আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
5219 - حدثني أبو بكر بن أبي دارِم، حدثنا عُبيد بن غَنّام.وأخبرنا أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا إسماعيل بن قُتيبة؛ قالا: حدثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: مات عُتبة بن غَزوان سنة سبعَ عشرةَ، ومات وله سبعٌ وخمسون سنةً.
মুহাম্মদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু নুমাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উত্বা ইবনু গাযওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সতেরো (১৭) হিজরী সনে মৃত্যুবরণ করেন। তিনি যখন মারা যান, তখন তাঁর বয়স হয়েছিলো সাতান্ন (৫৭) বছর।
5220 - أخبرني محمد بن علي الشَّيباني بالكوفة، حدثنا أحمد بن حازم الغِفاري، حدثنا أبو نُعيم، حدثنا قُرّة بن خالد.وأخبرنا أحمد بن جعفر القَطِيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا وكيع، حدثنا قُرّة بن خالد، عن حُميد بن هِلال.وحدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب - واللفظ له - حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا أسَد بن موسى، حدثنا سليمان بن موسى [1]، عن حُميد بن هلال، عن خالد بن عُمير العَدَوي، قال: خَطبَنا عُتبةُ بن غَزْوان، فحَمِدَ الله وأثنى عليه، ثم قال: أما بعدُ، فإنَّ الدنيا قد آذَنَتْ بِصُرْمٍ وَوَلَّت حَذّاءَ، وإنما بقيَ منها صُبَابةٌ كصُبَابة الإناء يَصطَبُّها صاحبُها، وإنكم مُنتقِلون منها إلى دارٍ لا زوالَ لها، فانتقِلوا منها بخيرِ ما بحَضْرتِكم، فإنه قد ذُكِر لنا: أنَّ الحَجَر يُلقَى من شَفِير جَهنّم، فيَهوي بها سبعينَ عامًا، وما يُدرِكُ لها قَعْرًا، فوالله لَتُمْلأنَّهُ، أفَعجِبتُم! وقد ذُكر لنا: أنَّ مِصرَاعَين من مَصارِيع الجنةِ بينهما أَربعون سنةً، وليأتِيَنّ عليه يومٌ وهو كَظِيظُ الزِّحام، ولقد رأيتُني وإني لَسابعُ سبعةٍ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ما لنا طعامٌ إلَّا وَرَقُ الشجر حتى قَرَحَتْ أشْداقُنا، وإني التَقطْتُ بُرْدةً فشَقَقْتُها بيني وبين سعد بن أبي وَقّاص فارسِ الإسلام، فاتَّزرتُ بنصفِها واتَّزرَ سعدٌ بنصفِها، وما أصبحَ منا اليومَ أحدٌ حيٌّ إلَّا أصبحَ أميرَ مِضْرٍ من الأمصار، وإنني أعوذُ بالله أن أكونَ في نَفْسي عظيمًا، وعند الله صغيرًا، وإنها لم تكن نُبوّةٌ قَطُّ إلَّا تناقَصَتْ حتى يكون عاقبتُها مُلكًا، وستُجرّبون - أو تَبْلُونَ - الأمراءَ بَعدِي [2]. صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
উতবা ইবনু গাযওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (খালিদ ইবনু উমায়ের আল-আদাবী বলেন: উতবা) আমাদের মাঝে ভাষণ দিলেন। তিনি আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও তাঁর গুণগান করলেন, অতঃপর বললেন: "আম্মা বা'দ (যাবতীয় প্রশংসা ও গুণগান পর), নিশ্চয়ই দুনিয়া তার সমাপ্তির ঘোষণা দিয়েছে এবং দ্রুত গতিতে পিঠ ফিরিয়ে চলে গেছে। এর সামান্য কিছু অংশই অবশিষ্ট রয়েছে, যেমন পাত্রের সামান্য তলানি, যা তার মালিক ঢেলে পান করে থাকে। আর তোমরা এই দুনিয়া থেকে এমন এক স্থায়ী নিবাসের দিকে স্থানান্তরিত হবে, যার কোনো বিনাশ নেই। সুতরাং, তোমাদের নিকট যা ভালো আছে, তা নিয়েই তোমরা এই দুনিয়া থেকে প্রস্থান করো। কারণ আমাদের কাছে উল্লেখ করা হয়েছে যে, জাহান্নামের কিনারা থেকে একটি পাথর নিক্ষেপ করা হলে তা সত্তর বছর ধরে নিচের দিকে পড়তে থাকে, কিন্তু এর গভীরে পৌঁছাতে পারে না। আল্লাহর শপথ! অবশ্যই তা পূর্ণ হয়ে যাবে। তোমরা কি বিস্মিত হচ্ছো? আর আমাদের কাছে এও উল্লেখ করা হয়েছে যে, জান্নাতের দুটি দরজার কপাটের মধ্যবর্তী দূরত্ব চল্লিশ বছরের পথ, কিন্তু এমন এক দিন আসবে যখন সেখানে ভিড়ের কারণে উপচে পড়া অবস্থা হবে। আমি (সেই সময়ের) নিজেকে দেখেছি, যখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে থাকা সাত জনের সপ্তম ছিলাম। আমাদের গাছের পাতা ছাড়া আর কোনো খাবার ছিল না, ফলে আমাদের গালের পাশ (ঠোঁটের কোণ) ক্ষত-বিক্ষত হয়ে গিয়েছিল। আমি একটি চাদর কুড়িয়ে পেয়েছিলাম এবং আমি ইসলামের অশ্বারোহী বীর সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে তা দু'ভাগ করে ভাগ করে নিলাম। আমি অর্ধেক পরিধান করলাম এবং সা'দও অর্ধেক পরিধান করল। আজ আমাদের মধ্যে জীবিত এমন কেউ নেই, যে কোনো জনপদের শাসক হয়নি। আর আমি আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই এই থেকে যে, আমি যেন নিজের চোখে মহান হই, কিন্তু আল্লাহর কাছে তুচ্ছ। আর এমন কোনো নবুয়্যত কখনো আসেনি যার (প্রাথমিক অবস্থা) হ্রাস পায়নি, অবশেষে তার পরিণতি রাজত্বে রূপ নিয়েছে। তোমরা আমার পরে শাসকদের পরীক্ষা করবে—অথবা (বললেন) তাদের দ্বারা পরীক্ষিত হবে।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك جاء في أصول "المستدرك": سليمان بن موسى، وهو وهمٌ فيما يغلب على ظننا، لأنَّ الطبراني قد أخرج هذا الحديث في "معجمه الكبير" 17/ (280) عن مقدام بن داود، عن أسد بن موسى، عن سليمان بن المغيرة، وقد رواه عن سليمان بن المغيرة، جماعة يزيد عددهم على السبعة، كلهم يروونه بمثل هذا اللفظ الذي ساقه المصنف هنا، فهو الصحيح هنا كذلك أنه سليمان بن المغيرة، وكأنه خطأٌ ناشئ عن سبق نظر. وهو في "مسند أحمد" 29/ (17574) و 34/ (20609) مختصرًا دون ذكر الحجر والمصراعين والبُردة وما بعدها.وأخرجه مسلم (2967) عن أبي كُريب محمد بن العلاء عن وكيع، به، مختصرًا كذلك بقوله: رأيتُني، إلى قوله: قَرِحت أشداقنا. ولم يذكر سائره.وأخرجه بطوله أحمد 29/ (17575)، ومسلم (2967)، والنسائي (11790)، وابن حبان (7121) من طرق عن سليمان بن المغيرة، وأحمد 34/ (20610) من طريق أيوب السختياني، كلاهما عن حميد بن هلال، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه مختصرًا أحمد 34/ (20609)، وابن ماجه (4156) من طريق وكيع، عن أبي نَعَامة العدوي، عن خالد بن عُمير، به. قال أحمد: ما حدَّث بهذا الحديث غير وكيع، يعني أنه غريب. قلنا: يعني بذكر أبي نعامة، فإنَّ المشهور أنه لحميد بن هلال عن خالد بن عُمير. لكن قد رواه غير وكيع، فقد رواه صفوان بن عيسى البصري عن أبي نعامة عند الترمذي في "الشمائل المحمدية" (375) وغيره.وأخرجه مختصرًا بذكر الحجر الذي يُلقى في جهنم: الترمذيُّ (2575) من طريق الحسن البصري، قال: قال عتبة بن غزوان على منبرنا هذا منبر البصرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، هكذا رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وقال الترمذي: لا نعرف للحسن سماعًا من عتبة بن غزوان، وإنما قَدِم عتبةُ بن غزوان البصرة زمن عمر، ووُلِدَ الحسن لسنتين بقيتا من خلافة عمر. قلنا: ورفعه وهمٌ، فإنَّ المحفوظ أنَّ عُتبة بن غزوان قال فيه: فإنه قد ذُكر لنا … فذكره، وفي رواية: فلقد بلغني أنَّ الحجر … فلم يُصرِّح فيه عتبة بن غزوان بالرفع، وإن كان مثلُه له حكم الرفع إذ لا يُقال بالرأي والاجتهاد.قوله: آذنت بصرم، معناه: أعلمت بانقطاع.وقوله: حَذَّاء، معناه: منقطعة ومنفصلة.والصُّبابة: الماء القليل الذي يبقى في الإناء ونحوه.والشَّفير: الحافَة والجانب.وقوله: كَظيظ الزحام، أي: الباب، يعني مُمتلئًا.وقوله: قَرِحَت أشداقُنا، أي: تَجرّحت من أكل ورق الشجر.وقوله: تَبْلُون، من بَلاه يَبلُوه بَلْوًا: إذا جرّبه.
[2] إسناده صحيح. أبو نعيم: هو الفضل بن دُكين. وهو في "مسند أحمد" 29/ (17574) و 34/ (20609) مختصرًا دون ذكر الحجر والمصراعين والبُردة وما بعدها.وأخرجه مسلم (2967) عن أبي كُريب محمد بن العلاء عن وكيع، به، مختصرًا كذلك بقوله: رأيتُني، إلى قوله: قَرِحت أشداقنا. ولم يذكر سائره.وأخرجه بطوله أحمد 29/ (17575)، ومسلم (2967)، والنسائي (11790)، وابن حبان (7121) من طرق عن سليمان بن المغيرة، وأحمد 34/ (20610) من طريق أيوب السختياني، كلاهما عن حميد بن هلال، به. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه مختصرًا أحمد 34/ (20609)، وابن ماجه (4156) من طريق وكيع، عن أبي نَعَامة العدوي، عن خالد بن عُمير، به. قال أحمد: ما حدَّث بهذا الحديث غير وكيع، يعني أنه غريب. قلنا: يعني بذكر أبي نعامة، فإنَّ المشهور أنه لحميد بن هلال عن خالد بن عُمير. لكن قد رواه غير وكيع، فقد رواه صفوان بن عيسى البصري عن أبي نعامة عند الترمذي في "الشمائل المحمدية" (375) وغيره.وأخرجه مختصرًا بذكر الحجر الذي يُلقى في جهنم: الترمذيُّ (2575) من طريق الحسن البصري، قال: قال عتبة بن غزوان على منبرنا هذا منبر البصرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، هكذا رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وقال الترمذي: لا نعرف للحسن سماعًا من عتبة بن غزوان، وإنما قَدِم عتبةُ بن غزوان البصرة زمن عمر، ووُلِدَ الحسن لسنتين بقيتا من خلافة عمر. قلنا: ورفعه وهمٌ، فإنَّ المحفوظ أنَّ عُتبة بن غزوان قال فيه: فإنه قد ذُكر لنا … فذكره، وفي رواية: فلقد بلغني أنَّ الحجر … فلم يُصرِّح فيه عتبة بن غزوان بالرفع، وإن كان مثلُه له حكم الرفع إذ لا يُقال بالرأي والاجتهاد.قوله: آذنت بصرم، معناه: أعلمت بانقطاع.وقوله: حَذَّاء، معناه: منقطعة ومنفصلة.والصُّبابة: الماء القليل الذي يبقى في الإناء ونحوه.والشَّفير: الحافَة والجانب.وقوله: كَظيظ الزحام، أي: الباب، يعني مُمتلئًا.وقوله: قَرِحَت أشداقُنا، أي: تَجرّحت من أكل ورق الشجر.وقوله: تَبْلُون، من بَلاه يَبلُوه بَلْوًا: إذا جرّبه.
5221 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ - وأنا سألتُه - حدثنا الحسن ابن علي بن شَبيب المَعمَري، حدثنا عبد الملك بن بشير السامِيّ [1]، حدثنا أبو حَفْص عمر بن الفضل السُّلَمي، حدثنا عتبة بن إبراهيم بن عُتبة بن غَزوان، عن أبيه، عن جَدِّه عُتبة بن غَزوان: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يومًا لقُريش: "هل فِيكم أحدٌ من غيرِكم؟ " قالوا: ابن أُختِنا عُتبةُ بن غَزْوان، فقال: "ابن أُختِ القومِ مِنهُم" [2].ذكرُ عتبة بن غزوان في هذا الحديث غريب جدًّا، وفضائلُه كثيرة، وهذا من أجلّ فضائلِه.ومَسانيدُ عُتبة بن غزوان عن رسول الله صلى الله عليه وسلم عزيزةٌ، وقد كتبْنا من ذلك حديثًا استغربْناه جدًّا، فأنا ذاكِرُه وإن لم يكن الغَلَابيّ من شرط هذا الكتاب:
উতবা ইবনে গাযওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন কুরাইশদের বললেন: "তোমাদের মধ্যে কি তোমাদের বাহিরের কেউ আছে?" তারা বলল: "আমাদের বোনের ছেলে উতবা ইবনে গাযওয়ান।" তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কোনো গোত্রের বোনের ছেলে তাদেরই অন্তর্ভুক্ত।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: النسائي، وإنما هو السامي، نسبة إلى سامة بن لؤي، وهو بصري لا نسائي. ابن حجر في "الإصابة" 4/ 438، وغزوان بن عُتبة بن غزوان قال العُقيلي في "الضعفاء" 3/ 335: لا يُعرف إلّا بهذا الحديث، ولا يُتابَع على إسناده، والمتن معروف. قلنا: ومحمد بن زكريا الغَلَابي ضعيف واتهمه الدارقطني، لكنه لم ينفرد به، والعجب من المصنِّف أنه ضعَّف الحديث واستغربه لأجله، وسكت عن شيخه ابن جَبَلة مع أنه مثله إن لم يكن أسوأ حالًا منه، بل إنَّ ابن جَبَلة هو عِلَّته، لأنَّ غير واحدٍ رواه عنه غير الغَلَابي، فعليه مدار الحديث.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (288) عن محمد بن زكريا الغَلابي، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "طرق حديث من كذب عليَّ متعمدًا" (172)، ومن طريقه ابن الجوزي في "الموضوعات" (96) عن إبراهيم بن هاشم البغوي، والعُقيلي في "الضعفاء الكبير" (1431) عن أحمد بن محمد بن عاصم الرازي، وأورده أبو القاسم الرافعي في "التدوين في أخبار قزوين" 2/ 78 من طريق سيَّار بن الحَسن التُستَري، ثلاثتهم عن عبد الرحمن بن عمرو بن جَبَلة، به.وهذا المتن معروف كما قال العقيلي، بل هو متواتر، انظر شواهده في التعليق على "صحيح ابن حبان" عند الحديث (28).
[2] إسناده ضعيف لجهالة حال عُتبة بن إبراهيم بن عُتبة بن غَزوان، وأبوه إبراهيم لا يُعرف إلّا بهذا الإسناد، وقال الذهبي في "تلخيصه": إسناده مُظلم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (291) عن الحسن بن علي المَعمري، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي عاصم في "الآحاد والمثاني" (302)، ومن طريقه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (5340) عن عبد الملك بن بشير السامي، به.وقد صحَّ عنه صلى الله عليه وسلم أنه قال ذلك لدى مقالته المشهورة للأنصار إبان غزوة حُنين كما في حديث أنس بن مالك عند أحمد 20/ (12766) و (13084)، والبخاري (3528)، ومسلم (1059) وغيرهم، ليس فيه ذكرٌ لعتبة بن غزوان. ابن حجر في "الإصابة" 4/ 438، وغزوان بن عُتبة بن غزوان قال العُقيلي في "الضعفاء" 3/ 335: لا يُعرف إلّا بهذا الحديث، ولا يُتابَع على إسناده، والمتن معروف. قلنا: ومحمد بن زكريا الغَلَابي ضعيف واتهمه الدارقطني، لكنه لم ينفرد به، والعجب من المصنِّف أنه ضعَّف الحديث واستغربه لأجله، وسكت عن شيخه ابن جَبَلة مع أنه مثله إن لم يكن أسوأ حالًا منه، بل إنَّ ابن جَبَلة هو عِلَّته، لأنَّ غير واحدٍ رواه عنه غير الغَلَابي، فعليه مدار الحديث.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (288) عن محمد بن زكريا الغَلابي، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "طرق حديث من كذب عليَّ متعمدًا" (172)، ومن طريقه ابن الجوزي في "الموضوعات" (96) عن إبراهيم بن هاشم البغوي، والعُقيلي في "الضعفاء الكبير" (1431) عن أحمد بن محمد بن عاصم الرازي، وأورده أبو القاسم الرافعي في "التدوين في أخبار قزوين" 2/ 78 من طريق سيَّار بن الحَسن التُستَري، ثلاثتهم عن عبد الرحمن بن عمرو بن جَبَلة، به.وهذا المتن معروف كما قال العقيلي، بل هو متواتر، انظر شواهده في التعليق على "صحيح ابن حبان" عند الحديث (28).
5222 - حدَّثَناهُ أبو جعفر أحمد بن عُبيد بن إبراهيم الحافظ بهَمَذان، حدثنا محمد بن زكريا الغَلَابي، حدثنا عبد الرحمن بن عَمرو بن جَبَلة، حدثنا عمر بن الفضل السُّلَمي، حدثنا غَزْوان بن عُتبة بن غزوان، عن أبيه، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن كَذَب علَيَّ متعمدًا، فلْيتَبوَّأْ مَقعدَه من النارِ" [1]. ذكرُ مناقب أبي عُبيدة بن الجَرّاح رضي الله عنه -
উতবা ইবনে গাযওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে আমার উপর মিথ্যা আরোপ করে, সে যেন জাহান্নামে তার আসন তৈরি করে নেয়।”
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف جدًّا من أجل عبد الرحمن بن عمرو بن جَبَلة، فهو متروك كما قال الحافظ ابن حجر في "الإصابة" 4/ 438، وغزوان بن عُتبة بن غزوان قال العُقيلي في "الضعفاء" 3/ 335: لا يُعرف إلّا بهذا الحديث، ولا يُتابَع على إسناده، والمتن معروف. قلنا: ومحمد بن زكريا الغَلَابي ضعيف واتهمه الدارقطني، لكنه لم ينفرد به، والعجب من المصنِّف أنه ضعَّف الحديث واستغربه لأجله، وسكت عن شيخه ابن جَبَلة مع أنه مثله إن لم يكن أسوأ حالًا منه، بل إنَّ ابن جَبَلة هو عِلَّته، لأنَّ غير واحدٍ رواه عنه غير الغَلَابي، فعليه مدار الحديث.وأخرجه الطبراني في "الكبير" 17/ (288) عن محمد بن زكريا الغَلابي، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "طرق حديث من كذب عليَّ متعمدًا" (172)، ومن طريقه ابن الجوزي في "الموضوعات" (96) عن إبراهيم بن هاشم البغوي، والعُقيلي في "الضعفاء الكبير" (1431) عن أحمد بن محمد بن عاصم الرازي، وأورده أبو القاسم الرافعي في "التدوين في أخبار قزوين" 2/ 78 من طريق سيَّار بن الحَسن التُستَري، ثلاثتهم عن عبد الرحمن بن عمرو بن جَبَلة، به.وهذا المتن معروف كما قال العقيلي، بل هو متواتر، انظر شواهده في التعليق على "صحيح ابن حبان" عند الحديث (28).
5223 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ العَدلُ، حدثنا موسى بن هارون، حدثنا الحسين بن علي بن يزيد الصُّدَائي، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثني أبي، عن محمد بن إسحاق بن يَسَار قال: أبو عُبيدة عامرُ بنُ عبد الله بن الجَرّاح بن هِلال بن أُهَيب بن ضَبّة بن الحارث بن فِهْر بن مالك بن النَّضْر بن كِنانة، وأمُّه أم غَنْم بنت جابر بن العَدْل بن عامر [1] بن عَمِيرة بن وَدِيعة بن الحارث بن فِهر [2].
আলি ইবনু হামশায আল-আদল আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: মুসা ইবনু হারুন আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: হুসাইন ইবনু আলি ইবনু ইয়াযীদ আস-সুদা’ঈ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: ইয়াকুব ইবনু ইবরাহীম ইবনু সা‘দ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমার পিতা আমার নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক ইবনু ইয়াসার থেকে বর্ণনা করেন, যিনি বলেন: আবু উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হলেন আমির ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আল-জাররাহ ইবনু হিলাল ইবনু উহাইব ইবনু দাব্বাহ ইবনু আল-হারিস ইবনু ফিহ্র ইবনু মালিক ইবনু আন-নাদর ইবনু কিনানাহ। আর তাঁর মাতা হলেন উম্মু গানম বিনতু জাবির ইবনু আল-আদল ইবনু আমির ইবনু উমাইরাহ ইবনু ওয়াদী‘আহ ইবনু আল-হারিস ইবনু ফিহ্র।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذا جاء هذا الاسمان في هذا النسب في النسخ الخطية، مع أنَّ المعروف عند علماء الأنساب أنَّ عَميرة وَلَدَ عامرةَ، هكذا بزيادة التاء المربوطة آخره، وليس في أولاد عَمِيرة من اسمه عامر، ولم يذكروا في أولاد عامرة ولدًا اسمه العدل. وانظر "طبقات ابن سعد" 3/ 379، و"نسب قريش" لمصعب بن عبد الله الزبيري ص 440، و"أنساب الأشراف" للبلاذُري 11/ 63 - 64. وبعضُهم يقول في هذا النسب: جابر بن عبد بن العداء بن عامر. انظر "تاريخ دمشق" 25/ 438. وانظر "السيرة النبوية" لابن هشام 1/ 252 و 329.
[2] وأخرجه الطبراني في "الكبير" (358) وعنه أبو نُعيم في "معرفة الصحابة" (578) عن محمد بن علي بن الفضل المديني، عن الحسين بن علي بن يزيد الصُّدائي، به. وفيه: جابر بن عبد بن العداء. وانظر "السيرة النبوية" لابن هشام 1/ 252 و 329.
5224 - أخبرنا أحمد بن يعقوب الثقفي، حدثنا موسى بن زكريا التُّستَري، حدثنا خليفة بن خيّاط، فذكَرَ هذا النسبَ، وقال: أدركتْ أمُّ أبي عُبيدة الإسلامَ [1].
খলীফা ইবনে খায়্যাত থেকে বর্ণিত, তিনি এই বংশধারাটি উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন, আবূ উবাইদার মাতা ইসলাম পেয়েছিলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] هو في "طبقات خليفة بن خياط" ص 27 - 28. وأخرجه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 68، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (2549)، وابن عساكر 25/ 474 من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق السبيعي، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود. وإسناده صحيح، وقد تابع زهيرًا على ذلك شريك النخعي كما في "العلل" للدارقطني (909)، ومثل هذا الاختلاف على أبي إسحاق محمولٌ على تعدُّد شيوخه في الخبر لا على الاضطراب، لسعة مرويات أبي إسحاق. وهذا ما يفيده قول أبي حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه (2647)، وأصرحُ منه قول الدارقطني في "علله" (909) إذ قال: يُشبه أن يكونا صحيحين.
5225 - حدثنا علي بن عيسى، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا ابن أبي عُمر، حدثنا سفيان، عن ابن أبي نَجِيح، قال: قال عمرُ لأصحابِه: تَمنَّوا، فجعل كلُّ رجلٍ منهم يَتَمنَّى شيئًا، فقال: لكني أتمنّى بيتًا مملُوءًا رجالًا مثلَ أبي عُبيدة بن الجَرّاح، فقالوا له: ما أَلَوتَ الإسلامَ خيرًا، قال: ذلك أردْتُ [1].
উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর সাথীদের বললেন: তোমরা (কিছু) কামনা কর। তখন তাদের মধ্য থেকে প্রত্যেকেই কিছু না কিছু কামনা করতে শুরু করল। অতঃপর তিনি বললেন: কিন্তু আমি এমন একটি ঘর কামনা করি যা আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহর মতো লোকে পরিপূর্ণ থাকবে। তারা তাঁকে বলল: আপনি ইসলামের জন্য সর্বোচ্চ কল্যাণ কামনা করেছেন। তিনি বললেন: আমি এটাই চেয়েছিলাম।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات لكنه منقطع، لأنَّ ابن أبي نجيح - وهو عبد الله بن أبي نجيح يسار المكي - لم يُدرك عمر بن الخطاب، لكن رُوي هذا عن عمر بن الخطاب من وجهٍ آخر حسن الإسناد تقدَّم عند المصنف برقم (5075). سفيان: هو ابن عُيينة، وابن أبي عمر: هو محمد بن يحيى بن أبي عمر العَدَني.وأخرجه ابن سعد في "الطبقات الكبرى" 3/ 382، والبلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 72، وابن أبي الدنيا في "المتمنّين" (39)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 474 من طرق عن سفيان بن عيينة، به.قولهم: ما أَلَوتَ، أي: ما قَصَّرت. وأخرجه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 68، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (2549)، وابن عساكر 25/ 474 من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق السبيعي، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود. وإسناده صحيح، وقد تابع زهيرًا على ذلك شريك النخعي كما في "العلل" للدارقطني (909)، ومثل هذا الاختلاف على أبي إسحاق محمولٌ على تعدُّد شيوخه في الخبر لا على الاضطراب، لسعة مرويات أبي إسحاق. وهذا ما يفيده قول أبي حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه (2647)، وأصرحُ منه قول الدارقطني في "علله" (909) إذ قال: يُشبه أن يكونا صحيحين.
5226 - أخبرنا أبو بكر أحمد بن إسحاق، أخبرنا محمد بن غالب، حدثنا أبو حُذيفة، حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن أبي عُبيدة قال: كان عبدُ الله يقول: كان أخِلّائي من أصحاب رسول الله ثلاثةً ولم آلُ: أبو بكر وعمرُ وأبو عُبيدةَ [1].
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের মধ্যে আমার ঘনিষ্ঠ বন্ধু ছিলেন তিনজন, যাদের প্রতি আমার ভালোবাসার কোনো কমতি ছিল না: আবূ বকর, উমার এবং আবূ উবাইদাহ।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم غير أنَّ أبا عُبيدة - وهو ابن عبد الله بن مسعود - لم يسمع من أبيه، لكن روى هذا عن عبد الله بن مسعود أيضًا أبو الأحوص عوف بن مالك الجُشمي، فالخبر صحيح. سفيان: هو الثوري، وأبو إسحاق: هو عمرو بن عبد الله السَّبيعي، وأبو حذيفة: هو موسى بن مسعود النهدي.وأخرجه أحمد في "فضائل الصحابة" (1277) و (1551)، وابن عساكر 25/ 474 من طريق وكيع بن الجراح، عن سفيان الثوري، به. وأخرجه البلاذُري في "أنساب الأشراف" 11/ 68، وأبو القاسم البغوي في "الجعديات" (2549)، وابن عساكر 25/ 474 من طريق زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق السبيعي، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود. وإسناده صحيح، وقد تابع زهيرًا على ذلك شريك النخعي كما في "العلل" للدارقطني (909)، ومثل هذا الاختلاف على أبي إسحاق محمولٌ على تعدُّد شيوخه في الخبر لا على الاضطراب، لسعة مرويات أبي إسحاق. وهذا ما يفيده قول أبي حاتم الرازي كما في "العلل" لابنه (2647)، وأصرحُ منه قول الدارقطني في "علله" (909) إذ قال: يُشبه أن يكونا صحيحين.
5227 - حدثنا علي بن حَمْشاذَ، حدثنا بِشر بن موسى، حدثنا الحُميدي، حدثنا سفيان، عن أيوب بن عائذٍ الطائي، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، قال: أتانا كتابُ عمرُ لمّا وقع الوَباءُ بالشام، فكتب عمرُ إلى أبي عُبيدة: إنه قد عَرَضَت لي إليك حاجةٌ لا غِنًى لي بك عنها، فقال أبو عُبيدة: يَرحمُ الله أميرَ المؤمنين، يريدُ بقاءَ قومٍ ليسوا بباقِين، قال: ثم كتب إليه أبو عُبيدة: إني في جيش من جُيوش المسلمين، لست أرغَبُ بنفسي عن الذي أصابَهم، فلما قرأ الكتابَ استرجَعَ، فقال الناس: ماتَ أبو عُبيدة، قال: لا، وكان كتب إليه بالعَزِيمة: فاظْهَرْ من أرض الأُردُنّ، فإنها غَمِقةٌ [1] وبِيّةٌ، إلى أرض الجابيَة، فإنها نَزِهةٌ نَدِيّةٌ، فلما أتاه الكتاب بالعزيمة أمر مُنادِيَه: أذِّن في الناس بالرَّحِيل، فلما قُدِّم إليه [2] ليَركَبَه، وضَعَ رِجْلَه في الغَرْزِ ثَنَى رجلَه، فقال: ما أُرى داءَكم إلَّا قد أصابَني. قال: وماتَ أبو عُبيدة، ورُفع الوَباءُ عن الناس [3]. رُواة هذا الحديثِ كلُّهم ثقات، وهو عَجيبٌ بمرّةٍ.
তারিক ইবনু শিহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন সিরিয়ায় (আশ-শাম) মহামারী দেখা দিল, তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পত্র আমাদের কাছে এলো। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লিখলেন: আমার আপনার কাছে একটি প্রয়োজন দেখা দিয়েছে, যা আপনাকে ছাড়া পূরণ হওয়ার নয়।
তখন আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ যেন আমীরুল মু'মিনীনকে রহম করেন। তিনি এমন এক কওমের (জাতির) জীবন রক্ষা করতে চাইছেন যারা স্থায়ী নয়।
তিনি (তারিক ইবনু শিহাব) বললেন: এরপর আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে লিখলেন: আমি মুসলিমদের একটি সৈন্যদলের মধ্যে আছি। তাদের ওপর যা আপতিত হয়েছে, তা থেকে নিজেকে দূরে সরিয়ে নিতে আমি পছন্দ করি না।
যখন তিনি (উমার) পত্রটি পড়লেন, তখন তিনি 'ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন' পাঠ করলেন। লোকেরা বলল: আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারা গেছেন। তিনি (উমার) বললেন: না (মারা যাননি)। উমার দৃঢ়তার সাথে (আযীমাতসহ) তাকে লিখেছিলেন: আপনি জর্ডানের (আল-উর্দুন) ভূমি ত্যাগ করে বেরিয়ে আসুন, কেননা তা হলো স্যাঁতস্যাঁতে ও রোগাক্রান্ত ভূমি, এবং আপনি জাবিয়া (আল-জাবিয়াহ)-এর ভূমির দিকে যান, কেননা তা মনোরম ও আর্দ্র।
যখন দৃঢ়তার (আযীমাহর) সাথে তার কাছে পত্র এলো, তিনি তার ঘোষককে নির্দেশ দিলেন: লোকদের মাঝে সফরের ঘোষণা দাও। যখন তার কাছে (সওয়ারি) আনা হলো যাতে তিনি তাতে আরোহণ করেন, তিনি তার পা রেকাবে রাখলেন কিন্তু সাথে সাথেই তার পা গুটিয়ে নিলেন, এবং বললেন: আমি মনে করি তোমাদের রোগ আমাকেও আক্রমণ করেছে।
তিনি (তারিক ইবনু শিহাব) বললেন: এরপর আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারা গেলেন এবং লোকদের থেকে মহামারী উঠে গেল।
এই হাদীসের সকল বর্ণনাকারী বিশ্বস্ত, এবং এটি অত্যন্ত আশ্চর্যের।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في المطبوع: عميقة. وإنما هي غَمِقة، بالغين المعجمة وليس بعد الميم ياء، ومعناها: الأرض القريبة من المياه فهي نديَّة كثيرة الندى والطّلّ، فيحصل من ذلك الوباء. عُبيدة وعُمر بن الخطاب - لم يحضر هذه الواقعة بالشام، وإنما الذي حضرها وحدَّث طارقَ بنَ شهاب بها هو أبو موسى الأشعري كما في بعض الروايات، وكأنَّ طارقًا هو نفسُه كان يُفصح أحيانًا عمَّن حدَّثه بالخبر، وفي أحيان أخرى يُرسل الخبر، وعليه فما وقع في رواية المصنِّف من قول طارقٍ: أتانا كتابُ عمر، فوهمٌ.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 422 من طريق البيهقي، عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر 25/ 484 من طريق عثمان بن جَبَلة، عن شعبة، عن قيس بن مسلم بنحوه.وأخرجه بنحوه كذلك الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 4/ 305 من طريق عاصم بن علي الواسطي وعبد الرحمن بن زياد الرصاصي، والهيثم بن كليب الشاشي في "مسنده" (618) - ومن طريقه ابن عساكر 25/ 483 - من طريق وهب بن جرير بن حازم، وابنُ عساكر 24/ 423 من طريق آدم بن أبي إياس، والطبري في "تهذيب الآثار" في القسم الذي فيه مسانيد بعض العشرة (113) من طريق محمد بن جعفر، خمستهم عن شعبة، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، قال: كنا نتحدث إلى أبي موسى الأشعري، فقال لنا ذات يوم: … وإني سأُحدِّثكم ما ينبغي للناس في الطاعون، إني كنت مع أبي عبيدة وإنَّ الطاعون قد وقع بالشام … فذكر نحوه.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 4/ 60 - 61 من طريق محمد بن إسحاق، عن شعبة، عن المخارق بن عبد الله البجلي، عن طارق بن شهاب، عن أبي موسى الأشعري. كذا ذكر ابن إسحاق المخارقَ البجليَّ بدل قيس بن مُسلم، ولم يتابعه على ذلك أحدٌ، وقد عنعنه أيضًا، على أن مخارقًا هذا ثقةٌ، وقد اختُلف في اسم أبيه، فقيل: اسمه خليفة، وقيل: عبد الرحمن، وقيل: عبد الله.وقوله: اظْهَر، أي: اخرُج إلى ظاهر الأرض التي أنت فيها.والغَرْزُ: رِكاب الرَّحْل من جلدٍ مخروز.
[2] وقع في (ص) بعدها بياض، بين لفظتي "إليه" و"ليركبه"، وضُبّب في (ز) فوق العبارة دون بياض، ولا حاجة إلى استشكال العبارة، فقُصارى ذلك أنه حذف من العبارة نائب الفاعل، وهو معلوم من سياق الكلام، تقديره: قُدّم إليه بعيرُه أو حصانُه أو ركوبُه ليركبه، ومثل هذا سائغ عند العرب، ومنه قوله تعالى: {فَلَوْلَا إِذَا بَلَغَتِ الْحُلْقُومَ} أي: الروح. عُبيدة وعُمر بن الخطاب - لم يحضر هذه الواقعة بالشام، وإنما الذي حضرها وحدَّث طارقَ بنَ شهاب بها هو أبو موسى الأشعري كما في بعض الروايات، وكأنَّ طارقًا هو نفسُه كان يُفصح أحيانًا عمَّن حدَّثه بالخبر، وفي أحيان أخرى يُرسل الخبر، وعليه فما وقع في رواية المصنِّف من قول طارقٍ: أتانا كتابُ عمر، فوهمٌ.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 422 من طريق البيهقي، عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر 25/ 484 من طريق عثمان بن جَبَلة، عن شعبة، عن قيس بن مسلم بنحوه.وأخرجه بنحوه كذلك الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 4/ 305 من طريق عاصم بن علي الواسطي وعبد الرحمن بن زياد الرصاصي، والهيثم بن كليب الشاشي في "مسنده" (618) - ومن طريقه ابن عساكر 25/ 483 - من طريق وهب بن جرير بن حازم، وابنُ عساكر 24/ 423 من طريق آدم بن أبي إياس، والطبري في "تهذيب الآثار" في القسم الذي فيه مسانيد بعض العشرة (113) من طريق محمد بن جعفر، خمستهم عن شعبة، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، قال: كنا نتحدث إلى أبي موسى الأشعري، فقال لنا ذات يوم: … وإني سأُحدِّثكم ما ينبغي للناس في الطاعون، إني كنت مع أبي عبيدة وإنَّ الطاعون قد وقع بالشام … فذكر نحوه.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 4/ 60 - 61 من طريق محمد بن إسحاق، عن شعبة، عن المخارق بن عبد الله البجلي، عن طارق بن شهاب، عن أبي موسى الأشعري. كذا ذكر ابن إسحاق المخارقَ البجليَّ بدل قيس بن مُسلم، ولم يتابعه على ذلك أحدٌ، وقد عنعنه أيضًا، على أن مخارقًا هذا ثقةٌ، وقد اختُلف في اسم أبيه، فقيل: اسمه خليفة، وقيل: عبد الرحمن، وقيل: عبد الله.وقوله: اظْهَر، أي: اخرُج إلى ظاهر الأرض التي أنت فيها.والغَرْزُ: رِكاب الرَّحْل من جلدٍ مخروز.
5227 [3] - خبر صحيح، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن طارق بن شهاب - وإن كان له رؤية وأدرك أبا عُبيدة وعُمر بن الخطاب - لم يحضر هذه الواقعة بالشام، وإنما الذي حضرها وحدَّث طارقَ بنَ شهاب بها هو أبو موسى الأشعري كما في بعض الروايات، وكأنَّ طارقًا هو نفسُه كان يُفصح أحيانًا عمَّن حدَّثه بالخبر، وفي أحيان أخرى يُرسل الخبر، وعليه فما وقع في رواية المصنِّف من قول طارقٍ: أتانا كتابُ عمر، فوهمٌ.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 24/ 422 من طريق البيهقي، عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر 25/ 484 من طريق عثمان بن جَبَلة، عن شعبة، عن قيس بن مسلم بنحوه.وأخرجه بنحوه كذلك الطحاوي في "شرح معاني الآثار" 4/ 305 من طريق عاصم بن علي الواسطي وعبد الرحمن بن زياد الرصاصي، والهيثم بن كليب الشاشي في "مسنده" (618) - ومن طريقه ابن عساكر 25/ 483 - من طريق وهب بن جرير بن حازم، وابنُ عساكر 24/ 423 من طريق آدم بن أبي إياس، والطبري في "تهذيب الآثار" في القسم الذي فيه مسانيد بعض العشرة (113) من طريق محمد بن جعفر، خمستهم عن شعبة، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، قال: كنا نتحدث إلى أبي موسى الأشعري، فقال لنا ذات يوم: … وإني سأُحدِّثكم ما ينبغي للناس في الطاعون، إني كنت مع أبي عبيدة وإنَّ الطاعون قد وقع بالشام … فذكر نحوه.وأخرجه الطبري في "تاريخه" 4/ 60 - 61 من طريق محمد بن إسحاق، عن شعبة، عن المخارق بن عبد الله البجلي، عن طارق بن شهاب، عن أبي موسى الأشعري. كذا ذكر ابن إسحاق المخارقَ البجليَّ بدل قيس بن مُسلم، ولم يتابعه على ذلك أحدٌ، وقد عنعنه أيضًا، على أن مخارقًا هذا ثقةٌ، وقد اختُلف في اسم أبيه، فقيل: اسمه خليفة، وقيل: عبد الرحمن، وقيل: عبد الله.وقوله: اظْهَر، أي: اخرُج إلى ظاهر الأرض التي أنت فيها.والغَرْزُ: رِكاب الرَّحْل من جلدٍ مخروز.
5228 - أخبرني أبو العباس السَّيّاري في كتاب "الرِّقاق" لابن المبارك، أخبرنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا عبد الحميد بن بَهْرام، عن شَهْر بن حَوشَب، حدثني عبد الرحمن بن غَنْم، عن حديث الحارث بن عَمِيرة الحارثي، قال: أخذ معاذُ بن جَبَل يُرسل الحارثَ بن عَمِيرة إلى أبي عُبيدة بن الجَرّاح يسألُه كيف هو، وقد طُعِنَ، فأراهُ أبو عُبيدة طَعْنةً خرجت في كفِّه فنَكَأَ به [1] شأنُها، وفَرِقَ منها حين رآها، فأقسَم أبو عُبيدة له بالله ما يُحِبُّ أنَّ له مكانَها حُمْرَ النَّعَم [2].
হারিস ইবন 'আমীরা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মু'আয ইবন জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হারিস ইবন 'আমীরাকে আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠাতে শুরু করলেন, যেন তিনি তাঁর (আবূ উবাইদাহর) খোঁজ-খবর নেন যে তিনি কেমন আছেন, কারণ তিনি (তখন প্লেগে) আক্রান্ত হয়েছিলেন। অতঃপর আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে হাতের তালুতে বের হওয়া একটি প্লেগের ফোড়া দেখালেন, যার অবস্থা তাঁকে (হারিসকে) চিন্তিত করল এবং তা দেখে তিনি ভীত হলেন। তখন আবূ উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর কসম করে তাঁকে বললেন যে, এর (এই ফোড়ার) বিনিময়ে তাঁকে লাল উট (আরবের সর্বোচ্চ সম্পদ) দেওয়া হলেও তিনি তা পছন্দ করবেন না।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] في النسخ الخطية: فنكأته، بالتاء المثناة، ويغلب على ظننا أنها مصحفة عن نكأَ به، بمعنى: أثَّر بنفسِه شأنُها فأوجعه، يعني أثَّر بنفس الحارث بن عَمِيرة شأنُ الطعنة التي في كف أبي عُبيدة، ويؤيده قوله في بعض روايات الحديث: فبكى الحارثُ وفَرِق منها … فالضمير راجع إلى الحارث.
[2] إسناده فيه لِينٌ، شهرُ بنُ حَوشَب - وإن كان إلى الضعف أقرب - روايةُ عبد الحميد بن بَهْرام عنه قوية عند بعض أهل العلم. عبد الله: هو ابن المبارك، وعَبْدان: هو عبد الله بن عثمان بن جَبَلة المروزي، وأبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري.وهو في "الزهد والرقائق" لابن المبارك برواية الحسين المروزي (882)، ومن طريقه أخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 485.وأخرجه البزار (2671)، والطبراني في "الكبير" (364)، وابن عساكر 11/ 459 - 460 من طرق عن عبد الحميد بن بَهْرام، به.
5229 - أخبرني علي بن المُؤمَّل بن الحَسن بن عيسى، حدثنا أبي، حدثنا عمرو بن محمد العُثماني، حدثنا عَمرو بن خالد بن عاصم بن عمرو بن عثمان، حدثني عبد الملك بن نَوفَل بن مُساحِق، عن أبي سعيد المَقبُري، قال: لما طُعِن أبو عُبيدة، قال: يا معاذُ، صلِّ بالناس، فصلَّى معاذٌ بالناس، ثم مات أبو عُبيدة بن الجرَّاح، فقام معاذٌ في الناس، فقال: يا أيُّها الناسُ، تُوبوا إلى الله من ذُنوبِكم توبةً نَصُوحًا، فإِنَّ عبدَ الله لا يلقى الله تائبًا من ذنْبه إلَّا كان حقًّا على الله أن يغفرَ له، ثم قال: إنكم أيُّها الناسُ قد فُجِعتُم برجلٍ، واللهِ ما أَزعُمُ أني رأيتُ من عبادِ الله عبدًا قَطُّ أقلَّ غِمْرًا [1] ولا أبَرَّ صدرًا، ولا أبعدَ غائلةً، ولا أشدَّ حبًّا للعافية، ولا أنصحَ للعامّة منه، فترحَّمُوا عليه رحمه الله، ثم أَصْحِروا [2] للصلاةِ عليه، فوالله لا يَلِي عليكم مثلُه أبدًا، فاجتمع الناسُ وأُخرج أبو عُبيدة وتَقدَّم معاذٌ فصلَّى عليه، حتى إذا أُتي به قبرُه دَخَل قبرَه معاذُ بنُ جبل وعمرو بن العاص والضحّاك بن قيس، فلما وضعوه في لَحْده وخرجوا فسَنُّوا [3] عليه الترابَ قال معاذ بن جَبل: يا أبا عُبيدة، لأُثْنينَّ عليكَ ولا أقولُ باطلًا، أخافُ أن يَلْحَقَني بها من الله مَقْتٌ، كنتَ واللهِ ما علمتُ من الذاكرين الله كثيرًا، ومن الذين يَمشُون على الأرض هَوْنًا، وإذا خاطَبَهم الجاهِلون قالوا سَلامًا، ومن الذين إذا أنفَقُوا لم يُسرِفُوا ولم يَقْتُروا وكان بين ذلك قوَامًا، وكنتَ والله من المُخبِتِين المُتواضعين الذي يَرحَمُون اليتيمَ والمسكينَ، ويُبغِضُون الخائنين المُتكبِّرين [4].
আবূ সাঈদ আল-মাকবুরী থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: যখন আবূ উবাইদা ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আক্রান্ত (রোগাক্রান্ত বা আহত) হলেন, তিনি বললেন: হে মু'আয, তুমি মানুষের সাথে (জামাআতে) সালাত আদায় করো। অতঃপর মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মানুষের সাথে সালাত আদায় করলেন। এরপর আবূ উবাইদা ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তিকাল করলেন।
তখন মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মানুষের মাঝে দাঁড়িয়ে বললেন: হে লোকসকল, তোমরা তোমাদের গুনাহ থেকে আল্লাহর নিকট খাঁটি তওবা (তাওবাতান নাসুহা) করো। কারণ কোনো বান্দা তার গুনাহ থেকে তওবাকারী অবস্থায় আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ করলে, তাকে ক্ষমা করে দেওয়া আল্লাহর উপর অপরিহার্য হয়ে যায়।
এরপর তিনি বললেন: হে লোকসকল, তোমরা এমন একজন ব্যক্তিকে হারিয়েছ (যা তোমাদের জন্য শোকের কারণ হয়েছে)। আল্লাহর কসম! আমি দাবি করি না যে আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে আমি এমন কাউকে দেখেছি, যার অন্তর তাঁর চেয়ে কম বিদ্বেষপূর্ণ, যার বক্ষ তাঁর চেয়ে অধিক পবিত্র, যে তাঁর চেয়ে দূরবর্তী অনিষ্টকারী, যে তাঁর চেয়ে সুস্থতাকে অধিক ভালোবাসে, এবং যিনি সাধারণ মানুষের জন্য তাঁর চেয়ে বেশি কল্যাণকামী। সুতরাং তোমরা তাঁর জন্য রহমতের দোয়া করো। আল্লাহ তাঁকে রহম করুন। এরপর তোমরা তাঁর জানাযার সালাতের জন্য খোলা ময়দানে একত্রিত হও। আল্লাহর কসম! তাঁর মতো কেউ আর কখনোই তোমাদের উপর নেতৃত্ব দেবে না।
অতঃপর লোকেরা একত্রিত হলো এবং আবূ উবাইদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বের করা হলো। মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এগিয়ে গেলেন এবং তাঁর জানাযার সালাত আদায় করলেন। এরপর যখন তাঁকে কবরের কাছে আনা হলো, তখন মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং দাহহাক ইবনু কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কবরে প্রবেশ করলেন। যখন তাঁরা তাঁকে লাহাদে (কবরের একপাশে) রাখলেন এবং বেরিয়ে এসে তাঁর উপর মাটি দিলেন, তখন মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আবূ উবাইদা! আমি অবশ্যই তোমার প্রশংসা করব, আর আমি কোনো মিথ্যা বলব না। (কারণ) আমি আশঙ্কা করি যে এর কারণে আল্লাহর পক্ষ থেকে কোনো ক্রোধ যেন আমাকে স্পর্শ না করে। আল্লাহর কসম! আমি যা জানি, তুমি ছিলে সেইসব লোকেদের মধ্যে যারা আল্লাহকে অধিক স্মরণ করে, এবং সেইসব লোকেদের মধ্যে যারা পৃথিবীতে নম্রভাবে চলে, আর যখন মূর্খরা তাদেরকে সম্বোধন করে, তখন তারা 'সালাম' (শান্তি) বলে, এবং সেইসব লোকেদের মধ্যে যারা যখন ব্যয় করে, তখন তারা অপচয় করে না এবং কার্পণ্যও করে না, বরং উভয়ের মধ্যস্থলে থাকে। আল্লাহর কসম! তুমি ছিলে সেইসব বিনয়ী ও নম্রদের মধ্যে, যারা ইয়াতীম ও মিসকীনদের প্রতি দয়া করে এবং বিশ্বাসঘাতক ও অহংকারীদের ঘৃণা করে।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: عمدًا، وبُيِّض مكانها في (ص)، والمثبت على الصواب من "تلخيص المستدرك" للذهبي. وهو بكسر الغين المعجمة: وهو الحِقد، وزنًا ومعنًى.
[2] في (ص): أصبِحوا. ومعنى الإصحار: الخروج إلى الصحراء، وربما عنى معاذٌ الخروجَ إلى العَراء.
5229 [3] - سَنَّ الترابَ: إذا صبّه على وجه الأرض صبًّا سهلًا.
5229 [4] - إسناده ضعيف. عمرو بن خالد بن عاصم بن عمرو بن عثمان لم نتبيّنه، وقد تابعه عليه أبو مِخنَف لوط بن يحيى عند أبي بكر الدِّينَوري في "المُجالسة" (3143)، لكن أبا مِخنَف هذا تالف لا يوثق به، فلا اعتبار بمتابعته، على أنَّ الراوي عنه مبهم، ثم إنَّ أبا مخنف قال في روايته: عن سعيد بن أبي سعيد المقبُري، فحصل اختلاف في تسمية راوي القصة، وسعيدٌ المقبري لم يُدركها يقينًا.
5230 - حدثنا أبو عبد الله الأصبهاني، حدثنا محمد بن عبد الله بن رُسْتَه، حدثنا أبو أيوب سليمان بن داود الشاذَكُوني، حدثني محمد بن عمر الواقدي، حدثنا ثَوْر بن يَزيد، عن خالد بن مَعْدان، عن مالك بن يُخامِرَ: أنه وَصَفَ أبا عُبيدة، فقال: رجلٌ نحيفٌ مَعْروقُ الوجه، خَفِيف اللحية، طُوالٌ أجْنَى [1] أثرمَ الثَّنِيّتَين [2].
মালিক ইবনু ইয়ুখামির থেকে বর্ণিত যে, তিনি আবু উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনা দিয়ে বলেন: তিনি ছিলেন শীর্ণকায় একজন পুরুষ, যার মুখমণ্ডল ছিল রোগা/মাংসহীন, তাঁর দাড়ি ছিল হালকা, তিনি ছিলেন লম্বা, কিছুটা সামনের দিকে ঝুঁকে থাকা এবং সামনের দুটি দাঁত ভাঙা।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] كذلك أُعجمت في (ز) و"تلخيص المستدرك" للذهبي، بالجيم المعجمة، وهي لغة في أجْنأ، يقال: أجنأ وأجنى، مهموزًا وغير مهموز، وهو مَن أشرف كاهِلُه على صدره؛ يعني محدودب الظَّهر، وقيل: هو الأقعس الذي في صدره انكباب إلى ظهره، يعني معكوس المعنى السابق.
[2] وهو عند ابن سعد في "طبقاته الكبرى" 3/ 383 و 9/ 388 عن محمد بن عمر الواقدي، به، ومن طريق ابن سعد أخرجه ابن عساكر 25/ 444.ومَعْروق الوجه: قليل لحم الوجه.والأثْرمُ: مكسور السّنّ من أصله، أو انكسار سنٍّ من الأسنان المقدَّمة مثل الثنايا والرَّباعيات، أو هو خاصٌّ بالثنيَّة.
5231 - أخبرني عبد الرحمن بن الحسن القاضي، حدثنا إبراهيم بن الحُسين، حدثنا أبو مُسهِر عبد الأعلى بن مُسهِر، حدثنا يحيى بن حمزة، عن عُروة بن رُوَيم، قال: توفي أبو عُبيدة بن الجَرَّاح بفِحْل من الأردن سنة ثَمانَ عشرةَ [1].
উরওয়াহ ইবনু রুওয়াইম থেকে বর্ণিত, আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জর্ডানের ফিহলে আঠারো সনে ইন্তেকাল করেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وهو عند أبي زرعة الدمشقي في "تاريخه" ص 218، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 486 و 491 من طريقين عن أبي مُسهر. ولكن ليس فيه ذكر السنة.وقد جاء في "تاريخ أبي زرعة الدمشقي" ص 218 و 688 - 689، ومن طريقه عبد الجبار الخولاني في "تاريخ داريا" ص 114، وابن عساكر 25/ 488 من طريق محمد بن عائذ، عن أبي مُسهر، قال: قرأت في كتاب يزيد بن عبيدة: توفي أبو عبيدة سنة سبع عشرة.قلنا: كأنَّ هذا أثبت عن أبي مُسهر في سنة وفاة أبي عبيدة. والله أعلم، وهذا ممّا انفرد به ابن عائذٍ كما قال الذهبي في "السير" 1/ 23.وجمهور أهل التاريخ على أنه توفي سنة ثمان عشرة فيما قاله ابن عبد البر في "التمهيد" 2/ 277.وانظر مصداق قوله في "تاريخ دمشق" 25/ 488 وما بعدها. 9/ 264، ومقاتل لم يدرك مرّةً فيما يغلب على ظننا.وأخرجه البيهقي في "الكبرى" 9/ 27، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 446 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (360)، ومن طريقه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (558)، وابن عساكر 25/ 446 - 447 عن أبي يزيد القراطيسي، عن أسد بن موسى، به.والأَلُّ جمعُ الأَلّة: وهي الحَرْبة العريضةُ النَّصْل.ونقل ابن عساكر 25/ 447 عن الواقدي أنه كان ينكر أن يكون أبو أبي عُبيدة أدرك الإسلام وينكر قول أهل الشام: إنَّ أبا عُبيدة لقي أباه في زحفٍ فقتله، وقال: سألت رجالًا من بني فِهر منهم زُفر بن محمد وغيره فقالوا: توفي أبوه قبل الإسلام، ويُسنِد أهلُ الشام ذلك إلى الأوزاعي.قال ابن عساكر: وهذا غلط في قول الواقدي هذا.
5232 - أخبرنا أبو جعفر البغدادي، حدثنا أبو عُلَاثة، حدثني أبي، حدثنا ابن لَهِيعة، عن أبي الأسود، عن عُروة، قال: وممَّن شهد بدرًا من بني الحارث بن فِهْر: أبو عُبيدة بن الجرَّاح وهو ابن إحدى وأربعين سنةً [1].
উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: বানু আল-হারিথ ইবনু ফিহর গোত্রের যে সকল ব্যক্তি বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন, তাঁদের মধ্যে অন্যতম হলেন আবূ উবাইদাহ ইবনু আল-জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। সে সময় তাঁর বয়স ছিল একচল্লিশ বছর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه الطبراني (361) عن أبي عُلَاثة محمد بن عمرو بن خالد الحراني، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 444 من طرق عن عبد الله بن لَهِيعة، به. 9/ 264، ومقاتل لم يدرك مرّةً فيما يغلب على ظننا.وأخرجه البيهقي في "الكبرى" 9/ 27، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 446 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (360)، ومن طريقه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (558)، وابن عساكر 25/ 446 - 447 عن أبي يزيد القراطيسي، عن أسد بن موسى، به.والأَلُّ جمعُ الأَلّة: وهي الحَرْبة العريضةُ النَّصْل.ونقل ابن عساكر 25/ 447 عن الواقدي أنه كان ينكر أن يكون أبو أبي عُبيدة أدرك الإسلام وينكر قول أهل الشام: إنَّ أبا عُبيدة لقي أباه في زحفٍ فقتله، وقال: سألت رجالًا من بني فِهر منهم زُفر بن محمد وغيره فقالوا: توفي أبوه قبل الإسلام، ويُسنِد أهلُ الشام ذلك إلى الأوزاعي.قال ابن عساكر: وهذا غلط في قول الواقدي هذا.
5233 - فحدَّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الرَّبيع بن سليمان، حدثنا أسَد بن موسى، حدثنا ضَمْرة بن ربيعة، عن عبد الله بن شَوذَب، قال: جعل أبو أبي عُبيدة بن الجَرَّاح ينَصِبُ الأَلَّ لأبي عُبيدة يومَ بدرٍ، وجعل أبو عُبيدة يَحِيدُ عنه، فلما أكثرَ الجِراحَ قَصَدَه أبو عُبيدة فقَتَله، فأنزل اللهُ تعالى فيه هذه الآيةَ حين قَتَل أباه: {لَا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آبَاءَهُمْ أَوْ أَبْنَاءَهُمْ} الآية إلى آخرها [المجادلة: 22] [1].
আব্দুল্লাহ ইবনু শাওযাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বদরের যুদ্ধের দিন আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিতা আবু উবাইদাহর বিরুদ্ধে অস্ত্র চালনা করতে লাগলেন। আবু উবাইদাহ তাকে এড়িয়ে যেতে লাগলেন। যখন (পিতা) আঘাতের পরিমাণ বাড়িয়ে দিলেন, তখন আবু উবাইদাহ তাকে লক্ষ্য করে হত্যা করলেন। যখন তিনি তার পিতাকে হত্যা করলেন, তখন আল্লাহ তাআলা তার (আবু উবাইদাহর) সম্পর্কে এই আয়াতটি নাযিল করলেন: "যারা আল্লাহ ও আখিরাতের প্রতি বিশ্বাসী, তাদেরকে তুমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের বিরোধিতাকারীদের সাথে বন্ধুত্ব করতে দেখবে না— হোক না তারা তাদের পিতা, বা পুত্র,..." আয়াতটি শেষ পর্যন্ত (সূরা আল-মুজাদালাহ: ২২)।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده ضعيف لإعضاله، فإنَّ عبد الله بن شَوذَبٍ من تبع الاتباع، لكن روى مقاتل بن حيان مثلَه عن مُرّة الهَمْداني عن ابن مسعود إلّا أنه قال: يوم أُحد، فيما نقله عنه الثعلبي في "تفسيره" 9/ 264، ومقاتل لم يدرك مرّةً فيما يغلب على ظننا.وأخرجه البيهقي في "الكبرى" 9/ 27، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 446 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (360)، ومن طريقه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (558)، وابن عساكر 25/ 446 - 447 عن أبي يزيد القراطيسي، عن أسد بن موسى، به.والأَلُّ جمعُ الأَلّة: وهي الحَرْبة العريضةُ النَّصْل.ونقل ابن عساكر 25/ 447 عن الواقدي أنه كان ينكر أن يكون أبو أبي عُبيدة أدرك الإسلام وينكر قول أهل الشام: إنَّ أبا عُبيدة لقي أباه في زحفٍ فقتله، وقال: سألت رجالًا من بني فِهر منهم زُفر بن محمد وغيره فقالوا: توفي أبوه قبل الإسلام، ويُسنِد أهلُ الشام ذلك إلى الأوزاعي.قال ابن عساكر: وهذا غلط في قول الواقدي هذا.
5234 - حدثنا أبو بكر محمد بن داود الزاهد، حدثنا عبد الله بن قَحْطَبة، حدثنا العباس بن عبد العظيم، حدثنا وهب بن جَرير، حدثنا أبي، سمعت بشّار بن أبي سَيف يُحدِّث عن الوليد بن عبد الرحمن، عن عِياض بن غُطَيف، قال: دخلْنا على أبي عُبيدة بن الجرَّاح نعودُه وامرأتُه تُحيفَة جالسة عند رأسِه، وهو مُقبِلٌ بوجهِه على الجِدار، فقلنا لها: كيف باتَ أبو عُبيدة الليلةَ؟ قالت: باتَ بأجرٍ، فأقبل علينا بوجهِه فقال: إني لم أبِتْ بأجرٍ، ثم قال: ألا تَسألوني عما قلتُ؟ فقلنا: ما أعجَبَنا ما قلتَ فنسألَك عنه، فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "مَن أنفَقَ نفقةً في سبيلِ الله فبسبع مئةٍ، ومَن أنفَقَ على نفسِه وأهلِه، أو عادَ مريضًا، أو مازَ أذًى، فالحسنةُ بعَشْر أمثالِها، والصومُ جُنَّةٌ ما لم يَخرِقْها، ومن ابتلاهُ اللهُ بِبَلاءٍ فِي جَسَدِه فهو له حِطّةٌ" [1].
ইয়াজ বিন গুত্বাইফ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আবু উবাইদা ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অসুস্থতার সময় তাকে দেখতে গেলাম। তাঁর স্ত্রী তুহাইফা তাঁর শিয়রে বসা ছিলেন, আর তিনি (আবু উবাইদা) প্রাচীরের দিকে মুখ করে ছিলেন। আমরা তাঁকে (স্ত্রীকে) জিজ্ঞাসা করলাম: আজ রাতে আবু উবাইদা কেমন ছিলেন? তিনি বললেন: তিনি সাওয়াবের (পুণ্যের) সাথে রাত কাটিয়েছেন। তখন তিনি আমাদের দিকে মুখ ফিরালেন এবং বললেন: আমি সাওয়াবের সাথে রাত কাটাইনি। এরপর তিনি বললেন: তোমরা কি আমাকে জিজ্ঞেস করবে না আমি এমন কথা কেন বললাম? আমরা বললাম: আপনার কথা আমাদের কাছে বিস্ময়কর মনে হয়নি যে, আমরা আপনাকে সে বিষয়ে জিজ্ঞাসা করব। তখন তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে কোনো খরচ করে, তার জন্য সাতশত গুণ (সাওয়াব)। আর যে ব্যক্তি নিজের জন্য ও পরিবারের জন্য খরচ করে, অথবা কোনো অসুস্থ ব্যক্তিকে দেখতে যায়, কিংবা (রাস্তা থেকে) কোনো কষ্টদায়ক জিনিস সরিয়ে দেয়, তার জন্য প্রত্যেক নেকি দশগুণ। এবং সিয়াম (রোজা) হলো ঢাল, যতক্ষণ না সে তা ভঙ্গ করে (নষ্ট করে) ফেলে। আর আল্লাহ যার দেহকে কোনো বিপদে বা অসুস্থতায় পতিত করেন, তা তার গুনাহের কাফফারা (ক্ষমা) হয়ে যায়।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] إسناده حسن من أجل بشار بن أبي سيف، فقد روى عنه ثقتان وذكره ابن حبان في "الثقات"، وصحَّح حديثَه هذا أبو حاتم الرازي كما يُفهم من كلامه الذي نقله عنه ابنه في "العلل" (688)، وصحَّحه كذلك ابن خزيمة (1892)، لكن صحَّح البخاريُّ وغيره أن تابعيَّه هو غُضيف بن الحارث، ويؤيده وروده من طريق أخرى بمعناه عن غُضيف بن الحارث كما سيأتي، والله أعلم.وأخرجه أحمد 3/ (1701) عن يزيد بن هارون، عن جرير بن حازم، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد (1690) و (1700) من طريق واصل مولى أبي عُيينة، عن بشار بن أبي سيف.وأخرجه النسائي (2554) من طريق واصل، عن بشار مختصرًا بذكر الصوم.وله طريق أخرى بمعناه عند البخاري في "الأدب المفرد" (491) من طريق سُليم بن عامر، عن غُضَيف بن الحارث، عن أبي عبيدة. وقد وقع في "الأدب المفرد" المطبوع: غطيف، بالطاء، لكن قول البخاري في "تاريخه الأوسط" 2/ 1014 يفيد أنه بالضاد المعجمة، لأنه قال: وقال الثوري في حديثه: غطيف بن الحارث، وهو وهمٌ. ونقل البيهقيُّ في "الكبرى" 9/ 171 عن البخاري أنَّ الصحيح غُضيف بن الحارث الشامي، هكذا ذكره بالضاد المعجمة. وجاء في رواية الخفاف عن البخاري "للتاريخ الأوسط" 2/ 1014 ما نصه: وقال الزُّبيدي: عن سُليم بن عامر، سمع غُضيفَ بن الحارث، عن أبي عُبيدة. وهذا إسناد "الأدب المفرد" نفسُه، ولفظُه في "الأدب المفرد": عن غضيف بن الحارث: أنَّ رجلًا أتى أبا عُبيدة بن الجراح وهو وجعٌ، فقال: كيف أمسى أجر الأمير؟ فقال: هل تدرون فيم تؤجرون به؟ فقال: بما يُصيبنا فيما نكرَهُ، فقال: إنما تؤجرون بما أنفقتم في سبيل الله، واستُنفِق لكم، ثم عدَّ أداة الرَّجُل كلّها حتى بلغ عِذارَ البِرذَون، ولكن هذا الوَصَبَ الذي يصيبُكم في أجسادكم يُكفّر الله به من خطاياكم.وقوله: حِطَّة، أي: تَحُطُّ عنه خطاياه وذُنوبه.
5235 - أخبرني خَلَف بن محمد البُخاري، حدثنا محمد بن حُريث، حدثنا عمرو بن علي، سمعت يحيى بن سعيد يقول: مات أبو عُبيدة وهو ابن ثَمانٍ وخمسينَ سنةً [1].
ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে বর্ণিত,
আবূ উবাইদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন মারা যান, তখন তাঁর বয়স ছিল আটান্ন (৫৮) বছর।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 489 من طريق أخرى عن أبي حفص عمرو بن علي الفلّاس من قوله هو لم يجاوزه. وشيخُ الفلّاس هنا هو يحيى بن سعيد القطانُ.وهذا يكاد يكون مُجمعًا عليه بين أهل التاريخ في سنّ أبي عبيدة لدى وفاته كما في "تاريخ دمشق" 25/ 488 - 490، سوى ما حكاه ابن إسحاق أنه عاش إحدى وأربعين سنة، وهو شاذٌّ.
5236 - أخبرنا أحمد العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد، حدثنا سليمان بن عبد الرحمن الدّمشقي، حدثنا الوليد بن مُسلم الدّمشقي، عن سعيد بن عبد العزيز، قال: مات أبو عُبيدة الجراح بالأردن سنة ثمانَ عشرةَ، وصلَّى عليه معاذُ بن جَبَل رضي الله عنهما [1].
সাঈদ ইবনে আব্দুল আযীয থেকে বর্ণিত, আবূ উবাইদা আল-জাররাহ আঠারো (হিজরী) সনে জর্ডানে ইন্তেকাল করেন। আর মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন। আল্লাহ তাদের উভয়ের প্রতি সন্তুষ্ট হোন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وأخرجه أبو نعيم في "معرفة الصحابة" (585).
5237 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفان، حدثنا أبو أسامة، حدثنا عمر بن حمزة، حدثنا سالم بن عبد الله، أنَّ عبد الله بن عمر أخبرهم، أنَّ عمر بن الخطّاب قال: ما تَعرّضتُ للإمارة، وما أحببتُها، غير [1] أنَّ ناسًا من أهل نَجْرانَ أتَوْا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فاشتَكَوا إليه عامِلَهم، فقال: "لأبعثَنَّ عليكم الأمينَ"، قال عمرُ: فكنتُ فيمن تَطاوَل رجاءَ أن يَبعثَني، فبعثَ أبا عُبيدةَ [2]. صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি কখনও নেতৃত্বের জন্য অগ্রসর হইনি এবং আমি তা পছন্দও করিনি। তবে (একবার) নাজরানের কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাদের গভর্নরের বিরুদ্ধে অভিযোগ করল। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাদের কাছে অবশ্যই একজন বিশ্বস্ত ব্যক্তিকে প্রেরণ করব।" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমাকে প্রেরণের আশায় আমি তাদের মধ্যে ছিলাম যারা উঁকি মেরেছিলাম (বা আগ্রহী হয়েছিলাম)। কিন্তু তিনি আবূ উবাইদাহকে প্রেরণ করলেন।
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] وقع في "تلخيص المستدرك" للذهبي: يشير، بدل قوله: غير، وكذلك رُسمت في (ز) و (ص) و (ب) لكن بدون إعجام، والمثبت على الصواب من "إتحاف المهرة" للحافظ ابن حجر (15604). وللمرفوع منه عن عمر بن الخطاب طرق أخرى، منها ما سيأتي برقم (5246)، وانظر تمام طرقه هناك.ويشهد له مع القصة لكن دون تسمية عمر بن الخطاب فيه حديثُ حذيفة بن اليمان، عند أحمد 38/ (3377)، والبخاري (4380)، ومسلم (2420)، والنسائي (8142) و (8143). فذكر نحوه ثم قال: فاستشرف لها أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "قم يا أبا عُبيدة بن الجراح". وانظر ما سيأتي برقم (5243).ويشهد له كذلك لكن دون ذكر استشراف أحد من الصحابة حديث أنس الآتي برقم (5244).وللمرفوع وحده شاهدٌ من حديث أبي بكر الصديق سيأتي برقم (5245).ومن حديث عمر بن الخطاب سيأتي برقم (5246).ومن حديث أنس بن مالك سيأتي برقم (5894).وسيأتي كذلك عن عبد الله بن عمر بن الخطاب برقم (6414)، لكن إسناده ضعيف.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عمر بن حمزة - وهو ابن عبد الله بن عمر بن الخطاب - ولحديثه هذا ما يشهد له كما سيأتي. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة.وأخرجه مختصرًا بالمرفوع منه البزار (117)، وأبو يعلى (228)، والحكيم الترمذي في "نوادر الأصول" (749)، وابن عدي في "الكامل" 5/ 19، وأبو نعيم في "حلية الأولياء" 1/ 101، وأبو الحسن الخِلَعي في "الخِلَعيات" (724)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 460 من طرق عن أبي أسامة حماد بن أسامة، به، بلفظ: "لكل أمةٍ أمين، وأمين هذه الأمة أبو عبيدة بن الجرّاح".وأخرجه بطوله يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 1/ 488، وابن عساكر 25/ 458 - 459 و 459 من طريق عبد الرزاق بن عمر الدمشقي، عن الزهري، عن سالم بن عبد الله بن عمر، به. وعبد الرزاق هذا متروك الحديث، فلا اعتداد بمتابعته هذه.وأخرج القصة ابن عساكر 25/ 462 عن بلال بن يحيى العبسي الكوفي، عن عمر بن الخطاب.ورجاله لا بأس بهم، لكنه منقطع لأنَّ بلالًا لم يُدرك عمر بن الخطاب.وأخرجها أيضًا ابن إسحاق، كما في "سيرة ابن هشام" 1/ 583، وابن المنذر في "تفسيره" (557)، وابن عساكر 25/ 462 حدَّثه محمد بن جعفر بن الزبير، فذكر نحو القصة، ورجاله لا بأس بهم كذلك لكنه منقطع أيضًا. ولكن بأي حال فالخبر صحيح بمجموع هذه الطرق الثلاثة غير طريق عبد الرزاق بن عمر. وللمرفوع منه عن عمر بن الخطاب طرق أخرى، منها ما سيأتي برقم (5246)، وانظر تمام طرقه هناك.ويشهد له مع القصة لكن دون تسمية عمر بن الخطاب فيه حديثُ حذيفة بن اليمان، عند أحمد 38/ (3377)، والبخاري (4380)، ومسلم (2420)، والنسائي (8142) و (8143). فذكر نحوه ثم قال: فاستشرف لها أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: "قم يا أبا عُبيدة بن الجراح". وانظر ما سيأتي برقم (5243).ويشهد له كذلك لكن دون ذكر استشراف أحد من الصحابة حديث أنس الآتي برقم (5244).وللمرفوع وحده شاهدٌ من حديث أبي بكر الصديق سيأتي برقم (5245).ومن حديث عمر بن الخطاب سيأتي برقم (5246).ومن حديث أنس بن مالك سيأتي برقم (5894).وسيأتي كذلك عن عبد الله بن عمر بن الخطاب برقم (6414)، لكن إسناده ضعيف.
5238 - أخبرنا حمزة بن العباس، حدثنا إبراهيم بن الهيثم البَلَدي، حدثنا الهيثَم بن جَميل، حدثنا المُبارك بن فَضَالة، عن الحسن، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ما من أصحابي أحدٌ إلَّا ولو شئتُ لأخذتُ عليه في بعضِ خُلُقِه، غيرَ أبي عُبيدة بن الجَرَّاح" [1]. هذا مرسلٌ غريب، ورواتُه ثقاتٌ.
হাসান থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত আমার সাহাবীদের মধ্যে এমন কেউ নেই, যার কোনো কোনো স্বভাব বা আচরণের ওপর আমি যদি চাইতাম, তবে সমালোচনা করতে পারতাম।"
تحقيق الشيخ د. محمد كامل قرة بلي:
[1] حسنٌ لغيره، وهذا إسناد رجاله لا بأس بهم، لكنه مرسل وفيه عنعنة المبارك بن فضالة، لكن روي من غير وجهٍ عن الحسن - وهو البصري - فيبقى إرسالُه، وقد روي مثلُه من مرسل محمد بن المنكدر، ومن وجه ثالث عن سعيد بن عبد العزيز الدمشقي منقطعًا، ورجالهما ثقات، فيرتقي الخبر إلى درجة الحسن باجتماع هذه الطرق إن شاء الله.وأخرجه أبو بكر الخلّال في "السنة" (345)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 25/ 473 من طريق وكيع بن الجراح عن المبارك بن فضالة به.وأخرجه ابن أبي شيبة 12/ 135 من طريق يونس بن عُبيد، وأحمد في "فضائل الصحابة" (1283)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 11/ 488، وابن عساكر 25/ 473 من طريق زياد الأعلم، وأحمد في "الفضائل" (1283) من طريق حميد الطويل، ثلاثتهم عن الحسن البصري. وأخرج مثله ابن عساكر 25/ 473 من مرسل محمد بن المنكدر بسندٍ رجاله ثقات.وأخرج مثله كذلك 25/ 473 عن سعيد بن عبد العزيز الدمشقي رفعه. وسعيد من تبع الأتباع، فهو معضل على ثقة رجاله.