আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5179 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونس بن بُكَير، عن ابن إسحاق، حدثني مَعْبَد بن كعب، عن أخيه، عن كعب بن مالك، قال: لما قال لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: "أَخرِجُوا لي اثني عَشَر نَقِيبًا"، فأخرَجْنا له سعدَ بن عُبادة بن دُلَيم بن حارثة بن حَزِيمة بن ثعلبة بن طَريف بن الخَزْرج بن ساعِدَة، وكان نَقِيبَ بني ساعِدةَ [1].
কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, "আমার জন্য বারোজন নেতা (নকিব) বের করো," তখন আমরা তাঁর জন্য সা'দ ইবনু উবাদাহ ইবনু দুলাইম ইবনু হারিসাহ ইবনু হুযাইমাহ ইবনু সা'লাবাহ ইবনু তারীফ ইবনু খাযরাজ ইবনু সা'ইদাহকে বের করলাম, আর তিনি ছিলেন বনী সা'ইদাহ গোত্রের নকিব (নেতা)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسنٌ من أجل محمد بن إسحاق، لكن لم يقع تسمية النقباء في شيء من الروايات عن ابن إسحاق بسنده هذا إلّا في رواية يونس بن بُكَير، ولكنه لم ينفرد به، فقد سماهم غيره من أهل السير.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 444 - 449 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد. وذكر قصة بيعة العقبة الثانية بطولها.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (5354) و 19/ (174)، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (3114) من طريق محمد بن عبد الله بن نمير، عن يونس بن بُكَير، به.
5180 - حدثني أبو أحمد محمد بن إسحاق الحافظ، حدثنا محمد بن إسحاق بن إبراهيم، حدثنا أبو الأشعَث، حدثنا هشام بن محمد بن السائب الكَلْبي، حدثنا عبد الحميد بن [أبي] [1] عَبْس [2] بن جَبْر، عن أبيه، قال: سَمِعَت قُريشٌ قائلًا يقول في الليل على أبي قُبيس:فإن يُسلِمِ السَّعدانِ يُصبِحُ مُحمدٌ … بمكةَ لا يَخشى خِلافَ المُخالِفِفلما أصبحوا قال أبو سفيان: من السَّعْدانِ: سعدُ بكرٍ وسعدُ هُذَيمٍ؟! فلما كانت في الليلة الثانية سمعُوه يقول:أيا سعدُ سعدَ الأوسِ كُن أنتَ ناصِرًا … ويا سعدُ سعدَ الخَزرجَينِ الغَطَارِفِ أجِيبا إلى داعِي الهُدى وتَمنَّيا … على اللهِ في الفِردَوسِ مُنْيةَ عارفِفإنَّ ثوابَ الله للطالبِ الهُدَى … جِنانٌ من الفِردَوسِ ذاتُ رَفارفِفلما أصبَحوا قال أبو سفيان: هو واللهِ سعدُ بن مُعاذٍ وسعدُ بن عُبَادة [3].
আব্দুল হামিদ ইবনে আব্স ইবনে জাবর থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পিতার সূত্রে বলেন, কুরাইশরা রাতে আবূ কুবাইস পাহাড়ের উপর থেকে একজন বক্তাকে বলতে শুনল:
"যদি দুই সাদ ইসলাম গ্রহণ করে, তবে মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় এমন অবস্থায় সকাল করবেন যে, বিরোধিতাকারীর বিরোধিতার ভয় তিনি করবেন না।"
যখন সকাল হলো, আবূ সুফিয়ান বললেন: এই দুই সাদ কারা? সা'দ ইবনে বাকর এবং সা'দ ইবনে হুযাইম?!
যখন দ্বিতীয় রাত এলো, তারা আবার তাকে বলতে শুনল:
"হে সাদ, আওস গোত্রের সাদ, তুমি সাহায্যকারী হও। আর হে সাদ, সম্মানিত খাজরাজ গোত্রের সাদ! হেদায়েতের আহ্বায়কের ডাকে সাড়া দাও, আর আল্লাহ্র কাছে জান্নাতুল ফিরদাউসে জ্ঞানীজনের আকাঙ্ক্ষা পোষণ করো। নিশ্চয়ই হেদায়েতের সন্ধানকারীর জন্য আল্লাহ্র প্রতিদান হলো ফিরদাউসের বাগানসমূহ, যা মনোরম অলঙ্কারে সজ্জিত।"
যখন সকাল হলো, আবূ সুফিয়ান বললেন: আল্লাহ্র কসম, তারা হলেন সা'দ ইবনে মু'আয এবং সা'দ ইবনে উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] لفظة "أبي" سقطت من نسخنا الخطية، والمثبت على الصواب من "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر (25483).
[2] في (ز) و (ب): عيش، وأُهملت في (م)، وتحرَّفت في (ص) إلى: عيسى. والمثبت على الصواب من "إتحاف المهرة"، ويحتمله ما في (م).
5180 [3] - إسناده ضعيف جدًّا من أجل هشام بن محمد بن السائب الكَلْبي، فهو متروك الحديث وعبد الحميد بن أبي عَبْس بن جَبْر هكذا سُمّي بعبد الحميد هنا وفي بعص مصادر تخريج هذه الرواية، وكذلك سُمِّي في بعض الروايات الأخرى في بعض مصادر تخريجها كما جاء في خبرٍ ذكره الحافظ ابن حجر في "نتائج الأفكار" 2/ 220، وكما جاء في خبرٍ آخر سيأتي عند المصنف برقم (5588)، وكما في خبرٍ ثالث سيأتي عند المصنف أيضًا برقم (5953)، ولكن الأشهر في اسمه أنه عبد المجيد، ولعله يكون هو الصواب، وقد روى عنه جمعٌ وذكره ابن حبان في "الثقات"، لكن ليَّنه أبو حاتم الرازي. وقد اختُلف عليه في روايته هذه، فأحيانًا يقال فيها: عنه عن أبيه، وأحيانًا يُقال: عنه عن أبيه عن جده، بزيادة ذكر جدّه، واسم عبد المجيد: عبد المجيد بن أبي عَبْس بن محمد بن أبي عَبْس بن جَبْر، كذلك سماه ابن سعد في "طبقاته" 7/ 589، والبخاري في "تاريخه الكبير" 6/ 111، وكذلك وقع مسمًّى في رواية الطبري في "تاريخه" لهذا الخبر 2/ 380.أبو الأشعث: هو أحمد بن المِقدام العجلي.وأخرجه البيهقي في "دلائل النبوة" 2/ 428 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 2/ 380 عن أبي الأشعث أحمد بن المقدام العجلي، به.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الهواتف" (75)، وعنه أبو بكر الدِّينَورِي في "المُجالسة" (1266) عن أبيه، عن هشام بن محمد، عن عبد المجيد بن أبي عَبْس، عن أبيه، عن جده. كذا سماه عبدَ المجيد، وذكر جدَّه في الإسناد.وأخرجه محمد بن حبيب البغدادي في "المنمق في أخبار قريش" ص 148 عن هشام بن محمد بن السائب الكلبي، عن أبيه، عن عبد المجيد بن أبي عبس، عن أبيه، عن جده، قال: أخبرني عمُّ لي قال: سمعت قريش صائحًا … فذكره، فزاد في الإسناد محمد بن السائب الكلبي، وهو متروك متَّهم، وزاد ذكر جدّ عبد المجيد، وجعل روايته عن عمٍّ له!وأخرجه الخرائطي في "هواتف الجِنّان" ص 35 عن علي بن حرب، عن أبي المنذر هشام بن محمد بن السائب الكلبي، عن عبد المجيد بن أبي عَبْس، عن أشياخه، قال: لما هاجر رسول الله صلى الله عليه وسلم خفي على قريش خبره، فبينا قريش في أنديتها حول البيت إذ سمعوا صوتًا … فذكره. هكذا جعله عن عبد المجيد عن أشياخه! وروى البخاريُّ مثله في "تاريخه الأوسط" 1/ 325 عن أبي محمد الكوفي، قال: لما أراد النبي صلى الله عليه وسلم أن يُهاجر سمعوا صوتًا … فذكره مُعضلًا.
5181 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا أبو مُسلم، حدثنا بَكّار بن محمد، حدثنا ابن عَوْن، عن محمد: أنَّ سعد بن عُبادة أتى سُبَاطةً قومٍ فبالَ قائمًا، فخَرَّ ميتًا، فقالت الجِنُّ:نحن قَتلْنا سيِّدَ ال … خَزْرجِ سعدَ بنَ عُبادَهُورَمَيناهُ بسَهْمَي … ن فلم نُخطِ فُؤادَهُ [1]
সাদ ইবনে উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি কোনো এক গোত্রের আবর্জনার স্তূপের কাছে এলেন এবং দাঁড়িয়ে পেশাব করলেন। এরপর তিনি মৃত অবস্থায় লুটিয়ে পড়লেন। তখন জিনেরা বলল: আমরাই খাযরাজ গোত্রের নেতা সাদ ইবনে উবাদাহকে হত্যা করেছি। এবং আমরা তাকে দুটি তীর ছুঁড়ে মেরেছি যা তার কলিজা লক্ষ্যভ্রষ্ট করেনি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف، بكّار بن محمد - وهو ابن عبد الله بن محمد بن سيرين - الأكثرون على تضعيفه، ولم يُحسِّن الرأيَ فيه غير ابن معين، وقد توبع، غير أنَّ الخبر مرسلٌ، لأنَّ محمدًا - وهو ابن سيرين - لم يدرك زمن وفاة سعد بن عُبادة. أبو مسلم: هو إبراهيم بن عبد الله الكشّي، وابن عون: هو عبد الله بن عون بن أرطبان.وأخرجه أبو الشيخ في "العظمة" (1113) عن محمد بن زكريا بن عبد الله القرشي، عن بكار بن عبد الله، به. هكذا نسبه لجدّه عبد الله.وأخرجه الحارث بن أبي أسامة كما في "بغية الباحث" للهيثمي (67)، والطبراني في "الكبير" (5359)، وأبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (3120) من طريق أبي عاصم الضحاك بن مخلد، وأبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (925)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 2/ 266 من طريق النضر بن شُميل، ومحمد بن عبد الله بن زَبْر الرَّبَعي في "تاريخ مولد العلماء ووفياتهم" ص 99، ومن طريقه ابن عساكر 20/ 269، من طريق أبي الحسن علي بن محمد المدائني، ثلاثتهم عن عبد الله بن عون، به.وأخرجه ابن سعد 3/ 570 و 9/ 395، والخطّابي في "غريب الحديث" 2/ 324 من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن محمد بن سيرين.والسُّبَاطة: الموضعُ الذي يُرمَى فيه الترابُ والأوساخُ، وما يُكنَس من المنازل.
5182 - أخبرنا محمد بن علي الصَّنْعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبَّاد، أخبرنا عبد الرزاق، عن مَعمَر، عن قَتَادة، قال: أقامَ سعدُ بنُ عُبادة لا يَبُول، ثم رَجَع، فقال: إني لأجِدُ في ظَهْري شيئًا، فلم يَلبَث أن مات، فناحَتِ الجنُّ فقالوا: نحن قَتلْنا سيِّدَ ال … خَزرجِ سَعْدَ بنَ عُبادَهُورَمَيناهُ بسَهْمي … نِ فلم نُخطِ فُؤادَهُ [1]
কাতাদাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সা'দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পেশাব না করে দাঁড়িয়ে থাকলেন। অতঃপর ফিরে এসে বললেন: আমি আমার পিঠে কিছু অনুভব করছি। এরপর তিনি দ্রুতই মারা গেলেন। তখন জিনেরা বিলাপ করতে লাগল এবং তারা বলল:
আমরা খাযরাজ গোত্রের নেতা সা'দ ইবনু উবাদাহকে হত্যা করেছি,
আমরা তাকে দুটি তীর নিক্ষেপ করেছি
এবং তার হৃদপিণ্ড লক্ষ্যচ্যুত হয়নি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لإرساله، فإنَّ قتادة - وهو ابن دِعامَة - لم يُدرك زمن وفاة سعد بن عُبادة.وهو في "جامع معمر" (20931). وفي "مصنف عبد الرزاق" (6778). وهذا مبنيٌّ على الجزم بعدم شهود سعد بن عُبادة بدرًا، لكن تقدم ذكرُنا عند الرواية (5174) الخلاف في شهوده بدرًا بين أهل السير.وبَرْك الغِماد: بلدة تقع في جنوب الجزيرة العربية على ساحل البحر الأحمر، تبعد عن مكة قُرابة 450 كم.
5183 - حدثني علي بن حَمْشاذَ العَدْلَ، حدثنا إسحاق بن الحسن ومحمد بن غالب، قالا: حدثنا عَفّان بن مسلم، حدثنا حماد بن سَلَمة، عن ثابت، عن أنس: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حين بَلَغَه إقبالُ أبي سفيان، فتكلّم أبو بكر، فأعرضَ عنه، ثم تكلّم عُمر، فأعرضَ عنه، فقال سعدُ بن عُبادة: يا رسول الله، والذي نفسِي بيدِه لو أمرتَنا أن نَخُوضَ البحرَ لَخُضْناه [1]، ولو أمرتَنا أن نَضرِبَ أَكبادَها إلى بَرْك الغِمادِ لَفَعَلْنا، فَنَدَبَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الناسَ، فانطلَقُوا حتى نزلوا بدرًا [2]. صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে আবু সুফিয়ানের আগমন বার্তা পৌঁছাল, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কিছু বললেন, কিন্তু তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কিছু বললেন, তখনো তিনি তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। তখন সা’দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! যার হাতে আমার জীবন, আপনি যদি আমাদের সমুদ্র পাড়ি দিতে নির্দেশ দেন, তবে আমরা তা পাড়ি দেব। আর আপনি যদি আমাদেরকে ‘বারক আল-গিমাদ’ পর্যন্ত ঘোড়ার পেট হাঁকাতে (দূর পথ অতিক্রম করতে) নির্দেশ দেন, তবে আমরা তা অবশ্যই করব। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম লোকদেরকে উৎসাহিত করলেন (যাত্রার জন্য)। এরপর তারা রওনা হলেন এবং বদরে গিয়ে অবতরণ করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (م) و (ب): لخُضناها، على التأنيث، وهو على تأويل محذوف، يعني الخيل، ويكون على تعدية الثلاثي، من قولهم: خاض الماءَ أو الشرابَ في المِجْدَح، والمثبت من (ص) و"تلخيص الذهبي"، وهو أوجَهُ وأقعَدُ، ويكون بعَوْد الضمير المذكَّر على البحر، وهو واضح. وهذا مبنيٌّ على الجزم بعدم شهود سعد بن عُبادة بدرًا، لكن تقدم ذكرُنا عند الرواية (5174) الخلاف في شهوده بدرًا بين أهل السير.وبَرْك الغِماد: بلدة تقع في جنوب الجزيرة العربية على ساحل البحر الأحمر، تبعد عن مكة قُرابة 450 كم.
[2] إسناده صحيح. ثابت: هو ابن أسلم البُنَاني.وأخرجه أحمد 21/ (13297) و (13703)، ومسلم (1779) من طريق عفان بن مسلم، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 21/ (13296) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، وابن حبان (4722) من طريق هدبة بن خالد، كلاهما عن حماد بن سلمة به.وأخرجه أحمد 19/ (12022) و 20/ (12954)، والنسائي (8290) و (8527) و (11076)، وابن حبان (4721) من طريق حميد الطويل، عن أنس. لكنه لم يصرِّح باسم قائل المقالة التي نُسبَت في رواية ثابت إلى ابن عُبادة، لكنه قال: فقال رجلٌ من الأنصار …وذكر ابن حجر في "فتح الباري" 12/ 23 أنَّ المحفوظ في هذه المقالة أنها لسعد بن معاذ كما ذكره موسى بن عقبة وعروة بن الزبير، وأنَّ ما وقع في رواية مسلم هذه ووافقها مرسل عكرمة عند ابن أبي شيبة من نسبتها لسعد بن عُبادة أنه فيه نظرٌ، لكون سعد بن عُبادة لم يشهد بدرًا … ثم قال: ويمكن الجمع بأنَّ النبي صلى الله عليه وسلم استشارهم في غزوة بدرٍ مرتين: الأولى وهو بالمدينة أول ما بلغه خبر العير مع أبي سفيان، وذلك بيِّن في رواية مسلم … والثانية كانت بعد أن خرج. وهذا مبنيٌّ على الجزم بعدم شهود سعد بن عُبادة بدرًا، لكن تقدم ذكرُنا عند الرواية (5174) الخلاف في شهوده بدرًا بين أهل السير.وبَرْك الغِماد: بلدة تقع في جنوب الجزيرة العربية على ساحل البحر الأحمر، تبعد عن مكة قُرابة 450 كم.
5184 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عَفّان، حدثنا أبو أُسامة، عن هشام بن عُروة، عن أبيه، قال: كان سعدُ بن عُبادة يقول: اللهمَّ هَبْ لي مَجدًا ولا مَجدَ إِلَّا بِفَعَالٍ، ولا فَعَالَ إِلَّا بمالٍ، اللهمَّ لا يُصلِحُني القليلُ، ولا أصلُحُ عليه. وكان له مُنادٍ [1] يُنادي على أُطُمِه: من كان يريد الشَّحمَ واللَّحمَ فليأتِ سعدًا [2].
সা'দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: হে আল্লাহ, আমাকে মহত্ত্ব দান করুন। আর সৎকর্ম ছাড়া কোনো মহত্ত্ব নেই, আর সম্পদ ছাড়া কোনো সৎকর্ম হয় না। হে আল্লাহ, অল্প সম্পদ আমাকে সংশোধন (বা পরিতৃপ্ত) করে না, আর আমি তার উপর সন্তুষ্টও হতে পারি না। আর তাঁর একটি টাওয়ারের (বা উঁচু ঘরের) উপর একজন ঘোষক ছিল যে ঘোষণা করত: যে কেউ চর্বিযুক্ত মাংস ও গোশত চায়, সে যেন সা'দ-এর কাছে আসে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في (ز) و (ب): ولو كان مناديًا، بدل قوله: وكان له مُنادٍ، وهو غلط. سعد بن عُبادة أحدًا يُنادي، فنظرت فقلتُ: لا، فقال: صدقتَ. قلنا: فلعلَّ عبد الله بن عمر هو من حدَّث عروة بذلك الخبر، فيكون القائل: أدركتُ سعد بن عبادة هو عبد الله بن عمر، وهذا ممكن، فإذا ثبت ذلك اتصل الإسناد، وكان صحيحًا، والله تعالى أعلم.وممّا يؤيد ذلك ما أخرجه ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 281، وابن عساكر 49/ 417 من طريق محمد بن عمر الواقدي، عن عبد الله بن نافع، عن أبيه، قال: مرَّ ابن عُمر على أُطُم سعدٍ، فقال لي: يا نافع، هذا أُطُم جدّه، لقد كان مناديه ينادي يومًا في كل حولٍ: من أراد الشحم واللحم فليأت دار دُلَيم، فمات دُلَيم، فنادى مُنادى عُبادة بمثل ذلك، ثم مات عُبادة، فنادي منادي سعد بمثل ذلك، ثم قد رأيتُ قيس بن سعد يفعل ذلك. وإسناده ليِّن لكنه يصلح في الشواهد.وروي مثلُه عن محمد بن سيرين مرسلًا، عند مسدَّد في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" للبوُصيري (3989)، وأبي بكر الشافعي في "الغيلانيات" (1084) و (1087)، وابن عساكر 20/ 264 و 49/ 417، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 199، ورجاله ثقات أيضًا.ورُوي دعاء سعد بن عُبادة وحده بنحو ما جاء هنا عن يحيى بن أبي كثير مرسلًا لذلك، عند ابن أبي شيبة 9/ 100، وهناد بن السَّرِيّ في "الزهد" (739)، وابن أبي الدنيا في "قِرى الضيف" (21)، وأبي بكر الشافعي في "الغيلانيات" (1086)، وابن عساكر 20/ 255، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 199. ورجاله ثقات.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه مرسل، لأنَّ عروة - وهو ابن الزبير - لم يدرك سعد بن عُبادة، لكنه أدرك ابنه قيسًا كما جاء في بعض روايات هذا الخبر، فلعله سمعه منه، وعلى أي حالٍ، فقد روي مثلُ هذا من غير وجهٍ. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة.وأخرجه البيهقي في "شعب الإيمان" (1200)، ومن طريقه ابن عساكر 20/ 264 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن سعد 3/ 566 و 567، وابن أبي شيبة 9/ 100، وابن أبي الدنيا في "إصلاح المال" (54)، وفي "قِرى الضيف" (22)، وأبو بكر الشافعي في "الغيلانيات" (1085)، والطبراني في "مكارم الأخلاق" (176)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 20/ 262 - 263 و 263 و 263 - 264 و 264 من طرق عن أبي أسامة، به. وقد وقع عند ابن سعد وابن أبي شيبة وغيرهما في روايتهم عن أبي أسامة أنَّ عروة قال: أدركتُ سعد بن عبادة وهو ينادي على أُطُمه … ثم أدركتُ ابنه بعد ذلك يدعو به. هكذا وقع عندهما، وهو غريبٌ، لأنَّ عروة بن الزبير ولد بعد وفاة سعد بن عبادة بزمن طويل، قيل: سنة ثلاث وعشرين، وقيل بعد ذلك، وسعدٌ إنما توفي في أوائل خلافة عمر، وقيل: في خلافة أبي بكر كما تقدَّم.وزاد ابن سعد وابن أبي شيبة في روايتهما قول عروة بن الزبير: ولقد كنت أمشي في طريق المدينة وأنا شابٌّ، فمر عليَّ عبد الله بن عمر منطلقًا إلى أرضه بالغابة، فقال: يا فتى، انظر هل ترى على أُطُم سعد بن عُبادة أحدًا يُنادي، فنظرت فقلتُ: لا، فقال: صدقتَ. قلنا: فلعلَّ عبد الله بن عمر هو من حدَّث عروة بذلك الخبر، فيكون القائل: أدركتُ سعد بن عبادة هو عبد الله بن عمر، وهذا ممكن، فإذا ثبت ذلك اتصل الإسناد، وكان صحيحًا، والله تعالى أعلم.وممّا يؤيد ذلك ما أخرجه ابن عبد البر في "الاستيعاب" ص 281، وابن عساكر 49/ 417 من طريق محمد بن عمر الواقدي، عن عبد الله بن نافع، عن أبيه، قال: مرَّ ابن عُمر على أُطُم سعدٍ، فقال لي: يا نافع، هذا أُطُم جدّه، لقد كان مناديه ينادي يومًا في كل حولٍ: من أراد الشحم واللحم فليأت دار دُلَيم، فمات دُلَيم، فنادى مُنادى عُبادة بمثل ذلك، ثم مات عُبادة، فنادي منادي سعد بمثل ذلك، ثم قد رأيتُ قيس بن سعد يفعل ذلك. وإسناده ليِّن لكنه يصلح في الشواهد.وروي مثلُه عن محمد بن سيرين مرسلًا، عند مسدَّد في "مسنده" كما في "إتحاف الخيرة" للبوُصيري (3989)، وأبي بكر الشافعي في "الغيلانيات" (1084) و (1087)، وابن عساكر 20/ 264 و 49/ 417، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 199، ورجاله ثقات أيضًا.ورُوي دعاء سعد بن عُبادة وحده بنحو ما جاء هنا عن يحيى بن أبي كثير مرسلًا لذلك، عند ابن أبي شيبة 9/ 100، وهناد بن السَّرِيّ في "الزهد" (739)، وابن أبي الدنيا في "قِرى الضيف" (21)، وأبي بكر الشافعي في "الغيلانيات" (1086)، وابن عساكر 20/ 255، وابن الجوزي في "المنتظم" 4/ 199. ورجاله ثقات.
5185 - أخبرني عَبْدان بن يزيد الدَّقّاق بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحُسين، حدثنا عَتِيق بن يعقوب، حدثنا عبد الملك بن محمد بن أبي بكر، عن عمِّه عبد الله بن أبي بكر، قال: أخذَ المشركون سعدَ بنَ عُبادة، فرَبَطُوا يدَه إلى عُنُقِه، وأدخَلُوه مكةَ يَضْرِبُونه ويَجُرُّونه بناصيَتِه، وكان ذا جُمّة طويلة [1].
আব্দুল্লাহ ইবনু আবী বকর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মুশরিকরা সা’দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ধরে ফেলেছিল। অতঃপর তারা তাঁর হাত তাঁর গর্দানের সাথে বেঁধে দিল এবং তাঁকে মারতে মারতে ও তাঁর কপাল বা চুলের অগ্রভাগ ধরে টানতে টানতে মক্কায় প্রবেশ করালো। আর তাঁর লম্বা কেশ (জুম্মাহ) ছিল।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن مرسَلٌ، وقد روى الواقديُّ مثلَه بأسانيد أخرى، فأمكن تحسين الخبر إن شاء الله. عبد الله بن أبي بكر: هو ابن محمد بن عمرو بن حزم.وأخرجه ابن هشام في "السيرة النبوية" 1/ 448 - 449 عن زياد بن عبد الله البكّائي، والطبري في "تاريخه" 2/ 367 من طريق سلمة بن الفضل الأبرش، كلاهما عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر، فذكره ضمن قصة بيعة العقبة الثانية.ويشهد له ما رواه ابن سعد في "طبقاته" 1/ 188 - 190 عن محمد بن عمر الواقدي بعدة أسانيد له، فذكر مثله في قصة بيعة العقبة الثانية.
5186 - حدثنا مُكرَم بن أحمد، حدثنا محمد بن عيسى المَدائني، حدثنا سفيان بن عُيينة، عن الزُّهْري، عن عُبيد الله بن عَبد الله، عن ابن عباس، عن سعد بن عُبادة: أنَّ أمَّه تُوفِّيَت وعليها صومٌ، قال: فسألتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فأمَرَني أَن أَقضِيَه عنها [1]. قد اتَّفق الشيخان على إخراج هذا الحديثِ: أنَّ أم سعد بن عُبادة تُوفّيت، ولم يَصِلَاهُ عنه [2].وهذا صحيحٌ على شرطهما. ذكر مناقبِ أبي سُفيان بن الحارث بن عبد المُطّلب رضي الله عنه -
সা'দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তাঁর মা ইন্তেকাল করেছেন এমতাবস্থায় যে তাঁর উপর রোযা বকেয়া ছিল। তিনি (সা'দ) বলেন: তখন আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম। তখন তিনি আমাকে তাঁর পক্ষ থেকে তা কাযা করে দেওয়ার নির্দেশ দিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حديث صحيح، دون قوله: وعليها صوم، فالمحفوظ أنه قال: وعليها نَذرٌ، والوهم فيه هنا من جهة محمد بن عيسى المدائني - وهو ابن حيّان - فقد اختُلف فيه، وهو إلى الضعف أقرب، بل وهّاه المصنّف كما في "سؤالات السجزي" له (277). فاعجَبْ منه كيف صحَّح إسناده هنا! ولهذا قال الذهبي في "التلخيص": المدائني ضعيف.وقد اختُلف في هذا الحديث فبعضهم يقول فيه: عن ابن عباس عن سعد بن عُبادة، كما هنا، وبعضهم يقول فيه: عن ابن عباس: أنَّ سعيد بن عبادة استفتى رسول الله صلى الله عليه وسلم … فيجعله من مسند ابن عباس. قال ابن حجر في "فتح الباري" 8/ 560: ابن عباس لم يدرك القصة، فتعيَّن ترجيح رواية من زاد فيه: عن سعد بن عُبادة، ويكون ابن عباس قد أخذه عنه، ويحتمل أن يكون أخذه عن غيره، ويكون قولُ من قال: عن سعد بن عُبادة، لم يقصد به الرواية، وإنما أراد: عن قصة سعد بن عُبادة، فتتحد الروايتان.وأخرجه النسائي (6455) عن محمد بن عبد الله بن يزيد المقرئ، عن سفيان بن عيينة، بهذا الإسناد. عن ابن عباس عن سعد أنه قال: ماتت أمي وعليها نذرٌ … الحديث. هكذا رواه بذكر النذر مطلقًا.وأخرجه أحمد 3/ (1893)، ومسلم (1638)، والنسائي (4740) و (6454) من طرقٍ أخرى عن سفيان بن عيينة، به. غير أنهم قالوا: عن ابن عباس: أن سعد بن عبادة استفتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في نذرٍ كان على أمّه … هكذا رووه بذكر النذر مطلقًا، وجعلوه من مسند ابن عباس.وأخرجه أحمد 39/ (23846)، والنسائي (6450) من طريق سليمان بن كثير. وأخرجه النسائي (6451) من طريق عيسى بن يونس السَّبيعي، و (6452) من طريق محمد بن شعيب بن شابُور، كلاهما (السَّبيعي ومحمد بن شعيب) عن الأوزاعي، كلاهما (سليمان بن كثير والأوزاعي) عن الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس، عن سعد. فجعلاه من مسند سعد بن عُبادة، وذكرا النذر مطلقًا، غير أنَّ سليمان بن كثير قال في روايته: أفيجزئ عنها أن أُعتق عنها؟ قال ابن حجر في "الفتح" 8/ 560: أفادت هذه الرواية بيان ما هو النذر المذكور، وهو أنها نذرت أن تُعتق رَقبة، فماتت قبل أن تفعل، ويُحتمل أن تكون نذرت نذرًا مطلقًا غير مُعيَّن، فيكون الحديث حجةً لمن أفتى في النذر المطلق بكفارة يمين، والعتق أعلى كفارات الأيمان، فلذلك أمره أن يعتق عنها. قلنا: هذا إن سلمت روايةُ سليمان بن كثير من الوهم، فقد تكلّم أهلُ العلم بالحديث في روايته عن الزهري خاصةً، قالوا: كان يخطئ فيها.وأخرجه أحمد 5/ (3048) عن محمد بن مصعب القرقسائي، والنسائي (6453) من طريق الوليد بن مَزيَد البيروتي، كلاهما عن الأوزاعي، وأخرجه أحمد (3078)، ومسلم (1638) من طريق معمر بن راشد، وأحمد (3506) من طريق محمد بن أبي حفصة، والبخاري (2761)، ومسلم (1638)، وأبو داود (3307) من طريق مالك بن أنس، والبخاري (6698) من طريق شعيب بن أبي حمزة، والبخاري (6959)، ومسلم (1638)، وابن ماجه (2132)، والترمذي (1546)، والنسائي (4741) و (6456) من طريق الليث بن سعد، ومسلم (1638) من طريق يونس بن يزيد، ومسلم (1638)، والنسائي (4742) و (6457) من طريق بكر بن وائل، كلهم (الأوزاعي وابن أبي حفصة ومالك وشعيب والليث ويونس وبكر) عن الزهري، به، عن عبد الله بن عباس: أنَّ أنَّ سعد بن عُبادة استفتى … فجعلوه من مسند ابن عباس، وذكروا النذر مطلقًا.وقد روي عن ابن عباس حديثٌ آخر في قصة أخرى غير قصة سعد بن عُبادة بذكر الصوم من رواية سعيد بن جبير وغيره عنه كما عند أحمد 3/ (1860) والبخاري (1953) ومسلم (1148) وغيرهم، والصواب أنها قصة أخرى كما قال البيهقي في "السنن" 4/ 256 وابن عبد البر في "التمهيد" 9/ 26 وابن حجر في "فتح الباري" 8/ 561.
[2] يعني جعلاه من مسند ابن عباس، وهو كذلك، لكنهما لم يقع عندهما أنَّ الذي كان على أمّ سعد صيامٌ، إنما جاء في روايتهما أنه كان نذرًا هكذا مطلقًا غير مقيَّد كما تقدم بيانه في التخريج.
5187 - حدثنا محمد بن أحمد بن بُطّة، حدثنا الحسن بن الجَهْم، حدثنا الحسين بن الفَرَج، حدثنا محمد بن عمر، قال: أبو سفيان بن الحارث بن عبد المُطّلب بن هاشِم، وكان أخا رسولِ الله صلى الله عليه وسلم من الرَّضاعة وابن عَمِّه، أرضعَتْه حَليمةُ أيامًا، فكان يألَفُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فلما بُعِث رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عاداه وهَجَاه وهَجَا أصحابَه، فمَكَثَ عشرين سنةً مُناصبًا لرسول الله صلى الله عليه وسلم، لا يَتخلَّف عن موضعٍ تسير فيه قريش لقتالِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما ذُكِر شُخُوص رسولِ الله صلى الله عليه وسلم إلى مكةَ عامَ الفتحِ ألقى الله عز وجل في قلبِه الإسلامَ، فتلقّى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قبل نُزولِه الأَبْواءَ، فأسلم هو وابنه جعفرٌ، وخرج مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فشَهِد فتحَ مكة وحُنينًا.قال أبو سفيان: فلما لَقِينا العدوَّ بحُنينٍ اقتحمْتُ عن فرسي وبيدي السيفُ صَلْتًا، واللهُ يعلمُ أني أريد الموتَ دونَه، وهو يَنظُر إليَّ، فقال العباسُ: يا رسولَ الله، هذا أخوك وابنُ عمّك أبو سفيان بن الحارث، فارْضَ عنه، قال: "قد فعلتُ يَغْفِرُ اللهُ له كلَّ عَداوةٍ عادَانِيها" ثم الْتفتَ إليَّ فقال: "أخي لَعَمْري"، فقبّلتُ رِجلَه في الرِّكاب [1].قالوا: ومات أبو سفيان بن الحارث بالمدينة بعد أخيه نوفل بن الحارث بأربعةِ أشهرٍ إلَّا ثلاثةَ عشرَ ليلةً، ويقال: مات سنة عِشرين، وصلَّى عليه عمرُ بن الخطاب، وقُبر في رُكْن دار عَقِيل بن أبي طالب بالبَقيع، وهو الذي حفر قبرَ نفسِه قبل أن يموت بثلاثةِ أيامٍ [2].قد ذكرتُ إسلامَ أبي سُفيان في فتح مكة فيما تَقدَّم [3].
মুহাম্মদ ইবনে উমার থেকে বর্ণিত, আবু সুফিয়ান ইবনে আল-হারিস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব ইবনে হাশিম ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুধ ভাই এবং চাচাতো ভাই। হালীমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে কয়েকদিন দুধ পান করিয়েছিলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বন্ধুত্বপূর্ণ সম্পর্ক বজায় রাখতেন। কিন্তু যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রেরিত হলেন, তিনি তাঁর শত্রুতা শুরু করলেন এবং তাঁকে ও তাঁর সাহাবীদের নিয়ে ব্যঙ্গ-বিদ্রূপ করতেন। তিনি বিশ বছর ধরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘোর বিরোধী ছিলেন এবং কুরাইশরা যখনই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিরুদ্ধে যুদ্ধ করতে যেত, তিনি কোনো স্থান থেকে বিরত থাকতেন না।
এরপর যখন মক্কা বিজয়ের বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মক্কার দিকে যাত্রার কথা উল্লেখ করা হলো, তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা তাঁর (আবু সুফিয়ানের) হৃদয়ে ইসলামের আলো নিক্ষেপ করলেন। তিনি আবওয়া নামক স্থানে অবতরণের আগেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দেখা করলেন। এরপর তিনি এবং তাঁর পুত্র জাফর ইসলাম গ্রহণ করলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হয়ে মক্কা বিজয় ও হুনাইন যুদ্ধে অংশগ্রহণ করলেন।
আবু সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন আমরা হুনাইনে শত্রুর মুখোমুখি হলাম, আমি আমার ঘোড়া থেকে লাফিয়ে নামলাম। আমার হাতে খোলা তরবারি ছিল। আল্লাহ জানেন, আমি তাঁর (নবীজীর) জন্য মৃত্যুবরণ করতে চেয়েছিলাম এবং তিনি আমার দিকে তাকাচ্ছিলেন। তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'ইয়া রাসূলাল্লাহ! ইনি আপনার ভাই ও চাচাতো ভাই আবু সুফিয়ান ইবনে হারিস। আপনি তাঁর প্রতি সন্তুষ্ট হোন।' তিনি (নবীজী) বললেন, "আমি সন্তুষ্ট হলাম। আল্লাহ তার সকল শত্রুতাকে ক্ষমা করুন যা সে আমার সাথে করেছিল।" এরপর তিনি আমার দিকে ফিরে তাকালেন এবং বললেন, "আমার জীবনের শপথ! (তুমি) আমার ভাই।" তখন আমি তাঁর সওয়ারীর রিকাবে (পাদানে) তাঁর পা চুম্বন করলাম।
বর্ণনাকারীগণ বলেন: আবু সুফিয়ান ইবনে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ভাই নওফাল ইবনে হারিসের মৃত্যুর চার মাস তেরো দিন কম সময়ের পরে মদীনায় ইন্তিকাল করেন। কেউ কেউ বলেন, তিনি বিশ হিজরীতে ইন্তিকাল করেন। উমার ইবনে খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জানাযার সালাত পড়ান এবং তাঁকে বাকী নামক স্থানে আকীল ইবনে আবি তালিবের ঘরের এক কোণে দাফন করা হয়। তিনিই সেই ব্যক্তি যিনি ইন্তিকালের তিন দিন আগে নিজের কবর নিজে খনন করেছিলেন। আমি পূর্বে মক্কা বিজয়ের আলোচনায় আবু সুফিয়ানের ইসলাম গ্রহণের ঘটনা উল্লেখ করেছি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو في "المغازي" للواقدي 2/ 806 - 809، وذكره كذلك ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 4/ 45 - 46 - من قوله هو لم يذكر شيخه محمد بن عمر الواقدي، وإنما تلقاه منه، لأنَّ هذا نصُّ كلامِه. ثم ذكر الواقدي في "مغازيه" 2/ 810 وجهًا آخر غير هذا في إسلام أبي سفيان بن الحارث، بنحو ما تقدَّم عند المصنف برقم (4407) عن ابن عباس بإسناد حسن. فهو أصح من هذا الوجه الذي هنا، والله أعلم.
[2] وهو في "طبقات ابن سعد" 4/ 49 أيضًا.
5187 [3] - برقم (4407) من رواية ابن عباس، بإسناد حسنٍ.
5188 - أخبرني محمد بن المؤمَّل، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، سمعت إبراهيم بن المنذر يقول: أبو سفيان بن الحارث بن عبد المُطّلب اسمُه المُغيرة، توفي سنة عشرين، وصلَّى عليه عمرُ بن الخطاب [1].
ইবরাহীম ইবনুল মুনযির থেকে বর্ণিত, আবু সুফিয়ান ইবনুল হারিস ইবনে আব্দুল মুত্তালিবের নাম আল-মুগীরাহ। তিনি বিশ হিজরীতে ইন্তেকাল করেন এবং উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه ابن مَنْدَه في "فتح الباب في الكنى والألقاب" (3550) من طريق عبد الله بن عيسى المديني، عن إبراهيم بن المنذر الحِزامي.وسيرويه المصنف مرة أخرى برقم (5196) من طريق أبي يونس محمد بن أحمد بن يزيد المدني عن إبراهيم بن المنذر. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ أبا سفيان خير أهلي" أو "من خير أهلي".وأخرجه أبو عَروبة الحَرَّاني في "المنتقى من كتاب الطبقات" ص 33 عن عبيد الله بن الحجاج بن المنهال، عن عمرو بن عاصم، عن حماد، عن علي بن زيد، عن عمار، عن أبي حَبّة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ما نظرتُ من ناحية إلّا رأيت أبا سفيان".وأخرجه أبو علي الصوَّاف في الجزء الثالث من "فوائده" (81) من طريق أبي سلمة موسى بن إسماعيل التَّبُوذكي، عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد بن جُدعان، عن عمار بن أبي عمار: أنَّ الحسن بن علي وعبد الله بن نوفل، قال عبد الله: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم حنين وأبو سفيان إلى جنبه كلما التفت رآه إلى جنبه، فقال: "أبو سفيان خير أهلي"، يعني أبا سفيان بن الحارث بن عبد المطّلب، فقال الحسن بن علي: "من خير أهلي"، قال: بيني وبينك أبو حبة البدري، فأرسل الحسنُ عبيدَ الله بن أبي رافع، وأرسل عبدُ الله بنُ نوفل عبيدَ الله بن نوفل، قال عمار: فقلتُ: والله لأسمعنَّ مقالته، فسمعها، فسألاه، فقال: نعم، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حُنين كلما التفت رأى أبا سفيان إلى جنبه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خير أهلي"، فقال عُبيد الله: من خير أهلي؟ فقال: "خير أهلي".وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" كما في "الإصابة" للحافظ ابن حجر 4/ 405، وعنه ابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 180 من طريق روح بن أسلم، عن حماد بن سلمة، عن علي بن يزيد، عن عمار بن أبي عمار، عن عُبيد الله بن نوفل: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم حُنين وأبو سفيان بن الحارث إلى جنبه كلما التفت رآه بجنبه، قال: "أبو سفيان خير أهلي". كذا جعله من مسند عُبيد الله بن نوفل المصغّر، وقد تبين لنا من رواية أبي علي الصوَّاف أنَّ الذي رواه هو عَبد الله بن نوفل المكبَّر، وهو الصحيح، ورَوح بن أسلم ضعيف كذلك، فلعلَّ الوهم منه.ويشهد له ما رواه محمد بن إسحاق بن يسار صاحب السيرة النبوية معضَلًا عند المعافى بن زكريا النهرواني في "الجليس الصالح" ص 121، وهو كذلك عند أبي نعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (6233) غير أنه وقع في إسناده في المطبوع سقط وتحريف يُستدرك من "الجليس الصالح".وقد ذكر هذا الخبرَ أيضًا مصعب الزبيري كما سيأتي عند المصنف برقم (5195).
5189 - سمعت أبا العباس محمد بن يعقوب، سمعت العباس بن محمد، سمعت يحيى بن مَعين يقول: حدثنا أبو أُسامة، عن هشام بن عُروة، عن أبيه: أنَّ أبا سفيان بن الحارث بن عبد المُطّلب كان أحبَّ قريشٍ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكان شديدًا عليه، فلما أسلَمَ كان أحبَّ الناسِ إليه [1].
যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আবূ সুফিয়ান ইবনুল হারিস ইবনে আবদুল মুত্তালিব রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কুরাইশদের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয় ছিলেন, কিন্তু তিনি তাঁর প্রতি খুবই কঠোর (বিরোধিতা পোষণকারী) ছিলেন। এরপর যখন তিনি ইসলাম গ্রহণ করলেন, তখন তিনি (অন্যান্য) মানুষের মধ্যে তাঁর নিকট সবচেয়ে প্রিয় হয়ে গেলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكنه مرسل، وهو في "تاريخ العباس الدُّوري" عن ابن معين (73). أبو أسامة: هو حماد بن أسامة، وعروة: هو ابن الزبير بن العوام.وأخرجه ابن أبي الدنيا في "الإشراف على منازل الأشراف" (177) عن محمد بن عبّاد بن موسى، عن أبي أسامة، به. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ أبا سفيان خير أهلي" أو "من خير أهلي".وأخرجه أبو عَروبة الحَرَّاني في "المنتقى من كتاب الطبقات" ص 33 عن عبيد الله بن الحجاج بن المنهال، عن عمرو بن عاصم، عن حماد، عن علي بن زيد، عن عمار، عن أبي حَبّة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ما نظرتُ من ناحية إلّا رأيت أبا سفيان".وأخرجه أبو علي الصوَّاف في الجزء الثالث من "فوائده" (81) من طريق أبي سلمة موسى بن إسماعيل التَّبُوذكي، عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد بن جُدعان، عن عمار بن أبي عمار: أنَّ الحسن بن علي وعبد الله بن نوفل، قال عبد الله: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم حنين وأبو سفيان إلى جنبه كلما التفت رآه إلى جنبه، فقال: "أبو سفيان خير أهلي"، يعني أبا سفيان بن الحارث بن عبد المطّلب، فقال الحسن بن علي: "من خير أهلي"، قال: بيني وبينك أبو حبة البدري، فأرسل الحسنُ عبيدَ الله بن أبي رافع، وأرسل عبدُ الله بنُ نوفل عبيدَ الله بن نوفل، قال عمار: فقلتُ: والله لأسمعنَّ مقالته، فسمعها، فسألاه، فقال: نعم، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حُنين كلما التفت رأى أبا سفيان إلى جنبه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خير أهلي"، فقال عُبيد الله: من خير أهلي؟ فقال: "خير أهلي".وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" كما في "الإصابة" للحافظ ابن حجر 4/ 405، وعنه ابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 180 من طريق روح بن أسلم، عن حماد بن سلمة، عن علي بن يزيد، عن عمار بن أبي عمار، عن عُبيد الله بن نوفل: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم حُنين وأبو سفيان بن الحارث إلى جنبه كلما التفت رآه بجنبه، قال: "أبو سفيان خير أهلي". كذا جعله من مسند عُبيد الله بن نوفل المصغّر، وقد تبين لنا من رواية أبي علي الصوَّاف أنَّ الذي رواه هو عَبد الله بن نوفل المكبَّر، وهو الصحيح، ورَوح بن أسلم ضعيف كذلك، فلعلَّ الوهم منه.ويشهد له ما رواه محمد بن إسحاق بن يسار صاحب السيرة النبوية معضَلًا عند المعافى بن زكريا النهرواني في "الجليس الصالح" ص 121، وهو كذلك عند أبي نعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (6233) غير أنه وقع في إسناده في المطبوع سقط وتحريف يُستدرك من "الجليس الصالح".وقد ذكر هذا الخبرَ أيضًا مصعب الزبيري كما سيأتي عند المصنف برقم (5195).
5190 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن يعقوب، حدثنا علي بن الحسن الهِلَالي، حدثنا عمرو بن عاصم الكِلَابي، حدثنا حماد بن سلَمة، عن عمّار بن أبي عمّار، عن أبي حَبّة البَدْري، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أبو سُفيان بن الحارث خَيرُ أهلي" [1]. صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবু হাব্বাহ আল-বদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আবু সুফিয়ান ইবনু হারিস আমার পরিবারের (আহলের) মধ্যে সর্বোত্তম।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات، لكن المحفوظ في هذا الإسناد ذكر علي بن زيد بن جُدعان بين حماد بن سلمة وعمار بن أبي عمار، فقد ذكره كلُّ من روى هذا الخبر عدا المصنّف، على أنَّ لحماد بن سلمة سماعًا من عمار بن أبي عمار في الجملة، وروايته عنه مشهورة، لكن هذا الخبر بعينه الغالبُ أنه لم يسمعه منه، وإذا ثبت ذلك فعلي بن زيد بن جُدعان هذا ضعيف الحديث.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 22/ (824)، وفي "الأوسط" (6546) من طريق إسحاق بن الضَّيف، عن عمرو بن عاصم الكلابي، عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن عمار، عن أبي حَبّة. بلفظ: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حُنين لا ينظر في ناحية إلّا رأى أبا سفيان بن الحارث يقاتل، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنَّ أبا سفيان خير أهلي" أو "من خير أهلي".وأخرجه أبو عَروبة الحَرَّاني في "المنتقى من كتاب الطبقات" ص 33 عن عبيد الله بن الحجاج بن المنهال، عن عمرو بن عاصم، عن حماد، عن علي بن زيد، عن عمار، عن أبي حَبّة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "ما نظرتُ من ناحية إلّا رأيت أبا سفيان".وأخرجه أبو علي الصوَّاف في الجزء الثالث من "فوائده" (81) من طريق أبي سلمة موسى بن إسماعيل التَّبُوذكي، عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد بن جُدعان، عن عمار بن أبي عمار: أنَّ الحسن بن علي وعبد الله بن نوفل، قال عبد الله: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم حنين وأبو سفيان إلى جنبه كلما التفت رآه إلى جنبه، فقال: "أبو سفيان خير أهلي"، يعني أبا سفيان بن الحارث بن عبد المطّلب، فقال الحسن بن علي: "من خير أهلي"، قال: بيني وبينك أبو حبة البدري، فأرسل الحسنُ عبيدَ الله بن أبي رافع، وأرسل عبدُ الله بنُ نوفل عبيدَ الله بن نوفل، قال عمار: فقلتُ: والله لأسمعنَّ مقالته، فسمعها، فسألاه، فقال: نعم، كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حُنين كلما التفت رأى أبا سفيان إلى جنبه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خير أهلي"، فقال عُبيد الله: من خير أهلي؟ فقال: "خير أهلي".وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" كما في "الإصابة" للحافظ ابن حجر 4/ 405، وعنه ابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 180 من طريق روح بن أسلم، عن حماد بن سلمة، عن علي بن يزيد، عن عمار بن أبي عمار، عن عُبيد الله بن نوفل: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم حُنين وأبو سفيان بن الحارث إلى جنبه كلما التفت رآه بجنبه، قال: "أبو سفيان خير أهلي". كذا جعله من مسند عُبيد الله بن نوفل المصغّر، وقد تبين لنا من رواية أبي علي الصوَّاف أنَّ الذي رواه هو عَبد الله بن نوفل المكبَّر، وهو الصحيح، ورَوح بن أسلم ضعيف كذلك، فلعلَّ الوهم منه.ويشهد له ما رواه محمد بن إسحاق بن يسار صاحب السيرة النبوية معضَلًا عند المعافى بن زكريا النهرواني في "الجليس الصالح" ص 121، وهو كذلك عند أبي نعيم الأصبهاني في "معرفة الصحابة" (6233) غير أنه وقع في إسناده في المطبوع سقط وتحريف يُستدرك من "الجليس الصالح".وقد ذكر هذا الخبرَ أيضًا مصعب الزبيري كما سيأتي عند المصنف برقم (5195).
5191 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المَحبُوبي بمَرُو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن سَلَمة، عن هشام بن عُرْوة، عن أبيه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "سيِّد فِتْيان الجنة أبو سفيان بن الحارث بن عبد المُطّلب". حَلَقه الحلّاق بمِنًى، وفي رأسِه ثُؤلُول فقَطَعَه فمات، فيُرَون أنه شَهيد [1].
যুবায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “জান্নাতের যুবকদের নেতা হলেন আবু সুফিয়ান ইবনু হারিস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব।” মিনায় এক নাপিত তাকে ক্ষৌরকর্ম করাচ্ছিল। তার মাথায় একটি আচিল ছিল, নাপিত সেটি কেটে দেয়, ফলে তিনি মারা যান। এ কারণে লোকেরা তাকে শহীদ হিসেবে গণ্য করতেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] رجاله ثقات لكنه مرسل، كما قال الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 7/ 179.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 4/ 49، وابن أبي الدنيا في "الإشراف" (178) من طريقين عن حماد بن سلمة، به.
5192 - حدثنا علي بن عيسى، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب [1]، حدثنا ابن أبي عُمر، حدثنا سفيان، عن الزُّهْري، عن كَثير بن العباس بن عبد المطلب، عن أبيه، قال: شهدتُ مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم يومَ حُنَين، فلقد رأيتُه وما معه إلَّا أنا وأبو سفيان بن الحارث بن عبد المُطّلب، وهو آخِذٌ بلِجَام بَغلةِ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو راكبُها، وأبو سفيان لا يألُو أن يُسرعَ نحوَ المشركين [2].صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আববাস ইবনু আবদুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুনাইনের দিনে উপস্থিত ছিলাম। আমি তাঁকে দেখলাম, তখন আমি এবং আবুল সুফিয়ান ইবনু হারিস ইবনু আবদুল মুত্তালিব ছাড়া আর কেউ তাঁর সাথে ছিল না। আর তিনি (আববাস) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খচ্চরের লাগাম ধরে রেখেছিলেন, অথচ তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটির পিঠে আরোহণ করে ছিলেন। আর আবু সুফিয়ান মুশরিকদের দিকে দ্রুত অগ্রসর হওয়ার ব্যাপারে কোনো ত্রুটি রাখছিলেন না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ب) والمطبوع إلى: علي بن عبد المطّلب.
[2] إسناده صحيح. ابن أبي عمر: هو محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدَني، وسفيان: هو ابن عُيينة.وأخرجه مسلم (1775) عن ابن أبي عمر، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 3/ (1775)، ومسلم (1775) (77)، والنسائي (8593)، وابن حبان (7049) من طريق معمر بن راشد، عن الزهري، به.وسيأتي مطولًا عند المصنف برقم (5505) من طريق يونس بن يزيد الأيلي عن الزهري.
5193 - حدثنا أبو زكريا العَنْبري وأبو الحسن بن موسى الفقيه، قالا: حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن المُثنَّى ومحمد بن بشار، قالا: حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن سِمَاك بن حَرْب، عن عبد الله بن أبي سفيان بن الحارث بن عبد المُطّلب، عن أبيه، قال: كان لرجل على النبي صلى الله عليه وسلم تمرٌ، فأتاه يَتقاضاهُ، فاستَقرَضَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم من خولةَ بنت حَكِيم تمرًا فأعطاه إياه، وقال: "أمَا إنّه كان عندي تمرٌ، ولكنه كان عَثَريًّا". ثم قال: "كذلك يَفعلُ عِبادُ الله المؤمنون [1]، وإِنَّ الله لا يَترحَّمُ على أُمَّةٍ لا يأخذُ الضعيفُ منكم حَقَّه من القَويّ غيرَ مُتَعْتَعٍ" [2]. لم يُسنِدْ أبو سفيان عن النبي صلى الله عليه وسلم غيرَ هذا الحديثِ الواحدِ، ولم يُقِمْ إسنادَه عن شعبةَ غيرُ عُندَر [3].
আবু সুফিয়ান ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তির নিকট নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাওনা কিছু খেজুর ছিল। সে তা চাইতে আসলো। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাওলা বিনত হাকীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে কিছু খেজুর ঋণ নিলেন এবং তাকে (পাওনাদারকে) তা দিয়ে দিলেন। আর বললেন: "শোনো, আমার কাছে খেজুর ছিল, কিন্তু তা ছিল 'আসারী' (বৃষ্টির পানিতে উৎপন্ন)।" অতঃপর তিনি বললেন: "আল্লাহর মুমিন বান্দারা এমনই করে থাকে। নিশ্চয়ই আল্লাহ সেই জাতির উপর করুণা বর্ষণ করেন না, যে জাতির দুর্বল ব্যক্তিরা শক্তিশালী ব্যক্তির কাছ থেকে কোনো দ্বিধা বা বাধা ছাড়াই তাদের প্রাপ্য অধিকার আদায় করে নিতে পারে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في نسخنا الخطية: المؤمنين، بالياء، والجادَّة ما أثبتنا.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكن المحفوظ فيه أنه عن عبد الله بن أبي سفيان بن الحارث مرسلًا، ليس فيه ذكر أبي سفيان كما سيُخرّجه المصنف نفسه برقم (5198) عن محمد بن صالح بن هانئ عن إبراهيم بن أبي طالب، بمثل إسناده هذا الذي هنا، بإسقاط أبي سفيان من إسناده، وكذلك أخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (721) عن عُبيد الله بن عمر القواريري عن محمد بن جعفر غُنْدر، بهذا الإسناد، وكذلك رواه غير واحدٍ عن شعبة مرسلًا، فهو الصحيح المحفوظ.وقد جزم البخاريُّ في "تاريخه الكبير" 5/ 101 بإرساله، وصحَّح البيهقيُّ في "سننه الكبرى" 10/ 93 إرسالَه أيضًا، وأما ابن حجر فعندما ذكر هذه الطريق الموصولة التي هنا في "إتحاف المهرة" (17749) قال: إن كان محفوظًا فهو صحيح متصل!وقد جزم بعضُ من ألَّف في الصحابة بكون عبد الله بن أبي سفيان بن الحارث صحابيًا، بهذه الرواية المرسلة، كالبغوي وابن عبد البر، وخالفهم غيرهم فقالوا: لا صحبة له ولا رؤية، كابنِ مَنْدَه وأبي نُعيم وابنِ الأثير، وهو معنى قول البخاري في "تاريخه" حين جزم بإرساله، وهذا هو الصحيح، إذ لا ذكر لعبد الله هذا في شيء من أخبار السيرة والمغازي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، والله تعالى أعلم.ولكن سيورده المصنف كما سيأتي بعده وبرقم (5197) من طريق أخرى عن شعبة عن سماك بن حرب، قال: كنا مع مُدرك بن المهلّب بسجِستان، فسمعت شيخًا يحدث عن أبي سفيان بن الحارث، فذكره، فجزم المصنف بإثر الطريق الآتية برقم (5197) بأنَّ هذا الشيخ المبهم في هذه الطريق وقع مصرحًا له في طريق محمد بن جعفر غُندَر عن شعبة، يعني أنه عبد الله بن أبي سفيان، نفسه، فكأنه يصحح الحديث موصولًا بذكر أبي سفيان في إسناده. وفي قوله هذا انظر كما قال ابن حجر في "التلخيص الحبير" 4/ 184. ويؤيد ما قاله ابن حجر أنَّ سماكًا ذكر في تلك الطريق أنَّ ذلك الشيخ حدثه وهو بسجِستان إذ كانوا مع مُدرك بن المهلَّب - وهو ابن أبي صُفْرة الأزدي - وإنما تولّى مدرك بن المهلّب سجِستان من قِبَل أخيه يزيد بن المهلّب أمير العراق وخراسان زمن سليمان بن عبد الملك بن مروان، أي: في سنة ست وتسعين فما بعدها، وكان عبدُ الله بن أبي سفيان قد قُتل في كربلاء مع الحُسين بن علي بن أبي طالب سنة إحدى وستين، فليس ذلك الشيخ المبهم الذي حدَّث سماكًا في سُرادق مدرك بن المهلَّب هو عبد الله بن أبي سفيان نفسَه بيقينٍ. فهي رواية أخرى لسماك عن شيخ آخر مبهم لم يُفصِح عنه، فصار لسماكٍ في هذا الحديث شيخان، أحدهما عبد الله بن أبي سفيان بن الحارث، وروايته مرسلة، وثانيهما ذلك الشيخ المبهم الذي حدَّثه عن أبي سفيان بن الحارث موصولًا، وهذا الشيخ لا يُعرف هل سمع من أبي سفيان بن الحارث أم لا، فإنَّ أبا سفيان متقدم الوفاة، والله أعلم، وعلى أي حالٍ فللحديث شواهدُ يصحُّ بها إن شاء الله.وأخرجه أبو القاسم البغوي في "معجم الصحابة" (1721)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 29/ 72 عن عبيد الله بن عمر القواريري، عن محمد بن جعفر غُندر، عن شعبة، عن سماك، عن عبد الله بن أبي سفيان مرسلًا.وأخرجه أبو القاسم البغوي أيضًا (1721)، ومن طريقه ابن عساكر 29/ 72 من طريق أبي داود الطيالسي، وابنُ قانع في "معجم الصحابة" 2/ 113، وأبو نعيم في "معرفة الصحابة" (4212)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (10717)، والضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 9/ (393) من طريق معاذ بن معاذ العَنْبري، كلاهما عن شعبة، عن سماك، عن عبد الله بن أبي سفيان، مرسلًا أيضًا.ويشهد له حديث أبي سعيد الخدري عند ابن ماجه (2426)، وإسناده صحيح، غير أنه جاء في روايته أنَّ المرأة التي استسلف منها رسول الله صلى الله عليه وسلم التمر خولة بنت قيس، وهو وهمٌ صوابه: بنت حكيم، كما في هذه الرواية.وكما في الشاهد الثاني لهذا الحديث، وهو حديث أبي حميد الساعدي عند أبي عوانة في "صحيحه" (7075)، والطبراني في "الصغير" (1045)، وأبي نعيم في "الحلية" 10/ 189، فذكر مثل حديثنا غير أنه ليس فيه آخرُه المرفوع. وذكر فيه أنَّ المقرضة كانت خولة بنت حكيم.وله شاهد ثالث من حديث عائشة عند عبد بن حميد (1499)، والبزار (88)، والعُقيلي في "الضعفاء" (1820)، والبيهقي في "الكبرى" 6/ 20، وفي "شعب الإيمان" (10718)، وذكر فيه خولة بنت حكيم أيضًا.والعَثَري: هو في الأصل: الزرع والنخيل الذي يشرب بعروقه من ماء المطر يجتمع في حفيرة، كأنه عثر على الماء عثرًا بلا عمل من صاحبه. لكن المراد في هذا الخبر - والله أعلم - أنَّ التمر كان فارغًا غير ممتلئ.والمتعتَع: الرجل يصيبه ما يُقلِقُه.
5193 [3] - هو لقب محمد بن جعفر.
5194 - فقد أخبرَناه أبو العباس السَّيّاري، أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدانُ، أخبرني أبي، عن شُعْبة، عن سِماك، قال: كنا مع مُدرِك بن المُهلَّب بسِجِستانَ، فسمعتُ شيخًا يُحدِّث عن أبي سفيان بن الحارث، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره [1]، ولم يُسَمِّ [2] عبدَ الله بن أبي سفيان.
আবু সুফিয়ান ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সিমাক বলেন: আমরা সিজিস্তানে মুদরিক ইবনুল মুহাল্লাবের সাথে ছিলাম। তখন আমি এক শাইখকে তাঁর (আবু সুফিয়ানের) সূত্রে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে হাদীস বর্ণনা করতে শুনলাম। তিনি তা উল্লেখ করলেন, কিন্তু তিনি আবদুল্লাহ ইবনু আবী সুফিয়ানের নাম উল্লেখ করেননি।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم لولا هذا الشيخ المبهم الذي لم يُسمَّ، وليس هو بعبد الله بن أبي سفيان، كما بيَّناه سابقًا. أبو العباس السَّيّار: هو القاسم بن القاسم، وأبو المُوجِّه: هو محمد بن عمرو الفَزَاري، وعَبْدان: لقبُ عبد الله بن عثمان بن جَبَلة المروزي.وسيأتي عند المصنف من طريق أحمد بن سيار المروزي عن عَبْدان برقم (5197).
[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: يسمع.
5195 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الحَرْبي، حدثنا مُصعَب بن عبد الله بن الزُّبَير، قال: وممَّن صَحِبَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم من ولد الحارث بن عبد المُطّلب أبو سفيان بن الحارث بن عبد المُطّلب، وقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مِن خَيرِ أهلي" أو "إنه خيرُ أهلي".وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنه سيّدُ فِتْيان أهلِ الجنة".وصَبَرَ مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم يوم حُنين، فأبصَرَه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في عَمَايةِ الصبح، فقال: "مَن هذا؟ " قال: ابن أمِّك يا رسولَ الله.حَلَقَه الحلَّاق فقَطَع ثُؤلولًا من رأسِه فلم يَرْقأْ [1] عنه الدمُ حتى ماتَ، وذلك في سنة عشرين، وصلَّى عليه عمرُ بن الخطاب رضي الله عنه.وكان تَلقَّى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ببعضِ الطريق ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم خارجٌ إلى مكةَ للفَتْح، فأسلمَ قبلَ الفَتح [2].
মুস'আব ইবনু আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হারিস ইবনু আব্দুল মুত্তালিবের সন্তানদের মধ্যে যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছিলেন, তাদের অন্যতম হলেন আবূ সুফিয়ান ইবনু হারিস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বলেছিলেন: "সে আমার আহলদের (পরিবারের/আত্মীয়দের) মধ্যে সর্বোত্তম" অথবা "নিশ্চয়ই সে আমার আহলদের মধ্যে সর্বোত্তম।" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "নিশ্চয়ই সে জান্নাতের যুবকদের সর্দার হবে।" হুনাইনের দিন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দৃঢ়ভাবে অবস্থান করেন (ধৈর্য ধারণ করেন)। ভোরের আবছা অন্ধকারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে দেখে জিজ্ঞাসা করলেন: "ইনি কে?" তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল, আপনার মায়ের পুত্র (ভাই)। নাপিত তাকে চুল কাটার সময় তার মাথা থেকে একটি আঁচিল কেটে ফেললে রক্ত বন্ধ হলো না, ফলস্বরূপ তিনি মারা যান। আর এটা ছিল বিশ হিজরীর ঘটনা। তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি মক্কা বিজয়ের উদ্দেশ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বের হওয়ার সময় পথের কোনো এক স্থানে তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করেন এবং বিজয়ের আগেই ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في نسخنا الخطية: يرق، بغير همز، والجادة همزُه.
[2] كلُّ ما ذكره مصعب بن عبد الله الزُّبيري هنا له شواهد تقدَّمت عند المصنف قريبًا.
5196 - أخبرني أبو الحُسين بن يعقوب الحافظ، أخبرنا محمد بن إسحاق، حدثني أبو يُونس، حدثنا إبراهيم بن المنذر، قال: أبو سفيان بن الحارث بن عبد المُطّلب اسمُه المُغيرة، توفي سنة عشرين، وصلَّى عليه عمرُ بن الخطاب [1].
ইব্রাহিম ইবনুল মুনযির থেকে বর্ণিত, আবূ সুফিয়ান ইবনুল হারিস ইবনে আবদুল মুত্তালিবের নাম ছিল মুগীরাহ। তিনি বিশ হিজরি সনে ইন্তেকাল করেন এবং উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تقدَّم برقم (5188) من طريق الفضل بن محمد الشَّعْراني عن إبراهيم بن المنذر. أبي زكريا العَنْري وأبي الحسن بن موسى الفقيه، كلاهما عن إبراهيم بن أبي طالب.وأخرجه البيهقي 10/ 93 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.
5197 - أخبرني أبو العباس محمد بن أحمد المَحبُوبي بمَرُو، حدثنا أحمد بن سَيَّار، حدثنا عبد الله بن عثمان بن جَبَلة، حدثني أبي، أخبرنا شُعبة، عن سِماك بن حرب، قال: كنا مع مُدرِك بن المُهلَّب بسِجِستانَ في سُرادِقِه، فسمعتُ شيخًا يُحدِّث عن أبي سفيان بن الحارث بن عبد المُطَّلب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إنَّ الله لا يُقدِّسُ أمةً لا يأخُذُ الضعيفُ حقَّه من القويِّ وهو غيرُ مُتَعْتَعٍ" [1].فإذا الشيخُ الذي لم يُسمِّه عثمان بن جَبَلة عن شعبة عن سماك، قد سمّاهُ عُندَرٌ، غيرَ أنه لم يَذكُر أبا سفيان في الإسناد.
আবু সুফিয়ান ইবনুল হারিস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ সেই জাতিকে পবিত্র করেন না, যেখানে দুর্বল ব্যক্তি কোনো প্রকার বাধাগ্রস্ত বা ভীত না হয়ে সবল ব্যক্তির কাছ থেকে তার অধিকার আদায় করে নিতে পারে না।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم لولا هذا الشيخ المبهم الذي لم يُسَمَّ.وقد تقدَّم عند المصنف برقم (5194) من طريق أبي المُوجِّه عن عبد الله بن عثمان بن جَبَلة، وهو المعروف بعَبْدان.وأخرجه البيهقي في "السنن الكبرى" 10/ 93 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن قانع في "المعجم الصحابة" 3/ 88 عن معاذ بن المثنَّى، والخطيب البغدادي في "تاريخ بغداد" 5/ 306 من طريق يحيى بن محمد بن صاعد، كلاهما عن أحمد بن سيّار، به.والسُّرادِقُ: هو كلُّ ما أحاط بشيءٍ، نحو الخِباء.وقوله: "إنَّ الله لا يُقدِّس أُمَّةٌ" معناه: لا يُطهِّرها ولا يُزكِّيها. أبي زكريا العَنْري وأبي الحسن بن موسى الفقيه، كلاهما عن إبراهيم بن أبي طالب.وأخرجه البيهقي 10/ 93 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.
5198 - أخبرَناهُ محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا أبو موسى وبُندارٌ، قالا: حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن سِماك، عن عبد الله بن أبي سفيان بن الحارث بن عبد المُطَّلب، قال: كان لرجلٍ على رسول الله صلى الله عليه وسلم تَمرٌ، فأتاه يَتقاضاه، فاستقرضَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم من خَولةَ بنتِ حَكيمٍ تمرًا، فأعطاهُ إياه، وقال: "أمَا إنّه قد كان عِندي تمرٌ، لكنه قد كان عَثَريًا"، ثم قال: "كذلك يفعلُ عِبادُ الله المؤمنون، إنَّ الله لا يَتَرحَّمُ على أمّةٍ لا يأخذُ الضعيفُ منهم حقَّه غيرَ مُتَعتَعٍ" [1]. ذكرُ مناقب محمد بن عِيَاض الزُّهْري رضي الله عنه -
আব্দুল্লাহ ইবনে আবী সুফিয়ান ইবনে হারিস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তির রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে খেজুর পাওনা ছিল। সে তা পরিশোধের জন্য তাঁর কাছে আসল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাওলা বিনতে হাকীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে খেজুর ধার করলেন এবং তাকে তা দিয়ে দিলেন। আর বললেন, “শোনো! আমার কাছে খেজুর ছিল, কিন্তু তা ছিল (বৃষ্টির পানিতে উৎপন্ন) নিম্নমানের (‘আছারীয়া’)।" এরপর তিনি বললেন, “এরূপই করে থাকে আল্লাহর মুমিন বান্দারা। নিশ্চয় আল্লাহ সেই জাতির প্রতি রহম করেন না, যাদের মধ্যে দুর্বল ব্যক্তি বিনা বাধায় তার অধিকার গ্রহণ করতে পারে না।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، وقد تقدَّم عند المصنف برقم (5193) عن أبي زكريا العَنْري وأبي الحسن بن موسى الفقيه، كلاهما عن إبراهيم بن أبي طالب.وأخرجه البيهقي 10/ 93 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.