আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5159 - أخبرني أحمد بن يعقوب الثَّقفي، حدثنا موسى بن زكريا، حدثنا خَليفة بن خَيّاط، قال: أمُّ خالد بن سعيد بن العاص لُبَينةُ المعروفةُ بأمّ خالد بنت خبّاب [1] بن عبد يالِيلَ بن ناشِبِ بن غِيَرَة بن سَعْد بن لَيث بن بَكْر بن عبد مَنَاة بن علي بن كِنانة بن خُزَيمة.
৫১৫৯ - আহমাদ ইবনে ইয়া’কুব আস-সাকাফী আমাকে অবহিত করেছেন। তিনি বলেন, মূসা ইবনে যাকারিয়া আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, খলীফা ইবনে খাইয়্যাত আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন: খালিদ ইবনে সাঈদ ইবনুল আ’স-এর মা হলেন লুবাইনাহ, যিনি উম্মে খালিদ বিনতে খাব্বাব [১] ইবনে আবদ ইয়ালিল ইবনে নাশিব ইবনে গিয়ারা ইবনে সা’দ ইবনে লাইস ইবনে বকর ইবনে আবদ মানাত ইবনে আলী ইবনে কিনানা ইবনে খুযাইমা নামে পরিচিত।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) جناب، بالجيم ثم النون، بدل الخاء ثم الباء الموحدة، ولم يظهر إعجام هذين الحرفين في بقية نسخنا الخطية، لكن يُحتمل قراءتُها في (ص): خباب، وهذا هو الثابت في "طبقات خليفة بن خيّاط" في الطبعتين المحققتين منه طبعة العمري ص 11، وطبعة سُهيل زكار ص 40، وهو الموافق لما جاء في مطبوع "تاريخ دمشق" لابن عساكر في الجزء 19 بتحقيق مأمون الصاغرجي، حيث حقق هذا الجزء على ثلاث نسخ كلها جاء فيها: خباب، في سائر المواضع ذكر فيها ابن عساكر أم خالد بن سعيد بن العاص، وقد نقل اسمَها عن خليفة بن خياط وغيره في الصفحات 510 و 511 و 512 و 513، لكن قال ابن عساكر أثناء نقله قول خليفة ص 511 ما نصّه: أمه لُبَينة بن خبّاب - وفي أصل سماعنا: جناب … ثم قال ابن عساكر بعده بقليل: وذكره - يعني خليفة - في موضع آخر فقال: لُبَينة بنت خباب. فكأنَّ ابن عساكر أراد بذلك تأكيد صحة كون اسم أبيها خبابًا، والله تعالى أعلم.
5160 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، حدثني جعفر بن محمد بن خالد بن الزُّبير، عن محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان، قال: كان إسلامُ خالدٍ قديمًا، وكان أولَ إخوتِه أسلَم قَبلُ، وكان بَدْءُ إسلامه أنه رأى في النوم أنه وُقِف به على شَفِير النار، فذكر من سَعَتِها ما اللهُ أعلمُ، ويَرى في النوم كأنَّ أباهُ يَدفَعُه فيها، ويرى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم آخِذًا بحَقْوَيهِ لا يَقَعْ، ففَزِع من نومِه، فقال: أحلِفُ بالله إنَّ هذه لَرُؤيا حَقٍّ، فلقيَ أبا بكر بن أبي قُحَافة، فذكر ذلك له، فقال أبو بكر: أُريدَ بك خيرٌ، هذا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فاتَّبِعه، فإنك ستتَّبِعُه وتدخلُ معه في الإسلام، والإسلامُ يَحجُزُك أن تَدخُلَ فيها، وأبوك واقعٌ فيها، فلقي رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو بأجيادٍ، فقال: يا محمدُ، إلامَ تَدعُو؟ فقال: "أدعُو إلى الله وحدَه لا شَريكَ له، وأنَّ محمدًا عبدُه ورسولُه، وتَخلَعُ ما كنتَ عليه من عِبادة حَجَرٍ لا يُضُرُّ ولا يَنفَعُ، ولا يدري مَن عَبَدَه ممَّن لم يَعبُدْه" قال خالدٌ: فإني أشهدُ أن لا إله إلَّا الله، وأشهدُ أنك رسولُ الله، فسُرَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بإسلامِه، وتَغيَّب خالد، وعَلِمَ أبوه بإسلامه، فأرسل في طلبه [1] مَن بَقيَ من ولَدِه ممَّن لم يُسلِمْ ورافعًا مولاه، فوجدوه، فأتَوْا به أباهُ أبا أُحَيحَة، فأنَّبَه وبَكَّتَه وضربه بصَرِيمةٍ في يدِه حتى كَسَرها على رأسِه، ثم قال: اتَّبعتَ محمدًا وأنت تَرى خِلافَه قومَه، وما جاء به من عَيبِ آلهَتِهم وعَيبِه مَن مضى من آبائهم، فقال خالدٌ: قد صَدَقَ واللهِ واتَّبعتُه، فغَضِبَ أبوه أبو أُحَيحَة ونالَ منه وشَتَمَه، ثم قال: اذهبْ يا لُكَعُ حيث شئتَ، والله لأمنَعنَّك القُوتَ، فقال خالدٌ: إن مَنَعتَني فإنَّ الله عز وجل يَرزُقُني ما أعِيشُ به، فأخرجَه، وقال لِبَنِيه: لا يُكلِّمُه أحدٌ منكم إلَّا صنعتُ به ما صنعتُ به، فانصرف خالدٌ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكان يُكرِمُه ويكونُ معه [2].
মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনু উসমান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইসলাম গ্রহণ ছিল প্রাচীন (প্রথম দিকের), এবং তিনি তাঁর ভাইদের মধ্যে প্রথম ইসলাম গ্রহণকারী ছিলেন। তাঁর ইসলাম গ্রহণের সূচনা ছিল এই যে, তিনি স্বপ্নে দেখলেন যে তাঁকে জাহান্নামের কিনারায় দাঁড় করানো হয়েছে। (বর্ণনাকারী) সেটির প্রশস্ততার কথা উল্লেখ করলেন যা আল্লাহই ভালো জানেন। আর তিনি স্বপ্নে দেখলেন, যেন তাঁর পিতা তাঁকে তার (জাহান্নামের) মধ্যে ধাক্কা দিচ্ছেন। আর তিনি দেখলেন যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কোমর ধরে আছেন, ফলে তিনি পড়ে যাচ্ছেন না।
তখন তিনি ঘুম থেকে ভীত অবস্থায় জেগে উঠলেন এবং বললেন: আমি আল্লাহর কসম করে বলছি, এটি অবশ্যই একটি সত্য স্বপ্ন। এরপর তিনি আবূ বাকর ইবনু আবী কুহাফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করলেন এবং তাঁকে সেই স্বপ্নের কথা জানালেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনার জন্য কল্যাণ চাওয়া হয়েছে। ইনিই হলেন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনি তাঁকে অনুসরণ করুন। আপনি অবশ্যই তাঁকে অনুসরণ করবেন এবং তাঁর সাথে ইসলামের মধ্যে প্রবেশ করবেন। আর ইসলামই আপনাকে সেই (জাহান্নামে) প্রবেশ করা থেকে বিরত রাখবে, কিন্তু আপনার পিতা তাতে পতিত হবেন।
এরপর তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলেন, যখন তিনি আজইয়াদ নামক স্থানে ছিলেন। তিনি বললেন: হে মুহাম্মাদ! আপনি কিসের দিকে আহ্বান করেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি আহ্বান করি একমাত্র আল্লাহর দিকে, যাঁর কোনো শরীক নেই, আর এই সাক্ষ্যের দিকে যে, মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল। এবং আমি আহ্বান করি তোমাকে ত্যাগ করতে, যে পাথরের পূজা তুমি করতে, যা না কোনো ক্ষতি করতে পারে, না কোনো উপকার করতে পারে, আর যে তার ইবাদত করলো আর যে তার ইবাদত করলো না—তাও সে জানে না।" খালিদ বললেন: তবে আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি আল্লাহর রাসূল।
তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ইসলাম গ্রহণে অত্যন্ত আনন্দিত হলেন। খালিদ আত্মগোপন করলেন। তাঁর পিতা তাঁর ইসলাম গ্রহণের কথা জানতে পারলেন। তখন তিনি তাঁর অন্য সন্তানদের মধ্যে যারা ইসলাম গ্রহণ করেনি, আর তাঁর ক্রীতদাস রাফি'কে তাঁকে (খালিদকে) খোঁজার জন্য পাঠালেন। তারা তাঁকে খুঁজে পেল এবং তাঁর পিতা আবূ উহাইহার কাছে নিয়ে এল। তখন তিনি তাঁকে তিরস্কার করলেন, ধমকালেন এবং হাতে থাকা একটি মোটা লাঠি দিয়ে তাঁকে প্রহার করলেন, এমনকি সেটি তাঁর মাথায় ভেঙে গেল। এরপর তিনি বললেন: তুমি মুহাম্মাদের অনুসরণ করেছ, অথচ তুমি দেখছ যে সে তোমার সম্প্রদায়ের বিরোধিতা করছে এবং সে যা নিয়ে এসেছে তাতে তাদের দেব-দেবীকে দোষারোপ করা হয়েছে এবং তাদের পূর্ববর্তী বাপ-দাদাদের নিন্দা করা হয়েছে। খালিদ বললেন: আল্লাহর কসম! তিনি (মুহাম্মাদ) সত্য বলেছেন এবং আমি তাঁর অনুসরণ করেছি।
তখন তাঁর পিতা আবূ উহাইহা ক্ষুব্ধ হলেন, তাঁকে আঘাত করলেন এবং গালি দিলেন। এরপর বললেন: যাও, হে হতভাগা, যেখানে ইচ্ছা সেখানে চলে যাও! আল্লাহর কসম, আমি তোমার খাদ্য বন্ধ করে দেব! খালিদ বললেন: আপনি যদি আমার খাদ্য বন্ধ করেনও, তবুও আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা আমাকে জীবিকা নির্বাহের জন্য রিযক (খাদ্য) দেবেন। অতঃপর তিনি তাঁকে বের করে দিলেন এবং তাঁর অন্য ছেলেদের বললেন: তোমাদের কেউ যেন তার সাথে কথা না বলে, নতুবা আমি তার সাথেও তাই করব যা আমি তার সাথে করেছি। এরপর খালিদ আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে গেলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে সম্মান করতেন এবং তিনি তাঁর সাথে থাকতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في نسخنا الخطية: طلب، بدون هاء الضمير، وهو خطأ، والمثبت على الصواب من رواية البيهقي في "دلائل النبوة" عن أبي عبد الله الحاكم، بإسناده هذا، وهو كذلك في "طبقات ابن سعد" عن شيخه محمد بن عمر الواقدي. الواقدي - خبر أبي أحيحة سعيد بن العاص مع ابنه خالد لما أسلم من طريق أخرى تقدَّمت عند المصنف برقم (5122)، لكن لم يسُق النبي هنا بتمامه، وساقه ابن سعد في "طبقاته" 4/ 88 و 89 من تلك الطريق المشار إليها، وهي معضلة كذلك، لكن باجتماعهما يقوى الخبر إن شاء الله.وأما قصة الرؤيا التي رآها خالد بن سعيد فلم تَرِد إلّا في هذه الطريق التي هنا.وقد روي في رؤياه التي رآها غير ذلك، وهو ما أخرجه الحُسينُ المحاملي في "أماليه" (248)، والدارقطني في "الأفراد" (60)، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 1/ 19 - 20، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 16/ 67 - 68 من طريق محمد بن عمر الواقدي، عن إسماعيل بن إبراهيم بن عقبة، عن عمه موسى بن عقبة، عن أم خالد بنت خالد بن سعيد، قالت: لما كان قبيل مبعث النبي صلى الله عليه وسلم بينا خالد بن سعيد ذات ليلة نائم، قال: رأيت كأنه غشيت مكة ظلمة حتى لا يبصر امرؤ كفَّه، فبينا هو كذلك إذ خرج نور، ثم علا في السماء، فأضاء في البيت، ثم أضاءت مكة كلها، ثم إلى نجدٍ ثم إلى يثرب، فأضاء، حتى إني لأنظر إلى البُسر في النخل، فاستيقظت، فقصصتها على أخي عمرو بن سعيد، وكان جَزْلَ الرأي، فقال: يا أخي إنَّ هذا الأمر يكون في بني عبد المطلب، ألا ترى أنه خرج من حفيرة أبيهم. قال خالد: فإنه لما هداني الله به إلى الإسلام … وهذا فيه الواقدي أيضًا، ولكن إسناده من فوق الواقدي كلهم ثقات، وروي نحوه عند ابن سعد 1/ 139 من مرسل صالح بن كيسان، فهذا أصح في رؤيا خالد بن سعيد التي كانت سببًا في إسلامه، والله أعلم.والصَّرِيمة: القِطعة من النخل أو غيره.
[2] خبر أبي أحيحة مع ابنه خالد حسن لغيره إن شاء الله، وهذا إسناد مُعضل من أجل أنَّ محمد بن عبد الله بن عمرو بن عثمان بن عفان من تبع الأتباع، لكن روى محمدُ بن عمر - وهو الواقدي - خبر أبي أحيحة سعيد بن العاص مع ابنه خالد لما أسلم من طريق أخرى تقدَّمت عند المصنف برقم (5122)، لكن لم يسُق النبي هنا بتمامه، وساقه ابن سعد في "طبقاته" 4/ 88 و 89 من تلك الطريق المشار إليها، وهي معضلة كذلك، لكن باجتماعهما يقوى الخبر إن شاء الله.وأما قصة الرؤيا التي رآها خالد بن سعيد فلم تَرِد إلّا في هذه الطريق التي هنا.وقد روي في رؤياه التي رآها غير ذلك، وهو ما أخرجه الحُسينُ المحاملي في "أماليه" (248)، والدارقطني في "الأفراد" (60)، والخطيب في "موضح أوهام الجمع والتفريق" 1/ 19 - 20، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 16/ 67 - 68 من طريق محمد بن عمر الواقدي، عن إسماعيل بن إبراهيم بن عقبة، عن عمه موسى بن عقبة، عن أم خالد بنت خالد بن سعيد، قالت: لما كان قبيل مبعث النبي صلى الله عليه وسلم بينا خالد بن سعيد ذات ليلة نائم، قال: رأيت كأنه غشيت مكة ظلمة حتى لا يبصر امرؤ كفَّه، فبينا هو كذلك إذ خرج نور، ثم علا في السماء، فأضاء في البيت، ثم أضاءت مكة كلها، ثم إلى نجدٍ ثم إلى يثرب، فأضاء، حتى إني لأنظر إلى البُسر في النخل، فاستيقظت، فقصصتها على أخي عمرو بن سعيد، وكان جَزْلَ الرأي، فقال: يا أخي إنَّ هذا الأمر يكون في بني عبد المطلب، ألا ترى أنه خرج من حفيرة أبيهم. قال خالد: فإنه لما هداني الله به إلى الإسلام … وهذا فيه الواقدي أيضًا، ولكن إسناده من فوق الواقدي كلهم ثقات، وروي نحوه عند ابن سعد 1/ 139 من مرسل صالح بن كيسان، فهذا أصح في رؤيا خالد بن سعيد التي كانت سببًا في إسلامه، والله أعلم.والصَّرِيمة: القِطعة من النخل أو غيره.
5161 - أخبرني عبد الله بن محمد بن إسحاق الخُزاعي بمكة، حدثنا أبو يحيى عبد الله بن أحمد بن أبي مَسَرّة، حدثنا أحمد بن محمد بن الوليد الأزرقي، حدثنا عمرو بن يحيى بن سعيد بن العاص، عن جدِّه، عن عَمِّه خالد بن سعيد: أنَّ سعيد بن العاص بن أميّة مَرِض، فقال: لئن رَفَعَني اللهُ من مَرَضي هذا لا يُعبَدُ إلهُ ابن أبي كَبْشَةَ ببَطْنِ مكة، فقال خالد بن سعيد عند ذلك: اللهم لا ترَفَعْه [1]. فأمَّا وفاةُ خالد بن سعيد وكُنْيتُه:
খালিদ ইবনু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনু আল-আস ইবনু উমাইয়াহ অসুস্থ হয়ে পড়লে সে বলল: যদি আল্লাহ আমাকে আমার এই অসুস্থতা থেকে মুক্তি দেন, তবে মক্কার অভ্যন্তরে ইবনু আবী কাবশাহের (অর্থাৎ রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) ইলাহের ইবাদত করা হবে না। তখন খালিদ ইবনু সাঈদ এ কথা শুনে বললেন: হে আল্লাহ, আপনি তাকে আরোগ্য দান করবেন না।
(এরপর খালিদ ইবনু সাঈদ-এর ইন্তেকাল ও কুনিয়াত সম্পর্কিত বিবরণ রয়েছে।)
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه منقطع، فإنَّ سعيد بن العاص - وهو سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص بن سعيد بن العاص بن أميّة، نسب هنا لجد أبيه الأدنى أو الأعلى - لا يُدرك خالدَ بن سعيد بن العاص، وقد سمع سعيدُ بن عمرو هذا من أم خالد بنت خالد بن سعيد، فلعله سمع هذا الخبر منها، فإن صحَّ ذلك اتصل الإسناد وكان صحيحًا، والله تعالى أعلم. وأخرجه ابن سعد 4/ 89، والطبراني في "الكبير" (4119)، وابن عساكر 16/ 176 من طرق عن عمرو بن يحيى، به.
5162 - فأخبَرَناه أبو سعيد الثَّقَفي، حدثنا موسى بن زكريا التُّستَري، حدثنا خَليفة بن خَيّاط، حدثني الوليد بن هشام القَحْذَمي [1]، عن أبيه، عن جده، قال: استُشْهِد يومَ مَرْجِ الصُّفَّر خالدُ بنُ سعيد بن العاص [2]. قال خليفة: وهو في سنة ثلاثَ عشرةَ، قال: وتوفي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وهو عاملُه على اليمن [3].
আল-ওয়ালীদ ইবনে হিশাম আল-কাহদামির দাদা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মারজে সুফফার নামক দিনে খালিদ ইবনে সাঈদ ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হয়েছিলেন। খলীফা (ইবনে খাইয়্যাত) বলেন: এটি ছিল তেরো হিজরীতে। তিনি (দাদা) আরও বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইন্তেকাল করেন, তখন তিনি (খালিদ) ছিলেন তাঁর পক্ষ থেকে ইয়ামানের শাসক।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: المخزومي، والصواب ما أثبتنا، فإنَّ الوليد بن هشام هو ابن قَحْذَم بن سليمان بن ذكوان، وهو الأزدي الجَزْمي البصري، ولا ذكر لمخزومٍ في نسبه لا أصالةً ولا موالاةً. المذكورين، وإبراهيم بن يوسف بن معمر المذكور يُعرف بالسَّعدي، روى عنه سَلْم بن جُنادة ومحمد بن عبيد الله بن يزيد المُنادي ومِنْجاب بن الحارث، وروى عنه هذا الأخيرُ كتاب "المبتدأ" لابن إسحاق، عن زياد البكائي عن ابن إسحاق، فيما قاله أبو بكر بن أبي داود في "المصاحف" (114)، وقال عنه أبو بكر: لا بأس به، وذكره ابن حِبّان في "الثقات".وهو في "المسند" لأبي العباس محمد بن إسحاق بن إبراهيم السرّاج كما في "الإصابة" لابن حجر 2/ 102، ومن طريقه أخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2428)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 25.
[2] لا بأس برجاله، وكلٌّ من الوليد بن هشام وأبيه وجده قد روى عنه جمعٌ وذكره ابن حبان في "الثقات"، بل قال الذهبي في قَحذَمٍ جدِّ الوليد في "تاريخ الإسلام": ما علمت به بأسًا. قلنا: وقحذمٌ هذا تابعيٌّ.وهو في "تاريخ خليفة بن خياط" ص 120، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 16/ 84 و 46/ 28. المذكورين، وإبراهيم بن يوسف بن معمر المذكور يُعرف بالسَّعدي، روى عنه سَلْم بن جُنادة ومحمد بن عبيد الله بن يزيد المُنادي ومِنْجاب بن الحارث، وروى عنه هذا الأخيرُ كتاب "المبتدأ" لابن إسحاق، عن زياد البكائي عن ابن إسحاق، فيما قاله أبو بكر بن أبي داود في "المصاحف" (114)، وقال عنه أبو بكر: لا بأس به، وذكره ابن حِبّان في "الثقات".وهو في "المسند" لأبي العباس محمد بن إسحاق بن إبراهيم السرّاج كما في "الإصابة" لابن حجر 2/ 102، ومن طريقه أخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2428)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 25.
5162 [3] - الذي في "تاريخ خليفة" ص 97: استعمل (يعني رسول الله صلى الله عليه وسلم) على صنعاء خالد بن سعيد بن العاص.وسيأتي في الروايات التالية كون خالد بن سعيد كان عاملًا لرسول الله صلى الله عليه وسلم على اليمن. المذكورين، وإبراهيم بن يوسف بن معمر المذكور يُعرف بالسَّعدي، روى عنه سَلْم بن جُنادة ومحمد بن عبيد الله بن يزيد المُنادي ومِنْجاب بن الحارث، وروى عنه هذا الأخيرُ كتاب "المبتدأ" لابن إسحاق، عن زياد البكائي عن ابن إسحاق، فيما قاله أبو بكر بن أبي داود في "المصاحف" (114)، وقال عنه أبو بكر: لا بأس به، وذكره ابن حِبّان في "الثقات".وهو في "المسند" لأبي العباس محمد بن إسحاق بن إبراهيم السرّاج كما في "الإصابة" لابن حجر 2/ 102، ومن طريقه أخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2428)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 25.
5163 - فحدثني أبو الحسين بن يعقوب الحافظ، حدثنا محمد بن إسحاق بن إبراهيم، حدثنا سَلْم بن جُنادة، حدثنا إبراهيم بن يوسف بن مَعمَر بن حمزة بن عمر بن سعد بن أبي وقّاص، حدثني خالد بن سعيد بن عمرو بن سعيد، حدثني أبي: أنَّ أعمامَه خالدًا وأبانًا وعمرَو بن سعيد بن العاص رَجَعُوا عن أعمالهم حين بلغَهم وفاةُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فقال أبو بكر: ما أحدٌ أحقَّ بالعملِ من عُمّال رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، ارجِعُوا إلى أعمالِكم، فقالوا: لا نَعملُ بعدَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم لأحدٍ، فخرجوا إلى الشام، فقُتِلوا عن آخِرِهم [1].
খালিদ বিন সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর চাচারা—খালিদ, আবান এবং আমর বিন সাঈদ বিন আল-আস—যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাতের খবর পেলেন, তখন তাঁরা তাঁদের কর্মক্ষেত্র থেকে ফিরে এলেন। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিযুক্ত কর্মচারীদের চেয়ে আর কেউ কাজের জন্য অধিক উপযুক্ত নয়। তোমরা তোমাদের কর্মস্থলে ফিরে যাও। তাঁরা বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে আমরা আর কারো জন্য কাজ করব না। অতঃপর তাঁরা শাম (সিরিয়া)-এর উদ্দেশ্যে বের হলেন, আর তাঁরা সকলেই সেখানে শহীদ হয়ে গেলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسلٌ من أجل أنَّ سعيد بن عمرو لم يدرك أحدًا من أعمامه المذكورين، وإبراهيم بن يوسف بن معمر المذكور يُعرف بالسَّعدي، روى عنه سَلْم بن جُنادة ومحمد بن عبيد الله بن يزيد المُنادي ومِنْجاب بن الحارث، وروى عنه هذا الأخيرُ كتاب "المبتدأ" لابن إسحاق، عن زياد البكائي عن ابن إسحاق، فيما قاله أبو بكر بن أبي داود في "المصاحف" (114)، وقال عنه أبو بكر: لا بأس به، وذكره ابن حِبّان في "الثقات".وهو في "المسند" لأبي العباس محمد بن إسحاق بن إبراهيم السرّاج كما في "الإصابة" لابن حجر 2/ 102، ومن طريقه أخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (2428)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 25.
5164 - أخبرني أبو نُعيم محمد بن عبد الرحمن الغِفاري بمَرُو، حدثنا عَبْدان بن محمد بن عيسى الحافظ، سمعت عبد الله بن مُسلم يَذكُر عن أبي اليَقْظان وغيره: أنَّ خالد بن سعيد بن العاص أسلمَ قبلَ أبي بكر الصِّدّيق [1].هذا وهمٌ من قائله، فقد قدّمتُ الروايةَ أنَّ أبا بكر هو الذي دَعَاه إلى الإسلامِ حتى أسلمَ [2].
আবু ইয়াকযান ও অন্যান্য রাবীগণ থেকে বর্ণিত: নিশ্চয়ই খালিদ বিন সাঈদ বিন আল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পূর্বে ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন। [গ্রন্থকারের মন্তব্য:] এটি তার বর্ণনাকারীর পক্ষ থেকে একটি ভুল/ভ্রম। কেননা আমি ইতিপূর্বে সেই বর্ণনাটি পেশ করেছি যে, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ই তাঁকে ইসলামের দাওয়াত দিয়েছিলেন, ফলে তিনি ইসলাম গ্রহণ করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف منكر لضعف أبي اليقظان - وهو عثمان بن عمير البَجَلي - ثم هو مُعضَل لأنَّ أبا اليقظان من تبع الأتباع، وعبد الله بن مسلم - وهو ابن قُتيبة الدِّينَورِي - لم يدرك أبا اليقظان، إنما يروي عنه بواسطةٍ أو نقلًا عن كتاب أبي اليقظان.
[2] يعني الرواية المتقدمة برقم (5160).
5165 - وحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، حدثني ابن إسحاق، عن محمد بن عبد الله بن أبي بكر، عن أبيه: أنَّ خالد بن سعيد حين وَلّاه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم اليمنَ قَدِمَ بعد وفاةِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وتَربَّص ببيعتِه، شهرَين، يقول: قد أمَّرني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، ثم لم يَعزِلْني حتى قَبضَه اللهُ عز وجل، وقد لقي عليَّ بنَ أبي طالب وعثمانَ بنَ عفّان، فقال: يا بَني عبد مَنافٍ، طِبتُم نَفْسًا عن إمرتِكم، يَلِيهِ غَيرُكم، قال: فأما أبو بكر فلم يَحفِلْها [1] عليه، وأما عمرُ فاضطَغَنَها [2] عليه، ثم بعث أبو بكر الجنودَ إلى الشام، فكان أولَ من استَعمَل على رَبْعٍ منها خالدُ بنُ سعيد، فأخذ عمرُ يقول: أتُؤمِّره وقد صَنَع ما صَنَع وقال ما قال؟! فلم يَزلْ بأبي بكر حتى عَزَله وأمَّر يزيدَ بنَ أبي سفيان [3].حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
খালিদ ইবনু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁকে ইয়ামেনের শাসক নিযুক্ত করেন, তখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাতের পরে মদীনায় ফিরে আসেন এবং দুই মাস পর্যন্ত বায়আত হওয়া থেকে বিরত থাকেন। তিনি বলছিলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে শাসক বানিয়েছিলেন এবং আল্লাহ তা'আলা তাঁকে উঠিয়ে না নেওয়া পর্যন্ত তিনি আমাকে পদচ্যুত করেননি। তিনি আলী ইবনু আবী তালিব এবং উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করেন এবং বলেন: হে বানু আবদে মানাফ, তোমরা কি তোমাদের নেতৃত্ব হাতছাড়া হতে দিয়ে স্বচ্ছন্দ বোধ করছো? এখন অন্য কেউ এর দায়িত্ব নেবে! বর্ণনাকারী বলেন: আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর এই বক্তব্যকে তেমন গুরুত্ব দেননি। কিন্তু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটিকে তাঁর বিরুদ্ধে শত্রুতা হিসেবে ধরে নেন। এরপর আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সিরিয়ার দিকে সৈন্যদল প্রেরণ করেন এবং সেই সময় সিরিয়ার একটি অংশের (রুব') ওপর খালিদ ইবনু সাঈদকেই প্রথম নিযুক্ত করেন। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতে শুরু করেন: আপনি কি তাকেই সেনাপতি নিযুক্ত করবেন, যে এমন কাজ করেছে এবং এমন কথা বলেছে?! তিনি আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ক্রমাগত বলতে থাকেন, অবশেষে তিনি খালিদকে পদচ্যুত করেন এবং ইয়াযীদ ইবনু আবী সুফিয়ানকে নিযুক্ত করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّفت في نسخنا الخطية إلى: يجعلها، من الجَعْل، وإنما هي: يَحفِلها، من الحَفْل: وهي المُبالاة، يقال: لا أَحفِلُه، أي: لا أُباليه. وعند بعض من ذكر الخبر: فلم يَحفِل بها. ويجوز أن يتعدّى بنفسه وبالباء.
[2] تحرَّفت في نسخنا الخطية إلى: فاصطنعها، وجاءت على الصواب في "تلخيص المستدرك" للذهبي، وفاقًا لسائر مصادر تخريج الخبر، وهي من اضطَغَن الرجلُ: إذا حمل في نفسه حقدًا. التوضيح والتصحيح" لابن مالك ص 170، و"النحو الوافي" لعباس حسن 2/ 111 - 123.
5165 [3] - حسنٌ لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكن المحفوظ أنه من رواية محمد بن إسحاق صاحب السيرة عن عبد الله بن أبي بكر محمد بن عمرو بن حزم مرسلًا، وليس لعبد الله بن أبي بكر عَقِبٌ كما نصّ عليه الواقدي فيما نقله عنه ابن سعد في "طبقاته" 7/ 491، فالخبر من مرسل عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، وفيه أيضًا عنعنةُ ابن إسحاق لكن روي الخبر من غير وجهٍ، فهو حسنٌ بمجموعها.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 3/ 387، ومن طريقه ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 378 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 16/ 78 من طريق إسحاق بن بشر البخاري، كلاهما عن ابن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم مرسلًا.وأخرجه عبد الرزاق (9770) عن معمر، عن الزهري، مرسلًا مثلُه.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات" 4/ 91، ومن طريقه ابن عساكر 16/ 79 - 80 عن محمد بن عمر الواقدي، عن جعفر بن محمد بن خالد بن الزبير بن العوام، عن إبراهيم بن عقبة، عن أم خالد بنت خالد بن سعيد بن العاص.وذكرت فيه أم خالد أنَّ أباها بايع أبا بكر بعد ثلاثة أشهر، بايعه في المسجد وأبو بكر على المنبر. التوضيح والتصحيح" لابن مالك ص 170، و"النحو الوافي" لعباس حسن 2/ 111 - 123.
5166 - أخبرنا أبو نُعَيم الغِفاري بمَرْوٍ محمد [1] بن عبد الرحمن، حدثنا عَبْدان بن محمد بن عيسى الحافظ، سمعت أحمد بن سَيّار، يقول: خالد بن سعيد بن العاص وُلِد لأبيه سعيدٍ عشرون [2] ابنًا وعشرون ابنةً، فأما العاصُ بن سعيد فإنَّ أمير المؤمنين علي بن أبي طالب قتلَه مُشركًا يومَ بدرٍ، وأما خالدُ بن سعيد فإنه قُتل يوم مَرْجِ الصُّفَّر في المُحرَّم سنة أربعَ عشرةَ في خلافة عُمر بن الخطاب [3].
আহমদ ইবনু সায়্যার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খালিদ ইবনু সাঈদ ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তাঁর পিতা সাঈদের বিশ জন পুত্র ও বিশ জন কন্যা জন্মগ্রহণ করেছিল। আর আল-আস ইবনু সাঈদের ক্ষেত্রে: আমীরুল মু'মিনীন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদরের দিন মুশরিক অবস্থায় তাকে হত্যা করেছিলেন। আর খালিদ ইবনু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ক্ষেত্রে: তিনি মার্জুস সফ্ফার-এর দিনে মুহাররাম মাসে, হিজরী চৌদ্দ সনে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে নিহত হন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب) ومحمد، بإقحام حرف الواو، وإنما اسم أبي نُعيم الغِفاري محمد بن عبد الرحمن. التوضيح والتصحيح" لابن مالك ص 170، و"النحو الوافي" لعباس حسن 2/ 111 - 123.
[2] جاء في نسخنا الخطية في الموضعين: عشرين، بالنصب، والجادَّة ما أثبتنا. وانظر "شواهد التوضيح والتصحيح" لابن مالك ص 170، و"النحو الوافي" لعباس حسن 2/ 111 - 123.
5166 [3] - لم يزد علماء الأنساب في تسمية أبناء سعيد بن العاص أبي أُحيحة على ثمانية، وقد سماهم مصعب الزبيري في "نسب قريش" ص 176. وأسند ابن أبي الدنيا في "الإشراف في منازل الأشراف" (303) عن عبد العزيز الأموي يحدثُ عن أهل بيته قال: ولد سعيد بن العاص أبو أُحيحة ثمانية رجال، وسمّاهم، وذكر موضع مقتل كل واحدٍ منهم. كما نبَّه عليه أبو نعيم في "المعرفة".وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 1/ 407 عن أبي نعيم الفضل بن دُكين، عن إسحاق، عن سعيد: أن خالد بن سعيد أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم … فذكره مرسلًا.وأخرجه ابن سعد 1/ 407، وإسحاق بن إبراهيم الخُتَّلي في "الديباج" (144)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 4/ 264، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 183 من طريق عمرو بن يحيى بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص بن سعيد بن العاص بن أمية، عن جده سعيد بن عمرو، قال: دخل عمرو بن سعيد بن العاص حين قدم من الحبشة على رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره مرسلًا أيضًا، غير أنه جعل الخاتم لعمرو بن سعيد بن العاص، وليس لأخيه خالد بن سعيد، وزاد: فكان في يده حتى قُبض، ثم في يد أبي بكر حتى قُبض، ثم في يد عمر حتى قُبض، ثم لبسه عثمان حتى حُفر بئر بالمدينة يقال له: أَريس، فبينا هو جالس على شفيرها سقط في البئر، فطُلب فلم يوجد. وليس فيه أنه كان من حديد، بل جاء عند الخُتَّلي أنه كان من فضة.وهذا هو الصحيح في ذكر الخاتم الذي اتخذه رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه كان من فضة، وهو الذي أخذه من بعده أبو بكر ثم عمر ثم عثمان، ثم سقط في بئر أريس، كما رواه عبد الله بن عمر بن الخطاب عند البخاري (5866) ومسلم (2091) وغيرهما، وهو الذي كان نقشُه: محمد رسول الله، كما في حديث ابن عمر المذكور، وكما في حديث أنس أيضًا عند البخاري (65)، ومسلم (2092) وغيرهما.
5167 - أخبرنا أبو عبد الله محمد بن عبد الله المُزَنِي، حدثنا أحمد بن نَجْدة، حدثنا يحيى بن عبد الحميد، حدثنا إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص، عن أبيه سعيد بن عمرو، عن خالد بن سعيد بن العاص: أنه أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم وفي يده خاتمٌ، فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم: "ما هذا الخاتَمُ؟ " فقال: خاتَمٌ اتخذتُه، قال: "فاطرَحْه"، فطرحتُه إليه، فإذا هو خاتمٌ من حديد، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "ما نَقْشُه؟ " قلت: محمدٌ رسولُ الله، فأخَذَه النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فتَختَّم به حتى مات، فهو الخاتَمُ الذي كان في يدِه [1]. صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
খালিদ ইবনু সাঈদ ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলেন, তখন তাঁর হাতে একটি আংটি ছিল। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: “এই আংটি কিসের?” তিনি বললেন: “এটি একটি আংটি যা আমি বানিয়েছি।” তিনি (নবী) বললেন: “এটি ফেলে দাও।” অতঃপর আমি তা তাঁর দিকে ফেলে দিলাম। সেটি ছিল লোহার আংটি। অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এর উপর কী খোদাই করা?” আমি বললাম: “মুহাম্মাদ রাসূলুল্লাহ।” অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা নিলেন এবং তিনি ইন্তিকাল (মৃত্যু) করা পর্যন্ত তা পরিধান করলেন। এটিই সেই আংটি যা তাঁর হাতে ছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله لا بأس بهم، لكنه منقطع، فإنَّ سعيد بن عمرو لم يدرك خالد بن سعيد بن العاص، وقد رواه أبو نعيم الفضل بن دُكين عن إسحاق بن سعيد عن أبيه سعيد بن عمرو: أن خالد بن سعيد أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكر الحديث مرسلًا. وكذلك رواه عمرو بن يحيى بن سعيد بن عمرو، عن جده سعيد بن عمرو مرسلًا، وهذا واضحٌ في انقطاعه.وأخرجه ابن أبي خيثمة في السفر الثاني من "تاريخه" 1/ 193، والطبراني في "الكبير" (4118)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (2430) من طرق عن يحيى بن عبد الحميد - وهو الحِمّاني - بهذا الإسناد. وزادوا في رواياتهم: خاتم من حديد مَلْويٌّ عليه فضة.وأخرجه ابن جرير الطبري في "أسماء من روى عن النبي صلى الله عليه وسلم من القبائل" كما في "أحكام الخواتيم" لابن رجب الحنبلي ص 39 - 40 من طريق أبي أحمد الزبيري، عن إسحاق بن عمرو، به. وزاد في روايته كذلك: خاتم من حديد قد لُوي عليه فضة. ووقع في مطبوع "أحكام الخواتيم": أحمد يدل أبي أحمد، وإنما الذي روى هذا الحديث أبو أحمد الزبيري كما نبَّه عليه أبو نعيم في "المعرفة".وأخرجه ابن سعد في "طبقاته" 1/ 407 عن أبي نعيم الفضل بن دُكين، عن إسحاق، عن سعيد: أن خالد بن سعيد أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم … فذكره مرسلًا.وأخرجه ابن سعد 1/ 407، وإسحاق بن إبراهيم الخُتَّلي في "الديباج" (144)، والطحاوي في "شرح معاني الآثار" 4/ 264، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 4/ 183 من طريق عمرو بن يحيى بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص بن سعيد بن العاص بن أمية، عن جده سعيد بن عمرو، قال: دخل عمرو بن سعيد بن العاص حين قدم من الحبشة على رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره مرسلًا أيضًا، غير أنه جعل الخاتم لعمرو بن سعيد بن العاص، وليس لأخيه خالد بن سعيد، وزاد: فكان في يده حتى قُبض، ثم في يد أبي بكر حتى قُبض، ثم في يد عمر حتى قُبض، ثم لبسه عثمان حتى حُفر بئر بالمدينة يقال له: أَريس، فبينا هو جالس على شفيرها سقط في البئر، فطُلب فلم يوجد. وليس فيه أنه كان من حديد، بل جاء عند الخُتَّلي أنه كان من فضة.وهذا هو الصحيح في ذكر الخاتم الذي اتخذه رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه كان من فضة، وهو الذي أخذه من بعده أبو بكر ثم عمر ثم عثمان، ثم سقط في بئر أريس، كما رواه عبد الله بن عمر بن الخطاب عند البخاري (5866) ومسلم (2091) وغيرهما، وهو الذي كان نقشُه: محمد رسول الله، كما في حديث ابن عمر المذكور، وكما في حديث أنس أيضًا عند البخاري (65)، ومسلم (2092) وغيرهما.
5168 - حدثنا أبو محمد أحمد بن عبد الله المُزَني، حدثنا محمد بن عبد الله الحَضْرمي، حدثنا عبد الله بن عمر بن أبان، حدثنا خالد بن سعيد بن عمرو بن سعيد، سمعت أبي يَذكُر عن عمِّه خالد بن سعيد الأكبر: أنه قَدِمَ على رسولِ الله صلى الله عليه وسلم حين قَدِم من أرض الحبشة ومعه ابنتُه أم خالد، فجاء بها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وعليها قَميصٌ أصفَرُ، وقد أعجَبَ الجاريةَ قميصُها، وقد كانت فَهمتْ بعضَ كلام الحبشة، فراطَنَها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بكلامِ الحبشة: "سَنَهْ سَنَهْ" وهي بالحبشة: حَسَن حَسَن، ثم قال لها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أَبلِي وأَخلِقي، أَبلي وأَخلِقي" - قال: فأبلَتْ واللهِ ثم أخلَفَتْ - ثم مالَتْ إلى ظَهْر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فوضعت يدَها على مَوضِع خاتَم النُّبوّة، فأخذها أبوها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "دَعُها" [1].صحيح الإسناد، فقد اتفق الشيخان على إخراج أحاديثَ لإسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد عن آبائه وعُمومته، وهذه أمُّ خالد بنت خالد بن سعيد بن العاص التي حملها أبوها صغيرةً إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، صَحِبَتْ بعد ذلك رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، وقد رَوَتْ عنه.
খালিদ ইবনু সাঈদ আল-আকবার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবিসিনিয়ার (হাবশা) ভূমি থেকে আসার পর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, তখন তার সাথে তার কন্যা উম্মু খালিদও ছিল। তার (উম্মু খালিদের) পরনে ছিল একটি হলুদ রঙের জামা। মেয়েটি তার জামাটি খুব পছন্দ করেছিল এবং সে হাবশার কিছু কথা বুঝতে পারত। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাবশার ভাষায় তার সাথে কথা বললেন: "সানাহ, সানাহ"। হাবশার ভাষায় এর অর্থ হল: ভালো, ভালো। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "দীর্ঘজীবী হও (পরিশ্রম কর) এবং পুরাতন কর, দীর্ঘজীবী হও এবং পুরাতন কর।" বর্ণনাকারী বলেন: আল্লাহর কসম, সে (সেই জামাটি) পরিধান করে দীর্ঘজীবী হয়েছিল এবং পরে আবার নতুন জামা তৈরি করেছিল (অর্থাৎ দীর্ঘকাল বেঁচে ছিল)। এরপর সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিঠের দিকে ঝুঁকে গেল এবং নবুওয়াতের মোহরের স্থানে হাত রাখল। তখন তার পিতা তাকে ধরে সরিয়ে নিতে চাইলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে ছেড়ে দাও।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه منقطع، فإنَّ سعيد بن عمرو بن سعيد ما أدرك خالدًا فيما قاله الذهبي في "تلخيصه". وقد روى سعيد بن عمرو مثل هذا الخبر عن أم خالد بنت خالد بن سعيد بن العاص، وسماعه منها صحيح، وروى قصة القميص منه دون قصة خاتم النبوة إسحاقُ بنُ سعيد أخو خالد عن أبيه عن أم خالد كما تقدَّم برقم (2398) و (4294)، فهذا هو الصحيح في رواية الحديث أنه من رواية سعيد بن عمرو عن أم خالد.وأخرجه الطبراني في "المعجم الكبير" (4117) عن محمد بن عبد الله الحضرمي وعبد الله بن أحمد بن حنبل، عن عبد الله بن عمر بن أبان، بهذا الإسناد.وأخرجه كذلك (4117) من طريق يحيى الحماني، عن خالد بن سعيد، به.وأخرجه البخاري (3071) و (5993) من طريق عبد الله بن المبارك، عن خالد بن سعيد، عن أبيه، عن أم خالد.وانظر ما سيأتي برقم (7579). جُنادة بن سَلْم هذا، فظهر بذلك صحة نسبته قُرشيًا للحِلف.
5169 - حدثني بصحّة ذلك أبو بكر بن داود وأبو محمد البَلَاذُري الحافظ وأبو سعيد الثقفي، قالوا: حدثنا محمد بن أيوب، أخبرنا سهل بن عثمان العَسْكري، حدثنا جُنادة بن سَلْم [1] القُرشي، عن عُبيد الله بن عمر، سمعت أمَّ خالد بنت خالد بن سعيد بن العاص الأكبر تقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يَتعوَّذ من عذابِ القبر [2]. ذكرُ صفوانَ بن مَخرَمة الزُّهري
উম্মু খালিদ বিনত খালিদ ইবনু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে কবরের আযাব থেকে পানাহ চাইতে (আল্লাহর কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করতে) শুনেছি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (م) و (ب): سالم، وكانت في (ص): سلم، ثم رُمِّجت وكُتب في هامشها: سالم، بخط مغاير، والصحيح ما كان في أصل (ص) وفاقًا لما في (ز). ونسبته قُرشيًا مما لم نقف عليه إلّا هنا، مع أنَّ المعروف أنه سُوائيٌّ عامريٌّ من هوازن، لكنهم كانوا حُلَفاء بني زُهرة بن كلاب القرشيِّين كما في ترجمة جابر بن سمرة السُّوائي في "طبقات ابن سعد" 8/ 146، وجابر أحدُ أجداد جُنادة بن سَلْم هذا، فظهر بذلك صحة نسبته قُرشيًا للحِلف.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم غير جُنادة بن سَلْم، فهو مختلَف فيه كما بيَّنّاه برقم (1943)، وعلى أي حالٍ فللحديث طريق أخرى ستأتي عند المصنف برقم (7106) يصح بها. وعن أبي موسى الأشعري عند النسائي (1502). وهو صحيح.
5170 - Null
5170 - حدثني أبو بكر بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مصعب بن عبد الله الزُّبيري، قال: ومن بني زُهير: صفوان بن مَخْرَمة بن نَوفَل، وبه يُكنى مَخرمةُ، وهو أخو المِسوَر بن مَخرَمة، وأمُّه عاتِكةُ بنت عَوف أختُ عبد الرحمن بن عَوف.
৫১৭০ - আমাকে বর্ণনা করেছেন আবূ বকর ইবনু বালওয়াইহি, তিনি বলেন, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু ইসহাক আল-হারবী, তিনি বলেন, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন মুসআব ইবনু আব্দুল্লাহ আয-যুবাইরী, তিনি বলেন: আর বানু যুহাইর গোত্রের অন্তর্ভুক্ত: সফওয়ান ইবনু মাখরামা ইবনু নাওফাল। তাঁর নামেই মাখরামা কুনিয়াত পরিচিত ছিলেন। তিনি হলেন মিসওয়ার ইবনু মাখরামার ভাই, আর তাঁর মাতা হলেন আতিকা বিনতু আওফ, যিনি ছিলেন আব্দুর রহমান ইবনু আওফের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বোন।
5171 - حدثنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا أحمد بن عِصام، حدثنا أبو أحمد الزُّبيري، حدثنا بَشير أبو إسماعيل: سمعت القاسم بن صفوان الزُّهْرِي يَذكُر عن أبيه وكانت له صحبة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "أَبرِدُوا بصلاةِ الظُّهر، فإنَّ شدَّةَ الحَرِّ من فَوْرِ جَهَنَّمَ" [1]. أخبرنا الحاكم أبو عبد الله محمد بن عبد الله الحافظ قال: ذكرُ مناقب سَلَمة بن هشام بن المُغيرة بن عبد الله بن عُمَر بن مَخرُوم رضي الله عنه -كان قديمَ الإسلام بمكة، وهاجَرَ إلى أرض الحَبَشة، ثم رجع إلى مكة، فحبسه أبو جهلٍ وضَرَبه وأجاعَه وعَطَّشَه، فكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَدعُو له في الصلوات والقُنوت.
কাসিম ইবনু সাফওয়ান আয-যুহরী থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেন—যিনি সাহাবী ছিলেন—যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা যোহরের সালাত ঠান্ডা (বিলম্ব) করে আদায় করো। কেননা, গরমের প্রচণ্ডতা জাহান্নামের নিঃশ্বাস (বা উত্তাপ) হতে আসে।"
আল-হাকিম আবূ আব্দুল্লাহ মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-হাফিয আমাদের খবর দিয়েছেন, তিনি বলেছেন: সালামাহ ইবনু হিশাম ইবনুল মুগীরা ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমর ইবনু মাখরূম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর গুণাবলী ও মর্যাদা সংক্রান্ত আলোচনা: তিনি মক্কায় প্রাচীন ইসলাম গ্রহণকারীদের মধ্যে অন্যতম ছিলেন। তিনি হাবশার (আবিসিনিয়া) ভূমিতে হিজরত করেন, অতঃপর মক্কায় ফিরে আসেন। তখন আবূ জাহল তাকে বন্দী করে, প্রহার করে, তাকে অনাহারী ও তৃষ্ণার্ত রাখে। ফলে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সালাত ও কুনূতের মধ্যে তার জন্য দু‘আ করতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن من أجل القاسم بن صفوان - وهو ابن مخرمة - فقد روى عنه جمع، وذكره ابن حبان وابن خلفون في "الثقات". بشير أبو إسماعيل: هو ابن سَلْمان الكَنْدي الكوفي، وأبو أحمد الزُّبيري: هو محمد بن عبد الله بن الزبير بن عمر.وأخرجه أحمد 30/ (18306) عن وكيع بن الجراح، و (18307) عن يعلى بن عُبيد الطنافسي، كلاهما عن أبي إسماعيل بشير بن سّلْمان، به.وفي الباب عن أبي هريرة عند أحمد 13/ (8221)، والبخاري (536)، ومسلم (615).وعن أبي سعيد الخدري عند أحمد 18/ (11490)، والبخاري (538).وعن أبي ذر الغِفاري عند أحمد 35/ (21376)، والبخاري (535)، ومسلم (616).وعن ابن عُمر عند البخاري (533).وعن المغيرة بن شعبة عند أحمد 30/ (18185)، وابن ماجه (680)، وابن حبان (1505). وسنده حسن. وعن أبي موسى الأشعري عند النسائي (1502). وهو صحيح.
5172 - كما أخبَرَناه أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن سعد، عن الواقِديّ [1].
৫১৭২ - যেমন আমাদেরকে খবর দিয়েছেন আবূ আব্দুল্লাহ আল-আসাবাহানী, তিনি বলেন, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন আল-হাসান ইবনুল জাহম, তিনি বলেন, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন আল-হুসাইন ইবনুল ফারাজ, তিনি বলেন, আমাদেরকে বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু সা‘দ, তিনি বর্ণনা করেছেন আল-ওয়াকিদী [১] থেকে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وانظر "الطبقات الكبرى" لابن سعد 4/ 121.وانظر كذلك "السيرة النبوية" لابن هشام 1/ 366 - 367.ودعاء رسول الله صلى الله عليه وسلم لسلمة بن هشام المخزومي في الصلاة ثابتٌ من حديث أبي هريرة عند أحمد 12 / (7260) والبخاري (804)، ومسلم (675)، وأبي داود (1442)، وابن ماجه (1244)، والنسائي (664)، وابن حبان (1969).
5173 - فحدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا محمد بن عبد الله بن رُسْتَهْ، حدثنا سليمان بن داود، حدثني محمد بن عمر، قال: ثم إِنَّ سَلَمة بن هشام أفْلَتَ بعد ذلك، فلَحِقَ برسول الله صلى الله عليه وسلم بالمدينة، وذلك بعد الخَندق، فقالت أمُّه ضُبَاعة بنت عامر بن قُرْط [1] بن سَلَمة بن قُشير بن كَعْب بن عامر بن ربيعة:اللهُمَّ ربَّ الكعبةِ المُحرَّمَهْ … أَظهِرْ على كُلِّ عدوٍّ سَلَمهْلَه يَدانِ في الأمورِ المُبهَمَهْ … كَفٌّ بها يُعطِي وكَفٌّ مُنعِمهْفلم يَزَل مع رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى قَبِض رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فخرج مع المسلمين إلى الشام حين بَعَث أبو بكر الجيوشَ لجهاد الرُّوم، فقُتل سَلَمةُ شهيدًا بمَرْج الصُّفَّر في المُحرَّم سنةَ أربعَ عشرةَ في خِلافة عُمر رضي الله عنه [2]. ذكرُ مناقب سعد بن عُبادة الخَزْرجي النَّقِيب رضي الله عنه -
মুহাম্মদ ইবনে উমার থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: এরপর সালামা ইবনে হিশাম মুক্তি পেলেন, অতঃপর তিনি মদীনায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে যোগ দেন। এটি খন্দকের যুদ্ধের পরে ঘটেছিল। তখন তাঁর মা, দুবাআ বিনতে আমির ইবনে কুর্ত ইবনে সালামা ইবনে কুশাইর ইবনে কা'ব ইবনে আমির ইবনে রাবিয়াহ, বলেন:
"হে আল্লাহ, সম্মানিত কাবাঘরের রব!
প্রতিটি শত্রুর ওপর সালামাহকে বিজয়ী করুন।
রহস্যময় কাজে তার দুটি হাত রয়েছে,
একটি হাত, যা দিয়ে তিনি দান করেন এবং একটি নেয়ামতপূর্ণ হাত।"
তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে আমৃত্যু ছিলেন, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইন্তেকাল করলেন। অতঃপর যখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রোমকদের বিরুদ্ধে জিহাদের জন্য সৈন্য প্রেরণ করলেন, তখন তিনি মুসলমানদের সাথে সিরিয়ার দিকে রওনা হলেন এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের সময় চৌদ্দ হিজরীর মুহাররম মাসে মারজে সুফফার নামক স্থানে সালামাহ শহীদ হিসেবে নিহত হন। খাজরাজি গোত্রের নকিব সা'দ ইবনে উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মর্যাদা প্রসঙ্গে আলোচনা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في نسخنا الخطية إلى: قسيط، والتصويب من ترجمتها في كتب الصحابة.
[2] وهو في "طبقات ابن سعد" 4/ 122 عن محمد بن عمر الواقدي. وانظر التعليق على ضبط اسم حَزِيمة عند الرواية الآتية برقم (5176).
5174 - أخبرنا أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة محمد بن عمرو بن خالد، حدثني أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسوَد، عن عُروة، في تَسمية من شهد العَقَبة من الأنصار من بني ساعِدةَ بن كعب بن الخَزْرج: سعدُ بن عُبادة بن دُلَيم بن حارِثة [1] بن حَزِيمة، وهو نَقِيبٌ، وقد شهد بدرًا [2].
উরওয়া থেকে বর্ণিত, আনসারদের মধ্য থেকে বনু সা'ইদাহ ইবনু কা'ব ইবনু খাযরাজ গোত্রের যারা আকাবার শপথ গ্রহণ করেছিলেন তাদের নাম উল্লেখ প্রসঙ্গে [তিনি বলেন]: তিনি হলেন সা'দ ইবনু 'উবাদাহ ইবনু দুলাইম ইবনু হারিসাহ ইবনু হুযাইমাহ। আর তিনি ছিলেন একজন নাকীব (নেতা), এবং তিনি বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] زاد في (ب) والمطبوع في نسب سعد بعد حارثة: عبيدة. وهو خطأ. وانظر التعليق على ضبط اسم حَزِيمة عند الرواية الآتية برقم (5176).
[2] تكرر هذا الخبر بإسناده ومتنه بإثره مباشرة في (ز) وحدها. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (5352)، وعنه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3116) عن أبي عُلَاثة محمد بن عمرو بن خالد، بهذا الإسناد.وكونه نقيبًا متفق عليه عند أهل السير والمغازي.وجاء مسندًا عن جابر بن عبد الله عند ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (1822)، ولا بأس به في الشواهد.ومن حديث كعب بن مالك، وسيأتي عند المصنف برقم (5179).وأما شهود سعد بن عبادة بدرًا ففيه خلاف، فقد جزم به عروة بن الزبير هنا والزهري كما في الرواية التالية، وقال ابن عبد البر في "الاستيعاب" (ص 280): لم يذكره ابن عُقبة ولا ابن إسحاق في البدريين، وذكره فيهم جماعةٌ غيرهما، منهم الواقدي والمدائني وابن الكلبي، وذكره أبو أحمد الحاكم في كتابه في الكنى، فقال: شهد بدرًا مع النبي صلى الله عليه وسلم، قال: ويقال: لم يشهد بدرًا. قلنا: ذِكرُه الواقديَّ فيمن أثبت شهود سعد بن عبادة بدرًا غير مسلَّم، فإنَّ الواقدي نفى شهوده بدرًا كما سيأتي في روايته الآتية برقم (5176).وقال ابن كثير في "البداية والنهاية" 5/ 227: ذكره غير واحد منهم عروة والبخاري وابن أبي حاتم والطبراني فيمن شهد بدرًا، ووقع في "صحيح مسلم" (1779) ما يشهد بذلك حين شاور النبي صلى الله عليه وسلم في ملتقى النفير من قريش، فقال سعد بن عبادة: كأنك تريدنا يا رسول الله … الحديث، والصحيح أنَّ ذلك سعد بن معاذ، والمشهور أنَّ سعد بن عُبادة ردّه من الطريق، قيل: لاستنابته على المدينة، وقيل: لدغته حيّة، فلم يتمكن من الخروج إلى بدر، حكاه السُّهيلي عن ابن قتيبة. وانظر التعليق على ضبط اسم حَزِيمة عند الرواية الآتية برقم (5176).
5175 - أخبرنا محمد بن علي الصَّنْعَاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن الزُّهري: أنَّ سعدَ بنَ عُبادة كان حامِلَ رايةِ الأنصارِ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يومَ بدرٍ وغيرِه [1].
সা'দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বদর যুদ্ধসহ অন্যান্য যুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আনসারদের ঝাণ্ডাবাহক ছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "مصنف عبد الرزاق" (9638) و (9770)، لكنه في الموضع الأول قال: عن الزهري عن عُروة. وليس بمحفوظ، فقد أخرج أحمد هذا الأثر في "فضائل الصحابة" (1503) عن عبد الرزاق، عن معمر، عن الزهري لم يجاوزه.وانظر لزامًا تعليقنا على ما تقدَّم بالرقمين (4633) و (4634).
5176 - حدثنا أبو عبد الله الأصبَهاني، حدثنا محمد بن عبد الله بن رُسْتَهْ، حدثنا سليمان بن داود، حدثنا محمد بن عمر، حدثني يحيى بن عبد العزيز بن سعيد بن سعد بن عُبادة بن دُلَيم بن حارثة بن النعمان بن أبي حَزِيمة [1] بن ثَعلبة بن طَرِيف بن الخَزْرج بن ساعِدةَ بن كعب بن الخَزْرج.قال محمد بن عمر: وكان سعد بن عُبادة يكنى أبا ثابت، وكان من الكَمَلَةِ، وهو أحدُ السبعين الذين بايَعوا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم من الأنصار ليلة العَقَبة في رواية جميعِهم، وأحدُ النُّقَباء الاثني عشر، وكان سيدًا جَوَادًا، ولم يَشْهَدْ بدرًا، ذُكِر أنه كان يَتأهّب للخروج إليهم، ويأتي دُورَ الأنصار يَحضُّهم على الخُروج، فنُهِش قبل أن يَخرُج فأقامَ، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "لئِنْ كان سعدٌ لم يَشهَدْها، لقد كان عليها حَريصًا"، وقد شهد أُحدًا والخندقَ والمَشاهِدَ كلَّها [2].
৫১৭৬ - আবূ আব্দুল্লাহ আল-আসফাহানী আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু রুস্তাহ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, সুলায়মান ইবনু দাউদ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, মুহাম্মাদ ইবনু উমর আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন, ইয়াহইয়া ইবনু আব্দুল আযীয ইবনু সাঈদ ইবনু সা'দ ইবনু উবাদাহ ইবনু দুলাইম ইবনু হারিছাহ ইবনু আন-নু'মান ইবনু আবী হাযীমাহ ইবনু সা'লাবাহ ইবনু তরীফ ইবনু আল-খাযরাজ ইবনু সা'ইদাহ ইবনু কা'ব ইবনু আল-খাযরাজ আমার কাছে বর্ণনা করেছেন।
মুহাম্মাদ ইবনু উমর বলেন: সা’দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপনাম ছিল আবূ সাবেত। তিনি ছিলেন উত্তম গুণাবলীতে পূর্ণাঙ্গ ব্যক্তিদের অন্তর্ভুক্ত। তিনি সেই সত্তরজন আনসারদের একজন, যারা সকলের বর্ণনামতে আকাবার রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে বাই‘আত করেছিলেন। তিনি বারোজন দলনেতা (নুকাবা)-এরও একজন ছিলেন। তিনি ছিলেন একজন সর্দার ও অত্যন্ত দানশীল। তিনি বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেননি। উল্লেখ আছে যে, তিনি তাদের (মুশরিকদের) বিরুদ্ধে বের হওয়ার জন্য প্রস্তুতি নিচ্ছিলেন এবং আনসারদের বাড়ি বাড়ি গিয়ে তাদেরকে যুদ্ধে বের হওয়ার জন্য উৎসাহিত করছিলেন। কিন্তু বের হওয়ার আগেই তাঁকে (বিষাক্ত প্রাণী) কামড় দেয়, ফলে তিনি (মদীনায়) থেকে যান। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যদিও সা’দ এতে (বদরে) অংশগ্রহণ করেনি, তবুও সে এর জন্য অত্যন্ত আগ্রহী ছিল।” তিনি উহুদ, খন্দক এবং অন্যান্য সকল সামরিক অভিযানে অংশগ্রহণ করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] جاء في (ص) مُعجمًا بالخاء المعجمة، وفي (ز) صُحِّح فوق الحاء المهملة، وكلاهما مرويٌّ، كما جاء في "تاريخ بغداد" للخطيب في ترجمة قيس بن سعد بن عُبادة 1/ 529 وكما جاء في "الإملاء المختصر" لأبي ذرٍّ الخُشَني ص 19، لكنّ ضبْطَه بالحاء المهملة هو الأشهر، وهو الذي جَزَم به الدارقطني في "المؤتلف والمختلف" 2/ 911، وابن ماكولا في "الإكمال" 3/ 141، وابن الأثير في "أسد الغابة" في ترجمة سعد بن عبادة 2/ 206، وفي "اللُّباب في تهذيب الأنساب" في نسبة الساعدي 2/ 92، وهو الذي صَوَّبه أبو ذر الخُشني في "الإملاء"، وبعضهم يقول في نسبه: ابن حَزِيمة، دون لفظة "أبي" كما سماه عروة بن الزبير في أول الترجمة.
[2] وهو في "طبقات ابن سعد" 3/ 567 عن محمد بن عمر الواقدي. وفي شهود سعد بن عبادة بدرًا خلافٌ كما تقدم.
5177 - أخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة، حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: تُوفِّي سعد بن عُبادة - وكان يُكنى أبا ثابت - بحَوْرانَ من أرض الشام، لسنتين ونصفٍ من خلافة عُمر رضي الله عنه، وذلك آخرَ سنة خمس عشرة [1].
মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু নুমাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সা‘দ ইবনু ‘উবাদাহ, যার কুনিয়াত (উপনাম) ছিল আবূ সাবিত, তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের আড়াই বছর পর, সিরিয়ার হাওরান নামক স্থানে ইন্তেকাল করেন। আর তা ছিল পনেরো হিজরি সনের শেষাংশে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "المعجم الكبير" للطبراني (5358) عن عُبيد بن غنّام ومحمد بن عبد الله الحضرمي، وفي "معرفة الصحابة" لأبي نعيم (3118) من طريق محمد بن عبدوس بن كامل، كلهم عن محمد بن عبد الله بن نمير.وروى مثلَه ابن سعد في "طبقاته 3/ 570 و 9/ 394 عن محمد بن عمر الواقدي، عن يحيى بن عبد العزيز بن سعيد بن سعد بن عبادة، عن أبيه.لكن خالف الواقديَّ فيه أبو الحسن المدائني عند البغوي في "معجم الصحابة" 3/ 17، فروى عن يحيى بن عبد العزيز، عن أبيه: أنَّ سعد بن عبادة توفي في خلافة أبي بكر، ومثله قول خليفة بن خيّاط كما في "تاريخ دمشق" 20/ 267 حيث قال: توفي سنة إحدى عشرة!وفيه غير ذلك من الأقوال انظرها في "تاريخ دمشق" 20/ 267 - 268.
5178 - أخبرني عبد الله أبو [1] محمد الحَمَّوي، حدثنا محمد بن إبراهيم العَبْدي، سمعت يحيى بن عبد الله بن بُكَير، يقول: توفي سعد بن عُبادة بحَوْران سنة ستَّ عشرةَ [2].
ইয়াহইয়া ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু বুকাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সা'দ ইবনু 'উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ষোল (হিজরী) সনে হাওরান নামক স্থানে ইন্তেকাল করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في نسخنا الخطية: بن وأغلب الظن أنها تحريف عن "أبو"، وهو عبد الله بن غانم بن حمّويه بن الحسين أبو محمد الطويل الصيدلاني، روى المصنف عنه "تاريخ ابن بُكَير" عن محمد بن إبراهيم العَبْدي البُوشنجي عن ابن بُكَير، وقد روى عنه في "المستدرك" عدة روايات لابن بُكَير، كلَّ ذلك يسمِّيه عبد الله بن غانم، وسماه مرةً: عبد الله بن حمّويه، وسماه في "تاريخ نيسابور" كما في "مختصره": عبد الله بن غانم بن حمّويه بن الحسين الصيدلاني أبو محمد. فالحمّوي هنا نسبةٌ لجده حمّويه.
[2] وهو في "معجم الطبراني الكبير" (5357) عن أبي الزِّنْباع روح بن الفرج، عن يحيى بن عبد الله بن بُكَير.