হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5139)


5139 - أخبرني أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن إسحاق، حدثنا سليمان بن حَرْب، حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن ابن أبي مُلَيكة، قال: كان عِكْرمةُ بن أبي جهل يأخذُ المُصحَف فيضعُه على وجهِه ويَبْكي، ويقول: كلامُ ربّي كتابُ ربِّي [1]. ‌‌ذكرُ مناقب أبي قُحَافة والد أبي بَكْر رضي الله عنهما




ইবনু আবি মুলাইকা থেকে বর্ণিত, ইকরিমা ইবনু আবি জাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুসহাফ (কুরআন) নিতেন, অতঃপর তা তাঁর চেহারার উপর রাখতেন এবং কাঁদতেন। আর বলতেন: এটা আমার রবের বাণী, এটা আমার রবের কিতাব।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه مرسل أيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني، وابن أبي مليكة: هو عَبد الله بن عُبيد الله.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (2037)، ومن طريقه ابن عساكر 41/ 68 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. لكن بلفظ: كتاب ربي كتاب ربي، مرتين.وأخرجه بنحوه ابن المبارك في "الجهاد" (56)، وابن سعد في "الطبقات الكبرى" 6/ 88، والدارمي (3393)، وعبد الله بن أحمد في "السنة" (110)، وأبو بكر الخلال في "السنة" (2077)، والطبراني في "الكبير" 17/ (1018)، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 12/ 25، وابن عساكر 41/ 67 - 68 و 68، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 157 من طرق عن حماد بن زيد، به.



5140 - Null









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5140)


5140 - أخبرنا أحمد بن يعقوب الثَّقَفي، حدثنا موسى بن زكريا التُّستَري، حدثنا خَليفة بن خَيّاط، قال: وأما أبو قُحَافة التَّيمي فإنه عثمان بن عامر بن عَمرو بن كعب بن سَعْد بن تَيْم بن مُرّة، أسلم يوم فتح مكة، وتُوفي بمكة في المُحرّم سنة أربعَ عشرة من الهجرة، وهو ابن سبع وتسعين سنةً.




খলীফা ইবনে খাইয়াত থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আর তায়মি গোত্রের আবূ কুহাফা হলেন উসমান ইবনে আমির ইবনে আমর ইবনে কাব ইবনে সা'দ ইবনে তাইম ইবনে মুররাহ। তিনি মক্কা বিজয়ের দিন ইসলাম গ্রহণ করেন এবং হিজরতের চৌদ্দতম সনে মুহাররাম মাসে মক্কায় ইন্তেকাল করেন। তখন তাঁর বয়স হয়েছিল সাতানব্বই বছর।









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5141)


5141 - حدثني القاضي أبو بكر محمد بن عمر بن سَلْم [1] بن الجِعَابي الحافظ الأوحد، حدثنا أبو شعيب عبد الله بن الحسن الحَرَّاني، حدثنا أبي [2] الحَسن بن أحمد بن أبي شعيب، حدثنا محمد بن سَلَمة [3]، عن هشام بن حسان. عن محمد بن سيرين، عن أنس، قال: جاء أبو بكر يوم فَتْح مكةَ بأبيه أبي قُحَافة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لو قَرَّرْتَ الشيخَ في بيتِه لأتَيناهُ" [4].صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মক্কা বিজয়ের দিন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পিতা আবূ কুহাফাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নিয়ে আসলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তুমি বৃদ্ধকে তার ঘরে থাকতে দিতে, তাহলে আমরাই তার নিকট আসতাম।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ب): سالم، وهو قولٌ في اسم جدِّ أبي بكر الجعابي. "تلخيصه": عبد الله منكر الحديث والقاسم لم يُدرك أباه، ولا أبوه أبا بكر. قلنا: لكن له شواهد يصحُّ بها الخبر.وأخرجه البزار (79)، وأبو نعيم في "فضائل الخلفاء الراشدين" (69) من طريق إبراهيم بن سعيد الجوهري، عن الحسين بن محمد المرُّوذي، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث أنس بن مالك الذي قبله.وحديثُ أسماء بنت أبي بكر الذي تقدَّم عند المصنف برقم (4411) وإسناده حسن.



[2] تحرَّفت في النسخ الخطية إلى: جدي. ولأبي شعيب روايةٌ عن جده في الجملة، لكن هذا الحديث إنما هو لأبيه الحسن بن أحمد بن أبي شعيب، فقد خرَّجه غير واحدٍ من طريق الحسن هذا. وقد سقط اسم "الحسن" بعده من "تلخيص الذهبي" ولعله تصرُّف من الذهبي رحمه الله قصدًا للموائمة مع قوله قبل ذلك: حدثنا جدي. "تلخيصه": عبد الله منكر الحديث والقاسم لم يُدرك أباه، ولا أبوه أبا بكر. قلنا: لكن له شواهد يصحُّ بها الخبر.وأخرجه البزار (79)، وأبو نعيم في "فضائل الخلفاء الراشدين" (69) من طريق إبراهيم بن سعيد الجوهري، عن الحسين بن محمد المرُّوذي، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث أنس بن مالك الذي قبله.وحديثُ أسماء بنت أبي بكر الذي تقدَّم عند المصنف برقم (4411) وإسناده حسن.



5141 [3] - وقع في نسخنا الخطية: محمد بن أبي سلمة، والمثبت على الصواب من "تلخيص الذهبي" و "إتحاف المهرة" لابن حجر (1731)، وهو محمد بن سَلَمة الباهلي مولاهم الحَرَّاني. "تلخيصه": عبد الله منكر الحديث والقاسم لم يُدرك أباه، ولا أبوه أبا بكر. قلنا: لكن له شواهد يصحُّ بها الخبر.وأخرجه البزار (79)، وأبو نعيم في "فضائل الخلفاء الراشدين" (69) من طريق إبراهيم بن سعيد الجوهري، عن الحسين بن محمد المرُّوذي، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث أنس بن مالك الذي قبله.وحديثُ أسماء بنت أبي بكر الذي تقدَّم عند المصنف برقم (4411) وإسناده حسن.



5141 [4] - إسناده صحيح.وأخرجه ابن حبان (5472) عن أبي العباس السَّرَّاج محمد بن إسحاق بن إبراهيم الثقفي مولاهم، عن الحسن بن أحمد بن أبي شعيب، بهذا الإسناد. وزاد بإثره: تكرمةً لأبي بكر.وأخرجه كذلك أحمد 20/ (12635) عن محمد بن سَلَمة الحَرَّاني، به.وسيأتي عند المصنف برقم (5147) من طريق يزيد أبي خالد عن أنس. "تلخيصه": عبد الله منكر الحديث والقاسم لم يُدرك أباه، ولا أبوه أبا بكر. قلنا: لكن له شواهد يصحُّ بها الخبر.وأخرجه البزار (79)، وأبو نعيم في "فضائل الخلفاء الراشدين" (69) من طريق إبراهيم بن سعيد الجوهري، عن الحسين بن محمد المرُّوذي، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث أنس بن مالك الذي قبله.وحديثُ أسماء بنت أبي بكر الذي تقدَّم عند المصنف برقم (4411) وإسناده حسن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5142)


5142 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا حسين بن محمد المرُّوْذِي، حدثنا عبد الله بن عبد الملك الفِهْري، حدثنا القاسم بن محمد بن أبي بكر، عن أبيه، عن أبي بكر، قال: جئتُ بأبي قُحافةَ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "هَلّا تركتَ الشيخَ حتى آتيهَ؟ " فقلت: بل هو أحقُّ أن يأتيَك، قال: "إنا لَنحفَظُه لأيادي ابنه عندَنا" [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি আবূ কুহাফাকে (আমার পিতাকে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নিয়ে আসলাম। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কেন বৃদ্ধকে রেখে এলে না, যাতে আমিই তার কাছে যেতাম?" আমি বললাম: বরং আপনার কাছে আসাই তার অধিকতর কর্তব্য। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমরা তার ছেলের (অর্থাৎ তোমার) আমাদের কাছে থাকা অনুগ্রহসমূহের কারণে তাকে সম্মানিত করছি।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره دون قوله: "إنا لنحفظه … " إلخ، وهذا إسناد ضعيف، قال الذهبي في "تلخيصه": عبد الله منكر الحديث والقاسم لم يُدرك أباه، ولا أبوه أبا بكر. قلنا: لكن له شواهد يصحُّ بها الخبر.وأخرجه البزار (79)، وأبو نعيم في "فضائل الخلفاء الراشدين" (69) من طريق إبراهيم بن سعيد الجوهري، عن الحسين بن محمد المرُّوذي، بهذا الإسناد.ويشهد له حديث أنس بن مالك الذي قبله.وحديثُ أسماء بنت أبي بكر الذي تقدَّم عند المصنف برقم (4411) وإسناده حسن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5143)


5143 - حدثنا أبو محمد عبد الله بن جعفر الفارسي، حدثنا يعقوب بن سفيان، حدثنا الحجَّاج بن أبي مَنيع، حدثنا جَدِّي، عن الزُّهْري، قال: اسمُ أبي قُحافة عثمانُ بن عامر بن عَمرو بن كعب بن سعْد بن تَيْم بن مُرّة بن كعب بن لُؤي بن غالب بن فِهْر، أسلم يومَ الفتح، ومات في المحرّم سنة أربعَ عشرةَ، وهو ابن سبعٍ وتسعين سنةً [1].




যুহরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ কুহাফার নাম উসমান ইবনু আমির ইবনু আমর ইবনু কাব ইবনু সা'দ ইবনু তাইম ইবনু মুররাহ ইবনু কাব ইবনু লুআই ইবনু গালিব ইবনু ফিহর। তিনি মক্কা বিজয়ের দিন ইসলাম গ্রহণ করেন এবং চৌদ্দ হিজরি সনে মুহাররম মাসে তিনি মৃত্যুবরণ করেন। তখন তাঁর বয়স ছিল সাতানব্বই বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 238 مختصرًا بذكر اسم أبي قُحافة ونسبه. وانظر ما تقدَّم برقم (4451).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5144)


5144 - حدثنا أبو عبد الله بن بُطّة، حدثنا محمد بن عبد الله رُستَهْ، حدثنا سليمان بن داود الشاذَكُوني، حدثنا محمد بن عمر، قال: تُوفي أبو قُحَافة أبو أبي بكر سنة سبعَ عشرةَ، وهو ابن مئة وأربعِ سنين [1].




মুহাম্মদ ইবনে উমর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ কুহাফা (যিনি আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিতা ছিলেন) সতেরো হিজরি সনে ইন্তিকাল করেন। তখন তাঁর বয়স হয়েছিল একশো চার বছর।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هذا مخالفٌ لما نقله ابن سعد في "طبقاته" 3/ 193 و 8/ 13 عن شيخه محمد بن عمر الواقدي، حيث ذكر أنَّ أبا قحافة توفي سنة أربع عشرة وهو ابن سبع وتسعين سنة. وابن سعد خيرٌ من سليمان بن داود الشاذكوني وأجلُّ وأوثق نقلًا، بل إن الشاذكوني متروكٌ. وما نقله ابن سعد عن الواقدي هو الموافق لقول أهل السير، كالزهري في روايته السابقة، وخليفة بن خياط الذي تقدَّمت بروايته برقم (5140).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5145)


5145 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصر، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني ابن جُريج، عن أبي الزُّبير، عن جابر: أن عمر بن الخطاب أخذ بيد أبي قُحافة، فأتى به النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فلمّا وَقَف به على رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "غَيِّروهُ ولا تُقَرِّبُوهُ سَوَادًا" [1]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . 5145 م - قال ابن وهب وأخبرني عُمر بن محمد، عن زيد بن أسلم: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم هنّأَ أبا بكر بإسلام أبيه [2].




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ কুহাফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাত ধরে তাঁকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নিয়ে আসলেন। যখন তিনি তাঁকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট দাঁড়ালেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই (সাদা চুল ও দাড়ি) পরিবর্তন করে দাও, তবে কালোর কাছাকাছিও করো না।" ইবনু ওয়াহব বলেন, উমর ইবনু মুহাম্মাদ যাইদ ইবনু আসলাম সূত্রে আমাকে অবহিত করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর পিতার ইসলাম গ্রহণের জন্য অভিনন্দন জানালেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات لكن ابن جريج - وهو عبد الملك بن عبد العزيز - مدلس وقد عنعن، وأبو الزبير - وهو محمد بن مسلم بن تدرس - قد صرَّح بسماعه كما سيأتي ثم هو متابع، وذكرُ عمر بن الخطاب في الخبر غير محفوظ، وهو مما تفرَّد به المصنف في كتابه هذا ورواه عنه البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 96.وقد رواه البيهقي مرةً أخرى في "سننه الكبرى" 7/ 310، وفي "شعب الإيمان" (5996)، وفي "الآداب" (549) عن المصنِّف بإسناده هذا أيضًا، فلم يذكر عُمر بن الخطاب، إنما ذكره بلفظ المجهول: أُتي بأبي قحافة … فذكره.وكذلك رواه يحيى بنُ إبراهيم المُزكي راوي "مسند عبد الله بن وهب" عن أبي العباس محمد بن يعقوب الأصمّ عن بحر بن نصر عن ابن وهب، ليس فيه ذكر عمر بن الخطاب. أخرجه من طريقه البيهقي في "سننه الكبرى" 7/ 310، وفي "الآداب" (549)، وابن الحداد الأصبهاني في "جامع الصحيحين" (2361). والذهبي في "معجم شيوخه" 1/ 113.وكذلك رواه غيرُ واحدٍ عن بحر بن نصر، فلم يذكروا في الخبر عمر بن الخطاب، منهم أبو عوانة في "صحيحه" (1512) و (8706)، ويحيى بن محمد بن صاعد في "مجلسين من أماليه" (27)، والطحاوي في "شرح مشكل الآثار" (3683).ورواه عن عبد الله بن وهب أيضًا جماعةٌ لم يذكروا عمر بن الخطاب، منهم أبو الطاهر أحمدُ بن عمرو بن السَّرْح عند مسلم (2102)، وأبي داود (4204)، وابن حبان (5471)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (5996). ومنهم أحمدُ بنُ سعيد الهَمْداني عند أبي داود (4204)، ويونسُ بن عبد الأعلى عند النسائي (9294)، والطبري في "تهذيب الآثار" في القسم المفرد الذي فيه بعض مسانيد العشرة ص 484، وأبو عوانة (1512) و (8706).ولا يُحفظ كذلك في حديث جابر بن عبد الله ذكر الأمر باجتناب السواد، كما جاء في رواية زهير بن معاوية عن أبي الزبير عن جابر عند الطيالسي (1860)، وابن سعد 6/ 79، وأحمد 23/ (14641)، وأبي عوانة (8709)، وأبي القاسم البغوي في "مسند ابن الجعد" (2652): أنَّ زهيرًا قال لأبي الزبير: أحدَّثك جابر أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لأبي قحافة: "وجَنَّبوه السَّوّاد"؟ فقال: لا. هذا لفظ الطيالسي، ولفظ الباقين قريب منه، ويستفاد من رواية زهير هذه تصريح أبي الزبير بسماعه هذا الحديث من جابر لكن بذكر الأمر بتغيير الشيب دون اجتناب السّواد.وقد أخرجه عن زهير بن معاوية غير هؤلاء مقتصرين في رواياتهم على الأمر بتغيير شيب أبي قحافة دون الأمر باجتناب السواد، ودون سؤال زهير لأبي الزبير الذي بإثره، وممَّن أخرجه كذلك مسلم (2102)، وأبو عوانة (1513) و (8707) و (8708)، والطبراني في "الكبير" (8327).ومما يؤيده رواية زهير روايةُ عَزْرة بن ثابت الآتية عند المصنف برقم (5146) عن أبي الزبير عن جابر بلفظ: "اخضبوا لحيته". ليس فيها ذكر الأمر باجتناب السواد.وقد تابع ابنَ جُريج على ذكر الأمر باجتناب السّواد في رواية أبي الزبير ليثُ بن أبي سليم عند معمر في "جامعه" (20179)، وابن سعد 6/ 79، وابن أبي شيبة 8/ 432، وأحمد 22/ (14402) و (14455)، وابن ماجه (3624)، وابن جرير الطبري في "تهذيب الآثار" ص 485، وأبي عوانة (8710)، والحكيم الترمذي في "المنهيات" ص 197، والطبراني (8324) و (8325)، وأبي نُعيم في "معرفة الصحابة" (4913)، والخطيب في "تلخيص المتشابه في الرسم" 1/ 430، وأبي محمد البغوي في "شرح السنة" (3179). لكن ليث بن أبي سلم هذا سيئ الحفظ.وتابعه كذلك أيوب السَّختياني عند أبي عوانة (1514) و (8710)، والطبراني (8326). وإسناده صحيح.وتابعه أيضًا المغيرة بن مسلم عند الطبري في "تهذيب الآثار" ص 485 لكن في الإسناد إليه شيخ الطبري محمد بن حميد الرازي، وهو ضعيف.وتابعهم الأجلحُ بنُ عبد الله الكِنْدي عند أبي يعلى (1819)، والطبراني في "الأوسط" (1819)، وفي "الصغير" (483)، والخطيب في "تاريخ بغداد" 10/ 197. وإسناده حسن.وتابعهم مطر بن طهمان الوراق عند الطبراني في "الكبير" (8325)، وأبي نُعيم في "معرفة الصحابة" (4913). وفي الإسناد إليه رجلٌ متروك.والصحيح عن مطر الوراق ما رواه عبدُ العزيز بن عبد الصمد العمي - وهو ثقة حافظ - عند الطبري في "تهذيب الآثار" ص 483، والطبراني في "الكبير" (8328) عن مطر الوراق، عن أبي رجاء العُطاردي، عن جابر بن عبد الله بلفظ: "اذهبوا إلى بعض نسائه، حتى تُغيّره" فذهبوا به فحمَّروه.وإسناده حسنٌ، وهو يوافق رواية زهير بن معاوية وعَزْرة بن ثابت عن أبي الزبير.لكن يبقى رواية أيوب السختياني ورواية الأجلح الكِنْدي الموافقتان لرواية ابن جريج، وإسنادهما لا بأس به، فلعلَّ أبا الزبير كان هو نفسه ربما أدرج الأمر باجتناب السَّواد في حديثه عن جابر استنادًا إلى رواية غيره من الصحابة، كما سيأتي ذكره مما ذُكر فيه الأمر باجتناب السّواد، وعند محاققة زهير بن معاوية له ومراجعته له بيّن له أنه لم يسمع من جابر الأمر باجتناب السَّواد، فهو المعتمد في حديث جابر، فحديث جابر بن عبد الله صحيح دون ذكر الأمر باجتناب السواد ودون ذكر عمر بن الخطاب في الخبر، والله تعالى أعلم. على أنه قد صح ذكر الأمر باجتناب السواد في قصة أبي قحافة عن غير جابر بن عبد الله، فقد ذكره أنس بن مالك عند أحمد 20/ (12635)، وابن حبان (5472) وغيرهما، بإسناد صحيح.وروي مثلُه من حديث أسماء بنت أبي بكر بإسناد حسن عند ابن سعد في "طبقاته" 6/ 78، والطحاوي في "شرح المشكل" (3684)، لكن أكثر من خرَّج حديث أسماء بنت أبي بكر رواه بلفظ الأمر بتغيير الشيب دون الأمر باجتناب السواد، كابن هشام في "السيرة النبوية" 2/ 405، وأحمد 44/ (26956)، وابن حبان (7208)، والطبراني في "الكبير" 24/ (236)، وأبي نعيم في "فضائل الخلفاء الراشدين" (67)، وفي "معرفة الصحابة" (4912)، وهذا يوافق المحفوظ من حديث جابر بن عبد الله في قصة أبي قحافة.وقد ورد النهي في الجُملة عن تغيير الشيب بالسواد كما في حديث ابن عباس عند أحمد 4/ (2470)، وأبي داود (4212)، والنسائي (9293) بلفظ: يكون قوم في آخر الزمان يخضبون بهذا السَّواد كحواصل الحَمَام، لا يَرِيحون رائحة الجنة". وإسناده صحيح.



[2] رجاله ثقات، لكنه مرسلٌ. عمر بن محمد هو ابن زيد بن عبد الله بن عمر بن الخطاب.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 5/ 96 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5146)


5146 - حدَّثَناهُ أبو العباس إسماعيل بن عبد الله، حدثنا عَبْدان الأهوازِي، حدثنا عُبيد الله بن معاذ، حدثنا خالد بن الحارث، حدثنا عَزْرة بن ثابت، عن أبي الزُّبير، عن جابر، قال: أُتي النبي صلى الله عليه وسلم يومَ الفَتْح بأبي قُحَافة ورأسُه ولحيتُه كالثَّغامةِ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "اخْضِبُوا لِحيتَه" [1].




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মক্কা বিজয়ের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আবূ কুহাফাকে আনা হলো, তখন তাঁর মাথা ও দাড়ি 'সুগামা' (এক ধরনের সাদা ফুল/গাছ)-এর মতো শুভ্র ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা তাঁর দাড়ি রং করে দাও।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده صحيح. عَبْدان الأهوازي: هو عبد الله بن أحمد بن موسى، وأبو الزبير: هو محمد بن مسلم بن تدرس المكي.وأخرجه النسائي (9295) عن محمد بن عبد الأعلى، عن خالد بن الحارث، بهذا الإسناد.وانظر ما قبله.والثَّغَامة: هو نبت أبيض الزهر، وقيل: هي شجرة كأنها الثلج.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5147)


5147 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن أحمد بن موسى القاضي ابن القاضي، حدثني أبي، حدثنا محمد بن شُجاع، حدثنا الحَسن بن زياد، عن أبي حَنيفة، عن يزيد أبي خالد، عن أنس، قال: كأني أنظُر إلى لِحيةِ أبي قُحَافة كأنه ضِرَام [1] عَرْفَجٍ من شدّة حُمْرته، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي بكر: "لو أقْرَرتَ الشيخَ في بيتِه لأتَيناهُ"؛ تَكرِمةً لأبي بكر [2].




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি যেন আবূ কুহাফার (আবূ বকরের পিতা) দাড়ির দিকে তাকাচ্ছি। অত্যধিক লাল হওয়ার কারণে তা যেন 'আরফাজ' গাছের জ্বলন্ত আগুনের মতো দেখাচ্ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকরকে বললেন: "তুমি যদি এই বৃদ্ধকে তাঁর বাড়িতেই থাকতে দিতে, তবে আমরাই তাঁর কাছে যেতাম।" (এটি তিনি) আবূ বকরের প্রতি সম্মান প্রদর্শনের জন্য বলেছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: صراح، بالصاد والحاء المهملتين، وإنما هو ضرام، بالضاد المعجمة والميم في آخره، وهو لَهَب العرفج، والعرفج شجر صغير معروف سريع الاشتعال بالنار، ولهبه شديد، الحمرة، يُبالَغ بحمرته، فيقال: كأنَّ لحيته ضرام عرفجة. وأخرجه كذلك أبو يوسف القاضي في "الآثار" (1036) عن أبي حنيفة، عن يزيد الرِّشك، عن أنس.وأخرجه مختصرًا أيضًا أبو نعيم الأصبهاني في "مسند أبي حنيفة" ص 262 من طريق إبراهيم بن طهمان، عن أبي حنيفة، عن يزيد عن أنس بن مالك. هكذا أطلقه ولم يقيده.ويشهد لما قاله أنس في لون لحية أبي قُحافة بعد تغيير شيبها أنها كانت حمراء حديثُ أبي رجاء العُطاردي عن جابر بن عبد الله الذي تقدم تخريجه عند الحديث رقم (5145). ولفظه: فذهبوا به - أي بأبي قحافة - فحمَّروه. وإسناده حسن.



[2] مرفوعه صحيح، سلف قريبًا برقم (5141) من طريق محمد بن سيرين عن أنس. وأما قول أنس في لون لحية أبي قحافة فهذا بعد أن خضبها، وله شاهد حسنٌ سيأتي ذكرُه لاحقًا.وأما هذا الإسناد فضعيف لضعف محمد بن شُجاع بن الثلجي والحَسن بن زياد اللؤلؤي، وقد بالغ من اتهمها بالكذب، ولهذا لم يُعرِّج الذهبي في "سير أعلام النبلاء" لدى ترجمته لهما على شيء من أقوال من وصفهما بذلك. على أنهما متابعان. وأما يزيد أبو خالد فلم نتبينّه، وقد اضطُرب في تسميته هنا، فسماه أبو حنيفة مرةً يزيد بن عبد الرحمن، ومرةً يزيد الرِّشك، أما الأول فإن كان هو أبا خالد الدالاني فهو لم يدرك أنسًا، وأما الآخر فكنيته أبو الأزهر لا أبو خالد، وقد أدرك أنسًا.وجزم ابن حجر في "تهذيب التهذيب"، وظنَّ ظنًا ولم يجزم به في "الإيثار بمعرفة رواة الأخبار" (272) أنه يزيد بن عبد الرحمن بن الأسود الزعافري الأودي التابعي الثقة، لكن لم نرَ له حُجّة في ذلك، ثم إنَّ يزيد بن عبد الرحمن الأودي هذا كنيته أبو داود وليس أبا خالد.وأخرجه ابن خسرو في "مسند أبي حنيفة" (1206) من طريق محمد بن إبراهيم بن حُبيش البغوي، عن محمد بن شجاع، بهذا الإسناد. مختصرًا بقول أنس بن مالك في ذكر لون لحية أبي قحافة بعد تغيير الشيب.وهو مختصر بهذا القدر كذلك في مسند الحسن بن زياد كما في "جامع المسانيد" لأبي المؤيد الخوارزمي 2/ 324.وأخرجه مختصرًا كذلك محمد بن الحسن الشيباني في "الآثار" (902) - ومن طريق محمد بن الحسن أخرجه ابن خسرو (1238) - عن أبي حنيفة عن يزيد بن عبد الرحمن، عن أنس. كذلك سمّى أباه عبد الرحمن، ولم يذكر كنيته.وكذلك أخرجه ابن سعد في "طبقاته" 6/ 80 عن عمرو بن الهيثم أبي قَطَن، عن أبي حنيفة، عن يزيد بن عبد الرحمن، عن أنس. وأخرجه كذلك أبو يوسف القاضي في "الآثار" (1036) عن أبي حنيفة، عن يزيد الرِّشك، عن أنس.وأخرجه مختصرًا أيضًا أبو نعيم الأصبهاني في "مسند أبي حنيفة" ص 262 من طريق إبراهيم بن طهمان، عن أبي حنيفة، عن يزيد عن أنس بن مالك. هكذا أطلقه ولم يقيده.ويشهد لما قاله أنس في لون لحية أبي قُحافة بعد تغيير شيبها أنها كانت حمراء حديثُ أبي رجاء العُطاردي عن جابر بن عبد الله الذي تقدم تخريجه عند الحديث رقم (5145). ولفظه: فذهبوا به - أي بأبي قحافة - فحمَّروه. وإسناده حسن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5148)


5148 - أخبرني أبو الحسن محمد بن الحسن النَّصْرَاباذي، حدثنا هارون بن يوسف [1]، حدثنا ابن أبي عُمر، حدثنا سفيان، عن الوليد بن كثير، عن عُمارة بن عبد الله بن صَيّاد، عن سعيد بن المسيّب، عن أبي هريرة، قال: لما قُبض النبيُّ صلى الله عليه وسلم بَلَغ أهلَ مكةَ الخبرُ، قال: فسمع أبو قُحافة الهائعةَ، فقال: ما هذا؟ قالوا: تُوفّي النبيُّ صلى الله عليه وسلم، قال: أمرٌ جليلٌ، فمن قام بالأمرِ من بعده؟ قالوا: ابنُك، قال: ورَضِيَت بنو مَحْزُومٍ وبنو المُغيرة؟ قالوا: نعم، قال: اللهم لا واضِعَ لما رفَعتَ ولا رافعَ لما وَضَعتَ، فلما كان عند رأس الحَوْل تُوفّي أبو بكر، قال: فبلغَ أهلَ مكةَ الخبرُ، فسمع أبو قُحَافة الهائعةَ، فقال: ما هذا؟ قالوا: تُوفّي ابنُك، قال: أمرٌ جليلٌ، والذي كان قبلَه أجلُّ منه قال: فمَن قام بالأمر بعدَه؟ قالوا: عمرُ بن الخطاب، قال: هو صاحبُه [2]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه. ‌‌ذكرُ مناقب نَوفَل بن الحارث بن عبد المُطلّب بن هاشم بن عبد مَنَافوكان يُكنى أبا الحارث بابنه الحارث، وكان أسنَّ مَن أسلَمَ من بني هاشم، ومن عمَّيه حمزةَ والعباس، ومن إخوتِه ربيعةَ وأبي سفيان وعبد شمسٍ بني الحارث.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন, তখন সেই খবর মক্কাবাসীর কাছে পৌঁছল। আবূ কুহাফা (আবূ বকরের পিতা) সেই শোকের চিৎকার শুনতে পেলেন। তিনি বললেন: এটা কী? তারা বলল: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেছেন। তিনি বললেন: এটি একটি মহান (গুরুত্বপূর্ণ) ব্যাপার। তাঁর পরে কে এই দায়িত্ব গ্রহণ করেছে? তারা বলল: আপনার ছেলে (আবূ বকর)। তিনি বললেন: বানু মাখজুম এবং বানু মুগীরাহ কি (এই সিদ্ধান্তের ওপর) সম্মত হয়েছে? তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: হে আল্লাহ! আপনি যা উন্নত করেছেন, তা নিচে নামানোর কেউ নেই; আর আপনি যা নিচে নামিয়েছেন, তা উন্নত করার কেউ নেই। এরপর যখন প্রায় এক বছর পূর্ণ হতে চলল, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন। তিনি বলেন: সেই খবর মক্কাবাসীর কাছে পৌঁছল। আবূ কুহাফা সেই চিৎকার শুনতে পেলেন। তিনি বললেন: এটা কী? তারা বলল: আপনার ছেলে ইন্তেকাল করেছেন। তিনি বললেন: এটি একটি মহান ব্যাপার, তবে এর আগেরটি তার চেয়েও মহান ছিল। তিনি বললেন: তাঁর পরে কে এই দায়িত্ব গ্রহণ করেছে? তারা বলল: উমার ইবনুল খাত্তাব। তিনি বললেন: সে তো তার (আবূ বকরের) সাথী ছিল।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: سيف، وهو خطأ صوَّبناه من إسنادين آخرين مثل هذا الإسناد تقدما عند المصنف بالرقمين (96) و (535). وهارون بن يوسف هذا هو ابن هارون الشَّطَوي. طريق يعقوب بن سفيان، كلاهما (الفاكهي ويعقوب) عن محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدَني، بهذا الإسناد عن سعيد بن المسيب مرسلًا.وكذلك أخرجه ابن سعد 3/ 168 - وعنه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 589 - 590 و 10/ 68 - 69 - وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 379، وابن عساكر 30/ 459 و 460 من طريق عبد الله بن الزبير الحُميدي، والفاكهي (1832) عن عبد الجبار بن العلاء، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (2451) من طريق محمد بن عباد بن الزبرقان المكي، ثلاثتهم عن سفيان بن عيينة، به عن ابن المسيب مرسلًا.وأخرجه كذلك ابن سعد 3/ 192، ومن طريقه ابن عساكر 30/ 459 - 460 عن محمد بن عمر الواقدي، عن الضحاك بن عثمان، عن عمارة بن عبد الله بن صياد، عن ابن المسيب مرسلًا.



[2] رجاله ثقات، لكن المحفوظ فيه أنه عن سعيد بن المسيب مرسلًا ليس فيه ذكر أبي هريرة كما سيأتي بيانه، غير أنه وإن كان كذلك فهو من أصح المراسيل لجلالة سعيد بن المسيّب. ابن أبي عمر: هو محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدَني، وسفيان: هو ابن عُيينة، والوليد بن كثير: هو القرشي المخزومي مولاهم.وأخرجه الفاكهي في "أخبار مكة" (1832)، وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 3/ 460 من طريق يعقوب بن سفيان، كلاهما (الفاكهي ويعقوب) عن محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدَني، بهذا الإسناد عن سعيد بن المسيب مرسلًا.وكذلك أخرجه ابن سعد 3/ 168 - وعنه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 1/ 589 - 590 و 10/ 68 - 69 - وابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 379، وابن عساكر 30/ 459 و 460 من طريق عبد الله بن الزبير الحُميدي، والفاكهي (1832) عن عبد الجبار بن العلاء، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (2451) من طريق محمد بن عباد بن الزبرقان المكي، ثلاثتهم عن سفيان بن عيينة، به عن ابن المسيب مرسلًا.وأخرجه كذلك ابن سعد 3/ 192، ومن طريقه ابن عساكر 30/ 459 - 460 عن محمد بن عمر الواقدي، عن الضحاك بن عثمان، عن عمارة بن عبد الله بن صياد، عن ابن المسيب مرسلًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5149)


5149 - حدثنا بذلك أبو عبد الله بن بُطّة بإسناده، وقال: فحدثنا ابن عُمر، عن شيوخه، قال: تُوفي نوفل بن الحارث بعد أن استُخلِف عمرُ بن الخطاب بسنةٍ وثلاثةِ أشهرٍ، فصلَّى عليه عمر، ثم مشى معه إلى البقيع، حتى دُفِنَ هنالك [1].




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নউফাল ইবনুল হারিস ইন্তেকাল করেন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খিলাফতের দায়িত্ব গ্রহণের এক বছর তিন মাস পর। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন, এরপর তিনি (উমর) তাঁর সাথে বাকী (কবরস্থান) পর্যন্ত হেঁটে যান, যতক্ষণ না সেখানে তাঁকে দাফন করা হলো।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] ومثله قولُ ابن سعد في "طبقاته" 4/ 42، وقول مصعب بن عبد الله الزبيري في "نسب قريش" ص 87، لكن لم يذكر مصعبٌ سنة وفاة نوفل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5150)


5150 - حدثني محمد بن يعقوب الحافظ، حدثنا محمد بن إسحاق الثقفي، أخبرني أبو يونس [1]، حدثنا إبراهيم بن المنذر، قال: تُوفّي نَوفَل بن الحارث بن عبد المُطّلب، ويكنى أبا الحارث لسنتَين مَضَتا مِن خِلافة عمرَ بن الخطاب بالمدينة.




ইবরাহীম ইবনুল মুনযির থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নাওফাল ইবনুল হারিস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব, যার কুনিয়াত ছিল আবুল হারিস, তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের দুই বছর অতিবাহিত হওয়ার পর মদীনায় ইন্তেকাল করেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] أبو يونس: هو محمد بن أحمد بن يزيد المديني.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5151)


5151 - حدثني أبو أحمد بن شعيب العَدْل، حدثنا أسَدُ بن نُوح، حدثنا هشام بن يحيى، حدثني محمد بن سعد، أخبرنا علي بن عيسى النَّوفَلي، قال: لما أُسر نَوفَلُ بن الحارث ببدرٍ قال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "افْدِ نفسَك يا نَوفَل"، قال: ما لي شيءٌ أَفْدِي به يا رسول الله، قال: "افْدِ نفسَك برِماحِك التي بجُدَّةَ"، قال: أشهدُ أنك رسولُ الله [1]، ففَدَى نفسَه بها، وكانت ألفَ رُمْحٍ، قال: وآخى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بين نَوفلٍ والعباسِ بن عبد المُطّلب، وكانا قبل ذلك شَرِيكَين في الجاهلية مُتفاوِضَين في المالَين مُتحابَّين، وشهدَ نوفلٌ مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم فتحَ مكةَ وحُنينَ [2] والطائفَ، وثبت يوم حُنين مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "كأني أنظُرُ إلى رِماحِك تَقْصِفُ في أصلابِ المُشرِكين" [3].




আলী ইবনে ঈসা আন-নাওফালী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন বদর যুদ্ধে নাওফাল ইবনুল হারিস বন্দি হলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন, "হে নাওফাল, তুমি মুক্তিপণ দিয়ে নিজেকে মুক্ত করো।" তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমার কাছে এমন কিছুই নেই যা দিয়ে মুক্তিপণ দেব।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার জেদ্দায় থাকা বর্শাগুলো দিয়ে নিজেকে মুক্ত করো।" তখন তিনি বললেন, "আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনি আল্লাহর রাসূল।" অতঃপর তিনি সেগুলো দিয়েই নিজেকে মুক্ত করলেন, আর তা ছিল এক হাজার বর্শা।

বর্ণনাকারী বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাওফাল ও আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের মধ্যে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করে দেন। এর আগে জাহিলিয়াতের যুগেও তারা দুজন ব্যবসায়িক অংশীদার ছিলেন, পরস্পরের সম্পদে অংশগ্রহণ করতেন এবং একে অপরকে ভালোবাসতেন। নাওফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মক্কা বিজয়, হুনাইন ও তায়েফ যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলেন। হুনাইনের দিন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে অবিচল ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি যেন দেখতে পাচ্ছি তোমার বর্শাগুলো মুশরিকদের পিঠের মধ্যে আঘাত হানছে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] جاء في المطبوع قبل هذه العبارة عبارة أخرى نصها: والله ما علم أحدٌ أنَّ لي بجُدّة رماحًا بعد الله غيري، وليست في شيء من نسخنا الخطية، ولم يذكرها ابن سعد في روايته لهذا الخبر 4/ 42، لكن وقع ذكرها في "الاستيعاب" لا بن عبد البر ص 717. وأشار محققه إلى اتفاق نُسخ "البداية والنهاية" الخطية على ذكر ابن إسحاق، وقد وقع في مطبوع "دلائل النبوة" 6/ 114: أبو إسحاق، ولا نظنُّه إلّا ذهولًا من محقق "الدلائل" عما في نسخه الخطية، فإنَّ ما عند ابن كثير نقلًا عن "الدلائل" هو العُمدة، ويؤيده رواية الطبراني بهذه السلسلة عدةَ أخبار إلى ابن إسحاق: هو محمد بن إسحاق المُطّلبي مولاهم صاحبُ السيرة.



[2] كذلك جاءت في نسخنا الخطية: حنين، ممنوعة من الصرف، على إرادة الواقعة، وربما كانت اللفظة على لغة ربيعة وغَنْم بأن تكون منصوبة في اللفظ إلّا أنها تكتب بغير ألف النصب. وأشار محققه إلى اتفاق نُسخ "البداية والنهاية" الخطية على ذكر ابن إسحاق، وقد وقع في مطبوع "دلائل النبوة" 6/ 114: أبو إسحاق، ولا نظنُّه إلّا ذهولًا من محقق "الدلائل" عما في نسخه الخطية، فإنَّ ما عند ابن كثير نقلًا عن "الدلائل" هو العُمدة، ويؤيده رواية الطبراني بهذه السلسلة عدةَ أخبار إلى ابن إسحاق: هو محمد بن إسحاق المُطّلبي مولاهم صاحبُ السيرة.



5151 [3] - وهو في "الطبقات الكبرى" لابن سعد 4/ 42 عن علي بن عيسى النوفلي، عن أبيه، عن عمه إسحاق بن عبد الله بن الحارث، عن عبد الله بن الحارث بن نوفل قال: لما أُسر نوفل … فذكره مسندًا. وعبدُ الله بنُ الحارث بن نوفل له رؤية، ولكن علي بن عيسى وأباه لا يُعرفان. وقد روى هذا الخبرَ البيهقيُّ في "دلائل النبوة" 3/ 144 عن أبي عبد الله الحاكم، بإسناده هذا الذي هنا موصولًا كما في "طبقات ابن سعد"!ثم عقّبه البيهقيُّ بقوله: المشهور عند أهل المغازي أن عباسًا رضي الله عنه فَداهُ! قلنا: رواه البيهقي في "الدلائل" 3/ 142 وقال: وهو عن ابن إسحاق، عن يزيد بن رومان عن عروة وعن الزهري وجماعةٍ، قالوا … وقال العباس بن عبد المطلب: يا رسول الله إني كنت مسلمًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "الله أعلم بإسلامك، فإن يكن كما تقول فالله يجزيك بذلك، فأما ظاهرًا منك فكان علينا، فافْدِ نفسك، وابنَي أخيك نوفل بن الحارث بن عبد المطلب وعقيل بن أبي طالب بن عبد المطلب … " وسيأتي عند المصنف برقم (5496). وأشار محققه إلى اتفاق نُسخ "البداية والنهاية" الخطية على ذكر ابن إسحاق، وقد وقع في مطبوع "دلائل النبوة" 6/ 114: أبو إسحاق، ولا نظنُّه إلّا ذهولًا من محقق "الدلائل" عما في نسخه الخطية، فإنَّ ما عند ابن كثير نقلًا عن "الدلائل" هو العُمدة، ويؤيده رواية الطبراني بهذه السلسلة عدةَ أخبار إلى ابن إسحاق: هو محمد بن إسحاق المُطّلبي مولاهم صاحبُ السيرة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5152)


5152 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا يحيى بن عثمان بن صالح، حدثنا حَسّان بن عبد الله، حدثنا ابن لَهِيعة، حدثنا يونس بن يزيد، حدثنا ابن [1] إسحاق، عن سعيد بن الحارث، عن جدِّه نوفل بن الحارث بن عبد المطّلب: أنه استعانَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في التَّزويج، فأنكَحَه امرأةً، فالتمَسَ شيئًا فلم يَجِدْه، فبعثَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أبا رافع وأبا أيوب بدِرْعِه فرَهَنَاهُ عند رجلٍ من اليهود بثلاثين صاعًا من شَعير، فدفَعَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فَطَعِمْنا منه نِصفَ سنةٍ، ثم كِلْناهُ فَوَجدْناهُ كما أدخَلْناه، قال نَوفلٌ: فذكرتُ لرسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "لو لم تَكِلْهُ لأكَلْتَ منه ما عِشْتَ" [2].وأما رَبيعةُ وعُبيدةُ بن الحارث بن عبد المطّلب والطُّفيلُ بن الحارث بن عبد المطّلب وحُصينُ بن الحارث، فإنهم قُتِلوا بين يدي رسول الله صلى الله عليه وسلم.




নওফল ইবনু হারিস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বিবাহের ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাহায্য চাইলেন। তখন তিনি তাকে এক মহিলার সাথে বিবাহ দিলেন। এরপর (নওফল) কিছু (খাদ্য/সামগ্রী) সন্ধান করলেন কিন্তু তা পেলেন না। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর (নিজস্ব) বর্মসহ আবু রাফে এবং আবু আইয়্যুবকে পাঠালেন। তারা বর্মটি একজন ইহুদীর কাছে ত্রিশ সা’ যবের বিনিময়ে বন্ধক রাখলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সেটি (যব) দিয়ে দিলেন। আমরা অর্ধ বছর তা থেকে খেলাম। এরপর যখন আমরা তা মেপে দেখলাম, তখন দেখলাম আমরা যে পরিমাণ এনেছিলাম তা ঠিক সেই পরিমাণই আছে। নওফল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বিষয়টি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট বললাম। তখন তিনি বললেন, “যদি তুমি তা না মাপতে, তবে তুমি যতদিন জীবিত থাকতে ততদিন তা থেকে খেতে পারতে।” আর রাবী‘আ, উবাইদাহ ইবনু হারিস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব, তুফায়ল ইবনু হারিস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব এবং হুসায়ন ইবনু হারিস—তাঁরা সকলে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সামনে শহীদ হয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: أبو إسحاق، وهو خطأ صوَّبناه من "دلائل النبوة" للبيهقي من روايته لهذا الخبر عن أبي عبد الله الحاكم، حيث أورده ابن كثير في "البداية والنهاية" 8/ 664، وأشار محققه إلى اتفاق نُسخ "البداية والنهاية" الخطية على ذكر ابن إسحاق، وقد وقع في مطبوع "دلائل النبوة" 6/ 114: أبو إسحاق، ولا نظنُّه إلّا ذهولًا من محقق "الدلائل" عما في نسخه الخطية، فإنَّ ما عند ابن كثير نقلًا عن "الدلائل" هو العُمدة، ويؤيده رواية الطبراني بهذه السلسلة عدةَ أخبار إلى ابن إسحاق: هو محمد بن إسحاق المُطّلبي مولاهم صاحبُ السيرة.



[2] إسناده ضعيف لضعف ابن لَهِيعة - وهو عبد الله بن لَهِيعة المصري - فقد ساء حفظه بعد احتراق كُتُبه، وسعيد بن الحارث لا يُعرف، وجَزْمُ ابن حجر في "إتحاف المهرة" (17215) بأنَّ له صُحبةً غير مُسلَّم له، إذ ليس له فيه سَلَفٌ، وقد ذكره ابن سعد في "الطبقات" 4/ 52 في أولاد الحارث بن نوفل، وأنَّ أمَّه أم ولد، ويبعُد إدراكه لجده نوفل، والله أعلم. ثم إنَّ ابن إسحاق مدلِّس وقد عنعن.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 6/ 114 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. لكن جاء عنده تقييد سعيد بن الحارث بابن عكرمة، وهو غريب! ووافق عروة بنَ الزبير على ذكر هؤلاء فيمن شهد بدرًا: الزهريُّ عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (345). وذكرهم كذلك ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 677 - 678.والواقديُّ في "مغازيه" 1/ 153.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5153)


5153 - أخبرنا بصِحّة ما ذكرتُه، أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، حدثنا أبو الأسود، عن عُروة بن الزُّبَير، قال: كان فيمن شهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم من قريش والأنصار ثلاثُ مئةِ رجلٍ وثلاثةَ عشرَ رجلًا. قال: ومن بني عبد المُطّلب بن عبد مَنَافٍ عُبيدة والطُّفيل وحُصينٌ بنو الحارث بن عبد المطّلب [1]. وقد اختَلفوا في رَبيعة بن الحارث فقيل: إنه عاشَ بعد ذلك وأدرَكَ أيامَ عمر بن الخطاب، وروى عن رسول الله صلى الله عليه وسلم:




উরওয়াহ ইবনুয-যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদর যুদ্ধে কুরাইশ ও আনসারদের মধ্য থেকে যারা অংশগ্রহণ করেছিলেন, তাদের সংখ্যা ছিল তিনশো তেরো জন পুরুষ।

তিনি আরো বলেন: আর আব্দুল মুত্তালিব ইবনু আব্দ মানাফের বংশধরদের মধ্য থেকে (যাঁরা অংশ নেন, তাঁরা হলেন): উবাইদা, তুফাইল ও হুসায়ন— এরা হলেন আল-হারিস ইবনু আব্দুল মুত্তালিবের পুত্রগণ।

রাবিয়া ইবনু আল-হারিস সম্পর্কে মতভেদ রয়েছে। কারো কারো মতে, তিনি এর পরেও জীবিত ছিলেন এবং উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগ পেয়েছিলেন এবং তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন: [পাঠের সমাপ্তি]




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم كما تقدم بيانه برقم (4378). أبو عُلَاثة: هو محمد بن عمرو بن خالد الحَرَّاني ثم المصري، وابن لَهِيعة: هو عبد الله، وأبو الأسود: هو محمد بن عبد الرحمن المعروف بيَتيم عروة. ووافق عروة بنَ الزبير على ذكر هؤلاء فيمن شهد بدرًا: الزهريُّ عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (345). وذكرهم كذلك ابن إسحاق كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 677 - 678.والواقديُّ في "مغازيه" 1/ 153.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5154)


5154 - حدَّثَناه علي بن حَمْشَاذَ العدل، حدثنا موسى بن إسحاق القاضي، حدثنا أبو بكر بن أبي شَيْبة، حدثنا ابن فُضيل، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث، عن رَبيعة بن الحارث بن عبد المُطَّلب قال: بلغ النبيَّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ قومًا نالُوا منه، وقالوا له: إنما مَثَلُ محمد كمَثَل نخلةٍ نَبَتَتْ في كُناسٍ، فغضب رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم قال: "أَيُّها الناسُ، إنَّ الله خَلَقَ خَلْقَه فجعلَهم فِرقَتين، فجعلَني في خير الفِرقَتين، ثم جعلَهم قَبائلَ، فجعلَني في خَيرِهم قبيلًا، ثم جعلَهم بُيوتًا، فجعلَني في خَيرِهم بيتًا"، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنا خَيرُكم قَبيلًا وخَيرُكم بيتًا" [1].




রবী‘আহ ইবনুল হারিস ইবন আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এ খবর পৌঁছাল যে, কিছু লোক তাঁর সমালোচনা করেছে এবং তাঁকে লক্ষ্য করে বলেছে: মুহাম্মাদের উপমা হলো এমন খেজুর গাছের মতো, যা আবর্জনার স্তূপে জন্মেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত হলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! আল্লাহ তাঁর সৃষ্টিকে সৃষ্টি করেছেন এবং তাদেরকে দু'টি ভাগে বিভক্ত করেছেন। অতঃপর তিনি আমাকে দুই ভাগের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ভাগে রেখেছেন। এরপর তিনি তাদেরকে বিভিন্ন গোত্রে বিভক্ত করেছেন এবং আমাকে তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ গোত্রে রেখেছেন। এরপর তিনি তাদেরকে বিভিন্ন পরিবারে বিভক্ত করেছেন এবং আমাকে তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ পরিবারে রেখেছেন।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বললেন: "আমি গোত্রের দিক থেকে তোমাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এবং পরিবারের দিক থেকেও তোমাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسنٌ لغيره، وهذا إسناد ضعيف لضعف يزيد بن أبي زياد - وهو الهاشمي مولاهم الكوفي - وقد اختُلِف عنه في تسمية الصحابي، كما سيأتي بيانه، وقولُه هنا: عن ربيعة بن الحارث، غريبٌ في رواية ابن أبي شيبة عن ابن فُضيل - وهو محمد - عن يزيد بن أبي زياد، فقد رواه ابن أبي شيبة في "مسنده" (919)، وفي "مصنفه" 11/ 430 عن ابن فُضيل، فسمَّى الصحابيَّ عبدَ المطَّلب بن ربيعة، وكذلك رواه عن ابن أبي شيبة غير واحدٍ، وكذلك رواه علي بن حرب الموصلي عن ابن فضيل.وأخرجه أحمد 29/ (17517) من طريق يزيد بن عطاء، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث بن نوفل، عن عبد المطلب بن ربيعة بن الحارث بن عبد المطلب. يعني كرواية ابن أبي شيبة عن ابن فضيل.وأخرجه أحمد 3/ (1788)، والترمذي (3532) و (3608) من طريق سفيان الثوري، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث، عن المطّلب بن أبي وداعة. وقال الترمذي: هذا حديث حسن. وأخرجه الترمذي (3607) من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله ابن الحارث، عن العباس بن عبد المطّلب. وقال الترمذي: هذا حديث حسن. ويشهد له حديث واثلة بن الأسقع عند أحمد 28/ (16986)، ومسلم (2276)، والترمذي (3605) و (3606)، وابن حبان (6242) بلفظ: "إنَّ الله اصطفى كِنانة من ولد إسماعيل، واصطفى قريشًا من كنانة، واصطفى من قريش بني هاشم، واصطفاني من بني هاشم".وذكر له البيهقيُّ في "دلائل النبوة" 1/ 165 - 176 شواهد أخرى يُرجع إليها.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5155)


5155 - قرأتُ في "تاريخ" أحمد بن عبد الله البَرْقي، حدثنا أبو عُبيد القاسم بن سَلَّام، عن هشام بن الكَلْبي في قول النبي صلى الله عليه وسلم: "وإن أول دَمٍ أَضَعُه دمُ ربيعة بن الحارث"، كان مُسترضَعًا في بني لَيثٍ فقَتَلَتْه هُذَيلٌ [1].قال هشامٌ: لم يُقتَل ربيعةُ، فإنه عاشَ بعد النبيِّ صلى الله عليه وسلم إلى خِلافة عمرَ، والذي قَتَلتْه هُذَيلٌ غيرُه. ‌‌ذكرُ مناقب سعيد بن الحارث بن عبد المُطَّلب رضي الله عنه -




হিশাম ইবনুল কালবী থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর এই উক্তি সম্পর্কে: "আর যে প্রথম রক্ত দাবি আমি রহিত করলাম, তা হলো রাবীআহ ইবনুল হারিসের রক্ত।" সে বনী লাইস-এর কাছে দুধ পানরত (পালিত) ছিল, অতঃপর তাকে হুযাইল গোত্র হত্যা করে। হিশাম বলেন: রাবীআহ নিহত হননি। কারণ তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর পরেও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফত পর্যন্ত বেঁচে ছিলেন। যাকে হুযাইল গোত্র হত্যা করেছিল, সে ছিল অন্য কেউ। সাঈদ ইবনে হারিস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদা বর্ণনা।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هشام بن الكلبي: هو هشام بن محمد بن السائب الكلبي، وهو متروك، وخبره هذا مُعضَل، لكن صحَّ الخبر موصولًا من حديث جابر بن عبد الله عند مسلم (1218)، وأبي داود (1905)، وابن ماجه (3074)، وابن حبان (1457) و (3944)، وقد وقع في أكثر الروايات: "دم ابن ربيعة بن الحارث"، وفي بعضها كما وقع هنا: "دم ربيعة".قال الطبراني في ذيل "المُذيَّل" كما في "منتخبه" لعُريب القرطبي 11/ 528: إنما قال النبي صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ أول دم أضعُه دم ربيعة بن الحارث" وربيعة حيٌّ، لأنَّ ذلك كان دمًا لربيعة الطلبُ به في الجاهلية، وذلك أنَّ ابنًا لربيعة صغيرًا كان مسترضَعًا في بني ليث بن بكر، وكان بين هذيل وبين ليث بن بكر حرب، فخرج ابن ربيعة بن الحارث، وهو طفل يَحبُو أمام البيوت، فرَمَتْه هُذيلٌ بحجرٍ، فأصابه الحجر فرضخ رأسه، فجاء الإسلام قبل أن يثأر ربيعة بن الحارث بدم ابنه، فأبطل النبي صلى الله عليه وسلم الطلبَ بذلك الدم، فلم يجعل لربيعة السبيل على قاتل ابنه …قلنا: فزال بذلك الإشكال الذي استشكله هشام بن الكلبي بإثره.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5156)


5156 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة، حدثنا أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، عن موسى بن جُبير، أنَّ أبا أُمامة بن سهل بن حُنيف أخبره: أنه قَدِمَ الشامَ في عهد مُعاوية، فلقِيَه نفرٌ من أهل الشام، فقالوا: ما قَرابَةُ ما بينَك وبينَ مُعاذ؟ قال: فقلتُ: ابن عمٍّ، قالوا: أفلا تُحدِّثُك بحديثٍ حدَّثَنا به قبل موتِه، ولم يكن حدَّثَنا به قبلَ ذلك؟ فقلتُ: بلى، فقال: حدَّثَنا قبل موتِه أنه سمعَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن لَقِيَ الله لا يُشركُ به، دَخَلَ الجنةَ" [1].




মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবূ উমামা ইবনু সাহল ইবনু হুনাইফ (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেন যে, তিনি মু'আবিয়াহর যুগে সিরিয়ায় (শামে) এসেছিলেন। শামের কিছু লোক তার সাথে সাক্ষাৎ করে জিজ্ঞেস করল, আপনার ও মু'আযের মধ্যে কী সম্পর্ক? তিনি বললেন, চাচাতো ভাই। তারা বলল, তিনি (মু'আয) তাঁর মৃত্যুর আগে আমাদের একটি হাদীস শুনিয়েছিলেন, যা এর আগে তিনি আমাদের শোনাননি। আমরা কি সেটি আপনাকে শোনাব না? তিনি বললেন, হ্যাঁ। তখন তারা বলল: তিনি (মু'আয) মৃত্যুর আগে আমাদেরকে শুনিয়েছিলেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর সাথে কাউকে শরীক না করে তাঁর সঙ্গে সাক্ষাৎ করবে (মৃত্যুবরণ করবে), সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف ابن لَهِيعة - وهو عبد الله - وموسى بن جُبير - وهو الأنصاري الحَذّاء - قال عنه ابن حبان بعد أن ذكره في "الثقات": يُخطئ ويخالف. قلنا: وللحديث طرق أُخَر عن مُعاذ بن جبل كما تقدَّم برقم (1315) يصحُّ بها. أبو عُلَاثة: هو محمود بن عمرو بن خالد الحَرَّاني ثم المصري.وانظر ما بعده.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5157)


5157 - قال موسى بن جُبير: فحدثتُ سَلْمان [1] الأغَرَّ بحديث أبي أُمامة هذا، فقال: أشهَدُ لَحَدَّثَني سعيدُ بن الحارث بن عبد المُطَّلب عن رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، مثلَ ما حَدَّث به الشامِيُّون عن مُعاذٍ [2]. ‌‌ذكرُ مناقب خالد سعيد بن العاص بن أُميّة بن عبد شَمْس بن عبد مَنَاف رضي الله عنه -




মূসা ইবনে জুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সালমান আল-আগার-এর কাছে আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসটি বর্ণনা করলাম। তখন তিনি (সালমান) বললেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, সাঈদ ইবনুল হারিস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে সেভাবেই বর্ণনা করেছেন, যেভাবে শামীরা মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। (এরপর অধ্যায়ের শিরোনাম শুরু হয়েছে:) খালিদ সাঈদ ইবনে আল-'আস ইবনে উমাইয়াহ ইবনে আবদে শামস ইবনে আবদে মানাফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদার আলোচনা।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: سليمان والمثبت على الصواب من "تلخيص المستدرك" للذهبي، ومن "إتحاف المهرة" لابن حجر (16769).



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف كسابقه.وأخرجه الدارقطني في كتاب "الإخوة" كما في "الإصابة" لابن حجر 3/ 100 من طريق عبد الله بن لَهِيعة، بهذا الإسناد.وقد تقدَّم نحو حديث معاذ بزيادةٍ برقم (60) من طريق عُبيد الله بن سلمان الأغر، عن أبيه، عنأبي أيوب الأنصاري، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما من عبد يعبد الله، لا يُشرك به شيئًا، ويقيم الصلاة، ويؤتي الزكاة، ويجتنب الكبائر إلّا دخل الجنة" … فكأنَّ هذا هو المحفوظ في رواية سلْمان الأغر، والله تعالى أعلم.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (5158)


5158 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن محمد بن إسحاق، قال: وممَّن خرج من أهل مكة مُهاجرًا إلى أرض الحبشة من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم من بني أُمَيَّة بن عبد شَمْس: خالدُ بنُ سعيد بن العاص بن أُميَّة بن عبد شَمْس بن عبد مَنَاف، ومعه امرأتُه، فوَلَدَت له بأرضِ الحبشة ابنَه سعيدَ بنَ خالدٍ [1].




মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাহাবীদের মধ্যে যারা মক্কা থেকে আবিসিনিয়ার (হাবশা) ভূমিতে হিজরত করে গিয়েছিলেন, উমাইয়া ইবনু আবদি শামসের বংশের তাদের মধ্যে ছিলেন: খালিদ ইবনু সাঈদ ইবনু আল-আস ইবনু উমাইয়া ইবনু আবদি শামস ইবনু আবদি মানাফ। তার সাথে তার স্ত্রীও ছিলেন, এবং আবিসিনিয়ার ভূমিতে তিনি তার পুত্র সাঈদ ইবনু খালিদকে জন্ম দিয়েছিলেন।




تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "السيرة النبوية" برواية يونس بن بُكَير (303)، وفي "السيرة النبوية" لابن هشام 1/ 23 و 2/ 359 - 360.وممَّن ذكر خالد بن سعيد وامرأته في مهاجرة الحبشة ابن شهاب الزهري عند عبد الرزاق (9743)، وهو عند البخاري في "تاريخه الأوسط" 1/ 238 والطحاوي في "أحكام القرآن" (410) وغيرهما عن الزهري عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث وسعيد بن المسيّب وعروة بن الزبير.وذكر هما كذلك ابن سعد في في "طبقاته" 4/ 91 عن الواقدي بإسناده إلى أم خالد بنت خالد بن سعيد بن العاص.وسيأتي ذكر مَقِدمه من الحبشة برقم (5168).