আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5099 - حدثنا أبو عبد الله بن بُطّة، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين بن الفرَج، حدثنا محمد بن عمر قال: ثابتُ بن قيس بن شَمّاس بن امرئ القيس بن مالك، خَطيبُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، شهد أُحدًا والخندقَ والمشاهدَ كلَّها مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وقُتل يوم اليمامة شهيدًا.
মুহাম্মাদ ইবনু উমার থেকে বর্ণিত, সাবিত ইবনু ক্বায়স ইবনু শাম্মাস ইবনু ইমরুউল ক্বায়স ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খতীব। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উহুদ, খন্দক এবং সকল যুদ্ধেই অংশগ্রহণ করেন। আর তিনি ইয়ামামার যুদ্ধের দিন শহীদ হিসেবে নিহত হন।
5100 - حدثنا أبو الحسين بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الثقفي، حدثنا عمر بن محمد بن الحسن الأسَديّ، حدثنا أبي [عن زياد] [1] عن محمد بن إسحاق، قال: استُشهِد ثابتُ بن قَيس بن شَمّاس يومَ اليَمامة، وكان أبو بكر قَدَّمه على الأنصار مع خالد بن الوليد [2].
মুহাম্মাদ ইবনে ইসহাক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইয়ামামার যুদ্ধের দিন সাবেত ইবনে কায়স ইবনে শাম্মাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হন। আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে আনসারদের উপর নেতা নিযুক্ত করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] سقط هذا من النسخ الخطية، وقد استدركناه من رواية أبي نعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (1326) حيث روى هذا الخبر عن أبي حامد بن جبلة، عن محمد بن إسحاق الثقفي، عن عمر بن محمد بن الحسن عن أبيه، عن زياد، عن ابن إسحاق. وروى أبو نعيم عدة أخبار بهذا الإسناد بذكر زياد فيها جميعًا، فلا بد من ذكره، وهو زياد بن عبد الله البكّائي أحد أشهر رواة السيرة عن ابن إسحاق، وعنه أخذ ابن هشام السيرة.
[2] رجاله لا بأس بهم.وأخرجه أبو نعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (1326) عن أبي حامد أحمد بن محمد بن جَبَلة، عن محمد بن إسحاق الثقفي - وهو السرّاج - بهذا الإسناد.وأخرجه خليفة بن خياط في "تاريخه" ص 102 عن بكر بن سليمان البصري، عن محمد بن إسحاق، فذكره.وخبر تقديم أبي بكر لثابت بن قيس على الأنصار تحت إمرة خالد بن الوليد أسنده محمد بن إسحاق عن محمد بن جعفر بن الزبير عن عُروة بن الزبير مرسلًا. كذلك كما أخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 8/ 334 عن أبي عبد الله الحاكم، عن أبي العباس محمد بن يعقوب، عن أحمد بن عبد الجبار، عن يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق.ورواه أيضًا خليفة بن خياط في "تاريخه" ص 102 عن عامر الشعبي ويزيد بن رومان مرسلًا.
5101 - أخبرني محمد بن عيسى العَطّار بمَرْو، سمعتُ أحمد بن سيّار، يقول: كنيةُ ثابت بن قيس بن شَمّاس أبو عبد الرحمن [1].
আহমদ ইবনু সায়্যার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সাবেত ইবনু ক্বায়স ইবনু শাম্মাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কুনিয়াত (ডাকনাম) হলো আবূ আবদুর রহমান।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أحمد بن سَيّار هذا هو ابن أيوب المروزي الحافظ وكذلك كنّى ابن حبان في "الثقات" ثابت بن قيس بأبي عبد الرحمن، قال: وقيل: أبو محمد، كذا قال مع أنَّ الأشهر في كنيته أنه أبو محمد، كما جزم به ابن أبي خيثمة في "تاريخه الكبير" في السفر الثاني (305)، والبلاذُري في "فتوح البلدان" ص 97، وابن مَنْدَه في "معرفة الصحابة" 1/ 336، وغيرهم، وبه جزم ابن حبان في "مشاهير علماء الأمصار" (41)، فهو المعتمد.
5102 - حدثنا أبو بكر بن إسحاق، حدثنا أبو المُثنَّى، حدثنا عبد الرحمن بن المُبارك، حدثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "نِعمَ الرجلُ أبو بكر، نِعمَ الرجلُ عمرُ، نِعمَ الرجلُ أبو عُبيدة بن الجَرّاح، نِعمَ الرجلُ ثابتُ بن قَيس بن شَمّاس، نِعمَ الرجلُ مُعاذُ بن جَبَل، نِعمَ الرجلُ معاذُ بن عَمرو بن الجَمُوح، بئسَ الرجلُ فلانٌ وفلانٌ" سبعةُ رجالٍ سَمّاهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، ولم يُسمِّهم لنا سُهيلٌ [1].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আবু বকর কতই না উত্তম লোক! উমর কতই না উত্তম লোক! আবূ উবাইদাহ ইবনু জাররাহ কতই না উত্তম লোক! সাবিত ইবনু কাইস ইবনু শাম্মাস কতই না উত্তম লোক! মু‘আয ইবনু জাবাল কতই না উত্তম লোক! মু‘আয ইবনু ‘আমর ইবনুল জামূহ কতই না উত্তম লোক! আর অমুক অমুক লোক কতই না নিকৃষ্ট লোক!” রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাত জন লোকের নাম উল্লেখ করেছিলেন, কিন্তু সুহাইল আমাদের কাছে তাদের নাম উল্লেখ করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح أبو المُثنَّى: هو معاذ بن المُثنَّى بن معاذ العَنْبري.وأخرجه النسائي (8173)، وابن حبان (6997) و (7129) من طرق عن عبد العزيز بن أبي حازم، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 15/ (9431)، والترمذي (3795) من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، والنسائي (8186) من طريق سليمان بن بلال كلاهما عن سُهيل بن أبي صالح، به. وقال الترمذي: حديث حسن. وزاد فيه الدراوردي أُسيد بن حضير، وذكره سليمان بن بلال مكان ثابت بن قيس.وسيأتي عند المصنف برقم (5247) من طريق سهل بن بكار عن عبد العزيز بن أبي حازم.وسيأتي مختصرًا بذكر معاذ بن عمرو بن الجموح برقم (5911) من طريق عبد العزيز الدراوردي عن سهيل بن أبي صالح. أقرانُكم" يعني العدو، في تركهم اتّباعكم قِبَلكم حتى اتخذتم الفِرار عادةً للنجاة وطلبِ الراحة من مجالدة الأقران. قلنا: وجاء في أكثر روايات البخاري: عوّدتُم، والمعنى: عوّدتم نظراءَكم في القوة من عدوِّكم الفرار منهم حتى طمعوا فيكم. قاله ابن حجر في "فتح الباري" 9/ 99. وسيأتي عند المصنف بهذا اللفظ برقم برقم (5106) من طريق ثابت عن أنس.
5103 - أخبرنا أبو عبد الرحمن بن أبي الوزير التاجر، حدثنا أبو حاتم الرازي، حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، حدثنا ابن عَوْن، حدثنا موسى بن أنس، عن أنس بن مالك، قال: لما كان يومُ اليَمامة جِئتُ إلى ثابتِ بن قيس بن شَمّاس، وهو يتحنَّط، فقلت: يا عمِّ، ألا تَرى ما يَلْقَى الناسُ؟ فلبس أكفانَه، ثم أَقبل وهو يقول: الآنَ الآنَ، وجعلَ يقول بالحَنُوط وأومأَ الأنصاريُّ على ساقِه هكذا - عن وُجُوهِ القوم يُقارعُ القومَ: بئسَ ما عَوّدَتكُم [1] أقرانُكم، ما هكذا كنا نُقاتِلُ مع النبيِّ صلى الله عليه وسلم، فقاتل حتى قُتِلَ [2]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন ইয়ামামার যুদ্ধ হয়েছিল, আমি সাবিত ইবনে কায়স ইবনে শাম্মাসের নিকট আসলাম। তিনি তখন সুগন্ধি (সুরমা) মাখছিলেন। আমি বললাম, ‘হে চাচা, আপনি কি দেখছেন না মানুষের কী অবস্থা হচ্ছে?’ অতঃপর তিনি তার কাফনের কাপড় পরিধান করলেন এবং সামনে এগিয়ে এলেন, আর বলতে লাগলেন, 'এখনই, এখনই (সময়)!' তিনি সুগন্ধি মাখা অবস্থায় বলতে লাগলেন— এবং (বর্ণনাকারী) আনসারী তাঁর পায়ের গোড়ালিতে এভাবে ইঙ্গিত করলেন— (তিনি সামনে এগিয়ে গেলেন) কওমের (শত্রুদের) মুখের উপর দিয়ে, কওমের সাথে লড়াই করতে করতে (তিনি বললেন): "তোমাদের সাথীরা তোমাদেরকে যে অভ্যাসের ওপর অভ্যস্ত করেছে, তা কতই না নিকৃষ্ট! আমরা আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এভাবে যুদ্ধ করতাম না।" এরপর তিনি যুদ্ধ করতে থাকলেন, অবশেষে শাহাদাত বরণ করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ص) و (م) و (ع) و (ب): دعوتكم، وفي "تلخيص المستدرك" للذهبي والمطبوع: عودتُم، وكذلك جاء في هامشي (ص) و (م) بخط مغاير، معلّمًا فوقهما فيهما بحرف (ط)، يعني استظهارًا لذلك، والمثبت من (ز) هو الموافق لبعض روايات البخاري كما في "مشارق الأنوار" للقاضي عياض 2/ 106، وهي رواية أبي إسحاق الفَزَاري في "السيرة" (334) لكن بلفظ: "عوَّدَكم أقرانكم". قال ابن بطال في "شرحه على البخاري" 5/ 52: معنى قوله: "بئس ما عودتكم أقرانُكم" يعني العدو، في تركهم اتّباعكم قِبَلكم حتى اتخذتم الفِرار عادةً للنجاة وطلبِ الراحة من مجالدة الأقران. قلنا: وجاء في أكثر روايات البخاري: عوّدتُم، والمعنى: عوّدتم نظراءَكم في القوة من عدوِّكم الفرار منهم حتى طمعوا فيكم. قاله ابن حجر في "فتح الباري" 9/ 99. وسيأتي عند المصنف بهذا اللفظ برقم برقم (5106) من طريق ثابت عن أنس.
[2] إسناده صحيح. ابن عون: هو عبد الله، ومحمد بن عبد الله الأنصاري: هو ابن المثنى من ذريّة أنس بن مالك، وأبو حاتم الرازي: هو محمد بن إدريس.وأخرجه البخاري (2845) من طريق خالد بن الحارث، عن ابن عون، عن موسى بن أنس، قال - وذَكَر يوم اليمامة - قال: أتى أنسٌ ثابت بن قيس، فذكر مثله كذا جاء فيه بصورة الإرسال، وكذلك جاء في رواية أبي إسحاق الفزاري في "السير" (334) عن عبد الله بن عون عن موسى بن أنس، على صورة الإرسال، لكن وصله غيرُ واحدٍ عن عبد الله بن عَون كما نبَّه عليه ابن حجر في "فتح الباري" 9/ 98، منهم ابن أبي زائدة ومحمد بن عبد الله الأنصاري.وسيأتي عند المصنف برقم (5106) من طريق ثابت بن أسلم البُناني عن أنس بن مالك. وانظر (5357).والتَّحنُّط استعمال الحَنُوط، وهو ما يُطيَّب به كفنُ الميت خاصة، فكأنه أراد بذلك الاستعداد للموت، وتوطين النفس على ذلك والصبر على القتال.
5104 - أخبرني الإمام أبو الوليد الفقيه وأبو بكر بن قُريش الوَرّاق قالا: حدثنا الحَسَن بن سفيان حدثنا وهْب بن بَقيّة، أخبرنا خالد عن حُميد، عن أنس، قال: خَطَبَ ثابتُ بن قيس عند مَقدَمِ النبيّ صلى الله عليه وسلم المدينةَ، فقال: نمنُعك مما نَمنعُ منه أَنفُسَنا وأولادَنا، فما لنا؟ قال: "الجنةُ" قال: رَضِينا [1].صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনায় আগমন করলেন, তখন সাবেত ইবনু ক্বায়িস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (উদ্দেশ্য করে) ভাষণ দিলেন। তিনি বললেন, আমরা আপনাকে সে সকল বিষয় থেকে রক্ষা করব যা থেকে আমরা নিজেদের এবং আমাদের সন্তানদের রক্ষা করি। তাহলে (এর বিনিময়ে) আমাদের জন্য কী আছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "জান্নাত।" তিনি বললেন, আমরা সন্তুষ্ট।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. حميد: هو ابن أبي حميد الطويل، وخالد هو ابن عبد الله الواسطي الطحّان.وأخرجه النسائي (8171) من طريق خالد بن الحارث، عن حميد الطويل، به.وقد تقدَّم مثله برقم (4299) من حديث جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم للنقباء من الأنصار: "تؤونني وتمنعوني؟ " قالوا: نعم، فما لنا؟ قال: "الجنة". وهو حديث صحيح أيضًا.
5105 - أخبرني أبو بكر محمد بن عيسى العَطّار بمَرُو، حدثنا عَبْدان بن محمد بن عيسى الحافظ، حدثنا الفضل بن سَهْل البغدادي - وكان يُقال له: الأعرج - حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثني أبي، عن ابن شهاب، قال: أخبرني إسماعيل بن محمد بن ثابت الأنصاري، عن أبيه، أن ثابت بن قيس قال: يا رسولَ الله، لقد خَشِيتُ أن أكونَ قد هَلَكتُ، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ولمَ؟ " قال: نهانا اللهُ أن نُحِبَّ أَن تُحمَدَ بما لم نفعل، وأجِدُني أُحِبُّ الحَمدَ، ونهانا عن الخُيَلاء، وأجِدُني أحِبُّ الجَمَال، ونهانا أن نرفعَ أصواتَنا فوق صوتِك، وأنا جَهِيرُ الصوتِ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يا ثابتُ، ألا ترضى أن تَعِيشَ حميدًا، وتُقتَل شهيدًا، وتدخُل الجنةَ؟ " قال: بلى يا رسول الله، قال: فَعاشَ حميدًا، وقُتِل شهيدًا يومَ مُسيلِمة الكذَّاب [1]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة، إنما أخرج مسلمٌ وحدَه حديثَ حمّاد بن سلَمة وسُليمان بن المُغيرة، عن ثابت، عن أنس، قال: لما أُنزلت: {لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ} [الحجرات: 2] جاء ثابتُ بن قيس، وذكر الحديثَ مختصرًا.
সাবেত ইবনে কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার ভয় হচ্ছে যে আমি বুঝি ধ্বংস হয়ে গেছি। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, “কেন?” তিনি বললেন, আল্লাহ্ আমাদের নিষেধ করেছেন এমন কাজের জন্য প্রশংসা পেতে যা আমরা করিনি, অথচ আমি প্রশংসা পছন্দ করি। তিনি অহংকার (খুইলা) করতে নিষেধ করেছেন, অথচ আমি সৌন্দর্য পছন্দ করি। আর তিনি নিষেধ করেছেন যেন আমরা আপনার কণ্ঠস্বরের উপর আমাদের কণ্ঠস্বর উঁচু না করি, অথচ আমার কণ্ঠস্বর খুবই উঁচু। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, “হে সাবেত! তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, তুমি প্রশংসিত জীবন যাপন করবে, শহীদ হিসেবে নিহত হবে এবং জান্নাতে প্রবেশ করবে?” তিনি বললেন, অবশ্যই, ইয়া রাসূলাল্লাহ! অতঃপর তিনি প্রশংসিত জীবন যাপন করলেন এবং মুসায়লামা কাযযাবের (মিথ্যাবাদী মুসায়লামার) যুদ্ধের দিন শহীদ হিসেবে নিহত হলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم لكن أكثر أصحاب ابن شهاب - وهو محمد بن مسلم الزهري - لم يذكروا فيه محمد بن ثابت بن قيس، وهو صحابي صغير له رؤية، فصار الخبر مرسلًا، ولكنه مع ذلك مرسلٌ قويُّ الإسناد كما قال ابن حجر في "فتح الباري" 10/ 524.وقد رواه بنحوه أبو ثابت من ولد ثابت بن قيس عند الطبري في "تفسيره" 26/ 118 عن عمه إسماعيل بن محمد بن ثابت عن أبيه، فكأنَّ هذا الخبر ممّا سمعه إسماعيل بن محمد بن ثابت من أبيه محمد بن ثابت بن قيس، وإن كان لا يُحفظ ذكره في طريق الزهري.وله طريقٌ ثالثةٌ بنحوه ستأتي عند المصنف برقم (5107) بإسناد لا بأس به عن ابنة ثابت بن قيس بن شمّاس، فذكرت قصة أبيها، فتبين بذلك أنَّ هذا الخبر كان معروفًا في آل ثابت بن قيس، على أنَّ له طرقًا أخرى مرسلةً ذكرها الطبري في "تفسيره" 26/ 119، فالخبر صحيح إن شاء الله.وأخرجه ابن حبان (7167) من طريق يونس بن يزيد الأيلي، عن ابن شهاب الزهري، عن إسماعيل بن ثابت - نسبه لجده - أنَّ ثابت بن قيس الأنصاري قال: يا رسول الله، فذكره مرسلًا.وكذلك رواه مالك بن أنس في "موطئه" برواية محمد بن الحسن الشيباني (946) عن ابن شهاب، عن إسماعيل بن محمد بن ثابت الأنصاري، أنَّ ثابت بن قيس بن شماس الأنصاري قال … فذكره مرسلًا.وأخرج مسلمٌ منه خشية ثابت بن قيس أن يحبط عمله لجهارة صوته بعد نزول آية الحجرات في النهي عن رفع الصوت فوق صوت النبي صلى الله عليه وسلم، وطمأنة النبي صلى الله عليه وسلم له فإنه من أهل الجنة، من حديث أنس بن مالك برقم (119)، كما نبه على ذلك المُصنِّف بإثره.
5106 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا السَّرِيّ بن خُزيمة، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد بن سَلَمة، حدثنا ثابت، عن أنس: أنَّ ثابت بن قيس جاء يومَ اليَمامة، وقد تَحنَّطَ ولَبِسَ أكفانَه، وقد انهزمَ أصحابُه، وقال: اللهمَّ إني أبْرأُ إليك مما جاءَ به هؤلاء، وأعتذِرُ إليك مما صنعَ هؤلاء، فبئسَ ما عَوَّدتُم أقرانَكم، خَلُّوا بيننا وبين أقرانِنا ساعةً، ثم حَمَل فقاتَلَ ساعةً فقُتِل، وكانت دِرعُه قد سُرِقَت، فرآه رجلٌ فيما يَرى النائمُ، فقال: إنَّ دِرعي في قِدرٍ تحت إكافٍ بمكان كذا وكذا، وأَوصى بوصايا، فطُلِب الدِّرعُ، فوُجِد حيثُ قال فأنفَذُوا وصيّتَه [1].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه. ولحديث وصاياه قصة عجيبة:
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই সাবেত ইবনু কাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইয়ামামার যুদ্ধের দিন এসেছিলেন। তিনি তখন নিজেকে সুগন্ধি মাখিয়ে কাফনের কাপড় পরেছিলেন। ইতোমধ্যে তাঁর সাথীরা পরাজিত হয়ে গিয়েছিল। তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! এরা (শত্রুরা) যা নিয়ে এসেছে, তার থেকে আমি আপনার কাছে মুক্তি চাই (অস্বীকৃতি জানাই)। আর এরা (আমার পরাজিত সাথীরা) যা করেছে, তার জন্য আমি আপনার কাছে ওজর পেশ করছি। তোমরা তোমাদের প্রতিপক্ষদের কী জঘন্য অভ্যাসে অভ্যস্ত করেছ! এক মুহূর্তের জন্য আমাদের এবং আমাদের প্রতিপক্ষদের মধ্যে (যুদ্ধ করার) সুযোগ দাও।" এরপর তিনি আক্রমণ করলেন এবং কিছুক্ষণ যুদ্ধ করার পর শহীদ হয়ে গেলেন।
তাঁর বর্মটি চুরি হয়ে গিয়েছিল। অতঃপর একজন ব্যক্তি স্বপ্নে তাঁকে দেখলেন। তিনি (শহীদ সাবেত) বললেন: "আমার বর্ম অমুক অমুক জায়গায় একটি পাত্রের নিচে জিনপোষের (উটের পিঠের গদির) নিচে আছে।" তিনি কিছু অসিয়তও করেছিলেন। অতঃপর বর্মটি খোঁজা হলো এবং তিনি যেখানে বলেছিলেন সেখানেই সেটি পাওয়া গেল। এরপর তারা তাঁর অসিয়তগুলো কার্যকর করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. ثابت: هو ابن أسلم البُناني.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 356 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 4/ 345، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (250)، والطبري في "الكبير" (1307)، وأبو بكر البرقاني في "مستخرجه" كما في "تغليق التعليق" لابن حجر 3/ 436، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (1327)، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 89 من طرق عن حماد بن سلمة، به. وبعضهم لا يذكر فيه قصة الدرع والوصايا.وقد علَّقه البخاري بصيغة الجزم بإثر الحديث (2845) عن حماد عن ثابت عن أنس، ولم يسُق لفظه.وأخرج منه قصة إقدامه يوم اليمامة واستشهاده دون سائر الحديث أحمدُ 19/ (2399)، وابن حبان (7168) من طريق سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس.
5107 - كما حدّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بحر بن نَصر الخَوْلاني، حدثنا بشر بن بكر، حدثني عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، حدثني عطاءٌ الخُراساني، قال: قدمتُ المدينةَ، فأتيتُ ابنةَ ثابت بن قيس بن شَمّاس، فذكرتْ قصةَ أبيها، قالت: لما أنزل الله على رسوله صلى الله عليه وسلم: {لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ} الآية [الحجرات: 2] {إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍ} [لقمان:18] جلس أبي في بيته يبكي، ففَقَدَه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فسألَه عن أمرِه، فقال: إني امرُؤٌ جَهِير الصوتِ، وأخافُ أن يكون قد حَبِطَ عَمَلي، فقال: "بل تَعِيشُ حميدًا، وتموتُ شهيدًا، ويُدخِلُك اللهُ الجنةَ بسلَامٍ"، فلما كان يومُ اليمامة مع خالد بن الوليد استُشهد، فرآه رجلٌ من المسلمين في مَنامه، فقال: إني لما قُتِلتُ انتَزَع درعي رجلٌ من المسلمين، وخَبّأه في أقصى العسكر، وهو عنده، وقد أكَبَّ على الدِّرع بُرْمةً، وجعل على البُرمة رَحْلًا، فالتِ الأميرَ فأخبِره، وإياك أن تقولَ: هذا حُلُم، فتُضيِّعَه، وإذا أتيتَ المدينةَ فائْتِ فقل لخليفةِ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم: إن عليَّ من الدَّين كذا، وغُلامي فلانٌ من رَقِيقي عَتيقٌ، وإياك أن تقولَ: هذا حُلُم، فتُضيِّعَه. قال: فأتاهُ فأخبره الخَبَر، فوجدَ الأمرَ على ما أخبرَه، وأتى أبا بكر فأخبرَه، فأنفذَ وصيَّتَه، فلا نعلمُ أحدًا بعدما مات أُنفذ وصيّتُه غيرَ ثابت بن قيس بن الشَّمّاس [1]. ذكرُ مناقب أبي العاص بن الرَّبيع خَتَنِ [2] رسول الله صلى الله عليه وسلم
আতা আল-খুরাসানি থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমি মদীনায় এসে সাবেত ইবনে কায়স ইবনে শাম্মাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যার কাছে গেলাম। তিনি তাঁর পিতার ঘটনা বর্ণনা করলেন। তিনি বলেন: যখন আল্লাহ তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর এই আয়াত নাযিল করলেন: "তোমরা নবীর কন্ঠস্বরের উপর তোমাদের কন্ঠস্বরকে উঁচু করো না..." (সূরা আল-হুজুরাত: ২) এবং (যখন এই আয়াত নাযিল হলো): "নিশ্চয় আল্লাহ কোনো অহংকারী দাম্ভিককে পছন্দ করেন না।" (সূরা লুকমান: ১৮) তখন আমার আব্বা বাড়িতে বসে কাঁদতে লাগলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে দেখতে না পেয়ে তাঁর অবস্থা জিজ্ঞেস করলেন। তিনি বললেন: আমি একজন উচ্চস্বরের মানুষ, আর আমি ভয় পাচ্ছি যে আমার সমস্ত আমল বাতিল হয়ে গেছে। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, বরং তুমি প্রশংসিত জীবন যাপন করবে, শহীদ হিসেবে মৃত্যুবরণ করবে এবং আল্লাহ তোমাকে নিরাপদে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন।" যখন খালিদ ইবনে ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ইয়ামামার যুদ্ধ সংঘটিত হলো, তখন তিনি শহীদ হলেন। অতঃপর মুসলিমদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি তাঁকে স্বপ্নে দেখলেন। তিনি (সাবেত) বললেন: আমি যখন নিহত হলাম, তখন মুসলিমদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি আমার বর্মটি ছিনিয়ে নেয় এবং সেটি সেনাদলের শেষ প্রান্তে লুকিয়ে রাখে। সেটি তারই কাছে আছে। সে বর্মটির উপর একটি হাঁড়ি উল্টো করে রেখেছে এবং হাঁড়িটির উপর একটি সওয়ারীর সরঞ্জাম (রাহল) রেখেছে। তুমি আমীরের কাছে যাও এবং তাঁকে খবর দাও। সাবধান, তুমি যেন এ কথা না বলো যে, এটি কেবল একটি স্বপ্ন, তাহলে তুমি এটিকে নষ্ট করে ফেলবে। আর যখন তুমি মদীনায় পৌঁছবে, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খলীফার (আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে গিয়ে বলবে: আমার উপর এত এত ঋণ আছে, আর আমার ক্রীতদাসদের মধ্যে অমুক গোলামটি মুক্ত। সাবধান, তুমি যেন এ কথা না বলো যে, এটি কেবল একটি স্বপ্ন, তাহলে তুমি এটিকে নষ্ট করে ফেলবে। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর সে (স্বপ্নদ্রষ্টা) আমীরের কাছে গেল এবং তাঁকে খবর দিল। তারা দেখল যে বিষয়টি হুবহু তেমনই যেমনটি সে খবর দিয়েছিল। এরপর সে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলো এবং তাঁকে অবহিত করল। তিনি তাঁর অসিয়ত কার্যকর করলেন। সাবেত ইবনে কায়স ইবনে শাম্মাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছাড়া আর কারো ব্যাপারে আমাদের জানা নেই, যার অসিয়ত তাঁর মৃত্যুর পরে কার্যকর করা হয়েছে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح بما قبله، وهذا إسناد قوي من أجل عطاء الخُراساني - وهو ابن أبي مسلم - وابنة ثابت بن قيس بن شماس صحابية، لأنها قالت في بعض روايات الحديث: سمعت أبي يقول … فذكرت القصة، وذكرها في الصحابة ابن أبي عاصم وأبو نُعيم وابن الأثير.وأخرجه أبو يعلى في "مسنده الكبير" كما في "المطالب العالية" لابن حجر (3721)، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (251)، ومن طريقه الخطيب البغدادي في "المتفق والمفترق" (332) عن أحمد بن عيسى المصري، عن بشر بن بكر، بهذا الإسناد. وزاد أبو يعلى في روايته قول ثابت للنبي صلى الله عليه وسلم أيضًا: يا رسول الله، أنزل عليك: {إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍ} والله إني لأُحبُّ الجَمال وأُحِبُّ أن أسود قومي. وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1921)، وفي "الجهاد" (225)، والطبراني في "الكبير" (1320)، وأبو نُعيم في "دلائل النبوة" (519) من طريق الوليد بن مسلم، وابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (3399)، وأبو بكر الروياني في "مسنده" (1002)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (8091) من طريق صدقة بن خالد، والبيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 356 من طريق الوليد بن مَزْيَد البيروتي، ثلاثتهم عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر به وذكر الوليد بن مسلم في روايته تصريح ابنة ثابت بن قيس بسماعها هذا الخبر من أبيها. وزاد الوليد بن مسلم وصدقة نحو الزيادة التي زادها بشر بن بكر في روايته عند أبي يعلى في "مسنده الكبير" كما تقدم.والبُرمة: القِدر.
[2] الخَتَن: هو اسم يجمع زوجَ الابنة وأبا الزوجة، وإنما كان أبو العاص زوج زينب ابنة النبي صلى الله عليه وسلم. وسيذكر المصنف ترجمة أبي العاص بن الربيع مرة أخرى بين يدي الخبر (6838). وفي أخبار أبي العاص بن الربيع وزواجه بزينب جزءٌ لطيف لعبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، فليُرجع إليه.وسيأتي برقم (7010) من طريق الواقدي بإسناده إلى ابن عباس أنَّ زينب ولدت عليًا وأمامة.وممَّن ذكر عليًا ابن زينب أيضًا الزبير بن بكار كما في "المعجم الكبير" للطبراني 22/ (1046)، وابن منده كما في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 43/ 8، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" 5/ 2968. وقد اختُلف في اسم أبي العاص، فسيأتي برقم (6838) أنَّ اسمه مهشم - من الهشم - وقيل: القاسم، وقال الزبير بن بكار فيما أسنده عنه الطبراني في "الكبير" 19/ (451): هو الثبت في اسمه، ونقل الزبير أنه قيل في اسمه: لقيط. وقال البَلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 397: الثبت أن اسمه لقيط. وبه جزم ابن معين وعمرو الفَلّاس كما في "تاريخ دمشق" 67/ 5، وجزم به كذلك ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" وابن حبان في "مشاهير علماء الأمصار" وابن عبد البر في "الاستيعاب".
5108 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا محمد بن عبد الله بن رُستَهْ، حدثنا سليمان بن داود الشاذَكُوني، حدثني محمد بن عمر قال: وأبو العاص بن الرَّبيع بن عبد العُزّى بن عبد شمس بن عبد مَناف بن قُصيّ، واسم أبي العاص مِقسَم، وأمُّه هالةُ بنت خُويلد بن أسد بن عبد العُزّى بن قُصيّ، وخالتُه خديجةُ بنت خُويلد زوجُ النبي صلى الله عليه وسلم، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم زَوَّجه ابنتَه زينبَ قبلَ الإسلام، فولَدَت له عليًا وأُمامة، فتُوفّي عليٌّ وهو صغير، وبقيت أُمامةُ إلى أن تزوّجها عليُّ بن أبي طالب بعد وفاةِ فاطمةَ رضي الله عنها.وكان أبو العاص فيمن شهد بدرًا مع المشركين، فأسرَه عبدُ الله بن جُبير بن النعمان الأنصاري رضي الله عنهما، فلما بعث أهلُ مكة في فِداء أُساراهم قَدِم في فِداء أبي العاص أخوه عَمرو بن الرَّبيع [1]. قد ذكرتُ فيما تقدَّم ما وقع بينه وبين زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى أن استُشهدت زينبُ، فاسمعِ الآن حُسنَ عاقبةِ أبي العاص، وحسنَ إسلامه، وانتقالَه إلى المدينة حتى تُوفّي بحَضْرة رسولِ الله صلى الله عليه وسلم:
মুহাম্মাদ ইবন উমার থেকে বর্ণিত,
আবুল আস ইবনু রাবী' ইবনু আব্দুল উযযা ইবনু আব্দু শামস ইবনু আব্দু মানাফ ইবনু কুসাই; আবুল আস-এর আসল নাম ছিল মিকসাম। তাঁর মাতা ছিলেন হালা বিনতু খুওয়াইলিদ ইবনু আসাদ ইবনু আব্দুল উযযা ইবনু কুসাই। আর তাঁর খালা ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী খাদীজা বিনতু খুওয়াইলিদ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইসলামের পূর্বে তাঁর কন্যা যায়নাবকে তার সাথে বিবাহ দিয়েছিলেন। তাদের গর্ভে জন্ম নিয়েছিল আলী ও উমামা। আলী ছোট থাকতেই ইন্তেকাল করেন, আর উমামা জীবিত ছিলেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইন্তেকালের পর আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (উমামাকে) বিবাহ করেন। আবুল আস ঐ সকল মুশরিকদের মধ্যে ছিলেন, যারা বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিল। আব্দুল্লাহ ইবনু জুবাইর ইবনু নু'মান আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বন্দী করেছিলেন। যখন মক্কার লোকেরা তাদের বন্দীদের মুক্তিপণ প্রেরণের জন্য লোক পাঠালো, তখন আবুল আস-এর মুক্তিপণ নিয়ে আসলেন তার ভাই আমর ইবনু রাবী'। [১] আমি ইতোপূর্বে যা কিছু ঘটেছে তা বর্ণনা করেছি, যা তার এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যায়নাবের মধ্যে ঘটেছিল, যাবৎ না যায়নাব ইন্তেকাল করেন। এখন তুমি আবুল আস-এর উত্তম পরিণতি, তার উত্তম ইসলাম গ্রহণ এবং মদীনায় তাঁর স্থানান্তরের কথা শ্রবণ করো, যতক্ষণ না তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপস্থিতিতে ইন্তেকাল করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقال مثل ذلك ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 8/ 5 - 6، لكنه أسند الشطر الثاني من هذا الخبر في شهود أبي العاص بدرًا مع المشركين وأسره وفدائه عن شيخه محمد بن عمر الواقدي، عن المنذر بن سعد مولى بني أسد بن عبد العُزّى، عن عيسى بن معمر، عن عبّاد بن عبد الله بن الزبير، عن عائشة.وسائر الخبر ذكره ابن سعد من قوله هو، والغالب أنه أخذه عن شيخه محمد بن عمر الواقدي. وفي أخبار أبي العاص بن الربيع وزواجه بزينب جزءٌ لطيف لعبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، فليُرجع إليه.وسيأتي برقم (7010) من طريق الواقدي بإسناده إلى ابن عباس أنَّ زينب ولدت عليًا وأمامة.وممَّن ذكر عليًا ابن زينب أيضًا الزبير بن بكار كما في "المعجم الكبير" للطبراني 22/ (1046)، وابن منده كما في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 43/ 8، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" 5/ 2968. وقد اختُلف في اسم أبي العاص، فسيأتي برقم (6838) أنَّ اسمه مهشم - من الهشم - وقيل: القاسم، وقال الزبير بن بكار فيما أسنده عنه الطبراني في "الكبير" 19/ (451): هو الثبت في اسمه، ونقل الزبير أنه قيل في اسمه: لقيط. وقال البَلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 397: الثبت أن اسمه لقيط. وبه جزم ابن معين وعمرو الفَلّاس كما في "تاريخ دمشق" 67/ 5، وجزم به كذلك ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" وابن حبان في "مشاهير علماء الأمصار" وابن عبد البر في "الاستيعاب".
5109 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن محمد بن إسحاق، حدثني يحيى بن عبّاد بن عبد الله بن الزُّبَير، عن أبيه، عن عائشةَ زوجِ النبي صلى الله عليه وسلم قالت: لما بعثَ أهلُ مكةَ في فِداء أُساراهم بَعثتْ زينبُ ابنةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم في فِداء أبي العاص بمالٍ، وبعثتْ فيه بقلادةٍ كانت خديجةُ أدخلَتْها بها على أبي العاص حين بَنى عليها، فلمّا رأى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم تلكَ القِلادةَ رَقَّ لها رِقّةً شديدةً، وقال: "إن رأيتُم أن تُطلِقوا أسيرَها، وتَردُّوا عليها الذي لها فافعلُوا"، فقالوا: نعم يا رسول الله، فأطلَقُوه ورَدُّوا عليه الذي لها [1].ولم يَزَل أبو العاص مُقيمًا على شِرْكه حتى إذا كان قُبَيلَ فتح مكةَ خرج بتجارة إلى الشام بأموال من أموال قريش أَبضَعُوها معه، فلما فَرَغ من تجارتِه وأقبلَ قافلًا، لقيَتْه سريّةٌ لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم، وقيل: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان هو الذي وجَّه السَّرِيَة للعِير التي فيها أبو العاص قافلةً من الشام، وكانوا سبعين ومئةَ راكبٍ، أميرُهم زيد بن حارثة، وذلك في جمادى الأولى في سنة ستٍّ من الهجرة، فأخَذُوا ما في تلك العِير من الأثقال، وأسرُوا أناسًا من العِير، فأعجزَهم أبو العاص هَرَبًا، فلما قَدِمَت السريّةُ بما أصابوا أقبل أبو العاص من الليل، حتى دخل على زينبَ ابنةِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فاستجارَ بها فأجارتْه؛ في طلب ماله، فلمّا خرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى صلاة الصبح فكبَّر وكبَّر الناسُ معه [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন মক্কার লোকেরা তাদের বন্দীদের মুক্তির (মুক্তিপণ) জন্য লোক পাঠালো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবু আল-আস-এর মুক্তির জন্য অর্থ পাঠালেন। এবং তার সাথে একটি হারও পাঠালেন, যা খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যায়নাবকে (আবু আল-আসের সাথে) বাসর রাতে দিয়েছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন হারটি দেখলেন, তখন তিনি অত্যন্ত কোমল (মমতাময়) হয়ে গেলেন এবং বললেন: "যদি তোমরা মনে করো যে তার বন্দীকে মুক্তি দেবে এবং তার জিনিস তাকে ফিরিয়ে দেবে, তবে তাই করো।" তারা বলল: "হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ!" অতঃপর তারা তাকে মুক্তি দিল এবং তার জিনিস তাকে ফিরিয়ে দিল [১]। আবু আল-আস তখনও তার শিরকের ওপর অটল ছিলেন। অবশেষে যখন মক্কা বিজয়ের কিছু পূর্বে তিনি কুরাইশদের কিছু সম্পদ নিয়ে ব্যবসার উদ্দেশ্যে সিরিয়ার দিকে রওয়ানা হলেন, যা তারা তার সাথে পাঠিয়েছিল। তিনি তার ব্যবসা শেষ করে যখন প্রত্যাবর্তন করছিলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি সামরিক দল (সারিয়্যা) তার মুখোমুখি হলো। বলা হয় যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজেই সিরিয়া থেকে প্রত্যাবর্তনকারী সেই কাফেলার জন্য সামরিক দলটি প্রেরণ করেছিলেন, যার মধ্যে আবু আল-আস ছিলেন। তাতে (সারিয়্যায়) একশ সত্তর জন আরোহী ছিলেন এবং তাদের আমীর ছিলেন যায়দ ইবনে হারিসা। এটি ছিল হিজরতের ষষ্ঠ বর্ষের জুমাদাল উলা মাসে। তারা সেই কাফেলার সমস্ত মালপত্র গ্রহণ করল এবং কাফেলার কিছু লোককে বন্দী করল। কিন্তু আবু আল-আস পালিয়ে তাদের নাগালের বাইরে চলে গেলেন। যখন সামরিক দলটি লুটের মাল নিয়ে ফিরে এলো, তখন আবু আল-আস রাতে আগমন করলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা যায়নাবের কাছে প্রবেশ করলেন। তিনি তার মালের সন্ধানের জন্য তাঁর কাছে আশ্রয় চাইলেন এবং যায়নাব তাকে আশ্রয় দিলেন। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাতের জন্য বের হলেন এবং তাকবীর বললেন, তখন তার সাথে লোকেরাও তাকবীর বলল [২]। (এরপর বর্ণনাটি অসম্পূর্ণ)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق. وهو مكرر الحديث السالف برقم (4352).
[2] قصة أبي العاص هذه في تجارته بأموال قريش إلى الشام، وتصدي سرية زيد بن حارثة له إثر رجوعه واغتنام تلك الأموال إنما سمعها ابن إسحاق من عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم يرويها مرسلةً كما وقع عن البيهقي في "السنن" 9/ 143 وفي "دلائل النبوة" 4/ 85 عن أبي عبد الله الحاكم بإسناده هذا الذي هنا إلى ابن إسحاق، وزاد فيها ما سيذكره المصنِّف بعد ذلك برقم (5111) من ردّ تلك الأموال إلى أبي العاص وحمله لها إلى مكة وإعادتها لقريش، ثم إعلانه الإسلامَ بعد ذلك، كل ذلك يرويه ابن إسحاق عن عبد الله بن أبي بكر مرسلًا. فبان بذلك أنَّ صنيع المُصنِّف هنا في "المستدرك" من عطفه قصة أبي العاص على قصة زينب لما أرسلت بقلادتها لفداء أبي العاص بعد أسره يوم بدر، وهمٌ منه رحمه الله تعالى، لأنه أوهم أنَّ القصتين مرويتان بالإسناد الموصول نفسه. وقد أشار البيهقي في مواضع من "سننه الكبرى" كما في الموضعين 6/ 322 و 9/ 95 إلى وجود فروقات في رواية الحاكم لبعض أخبار "سيرة ابن إسحاق"، بين كتابه "المستدرك" و"مغازي ابن إسحاق" بروايته عن أبي العباس الأصم عن أحمد بن عبد الجبار العُطاردي عن يونس بن بُكَير عن ابن إسحاق، وهذا يشير إلى أنَّ الحاكم كان ضبطُه لرواية كتاب "مغازي ابن إسحاق" أحسن من ضبطه لهذه الرواية في "المستدرك"، وذلك لأنه من المعلوم أنَّ إملاءه للمستدرك كان بعد أن تقدَّمت سنُّه وكبر، فكان ربما وصل مقطوعًا أو مرسلًا كما حصل معه هنا وفي الروايتين التاليتين أيضًا، والله أعلم.وقد وقع مثل ما وقع هذا أيضًا في رواية الطبري في "ذَيل المُذيّل" كما في "منتخبه" لعُريب القرطبي المطبوع بأثر "تاريخ الطبري" 11/ 499، وهو وهمٌ كذلك، لأنَّ الطبري نفسه أورد القصتين المشار إليهما في "تاريخه" 2/ 468 - 470 مبيِّنًا فيهما مُفصِّلًا رواية عائشة في قصة زينب وفدائها زوجها أبا العاص يوم بدر عن رواية عبد الله بن أبي بكر المرسلة في قصة أبي العاص، والإسناد في الكتابين إلى ابن إسحاق واحدٌ، فما جاء في "تاريخ الطبري" أولى ممّا وقع في "ذيل المذيَّل"، ولعلَّ ذلك يكون من صنيع عُريب القرطبي لدى انتخابه لكتاب "ذيل المذيَّل" اختصر فأخلَّ، والله تعالى أعلم.وكذلك جاءت القصتان مفصولتين في رواية محمد بن سَلَمة الحَرَّاني عن ابن إسحاق عند الطبراني في "الكبير" 22/ (1050)، وكذا في رواية زياد بن عبد الله البكائي كما في "السيرة النبوية" لابن هشام 1/ 657، لكن ظاهر ما وقع في رواية ابن هشام عن البكائي أن قصة أبي العاص هذه من قول ابن إسحاق نفسه لم يذكر فيها عبد الله بن أبي بكر، وقد ثبت ذكره في رواية غير البكائي، فهو المعتمد.لكن ليس في شيء من روايات ابن إسحاق فِقرة: وقيل: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان هو الذي وجَّه السرية للعير، إلى قوله: سنة ستّ من الهجرة، فلم ترد إلّا هنا وفي رواية الطبري في "ذيل المذيَّل".وقد رواها الواقدي في "مغازيه" 2/ 553، وعنه ابن سعد في "الطبقات" 5/ 6 - 7 عن موسى بن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبيه مرسلًا. وقد انفرد به الواقدي عن شيخه موسى بن محمد التيمي، وموسى هذا منكر الحديث لا يُكتب حديثه عند الأئمة.وقد روى قصة خروج أبي العاص في تجارته إلى الشام أيضًا موسى بن عقبة في روايته عن الزهري عند البيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 174، وجاء في روايته أنَّ الذين تعرضوا للقافلة هم: أبو بَصير وأبو جَنْدل زمن هدنة الحديبية، خلافًا لرواية الواقدي التي فيها أن سرية زيد بن حارثة التي اعترضت القافلة.فقولُ الواقدي وابن إسحاق يدلُّ على أن قصة أبي العاص كانت قبل الحُديبية، وإلا فبعد الهُدْنة لم تتعرَّض سرايا رسول الله صلى الله عليه وسلم، قريش، وقول موسى بن عقبة أصوب، وأبو العاص إنما أسلم زمن الهُدنة، وقريش إنما انبسطت عيرها إلى الشام زمن الهدنة، وسياق الزهرى للقصة بين ظاهر أنها كانت في زمن الهدنة، كما قال ابن القيّم في "زاد المعاد" 3/ 282 - 283.ومما يؤكد ذلك ما جاء في الرواية التالية عند المصنف من قوله صلى الله عليه وسلم لابنته زينب لمّا استجار بها أبو العاص: "لا يخلص إليكِ فإنك لا تَحِلِّين له"، ومعلوم أن تحريم المؤمنات على أزواجهم الكفار لم يكن إلّا بعد هدنة الحديبية لدى نزول سورة الممتحنة.وسيأتي عند المصنف بعده تمام قصة استجارة أبي العاص بزينب وقبول النبي صلى الله عليه وسلم لجوارها، وهي قصة صحيحة ثابتة.
5110 - قال ابن إسحاق: فحدثني يزيد بن رُومانَ، عن عُروة، عن عائشة، قالت: صرخَتْ زينبُ: أيُّها الناس، إني قد أجَرْتُ أبا العاص بن الربيع، قال: فلما سلَّم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من صلاته أقبلَ على الناس، فقال: "أيها الناس، هل سمعتُم ما سمعتُ؟ " قالوا: نعم، قال: "أما والذي نفسُ محمدٍ بيدِه، ما عَلِمتُ بشيءٍ كان حتى سمعتُ منه ما سمعتُم، إنه يُجِيرُ على المسلمين أدْناهُم"، ثم انصرفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فدخَل على ابنتِه زينبَ، فقال: "أيْ بُنيّةُ، أَكرِمي مَثْواهُ، ولا يَخلُصْ إليكِ، فإنك لا تَحِلِّين له" [1].
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যায়নাব (নবী কন্যা) চিৎকার করে বললেন: হে লোকসকল! আমি আবুল 'আস ইবনু আর-রাবীকে নিরাপত্তা দিয়েছি। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি লোকদের দিকে ফিরলেন এবং বললেন: "হে লোকসকল! আমি যা শুনলাম, তোমরাও কি তা শুনেছো?" তারা বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তবে যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, আমি এই বিষয়ে (নিরাপত্তা প্রদানের বিষয়ে) কিছু জানতাম না, যতক্ষণ না আমি তা শুনলাম যা তোমরা শুনলে। নিশ্চয় মুসলমানদের মধ্যে সর্বনিম্ন ব্যক্তিও অন্যদের পক্ষ থেকে নিরাপত্তা দিতে পারে।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে গেলেন এবং তাঁর কন্যা যায়নাবের কাছে প্রবেশ করলেন। তিনি বললেন: "হে আমার কন্যা! তার মেহমানদারী ভালোভাবে করো, কিন্তু সে যেন তোমার কাছে না পৌঁছাতে পারে (অর্থাৎ স্বামী-স্ত্রীর সম্পর্ক যেন না হয়), কারণ তুমি তার জন্য হালাল নও।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده لا بأس برجاله، لكن المحفوظ فيه أنه من رواية ابن إسحاق عن يزيد بن رومان مرسلًا، ليس فيه عروة ولا عائشة كما أشار إليه ابن عُساكر في "تاريخ دمشق" 67/ 18، وقد رواه المصنِّف نفسه على الصواب في "مغازي ابن إسحاق" كما رواه عنه البيهقي في "سننه الكبرى" 9/ 95 مشيرًا إلى تغاير ما بين روايتي الحاكم هاتين روايته التي في "مغازي إسحاق"، وروايته هذه التي في "المستدرك"، ولم يُرجِّح بينهما البيهقيُّ، وكان البيهقيُّ روى قبلَ ذلك هذه القصة 7/ 185 بإسناد الحاكم الموصول هنا.وأخرجه على الصواب ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 67/ 18 من طريق أبي الحسين رضوان بن أحمد الصيدلاني، عن أحمد بن عبد الجبار، عن يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، عن يزيد بن رومان مرسلًا.وكذلك أخرجه ابن سعد 5/ 8 و 10/ 32 عن يعلى بن عبيد الطنافسي، وابن هشام في "السيرة النبوية" 1/ 657 عن زياد بن عبد الله البكّائي، والطبري في "تاريخه" 2/ 471 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، والطبراني في "الكبير" 22/ (1050) من طريق محمد بن سَلَمة الحَرَّاني كلهم عن ابن إسحاق، عن يزيد بن رومان مرسلًا.ويشهد لقصة أبي العاص هذه في دخوله في جوار زوجه زينب وقبوله صلى الله عليه وسلم جوارها حديثا أنس بن مالك وأم سلمة الآتيان بالأرقام (7013 - 7015) لكن ليس فيهما قوله صلى الله عليه وسلم لابنته زينب: "أي بنيّة، أكرمي مثواهُ، ولا يَخلُص إليك، فإنك لا تَحِلِّين له".لكن يؤيد صحة هذا الحرف كونُ القصة كانت بعد هدنة الحديبية كما تقدم بيانه عند الرواية السابقة، أي: بعد نزول آية تحريم المؤمنات على أزواجهم الكفار في سورة الممتحنة.
5111 - قال ابن إسحاق: وحدثني عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حَزْم، عن عَمْرة، عن عائشة: أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بعث إلى السَّرِيّة الذين أصابُوا مالَ أبي العاص، وقال لهم: "إنَّ هذا الرجلَ منا حيثُ قد علمتُم، وقد أصبتُم له مالًا، فإن تُحسِنوا تَردُّوا عليه الذي له، فإنا نُحبُّ ذلك، وإن أبَيتُم ذلك فهو فَيْء الله الذي أفاءه عليكم، فأنتم أحقُّ به" قالوا يا رسول الله، بل نَردُّه عليه. قال: فرَدُّوا عليه مالَه، حتى إنَّ الرجلَ ليأتي بالحَبْل ويأتي الرجلُ بالشَّنّة والإداوة، حتى إنَّ أحدَهم ليأتي بالشِّظاظ [1]، حتى رَدُّوا عليه مالَه بأسْرِه لا يَفقِدُ منه شيئًا، ثم احتَمَل إلى مكةَ، فأدّى إلى كُلّ ذِي مالٌ من قريشٍ مالَه ممَّن كان أبضَعَ معه، ثم قال: يا مَعشرَ قُريش، هل بقيَ لأحدٍ منكم عندي مالٌ لم يأخذْه؟ قالوا: لا، فجزاك اللهُ خيرًا، فقد وجدناك وفِيًّا كريمًا، قال: فإني أشهد أن لا إلهَ إِلَّا الله وأنَّ محمدًا عبدُه ورسولُه، وما مَنَعني من الإسلام عندَه إلَّا تخوُّفًا أن تَظُنُّوا أني إنما أردتُ أخذَ أموالِكم، فلما أدَّاها الله عز وجل إليكم، وفَرغْتُ منها أسلمتُ، ثم خرج حتى قدم على رسول الله صلى الله عليه وسلم [2].
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই যুদ্ধদলের কাছে লোক পাঠালেন, যারা আবুল আস-এর সম্পদ দখল করেছিল। তিনি তাদের বললেন: "তোমরা জানো, এই লোকটি আমাদেরই একজন। তোমরা তার কিছু সম্পদ লাভ করেছ। যদি তোমরা ভালো মনে করো এবং তার জিনিসপত্র তাকে ফিরিয়ে দাও, তবে আমরা তা পছন্দ করি। আর যদি তোমরা তা প্রত্যাখ্যান করো, তবে এটা আল্লাহর পক্ষ থেকে তোমাদের জন্য দেওয়া ফাই (যুদ্ধলব্ধ সম্পত্তি), এর ওপর তোমাদেরই বেশি অধিকার রয়েছে।" তারা বলল, হে আল্লাহর রাসূল! বরং আমরা তা তাকে ফিরিয়ে দেব। তিনি বললেন: সুতরাং তারা তার মাল ফিরিয়ে দিল। এমন অবস্থা হলো যে, একজন লোক দড়ি নিয়ে আসছিল, আরেকজন লোক পানির পুরাতন মশক ও চামড়ার পাত্র নিয়ে আসছিল, এমনকি তাদের কেউ কেউ একটি কাঁটাও (উটের হাওদার খুঁটি) নিয়ে আসছিল—এভাবে তারা তার সমস্ত মাল তাকে ফিরিয়ে দিল, যা থেকে কিছুই বাদ পড়েনি। এরপর (আবুল আস) মক্কা অভিমুখে যাত্রা করলেন। কুরাইশের মধ্যে যারা তার সাথে (ব্যবসার জন্য) মাল পাঠিয়েছিল, তিনি তাদের প্রত্যেকের মাল তাকে পরিশোধ করে দিলেন। এরপর তিনি বললেন: হে কুরাইশ সম্প্রদায়! তোমাদের মধ্যে কারো কি কোনো সম্পদ আমার কাছে বাকি আছে যা সে গ্রহণ করেনি? তারা বলল: না, আল্লাহ আপনাকে উত্তম প্রতিদান দিন! আমরা আপনাকে বিশ্বস্ত ও মহৎ পেয়েছি। তিনি বললেন: সুতরাং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল। (এর আগে) ইসলাম গ্রহণ করা থেকে আমাকে কেবল এই ভয়ই বাধা দিয়েছিল যে, তোমরা হয়তো মনে করবে আমি তোমাদের সম্পদ হস্তগত করার জন্যই (ইসলাম গ্রহণ করতে চেয়েছি)। কিন্তু যখন আল্লাহ তা‘আলা তোমাদের কাছে তোমাদের মাল পৌঁছিয়ে দিলেন এবং আমি তা থেকে মুক্ত হলাম, তখন আমি ইসলাম গ্রহণ করলাম। এরপর তিনি মক্কা থেকে বের হয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে উপস্থিত হলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] الشِّظاظ: العُودُ الذي يُدخَل في عُروة الجُوالِق، وهو الوعاء من جلود وثياب وغيرها. ويشهد له مرسل موسى بن عقبة عن الزهري عند البيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 174، ورجاله ثقات. لكن ليس فيه إسلام أبي العاص.ويشهد له بأجمعه مرسلُ الشعبي عند ابن هشام 1/ 659، وابن سعد في "طبقاته" 5/ 7، وابن عساكر 67/ 13 و 14. ورجاله ثقات.والشَّنّة: القِربة.والإداوة: إناء صغير من جلد يُتخذ للماء.
[2] إسناده رجاله لا بأس بهم، لكن المحفوظ فيه أنه عن ابن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حَزْم، مرسلًا، ليس فيه ذكر عَمْرة - وهي بنت عبد الرحمن بن سعْد بن زُرارة - ولا عائشة كما رواه سائر أصحاب ابن إسحاق عنه، وقد رواه المصنِّف على الصواب في "مغازي ابن إسحاق" بروايته كما رواه عنه البيهقي في "سننه الكبرى" 9/ 143، وفي "دلائل النبوة" 4/ 85، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 67/ 14، وقد أشار البيهقي في "سننه" 9/ 95 إلى ذلك التغاير في الوصل والإرسال بين رواية الحاكم في "مغازي ابن إسحاق" وبين روايته في "المستدرك" فيما يتعلق بقصة أبي العاص.وأخرجه على الصواب ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 67/ 12 من طريق رضوان بن أحمد الصيدلاني، عن أحمد عبد الجبار، عن يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر مرسلًا.وكذلك أخرجه ابن هشام في "السيرة النبوية" 1/ 658 عن زياد البكائي، والطبري في "تاريخه" 2/ 471 - 472 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، والطبراني في "الكبير" 22/ (1050) من طريق محمد بن سَلَمة الحرَّاني، كلهم عن ابن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر مرسلًا. ويشهد له مرسل موسى بن عقبة عن الزهري عند البيهقي في "دلائل النبوة" 4/ 174، ورجاله ثقات. لكن ليس فيه إسلام أبي العاص.ويشهد له بأجمعه مرسلُ الشعبي عند ابن هشام 1/ 659، وابن سعد في "طبقاته" 5/ 7، وابن عساكر 67/ 13 و 14. ورجاله ثقات.والشَّنّة: القِربة.والإداوة: إناء صغير من جلد يُتخذ للماء.
5112 - قال ابن إسحاق: فحدثني داود بن الحُصين، عن عِكْرمة، عن ابن عباس، قال: ردَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم زينب بالنكاحِ الأول، لم يُحدِثْ شيئًا بعد ستِّ سنين [1].ثم إنَّ أبا العاص رَجَعَ إلى مكة بعدما أسلم، فلم يشهد مع النبي صلى الله عليه وسلم مَشهدًا، ثم قَدِمَ المدينةَ بعد ذلك فتُوفّي في ذي الحِجّة من سنة اثنتي عشرة، في خلافة أبي بكر رضي الله عنه، وأَوصى إلى الزُّبير بن العَوّام رضي الله عنه [2]. ذكرُ مناقب ضِرار بن الأزوَر الأسَدي الشاعر رضي الله عنه -
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রথম বিবাহের ভিত্তিতেই যায়নাবকে (স্বামী আবু আল-আস এর কাছে) ফিরিয়ে দেন। ছয় বছর পর নতুনভাবে (মোহরানা বা চুক্তি) কিছুই নির্ধারণ করেননি। অতঃপর আবু আল-আস ইসলাম গ্রহণের পর মক্কায় ফিরে যান। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কোনো যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেননি। এরপর তিনি মাদীনায় আগমন করেন এবং হিজরী বারো সনে যুল-হাজ্জা মাসে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে ইন্তেকাল করেন। তিনি যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ওসিয়ত করেছিলেন। কবি দিরাব ইবনুল আযওয়ার আল-আসাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর গুণাবলী আলোচনা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسنٌ.وأخرجه الترمذي (1143) عن هناد بن السري، عن يونس بن بكير، بهذا الإسناد. وقال: حديث ليس بإسناده بأس.وقد تقدم برقم (2847) وسيأتي برقم (7018) من طريق يزيد بن هارون، وسيأتي كذلك برقم (6839) من طريق أحمد بن خالد الوهبي، كلاهما عن محمد بن إسحاق. لكن قال يزيد بن هارون في روايته: بعد سنتين، وخالفه غيره من أصحاب ابن إسحاق، فقالوا: بعد ستِّ سنين.
[2] هذه الفقرة في رجوع أبي العاص بعدما أسلم حتى وفاته ووصيته للزبير من قول ابن إسحاق كما توضحه رواية البيهقي في "سننه الكبرى" 9/ 15، ومن طريق البيهقي رواه ابن عساكر 21/ 67 - 22 عن أبي عبد الله الحاكم بسنده هذا الذي هنا.ووافقه عليه الواقديُّ كما عند ابن عساكر 67/ 21 فرواه عن صالح بن كيسان وعيسى بن معمر.
5113 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحَسن بن الجهم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، عن شُيوخه: أنَّ ضِرار بن الأَزْوَر الشاعر، اسمُ الأزْوَر مالكُ بن أوسِ بن جَذِيمة [1] بن رَبيعة بن مالك بن ثعلبة بن أسَد بن خُزيمة، وكان ضرارٌ فارسًا شاعرًا، شهد يوم اليَمامة، فقاتل أشدَّ القِتال حتى قُطِعت ساقاهُ جميعًا، فجعل يَجثُو على رُكبتَيه ويُقاتِل وتطؤُه الخيلُ حتى غَلَبَه الموتُ.
মুহাম্মাদ ইবনু উমর থেকে বর্ণিত, তাঁর শায়খগণ (শিক্ষকগণ) বলেছেন যে, দি'রার ইবনুল আযওয়ার, যিনি কবি ছিলেন, আযওয়ারের আসল নাম হলো মালিক ইবনু আওস ইবনু জাযীমা ইবনু রাবী'আ ইবনু মালিক ইবনু সা'লাবা ইবনু আসাদ ইবনু খুযাইমা। আর দি'রার ছিলেন একজন অশ্বারোহী (বীর) এবং কবি। তিনি ইয়ামামার যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন এবং চরমভাবে যুদ্ধ করেছিলেন। এমনকি তার উভয় পা সম্পূর্ণ কেটে ফেলা হয়েছিল। এরপর তিনি হাঁটু গেড়ে যুদ্ধ করতে লাগলেন এবং ঘোড়াগুলো তাকে মাড়িয়ে দিচ্ছিল। অবশেষে মৃত্যু তাকে পরাভূত করে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: خزيمة، بالزاي بدل الذال، وانظر "اللباب في تهذيب الأنساب" لأبي الحسن عز الدين بن الأثير نسبة (الجَذَمي).
5114 - أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل الشَّعْراني، حدثنا جَدّي، حدثنا إبراهيم بن المنذر الحِزامي، حدثنا محمد بن فُليح، عن موسى بن عُقبة، عن ابن شِهاب، قال: قُتل ضِرارُ بن الأَزْوَر الأسَدي يومَ أَجْنادِينَ [1].
ইবনু শিহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: দিরাব ইবনুল আযওয়ার আল-আসাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আজনাদাইনের দিনে নিহত হন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، وهذا أولى من قاله الواقدي في الرواية السابقة، وقد وافق ابنَ شهاب عليه عروةُ بنُ الزبير عند ابن عساكر 24/ 390 و 391، ولهذا قال أبو نعيم في "معرفة الصحابة" بين يدي (3889): هو الصحيح.وأخرجه ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه الكبير" (1164)، وابن عساكر 24/ 391 من طرق عن إبراهيم بن المنذر، به.وأخرجه ابن عساكر 24/ 390 - 391 من طريق إسماعيل بن إبراهيم بن عقبة، عن عمه موسى بن عقبة من قوله.
5115 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبَهاني، حدثنا محمد بن الحَسَن [1] بن علي بن البَرِّي، حدثنا أبي، حدثنا ابن المبارك، حدثنا الأعمش، عن يعقوب بن بَحِير، عن ضرار بن الأزْوَر قال: أتيتُ النبيّ صلى الله عليه وسلم بلَقُوحٍ من أهلي، فقال لي: "احلُبْها" فذهبتُ لأُجْهدَها، فقال: "لا تُجهِدْها، دَعْ داعيَ اللَّبَنِ" [2].صحيح الإسناد، ولا نحفظ لضرارٍ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم غيرَ هذا.فأما فضيلتُه، فدعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم له لما أنشدَه قصيدتَه التي:
দি'রার ইবনুল আযওয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আমার পরিবারের একটি দুধালো পশু নিয়ে এসেছিলাম। তিনি আমাকে বললেন: "তুমি সেটির দুধ দোহন করো।" অতঃপর আমি (সবটুকু দুধ বের করার জন্য) তাকে জোরেশোরে চেষ্টা করতে গেলাম। তখন তিনি বললেন: "তাকে কষ্ট দিও না (বা তার ওপর চাপ সৃষ্টি করো না), দুধের অবশিষ্ট অংশ (যা আবার দুধকে পূর্ণ করবে) রেখে দাও।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا وقع عند المصنف في هذا الموضع روايتُه عن أبي عبد الله محمد بن عبد الله الزاهد الأصبهاني - وهو الصفّار - عن محمد بن الحسن علي بن البَرِّي - وهو ابن بحر البَرِّي - عن أبيه، والمحفوظ في سائر رواياته عن أبي عبد الله الصفّار عن الحسن بن علي بن بحر - والد محمد - عن أبيه علي بن بحر، وهذا هو الصواب، فإن الحسن بن علي لم يدرك ابنَ المبارك قطعًا، إذ توفي ابن المبارك سنة إحدى وثمانين ومئة، وتوفي الحسن سنة ثمانين ومئتين كما أرّخه الذهبي في "تاريخ الإسلام"، ونقل مغلطاي عن مسلمة بن قاسم أنه أرّخ وفاته سنة ثمان وسبعين ومئتين، إذًا فبين وفاتيهما سبعةٌ وتسعون عامًا على أقل تقدير، وإلّا فتسعة وتسعون عامًا، وأما علي بن بحر فلا شك بإدراكه لابن المبارك.
[2] مرفوعه حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات غير يعقوب بن بَحير، فلا يُعرف، وقد اختُلف في تعيين التابعي على الأعمش كما تقدَّم بيانه برقم (2397).
5116 - حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو عمر أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن محمد بن إسحاق، أخبرني داود بن الحُصين، عن عِكْرمة، عن ابن عباس: أنَّ ضِرار بن الأزْوَر لما أسلَمَ أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فأنشأَ يقول:تركتُ القِداحَ وعَزْفَ القِيَا … نِ والخمرَ تصْلِيةً وابتِهالاوكَرُّ المُحبَّرِ في عُمْرةٍ … وجَهدِي على المشركين القِتالاوقالت جميلةُ: بَدَّدْتَنا … وطَرَّحتَ أهْلَكَ شَتَّى شِلالافيا ربِّ لا أُغْبَنَنْ صَفْقَتي … فقد بِعتُ أهلي ومالي بِدَالافقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما غُبِنتَ صَفْقتك يا ضِرارُ" [1]. ذكرُ مناقب أبي كَبْشة مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, দিরার ইবনুল আযওয়ার যখন ইসলাম গ্রহণ করলেন, তখন তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বলতে শুরু করলেন: আমি জুয়ার তীর, বাদ্যযন্ত্রের আওয়াজ এবং মদ ত্যাগ করেছি, (আল্লাহর) সন্তুষ্টি লাভের ও তাঁর কাছে কাকুতি-মিনতি করার উদ্দেশ্যে। আর আমার উত্তম যুদ্ধ (আল্লাহর পথে) এবং মুশরিকদের বিরুদ্ধে জিহাদে আমার সকল প্রচেষ্টা। আর জামীলা (আমার স্ত্রী) বলল: ‘তুমি আমাদেরকে বিচ্ছিন্ন করে ফেলেছ এবং তোমার পরিবারকে বিক্ষিপ্তভাবে ছড়িয়ে দিয়েছ।’ হে আমার প্রতিপালক, আমার এই বেচা-কেনায় যেন লোকসান না হয়, কারণ আমি আমার পরিবার ও সম্পদ (দ্বীনের বিনিময়ে) বিক্রয় করে দিয়েছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে দিরার, তোমার এই বেচা-কেনায় কোনো ক্ষতি হয়নি।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.وسيأتي عند المصنف برقم (6747) من طريق أخرى ضعيفة عن ضرار.قوله: تركت القِداح، أي: السَّهام التي كانوا يستكشفون بها الغيب.والقِيان: المغنيات من الجواري.وتَصْليةً، أي: استغفارًا.وابتهالًا: تضرعًا الله تعالى.والمحبَّر: اسم فرس ضرار بن الأزور.وبَدَّدتَنا: فَرَّقتَنا.وشِلالًا: أي: مطرودين.
5117 - أخبرني أبو سعيد أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا موسى بن زكريا التُّستَري، حدثنا خَليفة بن خَيّاط العُصفُري، قال: مات أبو كَبْشةَ مولى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم سنةَ ثلاثَ عشرةَ [1].
খলীফা ইবনে খাইয়্যাত থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম আবু কাবশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ত্রয়োদশ (১৩) হিজরী সনে ইন্তিকাল করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا وقع في نسخنا الخطية، وهو خطأ، فقد جاء هذا الخبر في "تاريخ خليفة بن خياط" ص 156 وفيه تأريخ وفاة أبي كبشة سنة ثلاث وعشرين، وكذلك رواه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 298 من طريق أبي الحسن أحمد بن عمران بن موسى الأُشناني، عن موسى بن زكريا التُّستَري، عن خليفة.
5118 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحُسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، عن شيوخه، قالوا: أبو كَبْشة مولى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم اسمُه سُلَيم، وكان من مُولَّدي أرض دَوْس، شهدَ أبو كَبْشة مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بدرًا وأُحدًا والمَشاهدَ كلَّها.وتوفي أولَ يوم استُخلِف فيه عمرُ بن الخطّاب، وذلك يومَ الثلاثاء لثَمانِ ليالٍ بَقِين من جُمادى الأولى سنة ثلاثَ عشرةَ من الهجرة [1].
আবু আব্দুল্লাহ আল-আসবিহানী আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, হাসান ইবনুল জাহম আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, হুসাইন ইবনুল ফারাজ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, মুহাম্মাদ ইবনে উমার তাঁর শায়খগণ থেকে বর্ণনা করেছেন, তাঁরা বলেছেন: আবু কাবশা, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুক্ত দাস (মাওলা), তাঁর নাম ছিল সুলাইম। তিনি দাউস অঞ্চলের মুয়াল্লাদী (সেখানে জন্মগ্রহণকারী) ছিলেন। আবু কাবশা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদর, উহুদ এবং সকল যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেন। তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফত গ্রহণের প্রথম দিনেই ইন্তেকাল করেন। তা ছিল হিজরতের তেরোতম বছর জুমাদাল ঊলা মাসের আট রাত বাকি থাকতে মঙ্গলবার দিন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "الطبقات الكبرى" لابن سعد 3/ 46 عن محمد بن عمر الواقدي من قوله هو، غير تسمية أبي كبشة، وكونه من مولّدي أرض دوس، فذكرها ابن سعد من قوله لم ينسبها لشيخه الواقدي.وقد ذكر مصعب بن عبد الله الزبيري كما في "تاريخ دمشق" 4/ 98، مثل قول الواقدي هذا. ووفاة أبي كبشة في هذا التاريخ هو قول سائر أصحاب التراجم الذين أرّخوا وفاته، خلافًا لقول خليفة الذي انفرد به بالقول بأنه توفي في سنة ثلاث وعشرين.
5119 - Null