আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5119 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، حدثنا أبو الأسود، عن عُروة بن الزُّبَير، قال: وكان ممَّن شهد بدرًا من بني هاشم بن عبد مَنَاف أبو كَبْشة مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم. ذكرُ مناقب طُلَيب بن عُمير بن وَهْب بن كَثير بن عبد بن قُصَيّيُكنى أبا عَدِيّ، وكان من مُهاجِرة الحَبَشة في قول جميع أهل السِّير، وشهد بدرًا، وقتل يوم أَجنادين بالشام شهيدًا في جمادى الأولى سنة ثلاثَ عشرةَ، وهو ابن خمس وثلاثين سنة.
উরওয়াহ ইবন যুবাইর থেকে বর্ণিত, বানূ হাশিম ইবন আবদ মানাফ গোত্রের যারা বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন, তাদের মধ্যে ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম আবু কাবশাহ। (এরপর) তুলাইব ইবন উমাইর ইবন ওয়াহব ইবন কাছীর ইবন আব্দ ইবন কুসাই-এর গুণাবলী আলোচনা (করা হয়েছে), যার কুনিয়াত ছিল আবূ আদী। সীরাতশাস্ত্রের সকল বিশেষজ্ঞের মতে, তিনি আবিসিনিয়ার (হাবশা) মুহাজিরদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন এবং তিনি বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেন। এবং তেরো সনের জুমাদাল ঊলা মাসে শাম (সিরিয়া)-এর আজনাদাইন যুদ্ধে তিনি শহীদ হন। তখন তার বয়স ছিল পঁয়ত্রিশ বছর।
5120 - حدثنا بجميع ذلك أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، عن شُيوخه [1].
৫১২০ - আমাদের কাছে এই সব বর্ণনা করেছেন আবূ আব্দুল্লাহ আল-ইসফাহানী, বর্ণনা করেছেন হাসান ইবনুল জাহম, বর্ণনা করেছেন হুসাইন ইবনুল ফারাজ, বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু উমর, তাঁর শায়খদের [১] সূত্রে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "الطبقات الكبرى" لابن سعد 3/ 115 عن محمد بن عمر الواقدي، عن عبد الله بن جعفر، عن إسماعيل بن محمد بن سعد ومحمد بن عبد الله بن عمرو قالا. وعن محمد بن عمر الواقدي، عن قدامة بن موسى، عن عائشة بنت قدامة، قالوا … فذكروا مقتل طُليب بن عُمير ومكانه وسنّه إذّاك.وأما شهود طُليب بدرًا فهو عند ابن سعد 3/ 114 عن الواقدي، ثم قال ابن سعد: ولم يذكره موسى بن عقبة ومحمد بن إسحاق وأبو معشر ممن شهد بدرًا. كذا قال، مع أن موسى بن عقبة ذكره عن الزهري فيمن شهد بدرًا كما أخرجه عنه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (345).وقال ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 362: شهد بدرًا في قول ابن إسحاق والواقدي، وقد سقط في بعض الروايات عن ابن إسحاق.وذكره فيمن شهد بدرًا كذلك الكلبي في "جمهرة أنساب العرب"، ومصعب بن عبد الله الزبيري في "نسب قريش"، والزبير بن بكار كما في "تاريخ دمشق" 25/ 142 و 143، فالأكثرون إذًا على شهود طُليب بدرًا.وأما كونه من مهاجرة الحبشة، فقال ابن سعد 3/ 114: ذكروه جميعًا من مهاجرة الحبشة في الهجرة الثانية موسى بن عقبة ومحمد بن إسحاق وأبو معشر ومحمد بن عمر، وأجمعوا على ذلك.قلنا: ذكره ابن إسحاق كما في "السيرة النبوية" لابن هشام 1/ 324، وموسى بن عقبة ذكره عن الزهري عند أبي نعيم في "معرفة الصحابة" (3977).وذكر موسى بن عقبة أيضًا عن الزهري عند أبي نعيم في "المعرفة" (3977): أنَّ طليبًا قُتل يوم أجنادين، وكذلك قال عروة وابن إسحاق عند ابن عساكر 25/ 146 و 147. وخالفهم مصعبٌ الزبيري في نسب قريش" ص 257، فقال: استشهد يوم اليرموك، ورواه كذلك الطبري في "تاريخه" 3/ 402 عن سيف بن عمر، عن أبي عثمان يزيد بن أسيد الغَسّاني وشيخ آخر اسمُه خالد.
5121 - أخبرنا محمد بن المُؤمَّل بن الحسن، حدثنا الفضْل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا إسحاق بن محمد الفَرْوي، حدثنا موسى بن محمد بن إبراهيم بن الحارث التَّيمي، حدثني أبي، عن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن، قال: أسلمَ طُلَيب بن عُمَير في دار الأرقم، ثم خرج فدخل على أمّه، وهي أرْوى بنت عبد المُطَّلب، فقال: تَبعتُ محمدًا وأسلمتُ لله رب العالمين، فقالت أمُّه: إن أحقَّ من وَازرْتَ ومن عاضَدْتَ ابنُ خالك، والله لو كنا نقدِرُ على ما يَقدِرُ عليه الرجالُ لتَبِعناهُ، ولذَيَبنا عنه، قال: فقلتُ: يا أماه، وما يمنعُك أن تُسلِمِي وتَتّبعيه؟! فقد أسلم أخوك حمزة! فقالت: أنظُرُ ما يصنعُ أخَواتي ثم أكونُ إحداهُن، قال: قلتُ: أسألُك باللهِ إلَّا أتيتيهِ فسلّمتِ عليه وصدقتِيهِ، وشهدتِ أنَّ لا إله إلَّا الله، قالت: فإني أشهدُ أن لا إله إلَّا الله وأشهد أنَّ محمدًا رسولُ الله، وكانت بعد تعضُد النبيَّ صلى الله عليه وسلم بلسانها [1]، وتَحُضُّ ابنَها على نُصرتِه وبالقيام بأمرِه [2].صحيح غريب على شرط البخاري، ولم يُخرجاه. ذكرُ مناقب عمرو بن سعيد بن العاص بن أُميّة بن عبد شَمْس بن عبد مَنَاف
আবূ সালামাহ ইবনু আব্দুর রহমান থেকে বর্ণিত, তুলাইব ইবনু উমাইর আরকামের গৃহে ইসলাম গ্রহণ করলেন। এরপর তিনি বের হয়ে তাঁর মা আরওয়া বিনত আব্দুল মুত্তালিবের কাছে গেলেন এবং বললেন: আমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অনুসরণ করেছি এবং বিশ্বজগতের রব আল্লাহর প্রতি ঈমান এনেছি। তাঁর মা বললেন: তুমি যার সাহায্য ও সমর্থন করেছ, তিনি তোমার খালাতো ভাই। আল্লাহর কসম! পুরুষরা যা করতে পারে, যদি আমরা নারীরা তা করতে পারতাম, তাহলে অবশ্যই আমরাও তাঁকে অনুসরণ করতাম এবং তাঁকে রক্ষা করতাম। (তুলাইব) বললেন: হে আম্মা! আপনি ইসলাম গ্রহণ করতে ও তাঁকে অনুসরণ করতে কিসে বাধা দিচ্ছে? আপনার ভাই হামযাও তো ইসলাম গ্রহণ করেছেন! তিনি বললেন: আমি আমার অন্যান্য বোনরা কী করে তা দেখতে চাই, এরপর আমিও তাদের মধ্যে একজন হব। (তুলাইব) বললেন: আমি আপনাকে আল্লাহর শপথ দিয়ে বলছি, আপনি যেন অবশ্যই তাঁর কাছে গিয়ে তাঁকে সালাম করেন এবং তাঁকে সত্য বলে সাক্ষ্য দেন এবং সাক্ষ্য দেন যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই। তিনি বললেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল। এরপর থেকে তিনি (আরওয়া) তাঁর জিহ্বা দিয়ে নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সাহায্য করতেন এবং তাঁর পুত্রকে তাঁর সাহায্য করার ও তাঁর নির্দেশ পালনে উদ্যোগী হওয়ার জন্য উদ্বুদ্ধ করতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب) رُسمت هكذا: "سالها"، وضُبِّب فوقها في (ز) وهي محرفة عن "بلسانها"، فقد أورد ابن سعد 3/ 114 هذا الخبر، فقال فيه: "بلسانها" وكذلك نقله عن ابن سعد غير واحد، وتُرك موضعها في (ص) و (م) و (ع) بياضًا.
[2] إسناده ضعيف لضعف موسى بن محمد بن إبراهيم بن الحارث التَّيمي، وإسحاق بن محمد الفَرْوي ليّنُ الحديث، لكن تابعه محمد بن عمر الواقدي عند ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 3/ 114 و 10/ 42، غير أنَّ الواقدي لم يذكر في إسناده أبا سلمة بن عبد الرحمن، فجعله من مرسل محمد ابن إبراهيم التيمي.وسيذكر المصنِّف إسلامَ أروى بنت عبد المطلب برقم (7041) و (7053) عن أبي عبد الله الواقدي، وأسند عنه خبرًا يدل على ذلك فيُرجَع إليه.
5122 - Null
5122 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن، حدثنا الحُسين، حدثنا محمد بن عمر، قال عمرو بن سعيد بن العاص بن أميَّة بن عبد شمس بن عبد مَناف.
৫১২২ - আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আবু আবদুল্লাহ আল-আসবাহানী, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আল-হাসান, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আল-হুসাইন, আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু উমর, তিনি বলেন, আমর ইবনু সাঈদ ইবনু আল-আস ইবনু উমাইয়া ইবনু আবদ শামস ইবনু আবদ মানাফ।
5123 - فحدّثني عبدُ الحكيم بن عبد الله بن أبي فَرْوة، عن عبد الله بن عمرو بن سعيد بن العاص، قال: لما أسلم خالد بن سعيد وصنَع به أبوه أبو أحَيْحةَ ما صنَع، فلم يَرجِعْ عن دِينِهِ ولَزِمَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكان ابنُه عمرو بنُ سعيد على دِينِه، فلما أسلم عَمرو ولَحِق بأخيه خالدٍ بأرضِ الحبَشة ومعه امرأتُه فاطمة بنت صفوان بن أُميَّة [1].
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে সাঈদ ইবনে আল-আস থেকে বর্ণিত, যখন খালিদ ইবনে সাঈদ ইসলাম গ্রহণ করলেন এবং তার পিতা আবু উহায়হা তার সাথে যা করার তা করলেন, এরপরও সে তার দ্বীন থেকে বিচ্যুত হলো না এবং আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে লেগে রইল। আর তার (আবু উহায়হার) পুত্র আমর ইবনে সাঈদ তখনও তার (পিতার পূর্ব) ধর্মে ছিল। অতঃপর যখন আমর ইসলাম গ্রহণ করলেন এবং হাবশার ভূমিতে তাঁর ভাই খালিদের সাথে মিলিত হলেন, তখন তার সাথে ছিলেন তাঁর স্ত্রী ফাতিমা বিনত সাফওয়ান বিন উমাইয়াহ।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ورواه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 4/ 89 و 94 عن شيخه محمد بن عمر الواقدي، بإسناده هذا. وعبدُ الحكيم بن عبد الله بن أبي فَرْوة لا بأس به، وشيخه عبد الله بن عمرو بن سعيد بن العاص مجهول لا يُعرف، وليس هو ابنًا لصاحب الترجمة كما قد يتبادر إلى الذهن، فصاحب الترجمة ليس له عَقِبٌ كما نصَّ عليه ابن سعد وغيره، فقد يكون من أحفاد أحد إخوته.وقد روى محمد بن عمر الواقدي قصة أبي أُحيحة سعيد بن العاص بن أمية مع ابنه خالد بن سعيد لما أسلم بأبسط مما هنا بإسناد آخر سيأتي عند المصنف برقم (5160).وخبر إسلام خالد بن سعيد بن العاص وأخيه عمرو وهجرتهما إلى الحبشة مشهور عند أهل المغازي والسير.وروى ابن سعد 4/ 90 قصة إسلام عمرو بن سعيد وهجرته للحبشة مع امرأته فاطمة بنت صفوان عن محمد بن عمر الواقدي، عن جعفر بن محمد بن خالد بن الزبير بن العوام، عن محمد بن عبد الله بن عثمان بن عفان معضلًا. في "الطبقات" لابن سعد 4/ 95 عن محمد بن عمر - وهو الواقدي - بسنده هذا الذي هنا. وفي "تاريخ دمشق" لابن عساكر 46/ 21، وفي "أسد الغابة" 3/ 727: بيسير.
5124 - قال محمد بن عمر: وحدثني جعفر بن محمد بن خالد، عن إبراهيم بن عُقبة، عن أم خالد بنت خالد قالت: قَدِمَ علينا عمِّي عمرو بن سعيد أرضَ الحبشة بعد مَقدم أبي بسنَتين [1] فلم يَزلْ هُنالِك، حتى حُمل في السفينتَين مع أصحابِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقَدِمُوا على النبيِّ صلى الله عليه وسلم وهو بخَيبر سنةَ سبعٍ من الهجرة، فشهِد عَمرو مع النبيِّ صلى الله عليه وسلم الفتحَ وحُنين [2] والطائفَ وتَبوكَ، فلما خرج الجنودُ [3] إلى الشام كان فيمن خرج، فقُتل يوم أجْنادين شهيدًا في خلافة أبي بكر الصّدّيق في جُمادى الأولى سنة ثلاثَ عشرةَ، وكان على الناس يومئذ عمرو بن العاص [4].
উম্মু খালিদ বিনতে খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার চাচা আমর ইবনু সাঈদ আমার পিতার [খালিদের] আগমনের দুই বছর পর হাবশার (আবিসিনিয়া) ভূমিতে আমাদের কাছে আগমন করেন। তিনি সেখানেই অবস্থান করতে থাকলেন, যতক্ষণ না তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের সাথে দুটি নৌকায় আরোহণ করে [মদীনার উদ্দেশে] যাত্রা করলেন। অতঃপর তাঁরা হিজরতের সপ্তম বছরে, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারে ছিলেন, তখন তাঁর নিকট আগমন করলেন। তখন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মক্কা বিজয়, হুনাইন, তায়িফ ও তাবুক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেন। অতঃপর যখন সৈন্যরা শামের (সিরিয়া) উদ্দেশ্যে রওয়ানা হলো, তখন তিনিও তাদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। তিনি আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে ত্রয়োদশ হিজরির জুমাদাল ঊলা মাসে আজনাদাইন দিবসে শহীদ হিসেবে নিহত হন। আর সেই দিন (যুদ্ধের) নেতৃত্ব দিচ্ছিলেন আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: سفيان، وأثبتناه على الصواب من (ص) و (م)، وهو الموافق لما في "الطبقات" لابن سعد 4/ 95 عن محمد بن عمر - وهو الواقدي - بسنده هذا الذي هنا. وفي "تاريخ دمشق" لابن عساكر 46/ 21، وفي "أسد الغابة" 3/ 727: بيسير.
[2] كذلك جاءت في نسخنا الخطية: حنين، ممنوعة من الصرف للتأنيث، على إرادة الواقعة، ويجوز أن تكون على لغة ربيعة وغَنْم بأن تكون منصوبة في اللفظ إلّا أنها تكتب بغير ألف للنصب.
5124 [3] - في (ز) و (ع) و (ب): اليهود، والظاهر أنها تحريف عن الجنود، إذ لا معنى لذكر اليهود هنا، وكأنها كانت كذلك في (ص) ثم صوّبت إلى الجدود، وكذلك كانت في (م) ثم صوِّبت إلى الجنود، وهذا هو المناسب للمقام، وفي "الطبقات الكبرى" لابن سعد: فلما خرج المسلمون.
5124 [4] - قد اختُلف في زمن وموضع استشهاد عمرو بن سعيد العاص، فبعضهم قال: استشهد يوم أجنادين، وبعضم قال: يوم مرج الصُّفّر، وبعضهم قال: يوم اليرموك. انظر الخلاف في ذلك في "تاريخ دمشق" 46/ 21 - 24 وإن كان الأكثرون على أنه قتل يوم أجنادين.
5125 - أخبرنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى المُزكِّي، حدثنا محمد بن إسحاق الثقفي، حدثنا محمد بن عمرو الباهلي، حدثنا الأصمَعي، قال: كان خالدُ بن سعيد وأبان بن سعيد وعمرو بن سعيد من أهل السَّوابق في الإسلام، وأُحيحةُ والعاصُ ابنا سعيد بن العاص قُتِلا يومَ بدرٍ كافِرَين.وإنما قتلَهما جميعًا علي بن أبي طالب، لِمَا ذكرتُه في ذكر خالِد بن سعيد [1]. ذكرُ مناقب هشام بن العاص بن وائل السَّهْمي رضي الله عنه -
আল-আসমাঈ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খালিদ ইবনু সাঈদ, আবান ইবনু সাঈদ এবং আমর ইবনু সাঈদ ইসলামের অগ্রবর্তীদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। আর উহায়হা এবং আল-আস, উভয়েই সাঈদ ইবনুল আসের পুত্র, তারা কাফির অবস্থায় বদরের দিন নিহত হয়েছিল। আমি খালিদ ইবনু সাঈদের জীবনীতে যা উল্লেখ করেছি, তদনুসারে আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের উভয়কে হত্যা করেছিলেন। হিশাম ইবনুল আস ইবনু ওয়ায়েল আস-সাহমীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গুণাবলী আলোচনা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 28 بذكر عمرو بن سعيد وحده.
5126 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا موسى بن زكريا التُّستَري، حدثنا خَليفة بن خَيّاط، قال: هشام بن العاص أمُّه [أمّ] [1] حَرْملة بنت هشام بن المغيرة بن عبد الله بن عُمر بن مَخزُوم.
খলীফা ইবনে খাইয়্যাত থেকে বর্ণিত, তিনি (খলীফা) বলেন: হিশাম ইবনুল আসের মাতা হলেন হারমালা বিনত হিশাম ইবনুল মুগীরাহ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে উমার ইবনে মাখযূম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظة "أم" سقطت من نسخنا الخطية، وأثبتناها من "طبقات خليفة" ص 26 و 299.
5127 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، عن شُيوخه، قالوا: هشام بن العاص [بن وائل] [1] بن هاشم [2] بن سُعَيد [3] بن سَهْم، وأمّه حرملة بنت هشام بن المُغيرة، وكان هشامٌ قديمَ الإسلام بمكةَ قبل أخيه عمرو، وهاجر إلى أرضِ الحبشة، ثم قدم مكةَ حين بلغه مُهاجَرُ النبيّ صلى الله عليه وسلم إلى المدينة، وأراد اللَّحَاق به فحبَسه أبوه وقومُه بمكةَ، حتى قدِم بعد الخندق على النبي صلى الله عليه وسلم المدينةَ، فشَهِد ما بعد بعد ذلك من المَشاهد كلِّها، وكان أصغر سِنًّا من أخيه عَمرو بن العاص.
হিশাম ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শায়খগণ বলেন: তিনি হলেন হিশাম ইবনুল আস ইবনু ওয়াইল ইবনু হাশিম ইবনু সাঈদ ইবনু সাহ্ম। তাঁর মা ছিলেন হারমালা বিনত হিশাম ইবনুল মুগীরা। হিশাম তাঁর ভাই আমর-এর পূর্বে মক্কায় প্রাচীনকালে ইসলাম গ্রহণ করেন। তিনি আবিসিনিয়ার (হাবশা) ভূমিতে হিজরত করেন। অতঃপর যখন তিনি জানতে পারেন যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনায় হিজরত করেছেন, তখন তিনি মক্কায় ফিরে আসেন। তিনি তাঁর সাথে মিলিত হতে চেয়েছিলেন, কিন্তু তাঁর পিতা ও তাঁর গোত্রের লোকেরা তাঁকে মক্কায় আটকে রাখে। শেষ পর্যন্ত তিনি খন্দকের যুদ্ধের পর মদীনায় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করেন। এরপর তিনি এর পরবর্তী সকল যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেন। তিনি তাঁর ভাই আমর ইবনুল আসের চেয়ে বয়সে ছোট ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذه الزيادة من "طبقات ابن سعد" 4/ 178. والآخر محتمل للتحسين فهذا هو الثبتُ في استشهاد هشام بن العاص أنه كان يوم اليرموك. والله تعالى أعلم.
[2] تحرّف في نسخنا الخطية إلى: هشام، وصوَّبناه من مصادر الترجمة والأنساب. والآخر محتمل للتحسين فهذا هو الثبتُ في استشهاد هشام بن العاص أنه كان يوم اليرموك. والله تعالى أعلم.
5127 [3] - تحرَّف في (ز) و (م) و (ب) إلى: سعْد، وضُبط في (ص) سَعيد بفتح العين دلالة على أنه تصغير سعْد، وهو الموافق لما ضبطه به الدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 3/ 1188، وقال ابن ماكولا في "الإكمال" 4/ 304: اسمه سَعيد، بفتح السين وكسر العين، وقريش تُصغِّره فتسميه سُعَيدًا تصغير سعْد. والآخر محتمل للتحسين فهذا هو الثبتُ في استشهاد هشام بن العاص أنه كان يوم اليرموك. والله تعالى أعلم.
5128 - قال ابن عمر: فحدثَني ثَور بن يَزيد، عن خالد مَعْدان، قال: لما بن انهزمتِ الرُّومُ يومَ أجنادينَ انتهَوا إلى موضعٍ ضَيِّق لا يَعبُرُ إلَّا إنسانٌ إنسانٌ، فجعلتِ الرومُ تُقاتل عليه، وقد تَقدَّمُوه وعَبَروه، فتقدّم هشامُ بن العاص بن وائل فقاتَلَهم عليه حتى قُتِل، وذلك في أول خِلافة عُمر بن الخطاب سنة ثلاثَ عشرةَ [1].
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে সাওব ইবনে ইয়াযিদ খালিদ মা'দানের সূত্রে বর্ণনা করেছেন যে, যখন আজনাদাইন যুদ্ধের দিন রোমানরা পরাজিত হলো, তখন তারা এমন এক সংকীর্ণ স্থানে গিয়ে পৌঁছাল যেখানে কেবল একজন একজন করেই পার হওয়া যেত। রোমানরা সেখানে যুদ্ধ করতে শুরু করল, অথচ মুসলিমরা আগেই সে স্থান অতিক্রম করে চলে গিয়েছিল। তখন হিশাম ইবনে আল-আস ইবনে ওয়াইল এগিয়ে গেলেন এবং সেখানে তাদের সাথে যুদ্ধ করলেন, শেষ পর্যন্ত তিনি শহীদ হলেন। আর এটি ছিল উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের প্রথম দিকে, ত্রয়োদশ হিজরি সনে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "الطبقات الكبرى" لابن سعد 4/ 180 عن محمد بن عمر الواقدي، بإسناده هذا، وهو مرسل.لكن ثبت بإسناد أصحّ من هذا عن أبي جهم بن حذيفة - وهو صحابي - عند ابن المبارك في "الجهاد" (116)، وفي "الزهد" (525) - ورواه غير واحدٍ من طريق ابن المبارك: أنَّ هشام بن العاص استُشهد يوم اليرموك. وإسناده صحيح.وثبت كذلك عن عمرو بن العاص أخي هشام أنَّ أخاه هشامًا استُشهد يوم اليرموك، كما رواه ابن سعد 4/ 179، والبخاري في "التاريخ الأوسط" 1/ 360، وغيرهما بإسنادين أحدهما صحيح والآخر محتمل للتحسين فهذا هو الثبتُ في استشهاد هشام بن العاص أنه كان يوم اليرموك. والله تعالى أعلم.
5129 - حدثنا أبو بكر أحمد بن كامل بن خَلَف القاضي، خَلَف القاضي، حدثنا محمد بن سعد العَوْفي، حدثنا أبي، حدثنا مَخْرَمة بن بُكَير بن الأشَجِّ، عن أم بكر بنت المِسوَر بن مَخْرمة، قالت: كان هشامُ بن العاص بن وائل رجلًا صالحًا، رأى يوم أجْنادِينَ من المسلمين بعضَ النُّكُوص عن عَدوّهم، فألقى المِغفَر، ثم قال: يا معشرَ المسلمين، إن هؤلاء الغُلْفانَ لا صَبْرَ لهم على السَّيف، فاصنَعُوا كما أصنَعُ، قال: فجعل يَدخُل وسطهم فيقتُل النفرَ منهم، جعل يتقدَّم في نَحْر العَدوّ وهو يَصيحُ: إليَّ يا معشر المسلمين، إليَّ أنا هشامُ بن العاص بن وائل، أمِنَ الجنةِ تَفِرُّون؟! حتى قُتل [1].
উম্মে বকর বিনতে মিসওয়ার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, হিশাম ইবনুল আস ইবনু ওয়াইল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন একজন নেককার লোক। তিনি আজনাদাইনের যুদ্ধের দিন মুসলমানদের শত্রুদের থেকে কিছুটা পিছু হটে যেতে দেখলেন। তখন তিনি তাঁর লৌহশিরস্ত্রাণ (মাগফার) ফেলে দিলেন এবং বললেন, হে মুসলিমগণ, নিশ্চয়ই এই অমুসলমান যুবকদের তরবারির আঘাতে ধৈর্য নেই। অতএব, আমি যা করছি তোমরাও তাই করো। তিনি (উম্মে বকর) বলেন, এরপর তিনি তাদের (শত্রুদের) মাঝখানে প্রবেশ করতে শুরু করলেন এবং তাদের কয়েকজনকে হত্যা করলেন। তিনি শত্রুর একদম কাছে গিয়ে অগ্রগামী হতে লাগলেন এবং চিৎকার করে বলতে লাগলেন, হে মুসলিমগণ, আমার দিকে আসো! আমার দিকে আসো! আমি হিশাম ইবনুল আস ইবনু ওয়াইল! তোমরা কি জান্নাত থেকে পালাচ্ছ?! অবশেষে তিনি শহীদ হয়ে গেলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 4/ 180، ومن طريقه ابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 158 عن محمد بن عمر الواقدي، عن مخرمة بن بُكَير، عن أم بكر. وهذا مرسل والصحيح أن هشام بن العاص استُشهد يوم اليرموك كما سبق.
5130 - أخبرني حامد بن محمد المُذكِّر، حدثنا علي بن عبد العزيز، حدثنا حَجّاج بن مِنْهال، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سَلَمة، أبي أبي هريرة قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "ابنا العاص مُؤمنان: هشامٌ وعَمرٌو" [1].صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল-আস-এর দুই পুত্র মুমিন (বিশ্বাসী): হিশাম ও আমর।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة الليثي.وأخرجه أحمد 13/ (8042) و 14/ (8338) و (8641) من طرق عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وسيأتي برقم (6019) من طريق عفان بن مسلم عن حماد.
5131 - حدثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدثنا جعفر بن محمد الفِرْيابي، حدثنا سليمان بن عبد الرحمن الدّمشقي، حدثنا عبد الرحمن بن بَشير، عن محمد بن إسحاق، أخبرني نافع، عن ابن عمر، قال: كنا نقولُ: ما لأحدٍ توبةٌ إذا تَرَكَ دينَه بعد إسلامه ومَعرفتِه، فأنزلَ الله فيهم: {يَاعِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللَّهِ} [الزمر:53] وكتبتهُا بِيَدِي، ثم بعثتُ بها إلى هشامِ بن العاصِ بن وائل، فصاحَ بها، فجلس على بَعِيره، ثم لَحِق بالمدينة [1]. ذكرُ مناقب عِكرمةَ بن أبي جَهْل، واسمُ أبيه مشهورٌ
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা বলতাম: যে ব্যক্তি ইসলাম গ্রহণ ও জ্ঞান লাভের পর তার দ্বীন ত্যাগ করে, তার জন্য কোনো তওবা নেই। তখন আল্লাহ তাদের সম্পর্কে নাযিল করেন: {হে আমার বান্দাগণ, যারা নিজেদের উপর বাড়াবাড়ি করেছ (গুনাহ করেছ), তোমরা আল্লাহর রহমত থেকে নিরাশ হয়ো না।} [সূরা আয-যুমার: ৫৩]। আর আমি আমার নিজের হাতে এই আয়াতটি লিখলাম, এরপর তা হিশাম ইবনুল আস ইবনু ওয়াইল-এর নিকট পাঠালাম। অতঃপর সে তা উচ্চস্বরে ঘোষণা করল, এরপর সে তার উটের পিঠে চড়ে বসলো এবং মদীনার দিকে যাত্রা করল। ইকরিমা ইবনু আবি জাহলের মর্যাদা উল্লেখ; আর তার পিতার নাম মশহুর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسنٌ من أجل محمد بن إسحاق وعبد الرحمن بن بَشِير - وهو الشَّيباني الدمشقي - لكن الصحيح أنَّ هذا الحديث لعمر بن الخطّاب يرويه عنه ابنه عبد الله بن عمر، كذلك جاء في سائر الروايات عن ابن إسحاق، كالرواية المتقدمة عند المصنف برقم (3670) من طريق عبد الله بن إدريس عن ابن إسحاق، وأغلبُ الظنّ أنَّ الوهم هنا في إسقاط ذكر عمر بن الخطاب من جهة عبد الرحمن بن بَشير الشيباني، فهو حسنُ الحديث في أقل أحواله حسب ما نقله ابن حجر في "اللسان" من أقوال الأئمة فيه، لكن ذكر أبو حاتم الرازي أنه يروي عن ابن إسحاق غير حديث منكرٍ.وأخرجه الطبراني 22/ (462) عن جعفر بن محمد الفريابي، بهذا الإسناد. واتهمه بعضُهم، وقد انفرد بالخبر بهذا الإسناد، ومحمد بن عمر - وهو الواقدي - لا يُعتبر بما ينفرد به أيضًا. على أنَّ خبر عكرمة بن أبي جهل وامرأته هذا مشهور عند أهل المغازي والسير.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (710) و (711) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد مختصرًا.وهو عند الواقدي في "المغازي" 2/ 850 - 851، ومن طريق رواية "المغازي" أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 41/ 62 - 63.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 6/ 85، ومن طريقه ابن عساكر 41/ 64 و 70/ 255، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 155 عن محمد بن عمر الواقدي، به.وسيأتي هذا الخبر عند المصنف بنحوه من رواية عروة بن الزبير مرسلًا بالرقمين الآتيين بعده، لكن دون ذكر النهي عن سبِّ الأموات.ومثله عن الزهري مرسلًا عند ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 418، ومالك في "الموطأ" 2/ 545، وعبد الرزاق (12646)، وابن سعد 6/ 86، وغيرهم، دون ذكر النهي عن سبِّ الأموات كذلك.وقد روي هذا الحرفُ مفردًا في قصة عكرمة بن أبي جهل حبيبُ بن أبي ثابت مرسلًا عند هناد في "الزهد" (1170)، ورجاله لا بأس بهم.وعن عمرو بن دينار مرسلًا عند ابن عساكر 41/ 67، ورجاله لا بأس بهم كذلك.وقد صحَّ عن النبي صلى الله عليه وسلم النهيُ عن سبِّ الأموات كما سلف عند الحديث المتقدم برقم (1435) وما بعده.
5132 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين، حدثنا محمد بن عمر، أنَّ أبا بكر بن عبد الله بن أبي سَبْرة حدّثَه عن [1] موسى بن عُقبة، عن أبي حَبِيبة مولى عبد الله بن الزُّبير، [عن عبد الله بن الزُّبَير] [2] قال: فلما كان يومُ فَتْح مكةَ هرب عِكْرمةُ بن أبي جهل، وكانت امرأتُه أمُّ حكيم بنتُ الحارث بن هشام امرأةً عاقلةً أسلمتْ، ثم سألتْ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فأمَرَها بردِّه، وقالتْ له: جِئتُك من عند أَوصَلِ الناسِ وأبرِّ الناسِ وخَيرِ الناس، وقد استأمَنتُ لك فأمَّنَك، فرجع معها، فلما دنا من مكة قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه: "يأتيكُم عِكْرمة بن أبي جَهل مُؤمِنًا مُهاجرًا، فلا تَسبُّوا أباه، فإِنَّ سَبَّ الميتِ يُؤذي الحيَّ ولا يَبلُغُ الميتَ"، فلما بلغ بابَ رسول الله صلى الله عليه وسلم استَبْشَر ووَثَبَ له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قائمًا على رجليه فَرَحًا بقُدومِه [3].
আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: যখন মাক্কা বিজয়ের দিন এল, তখন ইকরিমা ইবনু আবী জাহল পালিয়ে গেল। তাঁর স্ত্রী উম্মু হাকীম বিনতু হারিস ইবনু হিশাম ছিলেন একজন বুদ্ধিমতী নারী, যিনি ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন। এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আবেদন করলেন। তিনি তাকে (ইকরিমাকে) ফিরিয়ে আনার নির্দেশ দিলেন। উম্মু হাকীম (ইকরিমাকে) বললেন: আমি আপনার কাছে এসেছি মানুষের মধ্যে সবচাইতে উত্তম, সবচাইতে সৎ ও সবচাইতে শ্রেষ্ঠ ব্যক্তির কাছ থেকে। আমি আপনার জন্য নিরাপত্তা চেয়েছিলাম, আর তিনি আপনাকে নিরাপত্তা দিয়েছেন। এরপর সে (ইকরিমা) তাঁর সাথে ফিরে এল। যখন সে মাক্কার কাছাকাছি পৌঁছল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের বললেন: "তোমাদের কাছে ইকরিমা ইবনু আবী জাহল মুমিন ও মুহাজির হিসেবে আসছে। তোমরা তার পিতাকে গালি দিও না। কেননা মৃত ব্যক্তিকে গালি দেওয়া জীবিত ব্যক্তিকে কষ্ট দেয়, আর তা মৃত ব্যক্তির কাছে পৌঁছায় না।" যখন সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দরজায় পৌঁছল, তখন তিনি (ইকরিমা) অত্যন্ত আনন্দিত হলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার আগমনে আনন্দিত হয়ে দু'পায়ে ভর করে দাঁড়িয়ে গেলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظ "عن" سقط من (ز) و (ب) والمطبوع. واتهمه بعضُهم، وقد انفرد بالخبر بهذا الإسناد، ومحمد بن عمر - وهو الواقدي - لا يُعتبر بما ينفرد به أيضًا. على أنَّ خبر عكرمة بن أبي جهل وامرأته هذا مشهور عند أهل المغازي والسير.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (710) و (711) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد مختصرًا.وهو عند الواقدي في "المغازي" 2/ 850 - 851، ومن طريق رواية "المغازي" أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 41/ 62 - 63.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 6/ 85، ومن طريقه ابن عساكر 41/ 64 و 70/ 255، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 155 عن محمد بن عمر الواقدي، به.وسيأتي هذا الخبر عند المصنف بنحوه من رواية عروة بن الزبير مرسلًا بالرقمين الآتيين بعده، لكن دون ذكر النهي عن سبِّ الأموات.ومثله عن الزهري مرسلًا عند ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 418، ومالك في "الموطأ" 2/ 545، وعبد الرزاق (12646)، وابن سعد 6/ 86، وغيرهم، دون ذكر النهي عن سبِّ الأموات كذلك.وقد روي هذا الحرفُ مفردًا في قصة عكرمة بن أبي جهل حبيبُ بن أبي ثابت مرسلًا عند هناد في "الزهد" (1170)، ورجاله لا بأس بهم.وعن عمرو بن دينار مرسلًا عند ابن عساكر 41/ 67، ورجاله لا بأس بهم كذلك.وقد صحَّ عن النبي صلى الله عليه وسلم النهيُ عن سبِّ الأموات كما سلف عند الحديث المتقدم برقم (1435) وما بعده.
[2] سقط من نسخنا الخطية، وقد أثبتناه من رواية البيهقي في "المدخل" (710) عن أبي عبد الله الحاكم، وهو ثابت في رواية محمد بن عمر الواقدي كما في "المغازي" له 2/ 850، و"طبقات ابن سعد" 6/ 85 عن الواقدي بإسناده هذا الذي هنا. واتهمه بعضُهم، وقد انفرد بالخبر بهذا الإسناد، ومحمد بن عمر - وهو الواقدي - لا يُعتبر بما ينفرد به أيضًا. على أنَّ خبر عكرمة بن أبي جهل وامرأته هذا مشهور عند أهل المغازي والسير.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (710) و (711) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد مختصرًا.وهو عند الواقدي في "المغازي" 2/ 850 - 851، ومن طريق رواية "المغازي" أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 41/ 62 - 63.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 6/ 85، ومن طريقه ابن عساكر 41/ 64 و 70/ 255، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 155 عن محمد بن عمر الواقدي، به.وسيأتي هذا الخبر عند المصنف بنحوه من رواية عروة بن الزبير مرسلًا بالرقمين الآتيين بعده، لكن دون ذكر النهي عن سبِّ الأموات.ومثله عن الزهري مرسلًا عند ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 418، ومالك في "الموطأ" 2/ 545، وعبد الرزاق (12646)، وابن سعد 6/ 86، وغيرهم، دون ذكر النهي عن سبِّ الأموات كذلك.وقد روي هذا الحرفُ مفردًا في قصة عكرمة بن أبي جهل حبيبُ بن أبي ثابت مرسلًا عند هناد في "الزهد" (1170)، ورجاله لا بأس بهم.وعن عمرو بن دينار مرسلًا عند ابن عساكر 41/ 67، ورجاله لا بأس بهم كذلك.وقد صحَّ عن النبي صلى الله عليه وسلم النهيُ عن سبِّ الأموات كما سلف عند الحديث المتقدم برقم (1435) وما بعده.
5132 [3] - إسناده ضعيف جدًّا من أجل أبي بكر بن عبد الله بن أبي سَبْرة، فهو متروك الحديث، واتهمه بعضُهم، وقد انفرد بالخبر بهذا الإسناد، ومحمد بن عمر - وهو الواقدي - لا يُعتبر بما ينفرد به أيضًا. على أنَّ خبر عكرمة بن أبي جهل وامرأته هذا مشهور عند أهل المغازي والسير.وأخرجه البيهقي في "المدخل إلى السنن الكبرى" (710) و (711) عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد مختصرًا.وهو عند الواقدي في "المغازي" 2/ 850 - 851، ومن طريق رواية "المغازي" أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 41/ 62 - 63.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 6/ 85، ومن طريقه ابن عساكر 41/ 64 و 70/ 255، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 155 عن محمد بن عمر الواقدي، به.وسيأتي هذا الخبر عند المصنف بنحوه من رواية عروة بن الزبير مرسلًا بالرقمين الآتيين بعده، لكن دون ذكر النهي عن سبِّ الأموات.ومثله عن الزهري مرسلًا عند ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 2/ 418، ومالك في "الموطأ" 2/ 545، وعبد الرزاق (12646)، وابن سعد 6/ 86، وغيرهم، دون ذكر النهي عن سبِّ الأموات كذلك.وقد روي هذا الحرفُ مفردًا في قصة عكرمة بن أبي جهل حبيبُ بن أبي ثابت مرسلًا عند هناد في "الزهد" (1170)، ورجاله لا بأس بهم.وعن عمرو بن دينار مرسلًا عند ابن عساكر 41/ 67، ورجاله لا بأس بهم كذلك.وقد صحَّ عن النبي صلى الله عليه وسلم النهيُ عن سبِّ الأموات كما سلف عند الحديث المتقدم برقم (1435) وما بعده.
5133 - أخبرَناهُ محمد بن محمد البغدادي، حدثنا محمد بن عمرو بن خالد الحَرّاني، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسوَد، عن عُروة قال: فَرَّ عِكرمةُ بن أبي جَهْل يومَ الفتح عامدًا إلى اليمن، وأقبلَت أمُّ حكيم بنت الحارث بن هشام، وهي يومئذ مُسلِمةٌ، وهي تحت عِكرمةَ بن أبي جَهْل، فاستأذنتْ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في طلب زوجِها، فأذِنَ لها وأمَّنَه، فخرجتْ برُوميٍّ لها، فراوَدَها عن نفسِها، فلم تَزَل تُمنِّيه وتُقرِّب له، حتى قَدِمتْ على أُناسٍ من عَكٍّ [1]، فاستغاثَتْهم عليه، فأوثَقُوه، فأدركَتْ زوجها ببعضِ تِهامةَ، وقد كان رَكِبَ في سفينةٍ فلما جلس فيها نادى باللاتِ والعُزَّى، فقال أصحابُ السفينة: لا يجوزُ هاهنا أحدٌ يدعو شيئًا إلَّا الله وحده مُخلِصًا، فقال عِكْرمةُ: واللهِ لئن كان في البحر وحدَه، إنه في البَرِّ وحدَه، أُقسِمُ بالله لأرجعنّ إلى محمدٍ، فرَجَع عِكْرمةُ مع امرأتِه فدخَل على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبايَعه فقَبِلَ منه.ودخَل رجلٌ مِن هُذيل حين هُزِمت بنو بَكْرٍ على امرأته فارًّا فلامَتُه وعَجَّزَتْه وعَيَّرتْه بالفِرَارِ، فقال:وأنتِ لو رأيتِنا بالخَندَمَهْ … إذ فَرَّ صفوانُ وفَرَّ عِكْرِمَهْوأَلحَمُونا بالسُّيوفِ المُسلِمَهْ … يَقطَعن كلِّ ساعدٍ وجُمجُمَهْلم تَنطِقي في اللَّوم أدنَى كَلِمَهْقال عُروة: واستُشهِدَ يوم أجْنادِينَ من المسلمين، ثم من قريش، ثم بني مَخزُومٍ عِكْرمةُ بن أبي جَهل [2].
উরওয়া থেকে বর্ণিত:
মক্কা বিজয়ের দিন ইকরিমা ইবনু আবূ জাহল ইয়েমেনের দিকে পালিয়ে যান। তখন উম্মু হাকীম বিনত আল-হারিস ইবনু হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আগমন করলেন। তিনি তখন ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন এবং তিনি ইকরিমা ইবনু আবূ জাহলের স্ত্রী ছিলেন। তিনি তাঁর স্বামীর খোঁজে বের হওয়ার জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অনুমতি চাইলেন। তিনি তাঁকে অনুমতি দিলেন এবং (ইকরিমাকে) নিরাপত্তা দিলেন। তিনি তার সাথে এক রোমান ক্রীতদাসকে নিয়ে বের হলেন। সে (দাসটি) তাকে (উম্মু হাকীমকে) তার নিজের দিকে আহ্বান করতে লাগল (অর্থাৎ কুপ্রস্তাব দিল)। তিনি তাকে কেবল আশ্বাস দিতে থাকলেন এবং তাকে কাছে রাখলেন, যতক্ষণ না তিনি আক্ক গোত্রের কিছু লোকের কাছে পৌঁছলেন। তিনি তাদের কাছে ঐ ক্রীতদাসটির বিরুদ্ধে সাহায্য চাইলেন। তারা তাকে (ক্রীতদাসকে) বেঁধে ফেলল।
এরপর তিহামার কোনো এক স্থানে গিয়ে তিনি তাঁর স্বামীকে খুঁজে পেলেন। ইকরিমা তখন একটি নৌকায় উঠেছিলেন। যখন তিনি তাতে বসলেন, তখন তিনি লাত ও উযযার নামে ডাকতে লাগলেন। তখন নৌকার সাথীরা বলল: “এখানে একমাত্র আল্লাহ ছাড়া অন্য কারো নামে ডাকা যাবে না, তাঁকে একনিষ্ঠভাবে স্মরণ করতে হবে।” তখন ইকরিমা বললেন: “আল্লাহর কসম, যদি তিনি (আল্লাহ) একাই সাগরে থাকেন, তবে তিনি একাই স্থলেও রয়েছেন। আমি আল্লাহর কসম করে বলছি, আমি অবশ্যই মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে যাব।”
এরপর ইকরিমা তাঁর স্ত্রীর সাথে ফিরে আসলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন। তিনি তাঁর হাতে বাইআত গ্রহণ করলেন এবং তিনি তা কবুল করলেন।
যখন বানু বকর পরাজিত হলো, তখন হুযাইল গোত্রের এক ব্যক্তি পলায়নরত অবস্থায় তার স্ত্রীর কাছে প্রবেশ করল। তার স্ত্রী তাকে তিরস্কার করল, তাকে অক্ষম বলল এবং পলায়নের জন্য তাকে উপহাস করল। তখন সে বলল:
"আর তুমি যদি আমাদেরকে খান্দামাহ নামক স্থানে দেখতে,
যখন সাফওয়ান পালিয়ে গিয়েছিল এবং ইকরিমাও পালিয়ে গিয়েছিল,
আর মুসলিমদের তরবারি দিয়ে আমাদের ওপর আঘাত হানছিল,
যা প্রতিটি বাহু ও মস্তক কর্তন করছিল,
তবে তুমি তিরস্কারের একটি শব্দও উচ্চারণ করতে না।"
উরওয়া বলেন: মুসলিমদের মধ্য থেকে, এরপর কুরাইশ গোত্র থেকে, এরপর বানু মাখযূম গোত্র থেকে ইকরিমা ইবনু আবূ জাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আজনাদাইন-এর যুদ্ধে শাহাদাত বরণ করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: عكة، وكُتب في هامش (ز) على الصواب بخط مغاير، وفاقًا لسائر مصادر تخريج الخبر. وعَكٌّ قبيلة يُضاف إليها مخلافٌ باليمن.
[2] وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 49 - 50 و 98 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (1020) عن محمد بن عمرو بن خالد، به.وروي مثلُه عن موسى بن عُقبة، عن الزهري مرسلًا، عند البيهقي 5/ 39 - 47، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 41/ 62 ورجاله ثقات، لكن ليس فيه ذكر قصة السفينة.وأخرج قصة السفينة مفردة النسائي (3516) من حديث سعد بن أبي وقاص، بإسناد حسن. وأخرجها كذلك الطبراني 17/ (1019) من مرسل ابن أبي مُليكة، ورجاله ثقات.وأخرجها أيضًا ابن عساكر 41/ 65 من مرسل سليمان التيمي، ورجاله ثقات.واستشهاد عكرمة بأجنادين هو أصحُّ ما قيل في ذلك، وقد وافق عروةَ بنَ الزبير عليه موسى بن عقبة كما في التاريخ "الأوسط" للبخاري 1/ 355. وهو الذي جزم به محمد بن عمر الواقدي فيما نقله عنه ابن سعد في "الطبقات" 6/ 88. ورواه موسى بن عقبة عن الزهري كما في "تاريخ دمشق" 41/ 71. وانظر ما سيأتي برقم (5135).والخدمة: جبل أسفل مكة، تجمع فيه ناس من قريش يوم الفتح ليقاتلوا المسلمين، وكان منهم صفوان بن أمية وسُهيل بن عمرو وعكرمة بن أبي جهل وغيرهم.
5134 - حدثنا أحمد بن سهل الفقيه ببُخارَى، حدثنا سهل بن المُتوكِّل، حدثنا إسماعيل بن أبي أُويس، عن أبيه، عن الزُّهْري، عن عُروة بن الزُّبَير، قال: قال عِكرمةُ بن أبي جَهْل: لما انتهيتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم قلتُ: يا محمد، إن هذه أخبرتْني أنك أَمَّنتَني، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنتَ آمِنٌ"، فقلتُ: أشهد أن لا إله إلَّا الله وحدَه لا شَريكَ له، وأنتَ عبدُ الله ورسولُه، وأنتَ أبَرُّ الناس، وأصدَقُ الناسِ، وأَوفَى الناس، قال عِكْرمةُ: أقولُ ذلك وإني لَمُطأطئٌ رأسي استحياءً منه، ثم قلتُ: يا رسول الله، استغِفرْ لي كلَّ عداوة عاديتُكَها، أو مَركبٍ أو ضَعتُ فيه أريدُ فيه إظهارَ الشِّرك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اللهم اغفِرْ لعكرمةَ كلَّ عداوةٍ عادانيها أو مَركبٍ أَوضَعَ فيه يريدُ أن يَصُدَّ عن سَبيلك"، قلت: يا رسول الله، مُرْني بخيرِ ما تَعلَمُ فأعملَه، قال: "قُل: أشهدُ أن لا إلهَ إلَّا الله، وأنَّ محمدًا عبدُه ورسولُه، وتُجاهِدُ في سبيله"، ثم قال عكرمة: أما واللهِ يا رسولَ الله، لا أدعُ نفقةً كنتُ أُنفِقُها في صَدٍّ عن سبيل الله إلَّا أنفقتُ ضِعفَها [1] في سبيل الله، ولا قاتلتُ قتالًا في الصّدّ عن سبيلِ الله إِلَّا أَبْلَيتُ ضعفَه في سبيل الله.ثم اجتَهد في القتال حتى قُتل يومَ أجنادِينَ شهيدًا في خلافة أبي بكر، وقد كان رسول الله صلى الله عليه وسلم استعملَه عامَ حَجِّه على هَوازِنَ يُصدِّقُها، فتوفِّي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وعِكْرمةُ يومئذٍ بتَبَالَةَ [2].
উরওয়া ইবনুয যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইকরিমা ইবনু আবি জাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছলাম, তখন আমি বললাম: হে মুহাম্মাদ, ইনি (আমার স্ত্রী) আমাকে জানিয়েছেন যে আপনি আমাকে নিরাপত্তা দিয়েছেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি নিরাপদ।" তখন আমি বললাম: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই, তিনি এক, তাঁর কোনো শরীক নেই, আর আপনি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল। আর আপনি মানুষের মধ্যে সবচাইতে বেশি সৎ, সবচাইতে বেশি সত্যবাদী এবং সবচাইতে বেশি অঙ্গীকার পূরণকারী। ইকরিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি যখন এসব বলছিলাম, তখন তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি লজ্জায় আমি মাথা নত করে রেখেছিলাম। এরপর আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আপনি আমার সকল শত্রুতার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন যা আমি আপনার সাথে করেছি, অথবা সেই সকল যাত্রার জন্য যা আমি করেছি এবং যার মাধ্যমে আমি শিরক প্রতিষ্ঠা করতে চেয়েছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ, ইকরিমাকে ক্ষমা করে দিন তার সকল শত্রুতার জন্য যা সে আমার সাথে করেছে, অথবা সেই সকল যাত্রার জন্য যা সে করেছে আপনার পথ থেকে মানুষকে বিরত রাখার উদ্দেশ্যে।" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আপনি যে উত্তম আমল সম্পর্কে জানেন, আমাকে তার নির্দেশ দিন, যেন আমি তা পালন করতে পারি। তিনি বললেন: "বল, আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই, আর মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও তাঁর রাসূল, এবং তুমি তাঁর পথে জিহাদ করবে।" অতঃপর ইকরিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম হে আল্লাহর রাসূল, আল্লাহর পথে বাধা দেওয়ার জন্য আমি যে পরিমাণ সম্পদ ব্যয় করতাম, আমি আল্লাহর পথে তার দ্বিগুণ ব্যয় না করে ছাড়ব না। আর আল্লাহর পথ থেকে বাধা দিতে গিয়ে আমি যে পরিমাণ যুদ্ধ করেছিলাম, আল্লাহর পথে তার দ্বিগুণ যুদ্ধ না করে ছাড়ব না। অতঃপর তিনি জিহাদে কঠোর চেষ্টা করেন, অবশেষে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে আজনাদাইন (Ajnadayn)-এর যুদ্ধে শহীদ হন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বিদায় হজ্জের বছরে তাকে হাওয়াজিন গোত্রের যাকাত আদায়ের দায়িত্বে নিযুক্ত করেছিলেন। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাত হয়, তখন ইকরিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাবালা (Tabalah) নামক স্থানে ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في نسخنا الخطية: إلّا أبليت ضعفه، وهو خطأ ناشئ عن انتقال نظر إلى السطر التالي، والمثبت من مصادر التخريج. وروي مثلُه في ذكر النفقة والقتال حسبُ عن أبي إسحاق السَّبيعي عن مصعب بن سعْد مرسلًا كما سيأتي عند المصنف برقم (5136)، لكن بلفظ: إلّا أنفقت مثلها. ووقع عند بعض من خرَّجه مرسلًا: فلما كان يوم اليرموك نزل فترجّل، فقاتل قتالًا شديدًا، فقُتل. كذا وقع بذكر اليرموك، بدل أجنادين، ووافقه حبيب بن أبي ثابت كما سيأتي بعده، وهو قول ضعيف كما تقدم ذكره عند الرواية التي قبله، وانظر ما بعده.
[2] رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسلٌ، وقد روي مثلُه عند أبي عبد الله محمد بن عمر الواقدي في "مغازيه" 2/ 850 - 852، ومن طريقه أخرجه ابن سعد في "طبقاته" 6/ 85، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 41/ 62 - 64، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 155 - 156.وروي مثلُ قول عكرمة بن أبي جهل هنا في سؤاله النبي صلى الله عليه وسلم أن يأمره بخير ما يعلم وقوله في النفقة والقتال واستشهاده بعد ذلك الضحاك بن عثمان الحِزامي مرسلًا عند ابن عساكر 41/ 66، ورجاله لا بأس بهم. غير أنه قال في آخره: ثم اجتهد في العبادة حتى قُتل زمان عمر بالشام شهيدًا. وروي مثلُه في ذكر النفقة والقتال حسبُ عن أبي إسحاق السَّبيعي عن مصعب بن سعْد مرسلًا كما سيأتي عند المصنف برقم (5136)، لكن بلفظ: إلّا أنفقت مثلها. ووقع عند بعض من خرَّجه مرسلًا: فلما كان يوم اليرموك نزل فترجّل، فقاتل قتالًا شديدًا، فقُتل. كذا وقع بذكر اليرموك، بدل أجنادين، ووافقه حبيب بن أبي ثابت كما سيأتي بعده، وهو قول ضعيف كما تقدم ذكره عند الرواية التي قبله، وانظر ما بعده.
5135 - أخبرني أبو الحسن العُمَري، حدثنا محمد بن إسحاق، حدثنا محمد بن المُثنّى، حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، حدثني أبو يونس القُشَيري، حدثني حبيب بن أبي ثابت: أنَّ الحارث بن هشام وعكْرمة بن أبي جهل وعَيّاش بن أبي رَبيعة ارتُثُّوا [1] يومَ اليرموك، فدعا الحارثُ بماءٍ ليشربَه، فنَظَر إليه عِكْرمةُ، فقال الحارثُ: ادفَعُوه إلى عِكرمةَ، فنَظَر إليه عَيّاش بن أبي رَبيعة، فقال عِكرمةُ: ادفَعُوه إلى عيّاش، فما وَصَل إلى عَيّاشٍ ولا إلى أحدٍ منهم حتى ماتُوا وما ذاقُوه [2].
হাবীব ইবনু আবী ছাবিত থেকে বর্ণিত, হারিস ইবনু হিশাম, ইকরিমাহ ইবনু আবী জাহল এবং আইয়াশ ইবনু আবী রাবীআহ ইয়ারমুক যুদ্ধের দিনে মারাত্মকভাবে আহত হয়ে মুমূর্ষু অবস্থায় নিক্ষিপ্ত হয়েছিলেন। তখন হারিস পান করার জন্য পানি চাইলেন। ইকরিমাহ তাঁর দিকে তাকালেন। হারিস বললেন: “এটা ইকরিমার দিকে ঠেলে দাও।” অতঃপর আইয়াশ ইবনু আবী রাবীআহ তাঁর দিকে তাকালেন। তখন ইকরিমাহ বললেন: “এটা আইয়াশের দিকে ঠেলে দাও।” অতঃপর পানি আইয়াশের কাছে পৌঁছালো না, আর তাদের কারো কাছেই পৌঁছালো না, এমনকি তাঁরা সবাই মারা গেলেন, অথচ তাঁরা কেউই তা পান করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أي: حُمِلوا من المعركة جَرحَى، والرَّثيث: الجريح. خلاف بينهم في ذلك، وأما عياش بن أبي ربيعة فمات بمكة، وأما الحارث بن هشام فمات بالشام في طاعون عمواس سنة ثماني عشرة.وأخرج مرسل حبيب هذا البيهقي في "شعب الإيمان" (3209)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 11/ 504 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 6/ 88، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (2030)، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1557)، وابن عساكر 11/ 504، وأبو الحجاج في المزّي في ترجمة الحارث بن هشام من "تهذيب الكمال" 5/ 301 من طرق عن محمد بن عبد الله الأنصاري، به.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (3342)، وابن عساكر 47/ 247 من طريق أبي وهب عبد الله بن بكر السَّهمي، عن أبي يونس القُشيري، به.وقد رُوي نظيرُ هذه القصة في اليرموك أيضًا من حديث أبي جهم بن حذيفة - وهو صحابي - لثلاثة رجال غير الذين ذكرهم حبيب بن أبي ثابت، هم هشام بن العاص أخي عمرو بن العاص، وابن عمٍّ لأبي جهم العدوي ورجل ثالث لم يُسَمَّ، أخرجه ابن المبارك في "الجهاد" (116) وفي "الزهد" (525)، وإسناده صحيح. وكأنَّ هذا هو المحفوظ، ووهم حبيب في تسمية الثلاثة، فسمى الحارثَ بنَ هشام بدل هشام بن العاص، ووهم في تسمية الاثنين الآخرين، والله أعلم، وفي هذا ما يؤيد قول الواقدي الذي تقدم.وممّا يؤيد ذكر هشام بن العاص بدل الحارث بن هشام أنَّ عمرو بن العاص أخا هشامٍ قد ذكر أنَّ أخاه هشامًا استُشهد يوم اليرموك، كما تقدم تخريجه برقم (5128).
[2] رجاله ثقات، لكنه مرسل. أبو يونس القُشَيري: هو حاتم بن أبي صَغيرة.وقد وافق حبيبَ بن أبي ثابت على ذكر استشهاد عكرمة بن أبي جهل يوم اليرموك أبو إسحاق السَّبيعي عند ابن أبي شيبة 5/ 344 و 13/ 37، قال: فلما كان يوم اليرموك نزل فترجّل فقاتل قتالًا شديدًا، فقتل، فوُجد به بضع وسبعون بين طعنة ورمية وضربة، لكن وقع في رواية ابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (202) في خبر أبي إسحاق السبيعي هنا: فلما كان يومُ اليرموك أو غيره، هكذا على الشك.وممَّن ذكر استشهاد عكرمة يوم اليرموك أيضًا ابن إسحاق كما في "تاريخ خليفة بن خياط" ص 130 - 131، والزبيرُ بنُ بكار في قولٍ كما في "الاستيعاب" لابن عبد البر ص 581.وفي قول آخر عن الزبير بن بكار أنَّ عكرمة استشهد يوم أجنادين، وفاقًا لقول عروة بن الزبير والزهري وموسى بن عقبة كما تقدم ذكره برقم (5133)، وهو الصحيح.وهو الذي جزم به الواقدي وأعلَّ خبر حبيب بن أبي ثابت هذا، كما نقله عنه ابن سعد في "طبقاته" 6/ 88 بعد أن أسنده ابن سعد برواية حبيب بن أبي ثابت هذه، قال: فذكرتُ هذا الحديث لمحمد بن عمر - وهو الواقدي - فأنكره، وقال: هذا وهمٌ، روايتنا عن أصحابنا جميعًا من أهل العلم والسيرة أنَّ عكرمة بن أبي جهل قتل يوم أجنادين شهيدًا في خلافة أبي بكر الصدّيق، ولا خلاف بينهم في ذلك، وأما عياش بن أبي ربيعة فمات بمكة، وأما الحارث بن هشام فمات بالشام في طاعون عمواس سنة ثماني عشرة.وأخرج مرسل حبيب هذا البيهقي في "شعب الإيمان" (3209)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 11/ 504 عن أبي عبد الله الحاكم بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 6/ 88، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (2030)، وأبو القاسم الأصبهاني في "الترغيب والترهيب" (1557)، وابن عساكر 11/ 504، وأبو الحجاج في المزّي في ترجمة الحارث بن هشام من "تهذيب الكمال" 5/ 301 من طرق عن محمد بن عبد الله الأنصاري، به.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (3342)، وابن عساكر 47/ 247 من طريق أبي وهب عبد الله بن بكر السَّهمي، عن أبي يونس القُشيري، به.وقد رُوي نظيرُ هذه القصة في اليرموك أيضًا من حديث أبي جهم بن حذيفة - وهو صحابي - لثلاثة رجال غير الذين ذكرهم حبيب بن أبي ثابت، هم هشام بن العاص أخي عمرو بن العاص، وابن عمٍّ لأبي جهم العدوي ورجل ثالث لم يُسَمَّ، أخرجه ابن المبارك في "الجهاد" (116) وفي "الزهد" (525)، وإسناده صحيح. وكأنَّ هذا هو المحفوظ، ووهم حبيب في تسمية الثلاثة، فسمى الحارثَ بنَ هشام بدل هشام بن العاص، ووهم في تسمية الاثنين الآخرين، والله أعلم، وفي هذا ما يؤيد قول الواقدي الذي تقدم.وممّا يؤيد ذكر هشام بن العاص بدل الحارث بن هشام أنَّ عمرو بن العاص أخا هشامٍ قد ذكر أنَّ أخاه هشامًا استُشهد يوم اليرموك، كما تقدم تخريجه برقم (5128).
5136 - أخبرنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو حُذيفة النَّهْدي، حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن مصعب بن سعد، عن عِكْرمة بن أبي جهل، قال: قال لي النبيُّ صلى الله عليه وسلم يومَ جئتُ: "مرحبًا بالراكِب المُهاجر، مرحبًا بالراكبِ المُهاجِر، مرحبًا بالراكبِ المُهاجِر" فقلت: والله يا رسولَ الله لا أدَعُ نفقةً أنفقتُها إلَّا أنفقتُ مثلَها في سبيلِ الله عز وجل [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইকরিমা ইবনে আবি জাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমি যখন তাঁর কাছে আসলাম, তখন আমাকে বললেন: "মুহাজির আরোহীকে স্বাগতম, মুহাজির আরোহীকে স্বাগতম, মুহাজির আরোহীকে স্বাগতম।" তখন আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আল্লাহর কসম, আমি (ইসলামের বিপক্ষে) যত অর্থ ব্যয় করেছি, তার সমপরিমাণ আল্লাহর পথে ব্যয় না করে ছাড়ব না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث حسن بمجموع طرقه، وهذا إسناد رجاله لا بأس يهم، لكنه مرسل كما نبه عليه الذهبي في "تلخيصه"، فإن مصعب بن سعد - وهو ابن أبي وقاص - لم يسمع من عكرمة بن أبي جهل فيما جزم به البخاري في "تاريخه الأوسط" 1/ 373، وقال أبو حاتم: لا أظنه سمع منه، وقال أبو عبد الله مصعب الزبيري كما في "تاريخ دمشق" 48/ 180 (طبعة مجمع اللغة العربية بدمشق): لم تكن أمُّ مصعب بن سعد قد سُبِيَت يؤمئذٍ، وقُتل عكرمة بن أبي جهل بأجنادين في خلافة أبي بكر.وأعلّه الترمذي (2735) بأبي حذيفة النَّهدي - وهو موسى بن مسعود - وأنه ضعيف في الحديث قال: وروي هذا الحديث عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان - وهو الثوري - عن أبي إسحاق - وهو عمرو بن عبد الله السَّبيعي - مرسلًا، ولم يذكر مصعب بن سعد، قال: وهو أصح.كذا قال الترمذي مع أنَّ أبا حذيفة النهدي ليس ضعيفًا بهذا الإطلاق الذي أطلقه، إنما هو حسن الحديث كان يُخطئ أحيانًا في حديث الثوري، ولم يخطئ هنا فقد تابعه على ذكر مصعبِ بن سعد بشرُ بن سَلْم البجلي عند أبي نُعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (5447)، فرواه عن سفيان الثوري مثل رواية أبي حذيفة. وتابعه كذلك إسرائيلُ بنُ يونس بن أبي إسحاق السبيعي عند أبي عروبة الحَرَّاني في "المنتقى من كتاب الطبقات" ص 43 - 44 حيث رواه عن جده أبي إسحاق، عن مصعب بن سعد: أنَّ عكرمة بن أبي جهل لما قدم النبي صلى الله عليه وسلم مكة … فذكره مرسلًا مظهرًا فيه الإرسال. وهذا أرجحُ من رواية بشر بن سَلْم وأبي حذيفة، فكأنَّ أبا إسحاق السبيعي نفسه هو الذي كان ربما ذكر مصعب بن سعد وربما لم يذكره، ومما يؤيد وجودَه في إسناد الخبر أنَّ إسماعيل بن عبد الرحمن السُّدِّي روى طرفًا من قصة فتح مكة وفرار عكرمة بن أبي جهل يومئذٍ ثم رجوعه وإسلامه عن مصعب بن سعد بن أبي وقاص، عن أبيه، عند النسائي (3516) وغيره، لكنه لم يذكر فيه ترحاب النبي صلى الله عليه وسلم به أو قول عكرمة للنبي صلى الله عليه وسلم في شأن إضعافه النفقة في سبيل الله، غير أنَّه وإن كان كذلك يدل على أن لذكر مصعب بن سعد أصلًا، واستفيد من رواية السُّدِّي هذه معرفة الذي سمع منه مصعبُ بنُ سعد قصة فتح مكة أنه أبوه سعد بن أبي وقاص، والله أعلم، فإن ثبت سماع مصعب بن سعد لهذه الرواية التي هنا من أبيه أيضًا اتصل الإسنادُ، والله أعلم بالصواب.وقد روى إبراهيم بن يوسف بن أبي إسحاق السَّبيعي مثل هذه الرواية التي هنا عن أبيه يوسف عن جدِّه أبي إسحاق، غير أنه قال: عن عامر بن سعد البجلي أن عكرمة بن أبي جهل أتى النبي صلى الله عليه وسلم .... فذكره مرسلًا، وذكر عامر بن سعد البجلي بدل مصعب بن سعد بن أبي وقاص. ولأبي إسحاق السبيعي رواية معروفةٌ عن عامر بن سعد البَجَلي، ثم إن أبا إسحاق واسع الرواية، فلا يبعد سماعه للخبر من كلا الرجلين، فيكون كلا الرجلين، فيكون بمجموع الطريقين مع ما له من شواهد صحيحًا، والله أعلم.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (8498) عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن سعد 6/ 87، والبخاري في تاريخه الكبير تعليقًا 7/ 48، والترمذي (2735)، وابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 280، والطبراني في "الكبير" 17/ (1022)، وفي "الدعاء" (1957) وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5446)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 41/ 52، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 156، والمزي في "تهذيب الكمال" 20/ 249 من طرق عن أبي حذيفة النَّهْدي، به.وأخرجه أبو نعيم في "المعرفة" (5447) من طريق بشر بن سَلْم البجلي، عن سفيان الثوري، به، لكن دون ذكر النفقة.وأخرجه ابن شَبْه في "تاريخ المدينة" 2/ 498 عن مُؤمَّل بن إسماعيل، عن سفيان الثوري، عن أبي إسحاق: أن عكرمة بن أبي جهل … فذكره، وكذلك رواه عبد الرحمن بن مهدي عن سفيان الثوري فيما قاله الترمذي (2735) فلم يذكرا مصعب بن سعد في إسناده.وأخرجه أبو عَروبة الحَرّاني في "المنتقى من كتاب الطبقات" ص 43 - 44 من طريق إسرائيل بن يونس بن أبي إسحاق السبيعي، عن جده أبي إسحاق، عن مصعب بن سعد: أنَّ عكرمة بن أبي جهل لما قدم النبي صلى الله عليه وسلم مكة قال … فذكره مرسلًا بأطول ممّا هنا، وذكر مصعب بن سعد.وأخرجه ابن أبي شيبة 5/ 344 و 13/ 37، وابن أبي الدنيا في "مكارم الأخلاق" (202) من طريق الأعمش، عن أبي إسحاق قال: لما أسلم عكرمة بن أبي جهل … فذكره لكن دون ذكر تَرحاب النبي صلى الله عليه وسلم بعكرمة، ولم يذكر مصعب بن سعد.وأخرجه الطبري في "ذيل المذيّل" كما في "منتخبه" لعُريب بإثر "تاريخ الطبري" 11/ 561، وأبو نعيم في "المعرفة" (5448)، وابن عساكر 41/ 53 من طريق إبراهيم بن يوسف بن أبي إسحاق، عن أبيه، عن جده، عن عامر بن سعد البجلي: أنَّ عكرمة بن أبي جهل لما أتى إليه النبي صلى الله عليه وسلم قال له … فذكره بنحوه وفيه زيادة. ورجاله لا بأس بهم لكنه مرسل أيضًا. وبعضهم قال في روايته: عن عكرمة ابن أبي جهل، ولكن الصحيح إرساله فلم يُدرك عامر بن سعد عكرمةَ بن أبي جهل.ويشهد لقول عكرمة بن أبي جهل في شأن إضعافه من النفقة في سبيل الله شواهد كما تقدَّم برقم (5133) و (5134).ولتَرحاب النبي صلى الله عليه وسلم بعكرمة شاهدٌ من مرسل الزهري عند مالك 2/ 545 وغيره: أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم لما رأى عكرمة بن أبي جهل وثب إليه فرحًا وما عليه رداء حتى بايعه، وانظر ما تقدَّم برقم (5132).
5137 - أخبرني أبو عبد الله الصَّنْعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عَبّاد، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزُّهْري، عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن عائشة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "رأيتُ في المَنام كأنَّ أبا جَهْلٍ أتاني فبايَعَني"، فلما أسلَم خالدُ بن الوليد قيل لرسول الله صلى الله عليه وسلم: قد صَدَّق اللهُ رؤياك يا رسول الله، هذا كان إسلامَ خالدٍ، فقال: "لَيكُونَنَّ غَيْرُه"، حتى أسلمَ عِكْرمةُ بن أبي جَهْل، وكان ذلك تصديقَ رُؤياهُ [1].صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি স্বপ্নে দেখলাম যে, আবূ জাহল যেন আমার নিকট এসে আমার হাতে বাইয়াত গ্রহণ করছে।" যখন খালিদ ইবনু ওয়ালীদ ইসলাম গ্রহণ করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ আপনার স্বপ্নকে সত্যে পরিণত করেছেন। এটিই ছিল খালিদের ইসলাম গ্রহণ। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আরও কেউ একজন হবে।" অবশেষে যখন ইকরামা ইবনু আবী জাহল ইসলাম গ্রহণ করলেন, তখনই সেই স্বপ্নের সত্যায়ন হলো।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن المحفوظ فيه في رواية إسحاق بن إبراهيم بن عبّاد - وهو الدَّبَري راوي مُصنف عبد الرزاق، و "جامع معمر بن راشد" - أنه عن عبد الرزاق عن معمر عن الزهري مرسلًا، ليس فيه ذكر أبي بكر بن عبد الرحمن ولا عائشة، كذلك جاء في "جامع معمر" (20365).لكن رواه ابن المبارك في "الجهاد" (55) عن معمر عن الزهري، عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام مرسلًا، فذكر أبا بكر، لكنه لم يذكر عائشة، فلا يُحفَظ فيه ذكر عائشة بيقينٍ، كذلك لا يُحفظ ذكر أبي بكر بن عبد الرحمن في رواية الدبري عن عبد الرزاق، لكن يُحفظ ذكرُه في رواية ابن المبارك عن معمر. ضعيفين في إسناده. قلنا: لعله قصد محمد بن سنان ويعقوب بن محمد، لكن محمد بن سنان متابع.وأخرجه يعقوب بن عبد الرحمن بن أحمد الجصاص في "فوائده" كما في "الإصابة" لابن حجر 4/ 538، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 41/ 60، وابن الأثير في "أسد الغابة" 3/ 570 عن محمد بن سنان القزاز بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" تعليقًا 3/ 412، وأخرجه الطبراني في "الكبير" 23/ (673) من طريق محمد بن عبادة الواسطي، كلاهما (البخاري ومحمد بن عُبادة) عن يعقوب بن محمد الزهري، به.
5138 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن سِنان القَزّاز، حدثنا يعقوب بن محمد الزُّهْري، حدثنا المُطّلب بن كَثير، حدثنا الزُّبير بن موسى، عن مصعب بن عبد الله بن أبي أُمية، عن أم سَلَمة، قالت: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "رأيتُ لأبي جَهلٍ عِذْقًا في الجَنّة" فلما أسلمَ عَكْرمةُ بن أبي جهل قال: "يا أم سَلَمة، هذا هو"، قالت أم سلمة: وقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: شكا إليه عِكْرمةُ أنه إذا مَرّ بالمدينة قيل له: هذا ابن عَدوِّ الله أبي جَهْل، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم خَطيبًا فقال: "النَّاسُ مَعادنُ، خِيارُهم في الجاهلية خِيارُهم في الإسلام إذا فَقُهوا، لا تُؤذُوا مُسلمًا بكافرٍ" [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি আবু জাহেলের জন্য জান্নাতে একটি খেজুরের কাঁদি দেখেছি।" এরপর যখন ইকরিমা ইবনু আবী জাহল ইসলাম গ্রহণ করলেন, তখন তিনি বললেন: "হে উম্মে সালামাহ, এটাই সেই [কাঁদি]।" উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছেন: ইকরিমা তাঁর নিকট অভিযোগ করলেন যে, তিনি যখনই মদীনার পাশ দিয়ে যান, তখনই তাঁকে বলা হয়: 'এই সেই আল্লাহ্র শত্রু আবু জাহেলের ছেলে।' তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন এবং বললেন: "মানুষ খনিজ পদার্থের মতো (বিভিন্ন গুণের অধিকারী)। জাহিলিয়্যাতের যুগে তাদের মধ্যে যারা উত্তম ছিল, ইসলামের জ্ঞান অর্জন করলে ইসলামের যুগেও তারা উত্তম। কোনো মুসলিমকে কোনো কাফিরের (অতীত কর্মের) কারণে কষ্ট দিও না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، يعقوب بن محمد الزُّهري ليِّن الحديث، ويحدِّث عمّن لا يُعرف من الشيوخ، وشيخُه هنا - وهو المُطَّلب بن كثير - مجهول لا يُعرف. وأعله الذهبي في "تلخيصه" بوجود ضعيفين في إسناده. قلنا: لعله قصد محمد بن سنان ويعقوب بن محمد، لكن محمد بن سنان متابع.وأخرجه يعقوب بن عبد الرحمن بن أحمد الجصاص في "فوائده" كما في "الإصابة" لابن حجر 4/ 538، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 41/ 60، وابن الأثير في "أسد الغابة" 3/ 570 عن محمد بن سنان القزاز بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري في "تاريخه الكبير" تعليقًا 3/ 412، وأخرجه الطبراني في "الكبير" 23/ (673) من طريق محمد بن عبادة الواسطي، كلاهما (البخاري ومحمد بن عُبادة) عن يعقوب بن محمد الزهري، به.