتمله الحافظُ ابتداءً في شرحه قبل مصيره بعد ذلك إلى تغليب الظن بوهم رواية البخاري، فهذا أولى من توهيم رواية البخاري، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4976)


4976 - ما أخبرَنيهِ عبد الله بن محمد بن زياد، حَدَّثَنَا محمد بن إسحاق الإمام، أخبرنا يحيى بن حبيب الحارِثي وعَبْدة بن عبد الله الخُزاعي، قالا: حَدَّثَنَا موسى بن إبراهيم بن كثير، قال: سمعت طلحة بن خِراشٍ يحدِّث عن جابر بن عبد الله، قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ الله تعالى لا يُكلِّم أحدًا إلَّا من وراء حِجَابٍ، وإنه كلَّم أباكَ كِفاحًا، فقال: تَمنَّ علَيَّ" وذكر الحديثَ [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (জাবির) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা কোনো ব্যক্তির সাথেই পর্দার আড়াল ছাড়া কথা বলেন না, কিন্তু তিনি তোমার পিতার সাথে সরাসরি (মুখোমুখি) কথা বলেছেন এবং বলেছেন: আমার কাছে কিছু চাও।" (এবং তিনি অবশিষ্ট হাদীস বর্ণনা করলেন)।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل طلحة بن خراش وموسى بن إبراهيم بن كثير، وقد انفردا بذكر تكليم الله لوالد جابر كفاحًا.وأخرجه ابن ماجه (190)، والترمذي (3010) عن يحيى بن حبيب، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حسن غريب.وأخرجه ابن ماجه (190) و (2800) عن إبراهيم بن المنذر الحِزامي، عن موسى بن إبراهيم بن كثير، به. وذكر الترمذي أنَّ علي بن المديني رواه كذلك عن موسى بن إبراهيم.وأخرجه بنحوه أحمد 23/ (14881) من طريق عبد الله بن محمد بن عَقيل، عن جابر بن عبد الله. وإسناده حسن في المتابعات والشواهد.وقد سلف ضمن حديث مطول برقم (2589)، وليس فيه ذكر الكِفاح.قوله: "كفاحًا" أي: مواجهة ليس بينهما حجاب ولا رسول.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4977)


4977 - حَدَّثَنَا أبو عبد الله محمد بن أحمد الأصبَهاني، حَدَّثَنَا الحسن بن الجَهْم، حَدَّثَنَا الحسين بن الفَرَج، حَدَّثَنَا محمد بن عمر، عن شُيوخه، قالوا: وقال عبد الله بن عمرو بن حَرَام: رأيتُ في النوم قبلَ أُحُدٍ كأني رأيتُ مُبشِّر بن عبد المُنذر يقول لي: أنت قادمٌ علينا في الأيام، فقلتُ: وأين أنتَ؟ قال: في الجنة نَسرحُ فيها كيف نَشاءُ، قلت له: ألم تُقتَل يومَ بدرٍ؟ قال: بلى، ثم أُحييتُ. فذَكَر ذلك لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "هذه الشهادةُ يا أبا جابرٍ" [1]. ‌‌ذكرُ مناقب حَنْظلة بن عبد اللهوكنيةُ عبد الله أبو عامر بن عبد عمرو الأنصاري الذي غسَّلتْه الملائكةُ.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে হারাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উহুদের যুদ্ধের আগে আমি স্বপ্নে দেখলাম, যেন আমি মুবাশশির ইবনে আব্দুল মুনযিরকে দেখছি, তিনি আমাকে বলছেন: "আপনি শীঘ্রই আমাদের কাছে আসছেন।" আমি জিজ্ঞেস করলাম: "আপনি কোথায়?" তিনি বললেন: "জান্নাতে, আমরা যেখানে ইচ্ছা সেখানেই বিচরণ করি।" আমি তাকে বললাম: "আপনি কি বদরের দিন নিহত হননি?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, হয়েছিলাম, কিন্তু তারপর আমাকে পুনরায় জীবিত করা হয়েছে।" অতঃপর (আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে হারাম) বিষয়টি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলেন। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আবূ জাবির! এটাই হলো শাহাদাত।"
[এই অনুচ্ছেদে] হানযালা ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদা উল্লেখ করা হয়েছে। আর আব্দুল্লাহ ইবনে আমরকে আবূ আমের ইবনে আব্দুল আমর আনসারী নামেও ডাকা হতো, যাঁকে ফিরিশতাগণ গোসল দিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا مع إعضاله.وهو في "مغازي الواقدي" 1/ 266.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 3/ 249 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (4978)


4978 - حَدَّثَنَا أبو جعفر محمد بن صالح بن هانئ، حَدَّثَنَا أبو إسحاق إبراهيم ابن إسحاق بن إبراهيم بن عيسى بن مَسْلمة بن سُليمان بن عبد الله بن أبي عامر بن عبد عَمرو، حدثني أبي، عن أبيه، عن جدِّه: أَنَّ حَنْظلة بن أبي عامر تَزوَّج فدَخَل بأهله الليلةَ التي كانت صبيحتُها يومَ أُحُدٍ، فلما صلَّى الصبحَ لَزِمَته جميلةُ، فعادَ فكان معها، فأجنَبَ منها، ثم أنه لَحِقَ برسولِ الله صلى الله عليه وسلم [1].




হানযালা ইবনে আবি আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বিবাহ করলেন এবং উহুদ যুদ্ধের দিনের আগের রাতে তাঁর স্ত্রীর সাথে মিলিত হলেন। এরপর যখন তিনি ফজরের সালাত আদায় করলেন, তখন তাঁর স্ত্রী জামিলা তাঁকে আঁকড়ে ধরলেন। ফলে তিনি ফিরে গেলেন এবং তাঁর সাথে মিলিত হলেন, যার কারণে তিনি জুনুবী (নাপাক) হয়ে গেলেন। এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যোগ দিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده مظلم كما قال الذهبي في "تلخيصه"، فإنَّ أبا إسحاق إبراهيم بن إسحاق قال عنه ابن حبان: كان يقلب الأخبار ويسرق الحديث، وقال عنه الخطيب: كان غير ثقة. قلنا: ومن فوقه من آبائه لا يُعرفون إلَّا بهذا الإسناد، فهم مجاهيل.وقد روى الواقديُّ في "مغازيه" 1/ 273 - ومن طريقه ابن سعد 4/ 291، وابن عساكر 27/ 421 - عن شيوخه، مثل هذا الخبر تمامًا. وأخرجه ابن حبان (7025) عن محمد بن إسحاق بن إبراهيم - وهو السَّرَّاج - بهذا الإسناد.وأخرجه أبو نعيم في "دلائل النبوة" (418)، وفي "معرفة الصحابة" (2225) عن أبي حامد أحمد بن محمد بن جبلة، عن محمد بن إسحاق السرّاج، به.وأخرجه ابن إسحاق في "السيرة النبوية" برواية محمد بن سَلَمة الحرّاني كما في قطعة منه مطبوعة بإثر رواية يونس بن بُكَير (515)، ومن طريقه أخرجه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 357، وأبو القاسم الأصبهاني في "دلائل النبوة" (109) قال: حدثني عاصم بن عمر بن قتادة، عن محمود بن لَبيد. ومحمود بن لبيد هذا له رؤية، فهذا مرسلُ صحابي حسن.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 4/ 15، وفي "دلائل النبوة" 3/ 246، وابن الأثير في "أسد الغابة" 1/ 543 من طريق يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، عن عاصم بن عمر بن قتادة، مرسلًا ليس فيه محمود بن لبيد، ودلَّت رواية محمد بن سَلَمة الحراني أنَّ عاصم بن عمر حمله عن محمود بن لبيد.وأخرجه ابن بشكوال في "غوامض الأسماء المبهمة" ص 591 من طريق هشام بن عروة، عن أبيه مرسلًا. ورجاله ثقات.وسيأتي برقم (7153) من حديث أنس بن مالك، قال: افتخر الحيان من الأنصار الأوس والخزرج، فقالت الأوس: منا من اهتز لموته عرش الرحمن سعد بن معاذ، ومنا من حمته الدَّبْر عاصم بن ثابت بن الأقلح، ومنا من غسّلتْه الملائكة حنظلة ابن الراهب … وإسناده قوي.